कुंडलिनी ही रति है और कुंडलिनी के द्वारा कामवासना को शांत किया जाना ही रति-कामदेव का विवाह है

Rati-kamadeva

दोस्तों, मुझे प्रतिदिन रहस्यात्मक साहित्य पढ़ने की आदत है। इससे मेरा दायाँ मस्तिष्क क्रियाशील रहता है, क्योंकि रहस्यात्मक कथाओं में लॉजिक लगाना कठिन होता है। हमारा दायाँ मस्तिष्क भी एक सिरफिरे आदमी की तरह मस्त मलंग स्वभाव वाला होता है। हिन्दू पुराणों के कथा-कथानक भी एक पहेली की तरह होते हैं। यदि उन्हें बूझ गए, तो उससे बायाँ मस्तिष्क क्रियाशील हो जाता है, और यदि नहीँ तो दायाँ मस्तिष्क। मतलब कि वे हर परिस्थिति में फायदा ही करते हैं।ऐसे ही एक कथानक के रहस्य को मैं इस हफ्ते पहचान सका हूँ। मैं प्रतिदिन शिवपुराण का केवल एक पृष्ठ पढ़ता हूँ, मूल संस्कृत में और हिंदी में। मूल संस्कृत का मजा ही कुछ और है। इस हफ्ते मुझे एक महत्त्वपूर्ण तांत्रिक रहस्य हाथ लगा है। इसे मैं यहाँ साझा कर रहा हूँ।

ब्रह्मा द्वारा कामदेव को श्राप देना व रति को उत्पन्न करके उसका विवाह कामदेव से करना

जब ब्रह्मा ने कामदेव की उत्पत्ति की, तब कामदेव को अपने ऊपर गर्व हो गया। वह अपनी शक्ति का परीक्षण ब्रह्मा पर ही करने लगा। इससे ब्रह्मा कामविह्वल होकर अपनी ही पुत्री के श्रृंगार का गुणगान करते हुए उस पर आसक्त हो गए। दरअसल ब्रह्मा द्वारा रचित यह सुंदर सृष्टि ही उसकी वह पुत्री है। कामदेव यहाँ भोगेच्छा का प्रतीक भी है। फिर शिव ने उन्हें रोका। जब उन्हें कामदेव की हरकत का बोध हुआ तो उसे यह कह कर श्राप दे दिया कि यदि उसे अपनी शक्ति का परीक्षण ही करना था तो उनकी पुत्री के सामने ही क्यों किया। वह श्राप था कामदेव का शिवजी के द्वारा भस्म किए जाने का। भगवान शिव तंत्रयोग के सर्वोच्च शिरोमणि हैं, उनके आगे काम भस्मीभूत ही है। फिर ब्रह्मा ने अपने शरीर के पसीने से अपनी रति नाम की एक अन्य पुत्री को उत्पन्न किया। वह सृष्टि में सबसे सुंदर थी। उसका विवाह ब्रह्मा ने कामदेव के साथ कर दिया। कामदेव तो उसके सौंदर्य को देखकर अपनी मोहिनी विद्या को जैसे भूल ही गया।

कामदेव मनुष्य के मन की वासना है और रति कुंडलिनी है

शास्त्रों में भी आता है कि यहाँ तक कि अपनी बेटी और बहन से भी नितांत अकेले में नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि यह काम बहुत प्रबल है। तो इसमें आश्चर्य नहीँ कि ब्रह्मा अपनी पुत्री पर आसक्त हो गए थे। उस काम को वश में करने के लिए उन्होंने कठिन योगाभ्यास किया। उनके पसीने की बूंदें इसी अथक कुंडलिनी-योगाभ्यास की प्रतीक हैं। उसी अथक कुंडलिनी योग से जो कुंडलिनी क्रियाशील या जागृत हुई, वही रति नाम से कही जा रही है। कुंडलिनी को रति नाम इसलिए दिया गया है, क्योंकि यह योग में निरंतर रत रहने से ही मिलती है। रत शब्द एक प्रमुख आध्यात्मिक शब्द है, जैसे ध्यान रत, भक्ति रत आदि। इसका अर्थ लीन भी है। कुंडलिनी किसी के प्यार में या ध्यान में लीन होकर ही मिलती है। रति क्रीड़ा नाम भी इसीसे बना है। क्योंकि कामक्रीड़ा से मन और उसका सबसे प्रिय अंश कुंडलिनी, दोनों प्रफुल्लित होते हैं, इसीलिए कुंडलिनी को रति नाम दिया गया है। यह रूपक के रूप में समझाया गया है, क्योंकि पुराने जमाने में रहस्यात्मक विद्याओं को सीधे तौर पर सार्वजनिक नहीँ किया जाता था। इसीलिए ऐसी कई विद्याओं को गुह्य विद्या भी कहते हैं। कामदेव-रति के कथानक से इस बात का भी पता चलता है कि सृष्टि रचयिता ईश्वर कुंडलिनी योगविद्या के बल से ही अपनी सुंदर रचना के मोहक आकर्षण से अछूता बना रहता है।

कुंडलिनी ने रति के रूप में देवताओं व ऋषियों की काम वासना को अपने नियंत्रण में रखा

जब देवताओं व ऋषियों को इस रहस्य का पता चला कि कुंडलिनी से कामवासना को नियंत्रण में रखा जा सकता है, तब उन्होंने नियमित योगाभ्यास करना शुरु कर दिया। इसीलिए उन्होंने रति के रूप में कुंडलिनी को सबसे सुंदर माना है, क्योंकि कामदेव केवल सुंदर भौतिक वस्तुओं की ओर ही जीव को आकृष्ट करवाता है। रति के आगे कामदेव हार गया। इसका मतलब है कि रति या कुंडलिनी सबसे सुंदर है। वह इतनी सुंदर है कि उसके बहकावे में आकर कई लोग अच्छी खासी गृहस्थी व चमक-दमक वाली दुनिया छोड़कर संन्यासी बन जाते हैं। उसने कामदेव का धंधा ही बंद कर दिया। कामदेव का रति से विवाह करने का अर्थ है कि जैसे एक शादीशुदा आदमी एक स्त्री से बंध कर अन्य स्त्रियों पर नजरें नहीँ डालता, उसी तरह वह भी रति नामक कुंडलिनी के द्वारा बाँध दिया गया।  इस रहस्य का थोड़ा स्पष्टीकरण भी एक श्लोक के माध्यम से वहीँ पर किया गया है, जिसमें लिखा गया है कि कामदेव अपनी प्रियतमा रति को अपने हृदय में ऐसे छुपा कर रखता था, जैसे एक योगी अपनी ब्रह्मविद्या को अपने हृदय में छिपा कर रखता है। अब वास्तविक ब्रह्मविद्या कुंडलिनी ही तो है, क्योंकि वही ब्रह्म तक ले जाती है। योगी को सभी लोग भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में देखते हैं, कभी ख़ुशी में, कभी गम में, कभी अवसाद में, तो कभी प्रफुल्लित अवस्था में। पर वे लोग उसके मन की उस कुँडलिनी को पहचान ही नहीं पाते, जो उसकी इन सभी अवस्थाओं में एक जैसी ही बनी रहती है। इसी तरह रति से विवाहित कामदेव के साथ हमेशा रति बनी रहती है। रति से काम के विवाह का यह मतलब भी है कि एकपत्नीव्रत के साथ सामाजिक पत्नी के साथ तांत्रिक योगाभ्यास करना। तन्त्रयोग साहित्य के अनुसार भी कई वर्षों तक केवल कर्मयोग व साधारण कुंडलिनी योग का अभ्यास करना पड़ता है। उस दौरान रति नामक कुंडलिनी का जन्म होता है, वह बढ़ती है, और यौनावस्था में पहुंच जाती है, मतलब बहुत मजबूत हो जाती है। फिर वह काम के साथ विवाह के योग्य हो जाती है। कुंडलिनी के काफी परिपक्व हो जाने पर ही साधारण कुंडलिनी योग को यौनयोग के साथ मिश्रित रूप में करने का विधान है। यही रति और काम का विवाह है। यदि जल्दबाजी में समयपूर्व ही काम के साथ रति का बालविवाह कर दिया जाए, तो लाभ की अपेक्षा हानि भी हो सकती है। ऐसा तंत्रशास्त्र में साफ तौर पर चेताया गया है। यदि काम-रति के दाम्पत्य युगल से युक्त व्यक्ति काम के आवेश में आ जाए, तो लोग उसे साधारण कामासक्त मान लेते हैं। वे काम के साथ खड़ी उस रति को नहीं देख पाते, जो हमेशा कल्याणकारी होती है। बहुत से तंत्रयोगी इसी कारणवश प्रताड़ित हो जाते हैं। वे भोलेपन में आकर काम-रति का प्रदर्शन करने लगते हैं, पर लोग केवल काम को ही देख पाते हैं, उसके साथ खड़ी रति नामक कुंडलिनी को नहीँ।

दरअसल काम के दायरे में सभी भोग लालसाएँ आ जाती हैं। इसलिए रति नामक कुंडलिनी सबसे विवाह करके उनसे जुड़ जाती है। काम के अर्थ में केवल यौन लालसा को इसलिए लिया जाता है, क्योंकि यह सभी भोग लालसाओं में सबसे प्रभावशाली और मुख्य है।

तंत्रयोगी रति को पैदा करने के लिए कामदेव की ही सहायता लेते हैं

इसे कहते हैं, दुश्मन को दुश्मन के ही तीर से मारना। कामदेव का तीर जगत्प्रसिद्ध है। तंत्रयोगी पंचमकारों की सहायता से अपनी कुंडलिनी को अतिरिक्त मजबूती प्रदान करते हैं। वे दरअसल कामशक्ति को कुंडलिनी शक्ति में रूपांतरित कर देते हैं। 

काम-रति विवाह की वैज्ञानिक व्याख्या

काम के आवेश में मस्तिष्क की ओर रक्त संचार बढ़ जाता है। इसीलिए मन प्रफुल्लित हो जाता है। यदि कोई आदमी कुंडलिनी योगी है, तो जाहिर है कि उसके मस्तिष्क का अधिकांश हिस्सा कुंडलिनी ने अधिगृहीत किया हुआ है। ऐसे में यदि मस्तिष्क में रक्त संचार बढ़ेगा, तो इससे सबसे ज्यादा लाभ कुंडलिनी को ही मिलेगा। क्योंकि कुंडलिनी एक प्रकार से हाई डेफिनिशन रिसोल्यूशन का एक मानसिक चित्र ही है, इसलिए वह बहुत ज्यादा प्राण ऊर्जा का उपभोग कर लेता है। इससे काम का वेग अनायास और जल्दी ही आनन्द के साथ शांत हो जाता है।

कुण्डलिनी के प्रति समर्पण ही असली समर्पण है

सभी धर्मों में ईश्वर के प्रति समर्पण/सरेंडर पर बहुत जोर दिया गया है। वास्तव में कुण्डलिनी के प्रति समर्पण ही ईश्वर के प्रति समर्पण है। ईश्वर निराकार है। उसे कोई देख नहीं सकता, जान नहीं सकता, और न ही उसे कोई अनुभव कर सकता है। जिसका कोई अता-पता ही नहीं है, उसके प्रति कोई कैसे समर्पित हो सकता है? वास्तव में कुण्डलिनी ही ईश्वर का छोटा रूप है, जो जानने में आ सकता है। यह कुण्डलिनी क्राइस्ट के मानसिक चित्र के रूप में हो सकती है, भगवान् राम के मानसिक चित्र के रूप में हो सकती है, किसी के मन में उसके अपने गुरु/मित्र/प्रेमी के चित्र के रूप में हो सकती है आदि-2।

अद्वैत के प्रति समर्पित होने का अर्थ भी कुण्डलिनी के प्रति समर्पित होना ही है

जैसा कि हमने पहले भी बताया है की अद्वैत और कुण्डलिनी साथ-2 रहते हैं । एक के बढ़ने से दूसरा स्वयं ही बढ़ जाता है। अनासक्ति भी अद्वैत का ही रूप है। इसका सीधा सा अर्थ है की ईश्वर सीधे नहीं, अपितु अद्वैत/अनासक्ति/साक्षीभाव {साक्षी भाव से अद्वैत व अनासक्ति बढ़ते हैं}/कुण्डलिनी के रूप में रहता है। ये चारों भाव एकसमान ही हैं, क्योंकि एक के भी बढ़ने से अन्य भाव स्वयं बढ़ने लगते हैं। यदि सभी भाव एकसाथ बढ़ाए जाएं, तब तो और भी अच्छा, क्योंकि तब बहुत तेज आध्यात्मिक प्रगति होती है।

प्रेमयोगी वज्र ने जब शरीरविज्ञान दर्शन के माध्यम से अद्वैत को लम्बे समय तक अपनाया, तब उसमें बहुत से आध्यात्मिक गुण बढ़ोत्तरी को प्राप्त हुए, और कुण्डलिनी भी परिवृद्ध हुई, जो अंततः जागृत हो गई।

ईश्वर के प्रति समर्पण से कुण्डलिनी के प्रति समर्पण स्वयं ही हो जाता है

वास्तव में भगवान् के ध्यान से भी कुण्डलिनी का ही ध्यान होता है। निराकार भगवान् के ध्यान से अद्वैत का ध्यान स्वयं ही हो जाता है, क्योंकि भगवान् सभी स्थितियों में एकसमान हैं। और यह निर्विवाद सत्य है कि अद्वैत के ध्यान से कुण्डलिनी का ध्यान स्वयं ही होने लगता है। इससे भी सिद्ध हो जाता है कि ईश्वर के प्रति समर्पण स्वयं ही अप्रत्यक्ष रूप में कुण्डलिनी के प्रति समर्पण बन जाता है। फिर क्यों न सीधे ही कुण्डलिनी-साधना की जाए।

इसीलिए कहा जाता है कि गुरु भगवान् से बढ़कर हैं

गुरु गोबिंद दोनों मिले, काके परूं पाए।
बलिहारी गुरु आपकी, गोबिंद दियो मिलाए।।

तुलनात्मक रूप से गुरु को भगवान् से बढ़कर बताया गया है, क्योंकि भगवान की प्राप्ति गुरु से ही तो होती है। कुण्डलिनी वास्तव में गुरु/प्रेमी की मन में बसी हुई छवि/कुण्डलिनी ही तो है। इससे भी सिद्ध होता है कि कुण्डलिनी के प्रति समर्पण अधिक आसान, मानवीय, व्यावहारिक व कारगर होता है।  

हिंदु धर्म और इस्लाम एक ही बात बोलते हैं

इस्लाम धर्म में अल्लाह/निराकार ईश्वर के प्रति समर्पण पर जोर दिया गया है। इसके विपरीत, हिन्दू धर्म में मुख्यतः साकार ईश्वर/मूर्ति/कुण्डलिनी के प्रति समर्पण पर अधिक जोर दिया गया है। ऊपर हमने यह भी सिद्ध कर दिया है कि निराकार ईश्वर के ध्यान से कुण्डलिनी का ध्यान स्वयं होने लगता है। इसी तरह, कुण्डलिनी/मूर्ति का ध्यान करने से निराकार ईश्वर/अल्लाह का ध्यान स्वयं ही हो जाता है। साथ में, इससे यह भी स्वयं सिद्ध हो जाता है कि इस्लाम में मूर्ति/कुण्डलिनी-पूजा का विरोध वास्तविक नहीं, अपितु काल्पनिक है, जो किसी गलतफहमी के कारण पैदा हुआ है।  

इसीलिए आजकल के बौद्धिक युग में हर जगह कुण्डलिनी योग का बोलबाला है।

और अज्ञानी गुरु भी कभी काम आ सकता है, अगर आप समर्पण कर दें। क्योंकि समर्पण करना ही घटना है, गुरु तो सिर्फ बहाना है।

ओशो प्रवचन- समर्पण की छलांग

मां कुंडलिनी के सम्मुख पूर्ण समर्पण की भावना भी रखनी चाहिए ।

आंतरिक शक्ति को जगाएं- speakingtree.in

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