वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास; भाग-13 (ब्लोक एडिटर, महत्त्वपूर्ण टिप्स)

ब्लोक एडिटर

वर्डप्रेस वेबसाईट में अब नया ब्लोक एडिटर आ गया है। इसके द्वारा हम अलग-२ पैराग्राफ को अलग-२ रूप में एडिट कर सकते हैं। हरेक पैराग्राफ का एक अलग ब्लोक बनता है। कविता के लिए वर्स ब्लोक का प्रयोग होता है। क्वोट के लिए, रिफरेन्स सोर्स का पता डालने के लिए व अन्य हलकी फुल्की या विशेष जानकारी प्रदान करने के लिए क्वोट ब्लॉग का प्रयोग करते हैं। यह पोस्ट की खूबसूरती को भी बढ़ाता है। यदि हमने मुफ्त में डाऊनलोड के लिए कोई पुस्तक या फाईल उपलब्ध करवानी है, तो उसे फाईल ब्लोक में रखते हैं। ऐसी कितनी फाईलें डाऊनलोड हुईं, ये भी वैबसाईट के स्टेट बटन में शो हो जाएगा। किसी चित्र या वीडियो को दिखाने के लिए मीडिया ब्लोक का प्रयोग करते हैं।

वेबसाईट से सम्बंधित कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ

रीडर के लाईक, टैग आदि बटन अकाऊंट होल्डर के नाम से स्टोर होते हैं, वेबसाईट के नाम से नहीं। इसलिए अलग-२ अकाऊंट से वेबसाईट को खोलने से वे अलग-२ दिखेंगे। ऐसा वहां होता है, जहां पर एक वेबसाईट के बहुत से मैम्बर होते हैं, जैसे एडमिन, मोडरेटर, राईटर आदि।

शुरू में या एक साल के लिए वेबसाईट होस्टिंग व डोमेन के लिए इकट्ठा व कम पेमेंट लेती है। अर्थात डोमेन नेम निःशुल्क दिया जाता है। डोमेन नेम देने वाली भी बहुत सी कम्पनियां हैं। कुछ तो निःशुल्क सेवा भी देती हैं।

पॉप अप फोलो बटन को बनाने के लिए मेलचिम्प पर साईन अप करना पड़ता है। फ्री प्लान पर केवल एक ही आडियेंस बना सकते हैं। आडियंस का मतलब यहाँ पर वेबसाईट पर विजिट करने वाला व्यक्ति है। आडियेंस बनाने पर मीनू बार से पॉप अप सब्सक्राईब बटन को क्लिक करते हैं। निर्देशानुसार करने पर एक कोड जेनेरेट होता है। उसे वैबसाईट के मेलचिम्प विजेट में कोपी पेस्ट करना पड़ता है। फिर फाईनल पब्लिश बटन दबा दो। हो गया।

हेडर इमेज वह होती है, जो हरेक पेज व पोस्ट पर छपती है। इसे कस्टमाईजर से सेट करते हैं। फीचर्ड इमेज वह होती है, जो सिर्फ एक पेज या पोस्ट के लिए होती है। इसे एडिट बटन से सेट करते हैं।

थीम बदलने से जरूरी नहीं कि नई थीम पर पुरानी सारी सेटिंग व स्टाईल आ जाए। कई बार तो बहुत मेहनत करनी पड़ती है दुबारा से। यदि कोई थीम गलत लगे, तो पुरानी थीम पर भी जा सकते हैं। वही पुरानी सेटिंग फिर से मिल जाएगी। मैं इस w बटन (वैबसाईट के टॉप पर, लेफ्ट में) को ही अधिकांशतः सेटिंग बटन कहता हूँ। इसे कस्टमाईजर बटन भी कह सकते हैं। w बटन दबा कर डिजाइन बटन दबाएँ। उसके अंतर्गत एक थीम्स बटन होगा। उसमें आपकी करेंट थीम का नाम और उसकी जानकारी होगी। अन्य सभी उपलब्ध थीम्स के बारे में भी जानकारी होगी। पुरानी सभी थीम्स देखने के लिए और उन पर रिवर्ट करने के लिए टूल्स के अंतर्गत एक्टिविटी बटन दबाएँ। आपकी सारी पिछली थीम्स वहां पर अपनी सेटिंग्स/कसटमाईजेशन के साथ स्टोर मिलेंगी।

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वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास; भाग-12 (पेमेंट और बैकअप)

वैबसाईट पर पेमेंट

वर्डप्रेस वेबसाईट पेपाल या क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड के थ्रू पेमेंट करती है, और वेबसाईट रिन्यू करने के लिए पेमेंट लेती है। यद्यपि कार्ड अंतर्राष्ट्रीय होना चाहिए। जैसे कि वह भारतीय रुपे कार्ड को एक्सेप्ट नहीं करती। इन्टरनेट बेंकिंग से पेमेंट नहीं होती। कार्ड को कंपनी बैंक से कन्फर्म करती है। बेंक से वह मेसेज वेबसाईट मालिक को आ जाता है, यदि उसका मोबाईल नंबर बेंक में दर्ज हो।

होस्ट को बदलना

वैबसाईट के लिए होस्टिंग (घर/जगह) देने वाली बहुत सी कम्पनियां हैं। सबका अलग-२ रेट है। यदि किसी को अपनी वर्तमान होस्टिंग महंगी या गलत लग रही हो, तो वह अपनी उसी वैबसाईट के लिए दूसरी होस्टिंग भी ले सकता है। इसके लिए उसे अपनी वैबसाईट का बेकप लेकर उसे दूसरे होस्ट की खाली वेबसाईट पर इम्पोर्ट करना पड़ता है। इसके लिए उसे नए होस्ट में अपना अकाऊंट बनाना होता है।

वैबसाईट को एक्सपोर्ट करना

पर्सनल प्लान में वैबसाईट का फुल बेकप नहीं बना सकते। पर उसको एक्सपोर्ट कर सकते हैं। सेटिंग के अंतर्गत एक बटन (कस्टमाईजर बटन) होता है। उस पर क्लिक करने से सारा टेक्स्ट कंटेंट एक जिप्ड फोल्डर के रूप में आ जाएगा, जिसे वहीँ पर डाऊनलोड किया जा सकता है। ईमेल पर भी वह आ जाता है, जो वहां 7 दिन तक के लिए रहता है। उसमें मीडिया और अपलोडीड डॉकुमेंट नहीं होते। उसके लिए साथ ही में एक्सपोर्ट मीडिया का एक दूसरा बटन होता है। वैसे तो पेमेंट वाली सभी वैबसाईट्स बहुत सुरक्षित रखी जाती हैं। फिर भी यदि कुछ अनहोनी घटना हो जाए, तो उस एक्सपोर्ट फाईल से हम वैबसाईट को पुनः प्राप्त कर सकते हैं। यद्यपि थीम व वैबसाईट कस्टमाईजेशन नए सिरे से करनी पड़ती है, क्योंकि इसमें कस्टमाईजेशन का बेकप नहीं हो पाता। इसलिए एक्सपोर्ट फाईल को क्लाऊड में, हार्ड डिस्क में आदि कई स्थानों में संभाल कर रखना चाहिए।

वैबसाईट की सुरक्षा के अन्य तरीके

इसके लिए एक और ऑफलाइन तरीका है। अपने वैबसाईट के पेजस की एक इ-बुक बनाओ, और उसे केडीपी पर सेल्फ पब्लिश कर लो। 10000 शब्दों से शुरू कर सकते हो। उसकी कोपी भी क्लाऊड पर स्टोर कर लो। सबसे सुरक्षित तरीका है। आप बोलोगे कि जो हर हफ्ते आप पोस्ट छापते हो, वह कैसे इ-बुक में आएगी। इसके लिए पोस्टों को इकटठा करके आप एक और ई-बुक बना लो, और उसे पब्लिश कर दो। हर हफ्ते की पोस्ट आप उसमें एड करते रहो, और केडीपी पर अपलोड करते रहो। बन गई न बात। आपकी वैबसाईट और पुस्तक, दोनों एक साथ ग्रो करेंगे।

एक और सबसे कारगर तरीका बताता हूँ। ई-दुनिया इतनी स्थिर नहीं है, जितनी कागजी दुनिया। जब ई-दुनिया संकट में आएगी, उस समय भी कागजी दुनिया घर के कोने में पड़े संदूकों में सही-सलामत रहेगी। आप प्रिंट ओन डिमांड की सहायता से अपनी उपरोक्त ई-पुस्तकों की प्रिंट पुस्तकें बनाकर संभाल कर रख लो। इसमें पब्लिशिंग का खर्चा भी नहीं लगेगा। केवल कुछ थोड़े से कमीशन के साथ कागज़ व बाइंडिंग की कीमत ही चुकानी होगी। जरूरत पड़ने पर इन कागजी पुस्तकों से आप ओसीआर की मदद से टेक्स्ट फाईल पुनः बना सकते हो। इससे आप अपनी वैबसाईट स्क्रेच से पुनः व आसानी से खड़ी कर सकते हो।

उपरोक्त तरीके से ही मेरी निम्नलिखित पुस्तकें मेरी इसी वैबसाईट से बनी हैं-

1) कुण्डलिनी विज्ञान- एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान

2) ई-रीडर पर मेरी वैबसाईट

एक पुस्तक तो मेरी क्वोरा पोस्ट से भी बनी है, जिसका नाम है, “कुण्डलिनी रहस्योद्घाटित- प्रेमयोगी वज्र क्या कहता है”।

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वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास; भाग-11 (कीवर्ड, विभिन्न वेबसाईट प्लान, बहुभाषी वेबसाईट)

पोस्ट के जो केटेगरी व टैग होते हैं, वे गूगल सर्च में उपयोगी नहीं होते। वे तो केवल वर्डप्रेस डॉट कोम में ही पोस्ट को सर्च करवाते हैं। केटेगरी व टेग, दोनों मिलाकर पंद्रह से अधिक नहीं होने चाहिए। उनकी पंद्रह से अधिक संख्या वाली पोस्टों को वर्डप्रेस फ़िल्टर करके स्पाम में डाल देता है। केटेगरी में मुख्य कीवर्ड होता है, जबकि टेग में उस मुख्य कीवर्ड का सब कीवर्ड होता है। उदाहरण के लिए, कुण्डलिनी जागरण से सम्बंधित पोस्ट के लिए “कुण्डलिनी” कीवर्ड केटेगरी के लिए फिट है, जबकि “कुण्डलिनी जागरण” टेग के लिए।

ऐसा भी चल सकता है कि किसी पोस्ट के लिए केवल केटेगरी के ही कीवर्ड दिए गए हों, टेग के नहीं। वर्डप्रेस डॉट कोम दोनों को एकसमान समझता है। यहाँ तक कि यदि कोई भी केटेगरी या टेग न दिया गया हो, तब भी वह पोस्ट के मुख्य कंटेंट में से कीवर्ड को ढूंढ लेता है।

अब जो वेबसाईट के रीडर के अंतर्गत टेग बटन है, उसका अर्थ यह नहीं है कि उसमें लिखे जाने वाले कीवर्ड से केवल उसी कीवर्ड के टेग वाली पोस्टें ही ढूंढी जाए। वास्तव में उस बटन का नाम “टेग” के स्थान पर “कीवर्ड” ज्यादा उपयुक्त लगता है।

अब मुफ्त की व खरीदी गई वेबसाईट के बीच में अंतर के बारे में बात करते हैं। निःशुल्क वेबसाईट के डोमेन नेम में वेबसाईट के नाम के साथ वर्डप्रेस डॉट लगा होता है। पेमेंट वाली वेबसाईट में यह नहीं लगा होता। यही अंतर है, और कुछ नहीं। उदाहरण के लिए,  इस वेबसाईट के निःशुल्क वर्जन का डोमेन नेम यह होगा, demystifyingkundalini.wordpress.com; जबकि इसके सशुल्क वर्जन का डोमेन नेम यह है, demystifyingkundalini.com

दोनों में ही मेरी वैबसाईट का डोमेन नेम (demystifyingkundalini) सुरक्षित है, और इसे कोई दूसरा नहीं ले सकता। सशुल्क वर्जन में एक लाभ यह भी है कि उसमें कस्टमर केयर की ईमेल व चेट सुपोर्ट मिलती है। साथ में, निःशुल्क वेबसाईट के डाटा की सुरक्षा का जिम्मा कंपनी नहीं लेती। इसलिए नियमित रूप से उसे बेकअप करते रहना पड़ता है।

वेबसाईट विकास से सम्बंधित पोस्ट की इस सिरीज (नंबर 1 से लेकर 12 तक) में जो जानकारी मुझे कस्टमर केयर सुपोर्ट से मिली है, उनमें से भी कुछ ख़ास-२ डाली गई है। इसलिए यह निःशुल्क वेबसाईट को बनाने वाले के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

अब बात आती है बहुभाषी वेबसाईट की। पहला तरीका यह है कि एक ही वेबसाईट में दोनों भाषाओं के पेज व पोस्ट डालें। इसके लिए मीनू आईटम्स व विजेट्स के नाम हिंदी व अन्ग्रेजी, दोनों में रखने पड़ेंगे। एक भाषा से दूसरी भाषा में जाने के लिए पेजस व पोस्ट्स पर लिंक डालने होंगे। अब ऐसी वेबसाईट में दो प्रकार से ब्लॉग पोस्ट लिखी जा सकती है। पहले तरीके में, पहले मूल भाषा में लिखा जाता है, फिर उसके नीचे उसी पोस्ट में अनुवादित भाषा में लिखा जाता है। पोस्ट के टॉप पर एक पेजजंप लिंक दिया जाता है, ताकि उस पर क्लिक करने से अनुवादित भाषा में जाया जा सके।

दूसरे तरीके में, मूल हिंदी के लिए अलग से पोस्ट बनाई जाती है, और अंग्रेजी के लिए अलग से। दोनों पोस्टों में एक-दूसरे पर जाने के लिए लिंक डाला जाता है। यह तरीका सर्च इंजन रेंकिंग के लिए कुछ ज्यादा अच्छा प्रतीत होता है। मैं तो द्विभाषी वैबसाईट के लिए इसी तरीके को अपनाता हूँ। यद्यपि इसमें एक भाषा के फोलोवर दूसरी भाषा की पोस्ट भी प्राप्त करते रहते हैं। इससे बचने का तरीका यह है कि अनुवादित भाषा के लिए अलग से वेबसाईट बना लो। मुफ्त वाली वेबसाईट भी बना सकते हैं। एक वेबसाईट से दूसरी पर जाने के लिए जगह-२ पर लिंक डाले जाते हैं। संभवतः उसमें एक वेबसाईट मीनू से दूसरी वेबसाईट भी खुल जाती है, क्योंकि दूसरी वेबसाईट पहली वाली वेबसाईट की सेटिंग पर ही बनी होती है। उदाहरण के लिए, यदि मुख्य वेबसाईट demystifyingkundalini.com है, तो दूसरी वेबसाईट demystifyingkundalinieng.wordpress.com बना सकते हैं। डोमेन नाम में कुछ न कुछ परिवर्तन तो करना ही पड़ता है। साथ में, वह डोमेन नाम उपलब्ध भी होना चाहिए। फिर भी, खासकर भारतीय वातावरण में एक ही वैबसाईट में हिंदी व अंग्रेजी भाषाएँ एक दूसरे की सहयोगी हैं, इसलिए यह मिश्रित तरीका सर्वोत्तम है।

ट्रांसलेशन के मामले में गूगल कुछ सख्त है। अंगरेजी की गुणवत्ता से वह आसानी से संतुष्ट नहीं होता। इसलिए कहा जाता है कि मशीन-ट्रांसलेशन या गूगल-ट्रांसलेशन को वह स्वीकार नहीं करता। पर मेरा मानना है कि यदि गूगल से बेसिक ट्रांसलेशन कराने के बाद उसे हाथ से सुधारा जाए, तो वह ट्रांसलेशन स्वीकृत हो जाता है।

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वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास; भाग-10 (विजेट, डाटा-चोरी, स्टेट्स)

अथोरिटी-वैबसाईट वह होती है, जो अपने सम्बंधित क्षेत्र में दबदबा रखती है। यदि किसी ने ब्लॉग लिखकर करोड़ों रुपए कमाए हैं, तो “ब्लॉग से करोड़पति कैसे बने” प्रकार के विषय पर उसकी वैबसाईट अथोरिटी-वैबसाईट कही जाएगी, न कि कोपी-पेस्ट करने वाले व्यक्ति की। इसी तरह, जिसको वास्तविक कुण्डलिनी-जागरण हुआ है, उसीकी कुण्डलिनी-वेबसाईट अथोरिटी वैबसाईट कही जाएगी। परन्तु होता यह है की उसकी वैबसाईट अन्य कुण्डलिनी-वेबसाईटों की बाढ़ के नीचे दब जाती है। वैसे अब गूगल इस बात का उचित संज्ञान ले रहा है, और अथोरिटी वैबसाईट को अधिक महत्त्व दे रहा है।

विजेटस को इस तरह से रिऑर्डर करना चाहिए कि सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण विजेट सबसे ऊपर हो, और सबसे कम महत्त्वपूर्ण सबसे नीचे। पर्सनल वैबसाईट में तो किसी भी प्रकार की पोस्ट को डाला जा सकता है, परन्तु प्रोफेशनल वैबसाईट में एक ही विषय होना चाहिए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि पर्सनल वैबसाईट को शौक पूरा करने के लिए बनाया जाता है, पैसे या प्रसिद्धि कमाने के लिए नहीं।

जैसा कि मैंने पहले भी बताया है कि “टॉप पोस्ट” विजेट को इंस्टाल किया जा सकता है। इसकी कमी यह है कि यह केवल पिछले अंतिम 48-72 घंटों के ही वियूस को काऊंट करता है। यदि आल टाईम टॉप पोस्ट बनानी हो, तो ‘टेक्स्ट विजेट’ को एप्लाई करें। उसके टाईटल में “आल टाईम टॉप पोस्ट” आदि लिखें। उससे नीचे के बक्से में टेक्स्ट बटन सेलेक्ट करें। उसमें पोस्ट का नाम लिखें। फिर उस नाम को सेलेक्ट करके उसके ऊपर की बार के “लिंक” बटन को क्लिक करें। उससे निर्मित बोक्स में उस पोस्ट का यूआरएल एड्रेस डालें। इस तरह नीचे की तरफ को मनचाही संख्या में पोस्ट की लिस्ट भी बनाई जा सकती है, और उस लिस्ट को बुलेटिड लिस्ट या नंबरड लिस्ट का रूप भी दिया जा सकता है। इस तरह, टेक्स्ट विजेट से हम मनचाहे टेक्स्ट को व लिंक को साईडबार में डाल सकते हैं।

यह ध्यान रखें कि डबल साईडबार से मुख्य कंटेंट के लिए जगह कम हो सकती है, खासकर डेस्कटॉप पर। मुझे तो सिंगल साईडबार वाली थीम ही पसंद है।

पुराने टेक्स्ट को तोड़-मरोड़ कर लिखने को डाटा स्पिनिंग या डाटा स्क्रेपिंग या प्लैग्रिस्म कहते हैं। इसका यदि गूगल को पता चलता है, तो वह अवश्य पेनल्टी लगाता है। वास्तव में वह पेनल्टी भी नहीं होती। गूगल बोट केवल उसको रीड करना छोड़ देता है, जिससे वेबसाईट खुद डाऊन आ जाती है। कई कहते हैं कि बहुत अधिक परिवर्तित करके ही टेक्स्ट को पुनः लिखना चाहिए। परन्तु उससे कोई लाभ नहीं, क्योंकि उससे कम मेहनत में तो नया टेक्स्ट लिखा जा सकता है। अगर कोई अपने प्राईवेट चैट, जैसे ईमेल आदि से डाटा को कोपी-पेस्ट करे, तब तो संभवतः वह डुप्लीकेट कंटेंट नहीं होता। अगर आपने गलती से डुप्लीकेट कंटेंट वाला वेबपेज बनाया है, तो उसे हटाने की जरूरत नहीं। उसे आप प्राईवेट पेज बना लें। इससे वह इंटरनेट से हट जाएगा, और गूगल उसे नहीं देख पाएगा। यद्यपि वह पेज आपको हमेशा उपलब्ध रहेगा।

पूर्वोक्तानुसार, W (वैबसाईट) नामक मीनू बटन दबा कर जो ड्रॉपडाऊन लिस्ट खुलती है, उसमें “स्टैट” बटन भी होता है। उसको क्लिक करके वैबसाईट की परफोर्मेंस से सम्बंधित सभी सूचनाएं मिल जाती हैं। वे हैं, वियूज की संख्या, विजिटर्स की संख्या, लाईक्स की संख्या, कमेंट्स की संख्या, वियू किए गए पेजस और पोस्टस के बारे में सूचना आदि। वियूज में आर्चाईव्स / होम पेज भी आता है। यह कोई विशेष पोस्ट या पेज का वियू नहीं होता। वास्तव में, होमपेज के “आर्चाईव” नामक विजेट में महीनों के नामों की लिस्ट होती है। उनमें से किसी महीने के ऊपर क्लिक करने से उस महीने की सभी पोस्टें एक स्वयंनिर्मित व अस्थायी पेज पर खुलती हैं। एक महीने के नाम पर क्लिक करने से आर्चाईव / होमपेज के नाम से एक वियू जुड़ जाता है। इसका अर्थ है कि कोई विजिटर होमपेज पर था, जब उसने आर्चाईव के किसी महीने के ऊपर क्लिक किया। यदि कोई उस महीने की किसी विशेष पोस्ट पर क्लिक करके उसे अपने मूल रूप में खोले, तभी उस विशेष पोस्ट के नाम से एक पेज वियू जुड़ेगा, अन्यथा नहीं। इसी तरह, होमपेज के केटेगरी विजेट के साथ भी यही होता है। पोस्ट के नीचे जो टैग होते हैं, उनमें से किसी एक पर क्लिक करने से उस टैग से सम्बंधित सभी पोस्टें उपरोक्त प्रकार के अस्थायी पेज पर खुल जाती हैं। बाकि की प्रक्रिया समान ही है।

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वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-9 (वेबपेज बनाना व कस्टमाईज करना, विजेट्स)

कोई भी वेबपेज बनाने के लिए “माय साईट” को क्लिक करते हैं। उससे ड्रॉप डाऊन मीनू खुलता है। उस पर “साईट पेजस” नाम से एक बटन होता है। उसके कोने में लिखे “एड पेज” पर क्लिक किया जाता है, जिससे लिखने के लिए एक खाली साईट-पेज खुलता है। उसे लिख कर पब्लिश कर दिया जाता है। वह वेबपोस्ट की तरह किसी ईमेल फोलोवर को डिलीवर नहीं होता, बल्कि वेबसाईट में कहीं गुमनाम पड़ा रहता है। उस वेबपेज को किसी मीनू में या विजेट में एड करना पड़ता है। मीनू में डालने के लिए कस्टमाईजर से प्राईमरी मीनू खोलें। उसमें मीनू के सभी पेज दिखते हैं, और अंत में नीचे एक “एड आईटम” बटन होता है। उस पर क्लिक करने से सभी वेबपेजस की लिस्ट खुल जाएगी। अब उस नए वेबपेज को सेलेक्ट कर लें। वह प्राईमरी मीनू में जुड़ जाएगा। मीनू की सभी आईटम्स को रिओरडर (ऊपर-नीचे) भी कर सकते हैं, और किसी आईटम का ड्रॉपडाऊन लिस्ट के रूप में सबमीनू भी बनाया जा सकता है। इससे यह लाभ होता है की वेबसाईट की साईडबार बहुत लम्बी होकर मेन कंटेंट के नीचे तक नहीं लटकती।

विजेट में वेबपेज को डालने के लिए कस्टमाईज़र से विजेट में जाएं। यथानुसार साईडबार या फुटबार विजेट को सेलेक्ट करें। वेबसाईट में लगे हुए विजेटस की लिस्ट के बोटम पर एक “एड विजेट” नाम से बटन होता है। उस पर क्लीक करके विजेट की एक नई व लम्बी लिस्ट खुलती है। उस पर “पेज” विजेट को चुनें। वह विजेट वेबसाईट के विजेट की लिस्ट में जुड़ जाएगा। अब उस पर क्लिक करके उसे नाम दें। उसमें वेबसाईट के सारे पेज जुड़ जाएंगे, और उनकी एक लम्बी लिस्ट नीचे की तरफ साईडबार में जुड़ जाएगी। उस लिस्ट में वे सभी पेज भी होंगें, जो प्राईमरी मीनू में दिख रहे होंगे। साथ में, इस विजेट की ड्रॉपडाऊन लिस्ट भी नहीं बनती। इससे यह बहुत स्थान घेरता है, जिससे साईडबार बहुत नीचे तक चली जाती है। इससे बचने के लिए डबल साईडबार वाली (दोनों बाईं तरफ, दोनों दाईं तरफ, या एक बाईं व एक दाईं तरफ) वेबसाईट-थीम को भी एक्टिवेट किया जा सकता है। इससे यह नुक्सान हो सकता है कि मेन कंटेंट के लिए जगह काफी कम रह सकती है, मुख्यतया डेस्कटॉप पर। दूसरा उपाय है कि इस विजेट का प्रयोग न करें। उपरोक्तानुसार, प्राईमरी मीनू में ही एक आईटम “अन्य वेबपेजस” आदि नाम से बना लें। उसमें अतिरिक्त के वेबपेज “एड आईटम” से डालें, व उन्हें रिऑर्डर कर लें। उस “अन्य वेबपेजस” आईटम का सबमीनू बना लें। इससे इसके नीचे के सभी पेज ड्रॉपडाऊन लिस्ट के रूप में आ जाएंगे, जो कम जगह घेरेंगे। अन्य भी बहुत से विजेट होते हैं, जैसे “रीसेंट पोस्टस”, “टॉप पोस्टस एंड पेजस”, “टेक्स्ट” आदि। “टेक्स्ट” विजेट को साधारण सूचना जैसे की कोपीराईट सूचना, व डिसक्लेमर आदि लिखने के लिए किया जाता है।

यदि आप हरेक पोस्ट के ऊपर शेयर की संख्या भी दिखाना चाहते हैं, तो “माय साईट” पर जाएं। ड्रॉपडाऊन लिस्ट में “शेयरिंग” बटन को क्लिक करें। अब उस पर “ऑफिशियल बटन्स” को क्लिक करें। वैबसाईट के मामले में धीरज रखना चाहिए। कभी भी डोमेन नेम व वैबसाईट के विषय को बदलना नहीं चाहिए। डोमेन का नाम भी वैबसाईट के अनुसार ही रखना चाहिए। जैसे कि यह वैबसाईट कुण्डलिनी से सम्बंधित है, इसीलिए इसका डोमेन नाम “demystifyingkundalini” रखा गया है।

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ओसीआर, ऑप्टिकल रिकोग्निशन सिस्टम, आधुनिक प्रकाशन के लिए एक वरदान

कुण्डलिनी और लेखन कला एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं

पाठक सोचते होंगे कि कुण्डलिनी-वैबसाईट में स्वयंप्रकाशन व वेबसाईट-निर्माण के विषय किस उद्देश्य से डाले गए हैं।  वास्तव में कुण्डलिनी-साधक को स्वयंप्रकाशन का व वेबसाईट-निर्माण का भी व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए।  ऐसा इसलिए है, क्योंकि कुण्डलिनी-क्रियाशीलता या कुण्डलिनी-जागरण के बाद दिमाग में मननशीलता की बाढ़ जैसी आ जाती है।  उस स्थिति में व्यक्ति एक उत्कृष्ट पुस्तक व वेबसाईट का निर्माण कर सकता है।  साथ में, इससे वह खालीपन की नकारात्मकता से भी बच सकता है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी ऐसा ही हुआ।

मैं ओसीआर तकनीक तक कैसे पहुंचा

ओसीआर (ocr) तकनीक से मेरा सामना तब हुआ, जब मैं अपने पिता द्वारा लिखित लगभग सात साल पुरानी एक कागजी पुस्तक का ई-पुस्तक वाला रूप बनाने का प्रयत्न कर रहा था। पुस्तक का नाम था ‘सोलन की सर्वहित साधना’। सौभाग्य से उस पुस्तक की सॉफ्ट कोपी प्रकाशक के पास मिल गई। इससे मैं पुस्तक को स्कैन करने से बच गया। साथ में, संभवतः सॉफ्ट कोपी से बनाई गई ई-पुस्तक में कम अशुद्धियाँ होती हैं। वह पुस्तक पीडीएफ फोर्मेट में थी। पहले तो मैं ऑनलाईन पीडीएफ कन्वर्टर की सहायता लेने लगा। मैंने कई प्रकार के कन्वर्टर को ट्राय करके देखा, गूगल ड्राईवर के कन्वर्टर को भी। परन्तु सभी में जो वर्ड फाईल कन्वर्ट होकर आ रही थी, उसके अक्षर तो पूर्णतया दोषपूर्ण थे। वह हिंदी पुस्तक तो कोई चाइनीज पुस्तक लग रही थी। फिर पीडीएफ एलीमेंट का प्रयोग किया। उसमें मुफ्त के प्लान में कुछ ही पेज एक्सट्रेक्ट करने की छूट थी। पेज तो पीडीएफ फाईल से वर्ड फाईल को एक्सट्रेक्ट हो गए थे, पर उन पृष्ठों में पट्टियों, फूलों आदि से सजावट जस की तस बनी हुई थी। वे सजावट की चीजें मुझसे रिमूव नहीं हो रही थीं। कुछ हो भी रही थीं, पर सभी नहीं। अक्षरों की गुणवत्ता भी अधिक अच्छी नहीं थी। मैंने सोचा कि शायद खरीदे जाने वाले प्लान से कोई बात बन जाए। परन्तु जब उसकी कीमत देखी, तो मैं एकदम पीछे हट गया। क्योंकि उसकी न्यूनतम सालाना कीमत लगभग 3000-4000 रुपए की थी।

मुफ्त में उपलब्ध ऑनलाईन फाईल कन्वर्टर से मुझे बहुत सहायता मिली

कई महीनों तक मेरी योजना ठन्डे बस्ते में पड़ी रही। फिर जब मुझे कुछ खाली समय प्राप्त हुआ, तब मैंने गूगल पर सर्च किया। ओसीआर तो मैंने पहले भी पढ़ रखा था, पर मुझे कभी भी पूरी तरह से समझ नहीं आया था। फिर मुझे एक वेबपोस्ट में पता चला कि उसके लिए पुस्तक को स्कैन करना पड़ता है, ताकि पुस्तक का प्रत्येक पृष्ठ एक अलग चित्र के रूप में आ जाए। जैसे ही मैं पुस्तक के स्कैन की तैयारी कर रहा था, वैसे ही मुझे पता चला कि यदि पुस्तक पीडीएफ फाईल के रूप में उपलब्ध हो, तो उसे सीधे ही चित्र-फाईल के रूप में कन्वर्ट किया जा सकता है। मैंने गूगल पर ‘पीडीएफ इमेज एक्सट्रेक्शन’ से सर्च करके बहुत से ऑनलाईन कन्वर्टर ट्राय किए। उनमें मुझे स्मालपीडीएफडॉटकोम पर उपलब्ध कन्वर्टर सर्वोत्तम लगा। मैंने उसमें एक ही बार में सारी बुक-फाईल अपलोड कर दी। कनवर्शन के बाद सारी बुक-फाईल डाऊनलोड कर दी। उससे कम्प्यूटर के डाऊनलोड फोल्डर में सारी बुक-फाईल क्रमवार चित्रों के रूप में आ गई। सभी चित्र एक जिपड (कंप्रेस्ड) फोल्डर में थे। उस फोल्डर को अन्जिप (विनजिप आदि सोफ्टवेयर से) करने से सभी चित्र एक साधारण फोल्डर में आ गए।

हिंदी भाषा के लिए काम करने वाले कम ही ओसीआर उपलब्ध हैं

फिर मैं उन चित्रों को वर्ड डोक में कनवर्ट करने वाले सोफ्टवेयर (ओसीआर) को गूगल में खोजने लगा। बहुत से ओसीआर ऐसे थे, जो हिंदी भाषा की सुविधा नहीं देते थे। अंत में मुझे वैबसाईट http://www.i2ocr.com पर उपलब्ध ऑनलाईन ओसीआर सर्वोत्तम लगा। वह निःशुल्क था। मैं बुक-चित्रों वाला फोल्डर एकसाथ अपलोड करने की कोशिश कर रहा था, पर नहीं हुआ। फिर मैंने सभी चित्रों को सेलेक्ट करके, सभी को एकसाथ अपलोड करने का प्रयास किया। पर वह भी नहीं हुआ। फिर मुझे एक वेबपोस्ट में पता चला कि बैच एक्सट्रेक्शन वाले ओसीआर कमर्शियल होते हैं, व मुफ्त में उपलब्ध नहीं होते। अतः मुझे एक-२ करके चित्रों को कन्वर्ट करना पड़ा। चित्रों की तरह ही कन्वर्ट हुई डोक फाईलें भी क्रमवार रूप में डाऊनलोड फोल्डर में आ गईं।

इमेज एक्सट्रेक्शन से बनाई गई वर्ड-फाईल की फोर्मेटिंग

फिर मैंने क्रम के अनुसार सभी डोक फाईलों को एक अकेली डोक फाईल में कोपी-पेस्ट कर दिया। पर डोक फाईल में अक्षरों की छोटी-बड़ी लाईनें थीं, जो जस्टिफाई एलाईनमेंट में भी ठीक नहीं हो रही थीं। फिर मैंने एक वैबपोस्ट में पढ़ा कि एमएस वर्ड के फाईन्ड-रिप्लेस के फाईन्ड सेक्शन में ^p (^ चिन्ह कीबोर्ड की शिफ्ट व 6 नंबर वाली की को एकसाथ दबाने से छपता है) को टाईप करें, व रिप्लेस में खाली सिंगल स्पेस डालें। ‘रिप्लेस आल’ की कमांड से सब ठीक हो जाता है। वैसा ही हुआ। इस तरह से वह ई-पुस्तक तैयार हुई।

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यदि बहुत सारी छोटी वर्ड फ़ाइलों को एक साथ जोड़ा जाना है, तो एमएस वर्ड के ‘इंसर्ट’ की मदद ली जानी चाहिए। ‘इंसर्ट’ बटन पर क्लिक करने पर बने ‘ऑब्जेक्ट’ बटन पर क्लिक करें, और इसके कोने पर बने त्रिकोण पर क्लिक करें। अब ड्रॉपडाउन मेनू पर ‘फ़ाइल फ्रॉम टेक्स्ट’ पर क्लिक करें। एक नया ब्राउज़-विंडो पॉप अप होगा। उस पर वर्ड फ़ाइलों का चयन करें, जिन्हें क्लब किया जाना है। ध्यान रखें कि चयन के क्रम में फ़ाइलों को क्लब किया जाएगा। इसका मतलब है, चयनित समूह में पहली फ़ाइल संयुक्त वर्ड फ़ाइल में पहले आएगी और इसी तरह। मैं एक बार में अधिकतम 10 फ़ाइलों को क्लब करने की सलाह देता हूं क्योंकि मुझे लगता है कि यदि बड़ी संख्या में फ़ाइलों को एक साथ चुना जाता है तो यह सिस्टम त्रुटि पैदा कर सकता है। पर वास्तव में कन्वर्ट होने के बाद कई फाईलें वर्ड फोर्मेट में डाऊनलोड नहीं हो रही थीं। मैं हिंदी भाषा की फाईल को ओसीआर कर रहा था। टेक्स्ट फोर्मेट में वे फाईलें डाऊनलोड हो रही थीं। हालांकि टेक्स्ट फोर्मेट वाली फाईल नोटपैड में ही खुल रही थीं, वर्डनोट में नहीं। टेक्स्ट फाईलों में डाऊनलोड करने का यह नुक्सान है कि उन्हें वर्ड फाईलों की तरह इन्सर्ट-ओब्जेक्ट आदि कमांड देकर एकसाथ क्लब नहीं किया जा सकता। सबको अलग-२ कोपी-पेस्ट करना पड़ता है।

फाईनल फाईल करेक्शन

उस पुस्तक में कई जगह दो अक्षर जुड़े हुए थे। जैसे कि मूल पुस्तक के ‘फल का’ शब्दों का ‘फलका’ बन गया था। थोड़ी सी मेनुअल करेक्शन से सब ठीक हो गया। कागजी पुस्तक को सामने रखकर उपयुक्त स्थानों पर पेजब्रेक, लाइनब्रेक, हैडिंग शेप आदि दिए गए, ताकि ई-पुस्तक पूर्णतः मूल पुस्तक की तरह लगती। कवर के व शुरू के कुछ चित्रात्मक पृष्ठों को सीधे ही ई-पुस्तक में इन्सर्ट किया गया। इन कवर फ़ोटो के संपादन के लिए मैंने ‘फोटोजेट’ के ऑनलाइन फोटो संपादक का उपयोग किया। हालाँकि, संपादित छवि डाउनलोड करने से पहले इस ऐप को फेस बुक पर साझा करना पड़ता है। Pixlr.com का ऑनलाइन संपादक भी अच्छा है। चित्रों को सीधे कोपी-पेस्ट करने की बजाय एमएस वर्ड की ‘इन्सर्ट-पिक्चर’ की सहायता ली गई, क्योंकि सीधे कोपी-पेस्ट करने से कई बार ई-बुक में चित्र दिखता ही नहीं।

ओसीआर में कुछ विशेष ध्यान देने योग्य बातें

पुस्तक को स्केन करने से पहले यह देख लें की पुस्तक कितनी पुरानी है। बहुत पुरानी पुस्तकों का ओसीआर नहीं हो पाता। पुस्तक की बाईंडिंग खोलकर प्रत्येक पेज को अलग से सकेन करना पडेगा। पुस्तक को फोल्ड करके स्केन करने से किनारे के अक्षर ढंग से स्कैन नहीं होते, जिससे वे ओसीआर नहीं हो पाते। बाद में आप पुस्तक की पुनः बाईन्डिंग करवा सकते हो। डबल पेज स्कैन करके भी ओसीआर नहीं हो पाता। पेज उसी हिसाब से स्कैनर पर रखना पड़ेगा, जैसा कि आमतौर पर सिंगल पेज रखा जाता है। पेज की लम्बाई स्कैनर की लम्बाई की दिशा में रखी जाती है। पेज सामान्य पुस्तक के पेज की तरह लिखा होना चाहिए, यानी अक्षरों की पंक्तियाँ पेज की चौड़ाई की दिशा में कवर करती हों। स्कैनर पर पेज जितना सीधा होगा, उतना ही अच्छा ओसीआर होगा। इसलिए पेज को स्कैनर-ग्लास की लम्बाई वाली बैक साईड प्लास्टिक बाउंडरी से सटा कर रखा जाना चाहिए। इससे पेज खुद ही सीधा आ जाता है। लैन्थवाईज तो पेज स्कैनर के बीच में आना चाहिए।

फाईल को सुधारने के लिए ओसीआर करने से पहले आसान विकल्प भी आजमा लें

कई बार तो ओसीआर करने की जरूरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि फोंट को कन्वर्ट करके काम चल पड़ता है। हर जगह चलने वाला फोंट यूनिकोड है। मैंने एक क्रुतिदेव (krutidev) फोंट में टाईप किए हुए पीडीएफ लेख को वर्ड-लेख में कन्वर्ट किया, परन्तु उसके अक्षर पढ़े नहीं जा रहे थे। फिर मैंने ऑनलाईन फॉण्ट कन्वर्टर में फाईल को डालकर उसके क्रुतिदेव फोंट को यूनिकोड में कन्वर्ट किया। फिर जाकर अक्षर पढ़े गए। १-२ प्रकार के ही अक्षर गलत थे, वो भी कहीं-२ पर ही। थोड़ी सी मेहनत से लेख मैंने करेक्ट कर दिया। वह मेहनत ओसीआर में लगने वाली मेहनत से काफी कम थी। फिर भी ओसीआर दुबारा टाईप करने से बहुत ज्यादा आसान है।

भविष्य की तकनीक ‘हैण्ड टैक्स्ट रिकोग्निशन’

इससे आगे की तकनीक हाथ से लिखे लेख को ओसीआर करने की है। इसे ‘हैण्ड टैक्स्ट रिकोग्निशन’ कहते हैं। परन्तु यह पूरा विकसित नहीं हुआ है। इस पर खोज जारी है। हालांकि डब्बों वाले कागजी फोर्मेट में एक-२ डब्बे में एक-२ अक्षर को डालने से यह तकनीक काम कर जाती है। तभी तो सेवा-भरती या पंजीकरण आदि के अधिकाँश परिचय-फॉर्म भरने के लिए डब्बों वाले फोर्मेट का प्रयोग किया जाता है।

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वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-8 (डुप्लीकेट कंटेंट, पब्लिश करने की फ्रिक्वेंसी, वेबसाईट ट्रांसफर, रीडर बटन); Website creation, management and development, part-8 (duplicate content, publishing frequency, website transfer, reader button)

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-8 (please browse down or click here to view this post in English)

मुफ्त के वैबसाईट प्लान में वैबसाईट का मोबाईल के आकार-प्रकार के अनुरूप आकार-प्रकार भी नहीं होता, जिससे ट्रेफिक काफी घट जाती है। कई लोग कहते हैं कि डुप्लीकेट कंटेंट की पेनल्टी से बचने के लिए पोस्ट में केनोनिकल टेग लगाने चाहिए। सच्चाई यह है कि गूगल स्वयं ही वेबपेज / वेब आर्टिकल का सर्वाधिक उपयुक्त रूप सर्च रेंकिंग के लिए चुन लेता है। हाँ, यदि गूगल को डुप्लीकेट कंटेंट का मकसद सर्च रेंकिंग को बढ़ाना लगे, तब वह उस पर पेनल्टी भी लगा सकता है। फिर भी जहाँ तक हो सके, सुरक्षा के लिहाज से डुप्लीकेट कंटेंट से बचना ही चाहिए। गूगल का बोट पोस्ट को डालने के अनुमानित समय पर बार-२ आता रहता है, व नई पोस्ट की खुराक से संतुष्ट होकर ट्रेफिक को बढ़ाता रहता है। इसलिए यदि निर्धारित अंतराल पर पोस्ट न डाली जाए, तो वह भूखा रह जाता है, जिससे वह लम्बे समय तक वापिस नहीं भी आ सकता। इसलिए अच्छा रहता है, यदि निर्धारित समय व अंतराल पर पोस्ट को डालना जारी रखा जाए। सप्ताह में एक दिन व वीकएंड पर जैसे कि शनिवार की शाम को 6 बजे से 9 बजे के बीच में सर्वोपयुक्त समय है, क्योंकि उस समय दुनिया के सभी टाईम जोन के लोग जागते हुए होते हैं, और रिलेक्सड मोड में भी होते हैं। फ्री प्लान में मोबाईल फोन पर वेबसाईट को एडिट भी नहीं किया जा सकता है। वेबसाईट पर पर्सनल पेज भी बनाए जा सकते हैं, जिन्हें कोई और नहीं देख सकता। उस पर अपनी सभी निजी जानकारी डाली जा सकती है।

इसी तरह “नोफोलो” कोड भी नहीं लगाना चाहिए किसी पोस्ट के साथ, क्योंकि इससे लिंक जूस किसी को नहीं मिलता, और नष्ट हो जाता है। यदि लिंक जूस लिंकड वेबसाईट को जाने से रुक भी जाए, तो भी फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि दूसरे ब्लोगर भी इस कोड को लगाएंगे, जिससे उनके ब्लॉग का लिंक जूस हमें नहीं मिल पाएगा। संक्षेप में, ट्रेफिक बढ़ाने के शोर्ट टर्म उपायों से बचना चाहिए। इनमें से अधिकांश उपाय तो अवैध ही होते हैं, जिनके कारण गूगल पेनल्टी लगा सकता है। अगर वैबपोस्ट या वेबपेज के लिए नया कंटेंट लिखने की सामर्थ्य न हो, तो अपने पुराने कंटेंट के शब्दों व वाक्यों में थोड़ा परिवर्तन करके, संभवतः उसको दुबारा भी लिख सकते हैं।  यद्यपि ऐसा दूसरों के कंटेंट को चुरा कर नहीं करना चाहिए।  कई ऐसे जाने-माने इंटरनेट-पुरुष भी हैं, जो दूसरों के कंटेंट से छेड़छाड़ करके ही मशहूर हुए हैं।

यदि बढ़ी हुई ट्रेफिक को निरंतर प्राप्त करना चाहें, तो सप्ताह में दो बार नई पोस्ट डालें।परन्तु इससे यह नुकसान होता है कि पाठकों को नई पोस्ट पढ़ने के लिए अधिक समय नहीं मिलता। ट्रेफिक को निर्बाध रूप से बढ़ा हुआ रखने के लिए भी सप्ताह में दो बार पोस्ट लिखी जा सकती है, परन्तु इससे बार-2 नोटिफिकेशन को प्राप्त करने वाले ई-मेल फोलोवर परेशान हो सकते हैं। यह भी हो सकता है कि वे मानसिक बोझ के कारण पोस्ट को पढ़े ही न।

वैबसाईट को ट्रांसफर भी किया जा सकता है। वेबसाईट को किसी दूसरे आदमी के नाम भी बनाया जा सकता है। कई लोग स्वयं वेबसाईट के मालिकाना हक़ से दूर रहना चाहते हैं, विशेषकर जिन पर पैसों का लेन-देन होता है। सार्वजनिक क्षेत्र के कामगारों को ऐसी वेबसाईट से समस्या आती है, विशेषकर आयकर दाखिले के समय। अन्य कानूनी बाध्यताएं भी होती हैं। ऐसे में वे पत्नी के नाम से वेबसाईट बनाते हैं, और स्वयं उसके एडमिन बन जाते हैं। मालिक (यहाँ पर पत्नि) तो वैसे भी एडमिन होता ही है। कई लोग अपनी वेबसाईट के प्रसिद्ध होने पर उसे पत्नि आदि के नाम ट्रांसफर कर देते हैं। उसके लिए पत्नि का वर्डप्रेस अकाऊंट (वर्डप्रेस प्लेटफोर्म के लिए) बनाना पड़ता है। पत्नि आदि का अंतर्राष्ट्रीय डेबिट कार्ड भी बनाना पड़ता है, जिससे वेबसाईट को रिचार्ज या अपग्रेड किया जा सके। साधारण वेबसाईट को तो सरकारी कर्मचारी भी चला सकते हैं, जिसमें पैसों का लेन-देन न हो, राजनीतिक बयानबाजी न हो, और सरकार की नापसंदगी के लेख न लिखे गए हों। विचारों की अभिव्यक्ति का अधिकार तो सबको है, यद्यपि एक सरकारी कर्मचारी के लिए कुछ शर्तों के साथ। उन विचारों से उसका सरकारी कार्य दुष्प्रभावित नहीं होना चाहिए। यदि लाभान्वित होए, तब तो बहुत अच्छा है।

वर्डप्रेस के टॉप बार के रीडर बटन को क्लिक करके ड्रापडाऊन मीनू खुलता है। उसमें पहला बटन “फोलोड साईट्स” का होता है। उस पर सभी फोलोड साईट्स की पोस्टस दिखती हैं, क्रमवार, सबसे नयी वाली सबसे पहले। उससे निचला बटन “कन्वर्जेशन” का होता है। उस पर जिस किसी भी पोस्ट के कमेन्ट को लाईक किया गया हो, उस पोस्ट के सभी कमेन्ट दिखाई देते हैं, क्रमवार, लाईक्ड कमेन्ट वाली सबसे नयी पोस्ट के कमेन्ट सबसे पहले। उससे निचला बटन “डिस्कवर” का होता है। उस पर वर्डप्रेस-पाठकों द्वारा चुनी गई बेहतरीन पोस्टस दिखाई जाती हैं। उससे निचला बटन “सर्च” का होता है। उस पर बहुत सी रिकमंड की गई पोस्टस होती हैं। सबसे ज्यादा रेकमंड की गई पोस्टस सबसे पहले होती हैं। उसमें एक सर्च बार भी होती है, जिस पर हम पोस्टस को सर्च कर सकते हैं। उससे निचला बटन “माय लाईक्स” का होता है। उस पर वे सभी पोस्टस होती हैं, जिन्हें लाईक किया गया होता है, क्रमवार, सबसे नयी लाईक की गई पोस्ट सबसे पहले। सबसे नीचे “टेगस” बटन होता है। इस पर हम अपने मनचाहे टेग को एड कर सकते हैं, ताकि हर बार उस टेग पर क्लिक करने से उस टेग वाली पोस्टस खुलती रहें। उदाहरण के लिए, यदि किसी को “कुण्डलिनी” से सम्बंधित विषय पसंद हैं, तो वह “कुण्डलिनी” शब्द को एड कर सकता है।

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Website creation, management and development, part-8

In a free website plan, the website does not have any size-type according to the size-type of mobile, which reduces traffic significantly. Many people say that in order to avoid the penalty of duplicate content, it is necessary to put a canonical tag in the post. The truth is that Google automatically chooses the best form of webpage / web article for search rankings. Yes, if Google finds it as a tactic to increase search rankings, then it can also penalize it. However, as far as possible, for security purpose, duplicate content must be avoided. Google’s bot keeps coming at the estimated time of posting, and satisfied with the new post dose, keeps increasing traffic. So if the post is not put at the fixed interval, then he is hungry, so that he may not return for a long time. It is therefore good, if continuing to post is kept at set time and interval. Weekly posting, on the day of weekend, such as on Saturday, and at time between 6 pm and 9 pm is the best, because at that time all the people of the world are awake and also in the Relaxed mode. The website cannot be edited on the mobile phone in the free plan. Personal pages can also be made on the website, which nobody else can see. All your personal information can be inserted on it.

Similarly, the “nofollow” code should not be included in any post as it does not make available link juice to anyone, and is destroyed. Even if the link juice is being blocked from going to the Linked website, there is no benefit as other bloggers will also apply this code, so that the link juice of their blog is not available to us. In short, short-term measures should be avoided to increase traffic. Most of these measures are illegal, due to which Google can penalize. If one does not have the ability to write new content for his webpost or webpage, then by changing slightly the words and sentences of their old content, they can possibly write it again. Although it should not be stolen from others’ content. There are many well-known internet-men, who have become famous only by tinkering with others’ content.

If you want to get increased traffic continuously, then add new posts twice a week. But this can be a loss for readers do not get much time to read new posts. Posting a post twice a week can also be practiced to keep the traffic uninterrupted, but the e-mail followers who receive frequent notifications may be upset. It may also be that they did not read the post because of the mental burden.

The website can also be transferred. The website can also be named with another man. Many people want to stay away from the ownership of the website themselves, especially on which money transactions happen. Public sector workers face problems from such websites, especially during the time of income tax return. There are also other legal obligations. In such a way, they make websites in the name of their wives, and become their administrators. The owner (the wife on here) is also the admin itself. Many people transfer their website to others’ account when they are famous. For that, the WordPress account (for wordpress platform) has to be created for the new website owner. The international debit card of the wife etc. has to be created so that the website can be recharged or upgraded. The general informative website can also be run by government employees, in which there is no money transaction, no political rhetoric, and the articles of government’s dislikes have not been written. The right to express thoughts is for everyone, even though with some conditions for a government employee. With his ideas, his official work should not be affected. If beneficial to his official work, then it is very good.

Clicking the Reader button in top bar of WordPress opens the dropdown menu. The first button is “Followed Sites”. Posts are displayed from all the followed sites on it, serial wise, the newest first of all. The lower button is of “Conversation”. It shows the comments of all the posts on the comment of which the website owner has put the “like” himself, or a comment has been made by himself, in an orderly fashion, the newest post with liked comment appearing first of all. Still lower button is that of “Discover”. The best posts are selected by WordPress-readers on it. The lower button is that of “Search”. There are so many recommended posts on it. The most recommended posts are the first. There is also a search bar on which we can search the post. The lower button is that of “My Likes”. There are all the posts on it, which have been liked, respectively, the most recently posted posts being first in line. The bottom is the “Tags” button. On this, we can add tags to our liking, so that every time we click on that tag, the posts with that tag continue to open. For example, if someone likes topics related to “Kundalini”, then he can add the word “Kundalini” in the tag.

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