कुण्डलिनी से कोरोना से बचाव; कुण्डलिनी ही जीवन के लिए जोखिम भरी परिस्थितियों में सबसे अधिक साथ निभाती है, चाहे वह कोरोना वायरस हो या अन्य कोई भयंकर परिस्थिति

कुछ पहुंची हुई बातें हमें विश्वास करके माननी ही पड़ती हैं, क्योंकि उन्हें प्रत्यक्ष विज्ञान के द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता। इन्हीं में से एक बात है, परलोकगमन के समय कुण्डलिनी की सहायता प्राप्त होना। सभी धर्मों में यह बात बताई गई है कि एक इष्ट का ध्यान करते रहना चाहिए। वही इष्ट परलोक यात्रा को सुगम बनता है। यदि अंत समय में उस इष्ट का स्मरण हो जाए, तो मुक्ति निश्चित है। यदि मुक्ति न भी हो, तो इतना तो जरूर है कि वह जीवात्मा को धरती के बंधन से छुड़ाता है, जिससे परलोक यात्रा सुगम व शीघ्र हो जाती है। यह तो विज्ञान से भी सिद्ध है कि अंतरिक्ष यान को धरती के गुरुत्वाकर्षण से छूटने के लिए ही महान बल चाहिए होता है। उसके बाद वह स्वयं ही ऊपर जाता रहता है। वैसा ही बल इष्ट के स्मरण से मिलता है। उसी इष्ट को कुण्डलिनी कहते हैं।

राजा परीक्षित को इसी इष्ट-ध्यान से एक सप्ताह में मुक्ति मिल गई थी

राजा परीक्षित को पता चल गया था कि एक सप्ताह में उनकी मृत्यु होने वाली थी। इसलिए उन्होंने अपना पूरा ध्यान श्री कृष्ण में लगा दिया था। इससे उन्हें मुक्ति मिल गई। इसी तरह रजा खट्वांग को पता चल गया था कि उनकी मृत्यु 1 घंटे बाद होने वाली है। इसलिए उन्होंने अपना पूरा ध्यान अपने इष्ट में लगा दिया था। इससे उन्हें मुक्ति मिल गई।

इसीलिए मेरी नानी जी कहा करती थीं कि आजकल तो मुक्ति को प्राप्त करना बहुत आसान है। आजकल डाक्टर लोग पहले से बता देते हैं कि किस बीमार व्यक्ति के मरने की सम्भावना कब और कितनी है।

कुण्डलिनी ध्यान से कोरोना वायरस से निपटने में भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों प्रकार से मदद मिल सकती है

कोरोना वायरस से भी पता चल ही गया है कि आदमी की जिंदगी बहुत अस्थायी है। इससे शिक्षा लेते हुए लोगों को कुण्डलिनी साधना शुरू कर देनी चाहिए। पहले तो कुण्डलिनी आदमी को कोरोना से बचाने की पूरी कोशिश करेगी, जैसा कि पिछली एक और अन्य स्वास्थ्य संबंधी कुंडलिनी पोस्टों में बताया गया है। यदि आदमी फिर भी बच न पाया, तो यह उसे मुक्ति प्रदान करेगी या परलोक यात्रा को तो आसान बनाएगी ही।

कुण्डलिनी को तालु और गले पर विशेष रूप में केन्द्रित करें

वैसे तो कुण्डलिनी को प्रत्येक चक्र पर बारी-बारी से केन्द्रित करना चाहिए, फिर भी तालु चक्र, विशुद्धि चक्र और अनाहत चक्र पर विशेष ध्यान देना चाहिए। कोरोना वायरस का हमला इन्हीं क्षेत्रों पर होता है। कुण्डलिनी को इन क्षेत्रों में केन्द्रित करने से वहां पर सकारात्मक रक्त संचार बढ़ेगा। रक्त संचार के सकारात्मक होने का अर्थ है कि रक्त संचार के साथ कुण्डलिनी भी विद्यमान होगी। वही कुण्डलिनी अद्वैत शक्ति है। शरीर के सूक्ष्म सैनिक उसी अद्वैत शक्ति की सहायता से कीटाणुओं व विषाणुओं के साथ लड़ते हैं, तथा उनका संहार करते हैं। साधारण व्यायाम से रक्त संचार में तो वृद्धि होती है, पर उसमें वह दिव्य कुण्डलिनी शक्ति नहीं होती। तालु चक्र मुख के अन्दर बिलकुल पीछे होता है, जहां पर एक मांस की अंगुली जैसी संरचना नीचे लटकी होती है। वहां पर गला ख़राब होने पर खारिश जैसी भी होती है। विशुद्धि चक्र गर्दन के बिलकुल केंद्र में होता है, जहाँ पर थायरायड ग्रंथि भी होती है। अनाहत चक्र छाती में तथा दोनों स्तनों के बिलकुल बीचोंबीच होता है। विशुद्धि और अनाहत, दोनों ही चक्रों के आगे और पीछे के दो चक्र होते हैं, जो एक सीधी काल्पनिक रेखा से आपस में जुड़े होते हैं। दो-चार दिन के अभ्यास से इन चक्रों का खुद ही पता लगने लगता है। इन चक्रों पर कुण्डलिनी का ध्यान करने से उन पर संकुचन जैसा अनुभव होता है, और एक सरसराहट जैसी संवेदना भी अनुभव होती है। इसका अर्थ है कि वे चक्र क्रियाशील हो गए हैं।

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