कुंडलिनी ध्यानसाधना और जागरूकता ध्यान एकदूसरे से भिन्न नहीं हैं

मित्राें, पिछली पोस्ट में सच्चे व समर्पित प्यार से उपजे चमत्कार को हमने देखा। अगर इसका उल्टा हो जाए, तो क्या होगा, आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं। लवजिहाद में यही उल्टा खेल चल रहा है। ऐसे ही भयानक संक्रामक रोगों के कारण सदियों से स्त्री और पुरुष के बीच अविश्वास की खाई बनी हुई है। यह आज से नहीं, बल्कि सदियों से न्यूनाधिक रूप से, इस नाम से या उस नाम से चल रहा है। आज तो यह ढंग से दुनिया के सामने आ रहा है। विश्वास बनाने में वर्षों लग जाते हैं, पर तोड़ने में कुछ ही पल। बल से शरीर को तो जीता जा सकता है, पर दिल को तो प्रेम और विश्वास से ही जीता जा सकता है। इसी पर बनी हुई लाजवाब फिल्म “केरला स्टोरी” आजकल अन्तर्राष्ट्रीय चर्चा व आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। पर यह इस ब्लॉग का विषय नहीं है, यह तो ऐसे ही पोस्ट के संबंध में बात चली थी, तो यह वर्तमानकालिक मुद्दा खुद ही जुड़ गया।

जब किसी मूर्ति आदि पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, तब भटकते विचारों की शक्ति वहाँ केंद्रित हो जाती है। विचारों की शक्ति को प्रकट होने का एक ही रास्ता बचता है, ध्यानचित्र के रूप में प्रकट होने का। योगी मूर्ति की बजाय अपने शरीर के चक्रोँ पर ध्यान केंद्रित करते है। उससे भी वैसा ही होता है। साथ में शरीर भी स्वस्थ रहता है। जो इनको नहीं मानते, वे आसमान पर या उसमें रहने वाले किसी अदृश्य भगवान पर ध्यान केंद्रित करते हैं। उससे भी वैसा ही होता है। मतलब साफ है कि कोई भी काफ़िर नहीं है।
साथ में, नदी, पर्वत, वृक्ष पर ध्यान लगाने से अर्थात उनकी पूजा करने से वे सभी भी शरीर के चक्रों की तरह स्वस्थ रहते हैं, क्योंकि फिर चक्रों की तरह ही आदमी की प्राणशक्ति उनको भी लगती है। पर्यावरण की सुरक्षा इसी मूलमंत्र में छुपी हुई है।
अवयरनेस मेडिटेशन अर्थात जागरूकता ध्यान पर भी यही सिद्धांत लागू होता है। कहते हैं कि एवयरनेस मेडिटेशन से बहुत लाभ मिलता है। मुझे हाल ही में एक नए मित्र से मिलने का मौका मिला। वे होम्योपैथिक मेडिसिन की अच्छी प्रेक्टिस भी करते हैं। वैसे भी होम्योपेथी भारतीय ऋषि परम्परा से बहुत मेल खाती है। इसी सिलसिले में वहाँ गया था तो थोड़ा परिचय हो गया। उनके साहित्य व अध्यात्म के शौक को जानकर मैं भी अध्यात्म की बातें करने लग गया। कहते हैं कि जौहरी को ही हीरा दिखाना चाहिए, आम आदमी तो उसे पत्थर समझकर नाले में फैक देगा। मैं उनकी इस बात से बहुत प्रभावित हुआ कि हर समय अवेयरनेस के साथ रहना चाहिए। ओशो महाराज भी बिल्कुल यही कहते हैं कि हरेक काम अवेयरनेस के साथ करो। वे खुद भी ओशो के अनुयायी लगे मुझे। सतसंग से लाभ तो मिलता ही है, जैसा मुझे मिला। मैं इसके मनोवैज्ञानिक सिद्धांत की तह तक पहुंच सका। मुझे लगता है कि जब हम वर्तमान के रियल टाइम में शरीर को महसूस हो रही किसी भी संवेदना पर ध्यान दे रहे होते हैं, तब मनोमय कोष, अन्नमय कोष और प्राणमय कोष आपस में मिश्रित हो रहे होते हैं, जैसा मैंने पिछली कुछ पोस्टों में विस्तृत रूप से वर्णन किया था। वर्तमान की संवेदना की तरफ ध्यान देने से शरीर और सांस पर भी खुद ही ध्यान चला जाता है, क्योंकि तीनों आपस में जुड़े हुए हैं। वैसे तो बीती हुई और आने वाली घटनाओं के ख्याल भी मानसिक संवेदना के ही अंतर्गत आते हैं, पर उनके साथ शरीर और सांस कम जुड़ते हैं, क्योंकि न भूतकाल में यह वर्तमान काल में स्थित भौतिक शरीर था, और न ही भविष्यकाल में होगा, यह तो केवल वर्तमान काल में ही स्थित है। इसीलिए कहते हैं कि वर्तमान में ही स्थित रहना चाहिए। मुझे लगता है कि जब किसी के द्वारा वर्तमान स्थिति के साथ जुड़ी भौतिक संवेदनाओं का ध्यान किया जाता है, तो इससे यह विश्वास पक्का होता रहता है कि वे उसके शरीर से ही जुड़ी हैं, क्योंकि वे शरीर और सांसों की बदलती स्थिति के साथ बदलती रहती हैं। इससे यह विश्वास भी खुद ही हो जाता है कि उसकी सभी मानसिक संवेदनाएं जैसे कि विभिन्न भावनाएं और विचार भी उसके शरीर के ही भाग हैं, क्योंकि संवेदना चाहे शारीरिक हो या मानसिक, वर्तमानकालिक हो या भूतकालिक या भविष्यकालिक, उन सभी का गुणस्वभाव व अनुभव बिल्कुल एकसमान ही होता है। इससे वे शांत हो जाती हैं, क्योंकि अपने आप से किसीको आसक्तिभाव, लगाव या प्रेम नहीं होता। क्योंकि स्वयं तो स्वयं से हमेशा के लिए जुड़ा हुआ है, उसे कोई अलग नहीं कर सकता, क्योंकि वह अपना ही रूप है। आसक्ति केवल दूसरे से या अलग व्यक्ति या पदार्थ से होती है मतलब तब काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे मानसिक दोष शांत होकर जीवन को अपने लिए और औरों के लिए सुखमय बना देते हैं। इसी शान्त माहौल में ही आध्यात्मिक प्रगति भी होती है, भौतिक प्रगति तो होती ही है। इसका प्रमाण है ऐसी अवस्था में कुंडलिनी ध्यानचित्र का आदमी के मन में सुस्पष्ट अभिव्यक्त होना। साथ में, कुंडलिनी ध्यानसाधना से मस्तिष्क इतना ज्यादा चुस्त और संवेदनशील हो जाता है कि वह हरेक भौतिक संवेदना को गहराई से महसूस करने लगता है, जिससे खुद ही जागरूकता साधना की आदत पड़ जाती है। साथ में आदमी को ऐसा भी लगता है कि जब सभी संवेदनाएं एकजैसी ही हैं, तब वह किसी संवेदना पर ज्यादा तो किसी पर कम आसक्त क्यों है। उसे तो सबके प्रति बराबर रहना चाहिए। इसलिए वह निष्पक्ष व निरपेक्ष होकर शान्त हो जाता है। या ऐसा समझ लो कि आसक्ति वाली संवेदनाओं से सामान्य भौतिक संवेदनाओं की तरफ ध्यान डाईवर्ट हो जाता है।

कुण्डलिनी ध्यान योग में विपासना अर्थात साक्षीभाव साधना का अत्यधिक महत्त्व है

विपासना साधना के लिए अति उपयोगी प्राणायाम कपालभाति

पिछली से पिछली पोस्ट में ही मैं विपासना के बारे में भी बता रहा था। मेरे अनुभव के अनुसार कपालभाति प्राणायाम भी विपासना में बहुत मदद करता है। सिर्फ सांस को बाहर ही धकेलना है। अंदर जैसी जाती हो, जाने दो। अपने को थकान न होने दो। तनावरहित बने रहो। जो रंगबिरंगे विचार उमड़ रहे हों, उन्हें उमड़ने दो। जो पुरानी यादें आ रही हों, उन्हें आने दो। वे खुद शून्य आत्मा में विलीन होती जाएंगी। दरअसल ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि मस्तिष्क में बिना किसी भौतिक वस्तुओं की सहायता के उनके प्रकट होने से आदमी को यह पता चल जाता है कि वे असत्य व आकाश की तरह सूक्ष्म हैं, पर भौतिक संसार के सम्पर्क में आने से भ्रम से सत्य व स्थूल जान पड़ते हैं। विपासना का सिद्धांत भी यही है। इसीलिए शास्त्रों में बारबार यही कहा गया है कि संसार असत्य है। सम्भवतः यह विपासना के लिए लिखा गया है, क्योंकि जब विपासना से संसार असत्य जान पड़ता है, तब संसार को असत्य जान लेने से विपासना खुद ही हो जाएगी। कपालभाति प्राणायाम से इसलिए विपश्यना ज्यादा होती है, क्योंकि व्यस्त दैनिक व्यवहार में भी हम ऐसे ही तेजी से और झटकों से सांस लेते हैं। जैसे ही कोई विचार आता है, ऐसा लगता है कि सांस के लिए भूख बढ़ गई, और अंदर जाने वाली सांस भी गहरी, मीठी, स्वाद व तृप्त करने वाली लगती है। अगर विचार को बलपूर्वक न दबाओ, तो इससे आगे से आगे जुड़ने से विचारों की श्रृंखला बन जाती है, और लगभग सारा ही मन घड़े से बाहर आ जाता है, जिसे पिछली पोस्ट की कथा में कहा गया है कि एक घड़े से सैंकड़ो या हजारों पुत्रों ने जन्म लिया। जो विचार-चित्र पहले से ही हल्का जमा हो, वह कम उभरता है। मतलब साफ है कि आसक्ति भरे व्यवहार से ही मन में कचरा जमा होता है। उसको विपासना से बारबार बाहर निकालना मतलब कचरा साफ करना। जैसे कढ़ाई में पक्के जमे मैल को बारबार धोकर बाहर निकलना पड़ता है, वैसे ही आसक्ति वाले विचार को बारबार निकालना पड़ता है।

आदमी को घूमककड़ की तरह रहना चाहिए, क्योंकि विपश्यना साधना नए-नए स्थानों व व्यक्तियों के सम्पर्क में आने से मजबूत होती है

पिछली पोस्ट में कहे रंगारंग कार्यक्रम को देखते हुए मेरे मन में नए-पुराने विचार साक्षीभाव व आनंद के साथ उमड़ रहे थे, और आत्मा में विलीन हो रहे थे। मतलब विपश्यना साधना खुद ही हो रही थी। दरअसल वह क्षेत्र मेरे लिए खुद ही विपश्यना क्षेत्र बना था। ऐसा होता है जब किसी स्थान के साथ एक पुराना व अज्ञात सा संबंध जुड़ता है, जो अपने गृहक्षेत्र से मिलता जुलता तो है, पर वहाँ के लोग नए आदमी को अजनबी व बाहरी सा समझ कर उसके प्रति तटस्थ से रहते हैं। विरोध तो नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें भी नए व्यक्ति से अपनापन सा लगता है। इससे आदमी की शक्ति खुद ही दुappearing व रिश्तों के फालतू झमेलों से बची रहकर विपश्यना में खर्च होती रहती है। हमारे गाँव के जो देवता हैं, वे हमारे पुराने राजा हुआ करते थे। वे एकप्रकार से हमारे पूर्वज भी थे। उनके साथ हमारे पूर्वज पुरानी रियासत से नई रियासत को आए थे। नई रियासत में उन्होंने अपना घर उस जगह पर बनवाया, जहाँ से उन्हें अपनी पुरानी रियासत वाली पहाड़ी सीधे और हर समय नजर आती थी। अपने घर के ज्यादातर द्वार और खिड़कियां भी उन्होंने उसी पहाड़ी की दिशा में बनवाए थे। उनकी मृत्यु के बाद जब वहाँ उनका मंदिर बनवाया गया, तब भी उसका द्वार उसी दिशा में रखा गया। इसी तरह मेरी दादी माँ बताया करती थीं कि एक वैरागी साधु बाबा उनके गाँव में रहते थे, जो उन्हें बेटी की तरह प्यार देते थे। दादी का गाँव एक ऊँचे पहाड़ के शिखर के पास ही था। वह पहाड़ बहुत ऊँचा था, और आसपास के पहाड़ उसके सामने कहीं नहीं ठहरते थे। उस पहाड़ के शिखर पर आने का उनका मुख्य मकसद था, नीचाई पर बसे उनके अपने पुराने गांव का लगातार नजर में बने रहना, ताकि अच्छे से साधना हो पाती, और पुराने घर की याद विपासना के साथ बनी रहती अर्थात वह याद उनकी साधना में विघ्न न डालकर लाभ ही पहुंचाती। वास्तव में, दुर्भाग्य से, धीरे-धीरे उनके परिवार के सभी सदस्य विभिन्न आपदाओं से कालकवलित हो गए थे। इस वजह से ढेर सारी दौलत भी मौत की भेंट चढ़ गई थी। इससे वे संसार के मोह से बिल्कुल विरक्त हो गए थे। व्यक्तिगत संबंध के मामले में भी यही आध्यात्मिक मनोविज्ञान काम करता है। किसी व्यक्ति के प्रति आकर्षण हो पर यदि वह बाहरी व विदेशी समझ कर प्यार करने वाले को ठुकरा दे तो विपश्यना खुद ही होती रहती है। मुझे बताते हुए कोई संकोच नहीं कि इस दूसरे किस्म की व्यक्तिगत संबंध की विपशयन से मेरी नींद में जागृति में बहुत बड़ा हाथ था।

हिंदु शास्त्रीय कथाएं एकसाथ दो अर्थ लिए होती हैं, भौतिक रूप में प्रकृति संरक्षक व आध्यात्मिक रूप में मनोवैज्ञानिक

हम इस पर भी बात रहे रहे थे कि इन कथाओं को पढ़ने का पूरा मजा तब आता है जब इनके पहेली जैसे रूप के साथ असली मनोवैज्ञानिक अर्थ भी समझ में आता है। कोई यह कह सकता है कि इन कथाओं से अंधविश्वास बढ़ता है। पर इनको मानने वालों ने इनके असली या भौतिक रूप पर ज्यादा अमल नहीं किया, इन पर अटूट श्रद्धा करके इनकी दिव्यता और पारलौकिकता को बनाए रखा। इनको पवित्र व पारलौकिक कथाओं की तरह समझा, लौकिक और भौतिक नहीं। वैसे ये कथाएं ज्यादा अमानवीय भी नहीं हैं। गंगा नदी को पूजने को ही कहा है, उसे गंदा करने को तो नहीं। इससे प्रकृति के प्रति प्रेम जागता है। वैसे भी नाड़ी विशेषकर सुषुम्ना नाड़ी नदी की तरह बहती है। नदी के ध्यान से संभव है कि नाड़ी की तरफ खुद ही ध्यान चला जाए। मतलब जो भी कथाएं हैं, दोनों प्रकार से फायदा ही करती हैं, भौतिक रूप से प्रकृति का संरक्षण करती हैं, और आध्यात्मिक रूपक के रूप में आध्यात्मिक उत्थान करती हैं। कुछ गिनेचुने मामले में मानवता के अहित में प्रतीत भी हो सकती हैं, जैसे कि मनु स्मृति के कुछ वाक्यों पर आरोप लगाया जाता है। पर आरोप के जवाब में ज्यादातर उनका आध्यात्मिक या पारलौकिक अर्थ ही लगाया जाता है, भौतिक नहीं। हमने तो अपने जीवन में उनके अनुसार चलते हुए कोई देखा नहीं, सिर्फ उन पर आरोप ही लगते देखे हैं। बहुत सम्भव है कि वे वाक्य मूल ग्रंथ में नहीं थे और बाद में उनको साजिश के तहत जोड़ दिया गया हो। इसके विपरीत कुछ अन्य धर्मों में मुझे अधिकांश लोग वैसी रहस्यात्मक कथाओं पर हूबहू चलते दिखाई देते हैं, उनके विकृत जैसे भौतिक रूप में। यहाँ तक कि वे उन कथाओं के आध्यात्मिक विश्लेषण व रहस्योद्घाटन की इजाजत भी नहीं देते, और जबरदस्ती ऐसा करने वालों को जरा भी नहीं बख्शते। जेहाद, काफीरों की अकारण हत्या, जबरन धर्मान्तरण जैसे उदाहरण आज सबके सामने हैं। हमने एक पोस्ट लिखी थी, जिसमें होली स्पिरिट व कुंडलिनी के बीच में समानता को प्रदर्शित किया गया था। दो-चार लोग किसी भी वैज्ञानिक तर्क को नकारते हुए उस पोस्ट को नकारने लगे। एक जेंटलमेन तो उसे शैतान व डेमन या शत्रु की कारगुजारी बताने लगे। वे इस बात को नहीं समझ रहे थे कि वह विभिन्न धर्मों के बीच मैत्री व समानता पैदा करने का प्रयास था। वे इस वैबसाईट में दर्शाए तंत्र को ओकल्ट या भूतिया प्रेक्टिस समझ रहे थे। हमें किसी भी विषय में पूर्वाग्रह न रखकर ओपन माइंडड होना चाहिए। हिंदु दर्शन में अन्य की अपेक्षा विज्ञानवादी सोच व तर्कशीलता को ज्यादा महत्त्व दिया गया है, और जबरदस्ती अंधविश्वास को बनाए रखने को कम, जहाँ तक मैं समझता हूँ। वैसे कुछ न कुछ कमियाँ तो हर जगह ही पाई जाती हैं। साथ में वे महोदय मुझे कहते हैं कि मैं किसी धर्म वगैरह से अपनी पहचान बना कर रखता हूँ। मैं जब हिंदु हूँ तो अपने हिंदु धर्म से पहचान बना कर क्यों नहीं रखूंगा। सभी धर्मों में अपनी विशिष्टताएं हैं। विभिन्न धर्मों से दुनिया विविध रंगों से भरी व सुंदर लगती है, हालांकि उनमें अवश्यँभावी रूप से अनुस्यूत मानव धर्म सबके लिए एकसमान ही है। पर फिर भी मैं अपने स्वतंत्र विचार रखता हूँ, और जो मुझे गलत या अंधविश्वास लगता है, उसे मैं नहीं भी मानता। मेरी लगभग हरेक पोस्ट में किसी न किसी हिंदु मान्यता का वैज्ञानिक व मानवीय स्पष्टीकरण होता है। मेरे धर्म की उदार और सर्वधर्मसमभाव वाली सोच का भला इससे बड़ा सीधा प्रमाण क्या होगा। एकबार हिंदी भाषा पढ़ाने वाले एक विद्वान व दार्शनिक अध्यापक से व्हट्सएप्प पर मेरी मुलाक़ात हुई थी। मैंने उन्हें बताया कि कैसे पाश्चात्य लोग योग में यहाँ के स्थानीय हिंदु लोगों से ज्यादा रुचि ले रहे हैं। तो उन्होंने लिखा कि उनमें संस्कार नहीं होते। संस्कार मतलब पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परम्परा। अब मुझे उनकी वह बात समझ आ रही है कि कैसे संस्कारों की कमी से आदमी एकदम से उस परम्परा के खिलाफ जा सकता है, जिसको वह जीजान से मान रहा हो। संस्कार आदमी को परम्परा से जोड़ कर रखते हैं।

ढाई आखर प्रेम का पढ़ ले जो कोई वो ही ज्ञानी

बोल नहीं सकता कुछ भी मैं
घुटन ये कब तुमने जानी।
चला है पदचिन्हों पर मेरे
मौनी हो या फिर ध्यानी।

मरने की खातिर जीता मैं
जीने को मरते हो तुम।
खोने का डर तुमको होगा
फक्कड़ का क्या होगा गुम।
हर पल एकनजर से रहता
लाभ हो चाहे या हानि।
बोल नहीं सकता ----

मेरे कंधों पर ही तुमने
किस्मत अपनी चमकाई।
मेरे ही दमखम पर तुमने
धनदौलत इतनी पाई।
निर्विरोध हर चीज स्वीकारी
फूटी-कौड़ी जो पाई।
खाया सब मिल-बाँट के अक्सर
बन इक-दूजे संग भाई।
कर्म-गुलामी की पूरी, ले
कुछ तिनके दाना-पानी।
बोल नहीं---

तेज दिमाग नहीं तो क्या गम
तेज शरीर जो पाया है।
सूंघे जो परलोक तलक वो
कितनी अद्भुत काया है।
मेरा इसमें कुछ नहीं यह
सब ईश्वर की माया है।
हर-इक जाएगा दुनिया से
जो दुनिया में आया है।
लगती तो यह छोटी सी पर
बात बड़ी और सैयानी।
बोल नहीं---

हूँ मैं पूर्वज तुम सबका पर
मेरा कहा कहाँ माना।
क़ुदरत छेड़ के क्या होता है
तुमने ये क्यों न जाना।
याद करोगे तुम मुझको जब
याद में आएगी नानी।
बोल--

मरा हमेशा खामोशी संग
तुम संग भीड़ बहुत भारी।
तोड़ा हर बंधन झटक कर
रिश्ता हो या फिर यारी।
मुक्ति के पीछे भागे तुम
यथा-स्थिति मुझे प्यारी।
वफा की रोटी खाई हरदम
तुमको भाए गद्दारी।
कर-कर इतना पाप है क्योंकर
जरा नहीं तुमको ग्लानि।
बोल नहीं---

लावारिस बन बीच सड़क पर
तन मेरा ठिठुरता है।
खुदगर्जी इन्सान की यारो
कैसी मन-निष्ठुरता है।
कपट भरे विवहार में देखो
न इसका कोई सानी।
बोल नहीं---

रोटी और मकान बहुत है
कपड़े की ख्वाइश नहीं।
शर्म बसी है खून में अपने
अंगों की नुमाइश नहीं।
बेहूदे पहनावे में तुम
बनते हो बड़े मानी।
बोल नहीं----

नशे का कारोबार करूँ न
खेल-मिलावट न खेलूँ।
सारे पुट्ठे काम करो तुम
मार-कूट पर मैं झेलूँ।
क्या जवाब दोगे तुम ऊपर
रे पापी रे अभिमानी।
बोल नहीं----

पूरा अपना जोर लगाता
जितना मेरे अंदर हो।
मेरा जलवा चहुँ-दिशा में
नभ हो या समंदर हो।
बरबादी तक ले जाने की
क्यों तुमने खुद को ठानी।
बोल नहीं सकता--

खून से सींचा रे तुझको फिर
भूल गया कैसे मुझको।
रब मन्दर मेरे अंदर फिर
भी न माने क्यों मुझको।
लीला मेरी तुझे लगे इक
हरकत उल्टी बचकानी।
बोल नहीं---

कुदरत ने हम दोनों को जब
अच्छा पाठ पढ़ाया था।
भाई बड़ा बना करके तब
आगे तुझे बढ़ाया था।
राह मेरी तू क्या सुलझाए
खुद की जिससे अनजानी।
बोल नहीं--

लक्ष्य नहीं बेशक तेरा पर
मुंहबोला वह है मेरा।
मकड़जाल बुन बैठा तू जो
उसने ही तुझको घेरा।
याद दिलाऊँ लक्ष्य तुम्हारा
बिन मस्तक अरु बिन बानी।
बोल नहीं---

प्यार की भाषा ही समझूँ मैं
प्यार की भाषा समझाऊँ।
प्यार ही जन्नत प्यार ही ईश्वर
प्यार पे बलिहारी जाऊँ।
ढाई आखर प्रेम का पढ़ ले
जो कोई वो ही ज्ञानी।
बोल नहीं--
@bhishmsharma95

कुंडलिनी के लिए वामपंथी तंत्र के यौगिक पंचमकारों की संभावित अहमियत, जिनसे प्रकृति के तीनों गुण संतुलित रहते हैं

मित्रो, पिछले हफ्ते हमने पंचमकार और उनसे उत्पन्न तमोगुण के बारे में बताया था। पंचमकारों का वर्णन हमने पुरानी पोस्टों में भी किया है। दरअसल पंचमकार वामपंथी तांत्रिक के प्रमुख हथियार हैं, कुंडलिनी का शिकार करने के लिए। ये पांच चीजें हैं, जिनके नाम अक्षर म से शुरु होते हैं। ये हैं, मैथुन, माँस, मद्य, मत्स्य एवं मुद्रा। पांचवा पंचमकार, मुद्रा वास्तव में कुंडलिनी योग ही है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि पंचमकार को लेकर इन भौतिक चीजों या भावनाओं के सांसारिक रूपों के साथ भ्रमित नहीं होना चाहिए। ये केवल तभी पंचमकार बनती हैं, जब ये पूरी तरह से एक योग्य गुरु के मार्गदर्शन में आध्यात्मिक भावना व साधना के साथ होती हैं, और अधिकतम आध्यात्मिक लाभ के लिए न्यूनतम राशि में उपयोग की जाती हैं। ऐसा नहीं करने पर, पंचमकार हानिकारक भी हो सकते हैं। पंचमकार शुरू में द्वंद्व या द्वैत पैदा करते हैं। फिर इसे विभिन्न ध्यान तकनीकों और वेदों-पुराणों या शरीरविज्ञान दर्शन जैसे अद्वैतमयी दर्शन-सिद्धांतों के साथ अद्वैत में परिवर्तित किया जा सकता है। दरअसल, अद्वैत का अपना अलग अस्तित्व नहीं है। यह केवल द्वैत का निषेध है। यह द्वैत है, जिसका अपना अस्तित्व है। इसलिए, हम सांसारिक भागीदारी के माध्यम से केवल द्वैत को ही पैदा कर सकते हैं। हम अद्वैत का उत्पादन सीधे नहीं कर सकते हैं, लेकिन केवल द्वैत के निषेध के माध्यम से ही कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, द्वैत सबसे पहले प्राप्त होने वाली आधार वस्तु है। यदि हमारे पास द्वैत नहीं है, तो हम नकारात्मक शब्द ‘अ’ को उस पर कैसे लागू करेंगे। अद्वैत के संबंध में व्यापक गलतफहमी दिखाई देती है। हम द्वैत की पूर्ण उपेक्षा करते हुए अद्वैतमयी नहीं बने रह सकते हैं। ये दोनों भावनाएँ साथ-साथ चलती हैं। हम इस पोस्ट में किसी चीज या जीवन के किसी  विशेष तौर-तरीके की वकालत नहीं कर रहे हैं। हम केवल वैज्ञानिक सत्य को पाठकों के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं।

दुनिया की नजरों में पंचमकारों को पापपूर्ण माना जाता है

इसका एक कारण यही है, जो पिछली पोस्ट में बताया था। ये तमोगुण पैदा करते हैं। दूसरा कारण यह है कि इसमें हिंसा कर्म छुपा होता है। कर्म का फल तो मिलता ही है। पर वह कर्म के हिसाब से ही मिलता है, मनमर्जी से नहीँ। शास्त्रीय मिथक कथाओं के अनुसार अधिकांश लोग समझ लेते हैं कि उससे मृत्युदंड मिल जाएगा अथवा भयानक नरकों में घोर यातनाएं झेलनी पड़ेंगी, क्योंकि सभी पाप या हिंसाएं बराबर हैं। पर ऐसा नहीं होता। ये सिर्फ आध्यात्मिक उक्ति ही है, भौतिक या व्यावहारिक नहीं। छुटपुट पापकर्म के छुटपुट फल मिलते रहते हैं, जो आम प्रगतिशील या मेहनतकश जनजीवन में वैसे भी देखे जाते हैं, जैसे बीमार होना, पैर फिसलना, मोच आना, हादसे की संभावना बढ़ जाना आदि। पर ज्यादातर मामलों में बचाव हो जाता है। पंचमकारों से मिली शक्ति से आदमी दुनियादारी के कामों में ज्यादा निमग्न रहने लगता है। इससे स्वाभाविक रूप से जो छुटपुट बीमारियाँ, शारीरिक कष्ट व मानसिक कष्ट पैदा होते हैं, वे ही उनके पाप के फल के रूप में होते हैं। उनसे पंचमकारों का पाप नष्ट होता रहता है, और दुनिया के काम धंधे भी तरक्की करते रहते हैं। इसलिए ऊर्जा का अधिक से अधिक सदुपयोग इस तरह से करना चाहिए कि उसके लिए कम से कम पाप करना पड़े। यही कर्म प्रबंधन है। यही योग है।

आजकल पंचमकारों के बिना कुंडलिनी योग करना मुश्किल प्रतीत होता है

मैं एक ब्लॉग में एक युवक के योग अनुभव के बारे में पढ़ रहा था। वह उसके लिए शुद्ध शाकाहारी बन गया था। एक बार संभवतः वह ऐमजॉन के जंगल में अपने किसी जाने पहचाने व्यक्ति के पास रहने लगता है। वहाँ वह मछली से परहेज करके चावल की ढेरी में एक गड्ढा सा बनाकर उसमें डालने के लिए दाल की मांग करता है। उसके परिचित की हंसी रुकने का नाम ही नहीं लेती। इससे शर्मिंदा होकर वह नॉनवेज योगी बन जाता है। इसका मतलब है कि जैसा देश, वैसा भेष। संतुलित आहार लेना योगी के लिए बहुत जरूरी है, क्योंकि योग के लिए ऊर्जा की सख्त जरूरत होती है। योग का दूसरा नाम संतुलन या संतुलित जीवन भी है। इससे जीवन में संतुलित आहार की अहमियत का पता चलता है। हम भोजन के संतुलन को केवल पोषक तत्त्वों के संतुलन तक ही सीमित समझते हैं। पर वास्तव में यह संतुलन भोजन की प्रकृति के गुणों तक भी एक्सटेंड होना चाहिए। एक आदमी को शाकाहार से सभी जरूरी पोषक तत्त्व मिल सकते हैं, पर उसे प्रकृति का तमोगुण मांसाहार से ही मिलेगा। कोई चाहे तो स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाए बिना सीमित मदिरा का प्रयोग भी आवश्यक तमोगुण की प्राप्ति के लिए कर सकता है। यह सभी को मालूम है और जैसा कि इस ब्लॉग की पिछली पोस्टों में सिद्ध किया गया है कि जीवन के संतुलन के लिए मन के अंदर प्रकृति के तीनों गुण संतुलन में होने चाहिए। ये गुण एक दूसरे के पूरक तभी बनते हैं, जब संतुलन में होते हैं, अन्यथा ये एक दूसरे के अवरोधक बन जाते हैं। ये सभी जानते हैं कि आहार से ही मन बनता है। एक प्रसिद्ध लोकोक्ति भी है कि “जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन”। इससे आहार में प्रकृति के तीनों गुणों के संतुलित मात्रा में होने की अहमियत का पता चलता है। तभी कहते हैं कि बिन खाए भजन न हो गोपाला। आयुर्वेद के वात, पित्त और कफ भी प्रकृति के क्रमशः सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण हैं। इनके संतुलन से स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है। पतंजलि ने यम और नियम में जो अहिंसा शब्द डाला है, उसका मतलब है कि बिना उच्च प्रयोजन के हिंसा न हो। यदि शरीर को पुष्ट व नीरोग रखने के लिए हल्की-फुल्की हिंसा के रूप में हल्का-फुल्का हेल्दी नॉनवेज जैसे कि मछली, अंडा न लिया जाए तो यह भी शरीर के प्रति हिंसा होगी। उससे भी योग का यम और नियम कहाँ सिद्ध हो पाएगा। मानव शरीर के प्रति हिंसा तो सबसे बड़ी हिंसा होती है। पतंजलि बहुत लम्बी सोच रखते थे, इसलिए शाकाहार-मांसाहार के झमेले में पड़ने की बजाय उन्होंने अहिंसा शब्द जोड़ दिया। समझने वालों के लिए यह बहुत है। अब यदि विज्ञान के हिसाब से शरीर की जरूरत को आंका जाए तो एक आदमी को हफ्ते में केवल दो ही दिन और एक दिन में करीब 70-100 ग्राम मांस की जरूरत होती है। इससे ज्यादा हानिकारक हो सकता है। इससे कम से शरीर को हानि पहुंच सकती है। मैंने बहुत से योगी लोग देखे हैं, जिन्हें 15 दिन बाद, कइयों को 1 महीने बाद, तो कइयों को 3 महीने बाद जरूरत महसूस होती है। कईयों को तो छः महीने के अंतराल पर नानवेज की जरूरत महसूस होती है। अब बताइए कि इससे पोषक तत्त्वों की क्या कमी पूरी होगी। इससे जाहिर है कि उससे आदमी के मन के तमोगुण की कमी पूरी होती है। इससे, अपने अंधकार प्रकार के आंतरिक स्वभाव से उसे भरपूर व ताजगी प्रदान करने वाली नींद भी आती है, जिससे उसके शरीर व मन की अच्छी मुरम्मत हो जाती है, और उससे वह स्वस्थ हो जाता है। शरीर अपनी जरूरत खुद बताता है। इसकी जरूरत होने पर योग में ध्यान कम लगने लगता है, चुस्ती कम हो जाती है, भूख घट जाती है, पाचन प्रणाली गड़बड़ाने लगती है, शरीर में कम्पन पैदा होने लगते हैं। व्यवहार में गुस्सा व चिड़चिड़ापन आ जाता है, अद्वैतभाव बना कर रखना मुश्किल हो जाता है, मन द्वैत के भंवर के अंदर भटकने लगता है, अवसाद जैसा हो जाता है, शरीर रोगी होने लगता है, डर सा लगने लगता है, सेक्स के प्रति रुचि नहीं रहती आदि बहुत से लक्षण पैदा हो जाते हैं। मन में सही तरीके से अद्वैत भाव बनाए रखने के लिए प्रकृति के तीनों गुणों का संतुलन बहुत जरूरी है। फिर यह सबको पता है कि जहां अद्वैत है, वहाँ कुंडलिनी भी है। वास्तव में आहार की कमी से शरीर और मन के हरेक हिस्से में कुछ न कुछ दुष्प्रभाव जरूर पैदा होता है। बहुत से लोग इन्हें नजरन्दाज करते हैं और बहुत से लोगों को इसका आभास ही नहीँ होता। नॉनवेज की खुराक पूरी होने से ये सभी खराब लक्षण एकदम से गायब हो जाते हैं। वैसे भी मछ्ली को सर्वश्रेष्ठ आमिष आहार माना गया है, क्योंकि इसमें बहुत से स्वास्थ्यवर्धक गुण हैं, और इसके कोई दुष्प्रभाव भी नहीँ हैं। तभी तो इसे पंचमकारों में विशेष रूप से शामिल किया गया है। इसके सेवन से पापकर्म भी बहुत कम होता है। वैज्ञानिक शोध से भी यह बात सामने आई है कि मछली को दर्द नहीं होता। यह उन्हें जालिम कुदरत से बचने के लिए कुदरत का ही दिया तोहफा है। वैसे तो सभी चीजों व भावों में प्रकृति के तीनों गुण विद्यमान होते हैं, पर किसी विशेष चीज में कोई विशेष गुण ज्यादा बलवान होता है। पंचमकारों को ही लें, तो मैथुन व मत्स्य में रजोगुण, मांस व मदिरा में तमोगुण, और मुद्रा में सतोगुण की अधिकता होती है। आजकल के प्रदूषण और अति भौतिकता के युग में शरीर की ऊर्जा की मांग बहुत ज़्यादा बढ़ गई है। ऐसे में सम्भवतः यौगिक पंचमकार ही मानव जाति का सही दिशानिर्देशन कर सकते हैं।

कुंडलिनी स्विच; कुंडलिनी योग (खेचरी मुद्रा) और माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट का तुलनात्मक अध्ययन

योग संसार में अक्सर कहा जाता है कि योग करते समय जीभ की शिखा को मुंह के अंदर पीछे वाले नरम तालु से छुआ कर रखना चाहिए। यह प्राचीन तकनीक आज के कोरोना (कोविड-19) काल में भारी तनाव के बोझ को दूर करने के लिए अद्भुत साबित हो सकती है। आज हम इसके मनोवैज्ञानिक और शरीर वैज्ञानिक पहलुओं पर विचार करेंगे।

जीभ को तालु से छुआने से कुंडलिनी स्विच ऑन हो जाता है, जिससे कुंडलिनी परिपथ पूरा हो जाता है

मुझे पहले ऐसा विशेष महसूस नहीं होता था। परन्तु जब मुझे कुंडलिनी योग करते हुए 2-3 साल बीत गए, तब मुझे इसके महत्व का पूरा अनुभव हुआ। जब मेरी जीभ ऊपर और पीछे को मुड़कर सॉफ्ट पेलेट की मालिश करती थी, तब मुझे ऐसा लगता था कि वह मेरे दिमाग को नीचे की तरफ चूस रही थी। सॉफ्ट पेलेट एक फिसलन भरे नरम गद्दे की तरह लगा, जिस पर जीभ को उरे-परे फिसलाने से बड़ी सुखद अनुभूति हुई। फिर दिमाग के रस के साथ मेरी कुण्डलिनी भी जीभ के पीछे से होती हुई नीचे गले तक उतर गई। वहां से अनाहत चक्र, फिर मणिपुर चक्र, और अंत में स्वाधिस्ठानचक्र-मूलाधार चक्र पर पहुंच कर सांसों की शक्ति से पीछे से ऊपर की ओर चली गयी। रीढ़ की हड्डी से होते हुए सभी चक्रों को भेदते हुए वह फिर मस्तिष्क तक पहुंच गई। वहां से फिर जीभ से होकर नीचे आ गई। इस तरह से कुंडलिनी परिपथ चालू हो गया, और कुंडलिनी पूरे शरीर में गोल-गोल घूमने लगी। इस प्रक्रिया में शरीर की सेंटरिंग (केन्द्रीकरण) का भी योगदान होता है, जिसका जिक्र हम आने वाली पोस्टों में करेंगे।

कुण्डलिनी स्विच के ऑन होने से दिमाग में हल्कापन महसूस होता है

जैसे ही कुंडलिनी स्विच से होकर मेरे दिमाग का रस या बोझ (कुंडलिनी) नीचे उतरा, वैसे ही मेरा दिमाग एकदम हल्का व शांत हो गया। जब कुंडलिनी पीछे से चढ़कर दिमाग तक पहुंची, दिमाग फिर भारी हो गया।इस तरह वह भारी-हल्का होता रहा और शक्ति पूरे शरीर में घूमने लगी।

खेचरी मुद्रा और माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट में जीभ को तालु से छुआया जाता है

बहुत से लोग सोचते हैं कि माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट में ही कुंडलिनी स्विच का वर्णन है, तथा उसने ही कुंडलिनी योग को पूर्ण किया। उससे पहले कुंडलिनी योग से कुण्डलिनी दिमाग में अटकी रहती थी और दिमागी परेशानियां पैदा करती थी। वास्तव में योग की खेचरी मुद्रा में कुंडलिनी स्विच का विस्तार से वर्णन है। उसमें तो जीभ के जोड़ को काटकर जीभ को इतना लंबा कर दिया जाता है कि वह पीछे मुड़कर नाक को जाने वाले सुराख में घुस जाती है। उससे कुंडलिनी स्विच परमानेंटली ऑन हो जाता है, जिससे योगी हमेशा कुंडलिनी के आनंद में झूमने लगता है। यद्यपि इस तरीके को करने की सलाह नहीं दी जाती, क्योंकि इससे स्वास्थ्य व जीवन शैली को भारी जोखिम उठाना पड़ सकता है।

माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट व कुंडलिनी योग भिन्न-2 परिस्थितियों के लिए हैं

कुंडलिनी जागरण दिमाग में ही होता है, अन्य चक्रों में नहीं। इसलिए यह सिद्ध है कि कुंडलिनी योगी को जल्दी कुंडलिनी जागरण होता था। प्राचीन भारत में बहुत शांतिपूर्ण और आरामदायक जीवनशैली होती थी। वातावरण व जलवायु भी विश्व में सर्वोत्तम होते थे। इसलिए वहां के योगी अपने दिमाग में कुंडलिनी का बोझ अच्छी तरह से झेल लेते थे। अधिकांश योगियों को कुंडलिनी स्विच की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। मुझे भी कुंडलिनी जागरण के लिए इसकी जरूरत नहीं पड़ी थी।पर आज मैं इसकी जरूरत महसूस करता हूँ, क्योंकि अब मेरे दिमाग में दूसरे कामों का बोझ बढ़ गया है।

कुंडलिनी स्विच से बहुत से स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं

सुबह-2 जब कई बार मेरा बॉवेल प्रेशर नहीँ बनता, तब मैं कुंडलिनी योग के बाद कुंडलिनी स्विच को ऑन करता हूँ। मैं कुंडलिनी का परिपथ नाभि चक्र तक बनाता हूँ। कुंडलिनी आगे के नाभि चक्र से पीछे घुसती है और पीछे वाले नाभि चक्र से होकर ऊपर चढ़ जाती है। जल्दी ही मेरी अंतड़ियों में हलचल शुरु हो जाती है, और मेरा पेट साफ हो जाता है।

कुण्डलिनी स्विच के पीछे छिपा हुआ शरीर विज्ञान

खाना खाते समय हमारी जीभ बार-2 तालु को छूती है। उससे दिमाग की ऊर्जा जीभ के रास्ते से होकर नाभि चक्र तक पहुंच कर खाना पचाने में मदद करती है। इसीलिए खाना खाने के बाद रक्तचाप भी कम हो जाता है, और आदमी दिमाग में हल्कापन महसूस करता है।

एम्ब्रोसिया, नेक्टर, अमृत, एलिकसिर ऑफ़ गॉड, लव पोशन, सीएसएफ आदि नाम कुण्डलिनी स्विच से जुड़े हैं

कुछ अभ्यास के बाद मैंने सॉफ्ट पेलेट से एक मीठा-नमकीन व जैली जैसा रस चखा। वह आनंद के साथ दिमाग का बोझ घटने से पैदा होता है। उसे उपरोक्त नामों से भी जाना जाता है।

कुंडलिनी के विकास के लिए बाँसुरी योग; बाँसुरी कोरोना काल के सबसे महत्वपूर्ण वाद्य यंत्र के तौर पर

दोस्तों, हर हफ्ते कोरोना वायरस अपनी तरफ ध्यान खींच लेता है। इसी के संबंध में लिखने का मन करता है। शायद इससे खुश होकर वह दुनिया के गुनाहों को माफ करके वापिस चला जाए। आशा ही जीवन है।

कोरोना काल में संगीत का महत्त्व

मैं लॉक डाऊन की वजह से घर में अपने को कैद जैसा महसूस कर रहा था। गाने भी बहुत सुन लिए थे। फिल्में भी बहुत देख ली थीं। भूतिया आत्मा जैसी फिल्मों का बोलबाला था। आजकल वे अच्छी लग रही थीं। एकदिन अपने परिवार के लोगों से उन कलाकारों के बारे में मेरी बात चल रही थी, जो लॉक डाऊन के समय अपनी कला विशेषकर संगीत कला को निखार रहे थे। कई लोगों ने तो खुद से ही संगीत सीखना भी शुरु कर दिया था। तभी मेरा ध्यान स्टोर रूम में रखी बाँसुरी की ओर गया जो कुछ सालों से वहाँ वैसे ही पड़ी थी। उस समय उससे बढ़िया गिफ्ट क्या हो सकती थी, क्योंकि उस समय लॉक डाऊन के कारण जरूरी चीजों के इलावा सभी वस्तुओं की आवाजाही पर रोक थी। मैं कॉलेज टाईम से लेकर कभी-कभार बाँसुरी बजा लिया करता था। 20 साल हो गए थे बाँसुरी से मित्रता किए हुए। किसी कला को यदि एकबार भी प्रयोग किया गया हो, तो वह समय के साथ खुद ही बढ़ती रहती है, बेशक फिर उसका प्रयोग बंद ही क्यों न किया जाए। इसीलिए पुराने समय में बचपन में ही सभी विद्याओं और कलाओं का एक्सपोजर दे दिया जाता था। बाँसुरी बजाने से मेरी धुँधली हो रही कुंडलिनी फिर से मजबूत होकर चमकने लगती थी।

बाँसुरी और कुंडलिनी का आपसी संबंध; बाँसुरी योग

बाँसुरी बजाने से प्राणायाम या ब्रीथिंग एक्सरसाइज हो जाती है। साँस भरते समय कुंडलिनी मेरुदंड से ऊपर चढ़ती है, और साँस छोड़ते समय आगे के चक्रों से नीचे उतरती है। इस तरह से कुंडलिनी पूरे शरीर का चक्कर लगाने लगती है। उससे सभी चक्र क्रियाशील हो जाते हैं। कुंडलिनी के ध्यान के साथ गहरी सांस भरी जाती है। फिर ध्यान के साथ धीरे-2 साँस छोड़ने से बाँसुरी की मधुर धुन भी बजती रहती है, और कुंडलिनी भी आगे के चक्रों से नीचे उतरती रहती है। साथ में, बाँसुरी की आवाज की शक्ति भी कुंडलिनी को लगती रहती है। इन सब से कुंडलिनी चमकने लग जाती है। उसके बाद आदमी को ऐसा लगता है जैसे कि उसने कुंडलिनी योग कर लिया हो। बाँसुरी योग भी अप्रतिम कुंडलिनी योग है। इससे तन और मन दोनों एकदम से स्वस्थ हो जाते हैं।

बाँसुरी एक सर्वोत्तम प्रकार का वाद्ययंत्र

बाँसुरी सबसे सस्ता और सर्वसुलभ वाद्ययंत्र है। इसको कहीं पर भी और कभी भी बाँस के पौधे से आसानी से बनाया जा सकता है। इसमें किसी विज्ञान या तकनीक की जरूरत नहीं होती। इसे बनाने में संसाधनों का भी बहुत कम प्रयोग होता है। इसमें सभी कुछ प्राकृतिक होता है, कुछ भी सिंथेटिक नहीं होता। इस वजह से बाँसुरी पर्यावरण मित्र होती है। आकार में छोटी होने से इसे कहीं पर भी आसानी से रखा जा सकता है। इन्हीं गुणों के कारण बाँसुरी सदाबहार व शाश्वत वाद्ययंत्र है। संभवतः इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण को बाँसुरी विशेष प्रिय थी। कई लोग घर में बाँसुरी बजाने से यह सोचकर परहेज करते हैं कि इसे खुले में बजाया जाना चाहिए। मैं भी यही सोचता था, पर 20 साल पहले ही मेरा यह भ्रम टूट गया था जब मैंने जंगली देहातों में रहने वाले लोगों को भी अपने कमरे के अंदर बाँसुरी बजाते हुए देखा।  चाहे कितना ही बड़ा लॉक डाऊन या आपातकाल क्यों न लागू हो जाए, बाँसुरी हमेशा मनोरंजन करती रहेगी, और आदमी को अध्यात्म के रास्ते पर ले जाती रहेगी। इसलिए प्रत्येक घर में कम से कम एक बाँस की बाँसुरी तो होनी ही चाहिए।

कुण्डलिनी के साथ पशु-प्रेम

यह सर्वविदित है कि कुण्डलिनी प्रेम का प्रतीक है। कुण्डलिनी समर्पण का प्रतीक है। कुण्डलिनी श्रद्धा-विश्वास का प्रतीक है। कुण्डलिनी स्वामीभक्ति का प्रतीक है। कुण्डलिनी सेवाभाव का प्रतीक है। कुण्डलिनी परहितकारिता का प्रतीक है। कुण्डलिनी आज्ञापालन का प्रतीक है। कुण्डलिनी सहनशक्ति का प्रतीक है। ये कुण्डलिनी के साथ रहने वाले मुख्य गुण हैं। अन्य भी बहुत से गुण कुण्डलिनी के साथ विद्यमान रहते हैं। यदि हम गौर करें, तो ये सभी मुख्य गुण पशुओं में भी विद्यमान होते हैं। इनमें से कई गुण तो उनमें मनुष्यों से भी ज्यादा मात्रा में प्रतीत होते हैं।  इससे यह अर्थ निकलता है कि पशु कुण्डलिनी-प्रेमी होते हैं। आइये, हम इसकी विवेचना करते हैं।

कुण्डलिनी स्वामीभक्ति का प्रतीक है

आजतक कुत्ते से ज्यादा स्वामीभक्ति किसी प्राणी में नहीं देखी गई है। ऐसे बहुत से  उदाहरण हैं, जब कुत्ते ने अपने मालिक के लिए जान तक दे दी है। इसका अर्थ है कि कुत्ते के मन में अपने मालिक के व्यक्तित्व की छवि स्थाई और स्पष्ट रूप से बसी हुई होती है। वह छवि कुत्ते के मन के लिए एक खूंटे की तरह काम करती है। इससे कुत्ता आपने विचारों और क्रियाकालापों के प्रति अनासक्ति भाव या साक्षी भाव प्राप्त करता रहता है। उससे कुत्ते को आनंद प्राप्त होता रहता  है। उस कुण्डलिनी छवि के महत्त्व को वह कभी नहीं भूलता, यहाँ तक कि उसके लिए जान तक दे सकता है। इसके विपरीत, बहुत से मनुष्य अपने मालिक के प्रति वफादारी नहीं निभा पाते। इससे सिद्ध  हो जाता है कि कुत्ता  मनुष्य से भी ज्यादा कुण्डलिनी प्रेमी होता है।

कुण्डलिनी सेवा भाव का प्रतीक है

उदाहरण के लिए, गाय को ही लें। वह हमें दूध देकर हमारी सेवा करती है। अधिकतर गौवें अपनी देख-रेख करने वाले मालिक के पास ही दूध देती हैं। दूसरा कोई जाए, तो वे जोर की लात भी टिका सकती हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि गाय के मन में अपने मालिक की छवि बस जाती है, जो  उसके लिए कुण्डलिनी का काम करती है।  एक आदमी  तो अपने मालिक को कभी भी छोड़ सकता है, परन्तु गाय ऐसा कभी नहीं करती है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि पशु मनुष्य से भी ज्य्यादा नैष्ठिक कुण्डलिनी भक्त होते हैं।

यह अलग बात है कि दिमाग की कमी के कारण पशु मनुष्य की तरह मालिक (कुण्डलिनी) को बारम्बार बदल भी नहीं सकता। अधिकाँश मनूश्य तो अपने दिमाग पर इतना घमंड करने लग जाते हैं कि कुण्डलिनी के परिपक्व होने से पहले ही उसे बदल देते हैं। ऐसी स्थिति से तो पशु वाली स्थिति ही बेहतर प्रतीत होती है। एक बात और है। पालतु पशु को जब आदमी द्वारा संरक्षण व भोजन प्राप्त होता है, तभी उसे कुण्डलिनी को ज्यादा बढ़ाने का अवसर मिलता है।

कुण्डलिनी परहितकारिता का प्रतीक है

इसी तरह, विभिन्न पशु-पक्षी विभिन्न प्रकार  के उत्पाद देकर मनुष्य का भला करते  रहते हैं। ऐसा उनके मनुष्य के प्रति प्रेम से ही सम्भव  हो सकता है। माता प्रेम के वशीभूत होकर ही अपने बच्चे को दूध पिलाती है। यह भी सत्य है कि प्रेम केवल कुण्डलिनी से ही होता है। यह अलग बात है कि पशु उसे बोलकर बता नहीं सकता। यदि प्रेम न भी हो, तो भी किसी का हित करते हुए स्वयं ही उससे प्रेम हो जाता है। यहाँ तक कि पेड़-पौधे भी कुण्डलिनी-प्रेमी होते हैं, क्योंकि वे भी सदैव परहित में लगे रहते हैं।

कुण्डलिनी आज्ञापालन का प्रतीक है

हम उसी की आज्ञा का पालन सबसे अधिक तत्परता के साथ करते हैं,  जो हमारे मन में सबसे अधिक बसा होता है, जो हमें सबसे अधिक महत्त्वशाली लगता है, और जिस पर हमें सबसे अधिक विश्वास होता है। वही हमारी कुण्डलिनी के रूप में होता है। वही आनंद का स्रोत भी होता है। अपनी मालिक की आज्ञा का पालन कुत्ते बहुत बखूबी करते हैं। कुत्ते में तो दिमाग भी इंसान से कम होता है। इसका सीधा सा अर्थ है कि कुत्ता केवलमात्र कुण्डलिनी से ही आज्ञापालन के लिए प्रेरित होता है, अन्य लॉजिक से नहीं। आदमी तो दूसरे भी बहुत से लॉजिक लगा लेता है। इसका सीधा सा अर्थ है कि एक कुत्ता भी कुण्डलिनी की अच्छी समझ रखता है।

इन बातों का उद्देश्य मनुष्य को गौण सिद्ध करना नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि मनुष्य जीव-विकास की सीढ़ी पर सबसे ऊपर है। यहाँ बात केवल कुण्डलिनी के बारे में हो रही है।

कुण्डलिनी कर्तव्यपालन का प्रतीक है

एक बैल यदि अस्वस्थ भी हो, तो भी वह खेत में हल चलाने से पीछे नहीं हटता। इसी तरह, यदि उसका मूड ऑफ़ हो, तो भी वह अपने कदम पीछे नहीं हटाता। यह अलग बात है, यदि वह हल चलाते-२ हांफने लगे या नीचे गिर जाए। इसका सीधा सा अर्थ है कि बैल भी कुण्डलिनी प्रेमी होता है। उसका रोजमर्रा का काम व उसके मालिक का व्यक्तित्व उसके मन में एक मजबूत कुण्डलिनी के रूप में बस जाता है, जिसे वह नजरअंदाज नहीं कर पाता। अपने आनंद के स्रोत को भला कौन बुद्धिमान प्राणी छोड़ना चाहे। इसी तरह, सहनशक्ति के मामले में बभी समझ लेना चाहिए।

पशुओं के कुण्डलिनी प्रेम के बारे में प्रेमयोगी वाज्र का आपना अनुभव

उसका ब्बच्पन पालतु पशुओं से भरे-पूरे परिवार में बीता था। पशुओं के मन के भाव पढ़ने में उसे बहुत मजा आता था। जंगल में बैलों का खेल-२ में आपस में भिड़ना उसे रोमांचित कर देता था। मवेशियों का जंगल के घास से पेट भर जाने के बाद अपने बाड़े की तरफ दौड़ लगाना एक अलग ही रोमांच पैदा करता था। एक गाय बड़ी नटखट, चंचल व साथ में दुधारू भी थी। वह एक नेता की तरह सभी मवेशियों के आगे-२ चला करती थी। सभी मवेशी उसे सींग मारने को आतुर रहते थे, इसलिए वह अकेले में ही चरा करती थी। वह जंगल के डर से उनकी नजरों से दूर भी नहीं जाती थी। उसकी बछिया भी वैसी ही निकली। वह देखने में भी बहुत सुन्दर थी। जंगल से बाड़े की तरफ पहाड़ी से नीचे उतरते समय वह पूंछ खड़ी करके बड़ी तेजी से कुदकते हुए भागती, और कुछ दूर जाकर पीछे से आने वाले  मवेशियों का इन्तजार करते हुए खड़ी होकर बार-२ गर्दन मोड़कर पीछे देखने लग जाती। जब वे नजदीक आते, तब फिर से दौड़ पड़ती।

जब प्रेमयोगी वज्र की कुण्डलिनी बलवान होती थी, तब सभी मवेशी उसके आसपास चरने के लिए आ जाया करते थे। कोई मवेशी उसे कान टेढ़े करके बड़े आश्चर्य से व प्रेम से देखने लग जाते थे। कई तो उसे चाटने भी लग जाते थे। वे उसे बार-२ सूंघते, और आनंदित हो जाते। शायद उन्हें कुण्डलिनी के साथ विद्यमान सबलीमेटिड वीर्य की खुशबू भी उसके रोमछिद्रों से निकली हुई महसूस होती थी। कुण्डलिनी जागरण के आसपास (प्राणोत्थान के दौरान) भी पशुओं के संबंध में उसका ऐसा ही अनुभव रहा। कई बार तो खूंटे से बंधीं कमजोर दिल वाली भैंसें उसे अचानक अपने पास पाकर डर सी भी जाती थीं, और फिर अचानक प्यार से सूंघने लग जाती थीं। ज्यादातर ऐसा उन्हीं के साथ होता था, जो क्रोधी, सींग मारने वाली, और दूध देने में आनाकानी करने वाली होती थीं। इसका सीधा सा मतलब है कि वे कुण्डलिनी से कम परिचित होती थीं।

पशुओं के बीच में रहने से कुण्डलिनी विकास

प्रेमयोगी वज्र ने यह महसूस किया कि पशुओं, विशेषकर जंगल में खुले घूमने वाले, पालतु, व गाय जाति के मवेशियों के बीच में रहकर कुण्डलिनी ज्यादा स्पष्ट रूप से विकसित हो जाती थी। पशु स्वभाव से ही प्रकृति प्रेमी होते हैं। प्रकृति में तो हर जगह अद्वैतरूपा कुण्डलिनी विद्यमान है ही। इसलिए कुण्डलिनी प्रेमी को पशुओं से भी प्रेम करना चाहिए।

  Please click on this link to view this post in English (Kundalini with animal love)

ਇਸ ਪੋਸਟ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬੀ ਵਿਚ ਪੜ੍ਹਨ ਲਈ ਇੱਥੇ ਕਲਿੱਕ ਕਰੋ (ਕੁੰਡਲਨੀ ਨਾਲ ਜਾਨਵਰਾਂ ਦਾ ਪਿਆਰ)

कुण्डलिनी से पर्यावरण-सुरक्षा

हमारे पर्यावरण का मौजूदा हाल

आजकल पर्यावरण तेजी से विनाश की तरफ जा रहा है। हर जगह पर्यावरण को प्रदूषित किया जा रहा है। हरेक व्यक्ति पर्यावरण को प्रदूषित करने में लगा हुआ है। आदमी की इच्छाओं पर लगाम ही नहीं लग रही है। भौतिक वस्तुओं का अंधाधुंध निर्माण हो रहा है, जिसके लिए पर्यावरण का व्यापक दोहन किया जा रहा है। हरेक वास्तु आज विषैली हो गई है। प्राकृतिक आपदाओं व प्रदूषण से लोग असमय मौत के शिकार हो रहे हैं।

प्राचीन जनजीवन में पर्यावरण-सुरक्षा

हमारा प्राचीन जनजीवन एक पर्यावरण-मित्र जनजीवन था। पर्यावरण को देवताओं की तरह पूजा जाता था। पर्वतों, नदियों, सागरों, वृक्षों, वनों समेत सभी वस्तुओं को देवता मानकर पूजा जाता था। कई तथाकथित आधुनिक लोग कहते हैं कि पुराने समय के लोगों में दिमाग की कमी होती थी, इसलिए वे तकनीक में पिछड़े हुए थे। परन्तु वास्तविकता यह है कि वे दिमाग के मामले में आज के लोगों से भी ज्यादा तेज होते थे। तभी तो वे स्वावलंबी होकर अपना जीवन जंगल में भी सुखपूर्वक बिता लेते थे। आज के अधिकाँश लोग तकनीक के बिना अपना जीवन जी ही नहीं सकते। प्राचीन लोग तकनीक का इस्तेमाल इसलिए नहीं करना चाहते थे, क्योंकि उससे पर्यावरण को नुक्सान पहुंचता था।

प्राचीन युग में पर्यावरण की सुरक्षा में कुण्डलिनी का योगदान

जैसा कि हमने ऊपर कहा है कि पुराने जमाने के लोग सभी वस्तुओं को देवता मानते थे। उदाहरण के लिए, आर्यों को ही देख लें। वे प्रकृति के पुजारी थे। सृष्टि की प्रत्येक वस्तु को उन्होंने सुन्दर देवता का रूप दिया हुआ था, जैसे कि वायु देव, जल देव, सूर्य देव, अग्नि देव आदि। आज भी वैदिक अनुष्ठानों में इन सभी देवताओं के पूजन की परम्परा है। इसी तरह की परम्परा प्राचीन मिस्र व सेल्टिक समाज में भी थी। लगभग सभी देशों में यह परम्परा किसी न किसी रूप में रही है। इससे पर्यावरण को लम्बे समय तक बचाने में काफी मदद मिली।

प्राकृतिक वस्तुओं की पूजा का अर्थ ही अद्वैत की पूजा है। क्योंकि तनिक चिंतन करने पर सभी वस्तुओं की आत्मा अद्वैत ही प्रतीत होती है। वे हैं भी, और नहीं भी हैं। वे काम करती भी हैं, और नहीं भी करती हैं। उन्हें फल मिलता भी है, और नहीं भी मिलता है। वे प्रकाश-रूप भी हैं, और अन्धकार-रूप भी, और दोनों से रहित भी हैं। इसका अर्थ है कि प्राचीन लोगों के मन में कुण्डलिनी का निवास हुआ करता था, क्योंकि अद्वैतभाव और कुण्डलिनी मन में साथ-२ रहते हैं। तभी तो प्राचीन युग में कुण्डलिनी का बहुत बोलबाला हुआ करता था, और विश्व के सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में इसका जिक्र जरूर मिलता है।

कुण्डलिनी पर्यावरण को कैसे बचाती है

अधिकाँश लोग अपने मन के वश में होते हैं। मन तो बन्दर की तरह होता है। वह अपने साथ उनको भी नचाता रहता है। वे मन के गुलाम होते हैं, और मन का साथ नहीं छोड़ सकते। उनकी सत्ता मन की सत्ता के साथ जुड़ी होती है। मन के नष्ट होने से वे भी अपने को नष्ट महसूस करते हैं। उनका मन भौतिक दुनिया के आश्रित होता है। यदि मन को भौतिक काम-धंधे न मिले, तो वह मरने लगता है। इसलिए वह बिना जरूरत के ही नए-२ काम-धंधे ढूँढता रहता है। वह पर्यावरण को हानि पहुंचाने से भी नहीं कतराता, क्योंकि द्वैतभाव के कारण उसे पर्यावरण में देवता/कुण्डलिनी नहीं दिखाई देती। उसे पर्यावरण में केवल अन्धकार दिखाई देता है। इस तरह से पर्यावरण को क्षति पहुँचती है।

इसके विपरीत, एक कुण्डलिनी योगी का मन कुण्डलिनी के आश्रित रहता है। वह कुण्डलिनी से जीवन-शक्ति लेता रहता है। उसे भौतिक काम-धंधों से जीवन-शक्ति लेने की कोई जरूरत नहीं होती। इसलिए वह अपनी जरूरत के कम से कम काम-धंधों में ही मस्त रहता है, और फालतु के काम-धंधों में नहीं उलझता। अपनी जरूरत के काम भी वह पर्यावरण को हानि पहुंचाए बिना निपटाता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उसकी नजर में हर जगह कुण्डलिनी है। यह तो सिद्ध ही है कि सृष्टि में हर जगह अद्वैत तत्त्व विद्यमान है, और यह भी कि अद्वैत के साथ कुण्डलिनी भी रहती है।

प्रेमयोगी वज्र का अपना अनुभव

क्षणिक आत्मज्ञान के बाद वह अकर्मक जैसा बन गया था। हर समय वह कुण्डलिनी के ध्यान में मस्त रहता था। उसे कुण्डलिनी से भरपूर जीवन मिलता रहता था। उसे कोई काम करने की जरूरत ही महसूस नहीं होती थी। काम करने से तो उसकी कुण्डलिनी को नुक्सान भी पहुँचता था। बहुत जरूरी होने पर ही वह काम करता था। काम को वह अद्वैत के साथ करता था, ताकि उसकी कुण्डलिनी को कम से कम नुकसान पहुंचता। वह पर्यावरण के प्रति काफी सचेत व प्रकृति-प्रेमी बन गया था। अधिकाँश समय वह प्रकृति के बीच में बैठकर अकेले ही गुजारता था। औरों के, बिना जरूरत के काम उसे पागलपन की तरह लगते थे। यद्यपि कई ऐसे काम मजबूरी में उसे भी करने पड़ते थे, ताकि वह सभी के साथ चल सकता। इससे जाहिर है कि एक कुण्डलिनी योगी से समाज की व्यवस्था पर विशेष फर्क नहीं पड़ता। पर्यावरण संरक्षण के लिए यह जरूरी है कि अधिकाँश लोग कुण्डलिनी योगी बनें।  

   इसी सन्दर्भ में प्रकृति के प्रति लगाव, प्रकृति से प्रेम भी एक योग है। परोक्ष रूप में यह प्रकृति ही परमात्मा का स्वरूप है ।

योग एक प्रकृति प्रेम-(विश्व पर्यावरण दिवस पर संदर्भित)

Please click on this link to view this post in English (Kundalini for Environmental protection)

ਇਸ ਪੋਸਟ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬੀ ਵਿਚ ਪੜ੍ਹਨ ਲਈ ਇੱਥੇ ਕਲਿੱਕ ਕਰੋ (ਕੁੰਡਲਿਨੀ ਤੋਂ ਵਾਤਾਵਰਣ ਦੀ ਸੁਰੱਖਿਆ ).