कुंडलिनी प्राण ऊर्जा का क्रीड़ा विलास ही है


दोस्तो, मैंने पिछले हफ्ते तीन फिल्में देखीं। उससे मेरा मस्तिष्क काफी क्रियाशील रहा। सम्भवतः इसीसे कई बार हल्का सा सिरदर्द भी रहा। हालाँकि मन में भरपूर शांति बनी रही, और भरपूर आनंद भी बना रहा। यह कुंडलिनी योग से बने हुए अद्वैत भाव से ही हुआ। फ़िर भी मैंने योग को कुछ कम किया, क्योंकि थोड़ी थकान व सुस्ती लग रही थी। इससे सिरदर्द भी थोड़ा कम हुआ और शरीर का कम्पन भी कम हुआ। वैसे ज्यादा अच्छा तब रहता है जब आसनों की संख्या कम न की जाए, पर उन पर लगने वाले समय को कम किया जाए। योग को काम की तरह नहीं लेना चाहिए। इसे थकान नहीं समझना चाहिए। इसे भरपूर आराम की तरह लेना चाहिए। शरीर व मन को ढीला छोड़ देना चाहिए। वास्तव में योग थकान को कम करता है, थकान को बढ़ाता नहीं। हरेक आसन एक विशेष प्रकार से प्राण ऊर्जा को ऊपर चढ़ाता है, और घुमाता है। वैसे भी कम नींद लेने से, रात को देर तक ज्यादा जागने से, खान-पान के समय में परिवर्तन से, पंखे या ऐसी की ज्यादा हवा लेने से तनाव व सिरदर्द पैदा हो जाता है। मेरे बाएं मस्तिष्क में क्रियाशीलता ज्यादा रही, जिसके लिए इड़ा नाड़ी से ऊर्जा ऊपर चढ़ रही थी। हालाँकि उसके साथ साथ आज्ञा चक्र और मूलाधार का ध्यान करने से ऊर्जा सुषुम्ना में स्थानांतरित हो जाती थी, जिससे दायाँ मस्तिष्क भी क्रियाशील हो जाता था, और सहस्रार में कुंडलिनी चित्र प्रकट हो जाता था। थोड़ी देर बाद वह ऊर्जा फिर से इड़ा नाड़ी में प्रविष्ट हो जाती थी। उसे फिर से इसी तरह सुषुम्ना में ले जाना पड़ता था। यह क्रम बार-2 चलता था। दरअसल दुनियादारी से बायाँ मस्तिष्क और अध्यात्म से दायाँ मस्तिष्क क्रियाशील होता है। दोनों मस्तिष्कों के संतुलन के लिए भौतिकता और आध्यात्मिकता का संतुलन जरूरी है। मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे देवलोक की स्त्रियां नंदा और अलकनन्दा का जल बारी-2 से पीकर रति क्रीड़ा की तरफ आकर्षित होती हैं और महान तृप्ति का अनुभव करती हैं। दरअसल वे दुनियादारी में डूबी हुई होती हैं। इसलिए उनमें ज्यादा एनेर्जी नहीं बची होती। वे सीधे तौर पर गंगा नदी तक नहीं पहुंच सकती हैं। इसलिए वे नन्दा और अलकनन्दा नदियों से ही काम चलाती हैं। मेरे साथ भी लगभग ऐसा ही हुआ। काम के ज्यादा बोझ के कारण मेरे अंदर इतनी एनेर्जी नहीं बची थी कि मैं कुंडलिनी को सीधे ही सहस्रार तक उठा पाता। ऐसा जबरदस्ती करने से मेरे सिर में हल्का दर्द हो रहा था। इसलिए मैंने कुंडलिनी ऊर्जा को उसकी अपनी मर्जी से पीठ से ऊपर चढ़ने दिया। फिर मैंने देखा कि वह इड़ा नाड़ी से होकर बाएँ मस्तिष्क को एक थ्रिल संवेदना के साथ जाने लगी, और लगातार जाती रही। मैं बस बीच में हल्का ध्यान फ्रंट आज्ञा चक्र और दांत के पीछे टिकाई हुई सीधी जीभ पर देता था। उनके साथ मूलाधार पर तो बहुत ही कम बार ध्यान दे पाता था, क्योंकि इससे ऊर्जा सीधे ही सहस्रार व सुषुम्ना में जाती है। उससे वह पिंगला या सुषुम्ना नाड़ी में जाने की कोशिश तो करती, पर जा नहीं पा रही थी। मतलब कि ऊर्जा की कमी थी। बड़ी देर बाद वह थोड़ी देर के लिए ही पिंगला और दाएँ मस्तिष्क में जाती थी, और फिर से इड़ा में आ जाती थी। कुंडलिनी ज्यादातर समय आज्ञा चक्र पर रहती, और उससे ऊपर न जाती। सुषुम्ना और सहस्रार में सिर्फ क्षण भर के लिए ठहरती थी। बात साफ है कि जितनी अपने अंदर ऊर्जा हो, उसीके हिसाब से कुंडलिनी को घुमाना चाहिए। जोर जबरदस्ती नहीँ करनी चाहिए।

ऊर्ध्वरेता पुरुष को ब्रह्मचारी माना जाए या तांत्रिक

मुझे इस सप्ताह शिवपुराण में एक नई जानकारी भी मिली। एक श्लोक में ऊर्ध्वरेता शब्द लिखा मिला। ऊर्ध्वरेता मनुष्य को महान ज्ञानी या आत्मज्ञानी या महान आध्यात्मिक साधक के समकक्ष रखा गया था। ऊर्ध्व का मतलब ‘ऊपर की ओर’ है, और रेता का मतलब ‘वीर्य’ है। इसलिए ऊर्ध्वरेता का मतलब हुआ कि वह व्यक्ति जो अपने वीर्य को ऊपर की ओर चढ़ाता है। यह तो वही सेक्सुअल सबलीमेशन है, जो तंत्रयोग की आधारभूत क्रिया है। तंत्र के नाम पर आजकल इसका ही बोलबाला है, हालाँकि यह वृहद परिपेक्ष्य वाले तंत्र का एक सर्वप्रमुख सहयोगी कारक ही है। अपने आप में यही सबकुछ नहीं है। इसका हिंदी में अनुवाद करते हुए इसे ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी लिखा गया है। जो ब्रह्मचारी है, वह ऊर्ध्वरेता कैसे बन पाएगा, क्योंकि ब्रह्मचारी में तो रेता का उत्पादन ही नहीं होता। रेता का उत्पादन तो सैक्सुअल स्टिमुलेशन से होता है, पर ब्रह्मचारी तो इससे सर्वथा दूर रहता है। यदि उसमें सामान्य शारीरिक क्रियाओं के तहत रेता का उत्पादन होता भी है, तो वह बहुत कम व अन-नोटिसड रहता है। जिस चीज को आदमी शरीर में नोटिस भी नहीं कर सकता, उसे वह ऊपर कैसे चढ़ाएगा। इससे एक और बात पता चलती है कि पुराणों में हर जगह तंत्र का उल्लेख है, और पौराणिक काल में तँत्रविज्ञान आम जनमानस में व्याप्त था। ब्रह्मचर्य भी तो एक तँत्रविज्ञान ही है। यदि ब्रह्मचारी योगसाधना की सहायता से वीर्य ऊर्जा को ऊपर न चढ़ाता रहे, तो वह उसे परेशान करेगी, और उसके मन व शरीर में विकार भी पैदा कर सकती है। यह अलग बात है कि वामपंथी तंत्र में इस ब्रह्मचर्य को अमर्यादित व प्रचण्ड रूप दिया जाता है। इससे हालाँकि आध्यात्मिक विकास बहुत तीव्रता से होता है, पर यदि यह सही ढंग से न किया जाए तो यह आध्यात्मिक पतन भी तीव्र गति से ही करता है। आजकल अधिकांशतः केवल इसी सैक्सुअल तंत्र को ही तंत्र माना जाता है।

महान लोगों के दोष भी आभूषणों की तरह शुभ होते हैं

इस दुनिया में कुछ भी सत्य नहीं है। सब कुछ एकदूसरे के सापेक्ष है। जो दोष आम लोगों में कुलक्षण कहे गए हैं, वही दोष भगवान शिव में सुलक्षण हैं। इसीलिए शिवपुराण में नारद मुनि पार्वती के माता-पिता को समझाते हुए कहते हैं कि ज्ञानियों और महान लोगों के दोष भी गुणों की तरह ही होते हैं। दरअसल नारद मुनि उन्हें बताते हैं कि उनकी पुत्री पार्वती का विवाह एक भूतिया, नंगे, जंगली और असामाजिक व्यक्ति से होगा। इससे वे चिंतित हो जाते हैं। फिर नारद उनकी चिंता को दूर करते हुए कहते हैं कि शिव भी ऐसे ही हैं, इसलिए पार्वती का विवाह शिव से करवाओ। पार्वती उनके मन की चंचलता को मिटा देगी। यह तंत्रयोग का ही तो वर्णन हो रहा है। फिर अधिकांश लोग कहते हैं कि तंत्र यहाँ से आया, वहाँ से आया; या तंत्र ऐसा है, तंत्र वैसा है। शिवपुराण एक पूर्ण समर्पित तंत्र-पुराण ही है। इसकी तंत्रविद्या आसानी से इसलिए पकड़ में नहीं आती, क्योंकि उसे उच्च कोटि की सामाजिकता व रूपकता के साथ लिखा गया है।

मान-अपमान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं

पिछले हफ्ते ही एक दुखद समाचार मिला कि अखाड़ा संघ के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी ने फंदे से झूलकर अपने प्राणों का अंत कर दिया। सूत्रों के अनुसार उन्होंने अपने आखिरी लिखित व वीडियो दस्तावेज में अपने इस काम के लिए अपने शिष्य आनन्द गिरि को जिम्मेदार ठहराया। आनन्द गिरि को उन्होंने बचपन से लेकर पालपोस कर बड़ा किया था, और उनका उसके प्रति विशेष लगाव होता था। सूत्रों के अनुसार वह उन्हें पहले भी समाज में अपमानित करवा चुका था, और अब भी झूठी विडियो वायरल करने जा रहा था, जिसमें उसके गुरु नरेंद्र गिरि किसी स्त्री के साथ आपत्तिजनक अवस्था में दिखाए जाते। इसी अपमान के डर से उन्होंने यह कदम उठाया। वैसे अभी भी इसकी जाँच चल रही है, और अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है। गीता में एक श्लोक आता है~जितात्मनः प्रशान्तस्यपरमात्मा समाहितः।शीतोष्णसुखदुःखेषुतथा मानापमानयोः॥६-७॥सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान में जिसने स्वयं को जीता हुआ है, ऐसा पुरुष परमात्मा में सम्यक् प्रकार से स्थित है॥7॥फिर अपमान से भयभीत होने को हम किस प्रकार का अध्यात्म कहेंगे। मैं यहाँ किसी का पक्ष नहीं ले रहा हूँ। मैं केवल घटना के एक पक्ष के बारे में वर्णन कर रहा हूँ, क्योंकि उसीसे सम्बंधित विचार मेरे मन में उठ रहे हैं। हरेक घटना के अनेक पक्ष होते हैं। पर हरेक पक्ष के बारे में विचार रखना एक अकेले आदमी के लिए संभव नहीं है। किसीका यह कहना कि इस घटना का केवल एक ही पक्ष क्यों लिया गया, बेमानी है। दूसरे पक्ष जानने के लिए दूसरे लोगों के विचार जानने चाहिए। एक जगह सभी कुछ नहीं मिल सकता। वैसे भी सम्पूर्ण जानकारी सभी पक्षों को जानकर ही मिलती है। लिटल नॉलेज इज ए डेंजरस थिंग। अगर दूसरे पक्ष की बात संक्षेप में कहूँ तो वह यही है कि गुरु, ज्ञानी और भक्त का कभी अपमान नहीं करना चाहिए। कुंडलिनी आदमी को बेहद संवेदनशील बना देती है। इसलिए कुंडलिनी योगी को परेशान नहीं करना चाहिए। उनसे प्रेम से ही बर्ताव करना चाहिए। सम्भवतः महिलाएं इसी कुंडलिनी सिद्धांत के कारण ज्यादा संवेदनशील होती हैं। मैं अगली पोस्ट में थोड़ा विस्तार से बताऊंगा कि ऐसा क्यों होता है। पहली बात, अपने प्रति सम्मान पर इतना लट्टू क्यों हुआ जाए कि उसके बाद अपमान झेल ही न सकें। अगर किसीके द्वारा लट्टू हुए बिना न रहा जाए, तो अपना सम्मान करवाया ही क्यों जाए। कुंडलिनी ही ऐसी परिस्थितियों में आदमी की सहायता व रक्षा करती है। कुंडलिनी के अतिरिक्त सृष्टि की हरेक वस्तु में स्वार्थ भरा है। कोई भी आदमी बिना स्वार्थ के मित्रता नहीं दिखाता। वृक्ष भी स्वार्थ के लिए ही फल देता है। गाय से दूध लेने के लिए उसे भी घास खिलाना पड़ता है। यहाँ तक कि नदी व पहाड़ आदि निर्जीव वस्तु से लाभ प्राप्त करने के बदले में उन्हें साफ-सुथरा रखना पड़ता है। पर कुंडलिनी तो बदले में किसी चीज की अपेक्षा नहीं रखती। वह बुरे समय में भी साथ देती है, और सांत्वना व सहानुभूति प्रदान करती है। कुंडलिनी अखण्ड ऊर्जा का एक बुलबुला है। उसका अखण्ड ऊर्जा से अलग अस्तित्व नहीं है। आसमान की तरह शून्य होने से उसे भला किस चीज की जरूरत हो सकती है। जो उसे जितना अधिक याद करता है, उसे उसका उतना ही ज्यादा साथ मिलता है। कुंडलिनी के अतिरिक्त हरेक वस्तु अस्थायी और अपवित्र है। कुंडलिनी के अतिरिक्त हरेक वस्तु भौतिक बाध्यताओं व सीमाओं से बंधी होती हैं। कुंडलिनी एक शुद्ध मानसिक चित्र है, शून्य ऊर्जा-आकाश का एक बुलबुला है। उसे भौतिक आयाम छू भी नहीं सकता। इसलिए अच्छी तरह से पालपोस कर रखी गई कुंडलिनी बुरे वक्त में बहुत काम आती है। जब भौतिक कार्यों व सम्बन्धों से तनाव बढ़ जाता है, तब पूरे शरीर की कार्यप्रणाली गड़बड़ा जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मस्तिष्क में ऊर्जा की कमी हो जाती है। उस समय अद्वैत की भावना करने से मन में कुंडलिनी प्रकट होने लगती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अद्वैत से शरीर थोड़ा रिलेक्स हो जाता है, जिससे ऊर्जा की खपत घट जाती है। अतिरिक्त ऊर्जा से मन में कुंडलिनी प्रकट होने लगती है। उस कुंडलिनी को बनाए रखने के लिए मूलाधार से ऊर्जा ऊपर चढ़ने लगती है। उससे एकदम से शारीरिक कार्यप्रणाली दुरस्त हो जाती है, और उससे मन के क्रोध आदि दोष मिट जाते हैं। दरअसल ऐसा मस्तिष्क में ऊर्जा की भरपूर उपलब्धता पैदा होने से ही होता है। मैंने पिछली पोस्ट में भी शिवपुराण का हवाला देकर लिखा था कि सहस्रार चक्र पूरे मस्तिष्क को ऊर्जा की आपूर्ति करता है। इसलिए जब मस्तिष्क में कुंडलिनी प्रकट हो जाए तो उसके साथ आज्ञा चक्र और मूलाधार चक्र का एकसाथ ध्यान करके उसे सेंट्रलाइज करने को कहा जाता है, ताकि वह सहस्रार में आ जाए। सहस्रार चक्र में इसीलिए एक हजार पंखुड़ियों को दर्शाया जाता है क्योंकि वह मस्तिष्क सहित पूरे शरीर में अनगिनत या हजारों स्थानों में ऊर्जा की आपूर्ति करता है। 

श्वास पर ध्यान से लाभ कुंडलिनी के माध्यम से ही मिलता है

एक दिन मैं थका हुआ महसूस कर रहा था। मैं सो भी नहीं पा रहा था, क्योंकि दिन में खाना खा लेने के बाद सोने से मुझे गैस्ट्रिक एसिड रिफलक्स होता है। पेट से मुंह को खटास जैसी आती है, जिससे दांत भी घिसते हैं। खाली बैठ कर साँसों पर ध्यान देने लगा, खासकर हँस शब्द के साथ। इससे थकान भी दूर हो गई और कुंडलिनी आनन्द भी प्रकट हो गया। साँस भरते समय साँस की आवाज पतले संगीत वाली थी, और बाहर जाती साँस की आवाज मोटे संगीत की थी। आप कह सकते हैं कि अंदर जाती साँस की आवाज की ट्रेबल या फ्रेकवेंसी ज्यादा थी, पर बाहर जाती साँस का ट्रेबल कम और बास ज्यादा था। म की आवाज ज्यादा ट्रेबल की और स की आवाज कम ट्रेबल की है। इसीलिए हँस के रूप में साँस पर ध्यान दिया जाता है। इसलिए हँ का ध्यान अंदर जाती साँस के साथ, व स का ध्यान बाहर जाती साँस के साथ किया जाता है। इससे बहुत लाभ मिलता है।

वैदिक दर्शन एक व्यावहारिक दर्शन है

व्यवहारिक दर्शन इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि यह शून्यवादी दर्शन नहीं है। वैदिक कर्मकांड इसका जीता जागता उदाहरण है। इसमें योग और ध्यान को दुनियादारी से प्राप्त किया जाता है, पलायनवाद से नहीं। मैं खुद इसी माहौल में पला-बढ़ा हूँ। यह अलग बात है कि जागरण रूपी अंतिम छलांग के लिए मैंने कुछ समय के लिए तंत्रयोग का सहारा भी लिया। पर यह भी सत्य है कि तंत्रयोग भी तभी सहायता करता है, यदि वैदिक कर्मकांड के प्रेमभरे माहौल में आदमी ने प्रारम्भिक आध्यात्मिक मुकाम हासिल कर लिया हो।

आध्यात्मिक रूप से हरेक पुरुष शिव और हरेक स्त्री पार्वती है

सती तपस्या करके शिव को प्राप्त करती है। अगले जन्म में जब वह पार्वती बनती है, तब भी तपस्या से ही शिव को प्रसन्न करके उन्हें प्राप्त करती है। मुझे तो यह तँत्रसम्मत गृहस्थ जीवन का रूपक ही लगता है। पार्वती की तपस्या यहाँ पर गृहस्थ जीवन की शुरुआत में एक पत्नी का, त्याग और समर्पण से भरपूर जीवन ही है। इसीलिए देखने में आता है कि गृहस्थी की शुरूआती खटपट के बाद ही असली गृहस्थ जीवन शुरु होता है। किसीकी गृहस्थी कुछ महीनों में ही पटरी पर आ जाती है, किसी को कुछ साल लग जाते हैं। कईयों के बीच तो तब असली ट्यूनिंग बनती है, जब उनके बच्चे भी बड़े हो जाते हैं। यह पति-पत्नी, दोनों की उचित भागीदारी पर निर्भर करता है कि कितना समय लगेगा। कई स्त्री पर आसक्त रहने वाले पति पत्नी से बिल्कुल भी तप नहीं करवाते और न ही खुद करते हैं। वे हालाँकि शुरु में ही फुल्ली ट्यूनड लगते हैं, पर यह दिखावा ज्यादा होता है। इस जल्दबाजी में वे एकदूसरे को ढंग से व गहराई से नहीं जान पाते। इससे कुछ न कुछ तांत्रिक कमी तो बाद तक रह ही जाती है। शादी से पहले तो चाहता ही है कि उसकी होने वाली पत्नी गुणों में देवी पार्वती से कम न हो, पर शादी के बाद भी पुरुष चाहता है कि उसकी पत्नी उसकी तन-मन-धन से सेवा करती रही, उससे भरपूर प्रेम करे और पूरी तरह उसके प्रति समर्पित रहे। मतलब कि पति चाहता है कि उसकी पत्नी उसके लिए पहले घोर तप करे, तभी वह अपने आपको उसके हवाले करेगा। भगवान शिव भी तो सती से या पार्वती से यही चाहते हैं। इसीलिए पार्वती निरन्तर शिव का स्मरण करते हुए घोर तप करती है। उसीके बाद शिव उसे स्वीकार करते हैं। थोड़ा तप तो शिव भी करते हैं। वे लगातार पार्वती की याद में इधर-उधर भटकते रहते हैं। यही उनका तप है। दरअसल यह मानव जीवन का मनोविज्ञान ही है, जिसे पुराणों में देवी-देवताओं की कथाओं द्वारा समझाया गया है।

युद्ध की देवी काली

युद्ध आदि के समय और अन्य विकट परिस्थितियों में भगवती माता या काली की पूजा करने का विधान है। दरअसल ऊर्जा का स्रोत स्त्री ही है। युद्ध आदि के समय बहुत अधिक प्राण ऊर्जा की आवश्यकता होती है, आम समय की अपेक्षा दुगुने से भी ज्यादा। शरीर को चलायमान रखने के लिए अलग से ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है, और मन को स्थिर रखने के लिए अलग से। अगर मुक्ति की आकांक्षा हो, तब तो और भी ज्यादा ऊर्जा चाहिए, क्योंकि उसके लिए साथ में नाड़ियों और अन्य चक्रों के साथ सहस्रार को भी जागृत रखना पड़ता है। काली को वीभत्स रूप इसलिए दिया गया है क्योंकि उससे प्राप्त ऊर्जा का इस्तेमाल युद्धादि में उपजे रक्तपात के लिए भी होता है। दूसरा मतलब यह भी है कि शक्ति खून की प्यासी भी हो सकती है।

कुंडलिनी तंत्र को उजागर करती लोकप्रिय फिल्म बाहुबली

दोस्तो, मैं एक पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कुंडलिनी-पुरुष को अभिव्यक्त करने के लिए ही महामानव को कल्पित किया जाता है। हनुमानजी ने भी एकबार पुराने जमाने के रॉकेट मैन की तरह ही वीरता से भरा कलाकौशल दिखाया था। लंका में जब उनकी पूँछ में लपेटे गए तेल से चुपड़े कपड़े में आग लगाई जाती है, तो वे रॉकेट मैन की तरह उड़ने लगते हैं, और पूरी लंका को आग लगाकर भस्म कर देते हैं। जो यथार्थ आजके महामानव से जुड़ा है, वही पुराने समय के महामानव के साथ भी जुड़ा है। अंतर यही है कि पुराने जमाने के ऋषि जानबूझकर कुंडलिनी-पुरुष को भौतिक अभिव्यक्ति देते थे, पर आजकल के बुद्धिजीवियों से अनजाने में ही आंतरिक प्रेरणा से ऐसा हो रहा है। मैंने अपने कुंडलिनी जागरण के आसपास बड़े और अत्याधुनिक पर्दे पर बाहुबली फ़िल्म सपरिवार देखी थी। हो सकता है कि उसका भी मेरी जागृति में हाथ हो। उस तमिल मूल की हिन्दी में अनुवादित फिल्म में बाहुबली नामक काल्पनिक महामानव का ही बोलबाला था। बाहुबली का शाब्दिक अर्थ है, ‘ऐसा व्यक्ति जिसकी भुजाओं में बहुत बल हो’। वह अपने कन्धे पर सैकड़ों किलो वजन के पत्थर के शिवलिंग को लेके चलता, अकेले ही शत्रुओं की पूरी सेना को पलभर में ही परास्त करता, और नौका को दिव्य विमान की तरह उड़ाकर उस पर अपनी प्रेमिका राजकुमारी से रोमांस करता। उस फिल्म में भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों काल नजर आते थे। विचित्र सी भव्यता थी उसमें, जिसे बहुत पुरानी भी कह सकते हैं, और बहुत नई भी। उसमें एनिमेशन तकनीक, वास्तविक दृश्य और जीवंत अभिनय, तीनों का मिश्रण लाजवाब था। गीत-संगीत भी आत्मा की गहराई को छूता हुआ नजर आता था। एक रोमांटिक गाने की शुरुआत तब होती है जब बाहुबली पानी में खड़ा होकर अपनी दोनों बाजुओं का पुल बनाकर उसके ऊपर से देवसेना को गुजार कर एक बड़ी सी सुंदर किश्ती में बैठाता है। इस दृश्य में कुंडलिनी तंत्र का यह पहला उपदेश छिपा है कि तंत्र में पुरुष और स्त्री बराबर का स्थान रखते हैं, और स्त्री को देवी और गुरु के रूप में पूजनीय भी माना जाता है। बाहुबली और देवसेना का रोमांस एक उड़ती हुई नौका पर दिखाया गया है। दरअसल वह पालों वाली नौका थी जो पानी पर तैर रही थी। सुंदर तटीय पहाड़ियों के बीच से गुजरती हुई वह नौका गहरे समुद्र में पहुंच जाती है। इसका मतलब है कि दोनों का विवाहोपरांत रोमांस हल्के-फुल्के पर्यटन से शुरु होकर दुनियादारी की गहरी जिम्मेदारियों के बीच में पहुंच जाता है। वहाँ बड़े-2 तूफानों से उनकी नौका डगमगाने लगती है। इसका मतलब है कि सांसारिक उलझनों और समस्याओं से उनके प्यार का आधार उनका मनुष्य जीवन संकटग्रस्त होने लगता है। फिर देवसेना आकर्षक मुस्कान के साथ बाहुबली को कुछ गूढ़ इशारा करते हुए अपने हाथ से गुलाबी रंग छोड़ती है, जो पूरे पानी को गुलाबी कर देता है। इसमें गहरा अर्थ छिपा है। मैंने शिव-पार्वती की प्रेम-लीलाओं से सम्बंधित पिछली पोस्ट में भी बताया था कि जब तक आदमी संसारसागर में बुरी तरह से नहीं फंस जाता, तब तक वह उससे बाहर निकलने का प्रयास नहीं करता। गुलाबी रंग वास्तव में स्त्री-प्रेम का प्रतीक है। वह पानी में फैलता है, मतलब संसार से होकर ही स्त्री-प्रेम उसके पात्र तक पहुंच सकता है, संसार से भागकर नहीं। समुद्र और उसका जल यहाँ संसार का प्रतीक है। दूसरा तँत्रसम्मत अर्थ इससे यह निकलता है कि स्त्री ही तंत्र का प्रारंभ करने वाली तँत्रगुरु होती है। उससे प्रेरित बाहुबली भी जोश के साथ अपने हृदय व हाथों से नीला रंग छोड़ता है, जो चारों ओर फैल जाता है। नीला रंग पुरुष-प्रेम का प्रतीक है। ये दोनों रँग आपस में मिल जाते हैं। इसका मतलब कि दोनों का प्रेम (कुंडलिनी) एकदूसरे से और चारों ओर हर चीज से घुल मिल जाता है।  फिर उससे उमंग से भरा बाहुबली उस नौका के स्टीयरिंग को घुमाता हुआ फ्लाईंग गियर लगाता है, जिससे उसके पाल पंख बन जाते हैं, और नौका बादलों के बीच उड़ने लगती है। फ्लाईंग गियर का मतलब यहाँ तांत्रिक योग, और उससे कुंडलिनी का हृदय चक्र से ऊपर उठकर आज्ञा चक्र की तरफ जाना है। उस पर गाने-बजाने वाली और सेवा-शुश्रुषा करने वाली लोगों की पूरी महफिल भी साथ होती है। इसका मतलब है कि कुंडलिनी से आकर्षित होकर सभी लोग कुंडलिनी योगी के सहयोगी बन जाते हैं। इसका यह मतलब भी है कि सभी प्राण कुंडलिनी के साथ होते हैं। ये सभी सुविधाएं प्राणों की प्रतीक भी हैं। बादलों को घोड़ों के आकार में दौड़ते हुए व हिनहिनाते हुए दिखाया गया है। ये दरअसल इन्द्रियाँ हैं, जो तांत्रिक कुंडलिनी शक्ति से अपनी क्रियाशीलता के चरम पर होती हैं। सारस जैसे सफेद पंछियों के झुंड उड़ते व चहकते दिखाए जाते हैं। ये भी उमंग से भरे हुए मन के प्रतीक हैं। मन या जीवात्मा को पंछी की संज्ञा भी दी जाती है। वैसे भी शास्त्रों में इंद्रियों को घोड़ों के रूप में दर्शाया गया है। आसमान को तलाब की तरह दिखा कर उसमें उगे कमल पुष्पों के झुंड दिखाए गए हैं। साथ में चन्द्रमा भी एक सुंदर जमीनी वस्तु की तरह दिखता है, जिस पर भी फूल उगने लगते हैं। बादल उनकी नौका पर स्तंभों, सीढ़ियों आदि से सुंदर आकृतियों में लिपटने लगते हैं। इसका मतलब है कि कुंडलिनी या मन के सहस्रार चक्र में प्रविष्ट होने के बाद सभी जमीनी वस्तुएं औऱ जमीनी भाव दिव्य लगने लगते हैं। जमीन और आसमान एक हो जाते हैं। मूलाधार और सहस्रार एक हो जाते हैं। बादल भी इसका प्रतीक है, क्योंकि उसमें जमीन (पानी) और आसमान (हवा) दोनों के अंश होते हैं। इसीलिए बादल मनभावन लगते हैं। मन अद्वैत भाव से भर जाता है। सबकुछ एक जैसा और आनन्द से भरा हुआ लगता है।  यह तांत्रिक कुंडलिनी रोमांच ही है, जिसे इस तरह आसमानी बगीचे में उड़ती नौका के रूप में दिखाया गया है। नहीं तो मन के कुंडलिनी आनन्द को कोई कैसे दिखाए। बाहुबली और देवसेना साधारण रोमांस को कुंडलिनी रोमांस में बदल देते हैं, जिससे उनकी कुंडलिनी सहस्रार चक्र में पहुंच जाती है। इसे ही बादलों की ऊंचाई में उड़ना दिखाया गया है। पेड़ के इर्दगिर्द सिमटा रोमांस क्या रोमांस होता है? फिल्म निर्माता की दार्शनिक कल्पना शक्ति को दाद देनी पड़ेगी। इन उपरोक्त दृष्यों वाले मात्र एक गाने में ही पूरा तंत्र दर्शन सिमटा हुआ प्रतीत होता है। सम्भव है कि मेरे अवचेतन मन पर बाहुबली फिल्म की छाप पड़ी हो, और अनजाने में ही कुंडलिनी योग की तरफ मेरा आकर्षण बढ़ा हो। और ये तो अधिकांश विद्वान मानते ही हैं कि महामानव और कुछ नहीं, कुंडलिनी-मानव ही है। वैसे मैं यहाँ फ़िल्म की समीक्षा नहीं कर रहा हूँ, प्रकरणवश लिख रहा हूँ।