कुंडलिनी भी एक भूत है~ एक पवित्र भूत

दोस्तो, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि भूत क्या होते हैं। कुछ लोगों ने सवाल किया कि अंग्रेजी में इसे घोस्ट शब्द में क्यों ट्रांसलेट किया है, घोस्ट का कोई आध्य्यात्मिक महत्व नहीं। मैंने कहा कि यह गूगल ने ट्रांसलेट किया है, मैंने नहीं। दरअसल हम शब्दों में ज्यादा उलझे रहते हैं, मूल भावना को कम समझने की कोशिश करते हैं। यह एक मनोवैज्ञानिक कमजोरी है। पर उनकी बात भी सही है।जो वास्तविक शाब्दिक अर्थ भूत शब्द का बनता है, वह घोस्ट शब्द का बनता ही नहीं। भूत मन ही है। यही आदमी को डराता है, ताकि आदमी सीधे रास्ते पर चले। भटके हुए मन के विविध रूप ही विविध प्रकार के भूत हैं। किसी के पेट पर आँख है, कोई अनगिनत भुजाओं वाला है, कोई अनगिनत टांगों वाला है आदि। समुद्री जीव भी तो ऐसे ही विविध व आश्चर्यजनक रूपों वाले होते हैं। उनके अंदर भी भटका हुआ मन है। वही अजीब मन ही अजीब किस्म का भूत है, जो अजीब शरीर को ही अपने रहने के लिए चुन पाता है। शरीर के मरने के बाद भी मन नहीं मरता। मन भी आत्मा की तरह ही अमर है। मन मर नहीं सकता, केवल आत्मा में विलीन ही हो सकता है। शरीर के न रहने पर मन अजीब से घने अंधकार का रूप ले लेता है। वह काले कज्जल की तरह घना और चमकीला सा होता है। उसमें उसकी शुरु से लेकर सारी सूचनाएं मनोवैज्ञानिक कोड केे रूप में दर्ज होती हैं। वे इतनी स्पष्ट होती हैं कि यदि कोई अपनी जानपहचान वाले आदमी का भूत देख ले तो तुरंत पहचान जाता है कि वह उसका भूत है। यहाँ तक कि जीव की वेे व्यक्तिगत सूचनाएं उसके भूत में उसके अपने जीवित समय के शरीर से भी ज्यादा स्पष्ट व प्रत्यक्ष होती हैं। दरअसल भूत मन में प्रत्यक्ष की तरह महसूस होता है। दिमाग उससे प्रेरित होकर भूत के रूप के अनुसार चित्र बना लेता है। दिमाग के ट्रिकस सबको पता ही हैं। वह हमें लगता है कि आंखों से दिख रहा है, पर होता वह दिमाग में है। आदमी समझता है कि सिर्फ मरने के बाद ही भूत बनते हैं। दरअसल जिंदा जीव या आदमी भी भूत ही है। भूत का शाब्दिक अर्थ ही “पैदा होया हुआ पदार्थ” है। न तो भगवान पैदा होता है, न ही प्रकृति। दोनों अनादि व अनंत हैं। केवल जीव ही परमात्मा से पैदा होता है, और उसीमें विलीन भी होता है। पैदा भी नहीं होता। असल में यह उसकी परछाई की तरह है। परछाई केवल महसूस होती है। परछाई का अस्तित्व नहीं होता। ऐसा ही भूत भी है। इसलिए जीव ही भूत है। मृत भूत ही लोगों को डरावना लगता है, क्योंकि उसका शरीर नहीं होता। अब यदि कोई आसमान में बिना लकड़ी की आग देख ले, तो वह डरेगा ही कि यह क्या हुआ। 

धर्म के लिए कुछ कट्टरता जरूरी भी है

फिर मैं यह बात भी बता रहा था कि जहाँ अति कट्टरता हानिकारक है, वहीं थोड़ी कट्टरता या थोड़ा हठ धर्म के लिए जरूरी भी है। यदि आप नियमित कुंडलिनी योग करने का हठ नहीं पकड़ोगे, तो कर ही नहीं पाओगे। कभी यह बहाना बनाओगे कि उस दिन आपने इसलिए नहीं किया क्योंकि उस दिन आप विवाह या बारात में गए थे। यदि आप कट्टर होते तो थोड़ी देर के लिए एकांत ढूंढ कर जरूर कुंडलिनी योग करते। कभी आप यह बहाना बनाओगे कि उस दिन मैं शहर गया था जहाँ जगह की कमी थी। यदि आप कट्टर होते तो कुर्सी पर भी कर लेते। कभी यह बहाना बनाओगे कि उस दिन आप देर रात को घर पहुंचे, इसलिए योग नहीं कर पाए। पर यदि आप हठी होते तो चाहे कम समय के लिए करते, पर करते जरूर। कभी आप बहाना बनाओगे कि उस दिन आपने खाना खा लिया था या आप बीमार थे। पर आप हल्के आसन और हल्के प्राणायाम भी कर सकते थे। साथ में, समस्याओं के बीच में भी कुंडलिनी योग करने से तो कुंडलिनी लाभ कई गुना बढ़ जाता है। इस तरह से यदि सकारात्मक कट्टरता न हो, तो बहाने खत्म ही नहीं होते, जिससे आदमी साधना पे अडिग नहीं रह पाता।

अगर पूजा ही सबकुछ होती, तो पूजा करने वालों के साथ दुखदायी घटनाएं न घटित हुआ करतीं

पूजा साधन है, साध्य नहीं। साध्य अद्वैत है। वही ईश्वर है। पूजा से भक्ति बढ़ती है, और भक्ति से अद्वैत। अद्वैत के साथ कुंडलिनी अवश्य रहती है। यह तो सभी जानते हैं कि कुंडलिनी हमेशा मंगल ही करती है। वैसे उसमें अद्वैत का ही अधिकांश योगदान है, जो कुंडलिनी से पैदा होता है। अद्वैत से कुंडलिनी, और कुंडलिनी से अद्वैत, ये दोनों एकदूसरे को बढ़ाते रहते हैं। अद्वैत से आदमी संतुलित और ऊर्जा से भरा रहता है, इससे बुद्धि अच्छे से काम करती है। अद्वैत से विचारों के शोर पर लगाम लगती है, जिससे ऊर्जा की बर्बादी नहीं होती। एकबार मैं किसी लघु जानपहचान वाले के घर एक व्यावसायिक कार्य से उसके द्वारा बुलाने पर गया था। उस घर का एक सदस्य जो मुझे मित्र के जैसा लगता था, वह मुझे अपने साथ ले गया था। वहाँ उसके नवयुवक भाई से तब बात हुई, जब उसने मेरा अभिवादन किया। उसके चेहरे पर मुझे एक विचित्र सा तेज नजर आ रहा था। उसका नाम भी शिव के नाम से जुड़ा था। इसलिए मैंने अनजाने में ही खुशी और मुस्कुराहट के साथ  उसकी तुलना शिव से कर दी। दरअसल स्वभाव भी उसका कुछ वैसा ही था। उससे वह भी मुस्कुराया, और परिवार के अन्य लोग भी। आकर्षक, शर्मीला, मां-बाप का विशेष लाड़ला और मेहनती लड़का था वह। उसके एक या दो दिन बाद वह अपने स्कूल टाईम के मित्र के साथ उसकी एकदम नई खरीदी मोटरसाइकिल पर उत्साह से भरा हुआ कहीं घूमने चला गया। सम्भवतः उसका वह दोस्त बाइक चलाना सीख ही रहा था। रास्ते में वे एक प्रख्यात शिव व स्थानीय देवता के मंदिर में दर्शन के लिए रुके। सम्भवतः नई गाड़ी की पूजा करवाना ही मुख्य उद्देश्य था वहाँ रुकने का। वहां से शहर घूमने निकले तो रास्ते में एक ट्रैक्टर ट्रॉली के पिछले हिस्से से टकरा गए। राइडर तो बच गया, पर पीछे बैठे उस नवयुवक ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। इससे यह भी पता लगता है कि बच्चों को बचपन में ही साइकिल आदि दोपहिया वाहनों का अच्छा प्रशिक्षण मिलना चाहिए। आम आदमी सोचता है कि बच्चा बड़ा होकर खुद सीख जाएगा, पर कई बार तब तक काफी देर हो चुकी होती है। चोरी छिप के चलाने वाले या सीखने वाले कुछ अन्य किशोरों में भी मैंने ऐसे हादसे देखे हैं। हो सकता है कि मेरे अवचेतन मन पर शिव के भूतों का प्रभाव पड़ा हो, जिससे शिव वाली बात मेरे मुंह से निकली हो। यह भी हो सकता है कि शक्तिशाली अद्वैत साधना से मेरे अवचेतन मन को घटना का पूर्वाभास हो गया हो। हालाँकि उस समय मैं कोई विशेष व नियमित योगसाधना नहीं करता था। मेरा काम करने का तरीका ही ऐसा था कि उससे खुद ही योगसाधना हो जाती थी। उस तरीके का सविस्तार वर्णन पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन~ एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र” में मिलता है। परिवार वाले हैरान होकर सोचते कि शिवनाम का सहारा होने पर भी वह बड़ा हादसा कैसे हो गया। होता भी, तो जान तो बच ही जाती। फिर यह मानकर संतुष्ट हो जाते कि उसे शिवनाम से मुक्ति मिल गई होगी। अब ये तो किसको पता कि क्या हुआ होगा पर इतना जरूर है कि पूजा लापरवाही को नहीं भर सकती। भौतिक कमियां केवल भौतिक साधनों से ही पूरी की जा सकती है। पूजा से सहयोग तो मिलता है, पर उसकी भी अपनी सीमाएं हैं। मन को बेशक लगे कि ऑल इज वैल, पर लगने और होने में फर्क है। अच्छा लगना और अच्छा होना। फील गुड एण्ड बींग गुड़। हालांकि दोनों आपस में जुड़े हैं, पर एक निश्चित सीमा तक ही। उसके परिवार वाले यह भी कहते कि वह पिछले कुछ समय से अजीब-अजीब सी और अपने स्वयं के बारे में दुनिया से जाने वाली जैसी बातें भी करता था। होनी ही वैसी रही होगी। उसके पिता जो अक्सर बीमार रहते थे, वे भी अपने बेटे के गम में कुछ दिनों के बाद चल बसे। जो कुछ भी हुआ, उससे पगलाए जैसे उसके भाई से मेरी मित्रता टूट जैसी चुकी थी। कुछ डिस्टर्ब जैसा तो वह पहले भी लगा करता था, पर उतना नहीं। कई बार वह यह सोचने लग जाता था कि कहीं उसके भाई को मंदिर में किसी काले तंत्र ने बलि का बकरा न बनाया हो। दुखी मन क्या नहीं सोचता। उसका सदमा मुझे भी काफी लगा और कुछ समय मुझे भी डिप्रेशन की गोलियाँ खानी पड़ीं, जिसको लेने के कुछ अन्य कारण भी थे, हालांकि मेरे स्वनिर्मित अद्वैत दर्शन और उसके अनुसार मेरी काम करने की आदत ने मुझे जल्दी ही संभाल लिया। मुझे महसूस हुआ कि डिप्रेशन की दवाइयां भी अद्वैत ही पैदा करवाती हैं, हालाँकि जबरदस्ती से और कुछ घटिया गुणवत्ता के साथ और स्मरणशक्ति व कार्यदक्षता के ह्रास के साथ। साथ में, शरीर और दिमाग को भी हानि पहुंचाती हैं। जब मूलतः अद्वैत से ही अवसाद दूर होता है, तब क्यों न कुंडलिनी की सहायता ली जाए, क्यों भौतिक दवाइयों की आदत डाली जाए। मैंने  ऐसे सहव्यवसायी भी देखे हैं, जिन्हें इन दवाओं की आदत है। वे कुछकुछ मरीजों, खासकर मानसिक मरीजों की तरह लगते हैं। भगवान करे, ऐसे हादसे किसी के साथ न हों।

अवसाद भूत का छोटा भाई है, जिसे कुंडलिनी ही सर्वोत्तम रीति से भगा सकती है

वैसे तो ईश्वर के सिवाय सभी कुछ भूत है, पर लोकव्यवहार में शरीररहित जीवात्मा को ही भूत माना जाता है। अवसाद की अवस्था भी शरीररहित अवस्था से मिलती जुलती है। इसमें शरीर के विविध सुखों का अनुभव घट जाता है। सम्भवतः यही प्रमुख कारण है कि अवसादग्रस्त व्यक्ति में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति ज्यादा होती है। अवसाद में कुंडलिनी योग एक जीवनरक्षक की भूमिका निभा सकता है। अवसादरोधी दवाओं से भी अद्वैत या कुंडलिनी ज्यादा स्पष्ट हो जाती है। मतलब कि अवसादरोधी दवाएं भी कुंडलिनी सिद्धांत से ही काम करती हैं। इसका वैज्ञानिक अन्वेषण होना चाहिये। मुझे लगता है कुण्डलिनी के प्रारंभिक अन्वेषण के लिए इनका इस्तेमाल विशेषज्ञ चिकित्सक की निगरानी में थोड़े समय के लिए किया जा सकता है। मुझे यह भी लगता है कि भांग भी यही काम करती है, इसीलिए योगी साधु इनका समुचित व नियंत्रित सेवन किया करते थे। कुंडलिनी ही शरीर के सभी सुखों का स्रोत या आधार है। इससे मस्तिष्क में भौतिक सुखों को अनुभव कराने वाले रसायन बनने लगते हैं। हम मन के रूप में ही भौतिक सुखों को अनुभव कर सकते हैं, सीधे नहीं। कुंडलिनी उच्च कोटि का संवर्धित और परिष्कृत मन ही तो है। इससे भौतिक वस्तुओं के बिना ही भौतिक सुख जैसा सुख मिलने लगता है। सीधा सा मतलब है कि कुंडलिनी भौतिक सुखों के लिए भौतिक सुविधाओं को बाईपास करने वाला अनूठा तरीका है। मुझे यह कुंडलिनी लाभ एकबार नहीं, अनेक बार मिला है। सबको मिलता है, पर वे इसकी गहराई में नहीं जाते। भारत कभी कुंडलिनी योग प्रधान देश था, तभी तो यह भौतिकवाद के बिना भी सर्वाधिक विकसित होता था।

अद्वैत का सबसे व्यावहारिक तरीका हमेशा अपने को संपूर्ण का हिस्सा मानना है

कोई उसे परमात्मा कहता है, कोई ईश्वर, कोई गॉड और कोई और कुछ। पर व्यावहारिकता में उसे संपूर्ण कम ही लोग मानते हैं। कई लोग मानते हैं, यद्यपि बाहर-बाहर से ही, क्योंकि अगर उनके सामने कोई भूखा या लाचार कुत्ता आ जाए, तो वे उसे गाली दे सकते हैं, या डंडा मार सकते हैं। फिर कैसा सम्पूर्ण का ध्यान या पूजन हुआ, जब उसके एक हिस्से से नफरत कर रहे हैं। इसलिए सबसे अच्छा तरीका यही है कि चाहे कैसी भी परिस्थिति हो, अपने को हमेशा सम्पूर्ण का हिस्सा मानना चाहिए। वह सम्पूर्ण, जिसमें सबकुछ है, जिससे अलग कुछ नहीं है। ध्यान करने की जरूरत भी नहीं, मानना ही काफी है। ध्यान तो अपने काम पर लगाना है। अगर ध्यान सम्पूर्ण पर लग गया, तो काम कैसे होगा। किसी भी परिस्थिति को ठुकराना नहीं, अंधेरा या प्रकाश कुछ भी, क्योंकि वह सम्पूर्ण का हिस्सा होने से उससे अलग नहीं है। एवरीथिंग इज पार्ट ऑफ ए व्होल। ऐसी मान्यता बनी रहने से कुंडलिनी भी मन में बनी रहेगी, और चारों ओर घूमते हुए पूरे शरीर को स्वस्थ रखेगी। यद्यपि इस विश्वास को सीधे चौबीसों घंटे बनाए रखना न तो व्यावहारिक और न ही आसान लगता है, इसलिए इसे अप्रत्यक्ष रूप से प्राप्त करने के लिए एक व्यावहारिक अद्वैत दर्शन और कुंडलिनी योग को अपनाया जाना चाहिए। ऐसी मान्यता बनाए रखने में अद्वैत की लोकप्रिय व व्यावहारिक पुस्तक”शरीरविज्ञान दर्शन~ एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र” ने मेरी बहुत मदद की।

कुंडलिनी भी एक भूत है, एक पवित्र भूत

जब मन ही भूत है, तब कुंडलिनी भी भूत ही सिद्ध हुई, क्योंकि कुंडलिनी भी एक उच्च कोटि का मन ही है। आम भूत का भी भौतिक अस्तित्व नहीं होता, और कुंडलिनी का भी नहीं। आम भूत भी केवल मन की ही उपज होते हैं, और कुंडलिनी भी। पर यह आम भूत से अलग है। जहाँ आम भूत परमात्मा से दूर ले जाते हैं, वहीँ पर कुंडलिनी-भूत परमात्मा की ओर ले जाता है। क्या इसाई धर्म में वर्णित पवित्र भूत या हॉली घोस्ट कुण्डलिनी ही है? इसका निर्णय मैं आपके ऊपर छोड़ता हूँ।

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demystifyingkundalini by Premyogi vajra- प्रेमयोगी वज्र-कृत कुण्डलिनी-रहस्योद्घाटन

I am as natural as air and water. I take in hand whatever is there to work hard and make a merry. I am fond of Yoga, Tantra, Music and Cinema. मैं हवा और पानी की तरह प्राकृतिक हूं। मैं कड़ी मेहनत करने और रंगरलियाँ मनाने के लिए जो कुछ भी काम देखता हूँ, उसे हाथ में ले लेता हूं। मुझे योग, तंत्र, संगीत और सिनेमा का शौक है।

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