प्राचीन मिस्र की आध्यात्मिक यौनता एवं भारतीय तंत्र के बीच में समानता

अन्खिंग क्या है और कैसे किया जाता है?

अन्खिंग में पूर्णता से थोड़ा कम (90%) सांस भर कर शक्ति को यौनचक्रों से पीठ वाले अनाहत चक्र (उनके अनुसार पांचवां चक्र) तक चढ़ाया जाता है, और वहां से 90 डिग्री के कोण पर पीछे की ओर खुले में मोड़ दिया जाता है। वह फिर स्वयं ही आँख के लूप से होते हुए सबसे ऊपर वाले आठवें चक्र (सिर से एक हाथ लम्बाई ऊपर) पर पहुँच जाती है। वह चक्र वर्टिकल बोडी लाइन से 90 डिग्री के कोण पर स्थित है। वहां से वह आँख-लूप के अगले भाग से नीचे उतर कर अनाहत चक्र (आगे का) पर पुनः स्थापित हो जाती है। फिर बाकि का बचा हुआ 10% सांस भी अन्दर भर लिया जाता है। धीरे-2 सांस छोड़ते हुए ध्यान किया जाता है कि वह शक्ति उस आँख-चेनल में घूम रही है। फिर गहरी साँसें लेते जाएं, जब तक कि पूरे शरीर में रिलैक्सेशन महसूस न हो जाए। फिर अपनी साँसें नार्मल कर लें। ध्यान करो कि यह शक्ति पूरे शरीर में रिसती हुई, उसकी सभी कोशिकाओं को पुष्ट करती हुई, उसके बाहर भी चारों ओर फैल रही है। फिर पूरी तरह से रिलैक्स हो जाओ, या सो जाओ।

अन्खिंग के रेखा-चित्र व लूप का मनोवैज्ञानिक रहस्य

अन्खिंग प्रक्रिया में शक्ति हृदय के ऊपर के शरीर के हिस्से को स्पर्श नहीं करती। वह चारों और बाहर-2 से ही लूप बना कर पुनः हृदय चक्र पर पहुँच जाती है। इसीलिए शक्ति-मार्ग को दर्शाने वाले रेखा-चित्र में रीढ़ की हड्डी को छूती हुई सीधी रेखा केवल यौनचक्र (मूलाधार) से हृदय चक्र तक ही दिखाई गई है, उसके ऊपर नहीं। उसके ऊपर उपरोक्त अन्खिंग-लूप जुड़ा है। हृदय चक्र पर एक सीधी रेखा आगे से पीछे जाते हुए एक क्रोस बनाती है। इस डिजाइन का यह मतलब है कि मूलाधार चक्र व नाभि चक्र के आगे वाले भाग से होते हुए कुण्डलिनी को ऊपर चढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि वे लचीले भाग में होते हैं, और योग-बंधों के कारण अन्दर की तरफ पिचक कर मेरुदंड वाले चक्र-भागों से जुड़कर एक हो जाते हैं। इससे आगे वाले चक्रों की शक्ति स्वयं ही पीछे वाले चक्रों को मिल जाती है। हृदय चक्र पर इसलिए आगे-पीछे गुजरने वाली रेखा है, क्योंकि आगे वाला चक्र पिचक कर पीछे वाले चक्र से नहीं जुड़ता है। देखा भी जाता है कि छाती का क्षेत्र विस्तृत है, और ज्यादा अन्दर-बाहर भी नहीं होता।

अन्खिंग का वैज्ञानिक स्पष्टीकरण

शक्ति मनोवैज्ञानिक दबाव से ही अनाहत चक्र से 90 डिग्री के कोण पर पीछे की ओर बाहर निकलती है। ऐसा सोचा जाता है, तभी ऐसा होता है। आठवें चक्र तक भी वह मनोवैज्ञानिक दबाव से ही आँख (अन्खिंग-लूप) से होते हुए ऊपर चढ़ती है। एक प्रकार से शक्ति बीच के चक्रों को बाईपास करते हुए, सीधे ही आठवें चक्र तक पहुँच जाती है। वहां से नीचे भी यह इसी तरह के दबाव के अभ्यास से आती है। इसमें शरीर की बनावट से मेल खाता हुआ रेखा-चित्र भी मानसिक चिंतन के दबाव की सहायता करता है।

अन्खिंग व सैक्सुअल कुण्डलिनीयोग के बीच में समानता

कुण्डलिनीयोग में शक्ति को कुण्डलिनी कहा जाता है। यह अधिकाँश मामलों में गुरु या देवता का मानसिक चित्र ही होता है। इस योग में यौनशक्ति से कुण्डलिनी को विभिन्न चक्रों पर पुष्ट किया जाता है, विशेषकर मस्तिष्क में। पुष्टता को प्राप्त कुण्डलिनी फिर लम्बे समय तक अनुभवदृष्टि में बनी रहकर तन-मन को शुद्ध करती रहती है। अन्खिंग में भी ऐसा ही होता है। यद्यपि उसमें शक्ति को हृदय क्षेत्र में ही केन्द्रित माना गया है। थोड़े समय के लिए आठवें चक्र पर भी रुकती है। बीच वाले रस्ते व लूप में तो केवल उसकी सूक्ष्म चाल ही होती है। वास्तव में हृदय में सबसे प्रिय वस्तु ही बसी होती है। यह वस्तु एक ही होती है। दो से तो प्रेम ही नहीं होता। हृदय ही प्रेम का स्थान है। इस तरह से, अन्खिंग की तथाकथित शक्ति स्वयं ही कुण्डलिनी-रूप सिद्ध हो गई। प्राचीन मिस्र की मान्यता के अनुसार, साधारण यौनसम्बन्ध के दौरान यौन-उन्माद/स्खलन की शक्ति या तो नीचे गिर कर भूमिगत हो जाती है, या मस्तिष्क के विभिन्न विचारों के रूप में प्रस्फुटित होती है। दोनों ही मामलों में यह नष्ट हो जाती है। परन्तु यदि मस्तिष्क का विचार एकमात्र कुण्डलिनी के रूप में हो, तब वह यौनशक्ति नष्ट नहीं होती। ऐसा इसलिए है, क्योंकि कुण्डलिनी का ध्यान प्रतिदिन किया जाता है, अन्य विचारों का नहीं। इसलिए यौनशक्ति से निर्मित, कुण्डलिनी की प्रचंडता लम्बे समय तक बनी रहती है। क्योंकि अन्य विचार कभी-कभार ही दोबारा पैदा होते हैं, इसलिए उनकी प्रचंडता तब तक गिर चुकी होती है। साथ में, यौनशक्ति सभी विचारों में बंट कर बहुत छोटी रह जाती है, जबकि वह कुण्डलिनीयोग से एक ही कुण्डलिनी को मिलती है, जिससे पूरी बनी रहती है। अतः सिद्ध होता है कि प्राचीन मिस्र की तथाकथित शक्ति कुण्डलिनी ही है, और अन्खिंग भी कुण्डलिनीयोग से भिन्न नहीं है। एक प्रकार से हम कुण्डलिनीयोग को अन्खिंग तकनीक का सरल व वैज्ञानिक रूपांतर भी कह सकते हैं।

प्राचीन तंत्र में यौनोन्माद (बिंदुपात) पूर्णतया वर्जित नहीं है, अपितु उस पर आत्मनियंत्रण न होना ही वर्जित है

प्रेमयोगी वज्र के अनुसार, यदि ओर्गैस्मिक शिखर/वीर्यपात के समय मूलबबंध व उड्डीयान बंध को मजबूती से व लम्बे समय तक बना कर रखा जाता है, तब पूरी यौनशक्ति मस्तिष्क-स्थित कुण्डलिनी को मिलती है। उससे ऐसा लगता है कि यौन-चक्र व मस्तिष्क-चक्र मिलकर एक हो गए हैं, और दोनों पर कुण्डलिनी एकसाथ चमक रही है। इससे वीर्य का क्षरण भी बहुत कम होता है, जबकि आनंद बहुत अधिक प्राप्त होता है। यदि केवल उड्डीयान बंध ही लगाया जाए, तो यह सकारात्मक प्रभाव बहुत कम हो जाता है।

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Sex, and specifically the orgasm, is more that just something that feels good and allows procreation. There are many other functions, such as the release of dysfunctional energy within the body, which can help to keep one from becoming diseased. There is the function that opens the higher chakras, and under the right conditions allows a person to begin the process of enlightenment. And further, if two people, lovers, practice sacred sex, the entire experience can lead them together into higher consciousness and into worlds beyond this plane——

Ancient Egyptian Sexual Ankhing 

The ancient egyptians believed that orgasm is more than just something that feels good and allows procreation…

This Ancient Egyptian Sex Technique May Be the Secret to Eternal Life

Please click on this link to view this post in English (similarity between ancient Egyptian spiritual sexuality and Indian Tantra)

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demystifyingkundalini by Premyogi vajra- प्रेमयोगी वज्र-कृत कुण्डलिनी-रहस्योद्घाटन

I am as natural as air and water. I take in hand whatever is there to work hard and make a merry. I am fond of Yoga, Tantra, Music and Cinema. मैं हवा और पानी की तरह प्राकृतिक हूं। मैं कड़ी मेहनत करने और रंगरलियाँ मनाने के लिए जो कुछ भी काम देखता हूँ, उसे हाथ में ले लेता हूं। मुझे योग, तंत्र, संगीत और सिनेमा का शौक है।

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