कुंडलिनी आधारित केस स्टडी में रूस-यूक्रेन युद्ध~शरीर-चक्रों पर जन्म-मृत्यु का चक्र

मित्रों, तीसरी आँख आज्ञा चक्र के समीप ही खुलती है। यही शिव का क्रोध से भरा हुआ नेत्र भी है, जो विध्वंस कराता है। मतलब कि अगर आज्ञा चक्र पर कुंडलिनी को ढंग से न संभाला जाए तो वह विध्वंस भी करवा सकती है। यही मैंने पिछली पोस्ट में समझाने की कोशिश की है कि यदि बुद्धि पर ज्ञान का अंकुश न रहे, तो कैसे वह विध्वंस भी करा सकती है। मशहूर वैज्ञानिक स्टीफेंस हॉकिंग भी यही कहते थे कि आज मानव सभ्यता विकास और विज्ञान के शीर्ष पर है। यदि इस समय विनाशकारी युद्धों से बचा जाए, तो ही धरती स्वर्णिम और अलौकिक अवस्था में पहुंच पाएगी, अन्यथा मंगल ग्रह जैसा हाल हो सकता है धरती का। साथ में, मैं भगवान गणेश को कुंडलिनी-रूप बता रहा था। यहाँ यह गौर करने वाली बात है कि शिव पुराण में पहले यह लिखा है कि देव कार्तिकेय के जन्म के बाद पार्वती देवी ने शिव के साथ संभोग से भगवान गणेश को पैदा किया। फिर आगे के अध्याय में यह लिखा है कि पार्वती ने अपने शरीर के मैल से पुत्र गणेश को पैदा किया। तो जो संभोग से भी बना हो, और उसी के साथ शरीर के मैल से भी बना हो, वह तन्त्र योग से निर्मित मानसिक कुंडलिनी-पुरुष ही हो सकता है।

जन्म और मृत्यु के चक्र इसी मानव शरीर में और इसी जीवन में हैं, बाहर की छोड़ो। कुंडलिनी के मूलाधार चक्र पर होने पर पशुवत व अज्ञान-आसक्ति से भरा जीवन होता है। यह कीट-पतंगे आदि निम्न जीव का जीवन होता है। आदमी के थोड़ी तरक्की करने पर कुंडलिनी स्वाधिष्ठान चक्र तक चढ़ जाती है। वह एक उच्चतर चेतना का पशु जीवन होता है, जैसे कि मुर्गे, बकरे आदि का जीवन। ये जीव अधिकांश समय सम्भोगसुख में ही रमे रहते हैं। और अधिक तरक्की करने पर कुंडलिनी मणिपुर चक्र तक चढ़ जाती है। मणिपुर चक्र नाभि में है, जो खाने-पीने व पाचन से सम्बंधित है। यह ऐसे उच्चतर पशु का जीवन होता है, जो हमेशा खाने में ही व्यस्त रहता है। उदाहरण के लिए, घास-पत्ते खाने वाले जानवर। वे चौबीसों घण्टे कुछ न कुछ खाते ही रहते हैं। और अधिक विकास करने पर कुंडलिनी अनाहत अर्थात हृदय चक्र पर पहुंचती है। यह स्वामिभक्त और भावनामय जैसे प्राणी का जीवन होता है। उदाहरण के लिए कुत्ता, हाथी, डॉल्फिन आदि। उसके ऊपर चढ़ने पर कुंडलिनी विशुद्धि चक्र में पहुंचती है। यह मीठी आवाज वाले जानवर के जैसा जीवन होता है। उदाहरण के लिए, कोयल। फिर कुंडलिनी आज्ञा चक्र तक उठ जाती है। यह बुद्धिमान प्राणी के जैसा जीवन होता है। जैसे प्राइमेट, मनुष्य आदि। उसके ऊपर कुंडलिनी को चढ़ाने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की जरूरत होती है। विरले लोग ही तांत्रिक साधनाओं से व एकांत के योगाभ्यास से कुंडलिनी को सहस्रार तक ऊपर उठा पाते हैं। उनमें से भी बहुत कम लोग ही काफी लंबे समय तक कुंडलिनी को सहस्रार में रोककर रख पाते हैं। उनमें से भी विरले लोग ही सहस्रार में कुंडलिनी को जागृत कर पाते हैं। उनमें भी बहुत कम लोग ही जीवनभर कुंडलिनी को सहस्रार में क्रियाशील रख पाते हैं। यहीं जीवनयात्रा समाप्त होती है। यही ईश्वर की प्राप्ति है। वहां से फिर आदमी दुबारा नीचे नहीं गिरता। यदि गिरता हुआ दिखता है, तो केवल लोकव्यवहार के लिए। असल में वो हमेशा सहस्रार चक्र में ही स्थित रहता है। सम्भवतः इसे ही ब्रह्मलोक कहा गया है। ब्रह्मा अर्थात मन के साथ वह ब्रह्मा की पूर्ण आयु पर्यंत अर्थात मनुष्य की पूर्ण आयु पर्यंत बना रहता है, और अंत में ब्रह्मा के साथ ही मुक्त हो जाता है। अधिकांश लोग तो आज्ञाचक्र से ऊपर जा ही नहीं पाते, और वहां से नीचे गिरने लगते हैं। बारी-बारी से सभी चक्रों से होते हुए वे पुनः मूलाधार रूपी अंधकूप में पहुंच जाते हैं। अर्थात वे एक-एक कदम नीचे की चेतना से होते हुए सबसे नीचे पहुंच जाते हैं। वहां से उनका विकास पुनः शुरु होता है, और वे धीरे-धीरे ऊपर उठने लगते हैं। मनुष्य योनि को पाकर, और परमात्मा को पाए बिना ही फिर नीचे गिरने लगते हैं, विभिन्न जीव-योनियों का रूप प्राप्त करते हुए। इस तरह से यह जन्म-मरण का चक्र बारम्बार चलता रहता है। आज दुनिया भी इसी अंतिम मोड़ पर स्थित है, जहाँ से यह सत्ययुग के लिए अंतिम छलांग न लगा पा सकने के कारण नीचे गिरना शुरु हो गई है, ऐसा लगता है। वैसे अभी देर नहीं हुई है, संभलने के लिए वक्त है। अभी हाल ही में छिड़े यूक्रेन-रूस युद्ध को ही लें। आदमी अपने बौद्धिक और भौतिक विकास के चरम पर था। ईराक-सीरिया आदि के ऊपर थोपी गई लड़ाईयां तो जैसे इतिहास में दफन हो रही थीं। धार्मिक आतंकवाद के ऊपर भी चारों ओर से शिकंजा कसा जा रहा था। मतलब कि दुनिया की कुंडलिनी आज्ञाचक्र पर थी। एक प्रकार से दुनिया आदमी बनी थी। अधिक से अधिक कुंडलिनी घटनाएं और जागृतियाँ देखने-सुनने में आ रही थीं। दुनिया अच्छे से सत्ययुग में रूपांतरित हो रही थी। बड़े-बड़े भौतिक वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक वैज्ञानिक और लेखक इसमें मदद कर रहे थे। आदमी के पास भरपूर संसाधन इकट्ठे हो गए थे। इससे आदमी के पास पर्याप्त अतिरिक्त समय था, जिससे वह कुंडलिनी योगसाधना करके कुंडलिनी को मुक्ति की अंतिम छलांग के लिए पर्याप्त मुक्तिगामी वेग अर्थात एस्केप विलोसिटी देने के लिए अग्रसर था। फालतू दुनियादारी को घटा कर और जटिल जीवनचर्या को सरल बना कर वह ऊर्जा का संरक्षण और संचय कर रहा था, ताकि वह ऊर्जा कुंडलिनी को दी जा सकती। सबकुछ स्मूथली और शांतिपूर्ण ढंग से हो रहा था। पर तभी इस युद्ध ने इस विकासात्मक प्रक्रिया पर जैसे एक प्रश्नचिन्ह सा लगा दिया हो। आदमी की कुंडलिनी-ऊर्जा सुरक्षा-भावना या सरवाइवल इंस्टिंक्ट को पूरा करने के लिए फिर से नीचे उतरने लगी। आदमी फिर से आदिम युग में चला गया। वह फिर से जंगली बन गया। उसे अब पेट भरने से ही मतलब रह गया था। किस्मत वाला ही तन भी अच्छी तरह से ढक पा रहा था। वीआईपी किस्म के जंगली को ही सिर के ऊपर छत नसीब हो रही थी। आदमी की सारी ऊर्जा रोटी, कपड़ा और मकान का बंदोबस्त करने में ही खर्च हो रही थी। अध्यात्म, योग, मुक्ति जैसे शब्द बेगाने से लगने लग गए थे। आदमी की सारी ऊर्जा जीवनयापन के लिए संघर्षों से मुकाबला करने में ख़र्च हो रही थी। सम्भोग सुख को प्राप्त करने के लिए भी ऊर्जा मुश्किल से उपलब्ध होती थी, संभोग योग तो दूर की बात रही। संघर्षों के चलते मन इतना चंचल हो गया था कि गम्भीर योगसाधना का औचित्य नहीँ रह गया था। क्योंकि योगसाधना से मन स्थिर हो जाता था, पर स्थिर मन से संघर्षों से मुकाबला नहीं हो पाता था। क्योंकि मन को स्थिर और अद्वैतमयी करने के लिए अधिकांश ऊर्जा मस्तिष्क को चली जाती थी, इससे भुजाओं और टाँगों में ऊर्जा की कमी हो जाती थी, जिनसे कि दुनियादारी के अधिकांश भौतिक काम निपटाए जाते हैं। ऊर्जा की कमी को पूरा करने के लिए मांसाहार का प्रयोग बढ़ रहा था, जिससे चारों ओर पाप और जीवहिंसा का माहौल पैदा हो गया था। ऐसे युद्धों से पशुओं पर नाजायज अत्याचार बढ़ जाता है। कुछ अच्छे पारिवारिक संस्कारों वाले और अध्यात्म का ज्ञान रखने वाले तो तन्त्र के अनुसार माँस आदि पँचमकारों का सेवन करके अपना आध्यात्मिक विकास कर भी रहे थे। इससे तन्त्र विद्या का विकास भी हो रहा था। संघर्ष से लोगों का मानसिक तनाव इतना बढ़ गया था कि उसे दूर करने के लिए शराब का सहारा लिया जा रहा था। तांत्रिक किस्म के लोग तो इसके साथ योगाभ्यास करके भौतिक लाभ भी प्राप्त कर रहे थे, और आध्यात्मिक विकास भी। कुछ दुनियादारी में डूबे हुए लोग उनके योगाभ्यास की नकल करते हुए बिना ध्यान के योगासन करने लगे थे, शरीर को तोड़ने-मरोड़ने वाले भौतिक व्यायाम की तरह। उन्हें भी कुछ न कुछ लाभ तो मिल ही रहा था, और कुछ वर्षों के अभ्यास के बाद वे भी ध्यानयोगी अर्थात कुंडलिनी योगी बन पा रहे थे। आज जो चारों तरफ बैठक वाले ध्यानमयी कुंडलिनी योग का प्रचलन बढ़ रहा है, वह मानव सभ्यता के चरम के करीब पहुंचने से उपलब्ध अतिरिक्त प्राण ऊर्जा के कारण ही हो रहा है। क्योंकि ध्यान के लिए काफी प्राण ऊर्जा चाहिए होती है। प्राण ऊर्जा की कमी से तो सम्भोग योग जैसे शक्तिशाली योग से भी भरपूर फायदा नहीं उठाया जा सकता। यदि प्राणों की, आराम की, भ्रमण की, निद्रा की, हठ योगाभ्यास की, संतुलित जीवनचर्या की और पर्याप्त समय की कमी में जबरदस्ती व ज्यादा किया जाए, तो विभिन्न शारीरिक व मानसिक विकार भी पैदा हो सकते हैं, जैसे कि प्रोस्टेट ग्रंथि का बढ़ना, संक्रमण, अवसाद, तनाव, गैस्ट्रिक आदि व हो सकता है इसी तरह कुछ अन्य भी। सम्भवतः इसीलिए तन्त्र में लेउकोरहोइआ जैसे योनि-संक्रमण में यौन-योग को न करने की सलाह दी गई है। युद्ध-प्रभावित पतन के दौर में बच्चे और कुंडलिनी योगी सबसे ज्यादा दुष्प्रभावित होते हैं। जैसे बच्चों की अधिकांश ऊर्जा शारिरिक व मानसिक विकास में खर्च हो रही होती है, ऐसे ही कुंडलिनी योगी की भी। दोनों में ही गजब का रूपांतरण चल रहा होता है। इसीलिए जागृति को दूसरा जन्म भी कहते हैं, उसके बाद ही आदमी द्विज या असली ब्राह्मण बनता है। द्विज का मतलब ही दूसरे जन्म वाला होता है। कुंडलिनी को निरंतर तन-मन में बनाए रखने के लिए भी काफी प्राण ऊर्जा खर्च होती रहती है। मैं रशियन हमले से डरे हुए एक बच्चे को सैंकड़ों किलोमीटर के सफर पर पलायन करते हुए देख रहा था। उसके अभिभावक युद्ध में मारे गए थे। उसका कोई नहीं था। वह मासूम बच्चा रोए जा रहा था, और अपने साथ एक बैग जैसा घसीटते हुए बड़ी मुश्किल से चल पा रहा था। वृद्ध लोग और महिलाएं भी इसी तरह ज्यादा दुष्प्रभावित होते हैं क्योंकि वे समाज के कमजोर अंग होते हैं। इसी तरह, जानवर भी बहुत ज्यादा दुष्प्रभावित होते हैं। पर ऐसे मामलों में उनकी कम ही गिनती होती है, हालांकि वे भी एक स्वस्थ समाज का महत्त्वपूर्ण हिस्सा होते हैं।

वैसे तो कई बार ऐसे युद्ध के लिए छोटे देश भी जिम्मेदार बन जाते हैं। उदाहरण के लिए पाकिस्तान को ही देख सकते है। इसने सीमापार आतंकवाद फैला कर आज तक हजारों निर्दोष लोगों की जान ले ली है। यह सिलसिला लगभग पचास वर्षों से ज्यादा समय से चला आ रहा है, पर उसकी नीति में आज भी कोई बदलाव नहीं दिखता। भारत ने हमेशा शांति बरतते हुए बड़े युद्ध को रोका है। यूएनओ ने भी उसकी ज्यादा मदद नहीं की है, उल्टा कई बार उसे ही कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया है। कभी जब यूएनओ ने मदद करने का हल्का सा प्रयास किया होगा, तो वह पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय दुष्प्रचार के आगे फीका पड़ गया। मुझे तो समझ नहीं आता कि यूएनओ इतनी हल्की भूमिका क्यों निभाता है, ऐसे मामलों में। आज भी इसका रवैया ढीलाढाला ही लग रहा है। खैर, इसी युद्धोन्मादी जैसे काल में और उसके बाद भी कुछ अति व्यस्त लोग योग करने के लिए जरा भी समय नहीं निकाल पा रहे थे। उनमें से अच्छे संस्कारों वाले लोग काम को ही योग अर्थात पूजा की तरह अद्वैतभाव से करने की कोशिश कर रहे थे, मतलब कर्मयोग को अपना रहे थे। इसमें मदद के लिए शरीरविज्ञान दर्शन जैसे नए-नए दर्शनों की खोज हो रही थी, ताकि भौतिक उत्थान के साथ आध्यात्मिक उत्थान भी आसानी से मिलता रहता। ऐसे दर्शन लोकप्रिय हो रहे थे, क्योंकि वे नवीनता के साथ थे, जो पुराने गीता जैसे दर्शनों को नए रूप में प्रस्तुत करते थे। इससे दर्शन और साहित्य का तीव्र गति से विस्तार हो रहा था। कुछ पुराने शास्त्रों के शौकीन लोग गीता जैसे पुराने दर्शनों, शास्त्रों और पुराणों को दिनरात टटोलते रहते, ताकि कोई ज्ञान की किरण दिखाई देती। इस भीषण युद्ध के कारण विकास के चरम के करीब पहुँची हुई मानव सभ्यता उस सबसे निचले पायदान पर पहुंच गई थी, जहां से सैंकड़ों-हजारों सालों से विकास करती हुई वह वहाँ पहुँची थी। लगता है कि यह चक्र लगातार कई युगों से चला आ रहा था। चरम तक तो विरला ही पहुंचा होगा विकास, जैसे कोई विरला आदमी ही कुंडलिनी जागरण प्राप्त करता है। पर जैसे समुचित अभ्यास से सभी लोग कुंडलिनी जागरण प्राप्त कर सकते हैं, उसी तरह पूरी धरती भी सतयुग में प्रविष्ट हो सकती है। पर इसकी तरफ सावधानी से ध्यान नहीं दिया गया, और इसे हल्के में लिया गया। मुझे लगता है कि जिस समय पुराणों और आध्यात्मिक दर्शनों की रचना हुई, उस समय सतयुग था, खासकर प्राचीन भारत में। उसकी याद से ही हम संतोष प्राप्त कर सकते हैं, अब तो। युद्ध, लूटपाट और अराजकता से पैदा हुए भय, दर्द आदि से निकली चीख-पुकार के साथ कुंडलिनी विशुद्धि चक्र तक उतर गई। फिर दिल को लगने वाले भावनात्मक सदमों को संभालने के लिए अनाहत चक्र पर आ गई। कुछ ऊर्जा वहां से आत्मसुरक्षा के लिए भुजाओं को भी चली गई। ऐसी हाय-तौबा और मार-धाड़ के माहौल के कारण भूख बहुत ज्यादा बढ़ गई। शारिरिक संघर्ष भी बहुत करना पड़ा। इससे कुंडलिनी नाभि चक्र तक आ गई। गट्स नाभि में ही तो रहता है। फिर कुंडलिनी स्वाधिष्ठान चक्र पर आ गई। यह मुर्गे, बकरे आदि सैक्सुअल जीवों के रूप में दुनिया का जन्म है। वहाँ से वह मूलाधार को उतर जाती है। दुनिया कीड़ों-मकोड़ों के जैसी मूढ़ता से भर जाती है। फिर दुनिया के विकास का क्रम पुनः शुरु हो जाता है। कुंडलिनी बारी-बारी से सभी चक्रों से होते हुए ऊपर चढ़ती है। इस तरह से आदमी युद्ध आदि अमानवीय हिंसाओं पर लगाम नहीं लगा पाता, जिससे दुनिया का जन्म-मरण का चक्कर इसी तरह चलता रहता है। 

मुझे तो यूएनओ पर भी हसी आती है। किसी देश को वीटो पावर देने का मतलब है कि चाहे वह कुछ भी कर ले, उसे रोकने-टोकने वाला कोई नहीं है। तब यूएनओ का औचित्य ही क्या है। कम से कम जिस देश के खिलाफ प्रस्ताव हो, उसे तो अपने बचाव में खुद ही वीटो करने का अधिकार नहीं होना चाहिए, दूसरा कोई चाहे बेशक कर दे। यह क्या कि चोर भी मैं और सिपाही भी मैं। वैसे अगर वीटो का सदुपयोग किया जाए, तो इसके लाभ भी हैं। भारत शुरु से ही आतंकविरोधी अभियान में शामिल रहा है। या यूं कह सकते हैं कि इस अभियान की शुरुआत भारत ने ही की थी। अब तो विश्व के अधिकांश देश इस अभियान में शामिल होने लग गए हैं। उस समय भारत के इस अभियान के विरोध में दुष्प्रचार के प्रयोग से यूएनओ में  उसके खिलाफ प्रस्ताव लाए जाते थे। पर सिर्फ एक-आध देश ही वीटो पावर का इस्तेमाल करके उन प्रस्तावों को गिरा दिया करते थे। कई बार उल्टा भी होता है, जब गलत काम करने वाले देश को एक वीटो पावर वाला देश इसलिए बचाता है, क्योंकि उसका उससे स्वार्थपूर्ण सम्बंध होता है। इसलिए मुझे तो लगता है कि सभा-निर्णय का वही पुराने जमाने से चला आ रहा तरीका ठीक है, जिसमें बहुमत देखा जाता है, जिस तरफ ज्यादा मत पड़ते हैं, उसी फैंसले को मान्य माना जाता है। मुझे लगता है कि सभा में बहुमत से किया गया निर्णय एकप्रकार से भगवान के निर्णय जैसा होता है। उसे भगवान भी देखता है, क्योंकि सबसे बड़ा सभापति भगवान ही है। इसीलिए शास्त्रों में अधिकांश स्थानों पर भगवान को सभापति की तरह दर्शाया गया है। एक बात और गौर करने लायक है। एक ताकतवर बच्चा एक कमजोर बच्चे को यह बोलते हुए पीट रहा है कि वह अपने बचाव के लिए किसी दूसरे ताकतवर लड़के के पास न जाए। इससे तो वह ज्यादा जाएगा। हाँ, अगर उससे प्यार का बर्ताव किया जाएगा, तो वह नहीं जाएगा। शुरु से यही होता आया है कि लड़ती आपस में दो महाशक्तियां हैं, औऱ खंडहर बनता है वह छोटा देश जिसके लिए वो लड़ रही होती हैं। लड़े सांड़, और झाड़ का होए नाश। फिर ज्यादातर मामलों में वे महाशक्तियां उस छोटे देश के पुनर्निर्माण में सहयोग नहीं करतीं। पुनर्निर्माण के काम की कोशिश अधिकांशतः भारत जैसे कुछ विकासशील देश ही करते हैं, क्योंकि वे मानवता देखते है, धर्म, जाति, वर्ग आदि नहीं। फिर कहते हैं कि विकासशील देश विकसित नहीं होते। विकसित कैसे होंगे जब बड़े देश दुनिया को लड़ाइयों में ही उलझाते रहेंगे। अफगानिस्तान, सीरिया और इराक का उदाहरण सबके सामने है। मैंने इन्हीं प्रकार की अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का वर्णन किसी दैवीय प्रेरणा से पुस्तक शरीरविज्ञान दर्शन में किया था। हालाँकि ये सबकुछ मैंने स्वास्थ्य विज्ञान के अनुसार शरीर में होता हुआ दिखाया था। वहाँ तो मैंने यहाँ तक लिखा था कि परमाणु युद्ध से पूरा देहदेश बर्बाद हो जाता है, अर्थात मर जाता है, जिसका पुनर्निर्माण के रूप में पुनर्जन्म होता है। यह विध्वंस तो शरीर के अंदर के सूक्ष्म देश का वर्णन था, भगवान करे कि बाहर के स्थूल देश में ऐसा कभी कुछ घटित न हो। 

कुंडलिनी ही दृश्यात्मक सृष्टि, सहस्रार में एनर्जी कँटीन्यूवम ही ईश्वर, और मूलाधार में सुषुप्त कुंडलिनी ही डार्क एनर्जी के रूप में हैं

विश्व की उत्पत्ति प्राण-मनस अर्थात टाइम-स्पेस के मिश्रण से होती है

फिर हठ प्रदीपिका के पूर्वोक्त व्याख्याकार कहते हैं कि सृष्टि की उत्पत्ति मनस शक्ति और प्राण शक्ति के मिश्रण से हुई। यह मुझे कुछ दार्शनिक जुगाली भी लगती है। भौतिक रूप में भी शायद यही हो, पर आध्यात्मिक रूप में तो ऐसा ही होता है। जब मस्तिष्क में प्राण शक्ति पहुंचती है, तब उसमें मनस शक्ति खुद ही मिश्रित हो जाती है, जिससे हमें जगत का अनुभव होता है। “यतपिण्डे तत्ब्रह्मांडे” के अनुसार बाहर भी तो यही हो रहा है। शून्य अंतरिक्ष के अंधेरे में सोई हुई शक्ति में किसी अज्ञात कारण से हलचल होती है। उसमें खुद ही मनस शक्ति मिश्रित हो जाती है, क्योंकि चेतनामयी ईश्वरीय मनस शक्ति हर जगह विद्यमान है। इससे मूलभूत कणों का निर्माण होता है। सम्भवतः ये मूल कण ही प्रजापति हैं, जो आगे से आगे बढ़ते हुए पूरी सृष्टि का निर्माण कर देते हैं। यह ऐसे ही है, जैसे मूलाधार के अंधेरे में सोई प्राण ऊर्जा के जागने से होता है। तभी कहते हैं कि यह सृष्टि मैथुनी है। फिर मनस शक्ति को देश या स्पेस और प्राण शक्ति को काल या टाइम बताते हैं। फिर कहते हैं कि टाइम और स्पेस के आपस में मिलने से मूल कणों की उत्पत्ति हो रही है, जैसा वैज्ञानिक भी कुछ हद तक मानते हैं।

डार्क एनर्जी ही सुषुप्त ऊर्जा है

दोस्तो, खाली स्पेस भी खाली नहीं होता, पर रहस्यमयी डार्क एनर्जी से भरा होता है। पर इसे किसी भी यन्त्र से नहीं पकड़ा जा सकता। यही सबसे बड़ी एनर्जी है। हम केवल इसे अपने अंदर महसूस ही कर सकते हैं। ब्रह्मांड इसमें बुलबुलों की तरह बनते और मिटते रहते हैं। सम्भवतः यही तो ईश्वर है। यह शून्य हमें इसलिए लगता है, क्योंकि हमें अनुभव नहीं होता। इसी तरह मूलाधार में सोई हुई ऊर्जा भी डार्क एनर्जी ही है। हम इसे अपनी शून्य आत्मा के रूप में महसूस करते हैं। हम हर समय अनन्त ऊर्जा से भरे हुए हैं, पर भ्रम से उसका प्रकाश महसूस नहीं कर पाते। उसे मूलाधार में इसलिए मानते हैं, क्योंकि मूलाधार मस्तिष्क से सबसे ज्यादा दूर है। मस्तिष्क के सहस्रार क्षेत्र में अगर चेतनता का महान प्रकाश रहता है, तो मूलाधार में अचेतनता का घुप्प अंधेरा ही माना जाएगा। मस्तिष्क से नीचे जाते समय चेतना का स्तर गिरता जाता है, जो मूलाधार पर न्यूनतम हो जाता है। यदि ऐसे समय कुंडलिनी का ध्यान करने की कोशिश की जाए, जब मस्तिष्क थका हो या तमोगुण रूपी अंधेरे से भरा हो, तो कुंडलिनी चित्र नीचे के चक्रों में बनता है। मुझे जो दस सेकंड का क्षणिक आत्मज्ञान का अनुभव हुआ था, उसमें रहस्यात्मक कुछ भी नहीं है। यह शुद्ध वैज्ञानिक ही है। संस्कृत की भाषा शैली ही ऐसी है कि उसमें सबकुछ आध्यात्मिक ही लगता है। उसे विज्ञान की भाषा मेंआप “एक्सपेरिएंस ऑफ डार्क एनेर्जी” या “अदृश्य ऊर्जा दर्शन” कह सकते हैं। इसी तरह सुषुम्ना में ऊपर चढ़ने वाली ऊर्जा भी डार्क एनेर्जी की तरह ही होती है। इसीलिए उसे केवल बहुत कम लोग ही और बहुत कम मौकों पर ही अनुभव कर पाते हैं, सब नहीं। हालाँकि यह पूरी तरह से डार्क एनेर्जी तो नहीं है, क्योंकि यह सूक्ष्म तरंगों या सूक्ष्म अणुओं की क्रियाशीलता से बनी होती है। असली डार्क एनेर्जी में तो शून्य के इलावा कुछ नहीं होता, फिर भी उसमें अनगिनत ब्रह्मांडों का प्रकाश समाया होता है। एक पुरानी पोस्ट में मैंने लिखा था कि एकबार कैसे मैंने अपनी दादी अम्मा की परलोकगत आत्मा या डार्क एनेर्जी को ड्रीम विजिटेशन में महसूस किया था। ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई चमकीले कज्जल से भरा आसमान हो, जिसका प्रकाश किसीने बलपूर्वक ढका हो, और वह प्रकाश सभी पर्दे-दीवारें तोड़कर बाहर उमड़ना चाह रहा हो, यानि कि अभिव्यक्त होना चाह रहा हो।

यिन-यांग या प्रकृति-पुरुष से सृष्टि की उत्पत्ति

डार्क एनेर्जी में ही सृष्टि के प्रारंभ में सबसे छोटा औऱ सबसे कम देर टिकने वाला कण बना होगा। इसे ही काल या टाइम या विपरीत ध्रुव की उत्पत्ति कह सकते हैं। स्पेस या डार्क एनर्जी दूसरा ध्रुव है, जो पहले से था। टाइम के रूप में निर्मित वह सूक्ष्मतम कण एक महान विस्फोट के साथ स्पेस की तरफ तेजी से आगे बढ़ने लगता है। यही सृष्टि का प्रारंभ करने वाला बिग बैंग या महा विस्फोट है। वह कण तो एक सेकंड के करोड़वें भाग में विस्फोट से नष्ट हो गया, पर उस विस्फोट से पैदा होकर आगे बढ़ने वाली लहर में विभिन्न प्रकार के कण और उनसे विभिन्न पदार्थ बनते गए। आगे चलकर उन कणों की व उनसे बनने वाले पदार्थों की जीवन अवधि में इजाफा होता गया। वैसे भी कहते हैं कि दो विपरीत ध्रुवों के बनने से ही सृष्टि की उत्पत्ति हुई। इन्हें यिन-यांग कह सकते हैं। यही प्रकृति-पुरुष है। शरीर में भी ऐसा ही है। मूलाधार में डार्क एनेर्जी है, जो कुंडलिनी योग से जागृत हुई। जागृत होने का मतलब है कि कुंडलिनी योग के सिद्धासन में वह मूलाधार चक्र पर पैर की एड़ी के दबाव से बनी संवेदना के रूप में अनुभव की गई। इस संवेदना में ध्यान चित्र मिश्रित होने से यह कुंडलिनी बन गई। इस संवेदना की उत्पत्ति को हम समष्टि के सबसे छोटे मूल कण की उत्पत्ति का शारीरिक रूप भी कह सकते हैं। वह कुंडलिनी एनेर्जी जागृत होने के लिए सहस्रार की तरफ जाने का प्रयास करते हुए मस्तिष्क में रंगबिरंगी सृष्टि की रचना बढ़ाने लगी। मतलब कि दो विपरीत ध्रुव आपस में मिलने का प्रयास करने लगे। शक्ति शिव से जुड़ने के लिए बेताब होने लगी। समष्टि में वह मूल कण बिग बैंग के रूप में आगे बढ़ने लगा और उस डार्क एनेर्जी के छोर को छूने का प्रयास करने लगा, जहाँ से वह आया था। वह मूलकण नौटंकी करते हुए यह समझने लगा कि वह अधूरा है, और उसने डार्क एनेर्जी को प्राप्त करने के लिए आगे ही आगे बढ़ते जाना है। ऐसा करते हुए उससे सृष्टि की रचना खुद ही आगे बढ़ने लगी। यह ऐसे ही होता है जैसे आदमी का मन या कुंडलिनी उस अदृश्य अंतरिक्षीय ऊर्जा को प्राप्त करने की दौड़ में भरे-पूरे जगत का निर्माण कर लेता है। कुंडलिनी भी तो समग्र मन का सम्पूर्ण प्रतिनिधि ही है। मन कहो या कुंडलिनी कहो, बात एक ही है। बिग बैंग की तरंगों के साथ जो सृष्टि की लहर आगे बढ़ रही है, उसे हम सुषुम्ना नाड़ी में एनर्जी का प्रवाह भी कह सकते हैं। पर उस डार्क एनेर्जी का अंत तो उसे मिलेगा नहीं। इसका मतलब है कि यह सृष्टि अनन्त काल तक फैलती ही रहेगी। पर इसे अब हम शरीर से समझते हैं, क्योंकि लगता है कि विज्ञान इसका जवाब नहीं ढूंढ पाएगा। जब आदमी इस दुनिया में अपनी सभी जिम्मेदारियों को निभाकर अपनी कुंडलिनी को जागृत कर लेता है, तब वह दुनिया से थोड़ा उपरत सा हो जाता है। कुछ समय शांत रहकर वह दुनिया से बिल्कुल लगाव नहीं रखता। वह जैसा है, उसी में खुश रहकर अपनी दुनियादारी को आगे नहीं बढ़ाता। फिर बुढ़ापे आदि से उसका शरीर भी मृत्यु को प्राप्त होकर नष्ट हो जाता है। इसी तरह जब इस सृष्टि का लक्ष्य पूरा हो जाएगा, तब उसके आगे फैलने की रप्तार मन्द पड़ जाएगी। फिर रुक जाएगी। अंत में सृष्टि की सभी चीजें एकसाथ अपनी-अपनी जगह पर विघटित हो जाएंगी। इसका मतलब है कि बिग बैंग रिवर्स होकर पुनः बिंदु में नहीं समाएगा। सृष्टि का लक्ष्य समय के रूप में निर्धारित होता होगा। निश्चित समय के बाद वह नष्ट हो जाती होगी, जिसे महाप्रलय कहते हैं। क्योंकि सृष्टि के पदार्थों ने आदमी की तरह असली जागृति तो प्राप्त नहीं करनी है, क्योंकि वे तो पहले से ही जागृत हैं। वे तो केवल सुषुप्ति का नाटक सा ही करते हैं। यह भी हो सकता है कि सृष्टि की आयु का निर्धारण समय से न होकर ग्रह-नक्षत्रों की संख्या और गुणवत्ता से होता हो। जब निश्चित संख्या में ग्रह आदि निर्मित हो जाएंगे, और उनमें अधिकांश मनुष्य आदि जीव अपनी इच्छाएं पूरी कर लेंगे, तभी सृष्टि की आयु पूरी होगी। ऐसा भी हो सकता है कि सृष्टि विघटित होने के लिए वापिस आए, बिग बैंग के शुरुआती बिंदु पर। क्योंकि आदमी का शरीर भी मरने से पहले बहुत कमजोर और दुबला-पतला हो लेता है। विज्ञान के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत से भी ऐसा ही लगता है। जब बिग बैंग के धमाके की ऊर्जा खत्म हो जाएगी, तो गुरुत्वाकर्षण का बल हावी हो जाएगा, जिससे सृष्टि सिकुड़ने लगेगी औऱ सबसे छोटे मूल बिंदु में समाकर फिर से डार्क एनेर्जी में विलीन हो जाएगी। यह संभावना कुंडलिनी योग की दृष्टि से भी सबसे अधिक लगती है। मानसिक सृष्टि का प्रतिनिधित्व करने वाली कुंडलिनी ऊर्जा भी सहस्रार से वापिस मुड़ती है, और फ्रंट चैनल से नीचे उतरती हुई फिर से मूलाधार में पहुंच जाती है। वहाँ से फिर बैक चैनल से ऊपर चढ़ती है। इस तरह से हमारे शरीर में सृष्टि और प्रलय का क्रम लगातार चलता रहता है।

सांख्य दर्शन और वेदांत दर्शन में सृष्टि-प्रलय

सांख्य दर्शन में पुरुष और प्रकृति, दोनों को शाश्वत कहा गया है। पर वेदांत दर्शन में प्रकृति की उत्पत्ति पुरुष से बताई गई है, जैसा मैं भी कह रहा हूँ। यहां पुरुष मूल रूप में प्रकाशमान डार्क एनेर्जी है, और प्रकृति प्रकाश से रहित डार्क एनेर्जी है। मुझे लगता है कि सांख्य में शरीर के अंदर की सृष्टि और प्रलय का वर्णन हो रहा है। हमें अपने मन में ही डार्क एनेर्जी का अंधेरा हमेशा महसूस होता है, यहाँ तक कि कुंडलिनी जागरण के बाद भी। इसीलिए इसे भी शाश्वत कहा गया है। दूसरी ओर वेदांत में बाहर के संसार की सृष्टि और प्रलय की बात हो रही है। वहां तो प्रकृति या डार्क एनेर्जी और उससे पैदा होने वाले कणों का अस्तित्व ही नहीं है। ये तो केवल हमें अपने मन में महसूस होते हैं। वहाँ अगर इनकी उत्पत्ति होती है, तो सिर्फ नाटकीय या आभासिक ही। वहाँ तो सिर्फ प्रकाश से भरा हुआ एनेर्जी कँटीन्यूवम ही है। वैसे तो वेदांत भी मानसिक सृष्टि का ही वर्णन करता है, क्योंकि वे भी किसी भौतिक प्रयोगशाला का उपयोग नहीं करते, जो बाहर के जगत की उत्पत्ति को सिद्ध कर सके। पर वह उन महान योगियों के अनुभव को प्रमाण मानता है, जो हमेशा एनेर्जी कँटीन्यूवम से जुड़े रहते हैं।

कुंडलिनी जागरण के लिए ही सृष्टिरचना होती है; हिंदु पुराणों में शिशु विकास को ही ब्रह्माण्ड विकास के रूप में दिखाया गया है

मित्रो, पुराणों में सृष्टि रचना विशेष ढंग से बताई गई है। कहीं आकाश के जल में अंडे का फूटना, कहीं पर आधाररहित जलराशि में कमल का प्रकट होना और उस पर एक देवता का अकस्मात प्रकट होना आदि। कहीं आता है कि सीधे ही प्रकृति से महत्तत्व, उससे अहंकार, उससे तन्मात्रा, उससे इंद्रियां और उससे सारी स्थूल सृष्टि पैदा हुई। जब मैं छोटा था, तब अपने दादाजी (जो एक प्रसिद्ध हिंदू पुरोहित और एक घरेलू पुराण वक्ता थे) से पूछा करता था कि अचानक खुले आसमान में बिना आधारभूत संरचना के ये सारी चीजें कैसे प्रकट हो गईं। वे परंपरावादी और रहस्यवादी दार्शनिक के अंदाज में कहते थे, “ऐसे ही होता है। हो गया तो हो गया।” वे ज्यादा बारीकी में नहीं जाते थे। पर अब कुंडलिनी योग की मदद से मैं इस शास्त्रीय उक्ति को ही सभी रहस्यों का मूल समझ रहा हूँ, “यत्पिण्डे तत्ब्रम्हांडे”। इसका मतलब है कि जो कुछ इस शरीर में है, वही सब कुछ ब्रम्हांड में भी है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। इस उक्ति को पुस्तक”शरीरविज्ञान दर्शन” में वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया गया है। इसलिए प्राचीन दूरदर्शी ऋषियों ने शरीर का वर्णन करके ब्रम्हांड को समझाया है। वे गजब के शरीर वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक थे। दरअसल, एक आदमी कभी भी अपने मन या मस्तिष्क के अलावा कुछ नहीं जान सकता है, क्योंकि वह जो कुछ भी वर्णन करता है, वह उसके मस्तिष्क के अंदर है, बाहर नहीं।

सृष्टि रचना पुराणों में शरीर रचना से समझाई गई है

 कई जगह आता है कि शेषशायी विष्णु की नाभि से कमल पैदा हुआ जिस पर ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। उसी के मन ने सृष्टि को रचा। माँ को आप विष्णु मान सकते हो। उसका शरीर एक शेषनाग की तरह ही केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के रूप में है, जो मेरुदंड में स्थित है। वह नाग हमेशा ही सेरेब्रोस्पाइनल फ्लुइड रूपक समुद्र में डूबा रहता है। उस नाग में जो कुंडलिनी या माँ के मन की संवेदनाएं चलती हैं, वे ही भगवान विष्णु का स्वरूप है, क्योंकि शक्ति और शक्तिमान भगवान में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं। गर्भावस्था के दौरान जो नाभि क्षेत्र में माँ का पेट बाहर को उभरा होता है, वही भगवान विष्णु की नाभि से कमल का प्रकट होना है। विकसित गर्भाशय को भी माँ के शरीर की नसें-नाड़ियाँ माँ के नाभि क्षेत्र के आसपास से ही प्रविष्ट होती हैं। खिले हुए कमल की पंखुड़ियों की तरह ही गर्भाशय में प्लेसेंटोमस और कोटीलीडनस उन नसों के रूप में स्थित कमल की डंडी से जुड़े होते हैं। वे संरचनाएं फिर इसी तरह शिशु की नाभि से कमल की डंडी जैसी नेवल कोर्ड से जुड़ी होती हैं। ये संरचनाएं शिशु को पोषण उपलब्ध कराती हैं। यह शिशु ही ब्रह्मा है, जो उस खिले कमल पर विकसित होता है। शिशु का साम्यगुण रूप ही वह मूल प्रकृति है, जिसमें गुणों का क्षोभ नहीं है। पहले मैं समझा करता था कि साम्यावस्था का मतलब है कि सभी गुण (प्रकृति का आधारभूत घटक) एक-दूसरे के बराबर हैं। आज भी बहुत से लोग ऐसा समझते हैं। पर ऐसा नहीं है।अगर ऐसा होता तो मूल रूप में सभी जीव एक जैसे होते, पर वे प्रलय या मृत्यु के बाद भी अपनी अलग पहचान बना कर रखते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आत्मा के प्रकाश को ढकने वाले तमोगुण की मात्रा सबमें अलग होती है। इससे अन्य गुणों की मात्रा भी खुद ही अलग होती है। यदि तमोगुण ज्यादा है, तो उसी अनुपात में सतोगुण कम हो जाता है, क्योंकि ये एक-दूसरे के विरोधी हैं। दरअसल उसमें सभी गुण साम्यावस्था में अर्थात समान अवस्था में होते हैं। सभी गुणों का समान अवस्था में होने का या उनमें क्षोभ या लहरों के न होने का मतलब है कि सत्त्वगुण (प्रकाश व ज्ञान का प्रतीक) भी घटने-बढ़ने के बजाय एकसमान रहता है, रजोगुण (गति, बदलाव व ऊर्जा का प्रतीक) भी एकसमान रहता है, और तमोगुण (अंधकार व अज्ञान का प्रतीक) भी। इससे वह किसी विशेष गुण की तरफ लालायित नहीं होता। इसीलिए शिशु सबकुछ अनुभव करते हुए भी उदासीन सा रहता है। वह निर्गुण नहीं होता। क्योंकि गुणों में क्षोभ तभी पैदा हो सकता है, यदि गुण पहले से विद्यमान हों। निर्गुण या गुणातीत तो केवल भगवान ही होता है। इसलिए उसमें कभी गुण-क्षोभ सम्भव नहीं हो सकता है। इसीलिए ईश्वर हमेशा ही परिवर्तनरहित हैं। ईश्वर निर्गुण इसीलिए होता है, क्योंकि उसमें आत्म-अज्ञान से उत्पन्न तमोगुण नहीं होता। सभी गुण तमोगुण के आश्रित होते हैं। इसी वजह से तो पंचमकारी या वामपंथी तांत्रिक दुनियादारी और अध्यात्म दोनों में अव्वल लगते हैं। फिर शिशु के थोड़ा बड़ा होने पर चित्त या मस्तिष्क में वृत्तियों या संवेदनाओं के बढ़ने से गुणों में, विशेषकर सतोगुण में क्षोभ पैदा होता है, और वह प्रकाश की ओर आकर्षित होने लगता है। इससे सतोगुण रूप महत्तत्व अर्थात बुद्धि उत्पन्न होती है। उसे लगने लगता है कि उसकी सत्ता के लिए उसका रोना और दूध पीना कितना जरूरी है। उससे शिशु को अपने विशेष और सबसे अलग होने का अहसास होता है, जिसे अहंकार कहते हैं। इसप्रकार अहंकार की उत्पत्ति हो जाती है। उससे तन्मात्राओं की उत्पत्ति होती है। तन्मात्रा पंचमहाभूतों का सूक्ष्म रूप या अनुभव मात्र होती हैं, जिन्हें हम मस्तिष्क में अनुभव करते हैं। जैसे पृथ्वी की तन्मात्रा गंध, जल की रस, वायु की स्पर्श, अग्नि की रूप और आकाश की शब्द होती है। वह दूध के रस के स्वाद को पहचानने लगता है, खिलौने की गंध को पहचानता है, अपने किए मूत्र की गर्मी को स्पर्ष करता है, सुंदर-असुंदर रूप में अंतर समझने लगता है, घुंघरू या खिलौने की आवाज की ओर आकर्षित होता है। फिर शिशु बाहर की तरफ नजर दौड़ाता है कि ये अनुभूतियाँ कहाँ से आईं। उससे इन्द्रियों की उत्पत्ति होती है, क्योंकि वह चक्षु, कान, त्वचा, जीभ, नाक आदि इन्द्रियों की सहायता से ही बाहर को महसूस करता है। इसीके साथ मन रूप इन्द्रिय भी विकसित होती है, क्योंकि वह इसी से ऐसा सब सोचता है। इन्द्रियों से उपरोक्त पंचमहाभूतों की उत्पत्ति होती है, क्योंकि वह इन्द्रियों से ही उनको खोजता है और उन्हें अनुभव करता है। उसे पता चलता है कि दूध, खिलौना, घुंघरू आदि भौतिक पदार्थ भी दुनिया में हैं, जिन्हें वह इन्द्रियों से महसूस करता है। फिर आगे-2 जैसा-2 बच्चा सीखता रहता है, वैसी-2 सृष्टिरचना की उत्पत्ति आगे बढ़ती रहती है। इस तरह से एक आदमी के अंदर ही पूरी सृष्टि का विस्तार हो जाता है। 

कुण्डलिनी जागरण ही सृष्टि विकास की सीमा है

सृष्टि रचना का विस्तार आदमी कुंडलिनी जागरण के लिए ही करता है। यह तथ्य इस बात से सिद्ध होता है कि कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी सृष्टि विस्तार से उपरत सा हो जाता है। उसका झुकाव प्रवृत्ति (दुनियादारी) से हटकर निवृत्ति (रिटायरमेंट) की तरफ बढ़ने लगता है। उसकी प्रवृत्ति भी निवृत्ति ही बन जाती है, क्योंकि फिर उसमें आसक्ति से उत्पन्न क्रेविंग या छटपटाहट नहीँ रहती। पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि यह स्थिति मन की होती है, बाहर से वह पूरी तरह से दुनियादारी के कामों में उलझा हो सकता है। कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी को लगता है कि उसने पाने योग्य सब कुछ पा लिया है, और करने योग्य सबकुछ कर लिया है। 

शिव पुराण के अनुसार सृष्टि रचना शिव के वीर्य से हुई

शिवपुराण में आता है कि प्रकृति रूपी योनि में शिव के वीर्यस्थापन से एक अंडे की उत्पत्ति हुई। वह अंडा 1000 सालों तक जल में पड़ा रहा। फिर वह बीच में से फटा। उसका ऊपर का भाग सृष्टि का कपोल बना। उससे ऊपर के श्रेष्ठ लोक बने। नीचे वाले भाग से निम्न लोक बने। 
दरअसल शिव यहाँ पिता है, और प्रकृति या पार्वती माता है। दोनों के वीर्य और रज के मिलन से गर्भाशय में अंडा बना। वह गर्भाशय के पोषक जल में लंबे समय तक पड़ा रहा और विकसित होता रहा। फिर वह फटा, अर्थात मनुष्याकृति में उससे अंगों का विभाजन होने लगा। उसमें ऊपर वाला भाग सिर या कपोल की तरह स्पष्ट नजर आया। उसमें सहस्रार चक्र, आज्ञा चक्र और विशुद्धि चक्र के रूप में ऊपर वाले लोक बने। नीचे के भाग में अन्य चक्रों के रूप में नीचे वाले लोक बने।