वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास- Website creation, management and development

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास  (please browse down or click here to view this post in English)।

मैंने अपनी पुस्तक को लिख कर तैयार कर लिया था। चार-पांच बार पढ़कर सभी अशुद्धियों को भी ठीक कर दिया था। पिछली पोस्टों में मैं यह बताना भूल गया कि मुझे क्विक प्रिंट से भी बहुत सहायता मिली। क्विक प्रिंट की सुविधा पोथी डॉट कॉम द्वारा दी जाती है। उसमें पुस्तक को साधारण तरीके से प्रिंट करके शीघ्रतापूर्वक उसे लेखक के बताए पते पर पहुंचा दिया जाता है। उसमें बुक की वर्ड फाईल को ज्यादा फोर्मेट करने की आवश्यकता नहीं होती। केवल पेज के मार्जिन ही सुविधानुसार निर्धारित किए जाते हैं। वर्ड के डिफाल्ट पेज मार्जिन (मतलब स्वयं के) चारों ओर 1 इंच (2.54 सेंटीमीटर) होते हैं। इनसाईड मार्जिन तो यह ठीक है, पर अन्य किनारों के लिए यह मर्जिन अधिक है, जिससे कागज़ की बर्बादी होती है। यह असली पुस्तक तो होती नहीं, केवल करेक्शन के लिए ही निकाली गई होती है। इसलिए अन्य मार्जिन्स को आप 1 या आधा सेंटीमीटर पर भी सेट कर सकते हो। संभवतः कहीं प्रिंट करते समय शब्द न कट जाएं, इसलिए कम से कम 1 सेंटीमीटर तो होना ही चाहिए। इसी तरह यदि करेक्शन करने के लिए अधिक स्थान चाहिए, तो आप लाइन स्पेसिंग को 1.5 पर भी सेट कर सकते हो। अन्य कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं होती। फिर उस वर्ड फाईल को गूगल ड्राईव की सहायता से पीडीएफ में बदल दिया जाता है। उस पीडीएफ फाईल को ही पोथी डॉट कॉम पर अपलोड कर दिया जाता है। वास्तव में प्रिंट फॉर्म में करेक्शन करना कम्प्युटर में सीधे करेक्शन करने से बहुत आसान, सटीक, सुविधाजनक व त्वरित होता है। पुस्तक के अतिरिक्त कोई  भी डोक्युमेंट पोथी डॉट कोम से मंगाया जा सकता है, घर बैठे-२ ही, वह भी मनचाही गुणवत्ता व बाईंडिंग में। 2 बार क्विक प्रिंट बुक में करेक्शन करने के बाद जब मैं आश्वस्त हो गया, तब मैंने बुक को फुल प्रिंट के लिए फोर्मेट किया, और उसकी डिलीवरी के लिए डिमांड दे दी। फुल प्रिंट बुक को भी मैंने दो बार करेक्ट करने के बाद ही फाईनल समझा। अब जाकर मेरी पुस्तक पूर्ण रूप से तैयार हुई थी। वेबसाईट तो मैंने बहुत पहले से बना ली थी, यद्यपि वेबसाईट का युद्धस्तर पर निर्माण तो पुस्तक की पूर्णता के बाद ही शुरू हुआ, क्योंकि तब मुझे अतिरिक्त समय उपलब्ध हो गया था।

वेबसाईट-निर्माण का मेरा सफर निम्नलिखित प्रकार का था। मुझे जब पुस्तक के प्रचार की आवश्यकता महसूस हुई, तब मैंने एक लेंडिंग पेज बनाने की सोची। जैसा कि पिछली पोस्टों में भी मैंने बताया है कि लेंडिंग पेज एक ऐसा वेबपेज (वेबसाईट का पेज) होता है, जिस पर पुस्तक के बारे में सम्पूर्ण विवरण हो, संभावित पाठकों को पुस्तक पढ़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा हो, और जिस पर उस पुस्तक को बेचने वाली व्यापारिक वेबसाईट का लिंक-पता दर्ज हो। गूगल पर सर्च करने पर लैंडिंग पेज के लिए बहुत सी सशुल्क पेशकशें दी जा रही थीं। कोई कम खर्चे वाली थीं, तो कुछ अधिक खर्चे वाली। फिर भी मुझे तो वह खर्चा अधिक ही लगा, और साथ में लैंडिंग पेज की उतनी साज-सज्जा की आवश्यकता भी मुझे महसूस नहीं हुई, जितनी का वे दावा कर रहे थे। मुझे तो एक साधारण लैंडिंग पेज ही चाहिए था। उसके लिए सर्वोत्तम व मुफ्त का तरीका तो मुझे वेबसाईट-निर्माण का ही लगा। वास्तव में बहुत सी कम्पनियां मुफ्त की वेबसाईट बनाने का ऑफर देती हैं, जैसे कि वर्डप्रेस डॉट कॉम, जिम्डो डॉट कॉम आदि-२। इनमें वर्डप्रेस डॉट कॉम काफी जानी-मानी व गुणवत्तापूर्ण वेबसाईट-निर्मात्री कंपनी है। इसलिए मैंने उसे ही चुना। 10 मिनट में ही सिंपल स्टेप्स में वह बन कर तैयार हो गई। पहले तो मुझे पता ही नहीं चला कि उसमें करना क्या था। मैंने एक-दो पोस्टें लिखीं, जो न जाने कहाँ खो जाती थीं। कभी दिख जाती थीं। फिर धीरे-२ मुझे आभास हुआ कि मुझे किसी मुफ्त की थीम को एक्टिवेट करना था। वेबसाईट-थीम वास्तव में वेबसाईट का दिल होती है। यह निर्धारित करती है कि वेबपेज कैसा दिखेगा। उस पर फोटो कौन सी होगी, विभिन्न बटन कहाँ-२ व कौन-२ से ऑप्शन होंगे।

थीम को एक्टिवेट करने से मेरा वेबसाईट-निर्माण का लगभग 90% काम पूरा हो गया था। बाकि का 10% काम तो अब उसमें विभिन्न विजेट (जैसे कि कोपीराईट का, लीगल डिस्क्लेमर का, शेयरिंग का आदि-2) को एप्लाई करना था। कई थीमों में केवल साईडबार-विजेट-एरिया ही होता है, फुटबार-विजेट-एरिया नहीं। धीरे-२ वह काम भी होता रहा। सर्वप्रथम मुख्य काम तो वेबपेज पर लिखित सामग्री को डालना था। मैंने अपनी ई-पुस्तक से ही पुस्तक-परिचय आदि को कोपी करके होमपेज पर पेस्ट कर दिया। होमपेज को ही मैंने लेंडिंग पेज बना दिया। इसके लिए होमपेज को स्टेटिक पेज बनाना पड़ता है। उससे वह स्थिर बना रहता है, और समय-२ पर डाली गई पोस्टें उस पर नहीं आतीं, अपितु एक अलग पेज “माय पोस्ट पेज” पर छपती रहती हैं। क्या आपको भी वेबसाईट बनाते हुए ऐसी ही समस्याएँ पेश आईं? —-मेरी अगली ब्लॉग पोस्ट पर जारी—–   

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Website creation, management and development

I had prepared my book in written form. After reading four to five times, I also cured all the impurities. In the previous post, I forgot to mention that I got many help from Quick Print. Quick print is provided by Pothi.com. In this service, the book is readily printed and delivered to the address given by the author. There is no need to format the book’s Word file in it. Only the margins of the pages are determined according to convenience. Word default page margins (mean of themselves) are around 1 inch (2.54 centimeter). Inside margins, this is fine, but this margin is higher for other edges, which causes waste of paper. This is not the real book, it is only for correction. Therefore, you can also set other margins to 1 or half centimeters. It may be that the words are not cut when printing, so at least 1 centimeter should be there. Similarly, if you need more space to perform correction, you can also set the line spacing to 1.5. There is no need to do anything else. Then that Word file is converted to PDF with the help of Google Drive. That PDF file is uploaded to Pothi.com. In fact, correction of print forms is very easy, accurate, convenient and quick than to correct / edit document in the computer. Apart from the book, any document can be sent to Pothi.com, sitting at home, that too in the desired quality and binding. After making a correction in a quick print book, when I was convinced, I formatted the book for full print, and put demand for delivery of it. I considered the full print book as finished product only after reading and correcting it twice. Now my book was fully prepared by me. The website was created very long ago, although the creation of the website at war level started only after the completion of the book, because then I had an extra time available.

My journey to website building was the following type. When I felt the need to publicize the book, I thought of making a landing page. As I have mentioned earlier in the previous posts, the landing page is a web page, which has full details about the book, potential readers are being encouraged to read the book, and on which there is entered the link-address of the business website that sells the book. There were many paid offers for landing pages when searching on Google. There were some less costly, then some were more expensive. Even then, I found that the expenditure was more expensive, and I did not even need the decoration of the landing page, as much as they were claiming. I just wanted a simple landing page. The best and free way for me was to create a website. In fact, many companies offer to create free websites, such as WordPress.com, Zimdo.com etc. Among them WordPress.com is a well-known and quality website-maker company. That is why I chose that. In 10 minutes website became ready in the simple steps. At first, I did not know what to do in it. I wrote a few posts, which were not shown fully and anywhere they were lost. Were ever seen again. Then slowly I realized that I had to activate any free theme. Website-theme is actually the heart of the website. It determines how a web page will look. What will be the photo on it, where different buttons will have options?

Activated by the theme, almost 90% of my website-building work was completed. The remaining 10% of the work was to be applied to various widgets (like copyright, legal disclaimer, sharing etc.). Many themes only have Sidebar-Widget-Area, Footer-Widget-Area not. Slowly that work was also going on. First, the main task was to put content written on the web page. I copied book-introduction etc. from my e-book and pasted it on the homepage. I made the landing page only for the home page. For this, the homepage has to be made static page. From that LP / HP remains stable, and the posts put on time after time do not come to that, but website keep those on a different page, “My Post Page”. Did you have similar problems while creating the website? —- Continued on my next blog post —–   

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भाई विनोद शर्मा जी द्वारा रचित व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ

ये काल का प्रहार है

काल का प्रहार

आकाश अश्रु रो रहा

सृष्टि के पाप धो रहा

धरा मिलनकी इच्छासे

पर्वत भी धैर्य खो रहा

चारों दिशा अवरुद्ध है

जल धाराएँ क्रुद्ध हैं

नर कंकाल बह रहे

हकीकत बयान कर रहे

कुदरत की गहरी मार है

ये काल का प्रहार है।

रिश्तों में अपनापन नहीं

बच्चों में भोलापन नहीं

शीतल रुधिर शिराओं में

धीरज नहीं युवाओं में

वाणी मधु से रिक्त है

हरएक स्वार्थ सिक्त है

अविश्वास से भरा हुआ

हर शख्स है डरा हुआ

इन्सानियत की हार है

ये काल का प्रहार है।

दहक रही भीषण अग्न

झुलस रहा है बाग-वन

सूरज के रक्त नयन से

बरस रहे अंगार हैं

गुलों में वो महक नहीं

परिंदों की वो चहक नहीं

ठूंठ बन गए तरू

भूखंड हो गए मरू

आबोहवा बेज़ार है

ये काल का प्रहार है।

जागृति के नाम पर

विलुप्त शिष्टाचार है

सभ्यता ठगी खड़ी

सुषुप्त संस्कार है

श्रेष्ठता के ढोंग का

ओढ़े हुए नक़ाब है

कर्तव्य बोध शून्य है

अधिकारों का हिसाब है

निश्छलता तार-तार है

ये काल का प्रहार है।

शब्दों से कैसे खेलूं मैं

शब्दों से कैसे खेलूं मैं

अन्तर में भावों की ज्वाला

धधक-धधक सी उठती है।

असह्य अखण्डित दाह-वेदना

जिह्वा पर मेरे ठिठकती है।

प्राकट्य जटिल सा हो जाता है

बस भीतर -भीतर झेलूं मैं।

अब तू ही बता हमदर्द मेरे!

शब्दों से कैसे खेलूं मैं?

इस जगती में हर श्वास की

परिमित एक कड़ी होती है।

हृदय निकट गहन रिश्तों की

चिन्ता -व्यथा बड़ी होती है।

धीर धरूं क्यों?मन करता है

सबकी पीड़ा ले लूं मैं।

अब तू ही बता हमदर्द मेरे!

शब्दों से कैसे खेलूं मैं?

कोकिल की मीठी स्वर लहरी में

झींगुर की झिन-झिन दोपहरी में

मस्त मयूरों के नृत्यों में

गुंजित भवरों के कृत्यों में

प्रच्छन्न सरस जीवन-पय घट से

मधु वंचित प्याले भर लूं मैं।

अब तू ही बता हमदर्द मेरे!

शब्दों से कैसे खेलूं मैं?

काल सरित की अविरल धारा

अबल-सबल हर कोई हारा।

मूर्ख है जो धारा संग उलझे

गिरह ये ऐसी जो न सुलझे।

अब तक कोई रोक न पाया

तो फिर कैसे ठेलूं मैं?

अब तू ही बता हमदर्द मेरे!

शब्दों से कैसे खेलूं मैं?

ऐ ज़िन्दगी ! तू बेहद खूबसूरत है।

ऐ ज़िन्दगी ! तू बेहद खूबसूरत है।

तेरा हर नाज़ो नख़रा सह लेते हैं।

रुलाए तू हंसाए तू,

नश्तर चुभा,सहलाए तू।

तेरी लौ की तपिश में

परवाने बन जल जाते हैं,कुर्बान हुए जाते हैं ।

ऐ ज़िन्दगी!….

भीड़ न बनो जुदा हों भीड़ से खड़े

भीड़ न बनो जुदा हों भीड़ से खड़े,

जिधर भी तुम चलो काफ़िला साथ चल पड़े।

है ज़िन्दगी की राह मुश्किलात से भरी,

ये रास्ते न होंगे हीरे-मोती से जड़े।

भीड़ न बनो…….

मेहनत से ही मिलेगा मुक़द्दर में जो लिखा,

नहीं मिलेंगे स्वर्ण-कलश खेत में गढ़े।

भीड़ न बनो……

पढ़े लिखों का दौर यही शोर चारों ओर,

इन्सां वही है जो दिलों के ज़ज्बों को पढ़े।

भीड़ न बनो…..

हर लम्हा है बदलाव ये मन्ज़ूर तुम करो,

तोड़ रूढ़ियों की बन्दिशें आगे चलो बढ़े।

भीड़ न बनो…..

ज़हनी संगीनें तन चुकी हैं होश में आओ,

जिस्मानी जंग छोड़ के हम खुद से ही लड़ें।

भीड़ न बनो…..

मतलबी हर शख़्स यहाँ घात में बैठा,

मालूम नहीं किस ग़रज़ से शानों पे चढ़े।

भीड़ न बनो…..

करता है वो इन्साफ बिना भेदभाव के,

अपनी कमी का दोष हम किसी पे क्यों मढ़ें।

भीड़ न बनो…..

लियाक़त नहीं मोहताज किसी धन की दोस्तो!

खिलते हैं वे कमल भी जो कीचड़ में हों पड़े।

भीड़ न बनो…..।

दिल के इस मयखाने में जज़्बात ये साक़ी बनते हैं

दिल के इस मयखाने में जज़्बात ये साक़ी बनते हैं

आँखों के पैमाने से फिर दर्द के जाम छलकते हैं।

तेरी रहमतों की बारिश का इन्तज़ार मुझको

तेरी रहमतों की बारिश का इन्तज़ार मुझको

उम्मीद के ये बादल घिरने लगे हैं फिर से ।

जो ज़ख़्म अब से पहले नासूर बन गए थे

रिस्ते हुए ज़ख़्म वो भरने लगे हैं फिर से।

दो अश्क

बैठ कहीं सुनसान जगह पर

ख़ुदग़रज़ी के इस आलम से

माज़ी के गुज़रे लम्हों में

कुछ देर मैं खोना चाहता हूँ

दो अश्क बहाना चाहता हूँ।

जाड़े की ठण्डी सुबह में

ठिठुरते हुए बाहों को बांधे

प्राची से उगते सूरज को

बेसब्री से तकना चाहता हूँ

दो अश्क बहाना चाहता हूँ।

पशु चराने दादी के संग

सुनसान सघन जंगल के भीतर

सर रखकर उनकी गोदी में

वही कथा मैं सुनना चाहता हूँ

दो अश्क——————-।

सुबह सबेरे खेत जोतते

पिता के पद-चिह्नों के पीछे

‘चल’ ‘हट’ कर उन बैलों को

सही दिशा दिखाना चाहता हूँ

दो अश्क——————-।

व्यर्थ उलझकर भाई-बहन से

सच्चे-झूठे आँसू लेकर

स्नेह भरे माँ के आँचल में

वो दुलार मैं पाना चाहता हूँ

दो अश्क—————-।

शहर गए अब्बू के संग

भीड़ भरी सड़क पर उनकी

विश्वास भरी उँगली को थामे

उस भीड़ में खोना चाहता हूँ

दो अश्क—————–।

कोई बड़ी शरारत हो जाने पर

सहमे हुए घबराए मन से

घास गई उस माँ की मैं

वही बाट जोहना चाहता हूँ

दो अश्क—————-।

बिना बताए माँ-अब्बू जब

आँखों से ओझल हो जाते

घर आने पर कहीं दुबककर

मैं उनसे रूठना चाहता हूँ

दो अश्क—————-।

मासूम बचपना कहीं छोड़कर

हरपल मरता है शख़्स यहाँ

इतराता अपने जन्म दिवस पर

क्यों? यही जानना चाहता हूँ

दो अश्क——————।

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सभी मित्रों के बीते वर्ष को सहर्ष विदाई व उनको नववर्ष 2019 की बहुत-2 शुभकामनाएं- Nice farewell to all the friends’ last year and many New Year wishes for them

सभी मित्रों के बीते वर्ष को सहर्ष विदाई व उनको नववर्ष की बहुत-2 शुभकामनाएं (please browse down to view this post in English)।

मेरा बीता वर्ष, 2018 निम्न प्रकार का रहा-

अपनी टाटा टियागो कार में लगभग 3000 किलोमीटर का सपरिवार सफ़र तय किया, जिसमें से अधिकाँश उन्नत उच्चमार्गों का सफर था। पीवीआर सिनेमा में 4 हिंदी फिल्में सपरिवार देखीं, 102 नोट आऊट, संजू, हनुमान वर्सस अहिरावना (थ्री डी एनीमेशन) व सिम्बा। मेरे माता-पिता तीर्थधाम यात्रा का जल चढ़ाने कन्याकुमारी / रामेश्वरम गए। अपने पुराने घर का नवीनीकरण करवाया गया। श्री मद्भागवत सप्ताह श्रवण यज्ञ का अनुष्ठान अपने घर में करवाया गया। मेरी पूज्य व वृद्ध पितामही जी का स्वर्गवास हुआ। मेरे बेटे को पहली कक्षा में ए-1 रहने पर पारितोषिक दिया गया। मेरी पत्नी के द्वारा नए सिलाई के प्रशिक्षण-कोर्स का प्रारम्भ किया गया। मुझे क्वोरा टॉप राईटर (क्वोरा शीर्ष लेखक)- 2018 का सम्मान मिला। मेरे द्वारा कुण्डलिनीयोग का प्रतिदिन का 1 घंटे का सुबह का व एक घंटे का सांय का अभ्यास एक दिन के लिए भी नहीं छोड़ा गया। इसके कारण मेरा वर्ष 2017 का कुण्डलिनीजागरण का अनुभव जारी रहा, महान आनंद के साथ। प्रेमयोगी वज्र की सहायता से इस मेजबानी वेबसाईट (https://demystifyingkundalini.com/home-3/) को पूर्णतः विकसित किया। इस वेबसाईट के लिए 139 शेयर, 30 लाईक्स, 4772 वियूस, 3099 विसिटर व 46 फोलोवर मिले। इस वेबसाईट के लिए मैंने लगभग 31 पोस्टें लिखीं व प्रकाशित कीं। प्रेमयोगी वज्र की सहायता से “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” नामक पुस्तक लिखी। उसके लिए 13 सशुल्क डाऊनलोड व 80 निःशुल्क डाऊनलोड प्राप्त हुए। उसके लिए अमेजन पर एक सर्वोत्तम रिव्यू / समीक्षा (5 स्टार) भी प्राप्त हुआ। साथ में, उसे गूगल बुक पर भी दो उत्तम व 5 स्टार रिव्यू प्राप्त हुए। दूरदर्शन के कार्यक्रमों में तेनालीरामा, तारक मेहता का उल्टा चश्मा, मैं मायके चली जाऊंगी, रियल्टी शोज व जी न्यूज (मुख्यतः डीएनए) का आनंद उठाया। अपने पोर्टेबल मिनी जेबीएल स्पीकर पर गाना एप के माध्यम से लगभग 2000 मधुर ओनलाईन गाने सुने। काटगढ़ मंदिर व टीला मंदिर के सपरिवार दर्शन किए। अपने किन्डल ई-रीडर पर 3 पुस्तकें पढ़ीं। पोस्ट पढ़ने के लिए धन्यवाद।

यदि आपको इस पोस्ट से कुछ लाभ प्रतीत हुआ, तो कृपया इसके अनुसार तैयार की गई उपरोक्त अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में निष्पक्षतापूर्वक समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। इस पुस्तक की संक्षिप्त रूप में सम्पूर्ण जानकारी आपको इसी पोस्ट की होस्टिंग वेबसाईट / hosting website पर ही मिल जाएगी। धन्यवाद।

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Nice farewell to all the friends’ last year and many New Year wishes for them.

My last year, 2018 was of the following type:

Travelled around 3,000 km in my Tata Tiago car with family, most of which were the journey of advanced highways. In PVR cinema saw 4 Hindi films with family, 102 Not out, Sanju, Hanuman Versus Ahiravana (Three D Animation) and Simmba. My parents went to Kanyakumari / Rameshwaram for carrying water for pilgrimage. My old home was renovated. Shreemad Bhaagvat Shravan Yagna’s week long ritual was performed in my house. My devoted and old grandmother went to heaven. My son was rewarded for being A1 in the first grade. New sewing training-course was started by my wife. I got the Quora Top Writer- the honour of 2018. I did not leave the Kundalini Yoga practice for 1 hour of morning and one hour of evening everyday even for one day. Due to this my experience of KundaliniJagran of 2017 continued, with great bliss. With the help of Premyogi Vajra, this hosted website (https://demystifyingkundalini.com/) was fully developed. For this website, 139 shares, 30 likes, 3099 visitors, 46 followers and 4772 views were obtained. I wrote and published about 31 posts for this website. With the help of Premyogi Vajra, I wrote a book called “Shareervigyaan darshan- ek aadhunik kundalini tantra (ek yogi ki premkatha)”. For that 13 paid downloads and 80 free downloads were received. For that, a great review (5 stars) was also received on Amazon. Along with, two good and 5 star reviews were also obtained on Google book for that. In Doordarshan’s programs, Tenalirama, Tarak Mehta ka Ulta Chashma, main maayake chali jaaoongee, realty shows and Zee news (mainly DNA) were enjoyed well. Two thousands of melodious online songs have been heard through Gaana App on my portable mini JBL speaker. Visiting the Katgarh Temple and the Tila Temple with family by me. Read 3 books on my Kindle e-Reader. Thanks for reading.

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed in unbiased way as the best, excellent and must read by everyone) made with steps as told above. If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

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