कुंडलिनी के लिए ही विभिन्न देवता विभिन्न व्यक्तित्वों के सांचों के रूप में हैं


मित्रो, मुझे कभी कोई देवता अधिक पसंद आता है, कभी कोई। बहुत पहले मुझे देवी माता रानी सर्वाधिक पसंद थी। अब मुझे भगवान शिव सबसे अच्छे लगते हैं। एक बार मैं जब मुंबई घूमने गया था, तब मुझे भगवान गणेश सबसे अच्छे लगे थे। देवताओं से हमेशा ही मेरी कुंडलिनी उजागर हो जाती थी। बात स्पष्ट है कि जो देवता कुंडलिनी को सबसे ज्यादा उजागर करता है, वही देवता सबसे अच्छा लगता है। इसका मतलब है कि असली आनन्द तो कुंडलिनी में ही है। देवता तो कुंडलिनी को उजागर करने में मददगार होते हैं। 

एक विशेष देवता का स्वरूप एक विशेष व्यक्तित्व के स्वरूप का साँचा होता है

वास्तव में विभिन्न देवताओं का अस्तित्व विभिन्न व्यक्तित्वों के बोधक के रूप में है। भगवान शिव एक तांत्रिक, मस्त, अकिंचन, भोले, निस्पृह, प्रकृति-प्रेमी, शीघ्र नाराज व प्रसन्न होने वाले, अनासक्त व उच्च कोटि के आत्मगौरव के अहसास वाले व्यक्तित्व के बोधक हैं। यदि किसी को ऐसा व्यक्तित्व व ऐसे व्यक्तित्व वाला कोई आदमी पसंद है, तो उसे शिव आराधना से लाभ मिल सकता है। शिव का ध्यान करते रहने से ऐसे व्यक्तित्व वाले व्यक्ति की छवि उसके मन मन्दिर में प्रकट होती रहती है, और फिर धीरे-धीरे कुंडलिनी का रूप ले लेती है। जीवन में कोई किसी के साथ भौतिक रूप से तो लगातार नहीं बना रह सकता। परन्तु मानसिक रूप में जरूर हमेशा बना रह सकता है। किसी प्रेमी व्यक्ति के मानसिक चित्र को लगातार बनाए रखने के लिए ही उसके जैसे देवता को चुना जाता है। देवता को मूर्ति, चित्र, प्रतिमा आदि के रूप में पूजा जाता है। इससे प्रेमी का मानसिक चित्र मजबूत होता रहता है। कई बार उल्टा भी घटित होता है। जिस व्यक्तित्व के देवता की अराधना की जाती है, उस व्यक्तित्व वाले आदमी से प्यार होने लगता है। इससे फिर कुंडलिनी का विकास होता है। पुराने युग में योगी किसी प्रेमी व्यक्ति के बिना ही खाली देवता की मूर्ति को भी कुंडलिनी बना लेते थे। परंतु आजकल यह असंभव सा ही लगता है। क्योंकि आजकल का समाज देवप्रधान या मूर्तिप्रधान न होकर व्यक्तिप्रधान है। इसी तरह किसी को भगवान गणेश का व्यक्तित्व रुचिकर लग सकता है, तो किसी को मां काली का। पसंद अपनी-अपनी। सभी की रुचि के अनुसार देवता विद्यमान हैं। जहाँ तक मेरे अपने अनुभव की बात है, तो मेरी कुंडलिनी के रूप में शिव जैसा व्यक्तित्व था। किसी दिव्य घटनाक्रम से एकबार मेरा झुकाव एकदम से भगवान शिव के प्रति बन गया था। मैं पूरी तरह हर तरफ से हारकर अपने आप को उनके प्रति समर्पित महसूस कर रहा था। इससे मुझे विविध अनुकूल परिस्थितियों के साथ अनजाने में ही तंत्रयोग की प्रेरणा मिली, जिससे मेरी कुंडलिनी जल्दी से जागृत हो गई।

देवता भावरूप में हमेशा विद्यमान रहते हैं

उदाहरण के लिए यदि किसी देश-काल में पैदा हुए विशेष तांत्रिक या कहो भैरवनाथ को तन्त्र का देवता माना जाता, तो आजकल के अधिकांश लोगों की उन पर श्रद्धा न होती। ऐसा इसलिए होता, क्योंकि भैरवनाथ एक असली मनुष्य थे, जो बहुत पुराने समय में पैदा हुए थे, और आज नहीं हैं। उनके समय की जीवन-परिस्थितियां आज की जीवन-परिस्थितियों से सर्वथा भिन्न थीं। इस प्रकार लोगों के मन में उमड़ रहा तांत्रिक भाव बाबा भैरव की तरह ही नष्टप्राय हो जाता। परंतु इसके विपरीत भगवान शिव शाश्वत हैं। वे आज भी वैसे ही हैं, जैसे हजारों वर्ष पहले थे। वे आगे भी हमेशा वैसे ही रहेंगे। वास्तव में वे कोई नाशवान व्यक्ति नहीं, अपितु व्यक्तित्व या भाव के रूप में हैं। उनके व्यक्तित्व को ओढ़ने वाले अनगिनत लोग हो चुके हैं। इसलिए उन पर हमेशा विश्वास और इंटरस्ट बना रहता है। उससे तंत्र पर भी विश्वास बना रहता है, और उसके प्रति रुचि भी। 

देवता हमेशा ही कुंडलिनी को शक्ति देते हैं

यदि कोई देवता रुचिकर हो या न हो, वह हमेशा ही कुंडलिनी लाभ देता है। देवता वास्तव में सजीव (यांग/शिव/पुरुष) और निर्जीव (यिन/शक्ति/प्रकृति) के मिश्रण की तरह है। सजीव का गुण उसमें मनुष्य की तरह ही सभी क्रियाकलाप करने के रूप में है। निर्जीव का गुण उनमें निर्जीव वस्तुओं जैसे कि हवा, पानी, आग, सूर्य आदि के रूप में होना है। देवता में सजीव व निर्जीव का मिश्रण तभी संभव हो सकता है, यदि देवता अद्वैतमयी और अनासक्त हों। अद्वैत व अनासक्ति से देवता के सभी क्रियाकलाप उसके मन में शांत हो जाते हैं। हालांकि देवता द्वारा बाहर-बाहर से वे होते रहते हैं। यदि देवता पूरी तरह से सजीव होता, तो एक जीवित मनुष्य की तरह प्रत्यक्ष होता, और दुनिया के बंधन में डूबा रहता। यदि देवता पूरी तरह निर्जीव होता, तो मृतप्राय होता, जो सृष्टि को क़भी भी न चला पाता। और तो और, उसकी पूजा से लाभ की बजाय हानि होती। देवता के इसी अद्वैत रूप के कारण ही उसकी पूजा करने से आदमी के मन में अद्वैत छा जाता है, जिससे कुंडलिनी उजागर हो जाती है। इसीलिए ही वेद-शास्त्रों में लिखा गया है कि देवता की अराधना से दुनिया के सुख-साधनों के साथ मुक्ति की भी प्राप्ति होती है।

Published by

demystifyingkundalini by Premyogi vajra- प्रेमयोगी वज्र-कृत कुण्डलिनी-रहस्योद्घाटन

I am as natural as air and water. I take in hand whatever is there to work hard and make a merry. I am fond of Yoga, Tantra, Music and Cinema. मैं हवा और पानी की तरह प्राकृतिक हूं। मैं कड़ी मेहनत करने और रंगरलियाँ मनाने के लिए जो कुछ भी काम देखता हूँ, उसे हाथ में ले लेता हूं। मुझे योग, तंत्र, संगीत और सिनेमा का शौक है।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s