आदरणीय पंडित ब्रम्हानंद शर्मा जी द्वारा रचित व दिल को छूने वाली कुछ शेरो-शायरी

उसकी खामोशी भी एक पैगाम है मेरे लिए……

मेरी अर्जे-शौक़ बेमानी है उसके वास्ते ,

उसकी ख़ामोशी भी एक पैग़ाम है मेरे लिए !

हर शख्स मेरा उस्ताद निकला……..

किस-किस को दूँ मैं ‘शिक्षक दिवस ‘ की बधाई

ढूँढने निकला तो हर शख़्स मेरा उस्ताद निकला …

अपना गम कोई कहानी नहीं कि तुम से कहें…..

अपना गम कोई कहानी नहीं कि तुम से कहें .

ये दस्तूरे- जमाना भी नहीं कि तुमसे कहें

आज तक अपनी मुस्कराती उदासी की वजह

खुद भी तो न समझ पाया कि तुमसे कहें.

पत्थर की मूरत में दिखेगा…..

मुस्कुराते फूलों में ना दिखा तो पत्थर की मूरत में दिखेगा ?

बन्दे ! इबादत की नज़र से देख , जर्रे जर्रे में वही दिखेगा !

मैं भी खुद से खुश नहीं आजकल…..

तेरी बे-रूखी वाजिब है दोस्त !

मैं भी खुद से खुश नहीं आजकल !

खुद बनाता है जहां में , आदमी अपनी जगंह…..

इत्तिफाक अपनी जगह , खुशकिस्मती अपनी जगह ,

खुद बनाता है जहां में , आदमी अपनी जगंह !

टकराऊं किसी और से गवारा नहीं मुझे…..

खुद अपने ख़यालों से उलझा हुआ हूँ मैं

टकराऊं किसी और से गवारा नहीं मुझे

हर शख़्स मेरा साथ निभा भी नहीं सकता……..

तू छोड़ गया मुझको तो तेरी कोई ख़ता नहीं

हर शख़्स मेरा साथ निभा भी नहीं सकता !

मैं भी किस सलीके से ख़ूब रोया हूँ , पूरी उम्र हंस हंस कर……

न आँखों से कभी ढले आंसू , न चेहरे पे शिकस्ती के निशान उभरे

मैं भी किस सलीके से ख़ूब रोया हूँ , पूरी उम्र हंस हंस कर !

जो बदल गया , उसका क्या कर लोगे…..

खो गया होता तो खोज भी लेते उसको

जो बदल गया , उसका क्या कर लोगे  !

एक कतरा जो हूँ , तनहा तो बह नहीं सकता……

संग चलना ही पड़ता है उफनते दरिया के साथ

एक कतरा जो हूँ , तनहा तो बह नहीं सकता !

सुलझे हुए लोगों में , यूँ उलझी रही मोहब्बत……

न जाहिर कर सका वो , न बयाँ कर सके हम ,

सुलझे हुए लोगों में , यूँ उलझी रही मोहब्बत।

 ये नूर तेरे दिल में है अंदर तलाश कर…..

क्या ढूँढ़ता फिरे है तू जंगल पहाड़ में ,

ये नूर तेरे दिल में है अंदर तलाश कर ।

फस्ले-गुल में तो हर चीज निखर जाती है…..

देखना है तो मेरा रंग खिजाँ में देखो

फस्ले-गुल में तो हर चीज निखर जाती है।

लहरों में वो ठहराव कहां…..

समंदर के सुकूत की बात अलग है .

लहरों में वो ठहराव कहां ?

लफ़्ज़ों में वो अंदाज कहां…..

खामोशी ने जो बात कही ,

लफ़्ज़ों में वो अंदाज कहां ?

दोस्ती न करते तो खुद से दुश्मनी होती……

उस शख्स में बात ही कुछ ऐसी थी

दोस्ती न करते तो खुद से दुश्मनी होती !

कुछ उठ भी गए कुछ आ भी गए…..

ये रंग – बहारे – आलम है

क्यों फ़िक्र है तुझको , ऐ साकी !

मह़फिल तो तेरी सूना न हुई ,

कुछ उठ भी गए कुछ आ भी गए ।

कुछ तो है, जो अब तक मुझको मिला नहीं…..

अभी तक कुछ भी खोया नही, मगर यूँ लगता है ,

कुछ तो है, जो अब तक मुझको मिला नहीं !

कोई मुस्कराया तो मैं भी हंस दिया…..

जख्म है, दर्द है, मगर हौसला भी है ,

कोई मुस्कराया तो मैं भी हंस दिया !

बहुत खामोश रहने से भी ताल्लुक टूट जाते हैं……

तुम्हे ये कौन बतलाये तुम्हे ये कौन समझाए ,

बहुत खामोश रहने से भी ताल्लुक टूट जाते हैं .

फिर इस के बाद चिराग़ों में रौशनी न रही…..

वो आये बज़्म में इतना तो ‘मीर’ ने देखा,

फिर इस के बाद चिराग़ों में रौशनी न रही.

डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता…..

न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,

डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता.

– ग़ालिब

किस से अक़ीदत का सिला मांगेगा…..

इश्क़ क़ातिल से भी , मक़तूल से हमदर्दी भी

यह बता , किस से मुहब्बत की जज़ा मांगेगा

सजदा ख़ालिक़ को भी , इबलीस से याराना भी

हस्र में , किस से अक़ीदत का सिला मांगेगा

– इक़बाल

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