कुंडलिनी के प्रति अरुचि को भी एक मानसिक रोग माना जा सकता है

दोस्तों, मैं पिछले ब्लॉग लेख में कुछ व्यावहारिक जानकारियां साझा कर रहा था। हालाँकि सभी जानकारियां व्यक्तिगत होती हैं। किसीके कुछ जानकारियां काम आती हैं, किसीके दूसरी। पता तो हर किस्म की मानवीय जानकारी का होना चाहिए, क्या पता किस समय कौनसी जानकारी काम आ जाए। व्यक्ति का व्यक्तित्व बदलता रहता है। कभी मैं तन्त्र पर जरा भी यकीन नहीं कर पाता था। हालाँकि उसकी मोटे तौर की जानकारी मुझे थी। वो जानकारी मेरे काम तब आई जब मेरा व्यक्तित्व व कर्म बदला, जिससे मुझे तन्त्र पर विश्वास होने लगा। खैर, तन्त्र का दुरुपयोग भी बहुत हुआ है। जिस तन्त्र की शक्ति से कुंडलिनी जागरण मिल सकता था, उसे भौतिक दुनियादारी को बढ़ावा देने के लिए प्रयोग में लाया गया। परिणाम सबके सामने है। आज का अंध भौतिकवाद और जेहादी किस्म की कट्टर धार्मिकता उसी का परिणाम है। किसी धर्म विशेष के बारे में कहने भर से ही मौत का फतवा जारी हो जाए, और कोई भी आदमी या संस्था डर के मारे कुछ न कह पाए, ये आज के विज्ञान के युग में कितना बड़ा विरोधाभास है। नाम को तो हिंदुस्तान है, पर हिंदुओं की सफाई का अभियान जोरों पर है। एक सुनियोजित अंतरराष्ट्रीय साजिश चल रही है। इसी हिन्दुविरोधी श्रृंखला में अब हिंदूवादी व राष्ट्रवादी सुदर्शन चैनल के प्रमुख सुरेश चव्हाणके जी की हत्या की जेहादी साजिश का खुलासा हुआ है। जबरन धर्मांतरण का सिलसिला जारी है। फिर उन्हें राईस बैग कन्वर्ट भी कहा जाता है। धर्म इसलिए बनाए गए थे ताकि मानवता को बढ़ावा मिले। ऐसा भी क्या धर्म, जो मानवता से न चले। मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है। जो अन्य धर्म और देश इसपर चुप्पी जैसी साध कर इसका अपरोक्ष समर्थन किए हुए हैं, उन्हें यह नहीं पता कि कल को उनका नम्बर भी लग सकता है। डबल स्टैंडर्ड की भी कोई सीमा नहीं आजकल। यदि बैप्टिसम वैज्ञानिक है, तो गंगास्नान भी वैज्ञानिक है। यदि गंगास्नान अंधविश्वास है, तो बैप्टिसम भी अंधविश्वास है। दोगलापन क्यों। जो ट्रूडो सिंघु बॉर्डर पर चले किसान आंदोलन को लोकतांत्रिक बताते हुए उसका समर्थन कर रहे थे, वे आज ट्रक ड्राइवर्स के आंदोलन को अलोकतांत्रिक बता रहे हैं। गहराई से जांचे-परखे बिना कोई भी सतही बयानबाजी नहीं करनी चाहिए। तन्त्र एक शक्ति है। तन्त्र का दुरुपयोग, मतलब शक्ति का दुरुपयोग। प्रकृति को भी इसने विनाश की ओर धकेल दिया है। देवी काली के लिए जो पशु बलि दी जाती थी, वह कुंडलिनी के लिए ही थी। काली कुंडलिनी को ही कहा गया है। पर कितने लोगों ने इसे समझा और इसका सही लाभ उठाया। हालांकि कुछ अप्रत्यक्ष लाभ तो मिलता ही है, पर उसे फलीभूत होने में बहुत वक्त लग जाता है। पर उस शक्ति से कुंडलिनी जागरण के लिए कितने लोगों ने प्रयास किया होगा, और कितना प्रयास किया होगा। शायद बहुत कम या लाखों में से कुछ सौ लोगों ने। उनमें से सही प्रयास भी कितनों ने किया होगा। शायद दस–बीस लोगों ने। उनमें से कितने लोगों को कुंडलिनी जागरण मिला होगा। शायद एक-दो लोगों को। तो फिर काली आदि कुंडलिनी प्रतीकों को समझने और समझाने में कहाँ गलती हुई। इसी का अनुसंधान कराने के लिए ही शायद काल ने वह प्रथा आज लुप्तता की ओर धकेल दी है। वैसे आजकल की अंधी पशु हिंसा से वह प्रथा कहीं ज्यादा अच्छी थी। वैदिक युग में कभी-कभार होने वाली यज्ञबलि से लोग अपने शरीर की अधिकांश जरूरत पूरी कर लिया करते थे। वैसे पशुहिंसा पर चर्चा मानवीय नहीं लगती, पर जिस विषय पर हम बोलेंगे नहीं, उसे दुरस्त कैसे करेंगे। कीचड़ को साफ करने के लिए कीचड़ में उतरना पड़ता है। पशु भी जीव है, उसे भी दुख-दर्द होता है। हिंदु धर्म के अनुसार गाय के शरीर में सभी देवताओं का निवास है। शरीरविज्ञान दर्शन भी तो यही कहता है कि सभी जीवों के शरीर में संपूर्ण ब्रह्मांड स्थित है। इसलिए उसके अधिकारों का भी ख्याल रखा जाना चाहिए। आजकल बहुत सी पशु अधिकारों से जुड़ी संस्थाएँ हैं, पर मुझे तो ज्यादातर निष्पक्ष और निःस्वार्थ नहीं लगतीं। वे जहाँ एक विशेष धर्म में हो रही बड़े तबके की और अमानवीय धार्मिक हिंसा पर मौन रहती हैं, वहीं पर किसी अन्य विशेष धर्म की छोटी सी धार्मिक व मानवतावादी हिंसा पर भी हायतौबा मचा देती हैं। आज तो पशुहिंसा पे कोई लगाम ही नहीं है। मानवाधिकार आयोग की तरह पशु अधिकार आयोग भी होना चाहिए। पर आज मानवाधिकार आयोग भी निष्पक्ष और ठीक ढंग से कार्यशील कहाँ है। अगर मानवाधिकार आयोग की चलती, तो आज धर्म के नाम पर हत्याएँ न हो रही होतीं। आज तो पशुहिंसा के साथ आध्यात्मिक व मानवतावादी प्रतीक भी नहीं जुड़ा है। कोई नियम कायदे नहीं हैं। पशु क्रूरता आज चरम के करीब लगती है, और आध्यात्मिक विकास निम्नतम स्तर पर। आज बहुत से लोग पशुजन्य उत्पादों का बिल्कुल प्रयोग नहीं करते। फिर इतनी ज्यादा पशुहत्या कैसे हो रही है। मतलब साफ है। जो पशुजन्य उत्पाद का उपभोग करते हैं, वे अपनी जरूरत से कहीं ज्यादा उपभोग कर रहे हैं। इससे वे स्वस्थ कम और बीमार ज्यादा हो रहे हैं। आजकल पूरी दुनिया में बढ़ रहा मोटापे का रोग इसका अच्छा उदाहरण है। जो इनका उपयोग नहीं करते, उनकी कमी भी वे पूरी कर दे रहे हैं। तो फिर कुछ लोगों के द्वारा इनको छोड़ने से क्या लाभ। जो ज्यादा उपभोग कर रहे हैं, वे भी बीमार हो रहे हैं, और जो बिल्कुल भी उपभोग नहीं कर रहे हैं, वे भी बीमार हो रहे हैं। ज्यादा उपयोग करने वाले यदि व्यायाम या दवाईयों आदि की सहायता से अपने शरीर को बीमार होने से बचा रहे हैं, फिर भी उनका मन तो बीमार हो ही रहा है। जरूरत से ज्यादा तमोगुण और रजोगुण से मन तो बीमार होगा ही। क्या है कि पाश्चात्य संस्कृति में अधिकांशतः शरीर की बीमारी को ही बीमारी माना जाता है। मन की बीमारी को भी अधिकांशतः अवसाद तक ही सीमित रखा जाता है। वास्तव में अध्यात्म में मन न लगना भी एक मन की बीमारी है। जीवविकास कुंडलिनी के लिए हो रहा है। यदि कोई कुंडलिनी से परहेज कर रहा है, तो वह जीवविकास से विपरीत दिशा में जा रहा है। ऐसी मानसिकता यदि मन की बीमारी नहीं है, तो फिर क्या है। असंतुलित जीवन से ऐसा ही हो रहा है आजकल। संतुलन कहीं नहीं है। इससे अच्छा तो तब होता यदि सभी लोग अपनी भौतिक और आध्यात्मिक जरूरत के हिसाब से इनका उपभोग करते, जैसा अधिकांशतः पुराने समय में होता था। इससे पशुओं पर होने वाला अत्याचार काफी कम होता। और साथ में जो पशु व्यवसाय से जुड़े गरीब लोग हैं, उनके सामने भी रोजी-रोटी का सवाल खड़ा नहीं होता। मेरा एक दोस्त था, जो पशु व्यवसाय से जुड़ा सम्पन्न व्यक्ति था। वह कहता था कि पशुहिंसा से जुड़ा कारोबार वही करता है, जो बहुत गरीब हो, और जिसके पास कमाई का और कोई चारा न हो। पशु मांस का उपभोग भी गरीब और मजदूर तबके के लोग करते हैं, क्योंकि उन्हें सस्ते में इसमें सभी पोषक तत्व आसानी से मिल जाते हैं। उनके पास इतना पैसा नहीं होता है कि वे उच्च पोषकता वाले महंगे शाकाहारी उत्पादों को खरीद सकें। आम मध्यमवर्गीय आदमी ऐसे पाप वाला काम नहीं करना चाहता। उच्चवर्गीय आदमी अगर अपने शौक की पूर्ति के लिए करे, तो वह अलग बात है। पर आज तो लालच इस हद तक बढ़ गया है कि आदमी करोड़पति बनने के लिए पशुहिंसा से जुड़े कारोबार करना चाहता है। पशु कल्याण के नाम पर आदमी को तो भूखों मरने नहीं छोड़ा जा सकता न। मतलब साफ है कि कोई अभियान तभी सफल होता है यदि पूरा समाज उसमें सहयोग करे। मात्र कुछ लोगों से समाज की व्यवस्था में एकदम से पूर्ण परिवर्तन नहीँ आता। हालांकि आ भी जाता है, पर उसमें समय काफी लग सकता है। यदि सभी लोग एकसाथ परिवर्तित हो जाएं, तो समाज भी एकदम से परिवर्तित हो जाएगा। लोगों का समूह ही समाज है। मैं किसी भी जीवनपद्धति के पक्ष या विपक्ष में नहीं बोल रहा। कोई भी व्यक्ति अपनी स्थिति-परिस्थिति के अनुसार अपनी जीवनचर्या चुनने के लिए स्वतंत्र है। किसी को कुछ सूट कर सकता है, तो किसी को कुछ। मैं तो सिर्फ अध्यात्मिक व वैज्ञानिक रूप से वस्तुस्थिति को बयां करके उसे चर्चा में लाने की कोशिश कर रहा हूँ। हम नाजायज जीवहिंसा की कतई वकालत नहीं करते, इसलिए कुछ नियम कायदे तो होने ही चाहिए। यदि कोई कहे कि ये सब तो भौतिकवाद से सम्बंधित बातें हैं, इनसे अध्यात्म कैसे मिलेगा। दरअसल असली अध्यात्म कुंडलिनी जागरण के बाद शुरु होता है। और कुंडलिनी जागरण मानवीय भौतिकवाद के चरम को छूने के बाद मिलता है। असली अद्वैत मानवीय द्वैत के चरम से शुरु होता है। असली अध्यात्म मानवीय विज्ञान के चरम से शुरु होता है। कई लोग अध्यात्म के वैज्ञानिक विश्लेषण का विरोध यह मानकर करते हैं कि कुण्डलिनी की प्राप्ति तर्कशील या लॉजिकल दिमाग से नहीं होती। वे अध्यात्म से बेखबर से बने रहते हैं। वे अध्यात्म के लिए कोई प्रयास नहीं करते। वे एक अनासक्त की तरह दिखावा करते हुए हरेक काम के बारे में लापरवाह व अहंकारपूर्ण व्यवहार से भरे हुए बने रहते हैं, और पूर्णता का ढोंग सा करते रहते हैं। ऐसे लोग आसक्त और अज्ञानी से भी निचले पायदान पर स्थित होते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि असली आसक्त या अज्ञानी आदमी तो कभी न कभी अनासक्ति व ज्ञान व जागृति के लिए प्रयास जरूर करेगा, पर अनासक्ति या ज्ञान का ढोंग करने वाला आदमी उसके लिए कभी प्रयास नहीं करेगा, क्योंकि वह इस धोखे में रहेगा कि वह पहले से ही अनासक्त और ज्ञानी है। असली अनासक्ति में तो आदमी को अनासक्ति के बारे में पता ही नहीं चलता, न ही वह अनासक्ति के नाम पर दुनियादारी से दूर भागता है। कई लोग इसलिए बेपरवाह बने रहते हैं, क्योंकि उन्हें कई लोग बिना प्रयास के ही या उनके बचपन में ही आध्यात्मिक या जागृत दिखते हैं। पर वे इस बात को नहीं समझते कि उनके पिछले जन्म का प्रयास उनके इस जन्म में काम कर रहा है। बिना प्रयास के कुछ नहीं मिलता, सांस भी नहीं। सच्चाई यह है कि दिमाग की वास्तविक तर्कहीन या इलॉजिकल अवस्था वैज्ञानिक तर्कों और अन्वेषणों का चरम छू लेने के बाद ही होती है। जब आदमी अध्यात्म का वैज्ञानिक कसौटी पर पूरा अन्वेषण कर लेता है, तब वह थकहार कर चुप होकर बैठ जाता है। वहीँ से ईश्वर-शरणागति और विश्वास पर आधारित असली तर्कहीनता शुरु होती है। उससे पहले की या अन्वेषण का प्रयास किए बिना ही जबरदस्ती पैदा की गई तर्कहीनता एक ढोंग ही होती है। यह अलग बात है कि लोग औरों की नकल करके आध्यात्मिक बनने का दिखावा करते हैं। वह भी ठीक है। समथिंग इज बैटर देन नथिंग। पर इसमें अटूट विश्वास की आवश्यकता होती है। नहीं तो क्या पता यह परलोक में काम आएगा भी या नहीं। मेरे द्वारा यहाँ पर किसीको निरुत्साहित नहीं किया जा रहा है। केवल संभावना को खुल कर व्यक्त किया जा रहा है। किसको पता कि परलोक में क्या होता है, पर अपनी सीमित बुद्धि से अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है। आप्तवचन पर भी आज के वैज्ञानिक युग में सोचसमझ कर ही यकीन किया जा सकता है, आंख बंद करके नहीं। मैं यह दावा नहीं कर रहा कि मुझे कुण्डलिनी जागरण हुआ है। मुझे गुरुकृपा और शिवकृपा से कुंडलिनी जागरण की झलक दिखी है। क्योंकि हर जगह तो क्षणिक, झलक, कुंडलिनी जैसे सहयोजित शब्द नहीं लिखे जा सकते, विस्तार के भय से, इसलिए जल्दी में जागरण या कुण्डलिनी जागरण ही लिखना पड़ता है। यदि कोई मेरी हरेक ब्लॉग पोस्ट ध्यान से पढ़ेगा, तो उसे ही पता चलेगा कि वह जागरण कैसा है। चीज की क्षणिक झलक देखने का यह मतलब नहीं कि उसने उस चीज को ढंग से देख लिया हो। हाँ, कुंडलिनी जागरण की क्षणिक झलक देखकर मुझे यह यकीन हो गया है कि कुंडलिनी जागरण का अस्तित्व है, और वह आध्यात्मिकता के लिए जरूरी है। और यह भी कि वह कैसे प्राप्त हो सकता है। वैसे ही, जैसे किसी चीज की झलक देख लेने के बाद उस चीज के अस्तित्व के बारे में विश्वास हो जाता है, और उसे पाने का तरीका पता चल जाता है। वस्तुतः तो मैं आम आध्यात्मिक व्यक्ति के जैसा ही एक साधारण कुंडलिनी जिज्ञासु हूँ। आध्यात्मिक चर्चा करना मेरा जन्मजात शौक है। जब विद्वान लोग उपलब्ध होते थे, तब आमनेसामने चर्चा कर लेता था। अब ब्लॉग पर लिखता हूँ। ब्लॉग मुझे सबसे अच्छा तरीका लगा। इसमें कोई बेवजह ट्रोलिंग नहीं कर सकता। किसी का कमेंट यदि अच्छा लगे तो अप्रूव कर दो, वरना डिनाय या डिलीट कर दो। आमनेसामने की चर्चा में धोखा लगता है। कई लोग बाहर से आध्यात्मिक जैसा बनने का ढोंग करते हैं। उन पर विश्वास करके यदि उनसे चर्चा करो, तो वे उस समय बगुला भगत की तरह हाँ में हाँ मिलाते हैं, और बाद में धुआँ देने को तैयार हो जाते हैं, क्योंकि वे दूसरे आदमी की आध्यात्मिकता को उसकी कमजोरी समझकर उसका नाजायज फायदा उठाते हैं। यहां तक कि कई लोग तो आध्यात्मिक चर्चा सुनते समय ही सुनाने वाले का मजाक उड़ाने लग जाते हैं। दोस्त भी अजनबी या दुश्मन जैसे बनने लगते हैं। इसलिए जो अच्छे विचार मन में आते हों, उनको किसीको सुनाने से अच्छा लिखते रहो। कम से कम लोग पागल तो नहीं बोलेंगे। अगर लिखने की बजाय उनको अपने में ही बड़बड़ाने लगोगे, तब तो लोग पक्का पागल कहेंगे। दो-चार लोगों के इलावा मेरे अपने दायरे से कोई भी मेरे ब्लॉग के फॉलोवर नहीं हैं। उनमें भी अधिकतर वे हैं, जिन्होंने कभी मेरी एक-आध पोस्ट को या किताब को पसंद किया, और फिर मैंने उनसे अपना ब्लॉग फॉलो करने के लिए कहा। कइयों को तो फॉलो करने के लिए स्टेप बाय स्टेप निर्देशित किया। वैसे उनमें से कोई मेरे ब्लॉग को छोड़कर भी नहीं गया। मतलब साफ है, उन्हें इससे लाभ मिल रहा है। वैसे मैं अपने लाभ के लिए ब्लॉग लिखता हूँ, पर यदि किसी और को भी लाभ मिले, तो मुझे दोगुनी खुशी मिलती है। मेरे अधिकाँश मित्रों व परिचितों को मेरे ब्लॉग के बारे में पता है, पर किसीने उसके बारे में जानने की कोशिश नहीं की, फॉलो करना तो दूर की बात है। मेरे अधिकांश फॉलोवर दूरपार के और विदेशों के हैं। उनमें भी ज्यादातर विकसित देशों के हैं। इससे भी इस धारणा की पुष्टि हो जाती है कि वैज्ञानिक या बौद्धिक या सामाजिक विकास के चरम को छू लेने के बाद ही असली अध्यात्म शुरु होता है। एक कहावत भी है कि घर का जोगी जोगड़ा और दूर का जोगी सिद्ध। वैसे भी मुझे सिद्ध कहलाए जाने का जरा भी शौक नहीं है। मंजिल पर पहुंच गया, तो सफर का मजा खत्म। असली मजा तो तब है अगर मंजिल मिलने के बाद भी सफर चलता रहे। इससे सफर और मंजिल का मजा एकसाथ मिलता रहता है। सच्चाई यह है कि पूर्ण सिद्धि कभी नहीं मिलती। आदमी चलता ही रहता है, चलता ही रहता है, कभी रुकता नहीं। बीच-बीच में जागरण रूपी चैन की सांस लेता रहता है। वैसे अभी विकासशील देशों में वेबसाइट और ब्लॉग का प्रचलन कम है। जागृति वाली वैबसाइट बनाने और पढ़ने के लिए तो वैसे भी अतिरिक्त ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। जहाँ रोजमर्रा की आम जरूरतों को पूरा करने के लिए ऊर्जा कम पड़ती हो, वहाँ जागृति के लिए अतिरिक्त ऊर्जा कहाँ से लाएंगे। यहाँ ज्यादातर लोगों को व्हाट्सएप और फेसबुक से ही फुर्सत नहीं है। जो ज्ञान एक विषय समर्पित ब्लॉग व वैबसाइट से मिलता है, वह फेसबुक, क्वोरा जैसे माइक्रोब्लॉगिंग प्लेटफार्म से मिल ही नहीं सकता। शुरुवाती लेखक के लिए तो क्वोरा ठीक है, पर बाद में वैबसाइट-ब्लॉग के बिना मन नहीं भरता। मुझे नेट पर अधिकांश वेबसाइट व ब्लॉग भी पसंद नहीं आते। जरूरत के हिसाब से उनसे जानकारी तो ले लेता हूँ, पर उन्हें फॉलो करने का मन नहीं करता। एक तो वे एक अकेले विषय के प्रति समर्पित नहीं होते। दूसरा, विस्तृत वैज्ञानिक चर्चा के साथ भी नहीं होते। तीसरा, या तो उनमें पोस्टों की बाढ़ सी होती है, या फिर लम्बे समय तक कोई पोस्ट ही नहीं छपती। चौथा, उन पोस्टों में भाषा व व्याकरण की अशुद्धियाँ होती है। उनमें व्यावहारिक दृष्टिकोण भी नहीं होता, और वे किसी दूसरे ग्रह की रहस्यात्मक कहानियाँ ज्यादा लगती हैं। उनमें मनोरंजकता और सकारात्मक या सार्थक संपर्कता कम होती है। समय की कमी भी एक वजह होती है। उनमें सभी विषयों की खिचड़ी सी पकाई होती है। इससे कुछ भी समझ नहीं आता। कहा भी है कि एके साधे सब सधे, सब साधे सब जाए। अगर कोई ज्योतिष का सिर-पैर एक करने वाला पूर्ण समर्पित ब्लॉग, डिमिस्टिफाइंगज्योतिषडॉटकॉम आदि नाम से हो, तो मैं उसे क्यों फॉलो नहीं करूंगा। दूसरा, उनमें विज्ञापनों के झुंड चैन नहीं लेने देते। इसीलिए मैंने अपने ब्लॉग में विज्ञापन नहीं रखे हैं। पैसा ही सबकुछ नहीं है। जो कोई किसी प्रोडक्ट के बारे में विज्ञापन देता है, उसे खुद उसके बारे में पता नहीं होता, क्योंकि उसको उसने प्रयोग करके कहाँ परखा होता है, या कौन सा सर्वे किया होता है। फिर जनता को क्यों ठगा जाए। पर्सनल ब्लॉग के नाम भी प्रोफेशनल व विषयात्मक लगने चाहिए, ताकि लोग उनकी तरफ आकर्षित हो सकें। सक्सेनाडॉटकॉम या जॉनडॉटकॉम नाम से अच्छा तो म्यूसिकसक्सेनाडॉटकॉम या राइटिंगजॉनडॉटकॉम है। इससे पता चलेगा कि इन ब्लॉग्स का विषय संगीत या लेखन है। विषयात्मक लेखों के बीच में अन्य विषय, व्यक्तिगत लेख और व्यक्तिगत घटनाक्रम भी लिखे जा सकते हैं। ऐसी वैबसाइट टू इन वन टाइप कही जा सकती हैं। ये प्रोफेशनल भी होती हैं, और पर्सनल भी। ये ज्यादा प्रभावशाली लगती है। अपनी पर्सनल वैबसाइट के लिए 200-250 रुपए का प्रति महीने का खर्चा लोगों को ज्यादा लगता है। पर वे जो 200 रुपए की अतिरिक्त मोबाइल सिम प्रति माह रिचार्ज करते हैं, उसका खर्चा उन्हें ज्यादा नहीं लगता। वैबसाइट से तो दुनिया भर की जानकारी मिलती है, पर अतिरिक्त सिम से तो कुछ नहीं मिलता, सिर्फ जिम्मेदारी का बोझ ही बढ़ता है। नकारात्मक जैसी किस्म के लोगों की भी आजकल कोई कमी नहीं। मैं क्वोरा पर कुण्डलिनी से संबंधित प्रश्न का एक उत्तर पढ़ रहा था, तो उसमें यह कहकर कुंडलिनी पर ही प्रश्नचिन्ह लगाया गया था कि पुराने धर्मशास्त्रों में कुंडलिनी के बारे में ऐसा कहाँ लिखा गया है, जैसे लोग आजकल सोशल मीडिया पर दावे कर रहे हैं। शायद उसका कहने का मतलब था कि शास्त्रों के कहे के अतिरिक्त अनुभव गलत है, और उसे सोशल मीडिया पर बताना भी गलत है। मतलब, अपनी कमजोरियों का ठीकरा शास्त्रों पर फोड़ना चाहते हैं, और उन्हें अपनी खीज और ईर्ष्या के लिए ढाल की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं। ओपन माइंड नहीँ हैं। शास्त्रों के कंधों पर रखकर बन्दूक चलाना चाहते हैं, अपना कोई योगदान नहीं देना चाहते। यह उस दमनकारी नीति से उपजी सोच है, जैसी विदेशी हमलावरों ने सैंकड़ों सालों तक इस देश में बना कर रखी। यह ऐसी सोच है कि असली कुंडलिनी योगी समाज में दबे हुए से रहे और अपनी आवाज कभी बुलंद न करें। फिर समाज में आध्यात्मिकता कैसे पनपेगी। हैरानी इस बात की कि उस पर ढेर सारे अपवोट और अनुकूल कमेंट मिले हुए थे। मैंने उस पर कुछ कहना ठीक नहीं समझा, क्योंकि जिस मंच ने पहले ही निर्णय ले लिया हो, उस पर चर्चा करके क्यों ट्रोल हुआ जाए।

चलो, फिर से कुण्डलिनी से जुड़ी भगवान कार्तिकेय की कथा पर वापिस चलते हैं। तारकासुर को मारने विभिन्न देवता आए, पर वे उसे मार न सके। फिर शिव का मुख्य गण वीरभद्र आया। उसने अपने अमित पराक्रम से उसे लगभग मरणासन्न कर दिया। पर वह फिर उठ खड़ा हुआ। अंत में सभी देवताओं ने मिलकर कार्तिकेय को उसे मारने भेजा। तब राक्षस तारकासुर ने उस बालक को देखकर हँसते हुए भगवान विष्णु से कहा कि वह बड़ा निर्लज्ज है, इसीलिए उसने बालक को उससे लड़कर मरने के लिए भेजा है। फिर उसने विष्णु को कोसते हुए कहा कि वह प्रारम्भ से ही कपटी और पापी है। उसने रामावतार में धोखे से बाली को मारा था, और मोहिनी अवतार में राक्षसों को ठगा था। इस तरह से तारकासुर ने विष्णु के बहुत से पाप गिनाए, और कहा कि वह उसको मारकर उन सभी पापों की सजा देगा। फिर कार्तिकेय ने तारकासुर पर हमला किया। भयंकर युद्ध हुआ। उससे पवन स्तम्भित जैसी हो गई, और धरती कांपने लगी। सूर्य भी फीका पड़ने लग गया। कार्तिकेय ने अपनी अत्यंत चमकदार शक्ति तारकासुर पर चलाई। इससे तारकासुर मर गया। उसके बहुत से सैनिक मारे गए। कई सैनिकों ने देवसेना की शरणागति स्वीकार करके अपनी जान बचाई। तारकासुर का एक राक्षस बाणासुर युद्ध से जिंदा भाग गया था। वह क्रोंच पर्वत को प्रताड़ित करने लगा। जब उसने उसकी शिकायत कार्तिकेय से करी, तो उसने बाणासुर को भी मार दिया। इसी तरह प्रलम्बासुर राक्षस शेषनाग के पुत्र कुमुद को दुखी करने लगा। कार्तिकेय ने उसका वध भी कर दिया।

तारकासुर वध का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

वीरभद्र को हम शिव का प्रमुख व्यक्तित्व कह सकते हैं, क्योंकि वह शिव का मुख्य गण है। मुख्य सेनापति में राजा के गुण तो आएंगे ही। एक प्रकार से यह तांत्रिक व्यक्तित्व है। ऐसे व्यक्तित्व से तारकासुर यानी अज्ञान काफी कमजोर या मरणासन्न हो जाता है, पर मरता नहीं है। मरता तो वह शिवपुत्र कार्तिकेय से ही है। कार्तिकेय यहाँ अथक व अटूट संभोग योग से उत्पन्न वीर्यतेज को सहस्रार को चढ़ाने से फलीभूत कुंडलिनी जागरण का प्रतीक है। सात्विक विष्णु भी तारकासुर को मारने आया। पर उसे उसके पुराने पाप कचोटते रहे। दुनिया में अक्सर देखा जाता है कि बहुत सात्विक आदमी अपने द्वारा हुआ छोटा सा पाप भी नहीँ भूल पाते। वे तांत्रिक ऊर्जा का उपभोग भी नहीं करते, जो पापों को नष्ट करने के लिए तांत्रिक बल देती है। अपने पुराने पापों की कुंठा ही उनकी कुंडलिनी को जागृत नहीं होने देती। इसीको ऐसा कहकर बताया गया है कि तारकासुर भगवान विष्णु से उसके पुराने पापों की सजा देने की बात कर रहा है। कार्तिकेय को बालक इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह कुण्डलिनी योग से निर्मित मानसिक पुरुष है, जो नया-नया ही पैदा हुआ है, और भौतिक वस्तुओं से कम प्रभावी प्रतीत होता है। सूर्य, चंद्र, वायु आदि देवता बहुत पुराने समय से लेकर हैं। उनका भौतिक अस्तित्व है, जिससे वे कठोर या दृढ़ शरीर वाले हैं। इसीलिए उन्हें तुलनात्मक रूप से वयस्क माना गया है। पर कुण्डलिनी तो शुद्ध मानसिक चित्र है, जिससे वह बच्चे की तरह मुलायम है। क्योंकि कुंडलिनी चित्र मूलाधार की उसी वीर्यशक्ति से पैदा होता है, जिससे सन्तान पैदा होती है। इसीलिए कार्तिकेय को बच्चा कहा गया है। कार्तिकेय ने तारकासुर पर हमला किया, मतलब कुंडलिनी योगी ने शक्तिशाली तांत्रिक योग से प्राणोत्थान को लंबे समय तक बना कर रखा, जिससे चमचमाती कुंडलिनी लम्बे समय तक लगातार सहस्रार में बनी रही। पवन स्तम्भित हो गई, मतलब शक्तिशाली प्राणोत्थान से योगी की साँसें बहुत धीमी और गहरी अर्थात लगभग न के बराबर हो गईं। योग की ऐसी उच्चावस्था में प्राण ही ऑक्सीजन की ज्यादातर जरूरत पूरी करने लगता है। धरती कांपने लगी, मतलब प्राणोत्थान से पूरे शरीर का प्राण सहस्रार में घनीभूत हो गया, जिससे शरीर में प्राण की कमी हो गई। इससे दुनियादारी के तनावयुक्त विविध कार्यों का शरीर पर जरा सा भी भार पड़ने पर शरीर कमजोरी के कारण कांपने लगता है। सूर्य फीका पड़ने लग गया, मतलब सहस्रार में कुण्डलिनी के काबिज होने से पूरे मन में अद्वैत भाव छा गया। अद्वैत में तो सुख और दुख समान लगने लगते हैं, प्रकाश और अंधकार समान लगने लगता है, मतलब सूर्य और चन्द्र समान लगने लगते हैं। यही सूर्य का फीका पड़ना है। कार्तिकेय ने अपनी चमकदार शक्ति तारकासुर के ऊपर चलाई। कार्तिकेय अर्थात कुंडलिनी की अपने आप की चमक ही उसकी वह चमकदार शक्ति है, जो उसने तारकासुर अर्थात अज्ञान के ऊपर चलाई। मतलब उसकी अपनी जागरण की चमक से ही द्वैतरूपी अज्ञान या तारकासुर नष्ट हुआ। अज्ञान रूपी तारकासुर के सैनिक हैं, विभिन्न मानसिक दोष और उनसे उपजे दूषित आचार-विचार। वे नष्ट हो जाते हैं। जो बचे रहते हैं, वे रूपांतरित होकर पवित्र हो जाते हैं। मतलब कि वे देवसेना की शरण में चले जाते हैं। जैसे कि कामभाव तन्त्रभाव में रूपांतरित होकर पवित्र हो जाता है, और मानव के आध्यात्मिक विकास में मदद करता है। राक्षस बाणासुर से यहाँ तात्पर्य बुरी नजरों के बाणों से है। नयन बाण, यह एक प्रसिद्ध शास्त्रीय उक्ति है। क्योंकि आंखें आज्ञाचक्र से जुड़ी होती हैं, इसलिए बुरी नजरों से वह दुष्प्रभावित होता है। यही बाणासुर राक्षस द्वारा क्रोंच पर्वत को प्रताड़ित करना है। दूषित नजर से बुद्धि दूषित होती है। बुद्धि आज्ञाचक्र में निवास करती है। क्योंकि जब तक जागृति से मन को तसल्ली नहीं मिल जाती, तब तक आदमी की नजरों में किसी न किसी तरह से भौतिक आनंद पाने की लालसा बनी रहती है। इसीसे नजर दूषित होती है। जैसे कि पराई नारी से क्षणिक सम्भोगसुख की लालसा होना, जिससे नारी पर गलत नजर पड़ती है। इससे गलत विचार आते हैं, जिससे बुद्धि की कल्पना शक्ति और निर्णय शक्ति भी पापपूर्ण होने लगती है। मतलब बाणासुर क्रोंच पर्वत को रौंदने लगता है, जिससे उसका अधिष्ठातृ देवता प्रताड़ित महसूस करके दुखी होता है।  पिछली पोस्ट में मेरा अनुमान सही था कि आज्ञाचक्र को ही क्रोंच पर्वत कहा गया है। जागृति का ज्ञान होने के बाद बुरी और दूषित नजर का नष्ट होना ही कार्तिकेय के द्वारा बाणासुर का वध है। इसी तरह, शेषनाग मूलाधार से सहस्रार चक्र तक जाने वाली सुषुम्ना नाड़ी को कहा गया है, क्योंकि इसकी आकृति एक कुण्डली लगाए हुए और फन उठाए नाग की तरह है। सहस्रार चक्र को ही उसका पुत्र कुमुद कहा गया है। कुमुद का अर्थ श्वेतकमल होता है। सहस्रार चक्र को भी एक हजार पंखुड़ियों वाले कमल के रूप में दर्शाया जाता है। सुषुम्ना से ही सहस्रार को प्राण अर्थात जीवन मिलता है, इसीलिए दोनों का पिता-पुत्र का सम्बंध दिखाया गया है। प्रलंब माला को कहते हैं। कुंडलिनी भी माला के रूप वाले माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट में घूमती है। यह एक व्यवहारिक अनुभव है कि जब माला पूरी जुड़ी हुई होती है, तभी कुंडलिनी सभी चक्रों में विशेषकर सहस्रार चक्र में अच्छे से प्रवेश कर पाती है। टूटी हुई माला से कुंडलिनी ऊर्जा गति नहीं कर पाती। राक्षस प्रलम्बासुर यही टूटी हुई माला है। वह शेषनाग पुत्र कुमुद को दुखी करने लगा, मतलब टूटा हुआ ऊर्जा परिपथ सहस्रार चक्र तक प्राण ऊर्जा की आपूर्ति को बाधित करने लगा। कार्तिकेय ने प्रलम्बासुर को मारा, मतलब कुंडलिनी जागरण के बाद कुंडलिनी के पीछे के चैनल से ऊपर चढ़ने से और आगे के चैनल से नीचे उतरने से ऊर्जा परिपथ पूर्ण हो गया। साथ में, कुंडलिनी जागरण से उत्साहित आदमी आगे भी नियमित रूप से कुंडलिनी योगाभ्यास करने लगा, जिससे माला रूपी केंद्रीय कुंडलिनी चैनल ज्यादा से ज्यादा खुलता गया। वास्तव में असली माला जाप तो चक्रों की माला में कुंडलिनी का जाप ही है। इसीको गलत समझने के कारण धागे और मनकों की भौतिक माला बनी होगी। या हो सकता है कि कुंडलिनी योग को आम अशिक्षित लोगों की समझ में लाने के लिए ही धागे की माला का प्रचलन शुरु कराया गया होगा। हालांकि इससे भी बहुत से लाभ मिलते हैं। अभ्यास से धागे की बाहरी माला चक्रों की भीतरी माला में रूपांतरित हो जाती है। 

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demystifyingkundalini by Premyogi vajra- प्रेमयोगी वज्र-कृत कुण्डलिनी-रहस्योद्घाटन

I am as natural as air and water. I take in hand whatever is there to work hard and make a merry. I am fond of Yoga, Tantra, Music and Cinema. मैं हवा और पानी की तरह प्राकृतिक हूं। मैं कड़ी मेहनत करने और रंगरलियाँ मनाने के लिए जो कुछ भी काम देखता हूँ, उसे हाथ में ले लेता हूं। मुझे योग, तंत्र, संगीत और सिनेमा का शौक है।

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