इसाई धर्म में कुण्डलिनी

कुण्डलिनी और होली स्पिरिट एक ही वस्तु-विशेष के दो नाम हैं। इसाई धर्म में होली स्पिरिट के साथ बैप्टिस्म का वर्णन आता है। इसी तरह हिन्दू धर्म में कुण्डलिनी की क्रियाशीलता व जागरण का वर्णन आता है। मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि होली स्पिरिट व कुण्डलिनी, दोनों एक ही चीज को दर्शा रहे हैं। इस बात को हम निम्नलिखित वैज्ञानिक तर्कों से भी सिद्ध कर सकते हैं।

होली स्पिरिट को ईश्वर की चलायमान शक्ति कहा गया है। इसी तरह कुण्डलिनी को भी जीवनी शक्ति कहा गया है। जैसे ईश्वर अपनी शक्ति को होली स्पिरिट के रूप में किसी भी स्थान पर प्रोजेक्ट करके उस शक्ति से अपनी इच्छा पूरी करवाता है, उसी तरह वह कुण्डलिनी के माध्यम से भी अपनी शुभ इच्छा पूरी करवाता है।

जैसे होली स्पिरिट को सांस, हवा, जीवन-धारियों में सबसे महत्त्वपूर्ण या प्राणशक्ति, देवता या फरिश्ते के रूप में पर्सोनीफाईड आदि नाम दिए गए हैं; उसी तरह से कुण्डलिनी को भी ये सभी नाम दिए गए हैं। जिस तरह होली स्पिरिट को गॉड का हाथ या अंगुली कहा गया है, उसी तरह कुण्डलिनी शक्ति को भी भगवान् शिव का क्रियात्मक अंश या आधा शरीर कहा गया है।

इसाई धर्म में कहा गया है कि गॉड अपनी होली स्पिरिट की सहायता से बहुत से महान कार्य करता व करवाता है। उदाहरण के लिए, सृष्टि का निर्माण, बाईबल की रचना, पुराने समय के महान लोगों व उपदेशकों के द्वारा किए गए आश्चर्यजनक काम। इसी तरह से कुण्डलिनी भी महान कार्य करती व करवाती है। इसी धर्म के अनुसार होली स्पिरिट किसी मानव-रूप में नहीं है, परन्तु उसे अन्य चीजों की तरह मानवीकृत किया गया है। इसी तरह कुण्डलिनी को भी एक देवी या सर्पिणी का रूप दिया गया है, हालांकि इसका कोई भौतिक रूप नहीं है।

होली स्पिरिट एक सहायक है, जिसे क्रिस्ट के नाम से भेजा गया है, जो क्रिस्ट के फोलोवर्स को सभी चीजें सिखाएगी, और उन्हें क्रिस्ट की टीचिंग्स की याद दिलाएगी। इसका अर्थ है कि क्रिस्ट का नाम जपने से मन में क्रिस्ट की छवि बस जाएगी, जो होली स्पिरिट बन जाएगी। कुण्डलिनी भी तो इसी तरह गुरु, देवता आदि के ध्यान से विकसित होती है।

होली स्पिरिट सिखाती है कि क्रिस्ट वास्तव में कौन है। अर्थात होली स्पिरिट अद्वैत का साक्षात्कार करवाती है। क्रिस्ट का रूप भी अद्वैतवान ही है। ऐसा ही अद्वैत कुण्डलिनी से भी तो उत्पन्न होता है।

होली स्पिरिट बाईबल को समझना आसान कर देती है। होली स्पिरिट वही सिखाती है, जो बाईबल में है। होली स्पिरिट बाईबल का स्मरण करवाती है। इसी तरह का काम कुण्डलिनी से भी होता है, व उसको जान लेने से भी सभी धार्मिक ग्रन्थ स्वयं ही, बिना पढ़े ही जाने हुए बन जाते हैं।

होली स्पिरिट पापों से लड़ने की शक्ति देती है। इसी तरह, कुण्डलिनी भी पुराने पापों को नष्ट करती है, और नए पापों को पनपने नहीं देती। होली स्पिरिट को प्राप्त करने वाला आदमी स्पिरिट में ही स्थित रहता है, और माँसमय शरीर की लिप्सा को पूरा नहीं करता। इसका मतलब है कि वह ननड्यूल व अनासक्त हो जाता है। कुण्डलिनी भी आदमी को अद्वैतशील व अनासक्त बना देती है। होली स्पिरिट भी कुण्डलिनी की तरह ही हमारे दिल में रहना चाहती है। इसका अर्थ है कि दोनों से ही बहुत गहरा प्यार हो जाता है, क्योंकि दोनों की याद निरंतर बनी रहती है। होली स्पिरिट व कुण्डलिनी, दोनों ही हमारा मार्गदर्शन करती हैं।

होली स्पिरिट या कुण्डलिनी बहुत बड़े बोझ व प्रतिकूलता को भी सहने की शक्ति देती है। दोनों ही नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर ले जाती हैं, तथा दोनों से पड़ौसी खुश रहते हैं। हिन्दू-ग्रंथों में भी आता है कि कुण्डलिनी-योगी के सभी लोग प्रेमी मित्र बन जाते हैं, कोई उसका शत्रु नहीं रहता।

वाक इन स्पिरिट का अर्थ है कि डैविल द्वारा आप मिसगाईड न किए जाएं, और हमेशा होली स्पिरिट के आज्ञाकारी बने रहें। इसी तरह कुण्डलिनी-योगी के लिए भी निरंतर कुण्डलिनी-ध्यान करना जरूरी माना गया है।

होली स्पिरिट में चलते रहने के वही लाभ मिलते हैं, जो कुण्डलिनी से उत्पन्न रूपांतरण से मिलते हैं। गॉड ने हमें डर की स्पिरिट (सामान्य द्वैतपूर्ण सोच) नहीं दी है, अपितु शक्ति, प्रेम, व स्वस्थ मन (अद्वैतपूर्ण व अनासक्त भाव) की स्पिरिट दी है। कुण्डलिनीयोग भी यही कहता है।

होली स्पिरिट के प्रवेश का अनुभव भी कुण्डलिनी-जागरण के अनुभव के सामान हो सकता है। दोनों के अनुभव रहस्यात्मक हैं। उदाहरण के लिए, पूरे शरीर में एक करंट के या सुनहरे जल के दौड़ने के साथ अनंत ख़ुशी का अनुभव। गिफ्ट ऑफ़ टंग भी प्राप्त हो सकता है। यह कुण्डलिनीयोग की वाक्-सिद्धि की तरह ही है, जिसमें कही गई बात सच हो जाती है। कुण्डलिनी के एक्टिवेशन की तरह ही होली स्पिरिट का एक्टिवेशन साईलेंट रूप में भी हो सकता है।

अब होली स्पिरिट के बैप्टिस्म व कुण्डलिनी जागरण के लिए जिम्मेदार कारणों के बीच समानता पर विचार करते हैं। जब कोई अपने अपराध पर पश्चाताप करता है, तब होली स्पिरिट एक्टिवेट हो जाती है। योग के अनुसार भी जब कोई आदमी अपने बीते जीवन को अपनी यादों में बार-२ साक्षीभाव के साथ उजागर करता है, तब स्वयं ही अच्छा पश्चाताप हो जाता है। उससे कुण्डलिनी क्रियाशील हो जाती है। जब कोई अपने को गॉड या क्रिस्ट के समर्पित कर देता है, तब होली स्पिरिट एक्टिवेट हो जाती है। योग में भी ईश्वर-समर्पण व कुण्डलिनी के प्रति समर्पण को सबसे अधिक महत्त्व दिया गया है।

यहां तक कि भगवान या देवता को याद करने से भी होली स्पिरिट या कुंडलिनी सक्रिय हो जाती है। मैंने हमेशा खुद इसको स्पष्ट रूप से अनुभव किया है। जब भी मैंने शरीरविज्ञान दर्शन की मदद से अद्वैतवादी होने की कोशिश की है, तब-2 मुझे कुंडलिनी का अनुभव हुआ है। ईश्वर अद्वैत का ही एक आधिकारिक नाम है। दोनों नाम एक ही चीज को दर्शाते हैं। मैं पहले से ही अनुभवात्मक रूप से साबित कर चुका हूं कि अद्वैत और कुंडलिनी हमेशा साथ-2 रहते हैं। यह वह इसाई धर्म-सम्मत बिंदु है, जहां से ईश्वर और पवित्र आत्मा (होली स्पिरिट/कुण्डलिनी) के बीच संबंध उपजा है। इसके अतिरिक्त, मैंने खुद भी अनुभव किया है कि अगर किसी भी चीज को बार-बार याद किया जाता है, तो वह चीज कुंडलिनी बन जाती है। उसी आधार पर, ईसा मसीह और बाइबल को बार-बार याद करने से वे पवित्र आत्मा / होली स्पिरिट के रूप में उपलब्ध हो जाते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि पवित्र आत्मा वही सिखाती है, जैसा कि ईसा मसीह और बाइबल ने सिखाया है, क्योंकि ये तीनों एकसमान ही हैं। उसी प्रकार, गुरु, देवता, या वेद-पुराणों का स्मरण करने से वे कुंडलिनी के रूप में प्रकट हो जाते हैं।

होली स्पिरिट को प्राप्त करने के लिए नया जन्म लेना पड़ता है। इसी तरह कुण्डलिनी को क्रियाशील करने के लिए योग-साधना के द्वारा रूपांतरित होना पड़ता है। नया जन्म क्रिस्ट से सम्बंधित होना चाहिए। इसका मतलब यह है कि योग के अनुसार रूपांतरण सकारात्मक होना चाहिए, नकारात्मक नहीं। इसका यह अर्थ भी है कि घर में शुरू से लेकर आध्यात्मिक माहौल होना चाहिए। वैसे भी कुण्डलिनी-जागरण के बाद पुनर्जन्म की तरह रूपांतरण होता है। ब्रेन में नए सरकट बनते हैं।

होली स्पिरिट की आज्ञा को मानना चाहिए। यह कुण्डलिनी योग के महत्त्व को रेखांकित करता है। जो योगी कुण्डलिनीयोग के माध्यम से कुण्डलिनी का बारम्बार स्मरण कर रहा है, वह उसकी आज्ञा का पालन करने के लिए हरदम तैयार ही तो है। होली स्पिरिट की प्राप्ति के लिए बिलीव करना अति आवश्यक है। कुण्डलिनीयोग के माध्यम से कुण्डलिनी के निरंतर स्मरण का मतलब ही यह है कि योगी का कुण्डलिनी के प्रति अपार विश्वास है।

होली स्पिरिट में बैप्टिस्म या सैल्वेशन के प्रत्येक मामले में ‘स्पीकिंग ऑफ़ टंग’ की प्राप्ति नहीं होती। यह ऐसा ही है, जैसे कि कुण्डलिनी जागरण व मोक्ष के लिए सिद्धियाँ जरूरी नहीं हैं।

अब हम कुण्डलिनी व होली स्पिरिट की एकरूपता का विरोध करने वाली बातों पर विचार करते हैं। होली स्पिरिट बाहर से आती है, परन्तु कुण्डलिनी शरीर के अन्दर ही होती है। ऐसा इसलिए है ताकि क्रिश्चियनिटी में योग के प्रसार पर रोक लग सके। योग का दुरुपयोग हो सकता है, जिस कारण उससे कर्महीनता व आलस्य का प्रसार हो सकता है। यह भी संभव है कि आत्मज्ञान व उस जैसे अनुभव को ही होली स्पिरिट का प्रवेश कहा गया हो। आत्मज्ञान बाहर से अर्थात ईश्वर से आता है, जबकि कुण्डलिनी-जागरण अपने अन्दर के प्रयास से उपलब्ध होता है। आत्मज्ञान के बाद कुण्डलिनी या होली स्पिरिट स्वयं ही विकसित हो जाती है, और निरंतर बनी रहती है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी ऐसा ही हुआ था। इसी तरह, ईश्वर से प्रार्थना व उसके प्रति समर्पण से कई प्रकार के अलौकिक अनुभव होते हैं, जैसे कि पूर्वोक्तानुसार शरीर में बहते हुए करंट या प्रकाश की नदी का अनुभव। ऐसे अनुभवों से भी कुण्डलिनी या होली स्पिरिट क्रियाशील हो जाती है।

मानवीय कर्म व प्रेम से कुण्डलिनी या होली स्पिरिट शरीर के अन्दर प्रविष्ट होती है। तभी तो इसाई धर्म में मानवता व प्रेम पर सर्वाधिक बल दिया गया है।

साथ में, ईसाई धर्म में 12 फलों वाले जीवन-वृक्ष का उल्लेख है। यह फ्रक्टिफाइड ट्री 7-12 चक्रों के साथ रीढ़ की हड्डी ही है।

क्रिश्चियनिटी में गॉड व सृष्टि के बीच में द्वैत का भाव है। ऐसा केवल इसलिए है ताकि गॉड को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया जा सके, जिससे उसमें मजबूत विश्वास पैदा हो जाए। हिंदू धर्म भी यह कहता है कि भगवान इस दुनिया के समान है, और साथ ही अलग भी है। वास्तव में अद्वैत ही सत्य है। क्योंकि जो अच्छी आदतें होली स्पिरिट के बैप्टिस्म के बाद विकसित होती हैं, वे केवल अद्वैत से ही उत्पन्न होती हैं।

कई लोग सोचते हैं कि योग में क्रिश्चियनीटी की तरह इविल स्पिरिट नहीं है। परन्तु यह सत्य नहीं है, क्योंकि योग में भी ‘माया’ नाम से इविल स्पिरिट को स्वीकार किया गया है, जो योगी को साधना व शुभ प्रयासों से विचलित करती रहती है।

वास्तव में चीज एक ही है, जिसे हम ऑब्जेक्ट ऑफ़ मेडिटेशन या ध्येय वस्तु कहते हैं। इसाई धर्म में इसे प्राकृतिक, सांसारिक व साधारण-संक्षिप्त रूप में बखान किया गया है; जबकि हिन्दू धर्म में त्यागपूर्णता, कृत्रिमता व दार्शनिक साज-सज्जा के साथ। परन्तु दुर्भाग्य से बहुत से लोग इस दार्शनिक विस्तार में असली, व्यावहारिक, व मूल वस्तु को भूल जाते हैं। इससे धर्मों में विभिन्नता प्रतीत होती है, परन्तु वास्तव में सभी धर्म मूल रूप से एकसमान हैं, और सभी मानवता व प्रेम के पक्ष में हैं।

अब मैं इसाई धर्म व हिंदु धर्म के मिश्रण के बारे में बात करता हूँ। पहले आदमी इसाई धर्म की नीति के अनुसार कर्मयोग से अपनी कुण्डलिनी को विकसित करे। फिर जब उसकी उम्र बढ़ जाए, वह मानवीय रूप से संसार को समृद्ध कर ले, तथा कुण्डलिनी में निपुण हो जाए; तब उसकी पदोन्नति कुण्डलिनीयोग में हो जाए। तब वह समर्पित व बैठकपूर्ण कुण्डलिनीयोग पर अधिक ध्यान दे, ताकि उसकी कुण्डलिनी और अधिक परिपक्व होकर जागृत हो जाए। प्रेमयोगी वज्र ने भी ईश्वरीय प्रेरणा से ऐसा ही किया था, जिससे उसे अतिशीघ्र कुण्डलिनीजागरण का अनुभव हो सका था। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि सभी धर्मों में वह सभी कुछ है, जो अन्य धर्मों में भी है। कई धर्मों में उनका संकेतों में वर्णन है, तो कई धर्मों में विस्तार से।

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कुण्डलिनी व मूर्तिपूजा के बीच में परस्पर सम्बन्ध

कुण्डलिनी को क्रियाशील व जागृत करने के लिए कुण्डलिनी के साथ बहुत लम्बे समय तक सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध बनाना पड़ता है। अधिकांशतः ऐसा एक ही जीवनकाल में संभव नहीं हो पाता। इसलिए आवश्यक है कि कुण्डलिनी के स्मरण वाला संस्कार एक आदमी को उसके जन्म से ही मिल जाए। यहाँ तक कि जब वह माता के गर्भ में हो, तभी से मिलना शुरू हो जाए। इसको संभव बनाने के लिए ही इष्टदेव को कल्पित किया गया है। वह कल्पित रूप सदा से सभी के लिए एक जैसा होता है। इससे उस इष्टदेव को मानने वाले परिवार में उस इष्टदेव के स्मरण से सम्बंधित संस्कार वंश परम्परा के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता रहता है। इसीलिए शैव सम्प्रदाय के लोगों के लिए शिव के रूप का ध्यान करना आसान हो जाता है। उसी ध्यान-शक्ति से एक शैव के मन में बसने वाला शिव उसकी कुण्डलिनी बन जाता है, जो अंततः कुण्डलिनी-जागरण के रूप में जीवंत भी हो सकता है। यदि दूरदर्शी ऋषियों के द्वारा शिव को निश्चित रूप न दिया गया होता, तो शिव का ध्यान उत्तरोत्तर न बढ़कर बार-२ टूटता रहता।

मान लो, किसी आदमी नि शिव को जटाधारी माना होता, और उसके पुत्र ने शिव को जटाहीन माना होता, तो क्या होता? वैसे में पिता के द्वारा अर्जित ध्यान पुत्र को प्राप्त न होता। वह अपना ध्यान स्वयं ही शुरू से इकट्ठा करता, जिससे उसे बहुत थोड़ा ही लाभ मिलता। उसे जो लाभ मिलता, वह यह होता कि उससे उसके जीवन में अल्प मात्रा में ही अद्वैत व अनासक्ति-भाव उत्पन्न होते। उससे प्रचंड अनासक्ति व अद्वैत के साथ कुण्डलिनी-जागरण न मिलता।

देवताओं में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देव शंकर हैं। इसीलिए उन्हें देवों के देव महादेव कहा जाता है। उन्हें एक निश्चित रूप प्रदान किया गया है। उनके गले में सर्प की माला है। उनके सिर पर लम्बी-२ जटाएं हैं। उनके मस्तक पर आधा चन्द्रमा विराजमान है। उनकी जटाओं से गंगा नदी निकल रही है। उनके माथे पर तीन समानांतर रेखाओं के रूप में तिलक है, जिसे त्रिपुंड कहा जाता है। कई जगह उनके भ्रूमध्य में खुला हुआ तीसरा नेत्र भी दिखाया जाता है। वे भस्म से लिपटे हुए हैं। उनके एक हाथ में त्रिशूल है, और एक हाथ में डमरू है। वे बैल की सवारी करते हैं। वे बाघ का चर्म ही ओढ़ते हैं, अन्य कोई वस्त्र नहीं पहनते हैं। वे सुन्दर हैं। उनके नयन-नक्श संतुलित व त्रुटिरहित हैं। उनका मुख कान्तिमान व आकर्षक है। उनका शरीर सुडोल व संतुलित है। वे मध्यम गोरे रंग के हैं। उनकी चाल-ढाल अद्वैत, अनासक्ति, व वैराग्य से भरी हुई है।

इसी तरह अन्य देवी-देवताओं को भी निश्चित रूप व आकार प्रदान किए गए हैं। साथ में, उन्हें निश्चित भाव-भंगिमाएं व आचार-विचार भी प्रदान किए गए हैं। गणेश को मूषक की सवारी करने वाला, लड्डू खाने वाला, व हाथी के जैसे मुख वाला बताया गया है। इसी तरह, नौ देवियों को भी भिन्न-२ परिचय दिए गए हैं।

इसी सिद्धांत के अनुसार अपने पूर्वज या पारिवारिक वृद्ध (पितामह आदि) को गुरु बनाना अधिक लाभप्रद है। क्योंकि एक व्यक्ति उनके साथ जन्म से लेकर परिचित व सौहार्दपूर्ण बना होता है, इसलिए उन्हें मन में बैठाना सर्वाधिक सरल होता है। वही मानसिक मूर्ति फिर लगातार के अभ्यास से कुण्डलिनी बन कर क्रियाशील व जागृत हो सकती है।

देव-मूर्ति पुराने मित्रों, परिचितों व पूर्वजों से भी जुड़ी होती है। जब कोई उन चिर परिचितों की समकालीन देव-मूर्ति से पुनः संपर्क साधता है, तब उन चिर-परिचितों की याद पुनः ताजा हो जाती है। उनमें से सर्वाधिक प्रभावशाली स्मरण बार-२ के अभ्यास से स्थायी स्मरण (कुण्डलिनी) के रूप में मन में उभर सकता है। विज्ञान की भाषा में इसे कंडीशंड रिफ्लेक्स (conditioned reflex) कहते हैं। इसके अनुसार जब दो वस्तुएं मन में एकसाथ बैठ गई हों, तो दोनों वस्तुएं आपस में जुड़ जाती हैं। जब कभी एक वस्तु का स्मरण किया जाता है, तो उससे जुड़ी हुई दूसरी वस्तु का स्मरण स्वयं ही हो जाता है। यह उस जैविक घटना की तरह है, जब एक गाय अपने बछड़े को देखकर अपना दूध छोड़ने लगती है। इस प्रकार से देव-मूर्तियाँ सामाजिक कंडिशनर (social conditioner) या सामाजिक संपर्कसूत्र (social link) का काम करती हैं। अपने प्रिय व परिचित जनों की याद बनाए रखने में ये अहम् भूमिका निभाती हैं। यही बात अन्य सभी निर्धारित किए गए धार्मिक विधि-विधानों के सम्बन्ध में भी लागू होती है। यद्यपि देव-मूर्तियाँ इनमें मुख्य हैं, क्योंकि वे मानवाकार, सुन्दर, सहज सुलभ, सर्वसुलभ, व आकर्षक होती हैं।

अगर किसी को मूर्ति पूजा से प्रत्यक्ष लाभ नहीं दिखता है, तो भी इसकी मदद से ध्यान और गहरी भावना की एक अच्छी आदत पड़ जाती है। यह मानवता के समग्र विकास में मदद करता है। यह सब प्रेमयोगी वज्र के साथ हुआ, तभी तो वह क्षणिक आत्मज्ञान व क्षणिक कुण्डलिनी जागरण को अनुभव कर पाया। दरअसल, वैदिक काल में देवताओं को उनके शुद्ध प्राकृतिक रूप में पूजा जाता था। बाद में, इनमें से कई देवताओं को मानव समाज में चल रहे सामाजिक सुधारों के साथ मानव रूप दिया गया, जो ज्ञान-विज्ञान सम्मत भी है।

प्राकृतिक चीजें अद्वैतशाली व अनासक्त होती हैं, तभी तो प्रकृति के बीच में आनंददायक शान्ति का अनुभव होता है। वास्तव में, देव-मूर्तियाँ घर के सीमित स्थान के लिए निर्मित किए गए, विराट प्रकृति के सूक्ष्म रूप ही हैं। शास्त्रों के वचनों से व वैज्ञानिक दर्शन “शरीरविज्ञान दर्शन” से भी यह प्रमाणित ही है कि जो कुछ भी इस बाह्य व विराट प्रकृति में है, वह सभी कुछ इस मानव शरीर के अन्दर भी वैसा ही है।

अब बात आती है, धर्म-परिवर्तन के बारे में। उपरोक्त तथ्यों के आधार पर तो अपने धर्म का त्याग कभी नहीं करना चाहिए। क्योंकि धर्म परिवर्तन करने से अपने कुलधर्म से जुड़ी हुई चिर-परिचित लोगों व वस्तुओं की यादें गायब हो जाती हैं, और कुण्डलिनी-विकास का अच्छा अवसर हाथ से छूट जाता है। शास्त्रों में भी आता है, श्रेयो स्वधर्मो विगुणोपि, परधर्मो भयावहः। अर्थात, अपना धर्म कम गुणों वाला होने पर भी कल्याणकारी है, दूसरों का धर्म तो भयावह है। इसका यह अर्थ नहीं है कि कट्टर धार्मिक होना चाहिए, या दूसरे धर्मों को नहीं मानना चाहिए। बल्कि इसका अर्थ है कि सभी मानवीय धर्मों को मानते हुए, अपने धर्म को ही मुख्य बना कर रखना चाहिए। यह ध्यान में रहना चाहिए कि यह बात योग पर लागू नहीं होती, क्योंकि योग कोई विशेष धर्म नहीं है। योग तो एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान है, जो सभी धर्मों का एक अभिन्न अंग है।

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शिव-अराधना से सर्वधर्मसमभाव- Love and brotherhood between all religions through Shiva-worship

पावन शिवरात्रि के अवसर पर सभी मित्रों को बहुत-२ शुभकामनाएं। (please browse down or click here to view this post in English)

आशुतोष शंकर बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। इसका अर्थ है कि उनके द्वारा उपदिष्ट तंत्र-साधना अतिशीघ्र मुक्ति प्रदान करती है। तंत्रसाधना हमारे दैनिक जीवन की गतिविधियों को आध्यात्मिक रूप देकर ही बनी है। उदाहरण के लिए निपुण तंत्रयोगियों का शरीर स्वयं ही मुड़ता, सिकुड़ता, फैलता व ऊपर की ओर उठता हुआ सा रहता है। ऐसा कुण्डलिनी को चक्रों पर स्थापित करने के लिए स्वयं ही होता रहता है। जब थकान होती है या कन्फ्यूजन होता है, तब भी ऐसा होता है, जिससे कुण्डलिनी मस्तिष्क-चक्र पर स्वयं ही प्रतिष्ठित हो जाती है। उससे एकदम चैन के साथ एक लम्बी सांस शरीर के अन्दर स्वयं ही प्रविष्ट होती है। नींद आने पर या बोरियत होने पर शरीर के उठने जैसे (अंगड़ाई) के साथ जम्हाई आने के पीछे भी यही रहस्य छिपा हुआ है।

शिव की मूर्ति मानवाकार होती है। इसका अर्थ है कि उस मूर्ति के अन्दर की कोशिकाएं (देहपुरुष) भी वैसी ही होती हैं, जैसी हमारे अपने शरीर के अन्दर की। इसका अर्थ है कि शिवमूर्ति की पूजा के समय हम उसमें स्थित देहपुरुष की ही पूजा कर रहे होते हैं। उस अद्वैतस्वरूप देहपुरुष को हमने अपनी मानसिक कुण्डलिनी का रूप दिया होता है। सीधा सा अर्थ है कि शिव-पूजन से भी कुण्डलिनी ही पुष्ट होती है। कुण्डलिनी-रूपी मानसिक चित्र किसी की व्यक्तिगत रुचि के अनुसार शिव का रूप लिए हुए भी हो सकता है, गुरु का रूप लिए भी हो सकता है, या प्रेमी / प्रेमिका का रूप लिए भी हो सकता है। कई बार तो कुण्डलिनी-चित्र शिव के जैसी वेशभूषा में भी अनुभव होता है, जैसे की बैल पर सवार, गले में सर्प की माला के साथ व डमरू के साथ, एक औघड़ तांत्रिक की तरह आदि-2। ऐसा शिव-पूजन के प्रभाव से होता है।

भगवान शिव दुनिया के सभी लोगों व धर्मों के आराध्य हैं। शिव-पूजन से दुनिया में सर्वधर्मसमभाव स्थापित हो सकता है। इससे धार्मिक उन्माद, कट्टरपंथ, व आतंकवाद पर रोक लग सकती है। सभी धर्म व दर्शन शिव से ही निकले हैं। इसका प्रमाण है कि भगवान शिव खान-पान के मामले में, पूजा के विधि-विधान के मामले में किसी से भेदभाव नहीं करते। उन्हें भूत-प्रेतों जैसे लोग भी उतने ही प्रिय हैं, जितने देवता जैसे लोग। वे सभी को प्रेम से व समान भाव से स्वीकार करते हैं, चाहे कोई किसी भी धर्म आदि का क्यों न हो। उनके द्वारा प्रदत्त तांत्रिक-साधना से यह स्पष्ट हो जाता है। शिवप्रदत्त तांत्रिक साधना ही सर्वाधिक वैज्ञानिक, प्रासंगिक, आधुनिक, सामाजिक, कर्मठतापूर्ण व मानवतापूर्ण है।

शिव-शक्ति अवधारणा सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में मानी जाती है। जो सत्य है, वह शिव है। वही पूर्ण है। उसमें सभी भाव-अभाव हैं। उसमें स्त्रीभाव व पुरुषभाव, दोनों एकसाथ विद्यमान हैं। एक प्रकार से शिव का स्वरूप मनुष्य के उस रूप के करीब है, जिसमें वह समाधि में स्थित रहता है। यह सभी जानते हैं कि सर्वाधिक मजबूत समाधि तांत्रिक यौनसंबंध के साथ ही लगती है। अतः एक ही भगवान शिव को शिव-पार्वती के रूप में काल्पनिक रूप से विभक्त किया गया है, ताकि समझने में आसानी हो। वास्तव में शिव-पार्वती सदैव एकाकार ही हैं, इससे यह भी कल्पित हो जाता है कि शिव-पार्वती सदैव पूर्णरूप से तांत्रिक-साधना में लीन रहते हैं। शिवलिंग इस साधना का प्रतीक है।

रशिया में भी इसी तरह की एक लोककथा प्रचलित है कि आदमी कभी पूर्ण हुआ करता था। उससे देवताओं का राजा डर गया और उसने आदमी को दो हिस्सों में बाँट दिया। एक हिस्सा पुरुष बना, और एक हिस्सा स्त्री बना। तभी से लेकर दोनों हिस्से एकाकार होने के लिए व्याकुल होते रहते हैं, ताकि पुनः पूर्ण होकर देवताओं पर राज कर सकें।

कई लोगों को शंका हो सकती है कि शिव तो हमेशा ही तांत्रिक साधना में लीन रहते हैं, फिर उन्हें कामारि, यह नाम क्यों दिया गया है? वास्तव में, एक तांत्रिक ही यौन-दुर्भावना को जीत सकता है। यौनता से दूर भागने वाला आदमी यौन-दुर्भावना को नहीं जीत सकता। उसके अन्दर यौनता के प्रति इच्छा बहुत बलवान होती है, बेशक वह बाहर से उससे अछूता होने का दिखावा करता रहे। काम को वही जीत सकता है, जो काम के रहस्य को समझता हो। काम के रहस्य को एक सच्चे तांत्रिक से अधिक कोई नहीं समझ सकता।

भगवान शिव को भूतनाथ भी इसीलिए कहते हैं, क्योंकि वह उन तांत्रिकों का नाथ भी होता है, जो बाहर के आचारों-विचारों से भूत-प्रेत की तरह ही प्रतीत होते हैं। यद्यपि अन्दर से वे शिव की तरह ही पूर्ण होते हैं।

भगवान शिव को भोला इसलिए कहा जाता है, क्योंकि वह अपनी नित्य तांत्रिक-साधना के बल से पूर्ण अद्वैत-भाव में स्थित रहते हैं। अर्थात वे एक बच्चे की तरह होते हैं। उनके लिए काष्ठ, लोष्ठ व स्वर्ण आदि सब कुछ एकसमान है। यद्यपि वे जीवन-व्यवहार के लिए ही बाहर से भेदभाव का प्रदर्शन करते हैं, अन्दर से नहीं।

मुझे एक बार भगवान स्शिव स्वप्न में दिखे थे। वे एक ऊंचे चबूतरे जैसी जगह पर बैठे हुए थे। वे कुछ गंभीर यद्यपि शांत लग रहे थे, एक औघड़ व अर्धवृद्ध तांत्रिक की तरह। साथ में वे मस्त-मौले जैसे भी लग रहे थे। फिर भी, उनका पहरावा शिव के जैसा लग रहा था। उनके चारों तरफ बहुत से भूत-प्रेत धूम-धड़ाके व जोर के हो-हल्ले के साथ नाच-गा रहे थे। वह आवाज जोर की व स्पष्ट थी। वह विशेष, रोमांचकारी, व संगीतमयी आवाज (खासकर ढोल की डिगडिगाहट) मुझे आजतक कुछ याद सी आ जाती है। उन भूत-प्रेतों से तनिक भी डर नहीं लग रहा था, अपितु बहुत आनंद आ रहा था। ऐसा लगा कि मेरे कुछ जानने में आने वाले व दिवंगत लोग भी उस भूत-प्रेतों के टोले में शामिल हो गए थे। उस स्वापनिक घटना से मेरी कुण्डलिनी को बहुत शक्ति मिली, और उसके लगभग डेढ़ से दो वर्षों के बाद वह जागृत भी हो गई।

इसी तरह, लगभग 30 वर्ष पूर्व मैं अपने चाचा की बरात के साथ जा रहा था। एक बड़े पहाड़ के नीचे से गुजरते हुए मुझे भगवान शिव एक अर्धवृद्ध के रूप में शांति से एक बड़ी सी चट्टान पर पालथी लगा कर बैठे हुए दिखे। वहां पर लोग फूल-पत्ते चढ़ा रहे थे, क्योंकि उसके थोड़ा ऊपर व पेड़ों के पीछे एक शिव-पार्वती का मंदिर था, जो वहां से दिखाई नहीं देता था। मैंने भी पत्ते चढ़ाए, तो मुझे उन्होंने प्रसाद के रूप में कुछ दिया, शायद चावल के कुछ दाने थे, या वहीँ से कुछ पत्ते उठाकर दे दिए थे। मुझे पूरी तरह से याद नहीं है। वे मुस्कुराते हुए, कुछ गंभीर जैसे, साधारण वेशभूषा में, व एक औघड़-गुरु के जैसे लग रहे थे। फिर भी वे एक साधारण मनुष्य ही लग रहे थे। तभी तो शायद मैंने उनसे बात नहीं की। वैसे भी, तंग पगडंडी पर लोगों की लम्बी पंक्ति में जल्दी-२ चलते हुए बात करने का समय ही नहीं था।

भगवान शिव की महिमा का कोई अंत नहीं है, पर निष्कर्ष के रूप में यही कह सकते हैं, शिव है तो सब कुछ है; शिव नहीं है तो कुछ नहीं है।

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Best wishes to all friends on the occasion of holy Shivratri.

Ashutosh Shankar becomes happy very easily. It means that the tantra-oriented technique provided by him gives liberation very quickly. The tantric techniques are made of the simple activities of our daily lives by giving those a spiritual shape. For example, the body of skilled tantric turns, shrinks, spreads and remains rising upward (tucking) itself. Such happen for kundalini to be installed on the chakras itself. When there is fatigue or confusion, this happens, due to which the Kundalini becomes distinguished itself on the cerebral chakra. With this, a long breath is drawn inside the body itself with a sudden relief. This secret is hidden behind the yawning with the body’s rise (body tucking up), when it comes to relieve of sleep or boredom.

Shiva’s idol is a human-form. It means that the cells (dehpurush) inside the body of that idol are also similar, as those in the inside of our own body. It means that while worshiping Shiva-idol, we are worshiping the non-dual dehpurush inside it. We have given the form of our mental Kundalini to that  dehpurush having non-dual attitude. It means straightforward that the Kundalini becomes strong even from Shiva-worship. Kundalini (mental image) can be having a form of Shiva according to somebody’s personal interest, can also be the form of a guru, or the form of boyfriend / girlfriend too. Many times, Kundalini-image is also experienced in Shiva-like costumes, such as one riding a bull, with a snake’s necklace and with a damroo (special drum), like a soft tantric etc. This happens with the influence of Shiva-Pooja (worship).

Lord Shiva is adorable of all people and religions of the world. Shiva-poojan can establish universal harmony in the world. It can prevent religious mania, fundamentalism, and terrorism. All religions and philosophies have come from Shiva. Its proof is that Lord Shiva does not discriminate against anyone in the case of eating-drinking and in the case of law and order of worship. He loves the people who are like the ghosts just equal to those people who are like God. He accepts all with love and with the same emotion, no matter how religious one is or what type the religion one has. It is clear from the tantric-sadhana given by him. Shiva-provided Tantric Sadhana is the most scientific, relevant, modern, social, productive, and humanistic.

Shiva-Shakti concept is considered in some form in all religions. That which is truth that is Shiva. That is the whole thing. There are all emotions in it. In it, both femininity and maleness are present together. In a sense, the nature of Shiva is close to that form of man, in which he lives in Samadhi. All of us know that the strongest Samadhi (meditation) seems to be accompanied by tantric sexual intercourse. Therefore, the only Lord Shiva has been conceptually divisible in the form of Shiva-Parvati that is easy to understand. In fact, Shiva-Parvati is always united as one, but it is also assumed that Shiva-Parvati are always completely absorbed in tantric-sadhana. Shiva lingam is a symbol of this sadhana.

In Russia, a similar folktale is prevalent that a man used to be perfect. From him the king of the gods was scared and he divided the man into two halves. One part is made of man, and one part becomes a woman. From then on, both sides are anxious to be united, so that they can rule over the gods once they are completed again.

Many people may doubt that Shiva is always absorbed in Tantric meditation, then why he has been given this name as kamari? In fact, only a tantric can conquer sex-malice. A man escaping sexuality cannot win sexually ill thought. His desire for sex in him is very strong, of course, he pretends to be untouched from the outside. Only one can win the sexuality, who understands its secret. Nobody can understand the secret of sexuality more than a true tantric.

Bhootnath (lord of ghosts) is also a name given to Lord Shiva, because he is also the master of those tantrics, who seem to be like ghosts from outside. Although from inside they are fulfilled just like Shiva.

Lord Shiva is also called as Bhola (innocent), because he is situated in full Advaita Bhava (non-dual attitude) with the force of his daily Tantric-Sadhana. That is, he is like a child. For him wood, lumber, and gold etc. everything is the same. Although he demonstrates discrimination from outside to live a mundane life-style, not having it inwardly.

I once saw Lord Shiva in my dream. He was sitting at a place like a table-type rock. He looked somewhat quiet though, like a soft, and semi-old Tantric. Together he seemed like a mast man (easy going). Even so, his dress looked like Shiva. Around him, many of the ghosts were dancing, singing with loud, and mast sound. That voice was loud and clear. That particular exhilarating musical voice (especially low pitch beats of the drum) makes me remember that a little today. I was not feeling frightened at all from those ghosts, but I was feeling very happy and a bliss. It seemed that the people who came to know me and were the departed ones also joined the group of those ghosts. My Kundalini got very much power from that automatic incident, and after about one and half a year to two years, she became awakened too.

Likewise, about 30 years ago, I was going with my uncle’s marriage procession. Passing under a big mountain, I saw Lord Shiva sitting in squatting posture in peace on a big rock in the form of a half-old man. There people were offering flowers and leaves, because there was a Shiva-Parvati temple behind the trees and a little above that place, which was not visible from there. I also offered him the leaves, then he gave me something in the form of a gift maybe that was in the form of some grains of rice or he picked up some leaves. I do not remember completely. He was smiling, looking like something serious, in ordinary costumes, and like a softhearted guru. Yet he seemed to be an ordinary man. Then maybe I did not talk to him. Anyway, there was no time to talk about while moving in the long line of people on the tight footpath for early running.

There is no end to the glory of Lord Shiva, but in the form of conclusions it can be said, Shiva is everything; if there is no Shiva, then there is nothing.

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पुलवामा के आतंकी हमले में शहीद सैनिकों के लिए सैद्धांतिक श्रद्धांजलि- Theological tribute to martyr soldiers in the Pulwama terror attack

पुलवामा के आतंकी हमले में शहीद सैनिकों के लिए सैद्धांतिक श्रद्धांजलि (please browse down or click here to view this post in English)

इतिहास गवाह है कि हमलावर ही अधिकाँश मामलों में विजयी हुआ है। यदि वह जीतता है, तब तो उसकी कामयाबी सबके सामने ही है, परन्तु यदि वह हारता है, तब भी वह कामयाब ही होता है। इसके पीछे गहरा तांत्रिक रहस्य छिपा हुआ है। हमला करने से पहले आदमी ने मन को पूरी तरह से तैयार किया होता है। हमले के लिए मन की पूरी तैयारी का मतलब है कि वह मृत्यु के भय को समाप्त कर देता है। मृत्यु का भय वह तभी समाप्त कर पाएगा, यदि उसे जीवन व मरण, दोनों बराबर लगेंगे। जीवन-मरण उसे तभी बराबर लगेंगे, जब वह मृत्यु में भी जीवन को देखेगा, अर्थात मृत्यु के बाद जन्नत मिलने की बात को दिल से स्वीकार करेगा। दूसरे शब्दों में, यही तो अद्वैत है, जो सभी दर्शनों व धर्मों का एकमात्र सार है। उसी अद्वैतभाव को कई लोग भगवान्, अल्लाह आदि के नाम से भी पुकारते हैं। तब सीधी सी बात है कि हरेक हमलावर अल्लाह का बन्दा स्वयं ही बन जाता है, चाहे वह अल्लाह को माने, या ना माने। अगर तो वह भगवान या अल्लाह को भी माने, तब तो सोने पे सुहागा हो जाएगा, और दुगुना फल हासिल होगा।

अब हमला झेलने वाले की बात करते हैं। वह मानसिक रूप से कभी भी तैयार नहीं होता है, लड़ने व मरने-मारने के लिए। इसका अर्थ है कि वह द्वैतभाव में स्थित होता है, क्योंकि वह मृत्यु से डरता है। वह जीवन के प्रति आसक्ति में डूबा होता है। इसका सीधा सा प्रभाव यह पड़ता है कि वह खुल कर नहीं लड़ पाता। इसलिए अधिकाँश मामलों में वह हार जाता है। यदि कभी वह जीत भी जाए, तो भी उसका डर व द्वैतभाव बना रहता है, क्योंकि विजयकारक द्वैत पर उसका विश्वास बना रहता है। सीधा सा अर्थ है कि वह हार कर भी हारता है, और जीत कर भी हार जाता है। बेहतरी से अचानक का हमला झेलने में वही सक्षम हो सकता है, जो अपने मन में हर घड़ी, हर पल अद्वैतभाव बना कर रखता है। अर्थात जो मन से साधु-संन्यासी की तरह की अनासक्ति से भरा हुआ जीवन जीता है, समर्थ होते हुए भी हमले की शुरुआत नहीं करता, और अचानक हुए हमले का सर्वोत्तम जवाब भी देता है। वैसा आदमी तो भगवान को सर्वप्रिय होता है। तभी तो भारत ने हजारों सालों तक ऐसे हमले झेले, और हमलावरों को नाकों चने भी चबाए। तभी भारत में शुरू से ही धर्म का, विशेषतः अद्वैत-धर्म का बोलबाला रहा है। इसी धर्म-शक्ति के कारण ही भारत को कभी भी किसी के ऊपर हमला करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। अपने धर्म को मजबूत करने के लिए हमला करने की आवश्यकता उन्हें पड़ती है, जो अपने दैनिक जीवन में शांतिपूर्वक ढंग से धर्म को धारण नहीं कर पाते। यह केवलमात्र सिद्धांत ही नहीं है, बल्कि तांत्रिक प्रेमयोगी वज्र का अपना स्वयं का अनुभव भी है। जीवन के हरेक पल को अद्वैत से भरी हुई, भगवान की पूजा बनाने के लिए ही उसने इस वेबसाईट को बनाया है।

अब एक सर्वोत्तम तरीका बताते हैं। यदि अद्वैत-धर्म का निरंतर पालन करने वाले लोग दुष्टों पर हमला करके भी अद्वैत-धर्म की शक्ति प्राप्त करने लग जाए, तब तो सोने पर सुहागे वाली बात हो जाएगी। विशेषकर उन पर तो हमला किया ही जा सकता है, जिनसे अपने को खतरा हो, और जो अपने ऊपर हमला कर सकते हों। हमारा देश आज ऐसे ही मोड़ पर है। यहाँ यह तरीका सबसे सफल सिद्ध हो सकता है। भारत के सभी लोगों को ऋषियों की तरह जीवन बिताना चाहिए। भारत के सैनिकों को भी ऋषि बन जाना चाहिए, और हर-हर महादेव के साथ उन आततायियों पर हमले करने चाहिए, जो धोखे से हमला करके देश को नुक्सान पहुंचाते रहते हैं। एक बार परख लिया, दो बार परख लिया, चार बार परख लिया। देश कब तक ऐसे उग्रपंथियों को परखता रहेगा?

आतंकवादियों के आश्रयस्थान के ऊपर जितने अधिक प्रतिबन्ध संभव हो, उतने लगा देने चाहिए, अतिशीघ्रतापूर्वक। उन प्रतिबंधों में शामिल हैं, नदी-जल  को रोकना, व्यापार को रोकना, संयुक्त राष्ट्र संघ में आतंकवादी देश घोषित करवाना आदि-2।

एक सैद्धांतिक व प्रेमयोगी वज्र के द्वारा अनुभूत सत्य यह भी है कि जब मन में समस्या (कुण्डलिनी चक्र अवरुद्ध) हो, तभी संसार में भी दिखती है। यही बात यदि उग्रपंथी समझें, तो वे दुनिया को सुधारने की अंधी दौड़ को छोड़ दें।

भगवान करे, उन वीरगति-प्राप्त सैनिकों की आत्मा को शांति मिले।

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Theological tribute to martyr soldiers in the Pulwama terror attack

History is the witness that the attacker has won in most of the cases. If he wins, then his success is in front of everyone, but if he loses, he still succeeds. The deep tantric mystery is hidden behind this. Before attacking other, man had prepared the mind completely. The complete preparation of the mind for the attack means that he eliminates the fear of death. He will be able to destroy the fear of death only if both life and death will be equal for him. Life and death will be equal to him, when he will see life in death also, that means, after death, he will accept the matter of getting the Paradise. In other words, this is the Advaita (non-duality), which is the only essence of all philosophies and religions. Many people call the same adwaita as the name of God, Allah etc. Then it is a straightforward thing that every attacker is the man of Allah itself, whether he believe in Allah or does not believe. If he also obeys God or Allah, then he will be blessed with borax on gold, means double reward will be achieved.

Now talk about the attacked. He is never mentally prepared regarding fighting and do or die. This means that he is present inside duality, because he is afraid of death. He is immersed in attachment to life. Its direct effect is that he does not openly fight. Therefore, in most cases he loses. Even if he wins, even then his fear and duality will remain, because his faith remains on the victorious duality. Straightforward it means that he loses even after defeating, and also loses by winning. He can be able to withstand the sudden attack better, who keeps non-duality in his mind at each moment of his life. That means, the mind that lives in a way filled with non-attachment like a Sage-Sannyasi. Even when capable, he does not start the attack, and gives a most appropriate answer to the sudden attack. Such a person is most loved by God. Only then did India take such attacks for thousands of years, and even shown stars in the daytime to the attackers. Only then India has religion dominated, especially Advaita Dharma (non duality-religion). Because of this same power, India never needed to attack anyone. Those need to attack to strengthen their own religion, who cannot hold religion in peace in their daily life. It is not only a mere theory, but also a tantric, Premyogi Vajra has this type of own experience. He has created this website to make every moment of one’s life full of Advaita, the unique and real worship of God.

Now tell a best way. If people, who constantly follow the Advaita Dharma, also continue to get the power of Advaita Dharma by attacking the evil ones, then there will be again borax over the gold. Especially those attackers can be attacked, who are a threat to one’s security, and those who can attack suddenly. Our country is on the same twist today. Here this method can be proven most successful. All people of India should spend life like sages. The soldiers of India should become sages, and with slogan of Har- Har Mahadev, they should attack those terrorists, who continue to harm the country by attacking deceptively. Once those have been tested, tested twice, tested four times. How long will the country test such extremists?

The restrictions on the shelter of the terrorists should be imposed as much as possible, in the fastest way possible. Those restrictions include stopping river-water, preventing trade, declaring a terrorist country in the United Nations etc.

The truth that is perceived by Premyogi vajra is that when there is a problem in the mind (Kundalini Chakra is blocked), then only in the world it is also visible. If extremists understand the same thing, then they should leave the blind race to improve the world.

May God bestow peace to the departed soul of those martyrs.

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योग व तंत्र-एक तुलनात्मक अध्ययन (तंत्र के बारे में कुछ रोचक तथ्य, तंत्र व इस्लाम के बीच में समानता)- Yoga and Tantra- A comparative study (some interesting facts about the tantric system, Tantra versus Islam)

योग व तंत्र- एक तुलनात्मक अध्ययन (तंत्र के बारे में कुछ रोचक तथ्य, तंत्र व इस्लाम के बीच में समानता), (please browse down or click here to view post in English)

तंत्र में प्रारंभ से ही एक व्यक्ति अपने आपको देहपुरुष की तरह अद्वैतपूर्ण, मुक्त व अनासक्त समझते हुए ही समस्त व्यवहार करता है। परन्तु योग में एक व्यक्ति पहले अपनी कुण्डलिनी को जगाता है। उससे उसे अद्वैत से जुड़े हुए महान आनंद का अनुभव होता है। उस कुन्डलिनीजागरण के आनंद के वशीभूत होकर ही वह अनायास ही अद्वैतमयी आचरण प्रारम्भ करता है, और धीरे-२ तांत्रिक की तरह अद्वैतपूर्ण बन जाता है। एक योगी कुण्डलिनीजागरण से आगे बढ़ते हुए आत्मज्ञान को भी अनुभव कर सकता है। उससे उसके अद्वैतज्ञान को और अधिक दृढ़ता मिलती है। इसका अर्थ है कि तंत्र योग की अपेक्षा अधिक आसान, सर्वसुलभ, स्वाभाविक व मानवतापूर्ण है। जब योगोपलब्धि के बाद भी तंत्र को स्वीकारना ही पड़ता है, तब क्यों न उसे प्रारम्भ से ही स्वीकार किया जाए। बहुत से तंत्र का अभ्यास करने वाले लोग समय के साथ स्वयं ही कुण्डलिनीजागरण व आत्मज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, बिना किसी भिन्न या विशेष प्रयास के। कई लोगों को तो तंत्र को सिद्ध करने का भी स्वाभाविक रूप से अवसर मिलता है, और योग को भी; जैसा कि इस वेबसाईट के नायक प्रेमयोगी वज्र के साथ हुआ। बहुत से लोग तंत्र को पंचमकारों तक ही सीमित कर देते हैं। परन्तु सच्चाई यह है कि तंत्र एक सम्पूर्ण जीवन पद्धति है। यह एक अद्वैतपूर्ण जीवनपद्धति है। हिन्दू संस्कृति के अधिकाँश अचार-विचार एक तांत्रिक पद्धति के ही विभिन्न अंग हैं, चाहे वह वेद-पुराणों का अध्ययन हो, या उनसे जुड़े हुए विभिन्न क्रियाकलाप। प्राचीनकाल में जिन लोगों को आत्मज्ञान हुआ, उन्हें आम साधारण जनजीवन में जीवन व्यतीत करना बहुत कठिन लगा। इसका कारण यह था कि आम लोग तो भौतिक दृष्टिकोण से जीवन जीने के आदी थे, जिसे आत्मज्ञानी लोगों का ज्ञानपूर्ण मन स्वीकार न कर सका। अतः उन्होंने आम अज्ञानी लोगों के व्यवहार की नक़ल को छोड़कर प्रकृति की नक़ल करते हुए अपना जीवन जीने का प्रयास किया। वैसा इसलिए, क्योंकि उन्हें प्रकृति के सभी व्यवहार ज्ञानपूर्ण लगे। वैसा करने से उनके आध्यात्मिक स्तर में और अधिक इजाफा हुआ, और वे जीवन्मुक्त बन गए। प्राकृतिक जीवनशैली से अपने को लाभ होते देखते हुए उनके मन में औरों को भी वैसा लाभ दिलाने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। अतः उन्होंने प्राकृतिक घटनाओं को जीवंत रूप में लिपिबद्ध करना शुरू कर दिया। वे ही लिपिबद्ध संग्रह कालान्तर में वेद-पुराणों के नाम से विख्यात हुए, जिन्होंने बहुत से लोगों के लिए जीवन्मुक्ति को सुलभ करवाया। उन पुराणों को लिखने वाले आत्मज्ञानी लोग ऋषि-मुनि कहलाए।

उपरोक्त प्रकार की ही घटना तांत्रिक प्रेमयोगी वज्र के साथ भी घटित हुई। उसे भी बचपन में ही क्षणिक आत्मज्ञान हो गया था। उसके बाद वह भी आम लोगों की तरह जीवनयापन करने में अपने आप को अक्षम पा रहा था। इसीलिए उसने अपने लाभ के लिए शरीरविज्ञान दर्शन नामक, पौराणिक दर्शन से मिलता-जुलता एक जीवन दर्शन बनाया। उसके सान्निध्य से उसे जो अद्वैत व अनासक्ति की उपलब्धि हुई, उससे उसकी चहुंमुखी प्रगति सुनिश्चित हुई, और यहाँ तक कि अनायास ही कुण्डलिनीजागरण की एक झलक भी मिली। उसी लाभ से प्रेरित होकर उसने उसी दर्शन पर आधारित एक पुस्तक की रचना की, जिसे हम आधुनिक पुराण भी कह सकते हैं। पुराणों में तो बाहर मौजूद स्थूल सृष्टि का वर्णन है, परन्तु शरीरविज्ञान दर्शन में हमारे अपने भीतर मौजूद सूक्ष्म सृष्टि का वर्णन है। ‘यत्पिंडे तत्ब्रम्हांडे’ नामक वेदोक्ति के अनुसार दोनों सृष्टियों के बीच में लेशमात्र भी अंतर नहीं है। इसलिए हम प्रेमयोगी वज्र को आधुनिक ऋषि भी कह सकते हैं। उसकी पुस्तक भी पुराणों की तरह ही तांत्रिक ही है, यद्यपि साथ में कुछ अंश पंचमकारी विद्या का भी है, श्रीमद देवीभागवत पुराण से मिलता जुलता। अब रही बात पंचमकारी तंत्र की, तो वह विशाल तांत्रिक पद्धति का केवलमात्र एक छोटा सा हिस्सा ही है। तांत्रिक पद्धति का बहुत लम्बे समय तक आचरण करने के बाद जब आम साधक का तांत्रिक दृष्टिकोण बहुत परिपक्व हो जाता है, तभी एक योग्य गुरु के मार्गदर्शन में तंत्र के पंचमकारी अंग का आश्रय लेना चाहिए, ताकि कुण्डलिनीजागरण के लिए पर्याप्त शक्ति मिल सके। समय से पहले अपनाने पर या अयोग्य गुरु के मार्गदर्शन में यह लाभ के स्थान पर हानि भी पहुंचा सकता है। साथ में, पंचमकारी तांत्रिकों का ध्येय हिंसा नहीं, अपितु कुण्डलिनीजागरण ही है। शक्ति के सर्वश्रेष्ठ स्रोत तो माँस, मैथुन व मद्य ही हैं, जो हिंसा के बिना प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं। इसलिए उनके कम से कम प्रयोग से अधिक से अधिक आध्यात्मिक लाभ को प्राप्त करने को ही प्राथमिकता दी गई है। इसका उदाहरण है, मत्स्य-सेवन। क्योंकि मछली को आवश्यकतानुसार न्यूनतम मात्रा में भी पकड़ा जा सकता है, इसलिए उससे निरर्थक हिंसा नहीं होती, जिससे हिंसा-दोष न्यूनतम स्तर पर बना रहता है। साथ में, मछली ठंडी प्रकृति की होती है। इसलिए यह पंचमकारी के अन्दर उस क्रोध को नहीं पनपने देती, जो आध्यात्मिक राह में सबसे बड़ा विघ्न होता है। साथ में, यह आमिषाहारों में सबसे कम तमोगुण उत्पन्न करता है, और इसके शरीर के ऊपर दुष्प्रभाव भी अन्य की तुलना में न्यूनतम होते हैं। इसी तरह इसमें एकपत्नीव्रत को प्राथमिकता दी गई है, ताकि यौनता की अति से बचा जा सके, क्योंकि वह भी एक विशेष प्रकार की हिंसा ही है, विशेषकर यदि सही तांत्रिक नियम न अपनाए जाएं। फिर भी थोड़ी-बहुत भूल-चूक तो सीखते समय स्वाभाविक ही है। यदि तांत्रिक-साथी को बदलना ही पड़े, तो बहुत लम्बे समय के बाद व विशेष आध्यात्मिक प्रगति को प्राप्त करने के बाद ही। स्त्री पर बुरी नजर सर्वथा वर्जित है। यौनता / पञ्चमकारों के बारे में भद्दे शब्द व भद्दे मजाक भी वर्जित हैं। स्त्री को देवी व गुरु की तरह सम्मान देना पड़ता है। किसी की बेटी या किसी की पत्नी को तांत्रिक-साथी नहीं बनाया जाता, क्योंकि उन्हें दूसरों की भावनात्मक संपति के अंश के रूप में देखा जाता है। प्राचीनकाल के अधिकाँश प्रख्यात तांत्रिक वही हैं, जो पहले आम जनमानस में प्रचलित साधारण तांत्रिक पद्धतियों से जीवन व्यतीत करते थे, परन्तु बाद में विभिन्न कारणों से उसके पंचमकारी अंग का भी सेवन करने लगे। उन कारणों में एक मुख्य कारण था, समाज से बहिष्कृति या समाज में पर्याप्त सम्मान न मिलना। तभी तो कुछ प्रख्यात तांत्रिक आज के पंजाब की भारत-पाकिस्तान सीमा के आसपास हुए हैं, कुछ तो आज के पाकिस्तान में भी हुए हैं। दूसरा कारण है कि पंजाब शुरु से ही समृद्ध रहा है, इसलिए वहां खाने-पीने व मौज-मस्ती करने वालों की परंपरा रही है। उसी तरफ को तांत्रिक मंदिर भी बहुतायत से पाए जाते हैं। पंजाब में गुरु-परम्परा  का बोलबाला भी तंत्र के अनुरूप ही विकसित हुआ है। मैंने स्वयं पंजाब के सुदूर व पाकिस्तान की दिशा के सीमावर्ती क्षेत्रों में रहकर सभी कुछ प्रत्यक्ष रूप में अनुभव किया है। उन सुदूर क्षेत्रों तक हिन्दुओं की आम तांत्रिक पद्धति की पहुँच ढीली थी, अतः वहां पर रहने वाले लोगों को सामूहिक आध्यात्मिकता से मिलने वाले बल की प्राप्ति नहीं हो रही थी। उसके प्रतिकारस्वरूप उन्होंने पंचमकारी तंत्र को सही ढंग से अपनाया, व त्वरित सफलता को प्राप्त किया, क्योंकि पंचमकारी शक्ति से उत्पन्न आध्यात्मिक बल सामूहिक आध्यात्मिकता के बल से भी कहीं अधिक था। निस्संदेह वे तांत्रिक आम सर्वसाधारण या आध्यात्मिक समाज से कटे-२ से रहे, फिर भी वे सिद्धियों के चरम पर पहुंचे, और दूसरों को भी प्रेरित करते रहे। स्वाभाविक है कि वैसे तांत्रिकों में बहुत से दलित व पिछड़े वर्गों के लोग भी इन्हीं उपरोक्त कारणों से शामिल हुए। वैसा ही उदाहरण दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में कष्टमय व एकाकी जीवन बिताने वाले तिब्बती बौद्धों का भी है। उन्हें सुविधामय मैदानी क्षेत्रों में प्रचलित साधारण तंत्र की अपेक्षा पंचमकारी तंत्र ही अधिक उपयुक्त लगा, इसीलिए यह वहां आज भी अच्छी तरह से जिन्दा है। चाईनी ताओ धर्म में तो एक यौनसनकी साधु को ही आदर्श साधु बताया गया है। वास्तव में जब से पंचमकारों का तंत्र से अलगाव हुआ, तब से ही आध्यात्मिकता का पतन प्रारंभ हो गया। पंचमकारों को उत्पथगामियों का आचार बताया गया। इससे हुआ यह कि पंचमकारों की शक्ति उत्पथगामियों को ही मिलती रही, और वे उससे पुष्ट होते रहे। धीरे-२ करके सारी धरती उत्पथगामियों से परिपूर्ण हो गई। दूसरी ओर आध्यात्मिकता आवश्यक शक्ति के बिना क्षीण होती गई, क्योंकि पंचमकारों को उससे दूर रखा गया। आजकल पंचमकारी तंत्र को तो गलत बोला जाता है, वैसे पंचमकारों का उपयोग धड़ल्ले से व बिना किसी रोक-टोक के खुल्लम-खुल्ला हो रहा है, आध्यात्मिकता के लिए नहीं, अपितु अंधी भौतिकता के लिए। इससे सिद्ध होता है कि आज असली तांत्रिकों की समाज को सख्त आवश्यकता है।

प्रेमयोगी वज्र के साथ भी कुछ-२ ऐसा ही हुआ। वह भी आम जनमानस की तंत्रपद्धतियों को अपनाता था। परन्तु उससे उसका आध्यात्मिक विकास बहुत धीरे-२ हो रहा था। जब बहुत लम्बे समय तक भी उसे कुण्डलिनीजागरण की झलक की आशा तक भी नहीं मिली, तब वह आम अध्यात्मिक जनमानस के विरुद्ध बागी जैसा हो गया। उससे उसका बहुत अपमान होने लगा। उसका विरोध भी तांत्रिक पंचमकारों के सेवन के रूप में बढ़ता ही जा रहा था। ये दोनों कार्य-कारण एक दूसरे को बढ़ाते जा रहे थे। अपमान से विरोध व विरोध से अपमान। यह चक्र तब तक चलता रहा, जब तक उसे कुण्डलिनीजागरण की झलक नहीं मिल गई। उससे वह संतुष्ट होकर शांत हो गया, और पंचमकारी तंत्र के ऊपर उसका विश्वास बढ़ गया।

वास्तव में योग (आम आध्यात्मिक तांत्रिक पद्धतियों सहित) व तंत्र (पंचमकारी योग) एक ही हैं, केवल प्रचंडता के स्तर में ही अंतर है। पंचमकारी योग से साधारण योग की अपेक्षा कुण्डलिनी अधिक प्रचंड रहती है। अतः एक बुद्धिमान तांत्रिक व्यक्ति दोनों का समयानुसार आश्रय लेता रहता है। दोनों में कुछ भी विरोध नहीं है। तांत्रिक तो सभी आध्यात्मिक लोग हैं, पर पंचमकारी तांत्रिक को ही तांत्रिक कहने का प्रचलन है। उसे हम पंचमकारी साधु भी कह सकते हैं, क्योंकि साधारण साधु व पंचमकारी साधु के बीच में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है, कुण्डलिनी की अभिव्यक्ति के स्तर को छोड़कर।

ऐसा प्रतीत होता है कि तंत्र मैं मैथुन मकार ही सबसे प्रमुख है, क्योंकि इसीसे कुण्डलिनी को आश्चर्यजनक बल प्राप्त होता है। अन्य मकार तो केवल आवश्यकतानुसार इस मुख्य मकार के सहायक ही हैं। अन्य पंचमकारी धर्मों को तो मैं तंत्र का ही एक रूपांतरित स्वरूप मानता हूँ। उनमें जो शक्ति विद्यमान है, और जिसके प्रति अधिकाँश लोग आकर्षित होते हैं, वह पंचमकारिक तांत्रिक शक्ति ही प्रतीत होती है। परन्तु सात्विक हिन्दु धर्म / तंत्र का विरोध करके वे विरोधी धर्म आध्यात्मिक लाभ की प्राप्ति नहीं करा सकते, अपितु उल्टा हानि ही कराते हैं, यह बात तो तय है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह सिद्धांत है कि पंचमकार तभी सफल होते हैं, यदि वे सात्विक तंत्र / योग / धर्म के सान्निध्य में रहें। इससे दोनों पद्धतियों को आध्यात्मिक व भौतिक, दोनों प्रकार के लाभ मिलते हैं। अन्यथा पंचमकार पापों के भण्डार ही तो हैं। अतः सभी धर्मों के सहयोगात्मक सहअस्तित्व में ही सबका भला है। स्वर्णसंज्ञक या आकर्षक व्यक्तित्व / रंग-रूप वाले हिंदु पंडितों के लिए इसीलिए अनुष्ठानपरक, निस्स्वार्थी, मानवतापूर्ण, प्रेमपूर्ण, संतोषी, सामाजिक व अहिंसावादी होकर रहने का निर्देश दिया गया है, ताकि उनमें अद्वैतभाव व अनासक्तिभाव के साथ-२ एक दिव्य तेज व आकर्षण भी विद्यमान रहे। तभी तो अन्य आम या पंचमकारी लोग उन्हें गुरु बना कर उनके रूप की कुण्डलिनी को अपने मन में पुष्ट कर सकते हैं। तभी पंचमकारों की शक्ति कुण्डलिनी को लगेगी, अन्यथा वह उनके लिए नरक का रास्ता ही साफ करेगी।

कई स्थानों पर तो पंचमकारों का सेवन संकेतमात्र या औपचारिकता मात्र के लिए इसलिए निर्दिष्ट किया गया है, ताकि किसी को यह अहंकार न होए कि मैं बहुत शुद्ध हूँ, और साथ में उत्तम प्रकार का अद्वैतभाव भी बना रहे। तंत्र में यह सिद्धांत भलीभांति ध्यान में रखा गया है कि कर्म का फल तो मिल कर ही रहेगा, इसलिए पंचमकारों के प्रयोग में बहुत संयम व सावधानी बरती जाती है। कई स्थानों पर इसलिए उनका प्रयोग बताया गया है, ताकि हिंसक या राक्षस प्रकृति के लोगों को सही ढंग से खाना-पीना व भोग-विलास करना सिखाया जा सके, और उनके भोग-विलास के अन्दर अध्यात्म का बीज डालकर उन्हें भी अध्यात्म की ओर मोड़ा जा सके। बाद में धीरे-२ वे खुद सुधर जाते हैं। परन्तु कुछ भी हो, पंचमकारी तंत्र की आश्चर्यजनक शक्ति को नकारा नहीं जा सकता। सिद्ध तांत्रिक तो यहां तक कहते हैं कि तंत्र विशेषकर यौनतंत्र के बिना आत्मज्ञान को प्राप्त ही नहीं किया जा सकता है।

तंत्र के बारे में और भी बहुत से रोचक तथ्य विद्यमान हैं। तंत्रसमाज को गुह्य समाज भी कहते हैं। कई तो उनमें महान ब्राम्हण पंडित भी शामिल हो गए थे। कई तांत्रिकों की तो उनकी अपनी बहन ही उनकी तांत्रिक गुरु थी। इस्लाम में भी अपनी बहन से (यद्यपि सहोदर बहन से या पिता की पत्नी से पैदा हुई के साथ नहीं) विवाह की अनुमति है। इससे कुछ अंदाजा लगता है कि इस्लाम के मूल में कहीं न कहीं पंचमकारी तंत्र विद्यमान है। काबा में जिस काले पत्थर को चूमने का रिवाज है, उसे अधिकाँश लोग शिवलिंग ही मानते हैं। भगवान शिव तो तंत्रमार्ग के आदि प्रवर्तक हैं ही। विषमवाही तंत्र के मामले में तो यह भी माना गया है कि तांत्रिक प्रेमिका जितनी अधिक बदसूरत या अनाकर्षक हो, वह उतनी ही अधिक तंत्रसम्मत होती है, बशर्ते कि वह तांत्रिक गुणों से संपन्न हो। ऐसा इसलिए, क्योंकि उसमें अहंकार नहीं होता, जिससे वह दूसरों / गुरु के रूप की कुण्डलिनी को अपने ऊपर आसानी से पनपने देती है। विषमवाही तंत्र का अर्थ है कि मानसिक कुण्डलिनी छवि किसी और की (गुरु आदि की) होती है, जबकि कुण्डलिनीवाहक तो तांत्रिक प्रेमिका ही होती है। समवाही तंत्र का अर्थ है कि मानसिक कुण्डलिनी छवि भी तांत्रिक प्रेमिका के रूप की होती है, और कुण्डलिनी-वाहक भी वही होती है। समवाही तंत्र में सांकेतिक / अप्रत्यक्ष तांत्रिकमैथुन अधिक कारगर है, परन्तु विषमवाही तंत्र में पूर्ण / स्पष्ट / प्रत्यक्ष तांत्रिकमैथुन क्रिया। इसीलिए अधिक से अधिक यौनाकर्षण उत्पन्न करने के लिए समवाही तांत्रिका आकर्षक होनी चाहिए। समवाही व विषमवाही नाम के तंत्र के दो प्रकार मैंने इसी मेजबान वेबसाईट पर प्रेमयोगी वज्र के अनुभवात्मक विवरण में देखे, अन्य स्थान पर नहीं, यद्यपि तंत्र में यह प्रचलित धारणा है कि पिछड़े वर्ग की महिलाएँ प्रत्यक्ष तांत्रिकसम्बन्ध के लिए सर्वोत्तम होती हैं। इससे प्रेमयोगी वज्र का कथन स्पष्ट हो जाता है। कहा जाता है कि एक बार एक प्रख्यात तांत्रिक-गुरु की बदसूरत व काली तांत्रिक प्रेमिका का उनके शिष्य ने उपहास उड़ाया था। उससे नाराज होकर उस तांत्रिक-प्रेमिका ने उसको उसके जीवनकाल में आत्मज्ञान की प्राप्ति न होने का श्राप दिया। उससे वैसा ही हुआ।

अब हम तंत्र व इस्लाम के बीच समानता पर विस्तार से चर्चा करते हैं। तंत्र व इस्लाम की शुरुआत लगभग एकसाथ हुई। दोनों में ही संसार-त्याग को अस्वीकार किया गया है, और सांसारिक प्रवृत्ति पर जोर दिया गया है। दोनों में ही स्त्री को महत्त्व दिया गया है। खतना के पीछे भी तान्त्रिक सिद्धांत ही प्रतीत होता है। इस्लाम में मौलवी के द्वारा हलाला करने की रिवाज भी तंत्र की उस प्रथा का विकृत रूप प्रतीत होती है, जिसमें गुरु व शिष्य की संयुक्त तांत्रिक-प्रेमिका होती है। दोनों ही साधना-पथ सभी सर्वसाधारण व शुद्धि-बुद्धि से रहित लोगों को भी मुक्ति प्रदान करने के लिए बनाए गए हैं। तांत्रिक नाथ सम्प्रदाय के बहुत से गुरुओं को बहुत से मुसलमान अपना भी गुरु मानते हैं। तांत्रिक गुरुओं को पीर बाबा भी कहा जाता है। जिस तरह दक्षिणपंथी, हिन्दुओं के शुद्धिवादी हैं, उसी तरह सूफी साधना-पथ इस्लाम में शुद्धिवादी व नरमपंथी विचारधारा है। अधिकांशतः, हिन्दु धर्म के दक्षिणतंत्र व वामतंत्र को एक-दूसरे का विरोधी बताया जाता है। परन्तु प्रेमयोगी वज्र के तांत्रिक अनुभव के आधार पर मैंने इस लेख में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि वामतंत्र व दक्षिणतंत्र आपस में विरोधी नहीं, अपितु सहयोगी हैं। साधारण तांत्रिक पद्धतियों को दक्षिणतंत्र कह लो, व पंचमकारी तंत्र को वामतंत्र। इसी तरह हिन्दु धर्म व इस्लाम धर्म भी एक दूसरे के सहयोगी ही सिद्ध हुए, क्योंकि वृहद् परिपेक्ष्य में हिन्दु धर्म को दक्षिणतंत्र एवं इस्लाम को वामतंत्र कह लो। इसलिए दोनों के बीच में वैमनस्य या कटुता के लिए कोई स्थान नहीं है। दोनों ही धर्म एक-दूसरे से घृणा करके अनजाने में ही एक दूसरे से प्रेम कर रहे होते हैं। परन्तु उससे पूरा काम नहीं चलता। फिर क्यों न ये दोनों सीधे तौर पर एक-दूसरे से प्रेम करें, जिससे वे एक-दूसरे की शक्ति को और अधिक मात्रा में व अधिक सकारात्मकता के साथ प्राप्त कर सकें। विचारों में भिन्नता तो मानवमात्र का स्वभाव है ही, परन्तु उससे आपसी प्रेम व सहयोग पर दुष्प्रभाव नहीं पढ़ना चाहिए। यदि उन्हें अपने प्राचीन धर्मशास्त्रों में संशोधन करने की आवश्यकता पड़े, तो मानवता के हित में धर्मसभा या सर्वधर्मसभा बैठाकर कर लेना चाहिए। मैं यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि यहाँ पर सभी धर्मों की बात हो रही है, किसी विशेष धर्म की नहीं। सभी को अमानवीयता, कट्टरता व घृणा से भरे हुए शब्दों में इस तरह से संशोधन करने पर विचार करना चाहिए, जिससे सभी धर्मों का सम्मान भी बना रहे, और जमाने के अनुसार उनमें संशोधन भी हो जाएं। उदाहरण के लिए जब से हिंदु धर्म में बलि प्रथा का विरोध होने लगा, तब से ही प्रतीतात्मक रूप में नारियल की बलि दी जाती है। तंत्र में कुण्डलिनी / गुरु के नाम पर पंचमकारों का सेवन किया जाता है, तो इस्लाम में अल्लाह (ईश्वर) के नाम पर, यद्यपि दोनों कुछ समानता साझा करते हैं। वास्तव में निराकार ईश्वर के निरंतर ध्यान से भी कुण्डलिनी ही पुष्ट होती है, यह रहस्य सभी को पता नहीं है। परन्तु कट्टर इस्लाम में पंचमकारों में मानव के प्रति हिंसा व झूठ-फरेब को भी सम्मिलित किया गया है। तुलनात्मक रूप से हल्के स्तर पर ऐसा हिन्दु धर्म व इसाई धर्म में भी हुआ, यद्यपि अधिकाँश मामलों में यह कहा जाता है कि ऐसा प्रतिक्रयास्वरूप हुआ। अब पुराने जमाने में इसकी क्या जरूरत पड़ी होगी, यह स्पष्टतया कह नहीं सकते, परन्तु आज के शिक्षित व मानवतापूर्ण युग में यह जरा भी प्रासंगिक नहीं है, ओर पूरी तरह से त्याज्य है। हालांकि घोर आत्मरक्षा के लिए (जान बचाने के लिए) इनके प्रयोग पर विरले मामलों में विचार किया जा सकता है। असली त्याग तो भावना का त्याग है। सुप्त भावना भी काम करती रहती है। इसलिए तत्संबंधित संकल्पों की दृढ़ अभिव्यक्ति से अमानवता का खंडन करना चाहिए, तभी सुप्त भावना (संस्कार) नष्ट होती है। ये सभी तथ्य इस वेबसाईट के नायक व एक तांत्रिक, प्रेमयोगी वज्र के अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर लिखे गए हैं, यह मात्र खाली थ्योरी नहीं है। प्रेमयोगी वज्र एक आत्मज्ञानी है, व उसकी कुण्डलिनी भी जागृत हो चुकी है। उसे भी तभी आध्यात्मिक सफलता मिली, जब उसने लगभग 25 वर्ष पूर्व अमानवता का सार्वजनिक रूप से कड़े शब्दों में खंडन किया। इसे इसी मेज वेबसाइट पर स्थित वेबपेज के निम्न लिंक पर पढ़ा जा सकता है-https://demystifyingkundalini.com/%E0%A4%97%E0%A5%83%E0%A4%B9-10/

एक स्पष्टीकरण यहाँ युक्तियुक्त प्रतीत हो रहा है। यदि ईश्वर की खिलाफत करने वाले बन्दे को ईश्वर के स्मरण के साथ यातना दी जाए जेहाद आदि के नाम पर,  तब उसके बदले में जो यातनारूपी फल उस यातना देने वाले को मिलेगा, उसके साथ स्वयं ही ईश्वर का स्मरण बढ़ते समय के साथ दुगुने या अधिक रूप में हो जाएगा, क्योंकि कर्म व उसका फल दोनों आपस में जुड़े हुए होते हैं। फिर यदि वह यातनाफल सहते हुए मर ही जाए, तब तो सीधा मुक्त हो गया, क्योंकि सनातन धर्म में भी कहा है कि मरते समय जिसका स्मरण किया जाए, वही रूप मरणोपरांत मिलता है। परन्तु यदि ऐसा नहीं हुआ, तो नरक का द्वार खुला है। यह अलग बात है कि उसे नरक में भी ईश्वर का स्मरण होता रहेगा। इसलिए बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है। इसी तरह, अब जब कोई ईश्वर के नाम पर पीड़ा सहेगा, तो स्वाभाविक है कि उसमें भी ईश्वर का स्मरण जागेगा, जिससे वह भी ईश्वर को प्रिय हो जाएगा। इससे पीड़ा देने वाले का व पीड़ा सहने वाले का, इन दोनों का एकसाथ भला होगा। अतः स्पष्ट है कि इसमें पीड़ा सहने वाले से अधिक बुरा तो पीड़ा देने वाले का होगा, क्योंकि यदि वह तंत्र का आचरण सही ढंग से नहीं कर पाया, तो बुरे कर्म से पैदा होने वाली नरकरुपी तलवार सदैव उसके ऊपर लटकी रहती है। क्योंकि यह महान कर्म-सिद्धांत है कि जब तक कोई मुक्त नहीं हो जाता, तब तक कर्म का फल तो मिल कर ही रहेगा। इसीलिए इसमें ‘सबकुछ’ या ‘कुछ भी नहीं’ होता है, बीच वाले स्तर नहीं होते। यही तंत्र का भी, विशेषतः अतिवादी तंत्र का भी सिद्धांत है। यही एक मुख्य कारण है कि महान इस्लाम एक अतिवादी तंत्र की तरह लगता है। परन्तु दुर्भाग्य से अतिवादी तंत्र के डर के कारण ही बहुत से लोग साधारण तंत्र से भी दूर रहने लगे, जिससे वे एक विज्ञानमिश्रित आध्यात्मिक पद्धति के लाभों से अछूते रहने लगे। प्रेमयोगी वज्र ने इसे अपने अनुभव से सिद्ध किया। उसने कुण्डलिनी के ध्यान के साथ मांसाहार किया। जब उससे उसे छिटपुट चोट के रूप में उसका फल मिला, तब एकदम से उसके मस्तिष्क में वह कुण्डलिनी प्रचंड होकर प्रकट हो गई, और उससे जुड़ा हुआ माँसभक्षण का पापकर्म भी उसे स्मरण हो आया। अब जो कहा है कि अल्लाह के बन्दे को परेशान नहीं करना चाहिए, वह भी सनातन धर्म के अनुसार ही है, जिसमें कहा गया है कि ईश्वरभक्त का बुरा करने वाले को ईश्वर कभी क्षमा नहीं करते। वास्तव में सभी धर्म एकरूप ही हैं, केवल समझने भर का फर्क है। इसी तरह, एक बार प्रेमयोगी वज्र ने कुण्डलिनीध्यान / अद्वैतपूर्ण जीवन के साथ हल्का-फुल्का राजद्रोह किया। वास्तव में वह राजद्रोह नहीं था, अपितु राजद्रोह का अभिनय मात्र ही था मूलतः, क्योंकि उसमें अहिन्सापूर्वक सर्वलोकहित छुपा हुआ था। जब उसे सजा मिली, तो उसने दिव्य प्रेरणा से सजा से बचने का पूरा प्रयास किया, जिसमें उसे अनौखी सफलता भी मिली। जब उसे उसकी हल्की-फुल्की सजा मिली, तब वह उसे ईनाम की तरह लगी, और उसके मन में कुण्डलिनी-ध्यान / अद्वैतभाव पहले से भी प्रचंड हो गया मूलकर्म के स्मरण के साथ, जिससे उसका थोड़े से योग के प्रयास के साथ कुण्डलिनीजागरण हो गया। साथ में कहें, जैसे योग के समय शारीरिक जोड़ों पर सांसों / मुड़ने / गति आदि के प्रभाव से उत्पन्न संवेदना के ऊपर कुण्डलिनी आरोपित होकर प्रचंड हो जाती है, उसी प्रकार धर्मसम्मत वेदना आदि के समय ईश्वर, संवेदना के ऊपर आरोपित होकर अति स्पष्ट हो जाते हैं।

तभी तो मैं कहता हूँ कि कोई भी किसी से कभी घृणा कर ही नहीं सकता। यदि एक आदमी दूसरे आदमी से संपर्क स्थापित करता है, तो वह हर हालत में उससे प्रेम ही करता है। यदि वह उसका भला करता है, तो उसको प्रत्यक्ष रूप से आगे बढ़ने का मौक़ा देकर, और यदि वह बुरा करता है, तो उसके पापों को नष्ट करके अप्रत्यक्ष रूप से। यद्यपि पहले वाला तरीका अधिक प्रशंसनीय व व्यावहारिक है। दूसरे तरीके का प्रयोग यदि मजबूरीवश करना ही पड़े, तो हल्के या अधिक से अधिक मध्यम स्तर तक ही, अतिवादी स्तर तक कभी नहीं।

इतिहास गवाह है कि मक्का में रहने वाले मुस्लिम मूर्तिपूजक थे। इसका सीधा सा मतलब है कि वे तंत्रयोगी थे। क्योंकि वहां के लोग मांस-मदिरा, यौन-भोग आदि पंचमकारों का सेवन तो वैसे भी पहले से करते आए हैं। इनके साथ मूर्तिपूजन जुड़ जाए, तो वह स्वतः ही तंत्र बन जाता है।

हो सकता है कि प्राचीनकाल में आम जनजीवन में लड़ाई-झगड़ों की, युद्धादि की व पशु आदि के प्रति हिंसाओं की बहुतायत हुआ करती थी, जिनका निवारण संभवतः असंभव था। इसलिए उन्हें ही धर्म का आवरण पहना कर शुद्ध व मुक्तिकारी कर दिया गया। क्योंकि हिंसाओं व अशुद्धियों से भरे हुए वातावरण में शुद्ध वैदिक क्रियाएं लाभ के स्थान पर हानि पहुंचा सकती थीं, इसीलिए उनके प्रति घृणा को फैलाया गया। बाद में स्थिति बदल गई, परन्तु उनके बनाए गए नियम सदा के लिए हो गए, क्योंकि वे निष्ठा व विश्वास से लिखित रूप में पक्के कर दिए गए थे। उस समय यातायात व संचार की भी संतोषजनक सुविधाएं नहीं होती थीं। इसलिए एक छोटे से दुष्कर / विशेष परिस्थिति वाले क्षेत्र में सीमित लोग समझते थे कि पूरी दुनिया उन्हीं के जैसी थी। इसीलिए वे अपनी विचारधारा को पूरी दुनिया में फैलाने की मंशा रखते थे।

इसी तरह पुराने समय में तंत्र में भी विरले मामलों में नर-बलि की प्रथा थी, जो अब नहीं है। दोनों में ही शरीर-सुख को अधिक महत्त्व दिया गया है। दोनों में ही हठयोग के आसन हैं। दोनों ही पलायनवादी नरम हिंदुत्व के विरोधस्वरूप ही बने थे। यद्यपि तंत्र इस्लाम की अपेक्षा नरम हिंदुत्व के प्रति बहुत अधिक उदारवादी बना रहा, और उसके बीच में पूरी तरह से घुल-मिल कर जीवित बना रहा।

यहाँ हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि इस्लाम में 5 मकार न होकर 4 मकार ही हैं, कम या अधिक रूप से। उसमें मदिरा निषिद्ध है। यद्यपि मैं तो माँस के प्रभाव को मदिरा के प्रभाव के समकक्ष ही मानता हूँ। दोनों ही तमोगुणस्वरूप हैं। साथ में यह भी स्पष्ट करना चाहता हूँ कि वे पञ्चमकार वहां तंत्र की तरह स्पष्ट व अच्छी तरह से परिभाषित  न होकर पञ्चमकार की तरह ही प्रतीत होते हैं, क्योंकि उनका प्रभाव पञ्चमकारों की तरह ही ईश्वरीय शक्ति की ओर ले जाने वाला है। उपरोक्त तथ्यों के लिए एक अन्य प्रामाणिक लेख निम्नोक्त लिंक पर पढ़ा जा सकता है- http://greatvashikaranspecialist.com/islamic-tantra

अल्लाह संस्कृत का शब्द है- स्क्रिब्ड

अंततः धार्मिक उन्माद से बचाने वाली, व वास्तविक मानवता-धर्म सिखाने वाली संक्षिप्त जानकारी इसी वेबसाईट पर (जिसका नायक प्रेमयोगी वज्र है) प्राप्त की जा सकती है, और विस्तृत जानकारी वाली पुस्तक को निम्नलिखित लिंक पर प्राप्त किया जा सकता है।

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Yoga and Tantra – A comparative study (some interesting facts about the tantric system, Tantra versus Islam)

From the very beginning in the tantric system, a person treats himself, just like the person of God / dehapurusha, as a supremely, free, nondual and unattached. However, in Yoga, a person first wakes up his kundalini. From that, he experiences great joy associated with Advaita / nonduality. With the happiness of that KundaliniJagran, he begins to adopt unattached conduct in an unintended manner, and gradually becomes non-dual like Tantric. A yogi can also experience enlightenment while moving ahead with KundaliniJagran. His adeptness gets more firmness from that. This means that the tantric technique is easier, more natural, universal, friendly to all human beings and humanistic than yoga. When the tantric system has to be accepted even after yogic achievement, why not accept it from the beginning? People who practice tantric mechanisms get themselves KundaliniJagran and enlightenment over time, without any different or special effort. Many people also get a natural opportunity to prove both the mechanisms, tantric as well as Yoga together; as with this hosting website, it happened with the protagonist Premyogi vajra. Many people limit the system to the five Ms. But the truth is that the tantric system is a whole life pattern. This is an Advaitic way (nondual) of life. Most spiritual pickles of Hindu culture are different parts of a tantric system, whether it is study of Vedas-Puranas, or various activities related to them. In ancient times, those people who had enlightenment became too decent and found very difficult to live their life in normal life. The reason for this was that the common people were used to living life from a physical perspective, which could not accept the enlightened minds of the enlightened people. Therefore, they tried to live their life while copying the natural style means imitating nature, leaving the common, ignorant and worldly people away from their deep heart. That is because they found all activities to be knowledgeable in nature. By doing so, their spiritual level increased further, and they became lively liberated. Seeing the benefits of natural lifestyles, they became curious to show the benefits to others in their mind. Therefore, they started writing natural events in the living form. That well-known scriptural collection in written form became famous as Vedas-Puranas, that made life easier and spiritual for many people. The enlightened people who wrote those mythologies were called sages/ monks.

The same type of incident happened with tantrik Premyogi Vajra as well. Even in his childhood, he got transient enlightenment. After that, he was unable to live himself as a normal person. That is why he made a philosophy of physiology philosophy / body science philosophy, a lively philosophy similar to mythical philosophies of Vedas-Puranas, for his benefit. From his proximity to that self-made philosophy, with the achievement of Advaita and non-attachment, his all-round progress was ensured, and even unintentionally, there was a glimpse of KundaliniJagran. Inspired by the same benefits, he composed a book based on the same philosophy, which we can call modern mythology. In the Puranas, there is a description of the physical universe outside, but in the philosophy of body, the description of the subtle creation within our own body is described. According to ‘Yatpinde Tatbramhande’, there is no difference between the two worlds. Therefore, we can also call Premyogi Vajra as a modern sage. His book is like a Tantric book, similar to the Puranas, although there is also a few parts of Panchmakari Vidya / 5 Ms, like the Srimad Devibhaagavat Purana. Now it is the Panchamakari tantric system, it is only a small part of the vast Tantric system. After conducting a tantric system for a very long time, when the Tantric attitude of the common seeker becomes very mature, then only under the guidance of a qualified master, the five-M part of the system should be taken as a shelter, so that sufficient power can be obtained for KundaliniJagran. In the direction of its adoption earlier than the proper time or under the guidance of an inept guru, it can also bring losses to the place of profit. Together, the goal of Panchmakari Tantricas is not violence, but KundaliniJagran only. The best sources of power are only meat, sex and alcohol, which cannot be obtained without violence. Therefore, the least of their experiments have been given priority to achieve maximum spiritual benefits. An example of this is fish-intake. Because the fish can also be caught in the minimum quantity as needed, hence there is no redundant violence, so that violence-faults remain at a minimum level. Together, the fish is of cold nature. Therefore, it does not allow that anger in the Panchamakari to occur, which is the biggest obstacle in the spiritual path. Together, it produces the lowest Tamoguna than related other nonvegs, and its side effects on the body are even less than the other. In the same way, a single wife has been given priority so that excessive sexuality can be avoided, because that is also a particular kind of violence, especially if the right tantric rules are not adopted. Still, light mistakes are natural when learning. If the tantric-mates have to change, then in rare cases, only after a very long time and after getting special spiritual progress or after achieving enough spiritual progress. The evil eye on the woman is absolutely forbidden. Bad words and bad jokes about sexuality / 5 Ms are also taboo. The woman is to be respected as Goddess and Guru as far as possible. No one’s daughter or anyone’s wife is made to be a tantric companion, because they are seen as part of the emotional property of others. Most of the earliest known tantrics of ancient times are those who used to live life with the prevalent ordinary tantric practices, but later on for various reasons they also started consuming the Panchmakaras. One of the main reasons for these reasons was boycott from society or not adequate respect in society. Only then, some eminent tantric technicians have been around the Indo-Pak border of Punjab today, some have happened in today’s Pakistan. The second reason being the Punjab area is well prosperous, so there are people fond of making merry. In Punjab, the patronage of Guru-tradition has also been developed according to tantra. I myself have experienced everything directly from Punjab while living there in the direction of border areas with Pakistan. Tantric temples are also found abundantly on the same side. The access to the common Tantric system of the Hindus was reduced to those remote areas, so the people living there were not receiving the force from collective spirituality. Because of this resistance, they adopted the Panchamkari system correctly, and achieved quick success, because the spiritual force generated with the Panchamkari Shakti was more than the force of collective spirituality. Undoubtedly, they remained cut off from the common and spiritual society, yet they reached the peak of accomplishments, and continued to inspire others too. Naturally, in the same way, many Dalit and backward classes were also involved due to the above-mentioned reasons. The same example is also the Tibetan Buddhists who spend their lives alone in remote mountainous areas. The Panchamakari system seemed more suitable than the simple system prevailing in the plains, so it is still alive there. In Chinese Taoism / Tao religion, a sexual sage has been described as an ideal sage. In fact, since the separation of the Panchamakaras from the spiritual system, the decline of spirituality has started. Panchamakaras were described as the abode of evils. It was from this that the power of Panchamakars kept on raising the power of the evil people, and they continued to get stronger from it. After all, the whole earth became full with the so-called ignorant or evil people. On the other hand, spirituality became impaired without the necessary power, because the five Ms were kept away from it. Nowadays, the Panchamakari tantric system is spoken incorrectly, though the use of the Panchamakars is being used in the open and without any interference, not for spirituality, but for blind materiality. This proves that today the society of real tantrics is a strict requirement.

Something similar happened with Premyogi Vajra. He also adopted the spiritual techniques of common sense. However, his spiritual growth was slowing down. When he could not even get the hope of glimpse of KundaliniJagran even for a very long time, he became like a rebel against the common spiritual system. Common people started to insult him. His opposition was also increasing in the form of intake of Tantric Panchamakars. Both of this effect-reason was increasing each other. Disrespect with opposition and opposition with insult. This cycle continued until he got a glimpse of KundaliniJagran. He became content with his calmness, and his faith increased over the Panchamakari tantric system.

In fact, yoga (including common spiritual tantric methods) and tantra (Panchamkari Yoga) is the same, only difference in the level of magnitude of kundalini expression. Kundalini is more massive with Panchamakari Yoga than ordinary yoga. Therefore, an intelligent tantric person keeps on taking shelter of both as per time. There is nothing opposed in both. Tantric is all the spiritual people, but the Panchmakari Tantric is the prevalence of saying Tantric. We can also call him Panchmakari Sadhu, because there is no difference in principle between the ordinary Sadhu and Panchamakari sadhu, except the level of manifestation of Kundalini.

It seems that the maithun-makar / sexuality-M is only the most important M of all the 5 Ms, because it gives a wonderful force to the Kundalini. Other considerations are, therefore, only helpful in this main cause. I consider other Panchmakari religions as a transformational form of the panchmakari tantric system. The power that exists in those, and the majority of which attract the people, appears to be the power of 5Ms. However, opposing Satvik Hindu religion / system, anti-religion cannot attain spiritual benefits, but reverse harm only; it is a matter of course. This is because it is the principle that the five Ms are successful only if those live near the satvik and peaceful system / yoga / religion. This gives both methods both spiritual and physical benefits. Otherwise, those are only the reserves of sins. Therefore, in all the cooperative co-existence of all religions, it is a blessing for everyone. It is instructed to be a rational, selfless, humanistic, loving, satisfying, social and non-violent, for the Hindu philosophers / priests of charming personality / colorful (svarna) Hindu pundits, so that they have a divine pace and attraction along with the non duality and detachment. Only then other common or Panchamakari tantric people can fortify their physical image as Kundalini in their mind by making them a guru. Only then will the power of Panchamakars look after and raise up the Kundalini, otherwise those will clear the path of hell for them.

In many places, the consumption of panchamkaras has been specified for signatory purpose or formalities, so that no one should have the ego that I am very pure, and together with the best kind of non-duality. This principle in the spiritual system has been kept in mind that the result of karmic effect / Karma will continue to be met; hence, the use of panchamkaras is very modest and cautious. In many places, their use has been told so that people of violent or demon nature can be taught to eat, drink and enjoy the right way, and by putting the seeds of spiritualism within their enjoyment and luxury, they too could be turned towards spirituality. Slowly later on they themselves improve. However, anything, the amazing power of the Panchamakari tantric system cannot be denied. Siddha Tantric even says that without the Tantra especially sexual tantra, enlightenment can not be attained.

There are even more interesting facts about the tantric system. Tantrasamaj is also called a cosmopolitan / secret society. Many of them had joined the great Brahmin pundit too. For many of the Tantric, their own sister was their tantric master. Islam is also allowed to marry one’s own sister (although not born from the wife of father). This suggests that there exists somewhere in the origin of Islam the Panchamakari tantric system. The black stone that kabba have a custom to kiss, most people consider that as Shivling. Lord Shiva is the originator of the Tantra. In the case of hetero-vehicle tantra, it is also believed that the more tantric girlfriend is more ugly or unattractive; tactical it is, provided it is filled with tantric qualities. That is because there is no ego in her, so that she lets the mental kundalini image made from physical forms of others / gurus to grow easily on herself. The vishamvaahee / hetero-vehicle tantra means that the image of the mental kundalini is of physical form of somebody else (the master), whereas the Kundalinivahika / kundalini carrier is a tantric lover. Samavaahee / homo-vehicle tantra means that the image of the mental kundalini is also of the physical form of a tantric lover, and the Kundalini-carrier is the same. In samavaahee tantra, signatory / indirect sexual technique is more effective, but complete / clear / direct tantric sexual action in the vishamvaahee tantric system. Therefore, to create more and more sexual attraction, the samavaahee Tantrica (female tantric) should be attractive. I have seen two types of tantric mechanisms called samavaahee tantra and vishamvaahee tantra in the experimental details of Premyogi Vajra on this host website only, not at other places. Although there is a prevailing belief in tantra that women of the backward classes are the best for direct tantric sexual activities. This makes the statement of Premyogi Vajra clear. It is said that once a famous Tantric guru’s ugly and black tantrica girlfriend was ridiculed by his disciple. Angered by that, that tantric girlfriend cursed him for not achieving enlightenment during his lifetime. That’s how it happened.

Now we discuss the similarity between Tantra and Islam in detail. The beginning of the Tantra and Islam began almost simultaneously. In both, escaping away from world has been rejected, and the emphasis is on worldly tendencies. Both have given importance to women. There appears Tantric principle behind circumcision. Halala done by maulavee in islam also appears as a distorted form of tantric ritual of making joint consort by guru and disciple. Both sadhana paths have been created to provide salvation for all the general and purity-free people. Too many Muslims consider tantric nath-gurus as their own gurus too. Tantric gurus are also called Pir Baba. Just as the rightists are purists of Hindus, in the same way, the Sufi spiritual practice is a puritanical and moderate ideology in Islam. Most of the time, the right Dynasties of Hinduism and the left ones are said to be anti to each other. But based on the tantric experience of Premyogi Vajra, I have tried to prove in this article that the tantra and the right Dynasty are not anti to each other, but collaborative. Say ordinary tantric methods to be dakshinatantra / right tantra, and the Panchamakari system is called vamatantra / left tantra. In the same way, Hindu religion and Islam also proved to be collaborators of each other, because in the larger perspective, call the Hindu religion as right tantra and Islam as a left tantra. Therefore there is no place for animosity or bitterness between the two. Both religions are loathing each other and are thus unknowingly loving each other for the love resides inside hatred. But it does not work in full. Then why do not these two love each other directly, so that they can achieve each other’s strength in greater quantity and with greater positiveity. The difference in ideas is the nature of mankind, but it should not be used to cause ill effects on mutual love and cooperation. If they need to amend their ancient theology, then it should be done in the interest of humanity by sitting in the Synod / dharmsabha or Sarvadharma Sabha / all religions’ assembly. I want to make it clear here that here all the religions are talking about, not of any particular religion. All should consider making amendments in this way in words filled with inhumanity, fanaticism and hatred, which will also preserve the respect of all religions, and also be amended according to the era. For example, since when Hinduism began to oppose the practice of spiritual slaughter, coconut was sacrificed in a symbolic form. In the name of the Kundalini / Guru in Tantra, the Panchamakars are consumed, however in the name of Allah (God) in Islam, however both share similarities. Actually minding the invisible god always feeds up the kundalini, the secret only known by few ones. But in the hardcore Islam, among the Panchamakars, violence and lies towards human beings have also been included. In Hinduism and Christianity, it was also there comparatively at a lighter level, although in most cases it is said that it was reactionary. Now, what was the need of it in the olden days, it can not be said, but in today’s educated and humanistic era it is not relevant, and needs to be totally exterminated. However, for one’s great self-defense (to save lives) their use can be considered in rare cases. Real sacrifice is the sacrifice of the bad spirit. Dormant sense also works. Therefore, the firm expression of the related resolutions should contradict the inhumanity, only then the latent feeling (samskaras) is destroyed. All these facts are written based on the personal experience of the hero of this website and a tantric, Premyogi Vajra, this is not a mere empty theory. Premogi Vajra is an enlightened man, and his Kundalini is also awakened. He also got spiritual success only when he denied the inhumanity in stern words nearly about 25 years ago. It can be read on this link to the webpage-https://demystifyingkundalini.com/home-5/

An explanation seems to be justified here. If the hostile opponent of God is tortured with the remembrance of God in the name of jihad etc, then in return, when that torture-giver would get the fruit of punishment arising out of that karma of torturing other, then the God will be remembered by him in much intensity for the karma and that’s fruit are both interconnected.. Then, if he dies while suffering torture, then he would be liberated, because even in Sanatan Dharma, it is said that whatever at the time of death is remembered, the same form is got posthumously. However, if it does not happen, then the door of hell is open. It is a different matter that he will remember God in hell also. Therefore, very caution is required. Now, when someone accepts pain in the name of God, it is natural that in him there will be a remembrance of God, so that he too will be dear to God. Due to this the person causing suffering and the person who suffers, will be blessed with one and the same. However it is clear that it will be worse for the suffering-causer than the one who suffers pain, because if the former does not perform the Tantra properly, then the hell-sword which is born from evil deeds always hangs over him. Because it is a karmic principle that until one becomes free, then the effect of karma will remain unchanged. That is why there is ‘everything’ or ‘nothing’, there is no middle level in it. This is also the principle of the Tantra especially the extreme Tantra. This is one of the main reasons that Great Islam seems like an extremist Tantra. However, unfortunately due to fear of extreme tantra, many people started living away from the ordinary or soft Tantra, by which they became untouched by the benefits of a science-based spiritual method of Tantra. Premyogi vajra proved it through his experience. He enjoyed flesh with the remembrance of Kundalini. When he got his fruit as a sporadic injury, kundalini suddenly appeared much more intense in his mind, and he also remembered the interconnected karma of eating flesh. Now whoever says that a devotee of Allah should not be disturbed, it is according to Sanatan Dharma, which states that God does not forgive the one who does bad to devotee of God. Actually all religions are the same, there is a difference between understanding only. Likewise, once, Premyogi vajra had a slight rebellion along with Kundalini-dhyan / Advaita-life. In fact, that was not treason, but the act of light apparent sedition only, because there was non-violence with benefit of the whole world hidden inside. When he was punished, he tried his best to avoid punishment by divine inspiration, in which he also had unique success. When he got his light sentence, he felt that like a prize, and in his mind, Kundalini-meditation / advaita became even more prevalent, so that he got KundaliniJagran with some effort of yoga. Simultaneously further saying, as on the body joints in yoga, the sensation generated by the effects of breathing / twisting / motion etc. becomes enraged by the Kundalini, in the same way, during the time of devotional pain, the God sensed spontaneously over the sensation becomes very clear.

Only then I say that no one can ever hate anyone. If a person establishes contact with another person, then he loves him in every situation. If he does good to him, then by giving him a chance to move forward, and if he does bad, then by destroying his sins indirectly. Although the former way is more plausible and practical. If the use of the second method is to be compulsive, then only to the mild level or up to the moderate  level at maximum, never to the extreme level.

History is witness that Muslims living in Mecca were pagan (idol worshipper). It simply means that they were tantric or tantric-yogis. Because the people of those desert areas were already habitual of enjoying flesh, alcohol, sex, etc. (panchmakaras) since long. If idol worship becomes associated with these panchmakari habits, then it becomes Tantra automatically.

It may be that in ancient times there was an abundance of violence in the form of quarrels, wars and animals as the main source of diet etc., whose redress was possibly impossible. Therefore, those were made clean and liberating by wearing a cover of religion. Because pure Vedic actions in the atmosphere filled with violence and impurities could cause harm to the place of profit, therefore hatred towards them spread. Afterwards, the situation changed, but the rules made by them were made forever, because they were confirmed in a written form with loyalty and faith. At that time there was not even satisfactory facilities for traffic and communication. Therefore, the limited people in a small drought area / special geographic area understood that the whole world was like them. That is why they intended to spread their ideology to the whole world.

Similarly in ancient times, there was a practice of human sacrifice in rare cases in Tantra, which is no longer there. Both of them have given greater importance to body pleasure. Both have the postures of Hatha Yoga. Both were made to oppose the escapist and soft Hindutva. Although the Tantra remained much more moderate towards soft Hindutva than Islam, and remained completely dissolving in its midst.

Here, we want to make it clear that Islam does not have five makaras, but only four are there, more or less. Wine is prohibited in it. Although I consider the effect of meat equivalent to the effect of alcohol. Both are tamoguni (darkness producing) Together, also, want to make it clear that the five-makaras there seem not as clearly and well defined as in Tantra, but those appear as panchmakaras, because their influence is going to lead towards divine power just like the Panchmakaras of Tantra.

For further confirmation, you can visit this link- http://greatvashikaranspecialist.com/islamic-tantra

Allah is a Sanskrit word- Scribd

In the end, a brief information that can save you from religious frenzy, and teach true humanity-religion, can be found on this website (Whose hero is a Premyogi vjara), and a detailed information book can be found on the following link.

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed in unbiased way as the best, excellent and must read by everyone) made with steps as told above. If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

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Yoga versus Religious extremism- योग और धार्मिक कट्टरता

Yoga versus Religious extremism (हिंदी में पढ़ने के लिए कृपया पोस्ट को नीचे की तरफ ब्राऊज करें)

I think, science became developed spontaneously to save the world from the religious extremism. People died of religious cause were born as advanced people in their next birth. The feeling of insecurity remained in those as such due to the long lasting effect of great agony of their previous birth. So there mind was itself diverted towards advanced weaponry for their self protection. There appears enough declines in the massacres on the basis of religion after the science took hold of its foot. People became too busy in their own business/work and there was no extra time/stamina to think of these things too seriously enough. Advanced warfare technologies became developed to take control of the outnumbered and frenzied religious mobs/religion driven dreadful warriors by the handful of security forces. But unfortunately those warfare technologies were not controlled in a sensible way, that resulted in world wars, other regional conflicts, their pass over to the terrorists/dictators/religiously driven warriors and insurgents(external link/quora); thus defying the main and sole purpose of the warfare technologies to save the humanity. Religious extremism/radicalism/intolerance is the so good example of the dualism/non spiritualism. Only Yoga can save the world from the religious extremism/intolerance.

Actually, Yoga and the non dual lifestyle, both nourish kundalini in a similar way. Premyogi vajra experienced all of it practically. He is a mystic man whose mystic experiences including his concluding vision can be read at  Mystic Premyogi vajra and his divine love story can be read at  Love story of a Yogi . When he adopted a non dual attitude in his too busy physical as well as mental life style through the help of his home made tantric philosophy named SHAVID, he found his kundalini as too live and growing. Similarly, when he practiced kundalini yoga in his sedentary lifestyle, then also he found his kundalini even more live and growing. So it is self obvious that Yoga produces non duality through the medium of Kundalini for kundalini and non duality love to live together. We also know that people with Sedentary lifestyle or those lacking a lot of work to do are more violent/aggressive/agitated for their tons of energy have no way to go. They are more prone to be religiously intolerant/extremists/radicals. If they do Yoga, then they will become non dual and all the problems will be solved for the non duality is the best antidote for the religious poisoning that is the outgrowth of the duality filled lifestyle.

Why one wants to destroy other’s religion. Because he doesn’t like that. Why he doesn’t like that. Because he has duality in mind and considers his religion as better/different than that of others. Now the problem here is the double standard. He tries to destroy other’s religion in the name of God/non duality. God is nothing but non-duality, I think so. In this way, he performs the act that is full of duality while considering himself as non dual or man of god. If he is really non dual or a man of god, then what is the need of destroying anything for a non dual is happy with everything, just as Premyogi vajra became after his glimpse enlightenment. It means he is a liar/cheater, speaking/thinking something and doing the opposite thing. These types of people may become too dangerous for they may be too unpredictable. This clarifies the famous statement that the crimes covered with the religious blanket are too difficult to eradicate. Until this double standard is removed ant the religions are fully disconnected from the anti humanity, till then the organized and well planned crimes are difficult to prevent. So it is better to be a human than a religious one.

Gautama Buddha has well said even much  before the advent of the truly extremist religions, though near the silent  footprints of those through his intuitive guess of the future course that not accepting his wrong doings by one is much more dangerous than the wrong doings itself for the later one can improve himself but former one can never improve himself for he considers himself as if right.

योग और कट्टर धर्मिता

मुझे लगता है कि धार्मिक कट्टरपंथियों के धार्मिक उन्माद से दुनिया को बचाने के लिए विज्ञान स्वचालित रूप से विकसित हो गया था। धार्मिक कारणों से मरने वाले लोग अपने अगले जन्म में उन्नत लोगों के रूप में पैदा हुए थे। वह असुरक्षा की भावना उन लोगों में बनी रही, जो उनके पिछले जन्म की बड़ी पीड़ा के लंबे समय तक चलने वाले प्रभाव के कारण थी। तो फिर वहां प्रकृति द्वारा उनको अपने स्वयं के संरक्षण के लिए उन्नत हथियारों की तरफ मोड़ दिया गया था। विज्ञान के पैर पसारने के बाद धर्म के आधार पर नरसंहार में पर्याप्त गिरावट दिखाई देती है। क्योंकि लोग अपने व्यवसाय / काम में बहुत व्यस्त हो गए, और अमानवीय चीजों को बहुत गंभीरता से सोचने के लिए कोई अतिरिक्त समय / शक्ति नहीं थी। सुरक्षा बलों के द्वारा बड़े पैमाने पर और उन्मत्त धार्मिक मोब्स / हिंसक भीड़ के डरावने योद्धाओं को नियंत्रित करवाने के लिए उन्नत युद्ध तकनीकों का विकास किया गया। लेकिन दुर्भाग्यवश उन युद्ध तकनीकों को एक समझदार तरीके से नियंत्रित नहीं किया गया, जिसके परिणामस्वरूप विश्व युद्ध व अन्य क्षेत्रीय संघर्ष हुए; और आतंकवादियों / तानाशाहों / धार्मिक रूप से संचालित योद्धाओं और विद्रोहियों (बाहरी लिंक / क्वारा) तक उन तकनीकों को प्रसारित कर दिया गया। इस प्रकार मानवता को बचाने के लिए युद्ध-प्रौद्योगिकियों के मुख्य और एकमात्र उद्देश्य को काफी हद तक खारिज कर दिया गया। धार्मिक अतिवाद / कट्टरतावाद / असहिष्णुता आदि दुर्गुण द्वैतवाद / गैर-आध्यात्मिकता के इतने अच्छे उदाहरण हैं। केवल योग ही धार्मिक अतिवाद / असहिष्णुता से दुनिया को बचा सकता है।

असल में, योग और अद्वैतमयी जीवनशैली, दोनों कुंडलिनी को एक ही तरह से पोषित करते हैं। प्रेमयोगी वज्र ने इसे व्यावहारिक रूप से अनुभव किया। वह एक रहस्यवादी व्यक्ति है, जिसके रहस्यमय अनुभवों को उनके अंतिम दृष्टिकोण समेत इसी वेबसाईट के गृह-पृष्ठों पर पढ़ा जा सकता है, और उसकी दिव्य / योगिक प्रेम कहानी को “एक योगी की प्रेम कहानी / love story of a yogi” नामक वेबपृष्ठों पर पढ़ा जा सकता है। जब उन्होंने शविद / शरीरविज्ञान दर्शन नामक अपने घर के / स्वयंनिर्मित तांत्रिक दर्शन की मदद से अपने व्यस्त शारीरिक और मानसिक जीवन शैली में एक अद्वैतपूर्ण रवैया अपनाया, तो उन्होंने अपनी कुंडलिनी को भी जीवित और बढ़ते हुए पाया। इसी तरह, जब उन्होंने अपनी आसन्न / बैठकमयी जीवनशैली में कुंडलिनी योग का अभ्यास किया, तब भी उन्होंने अपनी कुंडलिनी को और भी जीवित और बढ़ते हुए पाया। तो यह स्वयं स्पष्ट है कि योग कुंडलिनी के माध्यम से अद्वैत को पैदा करता है, क्योंकि कुण्डलिनी और अद्वैत एक साथ रहने के लिए ललायित रहते हैं / एकसाथ रहते हैं। हम यह भी जानते हैं कि सेडेंटरी / बैठकपूर्ण लाइफस्टाइल / जीवनशैली वाले लोग या वे जो अनथक रूप से काम को प्राप्त करने में असमर्थ रहते हैं, उनके पास अपनी प्रचंड व संचित ऊर्जा को हिंसक / आक्रामक / उत्तेजित / अमानवीय  रास्तों पर ले जाने के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं बचता है। वे धार्मिक असहिष्णु / चरमपंथी / कट्टरपंथी बनने के लिए अधिक बाध्य हो सकते हैं। यदि वे योग करते हैं, तो वे स्वयं ही अद्वैतमयी बन जाएंगे, और उस अद्वैत के द्वारा सभी समस्याओं का हल कर दिया जाएगा, क्योंकि अद्वैत ही उस धार्मिक विषाक्तता के लिए सबसे अच्छा प्रतिरक्षा-उपाय है, जो द्वैत से भरी जीवनशैली का विस्तार ही तो है।

क्यों कोई दूसरे के धर्म को नष्ट करना चाहता है? क्योंकि वह उसे पसंद नहीं करता है। वह उसे पसंद क्यों नहीं करता है? क्योंकि उसके मन में द्वैत है, और इसलिए अपने धर्म को दूसरों के मुकाबले बेहतर / अलग मानता है। अब समस्या यहाँ डबल स्टेंडर्ड / दोगलेपन की है। वह भगवान के / अद्वैत के नाम पर दूसरों के धर्म को नष्ट करने की कोशिश करता है। भगवान कुछ भी नहीं, बल्कि अद्वैत ही तो है, मुझे तो ऐसा लगता है। इस तरह, वह उस कार्य को निष्पादित करता है, जो द्वैत से भरा होता है, जबकि वह खुद को अद्वैतशाली या ईश्वर के बन्दे के रूप में मानता है। यदि वह वास्तव में अद्वैत या ईश्वर का आदमी है, तो कुछ भी नष्ट करने की क्या ज़रूरत है, क्योंकि अद्वैतवान हर स्वाभाविक स्थिति में व हर स्वाभाविक चीज से प्रसन्न रहता है, जैसे कि प्रेमयोगी वज्र अपने झलकमयी आत्मज्ञान के बाद रहता था। इसका मतलब है कि वह परधर्मद्वेषी झूठा / धोखाधड़ी-पूर्ण है, बोल / सोच कुछ और रहा है, और कर उसके बिलकुल विपरीत रहा है। इस प्रकार के लोग बहुत खतरनाक हो सकते हैं, क्योंकि वे बहुत अप्रत्याशित हो सकते हैं। यह इस प्रसिद्ध बयान को स्पष्ट करता है, कि धार्मिक कंबल से ढके अपराधों को खत्म करना बहुत मुश्किल होता है। जब तक इस डबल मानक को हटा नहीं दिया जाता है, और जब तक धर्म को अमानवता से पूरी तरह से डिस्कनेक्ट / पृथक नहीं कर दिया जाता है, तब तक संगठितसमूहों द्वारा किए गए और अच्छी तरह से अंजाम में लाए गए योजनाबद्ध अपराधों को रोकने में मुश्किल होगी। इससे निष्कर्ष निकालता है कि एक सच्चा इंसान एक धार्मिक व्यक्ति से बेहतर होता है।

गौतम बुद्ध ने वास्तव में चरमपंथी धर्मों के आगमन से पहले ही उनके बारे में बहुत कुछ कहा है, हालांकि संभवतः उनके चुपचाप आते हुए पैरों के निशान को वे शुरू में ही भांप गए थे। उन्होंने कहा है कि जो गलत लोग अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करते हैं, उनके लिए गलत कर्मों की तुलना में वह नकारने का भाव कहीं अधिक खतरनाक है, क्योंकि गलती करने वाला बाद में खुद को सुधार भी सकता है, लेकिन की हुई गलती को नकारने वाला व्यक्ति खुद को कभी भी सुधार नहीं सकता, क्योंकि वह खुद को सही मानते रहने की भूल करता ही रहता है।