कुंडलिनी और इस्लाम~कुंडलिनी जिन्न, सलत या नमाज योग, अल्लादीन योगी,  चिराग आज्ञा चक्र, व शरीर बोतल है, और आँखें आदि इन्द्रियां उस बोतल का ढक्कन हैं

मित्रो, मैं पिछले लेख में बता रहा था कि कैसे अच्छे लेखक के लिए अनुभवी होना बहुत जरूरी है। अनुभव की पराकाष्ठा जागृति में है। इसलिये हम कह सकते हैं कि एक जागृत व्यक्ति सबसे काबिल लेखक बन सकता है। होता क्या है कि जागृत व्यक्ति का पिछला जीवन जल्दी ही खत्म होने वाला होता है, तेजी से चल रहे रूपाँतरण के कारण। इसलिये उसमें खुद ही एक नेचुरल इंस्टिन्कट पैदा हो जाती है कि वह अपने पुराने जीवन को शीघ्रता से लिखकर सुरक्षित कर ले, ताकि जरूरत पड़ने पर वह उसे पढ़ कर अपने पुराने जीवन को याद कर ले। इससे उसे रूपान्तरण का सदमा नहीं लगता। इस इंस्टिनकट या आत्मप्रेरणा की दूसरी वजह यह होती है कि लोगों को जागृति के लिए प्रेरणा मिले और उन्हें यह पता चल सके कि जागृति के लिए कैसा जीवन जरूरी होता है। अगर उसे खुद भी फिर से कभी जागृति की जरूरत पड़े, तो वह उससे लाभ उठा सके। वेदों और पुराणों को लिखने वाले लोग जागृत हुआ करते थे। उन्हें ऋषि कहते हैं। यह उनकी रचनाओं को पढ़ने से स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। उन्हें पढ़ने से लगता है कि वे जीवन के सभी अनुभवों से भरे होते थे। उनका लेखन मानव के हरेक पहलू को छूता है। साथ में मैं अपना ही एक अनुभव साझा कर रहा था कि कैसे  मुझे अपने ही लेख ने प्रेरित किया। अन्य अधिकांश लोग तो दूसरों के लेखों से प्रेरित होते हैं। मुझे अपना ही लेख अचंभित करता था। उसमें मुझे अनेकों अर्थ दिखते थे, कभी कुछ तो कभी कुछ, और कभी कुछ नहीं। यह आदमी का मानसिक स्वभाव है कि सस्पेंस या संदेह और थ्रिल या रोमांच से भरी बात के बारे में वह बार-बार सोचता है। इसी वजह से वह लेख मेरे मन में हमेशा खुद ही बैठा रहता था, और मुझे ऐसा लगता था कि वह मुझे जीवन में दिशानिर्देशित कर रहा था। दरअसल अगर कोई चीज मन में लगातार बैठी रहे, तो वह कुंडलिनी का रूप ले लेती है। कई लोग उसे झेल नहीं पाते और अवसाद का शिकार हो जाते हैं। इसीलिए तो लोग कहते हैं कि फलां आदमी फलां चीज के बारे में लगातार सोच-सोच कर पागल हो गया। दरअसल वैसा ऊर्जा की कमी से होता है। कुंडलिनी शरीर की ऊर्जा का अवशोषण करती है। यदि कोई अतिरिक्त ऊर्जा को न ले तो स्वाभाविक है कि उसमें शक्तिहीनता जैसी घर कर जाएगी। इससे उसका मन अपनी रोज की साफसफाई के लिए भी नहीं करेगा। अवसाद की परिभाषा भी यही है कि आदमी अपने शरीर की देखरेख भी ढंग से नहीं कर पाता, बाकि काम तो छोड़ो। मेरा एक सहकर्मी जो अवसाद की दवाइयां भी खाता था, कई-कई दिनों तक न तो नहाता था और न खाना बनाता था। कुंडलिनी, ऊर्जा और शक्ति एकदूसरे के पर्यायवाची शब्द हैं, लगभग। अवसाद में आदमी अकेलेपन में इसलिए रहने लगता है क्योंकि वह व्यर्थ के झमेलों से बचकर अपनी ऊर्जा बचाना चाहता है। पर इससे कई बार उसका अवसाद बढ़ जाता है, क्योंकि उसे प्रेमभरी सहानुभूति देने वाला कोई नहीं रहता। पर यदि कुंडलिनी के लिए अतिरिक्त ऊर्जा या शक्ति की आपूर्ति हो जाए, और उससे आदमी के काम कुप्रभावित न हों, तो कुंडलिनी चमत्कार करते हुए आदमी को मुक्ति की ओर ले जाती है। कई बार अवसाद के मरीज में ऊर्जा तो पर्याप्त होती है, पर वह ऊर्जा दिग्भ्रमित होती है। कुंडलिनी योग से यदि ऊर्जा को सही दिशा देते हुए उसे कुंडलिनी को प्रदान किया जाए, तो अवसाद समाप्त हो जाता है। मुझे भी ऐसा ही अवसाद होता था, जो कुंडलिनी योग से समाप्त हो गया। मेरे उन लेखों में यौनवासना का बल भी था, तंत्र के रूप में। क्योंकि आपने देखा होगा कि लगभग हरेक फिल्म में रोमांस होता है। यह रोचकता प्रदान करने के लिए होता है। कोई चीज हमें तभी रोचक लगती है जब वह कुंडलिनी शक्ति से हमारे मन में ढंग से बैठती है। मतलब साफ है कि फ़िल्म में प्रणय संबंधों का तड़का इसीलिए लगाया जाता है, ताकि उससे मूलाधार-निवासिनी कुंडलिनी शक्ति सक्रिय हो जाए, जिससे पूरी फ़िल्म अच्छे से मन में बैठ जाए और लोग एकदूसरे से चर्चा करते हुए उसका खूब प्रचार करे, और वह ब्लॉकबस्टर बने। इसीलिए यदि ऐतिहासिक दस्तावेज पर भी फ़िल्म बनी हो, तो भी उसमें रोमांस जोड़ दिया जाता है, सच्चा न मिले तो झूठा ही सही। इसीलिए कई बार ऐसी फिल्मों का विरोध भी होता है। इसी विरोध के कारण ही फ़िल्म पद्मावती (स्त्रीलिंग) का नाम बदलकर पद्मावत (पुलिंग) रखना पड़ा था। यह फ़िल्म उद्योग का मनोविज्ञान है। ऐसा लग रहा था कि वे लेख मैंने नहीं, बल्कि मेरी कुंडलिनी ने लिखे थे। मेरा मन दो हिस्सों में विभाजित जैसा था, एक हिस्सा कुंडलिनी पुरुष या गुरु या उपदेशक के रूप में था, और दूसरे हिस्से में मेरा पूरा व्यक्तित्व एक शिष्य या श्रोता के रूप में था। कुंडलिनी का यह लाभ भी काबिलेगौर है। वैसे आम आदमी तो अपने लिखे या शत्रु द्वारा लिखे लेख  से ज्यादा लाभ नहीं उठा सकता, पर कुंडलिनी को धारण करने वाला व्यक्ति उनसे भी पूरा लाभ उठा लेता है, क्योंकि उसे लगता है कि वे कुंडलिनी ने लिखे हैं। सम्भवतः इसीलिये कुंडलिनी को सबसे बड़ा गुरु या मार्गदर्शक कहते हैं। एक लेख से मुझे अपने लिए खतरा भी महसूस होता था, क्योंकि उसमें धर्म के बारे में कुछ सत्य और चुभने वाली बातें भी थीं। हालांकि गलत कुछ नहीं लिखा था। उस बारे मुझे कुछ धमकी भरी चेतावनियाँ भी मिली थीं। उसकी वजह मुझे यह भी लगती है कि उससे कुछ बड़े-बुजुर्गों और तथाकथित धर्म के ठेकेदारों के अहंकार को चोट लगी होगी कि एक साधारण सा कम उम्र का लड़का धर्म, तंत्र व आध्यात्मिक विज्ञान के बारे में कुछ कैसे लिख सकता था। हो सकता है कि उन्हें यह भी लगा हो कि उन लेखों में एक जगह गुरु का अपमान झलकता था। हालाँकि लगता है कि वे बाद में समझ गए थे कि वैसा कुछ नहीं था, और वे लेख अनगिनत अर्थों से भरे थे, ताकि हर किस्म के लोगों को पसंद आते। वैसे उन्हें यह सवाल पत्रिका के लिए लेख के चयनकर्ताओं से पूछना चाहिए था कि उन्होंने मेरे लेखों को क्या देखकर चयनित किया था। मुझे उन लेखों से पैदा हुए भय से लाभ भी मिला। भय से एक तो हमेशा उन लेखों पर ध्यान जाता रहा, और दूसरा लेखन की बारीकियों की समझ विकसित हुई। मेरे लेखन को मेरे परिवार के एक या दो बड़े लोगों ने भी पढ़ा था। उन्हें भी उससे अपने लेखन में कुछ सुधार महसूस हुआ था। साथ में, मैं बता रहा था कि कैसे  पुरातन चीजों के साथ संस्कार जुड़े होते हैं। इसी मनोवैज्ञानिक सिद्धांत से प्रेरित होकर ही पुराणों के ऋषियों ने अपने लेखन में कभी सीमित काल नहीं जोड़ा है। केवल ‘बहुत पुरानी बात’ लिखा होता है। इससे पाठक के अवचेतन मन में यह दर्ज हो जाता है कि ये अनादि काल पहले की बातें हैं। इससे  सर्वाधिक काल-संभव संस्कार खुद ही प्राप्त हो जाता है। इसी तरह यदि कहीं कालगणना की जाती है, तो बहुत दूरपार की, लाखों -करोड़ों वर्षों या युगों की। इसीलिए हिंदू धर्म को ज्यादातर लोग सनातन धर्म कहना पसंद करते हैं।

अब शिव पुराण की आगे की कथा को समझते हैं। हाथी का सिर जोड़कर गणेश को गजानन बना दिया गया। मतलब कि भगवान शिव पार्वती की कुंडलिनी तो वापिस नहीं ला पाए, पर उन्होंने कुंडलिनी सहायक के रूप में गजानन को पैदा किया। हाथी वाला भाग यिन का प्रतीक है, और मनुष्य वाला भाग यांग का। यिन-यांग गठजोड़ के बारे में एक पिछली पोस्ट में भी बताया है। उसे देखकर पार्वती के मन में अद्वैतभावना पैदा हुई, जिससे उसे अपनी कुंडलिनी अर्थात अपने असली पुराने गणेश की याद वापिस आ गई, और वह हमेशा उसके मन में बस गया। इसलिए गजानन उसे बहुत प्यारा लगा और उसे ही उसने अपना पुत्र मान लिया। उसे आशीर्वाद भी दिया कि हर जगह सबसे पहले उसी की पूजा होगी। अगर उसकी पूजा नहीं की जाएगी, तो सभी देवताओं की पूजा निष्फल हो जाएगी। वास्तव में गजानन की पूजा से अद्वैतमयी कुंडलिनी शक्ति उजागर हो जाती है। वही फिर अन्य देवताओं की पूजा के साथ वृद्धि को प्राप्त करती है। देवताओं की पूजा का असली उद्देश्य कुंडलिनी ही तो है। यदि गजानन की पूजा से वह उजागर ही नहीं होगी, तो कैसे वृध्दि को प्राप्त होगी। अगर होगी, तो बहुत कम। 

फिर शिव-पार्वती अपने दोनों पुत्रों कार्तिकेय और गणेश के विवाह की योजना बनाते हैं। वे कहते हैं कि जो सबसे पहले समस्त ब्रह्मांड की परिक्रमा करके उनके पास वापिस लौट आएगा, उसीका विवाह पहले होगा। कार्तिकेय मोर पर सवार होकर उड़ जाता है, अभियान को पूरा करने के लिए। उधर गणेश के पास चूहा ही एकमात्र वाहन है, जिसपर बैठकर ब्रह्मांड की परिक्रमा करना असंभव है। इसलिए वह माता पिता के चारों तरफ घूमकर परिक्रमा कर लेता है। वह कहता है कि मातापिता के शरीर में संपूर्ण ब्रह्मांड बसा है, और वे ही ईश्वर हैं। बात ठीक भी है, और शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार ही है। सवारी के रूप में चूहे का मतलब है कि गणेश अर्थात यिन-यांग गठजोड़ ज्यादा क्रियाशील नहीं होता। यह शरीर में कुंडलिनी की तरह नहीं घूमता। शरीर मतलब ब्रह्मांड। कार्तिकेय अर्थात कुण्डलिनी का शरीर में चारों ओर घूमना ही पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा है। इसीलिए उसे तीव्र वेग से उड़ने वाले मोर की सवारी कहा गया है। गणेश तो भौतिक मूर्ति के रूप में शरीर के बाहर जड़वत स्थित रहता है। इसीलिए मन्द चाल चलने वाले चूहे को उसका वाहन कहा गया है। वह खुद नहीं घूमता, पर शरीर के अंदर घूमने वाले कुंडलिनी पुरुष को शक्ति देता है। यदि उसका मानसिक चित्र घूमता है, तो वास्तविक कुंडलिनी पुरुष की अपेक्षा बहुत धीमी गति से। वह तो यिन-यांग का मिश्रण है। माता-पिता या शिवपार्वती भी यिन-यांग का मिश्रण है। दोनों के इसी समान गुण के कारण उसके द्वारा मातापिता की परिक्रमा कही गई है। क्योंकि यिन-यांग गठजोड़ से, बिना कुंडलिनी योग के, सीधे ही भी जागृति मिल सकती है, इसीलिए उसके द्वारा बड़ी आसानी से परमात्मा शिव या ब्रह्मांड की प्राप्ति या परिक्रमा होना बताया गया है। यिन-याँग के बारे में बात चली है, तो मैं इसे और ज्यादा स्पष्ट कर देता हूँ। मांस मृत्यु या यिन है, और उसे जला रही अग्नि जीवन या याँग है। इसीलिए श्मशान में कुंडलिनी ज्ञान प्राप्त होता है। शिव इसी वजह से श्मशान में साधना करते हैं। धुएं के साथ उसकी गंध अतिरिक्त प्रभाव पैदा करती है। सम्भवतः इसी यिनयांग से आकर्षित होकर लोग तंदूरी चिकन आदि का —–। मैंने अपने कुछ बड़े-बुजुर्गों से सुना है कि वैदिक काल के लोग जिंदा भैंसों या बैलों और बकरों को यज्ञकुंड की धधकती आग में डाल दिया करते थे, जिससे यज्ञ के देवता प्रसन्न होकर हरप्रकार से कल्याण करते थे। आजकल भी पूर्वी भारत में ऐसा कभीकभार देखा जा सकता है। आदर्शवादी कहते हैं कि शाकाहार संपूर्ण आहार है। यदि ऐसा होता तो दुनिया से जानवरों की अधिकांश किस्में विलुप्त न हो गई होतीँ, क्योंकि आदमी के द्वारा अधिकांशतः उनका इस्तेमाल भोजन के रूप में ही हुआ। कहते हैं कि एक यज्ञ तो ऐसा भी है, जिसमें गाय को काटा जाता है, जबकि गाय को हिन्दु धर्म में अति पवित्र माना जाता है। यज्ञ की हिंसा को हल्का दिखाने वाले कई लोग यह अवैज्ञानिक तर्क भी देते हैं कि पुराने समय के ऋषि यज्ञ में मरने वाले पशु को अपनी शक्ति से पुनर्जीवित कर देते थे, पर आजकल किसी में ऐसी शक्ति नहीं है, इसलिए आजकल ऐसे यज्ञ आम प्रचलन में नहीं हैं। कई दार्शनिक किस्म के लोग कहते हैं कि यज्ञ में बलि लगे हुए पशु को स्वर्ग प्राप्त होता है। जब बुद्धिस्ट जैसे लोगों द्वारा उनसे यह सवाल किया जाता है कि तब वे स्वर्ग की प्राप्ति कराने के लिए यज्ञ में पशु के स्थान पर अपने पिता की बलि क्यों नहीं लगाते, तब वे चुप हो जाते हैं। सम्भवतः वे यज्ञ देवता कुंडलिनी के रूप में ही होते थे। ऐसा जरूर होता होगा, क्योंकि ऐसे हिंसक यज्ञ-यागों का वर्णन वेदों में है। काले तंत्र या काले जादू में इसी तरह मांस के हवन से कुंडलिनी शक्ति पैदा की जाती है, जिसे जिन्न भी कहते हैं। हम यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम नाजायज पशु हिंसा के सख्त खिलाफ हैं, और यहाँ प्रकरणवश ही तथ्यों को सामने रखा जा रहा है, किसी जीवन-पद्धति की वकालत के लिए नहीं। इमरान खान ने बुशरा बेगम से बहुत काला जादू कराया, पर बात नहीं बनी। इससे जुड़ी एक बात मुझे याद आ रही है। मेरा एक दोस्त मुझे एकबार बता रहा था कि मृत पशु के व्यवसाय से जुड़े किसी विशेष समुदाय के लोगों का एक शक्तिशाली देवता होता है। उसे वे गड्ढा कहते हैं। दरअसल हरवर्ष एक कटे हुए मृत बकरे को उस गड्ढे में दबा दिया जाता है। जिससे उसमें बहुत खतरनाक मांसखोर जीवाणु पनपे रहते हैं। यदि किसीका बुरा करना हो, तो उस गड्ढे की मिट्टी की मुट्ठी शत्रु के घर के ऊपर  फ़ेंक दी जाती है। जल्दी ही उस घर का कोई सदस्य या तो मर जाता है, या गंभीर रूप से बीमार हो जाता है। विज्ञान के अनुसार तो उस मिट्टी से जीवाणु-संक्रमण फैलता है। पर मुझे इसके पीछे कोई घातक मनोवैज्ञानिक वजह भी लगती है। जिन्न क्या है, कुंडलिनी ही है। चीज एक ही है। यह तो साधक पर निर्भर करता है कि वह उसे किस तरीके से पैदा कर रहा है, और किस उद्देश्य के लिए प्रयोग में लाएगा। यदि यह सात्विक विधि से पैदा की गई है, और आत्मकल्याण या जगकल्याण के लिए है, तब उसे शक्ति या कुंडलिनी या होली घोस्ट या पवित्र भूत कहेंगे। यदि उसे तामसिक तरीके से पैदा किया है, हालांकि उसे आत्मकल्याण और जगकल्याण के प्रयोग में लाया जाता है, तब इसे तांत्रिक कुंडलिनी कहेंगे। यदि इसे तामसिक या काले तरीके से पैदा किया जाता है, और इससे अपने क्षणिक स्वार्थ के लिए जगत के लोगों का नुकसान किया जाता है, तब इसे जिन्न या भूत या डेमन कहेंगे। अब्राहमिक धर्म वाले कई लोग जो कुंडलिनी को डेमन या शैतान कहते हैं, वे अपने हिसाब से ठीक ही कहते हैं। मैं ऐसा नहीं बोल रहा हूँ कि सभी लोग ऐसा कहते हैं। आपको हरेक धर्म में हर किस्म के लोग मिल जाएंगे। हमारे लिए सभी धर्म समान हैं। इस वैबसाईट में धार्मिक वैमनस्य के लिए कोई जगह नहीं ह। कुंडलिनी योग से जो शरीर में कंपन, सिकुड़न, नाड़ी-चालन आदि विविध लक्षण प्रकट होने लगते हैं, उसे वे शैतान का शरीर पर कब्जा होना कहते हैं। पर मैं उसे देवता का शरीर पर कब्जा होना कहूंगा। शैतान और देवता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उनके पास कुंडलिनी को वश में करने वाली युक्तियां व संस्कार नहीं हैं, इसलिये उनसे वह हिंसा, नुकसान, दंगे, जिहाद, धर्म परिवर्तन आदि करवाती है। हाल ही में जो देशभर में कई स्थानों पर रामनवमी के जुलूसों पर विधर्मियों के द्वारा हिंसक पथराव हुआ है, वह शक्ति से ही हुआ है। उस पर उन्हें कोई पछतावा नहीं, क्योंकि इसको उन्होंने महान मानवता का काम माना हुआ है, लिखित रूप में भी और सामूहिक तौर पर भी। हम मानते हैं कि कुंडलिनी शक्ति मानवता के लिए काम करती है, ये भी ऐसा ही मानते हैं, पर इन्होंने कुंडलिनी को धोखे में डाला हुआ है, मानवता को विकृत ढंग से परिभाषित करके। यह ऐसे ही है कि एक सांप घर के अंदर घुसा था चूहे का शिकार करने, पर शिकार सोया हुआ आदमी बन गया, क्योंकि चूहा सांप से बचने के लिए उसके बिस्तर में घुस गया। गजब का मनोविज्ञान है लगता है यह, जिस पर यदि ढंग से शोध किए जाएं, तो समाज में व्याप्त परस्पर वैरभाव समाप्त हो सकता है। शक्ति कुंडलिनी का ही पर्याय है, या यूँ कहो कि शक्ति कुंडलिनी से ही मिलती है, बेशक वह किसी को महसूस होए या न। उनके लिए तो कुंडलिनी शैतान ही कही जाएगी। पर हिन्दु धर्म में गुरु परम्परा, संस्कार आदि अनेकों युक्तियों से कुंडलिनी को वश में कर के उससे मानवता, सेवा, जगकल्याण, और मोक्ष संबंधी काम कराए जाते हैं। इसलिए हिन्दुओं के लिए वही कुंडलिनी देवता बन जाती है। ऐसा होने पर भी, हिन्दु धर्म में भी बहुत से लोग कई बार कुंडलिनी के आवेश को सहन नहीं कर पाते। मैं एकबार ऊँचे हिमालयी क्षेत्रों में किसी प्रसंगवश रहता था। हम कुछ साथियों का मकान-मालिक बहुत अच्छा इंसान था। देवता पर बहुत ज्यादा आस्था रखने वाला था। हमेशा देवपूजा में शामिल होता था। उसके पूरे परिवार के संस्कार ऐसे ही पवित्र थे। मेरे एक रूममेट के साथ अक्सर उठता-बैठता था। एकबार उस मकान मालिक की कुंडलिनी शक्ति को पता नहीं क्या हुआ, वह ज्यादा ही खानेपीने लग गया, जिससे वह सम्भवतः कुंडलिनी को नियंत्रित नहीं कर पा रहा था। वह रोज मेरे रूममेट को साथ लेकर शराब पीता और पूरे दिन उसके साथ और कुछ अन्य लोगों के साथ ताश खेलता रहता। समझाने पर भी न समझे। उसकी बड़ी-बड़ी और लाली लिए आँखें जैसे शून्यता को ढूंढती रहती। वह अजीब सा और डरावना सा लगता। ऐसा लगता कि जैसे उस पर देवता की छाया पड़ गई हो, पर उल्टे रूप में। मेरा रूममेट भी बड़ा परेशान। वह किसी के काबू नहीं आया पुलिस के सिवाय। बाद में माफी माँगने लगा। अपने किए पर बहुत शर्मिंदा हुआ। शराब तो उसने बिल्कुल छोड़ दी, और वह पहले से भी ज्यादा नेक इंसान बन गया। इससे जाहिर होता है कि वह देवता या कुंडलिनी के वश में था। इसीलिए वह मारपीट आदि नहीं कर रहा था। यदि मारपीट आदि बवाल मचाता, तो मानते कि वह भूतरूपी कुंडलिनी के वश में होता। उसकी कुंडलिनी को जरूरत से ज्यादा तांत्रिक ऊर्जा मिल रही थी, जिससे वह उसे नियंत्रित नहीं कर पा रहा था। यदि वह अपनी मर्जी से कर रहा होता तो बाद में माफी न मांगता, बहुत शर्मिंदा न होता, और प्रायश्चित न करता। ऐसे मैंने बहुत से अच्छे लोग देखे हैं, जिन्हे पता नहीं एकदम से क्या हो जाता है। वे तो खातेपीते भी नहीं। बिल्कुल सात्विक जीवन होता है उनका। लगता है कुंडलिनी को पर्याप्त ऊर्जा न मिलने से भी ऐसा होता है। यदि उनकी ऊर्जा की कमी को उच्च ऊर्जा वाली चीजों विशेषकर ननवेज या विशेष टॉनिक से पूरा किया जाए, तो वे एकदम से ठीक हो जाते हैं। इसीलिए कहते हैं कि शक्ति खून की प्यासी होती है। माँ काली के एक हाथमें खड़ग और दूसरे हाथ में खून से भरा कटोरा होता है। अगर ऊर्जा की कमी से कुंडलिनी रुष्ट होती है, तो ऊर्जा की अधिकता से भी। इसीलिए योग में संतुलित आहार व विहार पर बल दिया गया है। अपने व्यवसाय की खातिर मैं कुछ समय के लिए एक जंगली जैसे क्षेत्र में भी रहा था। वहां एक गांव में मैंने देखा था कि एक बुजुर्ग आदमी को प्रतिदिन मांस चाहिए होता था खाने को, बेशक थोड़ा सा ही। अगर उसे किसी दिन मांस नहीं मिलता था, तो उसमें भूत का आवेश आ जाता था, और वह अजीबोग़रीब हरकतें करने लगता था, गुस्सा करता, बर्तन इधरधर फ़ेंकता, और परिवार वालों को परेशान करता, अन्यथा वह दैवीय गुणों से भरा रहता था। कुछ तो इसमें मनोवैज्ञानिक कारण भी होता होगा, पर सारा नहीं। बहुत से लोग यह मानते हैं कि शक्ति से केवल लड़ाई-झगड़े जैसे राक्षसी गुण ही पनपते हैं, दैवीय गुण नहीं। पर सच्चाई यह है कि दया, प्रेम, नम्रता, सहनशीलता जैसे दैवीय गुणों के लिए भी शक्ति की जरूरत पड़ती है। अगर विष्ठा को ढोने के लिए ताकत की जरूरत होती है, तो अमृत को ढोने के लिए भी ताकत की जरूरत पड़ती है। यह अलग बात है कि शक्ति का स्रोत क्या है। पर यह भी सत्य है कि शक्ति का सबसे उत्कृष्ट स्रोत संतुलित आहार ही है, और वह ननवेज के बिना पूरा नहीं होता। हम यहाँ निष्पक्ष रूप से वैज्ञानिक तथ्य सामने रख रहे हैं, न कि किसी की जीवनपद्धति। भारत-विभाजन के कारण लाखों निर्दोष लोग मारे गए। विभाजन भी बड़ा अजीब और बेढंगा किया गया था। देश को तोड़ना और जोड़ना जैसे एक गुड्डे-गुडिया का खेल बना दिया गया। उसके लिए तथाकथित जिम्मेदार लोग तो बहुत उच्च जीवन-आदर्श वाले और अहिंसक थे। फिर सामाजिक न्याय, धार्मिक न्याय, बराबरी, हित-अहित, कूटनीति और निकट भविष्य में आने वाली समस्याओं का आकलन वे क्यों नहीं कर पाए। प्रथमदृष्टया तो ऐसा लगता है कि उनमें ऊर्जा की कमी रही होगी, और उनके विरोधी ऊर्जा से भरे रहे होंगे। तब ऐसे आदर्शवाद और अहिंसा धर्म से क्या लाभ। इससे अच्छा तो तब होता अगर वो अपनी ऊर्जा के लिए छुटपुट मानवीय हिंसा को अपनाकर उस भयानक मानवघातिनी हिंसा को रोक पाते, और भविष्य को भी हमेशा के लिए सुरक्षित कर देते। समझदारों के लिए इशारा ही काफी होता है। इस बारे ज्यादा कहने की जरूरत नहीं है। हम किसी की आलोचना नहीं कर रहे हैं, पर तथ्य प्रस्तुत कर रहे हैं। विरोध नीतियों, विचारों और कामों का होता है, व्यक्तियों का नहीं। हम आदर्शवाद की तरफ भी कोई अंगुली नहीं उठा रहे हैं। आदर्शवाद उच्च व्यक्तित्व का आधारस्तम्भ है। यह एक अच्छी और मानवीय आदत है। कुंडलिनी जागरण की प्राप्ति कराने वाले कारकों में यह मूलभूत कारक प्रतीत होता है। हमारा कहने का यही तात्पर्य है कि दुनिया में, खासकर आज के कलियुग में अधिकांश लोग मौकापरस्त होते हैं और आदर्शवादी का नाजायज फायदा उठाने के लिए तैयार रहते हैं। इसलिए आदर्शवाद के साथ अतिरिक्त सतर्कता की जरूरत होती है। दक्षिण भारत में मछली उत्पादन बहुत होता है, समुद्रतटीय क्षेत्र होने के कारण। इसलिए वहाँ अधिकांश लोग मांसाहारी होते हैं। फिर भी वहाँ हिन्दु संस्कृति को बहुत मान-सम्मान मिलता है। इसकी झलक दक्षिण की फिल्मों में खूब मिलती है। मुख्यतः इसी वजह से आजकल वहाँ की फिल्में पूरी दुनिया में धूम मचा रही हैं। सम्भवतः उपरोक्त वृद्ध व्यक्ति की कुंडलिनी शक्ति ऊर्जा की कमी से ढंग से अभिव्यक्त न होकर भूत जैसी बन जाती थी। एकप्रकार से संतुलित आहार से उसके मन को शक्ति मिलती थी, क्योंकि कुंडलिनी मन ही है, मन का एक विशिष्ट, स्थायी, व मज़बूत भाव या चित्र है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि जिससे मन को शक्ति मिलती है, उससे कुंडलिनी को भी खुद ही शक्ति मिलती है। कुंडलिनी को ही सबसे ज्यादा शक्ति मिलती है, क्योंकि कुंडलिनी ही मन का सबसे प्रभावशाली हिस्सा है। इसीलिए योग में संक्षेप में कहते हैं कि कुंडलिनी को शक्ति मिली, मन की बात नहीं होती। योग में कुंडलिनी से मतलब है, बाकि विस्तृत मन से कोई विशेष प्रयोजन नहीं। आप आदिवासियों के झुण्ड के सरदार को आसानी से वश में कर सकते हो, पूरे झुंड को नहीं। जैसे सरदार को वश में करने से पूरा झुंड वश में हो जाता है, उसी तरह कुंडलिनी को वश में करने से पूरा मन वश में हो जाता है। यूँ कह सकते हैं कि कुंडलिनी ही मन का मर्म है। अगर किसी की कुंडलिनी को पकड़ लिया, तो उसके पूरे मन को पकड़ लिया। तभी तो हरेक आदमी अपनी कुंडलिनी के बारे में छुपाता है। साम्प्रदायिक हिंसा ऐसे ही धार्मिक आवेश में होती है, और उसके लिए मन से पछतावा होने पर भी कोई माफी नहीं मांगता, क्योंकि धर्म में ही ऐसा लिखा होता है कि यह अच्छा काम है और जन्नत को देने वाला है। देवता तो उसे लाभ देना चाह रहा था, पर वह लाभ नहीं ले पा रहा था। उसका तनमन देवता के आवेश को सहन नहीं कर पा रहा था। इसलिये देवता उसके लिए भूत या डेमन बन गया था। इसी से बचने के लिए ही हठयोग के अभ्यास से तनमन को स्वस्थ करना पड़ता है, तभी कोई देव-कुंडलिनी को सहन और नियंत्रित करने की सामर्थ्य पाता है। यदि बंदर के हाथ उस्तरा लग जाए, तो दोष उस्तरे का नहीं है, दोष बंदर का है। इसी तरह, मैंने एकबार देखा कि एक देवता के सामने एक गुर (विशेष व्यक्ति जिस पर देवता की छाया पड़ती हो) जब ढोल की आवाज से हिंगरने या नाचने लगा, तो उसकी दिल के दौरे से मौत हो गई। लोगों ने कहा कि उसके ऊपर देवता की बजाय भूत की छाया पड़ी। दरअसल उसका निर्बल शरीर देवता रूप कुंडलिनी के आवेश को सहन नहीं कर पाया होगा। इसीलिए कुंडलिनी योग के लिए उत्तम स्वास्थ्य का होना बहुत जरूरी है। योग की क्रिया स्वयं भी उत्तम स्वास्थ्य का निर्माण करती है। मेरे दादाजी पर भी देवता की छाया उतारी जाती थी। छाया या साया चित्र को भी कहते हैं। यिन-याँग गठजोड़ ही देवता है। उससे जो मन में कुंडलिनी चित्र बनता है, उसे ही देवता की छाया कहते हैं। जब ढोल की आवाज से देवता उनके अंदर नाचता था, तब उनकी साँसे एकदम से तेज हो जाती थीं। उनकी पीठ एकदम सीधी और कड़ी हो जाती थी, सिर भी सीधा, और वे अपने आसन पर ऊपर-नीचे की ओर जोर-जोर से हिलते थे। उस समय उनके दोनों हाथ अगले स्वधिष्ठान चक्र पर जुड़े हुए और मुट्ठीबंद होते थे। ऐसा लगता है कि उनकी कुंडलिनी ऊर्जा मूलाधार से पीठ से होते हुए ऊपर चढ़ रही होती थी। मैंने कभी उनसे पूछा नहीं, अगर मौका मिला तो जरूर पूछूंगा। उस समय कुछ पूछने पर वे हांफते हुए कुछ अस्पष्ट से शब्दों में बोलते थे, जिसे देवता की सच्ची आवाज समझा जाता था। उससे बहुत से काम सिद्ध किए जाते थे, और बहुत से विवादों को निपटाया जाता था। देवता के आदेश का पालन लोग तहेदिल से करते थे, क्योंकि वह आदेश हमेशा ही शुभ और सामाजिक होता था। 5-10 मिनट में देवता की छाया उतरने के बाद वे शांत, तनावमुक्त और प्रकाशमान जैसे दिखते थे। कई बार उसकी थकान के कारण वे दिन में ही नींद की झपकी भी ले लेते थे। कई बार वह देवछाया थोड़ी देर के लिए और हल्की आती थी। कई बार ज्यादा देर के लिए और बहुत शक्तिशाली आती थी। कई बार नाममात्र की आती थी। कुछेक बार तो बिल्कुल भी नहीं आती थी। फिर कुछ दिनों बाद वह प्रक्रिया दुबारा करनी पड़ती थी, जिसे स्थानीय भाषा में नमाला कहते हैं। साल में इसे 1-2 बार करना पड़ता था, खासकर नई फसल के दौरान। कई बार तात्कालिक विवाद को मिटाने के लिए इमरजेंसी अर्थात आपात परिस्थिति में भी देवता को बुलाना पड़ता था। देव-छाया जितनी मजबूत आती थी, उसे उतना ही शुभ माना जाता था।

वैसे जिन्न अच्छे भी हो सकते हैं, जो किसीका नुकसान नहीं करते, फायदा ही करते हैं। यह उपरोक्तानुसार संस्कारों पर और जिन्न को हैंडल करने के तरीके पर निर्भर करता है। यदि कुंडलिनी जैसी दिव्य शक्ति हमेशा शैतान हुआ करती, तो जिन्न कभी अच्छे न हुआ करते। इसका मतलब है कि कुंडलिनी शक्ति के हैंडलर पर काफ़ी निर्भर करता है कि वह क्या गुल खिलाएगी। सलत या नमाज ही कुंडलिनी योग है। इसमें भी वज्रासन में घुटनों के बल बैठा जाता है। कुछ अल्लाह का ध्यान किया जाता है, जिससे स्वाभाविक है कि माथे पर आज्ञा चक्र क्रियाशील हो जाएगा। तब आगे को झुककर माथे को अर्थात उस पर स्थित आज्ञा चक्र को जमीन पर छुआया या रगड़ा जाता है। उससे अज्ञाचक्र पर कुंडलिनी या अल्लाह का ध्यान ज्यादा मज़बूत होकर शरीर में चारों तरफ एक ऊर्जा प्रवाह के रूप में घूमने लगता है। फिर पीठ को ऊपर उठाकर आदमी फिर से सीधा कर लेता है, और आँखें बंद रखता है। इससे वह घूमती हुई ऊर्जा बोतलनुमा शरीर में बंद होकर बाहर नहीं निकल पाती, क्योंकि आँख रूपी बोतल का ढक्क्न भी बंद कर दिया जाता है। जरूरत पड़ने पर जब आदमी दुनियादारी में काम करने लगता है, तो वह कुण्डलीनिनुमा ध्यान बाहर आकर बाहरी दुनिया में दिखने लग जाता है, और उसे सहानुभूति देकर उसकी काम में मदद करता है, और उसे तनाव पैदा नहीं होने देता। फिर अगले सलत के समय ध्यान के बल से वह ध्यान चित्र फिर शरीर के अंदर घुस जाता है, जिसे वहाँ पूर्ववत फिर बंद कर दिया जाता है। आप समझ ही गए होंगे कि इसका क्या मतलब है। फिर भी मैं बता देता हूँ। सलत ही कुंडलिनी योग है। वज्रासन ही योगासन है। अज्ञाचक्र या माथा ही चिराग है। जमीन पर माथा रखना या आज्ञाचक्र के साथ मूलाधार चक्र का ध्यान ही चिराग को जमीन पर रगड़ना है। वैसे भी मूलाधार को जमीनी चक्र अर्थात जमीन से जोड़ने वाला चक्र कहा जाता है। दरअसल माथे को जमीन पर छुआने से आज्ञा चक्र और मुलाधार चक्र के बीच का परिपथ पूरा होने से दोनों आपस में जुड़ जाते हैं, मतलब यांग और यिन एक हो जाते हैं। उससे मन में अद्वैत और उससे प्रकाशमान कुंडलिनी चित्र का पैदा होना ही चिराग से चमकते जिन्न का निकलना है। पीठ और सिर का ऊपर की ओर बिल्कुल सीधा करके उसका शरीर में अंदर ही अंदर ध्यान करना ही उसको बोतल में भरना है। शरीर ही बोतल है। आँखों को बंद करना अर्थात इन्द्रियों के दरवाजों को बंद करना अर्थात इन्द्रियों का प्रत्याहार ही बोतल का मुँह ढक्कन लगाकर बंद करना है। ध्यान चित्र इन्द्रियों से ही बाहर निकलता है और बाहरी जगत की चीजों के ऊपर आरोपित हो जाता है। इसे बोतलनुमा शरीर में कैद रखा जाता है, अर्थात इसे चक्रोँ पर गोलगोल घुमाया जाता है, और जरूरत के अनुसार बाहर भी लाया जाता रहता है। बाहर आकर यह दुनियावी व्यवहारों व कामों में अद्वैतभाव और अनासक्ति भाव पैदा करता है, जिससे मोक्ष मिलता है। साथ में, भौतिक उपलब्धियां तो मिलती ही हैं। मोक्ष के प्राप्त होने को ही सबकुछ प्राप्त होना कह सकते है। इसीलिए कहते हैं कि जिन्न सबकुछ देता हैं, या मनचाही वस्तुएँ प्रदान करता है। पवित्र कुरान शरीफ में साफ लिखा है कि बिना धुएं की आग से जिन्न पैदा हुआ। हिन्दु धर्म भी तो यही कहता है कि जब यज्ञ की अग्नि चमकीली, भड़कीली और बिना धुएं की हो जाती है, तब उसमें डाली हुई आहुति से यज्ञ का देवता अर्थात कुंडलिनी प्रकट होकर उसे ग्रहण करती है, और तृप्त होती है। मैंने खुद ऐसा कई बार महसूस किया है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि जिन्न और कुंडलिनी एक ही चीज के दो नाम हैं। बुरे जिन्न से बचने के लिए अच्छे जिन्न को बढ़ावा देना चाहिए। अल्लाह या भगवान के ध्यान से और योग से अच्छा जिन्न साथ देता है, नहीं तो बुरा जिन्न हावी हो जाता है। मेरे साथ भी ऐसी ही दुविधा होती थी। मेरे ऊपर दो किस्म के जिन्न हावी रहते थे। एक जिन्न तो देवतुल्य, ऋषितुल्य, वयोवृद्ध, तेजस्वी, अध्यात्मवादी, कर्मयोगी, और पुलिंग प्रकार का था। दूसरा जिन्न भी हालांकि भूतिया नहीं था, पर भड़कीला, अति भौतिकवादी, विज्ञानवादी, प्रगतिशील, खूबसूरत, जवान और स्त्रीलिंग प्रकार का था। उसमें एक ही कमी थी। वह कई बार भयानक क्रोध करता था, पर मन से साफ और मासूम था, किसी का बुरा नहीं करता था। मैंने दोनों किस्म के जिन्नों से भरपूर लाभ उठाया। दोनों ने मुझे भरपूर भौतिक समृद्धि के साथ जागृति उपलब्ध करवाई। समय और स्थान के अनुसार कभी मेरे अंदर पहले वाला जिन्न ज्यादा हावी हो जाता था, कभी दूसरे वाला। अब मेरी उम्र भी ज्यादा हो गई है, इसलिए मैं अब दूसरे वाले जिन्न का आवेश सहन नहीं कर पाता। इसलिए मुझे अब कुंडलिनी ध्यानयोग की सहायता से पहले वाले जिन्न को ज्यादा बलवान बना कर रखना पड़ता है। मेरा अनुभव इसी इस्लामिक मान्यता के अनुसार है कि लोगों की तरह ही जिन्न की जिंदगियां होती हैं। उनके लिंग, परिवार, स्वभाव आदि वैसे ही भिन्न-भिन्न होते हैं। उनकी उम्र होती है, शरीर की विविध अवस्थाएं होती हैं। वे वैसे ही पैदा होते हैं, बढ़ते हैं, और अंत में मर जाते हैं। मैंने दोनों जिन्नों को बढ़ते हुए महसूस किया, हालांकि धीमी रप्तार से। अब तो मुझे लगता है कि पहले वाले जिन्न की उम्र पूरी होने वाली है। हालांकि मैं ऐसा नहीं चाहता। उसके बिना मुझे बुरा लगेगा। फिर मुझे किसी नए जिन्न से दोस्ती करनी पड़ेगी, जो आसान काम नहीं है। दोनों जिन्न मेरे सम्भोग से शक्ति प्राप्त करते थे। कुंडलिनी भी इसी तरह तांत्रिक सम्भोग से शक्ति प्राप्त करती है। कई बार तो वे खुद भी मेरे साथ यौनसंबंध बनाते थे। सीधा यौनसंबंध बनाते थे, ऐसा भी नहीं कह सकते, पर मुझे किसीसे यौनसंबंध बनाने के लिए प्रेरित करते थे, ताकि वे उससे शक्ति प्राप्त कर सकते। यदि यौन संबंध से यौन साथी को शक्ति न मिले पर उन जिन्नों को शक्ति मिले, तो यही कहा जाएगा कि जिन्नों से यौन संबंध बनाया, भौतिक यौनसाथी से नहीं। सामाजिक रूप में ऐसा कहते हुए संकोच और शर्म महसूस होती है, पर यह सत्य है। दूसरे वाले जिन्न से मुझे एकसाथ ही हर किस्म का रिश्ता महसूस होता था। एकबार तो पहले वाले जिन्न ने मुझे समलैंगिकता और दूसरे वाले जिन्न ने बलात्कार की तरफ भी धकेल दिया था, पर मैं बालबाल बच गया था। उस समय यौन शक्ति से छाए हुए वे मुझे मन की आँखों से बिल्कुल स्पष्ट महसूस होते थे, और कई दिनों तक मुझे आनंदित करते रहते थे। पहले वाला जिन्न जब मेरे अद्वैतपूर्ण जीवन, कर्मयोग और सम्भोग की शक्ति से अपने उत्कर्ष के चरम पर पहुंचा, तो मेरे मन में कुछ क्षणों के लिए जीवंत हो गया, जो कुंडलिनी जागरण कहलाया। दूसरे वाला जिन्न तो मेरे साथ काफी समय तक पत्नी की तरह भी रहा, उससे बच्चे भी हुए, फिर उसकी उम्र ज्यादा हो जाने से उसने मेरे साथ सम्भोग करना लगभग बंद ही कर दिया। कई बार तो ऐसा लगता था कि वे दोनों जिन्न पति-पत्नि या प्रेमी-प्रेमिका के रूप में थे, हालांकि तलाकशुदा की तरह एकदूसरे से नाराज जैसे लगते थे, और एकदूसरे की ज्यादतियों से बचाने के लिए मेरे पास बारीबारी से आते-जाते थे। इससे मैं संतुलित हो जाया करता था। यह सब मनोवैज्ञानिक अनुभव है, मन के अंदर है, बाहर भौतिक रूप से कुछ नहीं है। उन्होंने मुझसे कभी सम्पर्क नहीं किया। वे मेरे मन में ऐसे रहते थे जैसे किसी पुराने परिचित या दोस्त की याद मन में बसी रहती है। मुझे लगता है कि वे असली जिन्न नहीं थे, बल्कि जिन्न की छाया मात्र थे, अर्थात दर्पण में बने प्रतिबिम्ब की तरह। अगर असली होते, तो उनमें अपना अहंकार होता, जिससे वे मुझे परेशान भी कर सकते थे, और मेरी योगसाधना में विघ्न भी डाल सकते थे। इसका मतलब है कि जिन्न या देवता की छाया ही योगसाधना में मदद करती है, उनका असली रूप नहीं। इसलिए यही कहा जाता है कि अमुक व्यक्ति में देवता की छाया प्रविष्ट हुई है, असली देवता नहीं। यह अनुभव भी इस्लामिक मान्यता के अनुसार ही है। हिन्दु मान्यता भी ऐसी ही है, क्योंकि चीज एक ही है, केवल नाम में अंतर हो सकता है। हिन्दू मान्यता के अनुसार भूत होते हैं। जैसा यह भौतिक लोक है, वैसा ही एक सूक्ष्म लोक है। जैसे जैसे लोग भौतिक लोक में होते हैं, बिल्कुल वैसे ही सूक्ष्म लोक में भी होते हैं। जैसे-जैसे क्रियाकलाप इस स्थूल भौतिक लोक में होते हैं, बिल्कुल वैसे-वैसे ही सूक्ष्म आध्यात्मिक लोक में भी होते हैं। एकसमान समारोह, मित्रता, वैर, रोजगार, पशु-पक्षी और अन्य सबकुछ बिल्कुल एक जैसा। उस सूक्ष्म लोक के निवासियों को ही भूत कहते हैं। वे आपस में टेलीपेथी से सम्पर्क बनाकर रखते हैं। वे सबको महसूस नहीं होते। उन्हें या तो योगी महसूस कर सकते हैं, या फिर वे जिन पर उन भूतों का आवेश आ जाए। तांत्रिक योगी तो उन्हें वश में कर सकते हैं, पर साधारण आदमी को वे अपने वश में कर लेते हैं। योगी उन्हें वश में करके उन्हें योगसाधना के बल से देवता या कुंडलिनी में रूपान्तरित कर देते हैं। इसी को भूतसिद्धि कहते हैं। बुरे लोग उनसे नुकसान भी करवा सकते हैं।

यह भी लगता है कि अल्लादिन की कहानी शिवतंत्र या उस जैसी तांत्रिक मान्यता से निकली है। जिसने यह कहानी बनाई, वह गजब का ज्ञानी, तांत्रिक और जागृत व्यक्ति लगता है। सम्भवतः उसे यौन तंत्र को स्पष्ट रूप में सामने रखने में मृत्यु का भय रहा होगा, क्योंकि पुराने जमाने की तानाशाही व्यवस्था में, खासकर इस्लामिक व्यवस्था में क्या पता कौन कब इसका गलत मतलब समझ लेता, और जान का दुश्मन बन जाता। इसलिए उसने रूपक कथा के माध्यम से तंत्र को अप्रत्यक्ष रूप से लोगों के अवचेतन मन में डालने का प्रयास किया होगा, और आशा की होगी कि भविष्य में इसे डिकोड करके इसके हकदार लोग इससे लाभ उठाएंगे। एक प्रकार से उसने गुप्त गुफा में खजाने को सुरक्षित कर लिया, और रूपक कथा के रूप में उस ज्ञान -गुफा का नक्शा भूलभूलैया वाली पहेली के रूप में छोड़ दिया। फिल्मों में दिखाए जाने वाले ऐसे मिथकीय खोजी अभियान इसी रहस्यात्मक तंत्र विज्ञान को अभिव्यक्त करने वाली मनोवैज्ञानिक चेष्ठा है। इसीलिए वैसी फिल्में बहुत लोकप्रिय होती हैं। वज्र पर जहाँ यौन संवेदना पैदा होती है, उस बिंदु को चिराग कहा गया है, क्योंकि वहाँ पर योनि-रुपी जमीन से रगड़ खाने पर उसमें संवेदना-रूपी प्रकाशमान ज्योति प्रज्वलित हो जाती है। उस प्रकाशमान ज्योति पर कुंडलिनी रूपी जिन्न पैदा हो जाता है। बोतल चिराग के साथ ही रखी होती है। इससे वह कुंडलिनी-जिन्न बोतल के अंदर प्रविष्ट हो जाता है। नाड़ी-छल्ला ही वह बोतल है, जो वज्रशिखा की सतह पर संवेदना-बिंदु से शुरु होकर मुलाधार से होता हुआ पीठ में ऊपर चढ़ता है, और आगे के नाड़ी चैनल से होता हुआ नीचे आकर फिर से उस संवेदना-बिंदु से जुड़ जाता है। वज्र का वीर्यनिकासी-द्वार ही उस बोतल का मुँह है। तांत्रिक विधि से वीर्यपतन को रोककर वीर्यशक्ति को ऊपर चढ़ाना ही जिन्न को बोतल में भरना है। वीर्यपात रोकने को ही बोतल के मुंह को ढक्क्न से बंद करना कहा गया है। साँसों की शक्ति के दबाव से ही जिन्न बोतल के अंदर घूमता है। अंदर को जाने वाली सांस से वह बोतल के पिछले हिस्से से ऊपर चढ़ता है, और बाहर आने वाली सांस से बोतल की अगली दीवार को छूता हुआ नीचे उतरता है। अगर मूलाधार से लेकर सहसरार तक के पूरे शरीर को बोतल माना जाए, तो पीठ को बोतल की पिछली दीवार, और शरीर के आगे के हिस्से को बोतल की अगली दीवार कह सकते हैं। चक्रोँ को जोड़ने वाली मध्य रेखा को बोतल की दोनों मुख्य दीवारों की अंदरूनी सतह पर स्थित एक विशिष्ट राजमार्ग कह सकते हैं, जिस पर जिन्न दौड़ता है। चक्रोँ को जिन्न के विश्रामगृह कह सकते हैं। वज्र को बोतल की गर्दन कह सकते हैं। आश्चर्यजनक समानता रखने वाला रूपक है यह। इस बोतल-रूपक के सामने तो मुझे हिन्दुओं का नाग-रूपक भी फीका लग रहा है। पर नाग-रूपक इसलिए ज्यादा विशेष प्रभावशाली हो सकता है, क्योंकि नाग जीवित प्राणी और कुदरती है, उसका जमीन वाला चौड़, चौड़ा फन, दोनों को जोड़ने वाला बीच वाला पतला भाग, और  कमर का गड्ढा बिल्कुल मानव-शरीर की बनावट की तरह है। जब जैसा रूपक उपयुक्त लगे, वैसे का ही ध्यान किया जा सकता है, कोई रोकटोक नहीं। 

बोतल का ढक्क्न खोलकर जिन्न को बाहर निकलने देने का मतलब है कि नियंत्रित और तांत्रिक तरीके से वीर्यपात किया। जिन्न के द्वारा ‘क्या हुक्म मेरे आका’ कहने का मतलब है, जिन्न या कुंडलिनी का बाहरी जगत में स्पष्ट रूप में दृष्टिगोचर होना। हालांकि जिन्न मन में ही होता है, पर वीर्य शक्ति के साथ बाहर गया हुआ महसूस होता है। फिर जिन्न के द्वारा आदमी के सभी कामों में मदद करने का अर्थ है, जिन्न का सभी कामों के दौरान एक विश्वासपात्र मित्र के रूप में अनुभव होते रहना। इससे दुनिया में अद्वैत और अनासक्ति का भाव बना रहता है, जिससे भौतिक सुखों के साथ आध्यात्मिक मुक्ति भी मिलती है। कुण्डलिनी रूपी जिन्न को शरीररूपी बोतल के अंदर कुण्डलिनी-योग-ध्यान की खुराक से लगातार पालते रहना पड़ता है। इससे वह शक्ति का संचय करता रहता है, और बाहर खुले में छोड़े जाने पर योगसाधक के बहुत से काम बनाता है। यह ऐसे ही है जैसे राजा लोग अपने अस्तबल में घोड़ों का पालन-पोषण बड़े समर्पण और प्यार से करवाते थे। उससे बलवान बने घोड़े जब बाहर खुले में निकाले जाते थे, तो बड़ी निष्ठा और समर्पण से राजा के काम करते और करवाते थे, शिकार करवाते थे, रथ खींचते थे, युद्ध में मदद करते थे, भ्रमण करवाते थे आदि।

पानी यिन है, और तनाव व भागदौड़ से भरा मनुष्य का तनमन याँग है। इसीलिए झील आदि के पास शांति मिलती है। वृक्ष का जड़ अर्थात अचेतन आकार यिन है, और उसमें जीवन याँग है। इसीलिए वृक्ष को देवता कहते हैं, और लोग अपने घरों के आसपास सुंदर वृक्ष लगाते हैं। मुलाधार यिन है, आज्ञा या सहस्रार चक्र यांग है। पत्थर आदि की चित्रविचित्र जड़ या मृत प्रतिमाऐं और मूर्तियां यिन है, और उनमें चेतन या जीवित देवता का ध्यान याँग है। यिनयांग की सहायता से सिद्ध होने वाला दुनियादारी वाला व्यावहारिक योग ही क्रियाशील कुंडलिनीयोग है। दूसरी ओर, कई बार बैठक वाले कुंडलिनी योगी की कुंडलिनी उम्रभर घुमती रहती है, पर वह जागृत नहीं हो पाती, और अगर होती है, तो बड़ी देर से होती है। इसीको इस तरह से कहा गया है कि गणेश ने ब्रह्मांड की परिक्रमा पहले कर ली। गणेश का विवाह कर दिया गया। उसको सिद्धि और बुद्धि नाम की दो कन्याएँ पत्नियों के रूप में प्रदान कर दी गईं। इनसे उसे क्षेम और लाभ नाम के दो पुत्र प्राप्त होते हैं। दरअसल यिन-यांग गठजोड़ दुनियादारी से सम्बंधित है। यह अनेक प्रकार के विरोधी गुणों वाले लोगों को साथ लेकर चलने की कला है। नेतृत्व की कला है। इससे प्रेमपूर्ण भौतिक सम्बंध बनते हैं, दुनिया में तरक्की मिलती है। नए-नए अनुभव मिलते हैं। इन्हीं दुनियावी उपलब्धियों को सिद्धि और बुद्धि कहा गया है। जबकि बैठक वाला कुंडलिनी योगी दुनिया से विरक्त की तरह रहता है। इससे उसे दुनियावी भौतिक लाभ नहीं मिलते। इसीको कार्तिकेय का अविवाहित होकर रहना बताया गया है। ऐसा उसने नारद मुनि की बातों में आकर नाराज होकर किया। नारद मुनि ने उसके कान भरे कि शिवपार्वती ने उसके साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है, और उसे गणेश की तुलना में बहुत कम आंका है। इससे वह नाराज होकर अपने मातापिता के निवासस्थान कैलाश पर्वत को छोड़कर क्रौंच पर्वत को चला जाता है, और वहीँ स्थायी रूप से निवास करने लगता है। आज भी उत्तराखंड स्थित क्रौंच पर्वत पर कार्तिकेय का रमणीय मंदिर है। शिवपार्वती आज भी प्रेम के वशीभूत होकर साल में एकबार उससे मिलने आते हैं। तब वहाँ मेला लगता है। वास्तव में कुंडलिनी योगी का मन ही नारद मुनि है। जब वह देखता है कि तांत्रिक किस्म के शरीरविज्ञान-दार्शनिक लोग दुनिया में हर किस्म का सुख, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष एकसाथ प्राप्त कर रहे हैं, पर उसे न तो माया मिल रही है और न ही राम, तब वह अपनी तीव्र कुंडलिनी योगसाधना कम कर देता है। इस प्रकार से हम गणेश जैसे स्वभाव वाले लोगों को तांत्रिक कर्मयोगी भी कह सकते हैं। इसीलिए गणेश चतुर व्यापारियों का मुख्य देवता होता है। आपने भी अधिकांश व्यापार-प्रचारक वार्षिक कैलेंडरों पर गणेश का चित्र बना देखा ही होगा। और उनमें साथ में लिखा होता है, ‘शुभ लाभ’। प्राचीन सभ्यताओं में इसीलिए देवीदेवताओं के प्रति भरपूर आस्था होती थी। पर बहुत से अब्रहामिक एकेश्वरवादियों ने उनका विरोध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आज भी आदिवासी जनजातियों में यह देवपूजन प्रथा विद्यमान है। हरेक कबीले का अपना खास देवता होता है। हिमालय के उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में मैंने खुद यह शक्तिशाली अद्वैत व कर्मयोग पैदा करने वाली प्रथा देखी है। हिमाचल का कुल्लू जिले का मलाणा गाँव तो इस मामले में विश्वविख्यात है। वहाँ सिर्फ देवता का प्रशासन काम करता है, किसी सरकारी या अन्य तंत्र का नहीं। उपरोक्तानुसार पत्थर आदि की चित्रविचित्र जड़ प्रतिमाऐं और मूर्तियां यिन है, और उनमें चेतन देवता का ध्यान याँग है। इस यिन -यांग के मिश्रण से ही सभी भौतिक और आध्यात्मिक शक्तियाँ मिलती हैं, हालांकि मिलती हैं कुंडलिनी के माध्यम से ही, पर रास्ता कर्मयोग व दुनियादारी वाला है। मतलब कि बैठक वाला कुंडलिनी योगी ज्यादा समय दुनिया से दूर नहीं रह सकता। वह जल्दी ही हतोत्साहित होकर अपनी कुंडलिनी को सहस्रार से आज्ञा चक्र को उतार देता है। वहाँ वह बुद्धिपूर्वक भौतिक जीवन जीने लगता है, हालांकि यिन-यांग गठजोड़ अर्थात शिवपार्वती से दूर रहकर, क्योंकि उसे दुनियादारी की आदत नहीं है। साथ में, वह ज्यादा ही आदर्शवादी बनता है। यही उसका शिवपार्वती अर्थात परमात्मा से नाराज होना है। दरअसल शिवपार्वती गठजोड़ ही असली परमात्मा हैं। अकेले शिव भी पूर्ण परमात्मा नहीं, और अकेली पार्वती भी नहीं। सहस्रार ही कैलाश और आज्ञाचक्र ही क्रौंच पर्वत है, जैसा कि एक पिछली पोस्ट में बताया गया है। शिव परमात्मा उसे अपनी तरफ आकर्षित करते रहते हैं, पुत्र-प्रेम के कारण। वैसे भी जीव शिव परमात्मा का पुत्र ही तो है। कई बार अल्प जागृति के रूप में उससे मिल भी लेते हैं। यही शिवपार्वती का प्रतिवर्ष उससे मिलने आना कहा गया है।

कुंडलिनी को मानवता से जोड़ने वाला धर्म बन सकता था इस्लाम

दोस्तों, अभी हाल ही में फ्रांस के पेरिस और ऑस्ट्रिया के विएना में इस्लाम के नाम पर जो आतंकवादी घटनाएं हुईं, वे बहुत दुर्भाग्यपूर्ण हैं। और अभी एक घटना और आ गई कि पाकिस्तान में एक चौकीदार ने धर्म के नाम पर अपने बैंक मैनेजर की हत्या कर दी और वहाँ उसका इस काम के लिए गर्मजोशी से स्वागत किया गया। साथ में, करतारपुर में स्थित सिखों के प्रमुख गुरुद्वारे का प्रबंधन सिखों से वापिस लेकर आईएसआई को दे दिया है। दुनिया जानती है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई इस्लामिक आतंकवादियों के संगठनों को चलाती है।पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में अनगिनत मंदिर तोड़ दिए गए हैं, और प्राचीन नक्काशियां लुप्तप्राय कर दी गई हैं। वहाँ पर आए दिन अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होते ही रहते हैं। भारत ऐसी घटनाओं का सदियों से भुक्तभोगी रहा है। आज हम इस तथ्य की विवेचना करेंगे कि इस्लाम कैसे कुंडलिनी को मानवता के साथ जोड़ने वाला धर्म बन सकता था, पर अपनी एकमात्र गलती कट्टरता के कारण चूक गया।

मूर्ति-पूजा के खंडन का असली मकसद इंसान का इंसान के प्रति प्रेम बढ़ाना था

इस्लाम मानवता का धर्म हो सकता था। ऐसा इसलिए, क्योंकि इस्लाम में केवल अल्लाह का ध्यान करने को कहा गया है, किसी मूर्ति वगैरह का ध्यान नहीं। फिर भी मूर्ति पूजा औऱ अन्य हिन्दू परम्पराओं का अपना अलग वैज्ञानिक दर्शन है, जिसकी अवहेलना नहीं की जा सकती। इसी तरह अन्य धर्मों का भी है। अल्लाह के ध्यान से अद्वैत का ध्यान खुद ही हो जाता है। उससे मन में कुंडलिनी स्वयं ही बस जाती है। स्वाभाविक है कि कुंडलिनी के रूप में किसी मनुष्य का ही स्मरण होगा, किसी मूर्ति या जानवर का नहीं। प्रियतम मनुष्य की वही छवि फिर कुंडलिनी बन जाती है। उससे मानवतापूर्ण प्रेम बढ़ता है। परंतु कट्टरता के कारण इस मानवता पर पानी फिर जाता है। अब जिससे प्रेम होगा, यदि कट्टरता के कारण उसे मारा गया, तो कैसा प्रेम। इसलिए इसी संभावित हिंसा के भय से किसी मनुष्य से असली प्रेम हो ही नहीं पाता। असली इस्लाम तो तब आएगा, जब उसमें कट्टरता और हिंसा पर पूर्ण विराम लगेगा। ऐसा कुंडलिनी तंत्र में होता है। उसमें जीवित गुरु या देवता आदि से प्रेम किया जाता है। उन्हीं के रूप की कुंडलिनी मन में बस जाती है। 

बहुत से धर्म शांतिपूर्ण ढंग से हिन्दू सनातन परम्पराओं का विरोध करते हैं

भारत में भी ऐसे बहुत से धर्म हैं, जो हिंदुओं की बहुत सी सनातन परम्पराओं को नहीं मानते। यह उनका अपना दृष्टिकोण है और उसमें कोई आपत्ति भी नहीं है, क्योंकि वे ऐसी वामपंथी मान्यता किसी के ऊपर थोपते नहीं हैं। इस्लाम को भी अपनी निजी परम्परा पर चलने का पूरा अधिकार है, औरों की धार्मिक स्वतंत्रता का हनन किए बगैर। पर इस्लाम अपनी मान्यता मनवाने के लिए कट्टर और हिंसक बन जाता है। जो वन विविधतापूर्ण न हो, वह सूना-सूना सा लगता है।

इस्लाम में हिंसा को शामिल करना मध्य युग की मजबूरी थी

इस्लाम के निर्माण के समय उसमें हिंसा पर जोर दिया गया। ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि उस समय के लोग अनपढ़ और जंगली होते थे। उन्हें समझाना लगभग असंभव सा ही होता था। समझाने के लिए शिक्षा के साधन भी आज की तरह नहीं थे। इसलिए भय को बनाना जरूरी था, क्योंकि भय की लहर खुद ही बहुत दूर तक फैल जाती है, शिक्षा के कट्टरतापूर्ण साधन के रूप में। खासकर अरब देशों में तो ऐसा ही था। भारत जैसे सभ्य और अनुकूल परिवेश वाले देश में तो प्रारम्भ से ही शिक्षा और समझ का बोलबाला था। अरब से धार्मिक कट्टरता और हिंसा की प्रथा को मुस्लिम आक्रमणकारी भारत में लेकर आए। आज के आधुनिक संसार में भी वह सदियों पुरानी परंपरा वैसी ही बनी हुई है। उसको संशोधित करना जरूरी है। समाज सुधार की तरह समय के साथ धर्म सुधार भी होता रहना चाहिए। इस्लाम को छोड़कर सभी धर्मों में सुधार हुए हैं। मुसलमानों को मिलकर यह बात समझनी चाहिए, और दूसरे धार्मिक समुदायों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आधुनिकता के साथ आगे बढ़ते रहना चाहिए।

कुण्डलिनी के विकास के लिए कोरोना (कोविड-19) से सहायता प्राप्त करना; नई दिल्ली की निजामुद्दीन-मस्जिद में तबलीगी जमात के मरकज की घटना; एक आध्यात्मिक-मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

हम किसी भी धर्म का समर्थन या विरोध नहीं करते हैं। हम केवल धर्म के वैज्ञानिक और मानवीय अध्ययन को बढ़ावा देते हैं।

इस पोस्ट में दी गई समाचारीय सूचना को सबसे अधिक विश्वसनीय माने जाने वाले सूत्रों से लिया गया है। इसमें लेखक या वैबसाईट का अपना कोई योगदान नहीं है।

दोस्तों, अभी दुनियाभर में लौक डाऊन का सख्ती से पालन किया जा रहा है, ताकि कोरोना महामारी से बचा जा सके। भारत में भी पूरे देश में 14 अप्रैल तक संपूर्ण लौकडाऊन है। यह लौकडाऊन 21 दिनों का है। सभी लोग अपने घरों में कैद हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कह रहे हैं कि उससे कुछ दिनों के लिए तो महामारी कम हो जाएगी, पर लगभग 45 दिनों के लगातार लौकडाऊन से ही महामारी से पूरी तरह से बचा जा सकता है।

ऐसी लौकडाऊन की स्थिति में इस्लाम को मानने वाली कट्टरपंथी तबलीगी जमात के लोग कोरोना वायरस से दोस्ती निभा रहे हैं। नई दिल्ली में अनेक कोरोना संक्रमित देशों के लोग अभी हाल ही में इकट्ठे हुए, जब नई दिल्ली में कर्फ्यू लगा हुआ था। ये लोग टूरिस्ट वीजा पर भारत आए हुए थे, पर यहाँ पर वे धर्म-प्रचार कर रहे थे, जो कि अवैध है। इन्होंने पुलिस की चेतावनी को भी नहीं माना। अनेकों बार पुलिस भी इनसे डरती है, क्योंकि ये सामने तो खुली हिंसा पर उतारू हो जाते हैं, पर पीठ के पीछे प्रताड़ित होने का ढोंग करते हैं। अधिकाँश देशी-विदेशी मीडिया भी इन्हें प्रताड़ित की तरह प्रस्तुत करते हैं। सूक्ष्म परजीवियों (कोरोना वायरस) की भी शरीर के अन्दर ऐसी ही स्ट्रेटेजी होती है। मीडिया टेप के सामने आने से यह खुलासा हुआ है कि निजामुद्दीन की उस तबलीगी मस्जिद में उसके अध्यक्ष मौलाना साद लोगों को भड़का रहा है। वह सभी को कह रहा है कि मुसलामानों को आपस में नजदीकी बनाए रखना चाहिए, और एक थाली में खाना खाना नहीं छोड़ना चाहिए। और कहता है कि कोरोना वायरस का प्रोपेगेंडा मुसलमानों को अलग-थलग करने के लिए फैलाया गया है। अल्लाह ने अगर कोरोना से मौत लिखी है, तो कोई नहीं बचा सकता। मस्जिद में मरने से अच्छा क्या काम हो सकता है। अल्लाह को मानने वाले डाक्टर से ही अपना इलाज करवाएं। फिर वे लोग उस मस्जिद से निकलकर पूरे देश में फैल गए। उनमें से बहुत से लोग कोरोना से संक्रमित पाए गए। कुछ मर गए। बहुत से लोग अभी भी मस्जिद आदि में छुपे हुए हैं, जो पकड़ में नहीं आ रहे हैं। यहाँ तक कि जब कुछ लोगों को क्वारनटाइन में रखने का प्रयास किया गया, तो वे हरेक हिदायत को ठुकराने लगे, दुर्व्यवहार करने लगे, पत्थरबाजी करने लगे (कुछ तो फायरिंग करते हुए भी सुने गए), और कर्मचारियों पर थूकने लगे, ताकि कोरोना वायरस हर जगह फैल सके। इस घटना के बाद पूरे देश में कोरोना मरीजों की संख्या एकदम से बढ़ी है, जिसने लौकडाऊन की सफलता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।

कुण्डलिनी जीवन और मृत्यु के संगम में निहित है       

धार्मिक शास्त्रों में मृत्यु से संबंधित युद्ध, दुर्भिक्ष आदि आपदाओं की बहुत सी कहानियां आती हैं। साथ में, उन्हीं शास्त्रों में ही जीवन से भरपूर कथा-रस भी बहुतायत में है। इससे जीवन और मृत्यु के संगम की अनुभूति होती है। उसी संगम को अद्वैत कहते हैं। उसी अद्वैत के साथ कुण्डलिनी भी विद्यमान होती है। यह धार्मिकता कथा-कहानियों तक ही सीमित रहनी चाहिए। जब उन्हें असली जीवन में हूबहू उतारने का प्रयास किया जाता है, तब उसे अतिवादी या कट्टर धार्मिकता कहा जाता है।

कुण्डलिनी की प्राप्ति के लिए अति लालसा से प्रेरित होकर ही अमानवीय काम होते हैं

इसी वजह  से ही कई बार कुण्डलिनी योगी नीरस, उबाऊ, कट्टर, अमानवीय, व उग्रवादी जैसे लगते हैं। ऐसा इसलिए लगता है, क्योंकि उनमें मृत्यु का भय नहीं होता। अपनी कुण्डलिनी के प्रभाव से वे जीवन-मृत्यु में, यश-अपयश में, व सुख-दुःख में समान होते हैं। उनके मन में यह समता कुण्डलिनी योग साधना से छाई होती है। परन्तु धार्मिक कट्टरवादी इस समता/अद्वैत को अमानवीय कामों से पैदा करते हैं। वे गलत काम करते हैं, ताकि उनके मन से मृत्यु, अपयश व दुःख का भय ख़त्म हो ज्जाए।  इससे वे भी जीवन-मृत्यु में, यश-अपयश में, व सुख-दुःख में समान रहने लगते हैं। इस अद्वैत से उनके मन में कुण्डलिनी अप्रत्यक्ष तरीके से आकर बस जाती है।

मतलब साफ है कि कुण्डलिनी योगी कुण्डलिनी की मदद से अद्वैत को प्राप्त करता है, परन्तु धार्मिक कट्टरवादी आमानवीय कामों से अद्वैत को प्राप्त करता है। किसी कारणवश धार्मिक कट्टरवादी कुण्डलिनीयोग नहीं कर पाते हैं। उनके पास मध्य मार्ग के अनुसार संतुलित व तांत्रिक जीवन जीने का अवसर होता है, पर वे उस पर विशवास नहीं करते, और उसे बहुत धीमा तरीका भी मानते हैं। आध्यात्मिक मुक्ति के प्रति इसी अति लालसा से प्रेरित होकर वे अमानवतावादी बन जाते हैं। उनमें से बहुत कम लोग ही सफल हो पाते हैं, बाकि सारे तो नरक की आग में गिर जाते हैं। तभी  तो कई धर्मों में पुनर्जन्म को माना गया है, ताकि आदमी निरुत्साहित होकर अमानवीय न बन जाए, और वह यह समझ सके कि उसकी साधना की कमी उसके अगले जन्म में पूरी हो जाएगी।

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कुण्डलिनी ही दंगों के लिए जिम्मेदार है, और कुण्डलिनी ही दंगों से सुरक्षा के लिए भी जिम्मेदार है; एनआरसी के विरोध में दिल्ली दंगों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

हम किसी भी धर्म का समर्थन या विरोध नहीं करते हैं। हम केवल धर्म के वैज्ञानिक और मानवीय अध्ययन को बढ़ावा देते हैं।

पिछली पोस्ट में हमने पढ़ा कि किस प्रकार से दिल्ली दंगों की तैयारी बेहतरीन बारीकी, तालमेल और गोपनीयता से लम्बे समय से चल रही थी। हिंसक अभियान को अंजाम देने वाली ऐसी उम्दा कार्यशैली तो हमारे अपने शरीर में ही दिखाई देती है, अन्यत्र कहीं नहीं। क्योंकि हमारा पूरा शरीर कुण्डलिनी शक्ति (अद्वैत शक्ति) के द्वारा चलायमान है, इससे सिद्ध होता है कि दिल्ली की जेहादी मानसिकता वाली घटना के पीछे भी कुण्डलिनी शक्ति का ही मुख्य योगदान था।

कुण्डलिनी से ही पिंड (माईक्रोकोस्म) और ब्रह्माण्ड (मैक्रोकोस्म) की सत्ता है

शरीरविज्ञान दर्शन में शरीर के सूक्ष्म समाज और मनुष्य के स्थूल समाज के बीच में पूर्ण समानता सिद्ध की गई है। जब-२ मैं उस दर्शन के बारे में विचार करते हुए काम करता था, तब-२ मेरे मन में कुण्डलिनी (अद्वैत शक्ति) छा जाया करती थी। इस दर्शन के 15 साल के अभ्यास से मेरी कुण्डलिनी एकबार क्षणिक रूप से जागृत भी हुई थी। इससे सिद्ध होता है कि शरीर अद्वैत तत्त्व या कुण्डलिनी से चलायमान है, क्योंकि जहाँ अद्वैत तत्त्व है, वहां पर कुण्डलिनी भी विद्यमान है। क्योंकि हमारा शरीर सृष्टि की हूबहू नक़ल है, इसलिए सृष्टि के मामले में भी कुण्डलिनी ही पूरी तरह से जिम्मेदार है।

हमारे अपने शरीर की सुरक्षा प्रणाली बड़ी जटिलता और सटीकता प्रदर्शित करती है

हमारे शरीर की सुरक्षा प्रणाली में भी सूक्ष्म सैनिक (श्वेत रक्त कण), सूक्ष्म अधिकारी (होरमोन आदि), सूक्ष्म सैन्य वाहन (ब्लड फ्लो से मोबिलिटी), सूक्ष्म हथियार (टोक्सिन आदि), सूक्ष्म गुप्तचर (विभिन्न सन्देश प्रणालियाँ) व अन्य सभी कुछ सूक्ष्म रूप में होता है। चालाकी से भरी हुई सूक्ष्म योजनाएं (जैव रासायनिक अभिक्रियाएँ आदि) बनती हैं। शरीर पर हमला करने वाले सूक्ष्म उग्रपंथियों (कीटाणुओं) को मारने के लिए अनेक प्रकार के हथकंडे अपनाए जाते हैं। यदि दिल्ली के सुरक्षाबलों के पास भी ऐसी ही कार्यशैली होती, तो उग्रपंथी दंगे न कर पाते। यदि वे भी देह-देश की तरह ही कुण्डलिनी की सहायता लेते, तो अवश्य सहायता मिलती।

शरीर पर हमला करने वाले कीटाणु (जैसे कि कोरोना वायरस) भी कुण्डलिनी की मदद से ही कई बार शरीर की सुरक्षा व्यवस्था को धूल चटा देते हैं

कीटाणुओं (उग्रपंथियों, उदाहरण के लिए कोरोना वायरस) की कार्यप्रणाली भी बड़ी जटिल व चतुराई से भरी होती है। वे शरीर को तबाह करने का प्रयास पूरी तत्परता व धर्म-निष्ठा से करते हैं। वैसा वे कुण्डलिनी की सहायता लेकर करते हैं। फर्क सिर्फ यह है कि वे अमानवीय काम को अंजाम देने के लिए कुण्डलिनी की मदद लेते हैं, जबकि श्वेत रक्त कण (सुरक्षक सैनिक) मानवता को बचाने के लिए।

हर बार शरीर-समाज के सैनिक अपने समाज पर हमला करने वाले उग्रपंथियों को मुंहतोड़ जवाब देकर उन्हें तबाह करते हैं। विरले मामलों में वे उग्रपंथी शरीर-समाज पर भारी पड़ जाते हैं, जिससे शरीर रोगी बन जाता है। वैसी हालत में भी शरीर उनका डट कर मुकाबला करता है। वैसे मामलों में भी बहुत विरले मामलों में ही सूक्ष्म उग्रपंथी शरीर को तबाह कर पाते हैं।

परन्तु हमारे अपने स्थूल समाज में इससे उलट हो रहा है। धार्मिक उग्रपंथी धर्म के नाम से कुण्डलिनी की मदद लेते हुए हर बार जान-माल का बहुत नुक्सान कर जाते हैं। विरले मामलों में ही सुरक्षाबल उनकी योजनाओं को विफल कर पाते हैं। इसका मतलब है कि हमारे सुरक्षाबलों को सशक्त होने की जरूरत है, जिसके लिए कुण्डलिनी की भरपूर सहायता प्राप्त की जानी चाहिए।  

अनगिनत संख्या में युद्ध, इस शरीर-देश के अंदर और बाहर चल रहे हैं, हर पल। घृणा से भरे कई दुश्मन, लंबे समय तक सीमा दीवारों के बाहर जमे रहते हैं, और शरीर-मंडल/देश पर आक्रमण करने के सही अवसर की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। जब किसी भी कारण से इस जीवित मंडल की सीमा-बाड़ क्षतिग्रस्त हो जाती है, तो वे दुश्मन सीमा पार कर जाते हैं। वहां पर वे रक्षा विभाग की पहली पंक्ति के द्वारा हतोत्साहित कर दिए जाते हैं, जब तक कि रक्षा-विभाग की दूसरी पंक्ति के सैनिक उन दुश्मनों के खिलाफ कड़ी नफरत और क्रोध दिखाते हुए, वहां पहुँच नहीं जाते। फिर महान युद्ध शुरू होता है। अधिकांश मामलों ………..

हमारा अपना शरीर एक अद्वैतशाली ब्रम्हांड-पुरुष

यह पोस्ट “शरीरविज्ञान दर्शन” पुस्तक से साभार ली गई है।

शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)

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कुण्डलिनी से प्रेरित होकर ही धर्म या परंपरा का निर्माण हुआ, जिससे पैदा होने वाले अद्वैत के नशे के अन्दर कुछ स्वार्थी धार्मिक कट्टरपंथियों ने नफरत का इतना जहर घोल दिया, जिससे पैदा होने वाली हिंसा से कई सभ्यताएं व संस्कृतियाँ समूल नष्ट हो गईं, और कई नष्ट होने की कगार पर हैं

हम किसी भी धर्म का समर्थन या विरोध नहीं करते हैं। हम केवल धर्म के वैज्ञानिक और मानवीय अध्ययन को बढ़ावा देते हैं।

दोस्तों, अभी हाल ही में दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक ताहिर हुसैन के घर की छत से बहुत से देसी हथियार बरामद हुए हैं, जिनसे दिल्ली में मासूम लोगों की भीड़ को निशाना बनाया गया, जिससे बहुत से लोगों की जानें भी गईं। वास्तव में वह एकाएक नहीं हुआ। उसके लिए कट्टरपंथियों की योजना बड़े सुनियोजित तरीके से लम्बे समय से चल रही थी। वास्तव में उस साजिश को रचने के लिए इस्लामिक कट्टरपंथियों के द्वारा कुण्डलिनी-सिद्धांत का ही सहारा लिया गया, हालांकि दुनिया के सामने ये कुण्डलिनी को सिरे से नकारते हैं।

कुण्डलिनी एक शक्ति है, जो कुछ धार्मिक परंपरागत मामलों में अच्छे कामों की तरह ही बुरे काम भी करवा सकती है

हमें इस भ्रम में कभी नहीं रहना चाहिए कि कुण्डलिनी आदमी से बलपूर्वक अच्छे काम करवाती रहती है। यह सत्य है कि कुछ सीमा तक कुण्डलिनी आदमी को अच्छे काम करने के लिए प्रेरित करती है। परन्तु अंतिम निर्णय लेने की स्वतंत्रता आदमी के अपने पास ही होती है। आदमी कुण्डलिनी के इशारे को बलपूर्वक नजरअंदाज करके कुण्डलिनी शक्ति से बुरे काम को भी अंजाम दे सकता है। यद्यपि उससे उसे बहुत बड़े पाप का भागी बनना पड़ता है। कुण्डलिनी का ऐसा ही दुरुपयोग कुछ काले तांत्रिक करते हैं। तभी तो कहा है कि कुण्डलिनी तंत्र यदि स्वर्ग दे सकता है, तो नरक भी दे सकता है। परन्तु डरने की बात नहीं। ऐसा अक्सर तभी होता है, जब लम्बी परंपरा के वशीभूत होकर कुण्डलिनी के इशारे को लम्बे समय तक दबाया जाता है। ऐसी ही एक विकृत परम्परा धार्मिक कट्टरपंथियों व उग्रपंथियों की है, जो धर्म के नाम पर अमानवीय काम करते हैं। वैसे कुण्डलिनी आदमी को सुधरने के अवसर लागातार देती रहती है। जब-२ आदमी गलत काम करने वाला होता है, तब-२ यह एक सच्चे गुरु की तरह आदमी के सामने आने लगती है, और उसे समझाने जैसे लगती है। अच्छे काम करने पर यह शाबाशी भी देती है।

कुण्डलिनी को आसानी से सबके लिए उपलब्ध करवाने के लिए ही नियमबद्ध परंपरा या धर्म का निर्माण होता है

परंपरा या धर्म की रचना भी कुण्डलिनी सिद्धांत से ही प्रेरित थी। आम आदमी कुण्डलिनी को नहीं समझ सकता था। इसलिए धर्म या परम्परा के नाम से आदमी को बाँधने वाला मानसिक खूंटा बनाया गया। उसमें आदमी के हरेक काम व व्यवहार के नियम बनाए गए, जिनसे आदमी का मन हर समय उस धर्म विशेष से बंधा रहता। उससे आदमी नशे के जैसी मस्ती व आनंद में डूबा रहने लगा। अवसादरोधी (एंटीडिप्रेसेंट) दवाओं (ड्रग्स) को खाने से भी वैसा ही कुण्डलिनी जैसा नशा महसूस होता है। तभी तो साम्यवादी लोग धर्म को एक प्रकार का नशा मानते हुए उसका विरोध करते हैं। हालांकि नशे से उत्पन्न अद्वैत और कुण्डलिनी से उत्पन्न अद्वैत के बीच में गुणवत्ता का बहुत फर्क होता है।

इतिहास गवाह है कि धर्म के नशे से कई सभ्यताएं रक्तरंजित हुईं

धर्म के नशे के कारण आदमी अंधा जैसा हो गया। वह धर्म पर इतना विश्वास करने लगा कि उसे उसमें बताई गई गलत बातें भी सही लगने लगीं। इसी धर्म के नशे की कड़वाहट में छुपाकर कई स्वार्थी व अमानवीय तत्त्वों ने इतना ज्यादा नफरत का जहर घोला, जिससे कई संस्कृतियाँ व सभ्यताएं रक्तरंजित हुईं।

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कुण्डलिनी से रचनात्मक संकल्पों की उत्पत्ति ही भगवान् नारायण (विष्णु) के नाभि कमल से ब्रम्हा (ब्रम्हदेव) की उत्पत्ति बताई गई है

यह प्रमाणित किया जाता है कि हम किसी भी धर्म का समर्थन या विरोध नहीं करते हैं। हम केवल धर्म के वैज्ञानिक और मानवीय अध्ययन को बढ़ावा देते हैं।

दोस्तों, इस हफ्ते मैं कुछ राईटर-ब्लोक को महसूस कर रहा था। फिर हफ्ता ख़त्म होने को आते ही मुझे अपनी मानवीय जिम्मेदारी का अहसास हुआ। हम सभी को अच्छी, सच्ची और वैज्ञानिक बातों का प्रचार-प्रसार करना चाहिए। यह हम सभी का फर्ज है। हिन्दुवाद कोई धर्म नहीं है। यह एक शुद्ध विज्ञान है। यह मानवतावादी विज्ञान है। यह कुण्डलिनी विज्ञान है। यह आध्यात्मिक मनोविज्ञान है। क्योंकि शरीर और संसार मन के ही अधीन हैं, इससे सिद्ध होता है कि हिन्दुवाद एक भौतिक विज्ञान भी है। इसकी अनेक बातें विज्ञान की कसौटी पर खरी उतरी हैं। सैंकड़ों सालों से विभिन्न कट्टर धर्मवादियों व अधर्मवादियों द्वारा इसे नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। आज तो वे इसे जड़ से उखाड़ने के लिए चारों और से एकजुट हो गए हैं। इस्लामिक राष्ट्र बनने का तेजी से बढ़ रहा ख़्वाब इसका एक जीता-जागता उदाहरण है। इसी तरह, विभिन्न धर्मों (इसाई धर्म समेत) द्वारा जबरदस्ती या छलपूर्वक धर्मांतरण इसका दूसरा उदाहरण है। भारत में ये दोनों प्रकार के हिन्दूविरोधी वैचारिक अभियान (एजेंडे) हाल के वर्षों में तेजी से बढ़े हैं। हाल ही में शरजिल इमाम (जेएनयू में आईआईटी ग्रेजुएट और पीएचडी स्कोलर) ने अपने भड़काऊ भाषण के बाद पुलिस के सामने बिना पछतावे के ये बातें कबूली भी हैं।  यदि समय रहते हुए हमने हिन्दुवाद को विज्ञान के साथ प्रस्तुत नहीं किया, तो हमारी आने वाली पीढियां इससे वंचित रह सकती हैं।

हिन्दुवाद का सभी कुछ कुण्डलिनी आधारित है। सारा हिन्दुवाद कुण्डलिनी के चारों और घूमता है। कुण्डलिनी ही इसकी धुरी में है। कुण्डलिनी की प्राप्ति के लिए ही पूरा हिन्दुवाद समर्पित है। इसी प्रकार का एक वैज्ञानिक तथ्य है, कुण्डलिनी और ब्रह्मा-विष्णु के बीच का वैज्ञानिक अंतर्संबंध। इसे हम इस पोस्ट में वर्णित करेंगे।

भगवान् विष्णु/नारायण ही कुण्डलिनी के रूप में हैं

जैसे कि मैंने पूर्व में भी वर्णित किया है कि जैसे भगवान् विष्णु शेषनाग पर शयन करते हैं, उसी प्रकार कुण्डलिनी भी तंत्रिका तंत्र (शेषनाग जैसी आकृति वाले) में विराजमान रहती है। नारायण ही कुण्डलिनी हैं, कुण्डलिनी ही नारायण है। दोनों एक ही हैं। अब चाहे उसे सुवर का, मछली का, कछुए का, देवता का, प्रेमी का, गुरु का आदि किसी का भी रूप दिया जाए। वैसे भी नारायण ने ऐसे अनेकों रूपों में अवतार लिया भी है।

रचनात्मक विचार व संकल्प ही भगवान् ब्रह्मा/ब्रह्मदेव के रूप में हैं

यह वेदों में साफ लिखा है कि सृष्टि के मन को ही ब्रह्मा कहते हैं। वह रचनात्मक समष्टि-मन/ब्रह्मांडीय मन, जिसने इस सृष्टि का निर्माण किया है, वही ब्रह्मा है।

कुण्डलिनी से रचनात्मक विचार व संकल्प उत्पन्न होते हैं

जो विचार क्रिया के रूप में प्रकट हो जाएं, वे संकल्प कहलाते हैं। शक्तिशाली विचार को ही संकल्प कहते हैं। एक अकेला व कार्यकारी विचार तभी संकल्प बन सकता है, जब मन में अन्य विचारों का शोरशराबा न हो। मतलब कि जब मन शांत हो। तब मन की शक्ति उस अकेले विचार को लगती है, जिससे वह पुष्ट होकर संकल्प बन जाता है, और रचनात्मक काम को पैदा करता है। मन की शान्ति कुण्डलिनी से ही प्राप्त होती है। यह देखा भी गया है कि बहुत से लोगों की कामयाबी के पीछे कुण्डलिनी ही होती है। किसी गुरु, प्रेमी आदि से प्रेरणा लेकर कामयाबी प्राप्त करने का भी यही अर्थ है कि गुरु आदि की छवि आदमी के मन में लगातार बसी रही। वह चिरस्थायी मानसिक छवि ही तो कुण्डलिनी है। इसका मतलब है कि प्रेरणा से कामयाबी भी कुण्डलिनी के माध्यम से ही मिलती है। ऐसा मैंने खुद अनुभव किया है। वैज्ञानिक तौर से भी सिद्ध हो गया है कि योग (कुण्डलिनी) रचनात्मकता को बढ़ाता है।

कुण्डलिनी की नाभि में ही विचार व संकल्प पैदा होते हैं

नाभि केंद्र को कहते हैं। कुण्डलिनी के ध्यान के साथ विविध नए-पुराने विचार प्रकट होते हैं। उनमें से फालतू विचार शांत हो जाते हैं। उससे लाभदायक विचार ताकतवर बनकर संकल्प बन जाते हैं। इसी प्रकार भगवान् नारायण की नाभि से भगवान् ब्रह्मा (संकल्प-रूप) उत्पन्न होते हुए बताए गए हैं। जब मैं रचनात्मक कामों में व्यस्त रहता था, तब मुझे अपनी कुण्डलिनी से बहुत सहयोग मिलता था। इस प्रकार सिद्ध हो जाता है कि पुराणों में जो भगवान् विष्णु की नाभि से ब्रह्मा की उत्पत्ति बताई गई है, वह कुण्डलिनी से उत्पन्न रचनात्मकता की ही व्याख्या की गई है। ऐसा दोनों मामलों में होता है, क्योंकि जो हमारे शरीर में घटित हो रहा  है, वह सभी कुछ ब्रह्माण्ड में भी वैसा ही घटित हो रहा है।

only indicative image (केवल संकेतात्मक चित्र)

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ਇਸ ਪੋਸਟ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬੀ ਵਿਚ ਪੜ੍ਹਨ ਲਈ ਇੱਥੇ ਕਲਿੱਕ ਕਰੋ (ਕੁੰਡਲਨੀ ਤੋਂ ਰਚਨਾਤਮਕ ਮਤਿਆਂ ਦੀ ਪੈਦਾਈਸ੍ਹ ਭਗਵਾਨ ਨਾਰਾਇਣ (ਵਿਸ਼ਨੂੰ) ਦੇ ਨਾਭੀ ਕੰਵਲ ਤੋਂ ਬ੍ਰਹਮਾ (ਬ੍ਰਹਮਦੇਵਾ) ਦੀ ਪੈਦਾਈਸ੍ਹ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਦੱਸੀ ਗਈ ਹੈ।)

कुण्डलिनी द्वारा सुरक्षा की भावना के विकास के माध्यम से दंगों की रोकथाम

आजकल अधिकाँश लोगों में जरुरत से ज्यादा असुरक्षा की भावना बढ़ गई है। जो लोगों के पास है, उसका वे पूरा आनंद उठा ही नहीं पाते हैं। इसका कारण यही है कि वे भविष्य की चिंता अधिक करते हैं। लोगों के अन्दर भविष्य के मामले में असुरक्षा की भावना इस कदर बढ़ गई है कि वे हिंसक होकर अपने वर्तमान को बिगाड़ने पर तुल गए हैं। उदाहरण के लिए, भारत की संसद से पारित किए गए एक बिल को ही लें। इस बिल का नाम नागरिकता संशोधन विधेयक / सीएए (citizen amendment act/ CAA) है। इस बिल में पड़ौसी देशों में प्रताड़ित धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारत में नागरिकता देने का प्रावधान है। ये पड़ौसी देश वही हैं, जो धर्म के नाम पर भारत से अलग हुए थे। वे देश तो इस्लामिक राष्ट्र बन गए, पर भारत धर्मनिरपेक्ष (यद्यपि मुस्लिम तुष्टिकरण के साथ) देश बना रहा।

उपरोक्त बिल के विरोध के लिए भारत के मुस्लिम भाइयों को स्वार्थपरक राजनेताओं व बुद्धिजीवियों द्वारा धर्म के नाम पर भड़काया जा रहा है। वे इसके विरोध में हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका मानना है कि वर्तमान में तो यह बिल उचित और मानवतावादी है। उनके मन का डर तो केवल अनजाने भविष्य के प्रति आशंकाओं (एनआरसी / NRC बिल आदि) को लेकर है। ऐसे लोग क़ानून से बच नहीं पाएंगे।

भविष्य से सम्बंधित सुरक्षा की भावना के मामले में पशु मनुष्य से बेहतर हैं

मैं पिछले गर्मी के मौसम में अपनी पत्नी के साथ सायं भ्रमण कर रहा था। वहां हम एक घास के मैदान में बने एक बैंच पर बैठ गए। वहां पर एक गाय बैठी थी, जो बड़े आराम से जुगाली कर रही थी। ऐसा लग रहा था कि दुनिया के सारे सुख उसे उस समय मिले हुए थे। वह प्रसन्न थी। उसके चेहरे पर अपने निकट भविष्य की चिंता जरा भी नजर नहीं आ रही थी। कुछ ही महीनों में कड़ाके की ठण्ड पड़ने वाली थी। वह बेघर थी, इसलिए स्वाभाविक था कि दो महीने की सर्दियों की रातों का ख्याल ही उसके होश उड़ा देता। पर वह उससे बेखबर होकर अपनी मौजूदा स्थिति का भरपूर लुत्फ उठा रही थी। कोई आदमी होता, तो पूरा गर्मियों का मौसम डर-२ के गुजरता। वह आने वाली सर्दियों की चिंता में डूबा रहता, और गर्मियों की सुहानी रातों का जरा भी आनंद न ले पाता। अपने विश्लेषण करने वाले दिमाग पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करने से ऐसा ही होता है। ऐसे झूठे दिमागी जंजालों से बचने के लिए अद्वैत और कुण्डलिनी का सहारा लेना चाहिए।

कुण्डलिनी से सुरक्षा की भावना कैसे बढ़ती है?

कुण्डलिनी योग से मन की कुण्डलिनी मजबूत होती है। उससे अद्वैत भाव मजबूत होता है। अद्वैत भाव के मजबूत होने से आदमी को सभी कुछ एकसमान लगता है। इससे उसके मन में किसी ख़ास चीज के प्रति आसक्ति नहीं रहती। वह किसी ख़ास चीज को प्राप्त करने के लिए छटपटाता नहीं है। इसी वजह से वह किसी भी परिस्थिति का विरोध नहीं करता। यदि कभी करता भी है, तो शांतिपूर्वक ढंग से करता है। मानवता, अहिंसा, और शांति तो कुण्डलिनी योगी के अन्दर सबसे प्रमुख गुण होते हैं। कुण्डलिनी इंसान को इंसान बनाती है।

कुण्डलिनी समस्याओं से कैसे बचाती है?

कुण्डलिनी आदमी को नियंत्रित रखती है। वह आदमी को भड़कने नहीं देती। वह आदमी के धीरज को बढ़ाती है। उससे अद्वैत व शान्ति का अनुभव होता है। उससे दिमाग अच्छी तरह से व सकारात्मक रूप से काम करने लगता है। उससे समस्या को सुलझाने में मदद मिलती है। कुण्डलिनी पूरे शरीर में घूमती रहती है, जिससे पूरा शरीर स्वस्थ रहता है। उससे आदमी का शरीर बलवान और मेहनती बनता है। उससे भी समस्याएँ सुलझने लगती हैं।

यह सत्य सिद्धांत है कि कर्म का फल अवश्य मिलता है। कुण्डलिनी से आदमी बुरे काम कर ही नहीं पाता। उससे उसे भविष्य में बुरे फल मिलने की सम्भावना नहीं रहती। उससे भविष्य की समस्याएँ रुक जाती हैं।

कुण्डलिनी योग एक वैज्ञानिक और प्राकृतिक धर्म

इतिहास गवाह है कि अधर्म ने मानवता का उतना नुक्सान नहीं किया है, जितना धर्म ने किया है। सबसे पहला, प्राकृतिक और मानवतावादी धर्म कुण्डलिनी योग ही था। उसको किसी विशेष स्थान से सम्बन्ध रखने वाले और विशेष विचारधारा वाले लोगों के संगठन ने अपनाया। उससे हिन्दु धर्म बन गया। कुछ दूसरे स्थानों पर रहने वाले लोगों के विभिन्न संगठनों ने हिन्दु धर्म का विरोध करने वाले कुछ विभिन्न धर्म बना लिए। परन्तु वे इस गलतफहमी में रहे कि कुण्डलिनी योग हिन्दु धर्म की खोज है। वे आज तक इसी भ्रम में हैं। इसीलिए वे कुण्डलिनी योग को अपनाने में हिचकिचाते हैं। परन्तु वास्तविकता यह है कि कुण्डलिनी योग पूरी तरह से वैज्ञानिक, बेरंग और कुदरती है। कुण्डलिनी योग के बिना तो कोई भी धर्म अधूरा है।

प्रेमयोगी वज्र के जीवन में कुण्डलिनी का योगदान

वह एक बिलकुल साधारण आदमी था। जब से उसे कुण्डलिनी का साथ मिला, तभी से वह तरक्की करने लगा। उसे तो कुण्डलिनी का बहुत सहयोग मिला। वास्तव में भगवान् कुण्डलिनी के माध्यम से ही सहायता करता है। उसी की सहायता से वह उच्च अध्ययन कर पाया। उसी की सहायता से वह उच्च भावना के साथ लोगों की सेवा कर पाया। उसी की वजह से वह उच्च स्तर का जीवन जी पाया। उसी की वजह से वह अनेक प्रकार की समस्याओं से बच पाया, और अनेक प्रकार की समस्याओं पर काबू पा पाया।

वह एक बार अपने घर समेत अपनी सारी संपत्तियों को छोड़कर घर से बहुत दूर चला गया। इससे उसकी भविष्य की सभी चिंताएं मिट गईं। उस नए व वीरान स्थान पर उसे अपनी असुरक्षा की भावना बिलकुल भी महसूस नहीं हुई। इससे उसे शान्ति मिली और वह कुण्डलिनी के बारे में अध्ययन करने लगा, और कुण्डलिनी योग करने लगा। एक साल के अन्दर ही उसकी कुण्डलिनी जागृत हो गई। कुण्डलिनी जागरण का अर्थ है, दुनिया के सभी सुखों की एकसाथ प्राप्ति। इससे मन पूरी तरह से तृप्त और संतुष्ट हो जाता है।

सीधा सा अर्थ है कि भविष्य को लेकर चिंता और असुरक्षा की भावना झूठी होती है। उनसे कुछ प्राप्त नहीं होता है, बल्कि जो अपने पास होता है, वह भी चला जाता है। इनसे जितना बचा जा सके, बचना चाहिए।

कुण्डलिनी ही वास्तविक धर्मनिरपेक्षता है

नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके आप पाएंगे एक देशप्रेम से भरी हुई, वैज्ञानिक , फिक्शन से भरी और अनौखी पुस्तक, जिसे हर किसी को जरूर पढ़ना चाहिए।

शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)

कुण्डलिनी की वैज्ञानिकता को सिद्ध करने वाली निम्नलिखित पुस्तक अनुमोदित की जाती है।

कुण्डलिनी विज्ञान- एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान

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कुण्डलिनी से सुहाने सपने

दोस्तों, अब मुझे हर हफ्ते नई पोस्ट लिखने के लिए खुद ही हिंट मिल जाती है, और नई घटना भी। आज रात को मैंने एक तंत्र से सम्बंधित स्वप्न देखा। वह जीवंत, स्पष्ट व असली लग रहा था। वह स्वप्न सुबह के समय आया। ऐसा लग रहा था कि वह मेरी किसी पूर्वजन्म की घटना पर आधारित रहा होगा। तभी तो मैं उसमें भावनात्मक रूप से बहुत ज्यादा बह गया था, और मुझे आनंद भी आया। उस स्वप्न से प्राचीनकाल के तंत्र के बारे में मेरे मन में तस्वीर स्पष्ट हो गई। वैसे भी एक कुण्डलिनी योगी का पुरानी या अपने पूर्वजन्मों की घटनाओं से सामना उसके स्वप्न में होता ही रहता है। वे सारे स्वप्न बहुत मीनिंगफुल होते हैं।

प्राचीनकाल में तंत्र बहुत उन्नत था

उस सपने में मैंने देखा कि मैं अपने परिवार सहित एक ऊंचे पहाड़ के किसी पर्यटक स्थल जैसे स्थान पर था, जहां पर चहल-पहल थी, व बहुत आनंद आ रहा था। कुछ पुराने परिचितों से भी वहां मेरी मुलाक़ात हुई। उस पहाड़ की तलहटी एक मैदानी जैसे भूभाग से जुड़ी हुई थी। उस जोड़ पर एक विशालकाय मंदिर जैसा स्थान था। हम नीचे उतर कर उस मंदिर परिसर में प्रविष्ट हो गए। चारों और बहुत सुन्दर चहल-पहल थी। बहुत आनंद आ रहा था। परिसर में एक प्रकाशमान गुफा जैसी संरचना भी थी, जिसके अन्दर भी बाजार सजे हुए थे। मेरी पत्नी उसमें घुमते-फिरते और शौपिंग करते हुए कहीं मुझसे खो गई थी। मैं उसे भी खोज रहा था। उस खोजबीन में मैंने मंदिर के बहुत से कमरे देखे, जो लाइन में थे. हालांकि कुछ कमरे सीढ़ियों से कुछ ऊपर चढ़कर भी थे। ऐसा लग रहा था, जैसे कि सारा मंदिर परिसर किसी विशालकाय छत के नीचे था। नीचे की पंक्ति के एक कमरे में मैं घुस गया। वहां पर बहुत से लोग नीचे, एक दरी पर बैठे थे। वहां पर बीच में जैसे मैंने अपना बैग पीठ से उतार कर रख दिया, और मैं भी बैठ गया। तभी एक महिला अन्दर आई, और मुझे बड़े प्यार व अपनेपन से अपने साथ, गलियों से होते हुए, सीढ़ियों के ऊपर के एक कमरे तक ले गई। उससे कुछ पुरानी जान-पहचान भी महसूस हो रही थी, पर वह स्पष्ट नहीं थी। शायद इसीलिए मुझे उसके साथ आनंद आ रहा था। एक-दो स्थान पर उसने मुझे अपना स्पर्श भी करवाया। वह उस कमरे में एक कुर्सी पर बैठ गई। उसके सामने मेज पर बहुत से कागजात पड़े थे। उसके समीप ही दो-चार पुरुष लोग भी कुर्सियों पर बैठे हुए थे। महिला ने किसी बीमा जैसी योजना के कुछ कागजात जैसे दिखाए, और मुझसे कहा कि मेरी पत्नी ने उस योजना के लिए हामी भरी थी। मैं मुकरने लगा, तो उसके चेहरे पर कुछ हलकी मायूसी जैसी दिखी। तभी वे लोग कुछ अन्य ग्राहकों का काम निपटाने लगे, जिससे मैं मौक़ा पाकर वहां से खिसक गया। मैं वापिस उसी कमरे में आ गया, जहां पहले बैठा था, क्योंकि मैं अपना बैग वहीं भूल गया था। पर मुझे अपना बैग वहां नहीं मिला। मैं काफी उदास हुआ, क्योंकि उसमें कुछ अन्य जरूरी चीजों के साथ मेरा महँगा किन्डल ई-रीडर भी था। मैं बहुत निराश होकर बैग खोजने लगा। मैंने कई कमरों में तलाश की, यह सोचकर कि कहीं मैं दूसरे कमरों में तो नहीं बैठा। मैं फिर बीच वाली खुली लॉबी में गया, जिसके अन्दर वे कमरे खुलते थे। वह एक रेलवे स्टेशन की तरह बहुत खुली-डुली जगह थी, जहाँ पर काफी चहल-पहल थी। वहां एक-दो पुलिस वाले भी सीमेंट के बेंच पर बैठे हुए थे। उनसे पूछा, तो उन्होंने लापरवाही से व मुझसे पीछा छुड़ाने के लिए कहा कि मेरा बैग कभी नहीं मिलेगा, और उसे किसी ने उठा लिया होगा। मैंने फिर से उसी कमरे का दरवाजा खोला, जहां मैं बैठा हुआ था। वहां पर दो भद्र पुरुष नाईट सूट में मदिरा पीने का आनंद ले रहे थे। वे दोनों पालथी लगा कर आराम से बैठे फुए थे। वे मध्यम कद-काठी के और कुछ सांवले लग रहे थे। मदहोशी की ख़ुशी की मुस्कान उनके चेहरे पर साफ झलक रही थी। पूछने पर उन्होंने मुझे बताया कि मेरा बैग वहीं कमरे में पड़ा था। मैं बहुत खुश हुआ और उनसे कहा कि शराब से आपके अन्दर ज्ञान की आँख खुली, जिससे आप मेरा बैग ढूंढ सके। वे बहुत खुश होकर मुस्कुराने लगे, और एक पेग हाथ में पकड़ कर मुझसे बोले कि मैं भी उसे देवी माता के नाम पर पी लेता। मैंने उन्हें मुस्कुराते हुए धन्यवाद कहा, और चल दिया। यद्यपि मेरा मन लगातार कर रहा था कि मैं एक पेग देविमाता के नाम पर लगा लेता। परन्तु मैं उन्हें मना कर चुका था, इसलिए वापिस नहीं मुड़ना चाहता था। परिसर से बाहर निकल कर ही दुकानों की एक कतार लगी हुई देखी। मैं एक मिठाई की दुकान में कुछ मिठाई खरीदने के लिए घुस गया। वहां पर दुकान के शुरू में ही खड़े मुझे कुछ चिर-परिचित दोस्त मिले, जो ख़ुशी के साथ शराब के बारे में कुछ आपसी बातें करने लगे। मैंने कहा कि ऐसी बातें न करो, नहीं तो मेरा मन भी देवी माता के नाम पर एक पेग लगाने का कर जाएगा। ऐसा सुनकर सब हंसने लगे। उन दुकानों की कतार वाली सड़क चढ़ाई की दिशा में बाहर जा रही थी। कुछ चढ़ाई चढ़ कर मैं निचले तरफ की एक दुकान के सीमेंट से बने पक्के प्लेटफोर्म पर चढ़ गया। तभी मुझे विचित्र व दिल को छूने वाले गाजे-बाजे/संगीत की आवाजें सुनाई देने लगीं। वह सजे हुए रथ पर देवी माता की झांकी निकल रही होगी। मैं देवी माता के प्यार मैं इतना बह गया कि मेरी आँखों में प्रेम के आंसुओं की बाढ़ आ गई, और मैं हलकी आवाज में रुक-२ कर रोने लगा। मैं बार-बार अपनी दाहिनी बाजू को फोल्ड करके, उससे अपनी आँखों को पोंछ रहा था, और आँखों को ढक भी रहा था। वह मैं इसलिए कर रहा था, ताकि कोई मुझे रोता हुआ जानकार अजीब न समझे, और उससे मेरे प्यार की भावना में बहने में रुकावट न पैदा हो। फिर मैंने सोचा कि उस अजनबी स्थान पर मुझे कोई नहीं पहचानता होगा। इसलिए मैं खुले दिल से जोर-जोर से रोने लगा। तभी मुझे एक लेटा हुआ भक्त सड़क पर दिखा, जो रोल होकर ऊपर की तरफ आ रहा था। वह देवी माता का कोई महान भक्त होगा। वह भी मध्यम से सांवले रंग का था। उसने खड़े होकर मुझे बड़ी-बड़ी व भावपूर्ण आँखों से देखा, और वह भी मानो भावना में बह गया। तभी मैंने देखा कि एक सांवले व ताकतवर आदमी ने एक बकरी के बच्चे को एक हाथ से सीधा अपने सिर से भी ऊपर, गले से पकड़ कर उठाया हुआ था, और उसे देवी माता की भक्ति के साथ मिश्रित क्रोध व हिंसक भाव के साथ देख रहा था। किड मिमिया रहा था। उसका दूसरा हाथ सीधा नीचे की ओर था, जिसमें उसने एक बड़ा सा खंजर पकड़ा हुआ था। वह बार-बार देवी माता का नाम ले रहा था। मैं पीछे हट कर दुकान की ओट में आ गया, ताकि वह निर्दयी दृश्य मुझे न दिखता। थोड़ी देर बाद, मैं आगे को खिसका ताकि मैं देख सकता कि क्या वहां पर किड के जुदा किए हुए धड़ और सिर थे, और चारों तरफ फैला हुआ खून था। परन्तु वहां पर सभी किड पहले की तरह ज़िंदा थे, और ख़ुशी से हिल-डुल रहे थे। उससे मैंने चैन की सांस ली, और ख़ुशी महसूस की। शायद सांकेतिक रूप में ही देवी माता को भेंट चढ़ा दी गई थी। तभी अलार्म बजा, और मेरा स्वप्न टूट गया।

उस स्वप्न से मुझे प्राचीनकाल के उन्नत तंत्र, विशेषकर काले तंत्र के बारे में स्पष्ट अनुभूति हुई। प्राचीनकाल में तंत्र एक उन्नत विज्ञान के रूप में था, और जन-जन में व्याप्त था। परन्तु उसके साथ हिंसा, व्यभिचार आदि के बहुत से दोष भी बढ़ जाते थे, विशेषतः जब उसे उचित तरीके से नहीं अपनाया जाता था। तंत्र के दुरूपयोग के कारण ही इसकी अवनति हुई। इस्लाम भी एक प्रकार का अतिवादी तंत्र ही है। यह इतना कट्टर है कि लोग इस बारे बात करने से भी कतराते हैं। इसीलिए यह जस का तस बना हुआ है। हिन्दु तंत्र में भी प्राचीनकाल में नरबली की प्रथा था, परन्तु उसका व्यापक विरोध होने पर उसे बंद कर दिया गया।

प्रेमयोगी वज्र का तंत्र सम्बंधित अपना अनुभव

उसने कुण्डलिनी के विकास के लिए किसी विशेष तंत्र का सहारा नहीं लिया। उसने वही काम किए, जो दूसरे सामान्य लोग भी करते हैं, पर उसने उन कामों को अद्वैतपूर्ण/तांत्रिक दृष्टिकोण के साथ किया। यही तरीका उचित भी है। इससे तंत्र का दुरुपयोग नहीं होता।    

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कुण्डलिनी के प्रति समर्पण ही असली समर्पण है

सभी धर्मों में ईश्वर के प्रति समर्पण/सरेंडर पर बहुत जोर दिया गया है। वास्तव में कुण्डलिनी के प्रति समर्पण ही ईश्वर के प्रति समर्पण है। ईश्वर निराकार है। उसे कोई देख नहीं सकता, जान नहीं सकता, और न ही उसे कोई अनुभव कर सकता है। जिसका कोई अता-पता ही नहीं है, उसके प्रति कोई कैसे समर्पित हो सकता है? वास्तव में कुण्डलिनी ही ईश्वर का छोटा रूप है, जो जानने में आ सकता है। यह कुण्डलिनी क्राइस्ट के मानसिक चित्र के रूप में हो सकती है, भगवान् राम के मानसिक चित्र के रूप में हो सकती है, किसी के मन में उसके अपने गुरु/मित्र/प्रेमी के चित्र के रूप में हो सकती है आदि-2।

अद्वैत के प्रति समर्पित होने का अर्थ भी कुण्डलिनी के प्रति समर्पित होना ही है

जैसा कि हमने पहले भी बताया है की अद्वैत और कुण्डलिनी साथ-2 रहते हैं । एक के बढ़ने से दूसरा स्वयं ही बढ़ जाता है। अनासक्ति भी अद्वैत का ही रूप है। इसका सीधा सा अर्थ है की ईश्वर सीधे नहीं, अपितु अद्वैत/अनासक्ति/साक्षीभाव {साक्षी भाव से अद्वैत व अनासक्ति बढ़ते हैं}/कुण्डलिनी के रूप में रहता है। ये चारों भाव एकसमान ही हैं, क्योंकि एक के भी बढ़ने से अन्य भाव स्वयं बढ़ने लगते हैं। यदि सभी भाव एकसाथ बढ़ाए जाएं, तब तो और भी अच्छा, क्योंकि तब बहुत तेज आध्यात्मिक प्रगति होती है।

प्रेमयोगी वज्र ने जब शरीरविज्ञान दर्शन के माध्यम से अद्वैत को लम्बे समय तक अपनाया, तब उसमें बहुत से आध्यात्मिक गुण बढ़ोत्तरी को प्राप्त हुए, और कुण्डलिनी भी परिवृद्ध हुई, जो अंततः जागृत हो गई।

ईश्वर के प्रति समर्पण से कुण्डलिनी के प्रति समर्पण स्वयं ही हो जाता है

वास्तव में भगवान् के ध्यान से भी कुण्डलिनी का ही ध्यान होता है। निराकार भगवान् के ध्यान से अद्वैत का ध्यान स्वयं ही हो जाता है, क्योंकि भगवान् सभी स्थितियों में एकसमान हैं। और यह निर्विवाद सत्य है कि अद्वैत के ध्यान से कुण्डलिनी का ध्यान स्वयं ही होने लगता है। इससे भी सिद्ध हो जाता है कि ईश्वर के प्रति समर्पण स्वयं ही अप्रत्यक्ष रूप में कुण्डलिनी के प्रति समर्पण बन जाता है। फिर क्यों न सीधे ही कुण्डलिनी-साधना की जाए।

इसीलिए कहा जाता है कि गुरु भगवान् से बढ़कर हैं

गुरु गोबिंद दोनों मिले, काके परूं पाए।
बलिहारी गुरु आपकी, गोबिंद दियो मिलाए।।

तुलनात्मक रूप से गुरु को भगवान् से बढ़कर बताया गया है, क्योंकि भगवान की प्राप्ति गुरु से ही तो होती है। कुण्डलिनी वास्तव में गुरु/प्रेमी की मन में बसी हुई छवि/कुण्डलिनी ही तो है। इससे भी सिद्ध होता है कि कुण्डलिनी के प्रति समर्पण अधिक आसान, मानवीय, व्यावहारिक व कारगर होता है।  

हिंदु धर्म और इस्लाम एक ही बात बोलते हैं

इस्लाम धर्म में अल्लाह/निराकार ईश्वर के प्रति समर्पण पर जोर दिया गया है। इसके विपरीत, हिन्दू धर्म में मुख्यतः साकार ईश्वर/मूर्ति/कुण्डलिनी के प्रति समर्पण पर अधिक जोर दिया गया है। ऊपर हमने यह भी सिद्ध कर दिया है कि निराकार ईश्वर के ध्यान से कुण्डलिनी का ध्यान स्वयं होने लगता है। इसी तरह, कुण्डलिनी/मूर्ति का ध्यान करने से निराकार ईश्वर/अल्लाह का ध्यान स्वयं ही हो जाता है। साथ में, इससे यह भी स्वयं सिद्ध हो जाता है कि इस्लाम में मूर्ति/कुण्डलिनी-पूजा का विरोध वास्तविक नहीं, अपितु काल्पनिक है, जो किसी गलतफहमी के कारण पैदा हुआ है।  

इसीलिए आजकल के बौद्धिक युग में हर जगह कुण्डलिनी योग का बोलबाला है।

और अज्ञानी गुरु भी कभी काम आ सकता है, अगर आप समर्पण कर दें। क्योंकि समर्पण करना ही घटना है, गुरु तो सिर्फ बहाना है।

ओशो प्रवचन- समर्पण की छलांग

मां कुंडलिनी के सम्मुख पूर्ण समर्पण की भावना भी रखनी चाहिए ।

आंतरिक शक्ति को जगाएं- speakingtree.in

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द्वैत और अद्वैत दोनों एक-दूसरे के पूरक के रूप में

द्वैत क्या है?

दुनिया की विविधताओं को सत्य समझ लेना ही द्वैत है। दुनिया में विविधताएं तो हमेशा से हैं, और सदैव रहेंगी भी, परन्तु वे सत्य नहीं हैं। दुनिया में जीने के लिए विविधताओं का सहारा तो लेना ही पड़ता है। फिर भी उनके प्रति आसक्ति नहीं होनी चाहिए।

अद्वैत क्या है?

उपरोक्तानुसार, दुनिया की विविधताओं के प्रति असत्य बुद्धि या अनासक्ति को ही अद्वैत कहते हैं। वास्तव में द्वैताद्वैत को ही संक्षिप्त रूप में द्वैत कहते हैं। अद्वैत अकेला नहीं रह सकता। यह एक खंडन-भाव है। अर्थात यह द्वैत का खंडन करता है। यह खंडन “द्वैत” से पहले लगने वाले “अ” अक्षर से होता है। जब द्वैत ही नहीं रहेगा, तब उसका खंडन कैसे किया जा सकता है? इसलिए जाहिर है कि द्वैत व अद्वैत दोनों साथ-२ रहते हैं। इसीलिए अद्वैत का असली नाम द्वैताद्वैत है।

एक ही व्यक्ति के द्वारा द्वैत व अद्वैत का एकसाथ पालन

ऐसा किया जा सकता है। यद्यपि ऐसा जीवनयापन विरले लोग ही ढंग से कर पाते हैं, क्योंकि इसके लिए बहुत अधिक शारीरिक व मानसिक बल की आवश्यकता पड़ती है। इससे लौकिक कार्यों की गुणवत्ता भी दुष्प्रभावित हो सकती है, यदि सतर्कता के साथ उचित ध्यान न दिया जाए।

द्वैताद्वैत को बनाए रखने के लिए श्रमविभाजन

ऐसा विकसित सभ्यताओं में होता है, व बुद्धिमान लोगों के द्वारा किया जाता हहै। वैदिक सभ्यता भी इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें द्वैतमयी लौकिक कर्मों का  उत्तरदायित्व एक भिन्न श्रेणी के लोगों पर होता है, और अद्वैतमयी धार्मिक क्रियाकलापों  का उत्तरदायित्व एक भिन्न श्रेणी के लोगों पर। वैदिक संस्कृति की जाति-परम्परा  इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें ब्राम्हण श्रेणी के लोग पौरोहित्य (धार्मिक कार्य) का कार्य करते हैं, और अन्य शेष तीन श्रेणियां विभिन्न लौकिक कार्य करती हैं।

द्वैताद्वैत में श्रम-विभाजन के लाभ

इससे व्यक्ति पर कम बोझ पड़ता है। उसे केवल एक ही प्रकार का भाव बना कर रखना पड़ता है। इससे परस्पर विरोधी भावों के बीच में टकराव पैदा नहीं होता। इसलिए कार्य की गुणवत्ता भी बढ़ जाती है। वैसे भी दुनिया में देखने में आता है कि जितना अधिक द्वैत होता है, कार्य उतना ही अच्छा होता है। अद्वैतवादी के अद्वैतभाव का लाभ द्वैतवादी को मिलता रहता है, और द्वैतवादी के द्वैतभाव का लाभ अद्वैतवादी को मिलता रहता है।  यह ऐसे ही होता है, जैसे एक लंगड़ा और एक अंधा एक-दूसरे की सहायता करते हैं। यद्यपि इसमें पूरी सफलता के लिए दोनों प्रकार के वर्गों के बीच में घनिष्ठ व प्रेमपूर्ण सम्बन्ध बने रहने चाहिए।

गुरु-शिष्य का परस्पर सम्ब्बंध भी ऐसा ही द्वैताद्वैत-सम्बन्ध है

प्रेमयोगी वज्र को भी इसी श्रमविभाजन का लाभ मिला था। उसके गुरू (वही वृद्धाध्यात्मिक पुरुष) एक सच्चे ब्राम्हण-पुरोहित थे। प्रेमयोगी वज्र स्वयं  एक अति  भौतिकवादी व्यक्ति तथा। दोनों के बीच में लम्बे समय तक नजदीकी व प्रेमपूर्ण  सम्बन्ध बने रहे। इससे प्रेमयोगी वज्र का द्वैत उसके गुरु को प्राप्त हो गया, और गुरु  का अद्वैत उसको प्राप्त हो गया। इससे दोनों का द्वैताद्वैत अनायास ही  सिद्ध हो गया, और दोनों मुक्त हो गए। इसके फलस्वरूप प्रेमयोगी वज्र को क्षणिक आत्मज्ञान के साथ क्षणिक कुण्डलिनीजागरण की उपलब्धि भी अनायास ही हो गई। साथ में, उसकी कुण्डलिनी तो उसके पूरे जीवन भर क्रियाशील बनी रही।

यही द्वैताद्वैत समभाव ही सर्वधर्म समभाव है

कोई धर्म द्वैतप्रधान होता है, तो कोई धर्म अद्वैतप्रधान होता है। इसीलिए दोनों प्रकार के धर्मों के बीच में मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बने रहने चाहिए। इससे दोनों एक-दूसरे को शक्ति प्रदान करते रहते हैं। इससे वास्तविक द्वैताद्वैत भाव पुष्ट होता है। विरोधी भावों के बीच में परस्पर समन्वय ही वैदिक संस्कृति की सफलता के पीछे एक प्रमुख कारण था। शरीरविज्ञान दर्शन में इसका विस्तार के साथ वर्णन है।

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