अब तो पुष्प खिलने दो, अब तो सूरज उगने दो~कुंडलिनी रूपकात्मक आध्यात्मिक कविता

अब तो पुष्प खिलने दो

अब तो सूरज उगने दो।

भौँरा प्यासा घूम रहा

हाथी पगला झूम रहा।

पक्षी दाना चौँच में लेके

मुँह बच्चे का चूम रहा।

उठ अंगड़ाई भरभर के अब

नन्हें को भी जगने दो।

अब तो पुष्प--

युगों युगों तक घुटन में जीता

बंद कली बन रहता था।

अपना असली रूप न पाकर

पवनवेग सँग बहता था।

मिट्टी खाद भरे पानी सँग

अब तो शक्ति जगने दो।

अब तो पुष्प ---

लाखों बार उगा था पाकर

उपजाऊ मिट्टी काया।

कंटीले झाड़ों ने रोका या

पेड़ों ने बन छाया।

खिलते खिलते तोड़ ले गया

जिसके भी मन को भाया।

हाथी जैसे अभिमानी ने

बहुत दफा तोड़ा खाया।

अब तो इसको बेझिझकी से

अपनी मंजिल भजने दो।

अब तो पुष्प--

अबकी बार न खिल पाया तो

देर बहुत हो जाएगी।

मानव के हठधर्म से धरती

न जीवन दे पाएगी।

करो या मरो भाव से इसको

अपने काम में लगने दो।

अब तो पुष्प --

मौका मिला अगर फिर भी तो

युगों का होगा इंत-जार।

धीमी गति बहुत खिलने की

एक नहीं पंखुड़ी हजार।

प्रतिस्पर्धा भी बहुत है क्योंकि

पूरी सृष्टि खुला बजार।

बीज असीमित पुष्प असीमित

चढ़ते मंदिर और मजार।

पाखण्डों ढोंगों से इसको

सच की ओर भगने दो।

अब तो पुष्प खिलने दो

अब तो सूरज उगने दो।

कुंडलिनी योग ही असली एकेश्वरवाद है, जो दुनिया के सभी धर्मों और सम्प्रदायों का मूल सारतत्त्व है

दोस्तो, मैं पिछली पोस्ट में जिन्न और कुंडलिनी की समतुल्यता के बारे में बात कर रहा था कि जब जिन्न मेरे साहसरार चक्र में जीवंत जैसा होकर मेरे से एकरूप हो गया, मतलब जब देखने वाला मैं और दिखने वाला जिन्न, दोनों अभेद हो गए, तब वही कुंडलिनी जागरण कहलाया। शास्त्रों में भी समाधि या कुंडलिनी जागरण की यही परिभाषा है।क्यों न हम जिन्न की बजाय फरिश्ता कहें, क्योंकि यह मुझे ज्यादा उपयुक्त लग रहा है। क्योंकि वह असली जिन्न न होकर उसका दर्पण-प्रतिबिम्ब था। मतलब उसमें अपनी स्वतंत्र इच्छा नहीं थी, वह ईश्वर की इच्छानुसार अच्छाई की तरफ ही चलता था। फरिश्ता भी ऐसा ही होता है। जिन्न का क्योंकि अपना स्वतंत्र अस्तित्व होता है, इसलिए वह किसी भी दिशा में ले जा सकता है। इसे यूँ समझ सकते हैं कि जिन्न किसी संसारचक्र में भटकते हुए जीव या मनुष्य का मानसिक चित्र है, जैसे किसी आदमी की याद मन में बसी होती है। वह आदमी वर्तमान में कहीं जीवित अवस्था में भी हो सकता है, और मृत्यु के बाद की पारलौकिक प्रेत अवस्था में या किसी अन्य योनि में भी। इसका मतलब है कि वह जो इच्छा या कर्म करेगा, वह टेलीपेथी आदि के माध्यम से उसके चित्र तक प्रसारित हो जाएंगे, जो उसको मन में धारण करने वाले साधक को जरूर परेशान करेंगे। साथ में, उसकी याद के साथ उसके आसक्ति आदि दुर्गुण भी तो मन में बसे ही होंगे। साधक को अपनी दृढ इच्छाशक्ति से उन्हें दबाना पड़ता है। इसीलिए कहते हैं कि जिन्न को सही रास्ते पर लगाए रखने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। पर इसके विपरीत फरिश्ता किसी ऐसे व्यक्ति का मानसिक चित्र होता है, जो यदि जीवित है, तो जीवन्मुक्त की तरह इच्छारहित होता है, और यदि मृत है, तो भी या तो मुक्त होता है, या किसी दिव्यलोक में होता है, किसी जीव-योनि में नहीं जन्मा होता है। साथ में, उसकी याद के साथ उसके अनासक्ति आदि दिव्य गुण भी मन में खुद ही बसे होते हैं। इसलिए फरिश्ता हमेशा तटस्थ और अछूता रहता है। इसलिए वह साधक की साधना में व्यवधान न डालकर साधना में एकप्रकार से मदद ही करता है। इसीलिए कहते हैं कि गुरु या आध्यात्मिक प्रबुद्ध या मुक्त व्यक्ति या देवता का ध्यान करना चाहिए। फिर कहते हैं कि फरिश्ता प्रकाश से बना होता है, जिन्न की तरह आग से नहीं। वैसे भी प्रकाश आग से ज्यादा दिव्य, शांत, सूक्ष्म, सतोगुण युक्त और तेजस्वी होता है। आसक्ति और अद्वैत जैसे आध्यात्मिक गुणों से भरा व्यक्ति पहले से ही सूक्ष्म होता है, इसलिए स्वाभाविक है कि उसका मानसिक चित्र तो और भी ज्यादा सूक्ष्म होगा। इसीलिए फ़रिश्ते को प्रकाश कहा है। दूसरी ओर, जिन्न ज्यादातर भड़कीले और सेक्सी लोगों के चित्र होते हैं। इसलिए वे ज्यादा स्थूल होते हैं, आग की तरह। इसीलिए दुनिया में सेक्सी लोगों का ज्यादा बोलबाला रहता है। दुनिया में फँसे लोगों को फ़रिश्ते बनने वाले साधु लोग कहाँ पसंद आने वाले। मुझे साधु और स्वादू एकसाथ प्राप्त हुए थे, इसलिए मैं साधु से ऊबा नहीं। स्वादू मतलब सेक्सी लोगों ने साधु के प्रति आकर्षण बना के रखा, क्योंकि सम्भवतः साधु और स्वादू के बीच अच्छी आपसी ट्यूनिंग थी। यह ऐसे ही था जैसे चीनी के साथ कड़वी दवा भी मीठी लगने लगती है।इसीलिए तो मेरे मन में एक जिन्न, और एक फरिश्ता, दोनों एकसाथ स्थायी तौर पर बस गए, जैसा कि मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था। यह एक अच्छी टेक्टिक साबित हो सकती है। जिन्न ज्यादातर प्रणय प्रेम वाली आग से बने होते हैं। जब असफल प्रेम संबंध आदि के कारण सैक्स की आग मन में लम्बे समय तक दबी रहती है, तब वह जिन्न बन जाती है , इसीलिए तो जिन्न सम्भोग के भूखे होते हैं। मुझे तो लगता है कि बिना धुएं की आग वज्र की यौन संवेदना को ही कहा गया है, क्योंकि वह आग की तरह प्रकाश और गर्मी से भरी होती है, और उसमें धुआँ भी नहीं होता। जिंग यौन-संवेदना की ऊर्जा को कहते हैं। हो सकता है कि जिंग से ही जिन्न शब्द बना हो। ये दोनों शब्द एक ही बिरादरी के हैं। एकसाथ कई मतलब भी हो सकते हैं इसके। जिन्न को अच्छा बनाना पड़ता है, पर फरिश्ता स्वभाव से ही अच्छा होता है। फरिश्ता जिन्न के बुरे स्वभाव पर लगाम लगा कर रखता है। अच्छे जिन्न और फरिश्ते के स्वभाव में ज्यादा अंतर नहीं होता है। अच्छा जिन्न साधना या संस्कार की कमी से बिगड़ भी सकता है, पर फरिश्ता नहीं बिगड़ता। सम्भोग से फरिश्ते भी शक्ति प्राप्त करते हैं, पर वे उस शक्ति से आदमी को कुंडलिनी जागरण की तरफ ले जाते हैं, जबकि जिन्न अधिकांशतः दुनियादारी की तरफ ले जाते हैं। साथ में मैं बता रहा था कि कैसे कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी का रुझान लेखन की तरफ बढ़ता है। दरअसल लेखन भी एक कुंडलिनी योग ही है, एक साक्षीभाव योग या विपासना योग। लिखने से पुरानी बातें मानसपटल पर अनासक्ति के साथ उभर कर विलीन होने लगती हैं, जिससे अन्तःकरण स्वच्छ होता जाता है। कुंडलिनी योग में भी ऐसा ही होता है। कुंडलिनीजागरण या कुंडलिनी ध्यान की शक्ति से चित्रविचित्र नए-पुराने विचार मन में साक्षीभाव या अनासक्तिभाव से उभरते हुए इसी तरह विलीन होते रहते हैं। जब तक पुरानी घटनाओं को मन में पुनः न उभारा जाए, तब तक वे वैसी ही मन में दबी रहती हैं, और आदमी को आगे बढ़ने से रोकती हैं। मैं यह भी बता रहा था कि जिन्न आदि सूक्ष्म या आकाशीय प्राणी केवल मन में होते हैं, बाहर कहीं नहीं। इसका मतलब है कि दरअसल वे होते तो किसी भौतिक पुरुष या स्त्री के चित्ररूप ही हैं, पर उनसे पूरी तरह अलग होते हैं। आप अपना चेहरा दर्पण में देख लो। आप खुद कहोगे कि मैं यह नहीं हूँ। आदमी का असली रूप उसका मन होता है, चेहरा नहीं। आदमी अपने मस्तिष्क में बने उस मानसिक चित्र के साथ अपनी भावनाएं जोड़ देता है, अपना मन जोड़ देता है, अपनी मान्यताएं जोड़ देता है, अपनी धारणाएं जोड़ देता है। इसीलिए कहते हैं कि दुनिया हमें वैसी ही दिखती है, जैसी इसे हम देखना चाहते हैं, या जैसा हमारा अपना स्वभाव है, दुनिया का अपना कोई रूप नहीं। आप अपने गुरु का ध्यान वर्षो तक करो, उससे कुंडलिनी जागरण भी प्राप्त कर लो, फिर अगर उनसे अचानक मिलो, तो वे आपको पहचान भी नहीं पाएंगे। आपने गुरु के बाहरी रूप का ध्यान किया, उनके मन का नहीं। किसीके मन का ध्यान कोई नहीं कर सकता, क्योंकि वह दिखता नहीं। मेरे कॉलेज टाइम का एक नवयुवक एक लड़की को बहुत चाहता था। जब वह कई वर्षों बाद उससे मिला, तो उसने उसे पहचानने से भी इंकार कर दिया। वह इस गम को बर्दाश्त न कर सका, और उसने नजदीक बने पुल से नदी में छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली। वैसे तो वह पहले भी आत्महत्या का प्रयास कर चुका था, अवसादग्रस्त की तरह था, और कुछ हद तक शराब की लत के अधीन भी था। दरअसल वह यौनप्रेम के वशीभूत होकर लड़की के बाहरी रूपरंग का ही ध्यान करता था, उसके मन अर्थात उसके असली स्वरूप का तो नहीं। अपने मन में बने उसके चित्र को उसने अपना स्वरूप दिया हुआ था। एकप्रकार से वह अपने से ही प्यार करता था। वस्तुतः हर कोई अपने से ही प्यार करता है, पर वह उसे किसी बाहरी व्यक्ति पर झूठमूठ ही आरोपित करता है, और फँसता है। कई चालाक लोग मीठी-मीठी बातें बनाकर इस झूठ को मनवा भी देते हैं, जिससे कई बार प्रेमिका उनके जाल में फँस भी जाती है। इसीलिए पतंजलि योग में उस चीज के चित्र को ध्यान का आलम्बन कहा है, जिसका मन में ध्यान किया जाता है। दरअसल ध्यान अपना ही होता है, इसीलिए मानसिक चित्र को ध्यान के लिए सहारा कहा है, असली ध्यान की वस्तु नहीं। इसीलिए ध्यान को आत्मानुसन्धान भी कहा जाता है, कुंडलिनी अनुसन्धान या जगत अनुसन्धान नहीं। दरअसल कुंडलिनी ध्यान या कुंडलिनी जागरण आत्मानुसन्धान का एक जरिया है, असली आत्मानुसन्धान नहीं। आपने फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस में भी देखा होगा कि मुन्नाभाई को मन में दिखने वाला गाँधी उसे वही बात बताता था जो बात उसको खुद को पता होती थी। जो उसे खुद पता नहीं होता था, उसे उसका गाँधी भी नहीं बता पाता था। दरअसल गाँधी के बारे में किताब पढ़ कर उसका मन गाँधी जैसा बन गया था, पर उसके मन ने उसे इस भ्रम में डाल दिया कि गाँधी खुद उसके अंदर बस गए हैं। ये बनावटी तरीका बढ़िया है कि सुबह-शाम एक विशिष्ट मानसिक चित्र का ध्यान कर लो, और जिंदगी मजे से जीते रहो। इससे सब कुछ किया या भोगा हुआ उस चित्र के द्वारा किया और भोगा हुआ माना जाएगा। आदमी खुद सब चीजों से अछूता रहेगा, अनासक्त रहेगा, जल में पड़े कमलपत्र की तरह। ऐसे ही जैसे मुन्नाभाई के लिए सबकुछ गाँधी कर रहा था, जबकि दरअसल वह खुद ही सबकुछ कर रहा था। यही दैनिक कुंडलिनी योग है। यही दैनिक पूजा-अराधना है। यही दैनिक संध्या-वंदन है। यह एक आश्चर्यजनक आध्यात्मिक मनोविज्ञान है, जो मुक्ति की ओर ले जाता है।

ईसाई धर्म में ये मान्यता है कि गिरे हुए फ़रिश्ते ने औरतों के साथ सम्भोग करके मानव जाति को आगे बढ़ाया। ऐसे बहुत से पुराने चित्र या शिलालेख हैं जिनमें राक्षस को औरत के साथ सम्भोगरत दिखाया गया है। इसीलिए पुराने समय में औरतों को ज्यादा सजधज कर खुले में बाहर घूमने की ज्यादा छूट नहीं होती थी। गिरा हुआ फरिश्ता दरअसल गिरा हुआ मन या गिरी हुई कुंडलिनी है, क्योंकि कुंडलिनी चित्र मन का प्रतिनिधि है। वही कुंडलिनी चित्र फरिश्ता है। कुंडलिनी कभी सहसरार में होती थी। आदमी की बदनीयती और बदमिजाज से वह नीचे गिरती रही, और सभी चक्रोँ को बेधते हुए मूलाधार चक्र रूपी अंधकूप में गिर गई। वहाँ से फिर ऊपर उठने के लिए वह सम्भोग का सहारा लेती है। फरिश्ते, शाश्वत फरिश्ते या आरकेंजल, और पवित्र आत्मा के बीच आपसी संबंध के बारे में भी लोगों के बीच भ्रम सा बना रहता है। दरअसल तीनों एक ही चीज है तत्त्वतः। एक ही शक्ति तत्त्व को समझाने के लिए तीन तत्वों में विभाजित किया गया है। पवित्र आत्मा को परमात्मा का अनादि सहचर और उससे अभिन्न माना गया है, जैसे सूर्यरश्मि सूर्य से अभिन्न है। शिव की शक्ति भी बिल्कुल ऐसी ही है। इसका मतलब कि अनादि शक्ति ही पवित्र आत्मा या हॉली स्पिरिट है। साधारण फरिश्ते को अस्थायी और नश्वर कहा गया है। लोगों के व्यक्तिगत आध्यात्मिक गुरु भी ऐसे ही होते हैं, जैसा मैंने अपने फरिश्ते बने गुरु के बारे में भी बताया है। वे सबके अलग-अलग हो सकते हैं, और अपने शिष्य तक ही सीमित रहते हैं। शाश्वत फ़रिश्ते या आरकेंजल हमारे शाश्वत वैदिक देवता हैं, जैसे गणेश, दुर्गा, शिव आदि। इनके ध्यानरूप मानसिक चित्र हर युग में लोगों को मुक्ति की तरफ ले जाते रहते हैं। मुझे लगता है कि बहुत से लोग इनमें मनमाना अंतर ढूंढ कर आपस में झगड़ा करते रहते हैं, और असली चीज से वँचित रह जाते हैं।

पिछली पोस्ट में मैं यह भी बता रहा था कि बहुईश्वरवादियों और एकेश्वरवादियों के बीच किस तरह वैरविरोध चलता रहता है। धर्म से इन विचारधाराओं का कोई लेनादेना नहीं है, क्योंकि ये किसी भी धर्म में हो सकती हैं। दरअसल ये व्यक्ति के मानसिक या आध्यात्मिक स्तर पर निर्भर करता है कि वह किस विचारधारा को मानता है। कोई व्यक्ति बहुईश्वरवादी धर्म से ताल्लुक रखता हुआ भी एकेश्वरवादी हो सकता है। इसी तरह कोई शख्स एकेश्वरवादी धर्म से ताल्लुक रखने पर भी बहुईश्वरवाद अर्थात द्वैतवाद से ग्रस्त हो सकता है। असली व अध्यात्म वैज्ञानिक विचारधारा तो एकेश्वरवादी ही है। कुंडलिनी योग भी एकेश्वरवादी ही है। कुंडलिनी योग एकाग्रता से प्राप्त होता है। एकाग्रता मतलब एकाग्र ध्यान का शाब्दिक अर्थ है, एक अग्र अर्थात एक चीज आगे, बाकि सब पीछे। वही सबसे आगे रहने वाली चीज ही कुंडलिनी है। दरअसल कोई भी धर्म बहुईश्वरवादी नहीं है, केवल भ्रम से ऐसा लगता है। कोई धार्मिक संप्रदाय यदि गणपति की आराधना करता है, तो केवल गणपति की ही करता है, किसी दूसरे देवता की नहीं। इसी तरह कोई शाक्त संप्रदाय यदि केवल दुर्गा की पूजा करता है, तो वह बहुईश्वरवाद कैसे हुआ। मतलब कि साम्प्रदायिक स्तर पर कोई भी धर्म बहुईश्वरवादी नहीं है। यह भी मैंने पिछली पोस्ट में बताया था कि कैसे देवमूर्ति आदि की पूजा से यिनयांग गठबंधन के बनने से मन की एकमात्र कुंडलिनी क्रियाशील हो जाती है। यदि कोई विविध प्रकार की देवमूर्तियों की पूजा भी करे, तो भी वह बहुईश्वरवादी नहीं है, क्योंकि सभी से यिन-यांग गठबंधन बनता है, जिससे एकमात्र कुंडलिनी को ही बल मिलता है, अन्य किसी को नहीं। इसके विपरीत, एकेश्वरवादी धर्म को मानने वाला व्यक्ति यदि कुंडलिनी और योग को न माने, तो वह बहुईश्वरवाद या द्वैत से भरा हुआ व्यक्ति है। जब उसके मन में कोई एकमात्र चीज अर्थात कुंडलिनी स्थायी तौर पर हमेशा स्थिर नहीं रहेगी, तो स्वाभाविक है कि उसका मन विविधता से भरे हुए द्वैतपूर्ण संसार में भटका रहेगा। फिर ऐसे द्वैतपूर्ण व्यक्ति को एकेश्वरवादी कैसे माना जा सकता है। दरअसल कुंडलिनी ही वह ईश्वर है, जिसकी हम ध्यान के रूप में पूजा कर सकते हैं। वह खुद पूर्ण परब्रह्म ईश्वर तक ले जाती है। सीधे तौर पर तो हम निराकार ब्रह्म को न तो देख सकते हैं और न ही अनुभव कर सकते हैं, फिर उसकी पूजा कैसे की जा सकती है। अगर पूजा करने की कोशिश की जाए, तो कमोबेश कुंडलिनी ही उस पूजा को स्वीकार करने के लिए मन में प्रकट होने लगती है, हालांकि उतनी नहीं जितनी सीधे कुंडलिनी ध्यान से प्रकट होती है। फिर क्यों न सीधे ही कुंडलिनी ध्यान अर्थात कुंडलिनी योग किया जाए। यदि निराकार ईश्वर की पूजा करने वाला एकेश्वरवादी मन में पैदा हो रही एकमात्र कुंडलिनी का बलपूर्वक विरोध करेगा, तब तो मानसिक ऊर्जा के पास विविधता से भरे संसार के रूप में उजागर होने के सिवाय कोई चारा नहीं बचेगा। मतलब कि ब्रह्म अर्थात एकेश्वर उपासक का मन द्वैत से भरे संसार से भर जाएगा। फिर वह एकेश्वरवादी कहाँ रहा। इसीलिए कहते हैं कि जैसा दावा किया जाता है या जैसा दिखता है, हमेशा वैसा नहीं होता, बल्कि कई बार बिल्कुल विपरीत होता है। सच्चाई को जानने के लिए मनोवैज्ञानिक खोजबीन करनी पड़ती है।

जो शक्ति शरीर के अंदर है, वही बाहर भी है। अंदर भी वह शिव से मिलना चाहती है इसलिए पीठ से होकर ऊपर चढ़ती है। वैसे तो वह अव्यक्त अर्थात निराकार है पर खुद को अभिव्यक्त करने के लिए मन के संसार का निर्माण करती है। कुंडलिनी चित्र उस मन का सबसे प्रभावशाली अंश होता है। शक्ति उसीके रूप में जागृत होकर शिव से एकाकार होती है। शक्ति या ऊर्जा का अपना कोई रूप नहीं होता। वह किसी संवेदना के रूप में ही अनुभव हो सकती है। संवेदनाओं में भी मानसिक चित्र में सबसे अधिक संवेदना छुपी होती है, उनमें भी व्यक्तिविशेष के चित्रों में, उनमें भी चिरपरिचित के चित्रों में, और उनमें भी गुरु या देव या पूर्वज के चित्र में सबसे अधिक संवेदना छिपी होती है। वैसे सैद्धांतिक रूप से देव -छाया में सबसे अधिक संवेदना छुपी होती है, अर्थात देवछाया के रूप में शक्ति सर्वाधिक अभिव्यक्त होकर सबसे आसानी से जागृत हो सकती है। देव मतलब अद्वैत, और देवछाया मतलब अद्वैत भाव की सहायता से मन में बनने वाला पवित्र व स्थायी चित्र। इससे जाहिर होता है कि जागृति के लिए सबसे जरूरी दो चीजें हैं, शक्ति और देवछाया। देवछाया को हम कुंडलिनी चित्र या संक्षेप में कुंडलिनी या पवित्र भूत या जिन्न या फरिश्ता भी कह सकते हैं, जैसा कि पिछली पोस्ट में बताया गया है। बाहर भी वह शक्ति इसी तरह विविध स्थूल संसार का निर्माण करती है। उस संसार में कुछ विशेष क्षेत्र भी होते हैं, जैसे भारत देश, उसमें भी हरिद्वार या काशी, या अन्य विशेष व सुन्दर पर्यटन स्थल आदि। उन विशेष क्षेत्रों के रूप में शक्ति सबसे ज्यादा अभिव्यक्त होती है। तभी तो वैसे क्षेत्रों में जागृति की सम्भावना ज्यादा होती है। इसीलिए आदमी ऐसे सुन्दर क्षेत्रों के निर्माण में लगा रहता है, जहाँ उसका मन प्रफुल्लित होकर चरम रूप में अभिव्यक्त हो जाए। मन की या कुंडलिनी शक्ति की चरम अभिव्यक्ति को ही तो कुंडलिनी जागरण कहते हैं। वैसे तो प्रकृति या समष्टि शक्ति भी ऐसे सुन्दर क्षेत्रों के निर्माण में लगी रहती है, पर जीव विशेषकर मनुष्य के रूप में व्यष्टि शक्ति इसे तेजी प्रदान करने और उसमें चार चाँद लगाने में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पर आजकल आदमी प्रकृति के साथ जरूरत से ज्यादा छेड़छाड़ करके उसके कार्य में बाधा डाल रहा है, जो उसके अस्तित्व के लिए ठीक नहीं है।

व्यष्टि और समष्टि शक्ति में अभिन्नता का मतलब है कि शरीर के अंदर शक्ति साधना से आदमी कुछ हद तक बाहरी स्थूल शक्ति पर नियंत्रण हासिल कर सकता है। उदाहरण के लिए, कल्पना करो कि कोई आदमी बाहरी बुरी शक्ति के प्रभाव में आकर किसी दुर्घटना का शिकार होने वाला होता है। आदमी को इसका आभास हो जाता है और वह कुंडलिनी का ध्यान करते हुए अतिरिक्त सतर्क हो जाता है। कुंडलिनी के ध्यान से उसके मन का अंधेरा छंट जाता है, जिससे प्रभावित होकर बाहरी शक्ति का अंधेरा भी कुछ हद तक छंट जाता है, जिससे वह बाहर भी उसे बचाने के लिए विशेष प्रयास करती है, जैसे बचने के लिए सुरक्षित जगह या सामान मिल जाना। यह कुछ हद तक ही होता है, इसलिए केवल इसके सहारे भी नहीं रहा जा सकता, पर यह कुछ न कुछ मदद जरूर करती है। यह बहुत दूर से या प्रार्थना से भी हो सकता है, क्योंकि शक्ति सर्वव्यापी है। होता क्या है कि किसी विपत्ति में फंसे व्यक्ति को मारने आई बुरी या काली शक्ति उसके परिचित व्यक्ति को देशांतर में भी महसूस हो सकती है। वह यदि कुंडलिनी ध्यान से उसे शांत कर दे, तो वह उस विपत्ति में पड़े व्यक्ति के लिए शांत हो सकती है। सम्भवतः यही प्रार्थना का रहस्य है।

जिसको शरीर में अपनी इच्छानुसार शक्ति को घुमाना आ गया, लगता है उसे बहुत कुछ आ गया। अशिक्षित लोग उसके लिए यौन क्रीड़ा का इस्तेमाल करते थे। इससे संवेदना रूपी शक्ति के शरीर के निचले हिस्सों में महसूस होने से, उस शक्ति को बल देने के लिए मस्तिष्क की शक्ति आगे से होते हुए नीचे उतरती थी, जिससे मस्तिष्क भी हल्का हो जाता था, और नीचे के सारे चक्र भी शक्ति से तृप्त हो जाते थे, जिससे पूरा शरीर तृप्त हो जाता था। हालांकि उन्हें कम और अल्पकालिक लाभ मिलता था, क्योंकि वे केवल संवेदना से जुड़े द्वैत से भरे संसार को ही अनुभव करते थे, उससे जुड़ी कुंडलिनी को नहीं, क्योंकि उनके मन में कोई स्थाई कुंडलिनी चित्र नहीं होता था। इससे उन्हें संवेदना वाले मूलाधार से जुड़े अंगों पर तो संवेदना के रूप में शक्ति महसूस होती थी, पर बीच वाले चक्रोँ पर नहीं। जैसे कि अनाहत चक्र, मणिपुर चक्र आदि पर। ऐसा इसलिए होता था क्योंकि अधिकांशतः इन बीच वाले चक्रोँ पर तो कुंडलिनी चित्र ही शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, इन पर संवेदना नहीं होती, और न ही द्वैतपूर्ण संसार। द्वैतपूर्ण संसार तो केवल मस्तिष्क में ही रहता है। कुंडलिनी चित्र ही चक्रोँ पर मांसपेशी की सिकुड़न पैदा करता है, जिससे हल्की सी संवेदना पैदा होती है। कुंडलिनी योगी ने इस प्रक्रिया को कृत्रिम, वैज्ञानिक और ज्यादा प्रभावशाली बनाया। उसने सिद्धासन या अर्धसिद्धासन के दौरान पैर की ऐड़ी से मुलाधार चक्र को दबा कर वहाँ बनावटी संवेदना पैदा की। साथ में उसने संवेदना के ऊपर कुंडलिनी चित्र को आरोपित किया, ताकि शक्ति को खींचने के लिए अधिक आकर्षण बने, और कम संवेदना पैदा होने पर भी कुंडलिनी चित्र के माध्यम से शक्ति को आकर्षित किया जा सके। बाकि कुंडलिनी से मिलने वाले मुक्तिलाभ को तो सब जानते ही हैं। इसीलिए कहते हैं कि योग से तन-मन भी स्वस्थ रहता है, और आत्मा भी।

शक्ति का कोई स्थायी आधार या आश्रय भी जरूर होना चाहिए। यह किसी कला, विद्या, रुचि या हॉबी आदि के रूप में हो सकता है। जैसे मेरी शक्ति का आधार लेखन और कविता रचना है। इससे मेरी व्यर्थ में नष्ट होने वाली शक्ति लेखन और कविता निर्माण में व्यय हो जाती है। एकबार किसी आदमी ने मेरा नुकसान कर दिया। उससे मेरे अंदर उससे लड़ने के लिए एक शक्ति से भरा जोश पैदा हो गया। फिर मैंने बुद्धि से निर्णय लिया कि लड़ाई से कोई लाभ नहीं, नुकसान ही है। मेरे अंदर जो शक्ति पैदा हुई थी, उसे मैंने कविता रचना की ओर मोड़ दिया, जिससे एक सुंदर सी कविता बन कर तैयार हो गई। मतलब कि मैंने शक्ति को रूपांतरित या दिग्दर्शित किया। शिवपुराण में भी एक कथा ऐसी ही आती है। इंद्र के द्वारा किए अपमान से जब शिव बहुत ज्यादा क्रोधित हो गए, तो वे उसे भस्म करने को आतुर हो गए। फिर ब्रह्मा आदि देवों ने शिव को बड़ी मुश्किल से मनाया। पर शिव का गुस्सा शांत ही नहीं हो रहा था। इसलिए देवताओं ने शिव के गुस्से को माथे से बाहर निकाला और उसे समुद्र में डलवा दिया, जिससे जलंधर नाम का दैत्य पैदा हुआ। जलंधर कथा को हम अगली पोस्ट में रहस्योदघाटित करेंगे। काश कि युक्रेन, रूस और नाटो की शक्ति को भी ऐसा ही दिग्दर्शन मिलता। मूलाधार चक्र शक्ति का सबसे बड़ा सिंक या अवशोषक या आकर्षणकर्ता होता है। कुंडलिनी योग में इसीलिए तो ऐड़ी को मूलाधार चक्र पर रखा जाता है। दरअसल ऐड़ी के दबाव से बनी संवेदना से मस्तिष्क की शक्ति नीचे उतरते हुए सभी चक्रोँ में बराबर बंट जाती है, पर खिंचाव तो मुलाधार ने ही पैदा किया न। यह ऐसे ही है कि जैसे छत की टंकी से सबसे निचली मंजिल पर पानी पहुंचाने से बीच वाली मंजिलों में भी पानी खुद ही पहुंच जाता है। यदि किसी बीच की मंजिल को ही पानी दिया जाए, तो उससे नीचे की मंजिलें बिना पानी के रह जाएंगी। यौन योग से तन-मन की अतिरिक्त शक्ति या तनावहीनता मूलाधार को मिल रहे वज्र के अतिरिक्त सहयोग से प्राप्त होती है। मूलाधार पर शक्ति सबसे ज्यादा अव्यक्त या अनभिव्यक्त रूप में रहती है, घुप्प अँधेरे की तरह। इसीलिए तो ऐसी अन्धकारपूर्ण मानसिक अवस्था में आदमी का मन सम्भोग की तरफ भागता है। सम्भोग का स्थान मूलाधार है। इसीलिए कहते हैं कि शक्ति का मूल निवासस्थान मूलाधार है। आदमी सबसे ज्यादा अनभिव्यक्त या शिथिल अवस्था में अपने घर पर होता है। काम धंधे के लिए बाहर निकलने पर उसकी अभिव्यक्ति बढ़ती जाती है। कुंडलिनी भी इसी तरह अभिव्यक्त होने के लिए अपने घर मूलाधार से बाहर निकलना चाहती है। जल्दी से जल्दी अधिकतम अभिव्यक्ति के लिए वह सम्भोग का सहारा लेती है। सम्भोग से वह सीधी आज्ञा चक्र और सहसरार चक्र में पहुंच जाती है। अन्यथा सामान्य लौकिक रीति से सभी चक्रोँ को क्रमवार भेदते हुए धीरेधीरे ऊपर चढ़ते हुए ज्यादा से ज्यादा अभिव्यक्त होती जाती है। बेशक चढ़ती तो वह पीठ से ही है, पर पीठ के हरेक चक्र की शक्ति आगे वाले संबंधित मुख्य चक्र तक भी रिसती रहती है। सहसरार पर वह सबसे ज्यादा अभिव्यक्त हो जाती है। वहाँ भी अभिव्यक्ति के चरम को छूने पर वह जागृत होकर शिव में मिल जाती है। मनुष्य ही शक्ति की इस चरम अभिव्यक्ति को प्राप्त कर सकता है। अन्य प्राणी अलग -अलग स्तर तक ही शक्ति को अभिव्यक्त कर सकते हैं, पूर्ण अभिव्यक्ति को छोड़कर। इस तरह से ऊर्जा या शक्ति के अनगिनत स्तर हैं। जो जीव या योनि इस विकास श्रृंखला में जितने ज्यादा निचले पायदान पर है, उसमें शक्ति की अभिव्यक्ति उतनी ही कम है। भूतप्रेत का भी अपना एक विशिष्ट ऊर्जा स्तर होता है, इसीलिए वह भी एक जीवयोनि है। इसी तरह कीड़ों मकोड़ों का ऊर्जा स्तर भी बहुत नीचे होता है। हालांकि इनमें उतनी ही शक्ति होती है, जितनी किसी मनुष्य, देवता या भगवान में होती है, बेशक वह अभिव्यक्त नहीं होती। मतलब कि वे भी अपनी अभिव्यक्ति बढ़ाते हुए कभी न कभी शिव तक जरूर पहुंचेंगे। इसीलिए तो कहते हैं कि सभी को समान समझते हुए सभी में अपनी आत्मा के दर्शन करने चाहिए। इस विचार क्षेत्र से जो आश्चर्यजनक बात निकलती है, वह यह है कि जिन निर्जीव चीजों को हम निर्जीव कहते हैं, वे भी जीवित हैं, उनमें शक्ति की अभिव्यक्ति सबसे कम है। इसीलिए हिंदू धर्म में हर चीज की पूजा की जाती है, यहां तक कि पत्थर, नदी, पहाड़ की भी। दुनिया की कुछ अन्य संस्कृतियों में भी जैसे कि विलुप्तप्राय प्राचीन सैल्टिक संस्कृति में ऐसी ही प्रकृति-पूजन की मान्यता है। भगवान शिव ने भी इसीलिए भूतों को अपने बराबर का दर्जा देकर उन्हें अपना गण बनाया है। ‘अहिंसा परमो धर्म:’, यह प्रसिद्ध उक्ति भी इसी सिद्धांत से बनी है। नाजायज जीवहिंसा का समर्थन दुनिया के किसी भी धर्म में नहीं किया गया है।

कुंडलिनी के प्रति अरुचि को भी एक मानसिक रोग माना जा सकता है

दोस्तों, मैं पिछले ब्लॉग लेख में कुछ व्यावहारिक जानकारियां साझा कर रहा था। हालाँकि सभी जानकारियां व्यक्तिगत होती हैं। किसीके कुछ जानकारियां काम आती हैं, किसीके दूसरी। पता तो हर किस्म की मानवीय जानकारी का होना चाहिए, क्या पता किस समय कौनसी जानकारी काम आ जाए। व्यक्ति का व्यक्तित्व बदलता रहता है। कभी मैं तन्त्र पर जरा भी यकीन नहीं कर पाता था। हालाँकि उसकी मोटे तौर की जानकारी मुझे थी। वो जानकारी मेरे काम तब आई जब मेरा व्यक्तित्व व कर्म बदला, जिससे मुझे तन्त्र पर विश्वास होने लगा। खैर, तन्त्र का दुरुपयोग भी बहुत हुआ है। जिस तन्त्र की शक्ति से कुंडलिनी जागरण मिल सकता था, उसे भौतिक दुनियादारी को बढ़ावा देने के लिए प्रयोग में लाया गया। परिणाम सबके सामने है। आज का अंध भौतिकवाद और जेहादी किस्म की कट्टर धार्मिकता उसी का परिणाम है। किसी धर्म विशेष के बारे में कहने भर से ही मौत का फतवा जारी हो जाए, और कोई भी आदमी या संस्था डर के मारे कुछ न कह पाए, ये आज के विज्ञान के युग में कितना बड़ा विरोधाभास है। नाम को तो हिंदुस्तान है, पर हिंदुओं की सफाई का अभियान जोरों पर है। एक सुनियोजित अंतरराष्ट्रीय साजिश चल रही है। इसी हिन्दुविरोधी श्रृंखला में अब हिंदूवादी व राष्ट्रवादी सुदर्शन चैनल के प्रमुख सुरेश चव्हाणके जी की हत्या की जेहादी साजिश का खुलासा हुआ है। जबरन धर्मांतरण का सिलसिला जारी है। फिर उन्हें राईस बैग कन्वर्ट भी कहा जाता है। धर्म इसलिए बनाए गए थे ताकि मानवता को बढ़ावा मिले। ऐसा भी क्या धर्म, जो मानवता से न चले। मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है। जो अन्य धर्म और देश इसपर चुप्पी जैसी साध कर इसका अपरोक्ष समर्थन किए हुए हैं, उन्हें यह नहीं पता कि कल को उनका नम्बर भी लग सकता है। डबल स्टैंडर्ड की भी कोई सीमा नहीं आजकल। यदि बैप्टिसम वैज्ञानिक है, तो गंगास्नान भी वैज्ञानिक है। यदि गंगास्नान अंधविश्वास है, तो बैप्टिसम भी अंधविश्वास है। दोगलापन क्यों। जो ट्रूडो सिंघु बॉर्डर पर चले किसान आंदोलन को लोकतांत्रिक बताते हुए उसका समर्थन कर रहे थे, वे आज ट्रक ड्राइवर्स के आंदोलन को अलोकतांत्रिक बता रहे हैं। गहराई से जांचे-परखे बिना कोई भी सतही बयानबाजी नहीं करनी चाहिए। तन्त्र एक शक्ति है। तन्त्र का दुरुपयोग, मतलब शक्ति का दुरुपयोग। प्रकृति को भी इसने विनाश की ओर धकेल दिया है। देवी काली के लिए जो पशु बलि दी जाती थी, वह कुंडलिनी के लिए ही थी। काली कुंडलिनी को ही कहा गया है। पर कितने लोगों ने इसे समझा और इसका सही लाभ उठाया। हालांकि कुछ अप्रत्यक्ष लाभ तो मिलता ही है, पर उसे फलीभूत होने में बहुत वक्त लग जाता है। पर उस शक्ति से कुंडलिनी जागरण के लिए कितने लोगों ने प्रयास किया होगा, और कितना प्रयास किया होगा। शायद बहुत कम या लाखों में से कुछ सौ लोगों ने। उनमें से सही प्रयास भी कितनों ने किया होगा। शायद दस–बीस लोगों ने। उनमें से कितने लोगों को कुंडलिनी जागरण मिला होगा। शायद एक-दो लोगों को। तो फिर काली आदि कुंडलिनी प्रतीकों को समझने और समझाने में कहाँ गलती हुई। इसी का अनुसंधान कराने के लिए ही शायद काल ने वह प्रथा आज लुप्तता की ओर धकेल दी है। वैसे आजकल की अंधी पशु हिंसा से वह प्रथा कहीं ज्यादा अच्छी थी। वैदिक युग में कभी-कभार होने वाली यज्ञबलि से लोग अपने शरीर की अधिकांश जरूरत पूरी कर लिया करते थे। वैसे पशुहिंसा पर चर्चा मानवीय नहीं लगती, पर जिस विषय पर हम बोलेंगे नहीं, उसे दुरस्त कैसे करेंगे। कीचड़ को साफ करने के लिए कीचड़ में उतरना पड़ता है। पशु भी जीव है, उसे भी दुख-दर्द होता है। हिंदु धर्म के अनुसार गाय के शरीर में सभी देवताओं का निवास है। शरीरविज्ञान दर्शन भी तो यही कहता है कि सभी जीवों के शरीर में संपूर्ण ब्रह्मांड स्थित है। इसलिए उसके अधिकारों का भी ख्याल रखा जाना चाहिए। आजकल बहुत सी पशु अधिकारों से जुड़ी संस्थाएँ हैं, पर मुझे तो ज्यादातर निष्पक्ष और निःस्वार्थ नहीं लगतीं। वे जहाँ एक विशेष धर्म में हो रही बड़े तबके की और अमानवीय धार्मिक हिंसा पर मौन रहती हैं, वहीं पर किसी अन्य विशेष धर्म की छोटी सी धार्मिक व मानवतावादी हिंसा पर भी हायतौबा मचा देती हैं। आज तो पशुहिंसा पे कोई लगाम ही नहीं है। मानवाधिकार आयोग की तरह पशु अधिकार आयोग भी होना चाहिए। पर आज मानवाधिकार आयोग भी निष्पक्ष और ठीक ढंग से कार्यशील कहाँ है। अगर मानवाधिकार आयोग की चलती, तो आज धर्म के नाम पर हत्याएँ न हो रही होतीं। आज तो पशुहिंसा के साथ आध्यात्मिक व मानवतावादी प्रतीक भी नहीं जुड़ा है। कोई नियम कायदे नहीं हैं। पशु क्रूरता आज चरम के करीब लगती है, और आध्यात्मिक विकास निम्नतम स्तर पर। आज बहुत से लोग पशुजन्य उत्पादों का बिल्कुल प्रयोग नहीं करते। फिर इतनी ज्यादा पशुहत्या कैसे हो रही है। मतलब साफ है। जो पशुजन्य उत्पाद का उपभोग करते हैं, वे अपनी जरूरत से कहीं ज्यादा उपभोग कर रहे हैं। इससे वे स्वस्थ कम और बीमार ज्यादा हो रहे हैं। आजकल पूरी दुनिया में बढ़ रहा मोटापे का रोग इसका अच्छा उदाहरण है। जो इनका उपयोग नहीं करते, उनकी कमी भी वे पूरी कर दे रहे हैं। तो फिर कुछ लोगों के द्वारा इनको छोड़ने से क्या लाभ। जो ज्यादा उपभोग कर रहे हैं, वे भी बीमार हो रहे हैं, और जो बिल्कुल भी उपभोग नहीं कर रहे हैं, वे भी बीमार हो रहे हैं। ज्यादा उपयोग करने वाले यदि व्यायाम या दवाईयों आदि की सहायता से अपने शरीर को बीमार होने से बचा रहे हैं, फिर भी उनका मन तो बीमार हो ही रहा है। जरूरत से ज्यादा तमोगुण और रजोगुण से मन तो बीमार होगा ही। क्या है कि पाश्चात्य संस्कृति में अधिकांशतः शरीर की बीमारी को ही बीमारी माना जाता है। मन की बीमारी को भी अधिकांशतः अवसाद तक ही सीमित रखा जाता है। वास्तव में अध्यात्म में मन न लगना भी एक मन की बीमारी है। जीवविकास कुंडलिनी के लिए हो रहा है। यदि कोई कुंडलिनी से परहेज कर रहा है, तो वह जीवविकास से विपरीत दिशा में जा रहा है। ऐसी मानसिकता यदि मन की बीमारी नहीं है, तो फिर क्या है। असंतुलित जीवन से ऐसा ही हो रहा है आजकल। संतुलन कहीं नहीं है। इससे अच्छा तो तब होता यदि सभी लोग अपनी भौतिक और आध्यात्मिक जरूरत के हिसाब से इनका उपभोग करते, जैसा अधिकांशतः पुराने समय में होता था। इससे पशुओं पर होने वाला अत्याचार काफी कम होता। और साथ में जो पशु व्यवसाय से जुड़े गरीब लोग हैं, उनके सामने भी रोजी-रोटी का सवाल खड़ा नहीं होता। मेरा एक दोस्त था, जो पशु व्यवसाय से जुड़ा सम्पन्न व्यक्ति था। वह कहता था कि पशुहिंसा से जुड़ा कारोबार वही करता है, जो बहुत गरीब हो, और जिसके पास कमाई का और कोई चारा न हो। पशु मांस का उपभोग भी गरीब और मजदूर तबके के लोग करते हैं, क्योंकि उन्हें सस्ते में इसमें सभी पोषक तत्व आसानी से मिल जाते हैं। उनके पास इतना पैसा नहीं होता है कि वे उच्च पोषकता वाले महंगे शाकाहारी उत्पादों को खरीद सकें। आम मध्यमवर्गीय आदमी ऐसे पाप वाला काम नहीं करना चाहता। उच्चवर्गीय आदमी अगर अपने शौक की पूर्ति के लिए करे, तो वह अलग बात है। पर आज तो लालच इस हद तक बढ़ गया है कि आदमी करोड़पति बनने के लिए पशुहिंसा से जुड़े कारोबार करना चाहता है। पशु कल्याण के नाम पर आदमी को तो भूखों मरने नहीं छोड़ा जा सकता न। मतलब साफ है कि कोई अभियान तभी सफल होता है यदि पूरा समाज उसमें सहयोग करे। मात्र कुछ लोगों से समाज की व्यवस्था में एकदम से पूर्ण परिवर्तन नहीँ आता। हालांकि आ भी जाता है, पर उसमें समय काफी लग सकता है। यदि सभी लोग एकसाथ परिवर्तित हो जाएं, तो समाज भी एकदम से परिवर्तित हो जाएगा। लोगों का समूह ही समाज है। मैं किसी भी जीवनपद्धति के पक्ष या विपक्ष में नहीं बोल रहा। कोई भी व्यक्ति अपनी स्थिति-परिस्थिति के अनुसार अपनी जीवनचर्या चुनने के लिए स्वतंत्र है। किसी को कुछ सूट कर सकता है, तो किसी को कुछ। मैं तो सिर्फ अध्यात्मिक व वैज्ञानिक रूप से वस्तुस्थिति को बयां करके उसे चर्चा में लाने की कोशिश कर रहा हूँ। हम नाजायज जीवहिंसा की कतई वकालत नहीं करते, इसलिए कुछ नियम कायदे तो होने ही चाहिए। यदि कोई कहे कि ये सब तो भौतिकवाद से सम्बंधित बातें हैं, इनसे अध्यात्म कैसे मिलेगा। दरअसल असली अध्यात्म कुंडलिनी जागरण के बाद शुरु होता है। और कुंडलिनी जागरण मानवीय भौतिकवाद के चरम को छूने के बाद मिलता है। असली अद्वैत मानवीय द्वैत के चरम से शुरु होता है। असली अध्यात्म मानवीय विज्ञान के चरम से शुरु होता है। कई लोग अध्यात्म के वैज्ञानिक विश्लेषण का विरोध यह मानकर करते हैं कि कुण्डलिनी की प्राप्ति तर्कशील या लॉजिकल दिमाग से नहीं होती। वे अध्यात्म से बेखबर से बने रहते हैं। वे अध्यात्म के लिए कोई प्रयास नहीं करते। वे एक अनासक्त की तरह दिखावा करते हुए हरेक काम के बारे में लापरवाह व अहंकारपूर्ण व्यवहार से भरे हुए बने रहते हैं, और पूर्णता का ढोंग सा करते रहते हैं। ऐसे लोग आसक्त और अज्ञानी से भी निचले पायदान पर स्थित होते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि असली आसक्त या अज्ञानी आदमी तो कभी न कभी अनासक्ति व ज्ञान व जागृति के लिए प्रयास जरूर करेगा, पर अनासक्ति या ज्ञान का ढोंग करने वाला आदमी उसके लिए कभी प्रयास नहीं करेगा, क्योंकि वह इस धोखे में रहेगा कि वह पहले से ही अनासक्त और ज्ञानी है। असली अनासक्ति में तो आदमी को अनासक्ति के बारे में पता ही नहीं चलता, न ही वह अनासक्ति के नाम पर दुनियादारी से दूर भागता है। कई लोग इसलिए बेपरवाह बने रहते हैं, क्योंकि उन्हें कई लोग बिना प्रयास के ही या उनके बचपन में ही आध्यात्मिक या जागृत दिखते हैं। पर वे इस बात को नहीं समझते कि उनके पिछले जन्म का प्रयास उनके इस जन्म में काम कर रहा है। बिना प्रयास के कुछ नहीं मिलता, सांस भी नहीं। सच्चाई यह है कि दिमाग की वास्तविक तर्कहीन या इलॉजिकल अवस्था वैज्ञानिक तर्कों और अन्वेषणों का चरम छू लेने के बाद ही होती है। जब आदमी अध्यात्म का वैज्ञानिक कसौटी पर पूरा अन्वेषण कर लेता है, तब वह थकहार कर चुप होकर बैठ जाता है। वहीँ से ईश्वर-शरणागति और विश्वास पर आधारित असली तर्कहीनता शुरु होती है। उससे पहले की या अन्वेषण का प्रयास किए बिना ही जबरदस्ती पैदा की गई तर्कहीनता एक ढोंग ही होती है। यह अलग बात है कि लोग औरों की नकल करके आध्यात्मिक बनने का दिखावा करते हैं। वह भी ठीक है। समथिंग इज बैटर देन नथिंग। पर इसमें अटूट विश्वास की आवश्यकता होती है। नहीं तो क्या पता यह परलोक में काम आएगा भी या नहीं। मेरे द्वारा यहाँ पर किसीको निरुत्साहित नहीं किया जा रहा है। केवल संभावना को खुल कर व्यक्त किया जा रहा है। किसको पता कि परलोक में क्या होता है, पर अपनी सीमित बुद्धि से अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है। आप्तवचन पर भी आज के वैज्ञानिक युग में सोचसमझ कर ही यकीन किया जा सकता है, आंख बंद करके नहीं। मैं यह दावा नहीं कर रहा कि मुझे कुण्डलिनी जागरण हुआ है। मुझे गुरुकृपा और शिवकृपा से कुंडलिनी जागरण की झलक दिखी है। क्योंकि हर जगह तो क्षणिक, झलक, कुंडलिनी जैसे सहयोजित शब्द नहीं लिखे जा सकते, विस्तार के भय से, इसलिए जल्दी में जागरण या कुण्डलिनी जागरण ही लिखना पड़ता है। यदि कोई मेरी हरेक ब्लॉग पोस्ट ध्यान से पढ़ेगा, तो उसे ही पता चलेगा कि वह जागरण कैसा है। चीज की क्षणिक झलक देखने का यह मतलब नहीं कि उसने उस चीज को ढंग से देख लिया हो। हाँ, कुंडलिनी जागरण की क्षणिक झलक देखकर मुझे यह यकीन हो गया है कि कुंडलिनी जागरण का अस्तित्व है, और वह आध्यात्मिकता के लिए जरूरी है। और यह भी कि वह कैसे प्राप्त हो सकता है। वैसे ही, जैसे किसी चीज की झलक देख लेने के बाद उस चीज के अस्तित्व के बारे में विश्वास हो जाता है, और उसे पाने का तरीका पता चल जाता है। वस्तुतः तो मैं आम आध्यात्मिक व्यक्ति के जैसा ही एक साधारण कुंडलिनी जिज्ञासु हूँ। आध्यात्मिक चर्चा करना मेरा जन्मजात शौक है। जब विद्वान लोग उपलब्ध होते थे, तब आमनेसामने चर्चा कर लेता था। अब ब्लॉग पर लिखता हूँ। ब्लॉग मुझे सबसे अच्छा तरीका लगा। इसमें कोई बेवजह ट्रोलिंग नहीं कर सकता। किसी का कमेंट यदि अच्छा लगे तो अप्रूव कर दो, वरना डिनाय या डिलीट कर दो। आमनेसामने की चर्चा में धोखा लगता है। कई लोग बाहर से आध्यात्मिक जैसा बनने का ढोंग करते हैं। उन पर विश्वास करके यदि उनसे चर्चा करो, तो वे उस समय बगुला भगत की तरह हाँ में हाँ मिलाते हैं, और बाद में धुआँ देने को तैयार हो जाते हैं, क्योंकि वे दूसरे आदमी की आध्यात्मिकता को उसकी कमजोरी समझकर उसका नाजायज फायदा उठाते हैं। यहां तक कि कई लोग तो आध्यात्मिक चर्चा सुनते समय ही सुनाने वाले का मजाक उड़ाने लग जाते हैं। दोस्त भी अजनबी या दुश्मन जैसे बनने लगते हैं। इसलिए जो अच्छे विचार मन में आते हों, उनको किसीको सुनाने से अच्छा लिखते रहो। कम से कम लोग पागल तो नहीं बोलेंगे। अगर लिखने की बजाय उनको अपने में ही बड़बड़ाने लगोगे, तब तो लोग पक्का पागल कहेंगे। दो-चार लोगों के इलावा मेरे अपने दायरे से कोई भी मेरे ब्लॉग के फॉलोवर नहीं हैं। उनमें भी अधिकतर वे हैं, जिन्होंने कभी मेरी एक-आध पोस्ट को या किताब को पसंद किया, और फिर मैंने उनसे अपना ब्लॉग फॉलो करने के लिए कहा। कइयों को तो फॉलो करने के लिए स्टेप बाय स्टेप निर्देशित किया। वैसे उनमें से कोई मेरे ब्लॉग को छोड़कर भी नहीं गया। मतलब साफ है, उन्हें इससे लाभ मिल रहा है। वैसे मैं अपने लाभ के लिए ब्लॉग लिखता हूँ, पर यदि किसी और को भी लाभ मिले, तो मुझे दोगुनी खुशी मिलती है। मेरे अधिकाँश मित्रों व परिचितों को मेरे ब्लॉग के बारे में पता है, पर किसीने उसके बारे में जानने की कोशिश नहीं की, फॉलो करना तो दूर की बात है। मेरे अधिकांश फॉलोवर दूरपार के और विदेशों के हैं। उनमें भी ज्यादातर विकसित देशों के हैं। इससे भी इस धारणा की पुष्टि हो जाती है कि वैज्ञानिक या बौद्धिक या सामाजिक विकास के चरम को छू लेने के बाद ही असली अध्यात्म शुरु होता है। एक कहावत भी है कि घर का जोगी जोगड़ा और दूर का जोगी सिद्ध। वैसे भी मुझे सिद्ध कहलाए जाने का जरा भी शौक नहीं है। मंजिल पर पहुंच गया, तो सफर का मजा खत्म। असली मजा तो तब है अगर मंजिल मिलने के बाद भी सफर चलता रहे। इससे सफर और मंजिल का मजा एकसाथ मिलता रहता है। सच्चाई यह है कि पूर्ण सिद्धि कभी नहीं मिलती। आदमी चलता ही रहता है, चलता ही रहता है, कभी रुकता नहीं। बीच-बीच में जागरण रूपी चैन की सांस लेता रहता है। वैसे अभी विकासशील देशों में वेबसाइट और ब्लॉग का प्रचलन कम है। जागृति वाली वैबसाइट बनाने और पढ़ने के लिए तो वैसे भी अतिरिक्त ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। जहाँ रोजमर्रा की आम जरूरतों को पूरा करने के लिए ऊर्जा कम पड़ती हो, वहाँ जागृति के लिए अतिरिक्त ऊर्जा कहाँ से लाएंगे। यहाँ ज्यादातर लोगों को व्हाट्सएप और फेसबुक से ही फुर्सत नहीं है। जो ज्ञान एक विषय समर्पित ब्लॉग व वैबसाइट से मिलता है, वह फेसबुक, क्वोरा जैसे माइक्रोब्लॉगिंग प्लेटफार्म से मिल ही नहीं सकता। शुरुवाती लेखक के लिए तो क्वोरा ठीक है, पर बाद में वैबसाइट-ब्लॉग के बिना मन नहीं भरता। मुझे नेट पर अधिकांश वेबसाइट व ब्लॉग भी पसंद नहीं आते। जरूरत के हिसाब से उनसे जानकारी तो ले लेता हूँ, पर उन्हें फॉलो करने का मन नहीं करता। एक तो वे एक अकेले विषय के प्रति समर्पित नहीं होते। दूसरा, विस्तृत वैज्ञानिक चर्चा के साथ भी नहीं होते। तीसरा, या तो उनमें पोस्टों की बाढ़ सी होती है, या फिर लम्बे समय तक कोई पोस्ट ही नहीं छपती। चौथा, उन पोस्टों में भाषा व व्याकरण की अशुद्धियाँ होती है। उनमें व्यावहारिक दृष्टिकोण भी नहीं होता, और वे किसी दूसरे ग्रह की रहस्यात्मक कहानियाँ ज्यादा लगती हैं। उनमें मनोरंजकता और सकारात्मक या सार्थक संपर्कता कम होती है। समय की कमी भी एक वजह होती है। उनमें सभी विषयों की खिचड़ी सी पकाई होती है। इससे कुछ भी समझ नहीं आता। कहा भी है कि एके साधे सब सधे, सब साधे सब जाए। अगर कोई ज्योतिष का सिर-पैर एक करने वाला पूर्ण समर्पित ब्लॉग, डिमिस्टिफाइंगज्योतिषडॉटकॉम आदि नाम से हो, तो मैं उसे क्यों फॉलो नहीं करूंगा। दूसरा, उनमें विज्ञापनों के झुंड चैन नहीं लेने देते। इसीलिए मैंने अपने ब्लॉग में विज्ञापन नहीं रखे हैं। पैसा ही सबकुछ नहीं है। जो कोई किसी प्रोडक्ट के बारे में विज्ञापन देता है, उसे खुद उसके बारे में पता नहीं होता, क्योंकि उसको उसने प्रयोग करके कहाँ परखा होता है, या कौन सा सर्वे किया होता है। फिर जनता को क्यों ठगा जाए। पर्सनल ब्लॉग के नाम भी प्रोफेशनल व विषयात्मक लगने चाहिए, ताकि लोग उनकी तरफ आकर्षित हो सकें। सक्सेनाडॉटकॉम या जॉनडॉटकॉम नाम से अच्छा तो म्यूसिकसक्सेनाडॉटकॉम या राइटिंगजॉनडॉटकॉम है। इससे पता चलेगा कि इन ब्लॉग्स का विषय संगीत या लेखन है। विषयात्मक लेखों के बीच में अन्य विषय, व्यक्तिगत लेख और व्यक्तिगत घटनाक्रम भी लिखे जा सकते हैं। ऐसी वैबसाइट टू इन वन टाइप कही जा सकती हैं। ये प्रोफेशनल भी होती हैं, और पर्सनल भी। ये ज्यादा प्रभावशाली लगती है। अपनी पर्सनल वैबसाइट के लिए 200-250 रुपए का प्रति महीने का खर्चा लोगों को ज्यादा लगता है। पर वे जो 200 रुपए की अतिरिक्त मोबाइल सिम प्रति माह रिचार्ज करते हैं, उसका खर्चा उन्हें ज्यादा नहीं लगता। वैबसाइट से तो दुनिया भर की जानकारी मिलती है, पर अतिरिक्त सिम से तो कुछ नहीं मिलता, सिर्फ जिम्मेदारी का बोझ ही बढ़ता है। नकारात्मक जैसी किस्म के लोगों की भी आजकल कोई कमी नहीं। मैं क्वोरा पर कुण्डलिनी से संबंधित प्रश्न का एक उत्तर पढ़ रहा था, तो उसमें यह कहकर कुंडलिनी पर ही प्रश्नचिन्ह लगाया गया था कि पुराने धर्मशास्त्रों में कुंडलिनी के बारे में ऐसा कहाँ लिखा गया है, जैसे लोग आजकल सोशल मीडिया पर दावे कर रहे हैं। शायद उसका कहने का मतलब था कि शास्त्रों के कहे के अतिरिक्त अनुभव गलत है, और उसे सोशल मीडिया पर बताना भी गलत है। मतलब, अपनी कमजोरियों का ठीकरा शास्त्रों पर फोड़ना चाहते हैं, और उन्हें अपनी खीज और ईर्ष्या के लिए ढाल की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं। ओपन माइंड नहीँ हैं। शास्त्रों के कंधों पर रखकर बन्दूक चलाना चाहते हैं, अपना कोई योगदान नहीं देना चाहते। यह उस दमनकारी नीति से उपजी सोच है, जैसी विदेशी हमलावरों ने सैंकड़ों सालों तक इस देश में बना कर रखी। यह ऐसी सोच है कि असली कुंडलिनी योगी समाज में दबे हुए से रहे और अपनी आवाज कभी बुलंद न करें। फिर समाज में आध्यात्मिकता कैसे पनपेगी। हैरानी इस बात की कि उस पर ढेर सारे अपवोट और अनुकूल कमेंट मिले हुए थे। मैंने उस पर कुछ कहना ठीक नहीं समझा, क्योंकि जिस मंच ने पहले ही निर्णय ले लिया हो, उस पर चर्चा करके क्यों ट्रोल हुआ जाए।

चलो, फिर से कुण्डलिनी से जुड़ी भगवान कार्तिकेय की कथा पर वापिस चलते हैं। तारकासुर को मारने विभिन्न देवता आए, पर वे उसे मार न सके। फिर शिव का मुख्य गण वीरभद्र आया। उसने अपने अमित पराक्रम से उसे लगभग मरणासन्न कर दिया। पर वह फिर उठ खड़ा हुआ। अंत में सभी देवताओं ने मिलकर कार्तिकेय को उसे मारने भेजा। तब राक्षस तारकासुर ने उस बालक को देखकर हँसते हुए भगवान विष्णु से कहा कि वह बड़ा निर्लज्ज है, इसीलिए उसने बालक को उससे लड़कर मरने के लिए भेजा है। फिर उसने विष्णु को कोसते हुए कहा कि वह प्रारम्भ से ही कपटी और पापी है। उसने रामावतार में धोखे से बाली को मारा था, और मोहिनी अवतार में राक्षसों को ठगा था। इस तरह से तारकासुर ने विष्णु के बहुत से पाप गिनाए, और कहा कि वह उसको मारकर उन सभी पापों की सजा देगा। फिर कार्तिकेय ने तारकासुर पर हमला किया। भयंकर युद्ध हुआ। उससे पवन स्तम्भित जैसी हो गई, और धरती कांपने लगी। सूर्य भी फीका पड़ने लग गया। कार्तिकेय ने अपनी अत्यंत चमकदार शक्ति तारकासुर पर चलाई। इससे तारकासुर मर गया। उसके बहुत से सैनिक मारे गए। कई सैनिकों ने देवसेना की शरणागति स्वीकार करके अपनी जान बचाई। तारकासुर का एक राक्षस बाणासुर युद्ध से जिंदा भाग गया था। वह क्रोंच पर्वत को प्रताड़ित करने लगा। जब उसने उसकी शिकायत कार्तिकेय से करी, तो उसने बाणासुर को भी मार दिया। इसी तरह प्रलम्बासुर राक्षस शेषनाग के पुत्र कुमुद को दुखी करने लगा। कार्तिकेय ने उसका वध भी कर दिया।

तारकासुर वध का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

वीरभद्र को हम शिव का प्रमुख व्यक्तित्व कह सकते हैं, क्योंकि वह शिव का मुख्य गण है। मुख्य सेनापति में राजा के गुण तो आएंगे ही। एक प्रकार से यह तांत्रिक व्यक्तित्व है। ऐसे व्यक्तित्व से तारकासुर यानी अज्ञान काफी कमजोर या मरणासन्न हो जाता है, पर मरता नहीं है। मरता तो वह शिवपुत्र कार्तिकेय से ही है। कार्तिकेय यहाँ अथक व अटूट संभोग योग से उत्पन्न वीर्यतेज को सहस्रार को चढ़ाने से फलीभूत कुंडलिनी जागरण का प्रतीक है। सात्विक विष्णु भी तारकासुर को मारने आया। पर उसे उसके पुराने पाप कचोटते रहे। दुनिया में अक्सर देखा जाता है कि बहुत सात्विक आदमी अपने द्वारा हुआ छोटा सा पाप भी नहीँ भूल पाते। वे तांत्रिक ऊर्जा का उपभोग भी नहीं करते, जो पापों को नष्ट करने के लिए तांत्रिक बल देती है। अपने पुराने पापों की कुंठा ही उनकी कुंडलिनी को जागृत नहीं होने देती। इसीको ऐसा कहकर बताया गया है कि तारकासुर भगवान विष्णु से उसके पुराने पापों की सजा देने की बात कर रहा है। कार्तिकेय को बालक इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह कुण्डलिनी योग से निर्मित मानसिक पुरुष है, जो नया-नया ही पैदा हुआ है, और भौतिक वस्तुओं से कम प्रभावी प्रतीत होता है। सूर्य, चंद्र, वायु आदि देवता बहुत पुराने समय से लेकर हैं। उनका भौतिक अस्तित्व है, जिससे वे कठोर या दृढ़ शरीर वाले हैं। इसीलिए उन्हें तुलनात्मक रूप से वयस्क माना गया है। पर कुण्डलिनी तो शुद्ध मानसिक चित्र है, जिससे वह बच्चे की तरह मुलायम है। क्योंकि कुंडलिनी चित्र मूलाधार की उसी वीर्यशक्ति से पैदा होता है, जिससे सन्तान पैदा होती है। इसीलिए कार्तिकेय को बच्चा कहा गया है। कार्तिकेय ने तारकासुर पर हमला किया, मतलब कुंडलिनी योगी ने शक्तिशाली तांत्रिक योग से प्राणोत्थान को लंबे समय तक बना कर रखा, जिससे चमचमाती कुंडलिनी लम्बे समय तक लगातार सहस्रार में बनी रही। पवन स्तम्भित हो गई, मतलब शक्तिशाली प्राणोत्थान से योगी की साँसें बहुत धीमी और गहरी अर्थात लगभग न के बराबर हो गईं। योग की ऐसी उच्चावस्था में प्राण ही ऑक्सीजन की ज्यादातर जरूरत पूरी करने लगता है। धरती कांपने लगी, मतलब प्राणोत्थान से पूरे शरीर का प्राण सहस्रार में घनीभूत हो गया, जिससे शरीर में प्राण की कमी हो गई। इससे दुनियादारी के तनावयुक्त विविध कार्यों का शरीर पर जरा सा भी भार पड़ने पर शरीर कमजोरी के कारण कांपने लगता है। सूर्य फीका पड़ने लग गया, मतलब सहस्रार में कुण्डलिनी के काबिज होने से पूरे मन में अद्वैत भाव छा गया। अद्वैत में तो सुख और दुख समान लगने लगते हैं, प्रकाश और अंधकार समान लगने लगता है, मतलब सूर्य और चन्द्र समान लगने लगते हैं। यही सूर्य का फीका पड़ना है। कार्तिकेय ने अपनी चमकदार शक्ति तारकासुर के ऊपर चलाई। कार्तिकेय अर्थात कुंडलिनी की अपने आप की चमक ही उसकी वह चमकदार शक्ति है, जो उसने तारकासुर अर्थात अज्ञान के ऊपर चलाई। मतलब उसकी अपनी जागरण की चमक से ही द्वैतरूपी अज्ञान या तारकासुर नष्ट हुआ। अज्ञान रूपी तारकासुर के सैनिक हैं, विभिन्न मानसिक दोष और उनसे उपजे दूषित आचार-विचार। वे नष्ट हो जाते हैं। जो बचे रहते हैं, वे रूपांतरित होकर पवित्र हो जाते हैं। मतलब कि वे देवसेना की शरण में चले जाते हैं। जैसे कि कामभाव तन्त्रभाव में रूपांतरित होकर पवित्र हो जाता है, और मानव के आध्यात्मिक विकास में मदद करता है। राक्षस बाणासुर से यहाँ तात्पर्य बुरी नजरों के बाणों से है। नयन बाण, यह एक प्रसिद्ध शास्त्रीय उक्ति है। क्योंकि आंखें आज्ञाचक्र से जुड़ी होती हैं, इसलिए बुरी नजरों से वह दुष्प्रभावित होता है। यही बाणासुर राक्षस द्वारा क्रोंच पर्वत को प्रताड़ित करना है। दूषित नजर से बुद्धि दूषित होती है। बुद्धि आज्ञाचक्र में निवास करती है। क्योंकि जब तक जागृति से मन को तसल्ली नहीं मिल जाती, तब तक आदमी की नजरों में किसी न किसी तरह से भौतिक आनंद पाने की लालसा बनी रहती है। इसीसे नजर दूषित होती है। जैसे कि पराई नारी से क्षणिक सम्भोगसुख की लालसा होना, जिससे नारी पर गलत नजर पड़ती है। इससे गलत विचार आते हैं, जिससे बुद्धि की कल्पना शक्ति और निर्णय शक्ति भी पापपूर्ण होने लगती है। मतलब बाणासुर क्रोंच पर्वत को रौंदने लगता है, जिससे उसका अधिष्ठातृ देवता प्रताड़ित महसूस करके दुखी होता है।  पिछली पोस्ट में मेरा अनुमान सही था कि आज्ञाचक्र को ही क्रोंच पर्वत कहा गया है। जागृति का ज्ञान होने के बाद बुरी और दूषित नजर का नष्ट होना ही कार्तिकेय के द्वारा बाणासुर का वध है। इसी तरह, शेषनाग मूलाधार से सहस्रार चक्र तक जाने वाली सुषुम्ना नाड़ी को कहा गया है, क्योंकि इसकी आकृति एक कुण्डली लगाए हुए और फन उठाए नाग की तरह है। सहस्रार चक्र को ही उसका पुत्र कुमुद कहा गया है। कुमुद का अर्थ श्वेतकमल होता है। सहस्रार चक्र को भी एक हजार पंखुड़ियों वाले कमल के रूप में दर्शाया जाता है। सुषुम्ना से ही सहस्रार को प्राण अर्थात जीवन मिलता है, इसीलिए दोनों का पिता-पुत्र का सम्बंध दिखाया गया है। प्रलंब माला को कहते हैं। कुंडलिनी भी माला के रूप वाले माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट में घूमती है। यह एक व्यवहारिक अनुभव है कि जब माला पूरी जुड़ी हुई होती है, तभी कुंडलिनी सभी चक्रों में विशेषकर सहस्रार चक्र में अच्छे से प्रवेश कर पाती है। टूटी हुई माला से कुंडलिनी ऊर्जा गति नहीं कर पाती। राक्षस प्रलम्बासुर यही टूटी हुई माला है। वह शेषनाग पुत्र कुमुद को दुखी करने लगा, मतलब टूटा हुआ ऊर्जा परिपथ सहस्रार चक्र तक प्राण ऊर्जा की आपूर्ति को बाधित करने लगा। कार्तिकेय ने प्रलम्बासुर को मारा, मतलब कुंडलिनी जागरण के बाद कुंडलिनी के पीछे के चैनल से ऊपर चढ़ने से और आगे के चैनल से नीचे उतरने से ऊर्जा परिपथ पूर्ण हो गया। साथ में, कुंडलिनी जागरण से उत्साहित आदमी आगे भी नियमित रूप से कुंडलिनी योगाभ्यास करने लगा, जिससे माला रूपी केंद्रीय कुंडलिनी चैनल ज्यादा से ज्यादा खुलता गया। वास्तव में असली माला जाप तो चक्रों की माला में कुंडलिनी का जाप ही है। इसीको गलत समझने के कारण धागे और मनकों की भौतिक माला बनी होगी। या हो सकता है कि कुंडलिनी योग को आम अशिक्षित लोगों की समझ में लाने के लिए ही धागे की माला का प्रचलन शुरु कराया गया होगा। हालांकि इससे भी बहुत से लाभ मिलते हैं। अभ्यास से धागे की बाहरी माला चक्रों की भीतरी माला में रूपांतरित हो जाती है। 

कुंडलिनी रहस्य पुरुष व स्त्री के बीच के शाश्वत प्रेम संबंध के रूप में ही उजागर होता है

सभी मित्रों को आने वाले दीपावली पर्व की शुभकामनाएं

शिवपार्वती विवाह, दुनिया का महानतम रहस्य

मित्रो, एक अन्य अर्थ भी है शिव पार्वती विवाह का। पार्वती प्रकृति है, जो मन के विचारों के रूप में है। वह परब्रह्म शिव को बांध देती है। यही शिव पार्वती से कहते हैं कि पार्वती, मैं सदा स्वतंत्र हूँ, पर तुमने मुझे परतंत्र बना दिया है, क्योंकि सबकुछ करने वाली महामाया प्रकृति तुम ही हो। पार्वती ने घोर तपस्या की, मतलब प्रकृति ने करोड़ों वर्षों तक जीवविकास किया। तब वह इस काबिल हुई कि परमात्मा को जीवात्मा बना सकी। इससे जीव की उत्पत्ति हुई। पार्वती शिव से कहती है कि वह उसके पिता हिमालय से उसका हाथ मांगे। इसका मतलब है कि प्रकृति नहीं चाहती कि हर जगह जीवात्मा की उत्पत्ति होए। अगर ऐसा होता तो पत्थर, मिट्टी, पानी, कीटाणु आदि में भी जीवात्मा होती और उन्हें भी दुःख दर्द हुआ करता, इससे सृष्टि में अव्यवस्था फैलती। इसलिए प्रकृति चाहती है कि जब जीव का शरीर अच्छी तरह से विकसित हो जाए, तब उसीमें जीवात्मा की उत्पत्ति होए। इसी विकसित शरीर को ही पर्वतराज हिमालय कहा गया है। पार्वती पहले हिमालय का निर्माण करती है, फिर उसकी पुत्री के रूप में पैदा होकर उसी पर रहने लगती है। मतलब कि प्रकृति पहले शरीर का निर्माण करती है, फिर उसीसे पैदा जैसी होकर उसीके अंदर बस जाती है। यह ऐसे ही है, जैसे आदमी पहले अपने लिए घर बनाता है, फिर उसके अंदर खुद रहने लगता है। फिर शिव कहते हैं कि वे निर्विकार और निरीह होकर भी भक्तों के लिए शरीर धारण करते हैं। वास्तव में ये दृश्य जगत शिव का ही शरीर है। इसी के पीछे भागकर दरअसल आदमी शिव के पीछे ही भागता है, मतलब उसीकी भक्ति करता है। पर आदमी को ऐसा नहीं लगता। कुंडलिनी भी परब्रह्म शिव का स्थूल रूप ही है, जिसके ध्यान से शिव का ही ध्यान होता है। सीधे रूप में तो परब्रह्म शिव को कोई नहीं जान-पहचान सकता।

वामपंथी तंत्र के पुरोधा भगवान शिव

शिवपुराण में शिव को अभक्ष्यभक्षी और भूतबलिप्रेमी कहा है। मतलब साफ है। यह पँचमकारी वाममार्गियों की इस मान्यता की पुष्टि करता है कि शिव माँस, मदिरा, भांग आदि का सेवन करते हैं, और मंदिरों में देवताओं को दी जाने वाली पशुबलि से प्रसन्न होते हैं। खैर, सच्चाई तो वे ही जानें। मैं तो संभावना को ही अभिव्यक्त कर रहा हूँ। वास्तव में भगवान ही सबको बचाने वाले हैं, और वही मारने वाले भी हैं। पर मारने वाले हमें भ्रम से ही प्रतीत होते हैं। उनके द्वारा मारने में भी उनके द्वारा बचाना ही छिपा होता है। हम पूरी तरह से भगवान का गुणगान तो कर सकते हैं, पर पूरी तरह उनकी नकल नहीँ कर सकते। ऐसा इसलिए है क्योंकि भगवान कर्म और फल से प्रभावित नहीं होते, पर आदमी को बुरे कर्म का बुरा फल भोगना ही पड़ता है। हो सकता है कि इस्लाम की प्रारंभिक मान्यता भी यही हो, पर वह कालांतर में अतिवादी होकर अन्य धर्मों और संप्रदायों का दुश्मन बन गया हो। यहाँ तक कि एक मुस्लिम मौलवी कासिम ने भी भगवान शिव को इस्लाम के पहले दूत के रूप में संदर्भित किया है। इससे हाल की ही घटना याद आ रही है। सूत्रों के अनुसार, इस क्रिकेट विश्वकप में एक पाकिस्तानी खिलाड़ी बीच मैदान में सबके सामने नीचे बैठकर नमाज पढ़ने लग गया। पाकिस्तान को मैच जीतने से ज्यादा खुशी धर्मप्रचार से मिली।

कुंडलिनी ही एक सच्चे जीवरक्षक के रूप में

यह कहा जाता है कि विभिन्न जीवों में कुंडलिनी विभिन्न चक्रों पर रहती है। विकसित जीवों में यह ऊपर वाले चक्रों में रहती है, जबकि अविकसित जीवों में नीचे वाले चक्रों पर। मैंने इसका वर्णन एक पुरानी पोस्ट में भी किया है। इसका यह मतलब नहीं है कि सभी जीव कुंडलिनी योगी होते हैं और कुंडलिनी ध्यान करते हैं। इसका मतलब यह है कि जब हमारी चेतना का स्तर नीचा होता है, तब यदि अद्वैत का अदृश्य अवचेतन मन से ही सही, हल्का सा ध्यान या ख्याल किया जाए, तब कुंडलिनी आनंदमय शांति पैदा करती हुई नीचे वाले चक्रों पर आ जाती है। अदृश्य ध्यान का हल्का ख्याल मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि चेतनता की न्यूनावस्था में मस्तिष्क में ध्यान करने लायक़ ऊर्जा ही कहाँ होती है। अचेतनता के अंधकार के समय इस अचिंत्य ध्यान भावना से कुंडलिनी ज्यादातर नाभि चक्र पर अनुभव में आती है, और यदि चेतना का स्तर इससे भी अधिक गिरा हुआ हो, तो स्वाधिष्ठान चक्र पर आ जाती है। हालांकि कुछ क्षणों में ही कुंडलिनी मस्तिष्क के चक्रों में आ जाती है, क्योंकि कुंडलिनी का स्वभाव ही ऊपर उठना है। ऐसा करते हुए वह मूलाधार से ऊर्जा भी ऊपर ले आती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि निम्न चेतनता की अवस्था में मस्तिष्क में पर्याप्त ऊर्जा का स्तर नहीं होता, जो कुंडलिनी को ऊपर वाले चक्रों में स्थापित कर सके। मालूम पड़ता है कि कुंडलिनी का निचले चक्रों पर आना मृत्यु के समय सहायक होता है। मृत्यु के समय चेतनता बहुत निम्न स्तर पर होती है। उससे मन में अंधेरा सा छाया रहता है। उस समय अद्वैत की सूक्ष्म भावना से कुंडलिनी निचले चक्रों पर आकर अच्छे मित्र की तरह साथ निभाते हुए आनंदमयी और शांत चेतना प्रदान करती है। वह मृत्यु जनित सभी दुखों और कष्टों को हरते हुए आदमी को मुक्ति प्रदान करती है।

कुंडलिनी जागरण के लिए ही सृष्टिरचना होती है; हिंदु पुराणों में शिशु विकास को ही ब्रह्माण्ड विकास के रूप में दिखाया गया है

मित्रो, पुराणों में सृष्टि रचना विशेष ढंग से बताई गई है। कहीं आकाश के जल में अंडे का फूटना, कहीं पर आधाररहित जलराशि में कमल का प्रकट होना और उस पर एक देवता का अकस्मात प्रकट होना आदि। कहीं आता है कि सीधे ही प्रकृति से महत्तत्व, उससे अहंकार, उससे तन्मात्रा, उससे इंद्रियां और उससे सारी स्थूल सृष्टि पैदा हुई। जब मैं छोटा था, तब अपने दादाजी (जो एक प्रसिद्ध हिंदू पुरोहित और एक घरेलू पुराण वक्ता थे) से पूछा करता था कि अचानक खुले आसमान में बिना आधारभूत संरचना के ये सारी चीजें कैसे प्रकट हो गईं। वे परंपरावादी और रहस्यवादी दार्शनिक के अंदाज में कहते थे, “ऐसे ही होता है। हो गया तो हो गया।” वे ज्यादा बारीकी में नहीं जाते थे। पर अब कुंडलिनी योग की मदद से मैं इस शास्त्रीय उक्ति को ही सभी रहस्यों का मूल समझ रहा हूँ, “यत्पिण्डे तत्ब्रम्हांडे”। इसका मतलब है कि जो कुछ इस शरीर में है, वही सब कुछ ब्रम्हांड में भी है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। इस उक्ति को पुस्तक”शरीरविज्ञान दर्शन” में वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया गया है। इसलिए प्राचीन दूरदर्शी ऋषियों ने शरीर का वर्णन करके ब्रम्हांड को समझाया है। वे गजब के शरीर वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक थे। दरअसल, एक आदमी कभी भी अपने मन या मस्तिष्क के अलावा कुछ नहीं जान सकता है, क्योंकि वह जो कुछ भी वर्णन करता है, वह उसके मस्तिष्क के अंदर है, बाहर नहीं।

सृष्टि रचना पुराणों में शरीर रचना से समझाई गई है

 कई जगह आता है कि शेषशायी विष्णु की नाभि से कमल पैदा हुआ जिस पर ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। उसी के मन ने सृष्टि को रचा। माँ को आप विष्णु मान सकते हो। उसका शरीर एक शेषनाग की तरह ही केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के रूप में है, जो मेरुदंड में स्थित है। वह नाग हमेशा ही सेरेब्रोस्पाइनल फ्लुइड रूपक समुद्र में डूबा रहता है। उस नाग में जो कुंडलिनी या माँ के मन की संवेदनाएं चलती हैं, वे ही भगवान विष्णु का स्वरूप है, क्योंकि शक्ति और शक्तिमान भगवान में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं। गर्भावस्था के दौरान जो नाभि क्षेत्र में माँ का पेट बाहर को उभरा होता है, वही भगवान विष्णु की नाभि से कमल का प्रकट होना है। विकसित गर्भाशय को भी माँ के शरीर की नसें-नाड़ियाँ माँ के नाभि क्षेत्र के आसपास से ही प्रविष्ट होती हैं। खिले हुए कमल की पंखुड़ियों की तरह ही गर्भाशय में प्लेसेंटोमस और कोटीलीडनस उन नसों के रूप में स्थित कमल की डंडी से जुड़े होते हैं। वे संरचनाएं फिर इसी तरह शिशु की नाभि से कमल की डंडी जैसी नेवल कोर्ड से जुड़ी होती हैं। ये संरचनाएं शिशु को पोषण उपलब्ध कराती हैं। यह शिशु ही ब्रह्मा है, जो उस खिले कमल पर विकसित होता है। शिशु का साम्यगुण रूप ही वह मूल प्रकृति है, जिसमें गुणों का क्षोभ नहीं है। पहले मैं समझा करता था कि साम्यावस्था का मतलब है कि सभी गुण (प्रकृति का आधारभूत घटक) एक-दूसरे के बराबर हैं। आज भी बहुत से लोग ऐसा समझते हैं। पर ऐसा नहीं है।अगर ऐसा होता तो मूल रूप में सभी जीव एक जैसे होते, पर वे प्रलय या मृत्यु के बाद भी अपनी अलग पहचान बना कर रखते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आत्मा के प्रकाश को ढकने वाले तमोगुण की मात्रा सबमें अलग होती है। इससे अन्य गुणों की मात्रा भी खुद ही अलग होती है। यदि तमोगुण ज्यादा है, तो उसी अनुपात में सतोगुण कम हो जाता है, क्योंकि ये एक-दूसरे के विरोधी हैं। दरअसल उसमें सभी गुण साम्यावस्था में अर्थात समान अवस्था में होते हैं। सभी गुणों का समान अवस्था में होने का या उनमें क्षोभ या लहरों के न होने का मतलब है कि सत्त्वगुण (प्रकाश व ज्ञान का प्रतीक) भी घटने-बढ़ने के बजाय एकसमान रहता है, रजोगुण (गति, बदलाव व ऊर्जा का प्रतीक) भी एकसमान रहता है, और तमोगुण (अंधकार व अज्ञान का प्रतीक) भी। इससे वह किसी विशेष गुण की तरफ लालायित नहीं होता। इसीलिए शिशु सबकुछ अनुभव करते हुए भी उदासीन सा रहता है। वह निर्गुण नहीं होता। क्योंकि गुणों में क्षोभ तभी पैदा हो सकता है, यदि गुण पहले से विद्यमान हों। निर्गुण या गुणातीत तो केवल भगवान ही होता है। इसलिए उसमें कभी गुण-क्षोभ सम्भव नहीं हो सकता है। इसीलिए ईश्वर हमेशा ही परिवर्तनरहित हैं। ईश्वर निर्गुण इसीलिए होता है, क्योंकि उसमें आत्म-अज्ञान से उत्पन्न तमोगुण नहीं होता। सभी गुण तमोगुण के आश्रित होते हैं। इसी वजह से तो पंचमकारी या वामपंथी तांत्रिक दुनियादारी और अध्यात्म दोनों में अव्वल लगते हैं। फिर शिशु के थोड़ा बड़ा होने पर चित्त या मस्तिष्क में वृत्तियों या संवेदनाओं के बढ़ने से गुणों में, विशेषकर सतोगुण में क्षोभ पैदा होता है, और वह प्रकाश की ओर आकर्षित होने लगता है। इससे सतोगुण रूप महत्तत्व अर्थात बुद्धि उत्पन्न होती है। उसे लगने लगता है कि उसकी सत्ता के लिए उसका रोना और दूध पीना कितना जरूरी है। उससे शिशु को अपने विशेष और सबसे अलग होने का अहसास होता है, जिसे अहंकार कहते हैं। इसप्रकार अहंकार की उत्पत्ति हो जाती है। उससे तन्मात्राओं की उत्पत्ति होती है। तन्मात्रा पंचमहाभूतों का सूक्ष्म रूप या अनुभव मात्र होती हैं, जिन्हें हम मस्तिष्क में अनुभव करते हैं। जैसे पृथ्वी की तन्मात्रा गंध, जल की रस, वायु की स्पर्श, अग्नि की रूप और आकाश की शब्द होती है। वह दूध के रस के स्वाद को पहचानने लगता है, खिलौने की गंध को पहचानता है, अपने किए मूत्र की गर्मी को स्पर्ष करता है, सुंदर-असुंदर रूप में अंतर समझने लगता है, घुंघरू या खिलौने की आवाज की ओर आकर्षित होता है। फिर शिशु बाहर की तरफ नजर दौड़ाता है कि ये अनुभूतियाँ कहाँ से आईं। उससे इन्द्रियों की उत्पत्ति होती है, क्योंकि वह चक्षु, कान, त्वचा, जीभ, नाक आदि इन्द्रियों की सहायता से ही बाहर को महसूस करता है। इसीके साथ मन रूप इन्द्रिय भी विकसित होती है, क्योंकि वह इसी से ऐसा सब सोचता है। इन्द्रियों से उपरोक्त पंचमहाभूतों की उत्पत्ति होती है, क्योंकि वह इन्द्रियों से ही उनको खोजता है और उन्हें अनुभव करता है। उसे पता चलता है कि दूध, खिलौना, घुंघरू आदि भौतिक पदार्थ भी दुनिया में हैं, जिन्हें वह इन्द्रियों से महसूस करता है। फिर आगे-2 जैसा-2 बच्चा सीखता रहता है, वैसी-2 सृष्टिरचना की उत्पत्ति आगे बढ़ती रहती है। इस तरह से एक आदमी के अंदर ही पूरी सृष्टि का विस्तार हो जाता है। 

कुण्डलिनी जागरण ही सृष्टि विकास की सीमा है

सृष्टि रचना का विस्तार आदमी कुंडलिनी जागरण के लिए ही करता है। यह तथ्य इस बात से सिद्ध होता है कि कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी सृष्टि विस्तार से उपरत सा हो जाता है। उसका झुकाव प्रवृत्ति (दुनियादारी) से हटकर निवृत्ति (रिटायरमेंट) की तरफ बढ़ने लगता है। उसकी प्रवृत्ति भी निवृत्ति ही बन जाती है, क्योंकि फिर उसमें आसक्ति से उत्पन्न क्रेविंग या छटपटाहट नहीँ रहती। पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि यह स्थिति मन की होती है, बाहर से वह पूरी तरह से दुनियादारी के कामों में उलझा हो सकता है। कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी को लगता है कि उसने पाने योग्य सब कुछ पा लिया है, और करने योग्य सबकुछ कर लिया है। 

शिव पुराण के अनुसार सृष्टि रचना शिव के वीर्य से हुई

शिवपुराण में आता है कि प्रकृति रूपी योनि में शिव के वीर्यस्थापन से एक अंडे की उत्पत्ति हुई। वह अंडा 1000 सालों तक जल में पड़ा रहा। फिर वह बीच में से फटा। उसका ऊपर का भाग सृष्टि का कपोल बना। उससे ऊपर के श्रेष्ठ लोक बने। नीचे वाले भाग से निम्न लोक बने। 
दरअसल शिव यहाँ पिता है, और प्रकृति या पार्वती माता है। दोनों के वीर्य और रज के मिलन से गर्भाशय में अंडा बना। वह गर्भाशय के पोषक जल में लंबे समय तक पड़ा रहा और विकसित होता रहा। फिर वह फटा, अर्थात मनुष्याकृति में उससे अंगों का विभाजन होने लगा। उसमें ऊपर वाला भाग सिर या कपोल की तरह स्पष्ट नजर आया। उसमें सहस्रार चक्र, आज्ञा चक्र और विशुद्धि चक्र के रूप में ऊपर वाले लोक बने। नीचे के भाग में अन्य चक्रों के रूप में नीचे वाले लोक बने।

कुण्डलिनी ही जैव विकास का मुख्य उद्देश्य है

मित्रो, मैंने पिछ्ली एक पोस्ट में बताया था कि मैंने अपने मन की चेतना के स्तर के अनुसार कुंडलिनी को विभिन्न चक्रों पर अनुभव किया। ज्यादा चेतना होने पर कुंडलिनी ऊपर के चक्रों पर आई, तथा कम चेतना होने पर नीचे के चक्रों पर आई। वास्तव में चेतना का स्तर शुद्ध मन से मापा जाता है, बाह्य इंद्रियों से संयुक्त मन से नहीं। बाह्य इन्द्रियों के सहयोग से तो सभी लोग और बहुत से अन्य जीव चेतना से भरे होते हैं। मरने के बाद तो बाह्य इन्द्रियाँ रहती नहीं हैं। उस समय तो शुद्ध मन की सूक्ष्म चेतना ही काम आती है। आँखों से कुछ देखते समय मन में चेतना की बाढ़ सी महसूस होती है। वह चेतना आँखों के बल से पैदा होती है, मन के अपने बल से नहीँ। इसी तरह अन्य बाह्य इंद्रियों के मामले में भी समझना चाहिये। जैसे-जैसे मन की काबलियत भीतर से भीतर जाते हुए सूक्ष्मता में चेतना प्रकट करने की बढ़ती है, वैसे-वैसे ही वह मुक्ति के अधिक योग्य बनता जाता है। कुण्डलिनी उसकी इसी योग्यता को बढ़ाती है। कुंडलिनी ध्यान के समय आँखें बंद होने के साथ लगभग सभी बाह्य इंद्रियों के दरवाजे बंद होते हैं। फिर भी योग ध्यान की शक्ति से मन में प्रज्वलित हो रही कुंडलिनी में इतनी चेतना आ जाती है, जितनी बाह्य इन्द्रियों के सहयोग से भी नहीं आती। वर्षों के ऐसे लगातार अभ्यास से बिना कुण्डलिनी के शांत, विचाररहित मन में भी इतनी ही चेतना आ जाती है। इसे ही आत्मज्ञान कहते हैं। दरअसल मन भी बाह्य इन्द्रियों का एक सूक्ष्म रूप ही है।  विचाररहित मन को ही अक्सर आत्मा कहा जाता है। 

वास्तव में विकसित हो रहे जीवों के रूप में कुंडलिनी ही विकसित हो रही होती है। दरअसल कुंडलिनी मन का ही द्योतक है। कुंडलिनी ही सबसे उच्च स्तर का मानसिक विचार है। इसलिए हम कुंडलिनी की चेतना के स्तर से मन की चेतना का स्तर नाप सकते हैं।

कुंडलिनी के काम करने के लिए उसी न्यूरोनल ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो मस्तिष्क या दिमाग के काम करने के लिए आवश्यक होती है। उस न्यूरोनल ऊर्जा को प्राण ऊर्जा या प्राणशक्ति द्वारा उत्तेजित किया जाता है, जो पूरे शरीर की सामान्यीकृत ऊर्जा है। तो दोनों एक ही ईंधन से प्रेरित होते हैं इसीलिए दोनों आपस में जुड़े हुए हैं। लेकिन सृजन का मुख्य उद्देश्य जीव को अंतिम स्थिति प्रदान करना है। यह कुंडलिनी द्वारा किया जाता है। इसका अर्थ है कि कुंडलिनी विकास ही सृजन का प्राथमिक लक्ष्य है, मस्तिष्क का विकास नहीं। मस्तिष्क का विकास अनिच्छा से खुद ही होता है। यह सह-प्रभाव के रूप में है, यद्यपि यह कुप्रभाव भी बन सकता है, यदि इसे गलत दिशा में लगाया जाए। कई पुरानी सभ्यताओं ने इस तथ्य को अच्छी तरह से समझा और कुंडलिनी पर मुख्य ध्यान रखा। तभी तो उस समय विभिन्न आध्यात्मिक पद्धतियों का बोलबाला था। आज, कुंडलिनी-घटनाऐं दिन-प्रतिदिन बढ़ रही हैं, क्योंकि आज के युग का मस्तिष्क विकास भी अप्रत्यक्ष रूप से कुंडलिनी विकास का कारण बन रहा है। इसलिए, कुंडलिनी विकास और मस्तिष्क या विश्व विकास को एक साथ करना ही सबसे अच्छा तरीका है, ताकि कम से कम समय में कुंडलिनी जागरण हो सके। इसके लिए कर्मयोग भी एक अच्छा तरीका है।

कुंडलिनी चेतना के विकास का पैमाना है। कुण्डलिनी के सुषुप्त होने का अर्थ है कि मन सोया हुआ है। सोया इसलिए कहते हैं क्योंकि मन की चेतना कभी खत्म नहीं होती, केवल अप्रकट हो जाती है अर्थात सो जाती है। उस समय चेतन मन के स्थान पर अंधेरा ही होता है। आत्मज्ञान के बाद कुंडलिनी लगातार मन में उच्च चेतना के साथ छाई रहती है, जिसे हम समाधि कहते हैं। इसे कुंडलिनी के पूर्ण जागरण की सबसे क़रीबी अवस्था कह सकते हैं। इन दोनोँ विपरीत छोरों के बीच में अधिकांश जीव होते हैं। उनकी कुंडलिनी की चेतना का बल्ब कभी जलता रहता है, कभी धीमा पड़ जाता है, तो कभी बुझ जाता है।

कुण्डलिनी विकास के रूप में जीव विकास

योग के बारे में सुनने में आता है कि कुण्डलिनी (नाड़ी-ऊर्जा) ही विभिन्न जीवों के रूप में ऊपर चढ़ती रहती है। सबसे निम्न जीवों में व पेड़-पौधों में यह मूलाधार में सुषुप्त रहती है। इसे कुंडलिनी शक्ति या प्राण शक्ति भी कहते हैं। वास्तव में, उनमें भी यह शरीर को बनाए रखने के लिए जीव द्वारा अनुभव किए बिना ही पृष्ठभूमि में हमेशा काम करती रहती है। यह ऐसे ही है, जैसे एक आदमी जब सोया होता है, तब उसकी चेतना लुप्त होती है, पर वह शरीर को जीवित रखने वाले सभी काम तब भी कर रही होती है। यह पूरे शरीर में वितरित रहती है, लेकिन इसे मूलाधार चक्र में निवसित कहा जाता है, क्योंकि यह इसके विकास और पोषण का मुख्य स्थान है। यह ऐसा ही है, जैसे कि एक आदमी दुनिया में हर जगह भटक सकता है, लेकिन वह अपने विकास, पोषण और आराम(नींद) को मुख्य रूप से अपने घर पर ही प्राप्त करता है। साथ में, कुण्डलिनी मूलाधार चक्र से ही अपनी लम्बी यात्रा शुरु करती है। अचेतन मन और मूलाधार चक्र, दोनों को समान कहा जाता है, और दोनों को सबसे बुरी भावनाओं से जोड़ा जाता है। आगे जो कहा गया है कि कुंडलिनी की शुरुआत मूलाधार चक्र से ही होती है, इसका अर्थ है कि प्रकाश की ओर यात्रा अंधेरे से ही शुरू होती है। उससे थोड़े विकसित जीवों में यह मूलाधार में अत्यल्प जागृत अवस्था में आ जाती है। इन्हें उभयलिंगी या हेर्मैप्रोडिटिक कहा जा सकता है। सम्भवतः इसी स्तर पर पूर्ण आत्मा सहस्रार से गिरकर मूलाधार के गड्ढे में फंस कर सो गई थी। इसीलिए तो उस जीव का यिन या स्त्री और यांग या पुरुष रूप में विभाजन हुआ, ताकि एक-दूसरे के प्रति आकर्षण से आत्मा मूलाधार से ऊपर चढ़ते हुए पुनः सहस्रार में प्रविष्ट हो सके। मूलाधार के वर्चस्व वाले सबसे निम्न जीवों के पास अपशिष्ट शरीर उत्पादों के उन्मूलन के अलावा बाहरी ऊर्जावान कार्य करने के लिए कुछ भी नहीं है। यह गुदा द्वार के पास स्थित मूलाधार चक्र का कार्य है। इसलिए उनकी कुंडलिनी ऊर्जा को मूलाधार चक्र में केंद्रित कहा जाता है। उससे विकसित जीवों में यह स्वाधिष्ठान चक्र तक ऊपर चढ़ जाती है।  यहां जीव का यौन विभाजन होता है और वह यौन आकर्षण के साथ यौन इच्छा महसूस करने लगता है। तभी तो देखा जाता है कि निम्न जीवों में प्रजनन की गति बहुत तेज होती है। उसमें उनकी अधिकांश ऊर्जा का व्यय हो जाता है। यह कुंडलिनी या जीव विकास के लिए अद्भुत बल प्रदान करता है। यह बल आज के विकसित मानव में भी लगातार काम कर रहा है। मध्यम विकसित जीवों में यह नाभि चक्र में आ जाती है। तभी तो अधिकांश निम्न जीव रात-दिन खाने में ही लगे रहते हैं। उच्च कोटि के प्राणी में जैसे सम्भवतः गाय में व प्रेममयी मनुष्य में यह हृदय चक्र में आ जाती है। संभवतः तभी तो गाय वात्सल्य स्नेह से भरी हुई होती है। गाय में पाचन का अधिकांश काम सूक्ष्म जीव करते हैं, इसलिए ऊर्जा की काफी बचत हो जाती है। बबून, गोरिल्ला आदि जैसे प्राइमेट्स में, कुंडलिनी ऊर्जा आगे उनकी भुजाओं या फ़ॉर्लिम्ब्स तक चली जाती है, इसीलिए वे अधिकतम रूप से अपने फ़ॉर्लिम्ब फ़ंक्शन का उपयोग करते हैं। इसी तरह, कोयल जैसे सुंदर गायन करने वाले पक्षी में, गले के चक्र में कुंडलिनी ऊर्जा को केंद्रित कहा जा सकता है। डॉल्फिन जैसे विश्लेषणात्मक कौशल वाले बुद्धिमान जानवरों में, इसे आज्ञा चक्र तक आने वाला कहा जा सकता है। यह मानव में ही सहस्रार चक्र तक आ सकती है, वह भी उचित मस्तिष्क-अभ्यास के साथ, क्योंकि केवल वही इसे जागृत कर सकता है, और जागरण का स्थान भी केवल सहस्रार ही है। सबसे उच्च कोटि के मनुष्य में यह सहस्रार में पूर्ण रूप से जाग जाती है।

कुंडलिनी के सात चक्र सात लोकों क़े रूप में हैं

शास्त्रों में ऊपर के सात लोकों का वर्णन आता है। ये सात लोक सात चक्रों के रूप में हैं। सबसे निम्न लोक मूलाधार चक्र है, क्योंकि उस स्तर के जीवों में सबसे कम चेतना होती है। उसके ऊपर के लोकों या चक्रों में जाते हुए चेतना का स्तर बढ़ता रहता है। सहस्रार में यह स्तर सर्वाधिक होता है। कुंडलिनी जागरण अर्थात शिव और शिवा के मिलन के समय चेतना का स्तर पूर्ण हो जाता है, जिससे उसे शिवलोक या ब्रह्मलोक कहते हैं। वैसे तो मूलाधार के नीचे भी पाताल के सात लोक बताए गए हैं। उनमें भी चेतना क्रमशः नीचे की ओर गिरती रहती है। इन लोकों में अधिकांशतः राक्षसों का का निवास बताया गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इनकी चेतना का स्तर इतना अधिक गिर गया होता है कि ये देवताओं, साधुओं व उच्च चेतना वाले अन्य जीवों से द्रोह करते रहते हैं। धरती को मूलाधार चक्र के समकक्ष माना गया है। ऊपर के आसमान के लोक उच्च लोक हैं, जबकि धरती के नीचे पाताल लोक हैं।

आदमी का सीधा खड़ा होना और पीठ में गड्ढा बनना भी जैव विकास श्रृंखला की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है

मैंने एक पुरानी पोस्ट में बताया था कि कैसे अपनी नई कार में बैठकर मुझे उसे चलाते हुए लगातार अपनी पीठ सीधी और नेचरल पोस्चर में रखनी पड़ती थी, क्योंकि उसका लेगस्पेस हल्का सा कम लग रहा था। उससे मेरी कुंडलिनी को जागृत करने वाली और पीठ में ऊपर चढ़ने वाली शक्ति मिली। लोग कह सकते हैं कि अगली दोनों टांगों का हाथ की तरह प्रयोग करने के लिए ही आदमी सीधा खड़ा हुआ। पर ऐसा तो गोरिल्ला आदि प्राइमेट भी करते हैं। आदिमानव भी ऐसा करते थे। उनकी पीठ तो बिल्कुल सीधी नहीं होती, और न ही हाथों का प्रयोग करने के लिए जरूरी लगती है। फिर विकसित आदमी की ही पीठ क्यों सीधी हुई। ऐसा दरअसल कुण्डलिनी को मूलाधार से मस्तिष्क तक आसानी से व निपुणता से चढ़ाने के लिए हुआ। कुंडलिनी आकाश की तरह सूक्ष्म होती है। इसका स्वभाव ऊपर की तरफ उठना होता है। तभी तो कुंडलिनी जागरण के समय लगता है कि कुंडलिनी ऊपर की तरफ तेजी व शक्ति से उड़ रही है। फिर कह सकते हैं कि फिर नाभि की सीध में पीठ में गड्ढा क्यों बना। वास्तव में वह रोलर कोस्टर के गड्ढे की तरह काम करता है। वह प्रश्वास की शक्ति से कुंडलिनी एनर्जी को मूलाधार से चूसकर अपने अंदर जमा करता रहता है। फिर काम करते हुए या योग करते हुए आदमी जब आगे की तरफ झुकता है, वह वेग को पकड़कर तेजी से दिमाग की तरफ ऊपर भाग जाती है। गर्दन के केंद्र पर जो विशुद्धि चक्र है, वहाँ भी एक ऐसा ही छोटा सा गड्ढा बनता है। वह भी इसी तरह निःश्वास की शक्ति से अनाहत चक्र पर इकट्ठी हुई कुंडलिनी एनर्जी को मूमेंटम प्रदान करके उसे ऊपर धकेलता है। इसी तरह, स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र पर यौन ऊर्जा भंडारित होती है, जिसे ही योग के दौरान पीठ में ऊपर चढ़ाया जाता है।

काम भाव का जीवविकास में सबसे ज्यादा योगदान है

उभयलिंगी जीव में यिन और यांग एक ही शरीर में इकट्ठे होते थे। इसका मतलब है कि वे पूर्ण आत्मा ही थे। क्योंकि उनमें विकास के लिए अपनी अलग इच्छा नहीँ थी, इसलिए उनका विकास अन्य कुदरती व जड़ वस्तुओं जैसे पहाड़, मिट्टी, आकाशीय पिंडों की तरह होता था। उस विकास की गति कुदरती और धीमी थी। फिर लिंग के विभाजन के साथ यिन-यांग का भी विभाजन हो गया। पुरुष वर्ग में यांग और स्त्री वर्ग में यिन की बहुलता हो गई। इस विभाजन से जीव को अपने अंदर अपूर्णता का अहसास हुआ। सम्भवतः इसी स्तर पर जीवात्मा की उत्पत्ति हुई। वह यिन और यांग को इकठ्ठा करके पूर्ण होने का प्रयास करने लगा। इससे काम भाव की उत्पत्ति हुई। इससे जीवों के पुरुष वर्ग और स्त्री वर्ग के बीच में परस्पर तीव्र आकर्षण पैदा हुआ। इसी काम भाव का जीवविकास में सबसे ज्यादा योगदान है, क्योंकि इससे सबसे अधिक अद्वैतभाव पैदा होता है, जिससे कुण्डलिनी का विकास सबसे मजबूती और तेजी से होता है। यह हमने पिछली बहुत सी पोस्टों में अनुभवात्मक रूप से सिद्ध किया है कि अद्वैत, कुंडलिनी और आनंद साथ साथ रहते हैं। इसने विकास को कृत्रिमता और तेज गति प्रदान की। आज भी यह तांत्रिक कुण्डलिनी योग के रूप में मनुष्य को मुक्ति रूपी पूर्णता की प्राप्ति के लिए विकास श्रृंखला की अंतिम छलाँग लगाने में मदद कर रहा है। यह मूलाधार चक्र पर स्थित यिन (शक्ति) को सहस्रार में स्थित यांग (शिव) के साथ जोड़ता है। भारतीय दर्शन में यिन को प्रकृति और यांग को पुरुष कहा जाता है। यिन-यांग के मिलन से अद्वैत भाव पैदा होता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से कुण्डलिनी को विकसित करता है। ऐसा नहीं है कि यिन-यांग का आकर्षण केवल स्त्री-पुरुष का ही आकर्षण होता है। यह किन्हीं भी विपरीत भावों के बीच में हो सकता है। मूलाधार अंधेरे, निम्नता, अज्ञान, घृणा आदि सभी निम्न भावों का प्रतीक है। इनके विपरीत सहस्रार प्रकाश, उच्चता, ज्ञान, प्रेम आदि सभी उच्च भावों का प्रतीक है। इसीलिए इन दोनों पर एकसाथ कुन्डलिनी ध्यान से तीव्र अद्वैतभाव पैदा होता है, जिससे सहस्रार में कुंडलिनी चमकने लगती है। यौन आकर्षण का मुख्य कार्य यही है कि इससे मूलाधार और सहस्रार चक्र तरोताजा और बलवान हो जाते हैं।