कुंडलिनी एक शिल्पकार के रूप में कार्य करती है, जो कि खराब मौसम द्वारा उत्पन्न द्वैत को अद्वैत में परिवर्तित करती है, जिससे यह बदलते मिजाज वाले मौसम के हानिकारक प्रभावों (शीतकालीन अवसाद सहित) से हमारी रक्षा करती है

दोस्तों, इस साल मौसम ने आम लोगों को बहुत परेशान किया। कड़ाके की ठण्ड बार-२ हमला करती रही। पर मुझे मेरी कुण्डलिनी ने इस समस्या का ज़रा भी आभास नहीं होने दिया। वास्तव में कोई मौसम खराब नहीं होता। हरेक मौसम में अपनी खूबसूरती होती है। गर्मियों में तनावहीनता, ढीलेपन, हल्केपन व शान्ति का एक अलग ही अहसास होता है। इसी प्रकार सर्दियों में चुस्ती का अहसास होता है। बरसात के मस्तीपने का एक अलग ही अंदाज होता है।

बदलता मौसम शरीर और मन के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है

हमारे शरीर और मन को मौसम के अनुसार अपने आपको ढालने के लिए कुछ दिनों के समय की जरूरत पड़ती है।  वे दिन शरीर और मन के लिए जोखिम भरे होते हैं, क्योंकि उन दिनों में वे पुराने मौसम के अनुसार चल रहे होते हैं, और नए मौसम से सुरक्षा के लिए जरूरी बदलाव उनमें नहीं आए होते हैं। ऐसे जोखिम भरे दिनों में कुण्डलिनी हमें अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान कर सकती है।

मौसम में ऐसे अचानक बदलाव पहाड़ों में बहुत होते हैं। वहां धूप लगने पर एकदम से गर्मी बढ़ जाती है, और ज़रा से बादल के टुकड़े से सूरज के ढक जाने पर एकदम से ठण्ड पड़ जाती है। ऐसा लगातार चलता रहता है। जैसे-२ पहाड़ों की ऊँचाई बढ़ती जाती है, मौसम के बदलाव भी बढ़ते जाते हैं। इसीलिए तो तिब्बत में तांत्रिक योग बहुत कामयाब और लोकप्रिय हुआ, क्योंकि वही एकदम से कुण्डलिनी को चमकाने में सक्षम है।

कुण्डलिनी मौसम के बदलाव से उत्पन्न द्वैत को अद्वैत में बदल देती है

यह तो हम पहले ही सिद्ध कर चुके हैं कि अद्वैत और कुण्डलिनी का चोली-दामन का साथ है। बदलता मौसम उतनी मार शरीर पर नहीं करता, जितनी मन पर करता है। बदलता मौसम खुद भी द्वैत-रूप (अच्छा-बुरा में बंटा हुआ) है, इसलिए वह मन को भी द्वैत से भर देता है। मन अच्छाई और बुराई (प्रकाश और अन्धकार) के बीच में झूलने लगता है। मन के रोगों की जड़ द्वैत ही तो है। और शरीर के रोगों की जड़ बीमार मन ही है।

नियमित कुण्डलिनी योग से अद्वैत लगातार पैदा होता रहता है, जो बदलते मौसम से पैदा द्वैत को मन पर हावी नहीं होने देता। यहाँ तक कि बदलते मौसम के द्वैत को भी अद्वैत में बदल कर प्रचंड अद्वैत पैदा करता है। वास्तव में द्वैत से ही अद्वैत निर्मित होता है, केवल कुण्डलिनी के रूप में कुशल कारीगर की जरूरत होती है। इसीलिए तो मानव इतिहास के शुरू से ही लोग योग साधना के लिए पहाड़ों का रुख करते आ रहे हैं। यह इसलिए, क्योंकि वहां बहुत द्वैत होता है, जिसे  कुण्डलिनी-मिस्त्री अद्वैत में बदल देता है।   

कुंडलिनी सर्दियों के अवसाद के खिलाफ प्रभावी उपकरण है

विशेष रूप से सुबह के समय उज्ज्वल प्रकाश का अभाव सर्दियों के अवसाद को उत्पादन करता है। कुंडलिनी का जब सुबह-सुबह ध्यान किया जाता है, तब मन में चेतना की तीव्र उज्ज्वल रोशनी पैदा होती है। यह अवसाद को रोकता है, और पहले से पैदा हुए सर्दियों के अवसाद को ठीक करता है।

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