कुण्डलिनी से रचनात्मक संकल्पों की उत्पत्ति ही भगवान् नारायण (विष्णु) के नाभि कमल से ब्रम्हा (ब्रम्हदेव) की उत्पत्ति बताई गई है

यह प्रमाणित किया जाता है कि हम किसी भी धर्म का समर्थन या विरोध नहीं करते हैं। हम केवल धर्म के वैज्ञानिक और मानवीय अध्ययन को बढ़ावा देते हैं।

दोस्तों, इस हफ्ते मैं कुछ राईटर-ब्लोक को महसूस कर रहा था। फिर हफ्ता ख़त्म होने को आते ही मुझे अपनी मानवीय जिम्मेदारी का अहसास हुआ। हम सभी को अच्छी, सच्ची और वैज्ञानिक बातों का प्रचार-प्रसार करना चाहिए। यह हम सभी का फर्ज है। हिन्दुवाद कोई धर्म नहीं है। यह एक शुद्ध विज्ञान है। यह मानवतावादी विज्ञान है। यह कुण्डलिनी विज्ञान है। यह आध्यात्मिक मनोविज्ञान है। क्योंकि शरीर और संसार मन के ही अधीन हैं, इससे सिद्ध होता है कि हिन्दुवाद एक भौतिक विज्ञान भी है। इसकी अनेक बातें विज्ञान की कसौटी पर खरी उतरी हैं। सैंकड़ों सालों से विभिन्न कट्टर धर्मवादियों व अधर्मवादियों द्वारा इसे नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। आज तो वे इसे जड़ से उखाड़ने के लिए चारों और से एकजुट हो गए हैं। इस्लामिक राष्ट्र बनने का तेजी से बढ़ रहा ख़्वाब इसका एक जीता-जागता उदाहरण है। इसी तरह, विभिन्न धर्मों (इसाई धर्म समेत) द्वारा जबरदस्ती या छलपूर्वक धर्मांतरण इसका दूसरा उदाहरण है। भारत में ये दोनों प्रकार के हिन्दूविरोधी वैचारिक अभियान (एजेंडे) हाल के वर्षों में तेजी से बढ़े हैं। हाल ही में शरजिल इमाम (जेएनयू में आईआईटी ग्रेजुएट और पीएचडी स्कोलर) ने अपने भड़काऊ भाषण के बाद पुलिस के सामने बिना पछतावे के ये बातें कबूली भी हैं।  यदि समय रहते हुए हमने हिन्दुवाद को विज्ञान के साथ प्रस्तुत नहीं किया, तो हमारी आने वाली पीढियां इससे वंचित रह सकती हैं।

हिन्दुवाद का सभी कुछ कुण्डलिनी आधारित है। सारा हिन्दुवाद कुण्डलिनी के चारों और घूमता है। कुण्डलिनी ही इसकी धुरी में है। कुण्डलिनी की प्राप्ति के लिए ही पूरा हिन्दुवाद समर्पित है। इसी प्रकार का एक वैज्ञानिक तथ्य है, कुण्डलिनी और ब्रह्मा-विष्णु के बीच का वैज्ञानिक अंतर्संबंध। इसे हम इस पोस्ट में वर्णित करेंगे।

भगवान् विष्णु/नारायण ही कुण्डलिनी के रूप में हैं

जैसे कि मैंने पूर्व में भी वर्णित किया है कि जैसे भगवान् विष्णु शेषनाग पर शयन करते हैं, उसी प्रकार कुण्डलिनी भी तंत्रिका तंत्र (शेषनाग जैसी आकृति वाले) में विराजमान रहती है। नारायण ही कुण्डलिनी हैं, कुण्डलिनी ही नारायण है। दोनों एक ही हैं। अब चाहे उसे सुवर का, मछली का, कछुए का, देवता का, प्रेमी का, गुरु का आदि किसी का भी रूप दिया जाए। वैसे भी नारायण ने ऐसे अनेकों रूपों में अवतार लिया भी है।

रचनात्मक विचार व संकल्प ही भगवान् ब्रह्मा/ब्रह्मदेव के रूप में हैं

यह वेदों में साफ लिखा है कि सृष्टि के मन को ही ब्रह्मा कहते हैं। वह रचनात्मक समष्टि-मन/ब्रह्मांडीय मन, जिसने इस सृष्टि का निर्माण किया है, वही ब्रह्मा है।

कुण्डलिनी से रचनात्मक विचार व संकल्प उत्पन्न होते हैं

जो विचार क्रिया के रूप में प्रकट हो जाएं, वे संकल्प कहलाते हैं। शक्तिशाली विचार को ही संकल्प कहते हैं। एक अकेला व कार्यकारी विचार तभी संकल्प बन सकता है, जब मन में अन्य विचारों का शोरशराबा न हो। मतलब कि जब मन शांत हो। तब मन की शक्ति उस अकेले विचार को लगती है, जिससे वह पुष्ट होकर संकल्प बन जाता है, और रचनात्मक काम को पैदा करता है। मन की शान्ति कुण्डलिनी से ही प्राप्त होती है। यह देखा भी गया है कि बहुत से लोगों की कामयाबी के पीछे कुण्डलिनी ही होती है। किसी गुरु, प्रेमी आदि से प्रेरणा लेकर कामयाबी प्राप्त करने का भी यही अर्थ है कि गुरु आदि की छवि आदमी के मन में लगातार बसी रही। वह चिरस्थायी मानसिक छवि ही तो कुण्डलिनी है। इसका मतलब है कि प्रेरणा से कामयाबी भी कुण्डलिनी के माध्यम से ही मिलती है। ऐसा मैंने खुद अनुभव किया है। वैज्ञानिक तौर से भी सिद्ध हो गया है कि योग (कुण्डलिनी) रचनात्मकता को बढ़ाता है।

कुण्डलिनी की नाभि में ही विचार व संकल्प पैदा होते हैं

नाभि केंद्र को कहते हैं। कुण्डलिनी के ध्यान के साथ विविध नए-पुराने विचार प्रकट होते हैं। उनमें से फालतू विचार शांत हो जाते हैं। उससे लाभदायक विचार ताकतवर बनकर संकल्प बन जाते हैं। इसी प्रकार भगवान् नारायण की नाभि से भगवान् ब्रह्मा (संकल्प-रूप) उत्पन्न होते हुए बताए गए हैं। जब मैं रचनात्मक कामों में व्यस्त रहता था, तब मुझे अपनी कुण्डलिनी से बहुत सहयोग मिलता था। इस प्रकार सिद्ध हो जाता है कि पुराणों में जो भगवान् विष्णु की नाभि से ब्रह्मा की उत्पत्ति बताई गई है, वह कुण्डलिनी से उत्पन्न रचनात्मकता की ही व्याख्या की गई है। ऐसा दोनों मामलों में होता है, क्योंकि जो हमारे शरीर में घटित हो रहा  है, वह सभी कुछ ब्रह्माण्ड में भी वैसा ही घटित हो रहा है।

only indicative image (केवल संकेतात्मक चित्र)

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ਇਸ ਪੋਸਟ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬੀ ਵਿਚ ਪੜ੍ਹਨ ਲਈ ਇੱਥੇ ਕਲਿੱਕ ਕਰੋ (ਕੁੰਡਲਨੀ ਤੋਂ ਰਚਨਾਤਮਕ ਮਤਿਆਂ ਦੀ ਪੈਦਾਈਸ੍ਹ ਭਗਵਾਨ ਨਾਰਾਇਣ (ਵਿਸ਼ਨੂੰ) ਦੇ ਨਾਭੀ ਕੰਵਲ ਤੋਂ ਬ੍ਰਹਮਾ (ਬ੍ਰਹਮਦੇਵਾ) ਦੀ ਪੈਦਾਈਸ੍ਹ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਦੱਸੀ ਗਈ ਹੈ।)

इसाई धर्म में कुण्डलिनी

पवित्र आत्मा के साथ बैपटिस्म का अर्थ है कुंडलिनी सक्रियण

कुण्डलिनी और होली स्पिरिट एक ही वस्तु-विशेष के दो नाम हैं। इसाई धर्म में होली स्पिरिट के साथ बैप्टिस्म का वर्णन आता है। इसी तरह हिन्दू धर्म में कुण्डलिनी की क्रियाशीलता व जागरण का वर्णन आता है। मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि होली स्पिरिट व कुण्डलिनी, दोनों एक ही चीज को दर्शा रहे हैं। इस बात को हम निम्नलिखित वैज्ञानिक तर्कों से भी सिद्ध कर सकते हैं।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों भगवान की क्रिया शक्ति हैं

होली स्पिरिट को ईश्वर की चलायमान शक्ति कहा गया है। इसी तरह कुण्डलिनी को भी जीवनी शक्ति कहा गया है। जैसे ईश्वर अपनी शक्ति को होली स्पिरिट के रूप में किसी भी स्थान पर प्रोजेक्ट करके उस शक्ति से अपनी इच्छा पूरी करवाता है, उसी तरह वह कुण्डलिनी के माध्यम से भी अपनी शुभ इच्छा पूरी करवाता है।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों के नाम समान हैं

जैसे होली स्पिरिट को सांस, हवा, जीवन-धारियों में सबसे महत्त्वपूर्ण या प्राणशक्ति, देवता या फरिश्ते के रूप में पर्सोनीफाईड आदि नाम दिए गए हैं; उसी तरह से कुण्डलिनी को भी ये सभी नाम दिए गए हैं। जिस तरह होली स्पिरिट को गॉड का हाथ या अंगुली कहा गया है, उसी तरह कुण्डलिनी शक्ति को भी भगवान् शिव का क्रियात्मक अंश या आधा शरीर कहा गया है।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों को समान रूप प्रदान किया गया है

इसाई धर्म में कहा गया है कि गॉड अपनी होली स्पिरिट की सहायता से बहुत से महान कार्य करता व करवाता है। उदाहरण के लिए, सृष्टि का निर्माण, बाईबल की रचना, पुराने समय के महान लोगों व उपदेशकों के द्वारा किए गए आश्चर्यजनक काम। इसी तरह से कुण्डलिनी भी महान कार्य करती व करवाती है। इसी धर्म के अनुसार होली स्पिरिट किसी मानव-रूप में नहीं है, परन्तु उसे अन्य चीजों की तरह मानवीकृत किया गया है। इसी तरह कुण्डलिनी को भी एक देवी या सर्पिणी का रूप दिया गया है, हालांकि इसका कोई भौतिक रूप नहीं है।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों मानसिक छवि के रूप में हैं

होली स्पिरिट एक सहायक है, जिसे क्रिस्ट के नाम से भेजा गया है, जो क्रिस्ट के फोलोवर्स को सभी चीजें सिखाएगी, और उन्हें क्रिस्ट की टीचिंग्स की याद दिलाएगी। इसका अर्थ है कि क्रिस्ट का नाम जपने से मन में क्रिस्ट की छवि बस जाएगी, जो होली स्पिरिट बन जाएगी। कुण्डलिनी भी तो इसी तरह गुरु, देवता आदि के ध्यान से विकसित होती है।

Holy spirit and Kundalini, both teach us the same thing

होली स्पिरिट सिखाती है कि क्रिस्ट वास्तव में कौन है। अर्थात होली स्पिरिट अद्वैत का साक्षात्कार करवाती है। क्रिस्ट का रूप भी अद्वैतवान ही है। ऐसा ही अद्वैत कुण्डलिनी से भी तो उत्पन्न होता है।

होली स्पिरिट बाईबल को समझना आसान कर देती है। होली स्पिरिट वही सिखाती है, जो बाईबल में है। होली स्पिरिट बाईबल का स्मरण करवाती है। इसी तरह का काम कुण्डलिनी से भी होता है, व उसको जान लेने से भी सभी धार्मिक ग्रन्थ स्वयं ही, बिना पढ़े ही जाने हुए बन जाते हैं।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों एक आदमी में समान गुण पैदा करते हैं

होली स्पिरिट पापों से लड़ने की शक्ति देती है। इसी तरह, कुण्डलिनी भी पुराने पापों को नष्ट करती है, और नए पापों को पनपने नहीं देती। होली स्पिरिट को प्राप्त करने वाला आदमी स्पिरिट में ही स्थित रहता है, और माँसमय शरीर की लिप्सा को पूरा नहीं करता। इसका मतलब है कि वह ननड्यूल व अनासक्त हो जाता है। कुण्डलिनी भी आदमी को अद्वैतशील व अनासक्त बना देती है। होली स्पिरिट भी कुण्डलिनी की तरह ही हमारे दिल में रहना चाहती है। इसका अर्थ है कि दोनों से ही बहुत गहरा प्यार हो जाता है, क्योंकि दोनों की याद निरंतर बनी रहती है। होली स्पिरिट व कुण्डलिनी, दोनों ही हमारा मार्गदर्शन करती हैं।

होली स्पिरिट या कुण्डलिनी बहुत बड़े बोझ व प्रतिकूलता को भी सहने की शक्ति देती है। दोनों ही नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर ले जाती हैं, तथा दोनों से पड़ौसी खुश रहते हैं। हिन्दू-ग्रंथों में भी आता है कि कुण्डलिनी-योगी के सभी लोग प्रेमी मित्र बन जाते हैं, कोई उसका शत्रु नहीं रहता। वाक इन स्पिरिट का अर्थ है कि डैविल द्वारा आप मिसगाईड न किए जाएं, और हमेशा होली स्पिरिट के आज्ञाकारी बने रहें। इसी तरह कुण्डलिनी-योगी के लिए भी निरंतर कुण्डलिनी-ध्यान करना जरूरी माना गया है।

होली स्पिरिट में चलते रहने के वही लाभ मिलते हैं, जो कुण्डलिनी से उत्पन्न रूपांतरण से मिलते हैं। गॉड ने हमें डर की स्पिरिट (सामान्य द्वैतपूर्ण सोच) नहीं दी है, अपितु शक्ति, प्रेम, व स्वस्थ मन (अद्वैतपूर्ण व अनासक्त भाव) की स्पिरिट दी है। कुण्डलिनीयोग भी यही कहता है।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों एक आदमी में समान रहस्यमय अनुभव पैदा करते हैं

होली स्पिरिट के प्रवेश का अनुभव भी कुण्डलिनी-जागरण के अनुभव के सामान हो सकता है। दोनों के अनुभव रहस्यात्मक हैं। उदाहरण के लिए, पूरे शरीर में एक करंट के या सुनहरे जल के दौड़ने के साथ अनंत ख़ुशी का अनुभव। गिफ्ट ऑफ़ टंग भी प्राप्त हो सकता है। यह कुण्डलिनीयोग की वाक्-सिद्धि की तरह ही है, जिसमें कही गई बात सच हो जाती है। कुण्डलिनी के एक्टिवेशन की तरह ही होली स्पिरिट का एक्टिवेशन साईलेंट रूप में भी हो सकता है।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों समान कारणों के कारण सक्रिय होते हैं

अब होली स्पिरिट के बैप्टिस्म व कुण्डलिनी जागरण के लिए जिम्मेदार कारणों के बीच समानता पर विचार करते हैं। जब कोई अपने अपराध पर पश्चाताप करता है, तब होली स्पिरिट एक्टिवेट हो जाती है। योग के अनुसार भी जब कोई आदमी अपने बीते जीवन को अपनी यादों में बार-२ साक्षीभाव के साथ उजागर करता है, तब स्वयं ही अच्छा पश्चाताप हो जाता है। उससे कुण्डलिनी क्रियाशील हो जाती है। जब कोई अपने को गॉड या क्रिस्ट के समर्पित कर देता है, तब होली स्पिरिट एक्टिवेट हो जाती है। योग में भी ईश्वर-समर्पण व कुण्डलिनी के प्रति समर्पण को सबसे अधिक महत्त्व दिया गया है।

यहां तक कि भगवान या देवता को याद करने से भी होली स्पिरिट या कुंडलिनी सक्रिय हो जाती है। मैंने हमेशा खुद इसको स्पष्ट रूप से अनुभव किया है। जब भी मैंने शरीरविज्ञान दर्शन की मदद से अद्वैतवादी होने की कोशिश की है, तब-2 मुझे कुंडलिनी का अनुभव हुआ है। ईश्वर अद्वैत का ही एक आधिकारिक नाम है। दोनों नाम एक ही चीज को दर्शाते हैं। मैं पहले से ही अनुभवात्मक रूप से साबित कर चुका हूं कि अद्वैत और कुंडलिनी हमेशा साथ-2 रहते हैं। यह वह इसाई धर्म-सम्मत बिंदु है, जहां से ईश्वर और पवित्र आत्मा (होली स्पिरिट/कुण्डलिनी) के बीच संबंध उपजा है। इसके अतिरिक्त, मैंने खुद भी अनुभव किया है कि अगर किसी भी चीज को बार-बार याद किया जाता है, तो वह चीज कुंडलिनी बन जाती है। उसी आधार पर, ईसा मसीह और बाइबल को बार-बार याद करने से वे पवित्र आत्मा / होली स्पिरिट के रूप में उपलब्ध हो जाते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि पवित्र आत्मा वही सिखाती है, जैसा कि ईसा मसीह और बाइबल ने सिखाया है, क्योंकि ये तीनों एकसमान ही हैं। उसी प्रकार, गुरु, देवता, या वेद-पुराणों का स्मरण करने से वे कुंडलिनी के रूप में प्रकट हो जाते हैं।

होली स्पिरिट को प्राप्त करने के लिए नया जन्म लेना पड़ता है। इसी तरह कुण्डलिनी को क्रियाशील करने के लिए योग-साधना के द्वारा रूपांतरित होना पड़ता है। नया जन्म क्रिस्ट से सम्बंधित होना चाहिए। इसका मतलब यह है कि योग के अनुसार रूपांतरण सकारात्मक होना चाहिए, नकारात्मक नहीं। इसका यह अर्थ भी है कि घर में शुरू से लेकर आध्यात्मिक माहौल होना चाहिए। वैसे भी कुण्डलिनी-जागरण के बाद पुनर्जन्म की तरह रूपांतरण होता है। ब्रेन में नए सरकट बनते हैं।

होली स्पिरिट की आज्ञा को मानना चाहिए। यह कुण्डलिनी योग के महत्त्व को रेखांकित करता है। जो योगी कुण्डलिनीयोग के माध्यम से कुण्डलिनी का बारम्बार स्मरण कर रहा है, वह उसकी आज्ञा का पालन करने के लिए हरदम तैयार ही तो है। होली स्पिरिट की प्राप्ति के लिए बिलीव करना अति आवश्यक है। कुण्डलिनीयोग के माध्यम से कुण्डलिनी के निरंतर स्मरण का मतलब ही यह है कि योगी का कुण्डलिनी के प्रति अपार विश्वास है।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों हमेशा उपलब्धियां प्रदान नहीं करती हैं

होली स्पिरिट में बैप्टिस्म या सैल्वेशन के प्रत्येक मामले में ‘स्पीकिंग ऑफ़ टंग’ की प्राप्ति नहीं होती। यह ऐसा ही है, जैसे कि कुण्डलिनी जागरण व मोक्ष के लिए सिद्धियाँ जरूरी नहीं हैं।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी के बीच संघर्ष गलतफहमी के कारण दिखाई देता है

अब हम कुण्डलिनी व होली स्पिरिट की एकरूपता का विरोध करने वाली बातों पर विचार करते हैं। होली स्पिरिट बाहर से आती है, परन्तु कुण्डलिनी शरीर के अन्दर ही होती है। ऐसा इसलिए है ताकि क्रिश्चियनिटी में योग के प्रसार पर रोक लग सके। योग का दुरुपयोग हो सकता है, जिस कारण उससे कर्महीनता व आलस्य का प्रसार हो सकता है। यह भी संभव है कि आत्मज्ञान व उस जैसे अनुभव को ही होली स्पिरिट का प्रवेश कहा गया हो। आत्मज्ञान बाहर से अर्थात ईश्वर से आता है, जबकि कुण्डलिनी-जागरण अपने अन्दर के प्रयास से उपलब्ध होता है। आत्मज्ञान के बाद कुण्डलिनी या होली स्पिरिट स्वयं ही विकसित हो जाती है, और निरंतर बनी रहती है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी ऐसा ही हुआ था। इसी तरह, ईश्वर से प्रार्थना व उसके प्रति समर्पण से कई प्रकार के अलौकिक अनुभव होते हैं, जैसे कि पूर्वोक्तानुसार शरीर में बहते हुए करंट या प्रकाश की नदी का अनुभव। ऐसे अनुभवों से भी कुण्डलिनी या होली स्पिरिट क्रियाशील हो जाती है।

मानवीय कर्म व प्रेम से कुण्डलिनी या होली स्पिरिट शरीर के अन्दर प्रविष्ट होती है। तभी तो इसाई धर्म में मानवता व प्रेम पर सर्वाधिक बल दिया गया है।

साथ में, ईसाई धर्म में 12 फलों वाले जीवन-वृक्ष का उल्लेख है। यह फ्रक्टिफाइड ट्री 7-12 चक्रों के साथ रीढ़ की हड्डी ही है।

एक ही उद्देश्य के साथ ईसाई और हिंदू धर्म दोनों में द्वैतवाद है

क्रिश्चियनिटी में गॉड व सृष्टि के बीच में द्वैत का भाव है। ऐसा केवल इसलिए है ताकि गॉड को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया जा सके, जिससे उसमें मजबूत विश्वास पैदा हो जाए। हिंदू धर्म भी यह कहता है कि भगवान इस दुनिया के समान है, और साथ ही अलग भी है। वास्तव में अद्वैत ही सत्य है। क्योंकि जो अच्छी आदतें होली स्पिरिट के बैप्टिस्म के बाद विकसित होती हैं, वे केवल अद्वैत से ही उत्पन्न होती हैं।

ईसाई धर्म और हिंदू धर्म, दोनों में बुरी आत्मा है

कई लोग सोचते हैं कि योग में क्रिश्चियनीटी की तरह इविल स्पिरिट नहीं है। परन्तु यह सत्य नहीं है, क्योंकि योग में भी ‘माया’ नाम से इविल स्पिरिट को स्वीकार किया गया है, जो योगी को साधना व शुभ प्रयासों से विचलित करती रहती है।

सभी धर्म मूल रूप से समान हैं

वास्तव में चीज एक ही है, जिसे हम ऑब्जेक्ट ऑफ़ मेडिटेशन या ध्येय वस्तु कहते हैं। इसाई धर्म में इसे प्राकृतिक, सांसारिक व साधारण-संक्षिप्त रूप में बखान किया गया है; जबकि हिन्दू धर्म में त्यागपूर्णता, कृत्रिमता व दार्शनिक साज-सज्जा के साथ। परन्तु दुर्भाग्य से बहुत से लोग इस दार्शनिक विस्तार में असली, व्यावहारिक, व मूल वस्तु को भूल जाते हैं। इससे धर्मों में विभिन्नता प्रतीत होती है, परन्तु वास्तव में सभी धर्म मूल रूप से एकसमान हैं, और सभी मानवता व प्रेम के पक्ष में हैं।

ईसाई धर्म और हिंदू धर्म का मिश्रण आध्यात्मिक सफलता प्राप्त करने के लिए सबसे तेज है

अब मैं इसाई धर्म व हिंदु धर्म के मिश्रण के बारे में बात करता हूँ। पहले आदमी इसाई धर्म की नीति के अनुसार कर्मयोग से अपनी कुण्डलिनी को विकसित करे। फिर जब उसकी उम्र बढ़ जाए, वह मानवीय रूप से संसार को समृद्ध कर ले, तथा कुण्डलिनी में निपुण हो जाए; तब उसकी पदोन्नति कुण्डलिनीयोग में हो जाए। तब वह समर्पित व बैठकपूर्ण कुण्डलिनीयोग पर अधिक ध्यान दे, ताकि उसकी कुण्डलिनी और अधिक परिपक्व होकर जागृत हो जाए। प्रेमयोगी वज्र ने भी ईश्वरीय प्रेरणा से ऐसा ही किया था, जिससे उसे अतिशीघ्र कुण्डलिनीजागरण का अनुभव हो सका था। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि सभी धर्मों में वह सभी कुछ है, जो अन्य धर्मों में भी है। कई धर्मों में उनका संकेतों में वर्णन है, तो कई धर्मों में विस्तार से।

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