मेरे द्वारा संकलित व पूर्ववर्णित ई-पुस्तक का प्रचाराभियान- Promotion of a compiled and predefined ebook by me

मेरे द्वारा संकलित व पूर्ववर्णित ई-पुस्तक का प्रचाराभियान (please browse down or click here to view post in English)-

मैंने उस ई-पुस्तक को पूर्णरूप से निर्मित होने से पहले ही केडीपी किन्डल पर डाल दिया था। नई तैयार लिखित सामग्री को मैं प्रतिदिन उस पर अपडेट कर लिया करता था। मैंने उस पुस्तक को किन्डल अनलिमिटिड में ज्वाइन कराया हुआ था, जिसके अनुसार किन्डल अनलिमिटिड के उपभोक्ता उस पुस्तक को मुफ्त में डाऊनलोड कर सकते थे। इस तरह से, पूर्ण निर्माण होने तक मेरी पुस्तक का कुछ प्रचार स्वयं ही हो गया था। वैसे मेरी किस्मत अच्छी रही जो किसी ने अधूरी पुस्तक की समीक्षा / रिव्यू नहीं डाली, क्योंकि उससे पुस्तक की कमियाँ पाठकों के समक्ष उजागर हो सकती थीं। मेरी पुस्तक को सर्वोत्तम समीक्षा तब मिली, जब वह पूर्ण रूप में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत हुई। लैंडिंग पेज / landing page भी मैंने बहुत पहले ही बना दिया था। लैंडिंग पेज एक वेबसाईट / website का वेबपेज / webpage, मुख्यतया होमपेज / homepage होता है, जिसमें पुस्तक के बारे में सम्पूर्ण जानकारी लिखी होती है, तथा उस पुस्तक के ऑनलाइन बुक-स्टोर / online book store का भी लिंक / link दिया होता है। इच्छुक पाठक उस लिंक पर क्लिक करके बुक स्टोर में पहुँचते हैं, और वहां से उस पुस्तक को खरीद लेते हैं। लैंडिंग पेज एक प्रकार से पुस्तक की दुकान ही होती है, और बुक स्टोर का बुक-डिटेल पेज / book detail page एक प्रकार का कैश-काऊंटर होता है। जब भी कभी पुस्तक के लिए एड-केम्पेन (प्रचाराभियान) / ad campaign चलाई जाती थी, तब उसमें लैंडिंग पेज का ही लिंक दिया गया होता था, सीधा बुक-स्टोर का नहीं। वह इसलिए क्योंकि बुक-स्टोर में पुस्तक के बारे में बहुत कम प्रारम्भिक जानकारी होती है, और वह पाठक को पुस्तक खरीदने के लिए अधिक प्रोत्साहित नहीं करता। लैंडिंग पेज में एक प्रकार से सम्पूर्ण पुस्तक ही संक्षिप्त रूप में विद्यमान होती है। मैंने तो सम्पूर्ण वेबसाईट ही पुस्तक के निमित्त कर दी थी। इससे उन पाठकों को भी लाभ मिलता था, जो किसी कारणवश विस्तृत पुस्तक को खरीद नहीं सकते थे, या पढ़ नहीं सकते थे। मैंने गूगल की एड-केम्पेन लगा कर देखी, पर उससे मुझे कोई विशेष लाभ प्रतीत नहीं हुआ। मैं क्वोरा पर प्रश्नों के उत्तर लिखा करता था। उत्तर के अंत में मैं अपनी वेबसाईट का लिंक भी लगा दिया करता था। उससे मेरी वेबसाईट पर ट्रेफिक / traffic तो काफी बढ़ गई थी, पर पुस्तक की खरीद नहीं हो पा रही थी। फेसबुक पर अपनी वेबसाईट के बारे में पोस्ट डाल कर भी बहुत कम ट्रेफिक आ रही थी। मैंने अपने सभी सोशल मीडिया अकाऊंट / social media account पर अपने वेबसाईट का लिंक लगा रखा था। पुस्तक के किन्डल अनलिमिटिड / kindle unlimited में होने की वजह से मुझे 3 महीने में 5 दिनों के लिए मुफ्त पुस्तक के रूप में उस पुस्तक के प्रचार का अवसर मिला हुआ था। उससे लगभग 40 के करीब निःशुल्क पुस्तकें पाठकों के द्वारा डाऊनलोड कर ली जाती थीं। उसके बाद 4-5 सशुल्क पुस्तकें भी बिक जाती थीं। रीडरशिप के अनुसार किण्डल अनलिमिटेड का फंड वितरित होता रहता है। मैंने एक बार किन्डल अनलिमिटिड को बंद कराकर पोथी डॉट कोम / pothi.com पर भी पुस्तक को डाला। निःशुल्क रूप में तो वहां से 2 महीने के अन्दर 15 पुस्तकें उठ गईं, पर सशुल्क रूप में एक भी नहीं। इसी के साथ ही मैंने स्मैशवर्ड / smashword, डी2डी / D2D आदि अन्य ई-बुक साईटों पर भी उस पुस्तक को डाला हुआ था। उनमें से तो एक भी पुस्तक डाऊनलोड / download नहीं हुई। अतः मैंने इन सभी साईटों से पुस्तक को हटा लिया, और उसे किन्डल अनलिमिटिड में पुनः ज्वाइन / join करा दिया। किन्डल अनलिमिटिड में रहते हुए किसी दूसरे प्लेटफोर्म / platform पर पुस्तक को पब्लिश / publish नहीं कर सकते हैं। वास्तव में किन्डल ही ई-पुस्तकों का नेता है, विशेषकर भारत में। भारत में लगभग 70% से अधिक ई-पुस्तकें अमेजन / amazon के किन्डल-स्टोर के माध्यम से ही खरीदी जाती हैं। वैसे भारत में कुल पुस्तकों का केवल लगभग 10% हिस्सा ही ई-पुस्तकों के रूप में पढ़ा जाता है। फेसबुक की एड-केम्पेन से मुझे सर्वाधिक बिक्री मिली। उसमें ग्राहकों को सुविधानुसार लक्षित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, मैं अपने ग्राहकों को योग, ई-बुक लवर, किन्डल ई-रीडर आदि शब्दों तक ही सीमित कर देता था। उसमें स्थान को भी लक्षित किया जा सकता है। मैं अपनी पुस्तक को हिंदीभाषी प्रदेशों व क्षेत्रों तक ही सीमित कर देता था। इसी तरह, मैं 25-45 वर्ष के आयु-वर्ग के लोगों को ही लक्षित करता था। पुरुष व स्त्री दोनों को लक्षित करता था। उसमें एक रुपए से लेकर जितने मर्जी रुपए को खर्च करने का निर्देश दिया जा सकता है। डेबिट कार्ड / क्रेडिट कार्ड का डिटेल मैंने उसमें डाल दिया था। फेसबुक / facebook खुद उससे समयानुसार पैसे निकाल लेता था। उसकी ख़ास बात है की उस एड को किसी के द्वारा देखने पर पैसे नहीं कटते, अपितु तभी कटते हैं, जब कोई उस एड के लिंक पर क्लिक करके लैंडिंग पेज पर पहुँचता है। एक क्लिक लगभग डेढ़ रुपए से लेकर पांच रुपए तक की होती है, डिवाईस / device के अनुसार व अन्य अनेक परिस्थितियों के अनुसार। मोबाईल न्यूजफीड / mobile newsfeed पर संभवतः सबसे महँगी होती है। इसको भी हम सेट / set कर सकते हैं कि किस-2 एप / app (फेसबुक, मेसेंजर या इन्स्टाग्राम) पर कितनी-2 एड दिखानी है। अन्यथा फेसबुक स्वयं ही सर्वोत्तम अनुपात बना कर रखता है। बाद में तो मैंने फेसबुक पेज (बिजनेस परपस / business purpose) भी मुफ्त में बना लिया। उस पर एड डालना और भी आसान हो गया। मैंने अपने वेबसाईट-ब्लॉग / website-blog को अपने फेसबुक पेज के साथ कनेक्ट / connect कर दिया था। उससे जब भी मैं कोई ब्लॉग-पोस्ट अपनी वेबसाईट पर डालता था, तब वह स्वयं ही उसी समय मेरे फेसबुक-पेज पर भी शेयर / share हो जाती थी। फेसबुक पेज पर एक ऑप्शन / option उस पोस्ट को बूस्ट करने के लिए आता था। एक बार मैंने कौतूहलवश उस बूस्ट-बटन / boost button को दबा दिया। कुछ घंटों बाद मुझे अपनी वेबसाईट पर एकदम से बढ़ी हुई ट्रेफिक मिली। उस सम्बंधित पोस्ट को 45 शेयर मिले हुए थे। वह ट्रेफिक फेसबुक से आ रही थी। जब मैंने फेसबुक खोलकर एड-स्टेटस का पता किया, तो वह उस पोस्ट के लिए एक्टिवेटड / activated थी। लगभग 400 रुपए खर्च हो चुके थे। उस पोस्ट को 32 लाईक्स मिल चुके थे, और उसे 15000 लोगों ने (हरियाणा के, अपने आप सेट) देख लिया था। साथ में मेरी 3-4 पुस्तकें भी बिक चुकी थीं। वह तो बड़े घाटे का सौदा लगा, क्योंकि उन पुस्तकों से 70-80 रुपए की ही कमाई हो पाई थी। मैंने तुरंत उस पोस्ट- बूस्ट की एड को बंद करवा दिया। फिर मुझे इंटरनेट से अतिरिक्त जानकारी मिली की एड-केम्पेन पोस्ट-बूस्ट से कहीं अधिक बेहतर व कम खर्चीली होती है। यह भी पता चला कि पुस्तक प्रचार से अधिकांशतः उतनी कमाई नहीं होती है, जितना उस पर खर्चा आता है।

अगली पोस्ट में हम वेबसाईट निर्माण से सम्बंधित स्वानुभूत जानकारी को साझा करेंगे।

यदि आपको इस पोस्ट से कुछ लाभ प्रतीत हुआ, तो कृपया इसके अनुसार तैयार की गई उपरोक्त अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। इस पुस्तक की संक्षिप्त रूप में सम्पूर्ण जानकारी आपको इसी पोस्ट की होस्टिंग वेबसाईट / hosting website पर ही मिल जाएगी। धन्यवाद।

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ई-रीडर व ई-बुक्स के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।

Promotion of a compiled and predefined ebook by me-

I had put that e-book on the KDP platform of Amazon kindle even before it was fully formed. I used to update the new written material on it every day. I had joined that book in Kindle Unlimited, according to which consumers of Kindle Unlimited could download that book for free. In this way, till the complete construction,  my book had got enough exposure. Before my book has been complete, luckily I did not get any review of that incomplete book, because the book’s shortcomings could be exposed to the readers. My book got the best review when it was presented to the readers in full form. I had made the landing page too long ago. The landing page is a website’s webpage, mainly homepage, in which the complete information about the book is written, and also links to the online Book Store of that book are provided there. Interested readers reach the book store by clicking on the link, and buy that book from there. Landing pages are a book shop, and Book Store’s Book-Detail page is a type of cash-counter. Whenever the ad-campaign was run for the book, it was given a link to the landing page tthere, not a direct one to book-store. That’s because book-store has very little initial information about the book, and it does not encourage readers to buy the book more. In a way, the entire book in a landing page is in short form. I had made the entire website just for the sake of the book. It also benefited those readers, who could not buy or read a detailed book for some reason. I looked at Google’s ad-campaign, but it did not seem to be a special advantage to me. I used to write answers to queries on quora. At the end of the reply, I used to link my website too. From that the traffic on my website had increased a lot, but the book was not able to be bought. Posting about my website on Facebook was also very low to attract traffic. I had put a link to my website on all my social media accounts. Because of the book’s kindle unlimited, I had the opportunity to publicize that book in the form of a free book for 5 days in 3 months. Nearly 40 free books were downloaded by the readers. After that 4-5 paid books were also sold. Kindle unlimited fund is distributed according to the readership. I once put the book on Pothi.com by closing the Kindle Unlimited. In the free form, 15 books got up within two months from there, but none in the paid form. At the same time, I had inserted that book on other e-book sites like Smashword, D2D etc. None of books were downloaded from those. So I removed the book from all these sites, and rejoined it in Kindle Unlimited. Self publisher can not publish the book on another platform while being in kindle unlimited. In fact, Kindle is the leader of e-books, especially in India. More than about 70% of e-books in India are purchased through the Amazon Kindle Store. In India, only about 10% of the total books are read as e-books. I got the best sale from Facebook’s ad-campaign. Customers can be targeted according to convenience. For example, I used to limit my clients to the words like Yoga, eBook lover, Kindle e-Reader etc. Location can also be targeted in it. I used to restrict my book to Hindi-speaking states and regions. Similarly, I used to target people aged 25-45 years of age. I targeted both men and women. It can be instructed to spend rupees from one rupee to as much as you like. I had put the details of debit card / credit card in it. Facebook itself withdraw money from time to time. His special thing is that he does not deduct money from anyone watching the ad, but only when he gets to the landing page by clicking the link of that ad. One click ranges from about 1.5 rupees to five rupees, according to the device and many more conditions. Mobile Newsfeed is probably the most expensive. We can also set this to show how much fraction of ad to show on which app (Facebook, Messenger or Instagram). Otherwise Facebook itself maintains the best ratio. Later on, I also created the Facebook Page (Business Purpose) for free. It was even easier to add an ad to it. I had connected my website-blog to my Facebook page. Whenever I used to post a blog-post on my website, it would have been shared on my Facebook page at the same time. An option on the Facebook page came to boost the post. Once upon a time I suppressed that boost-button. After a few hours, I found the tremendous traffic on my website. 45 related shares were received in that respective post. That traffic was coming from Facebook. When I opened Facebook and found the ad-status, it was activated for that post. About 400 rupees had been spent. That post had received 32 likes, and it was seen by 15,000 people (Haryana, the self set). Along with my 3-4 books were also sold. It was a big loss deal, because those books were able to earn only Rs. 70-80. I immediately stopped the post’s Boost. Then I got additional information from the Internet that the ad-campaign is far better and less expensive than Post-Boost. I also came to know that the book promotion is not as much as earning as much as it costs.

In the next post we will share the self experienced matters during a website development.

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed as the best, excellent and must read by everyone) made with steps as told above. If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

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Know in full detail about e-readers and e-books here.

 

स्वयंप्रकाशन, आधुनिक तकनीक की एक अद्भुत देन-Self-publishing, a wonderful creation of modern technology 

स्वयंप्रकाशन, आधुनिक तकनीक की एक अद्भुत देन (please browse down or click here to view post in English)

मुझे हाल ही में एक पुस्तक को तैयार करने का मौका मिला, जिसका नाम है, “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)”, और जिसको लिखा है, प्रेमयोगी वज्र नामक एक रहस्यमयी योगी ने। सबसे पहले मैंने उसके द्वारा कई वर्षों से समेटी गई अस्त-व्यस्त रूप की लिखित सामग्री / written material को सही ढंग से क्रमबद्ध किया। फिर बारम्बार उसको पढ़कर, उस पूरी सामग्री को अपने मन में बैठा लिया। वास्तव में लिखने का काम तो बहुत से लोग कर लेते हैं, परन्तु अंतिम दौर में उसे पुस्तक के रूप में सभी नहीं ढाल पाते। यह इसलिए, क्योंकि उसके लिए बहुत अधिक कड़ी व अनवरत मेहनत समेत संघर्ष, लगन, ध्यान, धारणाशक्ति व निरंतरता की आवश्यकता होती है। तीव्र एकाग्रता व स्मरणशक्ति को लम्बे समय तक बना कर रखना पड़ता है। पूरी पुस्तक-सामग्री को मन में एकसाथ बैठा कर रखना पड़ता है, ताकि पूरी सामग्री को युक्तियुक्तता, रोचकता व सजावट के साथ क्रमबद्ध किया जा सके। साथ में, जिससे उसमें पुनुरुक्तियाँ / repetitions भी न हो पाएं। फिर मैंने उसकी बहुत सी पुनुरुक्तियों को हटाया, तथा निर्मित क्रमबद्ध रूप में ही उसे कम्प्युटर पर टाईप करने लगा। समय की कमी के कारण लगभग 300 पृष्ठों को टाईप करने में एक साल लग गया। प्रेमयोगी वज्र बीच-2 में भी लिखित सामग्री भेजता रहा, जिसे भी मैं प्रसंगानुसार उस वर्ड फाईल / word file के बीच-2 में जोड़ता रहा। मैं माईक्रोसोफ्ट वर्ड-2007 / Microsoft word-2007 पर टाईप / type कर रहा था। कहीं मेरा टाईप किया हुआ मेटीरियल / material कम्प्यूटर की खराबी से या अन्य कारणों से नष्ट न हो जाता, उसके लिए मैं अपनी टाईप की हुई फाईल को डी-ड्राईव / D-drive (जिस पर विंडोस-फाईल्ज / windows files नहीं होतीं) में रख लेता था, और साथ में बाहरी स्टोरेज / external storage पर बेक-अप / backup के रूप में भी सुरक्षित रख लेता था। मैंने 600 रुपए के वार्षिक सब्सक्रिप्शन / annual subscription पर (डिस्काऊंट ऑफर / discount offer पर, वास्तविक मूल्य तो रुपए 1500 था) एवरनोट / Evernote को खरीदा हुआ था। वह मुझे सबसे सुरक्षित व आसान लगा, वैसे तो जी-मेल / G-mail या गूगल-ड्राईव / Google drive पर भी मुफ्त में बैक-अप रख सकते हैं। एवरनोट में अन्य भी बहुत सी अतिरिक्त सुविधाएं हैं। उसका लेखक के लिए एक फायदा यह भी है कि कहीं पर भी कुछ भी याद आ जाए, तो उस पर तुरंत लिखा जा सकता है, जो भविष्य के लिए स्टोर हो जाता है। उसका सर्च फंक्शन / search function भी बहुत कारगर है। कई बार मैं अपनी दूसरी वर्ड फाईल से या ब्लॉग पोस्ट / blog post से भी टेक्स्ट / text को कोपी / copy करके पुस्तक वाली फाईल में पेस्ट / paste कर देता था। परन्तु उससे फोर्मेटिंग एरर / formatting error आने से टेक्स्ट दोषपूर्ण हो जाता था, या गायब ही हो जाता था। तब मुझे पता चला कि पेस्ट करते समय ऑप्शन / option आता है कि किस स्टाईल / style में पेस्ट करना है। उसके लिए वह ऑप्शन सेलेक्ट / select करना पड़ता है, जिसमें “कीप टेक्स्ट ओनली” / keep text only लिखा होता है। इसको माईक्रोसोफ्ट वर्ड के बेस बटन / base button “वर्ड ऑप्शन” / word option में जाकर स्थाई तौर पर भी सेलेक्ट किया जा सकता है। और भी बहुत सी एडजस्टमेंट / adjustments सुविधानुसार उस पर की जा सकती हैं, हालांकि उनकी कम ही जरूरत पड़ती है। क्योंकि पुस्तक हिंदी में थी, अतः गूगल इनपुट / Google input के “हिंदी भाषा टूल” / Hindi language tool को डाऊनलोड / download किया गया था। उससे इंगलिश की-बोर्ड / English keyboard पर टाईप करने से उसके जैसे हिंदी के अक्षर छप जाते हैं। जैसे की “MEHNAT” को टाईप करने से फाईल में हिंदी का “मेहनत” शब्द छप जाता है। मैंने संस्कृत टूल को भी डाऊनलोड किया हुआ था, क्योंकि पुस्तक में बहुत से शब्द संस्कृत के भी थे। कम्प्युटर / computer को यूपीएस / UPS (बेटरी बैक-अप / battery backup) के साथ जोड़ा गया था, ताकि अचानक बिजली गुल होने पर कम्प्युटर एकदम से बंद न हो जाया करता, जिससे फाईल को सेव / save करने का मौका मिल जाया करता। वैसे भी टाईप करते हुए बीच-2 में फाईल को सेव कर लिया करता था। जब मेरी फाईल 150 पृष्ठों से बड़ी हो गई थी, तब कई बार सीधे ही पैन-ड्राईव / pen drive के अन्दर उसमें जोड़ा गया टेक्स्ट सेव नहीं हो पाता था, और उसकी सूचना स्क्रीन / monitor screen पर आ जाती थी। तब फाईल को पेन-ड्राईव से कोपी करके कम्प्युटर में पेस्ट करना पड़ता था। फिर उस पर टाईप किया हुआ टेक्स्ट सेव हो जाता था। कहीं दूसरे स्थान, दुकान आदि में टाईप करने के लिए उस ताजा फाईल को फिर से पेन-ड्राईव के अन्दर कोपी-पेस्ट करना पड़ता था। कई बार तो पेन-ड्राईव में स्टोर / store की गयी फाईल खुलती ही नहीं थी। ऐसा होने का एक मुख्य कारण कम्प्यूटर में वायरस होना भी है। इसलिए वायरस वाले कम्प्यूटर पर अपनी पेन ड्राईव न चलाएं, और अपने कम्प्यूटर पर हमेशा एंटिवायरस डाल कर रखें। इसलिए कुछ भी टाईप करने के बाद मैं उस फाईल को एवरनोट (पूर्वोक्त क्लाऊड-स्टोरेज / cloud storage) में बैकअप-स्टोर कर लेता था। पेन-ड्राईव की फाईल न खुलने पर, उस फाईल को एवरनोट से डाऊनलोड कर लेता था। इस तरह से मैंने कभी भी टाईप किए हुए टेक्स्ट को लूज / lose नहीं किया, एक पंक्ति को भी नहीं। इससे एक और फायदा यह होता था कि यदि कभी मेरे पास पेन ड्राईव नहीं होती थी, तो मैं एवेरनोट से बुक-फाईल को डाऊनलोड करके उस पर टाईप कर लेता था, और उसे फिर से एवरनोट में सेव कर लेता था। यद्यपि पेन ड्राईव हमेशा मेरे हेंड बेग में रहती थी। मैंने अतिरिक्त सुरक्षा के लिए, बुक-फाईल के पूरा होने पर उसे बाह्य हार्ड ड्राईव / external hard drive, गूगल ड्राईव व जी-मेल में भी सेव कर लिया। टेक्स्ट की लाईन-स्पेसिंग / line spacing बराबर नहीं आ रही थी। बहुत से फौंट / fonts प्रयुक्त किए, पर बात नहीं बनी। निर्देशानुसार पैराग्राफ स्पेसिंग-सेटिंग / paragraph spacing setting के “डू नोट एड एक्स्ट्रा स्पेस बिफोर ओर आफ्टर पेराग्राफ” / do not add extra space before or after paragraph को भी अनचेक / uncheck किया, पर बात नहीं बनी। मैं एरियल यूनिकोड एमएस / Arial unicode MS पर टाईप करता था। फिर मुझे इंटरनेट / internet से हिंट / hint मिला की कई फोंटों में गैर-अंगरेजी / non English भाषा के अक्षर अच्छी तरह से लाईन / line में फिट / fit नहीं होते। फिर मैंने बहुत से फोंटों को ट्राई / try किया, पर केवल केम्ब्रिया फोंट / Cambria font पर ही बात बनी, और लाईन स्पेसिंग बिलकुल बराबर व शानदार हो गई। उससे मेरी बहुत बड़ी समस्या दूर हो गई, विशेषतः पुस्तक का प्रिंट वर्जन / print version छपवाने के लिए, क्योंकि ई-बुक के लिए तो असमान लाईन स्पेसिंग से भी काम चल रहा था। पर एक बात गौर करने लायक थी कि केम्ब्रिया फॉण्ट तभी एप्लाई / apply हो रहा था, जब टेक्स्ट पहले से ही एरियल यूनिकोड एमएस में टाईप या रूपांतरित किया हुआ था, अन्यथा नहीं। दोनों ही फोंट बनावट में लगभग एक जैसे ही हैं, और हिंदी के लिए सबसे उपयुक्त हैं। टेक्स्ट को सेलेक्ट करके फोंट को कभी भी बदला जा सकता है।

अब आती है बारी वर्ड फाईल को किनडल ई-बुक / kindle e-book के अनुसार फोर्मेट / format करने की। चारों ओर के मार्जिन / margins एक सेंटीमीटर किए गए। हेडर व फूटर / header and footer रिमूव / remove किए गए। हेडर उसे कहते हैं जो एक जैसा वाक्य या शब्द हरेक पेज / page के टॉप / top पर सेलेक्ट एरिया / selected area में अपने आप लिखा होता है। ऐसा आपने पुस्तकों में देखा भी होगा। इसी तरह फूटर हरेक पेज के बॉटम / bottom के सेलेक्ट एरिया में स्वयं ही लिखा होता है। तभी ऐसा होता है यदि हेडर व फूटर को होम-सेटिंग में डाला गया हो। पेज नंबर / page number भी रिमूव किए गए। लाईन स्पेसिंग को 1.5 पर सेट किया गया। टेक्स्ट एलाईनमेंट / text alignment को लेफ्ट / left पर सेट / set किया गया। चित्र, ग्राफ / graph, टेबल / table आदि यदि टेक्स्ट में न ही हों, तो बेहतर है; क्योंकि ये ई-रीडर / e-reader में बहुत अच्छी तरह से डिस्प्ले / display नहीं होते हैं। ई-रीडर में केवल श्वेत-श्याम वर्ण ही होता है। यदि बहुत ही आवश्यक हो तो चित्र को भी डाला जा सकता है, यद्यपि वह बहुत जगह घेरता है, क्योंकि वह टेक्स्ट-लाईनों के बीच में फिट नहीं हो पाता, अपितु पेज के बाएँ मार्जिन से दाएं मार्जिन तक की पूरी जगह को टेक्स्ट के लिए अनुपयोगी बना देता है।

अगली पोस्ट में हम यह बताएंगे कि तैयार वर्ड-फाईल को केडीपी / KDP (किनडल डायरेक्ट पब्लिशिंग / Kindle direct publishing) में कैसे सेल्फ-पब्लिश / self publish करना है।

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Self-publishing, a wonderful creation of modern technology

I recently got an opportunity to prepare a book, whose name is “Shareervigyaan Darshan – Ek adhunik Kundalini tantra (ek yogi ki premkatha)”, and which has been originally written by a mysterious yogi named Premyogi Vajra. First of all, I sorted the written material of the disorganized form that he had been extending for many years. After reading the material again and again, I took the entire contents into my mind. In fact, many people do the work of writing, but in the last round, all of them do not shield the written material in the form of a book. This is because it requires struggle, passion, meditation, perception and continuity, including a lot of hard work and hard work. Acute concentration and memory have to be retained for a long time. The entire book-material has to be seated together in mind so that the whole material can be sorted with reasonableness, attractiveness and decoration. Together, in which words cannot be reproduced second time. Then I removed many of his reimaginations, and started typing it on the computer in the form of a textually built-in form. Due to a shortage of time, it took one year for typing about 300 pages. Premyogi Vajra also continued to send written content, which I continued to add to that word file in between the context at the right place. I was typing on Microsoft Word 2007. So that mine typed material is not destroyed by computer malfunction or for other reasons, I would have kept my typed file in the D-drive (which does not contain windows-files) and on external storage as back-up also safely. I had bought Evernote at an annual subscription of INR 600 (on the discount offer, the actual value was INR 1500). It seemed to me the safest and the easiest way to get back-up, even better than on Gmail or Google Drive both of which are free. Evernote also has many other additional facilities. There is also an advantage for his commentator that even if there is anything remembered anywhere, anything can be written immediately on it, which gets stored for the future. Its search function is also very effective. Many times I copied the text from my second word file or blog post and pasted it into the book file. But due to the formatting error coming from it, the text becomes defective, or disappeared. Then I came to know that there is an option to paste in which style to paste. For that, that option has to be selected, in which “Keep Text Only” is written. It can also be selected permanently by accessing the Microsoft Word’s base button “Word Option”. And also many adjustments can be made from here at the convenience level, although rarely required or not required at all. Because the book was in Hindi, so the “Hindi language tool” of Google Input was downloaded. By typing on the English keyboard, the letters like Hindi are printed. Like typing “MEHNAT”, Hindi’s “hard work” is printed in the file. I also downloaded the Sanskrit tool, because there were many words in the book also of Sanskrit. The computer was connected with UPS (Battery Backup) so that the computer did not stop immediately when suddenly the power was lost, thereby giving the opportunity to save the file. By typing anyway, I used to save the file again and again while typing. When my file went to be larger than 150 pages, added text was at times not able to directly be saved in that base text of the file while that being in pen-drive, and that had come to the notice screen. Then the file had to be copied from the pen-drive and pasted into the computer. Then the subsequently typed text was saved. In order to type in another place, shop etc., that fresh file had to be copied to the pen-drive. Many times the file stored in Pen-Drive did not open. That occurs mainly due to computer virus. So never use your pen drive on infected computer and keep antivirus programme installed on your computer always. So after typing anything I used to backup that file in Evernote (aforementioned cloud-storage). When the Pen-Drive file did not open, I would download the file from the Evernote.  In this way, I never lost the typed text, not even a line. Another advantage of this was that if I had ever not a pen drive, then I would download the book-file from Evernote and type it on it, and would have saved it again in the Evernote. Although the pen drive always used to be in my hand bag. I saved the completed book-file for extra security even in the external hard drive. The line-spacing of the text was not equal. I used lots of fonts, but it did not matter. I also unchecked “Do note ad extra space before and after paragraph” of paragraph spacing-setting as per the instructions, but it did not work. I used to type in Ariel Unicode MS. Then I got a hint from the internet that non-English language letters in many fonts do not fit well in the line. Then I tried a lot of fonts, but only thing happened on the Cambria font, and the line spacing became absolutely equal and fantastic. I got rid of my big problem, especially to print the print version of the book, because the e-book was also working with uneven line spacing. One thing to note was that the Cambria font was being used only when the text was already typed or converted into Aerial Unicode MS, otherwise it would not. Both fonts are almost identical in texture, and are most suitable for Hindi. By selecting the text, the fonts can be changed at any time.

Then comes to convert the word book-file to e-book format. The margins around were made one centimeter. Headers and footers were removed. Header is that in the form of same sentence or word written automatically in the selected area at the top of each page. Similarly, the footer is written in the selected area of ​​each page’s bottom. Page numbers were also removed. Line spacing was made 1.5. Text alignment set on the left. If not photo, graph, table etc., then it is better; because these in e-readers are not very well displayed. The e-reader only has black and white characters. The picture can also be inserted if it is very necessary, although it occupies a lot of space, because it does not fit in between text- lines, but the entire space from the left margin to the right margin of the page is made by this unusable for text.

In the next post we will tell how to publish the ready word-file in KDP (Kindle Direct Publishing).

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed as the best, excellent and must read by everyone) made with steps as told above. If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

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