Mr. M.K. Gandhi, a peaceful Indian freedom fighter was a man of practicality, not mere that of a theory. Whatever he said in his life, he proved all that practically. He translated and explained the Geeta, a Hindu sacred text, practically while he was there inside a prison. The compilation arose in the form of a book named as “Anasakti Yoga” in Hindi. He has described in that the scientific and practical meaning of the teachings of Geeta.Therein he has given full stress on the unattached attitude of living a fully functional and practical human life. He has uncovered this deep secret lying inside Geeta. Although I haven’t read that fully myself but I have read that’s modern and Tantric variety in the name of book “Shareervigyan darshan- ek aadhunik kundalini tantra (ek yogi ki premkatha)” by Premyogi vajra in Hindi. Premyogi vajra has proved scientifically that everything including every religion and philosophy exist there inside our own human body. Although there is total environment of unattached / nondual attitude there inside this micro society against the duality / attachment filled environment in our so famous day to day macro society. He has utilized the health science related knowledge fully to unveil this secret. As a result, the book appears resembling a Hindu Purana although in a more comprehensible, scientific and widely acceptable way comparatively. The full information of this book is available here at the webpage-
It’s also the birth anniversary of Mr. Laal bahaadur shaastri, the second prime minister of Independent India today, therefore salute to both of these great men.
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श्री मोहनदास कर्मचंद गांधी, एक शांतिपूर्ण भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और व्यावहारिकता से भरे हुए आदमी थे, न कि केवल एक सिद्धांतवादी। जो कुछ भी उन्होंने अपने जीवन में कहा, उसे व्यावहारिक रूप से साबित करके भी दिखाया। उन्होंने गीता का सरलीकृत अनुवाद तब किया, जब वे जेल में थे। वह संकलन हिंदी में “अनासक्ति योग” नामक पुस्तक के रूप में उभरा। उन्होंने गीता की शिक्षाओं को वैज्ञानिक और व्यावहारिक अर्थ में वर्णित किया है। उन्होंने इसमें पूरी तरह कार्यात्मक व व्यावहारिक मानव जीवन जीने के साथ अनासक्तिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने पर पूरा जोर दिया है। उन्होंने गीता के अंदर बसने वाले इस गहरे रहस्य को उजागर किया है। यद्यपि मैंने इसे स्वयं विस्तार से नहीं पढ़ा है, केवल इसकी प्रस्तावना ही पढ़ी है, लेकिन मैंने प्रेमयोगी वज्र द्वारा “शरीरविज्ञान दर्शन-एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” नामक किताब को अच्छी तरह से पढ़ा है, जो उपरोक्त पुस्तक का आधुनिक व तांत्रिक रूपान्तर ही प्रतीत होती है। प्रेमयोगी वज्र ने वैज्ञानिक रूप से साबित कर दिया है कि हर धर्म और दर्शन सहित सब कुछ हमारे अपने मानव शरीर के अंदर बसा हुआ है। यद्यपि इस सूक्ष्म शरीर-समाज के भीतर हमारी रोजमर्रा की मैक्रो सोसाइटी/स्थूल समाज के विपरीत पूर्ण अनासक्ति व अद्वैत का वातावरण विद्यमान है। इस रहस्य का अनावरण करने के लिए उन्होंने स्वास्थ्य विज्ञान से संबंधित ज्ञान का भी पूरी तरह से उपयोग किया है। नतीजतन, पुस्तक एक हिंदु-पुराण जैसी दिखती है, हालांकि तुलनात्मक रूप से एक अधिक समझपूर्ण, वैज्ञानिक, व्यापक व सर्वस्वीकार्य तरीके से। इस पुस्तक की सम्पूर्ण जानकारी यहां निम्नोक्त वेबपृष्ठ पर उपलब्ध है-
आज स्वतंत्र भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्मदिवस भी है, इसलिए इन दोनों महापुरुषों को कोटि-2 नमन।
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