Importance of Body Chakras in Kundalini Yoga – A Scientific Discussion / कुण्डलिनीयोग में शारीरिक चक्रों का महत्त्व- एक वैज्ञानिक विवेचना

Importance of Body Chakras in Kundalini Yoga – A Scientific Discussion

Giving the importance of equality to all the chakras in the Kundalini Yoga during everyday life, Kundalini visualization / visualization is done on all the chakras turn by turn. Its advantage is that in some parts of the body the Kundalini comes into the grip. In fact, the Kundalini is associated with the chakras / parts of the body. When the activity of a chakra increases, then the blissful expression of the Kundalini, which is being visualized there upon, also increases. The activity of the body depends solely on physical blood circulation. When blood circulation increases on a chakra, then the activity of that chakra also increases. The total blood circulation of the body remains the same, only in different parts it keeps on changing only. If blood circulation increases on one chakra, then it is naturally decreased on any other chakra. By brain work, blood circulation increases in the brain, so during that time the Kundalini-visualization in the brain-chakra / Agya chakra is very simple and successful. Speech, writing, reading, colloquial etc. increases the circulation in the throat, thereby making the Kundalini’s visualization simple and effective on there / in the throat chakra / Vishuddhi chakra. When the feeling of emotions in mind increases the blood circulation in the heart, then due to visualization in the heart centre / heart chakra / Anahata Chakra, the Kundalini becomes more ignited. When the digestive tract is powerful, then there is increased blood circulation in the abdomen / naval area. Therefore visualization in naval chakra / Manipura Chakra at that time is of greater benefit. The effectiveness of sexually energizing sexual activity, the proper health of the waste-emitting organs and other physical (especially hands and feet related) actions increases the blood circulation on the sexual chakras / swadhishthana and muladhara chakra, therefore there is more activity in the Kundalini. That is why at that time those two chakras seem to get more attention.

In the household life, especially in duality and ignorance, all chakras cannot be functioning simultaneously and in common, because sometimes the tasks related to a particular area have to be emphasized, then sometimes tasks related to any other area. Therefore, in a single sitting of Kundalini Yoga, visualization of Kundalini is done on all the chakras turn by turn. Then the influential chakra itself comes under the purview of visualization, which has a greater sense of visualization-benefit. By this, visualization-gains gradually become accumulated in Kundalini Jagran / awakening. On the contrary, there is no cosmic responsibility for the ascetic-yogi or devoted yogi, so that he can easily keep stirring the activity for a long time on a particular chakra. Therefore, it is said that visualization should be done on the same chakra for a long time and then should move towards the next chakra, it has been said only for such a dedicated yogi. He is saved by a slight loss of visualization caused by chakra-change, nothing special. By continuously meditating on the same chakra, it can increase blood circulation to that chakra for a long time, because visualization on any part of the body increases blood pressures there itself. This is also the principle of spiritual healing. When someone entangled in the worldly life, by leaving his chakra, which is actively working with its naturalness, takes a forceful attention on any other chakra, then according to that need, the blood of the functioning chakra runs towards that chaotic chakra. From that necessity, the natural function of the functioning chakra will be affected by it less or more. Therefore, in the Yogasadhana / meditation-sitting under such busy worldly circumstances, the dhyana / attention should be applied on the same chakra which is easily or spontaneously meditative. Do not be forced to coax with other dormant chakras. By the way, by keeping the attention of all the chakras in the same way, all parts of the body are equally healthy; Life becomes balanced and moves forward in every field. By focusing continuously on a particular chakra, specializations can be gained quickly in the related areas of that chakra, although life can become unbalanced, and the health of the areas related to other body chakras can be questioned.

This type of perfect physical and mental balance becomes available from the advaita / non duality of Puranas / Aryan personified natural stories and through the Advaita obtained from the physiology / body science philosophy. This is because, because of non duality all things look alike, and there is no special attachment to a particular area. From this, the person meditates on all parts of his individual body as well as on the universal body, because the worldly creation (related to the world) and the individual creation (body-related) are both interconnected according to “yatpinde tatbramhaande”. The control over one is reflected itself as the control over the second one too in the same manner and same extent. From this non duality practice also, kundalini develops itself gradually and with less special efforts.

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कुण्डलिनीयोग में शारीरिक चक्रों का महत्त्व- एक वैज्ञानिक विवेचना

प्रतिदिन के लौकिक जीवन के दौरान जो कुण्डलिनीयोग किया जाता है, उसमें सभी चक्रों को बराबरी का महत्त्व देते हुए सभी चक्रों पर बारी-२ से कुण्डलिनी का ध्यान किया जाता है। इसका यह फ़ायदा होता है कि शरीर के किसी न किसी भाग में कुण्डलिनी पकड़ में आ ही जाती है। वास्तव में कुण्डलिनी शरीर के चक्रों / भागों से जुड़ी होती है। जब किसी चक्र की क्रियाशीलता बढ़ती है, तब उस पर ध्यायित की जाने वाली कुण्डलिनी की आनंदमयी अभिव्यक्ति भी बढ़ जाती है। शरीर की क्रियाशीलता शारीरिक रक्तसंचार पर ही तो निर्भर करती है। जब किसी चक्र पर रक्तसंचार बढ़ जाता है, तब उस चक्र की क्रियाशीलता भी बढ़ जाती है। शरीर का कुल रक्तसंचार तो एकसमान ही रहता है, केवल विभिन्न भागों में उसकी मात्रा घटती-बढ़ती रहती है। यदि एक चक्र पर रक्तसंचार बढ़ता है, तो किसी दूसरे चक्र पर स्वाभाविक रूप से घट जाता है। दिमागी कार्य से दिमाग में रक्तसंचार बढ़ जाता है, अतः उसके दौरान मस्तिष्क-चक्र / आज्ञा चक्र में कुण्डलिनी-ध्यान अधिक सरल व सफल होता है। भाषण, लेखन, पठन, बोलचाल आदि से गले में रक्तसंचार बढ़ जाता है, जिससे वहां / ग्रीवाचक्र / विशुद्धिचक्र पर कुण्डलिनी का ध्यान सरल व प्रभावशाली हो जाता है। मन में भावनाओं के उमड़ने के समय ह्रदय में रक्तसंचार बढ़ जाता है, जिससे उस समय हृदयक्षेत्र / हृदयचक्र / अनाहत चक्र में ध्यान करने से कुण्डलिनी अधिक प्रज्वलित हो जाती है। जब पाचनक्रिया शक्तिशाली होती है, तब उदरक्षेत्र / नाभिक्षेत्र में रक्तसंचार बढ़ा हुआ होता है। इसलिए उस समय नाभिचक्र / मणिपुरचक्र में ध्यान करने से अधिक लाभ होता है। यौनशक्तिवर्धक यौनक्रियाशीलता से, अपशिष्ट-उत्सर्जक अंगों के उत्तम स्वास्थ्य से व अन्य शारीरिक (विशेषतः हस्तपादाश्रित) कर्मों से यौनचक्र / स्वाधिष्ठानचक्र व मूलाधार चक्र पर रक्तसंचार बढ़ा हुआ होता है, अतः वहां पर कुण्डलिनी अधिक क्रियाशील होती है। इसलिए उस समय उन दोनों चक्रों पर अधिक अच्छी तरह से ध्यान लगता है।

गृहस्थजीवन में, विशेषतः द्वैत व अज्ञान से भरे गृहस्थजीवन में सभी चक्र एकसाथ व एकसमान रूप से क्रियाशील नहीं रह सकते, क्योंकि कभी किसी क्षेत्र से सम्बंधित कार्यों पर अधिक जोर देना पड़ता है, तो कभी किसी अन्य क्षेत्र से सम्बंधित कार्यों पर। इसलिए कुण्डलिनीयोग की एक अकेली बैठक में सभी चक्रों पर बारी-२ से कुण्डलिनी का ध्यान किया जाता है। उससे प्रभावशाली चक्र स्वयं ही ध्यान के दायरे में आ जाता है, जिससे ध्यान-लाभ की अधिक अनुभूति होती है। इससे ध्यान-लाभ धीरे-२ इकट्ठा होता हुआ कुण्डलिनीजागरण में परिणत हो जाता है। इसके विपरीत संन्यासी-योगी या समर्पित योगी के लिए कोई लौकिक उत्तरदायित्व नहीं होता, जिससे वह एक विशेष चक्र पर लम्बे समय तक क्रियाशीलता को आसानी से बना कर रख सकता है। इसलिए जो यह कहा गया है कि एक ही चक्र पर लम्बे समय तक ध्यान करके उसे जगा देना चाहिए और फिर अगले चक्र की ओर रुख करना चाहिए, वह ऐसे ही समर्पित योगी के लिए ही कहा गया है। वह चक्र-बदलाव से उत्पन्न थोड़ी सी ध्यान-हानि से बच जाता है, अन्य विशेष कुछ नहीं। वह एक ही चक्र पर निरंतर ध्यान लगा कर वहां पर रक्तसंचार को लम्बे समय तक बढ़ा कर रख सकता है, क्योंकि शरीर के किसी भाग पर ध्यान लगाने से वहां पर रक्तसंचार स्वयं ही बढ़ जाता है। यही स्पिरिचुअल हीलिंग / आध्यात्मिक उपचार का सिद्धांत भी है। जब सांसारिकता में उलझा हुआ कोई व्यक्ति स्वाभाविकता से क्रियाशील अपने चक्र को छोड़कर किसी अन्य चक्र पर जोर-जबरदस्ती से ध्यान लगाता है, तब उस आवश्यकतानुसार क्रियाशील चक्र का रक्त उस ध्यायित किए जा रहे चक्र की ओर दौड़ पड़ता है। उससे उस आवश्यकतानुसार क्रियाशील चक्र के स्वाभाविक कार्य तो कम या अधिक रूप से दुष्प्रभावित होंगे ही। इसलिए वैसी व्यस्ततापूर्ण सांसारिक परिस्थितियों के अंतर्गत की जाने वाली योगसाधना-बैठक में जिस चक्र पर ध्यान आसानी से या स्वयं ही लग रहा हो, वहीँ पर लगने देना चाहिए। अन्य सुप्त चक्रों के साथ अधिक जोर-जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। वैसे तो सभी चक्रों पर समान रूप से ध्यान देने से ही शरीर के सभी अंग समान रूप से स्वस्थ रहते हैं; जीवन संतुलित बनता है और हरेक क्षेत्र में आगे बढ़ता है। एक विशेष चक्र पर ही निरंतर ध्यान देने से उस चक्र से सम्बंधित क्षेत्रों में शीघ्रता से विशेषज्ञता तो प्राप्त हो सकती है, यद्यपि उससे जीवन असंतुलित बन सकता है, और शरीर के अन्य चक्रों से सम्बंधित क्षेत्रों के स्वास्थ्य पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है। अद्वैतमय जीवन से भी कुण्डलिनी स्वयं ही व बिना किसी विशेष प्रयास के धीरे-२ विकसित होने लगती है।

इस प्रकार का उत्तम शारीरिक व मानसिक संतुलन पुराणों से व शरीरविज्ञान दर्शन से प्राप्त अद्वैतभाव से भी उपलब्ध हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि अद्वैतभाव से सभी कुछ समान जैसा लगता है, और किसी विशेष क्षेत्र से विशेष लगाव या आसक्ति नहीं रहती। इससे व्यक्ति व्यष्टि और समष्टि के सभी अंगों पर समान रूप से ध्यान देता है, क्योंकि समष्टि (विश्व-सम्बंधित) व व्यष्टि (शरीर-सम्बंधित), दोनों आपस में जुड़े हुए हैं, “यतपिण्डे तत ब्रम्हांडे” के अनुसार। एक के भी नियंत्रण से दूसरा स्वयं ही उसी के अनुसार नियंत्रित हो जाता है।

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BURNING RAVANA- DEEP SECRET HIDDEN INSIDE / रावण दहन- एक रहस्यात्मक प्रथा

It is Dushehara festival of Hindus / descendants of Aryans today. Ravana, a human-rascal of Ramayana-period is burnt on this day. Many people see it superficially and think that it is merely a ancient happening. However the truth is that it has deep meaning inside. I do not rule out the truth of the ancient story, but I see more truth in the collateral non dual- tantric message that it gives. Actually, the entire nature is present in the form of a beautiful woman. Whatever there is happening inside the body of a woman, that all is happening in a similar way inside the nature too, nothing else. It is a tantric and vedic truth thad has been further proved scientifically by Premyogi vajra in his tantric book, Shareeravigyaan darshan. Ignorant people exploit this nature in a bad manner and with a bad attitude. God Rama always in union with his nature can not tolerate this and thus never allow such people to gain self realization to enter his abode. Therefore such people are burnt by physical fire on there demise for they being deeply identified with their physical bodies. So the message is clear that love the nature and its creatures. The entire Aryan civilization is based on this fundamental guideline. God can never be approached directly without satisfying his nature. It is a deep tantric secret that also demystifies Kundalini more or less. That is why nature-worship is so much abundant in Aryan lifestyle. Today, the world is in great danger. The nature has been over exploited by the human. The result of it is global warming. If it continues, there would be disasters in every field of life. Beautiful Venice city would be submerged fully inside the ocean. So all the coastal areas. Therefore it is right time now to adopt Aryan practices and to worship the nature like those. May be the nature along with her consort, God become pleased and give us the right direction to follow, and also dilute down the disasters little or more.

The ancient story that Ravana had stolen Seetaa, the wife of Lord Rama is a metaphor type. The one disrespecting woman or nature can not please the God. Hanuman, the monkey god and servant of Seetaa is the metaphor of creatures inside the nature. He helped god Rama means that all creatures except of willfully ignorant human beings are innocents. Rama took help of Hanuman to save Seetaa means that when nature is exploited by human, then invisible God makes the other creatures outnumbered thus creating problems for selfish human beings. In this way, God teaches a good lesson to human and so he starts saving the nature. It is entirely similarly seen today, what was happening there thousands of years ago, in the Ramayana-age .

So very-2 happy Dushehara to all of you.

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आज आर्यों के वंशजों / हिन्दुओं  का त्यौहार दशहरा है। रावण, रामायण काल ​​का मानव-राक्षस इस दिन जला दिया जाता है। बहुत से लोग इसे सतही रूप से देखते हैं, और सोचते हैं कि यह केवल एक प्राचीन घटना है। हालांकि सच यह है कि इसमें गहरा अर्थ छुपा हुआ है। मैं प्राचीन कहानी की सच्चाई से इंकार नहीं करता हूं, लेकिन मैं इसे संपार्श्विक अद्वैत-तंत्र के उस संदेश के रूप में अधिक सत्य देखता हूं, जो यह देता है। असल में, पूरी प्रकृति एक सुंदर महिला के रूप में मौजूद है। किसी भी महिला के शरीर में जो भी हो रहा है, वह सब प्रकृति के अंदर भी इसी तरह से हो रहा है, और कुछ नहीं। यह एक तांत्रिक और वैदिक सत्य है, जिसे प्रेमयोगी वज्र ने अपनी तांत्रिक पुस्तक, शरीरविज्ञान दर्शन में वैज्ञानिक रूप से बखूबी साबित कर दिया है। अज्ञानी लोग इस प्रकृति का खराब तरीके से और बुरे व्यवहार के साथ शोषण करते हैं। भगवान राम जो हमेशा अपनी प्रकृति के साथ मिलकर रहते हैं, वे इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं, और इस तरह ऐसे लोगों को कभी भी अपने निवास में प्रवेश करने के लिए आत्मज्ञान प्राप्त करने की इजाजत नहीं देते हैं। इसलिए ऐसे लोगों को अंत में भौतिक आग से जला दिया जाता है, क्योंकि वे अपने भौतिक निकायों / शरीरों के साथ गहराई से / आसक्ति से चिपके होते हैं। तो संदेश स्पष्ट है कि प्रकृति और उसके प्राणियों से प्यार करना चाहिए। संपूर्ण आर्य सभ्यता इस मौलिक दिशानिर्देश पर ही आधारित है। भगवान को उनकी प्रकृति को संतुष्ट किए बिना, सीधे प्राप्त नहीं किया जा सकता है। यह एक गहरा तांत्रिक रहस्य है, जो कुण्डलिनी को भी रहस्योद्घाटित करता है। यही कारण है कि आर्य जीवनशैली में प्रकृति-पूजा इतनी प्रचुर मात्रा में है। आज दुनिया बहुत खतरे में है। प्रकृति का मानव द्वारा शोषण किया गया है। इसका परिणाम ग्लोबल वार्मिंग है। यदि यह जारी रहता है, तो जीवन के हर क्षेत्र में आपदाएं होंगी। सुंदर वेनिस शहर समुद्र के अंदर पूरी तरह से डूब जाएगा। सभी तटीय क्षेत्रों के साथ ऐसा ही होगा। इसलिए आर्यन प्रथाओं को अपनाने और उनकी तरह प्रकृति की पूजा करने के लिए यह सही समय है। हो सकता है कि प्रकृति व उसके सदैव साथ रहने वाले उसके प्रेमी, भगवान प्रसन्न हो जाएं, और हमें प्रकृति को बचाने में सही दिशा-निर्देशन प्रदान करें, और आपदाओं से भी थोड़ी राहत दे दें।

प्राचीन कहानी कि रावण ने भगवान राम की पत्नी सीता को चुरा लिया था, एक रूपक प्रकार की है। जो महिला या प्रकृति का अपमान करता है, वह भगवान को  प्रसन्न नहीं कर सकता है। हनुमान, बंदर-देवता और सीता का नौकर, प्रकृति के भीतर प्राणियों का रूपक है। उसने भगवान राम की मदद की, इसका अर्थ है कि जानबूझकर अनजान बने मनुष्यों को छोड़कर सभी प्राणी निर्दोष हैं। राम ने सीता को बचाने के लिए हनुमान की मदद ली, इसका मतलब है कि जब मनुष्य द्वारा प्रकृति का शोषण किया जाता है, तो अदृश्य भगवान अन्य प्राणियों को अधिक से अधिक बनाता है, जिससे स्वाभाविक ही मनुष्यों के लिए अधिक से अधिक समस्याएं पैदा हो जाती हैं। उसे उससे अच्छा सबक मिलता है, और वह प्रकृति को बचाने लग जाता है। यह पूरी तरह से आज भी वैसा ही देखा जा रहा है, जैसा कि हजारों साल पूर्व के रामायण-काल में घटित हो रहा था।

इसलिए आप सभी को दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं।

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Mahishasur mardini (goddess, killer of demon mahishasur)-महिषासुर मर्दिनी

Mahishasur mardini (कृपया इस पोस्ट को हिंदी में पढ़ने के लिए नीचे ब्राऊस करें या इस वाक्य के लिंक पर क्लिक करें)

Mahishasur was a great demon in prehistoric ages. He was having nature and appearance that of a male Buffalo. He used to appear as a divine and smart human being or as a male Buffalo as per his willingness. His army and followers of Buffalo race were too strong to be defeated even by the gods / demigods / devatas. He had captured all the territories including the divine and astral ones. He was torturing everyone. Ordinary people went to the doorsteps of gods, but they were unable to help those and were themselves too badly affected for the demon was not allowing them to work for the development of human race, most intelligent of all the creatures. Ultimately all gods became gathered and went to the doorstep of super god Bramha. He along with those went to another super god Shiva. He finding himself unable to help those went to last and topmost super god Vishnu along with them. Vishnu told them the importance of unity. All gods and super gods expressed out their individual powers. Those all individual powers were then united together and came out in the form of a super power in the appearance of a too beautiful, powerful and divine goddess called as Durga. She warned the demon many times but he took her lightly. Ultimately she killed him thus opening the way for the development of humanity and divinity.
This is a classical pauranik story of Hindu religious literature. We can take it into original scientific form. Mahishasur demon was the prehistoric dinosaur kingdom when Buffalo-mouthed reptilians used to roam the earth, hindering the human evolution by the natural elements / gods. No separate / lonely natural element was able to detain those. So in embodied / body less human spirits went to the personified heads of those natural elements / gods to help them for their embodied expression. Those natural elements ultimately joined together and made a most favorable condition for their destruction in the form of that scientifically proved drastic and prehistoric meteorite-hit that pushed dinosaurs to extinction. The flashing light of that meteorite was considered as the most beautiful goddess that was made through the so rare incidence of union of all of the favorable climatic conditions as union of individual powers of all the climate controlling natural elements / gods. May be that small meteorite-hits also occured before that drastic one as the signs of warning from the goddess.
This proves that ancient pauranik stories are just only the personified descriptions of the real and scientific world around us. This has only been done with a motive to produce functional non duality that leads to kundalini awakening with sustained practice. So these puranas should be regularly read, understood and that’s non dual attitude attached with one’s own individual life.
Premyogi vajra has made a Tantric book in Hindi, in which he has described universe existing inside our own body in a Purana-style. He has taken help of medical science for this. He has correlated everything happening inside our own human body with our gross social life. It’s already proved that whatever there is inside the universe, that everything is present inside our own body. His book appears more interesting than Purana today for he has written everything that’s scientifically proved, so in an easy form to comprehend. I have myself read it and found it suddenly transforming and spiritually elevating. It’s an extraordinary, incomparable and wonderful book. Detailed description of this book is available here at-

The non dual, tantric, Kundalini yoga technique (the real meditation), and spiritual Enlightenment explained, verified, clarified, simplified, justified, taught, guided, defined, displayed, summarized, and proved in an experiential, philosophical, practical, humanely, scientific and logical way best over

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महिषासुर प्रागैतिहासिक युग में एक महान दैत्य था। वह पुरुष बफेलो / भैंसे के जैसे स्वभाव व उसीकी जैसी शक्ल का था। वह अपनी इच्छा के अनुसार कभी एक दिव्य और स्मार्ट / सुन्दर इंसान और कभी एक भैंसे के रूप में दिखाई देता था। भैंस-वंश की उसकी सेना और उसके अनुयायी देवताओं द्वारा भी पराजित होने के लिए नहीं बने थे। उन्होंने दिव्य और सूक्ष्म लोकों सहित सभी क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। वह महिषराज हर किसी को यातना दे रहा था। साधारण लोग देवताओं के दरवाजे पर सहायता के लिए गए, लेकिन वे उन लोगों की मदद करने में असमर्थ थे और उन राक्षसों से खुद भी बहुत बुरी तरह प्रभावित हुए थे, जिससे उन्हें उस मानव जाति के विकास के लिए काम करने की इजाजत नहीं मिल पा रही थी, जो सभी प्राणियों में सबसे अधिक बुद्धिमान होती है। आखिरकार सभी देवता इकट्ठे हो गए और सुपर गॉड / महा देवता ब्रह्मा के द्वार पर गए। वे उनके साथ एक और सुपर भगवान शिव के पास गए। उन्होंने भी खुद को उन लोगों व देवताओं की सहायता करने में असमर्थ पाया, अतः वे भी उनके साथ अंतिम और शीर्ष सुपर भगवान विष्णु के पास चले गए। विष्णु ने उन्हें एकता के महत्व के बारे में बताया। सभी देवताओं और सुपर देवताओं ने अपनी व्यक्तिगत शक्तियों को अभिव्यक्त किया। फिर उन सभी व्यक्तिगत शक्तियों को एक साथ एकजुट किया गया, जिससे एक बहुत ही शक्तिशाली, सुन्दर, मनुष्याकृत और दिव्य देवी के रूप में एक सुपर पावर उत्पन्न हुई, जिसे दुर्गा कहा जाता था। उसने राक्षस को कई बार चेतावनी दी लेकिन उसने उसे हल्के में लिया। आखिरकार उसने मानवता और दिव्यता के विकास के लिए रास्ता खोलने के लिए उसे मार डाला।

यह हिंदू धार्मिक साहित्य की शास्त्रीय पौराणिक कहानी है। हम इसे मूल वैज्ञानिक रूप में ले सकते हैं। महिषासुर राक्षस का साम्राज्य प्रागैतिहासिक डायनासौर का साम्राज्य ही था, जब महिषमुख सरीसृप पृथ्वी के चारों ओर घूमते थे, और प्राकृतिक तत्वों / देवताओं द्वारा मानव विकास में बाधा डालते थे। कोई अकेला प्राकृतिक तत्व उनको रोकने में सक्षम नहीं था। तो देहरहित मानव आत्माओं ने उन प्राकृतिक तत्वों के मनुष्याकृत प्रमुखों / देवताओं से अपनी मानवीय अभिव्यक्ति के लिए सहायता माँगी। वे सभी प्राकृतिक तत्व / जल, वायु, अग्नि आदि आखिरकार एक साथ शामिल हो गए और वैज्ञानिक रूप से साबित प्रागैतिहासिककाल की कठोर उल्कापिंड-टक्कर के रूप में उन्होंने उन दैत्यों के विनाश के लिए सबसे अनुकूल स्थितियां बनाईं, जो अंततः डायनासोर को विलुप्त कर पाईं। उस उल्कापिंड की चमकती रोशनी को सबसे खूबसूरत / दिव्य व शक्तिशाली देवी माना गया, जो सभी अनुकूल जलवायु-स्थितियों के संघ की इतनी दुर्लभ घटना के माध्यम से अंतरिक्ष से धरती की ओर गिराया गया था। वास्तव में  ऐसी अति दुर्लभ घटना करोड़ों वर्षों में, सभी जलवायु नियंत्रक प्राकृतिक तत्वों / देवताओं की व्यक्तिगत शक्तियों के संघ से ही होती है। हो सकता है कि उससे पहले भी छोटे-२ उल्कापात हुए हों, जो उस दैत्य को देवी के द्वारा दी गई अंतिम चेतावनी के रूप में माने जा रहे हों।

यह साबित करता है कि प्राचीन पौराणिक कहानियां हमारे आस-पास की वास्तविक और वैज्ञानिक दुनिया के केवल personified / मनुष्याकृत वर्णन ही हैं। ऐसा केवल कार्यात्मक अद्वैत को पैदा करने के उद्देश्य से किया गया है, जो निरंतर अभ्यास के साथ कुंडलिनी जागृति को उत्पन्न करता है। इसलिए इन पुराणों को नियमित रूप से पढ़ा जाना चाहिए, समझ लिया जाना चाहिए और इनसे उत्पन्न अद्वैत-दृष्टिकोण को अपने वर्तमान के अपने व्यक्तिगत जीवन से जोड़ा जाना चाहिए।

प्रेमयोगी वज्र ने हिंदी में एक तांत्रिक पुस्तक बनाई है, जिसमें उन्होंने पुराण-शैली में अपने शरीर के अंदर मौजूद ब्रह्मांड का वर्णन किया है। उन्होंने इसके लिए चिकित्सा विज्ञान की मदद ली है। उन्होंने अपने स्वयं के मानव शरीर के भीतर होने वाली हर चीज को हमारे अपने सकल सामाजिक जीवन के साथ सहसंबंधित किया है। यह पहले ही साबित होया हुआ है कि ब्रह्मांड के अंदर जो कुछ भी है, वह सब हमारे अपने शरीर के अंदर भी वैसा ही मौजूद है। उनकी आधुनिक पुस्तक प्राचीन पुराण की तुलना में अधिक दिलचस्प व व्यावहारिक प्रतीत होती है, क्योंकि उन्होंने वही सब कुछ लिखा है जो वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है और समझने में बहुत आसान है। मैंने खुद इसे पढ़ लिया है और इससे मैंने अपने आपको अचानक ही रूपांतरित सा व आध्यात्मिक रूप से उन्नत सा महसूस किया। यह एक आश्चर्यजनक, अनुपम व अविस्मरणीय पुस्तक है। इस पुस्तक का विस्तृत विवरण यहां उपलब्ध है-

अद्वैतपूर्ण, तांत्रिक, कुंडलिनी योग तकनीक (असली ध्यान), और आत्मज्ञान को एक अनुभवपूर्ण, दार्शनिक, व्यावहारिक, मानवीय, वैज्ञानिक और तार्किक तरीके से; सबसे अच्छे रूप में समझने योग्य, सत्यापित, स्पष्टीकृत, सरलीकृत, औचित्यीकृत, सीखने योग्य, निर्देशित, परिभाषित, प्रदर्शित, संक्षिप्त, और प्रमाणित किया गया है

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Kundalini versus Hypnotism/कुंडलिनी एक सम्मोहक

Kundalini/kundalini yoga is the best preventive measure and antidote for the effect of hypnotism. We think that hypnotism is a special thing, but it’s not so. All of us are hypnotizers to little or more extent. When some one is trying to become over influential among others, actually he is hypnotizing others unknowingly. In this way, all great leaders, rulers, artists etc. all are hypnotizers. Positive hypnotism leads to progress but negative hypnotism leads to downfall. Positive hypnotism means that hypnotizer is positively oriented and leads to positivity inside the hypnotized beings too. Negative hypnotism is just the reverse of it. Actually kundalini is also a positive hypnotizer and Kundalini yoga is an artificial means to amplify it. Kundalini is the mental image of a positively hypnotizing being/guru/devata/god/lover/consort inside one’s mind/brain. Therefore kundalini doesn’t allow the mental image of different street hypnotizers to occupy one’s brain for that kundalini has already occupied most of the space inside the brain of a kundalini yogi keeping no space vacant for the others/negative hypnotizers. Nondual hypnotizers like qualified guru or diety or god produces spiritual as well as material progress. Beings having uncontrolled and duality filled mind produce mostly downfall in both of these. Five Ms of tantra produce enhanced hypnotizing effect of any being. So, if used properly and under guidance, they produce very strong positive hypnotism otherwise negative one. The improper use of 5 Ms of tantra resulted into the defamation of tantra, the real science of mind/spiritualism. Religious extremism/terrorism is one of the best example of this misuse. If we take it in a positive way, stray hypnotisms give a tough competition to kundalini, so kundalini becomes more and more stronger.

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कुंडलिनी/कुंडलिनी योग सम्मोहन से बचाने वाली सबसे अच्छी युक्ति है। हम सोचते हैं कि सम्मोहन एक विशेष चीज है, पर ऐसा नहीं है। वास्तव में हम सभी एक-दूसरे को कम-अधिक मात्रा में सम्मोहित करते रहते हैं। जब कोई व्यक्ति दूसरों के बीच में अधिक ही प्रभावशाली बनने का प्रयत्न करता है, तब वह वास्तव में अनजाने में ही दूसरों को सम्मोहित कर रहा होता है। इस तरह से सभी महान नेता, शासक, कलाकार, धर्म गुरु आदि सम्मोहनकर्ता ही हैं। सकारात्मक सम्मोहन उन्नति की ओर ले जाता है, परंतु नकारात्मक सम्मोहन पतन की ओर। सकारात्मक सम्मोहन का अर्थ है कि सम्मोहनकर्ता सकारात्मक मानसिकता वाला है, जिससे वह अपने द्वारा सम्मोहित लोगों में भी सकारात्मकता भर देता है। नकारात्मक सम्मोहन इसके ठीक विपरीत होता है। वास्तव में कुण्डलिनी भी एक सकारात्मक सम्मोहक है, और कुण्डलिनी योग उसकी सम्मोहकता को बढ़ाने वाला एक अर्धकृत्रिम उपाय। कुण्डलिनी एक सकारात्मक सम्मोहनकर्ता/योग्य गुरु/देवता/प्रेमी/यौनप्रेमी का मन/मस्तिष्क में बना हुआ एक प्रगाढ़ चित्र ही है। इसलिए वह कुण्डलिनी चित्र इधर-उधर के सम्मोहनकर्ताओं के चित्रों को मन में घुसने नहीं देता, क्योंकि उस कुण्डलिनी ने पहले ही मन-मस्तिष्क की अधिकांश खाली जगह को भरा होता है, अतः नए चित्र के लिए स्थान ही नहीं बचता। अद्वैतमयी सम्मोहनकर्ता, जैसे कि गुणवान गुरु या इष्ट या देवता , आध्यात्मिक व भौतिक, दोनों प्रकार की उन्नति करवाते हैं। परंतु जिन सम्मोहनकर्ताओं का मन अनियंत्रित, अमानवीय व द्वैतपूर्ण है, वे ज्यादातर पतन ही करवाते हैं। तन्त्र के पंचमकार किसी व्यक्ति की सम्मोहकता में अत्यधिक वृद्धि करते हैं। इसलिए यदि ये ढंग से व उचित दिशा निर्देशन में प्रयोग किए जाएं, तब ये बहुत बलवान व सकारात्मक सम्मोहकता को उत्पन्न करते हैं, अन्यथा केवल नकारात्मक। इन पंचमकारों के दुरुपयोग से ही वह तंत्र दुनिया में बदनाम हुआ है, वास्तव में जो मन/आध्यात्मिकता का वास्तविक विज्ञान है। धार्मिक अतिकट्टरता/आतंकवाद इस दुरुपयोग का एक अच्छा उदाहरण है। यदि इसे सकारात्मक रूप में लें, तो इधर-उधर के सम्मोहन कुण्डलिनी को कड़ा मुकाबला देते हैं, जिससे कुण्डलिनी मजबूत होती रहती है।

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Non duality and Kundalini reinforces each other/अद्वैतभाव व कुंडलिनी एक दूसरे को पुष्ट करते हैं।

Bliss originates from non duality. Kundalini awakening is semifinal bliss. Enlightenment is final/supreme bliss. Therefore, Kundalini awakening and enlightenment, both proves to be the states of semifinal and final non duality respectively. Morning Kundalini yoga strengthens Kundalini. That in turn strengthens non duality. That in turn strengthens bliss. Similar system works after evening Kundalini yoga too, so tiredness fade away immediately. Similarly, Non dual action strengthens kundalini and bliss, both together for all these three live together.

After his glimpse enlightenment, Premyogi vajra had got profound non dual attitude. So Kundalini and bliss also used to accompany that powerfully along with.

आनंद अद्वैत से उत्पन्न होता है। कुंडलिनी जागरण में उच्चतम के निकट का आनंद अनुभव होता है। आत्मज्ञान में उच्चतम आनंद की स्थिति होती है। इससे सिद्ध होता है कि कुंडलिनी जागरण लगभग उच्चतम अद्वैत से संपन्न होता है, और आत्मज्ञान पूर्णतया उच्चतम अद्वैत से सम्पन्न होता है। प्रातः कुण्डलिनी योग कुंडलिनी को पुष्ट करता है। कुंडलिनी फिर अद्वैत को पुष्ट करती है। अंत में अद्वैत आनंद को बढ़ाता है। सांयकाल के कुंडलिनी योग से भी इसी सिद्धांत से थकान दूर होती है। इसी तरह, अद्वैतमयी क्रियाकलाप कुंडलिनी व आनंद, दोनों को पुष्ट करते हैं, क्योंकि ये तीनों गुण साथ-२ रहते हैं।

अपने क्षणिकात्मज्ञान के बाद, उसके प्रभाव से प्रेमयोगी वज्र में असीम अद्वैत उत्पन्न हो गया था। इससे कुंडलिनी व आनंद, दोनों भी प्रचंड रूप से स्वयं ही उसके साथ रहते थे।

अटल जी को श्रद्धा सुमन/ Tribute to Atal ji

अटल जी की याद में कुछ पंक्तियाँ

मैं अटल जी के सम्मान में कुछ पंक्तियाँ लिखना चाहूंगा-

उठ जाग होनहार, प्रकाश हो या अंधकार।

बाँध तरकस पीठ पर, भर तीर में फुंकार।।

झुका दे शीश दोनों का, कर ना पाए फिर कभी भी वार।

उठ जाग होनहार, प्रकाश हो या अंधकार।।

यह कविता कुण्डलिनीयोग से भी स्वतः ही सम्बंधित प्रतीत होती है। यह कविता अज्ञानरूपी निद्रा में डूबे हुए एक आम साधारण मनुष्य से कहती है कि हे बहादुर मनुष्य, नींद से जाग जा और उठ खड़ा हो जा। तू डर मत, चाहे तेज रौशनी का माहौल हो या चाहे घनघोर अन्धकार ही क्यों न हो। इसका मतलब है कि तू प्रकाश व अन्धकार की परवाह न करते हुए दोनों को एक नजर से देख, अर्थात तू अद्वैतपूर्ण बन जा। बाँध तरकस पीठ पर का मतलब है कि तू कुण्डलिनीयोग साधना में जुट जा। उस साधना से जो चित्र-विचित्र विचार-संकल्प उसके मन में उभरेंगे, वे ही उस साधना रुपी तरकस के विभिन्न तीर होंगे। वह कुण्डलिनी साधना बैठकपूर्ण योग से भी की जा सकती है, और कर्मपूर्ण कर्मयोग से भी। फिर कविता कहती है कि भर तीर में फुंकार। इसका अर्थ है कि एक सबसे मजबूत व गुणसंपन्न मानसिक चित्र को तू कुण्डलिनी बना ले, और नित्य निरंतर उसका ध्यान करने लग जा। उससे वह कुण्डलिनी एक विषबुझे तीर की तरह प्रचंड हो जाएगी। “झुका दे शीश दोनों का” का अर्थ है कि उस प्रचंड कुण्डलिनी के आगे प्रकाश व अन्धकार दोनों निष्प्रभावी होने लग जाएंगे। कुण्डलिनी-जागरण से वे पूरी तरह से निष्प्रभावी हो जाएंगे, क्योंकि उस जागृत कुण्डलिनी में प्रकाश व अन्धकार दोनों के सभी उत्कृष्ट गुण विद्यमान होंगे। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि वह परम प्रकाशमान कुण्डलिनी साधक को अपनी आत्मा से अभिन्न प्रतीत होगी। पूर्णतः निष्प्रभावी होने पर वे दोनों कभी वार नहीं कर पाएंगे, क्योंकि फिर उन दोनों के किसी भी रूप में साधक के मन में कभी आसक्ति उत्पन्न नहीं होगी।

Tribute in the memory of Atal ji

Rise up brave, whether it is light or dark grave;

Tie arrow-box on the back, fill up hiss to that pack.

Make bow down heads of both, could never then hit when you be in sloth;

Rise up brave, whether it is light or dark grave. 

This poem seems to be related to Kundalini Yoga itself. This poem says to an spiritually ignorant sleepy man means a  common man, “O brave man, wake up from sleep and rise up!” Do not be afraid, whether there is a bright light environment or a dark darkness. This means that if you do not care light and darkness, watch them both at a glance, that is, you become untainted. On the back, tie up arrow box means that you will get involved in cultivation of Kundalinioga. The painting / different ideas / thoughts that arise in his mind from that sadhana / meditation will be different arrows of that technique. The Kundalini cult can also be done through sitting yoga ie. full yoga, and also through action-yoga / karmayoga. Then the poem says that apply poison to the arrow to make that a hissing serpent. This means that you make a most qualified and beautiful mental picture as your Kundalini, and always start meditating / concentrating on it or visualizing it. From that, the Kundalini will be powerful like a poisoned arrow. “make bow down heads” means that both the light and the dark will appear to be neutral in front of that huge and all light full kundalini. With Kundalini-Jagaran / awakening, they will become completely neutral, because in that awakening of the Kundalini, all the excellent qualities of light and darkness will exist. This will be because that ultimate luminous Kundalini  will appear to be the integral to seeker’s soul. If they both are completely neutral, they will never be able to fight, because then in any form of both of them the attachment will never be generated in the mind of that seeker.


Identifying Kundalini image- कुण्डलिनी छवि को पहचानना

Nondual Tantra helps to identify and subsequently enrich the mental Kundalini image.

Most of the people even many Yogis do not know how to identify a suitable mental image as a kundalini/life-boat to cross over, inside the vast ocean of their mental formations and subsequently to give initial boost to her in their mind, before the proper sitting meditation.

Actually, everybody has most preferred image inside their mind but that is obscured due to their duality/attachment filled lifestyle. One has to take support of non duality for some time to make that image prominent. Non duality should be adopted along with a fully functional worldly life, not a sedentary one. One would see then that the most preferred mental image would come to the surface and would roam his mind regularly, the image having a strength/expression proportionate to the intensity of the non duality. In this way, one would identify and mark his kundalini image. He would then start the sitting meditation twice a day regularly, in which he would concentrate on that selected kundalini image on his various body Chakras. He would succeed soon then. Kundalini image should be preferably a personified image. It can be a mental image of a Guru/teacher/friend/grandfather/lover/devata. Most preferred mental image is that of a person who is a loving and friendly too. Image of god or passed one is preferred for concentrating on the image of a living being may produce changes in the life of that living being likewise, although it rarely happens for one’s outer appearance is always different than his inner or real appearance. In fact, one should listen to his mind and decide likewise. Many of the Boddhaas are great meditating beings. They select their kundalini image as early as in their childhood and keep on concentrating on her for their lifetime. For practical and real time detail, Love story of a yogi can be followed.

Not selecting a correct kundalini image or not selecting at all appears one of the reason due to which many of the kundalini yogis do no succeed.

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अद्वैत तंत्र से मानसिक कुंडलिनी छवि को पहचानने और फिर उसे समृद्ध करने में मदद मिलती है।

अधिकांश लोग और यहाँ तक कि कई योगी भी नहीं जानते हैं कि एक उपयुक्त मानसिक छवि को कुंडलिनी / जीवनरक्षक नाव के रूप में कैसे परिवर्धित किया जाए, जिससे चित्र-विचित्र मानसिक संरचनाओं के विशाल महासागर को पार किया जाए, और फिर बैठकपूर्ण योगसाधना से पहले उसे किस तरह से प्रारंभिक बढ़ावा दिया जाए।

दरअसल, हर किसी के मन में सबसे पसंदीदा छवि अवश्य होती है लेकिन वह उनकी द्वैतपूर्ण / अनासक्तिपूर्ण जीवनशैली के कारण अस्पष्ट रहती है। उस छवि को प्रमुख रूप से स्पष्ट बनाने के लिए व्यक्ति को कुछ समय के लिए अद्वैत का समर्थन करना पड़ता है। अद्वैत को पूर्णरूप के कार्यात्मक सांसारिक जीवन के साथ अपनाया जाना चाहिए, न कि एक निष्कर्मक / निठल्ले जीवन के साथ, तभी अद्वैत का पूर्ण लाभ मिलता है। ऐसा करने पर हम देखेंगे कि हमारी सबसे पसंदीदा मानसिक छवि सतह पर आ जाएगी और नियमित रूप से हमारे दिमाग में घूमने लगेगी। उस छवि की स्पष्टता / अभिव्यक्ति / तीव्रता हमारे द्वारा अपनाए गए अद्वैत की तीव्रता के समानान्तर / अनुरूप होगी। इस तरह, एक व्यक्ति अपनी कुंडलिनी छवि को पहचान कर उसे चिन्हित कर पाएगा। फिर वह नियमित रूप से दिन में दो बार बैठकमय साधना / सिटिंग मेडिटेशन का अभ्यास शुरू करेगा, जिसमें वह अपने विभिन्न शरीर-चक्रों पर विराजमान उस चयनित कुंडलिनीछवि पर ध्यान केंद्रित करेगा। वह जल्द ही सफल हो जाएगा। कुंडलिनी छवि अधिमानतः एक प्रिय व्यक्तित्व की छवि होनी चाहिए। वह एक गुरु / शिक्षक / दोस्त / दादा / प्रेमी / देवता आदि, किसी की भी मानसिक छवि हो सकती है। सबसे पसंदीदा मानसिक छवि उस व्यक्ति की बनी होती है, जो एक प्रेमपूर्ण तरीके से मित्रवत व्यवहार करता है। ध्यान केंद्रित करने के लिए ईश्वर की छवि या स्वर्गारोहित व्यक्ति / अधिमानतः पूर्वज  की छवि को प्राथमिकता दी जाती है, क्योंकि सैद्धांतिक रूप से जीवित व्यक्ति की छवि पर ध्यान लगाने से उसके जीवन में ध्यानानुसार परिवर्तन उत्पन्न हो सकता है, हालांकि यह शायद ही कभी होता हो, क्योंकि किसी का बाहरी स्वरूप हमेशा ही उसके भीतर के या वास्तविक स्वरूप से अलग होता है। वास्तव में, किसी भी व्यक्ति को अपने दिमाग का सुनना चाहिए, और उसके अनुसार ही शुभ फैसला लेना चाहिए। बोद्धों में से कई लोग महान ध्यानयोगी होते हैं। वे अपने बचपन में ही अपनी कुंडलिनी छवि का चयन कर लेते हैं, और अपने पूरे जीवनभर उसके ऊपर ध्यान केंद्रित करते रहते हैं। इससे सम्बंधित व्यावहारिक और वास्तविक समय के पूर्ण ज्ञान के लिए, इस वेबसाईट पर प्रस्तुत सत्यकथा ” एक योगी की प्रेमकथा” /  Love story of a yogi का अनुपालन किया जा सकता है।

एक सही कुंडलिनी छवि का चयन नहीं करना या बिल्कुल चयन नहीं करना एक मुख्य कारण है, जिससे कुंडलिनी योगी सफल नहीं हो पाते हैं।