देवपूजा में कुंडलिनी

सभी धार्मिक गतिविधियाँ कुण्डलिनी में वैसे ही समा जाती हैं, जैसे नदियाँ समुद्र में। जब हम किसी देवी-देवता की पूजा कर रहे होते हैं, तब हम अप्रत्यक्ष रूप से कुण्डलिनी की ही पूजा कर रहे होते हैं। शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार देवता की मूर्ति, चित्र आदि के रूप में स्थित मानव-देह में अद्वैतशाली देहपुरुष विद्यमान होते हैं। अतः देवता की पूजा से उनकी पूजा स्वतः ही हो जाती है। उससे पूजा करने वाले व्यक्ति के मन में अद्वैतभाव पुष्ट हो जाता है। शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार यह सिद्धांत है कि कुण्डलिनी व अद्वैत साथ-२ रहते हैं। अतः देवपूजन से कुण्डलिनी-पूजन स्वयं ही हो जाता है, जिससे कुण्डलिनी क्रियाशील होकर विकसित होती रहती है, और कभी भी अनुकूल परिस्थितियों को पाकर जागृत भी हो सकती है।

यदि हम देव-मूर्ति में देहपुरुषों की सत्ता को न भी मानें, तब भी कोई बात नहीं। क्योंकि प्रकृति की सभी चीजें जिन्हें हम जड़ कहते हैं, वे जड़ नहीं, अपितु अद्वैतभाव के साथ चेतन होती हैं। प्रकृति के सभी अणु-परमाणु या मूलकण मूर्ति में भी विद्यमान होते हैं। अतः देव-मूर्ति के पूजन से सम्पूर्ण अद्वैतमयी प्रकृति की पूजा स्वयं ही हो जाती है। देहपुरुष की सत्ता की वैज्ञानिक कल्पना तो सम्पूर्ण प्रकृति व मानवाकार मूर्ति के बीच में पूर्ण समानता को प्रदर्शित करने के लिए ही की गई है। इससे अद्वैतभाव की प्रचंडता भी बढ़ जाती है।

जैसे ही मूर्ति-पूजन के साथ कुण्डलिनी प्रकट हो जाती है, तथा पूजन व कुण्डलिनी के बीच के सम्बन्ध का तनिक विचार कर लिया जाता है, वैसे ही पूजन पर ध्यान देने से वह ध्यान कुण्डलिनी को स्वयं ही लगता रहता है। उससे कुण्डलिनी उत्तरोत्तर चमकती रहती है। उदाहरण के लिए, देव-मूर्ति के सामने घंटी बजाने से व घंटी की आवाज पर ध्यान लगाने से, व ऐसा समझने से कि वह आवाज देवमूर्ति में स्थित कुण्डलिनी की सेवा कर रही है, स्वयं ही बीच-२ में कुण्डलिनी पर ध्यान लगता रहता है। ऐसा ही तब भी होता है, जब पितरों का पूजन किया जा रहा होता है। क्योंकि पितरों की देह भी देवता या प्रकृति की तरह शुद्ध, निर्विकार व अद्वैतवान होती है।

इसका अर्थ है कि जिसे कुण्डलिनी का ज्ञान नहीं है, उसे पूजा का सम्पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। एक कुण्डलिनी-योगी ही उत्तम प्रकार का पुजारी सिद्ध हो सकता है।

यदि किसी के मन में कुण्डलिनी नहीं बनी हुई है, तो उसके द्वारा की गई पूजा उलटी भी पड़ सकती है। पूजा से उसके मन में चित्र-विचित्र प्रकार के विचार उठेंगे, क्योंकि पूजा से शान्ति व मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। इससे पूजा की शक्ति घटिया किस्म के विचारों को भी मिल सकती है, जो हानि पहुंचा सकते हैं। जो पूजा-शक्ति कुण्डलिनी-रूपी एकाकी व लाभदायक विचार को पुष्ट कर सकती है, वह विचारों के हानिकारक झमेले को भी पुष्ट कर सकती है। इसीलिए कहते हैं कि पुजारी या गुरु का योग्य होना बहुत जरूरी है।

मैं अपने दादा के साथ लोगों के घरों में वैदिक पूजा-पाठ कराने जाया करता था। उस पूजा से मेरी पहले से विद्यमान तांत्रिक कुण्डलिनी बहुत अधिक बलवान हो जाया करती थी। उससे मुझे बहुत अधिक आनंद के साथ भरपूर सकारात्मक शक्ति प्राप्त होती थी। वह शक्ति वैसी ही यजमान को भी प्राप्त हो जाया करती थी, क्योंकि वे मेरे दादा के साथ मेरे प्रति भी आदर-बुद्धि व सेवाभाव रख रहे होते थे।

इसी तरह प्रत्येक कर्म भी बड़ी आसानी से पूजा बन सकता है, यदि शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार यह सत्य सिद्धांत समझा जाए कि प्रत्येक कर्म अद्वैतशाली देहपुरुष की प्रसन्नता के लिए ही किया जाता है।

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कुण्डलिनी व साँसों पर ध्यान के बीच में संबंध

कुण्डलिनी-ध्यान में साँसों का बहुत महत्त्व है। कुण्डलिनी के ध्यान से साँसें भी खुलकर चलने लगती हैं, व शरीर का मैटाबोलिजम भी सुधर जाता है। इसी तरह, गहरी व नियमित साँसों पर (उससे गति कर रहे शरीर के साथ) ध्यान देने से शरीर के चक्रों पर (विशेषकर अनाहत व मणिपुर चक्र पर), व नासिकाग्र पर कुण्डलिनी प्रकट हो जाती है। नासिकाग्र पर विशेषतः तब प्रकट होती है, जब नासिकाग्र का स्पर्श करती हुई साँसों की हवा का ध्यान किया जाता है। यही बात गीता में भी लिखी है। उसमें “नासिकाग्र पर ध्यान” नामक एक विषय आता है। कई विद्वान इसे भौहों के बीच का आज्ञाचक्र मानते हैं, अर्थात वे नासिका के शुरू के भाग को आज्ञाचक्र बताते हैं, क्योंकि उनकी दृष्टि में नाक वहां से शुरू होती है। पर वास्तव में नासिका का अग्र होठों के साथ लगा होता है, जहां से नाक शुरू होती है। मैं इसे प्रमाण के साथ कह सकता हूँ। मैं जब सुबह की सैर पर जाता हूँ, और नाक के शुरू के संवेदनशील भाग का स्पर्श सुबह की ठंडी हवा के साथ अनुभव करता हूँ, तो मेरे नासिकाग्र पर, नाक की शिखा (टिप) पर या उसके थोड़ा बाहर मेरी कुण्डलिनी प्रकट हो जाती है। जब मैं उस सांस के ध्यान के साथ पांच बार पूरी सांस (अन्दर व बाहर दोनों तरफ की) को एक से पांच तक की गिनती के साथ गिनता हूँ (अधिकाँश तौर पर कदमों को भी साँसों के साथ मिलाकर), तथा पांच बार सांस बिना गिनती के लेता हूँ, और इस तरह के क्रम को बार-२ दोहराता हूँ, तब कुण्डलिनी और भी अधिक स्थिर व स्पष्ट हो जाती है।

इसी प्रकार, साँसों के ध्यान के साथ “सोSहम” का भी मन में उच्चारण कर सकते हैं। इससे ॐ की शक्ति भी प्राप्त हो जाती है। संस्कृत शब्द “सो” का उच्चारण सांस भरते समय, व “हम” का उच्चारण सांस छोड़ते समय करें। “सो / सः” का अर्थ है, “वह (ईश्वर)”। संस्कृत शब्द “हम / अहम्” का अर्थ है, मैं। अर्थात मैं ही वह ईश्वर / ब्रम्ह हूँ। योग में हर प्रकार की साँसों का महत्त्व है। यदि साँसें उथली हो, तो नासिकाग पर उनका ध्यान आसान होता है। कुछ अधिक गहरी होने पर विशुद्धि चक्र पर, उससे अधिक गहरी होने पर अनाहत चक्र पर, उससे भी अधिक गहरी होने पर मणिपुर चक्र पर व सर्वाधिक गहरी होने पर स्वाधिष्ठान-मूलाधार चक्र पर उन साँसों का ध्यान करना आसान होता है। पेट से सांस लेते हुए, नाभि चक्र पर साँसों का ध्यान करना सर्वाधिक आसान व प्रभावशाली प्रतीत होता है।

देहपुरुष की तरह अद्वैतभाव को धारण करने से कुण्डलिनी भी उजागर हो जाती है, तथा साँसें (मैटाबोलिजम के साथ) सुधर जाती हैं। साँसें नियमित व गहरी हो जाती हैं। साँसों की हवा मीठी लगने लगती है, व उससे संतुष्टि महसूस होने लगती है। तनाव समाप्त होने लगता है। शरीर की कार्यप्रणालियाँ तनावमुक्त हो जाती हैं। हृदय की गति सुधर जाती है। हृदय का बोझ कम हो जाता है। मन में एक शान्ति सी छा जाती है, आनंद के साथ।

दोहरा तरीका भी अपनाया जा सकता है। इसमें अद्वैतभाव (मुख्यतः शरीरविज्ञान दर्शन की सहायता से) को धारण करके साँसों को किंचित गहरा व नियमित किया जाता है। फिर उन साँसों पर ध्यान देते हुए, और अधिक लाभ प्राप्त किया जाता है। अद्वैतभाव के अतिरिक्त कुण्डलिनी के सीधे ध्यान से भी साँसों को सुधारा जा सकता है। अद्वैतभाव व कुण्डलिनी-ध्यान, दोनों की एक साथ सहायता भी ली जा सकती है। अद्वैतभाव से तो कुण्डलिनी वैसे भी प्रकट हो ही जाती है। उस उजागर हुई कुण्डलिनी पर अतिरिक्त ध्यान भी दिया जा सकता है। फिर लम्बे समय तक साँसों पर ध्यान देने से कुण्डलिनी, ध्यान के अंतर्गत स्थिर व स्पष्ट जैसी हो जाती है। वह कुण्डलिनी फिर पूरे शरीर को तरोताजा, तनावमुक्त, व रोगमुक्त कर देती है।

साँसों पर ध्यान देते हुए, सांस से गति करते हुए शरीर के भागों पर स्वयं ही ध्यान चला जाता है। शरीर के लगभग सभी मुख्य भाग सांस के साथ गति करते हैं। इस तरह से पूरा शरीर ही ध्यान में आ जाता है। पूरा शरीर अद्वैतपूर्ण पुरुषों से भरा हुआ है। अतः उनके अप्रत्यक्ष ध्यान से मन स्वयं ही अद्वैतभाव से भर जाता है। “शरीरविज्ञान दर्शन” के अनुसार ये देहपुरुष शरीर की कोशिकाओं, व शरीर के जैव-रसायनों के रूप में विद्यमान हैं। ये देहपुरुष प्राणियों की तरह ही समस्त व्यवहार करते हैं। क्योंकि अद्वैतभाव रखने वाला कोई प्राणी एक मनुष्य ही हो सकता है, अन्य जीव नहीं। अन्य जीवों में तो भावों की भी न्यूनता होती है, द्वैत-अद्वैत का तो प्रश्न ही नहीं उठता। इसलिए देहपुरुष के ऊपर एक मनुष्य का रूप आरोपित होने लगता है। क्योंकि एक योगी ने एक मनुष्य (गुरु या प्रेमी) को अपनी कुण्डलिनी बनाया हुआ होता है, इसलिए वह उसी मनुष्य के रूप का सर्वाधिक अभ्यस्त होता है। इससे उस विशेष मनुष्य का रूप अर्थात उस ध्यान करने वाले योगी की कुण्डलिनी देहपुरुष के ऊपर आरोपित हो जाती है। योग-प्राणायाम के अभ्यास से भी साँसें कुण्डलिनी के साथ जुड़ जाती हैं। इससे भी साँसों के ध्यान से कुण्डलिनी स्वयं ही प्रकट हो जाती है। इस तरह से, विभिन्न प्रयासों से कुण्डलिनी लगातार पुष्ट होती रहती है, जिससे मन व शरीर, दोनों हृष्ट-पुष्ट बने रहते हैं। कालान्तर में कुण्डलिनी जागृत भी हो सकती है। इन सभी प्रयासों में शरीरविज्ञान दर्शन की एक अहम भूमिका होती है।

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सभी मित्रों के बीते वर्ष को सहर्ष विदाई व उनको नववर्ष 2019 की बहुत-2 शुभकामनाएं- Nice farewell to all the friends’ last year and many New Year wishes for them

सभी मित्रों के बीते वर्ष को सहर्ष विदाई व उनको नववर्ष की बहुत-2 शुभकामनाएं (please browse down to view this post in English)।

मेरा बीता वर्ष, 2018 निम्न प्रकार का रहा-

अपनी टाटा टियागो कार में लगभग 3000 किलोमीटर का सपरिवार सफ़र तय किया, जिसमें से अधिकाँश उन्नत उच्चमार्गों का सफर था। पीवीआर सिनेमा में 4 हिंदी फिल्में सपरिवार देखीं, 102 नोट आऊट, संजू, हनुमान वर्सस अहिरावना (थ्री डी एनीमेशन) व सिम्बा। मेरे माता-पिता तीर्थधाम यात्रा का जल चढ़ाने कन्याकुमारी / रामेश्वरम गए। अपने पुराने घर का नवीनीकरण करवाया गया। श्री मद्भागवत सप्ताह श्रवण यज्ञ का अनुष्ठान अपने घर में करवाया गया। मेरी पूज्य व वृद्ध पितामही जी का स्वर्गवास हुआ। मेरे बेटे को पहली कक्षा में ए-1 रहने पर पारितोषिक दिया गया। मेरी पत्नी के द्वारा नए सिलाई के प्रशिक्षण-कोर्स का प्रारम्भ किया गया। मुझे क्वोरा टॉप राईटर (क्वोरा शीर्ष लेखक)- 2018 का सम्मान मिला। मेरे द्वारा कुण्डलिनीयोग का प्रतिदिन का 1 घंटे का सुबह का व एक घंटे का सांय का अभ्यास एक दिन के लिए भी नहीं छोड़ा गया। इसके कारण मेरा वर्ष 2017 का कुण्डलिनीजागरण का अनुभव जारी रहा, महान आनंद के साथ। प्रेमयोगी वज्र की सहायता से इस मेजबानी वेबसाईट (https://demystifyingkundalini.com/home-3/) को पूर्णतः विकसित किया। इस वेबसाईट के लिए 139 शेयर, 30 लाईक्स, 4772 वियूस, 3099 विसिटर व 46 फोलोवर मिले। इस वेबसाईट के लिए मैंने लगभग 31 पोस्टें लिखीं व प्रकाशित कीं। प्रेमयोगी वज्र की सहायता से “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” नामक पुस्तक लिखी। उसके लिए 13 सशुल्क डाऊनलोड व 80 निःशुल्क डाऊनलोड प्राप्त हुए। उसके लिए अमेजन पर एक सर्वोत्तम रिव्यू / समीक्षा (5 स्टार) भी प्राप्त हुआ। साथ में, उसे गूगल बुक पर भी दो उत्तम व 5 स्टार रिव्यू प्राप्त हुए। दूरदर्शन के कार्यक्रमों में तेनालीरामा, तारक मेहता का उल्टा चश्मा, मैं मायके चली जाऊंगी, रियल्टी शोज व जी न्यूज (मुख्यतः डीएनए) का आनंद उठाया। अपने पोर्टेबल मिनी जेबीएल स्पीकर पर गाना एप के माध्यम से लगभग 2000 मधुर ओनलाईन गाने सुने। काटगढ़ मंदिर व टीला मंदिर के सपरिवार दर्शन किए। अपने किन्डल ई-रीडर पर 3 पुस्तकें पढ़ीं। पोस्ट पढ़ने के लिए धन्यवाद।

यदि आपको इस पोस्ट से कुछ लाभ प्रतीत हुआ, तो कृपया इसके अनुसार तैयार की गई उपरोक्त अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में निष्पक्षतापूर्वक समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। इस पुस्तक की संक्षिप्त रूप में सम्पूर्ण जानकारी आपको इसी पोस्ट की होस्टिंग वेबसाईट / hosting website पर ही मिल जाएगी। धन्यवाद।

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Nice farewell to all the friends’ last year and many New Year wishes for them.

My last year, 2018 was of the following type:

Travelled around 3,000 km in my Tata Tiago car with family, most of which were the journey of advanced highways. In PVR cinema saw 4 Hindi films with family, 102 Not out, Sanju, Hanuman Versus Ahiravana (Three D Animation) and Simmba. My parents went to Kanyakumari / Rameshwaram for carrying water for pilgrimage. My old home was renovated. Shreemad Bhaagvat Shravan Yagna’s week long ritual was performed in my house. My devoted and old grandmother went to heaven. My son was rewarded for being A1 in the first grade. New sewing training-course was started by my wife. I got the Quora Top Writer- the honour of 2018. I did not leave the Kundalini Yoga practice for 1 hour of morning and one hour of evening everyday even for one day. Due to this my experience of KundaliniJagran of 2017 continued, with great bliss. With the help of Premyogi Vajra, this hosted website (https://demystifyingkundalini.com/) was fully developed. For this website, 139 shares, 30 likes, 3099 visitors, 46 followers and 4772 views were obtained. I wrote and published about 31 posts for this website. With the help of Premyogi Vajra, I wrote a book called “Shareervigyaan darshan- ek aadhunik kundalini tantra (ek yogi ki premkatha)”. For that 13 paid downloads and 80 free downloads were received. For that, a great review (5 stars) was also received on Amazon. Along with, two good and 5 star reviews were also obtained on Google book for that. In Doordarshan’s programs, Tenalirama, Tarak Mehta ka Ulta Chashma, main maayake chali jaaoongee, realty shows and Zee news (mainly DNA) were enjoyed well. Two thousands of melodious online songs have been heard through Gaana App on my portable mini JBL speaker. Visiting the Katgarh Temple and the Tila Temple with family by me. Read 3 books on my Kindle e-Reader. Thanks for reading.

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed in unbiased way as the best, excellent and must read by everyone) made with steps as told above. If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

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Happy janamaashtami/जन्माष्टमी पर्व की बधाइयाँ

Geetaa philosophy dictated by Lord Krishna is a wonderful treatise of worldwide spirituality. Every religion, philosophy, spirituality seems to be emerging out of it. It’s Karmyoga is an amazing gift to the world. Today, it’s most necessary for people are becoming more and more lethargic, workless and paranoiac/depressed due to today’s mechanized work style. Many types of strange diseases like diabetes, heart ailments, thyroid ailments etc. are gaining their strong foot hold.

Actually, karmyoga teaches us how to be busy physically and mentally along with the development of spirituality round the clock. It helps in achieving worldly as well as spiritual goals, both together in a quickest possible time. Karmayoga is equal to tantra, but with additional sexual element added in tantra for super fast spiritual success. Lord Krishna was also a tantric. Keeping so many gopa-girls happy and even arranging raas in the lonely night with too many of them isn’t possible without tantra.

In karmyoga/tantra, one need to maintain non duality/mental awareness every moment. This is done through practices of vedas-puranas, shareervigyaan darshan/body science philosophy or any other suitable means. It’s a psychic principle that non duality, kundalini and bliss remains always together and enrich each other. So, there are four options for karmayogi. Either enrich kundalini with Kundalini yoga or enrich non duality through philosophical contemplation or through increasing his bliss through humanely relationships or all of these. Last is the best for it incorporates all the spiritual fundamentals. For detailed experiential information, please visit this website.

श्रीकृष्ण के द्वारा उच्चारित गीता दुनियाभर में आध्यात्मिकता का एक अद्वितीय खजाना है। प्रत्येक प्रकार का धर्म, दर्शन, आध्यात्मिक जीवन इससे निकलता हुआ प्रतीत होता है। इसका कर्मयोग दुनिया के लिए एक अद्भुत तोहफा है। आजकल यह सर्वाधिक प्रासंगिक है, क्योंकि आजकल के मशीनी युग में लोग सुस्त, कर्महीन, आलसी व अवसादग्रस्त से हो रहे हैं, जिसकी वजह से मधुमेह, उच्च रक्तचाप, उच्च कोलेस्ट्रॉल आदि विचित्र बीमारियां बढ़ रही हैं।

वास्तव में, कर्मयोग हमें सिखाता है कि कैसे हमने शारीरिक व मानसिक रूप, दोनों से दिन-रात व्यस्त रहना है, और साथ में अवसाद खत्म करके आध्यात्मिक विकास भी तीव्रतम गति से करना है। कर्मयोग से सर्वाधिक शीघ्रता से भौतिक व आध्यात्मिक विकास, दोनों हो जाते हैं। कर्मयोग व तन्त्र एक ही चीज है, यद्यपि तंत्र में अतिरिक्त भाग के रूप में यौनसंबंध भी जुड़ा होता है, ताकि आध्यात्मिक विकास तीव्रतम वेग से हो जाए।

अद्वैत, कुंडलिनी व आनंद , तीनों एकसाथ रहते हैं, और एक -दूसरे को बढ़ाते रहते हैं। इसलिए  आध्यात्मिक विकास की चार विधियाँ मुख्य है। कुंडलिनी योग से कुंडलिनी को बढ़ाओ या वेद-पुराणों, शरीरविज्ञान दर्शन आदि उचित अद्वैतकारी दर्शनों के अभ्यास से निरंतर अद्वैत को धारण किया जाए या मानवीय व्यवहारों से आनंद बढ़ाया जाए या तीनों प्रयासों को एकसाथ किया जाए। अन्तिम विधि सर्वाधिक बलवान है, क्योंकि इसके अंदर अध्यात्म के सभी मूलभूत सिद्धांत हैं।

वास्तव में भगवान श्रीकृष्ण एक तांत्रिक भी थे। इतनी सारी गोप कन्याओं को खुश रखना, व उनमें से अनेकों के साथ रात्रि के एकांत में रास रचाना तंत्र ज्ञान के बिना संभव नहीं है।

अतरिक्त व अनुभवात्मक जानकारी के लिए कृपया इस वेबसाइट को प्रारंभ से व विस्तार से पढ़ें।

Non duality and Kundalini reinforces each other/अद्वैतभाव व कुंडलिनी एक दूसरे को पुष्ट करते हैं।

Bliss originates from non duality. Kundalini awakening is semifinal bliss. Enlightenment is final/supreme bliss. Therefore, Kundalini awakening and enlightenment, both proves to be the states of semifinal and final non duality respectively. Morning Kundalini yoga strengthens Kundalini. That in turn strengthens non duality. That in turn strengthens bliss. Similar system works after evening Kundalini yoga too, so tiredness fade away immediately. Similarly, Non dual action strengthens kundalini and bliss, both together for all these three live together.

After his glimpse enlightenment, Premyogi vajra had got profound non dual attitude. So Kundalini and bliss also used to accompany that powerfully along with.

आनंद अद्वैत से उत्पन्न होता है। कुंडलिनी जागरण में उच्चतम के निकट का आनंद अनुभव होता है। आत्मज्ञान में उच्चतम आनंद की स्थिति होती है। इससे सिद्ध होता है कि कुंडलिनी जागरण लगभग उच्चतम अद्वैत से संपन्न होता है, और आत्मज्ञान पूर्णतया उच्चतम अद्वैत से सम्पन्न होता है। प्रातः कुण्डलिनी योग कुंडलिनी को पुष्ट करता है। कुंडलिनी फिर अद्वैत को पुष्ट करती है। अंत में अद्वैत आनंद को बढ़ाता है। सांयकाल के कुंडलिनी योग से भी इसी सिद्धांत से थकान दूर होती है। इसी तरह, अद्वैतमयी क्रियाकलाप कुंडलिनी व आनंद, दोनों को पुष्ट करते हैं, क्योंकि ये तीनों गुण साथ-२ रहते हैं।

अपने क्षणिकात्मज्ञान के बाद, उसके प्रभाव से प्रेमयोगी वज्र में असीम अद्वैत उत्पन्न हो गया था। इससे कुंडलिनी व आनंद, दोनों भी प्रचंड रूप से स्वयं ही उसके साथ रहते थे।