कुण्डलिनी-लिङ्गों में मूलाधार चक्र ही सर्वश्रेष्ठ लिङ्ग है

दोस्तों, शिवपुराण में भगवान शिव के ध्यान पर ही अधिकांश जोर दिया गया है। उसमें भगवान शिव को ही कुंडलिनी माना गया है। पूरे पुराण में लिंग का बहुतायत में वर्णन है। जब लिंग के ऊपर शिव (कुंडलिनी) का ध्यान किया जाता है, तब वह शिवलिंग या कुंडलिनी-लिंग बन जाता है। शिवलिंग ही शिवपुराण की धुरी है, जिसके चारों ओर पूरा पुराण घूम रहा है।

कुण्डलिनी के साथ जुड़े हुए चिन्ह को ही कुंडलिनी लिंग या शिवलिंग कहते हैं

वास्तव में मुख्य वस्तु के साथ जुड़े हुए चिन्ह को ही उस वस्तु का लिंग कहते हैं। जैसे कि पुरुष के साथ जुड़े हुए पौरुषत्व के चिन्ह को पुलिंग और स्त्री के साथ जुड़े हुए स्त्रीत्व के चिन्ह को स्त्रीलिंग कहते हैं। लिंग के बिना मुख्य वस्तु में कुछ कमी आ सकती है, परंतु वह समाप्त नहीं हो जाती। यदि पुरुष से पुरुष के चिन्ह समाप्त हो जाएं, तो पुरुष के स्वभाव में कुछ कमी आ सकती है, परंतु पुरुष वैसा ही रहेगा। इस हिसाब से तो छिपकली की पूँछ को भी छिपकली का लिंग कह सकते हैं। जब वह उसे गिराती है, तो उससे उसे अपना संतुलन बनाने में कुछ कठिनाई आ सकती है, परंतु छिपकली वैसी ही रहती है। इसी तरह, अध्यात्म में मुख्य वस्तु कुंडलिनी ही है। किसी मूर्ति आदि के चिन्ह से जोड़ने पर कुंडलिनी को अतिरिक्त बल मिलता है। यदि उस चिन्ह या लिंग को हटा दिया जाए, तो कुंडलिनी ध्यान में कुछ कमी आ सकती है, परंतु कुंडलिनी तब भी मन में बनी रहती है।

कुंडलिनी योग चर लिंग के अंतर्गत आता है

शिवपुराण में अनेक प्रकार के लिंगों का वर्णन आता है। चर लिंग कुंडलिनी योगी के लिए विशेष महत्त्व का है। इसमें मूल संवेदना को लिंग माना गया है। शरीर के विभिन्न चक्र उस लिंग के बदलते हुए स्थान हैं। वह संवेदना निचले चक्रों पर उत्पन्न होती रहती है, और अन्य सभी चक्रों से होती हुई चक्राकार घूमती रहती है।

सबसे स्थायी लिंग के रूप में हमारा अपना शरीर

अन्य प्रकार के लिंग अचर होते हैं। उनमें पर्वत या पत्थर से बने लिंग भी शामिल हैं। पर्वत से बने लिंग स्थायी होते हैं। पत्थर से बने लिंग अस्थायी होते हैं। पत्थर से बने लिंग स्त्रियों के लिए बेहतर बताए गए हैं। अन्य प्रकार के लिंग सूक्ष्म लिंग होते हैं। मंत्र लिंग इनमें मुख्य हैं। मंत्रलिंग में मंत्र के ऊपर कुंडलिनी का ध्यान किया जाता है। ॐ भी एक उत्तम प्रकार का मंत्र लिंग है। सूक्ष्म लिंग सन्यासियों के लिए बेहतर बताए गए हैं। पर्वत को इसीलिए स्थायी लिंग कहा गया है, क्योंकि वे लाखों वर्षों तक वैसे ही बने रहते हैं। इस हिसाब से तो हमारा अपना शरीर सबसे स्थायी लिंग हुआ, क्योंकि वह हमें हर जन्म में मिलता ही रहेगा, जब तक हमें मुक्ति नहीं मिल जाती। इसका सीधा सा अर्थ है कि कुंडलिनी योग साधना सर्वश्रेष्ठ साधना है। वास्तव में लिंग का दूसरा अर्थ अनुभूति भी है, जो हमें विभिन्न प्रकार के पदार्थों और भावों की सहायता से प्राप्त होती है। उसी अनुभूति पर कुंडलिनी को आरोपित किया जाता है। क्योंकि सबसे तीखी और मीठी संवेदना की अनुभूति हमें अपने ही शरीर से प्राप्त होती है, कहीं बाहर से नहीं, इसलिए शरीर के अंदर का लिंग ही सर्वश्रेष्ठ लिंग है। यही सिद्धांत तंत्रयोग का मूल सिद्धांत है।  “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” नामक पुस्तक में इस बात को पुरजोर सिद्ध करके दिखाया गया है।

कुंडलिनी के लिए ही तांत्रिक भैरव नाथ ने माता वैष्णो देवी का अपमान किया था

दोस्तों, हिंदुओं के पवित्र तीर्थस्थल वैष्णो देवी के मूल में एक कथा आती है कि तांत्रिक भैरव नाथ कन्या वैष्णो के पीछे भागा था। वह उसके माध्यम से अपनी मुक्ति प्राप्त करना चाहता था (सम्भवतः तांत्रिक यौन-योग के माध्यम से)। ऐसा वह अपनी कुंडलिनी को जागृत करके करना चाहता था। कन्या वैष्णो उसकी अच्छी मंशा को नहीं समझ सकी और क्रोध में आकर काली बन गई और उसका वध करने लगी। तब भैरव को उसकी दिव्यता का पता चला और वह उससे क्षमा मांगने लगा। वैष्णो को भी उसकी अच्छी मंशा का पता चल गया। सम्भवतः उसे पछतावा भी हुआ कि उसने अनजाने में एक महाज्ञानी तांत्रिक को मारने का प्रयास किया। इसीलिए तो उसने उसे मुक्ति का वर दिया और यह भी कहा कि भैरव के दर्शन के बिना मेरे दर्शन का कोई फल नहीं मिलेगा। यह प्रसंग सांकेतिक या मैटाफोरिक भी प्रतीत होता है। माता वैष्णो ने भैरव को असलियत में नहीं मारा था। वास्तव में मोक्ष प्राप्त करने के लिए शून्य बनना पड़ता है। अपना सब कुछ खोना पड़ता है। भैरव को भी मुक्ति के लिए ज़ीरो बनना पड़ा। इसी ज़ीरो को ही असम्प्रज्ञात समाधि भी कहते हैं, जिससे आत्मज्ञान होता है। इसी को भैरव का मरना कहा गया है। चूँकि भैरव के मन में वैष्णो के रूप की समाधि के लगने से ही वह आध्यात्मिक रूप से विकसित होकर असम्प्रज्ञात समाधि और आत्मज्ञान के स्तर को पार करता हुआ अपनी मुक्ति के उच्चतम स्तर तक पहुंचा, इसीलिए कथा-प्रसंग में कहा गया कि वैष्णो ने भैरव को मारा।

दूसरे प्रकार से ऐसा भी हो सकता है कि देवी माता की लघु संगति से उसे तांत्रिक प्रेरणा प्राप्त हुई हो। उससे उसने अपनी असली तांत्रिक प्रेमिका की सहायता से कुंडलिनी जागरण की प्राप्ति की हो, जिससे उसका अकस्मात रूपांतरण हो गया हो। इसीको उसका देवी माता के द्वारा मारा जाना कहा गया हो।

तीसरे प्रकार से देवी माता के द्वारा भैरव बाबा का मारा जाना इस सिद्धांत का मैटाफोर भी हो सकता है कि भौतिक समृद्धि के लिए यौन तंत्र का इस्तेमाल करने से भौतिक तरक्की तो प्राप्त होती है, पर मुक्ति नहीं मिलती, अर्थात मरना पड़ता है। 
फिर भी अच्छी मंशा के बावजूद भी बाबा भैरव ने तंत्र के नियमों के विरुद्ध तो काम किया ही था। तंत्र में कभी हमलावर रुख नहीं अपनाया जाता। एक नम्र व विरक्त साधु-संन्यासी या भोले-भाले बच्चे की तरह व्यवहार करना पड़ता है। स्वेच्छा से बने तांत्रिक साथी को देवी-देवता की तरह सम्मान देना पड़ता है, और यहाँ तक कि पूजना भी पड़ता है। दोनों को एक-दूसरे को बराबर मानना पड़ता है। तांत्रिक गुरु की मध्यस्थता भी जरूरी होती है।

विवाहपूर्व प्रेम संबंध वैष्णो-भैरव वाली उपरोक्त कथा का विकृत रूप प्रतीत होता है

विकृत रूप हमने इसलिए कहा क्योंकि अधिकांश मामलों में लड़के-लड़की के बीच का प्रेम संबंध कुंडलिनी जागरण के लिए नहीं होता। अर्थात वह प्रेमसंबंध तांत्रिक प्रकार का नहीं होता। वैसे तो तंत्र में किसी की बेटी या पत्नी से शारीरिक संबंध बनाना वर्जित है। इसलिए विवाहपूर्व या विवाहेतर प्रेमसंबंध को तांत्रिक बनाए रखने के लिए शारीरिक संबंध से परहेज रखना जरूरी है। इससे यह लाभ भी होता है कि आदमी को अपने असली तांत्रिक प्रेमी अथवा पति/पत्नी से ही पूरी तरह संतुष्ट होकर गहन तांत्रिक साधना करने की प्रेरणा मिलती है। वैसे तो तांत्रिक प्रेम का मुख्य कार्य शारीरिक आकर्षण को पैदा करना है, ताकि प्रेमी का अविचल चित्र निरंतर मन में कुंडलिनी के रूप में बना रह सके। यह आकर्षण साधारण बोलचाल, रहन-सहन, हाव-भाव, हँसी-मजाक व सैर-सपाटे आदि से भी पैदा हो सकता है। वास्तव में इनसे पैदा होने वाला शारीरिक आकर्षण प्रत्यक्ष शारीरिक संबंध से पैदा होने वाले शारीरिक आकर्षण से भी कहीं ज्यादा मजबूत और टिकाऊ होता है। साथ में, एक से अधिक साथी के साथ शारीरिक संबंध रखना सामुदायिक स्वास्थ्य व सामुदायिक संबंधों के लिए भी अच्छा नहीं है। इसलिए जहाँ तक संभव हो, इसे केवल एकल साथी तक ही सीमित रखा जाना चाहिए।

वैष्णो कन्या अपने पति परमेश्वर के लिए तपस्या कर रही थीं

वैष्णो में सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती, इन तीनों देवियों की शक्ति का सम्मिलन था। वह परमेश्वर को पति रूप में पाना चाहती थीं। वास्तव में सभी मनुष्य ईश्वर से आए हैं, और उसी को पाना चाहते हैं। इसका मैटाफोरिक अर्थ यह निकलता है कि तंत्रसम्पन्न स्त्री उत्तम पति (ईश्वर-सदृश) की तलाश में रहती है। यदि उसे ऐसा पति न मिल पाए तो वह अपने साधारण पति को भी ईश्वर बना देती है।

विवाहपूर्व प्रेमसंबंध जानलेवा भी हो सकता है, जबकि साऊलमेट सबसे सुरक्षित होता है

मशहूर सिने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के साथ सम्भवतः ऐसा ही हुआ। सम्भवतः वे अपने प्रेमसंबंध में बहुत आसक्त व परवश हो गए थे। ऐसी हालत में यदि प्रेमिका सही मार्गदर्शन न करे, तो यह प्रेमी के लिए घातक भी सिद्ध हो सकता है। साऊलमेट (आत्मीय मित्र) इस स्थिति से बचाते हैं। साऊलमेट एक ऐसा प्रेमी/प्रेमिका है, जिसके प्रति बहुत ज्यादा आकर्षण मौजूद होता है, यद्यपि उससे कभी भी मिलन नहीं हो पाता। इसका अर्थ है कि उस आकर्षण में अटैचमेंट नहीं होती। एक व्यक्ति को अपने साऊलमेट में अपना रूप या अपना प्रतिबिंब दिखता रहता है। साऊलमेटस एक दूसरे को एनलाईटनमेंट की तरफ ले जाते हैं।

कुंडलिनी सभी प्रकार के अनुभवों को सुरक्षित रूप से झेलने की शक्ति देती है; और कुण्डलिनी जागरण तो सबसे बड़ा अनुभव है, जिसके आगे सभी अनुभव बौने हैं; प्रेत आत्मा से सामना होने की कुछ घटनाएं

दोस्तों, पिछली पोस्ट में मैंने ड्रीम विजिटेशन के बारे में बताया था। इस पोस्ट में मैं उससे संबंधित अपने अनुभवों के बारे में बताऊंगा।

आदमी (आत्मा) की मृत्यु नहीं होती, वह केवल रूप बदलता रहता है

आज से दो वर्ष पहले मेरी दादी जी का देहांत हो गया था। बुढ़ापा मृत्यु का मुख्य कारण रहा, हालांकि उसमें एक अनजानी सी लंबी बीमारी का भी योगदान था। यह भी संयोग ही है कि उन्हें श्वासरोग की भी समस्या थी, और कोरोना(कोविड-19) भी श्वासरोग ही फैला रहा है। बहुत से शारीरिक व मानसिक कष्टों के बीच में उन्होंने अपने प्राण छोड़े। स्वभाव से वे कोमल, भावनाप्रधान, सुखप्रधान व भीरु स्वभाव की थीं। कई बार तो वे अपनेपन की मोहमाया से ग्रस्त लगती थीं, पर वे उसे प्रेमभावना कहती थीं। दयालु, मानवतापूर्ण व ममतामयी स्वभाव की मूर्ति थीं। मेहनती थीं और अच्छे-बुरे की अच्छी परख रखती थीं। अपनों के सुख व भले के लिए चिंतित रहा करती थीं। वे बच्चों से बहुत प्यार करती थीं। बच्चों को वे जरा भीडांटने नहीं देती थीं, उन्हें गुस्से में हाथ भी लगाना तो दूर की बात रही। वे पालतु जानवरों की भी बहुत देखरेख रखती थीं। वे बहुत सोच-विचार करा करती थीं। मरने से और उसके बाद की दुर्गति से बहुत डरती थीं। उनकी मृत्यु के लगभग 15 दिन बाद मेरी उनसे सपने में मुलाकात हुई। अजीब सा शांतिपूर्ण अंधेरा था। मुट्ठी में भरने लायक घना अंधेरा था। पर आम अंधेरे के विपरीत उसमें चमक थी चमकीले काजल की तरह। वह मोहमाया या अज्ञान से दबी हुई आत्मा की स्वाभाविक चमक होती है। उस अंधेरे के रूप में भी मैं उन्हें स्पष्ट पहचान रहा था। इसका मतलब है कि उस अंधेरे में उनके रूप की एनकोडिंग थी। मतलब कि किसी आदमी की आत्मा का अंधेरा उसके गुण और रूप के अनुसार होता है। उसी अंधेरे से अगले जन्म में वही गुण और कर्म फिर से प्रकट हो जाते हैं। इसका अर्थ है कि सभी अंधेरे एक जैसे नहीं होते।

उनका वह रूप मुझे अच्छा लगा। वह आकाश की तरह पूरा खुला हुआ और विस्तृत था। वह मुझे अपनी क्षणिक आत्मज्ञान की अनुभूति की तरह लगा। परन्तु उसमें प्रकाश व आनंद वाला गुण किसी चीज के दबाने से ढका हुआ जैसा लग रहा था। शायद यही दबाव अज्ञान, आसक्ति, द्वैत, मोहमाया, कर्मसंस्कार आदि के नाम से जाना जाता है। ऐसा लगा जैसे ग्रहण काल में आसमान के आकार का सूर्य पूरा ढका हुआ हो, और नीचे का प्रकाश उस काले आसमान को कुछ अजीब सी या चमकीले काजल जैसी चमक देता हुआ बाहर की तरफ उमड़ना चाह रहा हो। इसे ही अज्ञान के पर्दे से आत्मा का ढकना कहते हैं। इसे ही अज्ञान रूपी बादल से आत्मा रूपी सूर्य का ढकना भी कहते हैं।

मैंने उनसे उनका हालचाल पूछा तो उन्होंने कहा कि वहाँ पर तो ऐसी-वैसी कोई दिक्कत नहीं थी। उन्होंने मेरा हाल पूछा तो मैंने कहा कि मैं ठीक था। उन्होंने कहा, “मैं तो वैसे ही डरती थीं  कि मरने के बाद पता नहीं क्या होता होगा। पर मैं तो यहाँ ठीक हूँ”। उन्हें वह स्थिति कुछ शक के साथ पूर्ण जैसी लग रही थी, पर मुझे उसमें कमी लग रही थी। शायद वे उस स्थिति को भगवान ही समझ रही हों। शायद वह उस स्थिति के बारे में जानने के लिए मुझसे संपर्क कर रही हों। मैंने प्रसन्न मुद्रा में आसमान की तरफ ऊपर हाथ उठाकर और ऊपर देखते हुए उन्हें उनके अंत समय के निकट कहा भी था कि वे सबसे ऊपर के आकाश लोक में जाएंगी, जिसे उन्होंने गौर से व विश्वास के साथ सुना था। ऐसा मैंने उनके ऐसा पूछने पर कहा था कि उस लाईलाज बिमारी के बाद वह कहाँ जा रही थीं। उनके उस विश्वास की एक वजह यह भी थी कि मेरे दादाजी ने लगभग 25 वर्ष पहले उन्हें मेरे सामने मेरे आत्मज्ञान के बारे में प्रसन्नता व बड़े आत्मगौरव के साथ बताया था। मेरी कुंडलिनी के निर्माण में मेरे दादाजी का बहुत बड़ा योगदान रहा था।

फिर उस ड्रीम विजिटेशन में मेरी दादीजी ने मुझसे कहा, “तेरे बहुत से अहितचिंतक पीठ पीछे तेरे विरुद्ध बोल रहे हैं”। तो मैंने उनसे कहा, “आप भगवान के बहुत नजदीक हो, इसलिए कृपया उनसे स्थिति सामान्य करने के लिए प्रार्थना करो”। उन्होंने कहा, “ठीक है”। मैं उस समय प्रतिदिन कुण्डलिनी योग कर रहा था। इसका अर्थ है कि कुंडलिनी (अद्वैत) मृत्यु के बाद ईश्वर की तरफ ले जाती है।

प्रेतात्मा के द्वारा भगवान का स्मरण करना बहुत बड़ी बात है, क्योंकि उस समय वह पूरी तरह से भूखी-प्यासी व आश्रय विहीन होती है। हो सकता है कि उससे उन्हें भगवान की तरफ गति मिल गई हो। आश्चर्य की बात है कि जिस स्थान पर उन प्रेतात्मा के लिए धार्मिक रीति के अनुसार जल का कलश रखा हुआ था, वहीं पर उनसे मुलाकात हुई। वहां पर एक शिवलिंग टेलीफोन सेट का काम कर रहा था, जिसके माध्यम से उनसे बात हो रही थी। बड़ी स्पष्ट,भावपूर्ण व जीवंत आवाज थी उनकी। वह मुंह से निकली हुई आवाज नहीं थी। वह सीधी उनकी आत्मा से आ रही थी और मेरी आत्मा को छू रही थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई स्विच दबा और मैं शरीर रहित आयाम में प्रविष्ट हो गया था। फिर मैंने परिवार के और सदस्यों से उनकी बात करानी चाही। पर वे लोग उन्हें मरा हुआ मान रहे थे। फिर मुझे भी उनके मरे हुए होने का भान हुआ। मैं तनिक दुखी होकर विलाप करने लगा और थोड़ा डर सा गया। उससे वह आत्मा ओझल हो गई और मैं एकदम से आत्मा के आयाम से बाहर आ गया।

प्रियजनों की आत्मा आने वाले खतरे का बोध भी करवाती है

कुछ महीनों बाद मैंने उन्हें बड़ी भयावह अवस्था में देखा। वह शायद वैसी ही स्थिति थी, जैसी उन्होंने अपनी मृत्यु के समय महसूस की होगी। मैंने उन्हें अपने पुश्तैनी घर के बरामदे में मृत रूप में जीवित बैठे देखा। वह बड़ा विचित्र व क्लेशपूर्ण अनुभव था। शायद वह मुझे अगले दिन होने वाली दुर्घटना के बारे में बताना चाह रही हों, पर बोल नहीं पा रही हों। अगले दिन मेरे कमरे की खिड़की पर एक जहरीला कोबरा सांप था, जिससे मेरा कर्मचारी बाल-बाल बच गया।

एकबार मैंने उन सूक्ष्म शरीर को फिर से भगवान की याद दिलाई

वह किसी रिश्तेदार के यहाँ आराम से सबके साथ बाहर बैठी थीं। मेरी मुलाकात होने पर मैंने उन्हें ईश्वर की याद दिलाई। वह धीरे-2 भवन के अंदर को सरक गईं और ओझल हो गईं। उनका रूप पहले से कुछ अधिक स्वच्छ लग रहा था। सूक्ष्म शरीर भगवान के तेज को ज्यादा देर सहन नहीं कर सकता।

अंतिम बार मैंने उन सूक्ष्म शरीर को बहुत निर्मल देखा

वे मेरे पुश्तैनी घर के मुख्य गेट से बरामदे में प्रविष्ट हो रही थीं। उन्होंने उज्ज्वल सफेद कपड़े पहन रखे थे। वे बहुत निर्मल, शान्त व आनन्दमयी लग रही थीं। उनसे मिल कर मेरा रोम-2 खिल उठा। उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ गया था। मैंने कहा कि मैं हरिद्वार गया था। हरिद्वार भगवान का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है। यह विश्वप्रसिद्ध योग राजधानी ऋषिकेश के नजदीक स्थित है। वे मुस्कुराते हुए व मुझसे यह पूछते हुए भवन के अंदर प्रविष्ट हुईं कि क्या मैं उससे पहले हरिद्वार नहीं गया था। उनका पूछने का मतलब था कि मैं पहले भी तो हरिद्वार गया हुआ था।

जब मेरे चाचा का सूक्ष्म शरीर मुझे चेतवानी देने आया था

उससे कुछ समय पहले मेरे चाचा की मृत्यु हाईपर थायरेडिसम बीमारी के कारण अचानक हृदय गति रुकने से हुई थी। वे बड़े मिलनसार व सामाजिक होते थे। ड्रीम विजिटेशन में मुझे वे अपनी मित्रमण्डली के साथ होहल्ला व हंसी मजाक करते हुए एक विचित्र सी अंधेरी पर शांत गुफा के अंदर चलते मिले। मैं और मेरी 5 साल की बेटी भी कुछ अजीब, चन्द्रमा की रौशनी से मिश्रित अंधेरे वाली और आनंद वाली जगह पर कुछ सीढ़ियां चढ़ कर उनके पीछे चल दिए। गुफा के दूसरे छोर पर बहुत तेज स्वर्ग के जैसा प्रकाश था। चाचा ने मुझसे मुस्कुराते हुए अपने साथ चलने के लिए पूछा। मैंने अनहोनी की आशंका से मना कर दिया। मेरी बेटी को वह नजारा बड़ा भा रहा था, इसलिए वह उनके साथ चलने के लिए जिद करने लगी। मैंने उसे बलपूर्वक रोका और हम गुफा से बाहर वापिस लौट आए। अगले दिन मेरी कार सड़क से बाहर निकलने से बाल-2 बच गई। साथ बैठी हुई मेरी फैमिली ने मुझे समय रहते चेता दिया था।

अपरिचित की आत्मा भी ड्रीम विजिटेशन में सहायता माँग सकती है

मेरे एक रिश्तेदार के लड़के को सपने में एक मंदिर के साधु बार-2 आकर अपना अंतिम संस्कार करने के लिए कहते थे। खोजबीन करने पर पता चला कि उन साधु की हत्या हो गई थी और उनकी लाश को नाले में फेंक दिया गया था। मेरे उन रिश्तेदार ने साधु का पुतला बनवाया और उसका विधिवत अंतिम संस्कार करवाया। उसके बाद उन साधु का सपने में आना बंद हो गया। मैं उस बात पर यकीन नहीं करता था। पर अपने खुद के उपरोक्त ड्रीम विजिटेशन के अनुभव के बाद वैसी अलौकिक घटनाओं पर विश्वास होने लग गया।