कुंडलिनी जागरण से आत्मा की पारलौकिक परमावस्था का पता नहीं चलता 

मित्रो, मैं कुछ दिन पहले रिलेक्स होने के लिए इस कड़ी गर्मी में दिन की धूप में छतरी लेकर बाहर निकला। चारों तरफ गलियों की सड़कों का जाल था, पर छायादार पेड़ कम थे। जहाँ थे, वहाँ उनके नीचे चबूतरे नहीं बने थे बैठने के लिए। पूरी कॉलोनी में तीन-चार जगह  चबूतरे वाले पेड़ थे। मैं बारी-बारी से हर चबूतरे पर बैठता रहा, और आसपास से आ रही कोयल की संगीतमयी आवाज का आनंद लेता रहा। गाय और बैल मेरे पास आ-जा रहे थे, क्योंकि उनको पता था कि मैं उनके लिए आटे की पिन्नियां लाया था। अच्छा है, अगर सैरसपाटे के साथ कुछ गौसेवा भी होती रहे। एक छोटे चबूतरे पर पेड़ से सटा हुआ एक पत्थर था। मैं उसपे बैठा तो मेरा खुद ही एक ऐसा आसन लग गया, जिसमें मेरा स्वाधिष्ठान चक्र पेड़ को मजबूती से छू रहा था, और पीठ पेड़ के साथ सीधी और छाती के पीछे पीठ की हड्डी पेड़ से सटी हुई थी। इससे मेरे मन में वर्षों पुरानी रंगबिरंगी भावनाएं उमड़ने लगीं। बेशक पुरानी घटनाओं के दृश्य मेरे सामने नहीं थे, पर उनसे जुड़ी भावनाएँ बिल्कुल जीवंत और ताज़ा थीं। ऐसा लग रहा था जैसे कि वे भावनाएं सत्य हों और उस अनुभव के समय वर्तमान में ही बनी हों। यहाँ तक कि अपने असली घटनाकाल में भी वे भावनाएँ उतनी सूक्ष्म और प्रत्यक्ष रूप में अनुभव नहीं हुई थीं, जितनी उस स्मरणकाल में अनुभव हो रही थीं। भावनाओं के साथ आनंद तो रहता ही है। असल में भावनाएँ ही घटनाओं का सार या चेतन आत्मा होती है। भावना के बिना तो घटना निष्प्राण और निर्जीव होती है। सम्भवतः स्वाधिष्ठान चक्र को इसीलिए इमोशनल बेगेज या भावनाओं का थैला भी कहते हैं। वैसे तो सभी चक्रोँ के साथ विचारात्मक भावनाएँ जुड़ी होती हैं। स्वाधिष्ठान चक्र से इसलिए ज्यादा जुड़ी होती हैं, क्योंकि सम्भोग सबसे बड़ा अनुभव है, और उसी अनुभव के लिए आदमी अन्य सभी अनुभव हासिल करता है। मतलब कि सम्भोग का अनुभव हरेक अनुभव पर हावी होता है। विज्ञान भी इस बात को मानता है कि सम्भोग ही जीवन के हरेक पहलू के विकास के लिए मूल प्रेरक शक्ति है। क्योंकि स्वाधिष्ठान चक्र सम्भोग का केंद्र है, इसलिए स्वाभाविक है कि उससे सभी भावनाएं जुड़ी होंगी। 

किसी भी चीज में रहस्य इसलिए लगता है, क्योंकि हम उसे समझ नहीं पाते, नहीं तो कुछ भी रहस्य नहीं है। जो कुछ समझ आ जाता है, वह विज्ञान ही लगता है। पूरी सृष्टि हाथ पे रखे आंवले की तरह सरल और प्रत्यक्ष है, यदि लोग योग विज्ञान के नजरिए से इसे समझें, अन्यथा इसके झमेलों का कोई अंत नहीं है।

मूलाधार को ग्राउंडिंग चक्र इसलिए कहते हैं क्योंकि वह मस्तिष्क को ऐसे ही अपने से जोड़ता है, जैसे पेड़ की जड़ पेड़ को अपने से जोड़कर रखती है। मूल का शाब्दिक अर्थ ही जड़ होता है। जैसे जड़ मिट्टी के सहयोग से अपनी ऊर्जा पैदा करके पेड़ को पोषण भी देती है और खुद भी पेड़ के पत्तों से अतिरिक्त ऊर्जा को अपनी ओर नीचे खींचकर खुद भी मजबूत बनती है, उसी तरह मूलाधार भी सम्भोग से अपनी ऊर्जा पैदा करके मस्तिष्क को ऊर्जा की आपूर्ति भी करता है, और मस्तिष्क में निर्मित फालतू विचारों की ऊर्जा को अपनी तरफ नीचे खींचकर खुद भी ताकतवर बनता है।

फिर एक दिन मैं फिर से उसी पुरानी झील के किनारे गया। एक पेड़ की छाँव में बैठ गया। मुझे अपनी सेहत भी ठीक नहीं लग रही थी, और मैं थका हुआ सा महसूस कर रहा था। लग रहा था कि जुकाम के वायरस का हमला हो रहा था मेरे ऊपर, क्योंकि एकदम से मौसम बदला था। अचानक भारी बारिश से भीषण गर्मी के बीच में एकदम से कड़ाके की ठंड पड़ी थी। उससे स्वाभाविक है कि मन भी कुछ बोझिल सा था। सोचा कि वहाँ शांति मिल जाए। गंगापुत्र भीष्म पितामह भी इसी तरह गंगा नदी के किनारे जाया करते थे शांति के लिए। मुझे तो लगता है कि यह एक रूपक कथा है। क्योंकि भीष्म पितामह आजीवन ब्रह्मचारी थे, इसलिए स्वाभाविक है कि उनकी यौन ऊर्जा बाहर की ओर बर्बाद न होकर पीठ की सुषुम्ना नाड़ी से ऊपर चढ़ती थी। इसे ही ही भीष्म पितामह का बारम्बार गंगा के पास जाना कहा गया है। गंगा नदी सुषुम्ना नाड़ी को कहा जाता है। क्योंकि सुषुम्ना नाड़ी अपनी ऊर्जा रूपी दुग्ध से बालक रूपी कुंडलिनी-मन का पोषण-विकास करती है, इसीलिए गंगारूपी सुषुम्ना को माँ कहा गया है। थोड़ी देर बाद मैं मीठी और ताज़ा हवा की लम्बी सांस लेते हुए उस पर ध्यान देने लगा। इससे पुराने भावनात्मक विचार मन में ऐसे उमड़ने लगे, जैसे तेज हवा चलने पर आसमान में धूल उमड़ आती है। अगर आदमी धूल को देखने लगे, तो उसका दम जैसा घुटता है, और मन उदास हो जाता है। यदि उस पर ध्यान न देकर केवल हवा को महसूस करे, तो वह प्रसन्नचित हो जाता है। मैंने भी उन विचारों की धूल पर ध्यान देना बंद कर दिया, और सांसों पर ध्यान देने लगा। विचार तो तब भी थे, पर तब परेशान नहीं कर रहे थे। सांस और विचार हमेशा साथ रहते हैं। आप उन्हें अलग नहीं कर सकते, ऐसे ही जैसे हवा और धूल साथ रहते हैं। हवा है, तो धूल भी है, और धूल है तो हवा भी है। अगर आप धूल हटाने के लिए दीवार आदि लगा दो, तो वहाँ हवा भी नहीं आएगी। इसी तरह यदि आप बलपूर्वक विचारों को दबाएंगे, तो सांस भी दब जाएगी। और ये आप जानते ही हैँ कि सांस ही जीवन है। इसलिए विचारों को दबाना नहीं है, उनसे ध्यान हटाकर सांसों पर केंद्रित करना है। विचारों को आतेजाते रहने दो। जैसे धूल के कण थोड़ी देर उड़ने के बाद एकदूसरे से जुड़कर या नमी आदि से भारी होकर नीचे बैठने लगते हैँ, उसी तरह विचार भी श्रृंखलाबद्ध होकर मन के धरातल में गायब हो जाते हैं। बस यह करना है कि उन विचारों की धूल को ध्यान रूपी छेड़ा नहीं देना है। बाहर के विविध दृश्य नजारे और आवाजें मन के धरातल को मजबूत करते हैँ, जिससे फालतू विचार उसपे लैंड करते रह सकें। इसीलिए लोग ऐसे कुदरती नजारों की तरफ भागते हैं। जैसे धूल का कुछ हिस्सा आसमान में दूर गायब हो जाता है और बाकि ज्यादातर हिस्सा फिर से उसी जमीं पर बैठता है, इसी तरह विचारों के उमड़ने से उनका थोड़ा हिस्सा ही गायब होता है, बाकि बड़ा हिस्सा पुनः उसी मन के धरातल पर बैठ जाता है। इसीलिए तो एक ही किस्म के विचार लम्बे समय तक बारबार उमड़ते रहते हैं, बहुत समय बाद ही पूरी तरह गायब हो पाते हैं। बारीक़ धूल जैसे हल्के विचार जल्दी गायब हो जाते हैं, पर मोटी धूल जैसे आसक्ति से भरे स्थूल विचार ज्यादा समय लेते हैं। इसीलिए यह नहीं समझना चाहिए कि एकबार के साक्षीभाव से विचार गायब होकर मन निर्मल हो जाएगा। लम्बे समय तक साधना करनी पड़ती है। आसान खेल नहीं है। इसलिए जिसे जल्दी हो और जो इंतजार न कर सके, उसे  साधना करने से पहले सोच लेना चाहिए। वैसे भी मुझे लगता है कि यह दुनिया से कुछ दूरी बनाने वाली साधना उन्हीं लोगों के लिए योग्य है, जो अपनी कुंडलिनी को जागृत कर चुके हैं, या जो दुनिया के लगभग सभी अनुभवों को हासिल कर चुके हैं। आम लोग तो इससे गुमराह भी हो सकते हैं। आम लोगों के लिए तो व्यावहारिक कर्मयोग ही सर्वोत्तम है। हालांकि जो लोग एकसाथ विविध साधना मार्गों पर चलने की सामर्थ्य और योग्यता रखते हैं, उनके लिए ऐसी कोई पाबंदी नहीं। थोड़ी ही देर में मेरा शरीर खुद ही भिन्न-भिन्न सिटिंग पोज बनाने लगा, ताकि कुंडलिनी ऊर्जा को मूलाधार चक्र से ऊपर चढ़ने में आसानी हो। स्वतोभूत योगासनों को मैंने पहली बार ढंग से महसूस किया, हालांकि घर में बिस्तर पर रिलेक्स होते हुए मेरे आसन लगते ही रहते हैं, ख़ासकर शाम के 5-6 बजे के बीच। सम्भवतः ऐसा दिनभर की थकान को दूर करने के लिए होता है, संध्या का ऊर्जावर्धक प्रभाव भी होता है साथ में। तो लगभग सुबह के थकानरहित समय में झील के निकट मेरी कुंडलिनी ऊर्जा का उछालें मारने का मतलब था कि मेरी थकान काम के बोझ से नहीं हुई थी, बल्कि किसी आसन्न रोग की वजह से थी। वह उसका एडवांस में इलाज करने के लिए आई थी। कुंडलिनी ऊर्जा इंटेलिजेंट होती है, इसलिए सब समझती है। विचारों के प्रति साक्षीभाव के साथ कुछ देर तक लम्बी और गहरी साँसे लेने से कुंडलिनी ऊर्जा को ऊपर चढ़ाने वाला दबाव तैयार हो गया था। जूते के सोल की पिछली नोक की हल्की चुभन से मूलाधार चक्र आर्गेस्मिक आनंदमयी संवेदना के साथ बहुत उत्तेजित हुआ, जिससे कुंडलिनी ऊर्जा उफनती नदी की तरह ऊपर चढ़ने लगी। विभिन्न चक्रोँ के साथ इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना  नाड़ियों में आर्गेस्मिक आनंदमयी संवेदना महसूस होने लगी। ऐसा लग रहा था कि जैसे कुंडलिनी ऊर्जा से पूरा शरीर रिचार्ज हो रहा था। साँसें भी आर्गेस्मिक आनंद से भर गई थीं। कुंडलिनी के साथ आगे के आज्ञा चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र और वज्र शिखा के संयुक्त ध्यान से ऊर्जा आगे से नीचे के हिस्से में उतरकर सभी चक्रोँ के साथ पूरे शरीर को शक्तियुक्त कर रही थी। दरअसल आमधारणा के विपरीत मूलाधार चक्र में अपनी ऊर्जा नहीं होती, बल्कि उसे संभोग से ऊर्जा मिलती है। मूलाधार को रिचार्ज किए बगैर ही अधिकांश लोग वहाँ से ऊर्जा उठाने का प्रयास उम्रभर करते रहते हैं, पर कम ही सफल हो पाते हैं। सूखे कुएँ में टुलु पम्प चलाने से क्या लाभ। मूलाधार के पूरी तरह डिस्चार्ज होने के बाद यौन अंगों, विशेषकर प्रॉस्टेट का दबाव बहुत कम या गायब हो जाता है। उससे फिर से मन सम्भोग की तरफ आकर्षित हो जाता है, जिससे मूलाधार फिर से रिचार्ज हो जाता है। वैसे तो योग आधारित साँसों से भी मूलाधार चक्र शक्ति से आवेशित हो जाता है, जो संन्यासियों के लिए एक वरदान की तरह ही है। चाय से प्रॉस्टेट समस्या बढ़ती है, ऐसा कहते हैं। दरअसल चाय से मस्तिष्क में रक्तसंचार का दबाव बढ़ जाता है, इसीलिए तो चाय पीने से सुहाने विचारों के साथ फील गुड महसूस होता है। इसका मतलब है कि फिर यौन अंगों से ऊर्जा को ऊपर चढ़ाने वाला चुसाव नहीं बनेगा। इससे कुंडलिनी ऊर्जा घूमेगी नहीं, जिससे यौन अंगों समेत पूरे शरीर के रोगी होने की सम्भावना बढ़ेगी। उच्च रक्तचाप से भी ऐसी ही सैद्धांतिक वजह से प्रॉस्टेट की समस्या बढ़ती है। ऐसा भी लगता है कि प्रॉस्टेट की इन्फेलेमेशन या उत्तेजना भी इसके बढ़ने की वजह हो सकती है। स्वास्थ्य वैज्ञानिक भी ऐसा ही अंदेशा जता रहे हैं। जरूरत से ज्यादा तांत्रिक सम्भोग से प्रॉस्टेट उत्तेजित हो सकती है। तांत्रिक वीर्यरोधन से एक चुसाव भी पैदा हो सकता है जिससे संक्रमित योनि का गंदा स्राव प्रॉस्टेट तक भी पहुंच सकता है, जिससे प्रोस्टेट में इन्फेलेमेशन और संक्रमण पैदा हो सकता है। इसे एंटीबायोटिक से ठीक करना भी थोड़ा मुश्किल हो सकता है। इसीलिए खूब पानी पीने को कहा जाता है, ताकि गंदा स्राव मूत्रनाल से बाहर धुल जाए। योनि-स्वास्थ्य का भी भरपूर ध्यान रखा जाना चाहिए। वैसे आजकल प्रोस्टेट की हर समस्या का इलाज है, प्रोस्टेट कैंसर का भी, यदि समय रहते जाँच में लाया जाए। क्योंकि पुराने जमाने में ऐसी सुविधाएं नहीं थीं, इसीलिए तंत्र विद्या को गुप्त रखा जाता था। इस ब्लॉग की एक पुरानी पोस्ट में कबूतर बने अग्निदेव को दिए माता पार्वती के श्राप को जो दिखाया गया है, जिसमें वे उसे उसके द्वारा किए घृणित कार्य की सजा के रूप में उसे लगातार जलन महसूस करने का शाप देती हैं, वह सम्भवतः प्रॉस्टेट के संबंध में ही है। योगी इस जलन की ऊर्जा को कुंडलिनी को देने के लिए पूर्ण सिद्धासन लगाते हैं। इसमें एक पाँव की एड़ी से मूलाधार पर दबाव लगता है, और दूसरे पाँव की एड़ी से आगे के स्वाधिष्ठान चक्र पर। इसलिए यह अर्ध सिद्धासन से बेहतर है क्योंकि अर्धसिद्धासन में दूसरा पैर भी जमीन पर होने से स्वाधिष्ठान पर नुकीला जैसा संवेदनात्मक और आर्गेस्मिक दबाव नहीं लगता। इससे स्वाधिष्ठान की ऊर्जा बाहर नहीं निकल पाती। कुंडलिनी ऊर्जा के घूमते रहने से यह यौनता-आधारित सिलसिला चलता रहता है, और आदमी का विकास होता रहता है। हालांकि यह सिलसिला साधारण आदमी में भी चलता है, पर उसमें इसका मुख्य लक्ष्य द्वैतपूर्ण दुनियादारी से संबंधित ही होता है। जबकि कुंडलिनी योगी का लक्ष्य कुंडलिनी युक्त अद्वैतपूर्ण जीवनयापन होता है। साधारण आदमी में बिना किसी प्रयास के ऊर्जा चढ़ती है, इसलिए यह प्रक्रिया धीमी और हल्की होती है। जबकि कुंडलिनी योगी अपनी इच्छानुसार ऊर्जा को चढ़ा सकता है, क्योंकि अभ्यास से उसे ऊर्जा नाड़ियों का और उन्हें नियंत्रित करने का अच्छा ज्ञान होता है, जिससे शक्ति उसके वश में आ जाती है। तांत्रिक योगी तो इससे भी एक कदम आगे होता है। इसीलिए तांत्रिकों पर सामूहिक यौन शोषण के आरोप भी लगते रहते हैं। वे कठोर तांत्रिक साधना से शक्ति को इतना ज्यादा वश में कर लेते हैं कि वे कभी सम्भोग से थकते ही नहीं। ऐसा ही मामला एक मेरे सुनने में भी आया था कि एक हिमालयी क्षेत्र में मैदानी भूभाग से आए तांत्रिक के पास असली यौन आनंद की प्राप्ति के लिए महिलाओं की पंक्ति लगी होती थी। कुछ लोगों ने हकीकत जानकर उसे पीटा भी, फिर पता नहीं क्या हुआ। तांत्रिकों के साथ यह बहुत बड़ा धोखा होता है। आम लोग उनके कुंडलिनी अनुभव को नहीं देखते, बल्कि उनकी साधना के अंगभूत घृणित खानपान और आचार-विचार को देखते हैं। वे आम नहीं खाते, पेड़ गिनते हैं। इससे वे उनका अपमान कर बैठते हैं, जिससे उनकी तांत्रिक कुंडलिनी वैसे लोगों के पीछे पड़ जाती है, और उनका नुकसान करती है। इसी को देवता का खोट लगना, श्राप लगना, बुरी नजर लगना आदि कहा जाता है। इसीलिए तांत्रिक साधना को, विशेषकर उससे जुड़े तथाकथित कुत्सित आचारों-विचारों को गुप्त रखा जाता था। साधारण लोक परिस्थिति में भी तो लोग तांत्रिक विधियों का प्रयोग करते ही हैं, पर वे साधारण सम्भोग चाहते हैं, यौन योग नहीं। शराब से शबाब हासिल करना हो या मांसभक्षण से यौनसुख को बढ़ाना हो, सब में यही सिद्धांत काम करता है। ऐसी चीजों से दिमाग़ के विचार शांत होने से दिमाग़ में एक वैक्यूम पैदा हो जाता है, जो मूलाधार से ऊर्जा को ऊपर चूसता है। इससे आगे के चैनल से ऊर्जा नीचे आ जाती है। इससे ऊर्जा घूमने लगती है, जिससे सभी अंगों के साथ मूलाधार से जुड़े अंग भी पुनः सक्रिय और क्रियाशील हो जाते हैं। मुझे तो लगता है कि बीयर पीने से जो पेशाब खुल कर आता है, वह इससे यौनांगों का दबाव कम होने से ही आता है, न कि इसमें मौजूद पानी से, जैसा अधिकांश लोग समझते हैं। सीधे पानी पीने से तो पेशाब इतना नहीं खुलता, चाहे जितना मर्जी पानी पी लो। अल्कोहल का प्रभाव मिटने पर पुनः दबाव बन जाए, यह अलग बात है। अब कोई यह न समझ ले कि अल्कोहल से कुंडलिनी ऊर्जा को घूमने में मदद मिलती है, इसलिए यह स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है। हाहाहा। टेस्टॉस्टिरोन होर्मोन ब्लॉकर से इसलिए प्रॉस्टेट दबाव कम होता है, क्योंकि उससे इस होर्मोन की यौनाँग प्रेरक शक्ति क्षीण हो जाती है। इसके विपरीत, बहुत से आदर्शवादी पुरुष अपनी स्त्री को संतुष्ट नहीं कर पाते। मुझे मेरा एक दोस्त बता रहा था कि एक आदर्शवादी और संत प्रकार के उच्च सरकारी प्रोफेसर की पत्नि जो खुद भी एक सरकारी उच्च अधिकारी थी, उसने अपने कार्यालय से संबंधित एक बहुत मामूली से अविवाहित नवयुवक कर्मचारी से अवैध संबंध बना रखे थे। जब उन्हें इस बात का पता पुख्ता तौर पर चला, तो उनको इतना ज्यादा भावनात्मक सदमा लगा कि वे बेचारे सब कुछ यहीं छोड़कर विदेश चले गए, क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि एक औरत को जब अश्लीलता का चस्का लग जाए तो उसे उससे पीछे हटाना बहुत मुश्किल है, हालांकि असम्भव नहीं है। हालांकि एक औरत के लिए व उसके अवैध प्रेमी के लिए ऐसा करना बहुत नुकसानदायक हो सकता है, विशेषकर यदि उसका असली प्रेमी या पति सिद्ध प्रेमयोगी हो। शिवपुराण के अनुसार जब शिव और पार्वती का विवाह हो रहा था, तो ब्रह्मा उस विवाह में पुरोहित की भूमिका निभा रहे थे। शिवपार्वती से पूजन करवाते समय ब्रह्मा की नजर पार्वती के पैर के नख पर पड़ गई। उसे वे मोहित होकर देखते ही रहे और पार्वती पर कमासक्त हो गए। इससे उनका वीर्यपात हो गया। शिव को इस बात का पता चल गया। इससे शिव इतने ज्यादा क्रोधित हुए कि प्रलय मचाने को तैयार हो गए। बड़ी मुश्किल से देवताओं ने उन्हें मनाया, फिर भी उन्होंने ब्रह्मा को भयंकर श्राप दे ही दिया। प्रलय तो टल गई पर ब्रह्मा की बहुत बड़ी दुर्गति हुई। यदि पार्वती के मन में भी विकार पैदा हुआ होता, और वह ब्रह्मा के ऊपर कमासक्त हुई होती, तो उसे भी शिव की कुंडलिनी शक्ति दंड देती। यदि वह शिव की अतिनिकट संगति के कारण उस दंड से अप्रभावित रहती, तो उस दंड का प्रभाव उससे जुड़े कमजोर मन वाले उसके नजदीकी संबंधियों पर पड़ता, जैसे उसकी होने वाली संतानेँ आदि। ऐसा सब शिव की इच्छा के बिना होता, क्योंकि कौन अपनी पत्नि को दंड देना चाहता है। दरअसल कुंडलिनी खुद ही सबकुछ करती है। यदि ऐसा कुत्सित कुकर्म अनजाने में हो जाए तो इसका प्रायश्चित यही है कि दोनों अवैध प्रेमी मन से एकदूसरे को भाई-बहिन समझें और यदि कभी अपनेआप मुलाक़ात हो जाए, तो एक दूसरे को भाई-बहिन कह कर सम्बोधित करें, और सच्चे मन से कुंडलिनी से माफी मांगे, ऐसा मुझे लगता है। जो हुआ, सो हुआ, उसे भूल जाएं। आगे के लिए सुधार किया जा सकता है। मेरे उपरोक्त ऊर्जा-उफान से मुझे ये लाभ मिला कि एकदम से मुझे छीकें शुरु हो गईं, और नाक से पानी बहने लगा, जिससे जुकाम का वायरस दो दिन में ही गायब हो गया। गले तक तो वह लगभग पहुंच ही नहीं पाया। दरअसल वह कुंडलिनी ऊर्जा वायरस के खिलाफ इसी सुरक्षा चक्र को मजबूती देने के लिए उमड़ रही थी। इसी तरह एकबार कई दिनों से मैं किसी कारणवश भावनात्मक रूप से चोटिल अवस्था में था। शरीरविज्ञान दर्शन की भावना से कुंडलिनी मुझे स्वस्थ भी कर रही थी, पर कामचलाऊ रूप में ही। फिर एक दिन तांत्रिक कुंडलिनी योग की शक्ति से कुंडलिनी ऊर्जा लगातार मेरे दिल पर गिरने लगी। मैं मूलाधार, स्वाधिष्ठान और आज्ञा चक्र और नासिकाग्र के साथ छाती के बाईं ओर स्थित दिल पर भी ध्यान करने लगा। इससे दोनों कुंडलिनी चैनल भी महसूस हो रहे थे, और साथ में उससे दिल की ओर जाती हुई ऊर्जा भी और फिर पुनः नीचे उसी केंद्रीय चैनल में उसे जुड़ते हुए महसूस कर रहा था। यह सिलसिला काफी देर तक चलता रहा, जिससे मेरी यौन कुंडलिनी ऊर्जा से मेरा दिल बिल्कुल स्वस्थ हो गया। बाद में यह मेरे व्यवहार में एकाएक परिवर्तन से और लोगों के मेरे प्रति सकारात्मक व्यवहार से भी सिद्ध हो गया।

चलो, फिर से अध्यात्म की तरफ लौटते हैं। वैसे अध्यात्म भी दुनियादारी के बीच ही पल्लवित-पुष्पित होता है, उससे अलग रहकर नहीं, ऐसे ही जैसे सुंदर फूल काँटों के बीच ही उगते हैं। कांटे ही फूलों की शत्रुओं से रक्षा करते हैं। मैं पिछली पोस्ट में जो प्रकृति-पुरुष विवेक के बारे में बात कर रहा था, उसे अपने समझने के लिए थोड़ा विस्तार दे रहा हूँ, क्योंकि कई बार मैं यहाँ अटक जाता हूँ। चाहें तो पाठक भी इसे समझ कर फायदा उठा सकते हैं। वैसे है यह पूरी थ्योरी ही, प्रेक्टिकल से बिल्कुल अलग। हाँ, थ्योरी को समझ कर आदमी प्रेक्टिकल की ओर प्रेरित हो सकता है। जब कुछ क्षणों के लिए मुझे कुंडलिनी-पुरुष अपनी आत्मा से पूर्णतः जुड़ा हुआ महसूस हुआ, मतलब कि जब मैं प्रकृति से मुक्त पुरुष बन गया था, तब ऐसा नहीं था कि उस समय प्रकृति रूपी विचार और दृश्य अनुभव नहीं हो रहे थे। वे अनुभव हो रहे थे, और साथ में कुंडलिनी चित्र भी, क्योंकि वह भी तो एक विचार ही तो है। पर वे मुझे मुझ पुरुष के अंदर और उससे अविभक्त ऐसे महसूस हो रहे थे, जैसे समुद्र में लहरें होती हैं। इसका मतलब है कि वे उस समय प्रकृति रूप नहीं थे, क्योंकि उनकी पुरुष रूप आत्मा से अलग अपनी कोई सत्ता नहीं थी। आम साधारण जीवन में तो प्रकृति की अपनी अलग सत्ता महसूस होती है, हालांकि ऐसा मिथ्या होता है पर भ्रम से सत्य लगता है। दुनियादारी झूठ और भ्रम पर ही टिकी है। दरअसल कुंडलिनी चित्र अर्थात मन पुरुष और प्रकृति के मेल से बना होता है। जब वह निरंतर ध्यान से अज्ञानावृत आत्मा से एकाकार हो जाता है, तब वह शुद्ध अर्थात पूर्ण पुरुष बन पाता है। मतलब कि तब ही वह प्रकृति के बंधन से छूट पाता है। पूर्ण और शुद्ध पुरुष का असली अनुभव परमानंद स्वरूप जैसा होता है। इससे स्वाभाविक है कि उसके पूर्ण अनुभव के साथ भी तो मन के विचार चित्र तो उभरेंगे ही। पर तब वे ऐसे मिथ्या या आभासी महसूस होंगें जैसे चूने के ढेर में खींची लकीरें। मतलब उनकी सत्ता नहीं होगी, केवल पुरुष की सत्ता होगी। इसीलिए तो उस कुंडलिनी जागरण के चंद क्षणों में परमानंद के साथ सब कुछ पूरी तरह एक सा ही महसूस होता है, सबकुछ अद्वैत। जीवित मनुष्य में आनंद के साथ मन के विचार बंधे होते हैं। आनंद के साथ विचार आएंगे ही आएंगे। इस तरह से पूर्ण निर्विचार अवस्था के साथ आत्मरूप का अनुभव असम्भव के समान ही है जीवित अवस्था में। वैसे साधना की वह सर्वोच्च अवस्था होती है। वहाँ तक असंख्य आत्मज्ञानियों में केवल एक-आध ही पहुंच पाता है। उसीके पारलौकिक अनुभव को वेदों में लिखा गया है, जिसे आप्तवचन कहते हैं। उस पर विश्वास करने के इलावा पूर्ण मुक्त आत्मा की पारलौकिक अवस्था को जानने का कोई तरीका नहीं है। ऐसा नहीं है कि कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी इस परमावस्था को प्राप्त नहीं कर सकता। वह कर सकता है, पर जानबूझकर नहीं करता। इसकी मुख्य वजह है परमावस्था का अव्यवहारिक होना। यह अवस्था संन्यास की तरह होती है। इस अवस्था में आदमी प्रतिस्पर्धात्मक दुनिया में भौतिक रूप से पिछड़ जाता है। यहाँ तक कि खाने के भी लाले पड़ सकते हैं। अभी मानव समाज इतना विकसित नहीं हुआ है कि इस अवस्था के योग्य उम्मीदवारों के भरणपोषण और सुरक्षा का उत्तरदायित्व संभाल सके। सम्भवतः प्राचीन भारत में कोई ऐसी कार्यप्रणाली विकसित कर ली गई थी, तभी तो उस समय संन्यासी बाबाओं का बोलबाला हुआ करता था। पर आज के तथाकथित आधुनिक भारत में ऐसे बाबाओं की हालत बहुत दयनीय प्रतीत होती है। प्राचीन भारत में समाज का, विशेषकर समाज के उच्च वर्ग का पूरा जोर कुंडलिनी जागरण के ऊपर होता था। यह सही भी है, क्योंकि कुंडलिनी ही जीवविकास की अंतिम और सर्वोत्तम ऊंचाई है। हिन्दुओं की अनेकों कुंडलिनी योग आधारित परम्पराओं में उपनयन संस्कार में पहनाए जाने वाले जनेऊ अर्थात यग्योपवीत के पीछे भी कुंडलिनी सिद्धांत ही काम करता है। इसे ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। इसका मतलब है ब्रह्म अर्थात कुंडलिनी की याद दिलाने वाला धागा। कई लोग कहते हैं कि यह बाईं बाजू की तरफ फिसल कर काम के बीच में अजीब सा व्यवधान पैदा करता है। सम्भवतः यह अंधे कर्मवाद से बचाने का एक तरीका हो। यह भी लगता है कि इससे यह शरीर के बाएं भाग को अतिरिक्त बल देकर इड़ा और पिंगला नाड़ियों को संतुलित करता है, क्योंकि बिना जनेऊ की साधारण परिस्थिति में आदमी का ज्यादा झुकाव दाईं तरफ ही होता है। इसे शौच के समय तब तक दाएं कान पर लटका कर रखा जाता है, जब तक आदमी शौच से निवृत होकर जल से पवित्र न हो जाए। इसके दो मुख्य लाभ हैं। एक तो यह कि शौच-स्नान आदि के समय क्रियाशील रहने वाले मूलाधार चक्र की शक्तिशाली ऊर्जा कुंडलिनी को लगती रहती है, और दूसरा यह कि आदमी की अपवित्र अवस्था का पता अन्य लोगों को लगता रहता है। इससे एक फायदा यह होता है कि इससे शौच के माध्यम से फैलने वाले संक्रामक रोगों से बचाव होता है, और दूसरा यह कि शौच जाने वाले आदमी की शक्तिशाली कुंडलिनी ऊर्जा का लाभ उसके साथ उसके नजदीकी लोगों को भी मिलता है, क्योंकि इससे वे उस ऊर्जा का गलत मतलब निकालने से होने वाले अपने नुकसान से बचे रह कर कुंडलिनी लाभ प्राप्त करते हैं। इसी तरह कमर के आसपास बाँधी जाने वाली मेखला से नाभि चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र स्वस्थ रहते हैं, जिससे पाचन सामान्य बना रहता है, और प्रॉस्टेट जैसी समस्याओं से भी बचाव होता है। यह अलग बात है कि क्रूर और अत्याचारी मुगल हमलावर औरंगजेब जनेऊ के कुंडलिनी विज्ञान को न समझते हुए प्रतिदिन तब खाना खाता था, जब तथाकथित काफ़िर लोगों के गले से सवा मन जनेऊ उतरवा लेता था। अफ़सोस की बात कि आज के वैज्ञानिक और लोकतान्त्रिक युग में भी विशेष वर्ग के लोग उसे अपना रोल मॉडल समझते हैं।

अब तो पुष्प खिलने दो, अब तो सूरज उगने दो~कुंडलिनी रूपकात्मक आध्यात्मिक कविता

अब तो पुष्प खिलने दो

अब तो सूरज उगने दो।

भौँरा प्यासा घूम रहा

हाथी पगला झूम रहा।

पक्षी दाना चौँच में लेके

मुँह बच्चे का चूम रहा।

उठ अंगड़ाई भरभर के अब

नन्हें को भी जगने दो।

अब तो पुष्प--

युगों युगों तक घुटन में जीता

बंद कली बन रहता था।

अपना असली रूप न पाकर

पवनवेग सँग बहता था।

मिट्टी खाद भरे पानी सँग

अब तो शक्ति जगने दो।

अब तो पुष्प ---

लाखों बार उगा था पाकर

उपजाऊ मिट्टी काया।

कंटीले झाड़ों ने रोका या

पेड़ों ने बन छाया।

खिलते खिलते तोड़ ले गया

जिसके भी मन को भाया।

हाथी जैसे अभिमानी ने

बहुत दफा तोड़ा खाया।

अब तो इसको बेझिझकी से

अपनी मंजिल भजने दो।

अब तो पुष्प--

अबकी बार न खिल पाया तो

देर बहुत हो जाएगी।

मानव के हठधर्म से धरती

न जीवन दे पाएगी।

करो या मरो भाव से इसको

अपने काम में लगने दो।

अब तो पुष्प --

मौका मिला अगर फिर भी तो

युगों का होगा इंत-जार।

धीमी गति बहुत खिलने की

एक नहीं पंखुड़ी हजार।

प्रतिस्पर्धा भी बहुत है क्योंकि

पूरी सृष्टि खुला बजार।

बीज असीमित पुष्प असीमित

चढ़ते मंदिर और मजार।

पाखण्डों ढोंगों से इसको

सच की ओर भगने दो।

अब तो पुष्प खिलने दो

अब तो सूरज उगने दो।

कुंडलिनी के लिए संस्कार या सत्संग का महत्त्व

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में संस्कारों के बारे में बात कर रहा था। जितने लोगों तक किसी आदमी की अच्छी प्रतिज्ञा या अच्छे काम या अच्छे आचरण का सन्देश जाता है, मन पर उसका संस्कार उतना ही मजबूत बनता है। इसी संस्कार के लिए ही तो लोग ब्लॉग लिखते हैं, लेख लिखते हैं, प्रचार करते हैं, सशुल्क या निःशुल्क शिविर लगाते हैं, छोटे-बड़े समारोहों का आयोजन करते हैं, आदि। जिसको जितनी ज्यादा भीड़ मिलती है, वह उतना ज्यादा सफल माना जाता है। इन क्रियाकलापों के लिए कई बार काफी खर्चा करना पड़ता है, कई बार सस्ते में हो जाता है। कई बार बड़ों और गुरु लोगों की कृपा से मुफ्त में भी हो जाता। मैं इसी मामले में जागृति से जुड़ी अपने साथ घटी घटना बताता हूँ। कॉलेज टाइम में गुरुजनों की कृपा से मुझे एक पत्रिका में लेख लिखने का मौका मिला था। मैंने दो-तीन लेख लिख के दे दिए, जो सौभाग्यवश एक पेज पर छप गए। वे लेख सामान्य शरीरविज्ञान दर्शन, मानवता धर्म, प्रेम, देशप्रेम, कर्मयोग, तन्त्र और काव्य से संबंधित थे। मुझे उससे एक नई पहचान मिली। उससे मेरे मन पर इतना गहरा संस्कार पड़ गया कि मैं खूब क्रियाशील हो गया और दिन दोगुनी रात चौगुनी तरक्की करने लगा। मुझे तो लगता है कि कई वर्षों के भौतिक विकास के बाद जब मेरे मन में वह संस्कार-रूपी बीज भरापूरा वृक्ष बन गया, तभी मुझे जागृति की दूसरी झलक मिली, जिससे मेरे से शरीरविज्ञान दर्शन की रचना पुस्तक के रूप में पूर्ण हुई, अन्य भी बहुत सी पुस्तकों की रचना हुई, और कुंडलिनी ब्लॉग लिखने में भी काफी हद तक सफलता मिली। मतलब कि मैं पहले पुस्तकों को व्यवहारिक जीवन में खूब जिया हूँ, बाद में मैंने उस जीवन को पुस्तकों और ब्लॉग के रूप में उतारा है। ऐसा नहीं है कि मैं पैदा हुआ, और लिखने बैठ गया। वह तो नकल होती है। असली लेखन वह है जिसमें अपना जीवन कागज पर उतरता हुआ दिखे। उस समय मेरे यौन हॉर्मोन्स का स्तर काफी उच्च था, जैसा कि उस उम्र में सबका होता ही है। पर मुझे लगता है कि जागृति की प्रथम झलक और कुंडलिनी के कारण मेरा कुछ ज्यादा ही और आध्यात्मिक रूप से विशिष्ट था। सम्भवतः इसी वजह से वह शुभ संस्कार इतनी दृढ़ता से जम गया हो, जो ताउम्र मेरे से जुड़ा रहने के लिए बेताब लगता था। मुझे यह भी लगता है कि जागृति की पहली झलक के बाद मेरा पुराना संघर्षमय जैसा बालजीवन एकदम से मेरे मन में ध्वस्त जैसा हो गया था। उससे मेरा मन एक बच्चे की तरह साफ हो गया था, बिना लिखे नए ब्लैकबोर्ड की तरह। बच्चे की तरह मेरा रूपांतरण चल रहा था, जिससे मेरा मन-मस्तिष्क उसी की तरह बहुत ज्यादा ग्रहणशील हो गया था। इसीसे उस शुभ संस्कार ने मेरे मन में इतनी सकारात्मक और चिरस्थायी क्रियाशीलता पैदा कर दी कि उसने कालांतर में मुझे जागृति की दूसरी झलक भी दिखला दी। इसीलिए कहा जाता है कि बच्चों को अच्छे संस्कार देने चाहिए। इससे स्पष्ट हो जाता है कि बच्चों में अच्छे संस्कार डालने वाले सुसंस्कृत शिक्षक का समाज में इतना ज्यादा महत्त्व क्यों बताया गया है। सर्वप्रथम शिक्षिका माँ होती है। उसके द्वारा दिए संस्कारों का प्रभाव मनुष्य पर सबसे ज्यादा होता है। इसीलिए कहा गया है कि रमन्ते तत्र देवताः, नार्यस्यत्र पूज्यंते। शिवाजी महाराज को माँ जीजाबाई से जन्म से ही (यूँ कहो कि गर्भ से ही) संस्कार मिलने शुरु हो गए थे, इसी वजह से वे आक्रमणकारी मुगलों से सनातन धर्म की रक्षा कर सके। संस्कारों का प्रभाव कई जन्मों तक मन पर पड़ा रहता है। मैंने बहुत पहले एक बात सुनी-पढ़ी थी। रूस की एक 80 वर्ष की बुजुर्ग महिला ने स्कूल की पढ़ाई शुरु की। जब उससे पूछा गया कि वह पढ़ाई उसके किस काम आएगी, तो उसने जवाब दिया कि वह उसके अगले जन्म में काम आएगी। मतलब वह अगले जन्म के लिए पढ़ रही थी। उसने यह पढ़ी-पढ़ाई बात नहीं की होगी पर अपने अनुभव और अनुमान आदि के आधार पर कही होगी, क्योंकि पुनर्जन्म का बोलबाला हिन्दू धर्म में ही लगता है मुझको। स्वस्थ समाज का निर्माण स्वस्थ मन से होता है। स्वस्थ मन का निर्माण स्वस्थ संस्कारों से होता है। स्वस्थ संस्कारों का निर्माण स्वस्थ शिक्षा प्रणाली से होता है। हिंदी में एक कहावत है, काँटे का मुँह शुरु से ही पैना होता है। इसका मतलब है कि किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का पता उसके बचपन में ही चल जाता है। इसलिए यह कहावत भी संस्कारों का महत्त्व प्रदर्शित करती है।

उपरोक्त उदाहरण से यह मतलब भी निकलता है कि यह जरूरी नहीं है कि संस्कारों के निर्माण के लिए बड़े-बड़े और महंगे समारोहों पर ही निर्भर रहा जाए। हालाँकि इनसे समाज में उत्तम प्रथा बनी रहती है। रोज जो प्रातः संस्कृत मन्त्र बोले जाते हैं, वे भी संस्कारों का निर्माण करते हैं। उन मन्त्रों की शक्ति यही है कि वे अवचेतन मन पर गहरा प्रभाव डालकर संस्कार बनाते हैं। संस्कृत मंत्रों से कुंडलिनी शक्ति इसलिए भी मिलती है, क्योंकि इनको गाते समय साँसें लम्बी, गहरी, धीमी और नियमित हो जाती हैं। सांसों के साथ इनका तालमेल होता है। मन्त्र का कुछ भाग अंदर जाती हुई लम्बी गहरी सांस के साथ गाया जाता है, तो कुछ भाग बाहर निकलती हुई लम्बी गहरी सांस के साथ। अधिकांश मामलों में तो सिर्फ बाहर जाती सांस के साथ ही गाया जाता है। अंदर जाती गहरी सांस पर तो सिर्फ ध्यान दिया जाता है। सांस पर ध्यान देने से और ज्यादा कुंडलिनी-अद्वैत का लाभ मिलता है। इससे संस्कार और अधिक मजबूत हो जाता है। सांसों और मंत्र-शब्दों पर अनासक्तिपूर्ण ध्यान जाने से अद्वैत व साक्षीभाव का उदय होता। चालीसा आदि बोलने से भी इसी मनोवैज्ञानिक सिद्धांत से लाभ मिलता है। वैसे कुछ न कुछ लाभ तो हर किसी गाने को गाकर मिलता है। यह गायन का आध्यात्मिक मनोविज्ञान है। मैं जब बचपन में नानी के घर जाया करता था, तो मेरे नानाजी मुझे और मेरे दोनों लगभग हमउम्र मामाओं को ऐसे बहुत से प्रातःकालीन मंत्र बार-बार बुला कर याद कराया करते थे, जो मुझे अभी तक याद हैं। एक सार्वभौमिक उदारता का निर्माण करने वाला वैदिक संस्कृत मन्त्र बताता हूँ। सह नाववतु सह नौ भुनक्तौ सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। इसका अर्थ है, हमारी साथ-साथ रक्षा हो, मतलब हम सब एकदूसरे की रक्षा करें, हम सब साथ मिलकर खाएं मतलब कोई भूखा न रहे या सबको रोजगार मिले, हम सब साथ-साथ मिलकर बल का प्रयोग करें मतलब हम सब एकदूसरे की सहायता करें। हमारे द्वारा प्राप्त की गई विद्या तेज अर्थात व्यावहारिकता के प्रकाश से परिपूर्ण हो मतलब सिर्फ किताबी न हो, हम एकदूसरे से द्वेष अर्थात नफरत न करें। यह बहुत शक्तिशाली मंत्र है, और ज्यादा नहीं तो कम से कम इसे तो प्रतिदिन प्रातः जरूर बोलना चाहिए। गा कर बोलने पर तो यह और ज्यादा आकर्षक और प्रभावशाली लगता है। इसमें ‘मा’ शब्द विशेष प्रभावशाली है। इसका अर्थ वैसे तो ‘न’ होता है, पर यह मन पर माँ अर्थात माता के प्रभाव को भी पैदा करता है। इससे मन बच्चे की तरह भोला और ग्रहणशील बन जाता है। इसलिए गाते समय मा शब्द को दीर्घता और गुरुता प्रदान करनी चाहिए। प्रसिद्ध भारतीय नारा, ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ भी तो सरल शब्दों में यही मंत्र है। इसमें संदेह नहीं कि यह देश के लोगों में अच्छे संस्कार डालने का प्रयास है, जो कालांतर में जरूर फलीभूत होगा। गजब का मनोविज्ञान छिपा होता है संस्कृत मन्त्रों में। अगर इनका गहराई से अध्ययन किया जाए, तो बहुत सी रहस्यात्मक शक्तियाँ हाथ लग सकती हैं। वैदिक मंत्र होने के कारण इसकी संस्कृत का व्याकरण और अर्थ ज्यादा स्पष्ट नहीं है। वैदिक मंत्र ऐसे ही होते हैं। इनमें सस्पेंस जैसा होता है। यह इसलिए ताकि बेशक ये स्थूल रूप से समझ न आए, पर अपने विशेष उच्चारण और शब्द रचना के साथ मन पर गहरा सूक्ष्म संस्कार छोड़ते हैं, जो स्थूल समझ से कहीं ज्यादा शक्तिशाली होता है। सस्पेंस में भी बहुत शक्ति होती है। इससे आदमी विचारों का घोड़ा तेजी से दौड़ाता है, और बहुत सी मंजिलें आसानी से पा लेता है। इसीलिए सस्पेंस से भरी फिल्में बहुत लोकप्रिय होती हैं। मेरे द्वारा लिखे बताए गए उपरोक्त लेख भी भरपूर सस्पेंस से भरे थे, इसीसे उनसे इतनी शक्ति मिली। मुझे तो मिली ही, पर मुझे लगता है कि अन्य अनेक लोगों को भी मिली, जिन्होंने ये पढ़े थे। उनसे दोहरे अर्थ निकलते थे, भौतिक भी और आध्यात्मिक भी, सभ्य भी और असभ्य भी, धार्मिक भी और अधार्मिक भी, व्यंग्यात्मक भी और गम्भीर भी, आलोचनात्मक भी और विश्लेषणात्मक भी। कभी उनमें अश्लीलता नजर आती थी तो कभी तांत्रिक मनोविज्ञान। उनके साथ शरीरविज्ञान दर्शन का ऐसा तड़का लगा था कि ये उपरोक्त परस्पर विरोधी भाव उनमें एकसाथ भी नजर आते थे, और कुछ भी नजर नहीं आता था। सबकुछ शून्य के जैसे सन्नाटे की तरह लगता था। इसी वजह से वे हरेक किस्म के लोगों को पसंद आए। साथ में, उनमें कुछ थ्रिल भी था। मुझे तो लगता है कि पुराणों की कथाएँ इसीलिए बहुत प्रभावशाली होती हैं, क्योंकि उनमें भरपूर सस्पेंस और थ्रिल होता है। बाहुबली फ़िल्म इतनी लोकप्रिय क्यों हुई। उसमें शुरु से लेकर सस्पेंस बनाया हुआ था, जो फिल्म के दूसरे भाग के अंत में जाकर खत्म हुआ। थ्रिल भी उसमें बहुत और एक आभासिक या पौराणिक प्रकार का था। इसी तरह, एक और मंत्र है, ‘कराग्रे वसते लक्ष्मी—-‘आदि। यह सुबह सो कर उठकर हथेली की ओर देखकर बोला जाता है। यह शरीरविज्ञान दर्शन सम्मत है, क्योंकि इससे हाथ में अर्थात शरीर में पूरे ब्रह्मांड का अनुभव होता है। पौराणिक मन्त्रों का व्याकरण स्पष्ट होता है और इनकी शब्दरचना भी स्पष्ट होती है, इसलिए इनमें वैदिक मन्त्रों जितनी अदृश्य शक्ति नहीं होती। कई लोग अपने असभ्य आचरण के लिए दूसरों को दोष देते हैं। पर वास्तव में दोष उनके अंदर अच्छे संस्कारों की कमी का है। यह अलग बात है कि अच्छे संस्कारों की कमी के लिए कुछ हद तक पूरा समाज जिम्मेदार होता है। अच्छे संस्कार न डालने के लिए कभी माँबाप पर दोषारोपण होता है, कभी गुरुजनों पर तो कभी परिवारजन, मित्र, रिश्तेदार आदि अन्य निकटवर्ती सुपरिचित लोगों पर। हालांकि अपने संस्कारों के लिए आदमी स्वयं भी जिम्मेवार होता है। आदमी के पिछले जन्मों के संस्कार ही यह निश्चय करते हैं कि वह किस प्रकार के संस्कार ग्रहण करेगा। तभी तो आपने देखा होगा कि कई बार बहुत बुरे परिवार में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी बहुत बड़ा महात्मा बनता है। दरअसल वह पिछले जन्म के अच्छे संस्कारों के कारण अपने वर्तमान जीवन में बुरे संस्कारों की तरफ आकृष्ट नहीं होता, बल्कि वह अच्छे संस्कारों की तरफ भागता है, बेशक वे परिवार के बाहर ही क्यों न हों। इसी तरह, कई बार सभ्य परिवार का कोई सदस्य भी कई बार दुरात्मा बन जाता है। इस छोटी सी कहावत के बहुत बड़े मायने हैं, ‘बोए बीज बबूल का, आम कहाँ से होए’।

कुंडलिनी के लिए संस्कारों का महत्त्व

भौतिक उपलब्धियां अल्प अवधि में भी प्राप्त की जा सकती हैं। पर कुंडलिनी की प्राप्ति के लिए बहुत लंबा समय लग जाता है। अधिकांश मामलों में तो एक पूरा जीवन भी थोड़ा पड़ने से कई जन्मों के प्रयास की आवश्यकता लगती है। अगले जन्म का क्या पता कि कहाँ मिले, कैसा मिले। इसलिए प्रयास होना चाहिए कि इसी एक मनुष्य-जीवन में कुंडलिनी की प्राप्ति हो जाए। ऐसा केवल संस्कारों से ही सम्भव हो सकता है। यदि जन्म से ही आदमी को कुंडलिनी के संस्कार देना शुरु कर दिया जाए, और यह सिलसिला उम्रभर जारी रखा जाए, तभी यह हो पाना सम्भव लगता है। प्राचीन भारतीय हिंदू परंपरा में ऐसा होता भी था। यह कोई झूठी शेखी बघारने वाली बात नहीं है। कदम-कदम पर देवमन्दिर होते थे। आध्यात्मिक उत्सव-पर्व होते रहते थे। हरेक क्रियाकलाप के साथ अध्यात्म जुड़ा होता था। ज्योतिष पर लोगों की आस्था होती थी। चारों ओर वैदिक कर्मकांड का बोलबाला था। वर्णाश्रम धर्म अपने श्रेष्ठ रूप में विद्यमान था। हरेक आदमी के सोलह संस्कार कराए जाते थे। यह सब कुंडलिनी के लिए ही तो था। यह सब कुंडलिनी विज्ञान है, आध्यात्मिक मनोविज्ञान है। बड़े-बूढ़े लोग जब संस्कार प्रदान करते थे, तब उनके व्यक्तित्व की छाप बच्चों के मन पर गहरी पड़ जाती थी। इससे बच्चा बड़ा होकर एकसाथ दो जीवन जीता था, अपना भी और अपने पूर्वज का भी। उदाहरण के लिए मान लो एक व्यक्ति अपने पौत्र को कुंडलिनी संस्कार देता है। इससे पौत्र के मन में अपने दादा के प्रति अच्छे भाव पैदा हो जाते हैं। इससे अनजाने में ही दादा के जीवन-अनुभवों का लाभ पौत्र को मिलने लगता है। मतलब कि दादा बिना मरे ही पौत्र के रूप में दूसरा जीवन जी रहा है, अर्थात दादा की उम्र दुगुनी हो गई है, और पौत्र को अपनी आयु के साथ दादा की दुगुनी आयु भी प्राप्त होती है। इससे पौत्र की आयु तिगुनी मानी जाएगी, अर्थात 300 साल। अब यह समझ लो कि पौत्र ने लगातार 300 साल तक कुंडलिनी योग किया है। इतने समय की साधना से बहुत संभव है कि उसे कुंडलिनी जागरण हो जाए। पौत्र का अपना असली जीवन तो सौ साल का ही है, पर उसे संस्कारों के कारण तीन सौ सालों का लाभ मिल रहा है। यही कारण है कि हिंदू शास्त्रों में वर्णित कालगणना के मामले में भ्रम पैदा होता है। वहाँ किसी की आयु 300, किसी की 500 या किसी की हजारों साल की बताई गई है। इसी तरह कोई सैंकड़ों सालों तक तप-साधना करता है, तो कोई हजारों सालों तक। दरअसल यह वास्तविक उम्र या समय नहीं होता, बल्कि संस्कारों के कारण मिल रहा इतनी उम्र या समय का लाभ है। उपरोक्त उदाहरण में, इसी तरह दादा भी दो उम्रों को एकसाथ जीता है, एक अपनी और एक अपने पौत्र की। अगर बुढ़ापे से उनकी मृत्यु भी हो जाए, तब भी उन्हें अगले जन्म में पिछले जन्म की दोनों उम्रों का लाभ मिलता है, संस्कारों के कारण। एक-दूसरों से जीवन का साझाकरण संस्कारों से ही सम्भव है। हिंदु अध्यात्म में गुरु परम्परा भी संस्कार को बढ़ाने के लिए ही है। यदि किसी की गुरु परम्परा 10 गुरुओं से चली आ रही है, तो वर्तमान काल के गुरु की सांस्कारिक उम्र 1000 साल मानी जाएगी। मतलब उसे 1000 साल लम्बी चलने वाली कुंडलिनी योगसाधना का लाभ एकदम से अपने आप मिल जाएगा। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि हरेक गुरु अपने शिष्य अर्थात भावी गुरु को संस्कारों के रूप में अपना सारा जीवन देते आए हैं, जिससे संस्कार उत्तरोत्तर बढ़ते रहे। इसी तरह, यदि किसी का वंश 10 पीढ़ियों से चलता आ रहा है, तो उसकी वर्तमान पीढ़ी के व्यक्ति की सांस्कारिक उम्र 1000 साल मानी जाएगी। आपस में जितना अधिक भावनात्मक और प्रेमपूर्ण सम्बंध बना होगा, संस्कारों का उतना ही अधिक लाभ मिलेगा। यदि एक परिवार दस पीढ़ियों से लगातार आध्यात्मिक जीवन पद्धति को जीता आ रहा है, तो उसकी वर्तमान समय की दसवीं पीढ़ी के सदस्य को समझा जाएगा कि वह बिना मृत्यु को प्राप्त हुए, एक हजार वर्षों से लगातार आध्यात्मिक जीवन पद्धति को जीता आ रहा है। इसका मतलब है कि जो जीवन पद्धति या परंपरा जितनी अधिक पुरातन है, उसमें उतना ही ज्यादा संस्कारों का बल है। इस हिसाब से तो हिंदु या वैदिक परंपरा सबसे शक्तिशाली है, क्योंकि यह सबसे पुरातन है। अगर मैं आज शिवपुराण को रहस्योद्घाटित कर रहा हूँ, तो इसका यह मतलब भी हो सकता है कि मैं इसके लेखक ऋषि के संस्कार को पीढ़ी दर पीढ़ी परम्परा से प्राप्त कर रहा हूँ। परम्परा में संस्कार छिपे होते हैं, इसलिए हमें परम्परा को विलुप्त नहीं होने देना है। अगर उसे युग के अनुरूप भी ढालना है, तो उसके मूल रूप से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिये। प्रसिद्ध चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस कहते हैं कि नयापन इस तरह लाओ कि पुरानापन भी जीवित रहे। परम्परा से कटा आदमी डोरी से कटी पतंग की तरह दिशाहीन हो जाता है। हालांकि आज हमें उपरोक्त वैदिक परंपरा या जीवन पद्धति की तरह अन्य पुरातन परम्पराएँ भी अजीब सी लगती हैं। यह ऐसा इसलिए है क्योंकि आज ये विकृत हो गई हैं, अपने असली स्वरूप में नहीं हैं। आज ये ढोंग या दिखावा बन कर रह गई हैं। आज इनमें शक्ति नहीं है। आज हम बहुत आदर्शवादी बन गए हैं, जिससे अपनी असली संस्कृति भूल सी गए हैं। यह ऐसे है, जैसे शिवपुराण में कथा आती है कि त्रिपुरासरोंको पथभ्रष्ट करने के लिए भगवान विष्णु ने सिर मुंडवाए हुए बौद्ध-जैन भिक्षु जैसे लोग पैदा किए। वे शिवलिंग, वेदों, यज्ञों व उनमें दी जाने वाली पशु बलि के विरोध में छद्म अहिंसा आदि का उपदेश देते हुए अपने मायामय धर्म का प्रचार करने लगे। इससे महिलाएं कुलटा हो गईं। जिससे सब शक्तिहीन हो गए। वे भिक्षु मुंह पर कपड़ा जैसा बाँध रखते थे, और बहुत धीरे चलते थे, ताकि पैर के नीचे दब कर किसी चींटी आदि सूक्ष्म जीव की हत्या न हो जाए। शिवलिंग पूजा छोड़ने से सब तन्त्र से विमुख हो गए। उन्हें शक्तिहीन जानकर देवताओं ने अच्छा मौका जानकर उन त्रिपुरासरों को शिव से मरवा दिया। फिर वे मुंडी लोग भगवान नारायण के पास जाकर कहने लगे कि आपका काम हो गया, अब आप बताएं हम कहाँ जाएं। नारायण ने उन्हें रेगिस्तान चले जाने का निर्देश दिया और कहा कि कलियुग में फिर दुनिया में फैल जाना। आज के कलियुग में यह बात सच होती हुई लग रही है। मैं इस कथा का रहस्योद्घाटन अगली पोस्ट में करूंगा।

उपरोक्त बातों से सिद्ध होता है कि संस्कारों के बिना कुंडलिनी दुर्लभ है। संस्कार के साथ शुभ लगाने की जरूरत नहीं, क्योंकि इसका मतलब ही शुभ संस्कार बनता है। विशेष संस्कार बताने के लिए विशेष शब्द जोड़ सकते हैं, जैसे भौतिक संस्कार, स्वच्छता के संस्कार आदि। क्योंकि कुंडलिनी आध्यात्मिक संस्कार से मिलती है, इसलिए इस कुंडलिनी विषयक वेबसाइट में संस्कार का मतलब आध्यात्मिक संस्कार ही समझा जाएगा, जो शुभ संस्कार का ही एक प्रकार है। बुरे संस्कार के साथ बुरा या अशुभ जोड़ना पड़ता है। यह समझा जा सकता है कि बच्चे से कुंडलिनी योग या अन्य आध्यात्मिक क्रियाकलाप आसानी से नहीं कराया जा सकता, पर संस्कार तो डाला जा सकता है। यही संस्कार रूपी बीज कालांतर में कब महान वृक्ष बनेगा, किसीको पता भी नहीं चलेगा। संस्कार संगति से बनता है। इसीलिए अच्छी संगति की अध्यात्म में बहुत बड़ी महिमा है। थोड़ी सी संगति से भी अनगिनत लोग, यहाँ तक कि अन्य जीव भी भवसागर से तर गए हैं। शास्त्र ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं। उदाहरण के लिए, एक कौवा मंदिर पर चढ़ाया हुआ प्रसाद खाता था। संगति या संस्कार के प्रभाव से वह अगले जन्म में साधु बना और मुक्त हो गया। कोई जीव या मनुष्य किसी साधु की कुटिया के सानिध्य में रहकर मुक्त हो गया, आदि। वृंदावन में तो भगवान कृष्ण की संगति से फूल-पौधे भी तर गए। यह सब संस्कार या संगति का ही चमत्कार है। बिना किए ही सबकुछ हो जाता है। संस्कार की तरह संगति का मतलब भी यहाँ शुभ या आध्यात्मिक संगति ही समझना चाहिए। तत्त्वतः संगति और संस्कार में कोई अंतर नहीं है।

कुंडलिनी ही साँसें हैं, साँसें ही कुंडलिनी हैं

मित्रों, पिछले ब्लॉग लेखों में जो लिखा गया है कि ठंडे मौसम में ठंडे जल से नहाने वाली ऋषिपत्नियों अर्थात छः चक्रों ने वीर्यशक्ति को ग्रहण किया, यह मुझे ईसाइयों के बैप्टिसम संस्कार की तरह ही लगता है। बैप्टिसम में भी नंगे शरीर पर ठंडा पानी गिराया जाता है। इससे चक्र खुल जाते हैं, और शक्ति का संचार सुधर जाता है। साथ में, नंगा शरीर होने से मन में एक बालक के जैसा अनासक्ति भाव औऱ अद्वैत छा जाता है। इससे भी शक्ति के संचरण और कुंडलिनी की अभिव्यक्ति में मदद मिलती है। मुझे तो प्रतिदिन नहाते हुए अपने बैप्टिसम के जैसा अनुभव होता है। इससे सिद्ध होता है कि योग और बैप्टिसम के पीछे एक ही सिद्धांत काम करता है। साथ में, छः ऋषिपत्नियों अर्थात छः चक्रों के द्वारा कबूतर बने अग्निदेव से वीर्यतेज ग्रहण करने के बारे में लिखा गया है, वे स्वाधिष्ठान चक्र को छोड़कर शेष छः चक्र भी हो सकते हैं। वह इसलिए क्योंकि खुद स्वाधिष्ठान चक्र तो उस कबूतर बने अग्निदेव का हिस्सा है। सहस्रार में कुंडलिनी से अद्वैत भाव पैदा होता है। चन्द्रमा अद्वैत का प्रतीक है, क्योंकि इसमें प्रकाश और अंधकार दोनों समान रूप में विद्यमान होते हैं। इसीलिए सूर्य को अस्त होते हुए और चन्द्रमा को उदय होते दिखाया गया है। उसी अद्वैत अवस्था के दौरान कुंडलिनी आज्ञा चक्र और फिर हृदय चक्र को उतर जाती है। हृदय चक्र को ही कई योगी असली चक्र मानते हैं। उनका अनुभव है कि आत्मज्ञान व मुक्ति की ओर रास्ता हृदय से जाता है, मस्तिष्क से नहीं। मुझे भी ऐसा कई बार लगता है। प्रेम से जो मुक्ति कही गई है, वह हृदय से ही तो है, क्योंकि प्रेम हृदय में ही बसता है। किसी भी भावनात्मक मनःस्थिति में कुंडलिनी हृदय में विराजमान होती है। विपरीत परिस्थितियों में वह भावनात्मक सदमे और उसके परिणामस्वरूप हृदयाघात से भी बचाती है। इसीलिए तो पशुओं से प्रेम करने को कहा जाता है। पशु का नियंत्रक हृदय है, मस्तिष्क नहीं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि वे बोल नहीं सकते। इसलिए उनकी मानसिक विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम भावनाप्रधान हृदय ही है। आप भी किसी दिन मौनव्रत धारण करके देख लें। पूरे दिनभर आपकी कुंडलिनी हृदय में रहेगी। मौनव्रत की अपार महिमा है। गाय में हृदय का प्रभाव सभी पशुओं से श्रेष्ठ है, इसीलिए हिंदु धर्म में गाय को बड़ा महत्त्व दिया जाता है। इसीलिए आजकल कॉमिउनिकेशन के नाम से गाय के साथ रहने का चलन बढ़ा है। इससे बढ़ा हुआ रक्तचाप सामान्य हो जाता है, और तनाव से राहत मिलती है। दरअसल ऐसा कुंडलिनी शक्ति के द्वारा अनाहत चक्र पर डेरा लगा लेने से होता है। इसलिए कुंडलिनी योग हमेशा करते रहना चाहिए। बुरे वक्त में कुंडलिनी ही सभी शारीरिक व मानसिक हानियों से बचाती है। कुंडलिनी जागरण की झलक के एकदम बाद बहुत से लोगों को नीचे उतरती हुई कुंडलिनी का ऐसा ही अनुभव होता है। इस तरह कुंडलिनी सभी चक्रों में फैल जाती है। इसीको इस तरह से लिखा गया है कि चन्द्रमा ने शिव को बताया कि कृत्तिकाएँ कार्तिकेय को अपने साथ ले गईं। जो शाख अर्थात इड़ा नाड़ी और वैशाख अर्थात पिंगला नाड़ी से कार्तिकेय अर्थात कुंडलिनी पुरुष का शक्तिमान होना कहा गया है, वह मेरे अपने अनुभव के अनुसार भी है। मुझे तो सुषुम्ना की तरह ही इड़ा और पिंगला से भी अपनी कुंडलिनी सुदृढ़ होती हुई महसूस होती है, बशर्ते कि दोनों नाड़ियाँ साथसाथ या एकदूसरे के निकट रहें। जब ये दोनों संतुलित नहीं होती, तब इनसे कुंडलिनी सहस्रार को नहीं जाती, और अन्य चक्रों पर भी कम ही रहती है, हालांकि शरीर के अंदर या बाहर कहीं भी महसूस होती है। इसलिए वह माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट लूप में कम ही घूम पाती है। हालाँकि उसकी शक्ति तो बढ़ती ही है, पर वह सुस्त व अव्यवस्थित सी रहती है, जिससे आदमी भी वैसा ही रहता है। सम्भवतः इसीलिए कहा जाता है कि कुंडलिनी योग साधना की तकनीक सही होनी चाहिए, बिना तकनीक के हर कहीं ध्यान नहीं लगाना चाहिए। कुंडलिनी माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट लूप में घूमती रहनी चाहिए। आध्यात्मिक समाज में यह बात भी फैली हुई है कि कुंडलिनी इड़ा और पिंगला में नहीं जानी चाहिए। सम्भवतः यह बात अनुभवी व एक्सपर्ट कुंडलिनी योगी के लिए कही गई है। दरअसल आम दुनियादारी में इनके बिना कुण्डलिनी का सुषुम्ना में सीधे प्रवेश करना बहुत कठिन है। इसका मतलब है कुण्डलिनी का ध्यान कहीं पर भी लग जाए, लगा लेना चाहिए। इड़ा और पिंगला में भटकने के बाद वह देरसवेर सुषुम्ना में चली ही जाती है। इसीलिए लौकिक मंदिरों व आध्यात्मिक क्रियाकलापों में कहीं भी ध्यान की पद्धति नहीं दर्शाई होती है। बस मूर्तियों आदि के माध्यम से ध्यान को ही महत्त्व दिया गया होता है। क्रौंच पर्वत की उपमा हमने आज्ञाचक्र को दी। उत्तराखंड में वास्तविक क्रौंच पर्वत भी है। वहाँ भगवान कार्तिकेय का मंदिर है। कहते हैं कि वहाँ से हिमालय के लगभग 80% शिखर साफ नजर आते हैं। वहाँ घना जंगल है, और चारों ओर प्राकृतिक सौंदर्य बिखरा हुआ है। दरअसल पिंड और ब्रह्मांड में कोई अंतर नहीं है। जो भौतिक रचनाएं इस शरीर में हैं, बाहर भी वे ही हैं अन्य कुछ नहीं। यह अलग बात है कि शरीर में उनका आकार छोटा है, जबकि विस्तृत जगत में बड़ा है। हालांकि आकार सापेक्ष होता है, एब्सोल्यूट या असली नहीँ। यह सिद्धांत पुस्तक ‘शरीरविज्ञान दर्शन’ में विज्ञान की कसौटी पर परख कर साबित किया गया है। मुझे लगता है कि पहले पुराणों की रचना हुई, फिर उनमें दर्शाए गए रूपकात्मक और मिथकीय स्थानों को बाहर के स्थूल जगत में दिखाया गया। इसका एक उद्देश्य धार्मिकता व अध्यात्मिकता को बढ़ावा देना हो सकता है, तो दूसरा उद्देश्य व्यावसायिक व धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देना भी हो सकता है। ऐसे नामों के अनगिनत उदाहरण हैं। पुराणों में गंगा सुषुम्ना नाड़ी को कहा गया है, पर लोक में इसे उत्तराखंड से निकलने वाली एक नदी के रूप में दिखाया जाता है। जैसे सुषुम्ना शरीर के बीचोंबीच सफर करती है, उसी तरह गंगा नदी भी भारतीय भूभाग के बीचोंबीच बहती है। जैसे सुषुम्ना पूरे शरीर को मस्तिष्क से जोड़ती है, वैसे ही गंगा नदी पूरे भारतीय भूभाग को हिमालय से जोड़ती है।हिमालय को इसीलिए देश का मस्तक कहा जाता है। कैलाश रूपी सहस्रार भी मस्तक में ही होता है। गंगा में स्नान से मुक्ति प्राप्त होने का अर्थ यही है कि सुषुम्ना नाड़ी में बह रही कुंडलिनी ऊर्जा जब सहस्रार में बसे जीवात्मा को प्राप्त होती है, तो उसके पाप धुल जाने से वह पवित्र हो जाता है, जिससे मुक्ति मिल जाती है। पर आम लोगों ने उसे साधारण भौतिक नदी समझ लिया। उसमें स्नान करने के लिए लोगों की लाइन लग गई। वैसे तो आध्यात्मिक प्रतीकों से कुछ अप्रत्यक्ष लाभ तो मिलता ही है, पर उससे सुषुम्ना नाड़ी में नहाने से मिले लाभ की तरह प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिल सकता।

देवताओं के द्वारा शिव के समक्ष कार्तिकेय से संबंधित गवाही देना जीवात्मा के द्वारा शरीर की गतिविधियों को अनुभव करना है

ध्यान से अपने शरीर का अवलोकन करना ही शिव के द्वारा देवताओं की सभा बुलाना है। ऐसी सभा का वर्णन मैंने अनायास ही अपनी पुस्तक शरीरविज्ञान दर्शन में की है। मुझे लगता है कि सम्भवतः मैं पिछले जन्म में शिवपुराण का गहन जानकार होता था। इस जन्म में तो मैंने कभी शिव पुराण पढ़ा नहीं था, फिर कैसे मेरे से उससे हूबहू मिलती जुलती हालाँकि आधुनिक विज्ञानवादी पुस्तक शरीरविज्ञान दर्शन की रचना हो गई। या फिर भटकती हुई मानवसभ्यता पर दया करते हुए शिव की ही आज्ञा या प्रेरणा हो कि उनके द्वारा प्रदत्त लुप्तप्राय विद्या को पुनर्जीवित किया जाए। यह भी हो सकता है कि मेरे परिवार का संस्कार मेरे ऊपर बचपन से ही पड़ा हो, क्योंकि मुझे याद आता है कि मेरे दादाजी शिवपुराण को बहुत पसंद करते थे, और उसे विशेष रूप से पढ़ा करते थे। फिर जीवात्मा को कार्तिकेय जन्म की घटना की असलियत का पता चलना ही देवताओं द्वारा शिव को वस्तुस्थिति से अवगत कराना है। उस वीर्यतेज को कुंडलिनी पुरुष के रूप में जीवात्मा के अनुभव में न लाना ही उसकी चोरी है। क्योंकि वह शरीर के अंदर ही रहता है, इसलिए उसकी चोरी का शक देवताओं के ऊपर ही जाता है, जो पूरे शरीर का नियमन करते हुए शरीर में ही स्थित हैं। वीर्य की दाहकता ही वीर्यचोर को दिया गया श्राप है। रक्तसंचार के वेग से ही अँगों को प्राण मिलता है। उसी प्राण से उन अंगों के सम्बंधित चक्र क्रियाशील हो जाते हैं, जिससे वहाँ कुंडलिनी भी चमकने लगती है। उदाहरण के लिए यौनोत्तेजना के समय वज्रप्रसारण उसमें रक्त के भर जाने से होता है। मैं यहाँ बता दूं कि जो कुंडलिनी-नाग का ऊपर की ओर रेंगना बताया गया है, वह वज्र प्रसारण के बाद के वज्र संकुचन से होता है। इसके साथ सहस्रार से लेकर मूलाधार तक फैली नाग की आकृति की सुषुम्ना नाड़ी का ध्यान किया जाता है। वज्र उस नाग की पूंछ है, पैल्विक घेरा नाग का चौड़ है, पीठ के केंद्र से होकर वह ऊपर खड़ा है, मस्तिष्क में उसके अनगिनत फन फैले हैं, और उस नाग का अंत आज्ञा चक्र पर केंद्रीय फन के रूप में होता है। वज्र प्रसारण के बाद इस ध्यान से उत्पन्न वज्र संकुचन से ऐसा लगता है कि नाग ऊपर की तरफ रेंगते हुए सहस्रार में पहुंच गया और उसके साथ कुंडलिनी पुरुष भी सहस्रार में चमकने लगता है। यदि नाग की पूँछ का ऐसा ध्यान करो कि वह आगे से ऊपर चढ़कर आज्ञा चक्र को छू रही है, मतलब नाग की पूँछ उसके सिर को छूकर एक गोल छल्ला जैसा बना रही है, तब यह रेंगने की अनुभूति ज्यादा होती है। फिर वह आज्ञा चक्र से होते हुए आगे से नीचे उतरता है। इस तरह एक लूप सा बन जाता है, जिस पर गशिंग व ऑर्गैस्मिक ब्लिस फील के साथ एनर्जी लगातार घूमने लगती है। यह प्रक्रिया कुछ क्षणों तक ही रहती है। फिर मांसपेशियों की निरंतर व स्पासमोडिक किस्म की सिकुड़न से शरीर थक जाता है। यह सिकुड़न जैसा घटनाक्रम ज्यादातर लगभग एक ही लम्बी व अटूट सांस में होता है। सम्भवतः इसीलिए सांस को ज्यादा देर तक रोकने के लिए योगी को प्राणायाम का अभ्यास कराया जाता है। फिर कई घण्टों के उपयुक्त क्रियाकलापों से या आराम से ही इसे दुबारा से सही ढंग से करने की शक्ति हासिल होती है। वज्र में रक्त भर जाने से स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र पर कुंडलिनी की अभिव्यक्ति बढ़ जाती है। उसी रक्त को रूपक में दुग्ध कहा गया है, क्योंकि दुग्ध रक्त से ही बना है। दुग्ध अन्य कुछ नहीं बल्कि एक प्रकार से छना हुआ रक्त ही है। दुग्ध इसलिए भी कहा गया है क्योंकि तांत्रिक कुंडलिनी मूलाधार से हृदय चक्र तक ही सबसे ज्यादा जाती है। वह वक्षस्थल पर होता है, जहाँ पर दुग्ध के स्रोत स्तन भी होते हैं। मिस्र की अँखिन्ग तकनीक में भी कुंडलिनी यौनांग से पीछे के हृदय चक्र तक जाती है। उसे फिर अँखिन्ग लूप से पीछे से ऊपर ले जाकर सिर के ऊपर से घुमा कर वापिस आगे से नीचे ले जाकर आगे के हृदय चक्र तक उतारा जाता है। सम्भवतः इसी तकनीक से कृतिका डर गई हो। अँखिन्ग लूप में कुंडलिनी का बारबार घूमना ही कार्तिकेय का कृत्तिका को आश्वासन देना और उससे बारबार मिलने आना है। जैसे ही लंबी-गहरी-धीमी और ध्यान लगाई गई साँसों की सहायता से होने वाली संकुचन -प्रसारण जैसी तांत्रिक क्रिया से शक्ति को मूलाधार से ऊपर पीठ से होते हुए मस्तिष्क की ओर चढ़ाया जाता है, वैसे ही वज्र संकुचित हो जाता है, और उसके साथ कुंडलिनी भी ऊपर चली जाती है। फिर जिस चक्र पर वह प्राण शक्ति जाती है, रक्त या दुग्ध भी वहीं चला जाता है, जिसका पीछा करते हुए कुण्डलिनी पुरुष भी। हालांकि उन चक्रों पर हमें वज्र प्रसारण की तरह कोई तरलजनित प्रसारण अनुभव नहीं होता, क्योंकि वे क्षेत्र शरीर में गहरे और दृढ़तापूर्वक स्थित होते हैं। कई बार उल्टा भी होता है। किसी चक्र पर यदि कुंडलिनी पुरुष का ध्यान किया जाए, तो शक्ति खुद ही वहाँ के लिए दौड़ पड़ती है। इसीलिए कार्तिकेय को षण्मुखी कहा गया है क्योंकि यह छहों चक्रों पर प्राणों से अर्थात दुग्ध से पोषण प्राप्त करता है। रक्त क्योंकि जल देवता के आधिपत्य में आता है, इसीलिए कहा गया है कि जलदेवता ने बताया कि कृत्तिकाएँ उस नवजात बालक को स्तनपान कराती हैं। पौराणिक युग के पुराण रचनाकार गजब के अध्यात्म वैज्ञानिक होते थे। जो शिवगण कृत्तिकाओं से कार्तिकेय को लेने जाते हैं, वे तांत्रिक क्रियाएं ही हैं, जो चक्रों से कुण्डलिनी को सहस्रार की तरफ खींचती हैं। वे क्रियाएँ साधारण हठयोग वाली संकुचन-प्रसारण वाली या वीभत्स प्रकार की पँचमकारी भी हो सकती हैं, इसीलिए कृत्तिकाओं का उनसे डरना दिखाया गया है। स्वाभाविक है कि कुंडलिनी के साथ ही वहाँ से रक्तसंचार भी जाने लग पड़ता है, इसलिए वे मुरझा कर पीली सी पड़ने लगती हैं अर्थात डरने लगती हैं। कुंडलिनी योग से कुंडलिनी का बार-बार चक्रों की ओर लौटना ही कार्तिकेय का अपनी माता को पुनः वापिस लौटने का आश्वासन देना है। इससे वे नए रक्तसंचार से प्रफुल्लित होने लगती हैं, अर्थात उनका भय खत्म हो जाता है। कई लोग बोलते हैं कि उनकी कुंडलिनी किसी चक्र पर फंसी हुई है, और चलाने पर भी नहीं चलती। दरअसल जब कुंडलिनी है ही नहीं, तो चलेगी कैसी। कई बार कमजोर कुंडलिनी भी एक जगह अटक जाती है, कमजोर आदमी की तरह। ताकतवर कुंडलिनी को कोई चलने से नहीं रोक सकता। तांत्रिक पँचमकारों से कुण्डलिनी को अतिरिक्त शक्ति मिलती है। कुंडलिनी को अभिव्यक्त करने का सबसे आसान तरीका बताता हूँ। लम्बी-गहरी-धीमी साँसें लो और उस पर ध्यान देकर रखो। इधर-उधर के विचारों को भी अपने आप आते-जाते रहने दो। न उनका स्वागत करो, और न ही अनादर। एकदम से कुंडलिनी पुरुष किसी चक्र पर अनुभव होने लगेगा। फिर उसे अपनी इच्छानुसार चलाने लग जाओ। कुंडलिनी पुरुष को अभिव्यक्त कराने वाला दूसरा पर हल्के वाला तरीका बताता हूँ। अपने शरीर के किसी निर्वस्त्र स्थान जैसे कि हाथों पर शरीरविज्ञान दर्शन के ध्यान के साथ नजर डालो। कुंडलिनी अभिव्यक्त हो जाएगी। कुंडलिनी पुरुष और कुंडलिनी शक्ति साथसाथ रहते हैं। मानसिक ध्यान चित्र या कुंडलिनी चित्र ही कुंडलिनी पुरुष है। यही शिव भी है। यह शक्ति के साथ ही रहता है। शक्ति की बाढ़ से शिव पूर्ण रूप में अर्थात अपने असली रूप में अभिव्यक्त होता है। यही कुंडलिनी जागरण है। दरअसल अँगदर्शन वाले उपरोक्त तरीके से भी यौगिक साँसें चलने लगती है। उसीसे कुण्डलिनी चित्र अभिव्यक्त होता है। सारा कमाल साँसों का ही है। साँस ही योग है, योग ही साँस है। किसी विचार के प्रति आसक्ति के समय हमारी सांसें थम जैसी जाती हैं। जब हम फिर से स्वाभाविक साँसों को चलाना शुरु करते हैं, तो आसक्ति गायब होकर अनासक्ति में तब्दील हो जाती है। इससे परेशान करने वाला विचार भी आराम से शांत हो जाता है। इससे काम, क्रोध आदि सभी मानसिक दोष भी शांत हो जाते हैं, क्योंकि ये विकृत व आसक्तिपूर्ण विचारों की ही उपज होते हैं। अगर साँसों पर ध्यान दिया जाए, तो कुंडलिनी की शक्ति से अनासक्ति और ज्यादा बढ़ जाती है।

यब-युम तकनीक यौन तंत्र का महत्त्वपूर्ण आधारस्तंभ है

यब-युम की तकनीक भी इसी कार्तिकेय-कथा में रहस्यात्मक रूपक की तरह दर्शाई गई है। क्योंकि कथा में आता है कि कबूतर के रूप में बना गुप्तांग वीर्य को ग्रहण करके ऋषिपत्नियों के रूप में बने चक्रों को प्रदान करते हैं। उन में उससे गर्भ बन जाता है, जो कुंडलिनी पुरुष के रूप में विकसित होने लगता है। यब-युम में भी तो यही किया जाता है। यब-युम की युग्मावस्था में यह वीर्यतेज का स्थानांतरण बहुत तेजी से होता है। इसमें पुरुष-स्त्री का जोड़ा अपने सभी युग्मित चक्रों पर एकसाथ ध्यान लगाता है। उससे दो मूलाधरों की ऊर्जा एकसाथ बारी-बारी से सभी चक्रों पर पड़ती है। उससे वहाँ तेजी से कुंडलिनी पुरुष प्रकट हो जाता है, जो वीर्यतेज से और तेजी से बढ़ने लगता है। यह तन्त्र की बहुत कारगर तकनीक है। इस तकनीक के बाद ऐसा लगता है कि मूलाधार व स्वाधिष्ठान चक्रों और सम्बंधित अँगों का दबाव एकदम से कम हो गया। दरअसल वहां से वीर्यतेज चक्रों पर पहुंच कर वहाँ कुंडलिनी पुरुष बन जाता है। यही ऋषिपत्नियों के द्वारा गर्भ धारण करना है। ऐसे लम्बे अभ्यास के बाद सुषुम्ना नाड़ी पूरी खुल जाती है। फिर चक्रों पर स्थित वह तेज एकदम से सुषुम्ना से ऊपर चढ़कर सहस्रार में भर जाता है। यह कुंडलिनी जागरण या प्राणोत्थान है। यही ऋषिपत्नियों के द्वारा गर्भसहित वीर्यतेज को गंगा नदी को प्रदान करना है। गंगा के द्वारा किनारे में उगी सरकंडे की घास को प्रदान करना है, और उस पर एक शिशु का जन्म है। यह रूपक पिछले कुछ लेखों में विस्तार से वर्णित किया गया है। यहाँ ध्यान देने योग्य मुख्य बिंदु है कि शिवलिंग भी यब-युम का ही प्रतीक है। इसी वजह से शिवलिंगम की अराधना से भी यब-युम के जैसा लाभ प्राप्त होता है। और तो और, हठयोग के आसनों को भी इसी वीर्य ऊर्जा को पूरे शरीर में वितरित करने के लिए बनाया गया है, ऐसा लगता है। ऐसे प्रत्यक्ष अनुभव से ही पाश्चात्य देशों में यह धारणा बनी हुई है कि योगासन संभोग शक्ति को बढ़ाते हैं।

शिवपुराण में साफ लिखा है कि शिव के वीर्य से उत्पन्न कार्त्तिकेय अर्थात कुंडलिनी पुरुष ही तारकासुर अर्थात आध्यात्मिक अज्ञान को मारकर उससे मुक्ति दिला सकता है, अन्य कुछ नहीं। इससे यह क्यों न मान लिया जाए कि यौनयोग ही आत्मजागृति के लिए आधारभूत व मुख्य तकनीक है, अन्य बाकि तो सहयोगी क्रियाकलाप हैं। अगर गिने चुने लोगों को जागृति होती है, तो अनजाने में इसी यौन ऊर्जा के मस्तिष्क में प्रविष्ट होने से होती है। यह इतनी धीरे होता है कि उनको इसका पता ही नहीं चलता। इसलिए वे जागृति का श्रेय अपने रंगबिरंगे क्रियाकलापों और चित्रविचित्र मान्यताओं को देते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उनकी जागृति के समय वे उन-उन प्रकार के क्रियाकलापों या मान्यताओं से जुड़े होते हैं। इससे आपसी विवाद भी पैदा होता है। अन्धों की तरह कोई हाथी की पूंछ पकड़कर उसे असली हाथी बताता है, तो कोई हाथी की सूंड को। असली हाथी का किसीको पता नहीं होता। ऐसा भी हो सकता है कि अपनी विशिष्ट मान्यताओं या क्रियाओं से मूलाधार की यौन शक्ति हासिल हो, पर आदमी शर्म के कारण उसके यौनता से जुड़े अंश को जगजाहिर न करता हो। हम अन्य तकनीकों का विरोध नहीं करते। पर हैरानी इसको लेकर है कि मुख्य तकनीक व सिद्धांत को सहायक या गौण बना दिया गया है, और सहायक तकनीकों को मुख्य। जब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा तब स्वाभाविक है कि बहुत से लोगों को स्पष्ट व वैज्ञानिक रूप से जागृति होगी, संयोगवश गिनेचुने लोगों को ही नहीं। अक्सर लोग बाहरी अलंकारों और रूपकों में डूबे होते हैं, असल चीज का पता ही नहीं होता। मुझे तो वे समझ भी नहीं आते, और उनका रहस्य समझे बिना वे किसी दिव्य ग्रह की कथाएं लगती हैं। मैं फेसबुक पर देखता रहता हूँ। डाकिनी, काली आदि देवियों के कितने ही नाम इस मूल सिद्धांत से जोड़े गए हैं। सभी पन्थों और संप्रदायों ने अपनेअपने हिसाब से नाम दिए हैं। मूल चीज एक ही है। ऐसी बात भी नहीं है कि जागृति के मूल वैज्ञानिक सिद्धांत का पता न हो लोगों को। योग शास्त्रों में साफ लिखा है कि कुंडलिनी मूलाधार में ही रहती है, अन्यत्र कहीं नहीं। तो फिर इधर-उधर क्यों भागा जाए। मूलाधार में ही शक्ति को क्यों न ढूंढा जाए। दरअसल इसको व्यावहारिक रूप में नहीं, बल्कि अलंकार या रूपक की तरह माना गया। रूपक बनाने से यह नुकसान हुआ कि लोगों को पता ही नहीं चला कि क्या रूपक है और क्या असली। जिन्होंने इसे कुछ समझा, वे संभोग के सिवाय अन्य सभी टोटकों की सहायता लेने लगे मूलाधार की शक्ति को जागृत करने के लिए। सम्भवतः ऐसा सामाजिक संकोच व लज्जा के कारण हुआ। महिलाएं तो इस बारे में ज्यादा ही अनभिज्ञ और संकोची बनती हैं, जबकि पुराने जमाने में महिलाएं ही सफल तन्त्रगुरु हुआ करती थीं। एक तरफ तो मान रहे हैं कि कुंडलिनी मूलाधार में ही रहती है, और कहीं नहीं, और दूसरी तरफ उस संभोग को नकार रहे हैं, जो मूलाधार की शक्ति को जगाने के लिए सबसे प्रत्यक्ष और शक्तिशाली क्रिया है। विचित्र सा विरोधाभास रहा यह। सम्भवतः शक्ति की कमी भी इसमें कारण रही। समाज के जरूरत से ज्यादा ही आदर्शवादी और अहिंसक बनने से शरीर में शक्ति की कमी हो गई। शक्ति की कमी होने पर संभोग में रुचि कम हो जाती है। अंडे का सेवन एक उचित विकल्प हो सकता है। अंडा तो शाकाहारी भोजन ही माना जा सकता है, क्योंकि उसमें जीवहिंसा नहीं होती। वह तो दूध की तरह ही पशु का बाइप्रोडक्ट भर ही है। उसमें सभी पोषक तत्त्व संतुलित मात्रा में होते हैं। अंडा यौन उत्तेजना को भी बढ़ाता है, इसलिए तन्त्र के हिसाब से इसका सेवन सही होना चाहिए। आजकल के विकसित व वैज्ञानिक युग में तो यौनता के प्रति संकोच कम होना चाहिए था। विज्ञान की बदौलत आजकल अनचाहे गर्भ का भय भी नहीं है। बेशक तांत्रिक संभोग के साथ कंडोम का प्रयोग नहीं किया जा सकता, क्योंकि तांत्रिक क्रियाओं से वज्र लगातार संकुचित व प्रसारित होता रहता है, जिससे वह अंदर फंस सकता है। एड्स आदि यौन रोगों के संचरण का खतरा बढ़ सकता है इसके बिना। पर ऐसी नौबत ही नहीं आती क्योंकि यौनतन्त्र एक ही जीवनसाथी अर्थात पत्नी के साथ ही सिद्ध होता है। तन्त्र में वैसे भी दूसरों की बेटियों व पत्नियों को यौनतन्त्र साथी बनाना वर्जित है। कामभाव जागृत करने के लिए सभ्य तरीके से अप्रत्यक्ष सम्पर्क या हंसीमजाक तो चलता रहता है। फिर भी बहुत से गर्भनिरोधक उपाय हैं। हॉर्मोन की गोलियां हैं। हालांकि इनको लम्बे समय तक लगातार रोज लेना पड़ता है, जिससे दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं। यदि तांत्रिक अभ्यास के समय असुरक्षित चक्र-काल में गल्ती से योनि में स्खलन हो भी जाए, तो गर्भ रोकने के लिए अन्य हॉर्मोनल दवाइयां हैं, जैसे कि विकल्प-72, जिसे स्खलन के बाद के 72 घण्टे के अंदर लेने पर गर्भ नहीं ठहरता। यदि किसी कारणवश उसे न लिया जा सके, या बहुत विरले मामले में वह फेल हो जाए, तो एबॉर्शन पिल नाम से अन्य हॉर्मोनल दवाइयां मिलती हैं, जिन्हें माहवारी मिस होने के बाद जितना जल्दी लिया जाए, उतना अच्छा परिणाम मिलता है। ऐसे यूजर फ्रेंडली मिनीकिट उपलब्ध हैं, जिनसे माहवारी मिस होने के दिन से अगले 2-3 दिन में ही गर्भ ठहरने का पता चल जाता है। वैसे तो इन सबकी जरूरत ही नहीं पड़ती यदि यौनतन्त्र के प्रारम्भिक अभ्यास के समय सुरक्षित काल में ही संभोग किया जाए। यह समय माहवारी के पहले दिन समेत माहवारी चक्र के प्रथम सात दिन और अंतिम 7 दिन हैं। इन दिनों में स्खलन होने पर भी गर्भ नहीं बनता, क्योंकि इन दिनों में शुक्राणुओं को अण्डाणु उपलब्ध नहीं होता। यह समय सीमा उनके लिए है, जिनमें चक्र काल 28 दिनों का है, और हरबार इतना ही और अपरिवर्तित रहता है। यदि काल इससे कम-ज्यादा हो, तो उसी हिसाब से सुरक्षित काल कम-ज्यादा हो जाता है। यदि यह काल बराबर नहीं तब भी धोखा लग सकता है। हालाँकि कोई भी गर्भनिरोधक तरीका 100 प्रतिशत नहीं है, पर सभी तरीके मिलाकर तो लगभग 100 प्रतिशत सुरक्षा दे ही देते हैं। कई बार प्रीइजेक्युलेट में भी थोड़े से शुक्राणु होते हैं। पर वे अक्सर गर्भ के लिए नाकाफी होते हैं। वैसे हल्के तरीके ही काफी हैं। कॉपर टी, नलबंदी, नसबंदी जैसे जटिल तरीकों की तो जरूरत ही नहीं पड़ती अधिकांशतः। मैं एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट में पढ़ रहा था जिसमें एक तंत्राभ्यासी कह रहे थे कि आजकल जनसंख्या व बेरोजगारी अधिक है, इसलिए यौन तन्त्र से समस्या आ सकती है। इसलिए यौन तन्त्र का अभ्यास करें तो सावधानी से करें, और यह मान कर चलें कि यदि अनचाहा गर्भ ठहर जाए तो उसे खुशी-खुशी स्वीकार करने में ही भलाई है। पर आज के वर्तमान दौर में ये सब बातें पुरानी हो गई हैं। गर्भ भी उसी प्रकार की प्रचण्ड यौन ऊर्जा से बनता है, जिससे जागृति मिलती है। जिस सुस्त व आलसी संभोग से गर्भ नहीं बन सकता, उससे जागृति भी नहीं मिल सकती। इसीलिए तो देवी पार्वती को हैरानी हुई कि भगवान शिव के शक्तिशाली संभोग से उपजे शक्तिशाली वीर्य से गर्भ तो अवश्य बनना था, वह वीर्य असफल नहीं हो सकता था। पर वह गर्भ गया कहाँ। बाद में पता चला कि वह गर्भ सहस्रार में जागृति के रूप में प्रकट हुआ। इससे स्वाभाविक है कि पुराने जमाने में संभोग तन्त्र से लोगों को परहेज होना ही था, क्योंकि इससे गर्भ ठहरने की पूरी संभावना होती है, और भौतिक विज्ञान की कमी से उस समय भौतिक गर्भनिरोधक तकनीकों और ज्ञान का अभाव तो था ही। ऐसी जानकारियों वाली बातें लिखने और पढ़ने में ही अच्छी लगती हैं, इन्हें बोलने और सुनने में संकोच और लज्जा जैसी महसूस होती है। इसी वजह से तो आजकल के चैटिंग के युग में देखने में आता है कि कई बार एक देवी सदृश और पतिव्रता नारी भी, जिससे ऐसी बातें बोलने और सुनने की कल्पना भी नहीं की जा सकती, वह भी अपने मोबाइल फोन पर इतनी अश्लील चैटिंग कर लेती है कि लेखन के जादू पर उसको भी यकीन होने लगता है जो लेखन का धुर विरोधी रहा हो।

ढाई आखर प्रेम का पढ़ ले जो कोई वो ही ज्ञानी

बोल नहीं सकता कुछ भी मैं
घुटन ये कब तुमने जानी।
चला है पदचिन्हों पर मेरे
मौनी हो या फिर ध्यानी।

मरने की खातिर जीता मैं
जीने को मरते हो तुम।
खोने का डर तुमको होगा
फक्कड़ का क्या होगा गुम।
हर पल एकनजर से रहता
लाभ हो चाहे या हानि।
बोल नहीं सकता ----

मेरे कंधों पर ही तुमने
किस्मत अपनी चमकाई।
मेरे ही दमखम पर तुमने
धनदौलत इतनी पाई।
निर्विरोध हर चीज स्वीकारी
फूटी-कौड़ी जो पाई।
खाया सब मिल-बाँट के अक्सर
बन इक-दूजे संग भाई।
कर्म-गुलामी की पूरी, ले
कुछ तिनके दाना-पानी।
बोल नहीं---

तेज दिमाग नहीं तो क्या गम
तेज शरीर जो पाया है।
सूंघे जो परलोक तलक वो
कितनी अद्भुत काया है।
मेरा इसमें कुछ नहीं यह
सब ईश्वर की माया है।
हर-इक जाएगा दुनिया से
जो दुनिया में आया है।
लगती तो यह छोटी सी पर
बात बड़ी और सैयानी।
बोल नहीं---

हूँ मैं पूर्वज तुम सबका पर
मेरा कहा कहाँ माना।
क़ुदरत छेड़ के क्या होता है
तुमने ये क्यों न जाना।
याद करोगे तुम मुझको जब
याद में आएगी नानी।
बोल--

मरा हमेशा खामोशी संग
तुम संग भीड़ बहुत भारी।
तोड़ा हर बंधन झटक कर
रिश्ता हो या फिर यारी।
मुक्ति के पीछे भागे तुम
यथा-स्थिति मुझे प्यारी।
वफा की रोटी खाई हरदम
तुमको भाए गद्दारी।
कर-कर इतना पाप है क्योंकर
जरा नहीं तुमको ग्लानि।
बोल नहीं---

लावारिस बन बीच सड़क पर
तन मेरा ठिठुरता है।
खुदगर्जी इन्सान की यारो
कैसी मन-निष्ठुरता है।
कपट भरे विवहार में देखो
न इसका कोई सानी।
बोल नहीं---

रोटी और मकान बहुत है
कपड़े की ख्वाइश नहीं।
शर्म बसी है खून में अपने
अंगों की नुमाइश नहीं।
बेहूदे पहनावे में तुम
बनते हो बड़े मानी।
बोल नहीं----

नशे का कारोबार करूँ न
खेल-मिलावट न खेलूँ।
सारे पुट्ठे काम करो तुम
मार-कूट पर मैं झेलूँ।
क्या जवाब दोगे तुम ऊपर
रे पापी रे अभिमानी।
बोल नहीं----

पूरा अपना जोर लगाता
जितना मेरे अंदर हो।
मेरा जलवा चहुँ-दिशा में
नभ हो या समंदर हो।
बरबादी तक ले जाने की
क्यों तुमने खुद को ठानी।
बोल नहीं सकता--

खून से सींचा रे तुझको फिर
भूल गया कैसे मुझको।
रब मन्दर मेरे अंदर फिर
भी न माने क्यों मुझको।
लीला मेरी तुझे लगे इक
हरकत उल्टी बचकानी।
बोल नहीं---

कुदरत ने हम दोनों को जब
अच्छा पाठ पढ़ाया था।
भाई बड़ा बना करके तब
आगे तुझे बढ़ाया था।
राह मेरी तू क्या सुलझाए
खुद की जिससे अनजानी।
बोल नहीं--

लक्ष्य नहीं बेशक तेरा पर
मुंहबोला वह है मेरा।
मकड़जाल बुन बैठा तू जो
उसने ही तुझको घेरा।
याद दिलाऊँ लक्ष्य तुम्हारा
बिन मस्तक अरु बिन बानी।
बोल नहीं---

प्यार की भाषा ही समझूँ मैं
प्यार की भाषा समझाऊँ।
प्यार ही जन्नत प्यार ही ईश्वर
प्यार पे बलिहारी जाऊँ।
ढाई आखर प्रेम का पढ़ ले
जो कोई वो ही ज्ञानी।
बोल नहीं--
@bhishmsharma95

कुंडलिनी पुरुष के रूप में भगवान कार्तिकेय का लीला विलास

मित्रो, मुझे भगवान कार्तिकेय की कथा काफी रोचक लग रही है। इसमें बहुत से कुंडलिनी रहस्य भी छिपे हुए लगते हैं। इसलिए हम इसे पूरा खंगालेंगे। शिवपुराण के अनुसार ही, फिर सरकंडे पर जन्मे उस बालक को ऋषि विश्वामित्र ने देखा। बालक ने उन्हें अपना वेदोक्त संस्कार कराने के लिए कहा। जब विश्वामित्र ने कहा कि वे क्षत्रिय हैं, ब्राह्मण नहीं, तब कार्तिकेय ने उनसे कहा कि वे उसके वरदान से ब्राह्मण हो गए। फिर उन्होंने उसका संस्कार किया। तभी वहाँ छः कृत्तिकाएँ आईं। जब वे उस बालक को लेकर लड़ने लगीं, तो वह छः मुंह बनाकर छहों का एकसाथ स्तनपान करने लगा। अग्निदेव ने भी उसे अपना पुत्र कहकर उसे शक्तियां दीं। उन शक्तियों को लेकर वह करौंच पर्वत पर चढ़ा और उसके शिखर को तोड़ दिया। तब इंद्र ने नाराज होकर उस पर वज्र से कई प्रहार किए, जिनसे शाख, वैशाख और नैगम तीन पुरुष पैदा हुए और वे चारों इंद्र को मारने के लिए दौड़ पड़े। कृत्तिकाओं ने अपना दूध पिलाकर कार्तिकेय को पाला पोसा, और जगत की सभी सुख सुविधाएं उसे दीं। उसे उन्होंने दुनिया की नजरों से छिपाकर रखा कि कहीं उस प्यारे नन्हें बालक को कोई उनसे छीन न लेता। 
पार्वती ने शंकित होकर शिव से पूछा कि उनका अमोघ वीर्य कहाँ गया। उसे किसने चुराया। वह निष्फल नहीं हो सकता। भगवान शिव जब पार्वती के साथ व अन्य देवताओं के साथ अपनी सभा में बैठे थे, तो उन्होंने सभी देवताओं से इस बारे पूछा। उन्होंने कहा कि जिसने भी उनके अमोघ वीर्य को चुराया है, वह दण्ड का भागी होगा, क्योंकि जो राजा दण्डनीय को दण्ड नहीं देता, वह लोकनिंदित होता है। सभी देवताओं ने बारी-बारी से सफाई दी, और वीर्यचोर को भिन्न-भिन्न श्राप दिए। तभी अग्निदेव ने कहा कि उन्होंने वह वीर्य शिव की आज्ञा से सप्तऋषियों की पत्नियों को दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने वह हिमालय को दे दिया। हिमालय ने बताया कि वह उसे सहन नहीं कर पाया और उसे गंगा को दे दिया। गंगा ने कहा कि उस असह्य वीर्य को उसने सरकंडे की घास में उड़ेल दिया। वायुदेव बोले कि उसी समय वह वीर्य एक बालक बन गया। सूर्य बोले कि रोते हुए उस बालक को देख न सकने के कारण वह अस्ताचल को चला गया। चन्द्रमा बोला कि कृत्तिकाएँ उसे अपने घर ले गईं। जल बोला कि उस बालक को कृत्तिकाओं ने स्तनपान कराके बड़ा किया है। संध्या बोली कि कृत्तिकाओं ने प्रेम से उसका पालन पोषण करके कार्तिक नाम रखा है। रात्रि बोली कि वे कृत्तिकाएँ उसे अपनी आँखों से कभी दूर नहीं होने देतीं। दिन बोला कि वे कृत्तिकाएँ उसे श्रेष्ठ आभूषण पहनाती हैं, और स्वादिष्ट भोजन कराती हैं। इससे शिवपार्वती, दोनों बड़े खुश हुए, और समस्त जनता भी। तब शिव के गण दिव्य विमान लेकर कृतिकाओं के पास गए। जब कृतिकाओं ने उसे देने से मना किया तो गणों ने उन्हें शिवपार्वती का भय दिखाया। कृत्तिकाएँ डर गईं तो कार्तिकेय ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि उसके होते हुए उन्हें डरने की आवश्यकता नहीं। उन्होंने रोते हुए कार्तिकेय को हृदय से लगाकर उसीसे पूछा कि वह कैसे उन अपनी दूध पिलाने वाली माताओं से अलग हो पाएगा, जो एकपल के लिए भी उसे अपनी नजरों से ओझल नहीं होने देतीं। कार्तिकेय ने कहा कि वह उनसे मिलने आया करेगा। दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर कार्तिकेय शिवपार्वती के पास कैलाश पर आ गया। हर्षोल्लास का पर्व मनाया गया। शिवपार्वती ने उसे गले से लगा लिया। कार्तिकेय के दिव्य तेज से प्रभावित होकर बहुत से लोग उसके भक्त बन कर उसकी स्तुति करने लगे। वे उसे शिव की प्राप्ति कराने वाला और जन्ममरण से मुक्ति देने वाला कहते। वे उसे अपना सबसे प्रिय इष्टदेव कहते। एक आदमी का यज्ञ के लिए बंधा बकरा कहीं भाग गया था। सबने उसे ब्रह्मांड में हर जगह ढूंढा, पर वह नहीं मिला। फिर वह आदमी भगवान कार्तिकेय के पास आकर उनसे प्रार्थना करने लगा कि वे ही उस बकरे को ला सकते हैं, नहीं तो उसका अजमेध यज्ञ नष्ट हो जाएगा। कार्तिकेय ने वीरबाहु नामक गण को पैदा करके उसे वह काम सौंपा। वह उसे ब्रह्मांड के किसी कोने से बांध कर ले आया और कार्तिकेय के समक्ष उस आदमी को सौंप दिया। कार्तिकेय ने उसपर पानी छिड़कते हुए उससे कहा कि वह बकरा बलिवध के योग्य नहीं, और उसे उस आदमी को दे दिया। वह कार्तिकेय को धन्यवाद देकर चला गया।

उपर्युक्त कुंडलिनी रूपक का रहस्योद्घाटन

विश्वामित्र ने कुंडलिनी का अनुभव किया था। वे क्षत्रिय थे पर कुंडलिनी के अनुभव से उनमें ब्रह्मतेज आ गया था। उसी कुंडलिनी पुरुष अर्थात कार्तिकेय के अनुभव से ही वे ब्रह्मऋषि बने। कुंडलिनी से ब्रह्मऋषित्व है, जाति या धर्म से ही नहीं। कार्तिकेय का संस्कार करने का मतलब है कि उन्होंने कुंडलिनी पुरुष को अपनी योगसाधना से प्रतिष्ठित किया। छः कृत्तिकाएँ छः चक्र हैं। कुंडलिनी पुरुष अर्थात कुंडलिनी चित्र कभी किसी एक चक्र पर तो कभी किसी अन्य चक्र पर जाता हुआ सभी चक्रों पर भ्रमण करता है। इसीको उनका आपस में लड़ना कहा गया है। फिर योगी ने तीव्र योगसाधना से उसे सभी चक्रों पर इतनी तेजी से घुमाया कि वह सारे चक्रों पर एकसाथ स्थित दिखाई दिया। यह ऐसे ही है कि यदि कोई जलती मशाल को तेजी से चारों ओर घुमाए, तो वह पूरे घेरे में एकसाथ जलती हुई दिखती है। इसीको कार्तिकेय का छः मुख बनाना और एकसाथ छहों कृत्तिकाओं का दूध पीना कहा गया है। चक्रों पर कुंडलिनी पुरुष के ध्यान से उसे बल मिलता है। इसे ही कार्तिकेय का दूध पीना कहा गया है। रोमांस से सम्बंधित विषयों को ‘हॉट’ भी कहा जाता है। इसलिए उन विषयों पर अग्निदेव का आधिपत्य रहता है। क्योंकि कुंडलिनी पुरुष की उत्पत्ति इन्हीं विषयों से हुई, इसीलिए वह अग्निदेव का पुत्र हुआ। उत्पत्ति होने के बाद भी कुंडलिनी पुरुष को तांत्रिक योग से बल मिलता रहा, जिसमें प्रणय प्रेम की मुख्य भूमिका होती है। इसीको अग्निदेव के द्वारा कार्तिकेय को बल देना कहा गया है। फिर कुंडलिनी उससे शक्ति लेकर आज्ञाचक्र के ऊपर आ गई। मूलाधार और आज्ञाचक्र आपस में सीधे जुड़े हुए दिखाए जाते हैं। इसको कार्तिकेय का क्रौंच पर्वत पर चढ़ना बताया गया है। क्रौं से मिलता जुलता सबसे नजदीकी शब्द क्रांति है। क्रांतिकारी चक्र आज्ञा चक्र को भी कह सकते हैं। आज्ञाचक्र एक बुद्धिप्रधान चक्र है। क्रांति बुद्धि से ही होती है, मूढ़ता से नहीं। क्रौंच पर्वत के शिखर को तोड़ता है, मतलब तेज, जजमेंटल और द्वैतपूर्ण बुद्धि को नष्ट करता है। अहंकार से भरा जीवात्मा कुंडलिनी को सहस्रार में जाने से रोकना चाहता है। उसी अहंकार को इंद्र कहा गया है। उसके द्वारा कुंडलिनी को रोकना ही उसके द्वारा कार्तिकेय पर वज्र प्रहार है। कुंडलिनी आज्ञाचक्र पर तीन नाड़ियों से आती है। ये नाड़ियां हैं, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना। इससे कुंडलिनी आज्ञा चक्र से नीचे आती रहती है, और तीनों नाड़ियो से फिर से ऊपर जाती रहती है। इससे वह बहुत शक्तिशाली हो जाती है। यही वज्र प्रहार से कार्तिकेय से तीन टुकड़ों का अलग होना है। शाख इड़ा है, वैशाख पिंगला है, नैगम सुषुम्ना है। शाखा से जुड़ा नाम इसलिए दिया गया है, क्योंकि ये दोनों नाड़ियां टहनियों की तरह हैं। मूल वृक्ष सुषुम्ना है, इसलिए उसे नैगम नाम दिया गया है। सभी निगमों अर्थात धर्मशास्त्रों का निचोड़ सुषुम्ना ही है, इसीलिए नैगम नाम दिया गया। कुंडलिनी पुरुष अर्थात कार्तिकेय के साथ ये तीनों पुरुष इंद्र को मारने दौड़ पड़े, मतलब कुंडलिनी सहस्रार की ओर अग्रसर थी, जिससे इंद्र रूपी अहंकार का नाश होना था। सभी लोग कार्तिक की ऐसे स्तुति कर रहे हैं, जैसे कुंडलिनी पुरुषरूप देवता की स्तुति की जाती है। कुंडलिनी तांत्रिक क्रियाओं से भी शक्ति प्राप्त कर सकती है। ऐसा तब ज्यादा होता है जब कुंडलिनी की तीव्र अभिव्यक्ति के साथसाथ शारिरिक श्रम भी खूब किया जाता है। इसका अर्थ है कि कुंडलिनी ही तांत्रिक यज्ञों को सफल बनाती है। कार्तिकेय के द्वारा पैदा किए गए वीरबाहु नामक गण के द्वारा बलि के बकरे को ढूंढ कर यज्ञ को पूर्ण करना इसी सिद्धांत को दर्शाता है। वीरबाहु का मतलब है, ऐसा व्यक्ति, जो अपनी भुजाओं की शक्ति के कारण ही वीर है। यह श्रमशीलता का परिचायक है। अधिकांशतः कुंडलिनी शक्ति के प्रतीकों से ही संतुष्ट हो जाती है, शक्ति के लिए हिंसा की जरूरत ही नहीं पड़ती। इससे यह तातपर्य भी निकलता है कि कम से कम हिंसा और अधिक से अधिक आध्यात्मिक लाभ। तंत्र के नाम पर नाजायज हिंसा का विरोध करने के लिए ही यह दिखाया गया है कि कार्तिकेय ने बकरे पर जल का छिड़काव करके उसे छोड़ देने के लिए कहा। यह हिंसा का प्रतीकात्मक स्वरूप ही है। शेष अगले हफ्ते।

कुंडलिनी साहित्य के रूप में संस्कृत साहित्य एक आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक, अत्याधुनिक, और सदाबहार साहित्य है

संस्कृत साहित्य कुंडलिनी आधारित साहित्य होने के कारण ही एक अनुपम साहित्य है

दोस्तो, मैं संस्कृत साहित्य का जन्मजात शौकीन हूँ। संस्कृत साहित्य बहुत मनोरम, सजीव, जीवंत व चेतना से भरा हुआ है। एक सज्जन संस्कृत विद्वान ने बहुत वर्षों पहले ‘संस्कृत साहित्य परिचायिका’ नाम से एक सुंदर, संक्षिप्त व ज्ञान से भरपूर पुस्तक लिखी थी। उस समय ऑनलाइन पुस्तकों का युग नहीं आया था। इससे वह आजतक गुमनामी में पड़ी रही। मेरी इच्छा उसको ऑनलाइन करने की हुई। कम्प्यूटर पर टाइपिंग में समस्या आई, क्योंकि अधिकांश शब्द संस्कृत के थे, और टाइप करने में कठिन थे। भला हो एंड्रॉयड में गूगल के इंटेलिजेंट कीबोर्ड का। उससे अधिकांश टाइपिंग खुद ही होने लगी। मैं तो शुरु के कुछ ही वर्ण टाइप करता हूँ, बाकी वह खुद प्रेडिक्ट कर लेता है। आधे से ज्यादा टाइप हो गई। अधिकांश पब्लिशिंग प्लेटफोरमों पर तो मैंने इसे ऑनलाइन भी कर दिया है। शेष स्थानों पर भी मैं इसे जल्दी ही ऑनलाइन करूँगा। निःशुल्क पीडीएफ बुक के रूप में यह इस वेबसाइट के शॉप पेज पर दिए गए निःशुल्क पुस्तकों के लिंक पर भी उपलब्ध है। यह सभी साहित्यप्रेमियों के पढ़ने लायक है। आजकल किसी भी विषय का आधारभूत परिचय ही काफी है। बोलने का तात्पर्य है कि विषय की हिंट ही काफी है। उसके बारे में बाकि विस्तार तो गूगल पर व अन्य साधनों से मिल जाता है। केवल साहित्य से जुड़े हुए प्रारम्भिक संस्कार को बनाने की आवश्यकता होती है, जिसे यह पुस्तक बखूबी बना देती है। संस्कृत साहित्य का भरपूर आनंद लेने के लिए इस पुस्तक का कोई सानी नहीं है। यह छोटी जरूर है, पर गागर में सागर की तरह है। इसी पुस्तक से निर्देशित होकर मैं कालीदासकृत कुमारसम्भव काव्य की खोज गूगल पर करने लगा। मुझे पता चला कि इसमें शिव-पार्वती के प्रेम, उससे भगवान कार्तिकेय के जन्मादि की कथा का वर्णन है। कुमार मतलब लड़का या बच्चा, सम्भव मतलब उत्पत्ति। कहते हैं कि शिव और पार्वती के संभोग का वर्णन करने के पाप के कारण कवि कालीदास को कुष्ठरोग हो गया था। इसलिए वहां पर उन्होंने उसे अधूरा छोड़ दिया। बाद में उसे पूरा किया गया। कुछ लोग कहते हैं कि आम जनमानस ने शिव-पार्वती के प्रति भक्तिभावना के कारण उनके संभोग-वर्णन को स्वीकार नहीं किया। इसलिए उन्हें उसे रोकना पड़ा। पहली संभावना यद्यपि विरली पर तथ्यात्मक भी लगती है, क्योंकि वह आम संभोग नहीं है। उसका लौकिक तरीके से वर्णन नहीं किया जा सकता। वह एक तंत्रसाधना के रूप में है, और रूपकात्मक है, जैसा कि पिछली पोस्ट में दिखाया गया है। लौकिक हास्यविनोद व मनोरंजन का उसमें कोई स्थान नहीं है। इस संभावना के पीछे मनोविज्ञान तथ्य भी है। क्योंकि देवताओं के साथ बहुत से लोगों की मान्यताएं और आस्थाएँ जुड़ी होती हैं, इसलिए उनके अपमान से उनकी अभिव्यक्त बददुआ या नाराजगी की दुर्भावना तो लग ही सकती है, पर अनभिव्यक्त अर्थात अवचेतनात्मक रूप में भी लग सकती है। इस तरह से अवलोकन करने पर पता चलता है कि सारा संस्कृत साहित्य हिंदु वेदों और पुराणों की कथाओं और आख्यानों के आधार पर ही बना है। अधिकाँश साहित्यप्रेमी और लेखक वेदों या पुराणों से किसी मनपसंद विषय को उठा लेते हैं, और उसे विस्तार देते हुए एक नए साहित्य की रचना कर लेते हैं। क्योंकि वेदों और पुराणों के सभी विषय कुण्डलिनी पर आधारित होने के कारण वैज्ञानिक हैं, इसलिए संस्कृत साहित्य भी कुण्डलिनीपरक और वैज्ञानिक ही सिद्ध होता है।

विभिन्न धर्मों की मिथकीय आध्यात्मिक कथाओं के रहस्योद्घाटन को सार्वजनिक करना आज के आधुनिक, वैज्ञानिक, व भौतिकवादी युग की मूलभूत मांग प्रतीत होती है

मुझे यह भी लगता है कि आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर करने से समाज को बहुत लाभ भी प्राप्त हो सकता  है। मैं यह तो नहीं कहता कि हर जगह रहस्य को उजागर किया जाए, क्योंकि ऐसा करने से रहस्यात्मक कथाओं का आनन्द समाप्त ही हो जाएगा। पर कम से कम एक स्थान पर तो उन रहस्यों को उजागर करने वाली रचना उपलब्ध होनी चाहिए। कहते हैं कि आध्यात्मिक सिद्धांतों व तकनीकों को इसलिए रहस्यमयी बनाया गया था, ताकि आदमी आध्यात्मिक परिपक्वता से पहले उनको आजमाकर पथभ्रष्ट न होता। पर कई बार ऐसा भी होता है कि अगर आध्यात्मिक परिपक्वता से पहले ही आदमी को रहस्य की सच्चाई पता चल जाए, तब भी वह उससे तभी लाभ उठा पाएगा जब उसमें परिपक्वता आएगी। रहस्य को समझ कर उसे यह लाभ अवश्य मिलेगा कि वह उससे प्रेरित होकर जल्दी से जल्दी आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त करने की कोशिश करके आध्यात्मिक परिपक्वता को हासिल करेगा, ताकि उस रहस्य से लाभ उठा सके। साथ में, तब तक वह योग साधना के रहस्यों व सिद्धांतों से भलीभांति परिचित हुआ रहेगा। उसे जरूरत पड़ने पर वे नए और अटपटे नहीं लगेंगे। कहते भी हैं कि अगर कोई आदमी अपने पास लम्बे समय तक चाय की दुकान का सामान संभाल कर रखे तो वह एकदिन चाय की दुकान जरूर खोलेगा, और कामयाब उद्योगपति बनेगा। पहले की अपेक्षा आज के युग में आध्यात्मिक रहस्योद्घाटन को सार्वजनिक करना इसलिए भी जरूरी लगता है क्योंकि आजकल ईमानदार, व निपुण आध्यात्मिक गुरु विरले ही मिलते हैं, और जो होते हैं वे भी अधिकांशतः आम जनमानस की पहुंच से दूर होते हैं। पहले ऐसा नहीं होता था। उस समय अध्यात्म का बोलबाला होता था। आजकल तो भौतिकता का बोलबाला ज्यादा है। अगर आजकल कोई आध्यात्मिक रूप से परिपक्व हो जाए, और उसे उसकी जरूरत के अनुसार सही मार्गदर्शन न मिले, तो उसे तो बड़ी आध्यात्मिक हानि उठानी पड़ सकती है। एक अन्य लाभ यह भी मिलेगा कि जब सभी धर्मों का रहस्योद्घाटन हो जाएगा, तब सबको कुंडलिनी तत्त्व अर्थात अद्वैत तत्त्व ही अध्यात्म के मूल तत्त्व के रूप में नजर आएगा। इससे सभी धर्मों के बीच में आपसी कटुता समाप्त हो जाएगी और असल रूप में सर्वधर्मसमभाव स्थापित हो पाएगा। इससे दुनिया के अधिकांश झगड़े समाप्त हो जाएंगे।

इड़ा नाड़ी को ही ऋषिपत्नी अरुन्धती कहा गया है

अब पिछली पोस्ट में वर्णित रूपकात्मक कथा को आगे बढ़ाते हैं। उसमें जिस अरुंधति नामक ऋषिपत्नी का वर्णन है, वह दरअसल इड़ा नाड़ी है। इड़ा नाड़ी अर्धनारीश्वर के स्त्री भाग का प्रतिनिधित्व करती है। कई बार हठयोग का अभ्यास करते समय प्राण इड़ा नाड़ी में ज्यादा प्रवाहित होने लगता है। इसका मतलब है कि वह प्राण को सुषुम्ना में जाने से रोकती है। सुषुम्ना से होता हुआ ही प्राण चक्रों पर अच्छी तरह स्थापित होता है। प्राण के साथ वीर्यतेज भी होता है। इसको यह कह कर बताया गया है कि अरुंधति ने ऋषिपत्नियों को अग्नि देव के निकट जाने से रोका। पर योगी ने आज्ञाचक्र के ध्यान से प्राण के साथ वीर्यतेज को सुषुम्ना से प्रवाहित करते हुए चक्रों पर उड़ेल दिया। इसको ऐसे दिखाया गया है कि ऋषिपत्नियों ने अरुंधती की बात नहीं मानी, पर भगवान शिव के इशारे को समझा। आज्ञाचक्र शिव का प्रतीक भी है, क्योंकि वहीँ पर उनका तीसरा नेत्र है।

कुंडलिनी जागरण और कुंडलिनी योग के बीच में केवल अनुभव की मात्रा को लेकर ही भिन्नता है, अनुभव की प्रकृति को लेकर नहीं

कई जगह सहस्रार को आठवां चक्र माना जाता है। सहस्रार तक वीर्यतेज पहुंचाना अन्य चक्रों से मुश्किल होता है। जबरदस्ती ऐसा करने से सिरदर्द होने लग सकता है। इसलिए नीचे के सात चक्रों पर ही वीर्य को स्थापित किया जाता है। इसीको रूपक में ऐसा कहा गया है कि आठ में से सात ऋषिपत्नियाँ ही अग्निदेव के पास जाकर आग सेंकने लगीं। आई तो आठवी भी, पर उसने आग की तपिश नहीं ली। मतलब कि थोड़ा सा वीर्यतेज तो सहस्रार तक भी जाता है, पर वह नगण्यतुल्य ही होता है। सहस्रार तक वीर्यतेज तो मुख्यतः सुषुम्ना के ज्यादा क्रियाशील होने से उससे होकर ही जाता है। इसीको रूपक में यह कहा गया है कि गंगानदी ने शिव के वीर्य को सरकंडे की घास में उड़ेल दिया। यह हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि प्राण या वीर्यतेज या ऊर्जा या शक्ति के साथ कुंडलिनी चित्र तो रहता ही है। ये सभी नाम आपस में पर्यायवाची की तरह हैं, अर्थात सभी शक्तिपर्याय हैं। वीर्यतेज से सर्वप्रथम व सबसे ज्यादा जलन आगे के स्वाधिष्ठान चक्र पर महसूस होती है। यह उसी जननांग से जुड़ा है, जिसे पिछले लेख में कबूतर कहा गया है। उसके साथ जब चक्रों पर बारी-बारी से कुंडलिनी का भी ध्यान किया जाता है, तब वह तेज चक्रों पर आने लगता है। फिर वह चक्रों से रीढ़ की हड्डी में जाता हुआ महसूस होता है। सम्भवतः यह आगे के चक्र से पीछे के चक्र को रिस जाता है। इसीलिए आगे-पीछे के दोनों चक्र आपस में एक पतले एनर्जी चैनल से जुड़े हुए बताए जाते हैं। इसीको मिथक कथा में यह कह कर बताया गया है कि ऋषिपत्नियों ने वह वीर्य तेज हिमालय को दिया, क्योंकि पीछे वाले चक्र रीढ़ की हड्डी में ही होते हैं। पुराण बहुत बारीकी से लिखे गए होते हैं। उनके हरेक शब्द का बहुत बड़ा और गहरा अर्थ होता है। इस तेज-स्थानांतरण का आभास पीठ के मध्य भाग में नीचे से ऊपर तक चलने वाली सिकुड़न के साथ आनन्द की व नीचे के बोझ के कम होने की अनुभूति से होता है। फिर थोड़ी देर बाद उस सिकुड़न की सहायता से वह तेज सुषुम्ना में प्रविष्ट होता हुआ महसूस होता है। यह अनुभूति बहुत हल्की होती है, और खारिश की या किसी संवेदना की या यौन उन्माद या ऑर्गेज्म की एक आनन्दमयी लाइन प्रतीत होती है। यह ऐसा लगता है कि पीठ के मेरुदंड की सीध में एक मांसपेशी की सिकुड़न की रेखा एकसाथ नीचे से ऊपर तक बनती है और ऑर्गेज्म या यौन-उन्माद के आनन्द के साथ कुछ देर तक लगातार बनी रहती है। ऐसा लगता है कि वह नाड़ी सहस्रार में कुछ उड़ेल रही है। इसके साथ ही कुंडलिनी चित्र सहस्रार में महसूस होता है। अभ्यास के साथ तो हर प्रकार की अनुभूति बढ़ती रहती है। इसीको रूपक में ऐसे कहा गया है कि अग्निदेव ने वह तेज सात ऋषिपत्नियों को दिया, ऋषिपत्नियों ने हिमालय को दिया, हिमालय ने गंगानदी को, और गंगानदी ने सरकंडे की घास को दिया। इसका सीधा सा मतलब है कि कुंडलिनी क्रमवार ही सहस्रार तक चढ़ती है, सीधी नहीं। योग में अक्सर ऐसा ही बोला जाता है। हालाँकि तांत्रिक योग से सीधी भी सहस्रार में जा सकती है। किसीकी कुंडलिनी मूलाधार में बताई जाती है, किसी की स्वाधिष्ठान चक्र तक ऊपर चढ़ी हुई, किसीकी मणिपुर चक्र तक, किसीकी अनाहत चक्र तक, किसीकी विशुद्धि तक, किसी की आज्ञाचक्र तक और किसीकी सहस्रार तक चढ़ी हुई बताई जाती है। हालांकि इन सातों चक्रों में तो कुण्डलिनी प्रतिदिन के योगाभ्यास में चढ़ती औऱ उतरती रहती है, पर कुंडलिनी को लम्बे समय तक एक चक्र पर स्थित रखने के लिए काफी अभ्यास की जरूरत होती है। आपकी कुंडलिनी प्रतिदिन सहस्रार में भी जाएगी, पर यह योगाभ्यास के दौरान सहस्रार पर ध्यान लगाने के समय जितने समय तक ही सहस्रार में रहेगी। जब कुण्डलिनी लगातार, पूरे दिनभर, कई दिनों तक और बिना किसी योगाभ्यास के भी सहस्रार में रहने लगेगी, तभी वह सहस्रार तक चढ़ी हुई मानी जाएगी। इसे ही प्राणोत्थान भी कहते हैं। इसमें आदमी दैवीय गुणों से भरा होता है। पशुओं को आदमी की इस अवस्था का भान हो जाता है। मैं जब इस अवस्था के करीब होता हूँ, तो पशु मुझे विचित्र प्रकार से सूंघने और अन्य प्रतिक्रियाएं दिखाने लगते हैं। इसमें ही कुंडलिनी जागरण की सबसे अधिक संभावना होती है। इसके लिए सेक्सुअल योग से बड़ी मदद मिलती है। ये जरूरी नहीं कि ये सभी अनुभव तभी हों, जब कुंडलिनी जागरण हो। हरेक कुंडलिनी योगी को ये अनुभव हमेशा होते रहते हैं। कई इन्हें समझ नहीं पाते, कई ठीक ढंग से महसूस नहीं कर पाते, और कई दूसरे छोटे-मोटे अनुभवों से इन्हें अलग नहीं कर पाते। सम्भवतः ऐसा तब होता है, जब कुंडलिनी योग का अभ्यास हमेशा या लंबे समय तक नित्य प्रतिदिन नहीं किया जाता। अभ्यास छोड़ने पर कुण्डलिनी से जुड़ीं अनुभूतियां शुरु के सामान्य स्तर पर पहुंच जाती हैं। मैं एक उदाहरण देता हूँ। नहाते समय चाहे शरीर के किसी भी हिस्से में पानी के स्पर्श की अनुभूति ध्यान के साथ की जाए, वह अनुभूति एक सिकुड़न के साथ पीठ से होते हुए सहस्रार तक जाती हुई महसूस होती है। इससे जाहिर होता है कि मेरुदण्ड में ही सुषुम्ना नाड़ी है, क्योंकि वही शरीर की सभी संवेदनाओं को मस्तिष्क तक पहुंचाती है। कुंडलिनी जागरण और कुंडलिनी योग के बीच में केवल अनुभव की मात्रा को लेकर ही भिन्नता है, अनुभव की प्रकृति को लेकर नहीं। कुंडलिनी जागरण में कुंडलिनी अनुभव उच्चतम स्तर तक पहुंच जाता है, व इससे सम्बंधित अन्य अनुभव भी शीर्षतम स्तर तक पहुंच सकते हैं। कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी फिर से एक साधारण कुंडलिनी योगी बन जाता है, ज्यादा कुछ नहीं।

मेडिटेशन एट टिप अर्थात शिखर पर ध्यान

यह एक वज्रोली क्रिया का छोटा रूप ही है। इसमें वीर्य को बाहर नहीं गिराया जाता पर पेनिस टिप या वज्रशिखा पर उसे ले जाकर वापिस ऊपर चढ़ाया जाता है। यह ऐसा ही है कि वीर्य स्खलन के बिना ही उसकी चरम अनुभूति के करीब तक संवेदना को बढ़ाया जाता है, और फिर संभोग को रोक दिया जाता है। यह ऐसा ही है कि यदि उस अंतिम सीमाबिन्दु के बाद थोड़ा सा संभोग भी किया जाए, तो वीर्य का वेग अनियंत्रित होने से वीर्यस्खलन हो जाता है। यह तकनीक ही आजकल के तांत्रिकों विशेषकर बुद्धिस्ट तांत्रिकों में लोकप्रिय है। यह बहुत प्रभावशाली भी है। यह तकनीक पिछले लेख में वर्णित अग्निदेव के कबूतर बनने की शिवपुराण कथा से ही आई है। यह ज्यादा सुरक्षित भी है, क्योंकि इसमें पूर्ण वज्रोली की तरह ज्यादा दक्षता की जरूरत नहीं, और न ही संक्रमण आदि का भय ही रहता है। दरअसल शिवपुराण में रूपकों के रूप में लिखित रहस्यात्मक कथाएं ही तंत्र का मूल आधार हैं। 

शरीर व उसके अंगों का देवता के रूप में सम्मान करना चाहिए

तंत्र शास्त्रों में आता है कि योनि में सभी देवताओं का निवास है। इसीलिए कामाख्या मंदिर में योनि की पूजा की जाती है। इससे सभी देवताओं की पूजा स्वयं ही हो जाती है। दरअसल ऐसा मूलाधार की प्रचण्ड ऊर्जा के कारण ही होता है। वास्तव में यही मूलाधार को ऊर्जा देती है। उससे वहाँ कुंडलिनी चित्र का अनुभव होता है। क्योंकि मन में सभी देवताओं का समावेश है, और कुंडलिनी मन का सारभूत तत्त्व या प्रतिनिधि है, इसीलिए ऐसा कहा जाता है। इसलिए पिछले लेख में वर्णित रूपक के कुछ यौन अंशों को अन्यथा नहीं लेना चाहिए। शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार शरीर के सभी अंग भगवदस्वरूप हैं। पुराणों के अनुसार भी शरीर के सभी अंग देवस्वरूप हैं। शरीर में सभी 33 करोड़ देवताओं का वास है। इसका मतलब तो यह हुआ कि शरीर का हरेक सेल या कोशिका देवस्वरूप ही है। इससे यह अर्थ भी निकलता है कि शरीर की सेवा और देखभाल करना सभी देवताओं की पूजा करने के समान ही है। पुस्तक ‘शरीरविज्ञान दर्शन’ में यह सभी कुछ तथ्यों के साथ सिद्ध किया गया है। यह शरीर सभी पुराणों का और शरीरविज्ञान दर्शन का सार है। पुराण पुराने समय में लिखे गए थे, पर शरीरविज्ञान दर्शन आधुनिक है। इसलिए शरीर के किसी भी अंग का अपमान नहीं करना चाहिए। शारीरिक अंगों का अपमान करने से देवताओं का अपमान होता है। ऐसा करने पर देवता तारकासुर रूपी अज्ञान को नष्ट करने में मदद नहीं करते, जिससे आदमी की मुक्ति में अकारण विलंब हो जाता है। कई लोग धर्म के नाम पर इसलिए नाराज हो जाते हैं कि किसी देवता की तुलना शरीर के अंग से क्यों कर दी। इसका मतलब तो भगवदस्वरूप शरीर और उसके अंगों को तुच्छ व हीन समझना हुआ। एक तरफ वे देवता को खुश कर रहे होते हैं, पर दूसरी तरफ भगवान को नाराज कर रहे होते हैं।

कुंडलिनी तांत्रिक योग को यौन-संभोग प्रवर्धन व वीर्य रूपांतरण की सहायता से दिखाता हिंदु शिवपुराण~संभोग से समाधि

ॐ कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगिन्द्रहारम् सदावसंतं हृदयारविन्दे भवंभवानीसहितं नमामि

मित्रो, शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव के साथ देवी पार्वती का विवाह हुआ। फिर वे पार्वती के साथ कामक्रीड़ा करते हुए विहार करते रहे। उनको रमण करते हुए सैंकड़ों वर्ष बीत गए, पर वे उससे उपरत नहीँ हुए। इससे सभी देवता उदास होकर ब्रह्मा के पास चले गए। ब्रह्मा उन सबको साथ लेकर भगवान नारायण के पास चले गए। नारायण ने उन्हें समझाया कि किसी पुरुष और स्त्री के जोड़े को आपसी रमण करने से नहीं रोकना चाहिए। यदि कोई ऐसा करता है, तो उसे अपनी पत्नी और संतानों से वियोग का दुःख झेलना पड़ता है। उन्होंने ऐसे बहुत से लोगों का उदाहरण दिया जिन्होंने ऐसा किया था और जिसका दण्ड भी उन्हें मिला था। फिर उन्होंने कहा कि भगवान शिव एक हजार साल तक पार्वती के साथ संभोग करेंगे। उसके बाद वे उससे उपरत हो जाएंगे। इसलिए तब तक देवताओं को उनसे न मिलने की सलाह दी। परन्तु एक हजार साल बाद भी शिव और पार्वती गुफा से बाहर नहीं निकले। उन दोनों की रतिक्रीड़ा से भू कम्पित होने लगी, और जिस कच्छप और शेषनाग पर धरती टिकी हुई है, उनकी थकावट के कारण वायुमंडल की वायु भी स्तम्भित जैसी होने लग गई।  तब सभी देवता व्याकुल होकर उस गुफा के द्वार के पास पहुंच गए। उस समय शिव-पार्वती संभोग में क्रीड़ारत थे। देवताओं ने दुखभरी आवाज में रुदन करते हुए शिव की स्तुति की, और राक्षस तारकासुर द्वारा अपने ऊपर किए गए अत्याचार से उन्हें अवगत कराया। भगवान शिव उनका रुदन सुनकर पार्वती को छोड़कर करुणावश उनसे मिलने द्वार तक आ गए। शिव ने उन्हें समझाया कि होनी को कोई नहीं टाल सकता, यहाँ तक कि वे खुद भी नहीं। फिर उन्होंने कहा कि जो होना था, वह हो गया, अब आगे की स्थिति स्पष्ट करते हैं। शिव ने कहा कि जो उनके वीर्य को ग्रहण कर सके, वही राक्षस तारकासुर से सुरक्षा दिला सकता है। सभी देवताओं ने इसके लिए अग्नि देवता को आगे किया। फिर शिव ने आश्वस्त होकर अपना वीर्य धरा पर गिरा दिया। अग्नि देवता ने कबूतर बनकर अपनी चोंच से उस वीर्य का पान कर लिया। तभी पार्वती अंदर से रुष्ट होकर बाहर आई, और देवताओं के ऊपर क्रोध करते हुए उन पर आरोप लगाने लगी कि उन्होंने उसके संभोग के आंनद में विघ्न पैदा करके उसे बन्ध्या बना दिया। ऐसा कहते हुए उसने उनको श्राप दे दिया कि वे भी वन्ध्या की तरह निःसंतान रहेंगे। फिर अग्नि देवता को फटकारते हुए कहा कि उसने वीर्यपान जैसा नीच कर्म किया है, इसलिए वह कहीं शान्ति प्राप्त नहीं करेगा, और दाहकता से जलता रहेगा। वीर्य के असह्य तेज से परेशान होकर वह महादेव की शरण में चला गया, और उनसे अपनी व्यथाकथा सुनाई। महादेव शिव ने उसकी जलन कम करने के लिए एक उपाय बताया। उन्होंने कहा कि यदि माघ या जनवरी के महीने में प्रातः जल्दी स्नान करने वाली सात स्त्रियां इस वीर्य को अपनी योनि में ग्रहण करें, तो उसे उस वीर्य की जलन से छुटकारा मिल जाएगा। फिर देवी पार्वती भगवान शिव को फिर से गुफा के भीतर ले गई, और उनके साथ संभोग सुख प्राप्त करते हुए गणेश नामक पुत्र को उत्पन्न किया। तभी गुफा द्वार पर स्थित देवताओं के समक्ष आठ ऋषिपत्नियाँ पहुंच गईं। उन्हें माघ महीने के ठंडे जल के स्नान से ठंड लगी थी, इसलिए उनमें से सात स्त्रियां उस अग्नि के समीप जाने लगीं। एक अन्य ऋषिपत्नी अरुंधति को सब पता था, इसलिए उसने उन्हें रोका भी, पर वे नहीं रुकीं। अग्नि के पहुंचते ही अग्नि की सूक्ष्म चिंगारियों से होता हुआ वह वीर्य उनके अंदर प्रविष्ट हो गया, और वे गर्भवती हो गईं। जब उनके पति ऋषियों को इस बात का पता चला, तो उन्हें व्यभिचारिणी कहते हुए उनका परित्याग कर दिया। अब वे अपने कृत्य पर पछताते हुए दुनिया में इधर-उधर भटकने लगीं। उनसे वीर्य की जलन नहीं सही जा रही थी। वे हिमालय पर्वत पे चली गईं और उस वीर्य को हिमालय को देकर जलन और दबाव के भार से मुक्त हो गईं। जब हिमालय से वह वीर्यतेज नहीँ सहा गया, तो उसने वह गंगा नदी को दे दिया। गंगा भी उस वीर्य के तेज से परेशान हो गई, और उसने उसे अपने किनारे पर उगे सरकंडों में उड़ेल दिया। वहाँ पर उससे एक सरकंडे के ऊपर एक बालक ने जन्म लिया। उसके जन्म लेते ही चारों ओर खुशियां छा गईं। अनजाने में ही शिव और पार्वती परम प्रसन्नता, ताजगी व किसी बड़े बोझ के खत्म होने का अनुभव करने लगे। अत्यधिक प्रेम उमड़ने के कारण पार्वती के स्तनों से खुद ही दूध निकलने लगा। उनके निवास पर चारों ओर उत्सव के जैसा माहौल छा गया। देवता खुशियां मनाने लगे, और तारकासुर जैसे राक्षसों का अंत निकट मानने लगे। वह बालक कार्तिकेय के नाम से विख्यात हुआ, जिसने बड़े होकर तारकासुर का वध किया।

उपरोक्त रूपक का मनोवैज्ञानिक व कुण्डलिनीयोग परक विश्लेषण

शिव एक जीव की आत्मा है। जीवात्मा और परमात्मा में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है। पार्वती उसकी पत्नि है। जीव हरेक मनुष्य जन्म में अपनी पत्नी के साथ भरपूर सहवास करता है, पर जीवन-मरण से मुक्ति का उपाय नहीं करता। देवताओं ने जगत और जीव के शरीर का निर्माण इसलिए किया है, ताकि उसमें रहने वाली जीवात्मा मुक्त हो सके। उससे देवताओं को भी फायदा होता है, क्योंकि वे फिर जीव की सीमित देह के बंधन को त्याग कर पूर्ववत अपनी असीमित ब्रह्मांडीय देह में विहार करने लगते हैं। कुछ जन्मों तक तो वे लोकपालक विष्णु की आज्ञा से उसे संभोग सुख में डूबे रहने देते हैं। पर जब उसके दसियों जन्म ऐसे ही बीत जाते हैं, तब विष्णु भी देवताओं के साथ मिलकर उसे मनाने चल पड़ते हैं। आध्यात्मिक मुक्ति के सम्बंध में मनुष्य को प्रकृति ने स्वतंत्र इच्छा प्रदान की है, इसलिए उस पर जोरजबरदस्ती तो नहीं चल सकती। इसका मतलब है कि देवताओं को प्रेम से उसकी प्रार्थना और स्तुति करनी पड़ती है। देवता उससे कहते हैं कि राक्षस तारकासुर उन्हें परेशान करता है, और आपका पुत्र ही उसका वध कर सकता है। तारकासुर अज्ञान का प्रतीक है, क्योंकि वह आदमी को अंधा कर देता है। जीव का पुत्र कुंडलिनी को कहा गया है। दरअसल जीव लिंग रूप में है, और उसकी पत्नी योनि रूप में है, जो गुहारूप ही है। देवपूजा आदि विभिन्न आध्यात्मिक साधनाओं से व सत्संग से उसके मन में कुंडलिनी का विकास होता है। उसके साथ संभोग की शक्ति भी मिश्रित हो जाती है। उसी प्रचण्ड कुंडलिनी के प्रभाव से उसके शरीर में कम्पन पैदा होने लगता है, और साँसे भी उखड़ने लगती हैं। इसीको रूपक कथा में धरती के कम्पन और वायु के स्तम्भन के रूप में दर्शाया गया है। जीव का केंद्रीय तंत्रिका तंत्र रीढ़ की हड्डी और मस्तिष्क में फैला हुआ है, जिसकी आकृति एक फन उठाए हुए नाग से मिलती है। कुंडलिनी चित्र उसी केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में पलता और बढ़ता है। स्वाभाविक है कि प्रचंड कुंडलिनी के वेग से वह थक जाएगा। साँसों की गति व शरीर के कम्पन को भी वही केंद्रीय तंत्रिका तंत्र नियंत्रित करता है। उसकी थकावट से ही साँसे अनियमित, लम्बी या उखड़ी हुई सी हो जाती हैं। इसीको योगासन और प्राणायाम भी कह सकते हैं। इसीको रूपक में यह कह कर बताया गया है कि शेषनाग की थकान से वायुमंडल की वायु स्तम्भित होने लगी। वही कुंडलिनी उसे संभोग के समय स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र के आसपास महसूस होती है। इसीको समस्त देवताओं का गुहाद्वार पर इकट्ठे होने के रूप में दर्शाया गया है। क्योंकि कुंडलिनी ही पूरे शरीर का अर्थात सभी देवताओं का सार है। फिर शिवलिंग रूपी शिव गुफा से बाहर आते हैं। जीव को परमात्मा शिव की प्रेरणा से आभास हो जाता है कि जब जननांग क्षेत्र में वीर्य तत्त्व से कुंडलिनी चित्र इतना अधिक घनीभूत हो जाता है, तब उसे मस्तिष्क को चढ़ाकर समाधि या कुंडलिनी जागरण को अवश्य प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए वह अपने ही शरीर के अंतर्गत स्थित देवताओं से कहता है कि जो उसके वीर्य के तेज को धारण कर पाएगा, वह तारकासुर के वध में सहायक होगा। फिर जीव अपनी पुट्ठे की, पेट की व मूत्रनालिका की मांसपेशियों को जोर से ऊपर की ओर सिकोड़ता हुआ वीर्य को ऊपर की ओर खींचता है। इस शक्तिशाली कर्म से शरीर में गर्मी चढ़ जाती है। इसे ही अग्नि देवता द्वारा वीर्यपान कहा गया है। वीर्य का चुसाव जननेन्द्रिय से शुरु होता है, जिसकी आकृति एक चोंच वाले पक्षी की तरह है। इसीको अग्नि द्वारा कबूतर बन कर अपनी चोंच से वीर्यपान करना बताया गया है। कई तांत्रिक हठयोगी तो इस क्रिया में इतनी महारत हासिल कर लेते हैं कि वे वीर्य को बाहर गिराकर भी वापिस ऊपर खींच लेते हैं। इस तकनीक को तंत्र में वज्रोली क्रिया कहा जाता है। इससे क्योंकि योनि में वीर्य नहीं गिरता, इसलिए स्वाभाविक है कि गर्भ नहीं बनेगा। यही पार्वती के द्वारा देवताओं को श्राप देना है। क्योंकि शरीर देवताओं से ही बना है, इसलिए स्वाभाविक है कि जीव के निःसन्तान होने से देवता भी निःसन्तान अर्थात बन्ध्या हो जाएंगे। वीर्य को धारण करने से जननांग में एक दबाव सा या जलन सी पैदा हो जाती है। यही पार्वती द्वारा अग्निदेव को दिया गया श्राप है। परमात्मा शिव रूपी गुरु की आज्ञा से जीव अपनी जननेन्द्रिय के वीर्य के तेज को अपने शरीर के सातों चक्रों के ऊपर प्रतिस्थापित कर देता है। क्योंकि आठवां चक्र शरीर के बाहर और मस्तिष्क से थोड़ा ऊपर होता है, इसलिए वह उसे वीर्यतेज नहीं दे पाता। नहाते समय चक्रों पर एक आनन्दमयी संवेदना और सिकुड़न पैदा होती है। पानी जितना ठंडा होता है, यह अनुभव इतना ही ज्यादा होता है। इसीलिए शास्त्रों में सभी के लिए, विशेषकर योगियों के लिए वर्षभर प्रातः जल्दी उठकर ठंडे पानी से नहाने की हिदायत दी गई है। अपनी सिकुड़न की शक्ति से चक्र उस वीर्यतेज को जननांग से अपनी ओर खींच लेते हैं। यही ऋषिपत्नियों का ठंड के मारे अग्नि के निकट जाकर आग तपना, और अग्नि की सूक्ष्म चिंगारियों के माध्यम से उनके अंदर वीर्यतेज का प्रविष्ट होना है। क्योंकि माघ का महीना सबसे ठंडा होता है, इसलिए स्वाभाविक है कि यह प्रक्रिया तब सर्वाधिक होती है। इसीको रूपक में उन आठ स्त्रियों, सात स्त्रियों व माघ माह में उनके ठंडे पानी से स्नान के रूप में दिखाया गया है। क्योंकि कुंडलिनीयुक्त हठयोग से भी चक्रों पर ठंडे पानी के जैसा प्रभाव पड़ता है, इसलिए यह रूपक अंश कुंडलिनी योग के हठयोग भाग (विशेषकर आसनों) का भी प्रतीक है। मन को ऋषि के रूप में दिखाया गया है। अलग-अलग चक्रों में मन के अलग-अलग विचार दबे होते हैं। इसलिए चक्रों को ही ऋषिपत्नियाँ कहा गया है। चक्र एक छल्ले के सुराख के जैसी आकृति है, इसलिए इसे योनिरूप में दर्शाया गया है। चक्र में छिपा मन का विचार स्त्रीरूप है। उसमें स्थापित वीर्य का तेज पुरुषरूप है। दोनों का मिलन होने से गर्भ बनता है। इसीको ऋषिपत्नियों का गर्भवती होना बताया गया है। चक्र पर वीर्य का तेज भी ज्यादा शक्तिशाली नहीं होता, और कुंडलिनी विचार भी मस्तिष्क के कुंडलिनी विचार की तरह मजबूत नहीं होता। इसलिए वह गर्भ कामयाब नहीं हो पाता। गर्भ और वीर्य के तेज से चक्रों को जलन महसूस होने लगी। वीर्य के तेज से चक्र पर इधर-उधर के फालतू विचारों का शोर थम गया, और उनकी जगह एकमात्र कुंडलिनी विचार ने ले ली। मतलब मन ने चक्र का साथ छोड़ दिया, क्योंकि विचारों का समूह ही मन है। यही ऋषियोँ के द्वारा अपनी पत्नियों को व्यभिचार का आरोप लगाकर छोड़ना है। सबसे अधिक जलन और दबाव स्वाधिष्ठान चक्र को महसूस होता है। चक्रों ने गर्भ सहित उस वीर्यतेज को रीढ़ की हड्डी को दे दिया। मतलब कि जीव ने स्वाधिष्ठान चक्र की जलन के साथ रीढ़ की हड्डी को उसके ध्यान के साथ अनुभव किया। रीढ़ की हड्डी मूलाधार चक्र से मस्तिष्क तक जाती है। पर उसकी अनुभूति पिछले स्वाधिष्ठान चक्र से पिछले आज्ञा चक्र तक ज्यादा होती है। यही ऋषिपत्नियों के द्वारा अपने अंदर प्रविष्ट वीर्य और गर्भ के तेज को हिमालय को देना है। नीचे का, पुट्ठे वाला क्षेत्र पर्वत का निचला आधार है, और मस्तिष्क उस पर्वत का ऊपरी आधार या शिखर है, जबकि रीढ़ की हड्डी उन दोनों मूलभूत आधारों को जोड़ने वाली एक पतली, लम्बी और ऊंची पहाड़ी है। हड्डी में यह सामर्थ्य नहीँ है कि वह अपने अंदर स्थित वीर्यतेज को प्रवाहित कर सके, क्योंकि वह स्थूल व कठोर होती है। इससे वीर्य का तेज उसके विभिन्न व विशेष बिंदुओं पर एकस्थान पर ही दबाव डालने लगा। ये सभी बिंदु फ्रंट चैनल के चक्रों की सीध में ठीक पीछे रीढ़ की हड्डी में होते हैं। इनमें से दो मुख्य बिंदु हैं, पीछे का स्वाधिष्ठान चक्र और पीछे का आज्ञा चक्र। वीर्यतेज के ज्यादा होने पर अनाहत चक्र के क्षेत्र में भी बनता है। और ज्यादा होने पर नाभि चक्र के क्षेत्र में भी बन जाता है, इस तरह से। जब तांत्रिक शक्ति से सम्पन्न, नियमित, व निरंतर योगाभ्यास से वीर्य का तेज बहुत अधिक बढ़ जाता है, तब वह रीढ़ की हड्डी से सुषुम्ना नाड़ी में चला जाता है। इसीको इस तरह से लिखा गया है कि जब हिमालय के लिए वीर्यतेज असहनीय हो गया तो उसने उसे गंगा नदी में उड़ेल दिया। गंगा नदी यहाँ सुषुम्ना नाड़ी को कहा गया है। सुषुम्ना से होता हुआ वह प्रकाशमान तेज एक विद्युत रेखा के रूप में सहस्रार में प्रविष्ट हो जाता है। वहाँ उस तेज की शक्ति से कुंडलिनी जागृत हो जाती है। इसको रूपक के तौर पर ऐसा लिखा गया है कि गंगा के प्रवाह में बहता हुआ वह वीर्य गंगा के लिए असह्य हो गया। इसलिए गंगा ने उसे किनारे पर उगी हुई सरकंडे की घास में उड़ेल दिया। वहाँ उससे एक सरकंडे के ऊपर एक बालक का जन्म हुआ। सरकंडे की घास वाला किनारा यहाँ मस्तिष्क के लिए कहा गया है। मस्तिष्क को ढकने वाली खोपड़ी पर सरकंडे की तरह पैने और चुभने वाले बाल होते हैं। दोनों को ही पशु नहीं खाते। सरकंडे की घास में जड़ से निकलने वाली कुछ ऐसी शाखाएं भी होती हैं, जिन पर फूल लगते हैं। वे बांस की तरह लकड़ीनुमा और गाँठेदार होती हैं। उनसे लकड़ी का छोटामोटा और सजावटी फर्नीचर भी बनाया जाता है। उन पर पत्तों की घनी छाल लगी होती है, जिसको निकालकर और कूट कर एक रेशा निकाला जाता है। उससे मूँज की रस्सी बनाई जाती है। इसीलिए मूँज एक आध्यात्मिकता और सात्विकता का प्रतीक भी है। दरअसल सरकंडा एक बहुपयोगी पौधा है, जो नदी या तालाब के किनारों पर उगता है। सरकंडे की उस पुष्पगुच्छ वाली शाखा में इसी तरह बीच-बीच में गाँठे होती हैं, जिस तरह रीढ़ की हड्डी में चक्र। सम्भवतः इसीलिए उसपर बालक का जन्म बताया गया है। कुंडलिनी चित्र का जागरण ही बालक का जन्म है। पर यह भौतिक बालक नहीं, मानसिक बालक होता है। अगर जागरण न भी हो, तो भी कुंडलिनी चित्र का मन में दृढ़ समाधि के तौर पर स्थायी और स्पष्ट रूप से बने रहना भी कुंडलिनी-बालक का जन्म ही कहा जाएगा। वीर्य इसे बाहर निकलकर पैदा नहीं करता, बल्कि अंदर या उल्टी दिशा में जाकर पैदा करता है। ब्रह्मा भी एक मानसिक चित्र ही है, इसीलिए उसे अयोनिज कहा जाता है। मतलब वह जो योनि से पैदा न हुआ हो। कोई शंका कर सकता है कि केवल एक बार के यौनयोग से कैसे कुंडलिनी जागरण या दृढ़ समाधि की प्राप्ति हो सकती है। पर यह हो भी सकता है। प्रसिद्ध व महान तंत्र दार्शनिक ओशो कहते थे कि यदि एक बार भी ठीक ढंग से संभोग के साथ समाधि का अनुभव हो जाए, तो भी आध्यात्मिक सफलता मिल जाती है। यह अलग बात है कि वे ऐसे तांत्रिक रहस्यों को खुले तौर पर, प्रत्यक्ष तौर पर और मौखिक भाषणों के रूप में आम जनमानस के बीच ले गए, जिससे गलतफहमी से उनके बहुत से दुश्मन और आलोचक भी बन गए। यह भी आशंका जताई जाती है कि सम्भवतः उनकी मृत्यु के पीछे किसी साजिश का हाथ हो। इसलिए तंत्र को गुप्त कला या गुह्य विद्या कहा जाता है। यद्यपि इसे आज की खुली दुनिया में छिपाना ठीक नहीं है, फिर भी कुछ गोपनीयता की आवश्यकता है, और अपात्र, अनिच्छुक, अविश्वसनीय, विश्वासहीन और असमर्पित व्यक्ति के सामने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रकट नहीं किया जाना चाहिए। लेखक की प्रत्यक्ष व्यक्तिगत पहचान दिखाए बिना और किसी संभावित लक्ष्य को तय किए बिना, और स्वार्थ व पक्षपात के बिना, सभी के लिए ऑनलाइन ब्लॉग में इसे प्रदर्शित करना आज के मुक्तसमाज में गोपनीयता का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता है। सम्भवतः इसी गोपनीयता को बनाए रखने के लिए ही पुराणों के लेखक ने कभी भी अपना नाम और पता सार्वजनिक नहीं किया। हर जगह लेखक को दर्शाने के लिए ‘व्यास’ शब्द लिखा गया है, जो सभी आध्यात्मिक कथावाचकों के लिए दिया गया एक आम सामान्य शब्द है। कुंडलिनी जागरण से शरीर का आधा बायाँ भाग और आधा दायाँ भाग, दोनों बराबर मात्रा में पुष्ट और प्रसन्न हो गए। कुंडलिनी चित्र यहाँ बाएँ भाग या स्त्री या पार्वती की खुशी का प्रतीक है, और भटकती हुई आत्मा की शांति यहाँ दाएँ भाग या पुरुष या शिव की खुशी का प्रतीक है। मतलब कि एकदूसरे से बिछुड़े हुए शिव और पार्वती अपने पुत्र के रूप में एक दूसरे में एक हो गए। जीव कभी पूर्ण और एक था। पर माया की शक्ति से वह दो टुकड़ों में बंट कर अपूर्ण हो गया। तभी से वे दोनों टुकड़े एक होने का प्रयास कर रहे हैं। जीव के द्वारा फिर से पूर्ण होने के लिए की गई आपाधापी से ही जीव और जगत का विकास होता है। तांत्रिक जोड़े के पुरुष और स्त्री भाग या पार्टनर, दोनों भी वीर्यतेज के बोझ, दबाव, व दाह से मुक्त होकर सुप्रसन्न हो गए। पूरे मन में हर्षोल्लास व आनन्द छा गया। शरीर का रोम-रोम खिल गया। इसी को कथा में ऐसे दर्शाया गया है कि उस बालक के जन्म लेने पर शिव व पार्वती, और सभी देवता दोनों बहुत प्रसन्न हुए, और चारों ओर हर्षोल्लास छा गया। कुंडलिनी जागरण के बाद कुंडलिनी चित्र मन में अधिक से अधिक स्पष्ट और स्थायी होता गया। फिर वह स्थायी समाधि के रूप में मन में लगातार बना रहने लगा। उस स्थायी समाधि से जगत के प्रति आसक्ति क्षीण होती गई, और अद्वैत भावना बढ़ती रही। फिर जीवात्मा को अपनी जीवनमुक्ति का आभास हुआ। यही उसके अज्ञान का अंत था। इसको मिथक कथा में इस तरह दिखाया गया है कि वह बालक बड़ा होकर कार्तिकेय नाम से विख्यात हुआ, जिसने राक्षस तारकासुर का वध किया। साथ में, इस कथा के बारे में यह भी लिखा गया है कि जो कोई इस कथा को श्रद्धापूर्वक पढ़ेगा या सुनेगा, वह जगत के सारे सुख प्राप्त करते हुए आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त करेगा। इसका मतलब है कि यह मिथकीय व रूपकात्मक कथा तांत्रिक कुंडलिनी योग का ही वर्णन कर रही है। यदि यह साधारण सहवास, पुत्रजन्म या राक्षसवधकी कथा होती, तो आध्यात्मिक मुक्ति की बात तो दूर की, साधारण लौकिक सुखों की प्राप्ति में भी संदेह होता।

कुंडलिनी जागरण दीपावली और राम की योगसाधना रामायण महाकाव्य के मिथकीय रूपक में निरूपित

कुंडलिनी देवी सीता और जीवात्मा भगवान राम है

सीता कुंडलिनी ही है जो बाहर से आंखों की रौशनी के माध्यम से वस्तु के चित्र के रूप में प्रविष्ट होती है। वास्तव में शरीर की कुंडलिनी शक्ति नेत्रद्वार से बाहर गई होती है। शास्त्रों में कहा भी है कि आदमी का पूरा व्यक्तित्व उसके मस्तिष्क में रहता है, जो बाह्य इन्द्रियों के रास्ते से बाहर निकलकर बाहरी दुनिया में भटकता रहता है। बाहर हर जगह भौतिक दोषों अर्थात रावण का साम्राज्य है। वह शक्ति उसके कब्जे में आ जाती है, और उसके चंगुल से नहीं छूट पाती। मस्तिष्क में बसा हुआ जीवात्मा अर्थात राम उस बाहरी दुनिया में भटकती हुई सीता शक्ति को लाचारी से देखता है। यही जटायु के भाई सम्पाति के द्वारा उसे अपनी तेज नजर से समुद्र पार देखना और उसका हालचाल राम को बताना है। फिर राम योगसाधना में लग जाता है, और किसी मंदिर वगैरह में बनी देवता की मूर्ति को या वहाँ पर रहने वाले गुरु की खूब संगति करता है, औऱ तन-मन-धन से उनको प्रसन्न करता है। इससे धीरे-धीरे उसके मन में अपने गुरु के चित्र की छाप गहरी होती जाती है, और एक समय ऐसा आता है जब वह मानसिक चित्र स्थायी हो जाता है। यही लँका के राजा रावण से सीता को छुड़ाकर लाना, और उसे समुद्र पर बने पुल को पार कराते हुए अयोध्या पहुंचाना है। प्रकाश की किरण ही वह पुल है, क्योंकि उसीके माध्यम से बाहर का भौतिक चित्र मन के अंदर प्रविष्ट हुआ। मन ही अयोध्या है, जिसके अंदर राम रूपी जीवात्मा रहता है। मन से कोई भी युद्ध नहीं कर सकता, क्योंकि वह भौतिकता के परे है। हर कोई किसीके शरीर से तो युद्ध कर सकता है, पर मन से नहीं। इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि मन को समझा-बुझा कर ही सीधे रास्ते पर लगाना चाहिए, जोरजबरदस्ती या डाँट-डपट से नहीं। टेलीपैथी आदि से भी दूसरे के मन का बहुत कम पता चलता है। वह भी एक अंदाज़ा ही होता है। किसी दूसरे के मन के बारे में पूरी तरह से कभी नहीं जाना सकता। पहले तो राम रूपी जीवात्मा लंबे समय तक बाहर की दुनिया में अर्थात रावण की लँका में भटकते हुए अपने हिस्से को अर्थात सीता माता को दूर से ही देखता रहा। मतलब उसने उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। अगर वह बाहर गया भी, तो अधूरे मन से गया। अर्थात उसने शक्ति को वापिस लाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए। फिर जब राम उसके वियोग से बहुत परेशान हो गया, तब वह दुनियदारी में जीजान से कूद गया। यही राक्षसों के साथ उसके युद्ध के रूप में दिखाया गया है। दरअसल असली और जीवंत जीवन तो युद्धस्तर के जैसा संघर्षमयी और बाह्यमुखी जीवन ही होता है। मतलब कि वह मन रूपी अयोध्या से बाहर निकलकर आँखों की रौशनी के पुल से होता हुआ लँका में प्रविष्ट हो गया। दुनिया में वह पूरे जीजान से व पूरे ध्यान के साथ मेहनत करने लगा। यही तो कर्मयोग है, जो सभी आध्यात्मिक साधनाओं के मूल व प्रारंभ में स्थित है। मतलब कि वह लँका में सीता को ढूंढने लगा। फिर किसी सत्संगति से उसमें दैवीय गुण बढ़ने लगे। मतलब कि अष्टाङ्ग योग के यम-नियमों का अभ्यास उससे खुद ही होने लगा। यह सत्संग राम और राक्षस संत विभीषण की मित्रता के रूप में है। इससे जीवात्मा को कोई वस्तु  बहुत पसंद आई, और वह लगातार उसी एक वस्तु के संपर्क में बना रहने लगा। मतलब कि राम की नजर अपनी परमप्रिय सीता पर पड़ी, और वह उसीके प्रेम में मग्न रहने लगा। मतलब कि इस रूपक कथा में साथ में तंत्र का यह सिद्धांत भी प्रतिपादित किया गया है कि एक स्त्री अर्थात पत्नी ही योग में सबसे ज्यादा सहायक होती है। पुराणों का मुख्य उद्देश्य तो आध्यात्मिक और पारलौकिक है। लौकिक उद्देश्य तो गौण या निम्न है। पर अधिकांश लोग उल्टा समझ लेते है। उदाहरण के लिए, वे इस आध्यात्मिक मिथक से यही लौकिक आचार वाली शिक्षा लेते हैं कि रावण की तरह पराई स्त्री पर बुरी नजर नहीं डालनी चाहिए। हालांकि यह शिक्षा भी ठीक है, पर वे इसमें छिपे हुए कुंडलिनी योग के मुख्य और मूल उद्देश्य को या तो समझ ही नहीं पाते या फिर नजरअंदाज करते हैं। फिर जीवात्मा के शरीर की पोज़िशन और सांस लेने की प्रक्रिया स्वयं ही इस तरह से एडजस्ट होने लगी, जिससे उसका ज्यादा से ज्यादा ध्यान उसकी प्रिय वस्तु पर बना रहे।  इससे योगी राम का विकास अष्टाङ्ग योग के आसन और प्राणायाम अंग तक हो गया। इसका मतलब है कि राम सीता को दूर से व छिप-छिप कर देखने के लिए कभी बहुत समय तक खड़ा रहता, कभी डेढ़ा-मेढ़ा बैठता, कभी उसे लंबे समय तक सांस रोककर रखनी पड़ती थी, कभी बहुत धीरे से साँसें लेनी पड़ती थी। ऐसा इसलिए था ताकि कहीं दुनिया में उलझे लोगों अर्थात लँका के राक्षसों को उसका पता न चलता, और वे उसके ध्यान को भंग न करते। वास्तव में जो भौतिक वस्तु या स्त्री होती है, उसे पता ही नहीं चलता कि कोई व्यक्ति उसका ध्यान कर रहा है। यह बड़ी चालाकी से होता है। यदि उसे पता चल जाए, तो वह शर्मा कर संकोच करेगी और अपने विविध रूप-रंग व भावनाएं ढंग से प्रदर्शित नहीं कर पाएगी। इससे ध्यान परिपक्व नहीं हो पाएगा। अहंकार पैदा होने से भी ध्यान में क्षीणता आएगी। ऐसा ही गुरु के मामले में भी होता है। इसी तरह मन्दिर में जड़वत खड़ी पत्थर की मूर्ति को भी क्या पता कि कोई उसका ध्यान कर रहा है। क्योंकि सीता के चित्र ने ही राम के मन की अधिकांश जगह घेर ली थी, इसलिए उसके मन में फालतू इच्छाओं और गैरजरूरी वस्तुओं को संग्रह करने की इच्छा ही नहीं रही। इससे अष्टाङ्ग योग का पांचवां अंग, अपरिग्रह खुद ही चरितार्थ हो गया। अपरिग्रह का अर्थ है, वस्तुओं का संग्रह या उनकी इच्छा न करना। फिर इस तरह से योग के इन प्रारंभिक पांच अँगों के लंबे अभ्यास से जीवात्मा के मन में उस वस्तु या स्त्री का चित्र स्थिर हो जाता है। यही योग के धारणा और ध्यान नामक एडवांस्ड व उत्तम अंग हैं। इसका मतलब है कि राम ने लँका के रावण से सीता को छुड़ा लिया, और उसे वायुमण्डल रूपी समुद्र पर बने उसी प्रकाश की किरण रूपी पुल के माध्यम से आँख रूपी समुद्रतट पर पहुंचाया और फिर अंदर मनरूपी अयोध्या की ओर ले गया या जैसा कि रामायण में लिखा गया है कि लँका से उनकी वापसी पुष्पक विमान से हुई। यही समाधि या कुंडलिनी जागरण का प्रारंभ है। इससे उसकी इन्द्रियों के दस दोष नष्ट हो गए। इसे ही दशहरा त्यौहार के दिन दशानन रावण को जलाए जाने के रूप में मनाया जाता है। फिर जीवात्मा ने कुंडलिनी की जागृति के लिए उसे अंतिम व मुक्तिगामी छलांग या एस्केप विलोसिटी प्रदान करने के लिए बीस दिनों तक तांत्रिक योगाभ्यास किया। उस दौरान वह घर पहुंचने के लिए सुरम्य और मनोहर यात्राएं करता रहा। वैसे भी अपने स्थायी घर के ध्यान और स्मरण से कुंडलिनी को और अधिक बल मिलता है, क्योंकि कुंडलिनी स्थायी घर से भी जुड़ी होती है, जैसा मैंने एक पिछले लेख में बताया है। मनोरम यात्राओं से भी कुंडलिनी को अतिरिक्त बल मिलता है, इसीलिए तो तीर्थयात्राएं बनी हैं। उस चौतरफा प्रयास से उसकी कुंडलिनी बीस दिनों के थोड़े समय में ही जागृत हो गई। यही राम का अयोध्या अर्थात कुंडलिनी के मूलस्थान पहुंचना है। यही कुंडलिनी जागरण है। कुंडलिनी जागरण से जो मन के अंदर चारों ओर सात्त्विकता का प्रकाश छा जाता है, उसे ही प्रकाशपर्व दीपावली के रूप में दर्शाया गया है। क्योंकि कुंडलिनी जागरण का प्रभाव समाज में, विशेषकर गृहस्थान में चारों तरफ फैलकर आनन्द का प्रकाश फैलाता है, इसलिए यही अयोध्या के लोगों के द्वारा दीपावली के प्रकाशमय त्यौहार को मनाना है।

कुंडलिनी-शिव विवाह ही साधारण लौकिक विवाह का उद्गम स्थान है

मित्रो, आप सभी को छठ पर्व की शुभकामनाएं। मैं हाल ही के एक लेख में बता रहा था कि हिंदू त्यौहारों वाली आध्यात्मिक संस्कृति प्रकृति की पुजारी है, और वातावरणीय प्रदूषण के विरुद्ध है। सूत्रों के अनुसार अभी जब 2-3 दिन पहले छठी देवी की पूजा करने के लिए कुछ महिलाएं दिल्ली की यमुना नदी के पानी के बीच में सूर्य को अर्घ्य देने के लिए खड़ी हुईं, तो दुनिया को यमुना के वास्तविक प्रदूषण का पता चला। यमुना का पानी काला था, और उस पर इतनी ज्यादा सफेद झाग तैर रही थी कि वह ध्रुवीय समुद्र के बीच में तैर रहे बर्फ के पहाड़ लग रहे थे। बताने की जरूरत नहीं है कि अब यमुना की सफाई के प्रयास जोरों से शुरु हो गए हैं। पर इसको करवाने के लिए अनजाने में ही व्हिसल ब्लोवर का काम उन हिन्दू परंपरावादी महिलाओं से हो गया जो अपनी जान को जोखिम में डालकर प्रकृति को सम्मान देने और उसकी पूजा करने के लिए ज़हरीली नदी में उतरीं। कुछ तथाकथित अत्याधुनिक लोग तो उन्हें रूढ़िवादी और अंधविश्वासी कह सकते हैं, पर उन्होंने वह काम कर दिखाया जिसे बड़े-बड़े आधुनिकतावादी और तर्कवादी भी न करे। यह एक छोटा सा उदाहरण है। प्रकृति प्रेमी हिंदूवाद की इसी तरह हर जगह बेकद्री होती हुई दिखती है, इसीलिए प्रकृति विनाश की तरफ जाती हुई प्रतीत होती है। मैं यहाँ किसी धर्मविशेष का पक्ष नहीं ले रहा हूँ, और न ही किसी विचारधारा का विरोध कर रहा हूँ, बल्कि जो सत्य घटना घटित हुई है, उसीका वर्णन और विश्लेषण कर रहा हूँ।

राजा हिमाचल मस्तिष्क का और उसका राज्य शरीर का प्रतीक है

शिवपुराण में आता है कि राजा हिमाचल ने विवाह महोत्सव के लिए अपने सभी संबंधी पर्वतों और नदियों को निमंत्रण दिया। विभिन्न प्रकार के अन्नों का भंडारण करवाया। चारों तरफ साज-सज्जा की गई। अपने राज्य के सभी लोगों के लिए खूब सुख-सुविधाएं वितरित कीं। उससे उसके पूरे राज्य के लोग प्रसन्न हो गए। प्रमुख ऋषियों को शिव के पास विवाह का निमंत्रण लेकर कैलाश मिलने भेजा। दरअसल राजा हिमाचल और उसका महल मस्तिष्क ही है। कैलाश सहस्रार चक्र है। धरती ही राजा हिमाचल का राज्य है। वह पूरा शरीर है। वैसे भी पर्वत को भूभृत कहते हैं। इसका मतलब है, धरती को पालने वाला। मस्तिष्क ही शरीर को पालता है। राजा हिमाचल सभी नदियों को अपने महल बुलाता है, मतलब मस्तिष्क शरीर की सभी नाड़ियों की ऊर्जा को अपनी तरफ आकर्षित करता है। वह सभी पर्वतों को भी न्यौता देता है, मतलब मस्तिष्क का मुख्य केंद्र अन्य छोटे-छोटे केंद्रों से संवेदना-शक्ति को इकट्ठा करके कुंडलिनी जागरण की सर्वोच्च संवेदना को अभिव्यक्त करता है। यही शिव विवाह है, और इसीको ही विभिन्न पर्वतों का शिवविवाह में सम्मिलित होना कहा गया है। पर्वतराज हिमाचल विभिन्न खाद्यान्नों का भंडारण करता है, मतलब मस्तिष्क शरीर की सारी ऊर्जा अपनी तरफ खींचता है। भोजन ही ऊर्जा है, ऊर्जा ही भोजन है। प्राण ऊर्जा की प्राप्ति के लिए ही भोजन किया जाता है। तभी तो कहते हैं कि अन्न ही प्राण है। राजा हिमाचल के पूरे राज्य की जनता धन-धान्य से युक्त होकर हर्षोल्लास से भर जाती है, मतलब मस्तिष्क में जब ऊर्जा की भरमार होती है, तब उससे ऐसे रसायन निकलते हैं, जो पूरे शरीर को लाभ पहुंचाते हैं। शरीर और ब्रह्मांड के बीच में इस तरह की समकक्षता पुस्तक ‘शरीरविज्ञान दर्शन’ में सर्वोत्तम रूप में दर्शाई गई है। शिवविवाह के दिन राज्य के सभी लोग विभिन्न भोगों की धाम खाते हैं, और विभिन्न विलासों का भरपूर आनन्द उठाते हैं। इसका मतलब है कि कुंडलिनी जागरण वाले दिन पूरे शरीर में रक्तसंचार बढ़ जाता है। ऋषियों को आम आदमी के जैसे साधारण विवाह को इतने विस्तार से लिखने की क्या जरूरत थी, क्योंकि वे ज्यादातर खुद ब्रह्मचारी या अविवाहित होते थे, और कई तो गृहस्थी से दूर रहकर वनों में तप करते थे। कुंडलिनी के तो माता-पिता हैं, पर शिव के कोई नहीं। वह तो स्वयंभू परमात्मा हैं, इसीलिए शम्भु कहे जाते हैं। इससे जाहिर होता है कि यह साधारण विवाह नहीँ है। कुंडलिनी जागरण को ही शिवविवाह के रूप में वर्णित किया गया है, ताकि गृहस्थी में बंधे हुए आमजन भी उसे समझ सके और उसे आसानी से प्राप्त कर सके।

हिमाचल राज्य का सर्वोच्च महल सहस्रार है, जहाँ पर शिव-शक्ति का वैवाहिक जोड़ा ही स्थायी रूप से निवास कर सकता है

उपरोक्तानुसार सप्तऋषियों को विवाह के निमंत्रण पत्र के साथ शिव के पास कैलाश भेजा। कैलाश सहस्रार चक्र है। वहाँ पर ही अद्वैतभाव रूपी शिव का निवासस्थान है। दरअसल प्राणोत्थान के बाद शरीर की ऊर्जा-नदी का प्रवाह सहस्रार की तरफ ही होता है। उससे स्वाभाविक है कि उस ऊर्जा के बल से सहस्रार क्षेत्र में अद्वैतभाव व आनन्द के साथ सुंदर चित्र प्रकट होते रहते हैं। यह भी स्वाभाविक ही है कि अधिकांशतः वे चित्र भी उन्हीं लोगों या वस्तुओं के बनते हैं, जिनके साथ अद्वैत भाव या आध्यात्मिक भाव जुड़ा होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कोई व्यक्ति उसी क्षेत्र में जाना चाहता है, जो क्षेत्र उसके अनुकूल या उसके जैसा हो। ऋषि-मुनियों से अधिक अद्वैतरूप या आध्यात्मिक कौन हो सकता है। इसीलिए उन आध्यात्मिक वस्तुओं या व्यक्तियों को सप्तर्षिओं के रूप में दिखाया गया है। वैसे वह गुरु, मंदिर का पुजारी, मंदिर, गाय, गंगा आदि कोई भी आध्यात्मिक वस्तु हो सकती है। शिवजी के नजदीक तो ये चीजें जाती हैं, और उन्हें कुंडलिनी के साथ एकाकार होने के लिए प्रेरित भी करती हैं, पर खुद शिव से एकाकार नहीं हो पातीं। इसीको इनके द्वारा शिव को उन्हीं के विवाह के लिए निमंत्रण देने के रूप में दिखाया गया है। विवाह किससे, कुंडलिनी से। शिव के साथ एकाकार न हो पाने के कारण ही इन्हें निमंत्रण देकर वापिस आते हुए दिखाया गया है। कोई भी चित्र शिव से जुड़े बिना निरन्तर सहस्रार में नहीं बना रह सकता, उसे जल्दी ही मस्तिष्क के निम्नतर ऊर्जा स्तर वाले निचले साधारण क्षेत्रों में आना ही पड़ता है। कुंडलिनी ही शिव के साथ एकाकार होने या जागृत होने के फलस्वरूप शिव के साथ कैलाश में निरंतर बनी रह पाती है। मतलब कि कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी को अपनी आत्मा के साथ जुड़ी हुई कुंडलिनी का अनुभव सहस्रार चक्र में निरंतर होता रहता है। यही कुंडलिनी जागरण की सर्वप्रमुख खूबी है, और यही आदमी को मोक्ष की ओर ले जाती है।

प्राण ही सहस्रार में शिव-शक्ति का विवाह रचाते हैं

फिर आता है कि शिव के विवाह समारोह के लिए विश्वकर्मा ने अद्भुत व दिव्य विवाह मंडप, भवन व प्रांगण आदि बनाए। जड़ मूर्तियां सजीव लग रही थीं, और सजीव वस्तुएं जड़ मूर्तियां लग रही थीं। जल में स्थल का और स्थल में जल का भान हो रहा था। दरअसल कुंडलिनी जागरण के आसपास प्राणों के सहस्रार में होने के कारण सब कुछ अद्भुत व दिव्य लगता है। अतीव आनन्द की स्थिति होती है। चारों ओर शांति महसूस होती है। अद्वैत भाव चरम के करीब होता है, और कुंडलिनी जागरण के दौरान तो चरम पर पहुंच जाता है। सभी कुछ एक जैसा लगता है। भेद दृष्टि खत्म सी हो जाती है। यह नशे के जैसी मूढ़ अवस्था नहीं होती, पर परम चेतनता और आनन्द से भरी होती है। इसी आध्यात्मिक भाव को यहाँ उपरोक्त रोचक कथानक के रूप में दर्शाया गया है। जल का थल लगना या थल का जल लगना, मतलब जल और थल के बीच में अभेद का अनुभव। जड़ का चेतन की तरह दिखना व चेतन का जड़ की तरह दिखना, मतलब जड़ और चेतन के बीच में समानता नजर आना। हर जगह झाड़-बुहार के पूरी तरह से साफ व निर्मल कर दी गई थी। इसका मतलब है कि सहस्रार में ही असली व पूर्ण निर्मलता का अनुभव होता है। बाहर से जितना मर्जी सफाई कर लो, यदि सहस्रार में प्राण नहीं हैं, तो सबकुछ मैला ही लगता है। इसी वजह से तो गाय के गोबर से पुते हुए आध्यात्मिक स्थान अति पवित्र महसूस होते हैं, क्योंकि आध्यात्मिकता के प्रभाव से सहस्रार चक्र प्राण से संपन्न होता है। जिन मूल्यवान भवनों में लड़ाई-झगड़ों का बोलबाला हो, वहां की चाकचौबंद सफाई भी रास नहीं आती, और वहाँ दम सा घुटता है। इसके विपरीत एक आध्यात्मिक साधु पुरुष की गोबर से लिपीपुती घासफूस की झौंपड़ी भी बड़ी आकर्षक व संजीदा लगती है।