द्वैत और अद्वैत दोनों एक-दूसरे के पूरक के रूप में

द्वैत क्या है?

दुनिया की विविधताओं को सत्य समझ लेना ही द्वैत है। दुनिया में विविधताएं तो हमेशा से हैं, और सदैव रहेंगी भी, परन्तु वे सत्य नहीं हैं। दुनिया में जीने के लिए विविधताओं का सहारा तो लेना ही पड़ता है। फिर भी उनके प्रति आसक्ति नहीं होनी चाहिए।

अद्वैत क्या है?

उपरोक्तानुसार, दुनिया की विविधताओं के प्रति असत्य बुद्धि या अनासक्ति को ही अद्वैत कहते हैं। वास्तव में द्वैताद्वैत को ही संक्षिप्त रूप में द्वैत कहते हैं। अद्वैत अकेला नहीं रह सकता। यह एक खंडन-भाव है। अर्थात यह द्वैत का खंडन करता है। यह खंडन “द्वैत” से पहले लगने वाले “अ” अक्षर से होता है। जब द्वैत ही नहीं रहेगा, तब उसका खंडन कैसे किया जा सकता है? इसलिए जाहिर है कि द्वैत व अद्वैत दोनों साथ-२ रहते हैं। इसीलिए अद्वैत का असली नाम द्वैताद्वैत है।

एक ही व्यक्ति के द्वारा द्वैत व अद्वैत का एकसाथ पालन

ऐसा किया जा सकता है। यद्यपि ऐसा जीवनयापन विरले लोग ही ढंग से कर पाते हैं, क्योंकि इसके लिए बहुत अधिक शारीरिक व मानसिक बल की आवश्यकता पड़ती है। इससे लौकिक कार्यों की गुणवत्ता भी दुष्प्रभावित हो सकती है, यदि सतर्कता के साथ उचित ध्यान न दिया जाए।

द्वैताद्वैत को बनाए रखने के लिए श्रमविभाजन

ऐसा विकसित सभ्यताओं में होता है, व बुद्धिमान लोगों के द्वारा किया जाता हहै। वैदिक सभ्यता भी इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें द्वैतमयी लौकिक कर्मों का  उत्तरदायित्व एक भिन्न श्रेणी के लोगों पर होता है, और अद्वैतमयी धार्मिक क्रियाकलापों  का उत्तरदायित्व एक भिन्न श्रेणी के लोगों पर। वैदिक संस्कृति की जाति-परम्परा  इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें ब्राम्हण श्रेणी के लोग पौरोहित्य (धार्मिक कार्य) का कार्य करते हैं, और अन्य शेष तीन श्रेणियां विभिन्न लौकिक कार्य करती हैं।

द्वैताद्वैत में श्रम-विभाजन के लाभ

इससे व्यक्ति पर कम बोझ पड़ता है। उसे केवल एक ही प्रकार का भाव बना कर रखना पड़ता है। इससे परस्पर विरोधी भावों के बीच में टकराव पैदा नहीं होता। इसलिए कार्य की गुणवत्ता भी बढ़ जाती है। वैसे भी दुनिया में देखने में आता है कि जितना अधिक द्वैत होता है, कार्य उतना ही अच्छा होता है। अद्वैतवादी के अद्वैतभाव का लाभ द्वैतवादी को मिलता रहता है, और द्वैतवादी के द्वैतभाव का लाभ अद्वैतवादी को मिलता रहता है।  यह ऐसे ही होता है, जैसे एक लंगड़ा और एक अंधा एक-दूसरे की सहायता करते हैं। यद्यपि इसमें पूरी सफलता के लिए दोनों प्रकार के वर्गों के बीच में घनिष्ठ व प्रेमपूर्ण सम्बन्ध बने रहने चाहिए।

गुरु-शिष्य का परस्पर सम्ब्बंध भी ऐसा ही द्वैताद्वैत-सम्बन्ध है

प्रेमयोगी वज्र को भी इसी श्रमविभाजन का लाभ मिला था। उसके गुरू (वही वृद्धाध्यात्मिक पुरुष) एक सच्चे ब्राम्हण-पुरोहित थे। प्रेमयोगी वज्र स्वयं  एक अति  भौतिकवादी व्यक्ति तथा। दोनों के बीच में लम्बे समय तक नजदीकी व प्रेमपूर्ण  सम्बन्ध बने रहे। इससे प्रेमयोगी वज्र का द्वैत उसके गुरु को प्राप्त हो गया, और गुरु  का अद्वैत उसको प्राप्त हो गया। इससे दोनों का द्वैताद्वैत अनायास ही  सिद्ध हो गया, और दोनों मुक्त हो गए। इसके फलस्वरूप प्रेमयोगी वज्र को क्षणिक आत्मज्ञान के साथ क्षणिक कुण्डलिनीजागरण की उपलब्धि भी अनायास ही हो गई। साथ में, उसकी कुण्डलिनी तो उसके पूरे जीवन भर क्रियाशील बनी रही।

यही द्वैताद्वैत समभाव ही सर्वधर्म समभाव है

कोई धर्म द्वैतप्रधान होता है, तो कोई धर्म अद्वैतप्रधान होता है। इसीलिए दोनों प्रकार के धर्मों के बीच में मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बने रहने चाहिए। इससे दोनों एक-दूसरे को शक्ति प्रदान करते रहते हैं। इससे वास्तविक द्वैताद्वैत भाव पुष्ट होता है। विरोधी भावों के बीच में परस्पर समन्वय ही वैदिक संस्कृति की सफलता के पीछे एक प्रमुख कारण था। शरीरविज्ञान दर्शन में इसका विस्तार के साथ वर्णन है।

Please click on this link to view this post in English (Duality and non-duality as complementary to each other)

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demystifyingkundalini by Premyogi vajra- प्रेमयोगी वज्र-कृत कुण्डलिनी-रहस्योद्घाटन

I am as natural as air and water. I take in hand whatever is there to work hard and make a merry. I am fond of Yoga, Tantra, Music and Cinema. मैं हवा और पानी की तरह प्राकृतिक हूं। मैं कड़ी मेहनत करने और रंगरलियाँ मनाने के लिए जो कुछ भी काम देखता हूँ, उसे हाथ में ले लेता हूं। मुझे योग, तंत्र, संगीत और सिनेमा का शौक है।

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