कुण्डलिनी योग विज्ञान ही क्वांटम यांत्रिकी, अंतरिक्ष विज्ञान, खगोल-भौतिकी और ब्रह्माण्ड विज्ञान का शिखरबिंदु है

कुण्डलिनी जागरण ही सिद्ध करता है कि अभावात्मक शून्य का अस्तित्व ही नहीं है

दोस्तों, मैं हाल ही में अपने जागृति के अनुभवों को विज्ञानवादियों को प्रेषित करने बारे विचार कर रहा था, ताकि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के रहस्य को सुलझाया जा सके, जिस पर वे बुरी तरह से अटके हुए हैं। पर मुझे उनकी साइटों पर न तो कमेंट बॉक्स मिला और न ही उनकी तरफ से इस तरह की कोई अपील ही गूगल पर मिली। एक-दो का एड्रेस मिलने पर उनसे जीमेल पर कंटेक्ट किया भी पर कोई जवाब नहीं मिला। आपको ऐसा कोई मंच पता हो तो कृपया जरूर शेयर करना।

अध्यात्म विज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान आपस में जुड़े हुए हैं, और एकदूसरे के बिना अधूरे हैं। इसीलिए सनातन वैदिक दर्शन के साथ ज्योतिष विज्ञान भी सम्मिलित किया गया था, और इसे एक विशिष्ट सम्मानजनक स्थान प्राप्त था।

शून्यवाद ही सभी समस्याओं की जड़ है

शून्यवाद सबसे बड़ा द्वैतकारी अज्ञान है। विज्ञान अगर शून्यवाद का सहारा न लेता तो आज प्रकृति और मानवता का विनाश न हो रहा होता। इससे आज चारों तरफ युद्ध, प्राकृतिक आपदा आदि के रूप में हायतौबा न मच रही होती। फिर विज्ञान और अद्वैतरूपी अध्यात्म एकसाथ आगे बढ़ रहे होते और मानवमात्र का सम्पूर्ण व सर्वांगीण विकास सुनिश्चित हो रहा होता। प्राचीन भारत से बुद्ध धर्म इसी वजह से लगभग बाहर कर दिया गया था, क्योंकि उसने शून्यवाद का सहारा लिया। हालांकि बुद्धिस्ट बहुत तर्क देते हैं कि उनका उपास्य शून्य नहीं पर चेतन ब्रह्म है, यह सत्य भी है, पर बौद्ध धर्म के बाहरी आचारविचार से तो वह शून्य ही प्रतीत होता है। आम जनमानस तो ऊपर से ही देखते हैं, गहरी बात नहीं समझ पाते।

लगता है कि दुनिया की सबसे अधिक शून्य-विरोधी संस्कृति हिंदु सनातन संस्कृति ही है। इसमें मिट्टी-पत्थर आदि जड़ वस्तुओं के साथसाथ अंधेरा काला आसमान भी पूजा जाता है। उदाहरण के लिए शनि देव और काली माता

जागृति के अनुभव के आधार पर ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और उसकी आधारभूत संरचना

जिसे हम शून्य या अंधकारनुमा या आनंदहीन आकाश समझते हैं, और अपनी आत्मा के रूप में महसूस भी करते हैं, वह जागृति के समय वैसा महसूस नहीं होता, अर्थात वह अशून्य या प्रकाश या आनंदमय जैसा आकाश महसूस होता है। अशून्य इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि वह भरे-पूरे भौतिक संसार के जैसा ही लगता है। प्रत्यक्ष भौतिक संसार व उससे बने मानसिक चित्र या विचार उसमें तरंगों की तरह महसूस होते हैं। वैसे ही जैसे सागर में तरंगें होती हैं। विभिन्न धर्मशास्त्रों में भी ऐसा ही वर्णन किया गया है। तो क्या विज्ञान इस बात को अनदेखा कर रहा है।

अपने मूल रूप में अंतरिक्ष ही आत्मा है

सारा संसार आभासी व अवास्तविक है

मूल मत ओरिजिनल माने वास्तविक अर्थात निर्विकार रूप में। आइंस्टिन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत से यह काफी पहले ही जाहिर हो गया था, पर इस आध्यात्मिक रूप में किसी ने समझा नहीं था। आइंस्टिन बहुत महान व्यक्ति थे पर ऐसा लगता है कि उनका सामना किसी असली जागृत व्यक्ति से नहीं हुआ था। हाहा। आइंस्टिन ने सिद्ध किया कि स्पेसटाईम किसी त्रिआयामी चादर की तरह मुड़ सकता है, उसमें गड्ढे पड़ सकते हैं। वैसे जो पहले ही खाली गड्ढे की तरह है, उसमें एक और खाली गड्ढा कैसे बन सकता है। मतलब साफ है कि अंतरिक्ष वैसा शून्य नहीं है, जैसा आम आदमी समझते हैं। वह एकसाथ शून्य भी है और नहीं भी, वह भावरूप शून्य है, वह आत्मा है, वह परमात्मा है। यह ऐसे ही है, जैसे तलाब के पानी में किश्ती से गड्ढा बनता है। तरंग भी तो इसी तरह गड्ढा बनाते हुए चलती है। मतलब अंतरिक्ष में तरंग बन सकती है। फिर वह शून्य कैसे हुआ। कई लोग यह भी कह सकते हैं कि वह ऐसा शून्य है, जिसमें झूठमूठ वाली माने वर्चुअल तरंग बन सकती है। ऋषिमुनि भी आत्मा का ऐसा ही अनुभव बताते हैं। मतलब वह ऐसी तरंग नहीं होती जो आत्मा को असल में विकृत कर सके। यहाँ तक कि पानी भी तरंग से थोड़ी देर के लिए ही विकृत लगता है, तरंग गुजर जाने के बाद उसकी सतह भी बिल्कुल सीधी और पहले जैसी हो जाती है। हवा के साथ भी ऐसा ही होता है। फिर अंतरिक्ष या आकाश तो उनसे भी सूक्ष्म है, वह कैसे विकृत हो सकता है। वह तो थोड़ी देर के लिए भी विकृत नहीं हो सकता, क्योंकि विकृत होकर जाएगा कहाँ। क्योंकि हर जगह आकाश है। पानी और हवा तो खाली स्थान को खिसक जाते हैं, पर अंतरिक्ष कहाँ को खिसकेगा। इसका मतलब है कि अंतरिक्ष की तरंग पानी और हवा की तरंग से भी ज्यादा आभासी है। मतलब तरंग कहीं नहीं चलती, सिर्फ प्रतीत होती है। है न आश्चर्यजनक तथ्य। गजब का शून्य है भाई। सम्भवतः यही परमात्मा की वह जादूगरी या माया है जो न होते हुए भी सबकुछ दिखा देती है।

शास्त्रीय प्रमाण के रूप में, महाभारत जितने आकार वाले प्रसिद्ध योगवासिष्ठ उपनामित महारामायण ग्रंथ में बारम्बार और हर जगह भावपूर्ण शून्य आकाश या अंतरिक्ष को ही परमात्मा कहा गया है। उसमें हर जगह संसार को असत्य व आभासी कहा गया है।

शून्य में अगर सारी दुनिया विद्यमान है तो वह शून्य दुनिया के जैसे गुणों वाला होना चाहिए

अब हम उपरोक्त वैज्ञानिक विश्लेषण को थोड़ा तर्क की धार देते हैं। अंतरिक्ष रूपी शून्य में वह सभी क्रियाकलाप होते हैं, जो भौतिक संसार में होते हैं, जैसा कि हमने ऊपर कहा। इसका मतलब है कि शून्य का स्वभाव दुनिया के जैसा होना चाहिए। यह तभी संभव है अगर उस शून्य में सत्त्व गुण, रजो गुण और तमोगुण, प्रकृति के ये तीनों गुण एकसाथ विद्यमान हों, क्योंकि भौतिक संसार इन्हीं तीनों गुणों से बना है, जैसा कि शास्त्रों में कहा गया है। इसीलिए उस शून्य आत्मा को त्रिगुणातीत मतलब तीनों गुणों से परे कहा गया है, क्योंकि तीनों गुण एकसमान मात्रा में होने से एकदूसरे के प्रभाव को कैंसल कर देते हैं, हालांकि रहते तीनों गुण हैं। इसीलिए अध्यात्म शास्त्रों में परमात्मा को अनिर्वचनीय भी कहते हैं, मतलब उसमें तीनों गुण हैं भी, नहीं भी हैं, ये दोनों बातें भी हैं और दोनों भी नहीं हैं। शून्य में ये गुण एक दूसरे से कम ज्यादा नहीं हो सकते, क्योंकि समय के साथ भौतिक वस्तु के परिवर्तन से गुण कम या ज्यादा होते रहते हैं। पर शून्य परिवर्तित नहीं हो सकता। इसका मतलब है कि शून्य आत्मा एक ही समय में सत्त्व रूपी प्रकाश, रज रूपी क्रियाशीलता (आभासी तरंग के रूप में, यद्यपि यह नहीं भी है) और तम रूपी अंधकार एकसाथ विद्यमान हैं। यह सब शास्त्रों के इस कथन को सिद्ध करता है कि वास्तविक व सर्वव्यापी अंतरिक्ष जो परम-आत्मा है, वह सभी सांसारिक जीवों की तुलना में कहीं बेहतर तरीके से चेतन है, और वह प्राप्त किया जा सकता है।

शून्य अंतरिक्ष भी भौतिक पदार्थों की तरह व्यवहार करता है

हालांकि सिर्फ यह अंतर है कि जिसे शून्य अंतरिक्ष आभासिक या वर्चुअल रूप में करता है, उसे भौतिक पदार्थ सत्य रूप में करता है। इसलिए शास्त्रों में कहा है कि परमात्मा सबसे बड़ा नटखट, नाटककार और जादूगर है। उदाहरण के लिए समुद्र के पानी से पानी छोटे-छोटे टुकड़ों में बाहर उछलकर वास्तविक बुँदे बनाता है। पर शून्य अंतरिक्ष रूपी सागर में पहली बात, शून्य टुकड़ा बन कर नहीं उछल सकता, दूसरा ऐसी किसी खाली जगह का अस्तित्व ही नहीं है, जो शून्य आकाश के रूप में न हो। इसलिए एक ही रास्ता बचता है कि झूठमूठ की अर्थात दिखावे की अर्थात वर्चुअल बुँदे बनाई जाए। उन्हें ही विज्ञान के अनुसार हम मूल कण अर्थात एलिमेंट्री पार्टिकल्स कहते हैं, जो लगातार शून्य अंतरिक्ष में पॉप होते रहते हैं अर्थात प्रकट होते रहते हैं और उसीमें विलीन भी होते रहते हैं। बिल्कुल वैसे ही जैसे समुद्र से जल की बुँदे बाहर निकलती रहती हैं, और उसीमें विलीन होती रहती हैं। फिर आत्मजागृति का यह अनुभव विज्ञानसम्मत व सही क्यों न मान लिया जाए कि सारी सृष्टि आत्मा के अंदर आभासी तरंग है। दिक्क़त यही है कि उस अनुभव को किसी और को नहीं दिखाया जा सकता और कोई मशीन भी उसे वेरिफाई नहीं कर सकती। इसे खुद अनुभव करना पड़ता है।

विज्ञान-युग का योग-युग में रूपान्तरण

धर्मग्रंथों में यह प्रचुरता से लिखा गया है कि शून्य से जगत की उत्पत्ति नहीं हो सकती। बहुत पहले से ऋषियों को आत्मानुभव से ज्ञात था कि स्वयंप्रकाश आकाशरूप आत्मा से ही इस जगत की उत्पत्ति हुई है, किसी अँधेरेनुमा शून्य अंतरिक्ष से नहीं। इसके लिए बहुत से विज्ञाननुमा तर्क दिए जाते थे, जिससे भी यही सिद्ध होता था। आत्मजागृत अर्थात कुण्डलिनी-जागृत व्यक्ति भी ऐसा ही अनुभव बताते हैं। वह आत्मा भौतिक इन्द्रियों की पकड़ में नहीं आ सकता, केवल अपने स्वयं के असली स्वरूप के रूप में अनुभव होता है। इसलिए एक बात तो साफ है कि विज्ञान से बेशक उसका अंदाजा लग जाए, पर दिखेगा वह केवल योग से ही। विज्ञान उसका अंदाजा लगाकर शांत हो जाएगा, और फिर उसको अनुभव करने के लिए योग की तरफ बढ़ेगा। सारे वैज्ञानिक योगी बन जाएंगे, और विज्ञान-युग योग-युग में रूपान्तरित हो जाएगा।

बाहर के और भीतर के ब्रह्माण्ड में कोई अंतर नहीं है

अगर मन का ब्रह्माण्ड आत्मा के अंदर अनुभव होता है, तो बाहर का भौतिक ब्रह्माण्ड भी, क्योंकि उसे हम मानसिक ब्रह्माण्ड से ही अंदाजन जान सकते हैं, सीधे व असली रूप में कभी नहीं। पर इतना तय है कि बाहरी ब्रह्माण्ड का असली रूप भी मनोरूप ब्रह्माण्ड की तरह ही है। बस इतना सा अंतर है कि बाहरी ब्रह्माण्ड को भीतरी ब्रह्माण्ड से ज्यादा स्थिरता मिली हुई है, इसीलिए हजारों सालों तक सभी को वह लगभग एक जैसा ही दिखता है, पर मानसिक ब्रह्माण्ड विचारों और अनुभवों के साथ प्रतिपल बदलता रहता है।

विज्ञान के कई गहन रहस्य कुण्डलिनी जागरण से सुलझ सकते हैं

उदाहरण के लिए ब्रह्माण्ड के सबसे गहरे मूल में क्या है, क्वांटम एन्टेन्गलमेंट का सिद्धांत क्या है, विद्युत्चुंबकीय तरंग क्या है व कैसे चलती है, वेक्यूम एनर्जी, क्वांटम फलकचुएशन, डार्क एनर्जी, महाविस्फोट, ब्रह्माण्ड का विस्तार, ब्लैक होल, मल्टीवर्स, पैरालेल यूनिवर्स, एंटी यूनिवर्स, फोर्थ डाईमेंशन, स्पेसटाईम ट्रेवल, टेलीपोर्टेशन, एलियन हंटिंग आदि, और अन्य भी बहुत कुछ। कालेब शार्फ, एक अंतरिक्ष विज्ञानी कहते हैं कि पूरा ब्रह्माण्ड ही एक देत्याकार एलियन हो सकता है। आइंस्टिन की नजर में समय एक भ्रम है। ऐसी सभी सोचें और थ्योरियाँ ज्ञानी ऋषियों और दार्शनिकों के चिंतन से मेल खाती हैं। इसलिए विज्ञानवादियों को एकांगी भौतिक सोच छोड़कर योग और अध्यात्म को भी अपने अध्ययन में सम्मिलित करना चाहिए, तभी दुनिया के सारे रहस्यों से पर्दा उठ सकता है। कई क्वांटम थ्योरियाँ योग विज्ञान से समझ में आ सकती हैं, जैसे कि वेव पार्टिकल ड्यूल नेचर ऑफ़ मैटर, स्टैंडिंग वेव, डबल स्लिट एकस्पेरीमेंट, डी ब्रॉगली सिद्धांत, केसीमिर इफेक्ट, आदि बहुत सी। जिस थ्योरी ऑफ़ एव्रीथिंग के लिए वैज्ञानिक लम्बे समय से प्रयास कर रहे हैं, वह लगता है कि योग विज्ञान से मिल सकती है। कुछ वैज्ञानिक सत्य की तरफ बढ़ भी रहे हैं, जैसे कि स्टीफेन हॉकिंग की स्ट्रिंग थ्योरी, रोबर्ट लैंजा की बायोसेंटरिज्म थ्योरी, हरेक वस्तु के रूप में एलियन के छुपे होने की थ्योरी, एडम फ्रैंक की धरती को एक जीवित प्राणी समझने वाली थ्योरी, धरती को अपराधियों के लिए जेल और चन्द्रमा को जेल निगरानी केंद्र मानने वाली थ्योरी आदि,और अन्य भी कई सारी। हालांकि यह सब वैज्ञानिक अंदाजे ही हैं, जैसे मैंने ऊपर कहा। इनको सिद्ध करने के लिए उन लोगों को साथ में लेने की जरूरत है, जिन्होंने योग से कुण्डलिनी जागरण को प्रत्यक्ष रूप में अनुभव किया है। आजकल ऐसी अबूझ किस्म की विज्ञान पहेलियों पर हर जगह चर्चा का माहौल गरमाया हुआ है। लोहा गर्म है, और वैज्ञानिकों को हथोड़ा चलाने में संकोच नहीं करना चाहिए। अगर आप भी इन पहेलियों को सुलझाने में योगदान देना चाहते हैं, तो कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

कुण्डलिनी की चमक को कम करने के लिए ही कुंडली-ग्रह किसी आदमी के लिए अपनी चमक कम करते हैं, जिससे पाप का अंधेरा हावी होकर अपना बुरा असर दिखाता है

दोस्तों, हाल ही में मुझे कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का सामना करना पड़ा। वैसी घटनाओं की रोकथाम के लिए मेरे परिचितों द्वारा मेरी जन्मपत्री कई प्रकार के ज्योतिषविदों से परीक्षित करवाई गई। कुछ ज्योतिषविदों की ऑनलाइन रॉय ली गई, तो कुछ की ऑफलाइन। सभी ने मेरी ग्रह-दशा को बहुत खराब बताया। एकदम से मेरा तुलादान करवाया गया। हनुमान चालीसा, दुर्गा रक्षा स्तोत्र, व गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र पढ़ने को कहा गया। महामृत्युंजय मन्त्र-जाप करने को कहा गया। मैं इन्हीं बातों से जुड़े हुए अपने कुण्डलिनी-अनुभव व इससे जुड़े मनोवैज्ञानिक सिद्धांत इस पोस्ट में साझा करूँगा।

बुरा समय आने पर कुण्डलिनी धीमी पड़ने लगती है

पूर्ववत नियमित योग करने पर भी मेरे मन की कुण्डलिनी धीमी पड़ती जा रही थी। मुझे उसका कारण समझ नहीं आ रहा था। हालांकि बहुत पहले भी मेरे साथ ऐसा होता था, पर उसकी वजह याद नहीं आ रही थी। उससे उस समय भी मैं इसी तरह से दुर्भाग्य के साए में आ जाता था।

धार्मिक कृत्यों से कुण्डलिनी चमकने लगती है, जो हर प्रकार से कल्याण करती है

वास्तव में सभी धार्मिक कृत्य कुण्डलिनी के माध्यम से ही लाभ पहुंचाते हैं। उनसे कुण्डलिनी एकदम से पुष्ट हो जाती है। वह कुंडलिनी फिर हर प्रकार से आदमी की भलाई में जुट जाती है। कुंडलिनी ही आदमी को विपदाओं से बचाती है। तुलादान कराते वक्त ही मुझे अहसास हुआ कि मेरे पाप या यूं कहो कि मन का बोझ मेरे कंधे से उतरकर दूसरे पलड़े पर रखे हुए अनाज के साथ नीचे उतर गया था। उससे मैं हल्का हो गया और मेरे अंदर जैसे काफी खाली जगह बन गई। उस खाली जगह को भरते हुए मेरी कुंडलिनी एकदम से कौंधने लग गई। उससे मैंने फीलगुड महसूस किया और उसके बाद मैं हर समय कुंडलिनी के आनंद में मस्त रहने लगा। कुण्डलिनी से जुड़े अन्य सारे आध्यात्मिक गुण भी पुनः मेरे अंदर प्रकट हो गए। उससे मेरा जीवन भी सुधर गया। व्रत-उपवास, जप-पाठ आदि धार्मिक कृत्यों से भी मुझे अपनी कुंडलिनी सुदृढ़ होती हुई महसूस हुई। विशेष ग्रह-दशा में विशेष धार्मिक कृत्य इसीलिए बताए जाते हैं, क्योंकि वे ही कुंडलिनी को सबसे ज्यादा उजागर करते हैं।

आकाशीय पिंड कुंडलिनी को प्रभावित करते हैं, क्योंकि दोनों ही चमकीले होते हैं

पाप मन के बोझ के रूप में प्रकट होते हैं। वे कुंडलिनी को दबाने की कोशिश करते हैं। इसी तरह, बुरी ग्रह दशा भी कुंडलिनी को दबा कर अपना प्रभाव दिखाती है। कुंडलिनी के दबने से पुराने पाप मन के बोझ के रूप में प्रकट हो जाते हैं। आदमी के लिए बुरी ग्रह दशा का मतलब यहाँ उसके लिए ग्रहों की चमक का कम होना है। उससे कुंडलिनी की चमक भी कम हो जाती है। जिन लोगों के मन में कुंडलिनी नहीं बनी होती है, उनकी सामान्य मानसिकता की चमक को प्रभावित करके ग्रह अपना असर दिखाते हैं।

ग्रह अपना असर कैसे दिखाते हैं

इसे हम एक साधारण से उदाहरण से समझ सकते हैं। सूर्य को सबसे बड़ा व चमकीला ग्रह माना जाता है, और उसका प्रभाव भी सबसे ज्यादा दिखाई देता है। जिस दिन चमकदार धूप हो, उस दिन मन आनंद व उमंग से भरपूर होता है। जिस दिन सूर्य की रौशनी बादलों से ढकी हो, उस दिन मन में अवसाद जैसा छाया रहता है। ऐसा ही प्रभाव अन्य ग्रह भी दिखाते हैं, जिसे ज्योतिष शास्त्र से समझा जाता है। जैसे रेडियो सिग्नल हर जगह हैं, पर वे उनसे प्रोपर ट्यूनिंग करने वालों को ही प्राप्त होते हैं; उसी प्रकार ग्रहों की चमक हर जगह है, पर वह समुचित जन्मकुंडली-योग वाले आदमी को ही प्राप्त होती है। यह ऐसे ही होता है, जैसे कई लोगों को सूर्य का प्रकाश भी आनंदित नहीं कर पाता। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उन्होंने सूर्य व उसके प्रकाश के साथ ट्यूनिंग नहीं की होती। शायद इसी ट्यूनिंग को बनाने के लिए ही सुबह के समय सूर्य को अर्घ्य देने की धार्मिक परम्परा है। इसी तरह नवग्रह पूजन से उन सभी ग्रहों के साथ ट्यूनिंग हो जाती है।

कोरोना काल में ज्योतिष शास्त्र अतिरिक्त सहायता प्रदान कर सकता है

जिन बीमारियों का इलाज है, उनके मामलों में तो कोई आध्यात्मिक मनोविज्ञान की बात ही नहीं करता। सफलता के लिए हर कोई आसान शॉर्टकट अपनाना चाहता है, बेशक वह टिकाऊ न हो।  पर कोरोना में तो यह विशेष लाभ पहुंचा सकता है, क्योंकि उसका इलाज ही नहीं। जब मन का बोझ कम होगा, तो स्वाभाविक है कि शरीर की इम्यूनिटी बढ़ेगी, जिससे कोरोना से लड़ने में मदद मिलेगी। यह तो वैज्ञानिक प्रयोगों से पहले से ही सिद्ध हो चुका है कि कुंडलिनी ध्यान से शरीर की इम्यूनिटी बढ़ती है।

ज्योतिष शास्त्र अपने आप में सम्पूर्ण विज्ञान है, जिसे गहन वैज्ञानिक अनुसंधान की आवश्यकता है

मैंने गूगल पर बहुत सर्च किया कि कहीं डीमिस्टीफाईंग ज्योतिष आदि के नाम से या अन्य कोई सरलीकृत वैबसाइट मिल जाए, पर कहीं नहीं मिली। ज्योतिष से संबंधित विद्वान पाठकों से अपेक्षा है कि वे इस क्षेत्र में पहल करें और ज्योतिष को पूर्ण सरलता से आम लोगों तक पहुंचाएं।