वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-9

कोई भी वेबपेज बनाने के लिए “माय साईट” को क्लिक करते हैं। उससे ड्रॉप डाऊन मीनू खुलता है। उस पर “साईट पेजस” नाम से एक बटन होता है। उसके कोने में लिखे “एड पेज” पर क्लिक किया जाता है, जिससे लिखने के लिए एक खाली साईट-पेज खुलता है। उसे लिख कर पब्लिश कर दिया जाता है। वह वेबपोस्ट की तरह किसी ईमेल फोलोवर को डिलीवर नहीं होता, बल्कि वेबसाईट में कहीं गुमनाम पड़ा रहता है। उस वेबपेज को किसी मीनू में या विजेट में एड करना पड़ता है। मीनू में डालने के लिए कस्टमाईजर से प्राईमरी मीनू खोलें। उसमें मीनू के सभी पेज दिखते हैं, और अंत में नीचे एक “एड आईटम” बटन होता है। उस पर क्लिक करने से सभी वेबपेजस की लिस्ट खुल जाएगी। अब उस नए वेबपेज को सेलेक्ट कर लें। वह प्राईमरी मीनू में जुड़ जाएगा। मीनू की सभी आईटम्स को रिओरडर (ऊपर-नीचे) भी कर सकते हैं, और किसी आईटम का ड्रॉपडाऊन लिस्ट के रूप में सबमीनू भी बनाया जा सकता है। इससे यह लाभ होता है की वेबसाईट की साईडबार बहुत लम्बी होकर मेन कंटेंट के नीचे तक नहीं लटकती।

विजेट में वेबपेज को डालने के लिए कस्टमाईज़र से विजेट में जाएं। यथानुसार साईडबार या फुटबार विजेट को सेलेक्ट करें। वेबसाईट में लगे हुए विजेटस की लिस्ट के बोटम पर एक “एड विजेट” नाम से बटन होता है। उस पर क्लीक करके विजेट की एक नई व लम्बी लिस्ट खुलती है। उस पर “पेज” विजेट को चुनें। वह विजेट वेबसाईट के विजेट की लिस्ट में जुड़ जाएगा। अब उस पर क्लिक करके उसे नाम दें। उसमें वेबसाईट के सारे पेज जुड़ जाएंगे, और उनकी एक लम्बी लिस्ट नीचे की तरफ साईडबार में जुड़ जाएगी। उस लिस्ट में वे सभी पेज भी होंगें, जो प्राईमरी मीनू में दिख रहे होंगे। साथ में, इस विजेट की ड्रॉपडाऊन लिस्ट भी नहीं बनती। इससे यह बहुत स्थान घेरता है, जिससे साईडबार बहुत नीचे तक चली जाती है। इससे बचने के लिए डबल साईडबार वाली (दोनों बाईं तरफ, दोनों दाईं तरफ, या एक बाईं व एक दाईं तरफ) वेबसाईट-थीम को भी एक्टिवेट किया जा सकता है। इससे यह नुक्सान हो सकता है कि मेन कंटेंट के लिए जगह काफी कम रह सकती है, मुख्यतया डेस्कटॉप पर। दूसरा उपाय है कि इस विजेट का प्रयोग न करें। उपरोक्तानुसार, प्राईमरी मीनू में ही एक आईटम “अन्य वेबपेजस” आदि नाम से बना लें। उसमें अतिरिक्त के वेबपेज “एड आईटम” से डालें, व उन्हें रिऑर्डर कर लें। उस “अन्य वेबपेजस” आईटम का सबमीनू बना लें। इससे इसके नीचे के सभी पेज ड्रॉपडाऊन लिस्ट के रूप में आ जाएंगे, जो कम जगह घेरेंगे। अन्य भी बहुत से विजेट होते हैं, जैसे “रीसेंट पोस्टस”, “टॉप पोस्टस एंड पेजस”, “टेक्स्ट” आदि। “टेक्स्ट” विजेट को साधारण सूचना जैसे की कोपीराईट सूचना, व डिसक्लेमर आदि लिखने के लिए किया जाता है।

यदि आप हरेक पोस्ट के ऊपर शेयर की संख्या भी दिखाना चाहते हैं, तो “माय साईट” पर जाएं। ड्रॉपडाऊन लिस्ट में “शेयरिंग” बटन को क्लिक करें। अब उस पर “ऑफिशियल बटन्स” को क्लिक करें। वैबसाईट के मामले में धीरज रखना चाहिए। कभी भी डोमेन नेम व वैबसाईट के विषय को बदलना नहीं चाहिए। डोमेन का नाम भी वैबसाईट के अनुसार ही रखना चाहिए। जैसे कि यह वैबसाईट कुण्डलिनी से सम्बंधित है, इसीलिए इसका डोमेन नाम “demystifyingkundalini” रखा गया है।

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ओसीआर, ऑप्टिकल रिकोग्निशन सिस्टम, आधुनिक प्रकाशन के लिए एक वरदान

पाठक सोचते होंगे कि कुण्डलिनी-वैबसाईट में स्वयंप्रकाशन व वेबसाईट-निर्माण के विषय किस उद्देश्य से डाले गए हैं।  वास्तव में कुण्डलिनी-साधक को स्वयंप्रकाशन का व वेबसाईट-निर्माण का भी व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए।  ऐसा इसलिए है, क्योंकि कुण्डलिनी-क्रियाशीलता या कुण्डलिनी-जागरण के बाद दिमाग में मननशीलता की बाढ़ जैसी आ जाती है।  उस स्थिति में व्यक्ति एक उत्कृष्ट पुस्तक व वेबसाईट का निर्माण कर सकता है।  साथ में, इससे वह खालीपन की नकारात्मकता से भी बच सकता है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी ऐसा ही हुआ।

ओसीआर (ocr) तकनीक से मेरा सामना तब हुआ, जब मैं अपने पिता द्वारा लिखित लगभग सात साल पुरानी एक कागजी पुस्तक का ई-पुस्तक वाला रूप बनाने का प्रयत्न कर रहा था। पुस्तक का नाम था ‘सोलन की सर्वहित साधना’। सौभाग्य से उस पुस्तक की सॉफ्ट कोपी प्रकाशक के पास मिल गई। इससे मैं पुस्तक को स्कैन करने से बच गया। साथ में, संभवतः सॉफ्ट कोपी से बनाई गई ई-पुस्तक में कम अशुद्धियाँ होती हैं। वह पुस्तक पीडीएफ फोर्मेट में थी। पहले तो मैं ऑनलाईन पीडीएफ कन्वर्टर की सहायता लेने लगा। मैंने कई प्रकार के कन्वर्टर को ट्राय करके देखा, गूगल ड्राईवर के कन्वर्टर को भी। परन्तु सभी में जो वर्ड फाईल कन्वर्ट होकर आ रही थी, उसके अक्षर तो पूर्णतया दोषपूर्ण थे। वह हिंदी पुस्तक तो कोई चाइनीज पुस्तक लग रही थी। फिर पीडीएफ एलीमेंट का प्रयोग किया। उसमें मुफ्त के प्लान में कुछ ही पेज एक्सट्रेक्ट करने की छूट थी। पेज तो पीडीएफ फाईल से वर्ड फाईल को एक्सट्रेक्ट हो गए थे, पर उन पृष्ठों में पट्टियों, फूलों आदि से सजावट जस की तस बनी हुई थी। वे सजावट की चीजें मुझसे रिमूव नहीं हो रही थीं। कुछ हो भी रही थीं, पर सभी नहीं। अक्षरों की गुणवत्ता भी अधिक अच्छी नहीं थी। मैंने सोचा कि शायद खरीदे जाने वाले प्लान से कोई बात बन जाए। परन्तु जब उसकी कीमत देखी, तो मैं एकदम पीछे हट गया। क्योंकि उसकी न्यूनतम सालाना कीमत लगभग 3000-4000 रुपए की थी।

कई महीनों तक मेरी योजना ठन्डे बस्ते में पड़ी रही। फिर जब मुझे कुछ खाली समय प्राप्त हुआ, तब मैंने गूगल पर सर्च किया। ओसीआर तो मैंने पहले भी पढ़ रखा था, पर मुझे कभी भी पूरी तरह से समझ नहीं आया था। फिर मुझे एक वेबपोस्ट में पता चला कि उसके लिए पुस्तक को स्कैन करना पड़ता है, ताकि पुस्तक का प्रत्येक पृष्ठ एक अलग चित्र के रूप में आ जाए। जैसे ही मैं पुस्तक के स्कैन की तैयारी कर रहा था, वैसे ही मुझे पता चला कि यदि पुस्तक पीडीएफ फाईल के रूप में उपलब्ध हो, तो उसे सीधे ही चित्र-फाईल के रूप में कन्वर्ट किया जा सकता है। मैंने गूगल पर ‘पीडीएफ इमेज एक्सट्रेक्शन’ से सर्च करके बहुत से ऑनलाईन कन्वर्टर ट्राय किए। उनमें मुझे स्मालपीडीएफडॉटकोम पर उपलब्ध कन्वर्टर सर्वोत्तम लगा। मैंने उसमें एक ही बार में सारी बुक-फाईल अपलोड कर दी। कनवर्शन के बाद सारी बुक-फाईल डाऊनलोड कर दी। उससे कम्प्यूटर के डाऊनलोड फोल्डर में सारी बुक-फाईल क्रमवार चित्रों के रूप में आ गई। सभी चित्र एक जिपड (कंप्रेस्ड) फोल्डर में थे। उस फोल्डर को अन्जिप (विनजिप आदि सोफ्टवेयर से) करने से सभी चित्र एक साधारण फोल्डर में आ गए।

फिर मैं उन चित्रों को वर्ड डोक में कनवर्ट करने वाले सोफ्टवेयर (ओसीआर) को गूगल में खोजने लगा। बहुत से ओसीआर ऐसे थे, जो हिंदी भाषा की सुविधा नहीं देते थे। अंत में मुझे वैबसाईट http://www.i2ocr.com पर उपलब्ध ऑनलाईन ओसीआर सर्वोत्तम लगा। वह निःशुल्क था। मैं बुक-चित्रों वाला फोल्डर एकसाथ अपलोड करने की कोशिश कर रहा था, पर नहीं हुआ। फिर मैंने सभी चित्रों को सेलेक्ट करके, सभी को एकसाथ अपलोड करने का प्रयास किया। पर वह भी नहीं हुआ। फिर मुझे एक वेबपोस्ट में पता चला कि बैच एक्सट्रेक्शन वाले ओसीआर कमर्शियल होते हैं, व मुफ्त में उपलब्ध नहीं होते। अतः मुझे एक-२ करके चित्रों को कन्वर्ट करना पड़ा। चित्रों की तरह ही कन्वर्ट हुई डोक फाईलें भी क्रमवार रूप में डाऊनलोड फोल्डर में आ गईं।

फिर मैंने क्रम के अनुसार सभी डोक फाईलों को एक अकेली डोक फाईल में कोपी-पेस्ट कर दिया। पर डोक फाईल में अक्षरों की छोटी-बड़ी लाईनें थीं, जो जस्टिफाई एलाईनमेंट में भी ठीक नहीं हो रही थीं। फिर मैंने एक वैबपोस्ट में पढ़ा कि एमएस वर्ड के फाईन्ड-रिप्लेस के फाईन्ड सेक्शन में ^p (^ चिन्ह कीबोर्ड की शिफ्ट व 6 नंबर वाली की को एकसाथ दबाने से छपता है) को टाईप करें, व रिप्लेस में खाली सिंगल स्पेस डालें। ‘रिप्लेस आल’ की कमांड से सब ठीक हो जाता है। वैसा ही हुआ। इस तरह से वह ई-पुस्तक तैयार हुई।

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यदि बहुत सारी छोटी वर्ड फ़ाइलों को एक साथ जोड़ा जाना है, तो एमएस वर्ड के ‘इंसर्ट’ की मदद ली जानी चाहिए। ’इंसर्ट’ बटन पर क्लिक करने पर बने ‘ऑब्जेक्ट’ बटन पर क्लिक करें, और इसके कोने पर बने त्रिकोण पर क्लिक करें। अब ड्रॉपडाउन मेनू पर ‘फ़ाइल फ्रॉम टेक्स्ट’ पर क्लिक करें। एक नया ब्राउज़-विंडो पॉप अप होगा। उस पर वर्ड फ़ाइलों का चयन करें, जिन्हें क्लब किया जाना है। ध्यान रखें कि चयन के क्रम में फ़ाइलों को क्लब किया जाएगा। इसका मतलब है, चयनित समूह में पहली फ़ाइल संयुक्त वर्ड फ़ाइल में पहले आएगी और इसी तरह। मैं एक बार में अधिकतम 10 फ़ाइलों को क्लब करने की सलाह देता हूं क्योंकि मुझे लगता है कि यदि बड़ी संख्या में फ़ाइलों को एक साथ चुना जाता है तो यह सिस्टम त्रुटि पैदा कर सकता है।

उस पुस्तक में कई जगह दो अक्षर जुड़े हुए थे। जैसे कि मूल पुस्तक के ‘फल का’ शब्दों का ‘फलका’ बन गया था। थोड़ी सी मेनुअल करेक्शन से सब ठीक हो गया। कागजी पुस्तक को सामने रखकर उपयुक्त स्थानों पर पेजब्रेक, लाइनब्रेक, हैडिंग शेप आदि दिए गए, ताकि ई-पुस्तक पूर्णतः मूल पुस्तक की तरह लगती। कवर के व शुरू के कुछ चित्रात्मक पृष्ठों को सीधे ही ई-पुस्तक में इन्सर्ट किया गया। इन कवर फ़ोटो के संपादन के लिए मैंने ‘फोटोजेट’ के ऑनलाइन फोटो संपादक का उपयोग किया। हालाँकि, संपादित छवि डाउनलोड करने से पहले इस ऐप को फेस बुक पर साझा करना पड़ता है। Pixlr.com का ऑनलाइन संपादक भी अच्छा है। चित्रों को सीधे कोपी-पेस्ट करने की बजाय एमएस वर्ड की ‘इन्सर्ट-पिक्चर’ की सहायता ली गई, क्योंकि सीधे कोपी-पेस्ट करने से कई बार ई-बुक में चित्र दिखता ही नहीं।

इससे आगे की तकनीक हाथ से लिखे लेख को ओसीआर करने की है। इसे ‘हैण्ड टैक्स्ट रिकोग्निशन’ कहते हैं। परन्तु यह पूरा विकसित नहीं हुआ है। इस पर खोज जारी है। हालांकि डब्बों वाले कागजी फोर्मेट में एक-२ डब्बे में एक-२ अक्षर को डालने से यह तकनीक काम कर जाती है। तभी तो सेवा-भरती या पंजीकरण आदि के अधिकाँश परिचय-फॉर्म भरने के लिए डब्बों वाले फोर्मेट का प्रयोग किया जाता है।

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वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-8; Website creation, management and development, part-8

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-8 (please browse down or click here to view this post in English)

मुफ्त के वैबसाईट प्लान में वैबसाईट का मोबाईल के आकार-प्रकार के अनुरूप आकार-प्रकार भी नहीं होता, जिससे ट्रेफिक काफी घट जाती है। कई लोग कहते हैं कि डुप्लीकेट कंटेंट की पेनल्टी से बचने के लिए पोस्ट में केनोनिकल टेग लगाने चाहिए। सच्चाई यह है कि गूगल स्वयं ही वेबपेज / वेब आर्टिकल का सर्वाधिक उपयुक्त रूप सर्च रेंकिंग के लिए चुन लेता है। हाँ, यदि गूगल को डुप्लीकेट कंटेंट का मकसद सर्च रेंकिंग को बढ़ाना लगे, तब वह उस पर पेनल्टी भी लगा सकता है। फिर भी जहाँ तक हो सके, सुरक्षा के लिहाज से डुप्लीकेट कंटेंट से बचना ही चाहिए। गूगल का बोट पोस्ट को डालने के अनुमानित समय पर बार-२ आता रहता है, व नई पोस्ट की खुराक से संतुष्ट होकर ट्रेफिक को बढ़ाता रहता है। इसलिए यदि निर्धारित अंतराल पर पोस्ट न डाली जाए, तो वह भूखा रह जाता है, जिससे वह लम्बे समय तक वापिस नहीं भी आ सकता। इसलिए अच्छा रहता है, यदि निर्धारित समय व अंतराल पर पोस्ट को डालना जारी रखा जाए। सप्ताह में एक दिन व वीकएंड पर जैसे कि शनिवार की शाम को 6 बजे से 9 बजे के बीच में सर्वोपयुक्त समय है, क्योंकि उस समय दुनिया के सभी टाईम जोन के लोग जागते हुए होते हैं, और रिलेक्सड मोड में भी होते हैं। फ्री प्लान में मोबाईल फोन पर वेबसाईट को एडिट भी नहीं किया जा सकता है। वेबसाईट पर पर्सनल पेज भी बनाए जा सकते हैं, जिन्हें कोई और नहीं देख सकता। उस पर अपनी सभी निजी जानकारी डाली जा सकती है।

इसी तरह “नोफोलो” कोड भी नहीं लगाना चाहिए किसी पोस्ट के साथ, क्योंकि इससे लिंक जूस किसी को नहीं मिलता, और नष्ट हो जाता है। यदि लिंक जूस लिंकड वेबसाईट को जाने से रुक भी जाए, तो भी फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि दूसरे ब्लोगर भी इस कोड को लगाएंगे, जिससे उनके ब्लॉग का लिंक जूस हमें नहीं मिल पाएगा। संक्षेप में, ट्रेफिक बढ़ाने के शोर्ट टर्म उपायों से बचना चाहिए। इनमें से अधिकांश उपाय तो अवैध ही होते हैं, जिनके कारण गूगल पेनल्टी लगा सकता है। अगर वैबपोस्ट या वेबपेज के लिए नया कंटेंट लिखने की सामर्थ्य न हो, तो अपने पुराने कंटेंट के शब्दों व वाक्यों में थोड़ा परिवर्तन करके, संभवतः उसको दुबारा भी लिख सकते हैं।  यद्यपि ऐसा दूसरों के कंटेंट को चुरा कर नहीं करना चाहिए।  कई ऐसे जाने-माने इंटरनेट-पुरुष भी हैं, जो दूसरों के कंटेंट से छेड़छाड़ करके ही मशहूर हुए हैं।

यदि बढ़ी हुई ट्रेफिक को निरंतर प्राप्त करना चाहें, तो सप्ताह में दो बार नई पोस्ट डालें।परन्तु इससे यह नुकसान होता है कि पाठकों को नई पोस्ट पढ़ने के लिए अधिक समय नहीं मिलता। ट्रेफिक को निर्बाध रूप से बढ़ा हुआ रखने के लिए भी सप्ताह में दो बार पोस्ट लिखी जा सकती है, परन्तु इससे बार-2 नोटिफिकेशन को प्राप्त करने वाले ई-मेल फोलोवर परेशान हो सकते हैं। यह भी हो सकता है कि वे मानसिक बोझ के कारण पोस्ट को पढ़े ही न।

वैबसाईट को ट्रांसफर भी किया जा सकता है। वेबसाईट को किसी दूसरे आदमी के नाम भी बनाया जा सकता है। कई लोग स्वयं वेबसाईट के मालिकाना हक़ से दूर रहना चाहते हैं, विशेषकर जिन पर पैसों का लेन-देन होता है। सार्वजनिक क्षेत्र के कामगारों को ऐसी वेबसाईट से समस्या आती है, विशेषकर आयकर दाखिले के समय। अन्य कानूनी बाध्यताएं भी होती हैं। ऐसे में वे पत्नी के नाम से वेबसाईट बनाते हैं, और स्वयं उसके एडमिन बन जाते हैं। मालिक (यहाँ पर पत्नि) तो वैसे भी एडमिन होता ही है। कई लोग अपनी वेबसाईट के प्रसिद्ध होने पर उसे पत्नि आदि के नाम ट्रांसफर कर देते हैं। उसके लिए पत्नि का वर्डप्रेस अकाऊंट (वर्डप्रेस प्लेटफोर्म के लिए) बनाना पड़ता है। पत्नि आदि का अंतर्राष्ट्रीय डेबिट कार्ड भी बनाना पड़ता है, जिससे वेबसाईट को रिचार्ज या अपग्रेड किया जा सके। साधारण वेबसाईट को तो सरकारी कर्मचारी भी चला सकते हैं, जिसमें पैसों का लेन-देन न हो, राजनीतिक बयानबाजी न हो, और सरकार की नापसंदगी के लेख न लिखे गए हों। विचारों की अभिव्यक्ति का अधिकार तो सबको है, यद्यपि एक सरकारी कर्मचारी के लिए कुछ शर्तों के साथ। उन विचारों से उसका सरकारी कार्य दुष्प्रभावित नहीं होना चाहिए। यदि लाभान्वित होए, तब तो बहुत अच्छा है।

वर्डप्रेस के टॉप बार के रीडर बटन को क्लिक करके ड्रापडाऊन मीनू खुलता है। उसमें पहला बटन “फोलोड साईट्स” का होता है। उस पर सभी फोलोड साईट्स की पोस्टस दिखती हैं, क्रमवार, सबसे नयी वाली सबसे पहले। उससे निचला बटन “कन्वर्जेशन” का होता है। उस पर जिस किसी भी पोस्ट के कमेन्ट को लाईक किया गया हो, उस पोस्ट के सभी कमेन्ट दिखाई देते हैं, क्रमवार, लाईक्ड कमेन्ट वाली सबसे नयी पोस्ट के कमेन्ट सबसे पहले। उससे निचला बटन “डिस्कवर” का होता है। उस पर वर्डप्रेस-पाठकों द्वारा चुनी गई बेहतरीन पोस्टस दिखाई जाती हैं। उससे निचला बटन “सर्च” का होता है। उस पर बहुत सी रिकमंड की गई पोस्टस होती हैं। सबसे ज्यादा रेकमंड की गई पोस्टस सबसे पहले होती हैं। उसमें एक सर्च बार भी होती है, जिस पर हम पोस्टस को सर्च कर सकते हैं। उससे निचला बटन “माय लाईक्स” का होता है। उस पर वे सभी पोस्टस होती हैं, जिन्हें लाईक किया गया होता है, क्रमवार, सबसे नयी लाईक की गई पोस्ट सबसे पहले। सबसे नीचे “टेगस” बटन होता है। इस पर हम अपने मनचाहे टेग को एड कर सकते हैं, ताकि हर बार उस टेग पर क्लिक करने से उस टेग वाली पोस्टस खुलती रहें। उदाहरण के लिए, यदि किसी को “कुण्डलिनी” से सम्बंधित विषय पसंद हैं, तो वह “कुण्डलिनी” शब्द को एड कर सकता है।

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Website creation, management and development, part-8

In a free website plan, the website does not have any size-type according to the size-type of mobile, which reduces traffic significantly. Many people say that in order to avoid the penalty of duplicate content, it is necessary to put a canonical tag in the post. The truth is that Google automatically chooses the best form of webpage / web article for search rankings. Yes, if Google finds it as a tactic to increase search rankings, then it can also penalize it. However, as far as possible, for security purpose, duplicate content must be avoided. Google’s bot keeps coming at the estimated time of posting, and satisfied with the new post dose, keeps increasing traffic. So if the post is not put at the fixed interval, then he is hungry, so that he may not return for a long time. It is therefore good, if continuing to post is kept at set time and interval. Weekly posting, on the day of weekend, such as on Saturday, and at time between 6 pm and 9 pm is the best, because at that time all the people of the world are awake and also in the Relaxed mode. The website cannot be edited on the mobile phone in the free plan. Personal pages can also be made on the website, which nobody else can see. All your personal information can be inserted on it.

Similarly, the “nofollow” code should not be included in any post as it does not make available link juice to anyone, and is destroyed. Even if the link juice is being blocked from going to the Linked website, there is no benefit as other bloggers will also apply this code, so that the link juice of their blog is not available to us. In short, short-term measures should be avoided to increase traffic. Most of these measures are illegal, due to which Google can penalize. If one does not have the ability to write new content for his webpost or webpage, then by changing slightly the words and sentences of their old content, they can possibly write it again. Although it should not be stolen from others’ content. There are many well-known internet-men, who have become famous only by tinkering with others’ content.

If you want to get increased traffic continuously, then add new posts twice a week. But this can be a loss for readers do not get much time to read new posts. Posting a post twice a week can also be practiced to keep the traffic uninterrupted, but the e-mail followers who receive frequent notifications may be upset. It may also be that they did not read the post because of the mental burden.

The website can also be transferred. The website can also be named with another man. Many people want to stay away from the ownership of the website themselves, especially on which money transactions happen. Public sector workers face problems from such websites, especially during the time of income tax return. There are also other legal obligations. In such a way, they make websites in the name of their wives, and become their administrators. The owner (the wife on here) is also the admin itself. Many people transfer their website to others’ account when they are famous. For that, the WordPress account (for wordpress platform) has to be created for the new website owner. The international debit card of the wife etc. has to be created so that the website can be recharged or upgraded. The general informative website can also be run by government employees, in which there is no money transaction, no political rhetoric, and the articles of government’s dislikes have not been written. The right to express thoughts is for everyone, even though with some conditions for a government employee. With his ideas, his official work should not be affected. If beneficial to his official work, then it is very good.

Clicking the Reader button in top bar of WordPress opens the dropdown menu. The first button is “Followed Sites”. Posts are displayed from all the followed sites on it, serial wise, the newest first of all. The lower button is of “Conversation”. It shows the comments of all the posts on the comment of which the website owner has put the “like” himself, or a comment has been made by himself, in an orderly fashion, the newest post with liked comment appearing first of all. Still lower button is that of “Discover”. The best posts are selected by WordPress-readers on it. The lower button is that of “Search”. There are so many recommended posts on it. The most recommended posts are the first. There is also a search bar on which we can search the post. The lower button is that of “My Likes”. There are all the posts on it, which have been liked, respectively, the most recently posted posts being first in line. The bottom is the “Tags” button. On this, we can add tags to our liking, so that every time we click on that tag, the posts with that tag continue to open. For example, if someone likes topics related to “Kundalini”, then he can add the word “Kundalini” in the tag.

If you liked this post then please share it, and follow this blog while providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail. Do not forget to express your opinion in the comments section.

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-7; Website creation, management and development, part-7

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-7 (please browse down or click here to view this post in English)

डुप्लीकेट कंटेंट के लिए गूगल पेनल्टी लगा सकता है। यदि वेब पर कोई कंटेंट कोपी-पेस्ट किया गया / बिलकुल एक जैसा हो, तो उसे डुप्लीकेट कंटेंट कहा जाता है। इससे बचने का उपाय है कि पसंद किए गए कंटेंट का लिंक ही अपनी वेबसाईट में डालें, कंटेंट नहीं। इससे पाठक कंटेंट तक सुरक्षित रूप से पहुँच जाते हैं। इसी तरह, कभी भी किसी पब्लिश्ड पोस्ट को डिलीट न करें। पोस्ट को डिलीट करने से ब्रोकन लिंक बन जाता है, जिससे वेबसाईट डिफेम हो जाती है। ब्रोकन लिंक वह है, जिस पर क्लिक करने से पेज नहीं खुलता। इससे बचने का तरीका यह है कि पब्लिश की गई पोस्ट के यूआरएल से छेड़छाड़ न करें। इसी तरह अतिथि-लेखक को भी यह स्पष्ट कर दें कि उनका लेख वापिस नहीं होगा, और न ही वे वेब पर उसे अन्य स्थान पर डाल सकते हैं, डुप्लीकेट कंटेंट से बचने के लिए। संभवतः वे उसे फेसबुक पर अपने मित्रों तक सीमित तो रख ही सकते हैं। नई पोस्ट पब्लिश करने के बाद कुछ दिनों तक वेबसाईट पर ट्रेफिक बढ़ जाती है, व पोस्ट के शेयर भी बढ़ जाते हैं। फिर एकदम से ट्रेफिक डाऊन आ जाती है, और शेयर भी रुक जाते हैं। यह गूगल व फेसबुक के रेंकिंग अलोगरिथम के कारण होता है। वेबसाईट पर अधिक परिवर्तन किए जाने पर गूगल अपने सर्च इंजन से एकदम से व थोड़े समय के लिए ट्रेफिक को बढ़ा देता है। वह पाठकों का रिस्पोंस टेस्ट कर रहा होता है, ताकि वेबसाईट को रेंकिंग दी जा सके।

अपने वेबसाईट प्लान के एक्सपायर होने से 1-2 महीने पहले ही रिचार्ज कर लें। यदि आखिरी समय पर रिचार्ज में दिक्कत आने से डोमेन एक्सपायर हो जाए, तो बहुत दिक्कतें आती हैं। वैसे वेबसाईट का पर्सनल प्लान प्रीमियम प्लान से बेहतर होता है, क्योंकि उसमें वेबसाईट साधारण होती है, जिससे उसमें कम कन्फ्यूजन होता है, वह जल्दी से लोड हो जाती है, और उस पर ट्रेफिक भी बढ़ जाती है। फेसबुक पर भी गूगल की तरह ही रेंकिंग अलोगरिथम चलती है। जिस पोस्ट को जितने अधिक रिएक्शन (शेयर, लाईक, कमेन्ट) मिलते हैं, वह उतनी ही फैलती है। शुरू में ओरगेनिक ट्रेफिक (बिना पेमेंट/एड/बूस्ट की) कम होती है, पर धीरे-2 बढ़ जाती है, यदि पोस्ट में दम हो, तो। पोस्ट को लिखने के बाद एक दिन के लिए 40 रुपए न्यूनतम डालकर, उसका बूस्ट करके देख लेना चाहिए। यदि उसे अच्छा रिएक्शन मिले, तो बूस्ट को बढ़ाया जा सकता है, अन्यथा पैसा खर्च करने से कोई विशेष लाभ नहीं। वैसे असफल मामलों में वियू तो मिल जाते हैं, पर रिएक्शन नहीं मिलते। रिएक्शन ही तो पोस्ट को पंख लगाते हैं। कई बार केवल एकमात्र अच्छी पोस्ट भी वेबसाईट को चार चाँद लगा देती है। सफल बूस्ट के बाद ऑर्गेनिक ट्रेफिक भी बढ़ जाती है। अच्छी पोस्ट तो बिना बूस्ट के भी फैल जाती है, पर बहुत ज्यादा समय ले सकती है।

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Website creation, management and development, part-7

 

Google can penalize duplicate content. If any content on the web is copy-pasted / is exactly the same, then it is called duplicate content. The only way to avoid this is to insert a link to the liked content on your website, not copying the content. This allows readers to access content safely. Similarly, never delete a published post. Deleting a post creates a Broken Link, which causes the Website defamed. Broken link is that, clicking on which page does not open. The way to avoid this is not to tamper with the post URL of published post. Similarly, make the guest-writers clear that their article will not be returned, nor can they place it on another place on the Web, to avoid duplicate content. Maybe they can keep it limited to Facebook friends. After publishing a new post, traffic increases on the website for a few days, and post shares also increase. Then suddenly traffic goes down, and the shares also stop. This is due to Google’s and Facebook’s ranking algorithm. When more changes are made to the website, Google extends traffic from its search engine for a short time. Google is testing the readers’ responses so that the website can be ranked.

Recharge your website plan 1-2 months prior to expiry. If the domain expires at the last minute due to a problem with recharge, then there are many problems. The personal plan of the website is better than the premium plan, because the website is simple, thereby it has less confusion, and it loads quickly, and also increases traffic on it. Like Google, Ranking algorithm runs on Facebook too. The more reactions (shares, likes, comments) the post gets, the more it spreads. Initially, organic traffic (without payment / ad / boost) is low, but gradually increases, if the post is wonderful.  After publishing the post, test it by putting a minimum of 40 rupees for one day. That way, it should be test-boosted and looked after. If that gets a good reaction, boost can be increased; otherwise, the money spent does not have any special advantage. Well, in the case of failed cases, the views are found enough, but the reaction is not found. Reactions put wings to the post. Many times, only a single good post lets the website enjoy the stardom. After successful boost, organic traffic also increases. Good post can also spread without boost, but it can take a lot of time.

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वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-6; Website creation, management and development, part-6

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-6 (please browse down or click here to view this post in English)

पेज जम्प लिंक भी साधारण लिंक एड्रेस के साथ अतिरिक्त कोड डालकर बनाए जाते हैं। सामान्य तौर पर लिंक को दबाने से लिंकड पेज के टॉप पर ही लेंडिंग होती है। यदि हम पेज के बीच में किसी विशेष पेराग्राफ पर सीधे ही लेंड करना चाहें, तो उसके लिए पेज जम्प लिंक बनाया जाता है। उसके लिए लिंकड पेज के एडिट मोड (एचटीएमएल में, विजुअल में नहीं) में जाकर लक्षित पेराग्राफ के प्रारम्भ में “स्टाईल” अंगरेजी के शब्द के बाद सिंगल स्पेस देकर यह कोड लिखा जाता है, id=“कुछ भी लिखो” सिंगल स्पेस——पोस्ट की सामग्री—। फिर जब उस लिंकड पेज का वेब एड्रेस भरा जाता है, तब उसके अंत में, कहीं पर भी बिना कोई स्पेस दिए, हेशटेग के  निशान के साथ  वही कोड लिखा जाता है, अर्थात #कुछ भी लिखो(जो id के साथ लिखा था)। यह मार्कर कुछ भी व किसी भी भाषा में लिखा जा सकता है, यद्यपि दोनों जगह पर यह एकसमान (समान स्पेसिंग के साथ) होना चाहिए, उपरोक्त लक्षित पेराग्राफ पर भी व उपरोक्त लिंक-निर्माण की एड्रेस बार में भी। अच्छा रहता है यदि पेज से सम्बंधित शब्द ही लिखे जाएं। जैसे कि कुण्डलिनी से सम्बंधित पेज में पहले पेज जम्प लिंक के लिए ‘कुण्डलिनी1’ व दूसरे के लिए ‘कुण्डलिनी2’ आदि-2। इसी पेज जम्प लिंक से ही एक ही पेज पर इधर से उधर एक क्लिक मात्र से जा सकते हैं, आवश्यकता के अनुसार, जैसे कि ‘गो टू टॉप ऑफ़ पेज’ आदि-2।

वेबसाईट का नाम वैसा रखना चाहिए, जो वेबसाईट की सामग्री से सर्वाधिक जुड़ा हुआ हो। हफ्ते-दस दिन के अंतराल पर नई व पर्याप्त लम्बी पोस्ट को डालते रहना चाहिए। उससे पाठकों की संख्या बढ़ी हुई रहती है। एक पोस्ट कम से कम 500 सब्दों की तो होनी ही चाहिए। वर्डप्रेस की यदि एक पोस्ट 1500 शब्दों से बड़ी हो, तो उसके टेग में ‘Longreads’ शब्द जोड़ देना चाहिए, क्योंकि लम्बी पोस्टों के अलग ही दीवाने होते हैं। आप किसी  भी आदमी को अपनी वेबसाईट से जुड़ने के लिए न्यौता दे सकते हैं। आप उसे फोलोवर, राईटर, एडमिन आदि कुछ भी बना सकते हैं।

मुझे तो लगता है कि सभी लोगों को अपनी एक वेबसाईट व एक पुस्तक बनानी चाहिए। इससे एक-दूसरे के विचारों का व जिन्दगी का पूरा पता चलता है। वेबसाईट किसी भी त्रुटि से पूर्णतया सुरक्षित रहती है। यदि लिखने में कोई त्रुटि हो जाए, तो उसे हम बिना दिक्कत के कभी भी दूर कर सकते हैं। किसी भी वेबपेज के एडिट मोड में टॉप पर एक हिस्टरी बटन बना होता है। उस पर वेबसाईट के कई हफ्तों-महीनों के सभी परिवर्तित रूप विद्यमान रहते हैं। हम किसी भी रूप में कभी भी वापिस लौट सकते हैं। यह सुविधा डेस्कटॉप पर ही विद्यमान होती है, मोबाईल डिवाईस पर नहीं। इसी तरह, हम किसी भी वेबपेज को कभी भी ट्रेश बिन में डाल सकते हैं। वह रिसाईकल बिन की तरह ही होता है, और उससे हम वेबपेज को कभी भी वापिस प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि एक महीने के बाद ट्रेशबिन  खुद ही खाली हो जाता है।

पूर्वोक्तानुसार, टॉप लेफ्ट के मुख्यरूप W-My site बटन के ड्राप डाऊन मीनू के अंत में एक सेटिंग बटन भी होता है। उसमें 5 हैड होते हैं। राईटिंग हैड में जाकर हम अवांछित पोस्ट-केटेगरी को डिलीट कर सकते हैं। डिस्कशन हैड में हम चुन सकते हैं कि हमें कब-२ ई-मेल के माध्यम से नोटिफाई किया जाए—अगली पोस्ट में जारी—

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Website creation, management and development, part-6

Page Jump Links are also created by adding additional code with simple link address. Normally, the link is lending only at the top of the link page by clicking the link. If we want to lend directly to a particular paragraph in the middle of the page, then the page jump link is created for it. For this, by entering the single space after the word “style” in the beginning of the targeted paragraph, in the edit mode of the ‘to be linked page’ (in the HTML, not in visual), this code is written, id=”Write anything” single space– —- Content of the post —. Then when the web address of that ‘to be linked page’ is filled, then at the end of it, the same code is written without any spaces with hash tag, that is, #write anything (which is written with the above said id). This marker can be written in anything and in any language, although it should be in uniform (with the same spacing) in both places, that is, on the targeted paragraph as told above and in the address bar of the above link building. It is good if words related to pages are written. For example, Kundalini 1 for the first page jump link in the page related to Kundalini and ‘Kundalini 2’ for the second etc. The same page can jump from one paragraph to another on the same page from Jump Link only, as per the requirement, such as ‘go to top of page’ etc.

The name of the website should be kept that, which is most linked to the contents of the website. New and substantial long post should be posted in the intervals of ten days. With that, the number of readers keeps increasing. A post must have at least 500 words. If a post is bigger than 1500 words in Word press, then the word ‘longreads’ should be added in its tag, because the long posts have different junkies. You can invite any person to join your website. You can make him a follower, writer, admin etc.

I feel that all people should have their own website and a book. This gives complete understanding of each other’s thoughts and lives. The website is completely secure from any error. If there is an error in writing, then we can overcome it without any difficulty. On top of any webpage in edit mode, there is a history button. There are many variations of the website for several weeks and months. We can return to any form anytime. This feature exists on the desktop, not on the mobile device. Similarly, we can put any webpage in the trash bin anytime. It is like a recycling bin, and we can get it back to the webpage anytime. However, after a month the trash bin itself is empty.

As aforementioned, there is a ‘setting’ button at the end of the drop-down menu of the main ‘W-My site’ button of the top left. There are five heads in it. We can delete unwanted post-category by visiting the Writing Head. In the Discussion Head, we can choose to notify us for which contents via e-mail—-continued in next post—-

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वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-5; Website creation, management and development, part-5

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-5 (please browse down or click here to view this post in English)

वर्डप्रेस के तीन प्लान हैं, पर्सनल, प्रीमियम, व बिजनेस। पर्सनल प्लान की कीमत 2400 रुपए प्रतिवर्ष है, प्रीमियम प्लान की लगभग 4000 रुपए, व बिजनेस प्लान की लगभग 8000 रुपए । अधिकाँश लोगों के लिए पर्सनल प्लान पर्याप्त है। जो बहुत अधिक आडियो व विडियो पोस्ट लिखते हैं, इंटरनेट पर कुछ बेचकर पेमेंट रिसीव करते हैं, विज्ञापनों से कमाई करते हैं, व ज्यादा ही तड़क-भड़क वाली वेबसाईट-थीम को पसंद करते हैं, केवल उन्हीं के लिए दूसरे प्लान की आवाश्यकता होती है। छोटे प्लान से ट्रेफिक भी अधिक मिलती है, क्योंकि वह जल्दी लोड होती है, और वह सिंपल भी होती है। मुझे तो पर्सनल प्लान ही सर्वश्रेष्ठ लगा। वर्डप्रेस डॉट कॉम के पास एक निःशुल्क प्लान भी होता है, जिसमें वह अपने विज्ञापन डालती रहती है, और कस्टमर केयर की सपोर्ट भी नहीं देती। निःशुल्क प्लान तो कभी नहीं लेना चाहिए, सीखने के लिए भी नहीं, क्योंकि उसमें डाटा गुम होने का डर हमेशा बना रहता है। मेने तो शुरू के 5-6 महीने के लिए निःशुल्क प्लान ही लिया था। जब मेरी ट्रेफिक कुछ बढ़ गई, और डाटा भी बड़ा हो गया, तब मैंने उसे पर्सनल प्लान में अपग्रेड करवाया। उसमें मुझे एक महीने का विंडो-टाईम मिला, जिसमें पुनः डाऊनग्रेड करने पर मुझे पूरा रिफंड वापिस मिलना था। जब मेरी वेबसाईट पूर्णतः तैयार हो गई, तब मैंने उसे प्रीमियम प्लान में अपग्रेड करवाया (उसमें भी एक महीने का विंडो-टाईम था)। पर मैं उसमें छः महीने तक काम करता रहा, और जब मेरा मन भर गया, और उसे निरर्थक समझा, तब मैंने उसे डाऊनग्रेड करवा दिया। अपवाद–स्वरूप मुझे पूरा रिफंड वापिस मिल गया।

अब हम पोस्ट के व वेबपेज के निर्माण के बारे में बात करते हैं। पोस्ट में केटेगरी व टैग बनाने का विकल्प होता है। केटेगरी से पाठकों / वेबसाईट-विजिटरों के लिए पोस्ट तक पहुँचना आसान हो जाता है। जैसे कि कविताओं के लिए कविता नाम से केटेगरी बना कर उसमें सभी कवितायेँ डाली जाती हैं। एक पोस्ट की एक से अधिक केटेगरी भी हो सकती हैं। टैग के रूप में कीवर्ड को लिखा जाता है। जैसे कि कुण्डलिनी से सम्बंधित पोस्ट के लिए कुण्डलिनी, योग, अध्यात्म आदि शब्द टैग के रूप में डाले जाते हैं। टैग से सर्च इंजन को पोस्ट खोजने में आसानी होती है। इसी तरह कमेन्ट, पिन्जबेक, व ट्रेकबेक को एनेबल या डिसेबल करने का विकल्प भी होता है। वेबसाईट में लिंक बनाना बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। लिंक से ही वेबसाईट पूरी दुनिया से जुड़ती है। पोस्ट के एडिट मोड में जाकर सर्वप्रथम एंकर टेक्स्ट को सेलेक्ट किया जाता है। एंकर टेक्स्ट पोस्ट का वह वाक्य या शब्द होता है, जिस पर लिंक की हुई सामग्री जुड़ी होती है, और जिस पर कर्सर रखने से हाथ का निशान बनता है, और जिसको क्लिक करने से लिंकड सामग्री वाला पेज खुल जाता है। एंकर टेक्स्ट को सेलेक्ट करने के बाद टॉप मीनू बार में लिंक के निशान पर क्लिक किया जाता है। उससे वह लिंकड पेज का यू-आर-एल (जो पेज के टॉप वाली गूगल-सर्च-बार में होता है) एड्रेस मांगता है। उस एड्रेस को वहां कोपी-पेस्ट करके सेव कर लिया जाता है। “लिंकड पेज को अलग टेब पर खोलें” वाले विकल्प को न चुनें। इसी लिंक बनाने की कला से ही “नेक्स्ट पेज”, “प्रीवियस पेज” आदि क्लिकेबल बटन बनाए जाते हैं। अगली पोस्ट में हम पेज जम्प लिंक के बारे में बताएँगे——अगली पोस्ट पर जारी——

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Website creation, management and development, part-5

There are three plans of WordPress.com. These are personal, premium, and business. The price of personal plan is 2400 INR per year, about 8000 INR is the price for premium plan, and approximately 8000 inr for the business plan. Personal plan for most people is enough. Those who write a lot of audio and video posts, sell something on the internet, receive payments, earn money from ads, and like more snappy website-themes, they only need another plan. Traffic is also much higher with the simple plan, because it loads quickly, and it is simple in design. I thought it was best to have a personal plan. WordPress.com also has a free plan, in which it keeps sending its ads, and does not even support customer care. Free plans should never be taken, not even for learning, because there is always the fear of losing data. I had only taken a free plan for 5-6 months of the start. When my traffic increased, and the data grew too, then I upgraded it to the personal plan. I got one-month window-time in which I had to get the entire refund back once I again downgraded that. When my website was completely ready, then I upgraded it to the premium plan (it also had a one-month window-time). However, I kept working for six months in it, and when my mind was full, and considered it as nonsensical, then I downgraded it. With the exception, I got the full refund back.

Now we talk about the creation of posts and web pages. Post has the option to create categories and tags. The category makes it easy for readers / website-visitors to access posts. For poetry, ‘poetry’ is named after category and all poems are inserted in it. There may be more than one category for a post. The keywords are written as tags. As for the post related to Kundalini, Kundalini-Yoga, Spirituality etc., kundalini or/and yoga words are put in the form of tags. The tag makes search engines easy to find posts. Similarly, there is an option to enable comment, Pingback, and Trackback. Making a link in the website is very important. The link connects the whole world with the post / website. First, the anchor text is selected by going into the edit mode of the post. The anchor text is the sentence or word of the post that the linked material is attached to, and putting mouse on which the hand mark evolves, and clicking on which opens the page with the link contents. After selecting anchor text, the link mark is clicked in the top editor bar. From that, it asks for the link-page URL (which is in the top of the to be linked page, in Google-search-bar). Copying that address, it is pasted in editor and saved. Do not select the option “Open the link page on a separate tab”. Clickable buttons are created from the art of creating link, like “Next page”, “Previous page” etc. In the next post we will tell about the page jump link —— contd. on next post ——

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वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-4; Website creation, management and development, part-4

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-4 (please browse down or click here to view this post in English)

पिछली पोस्ट में हम वेबपोस्ट को लिखने के बारे में बता रहे थे, जो इस पोस्ट में भी जारी है। कुछ फोटो / वीडियो आदि डालने के लिए टॉप के बाएँ कोने का प्लस निशान दबा कर आए मीडिया बटन को दबाया जाता है।

पूर्वोक्त स्टेटस बटन से हम यह भी देख सकते हैं कि हमारी वेबसाईट की तरफ लोगों को रेफर / निर्देशित करने वाला स्रोत क्या है। जैसे कि क्वोरा या फेसबुक या ट्विटर आदि। वास्तव में प्रारम्भ में रेफरल ट्रेफिक का ही सहारा लेना पड़ता है, क्योंकि सर्च इंजन से ट्रेफिक लगभग शून्य ही होती है। इसके लिए हर सोशल मीडिया पर, फोरम पर, वार्तालाप पर व कमेन्ट पर अपनी वेबसाईट का लिंक डालकर रेफरेंस देते रहना चाहिए। सबसे अच्छा तरीका तो क्वोरा पर प्रश्नों के उत्तर दें, क्योंकि आजकल क्वोरा नंबर एक की प्रश्नोत्तरी वेबसाईट है। वहां पर वेबसाईट का लिंक डालने की सबसे अधिक छूट है, और वहां से रेफरल ट्रेफिक एकदम से मिलनी शुरू हो जाती है, और लम्बे समय तक मिलती रहती है। इसी तरह हम ओनलाईन एप से वेबसाईट का सर्च-रेंक व बेकलिंक स्टेटस भी जान सकते हैं। सर्च इंजन रेंक का मतलब है कि वेबसाईट में स्थित किसी कीवर्ड को गूगल पर सर्च करने पर वह वेबसाईट कौन से पेज पर व कौन से नंबर पर आ रही है। एक पेज पर 10 वेबसाईटें होती हैं। इस तरह के 10 पेज ही सर्च में शो होते हैं। यदि पहले पेज पर वेबसाईट आए तो अच्छी बात है, यदि उस पर भी प्रथम / टॉप की तीन वेबसाईटों में आए तो सर्वोत्तम। की-वर्ड यदि मशहूर होगा, तभी लोग उसे सर्च करेंगे। उदाहरण के लिए, यदि “कुण्डलिनी” शब्द प्रथम पृष्ठ पर आए, तो सर्वोत्तम ट्रेफिक मिलेगी, क्योंकि कुण्डलिनी शब्द बहुत मशहूर है। पर यदि “कुण्डलिनी का रहस्योद्घाटन”, यह शब्द-समूह / की-वर्ड प्रथम पेज पर आए, तो कोई विशेष लाभ नहीं, क्योंकि इस की-वर्ड को खोजने वाले लोग बहुत कम हैं।

सर्च-रेंकिंग वियूशिप से बढ़ती है, और वह वियूशिप भी गूगल सर्च से ही आनी चाहिए, रिफेरल सोर्स से नहीं। वियूशिप का अर्थ है कि प्रति विजिट कितने वियू हैं। यदि वियूशिप कम है, तो इसका अर्थ है कि वेबसाईट बोरिंग है। वास्तव में, सर्च इंजन से आई हुई ट्रेफिक का वियूशिप ही वेबसाईट-रेंकिंग बढ़ाता है, रिफेरल ट्रेफिक का नहीं। इसी तरह बेकलिंक से भी बहुत अधिक ट्रेफिक मिल सकती है, विशेषतः यदि बेकलिंक प्रसिद्द वेबसाईट से मिला है। बेकलिंक का अर्थ है कि दूसरी वेबसाईट हमारी वेबसाईट को लिंक कर रही है।

वर्डप्रेस डॉट ओर्ग (ओर्ग- ऑर्गेनाईजेशन) के माध्यम से उपलब्ध वर्डप्रेस वास्तव में लाएनेक्स के फ्री विन्डोज़ ऑपरेटिंग सोफ्टवेयर की तरह वेबसाईट बनाने के लिए एक सार्वजनिक व निःशुल्क सोफ्टवेयर है। इसे ओपन सोर्स सोफ्टवेयर भी कहते हैं। यह वेबसाईट के लिए ऐसे ही है, जैसे कम्पयूटर के लिए विंडोज सोफ्टवेयर है। उसे कोई भी सोफ्टवेयर विशेषग्य अपनी कला से सुधार सकता है। इसीलिए वेबसाईट बनाने में कोई खर्चा नहीं आता। परन्तु उससे सम्बंधित कायदे-कानूनों का ज्ञान तो होना ही चाहिए, जैसे कि गूगल को साईट मेप उपलब्ध करवाते रहना, गूगल एनालीटिक को इंस्टाल करना, एसईओ (सर्च इंजन ओपटीमाईजेशन) आदि-२। साथ में, होस्टिंग सर्विस के लिए तो किसी कंपनी को चुन कर, उसे तो शुल्क अदा करना ही पड़ता है। वह कंपनी वेबसाईट का सारा डाटा सुरक्षित रूप से स्टोर करके रखती है, और वेब पर उपलब्ध करवाती है। इन सभी परेशानियों को देखते हुए, वर्डप्रेस डॉट कोम (कोम- कोमर्शियल) नाम की कंपनी बनाई गई। उस कंपनी ने निःशुल्क वेबसाईट सेवाप्रदाता के वर्डप्रेस प्लेटफोर्म के साथ अन्य सभी सेवाएं प्रदान कीं। इससे लोगों को कुछ सस्ते में ही सभी परेशानियों से छुटकारा मिल गया। उनका काम फिर वेबसाईट पर लिखना मात्र ही रह गया। जैसे कि पहले भी बताया गया है कि उनके तीन प्लान हैं——अगली पोस्ट में जारी——

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Website creation, management and development, part-4

 

In the previous post we were talking about writing a web post, which is also in this post. To insert some photo / video etc., pressing the plus sign of the top left corner causes the media button pop out.

From the aforementioned ‘Stats’ button, we can also see what is the source of referring / directing people towards our website. Such as quora or facebook or twitter etc. In fact, referrals have to be resorted to in the beginning, because traffic from the search engines is almost zero. For this, on every social media, on the forum, on the conversation and comment, reference of website should be given by putting a link of your website. Answering the questions on Quora is the best way, because now quora is the number one quiz website. There is the maximum discount for putting a link of the website on quora, and from there the referral traffic starts immediately, and it lasts for a long time. Similarly, we can also find the website’s search-rank and backlink status from the online apps. Search Engine Rank means that on which page and on which position the website is positioned, when searching any keyword of website in the search engine. There are 10 websites on one page. Such 10 pages are shown only in search. If the first page is reserved to the website then it is a good thing, if it comes in the first / top three positions, then the best. If the keyword is famous, then only people will search it. For example, if the keyword “kundalini” brings website to the first page, then the best traffic will be obtained, because the word Kundalini is very popular. But if “the revelation of Kundalini”, this keyword-group / key phrase brings the website on the first page, then there is no special advantage, because people searching for this word-group are very few.

Search-Ranking increases with viewship, and that should also come from Google search, not from referral sources. Viewship means how many views per visit are there. If the viewship is low, it means that the website is boring. In fact, the traffic from the search engines increases website-ranking, not the referral traffic. Similarly, there may be more traffic from backlink, especially if the backlink is from the popular website. Backlink means that the other website is linking to our website.

WordPress available through WordPress.org (org- organization) is actually a public and free software for creating websites like Linux’s free Windows operating software. It is also called open source software. This is there to run the website, just as Windows software is there to run the computers. It can be improved by any software expert through his art. That’s why there is no cost to make the website. But there must be knowledge of the laws and rules related to it, such as providing the site map to Google, installing Google Analytics, SEO (Search Engine Optimization) etc. Together, by choosing a company for the hosting service, one has to pay the fee. The company keeps all the data stored on its cloud service safely, and makes it available on the web. Looking at all these problems, the WordPress.com (com-commercial) was created. The company provided all other services with the free WordPress platform. With this, people got rid of all the hassles in some cheap way. Their work was left to write on the website only. As mentioned earlier, they have three plans ———————————-continued in next web post———

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