कुण्डलिनी भी आत्महत्या के लिए प्रेरित कर सकती है?

सहलेखक: डा० भीष्म शर्मा {पशु चिकित्सक, हि. प्र. राज्य}

सह संपादक: मास्टर विनोद शर्मा {अध्यापक, हि. प्र. राज्य}

Photo by Vanderlei Longo from Pexels

अभी कुछ दिन पहले बौलीवुड के मशहूर सितारे सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या का मामला सामने आया। सबसे पहले हम उनकी आत्मा की शान्ति की कामना करते हैं। वह बुलंदियों पर था। बुलंदियां कुण्डलिनी से हासिल होती हैं। तो क्या कुण्डलिनी भी आत्महत्या की वजह बन सकती है? इस पोस्ट में हम इसका विश्लेषण करेंगे।

अवसाद एक छुआछूत वाले रोग की तरह है, जिसे कुंडलिनी योग की सहायता से दूर भगाया जा सकता है: एक अदभुत आध्यात्मिक मनोविज्ञान

एक ब्लयू व्हेल नाम की वीडियोगेम आई थी, जिसे खेलते हुए बहुत से बच्चों ने आत्महत्या की थी। सुशान्त ने एक आत्महत्यारे की पेंटिंग अपनी सोशल मीडिया वाल पर कई दिनों से लगाई हुई थी। उनकी छिछोरे फिल्म में वह अपने बेटे को इस रोग से बचने के लिए पूरी फिल्म में समझाते रहे। इसी तरह, एक खबर के अनुसार एक बिहार राज्य का लड़का देर रात तक अकेले में सुशांत की खुदकुशी की खबरें देखता रहा औऱ सुबह को वह भी लटका हुआ मिला। यह सब मन का खेल है। ऐसे आत्महत्या से संबंधित चिंतन से विशुद्धि चक्र पर एक कसाव सा पैदा होता है। गला दबा हुआ सा लगता है, और गले पर एक घुटन सी महसूस होती है। कुंडलिनी योगी को तो विशुद्धि चक्र पर ध्यान करने की पहले से ही आदत होती है। वह बार-2 वहां कुंडलिनी को फोकस करता है। उससे गले को जीवनी शक्ति मिलती है, और कुंडलिनी भी मजबूत होती है। गले की घुटन में गेस्ट्राइटिस का भी रोल हो सकता है। तनावपूर्ण और अनहेल्थी जीवनशैली से गेस्ट्राइटिस होती है। आजकल इसके इलाज के लिए सुरक्षित दवाई मौजूद है। ऐसी दवाइयां योग अभ्यास करने वाले लोगों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसलिए इनका आधा डोज खाकर उनका अपने ऊपर असर परख लेना चाहिए। अवसाद-रोधी दवाएं तो बहुत से लोगों का अवसाद बढ़ा भी सकती हैं, क्योंकि उनसे आदमी की स्मरणशक्ति व कार्यक्षमता काफी घट जाती है। वे दवाईयां लम्बे समय से बनी हुई कुण्डलिनी को नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे उससे जुड़े सभी काम दुष्प्रभावित हो सकते हैं। अगर किस्मत अच्छी हो, और परिश्रम किया जाए, तो उससे नए कुण्डलिनी-चित्र के निर्माण का और उसे जागृत करने का सुअवसर भी प्राप्त होता है। नई कुंडलिनी से एडजस्ट होने में समय लगता है। सूत्रों के अनुसार, सुशांत भी लम्बे अरसे से अवसाद रोधी दवाएं खा रहे थे, हालांकि कुछ समय से उन्होंने उन्हें खाना छोड़ा हुआ था। जितना हो सके मौन रहना चाहिए औऱ जीभ को तालु के साथ टाईटली जोड़कर रखना चाहिए ताकि मस्तिष्क की कुंडलिनी या विचार आसानी से नीचे बह सके। जिसने आत्महत्या की भावनाओं के बीच में रहते हुए भी उसे दबा दिया, वह असली योगी है।

सुशांत सिंह राजपूत कई बार अपनी स्वर्गवासिनी माँ की याद में खोकर भावुक हो जाते थे

वह अपनी माँ से सर्वाधिक प्रेम करते थे। यह बहुत अच्छी बात है, और बड़ों-बुजुर्गों से प्यार होना ही चाहिए। उनकी आखिरी सोशल मीडिया पोस्ट भी अपनी माँ की याद की थी। ऐसा हमें मीडिया से सुनने को मिला। सर्वाधिक प्रिय वस्तु ही मन में निरंतर बस कर कुण्डलिनी बन जाती है। इसका अर्थ है कि उनके मन में अपनी माँ की छवि कुण्डलिनी के रूप में बसी हुई हो सकती है। इसीसे उन्हें निरंतर सफलताएं मिलती गईं। वैसे तो पूर्वजों व पारिवारिक लोगों या बुजुर्गों से संबंधित शुद्ध कुंडलिनी हमेशा शांत औऱ कल्याणकारी ही होती है। परंतु कई बार वैसी कुंडलिनी का सहारा लेकर इश्क-मोहब्बत वाली कुंडलिनी मन पर हावी हो जाती है। वह बहुत भड़कीली होती है औऱ कई बार खतरनाक हो सकती है। सुशांत का कुछ स्टार लड़कियों से प्यार और ब्रेकअप भी सुनने में आया। कुंडलिनी को सकारात्मक व सही दिशा देने के लिए एक स्थिर दाम्पत्य जीवन बहुत जरूरी होता है। हालांकि सिने जगत में ऐसा चलता रहता है, पर सभी एक जैसे नहीं होते, और ऐसा सभी को सूट भी नहीं करता। इश्क-मुहब्बत के चक्कर में हुई आत्महत्याएं इसी कुदरती कुण्डलिनी से सम्बंधित होती हैं। डॉक्टर के अनुसार वह बाईपोलर डिसीस से पीड़ित थे। यह कुण्डलिनी-अवसाद का ही एक दूसरा रूप है। इसमें तीव्र उत्तेजना के दौर के बाद तीव्र अवसाद का दौर आता है।अगर ढंग से किया जाए, तो कुंडलिनी योग ही बाइपोलर रोग का सबसे बढ़िया इलाज है। कथित कलाकार ने थोड़े दिनों के लिए उसे इलाज के लिए किया था, फिर छोड़ दिया था।अगर ढंग से किया जाए, तो कुंडलिनी योग ही बाइपोलर रोग का सबसे बढ़िया इलाज है। कथित कलाकार ने थोड़े दिनों के लिए उसे इलाज के लिए किया था, फिर छोड़ दिया था। कुंडलिनी मन के विकारों को बाहर निकाल रही होती है। वास्तव में विकार ही अवसाद पैदा कर सकते हैं, कुंडलिनी नहीं।कुंडलिनी अवसाद से बचने के लिए हर समय काम में व्यस्त रहना चाहिए। कथित कलाकार कई दिनों से कामधाम छोड़कर कमरे में बंद हो गए थे।

किसीसे बिछुड़ने का गम भी कुंडलिनी अवसाद का ही एक प्रकार है। उस गम को खुशी में बदलने के लिए बिछुड़े हुए व्यक्ति के मानसिक चित्र को कुंडलिनी बनाकर कुंडलिनी योग साधना शुरु कर देनी चाहिए।

कुण्डलिनी से उस सिने कलाकार की आध्यात्मिक प्रगति भी तीव्रता से हो रही थी

प्रत्यक्षदर्शी कहते हैं कि वे अध्यात्मिक रुझान वाले व बेहद संवेदनशील व्यक्ति थे। उनकी कम उम्र के शरीर में एक बुजुर्ग का दिमाग था। ऐसे गुण कुण्डलिनी से ही उत्पन्न होते हैं।

कुण्डलिनी आदमी को जीवन के प्रति लापरवाह बना सकती है

कुण्डलिनी के कारण आदमी अद्वैत से भर जाता है। इसका मतलब है कि उसे रात-दिन, जीवन-मृत्यु, दोस्त-दुश्मन, सुख-दुःख आदि सभी विपरीत चीजें एकसमान जैसी लगने लगती हैं। इससे यह अर्थ निकलता है कि आदमी को किसी चीज से डर नहीं लगता। जब कोई आदमी अपनी मौत से नहीं डरेगा, तब वह अपनी जिंदगी के प्रति लापरवाह हो जाएगा। वही लापरवाही जब सीमा पार कर जाती है, तब वह आत्महत्या का रूप ले लेती है। वास्तव में तो अद्वैत से सतर्कता बढ़ती है, लापरवाही नहीं। पर कई लोग अद्वैत को गलत तरीके से ग्रहण करते हैं।

कुण्डलिनी को संभालने के लिए बाहरी सहारे की आवश्यकता होती है

उपरोक्त स्थिति में आदमी को बाहरी सहारा मिलना चाहिए। लोगों से मेल-जोल जारी रहना चाहिए। परिवार व दोस्तों के साथ खूब समय बिताना चाहिए। घूमना-फिरना चाहिए। सामाजिक समारोहों व कार्यों में शामिल होते रहना चाहिए। इससे कुण्डलिनी योगी को लोगों के मन में जीवन के प्रति लगाव नजर आएगा। लोगों के मन में अनहोनी का डर नजर आएगा। इससे उसे सही ढंग से जीवन जीने की प्रेरणा मिलेगी। आजकल के कोरोना लौकडाऊन ने बहुत सारे लोगों से यह सामाजिक सहारा छीन लिया है।

गुरु कुण्डलिनी के लिए सर्वोत्तम सहारा है

गुरु कुण्डलिनी के दौर से पहले ही गुजर चुका होता है। इसलिए उसे सब कुछ पता होता है। इसलिए वह नए-२ कुण्डलिनी योगी को अकेला ही पूरे समाज की शक्ति दे सकता है।

कुण्डलिनी अवसाद ही समुद्रमंथन से निकला हुआ विष है

समुद्रमंथन का वर्णन हिन्दू पुराणों में मिलता है। मंदराचल पर्वत कुण्डलिनी है। कुण्डलिनी-ध्यान वासुकी नाग है। मन समुद्र है। उससे निकली हुई अच्छी चीजें अच्छे विचार हैं, जो आदमी को देवता बनाते हैं। उससे निकली हुई गन्दी चीजें गंदे विचार हैं, जो आदमी को राक्षस बनाते हैं। मन के देवताओं और राक्षसों के परिश्रम व सहयोग से मंथन चलता रहता है। अंत के करीब जो विष निकलता है, वह कुण्डलिनी से पैदा हुआ अवसाद है। उसे पीने वाले शिव गुरु हैं। वे उसे गले में धारण करते हैं। इसका मतलब है कि वे शिष्य का अवसाद हर लेते हैं, पर स्वयं उससे प्रभावित नहीं होते। उसके बाद जो अमृत निकलता है, वह कुण्डलिनी से मिलने वाला आनंद है। समुद्र मंथन से जो लक्ष्मी मिलती है, उसका अर्थ तांत्रिक प्रतीत होता है। वह भगवान् नारायण तक ले जाती है।

कुण्डलिनी योग से सम्बंधित मेरा अपना अनुभव

जो मैंने इस पोस्ट में लिखा, वह मेरा अपना ही कुण्डलिनी अवसाद का, और उससे बाहर निकलने का अनुभव है। खुशकिस्मती से मुझे एक पड़ौसी सज्जन का सहारा मिल गया था, जिनके घर मैं बिना पूछे और खुलकर आ-जा सकता था, तथा जिनके साथ जितना चाहे समय बिता सकता था। दूसरे अधिकाँश लोग तो मुझे मंगल ग्रह से आए हुए प्राणी की तरह ट्रीट करते थे। अच्छा जोक कर दिया।

कुण्डलिनी मेडिटेशन की अवस्था ज्ञान की चरम अवस्था होती है, अवसाद तो वह दूसरे लोगों को लगती है

कुण्डलिनी अवसाद सापेक्ष होता है। स्वयं कुण्डलिनी योगी को वह ज्ञान की शीर्ष अवस्था लगती है। कुण्डलिनी के अन्य जानकारों को भी यह ऐसी ही लगती है। कुण्डलिनी से अनजान लोगों को ही वह अवसाद लगती है। इसलिए वैसे लोग कुण्डलिनी योगी की आलोचना करते रहते हैं, और उसे अवसाद से भर देते हैं। लोग तो उसके भले के लिए उसकी आलोचना करते हैं ताकि वह कुंडलिनी के बिना जीना सीख सके, पर वह इस बात को अक्सर समझ नहीं पाता। अवसाद उसे कुंडलिनी को मन से हटाने से होता है, क्योंकि उसे कुंडलिनी के नशे की लत लग जाती है। कुंडलिनी प्रकाश के सामने तो अवसाद का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। इसीलिए या तो कुंडलिनी को किसी हालत में नहीं छोड़ना चाहिए या फिर कुंडलिनी से आसक्ति नहीं होनी चाहिए और उसके बिना जीने की आदत भी बनी रहनी चाहिए। नहीं तो वैसा ही अवसाद पैदा होने की संभावना है, जैसा नशेड़ी में एकदम से नशा छोड़कर पैदा होता है। जितनी ज्यादा रौशनी होगी, जब वह बुझेगी तब उतना ही ज्यादा अंधेरा भी होगा। कुंडलिनी शरीर औऱ मन की शक्ति को खींचती है। उससे पैदा हुई कमजोरी ही अवसाद की वजह बन सकती है। इसीलिए तंत्र में उस कमजोरी से बचने के लिए पंचमकारों के सेवन का प्रावधान है।इसीलिए अच्छी संगति को अपनाने पर जोर दिया गया है। अच्छा हो, यदि औरों के रास्ते में फूल न बो सको, तो कांटे भी नहीं बोने चाहिए। इससे फूल खुद उग आएँगे। महात्मा बुद्ध ने भी ऐसा ही कहा है।

यह ध्यान रखना चाहिए कि कुंडलिनी अवसाद प्राकृतिक तौर से उभरी कुंडलिनी से ज्यादा होता है। यद्यपि प्राकृतिक कुंडलिनी बहुत तेजी से आध्यात्मिक विकास करती है। इसलिए प्राकृतिक कुंडलिनी के इस खतरे से बचे रहने के लिए कृत्रिम कुंडलिनी योग करते रहना चाहिए।

एक पुस्तक जिससे मुझे कुण्डलिनी अवसाद से पूरी तरह से बाहर आने में मदद मिली

वह पुस्तक है “शरीरविज्ञान दर्शन”। उसका पूरा विवरण निम्नलिखित लिंक पर उपलब्ध है।

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कुण्डलिनी सर्ज (लहर) के लिए बाई-साईकलिंग (बाईकिंग) योग

भीष्म एवं हृदयेश

लोग सोचते हैं कि रोजाना की व्यस्त जीवनशैली से कुण्डलिनी साधना में बाधा पहुँचती है। पर ऐसा नहीं होता। व्यस्त काम-काज से कुण्डलिनी बहुत तेजी से ऊपर चढ़ती है। योग से रोजाना के कामकाज को करने की शक्ति भी मिलती है। कामकाज और योग, दोनों एक दूसरे के पूरक व सहयोगी हैं। 3 दिन की साईकलिंग से मेरी कुण्डलिनी मूलाधार से मस्तिष्क तक पहुँच गई। भारी गर्मी के बीच, एकदम से इतना ज्यादा बाईसाईकल मैं इसलिए चला सका, क्योंकि मेरा मन और शरीर रोजाना के कुण्डलिनी योगाभ्यास से फिट व तंदरुस्त थे।

मेरा बाई-साईकलिंग योग का अनुभव

इस हफ्ते आंशिक कोरोना-लौकडाऊन की वजह से मैंने साईकल पर ही अपने दफ्तर को आना-जाना शुरू किया। एक दिन का कुल 20 किलोमीटर का सफर हो जाता था। पहले दिन मैंने नोटिस किया कि मेरे मूलाधार पर बड़ी तेज व दबाव से भरी हुई संवेदना थी। वह संवेदना वैसी ही थी, जैसी सीमेन रिटेंशन से महसूस होती है। ऐसा लगता था जैसे कि मेरे मूलाधार चक्र पर किसी ने आगे से नुकीले चमड़े के जूते से गहरी किक मार दी हो, और उसके बाद मीठा व गहरा दर्द हो रहा हो। उससे मैं दिन के समय कुछ हल्का सा बेचैन रहने लगा। योग करते समय वह संवेदना फिर बढ़ जाती थी। मैं उस संवेदना को बार-२ पीठ से ऊपर चढ़ाने की कोशिश करता था। प्राणायाम के साथ पीठ के शेषनाग का चिंतन करने से वह संवेदना कुछ ऊपर जाती हुई लगती थी। इस प्राणायाम का वर्णन मैंने “बैकवार्ड फ्लो” व ‘शेषनाग’ वाली पुरानी पोस्ट में किया है। जब वह दर्द जैसी संवेदना ऊपर चढ़ती थी, तब पीठ में जगह-२ ऐंठन जैसी मीठी दर्द महसूस होती थी। उसी पर ही कुन्डलिनि चित्र भी प्रकट हो जाता था। दो दिन तक ऐसे ही चलता रहा। तीसरे दिन वह संवेदना मेरे पिछले अनाहत चक्र पर आ गई। ऐसा लगने लगा कि जैसे किसी ने चमड़े के पैने जूते से मेरे पिछले अनाहत चक्र पर गहरी किक मारी है, जिसके बाद उस पर मीठी व गहरी दर्द पैदा हो रही है। उससे मूलाधार का दबाव और वहां की संवेदना गायब हो गई। मणिपुर चक्र को संवेदना ने बायपास किया। इसका मतलब था कि मणिपुर चक्र ब्लोक नहीं था। जो चक्र ब्लॉक होता है, उसी पर वह मीठा दर्द महसूस होता है। एक दिन के बाद वह संवेदना गर्दन से होकर ऊपर चढ़ने लगी। फिर वह मीठी दर्द व अकड़न गर्दन के पिछले भाग के केंद्र (विशुद्धि चक्र) में महसूस होने लगी। उसी दिन मेरे मूलाधार को बाहर से किसी वजह से और संवेदना मिली। संवेदना आसानी से ऊपर चढ़ गई, क्योंकि मूलाधार पिछले फ्लो से अनब्लौक हो गया था। वह गर्दन की संवेदना से मिल गई और उसे मजबूत बना दिया। अनाहत चक्र की संवेदना गायब हो गई। अगले दिन, गर्दन से वह संवेदना मस्तिष्क में पहुँचने लगी, जिससे सिर हल्का परन्तु एनर्जी सर्ज के समय भारी लगने लगा। मैं दिन के समय कुर्सी पर बैठा था, और मुझे नींद की 4-5 मिनट की झपकी आ गई। जब मैं ऊपर उठा तो एनर्जी सर्ज पूरे वेग से पूरे मस्तिष्क में छा रही थी। दिमाग भारी व दबावयुक्त था। ऐसा लग रहा था कि उसमें मधुमक्खी के झुण्ड उड़ रहे हैं। यद्यपि आनंद भी आ रहा था। उससे कामकाज में दखलंदाजी न हो, इसके लिए मैंने उलटी जीभ को तालु से छुआ दिया। उससे एकदम से वह संवेदना की सर्ज आगे से नीचे उतर कर मेरे अगले अनाहत चक्र पर आ गई। उससे मेरा दिमाग एकदम से शांत हो गया, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। हृदय में कुण्डलिनी मजबूती से प्रकट हो गई, और वह आनंद से प्रफुल्लित हो गया। मस्तिष्क में केवल एनर्जी थी, कुण्डलिनी तो दिल में ही प्रकट हुई। इससे सिद्ध हुआ कि प्रेम दिल में ही बसता है। यह कोई आश्चर्य वाली चमत्कारिक घटना नहीं है, अपितु शरीर की सामान्य सी शरीरविज्ञान से जुडी हुई घटना है। इस प्रकार का कुण्डलिनी प्रवाह योगी के जीवन में इसी तरह से जीवनभर चलता रहता है। कुण्डलिनी जागरण तभी होता है, जब उसके लिए बहुत सी अनुकूल परिस्थितियाँ हों, और चक्र ब्लॉक न हों। जिस समय एनर्जी सर्ज मेरे दिमाग में छा रही थी, यदि उस समय मुझे किसी भी कारण से कुण्डलिनी की गहरी याद आ गई होती, तो पुनः कुण्डलिनी जागरण के लिए यह एक अनुकूल परिस्थिति होती। वास्तव में, मस्तिष्क में वह प्राणों का सर्ज था, क्योंकि उसमें कुण्डलिनी नहीं थी। विपरीत रूप से, कुण्डलिनी से भी प्राणों का सर्ज पैदा हो सकता है। वैसे में कुण्डलिनी की गहरी याद दिमाग में खुद ही प्राणों का सर्ज पैदा करती है। उसके साथ कुण्डलिनी खुद ही जुडी होती है, क्योंकि कुण्डलिनी ने ही तो वह प्राणों का सर्ज (महान लहर/जमघट) पैदा किया हुआ होता है। वैसी स्थिति में कुण्डलिनी जागरण हो जाता है। ऐसा ही कुण्डलिनी जागरण मुझे लगभग 3 साल पहले हुआ था, जिसका वर्णन मैंने इस वैबसाईट के होमपेज पर किया है।

बाईकिंग या साईकलिंग योग डायाफ्रागमैटिक साँसों को उत्तेजित करता है

मुझे लगता है कि साईकल चलाते समय पेट से गहरे सांस लेने से मेरा मूलाधार चक्र ज्यादा ही उत्तेजित हो गया था। स्पोर्ट्स बाईक में पीठ का पोस्चर अपनी प्राकृतिक अवस्था में होता है, और उसकी पतली सीट के दबाव से मूलाधार चक्र भी उत्तेजित होता रहता है। साथ में, पीठ में सांस लेते व छोड़ते हुए शेषनाग के चिंतन से मेरे मूलाधार को और अधिक शक्ति मिली। उससे मूलाधार में वीर्य शक्ति संचित होने लगी। उससे बैकवार्ड फ्लो भी चालू हो गया, जिससे मूलाधार में संचित एनर्जी पीठ में ऊपर चढ़ने लगी। मूलाधार की संवेदना वैसी ही थी, जैसी यौन-ऊर्जा के रक्षण से पैदा होती है। साथ में, वह संवेदना यौनसंबंध के लिए भी प्रेरित कर रही थी। शायद यही वजह है कि कामकाज में एक्टिव लोग सेक्सुअल रूप से भी एक्टिव होते हैं। मैं मुंह और जीभ को कस कर बंद रखता था, और जीभ की अधिकाँश सतह को तालु से कसकर चिपका कर रखता था। मैं उसका चिंतन एक पिलर के टॉप की स्लैब से करता था जिससे मस्तिष्क फ्रंट पिलर या एनर्जी चैनल से जुड़ा होता था। उससे साईकलिंग के समय उमड़ने वाले दिमाग के फालतू विचार नीचे उतरकर शरीर को एनर्जी देते रहते थे। उससे मन भी शांत रहता था, और थकावट भी नहीं होती थी।

अगले दिन मेरी कुण्डलिनी एनर्जी मणिपुर चक्र तक लौट आई थी

अगले दिन मेरी गहरी व मीठी दर्द पीछे के मणिपुर चक्र पर आ गई। संभवतः वह आगे के अनाहत चक्र से आगे के मणिपुर चक्र तक नीचे उतरी थी। आगे से वह पीछे के मणिपुर चक्र तक आ गई थी। वास्तव में इसी मीठी दर्द को एनर्जी कहते हैं। यही नाड़ी लूप में घूमती है। जब इस दर्द के साथ सबसे मजबूत व पसंदीदा मानसिक चित्र मिश्रित हो जाता है, तब वही एनेर्जी कुण्डलिनी कहलाती है। मुझे ऐसा भी लगा कि पीछे के चक्रों पर खाली एनेर्जी ज्यादा प्रभावी रहती है, जबकि आगे के चक्रों पर कुण्डलिनी ज्यादा प्रभावी रहती है। पीठ में जगह-२ बनने वाले मोड़ या बैंड उस एनेर्जी का निर्माण करते हैं, जिसके साथ कुण्डलिनी चित्र मिश्रित किया जाता रहता है।

कुण्डलिनी जागरण आध्यात्मिक प्रगति के लिए अत्यावश्यक नहीं है

कुण्डलिनी जागरण का योगदान यही है कि यह साधक के मन में कुण्डलिनी योगसाधना के प्रति अटूट विशवास पैदा करता है। उससे साधक प्रतिदिन के तौर पर हमेशा ही कुण्डलिनी योगसाधना करता रहता है। इस प्रकार से, यदि कोई व्यक्ति हमेशा ही सही तरीके से कुण्डलिनी योगसाधना करता रहे, तो एक प्रकार से उसकी कुण्डलिनी जागृत ही मानी जाएगी। हालांकि सही तरीके से कुण्डलिनी योगसाधना सीखने के लिए उसे योग्य गुरु की जरूरत पड़ेगी। एक प्रकार से, यह वैबसाईट भी एक गुरु (ई-गुरु) का ही काम कर रही है।    

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कुंडलिनी उच्च रक्तचाप के खिलाफ- तनाव को रोकने और उसे दूर करने के लिए एक रहस्यमय कुंजी; भोजन योग

शरीर में कुंडलिनी प्रवाह के लिए दो प्रमुख चैनल्स होते हैं। एक शरीर के आगे के भाग में है। दूसरा शरीर के पिछले भाग में है। दोनों शरीर के बीचोंबीच गुजरकर शरीर को दो बराबर व सिमेट्रिक जैसे भागों में बांटती हुई नजर आती हैं। एक हिस्सा बायां भाग (स्त्री या यिन) है, और दूसरा दायाँ(पुरुष या यांग) है। इसीसे अर्धनारीश्वर भगवान की अवधारणा हुई है। उस शिव भगवान का बायां भाग स्त्री रूप व दायाँ भाग पुरुष रूप दिखाया गया है। दोनों चैनल्स सभी चक्रों को बीचोंबीच काटते हैं। दोनों सभी चक्रों पर आपस में जुड़े हैं, जिससे बहुत से लूप बनते हैं। सबसे बड़ा लूप तब बनता है जब दोनों चैनल्स मूलाधार और मस्तिष्क चक्र पर आपस में जुड़े होते हैं। वह लूप सभी चक्रों को कवर करता है। कुण्डलिनी लूप पर भ्रमण करती है। और भी बहुत सी नाड़ियाँ इन दो मुख्य चैनल्स से निकलती हैं, जो पूरे शरीर में फैली हुई हैं। हठयोग व ताओवाद में इनका विस्तार से वर्णन है।

शरीर के आगे के भाग का चैनेल

मतिष्क प्यार का उत्पादक और दिल प्यार का एम्पलीफायर

प्यार मस्तिष्क में पैदा होता है। वह खाना खाते समय दिल तक उतर जाता है। तभी तो कहा जाता है कि साथ मिलकर खाने से प्यार बढ़ता है। यह भी कहा जाता है कि दिमाग का रास्ता पेट से होकर गुजरता है। जब स्कूल के दिनों में मेरे दोस्त मेरी काल्पनिक गर्लफ्रैंड का टिफिन दिखाकर मुझे मजाक में खाना खाने के लिए तैयार होने के लिए कहते थे, तब मुझे प्यार की बड़ी तेज व आनन्दमयी अनुभूति होती थी। आनंद तो दिल में ही पैदा होता है, दिमाग में तो बोझ महसूस होता है। कुंडलिनी जागरण व आत्मज्ञान भी तभी होता है जब दिल दिमाग से जुड़ता है। केवल दिमाग में कुंडलिनी जागरण नहीं बल्कि पागलपन ही पैदा हो सकता है। इसीलिए जीभ को तालु से छुआकर कुण्डलिनी को दिमाग से उतारकर दिल तक लाने के लिए कहा जाता है। बेशक उसे दिल से ही लूप बनाकर दिमाग तक ऊपर नीचे घुमाया जाता रहे। इससे दिल और दिमाग आपस में जुड़ जाते हैं। तभी तो कहते हैं कि उसके हुस्न का नशा मेरे दिलोदिमाग पर छा गया, मतलब कि बहुत मजा आया।  

कुंडलिनी भोजन के साथ मुंह से नीचे उतरती है

सीधा सा मतलब है कि टिफिन के खयाल से मेरे मुंह के रस के साथ मेरी कुंडलिनी मेरे दिल तक उतर जाती थी। वह रस या भोजन के कण एक कंडक्टर ज्वाइंट-ग्रीस की तरह दोनों जबड़ों को जोड़ देते थे। उससे होकर कुंडलिनी दिल तक उतरती थी और आनंद व प्यार पैदा करती थी। वहां से कुंडलिनी नाभि चक्र तक उतरती थी, जो वहां खाना पचाकर मुझे शक्ति का एहसास देती थी। तभी तो कहते कि नाभि में गट्स होता है। मैं तो पानी घूंट से मुंह को पूरा भरकर मस्तिष्क व शरीर के बीच बने सबसे मजबूत जोड़ को अनुभव करता हूँ, और वह पानी की घूंट मुझे अमृत के समान लगती है।

भरपेट खाना खाने के बाद यौनसंबंध या सैक्स बनाने की इच्छा

अक्सर देखा जाता है कि ज्यादा खाना खा लेने के बाद सैक्स के लिए मन करता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आगे वाले चैनेल से होती हुई कुंडलिनी नाभि चक्र से स्वाधिष्ठान चक्र तक उतर जाती है। कुंडलिनी वहीँ से पीछे मुड़कर ऊपर चढ़ जाती है। मूलाधार तो शरीर को बीचोंबीच विभाजित करने के लिए रखा गया है, ताकि कुंडलिनी चैनेल शरीर के बीचोंबीच सीधी रेखा में खुले। इसीलिए इसका ध्यान भी जरूरी है। हालांकि यह कुंडलिनी को पीछे से ऊपर मोड़ने का काम भी करता है। यह चक्र मलोत्सर्ग से भी जुड़ा है। तभी तो सेक्स के बाद हाजत की अनुभूति होती है और पेट साफ हो जाता है। वास्तव में कुंडलिनी स्वाधिष्ठान चक्र से नीचे उतरकर मूलाधार चक्र पर आ जाती है। दूसरे तरीके से, यदि मूलाधार पर वज्र शिखा का ध्यान किया जाए जो कि वास्तविकता है, तब दोनों सेक्सुअल चक्रों का ध्यान एक साथ हो जाता है और कुंडलिनी भी अच्छी तरह से पीछे मुड़ती है। कई लोग यह भी कहते हैं कि कुंडलिनी आज्ञा चक्र से ही पीछे मुड़कर नीचे उतर जाती है और सहस्रार तो मूलाधार की तरह सेंटरिंग व ध्यान करने के लिए ही है। पर मुझे तो कुंडलिनी को सहस्रार तक ले जाना अधिक आसान और कारगर लगता है। इसी तरह नाक के शिखर, आज्ञा चक्र और सिर पर बालों की चोटी रखने के स्थान से भी शरीर की सेंटरिंग होती है। इसी सेंटरिंग के लिए हिन्दुधर्म में सिर के पिछले भाग में दोनों तरफ के बीचोंबीच एक लंबे बालों की चोटी (शिखा) रखी जाती है।

विज्ञान फ्रंट चैनेल को ढंग से परिभाषित नहीं कर पाया है

मुझे लगता है कि फ्रंट चैनेल परस्पर स्पर्ष की संवेदना से बना है। यह स्पर्श की संवेदना सेल से सेल के कान्टेक्ट से आगे बढ़ती है। वैसे भी खाने का निवाला निगलते समय वह पहले गले के विशुद्धि चक्र में संवेदना पैदा करता है। फिर हृदय के अनाहत चक्र में और पेट में पहुंचने पर नाभि चक्र में संवेदना पैदा करता है। जब ज्यादा खाने से पेट नीचे लटक जाता है तब वह नीचे की ओर दबाव डालकर जननांग क्षेत्र को उत्तेजित करता है जिससे सैक्सुअल स्वाधिष्ठान चक्र क्रियाशील हो जाता है।

शरीर का मेरुदंड वाला चैनेल

सैक्स में सबसे ज्यादा आनंद होता है। जननांगों में सबसे तेज संवेदना पैदा होती है। यह भी सत्य है कि आनंद मस्तिष्क और दिल में एकसाथ तेज अनुभूति से पैदा होता है। इसका मतलब है कि जननांगों से संवेदना एकदम से मस्तिष्क व दिल तक जाती है। पहले वह सीधी मस्तिष्क तक जाती है। दिल तक तो उसे जीभ से उतारना पड़ता है। तांत्रिक संभोग के समय मुंह में भरपूर लार रस बनने से कुंडलिनी चालन/शक्ति चालन को अतिरिक्त सहायता प्राप्त होती है। इससे मस्तिष्क को भी कम थकान होती है। जननांगो से मस्तिष्क तक संवेदना को भेजने का रास्ता मेरुदंड ही है। विज्ञान से भी यह सिद्ध है कि मेरुदंड की नाड़ी जननांगों से सीधी मस्तिष्क तक जुड़ी होती है। विज्ञान के ही अनुसार , प्रत्येक चक्र भी मेरुदंड के माध्यम से ही मस्तिष्क से जुड़ा होता है।

संवेदना का बार-बार नाड़ी लूप में घूमना

जहाँ पहले से नाड़ी विद्यमान है, वहां पर संवेदना नाड़ी से चलती है। अन्य स्थानों पर सेल से सेल के कान्टेक्ट के थ्रू चलती है। मुझे तो लगता है मेरुदंड वाली संवेदना भी शुरु में स्पर्श के अनुभव से ही ऊपर चढ़ती है। इस तरह से नाड़ी लूप में कुण्डलिनी घूमने लगती है। यह नाड़ी लूप ताओवाद के माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट और कुण्डलिनी योग में एकसमान है।

यह नाड़ी लूप अनुभव के दायरे से विलुप्त हो गया, पर कुण्डलिनी अभ्यास से पुनः जागृत हो सकता है

आदमी केवल उन्हीं संवेदनाओं को अनुभव करने लगा , जिनकी उसे भौतिक रूप से सर्वाइव करने के लिए जरूरत थी। शरीर की अन्य संवेदनाओं को वह नजरअंदाज करने लगा। यह आध्यात्मिक नाड़ी लूप भी उन संवेदनाओं में शामिल था। इसलिए समय के साथ यह नाड़ी लूप अदृश्य हो गया। हालांकि अच्छी बात यह है कि लगातार के कुंडलिनी योग के अभ्यास से इस नाड़ी लूप को पुनः जागृत किया जा सकता है।

उलटी जीभ को पेलेट से छुआने पर काम आदि के बोझ से बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर एकदम से घट जाता है

यह मैंने पिछली पोस्ट में भी बताया था। मैं इस तकनीक की कारीगरी को कई बार आजमा चुका हूँ। अब इसका मैं उचित तरीका बताता हूँ। उलटी जीभ का तालु के साथ जितना पीछे हो सके, उतना पीछे फ्लैट और टाइट कांटेक्ट बनाएं। बेशक बहुत पीछे मोड़कर जीभ को परेशान न करें। बिल्कुल दांत के पीछे भी यदि जरा सी उल्टी जीभ लग जाए तो बहुत अच्छा कान्टेक्ट पॉइंट बनता है। इस उल्टे स्पर्श के कारण काउंटर करेंट सिस्टम चालू हो जाता है और कुंडलिनी नीचे उतर जाती है। यह काउंटर करेंट सिस्टम ऐसे ही है जैसे गर्म दूध के गिलास को ठंडे पानी में चारों ओर घुमाओ और ठंडे पानी को विपरीत दिशा में घुमाओ तो दूध एकदम से ठंडा हो जाता है। दूध की गर्मी पानी में एकदम चली जाती है। ऐसा लगता है कि मस्तिष्क पूरे शरीर में फ़ैल गया है। एकबार मुझे गुस्सा आ रहा था। उसी समय मैंने अपनी जीभ तालु से लगाई। मेरा मस्तिष्क शांत हो गया और उसकी एनर्जी हृदय चक्र तक उतर कर दोनों बाजुओं में फैल गई। मेरी बाजुएं लड़ाई के लिए तैयार हो गईं डिफेंसिव मोड में ही, क्योंकि मेरा मस्तिष्क शान्त था और लड़ाई शुरु नहीं करना चाहता था। इसीलिए सच्चे योगी व कुंफू विद्वान डिफेंसिव होते हैं, ऑफेंसिव नहीं। ऐसा उपरोक्त बाजू वाला ब्रांचिंग नाड़ी सिस्टम आगे वाले चैनेल से निकलकर पूरे शरीर में फैला है। ऐसी कल्पना करें कि दिमाग जीभ के माध्यम से गले से जुड़ गया है। वैसे भी गले में अकड़न सी पैदा होगी। मस्तिष्क के बोझ के नीचे उतरने से वह अकड़न विशुद्धि चक्र पर ज्यादा बढ़ जाएगी। थोड़ी देर बाद वह बोझ हृदय चक्र तक पहुंच जाएगा। थोड़ी अधिक देर बाद वह नाभि चक्र तक पहुंच जाता है। ऐसा साफ महसूस होता है कि कोई लहर जैसी दिमाग से नीचे उतरकर नाभि में विलीन हो गई। उसके साथ ही मन एकदम से खाली और हल्का हो जाता है। क्रोध आदि मन के विकार भी शांत हो जाते हैं, क्योंकि ये मन के बोझ से ही पैदा होते हैं। रक्तचाप भी एकदम से घटा हुआ महसूस होता है। कुंडलिनी भी आनंद के साथ नाभि चक्र पर चमकने लगती है। इसीलिए नाभि को सिंक या समुद्र भी कहते हैं, क्योंकि यह आदमी का सारा बोझ सोख लेती है।

जीभ के पिछले हिस्से पर टिप से शुरु होकर जीभ के बीचोंबीच जाती हुई गले के बीच में उतरकर आगे के सभी चक्रों को कवर करने वाली एक पतली नस जैसी महसूस होती है। उसके ऊपर कुंडलिनी चलती है। वह नस ही नरम तालु से टच होने पर कुंडलिनी या अन्य संवेदनाओं या बोझ को दिमाग से नीचे उतारती है। माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट में कुंडलिनी को नहीं अपितु सीधे एनर्जी या संवेदना या बोझ को नाड़ी चैनलों में घुमाया जाता है।

तालाबंदी लोकडाऊन का उल्लंघन करके पलायन कर रहे लोगों का कुंडलिनी से सम्बंध

भोजन के बिना आदमी कई दिनों तक जिंदा रह सकता है। वैसे भी एक बार में ही यदि बहुत सारा खाना खा लिया जाए, तो दो दिन तक दुबारा खाना खाने की जरूरत न पड़े। मेरे एक जाने-पहचाने शख्स थे जो अक्सर एक बार में ही 5 आदमियों का खाना खा लेते थे। विशेषकर वह ऐसा शादी आदि समारोहों में करते थे, जहाँ अच्छा और तला भुना खाना बनता था। फिर वे 5 दिन तक बिना कुछ खाए ही कमरे में सोए रहते थे, और बार-2 पानी पीते रहते थे। वे हंसते भी बहुत थे और पूरा खुलकर हँसते थे। साथ में वे पूरी तरह से मस्त रहते थे। इससे उन्हें खाना पचाने में मदद मिलती थी। इसी तरह, लोकडाऊन की वजह से काम न करने से तो तीन दिन तक एक भारी भोजन से गुजारा चल सकता है। पर भोजन से शरीर के लिए केवल पोषक तत्त्व ही नहीं मिलते, बल्कि मन के बोझ को कम करने वाला व आनन्द प्रदान करने वाला कुंडलिनी लाभ भी मिलता है। इसी कुंडलिनी लाभ के लिए लोग खासकर मजदूर नॉवेल कोरोना (कोविड-19) वायरस लोकडाऊन का उल्लंघन करके घर भाग रहे हैं, भूख से नहीं। वैसे भी अधिकांश मामलों में कैम्पों में मुफ्त का खाना मिल ही रहा है। यदि भोजन केवल शरीर बनाने के लिए चाहिए होता, तब तो मोटे आदमी कई-2 दिनों तक खाना न खाया करते।

कुंडलिनी दोनों दिशाओं में प्रवाहित हो सकती है

सीखने के समय ताओवाद में आगे के फ्रंट चैनल में कुंडलिनी को ऊपर की तरफ चलाया जाता है। मैंने भी एकबार तांत्रिक प्रक्रिया के दौरान फ्रंट चैनेल से ऊपर जाते हुए महसूस किया था। वह एक हेलीकॉप्टर की तरह बड़े सुंदर ढंग से और स्पष्ट रूप से ऊपर उठी थी। उसने सेक्सुअल चक्रों से मस्तिष्क तक पहुंचने में लगभग 5-10 सेकंड का समय लिया था। कुंडलिनी संवेदना एक तरंग की तरह ऊपर उठी। वह जिस क्षेत्र से गुजरी, उस क्षेत्र को प्रफुल्लित करते गई। निचले वाला क्षेत्र सिकुड़ता गया। मतलब कि जैसे ही वह जननांगों से ऊपर उठी, वे एकदम से सिकुड़ गए। पहले वे पूरी तरह से प्रसारित थे।

यद्यपि सबसे सुंदर अनुभूति तब होती है जब कुंडलिनी फ्रंट चैनल से नीचे उतरती है और मूलाधार से वापिस मुड़कर बैक चैनल से ऊपर चढ़ती है। जब एनर्जी मस्तिष्क में पहुंचती है, तब चेहरे की त्वचा पर ऊपर की तरफ खिंचाव लगता है और आंखें भिंच जाती हैं। कानों से ऊपर मस्तिष्क में घुसती हुई सरसराहट या गशिंग फ्लो के जैसी अनुभूति होती है। हो सकता है कि वह खिंचाव के दबाव में रक्त प्रवाह हो। फिर उस गशिंग से भरे दबाव को जीभ से नीचे उतारा जाता है। नीचे आते हुए वह गशिंग कुंडलिनी में बदल जाती हो। मूलाधार से वह फिर ऊपर मुड़ जाती है। रीढ़ की हड्डी का एक फन फैलाए शेषनाग के अनुभव से वह कुंडलिनी संवेदना मस्तिष्क तक पहुंच जाती है। नाग और जीभ का वैसे भी आपस में गहरा अंतरसंबंध है। फिर वही गशिंग और फिर वही प्रोसेस बार बार चलता रहता है।

कुंडलिनी स्विच; कुंडलिनी योग (खेचरी मुद्रा) और माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट का तुलनात्मक अध्ययन

योग संसार में अक्सर कहा जाता है कि योग करते समय जीभ की शिखा को मुंह के अंदर पीछे वाले नरम तालु से छुआ कर रखना चाहिए। यह प्राचीन तकनीक आज के कोरोना (कोविड-19) काल में भारी तनाव के बोझ को दूर करने के लिए अद्भुत साबित हो सकती है। आज हम इसके मनोवैज्ञानिक और शरीर वैज्ञानिक पहलुओं पर विचार करेंगे।

जीभ को तालु से छुआने से कुंडलिनी स्विच ऑन हो जाता है, जिससे कुंडलिनी परिपथ पूरा हो जाता है

मुझे पहले ऐसा विशेष महसूस नहीं होता था। परन्तु जब मुझे कुंडलिनी योग करते हुए 2-3 साल बीत गए, तब मुझे इसके महत्व का पूरा अनुभव हुआ। जब मेरी जीभ ऊपर और पीछे को मुड़कर सॉफ्ट पेलेट की मालिश करती थी, तब मुझे ऐसा लगता था कि वह मेरे दिमाग को नीचे की तरफ चूस रही थी। सॉफ्ट पेलेट एक फिसलन भरे नरम गद्दे की तरह लगा, जिस पर जीभ को उरे-परे फिसलाने से बड़ी सुखद अनुभूति हुई। फिर दिमाग के रस के साथ मेरी कुण्डलिनी भी जीभ के पीछे से होती हुई नीचे गले तक उतर गई। वहां से अनाहत चक्र, फिर मणिपुर चक्र, और अंत में स्वाधिस्ठानचक्र-मूलाधार चक्र पर पहुंच कर सांसों की शक्ति से पीछे से ऊपर की ओर चली गयी। रीढ़ की हड्डी से होते हुए सभी चक्रों को भेदते हुए वह फिर मस्तिष्क तक पहुंच गई। वहां से फिर जीभ से होकर नीचे आ गई। इस तरह से कुंडलिनी परिपथ चालू हो गया, और कुंडलिनी पूरे शरीर में गोल-गोल घूमने लगी। इस प्रक्रिया में शरीर की सेंटरिंग (केन्द्रीकरण) का भी योगदान होता है, जिसका जिक्र हम आने वाली पोस्टों में करेंगे।

कुण्डलिनी स्विच के ऑन होने से दिमाग में हल्कापन महसूस होता है

जैसे ही कुंडलिनी स्विच से होकर मेरे दिमाग का रस या बोझ (कुंडलिनी) नीचे उतरा, वैसे ही मेरा दिमाग एकदम हल्का व शांत हो गया। जब कुंडलिनी पीछे से चढ़कर दिमाग तक पहुंची, दिमाग फिर भारी हो गया।इस तरह वह भारी-हल्का होता रहा और शक्ति पूरे शरीर में घूमने लगी।

खेचरी मुद्रा और माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट में जीभ को तालु से छुआया जाता है

बहुत से लोग सोचते हैं कि माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट में ही कुंडलिनी स्विच का वर्णन है, तथा उसने ही कुंडलिनी योग को पूर्ण किया। उससे पहले कुंडलिनी योग से कुण्डलिनी दिमाग में अटकी रहती थी और दिमागी परेशानियां पैदा करती थी। वास्तव में योग की खेचरी मुद्रा में कुंडलिनी स्विच का विस्तार से वर्णन है। उसमें तो जीभ के जोड़ को काटकर जीभ को इतना लंबा कर दिया जाता है कि वह पीछे मुड़कर नाक को जाने वाले सुराख में घुस जाती है। उससे कुंडलिनी स्विच परमानेंटली ऑन हो जाता है, जिससे योगी हमेशा कुंडलिनी के आनंद में झूमने लगता है। यद्यपि इस तरीके को करने की सलाह नहीं दी जाती, क्योंकि इससे स्वास्थ्य व जीवन शैली को भारी जोखिम उठाना पड़ सकता है।

माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट व कुंडलिनी योग भिन्न-2 परिस्थितियों के लिए हैं

कुंडलिनी जागरण दिमाग में ही होता है, अन्य चक्रों में नहीं। इसलिए यह सिद्ध है कि कुंडलिनी योगी को जल्दी कुंडलिनी जागरण होता था। प्राचीन भारत में बहुत शांतिपूर्ण और आरामदायक जीवनशैली होती थी। वातावरण व जलवायु भी विश्व में सर्वोत्तम होते थे। इसलिए वहां के योगी अपने दिमाग में कुंडलिनी का बोझ अच्छी तरह से झेल लेते थे। अधिकांश योगियों को कुंडलिनी स्विच की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। मुझे भी कुंडलिनी जागरण के लिए इसकी जरूरत नहीं पड़ी थी।पर आज मैं इसकी जरूरत महसूस करता हूँ, क्योंकि अब मेरे दिमाग में दूसरे कामों का बोझ बढ़ गया है।

कुंडलिनी स्विच से बहुत से स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं

सुबह-2 जब कई बार मेरा बॉवेल प्रेशर नहीँ बनता, तब मैं कुंडलिनी योग के बाद कुंडलिनी स्विच को ऑन करता हूँ। मैं कुंडलिनी का परिपथ नाभि चक्र तक बनाता हूँ। कुंडलिनी आगे के नाभि चक्र से पीछे घुसती है और पीछे वाले नाभि चक्र से होकर ऊपर चढ़ जाती है। जल्दी ही मेरी अंतड़ियों में हलचल शुरु हो जाती है, और मेरा पेट साफ हो जाता है।

कुण्डलिनी स्विच के पीछे छिपा हुआ शरीर विज्ञान

खाना खाते समय हमारी जीभ बार-2 तालु को छूती है। उससे दिमाग की ऊर्जा जीभ के रास्ते से होकर नाभि चक्र तक पहुंच कर खाना पचाने में मदद करती है। इसीलिए खाना खाने के बाद रक्तचाप भी कम हो जाता है, और आदमी दिमाग में हल्कापन महसूस करता है।

एम्ब्रोसिया, नेक्टर, अमृत, एलिकसिर ऑफ़ गॉड, लव पोशन, सीएसएफ आदि नाम कुण्डलिनी स्विच से जुड़े हैं

कुछ अभ्यास के बाद मैंने सॉफ्ट पेलेट से एक मीठा-नमकीन व जैली जैसा रस चखा। वह आनंद के साथ दिमाग का बोझ घटने से पैदा होता है। उसे उपरोक्त नामों से भी जाना जाता है।

कुंडलिनी सभी प्रकार के अनुभवों को सुरक्षित रूप से झेलने की शक्ति देती है; और कुण्डलिनी जागरण तो सबसे बड़ा अनुभव है, जिसके आगे सभी अनुभव बौने हैं; प्रेत आत्मा से सामना होने की कुछ घटनाएं

दोस्तों, पिछली पोस्ट में मैंने ड्रीम विजिटेशन के बारे में बताया था। इस पोस्ट में मैं उससे संबंधित अपने अनुभवों के बारे में बताऊंगा।

आदमी (आत्मा) की मृत्यु नहीं होती, वह केवल रूप बदलता रहता है

आज से दो वर्ष पहले मेरी दादी जी का देहांत हो गया था। बुढ़ापा मृत्यु का मुख्य कारण रहा, हालांकि उसमें एक अनजानी सी लंबी बीमारी का भी योगदान था। यह भी संयोग ही है कि उन्हें श्वासरोग की भी समस्या थी, और कोरोना(कोविड-19) भी श्वासरोग ही फैला रहा है। बहुत से शारीरिक व मानसिक कष्टों के बीच में उन्होंने अपने प्राण छोड़े। स्वभाव से वे कोमल, भावनाप्रधान, सुखप्रधान व भीरु स्वभाव की थीं। कई बार तो वे अपनेपन की मोहमाया से ग्रस्त लगती थीं, पर वे उसे प्रेमभावना कहती थीं। दयालु, मानवतापूर्ण व ममतामयी स्वभाव की मूर्ति थीं। मेहनती थीं और अच्छे-बुरे की अच्छी परख रखती थीं। अपनों के सुख व भले के लिए चिंतित रहा करती थीं। वे बच्चों से बहुत प्यार करती थीं। बच्चों को वे जरा भीडांटने नहीं देती थीं, उन्हें गुस्से में हाथ भी लगाना तो दूर की बात रही। वे पालतु जानवरों की भी बहुत देखरेख रखती थीं। वे बहुत सोच-विचार करा करती थीं। मरने से और उसके बाद की दुर्गति से बहुत डरती थीं। उनकी मृत्यु के लगभग 15 दिन बाद मेरी उनसे सपने में मुलाकात हुई। अजीब सा शांतिपूर्ण अंधेरा था। मुट्ठी में भरने लायक घना अंधेरा था। पर आम अंधेरे के विपरीत उसमें चमक थी चमकीले काजल की तरह। वह मोहमाया या अज्ञान से दबी हुई आत्मा की स्वाभाविक चमक होती है। उस अंधेरे के रूप में भी मैं उन्हें स्पष्ट पहचान रहा था। इसका मतलब है कि उस अंधेरे में उनके रूप की एनकोडिंग थी। मतलब कि किसी आदमी की आत्मा का अंधेरा उसके गुण और रूप के अनुसार होता है। उसी अंधेरे से अगले जन्म में वही गुण और कर्म फिर से प्रकट हो जाते हैं। इसका अर्थ है कि सभी अंधेरे एक जैसे नहीं होते।

उनका वह रूप मुझे अच्छा लगा। वह आकाश की तरह पूरा खुला हुआ और विस्तृत था। वह मुझे अपनी क्षणिक आत्मज्ञान की अनुभूति की तरह लगा। परन्तु उसमें प्रकाश व आनंद वाला गुण किसी चीज के दबाने से ढका हुआ जैसा लग रहा था। शायद यही दबाव अज्ञान, आसक्ति, द्वैत, मोहमाया, कर्मसंस्कार आदि के नाम से जाना जाता है। ऐसा लगा जैसे ग्रहण काल में आसमान के आकार का सूर्य पूरा ढका हुआ हो, और नीचे का प्रकाश उस काले आसमान को कुछ अजीब सी या चमकीले काजल जैसी चमक देता हुआ बाहर की तरफ उमड़ना चाह रहा हो। इसे ही अज्ञान के पर्दे से आत्मा का ढकना कहते हैं। इसे ही अज्ञान रूपी बादल से आत्मा रूपी सूर्य का ढकना भी कहते हैं।

मैंने उनसे उनका हालचाल पूछा तो उन्होंने कहा कि वहाँ पर तो ऐसी-वैसी कोई दिक्कत नहीं थी। उन्होंने मेरा हाल पूछा तो मैंने कहा कि मैं ठीक था। उन्होंने कहा, “मैं तो वैसे ही डरती थीं  कि मरने के बाद पता नहीं क्या होता होगा। पर मैं तो यहाँ ठीक हूँ”। उन्हें वह स्थिति कुछ शक के साथ पूर्ण जैसी लग रही थी, पर मुझे उसमें कमी लग रही थी। शायद वे उस स्थिति को भगवान ही समझ रही हों। शायद वह उस स्थिति के बारे में जानने के लिए मुझसे संपर्क कर रही हों। मैंने प्रसन्न मुद्रा में आसमान की तरफ ऊपर हाथ उठाकर और ऊपर देखते हुए उन्हें उनके अंत समय के निकट कहा भी था कि वे सबसे ऊपर के आकाश लोक में जाएंगी, जिसे उन्होंने गौर से व विश्वास के साथ सुना था। ऐसा मैंने उनके ऐसा पूछने पर कहा था कि उस लाईलाज बिमारी के बाद वह कहाँ जा रही थीं। उनके उस विश्वास की एक वजह यह भी थी कि मेरे दादाजी ने लगभग 25 वर्ष पहले उन्हें मेरे सामने मेरे आत्मज्ञान के बारे में प्रसन्नता व बड़े आत्मगौरव के साथ बताया था। मेरी कुंडलिनी के निर्माण में मेरे दादाजी का बहुत बड़ा योगदान रहा था।

फिर उस ड्रीम विजिटेशन में मेरी दादीजी ने मुझसे कहा, “तेरे बहुत से अहितचिंतक पीठ पीछे तेरे विरुद्ध बोल रहे हैं”। तो मैंने उनसे कहा, “आप भगवान के बहुत नजदीक हो, इसलिए कृपया उनसे स्थिति सामान्य करने के लिए प्रार्थना करो”। उन्होंने कहा, “ठीक है”। मैं उस समय प्रतिदिन कुण्डलिनी योग कर रहा था। इसका अर्थ है कि कुंडलिनी (अद्वैत) मृत्यु के बाद ईश्वर की तरफ ले जाती है।

प्रेतात्मा के द्वारा भगवान का स्मरण करना बहुत बड़ी बात है, क्योंकि उस समय वह पूरी तरह से भूखी-प्यासी व आश्रय विहीन होती है। हो सकता है कि उससे उन्हें भगवान की तरफ गति मिल गई हो। आश्चर्य की बात है कि जिस स्थान पर उन प्रेतात्मा के लिए धार्मिक रीति के अनुसार जल का कलश रखा हुआ था, वहीं पर उनसे मुलाकात हुई। वहां पर एक शिवलिंग टेलीफोन सेट का काम कर रहा था, जिसके माध्यम से उनसे बात हो रही थी। बड़ी स्पष्ट,भावपूर्ण व जीवंत आवाज थी उनकी। वह मुंह से निकली हुई आवाज नहीं थी। वह सीधी उनकी आत्मा से आ रही थी और मेरी आत्मा को छू रही थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई स्विच दबा और मैं शरीर रहित आयाम में प्रविष्ट हो गया था। फिर मैंने परिवार के और सदस्यों से उनकी बात करानी चाही। पर वे लोग उन्हें मरा हुआ मान रहे थे। फिर मुझे भी उनके मरे हुए होने का भान हुआ। मैं तनिक दुखी होकर विलाप करने लगा और थोड़ा डर सा गया। उससे वह आत्मा ओझल हो गई और मैं एकदम से आत्मा के आयाम से बाहर आ गया।

प्रियजनों की आत्मा आने वाले खतरे का बोध भी करवाती है

कुछ महीनों बाद मैंने उन्हें बड़ी भयावह अवस्था में देखा। वह शायद वैसी ही स्थिति थी, जैसी उन्होंने अपनी मृत्यु के समय महसूस की होगी। मैंने उन्हें अपने पुश्तैनी घर के बरामदे में मृत रूप में जीवित बैठे देखा। वह बड़ा विचित्र व क्लेशपूर्ण अनुभव था। शायद वह मुझे अगले दिन होने वाली दुर्घटना के बारे में बताना चाह रही हों, पर बोल नहीं पा रही हों। अगले दिन मेरे कमरे की खिड़की पर एक जहरीला कोबरा सांप था, जिससे मेरा कर्मचारी बाल-बाल बच गया।

एकबार मैंने उन सूक्ष्म शरीर को फिर से भगवान की याद दिलाई

वह किसी रिश्तेदार के यहाँ आराम से सबके साथ बाहर बैठी थीं। मेरी मुलाकात होने पर मैंने उन्हें ईश्वर की याद दिलाई। वह धीरे-2 भवन के अंदर को सरक गईं और ओझल हो गईं। उनका रूप पहले से कुछ अधिक स्वच्छ लग रहा था। सूक्ष्म शरीर भगवान के तेज को ज्यादा देर सहन नहीं कर सकता।

अंतिम बार मैंने उन सूक्ष्म शरीर को बहुत निर्मल देखा

वे मेरे पुश्तैनी घर के मुख्य गेट से बरामदे में प्रविष्ट हो रही थीं। उन्होंने उज्ज्वल सफेद कपड़े पहन रखे थे। वे बहुत निर्मल, शान्त व आनन्दमयी लग रही थीं। उनसे मिल कर मेरा रोम-2 खिल उठा। उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ गया था। मैंने कहा कि मैं हरिद्वार गया था। हरिद्वार भगवान का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है। यह विश्वप्रसिद्ध योग राजधानी ऋषिकेश के नजदीक स्थित है। वे मुस्कुराते हुए व मुझसे यह पूछते हुए भवन के अंदर प्रविष्ट हुईं कि क्या मैं उससे पहले हरिद्वार नहीं गया था। उनका पूछने का मतलब था कि मैं पहले भी तो हरिद्वार गया हुआ था।

जब मेरे चाचा का सूक्ष्म शरीर मुझे चेतवानी देने आया था

उससे कुछ समय पहले मेरे चाचा की मृत्यु हाईपर थायरेडिसम बीमारी के कारण अचानक हृदय गति रुकने से हुई थी। वे बड़े मिलनसार व सामाजिक होते थे। ड्रीम विजिटेशन में मुझे वे अपनी मित्रमण्डली के साथ होहल्ला व हंसी मजाक करते हुए एक विचित्र सी अंधेरी पर शांत गुफा के अंदर चलते मिले। मैं और मेरी 5 साल की बेटी भी कुछ अजीब, चन्द्रमा की रौशनी से मिश्रित अंधेरे वाली और आनंद वाली जगह पर कुछ सीढ़ियां चढ़ कर उनके पीछे चल दिए। गुफा के दूसरे छोर पर बहुत तेज स्वर्ग के जैसा प्रकाश था। चाचा ने मुझसे मुस्कुराते हुए अपने साथ चलने के लिए पूछा। मैंने अनहोनी की आशंका से मना कर दिया। मेरी बेटी को वह नजारा बड़ा भा रहा था, इसलिए वह उनके साथ चलने के लिए जिद करने लगी। मैंने उसे बलपूर्वक रोका और हम गुफा से बाहर वापिस लौट आए। अगले दिन मेरी कार सड़क से बाहर निकलने से बाल-2 बच गई। साथ बैठी हुई मेरी फैमिली ने मुझे समय रहते चेता दिया था।

अपरिचित की आत्मा भी ड्रीम विजिटेशन में सहायता माँग सकती है

मेरे एक रिश्तेदार के लड़के को सपने में एक मंदिर के साधु बार-2 आकर अपना अंतिम संस्कार करने के लिए कहते थे। खोजबीन करने पर पता चला कि उन साधु की हत्या हो गई थी और उनकी लाश को नाले में फेंक दिया गया था। मेरे उन रिश्तेदार ने साधु का पुतला बनवाया और उसका विधिवत अंतिम संस्कार करवाया। उसके बाद उन साधु का सपने में आना बंद हो गया। मैं उस बात पर यकीन नहीं करता था। पर अपने खुद के उपरोक्त ड्रीम विजिटेशन के अनुभव के बाद वैसी अलौकिक घटनाओं पर विश्वास होने लग गया।

कुण्डलिनी ही सहस्रार चक्र से नीचे झरने वाले अमृत के रूप में कोरोना (कोविड-19) के खिलाफ काम कर सकती है

यह पोस्ट चिकित्सा विज्ञान का विकल्प नहीं है, अपितु उसकी अनुपूरक है। कृपया कोरोना से लड़ने के लिए डाक्टर की सलाह का पालन अवश्य करते रहें।

मस्तिष्क ही हमारे शरीर का बोस है। वह पूरे शरीर के सुचारु संचालन के लिए पूरे शरीर में सन्देश प्रसारित करता रहता है। कुछ सन्देश होरमोन के रूप में होते हैं, तो कुछ सन्देश नर्व सिग्नल के रूप में होते हैं।

हम उन संदेशों को महसूस नहीं कर सकते, इसलिए हम उन्हें मस्तिष्क में पैदा करके वहां से पूरे शरीर की तरफ बलपूर्वक नहीं धकेल सकते। जिस चीज को हम मस्तिष्क में महसूस कर सकते हैं, हम उसे ही शरीर की तरफ रवाना कर सकते हैं। हम विचारों को मस्तिष्क में महसूस कर सकते हैं। हम उन्हें शरीर के विभिन्न चक्रों तक ध्यान से उतार सकते हैं। इससे भी मस्तिष्क में संदेशवाहक रसायनों के निर्माण को बल मिलता है, जो पूरे शरीर में प्रसारित हो जाते हैं। परन्तु यह बल बहुत कम होता है, क्योंकि कभी-कभार उठने वाले व बदलते विचारों की चमक धुंधली होती है। साथ में, भिन्न-२ विचारों का सहारा लेने से आदमी का मन पैरानोइक या विचलित भी रह सकता है। इस समस्या का हल कुण्डलिनी में निहित है। कुण्डलिनी एकमात्र इष्ट की छवि है, जो रोज के अभ्यास से बहुत चमकीली बनी होती है। उसकी तीव्र चमक से मस्तिष्क में तेजी से रसायन बनते हैं। जब उस कुण्डलिनी को विभिन्न चक्रों तक उतारा जाता है, तब साथ में वे सभी रसायन भी वहां पहुँच जाते हैं, जो शरीर की बहुत मदद करते हैं। एकमात्र छवि का सहारा लेने से आदमी का मन भी विचलित नहीं होता। साथ में, कुण्डलिनी से आध्यात्मिक उन्नति भी प्राप्त होती है, जिससे मुक्ति मिलती है।

कुण्डलिनी ही सहस्रार से झरने वाला अमृत (एम्ब्रोसिया) है

योग शास्त्रों में लिखा है कि चन्द्रमा से पैदा हुए अमृत को सूर्य खाता है। सहस्रार ही वह चंद्रमा है। उसे बिंदु भी कहते हैं। विशुद्धि चक्र सूर्य है। कुण्डलिनी को ही अमृत कहा गया है, क्योंकि वही प्रकाश, आनंद व मुक्ति प्रदान करती है। साथ में, संभवतः कुण्डलिनी कोरोना जैसी प्राणघातक बीमारियों से भी हमारी रक्षा करती है, जैसा कि आगे बताया गया है।

योग साधना में भी यह सिखाया जाता है कि कुण्डलिनी को मूलाधार (शक्ति-उत्पादक चक्र) से उठाकर पीठ (महान नाग) के रास्ते से सहस्रार (नाग का फण) तक उठाना चाहिए। फिर उसे आगे के सभी चक्रों से होकर धीरे-२ नीचे उतारना चाहिए। इसका भी यही अर्थ है।

कुण्डलिनी को सहस्रार से नीचे उतारने के लिए विभिन्न रेखा-चित्रों का सहारा लिया जा सकता है

सिर-गर्दन की बाऊंडरी से बाहर निकलने वाली तिरछी-खड़ी रेखा गलती से बनी है

कुण्डलिनी को इन रेखा-चित्रों की रेखाओं पर घुमाया जाता है, जिससे वह उत्तरोत्तर चमकती जाती है।

कुण्डलिनी को नाग के माध्यम से भी नीचे उतारा जा सकता है

विशुद्धि चक्र से नीचे के चक्रों तक कुण्डलिनी को नाग की सहायता से भी पहुँचाया जा सकता है। विशुद्धि चक्र तक गर्दन सीधी रहती है, परन्तु उसके नीचे के चक्रों के लिए गर्दन को आगे को मोड़कर ठोड़ी को छाती से लगाया जाता है। इसे जालंधर बंध (चिन लौक) कहते हैं। इसके साथ कल्पना की जा सकती है कि नाग अपना फण नीचे करके अनाहत चक्र का चुम्बन कर रहा है। इससे सहस्रार व अनाहत चक्र कुण्डलिनी के पुल से आपस में जुड़ जाते हैं। इसी तरह, सहस्रार और मणिपुर चक्र; सहस्रार और स्वाधिष्ठान चक्र; और सहस्रार व मूलाधार चक्र भी आपस में जुड़ जाते हैं। इससे मस्तिष्क के सारे जैव-रसायन भी कुण्डलिनी के साथ सभी चक्रों पर पहुँच जाते हैं, जिससे शरीर और मन दोनों स्वस्थ रहते हैं।

कुण्डलिनी से कोरोना के खिलाफ लड़ने में मदद मिल सकती है

पुराने जमाने में एंटीबायोटिकस व वैक्सीन नहीं होती थीं। फिर भी लोग स्वस्थ रहते थे। उनके अच्छे स्वास्थ्य के लिए कुण्डलिनी काफी हद तक जिम्मेदार थी, जो उनके दैनिक जीवन में शामिल होती थी। योगी तो कभी बीमार होते ही नहीं थे।

पुराने जमाने में ही अधिकाँश जानें श्वास-रोगों से जाती थीं। कोरोना वायरस भी श्वास रोग पैदा करता है। श्वास रोग गले के रोगों से शुरू होते हैं। विशुद्धि चक्र गले में ही स्थित है। अमृत का झरना भी सहस्रार से विशुद्धि चक्र तक ही मुख्य रूप से दिखाया जाता है। सीधी सी बात है कि उससे गले के रोग ठीक होते थे, जिससे योगियों की जान बच जाती थी। तभी कुण्डलिनी को अमृत अर्थात जान बचाने वाला कहा गया है।

कुण्डलिनी ही देवी-देवताओं के रूप में रोगों से हमारी रक्षा करती है

पुराने जमाने में विशेष रोग से बचाव के लिए एक विशेष देवता का मंदिर होता था, जैसे कि बच्चों के छोटी माता रोग (small pox) से बचाव के लिए शीतला माता। उस देवी माता का मंदिर बहते पानी के पास, ठंडी जगह पर होता था। मतलब है कि रोग के बुखार को उस ठंडी जगह से ठंडक मिलती थी। आज भी ऐसे बहुत से मंदिर हाई। वास्तव में उन देवी-देवताओं की पूजा से कुण्डलिनी संपुष्ट होती है, जो हमारे इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है।    

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कुण्डलिनी से प्रेरित होकर ही धर्म या परंपरा का निर्माण हुआ, जिससे पैदा होने वाले अद्वैत के नशे के अन्दर कुछ स्वार्थी धार्मिक कट्टरपंथियों ने नफरत का इतना जहर घोल दिया, जिससे पैदा होने वाली हिंसा से कई सभ्यताएं व संस्कृतियाँ समूल नष्ट हो गईं, और कई नष्ट होने की कगार पर हैं

हम किसी भी धर्म का समर्थन या विरोध नहीं करते हैं। हम केवल धर्म के वैज्ञानिक और मानवीय अध्ययन को बढ़ावा देते हैं।

दोस्तों, अभी हाल ही में दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक ताहिर हुसैन के घर की छत से बहुत से देसी हथियार बरामद हुए हैं, जिनसे दिल्ली में मासूम लोगों की भीड़ को निशाना बनाया गया, जिससे बहुत से लोगों की जानें भी गईं। वास्तव में वह एकाएक नहीं हुआ। उसके लिए कट्टरपंथियों की योजना बड़े सुनियोजित तरीके से लम्बे समय से चल रही थी। वास्तव में उस साजिश को रचने के लिए इस्लामिक कट्टरपंथियों के द्वारा कुण्डलिनी-सिद्धांत का ही सहारा लिया गया, हालांकि दुनिया के सामने ये कुण्डलिनी को सिरे से नकारते हैं।

कुण्डलिनी एक शक्ति है, जो कुछ धार्मिक परंपरागत मामलों में अच्छे कामों की तरह ही बुरे काम भी करवा सकती है

हमें इस भ्रम में कभी नहीं रहना चाहिए कि कुण्डलिनी आदमी से बलपूर्वक अच्छे काम करवाती रहती है। यह सत्य है कि कुछ सीमा तक कुण्डलिनी आदमी को अच्छे काम करने के लिए प्रेरित करती है। परन्तु अंतिम निर्णय लेने की स्वतंत्रता आदमी के अपने पास ही होती है। आदमी कुण्डलिनी के इशारे को बलपूर्वक नजरअंदाज करके कुण्डलिनी शक्ति से बुरे काम को भी अंजाम दे सकता है। यद्यपि उससे उसे बहुत बड़े पाप का भागी बनना पड़ता है। कुण्डलिनी का ऐसा ही दुरुपयोग कुछ काले तांत्रिक करते हैं। तभी तो कहा है कि कुण्डलिनी तंत्र यदि स्वर्ग दे सकता है, तो नरक भी दे सकता है। परन्तु डरने की बात नहीं। ऐसा अक्सर तभी होता है, जब लम्बी परंपरा के वशीभूत होकर कुण्डलिनी के इशारे को लम्बे समय तक दबाया जाता है। ऐसी ही एक विकृत परम्परा धार्मिक कट्टरपंथियों व उग्रपंथियों की है, जो धर्म के नाम पर अमानवीय काम करते हैं। वैसे कुण्डलिनी आदमी को सुधरने के अवसर लागातार देती रहती है। जब-२ आदमी गलत काम करने वाला होता है, तब-२ यह एक सच्चे गुरु की तरह आदमी के सामने आने लगती है, और उसे समझाने जैसे लगती है। अच्छे काम करने पर यह शाबाशी भी देती है।

कुण्डलिनी को आसानी से सबके लिए उपलब्ध करवाने के लिए ही नियमबद्ध परंपरा या धर्म का निर्माण होता है

परंपरा या धर्म की रचना भी कुण्डलिनी सिद्धांत से ही प्रेरित थी। आम आदमी कुण्डलिनी को नहीं समझ सकता था। इसलिए धर्म या परम्परा के नाम से आदमी को बाँधने वाला मानसिक खूंटा बनाया गया। उसमें आदमी के हरेक काम व व्यवहार के नियम बनाए गए, जिनसे आदमी का मन हर समय उस धर्म विशेष से बंधा रहता। उससे आदमी नशे के जैसी मस्ती व आनंद में डूबा रहने लगा। अवसादरोधी (एंटीडिप्रेसेंट) दवाओं (ड्रग्स) को खाने से भी वैसा ही कुण्डलिनी जैसा नशा महसूस होता है। तभी तो साम्यवादी लोग धर्म को एक प्रकार का नशा मानते हुए उसका विरोध करते हैं। हालांकि नशे से उत्पन्न अद्वैत और कुण्डलिनी से उत्पन्न अद्वैत के बीच में गुणवत्ता का बहुत फर्क होता है।

इतिहास गवाह है कि धर्म के नशे से कई सभ्यताएं रक्तरंजित हुईं

धर्म के नशे के कारण आदमी अंधा जैसा हो गया। वह धर्म पर इतना विश्वास करने लगा कि उसे उसमें बताई गई गलत बातें भी सही लगने लगीं। इसी धर्म के नशे की कड़वाहट में छुपाकर कई स्वार्थी व अमानवीय तत्त्वों ने इतना ज्यादा नफरत का जहर घोला, जिससे कई संस्कृतियाँ व सभ्यताएं रक्तरंजित हुईं।

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कुण्डलिनी जागरण केवल तांत्रिक सैक्सुअल योगा/यौनयोग-सहायित कुण्डलिनी योग से ही सभी के लिए प्राप्त करना संभव है

यह तांत्रिक पोस्ट तंत्र के आदिदेव भगववान शिव व तंत्र गुरु ओशो को समर्पित है।

प्रमाणित किया जाता है कि इस तांत्रिक वैब पोस्ट में किसी की भावना को ठेस पहुंचाने का प्रयास नहीं किया गया है। इसमें तांत्रिक वैबसाइट के अपने स्वतंत्र विचार जनहित में प्रस्तुत किए गए हैं। हम यौनिहिंसा की पीड़िताओं के साथ गहरी सम्वेदना प्रकट करते हैं।

मित्रो, इस पोस्ट समेत पिछली दोनों पोस्टें कुण्डलिनी विषय की आत्मा हैं। ये तीनों पोस्टें यदि क्रमवार पढ़ी जाएं, तो कुण्डलिनी विषय का विशेषज्ञ बना जा सकता है। अगर तीनों पर अमल भी किया जाए, तब तो कुण्डलिनी जागरण भी प्राप्त किया जा सकता है। इस पोस्ट में मैं यह बताने की कोशिश करूंगा कि कुण्डलिनी जागरण का सबसे आसान, कारगर और शीघ्र फलदायी तरीका क्या है? यौनयोग-सहायित कुण्डलिनी योग ही वह तरीका है।

पिछली पोस्ट में मैंने बताया कि वे छः महत्त्वपूर्ण कारक कौन से हैं, जिनके एकसाथ इकट्ठा होने से कुण्डलिनी जागरण होता है। इस पोस्ट में मैं यह बताऊंगा कि यौनयोग से वे छः कारक कैसे प्रवर्धित/बूस्ट होकर अति शीघ्रता से व आसानी से कुण्डलिनी को जागृत करते हैं।

तांत्रिक सैक्सुअल योगा (यौनयोग) से कुण्डलिनी ध्यान को बल

सैक्सुअल योगा के समय वज्र प्रसारण अपने चरम पर होता है। वज्र में भरपूर रक्त प्रवाहित हो रहा होता है। इससे वज्र-शिखा की संवेदना अपने चरम पर होती है। वज्र-शिखा ही तो वह मूलाधार चक्र है, जिस पर कुण्डलिनी शक्ति का निवास बताया गया है। वास्तव में जब वज्र शिथिल होकर नीचे लटका होता है, तब वज्र शिखा उस बिंदु को छू रही होती है, जिसे मूलाधार चक्र का स्थान बताया गया है। वह स्थान वज्र के आधार व मलद्वार को जोड़ने वाली रेखा के केंद्र में बताया गया है। फिर वज्र-शिखा की तीव्र संवेदना के ऊपर कुण्डलिनी-छवि का आरोपण किया जाता है। दोनों तांत्रिक प्रेमियों के यब-युम/yab-yum में जुड़े होने पर वह वज्र संवेदना लोटस के अन्दर ब्लोक हो जाती है, जिससे वह वीर्यपात के रूप में बाहर नहीं भाग पाती। दोनों एक-दूसरे के शरीर पर आगे और पीछे के चक्रों को हाथों से क्रमवार स्पर्श करके उन पर कुण्डलिनी का ध्यान करते हैं। उसके बाद सम्भोग क्रीड़ा के दौरान वज्र-संवेदना को चरम तक पहुँचाया जाता है। फिर योग-बंधों से उसे ऊपर उठाया जाता है। उससे संवेदना के साथ कुण्डलिनी एकदम से मस्तिष्क को कूद जाती है, और वहां तेजी से जगमगाने लगती है। साथ में वज्र शिथिल हो जाता है। उससे वीर्यपात भी रुक जाता है। ऐसा बार-२ करने से मस्तिष्क में कुण्डलिनी जीवंत जैसी हो जाती है। इसे प्राणोत्थान या कुण्डलिनी-उत्थान भी कहते हैं। इसी तरह, मिस्र वाली अन्खिंग विधि का भी प्रयोग किया जा सकता है। महिला में वज्र का काम क्लाईटोरिस करता है, क्योंकि वहीं पर सबसे बड़ी यौन-संवेदना पैदा होती है। बाकि अन्य काम महिला में पुरुष के समान ही किया जाता है। महिला में भी क्लाईटोरिस की संवेदना को चरम तक पहुंचा कर ऊपर चढ़ाया जाता है। उससे संवेदना के ऊपर आरोपित कुण्डलिनी भी ऊपर चढ़ जाती है। उससे रजोपात भी रुक जाता है, और पूर्ण यौन तृप्ति भी मिल जाती है।

तांत्रिक सैक्सुअल योग (यौनयोग) से प्राणों को बल

यह पहले से ही सिद्ध है कि कुण्डलिनी के साथ प्राण भी विद्यमान रहते हैं। यौनयोग से जब वज्र पर कुण्डलिनी प्रचंड हो जाती है, तब वहां प्राण भी खुद ही प्रचंड हो जाते हैं। जब उस कुण्डलिनी को सभी चक्रों तक ले जाया जाता है, तब प्राण भी खुद ही सभी चक्रों तक चले जाते हैं।

तांत्रिक सैक्सुअल योगा (यौनयोग) से इन्द्रियों की अंतर्मुखता को बल

सैक्सुअल योगा से पूरे शरीर में प्राणों का संचार हो जाता है। इससे शरीर व मन, दोनों स्वस्थ हो जाते हैं। इससे स्वस्थ विचार पैदा होते हैं, जिससे आनंद की अनुभूति होती है। इससे आदमी अपने तन-मन से ही संतुष्ट रहता हुआ बाहरी जगत के प्रति अनासक्त हो जाता है। इसी अनासक्ति को ही तो अंतर्मुखता कहते हैं। वह जरूरत के हिसाब से दुनियादारी चलाता तो है, पर उसमें उसके प्रति फालतू की छटपटाहट/क्रेविंग नहीं रहती। साथ में, यौनयोग से प्रचंड बने हुए उसके प्राण भी उसे दुनिया में निर्लिप्त रहने में मदद करते हैं।

तांत्रिक सैक्सुअल योगा (यौनयोग) से वीर्यशक्ति को बल

यदि सम्भोग ही नहीं किया जाए, तो वीर्य कैसे उत्पन्न होगा। यदि वीर्य ही उत्पन्न न होए, तो उसकी शक्ति कैसे प्राप्त की जा सकती है। इसका अर्थ है कि केवल सैक्सुअल योग से ही वीर्यशक्ति पैदा होती है, और वह कुण्डलिनी को प्राप्त होती है। साधारण सम्भोग से तो वीर्यशक्ति की बर्बादी होती है, और सम्भोग ही न करने से वीर्यशक्ति पैदा ही नहीं होती।

तांत्रिक सैक्सुअल योगा (यौनयोग) से ट्रिगर को बल

सैक्सुअल योगा से ट्रिगर के लिए संवेदनात्मकता/सेंसिटिविटी बहुत बढ़ जाती है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि सैक्सुअल योगा से मस्तिष्क में कुण्डलिनी पहले से ही बहुत मजबूत बनी होती है। उसे मामूली सी ट्रिगर चाहिए होती है। इसलिए हलकी सी व साधारण सी ट्रिगर भी काम कर जाती है।

उपरोक्त सभी छह कारकों के एकसाथ इकट्ठा होने से उत्पन्न कुण्डलिनी-जागरण (जिन्हें यौनयोग/सैक्सुअल योगा से प्रवृद्ध किया गया) के वास्तविक समय के अनुभव को पढ़ने के लिए निम्नलिखित लिंक पर जाएं।

प्रेमयोगी वज्र अपनी उस समाधि(कुण्डलिनीजागरण/KUNDALINI AWAKENING) का वर्णन अपने शब्दों में इस प्रकार करता है

Please click on this link to view this post in English (Kundalini awakening is possible for everyone only through sexual yoga assisted kundalini yoga)

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कुण्डलिनी जागरण- यह कैसे काम करता है

दोस्तो, क्वोरा पर कुण्डलिनी-जागरण के बारे में बहुत से प्रश्न पूछे जाते रहते हैं। मुख्य प्रश्न यही होता है कि कुण्डलिनी जागरण क्या होता है? बार-२ वही उत्तर दोहराना कुछ युक्तियुक्त सा नहीं लगता है। इसलिए मैंने निर्णय लिया कि इससे सम्बंधित एक वैबसाईट पोस्ट बनाई जाए, ताकि पाठकों को क्वोरा से इसकी ओर रिडायरेक्ट किया जा सके।

किसी को याद करना ही कुण्डलिनी जागरण है

तत्त्वतः तो ऐसा ही है। केवल याद करने के स्तर में ही भिन्नता होती है। कुण्डलिनी को इससे अधिक गहराई से याद नहीं किया जा सकता। जागरण की अवस्था में कुण्डलिनी दिल की गहराईयों में पूरी उतरी होती है। कुण्डलिनी जागरण के समय कुण्डलिनी आत्मा की गहराईयों में पूरी उतर चुकी होती है। वास्तव में कुण्डलिनी आत्मा से जुड़ जाती है। वह आत्मा से एकाकार हो जाती है। उस समय आत्मा उसे दूसरी वस्तु के रूप में नहीं देख पाता। उस समय आत्मा उसे अपने ही रूप में देखता है। आत्मा पूरी तरह से कुण्डलिनी-रूप बन जाता है। यहाँ याद किया गया व्यक्ति (गुर, देवता, प्रेमी आदि या सैद्धांतिक रूप से कुछ भी) ही कुण्डलिनी के रूप में होता है। आत्मा का अभिप्राय यहाँ आम आदमी का अपना निरपेक्ष व अंधकारमय स्वरूप है। वह रूप विचारों व अनुभवों से पूर्णतः रिक्त जैसा होता है। वह अंधकारमय शून्य जैसा होता है। वह माया या अज्ञान या भ्रम से ही अंधकारमय बना होता है। वास्तव में तो वह कुण्डलिनी की तरह ही प्रकाशमान होता है।

इसका मतलब है कि कुण्डलिनी-जागरण के समय आत्मा भी कुण्डलिनी के रूप में चमकने लगता है। इससे यह होता है की सभी कुछ अपने जैसा महसूस होने लगता है। कोई द्वैत नहीं रहता। सभी कुछ अद्वैत-रूप में प्रकाशित होने लगता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि कुण्डलिनी समेत सभी अनुभव स्वभाव से ही प्रकाशमान होते हैं। उस समय कुण्डलिनी के जुड़ने से आत्मा भी प्रकाशमान बन जाता है। विशाल अग्नि को अपनी एक लौ अपने से अलग कैसे लग सकती है? आत्मा को दुनिया के अनुभव / पदार्थ तब अपने से अलग लगते थे, जब वह कुण्डलिनी से नहीं जुड़ा था। उस समय उसे कुण्डलिनी भी अपने से अलग लगती थी। बेशक कुण्डलिनी का कितना ही ज्यादा ध्यान क्यों नहीं किया जाता था, कुछ न कुछ अलगाव तो उससे रहता ही था। एक अन्धकार से भरे कमरे को अपने अन्दर पैदा हुई एक आग की चिंगारी अपने जैसी कैसे लग सकती है? उसे तो वह अपने से अलग ही लगेगी न।

कुण्डलिनी जागरण आदमी को उसकी अपनी असली आत्मा की झलक दिखाता है। इससे वह योगसाधना आदि के निरंतर अभ्यास से उसे पूर्ण रूप से प्राप्त करने के लिए प्रेरित होता है।

कुण्डलिनी जागरण ज्यादा देर तक नहीं टिकता

कुण्डलिनी जागरण कुछ सेकंडों से ज्यादा समय तक नहीं झेला जा सकता। उस समय मस्तिष्क में विस्फोटक दबाव जैसा बना होता है। अधिकाँश मामलों में आदमी भय से या संकोच से कुण्डलिनी को स्वयं ही नीचे उतार देता है। यदि वह खुद न उतारे, तो कुछ देर में ही मस्तिष्क बहुत थक जाता है, और जागरण के अनुभव को खुद बंद कर देता है। फिर आदमी थकान के कारण आराम कर सकता है। संभवतः उसे नींद तो नहीं आती, क्योंकि वह उस समय आनंद, शान्ति, अद्वैत, और तनावहीनता से भरा होता है। उसका मस्तिष्क शून्य जैसा भी बन सकता है, जिसमें उसे विचार-शून्य असली आत्मा का अनुभव भी हो सकता है।

कुण्डलिनी जागरण की अवधि व्यक्ति के अभ्यास, मनोबल, शारीरिक बल, आयु, सामाजिक स्थिति आदि के ऊपर भी निर्भर कर सकती है। पर इसे एक मिनट से ज्यादा समय तक जारी रखना असंभव सा ही लगता है।

कुण्डलिनी जागरण के बारे में भ्रम

बहुत से लोग कुण्डलिनी-ध्यान को और प्राणोत्थान (कुण्डलिनी-उत्थान) को ही कुण्डलिनी जागरण समझ लेते हैं। यह भ्रम स्वाभाविक ही है, क्योंकि पूर्वोक्तानुसार सभी स्वभाव से समान ही हैं, और इन सभी स्थितियों में कुण्डलिनी का स्मरण या चिंतन विद्यमान होता है। केवल स्मरण के स्तर में ही अंतर होता है। साधारण कुण्डलिनी-ध्यान में यह स्मरण सबसे कम होता है। प्राणोत्थान में यह स्मरण और अधिक होता है। कुण्डलिनी-जागरण में यह सर्वोच्च होता है। जहां साधारण कुण्डलिनी ध्यान व प्राणोत्थान वाला कुण्डलिनी ध्यान लम्बे समय तक (घंटों से दिनों तक) लगातार जारी रखा जा सकता है, वहीँ कुण्डलिनी जागरण को एक मिनट से ज्यादा अवधि तक जारी नहीं रखा जा सकता। जहां साधारण कुण्डलिनी ध्यान और प्राणोत्थान वाले कुण्डलिनी ध्यान को अपनी इच्छा व अभ्यास से कभी भी पैदा किया जा सकता है, वहीँ कुण्डलिनी जागरण को इच्छानुसार पैदा नहीं किया जा सकता। कुण्डलिनी जागरण स्वयं होता है, और बिना बताए होता है। जब बहुत सी अनुकूल परिस्थितियाँ इकट्ठी होती हैं, तभी यह होता है। साथ में, इसको पैदा करने के लिए एक मानसिक झटका देने वाला उत्तेजक या उद्दीपक (ट्रिगर) भी होना चाहिए। वास्तव में आदमी इसके होने के बारे में कोई पूर्वानुमान नहीं लगा पता। यह तब होता है, जब आदमी को इसके होने के बारे में जरा भी अंदेशा नहीं होता। परन्तु साथ में यह भी सत्य है कि यह कुण्डलिनी ध्यान और प्राणोत्थान की अवस्था में ही होता है, और ये व्यक्तिगत व परिवेशीय परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न अरसे से (महीनों से लेकर वर्षों की अवधि तक) जारी रखे हुए होने चाहिए।

प्राणोत्थान के बारे में विस्तृत जानकारी निम्नलिखित पोस्ट पर पढ़ी जा सकती है।

प्राणोत्थान व कुण्डलिनी-जागरण के बीच में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है। दोनों के बीच में केवल अभिव्यक्ति के स्तर का ही अंतर है। इसीलिए कई अति महत्त्वाकांक्षी लोग प्राणोत्थान को ही कुण्डलिनी जागरण समझ लेते हैं। पूर्णता को प्राप्त प्राणोत्थान ही कुण्डलिनी जागरण कहलाता है …….

प्राणोत्थान- कुण्डलिनी जागरण की शुरुआत

कुंडली जागरण के वास्तविक समय के अनुभव को जानने के लिए निम्नलिखित वेबपेज पढ़ा जा सकता है।

शक्तिशाली फरफराहट के साथ, जैसे वह अनुभव ऊपर की ओर उड़ने का प्रयास कर रहा था। अतीव आनंद की स्थिति थी। वह आनंद एकसाथ अनुभव किए जा सकने वाले सैंकड़ों यौनसंबंधों से भी बढ़ कर था। सीधा सा अर्थ है कि इन्द्रियां उतना आनंद उत्पन्न कर ही नहीं सकतीं। मेरी कुण्डलिनी पूरी तरह से प्रकाशित होती हुई, सूर्य का मुकाबला कर रही थी …..

प्रेमयोगी वज्र अपनी उस समाधि(कुण्डलिनीजागरण/KUNDALINI AWAKENING) का वर्णन अपने शब्दों में इस प्रकार करता हैैं

अगली पोस्ट में हम यह बताएँगे कि कुण्डलिनी जागरण के लिए दिमाग में किन 5 चीजों का एकसाथ इकट्ठा होना जरूरी है।     

कुण्डलिनी विषय के दिल तक पहुँचने के लिए कृपया अगली दोनों पोस्टें क्रमवार जरूर पढ़ें

Please click on this link to view this post in English (Kundalini awakening- How it works)

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कुण्डलिनी के लिए उचित विधि से बैठना

मित्रो, कुछ दिनों पहले मुझे माता वैष्णो देवी तीर्थ जाने का सुनहरा मौका मिला। इसके बारे में महत्त्वपूर्ण बातें मैं आगे बताऊंगा। परन्तु एक बात जो मैंने नई जानी, वह समुचित विधि से बैठने के बारे में थी। उस यात्रा के दौरान मेरी कुण्डलिनी उछालें मार रही थी।

डंडे की तरह सीधी पीठ रखने को बैठने की उचित विधि नहीं कहते

पहले मैं समझा करता था कि पीठ डंडे की तरह सीधी होनी चाहिए। वास्तव में ऐसा नहीं है। पीठ में सामान्य मोड़ अपनी पूरी गहराई में रहने चाहिए। पीठ की समुचित स्थिति एक नाग की तरह होती है, जैसे की मैंने पिछली पोस्ट में विस्तार से वर्णित किया है। इसमें नाभि की सीध में, पीठ पर एक गड्ढा सा बनता है। फिर पीठ बाहर को आती हुई ऊपर जाती है। अंत में सिर का अन्दर की ओर को झुका हुआ मोड़ आता है। नाभि की सीध में पीछे, पीठ पर जितना गहरा गड्ढा बनेगा, पीठ उतनी ही अधिक सीधी मानी जाएगी। इससे इसके नीचे (हिप पर), पीठ वाले स्वाधिष्ठान चक्र पर एक खिंचाव/ऐंठन सी बनेगी, जहाँ कुण्डलिनी चमकेगी। वास्तव में ऐसी पीठ के सभी चक्रों पर कुण्डलिनी बखूबी चमकेगी। पीठ का नाग के रूप में ध्यान करने से यह खिंचाव प्रत्येक चक्र पर कुण्डलिनी के साथ प्रकट होता है। एक ऊपर की तरफ को खिंचाव भी महसूस होता है।

कार की ड्राईविंग सीट से सही ढंग से बैठने की सीख

ज्यादातर आधुनिक कारों की ड्राईविंग सीट (बकेट सीट) टाईट जैसी होती है। उसमें कम से कम जगह में शरीर को फिट करना पड़ता है। शरीरविज्ञान के अनुसार, यदि आदमी अपनी पीठ को उसके कुदरती पोस्चर में जितना अधिक ले जाएगा, उसके शरीर की मांसपेशियों की टोन (मजबूती) उतनी ही अधिक बढ़ेगी। साथ में, स्वस्थ सांस/पेट से सांस भी सुधरेगा। उससे वह छोटी सी जगह में भी अच्छी तरह से व आराम से अपने शरीर को, विशेषकर अपनी टांगों को एडजस्ट कर पाएगा।

ड्राईविंग सीट पर मेरी कुण्डलिनी

मेरे पास मध्यम आकार की कार थी। कार तो वह सर्वोत्तम थी, पर उसकी ड्राईविंग सीट मुझे कुछ टाईट लगती थी। एक कुदरती व कम्पेनसेटरी प्रक्रिया/प्रेरणा से मैं उस सीट पर अपनी पीठ सीधी रखने लगा। मैं अपनी पीठ के उपरोक्त लम्बर क्षेत्र के गड्ढे वाले स्थान पर एक फोल्ड किया हुआ तौलिया रखने लगा। उस तौलिए से उस गड्ढे को सहारा मिलता था, और गड्ढे के सुखद स्पर्श का अनुभव भी होता था। उस पिट पॉइंट पर मेरी कुण्डलिनी भरपूर चमकती थी, जो बीच-२ में सहस्रार से लेकर मूलाधार तक सभी पिछले चक्रों पर दौड़ती रहती। बहुत आनंद आता, शान्ति मिलती, और लगता कि असली ड्राईविंग वही थी। मुझे ऐसा लगता था कि मैं एक फाईटर प्लेन के कोकपिट में फिट रहता था। शुरू-२ में मुझे लगा था कि टाईट सीट वाली महँगी कार मैंने क्यों ले ली थी, पर बाद में असलियत का पता चला। संभवतः उसी सीटिंग से प्रभावित होकर मुझे कुण्डलिनी योग का अभ्यास शुरू करने की प्रेरणा मिली।

एक अच्छे कुर्सी-मेज की सहायता से अनूठा कुण्डलिनी योग

एक उचित आकार-प्रकार की कुर्सी बहुत लाभदायक होती है, जिसमें पूरी पीठ अपनी कुदरती स्थिति की पूरी गहराई में स्थिर रह सके। उसमें उचित उभार का लम्बर सपोर्ट उचित स्थान पर हो। उसमें उचित स्थान पर हेडरेस्ट हो। हेडरेस्ट लगभग गर्दन की सिधाई में सीधा ऊपर होना चाहिए। मामूली सा टिल्ट पीछे की ओर दिया जा सकता है। वास्तव में उस कुर्सी पर रखी हुई पीठ एक पण उठाए हुए नाग से पूरी तरह से मेल खाती होनी चाहिए। आर्म्स रेस्ट उस उंचाई पर होने चाहिए, जहाँ पर सीधी बाजू की कोहनी/एल्बो होती है। वे सीधे आगे की और होने चाहिए। टांगों में घुटनों की तरफ चढ़ाई होनी चाहिए, ताकि घुटनों का स्तर हिप के स्तर से अधिक उंचाई पर हो। कई लोग बोलते हैं कि इससे घुटनों में दर्द होता है। इससे बचने के लिए टांगों की स्लोप को कुछ घटाया जा सकता है, या घुटनों को एक्सरसाईज से मजबूत किया जा सकता है। टांगें आगे को नहीं फैली होनी चाहिए, क्योंकि इससे पीठ की कुदरती शेप बिगड़ती है। टांगें जितना अधिक शरीर की ओर सिकुड़ी होंगी, उतनी ही अधिक मजबूती कुदरती पीठ को मिलेगी। कार की सोच-समझ कर बनाई गई ड्राईविंग सीट बिलकुल ऐसी ही होती है। इसी आसन से आदमी सर्वाधिक सतर्क व माईंडफुल रहता है। कुण्डलिनी भी इसी आसन से मजबूत होती है। इससे यह भी सिद्ध हो जाता है कि कुण्डलिनी से आदमी सतर्क, मननशील व विकासशील बनता है।

अब मेज की बात करते हैं। अच्छा हो, अगर एडजस्टेबल हाईट का टेबल हो। टेबल इतनी ऊँचाई पर होना चाहिए ताकि पीठ की कुदरती स्थिति न बिगड़े, और उस पर रखी पुस्तक को पढ़ते समय आँखों पर भी बोझ न पड़े। यह उंचाई सीधी बाजू की कोहनी के स्तर तक होती है। कुर्सी भी एडजस्टेबल/हाईड्रोलिक हो तो ज्यादा अच्छा है।

प्रेमयोगी वज्र के साथ भी ऐसा ही अनूठा वाकया हुआ था। उपरोक्त प्रकार का कुर्सी-मेज का जोड़ा उसने एक छोटे से कमरे में फिट करवा दिया था। वह हल्का, सस्ता, कामचलाऊ, पुराने जमाने का व टिन का बना था। फिर भी उससे उसकी पीठ का उचित पोस्चर विकसित हो गया। वह दिन-रात उस पर बैठकर लगातार अध्ययन करता। उससे उसका अध्ययन भी उत्कर्ष तक पहुंचा, और उसकी कुण्डलिनी भी।

उचित पीठ से बैठने का वैज्ञानिक आधार

संभवतः कुदरती पीठ से बैठने से मेरुदंड पूर्णतः रिलेक्सड व कार्यक्षम रहता है। मेरुदंड से ही सभी संवेदनाएं ऊपर-नीचे ट्रेवल करती हैं। वैज्ञानिक तौर पर, कुण्डलिनी शरीर की सर्वोच्च संवेदना ही होती है।

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