कुण्डलिनी से विपासना या विपश्यना

विपश्यना क्या है

क्वोरा पर बहुत से लोग विपासना के बारे में प्रश्न पूछते रहते हैं। इसलिए सोचा कि क्यों न इस बार विपासना पर ही एक एक सुन्दर ब्लॉग-पोस्ट लिख लूं।

विपश्यना का अर्थ है विशेष पश्यना अर्थात एक विशेष प्रकार की नजर। सामान्य नजर तो वही बहिर्मुखी नजर है, जिससे हम-आप सभी लोग देखते हैं। विशेष नजर अंतर्मुखी नजर है, जिससे अपने अन्दर मौजूद विचारों-भावों को देखा जाता है। सामान्य नजर में द्रष्टा का साक्षी भाव नहीं होता, परन्तु विपश्यना में द्रष्टा का साक्षीभाव होता है। सामान्य नजर से बंधन होता है, जबकि विपश्यना से मुक्ति प्राप्त होती है। सामान्य नजर से असली सुख नहीं मिलता, जबकि विपश्यना से असली सुख मिलता है। सामान्य नजर से असली शान्ति नहीं मिलती, जबकि विपश्यना से असली शान्ति मिलती है। यद्यपि यह बात ध्यान रखने योग्य है की विपश्यना का आधार सामान्य नजर ही है, क्योंकि सामान्य नजर से ही मन में वह ढेर सारी सूक्ष्म सामग्री इकट्ठी हो पाती है, जिसके प्रति हम विपश्यना की विशेष नजर को केन्द्रित कर पाते हैं। इसलिए सामान्य नजर का भी अपना अलग महत्त्व है। तभी तो कहा जाता है कि विज्ञान के बिना अध्यात्म लंगड़ा है, तथा अध्यात्म के बिना विज्ञान अंधा है। इसलिए जीवन में विज्ञान व अध्यात्म, दोनों का समुचित मिश्रण होना चाहिए।

विपश्यना से साधना-लाभ कैसे मिलता है

जब हम मन के विचारों-भावों के प्रति अनासक्त हो जाते हैं, तब उससे यह अर्थ निकलता है कि जो कुछ विचारों-भावों से हासिल होता है, वह हमारे अपने पास पहले से ही तो है। अपने विचारों-भावों के इलावा हमारे पास अपना स्वयं का निरपेक्ष रूप/आत्मा ही तो है। अतः विचारों-भावों के सभी गुण आत्मा में उजागर होने लगते हैं, जैसे कि प्रकाश, आनंद, शान्ति आदि। वास्तव में, वे गुण आत्मा में पहले से ही विद्यमान होते हैं, परन्तु भौतिक व मानसिक दुनिया के प्रति आसक्ति के कारण दबे होते हैं। आत्मा के इसी शुद्धीकरण को “भ्रम के काले बादलों का छंटना” या “अज्ञान के काले परदे का हटना” आदि नामों से भी जाना जाता है।

आत्मा के ऊपर से अज्ञान के काले बादल का हटना

हालांकि ऐसा प्रतीत नहीं होता कि आत्मा धीरे-२ साफ हो रही है, जैसे कि रात का अँधेरा सुबह के साथ-२ धीरे-२ साफ होता है। नगण्य मात्रा में आत्मा की सफाई हो भी सकती है (जो प्रत्यक्ष तौर पर नजर नहीं आती), जिससे अद्वैत व शान्ति का अनुभव होता है, पर यह क्षणिक/अस्थायी होती है। सच्चाई यह है कि अचानक ही घुप अन्धकार से भरी आत्मा में प्रकाश छा जाता है, जैसे कि अँधेरे कमरे में प्रकाश बल्ब का स्विच ऑन करने से छा जाता है। वास्तव में सफाई तो मन की होती है, आत्मा की नहीं। आत्मा तो हमेशा साफ है। जब मन पूरी तरह से साफ हो जाता है, या यूं कहो कि मन विचारों के कचरे से रहित हो जाता है, तभी आत्मा के ऊपर पड़ा हुआ काला पर्दा अचानक से हट जाता है। आम आदमी यह देखकर हतोत्साहित हो जाता है कि उसकी आत्मा तो साफ ही नहीं हो रही है। इससे वह साधना के प्रयास को छोड़ देता है।

आम इंसान को एक अन्य गलतफहमी यह होती है कि व्यक्त रूप में ही मन के विचार आत्मा पर पर्दा डालते हैं, अव्यक्त या संस्कार रूप में नहीं। तभी तो अधिकाँश लोग अपने विचारों को बलपूर्वक दबाकर इस भ्रम में रहते हैं कि वे योगी हैं। वास्तव में मन के विचार (आसक्ति के साथ) बड़े दुष्ट होते हैं। ये अपनी सुप्त अवस्था में भी आत्मा को अँधेरे से ढक कर रखते हैं। तभी तो विभिन्न साधनाओं से इन दबे हुए विचारों को उघाड़ कर नष्ट करना पड़ता है। विपासना से यह काम सबसे आसानी से होता है। तभी तो सरल विपासना से सीधे ही, बिना किसी अन्य साधना के आत्मज्ञान हो सकता है, जैसे बुद्ध को हुआ। यह अलग आत है कि आम सांसारिक जीवन में कुण्डलिनी के बिना ऐसा होना संभव प्रतीत नहीं होता।

विपश्यना के प्रकार व उसके लिए सहयोगी कारक

विपश्यना दो प्रकार की है, ऐक्टिव (सक्रिय) और पैसिव (निष्क्रिय)। ऐक्टिव विपश्यना में मन को जिस मानसिक खूंटे (ऐंकर) से बांधा जाता है, वह बलपूर्वक निर्मित किया जाता है। उससे मन हर समय उस खूंटे से चिपका रहता है। उससे मन अपने अन्दर उमड़ने वाले विचारों-भावों की तरफ गहराई से ध्यान नहीं दे पाता, जिससे उसका उनके प्रति अनासक्ति के साथ साक्षीभाव बना रहता है। मन्त्र-जाप, माला-जाप, साँसें, कुण्डलिनी, जप-तप, उपवास, तथा अन्य सभी आध्यात्मिक गतिविधियाँ इसी खूंटे का काम करती हैं।

पैसिव विपश्यना में रोजमर्रा के क्रियाकलापों के दौरान स्वयं ही मन के लिए खूंटा निर्मित होता रहता है। उदाहरण के लिए, ड्राईविंग के दौरान मन सड़क पर लगा होता है, इसलिए उस दौरान उमड़ रहे विचारों-भावों के प्रति स्वयं ही विपश्यना होती रहती है। इसी तरह, अन्य साहसिक गतिविधियों, खेलों, स्पर्धाओं, कलाओं, विद्याओं आदि के दौरान भी होता है। इन गतिविधियों के साथ जितनी अधिक विपश्यना होती है, उतनी ही अधिक उनकी गुणवत्ता मानी जाती है। इनके साथ विपश्यना की मात्रा ही इनकी गुणवत्ता की मात्रा की सूचक हैं। प्रतिभागी की यह विपश्यना साथ रहने वाले लोगों, दर्शकों में भी इंडयूस होती रहती है।

कुण्डलिनी से विपश्यना

कुण्डलिनी (मन में स्थायी रूप से बसने वाली एकाकी छवि) विपश्यना के लिए सर्वोत्तम खूंटा है। यह मानसिक खूंटा ढीला होता रहता है, अतः प्रतिदिन के कुण्डलिनी-योग से इसे मजबूती देते रहना चाहिए।

कुण्डलिनी की सहायता से निष्क्रिय विपश्यना सर्वाधिक प्रभावशाली

प्रेमयोगी वज्र के अन्दर स्वयं ही तांत्रिक कुण्डलिनी चिपक गई थी। वह बहुत मजबूत व स्पष्ट थी। वह लगातार बनी रहती थी। वह एक आकर्षक मानसिक प्रेमिका (तांत्रिक गुरु की संगति में) के रूप में थी। वह मन के लिए एक सर्वाधिक शक्तिशाली खूंटा बनी। अपनी आकर्षकता के कारण, वह मानसिक खूंटे के साथ मानसिक वीडियो प्लेयर का काम भी कर रही थी। उससे प्रेमयोगी वज्र के मन में अपने पिछले जीवन की घटनाएं रंग-बिरंगे चित्रों के रूप में उमड़ रही थीं। सभी चित्र उस आकर्षक खूंटे के सामने फीके पड़ गए थे। सभी के प्रति स्वयं ही विपश्यना हो रही थी, जिससे वे तेजी से आत्मा में विलीन हो रहे थे। उससे उसका आत्मा बहुत तेजी से शुद्ध हो रहा था। अंततः दो साल के भीतर ही वह शून्य जैसा हो गया। अंत में, दिव्य परिस्थितियों के कारण उसका वह अंतिम विचार-रूपी मानसिक खूंटा भी उखड़ गया, जिससे उसे क्षणिक आत्मज्ञान की झलक मिली। इस घटना का विस्तृत वर्णन उसकी हिंदी में पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” व अंग्रेजी में पुस्तक “Love story of a Yogi- what Patanjali says” में किया गया है।

इससे सिद्ध होता है कि मानसिक खूंटे का आकर्षक होना भी आवश्यक है, ताकि वह मन की गहराइयों में दबे पड़े विचारों-भावों के स्पष्ट चित्रों को उघाड़ता रहे, और वे सभी उसके आगे फीके पड़ने लगे। कुण्डलिनी (विशेषतः तांत्रिक कुण्डलिनी) सबसे अधिक आकर्षक होती है, इसलिए विपश्यना के लिए कुण्डलिनी एक सर्वोत्तम मानसिक खूंटा है। निरंतर ध्यान के साथ इसका आकर्षण बढ़ता ही जाता है। जब सभी कुछ शून्यप्राय हो जाता है, तब आत्मज्ञान के लिए अंतिम छलांग के रूप में उस अंतिम मानसिक खूंटे को भी त्यागना पड़ता है। इसी मूलभूत मनोवैज्ञानिक सिद्धांत के आधार पर ही लाखों पुस्तकें व साधनाएं बनी हैं।

विपस्‍सना का अर्थ है: अपनी श्‍वास का निरीक्षण करना, श्‍वास को देखना।      

 
विपस्‍सना ध्‍यान की तीन विधियां: ओशो

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demystifyingkundalini by Premyogi vajra- प्रेमयोगी वज्र-कृत कुण्डलिनी-रहस्योद्घाटन

I am as natural as air and water. I take in hand whatever is there to work hard and make a merry. I am fond of Yoga, Tantra, Music and Cinema. मैं हवा और पानी की तरह प्राकृतिक हूं। मैं कड़ी मेहनत करने और रंगरलियाँ मनाने के लिए जो कुछ भी काम देखता हूँ, उसे हाथ में ले लेता हूं। मुझे योग, तंत्र, संगीत और सिनेमा का शौक है।

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