कुण्डलिनी से यौन-हिंसा पर रोकथाम

यह तांत्रिक पोस्ट तंत्र के आदिदेव भगववान शिव व तंत्र गुरु ओशो को समर्पित है।

प्रमाणित किया जाता है कि इस तांत्रिक वैब पोस्ट में किसी की भावना को ठेस पहुंचाने का प्रयास नहीं किया गया है। इसमें तांत्रिक वैबसाइट के अपने स्वतंत्र विचार जनहित में प्रस्तुत किए गए हैं। हम बलात्कार पीड़िताओं के साथ सम्वेदना प्रकट करते हैं।

आजकल हर जगह यौन हिंसा की ख़बरें सुनने को मिल रही हैं। यह पूरी दुनिया में हो रहा है। कोई भी क्षेत्र इस मामले में अपवाद नहीं है। अभी हाल ही में हैदराबाद में घटित डा० प्रियंका रेड्डी यौन हत्याकांड इसका सबसे ताजा उदाहरण है। दूसरा ताजा उदाहरण उत्तर प्रदेश के उन्नाव का है, जहां एक बलात्कार से पीड़ित बाला को ज़िंदा जलाया गया। आओ, हम इन मामलों के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक व तांत्रिक पहलुओं के सम्बन्ध में विचार करते हैं।

यौन हिंसा के मुख्य कारण

यौनहिंसा का मुख्य कारण सार्वजनिक स्थानों पर परोसी जाने वाली, अश्लीलता, भौंडेपन, व्यभिचार एवं पोर्न से भरी हुई ऑडियोविजुअल सामग्रियां हैं। हालांकि, यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि ये यौन-अनुशासित और तांत्रिक व्यक्ति को शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से नुकसान पहुंचाने के बजाय लाभ पहुंचा सकती हैं। इसलिए, इस मामले में मानसिक दृष्टिकोण का प्रकार अधिक महत्वपूर्ण कारक है।

यौन हिंसा का दूसरा मुख्य कारण समाज में समुचित यौन शिक्षा का अभाव है। कई जगह जो यौन शिक्षा दी जाती है, वह तंत्र के अनुसार नहीं होती, इसलिए वह पूरी तरह से कारगर नहीं हो पाती। वास्तविक यौन शिक्षा तो तांत्रिक यौन शिक्षा ही है। तंत्र ही यौनाचार का विज्ञान है। आजकल जब भौतिक यौन शिक्षा को हर जगह फैलाया जा रहा है, तब भी यौन हिंसा बढ़ने की क्या वजह है? इसकी वजह यही है कि उसमें तंत्र की आध्यात्मिकता को शामिल नहीं किया जा रहा है। भौतिक यौन शिक्षा तो कई बार लाभ की बजाय हानि भी पहुंचाती है, तथा वास्तविक यौन सुख से भी वंचित रखती है। यह तांत्रिक यौन शिक्षा ही है, जो वास्तविक यौन सुख को उपलब्ध करवाते हुए आदमी को शारीरिक, मानसिक, व आध्यात्मिक रूप से भी उन्नत करती है।

यौन हिंसा का तीसरा मुख्य कारण समाज में बढ़ती अव्यवस्था, व बेरोजगारी है। इससे असुरक्षा की भावना बढ़ती है, जो यौन हिंसा को जन्म देती है। खाली दिमाग शैतान का घर होता है। जिस आदमी के पास काम और आमदनी नहीं होते, उसे ऊटपटांग ही सूझता है।

यौन हिंसा का चौथा कारण वास्तविक आध्यात्मिकता की कमी है। आध्यात्मिकता खाली दिमाग को भी नियंत्रण में रखती है। तभी तो खाली बैठे हुए जोगी-फकीर कभी गलत काम नहीं करते।

यौन हिंसा का पांचवां प्रमुख कारण न्यायिक कारण है। न्याय प्रणाली भी अपने तरीके से सही काम कर रही है। यद्यपि यह अपराधी मानसिकता के मन में पर्याप्त डर या शर्म पैदा नहीं कर पा रही है। अपराध या तो डर से रुकते हैं, या शर्म से। इसमें शर्म पैदा करने वाला तरीका ज्यादा मानवतापूर्ण है। एक कटु सत्य यह भी है कि ज्यादातर मामलों में अपराधी सजा के भय से ही बलात्कार-पीड़िता की ह्त्या करते हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा सबूत मिटाए जा सके। यह भी यह भी सच्चाई है कि अधिकांशतः तेज दिमाग वाले लोग ही अपराधी बनते हैं। यदि ऐसे लोगों को समुचित दिशा-निर्देशन मिलता रहे, तो वे अपराध की बजाय समाज के अन्य बहुत से महत्त्वपूर्ण काम कर सकते हैं।

तांत्रिक आचार को अपनाने से यौन हिंसा पर रोकथाम

बेशक तंत्र बाहर से देखने पर यौन-सनकी शास्त्र की तरह लगता हो, परन्तु ऐसा नहीं है। तंत्र पोर्न या बलात्कार के बिलकुल विपरीत है। इसमें यौन साथी को पूर्णतः अपने समान समझ कर उससे प्रेम किया जाता है। इसमें परस्पर रजामंदी होती है। इसमें यौन-स्वास्थ्य व यौन अनुशासन पर बहुत ध्यान दिया जाता है। सच्चाई तो यह है कि अनुशासित तंत्र के सामने तो सर्वसाधारण व पारिवारिक प्रणय सम्बन्ध भी बलात्कार की तरह प्रतीत होते हैं। तंत्र में किसी की बेटी या पत्नी को यौन साथी नहीं बनाया जाता। इससे किसी की भावनात्मक संपत्ति को नुक्सान नहीं पहुंचता। तंत्र में बहुत लम्बे समय तक यौन साथी के साथ अन्तरंग सम्बन्ध बना कर रखना पड़ता है। उसे कई वर्षों तक बदला नहीं जा सकता। उसे मझधार में भी नहीं छोड़ा जा सकता। इससे भी बलात्कार जैसे क्षणिक वासना पूर्ति के कामों पर रोक लगती है। तंत्र में एकपत्नीव्रत को सर्वश्रेष्ठ आचार माना गया है, तथा पत्नी को ही सर्वश्रेष्ठ तांत्रिक साथी माना गया है। भगवान शिव-पार्वती की जोड़ी इसका अच्छा उदाहरण है।

कुण्डलिनी शक्ति के बहिर्गमन को रोकने से यौन हिंसा की रोकथाम

वैसे तो जितना संभव हो सके, तांत्रिक विधि से वीर्यपात को रोककर उसकी शक्ति को कुण्डलिनी शक्ति में रूपांतरित कर देना चाहिए। फिर भी मासिक चक्र के गर्भाधान से सुरक्षित काल (मासिक चक्र के प्रथम 7 और अंतिम 7 दिन, यद्यपि कोई भी समय शत-प्रतिशत सुरक्षित नहीं हो सकता है) में किए गए वीर्यपात के बाद सम्भोग बंद नहीं करना चाहिए, बल्कि वीर्य-रक्षण के साथ जारी रखना चाहिए। वीर्यपात से शक्ति बहिर्मुख होकर नष्ट हो जाती है। इससे यौन साथी के प्रति द्वेष पैदा होता है, जो यौन हिंसा में बदल सकता है। इससे एक प्रकार से शक्ति का मुंह बाहर की तरफ खुल जाता है, और लम्बे समय तक वैसा ही बना रहता है। कुछ दिनों के बाद जब बाहर की और शक्ति (नागिन) का मुंह बंद हो जाता है, तब आदत से मजबूर मूढ़ मनुष्य फिर से वीर्यपात करके उसे खोल देता है। इससे उसकी कुण्डलिनी शक्ति निरंतर बाहर की और बर्बाद होती रहती है। उससे आदमी बाहरी दुनिया की मोहमाया में बुरी तरह से फँस जाता है, और उसके अन्दर बहुत से दुर्गुण पैदा हो जाते हैं। उस शक्ति को जितना हो सके, वीर्यपात के बाद उतना शीघ्र ऊपर (मस्तिष्क) की ओर चढ़ा दिया जाना चाहिए। यहाँ तक कि एक बार भी वीर्य के संरक्षण और उसके ऊर्ध्व-चालन के साथ किया गया तांत्रिक यौनयोग बहुत सुन्दर फल देता है, बेशक उसके बाद लम्बे समय तक सेक्स न किया जाए। उससे शक्ति की बहिर्मुखता (नागिन का मुंह नीचे की ओर होना) से उत्पन्न नकारात्मकता एकदम से यू टर्न लेकर ऊर्ध्वमुखता (नागिन का मुंह ऊपर की तरफ उठना) से उत्पन्न सकारात्मकता का रूप ले लेती है। इससे यौन साथी से भी प्रेम बढ़ता है, जिससे यौन हिंसा पर लगाम लगती है। जैसे-२ वीर्य बढ़ता जाता है, वैसे-२ ही मस्तिष्क में कुण्डलिनी शक्ति का स्तर भी बढ़ता जाता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि हमने यौन योग से वीर्य की शक्ति को मस्तिष्क की ओर जाने के लिए निर्दिष्ट किया होता है। उसके साथ कुण्डलिनी स्वयं ही मस्तिष्क की तरफ विकास करती है, क्योंकि यौन योग से हमने कुण्डलिनी को उस वीर्य-शक्ति के ऊपर आरोपित किया होता है।

कुण्डलिनी योग से यौन हिंसा पर लगाम

यह मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक रूप से सत्य है कि प्रत्येक जीव अपनी कुण्डलिनी के विकास के लिए ही यौन सम्बन्ध बनाता है। महान तंत्र गुरु ओशो ने भी यह बात कही है कि सम्भोग से समाधि की प्राप्ति सबसे आसान व व्यावहारिक है। समाधि का अर्थ यहाँ निरंतर का कुण्डलिनी-ध्यान या कुण्डलिनी-जागरण ही है। इस परिपेक्ष्य से, यदि कुण्डलिनी के विकास के लिए कुण्डलिनी-योग की सहायता ली जाए, तो सम्भोग की आवश्यकता ही न पड़े। इसी वजह से तो ऋषि-मुनि व महान योगीजन आजीवन विवाह के बिना ही पूर्ण संतुष्ट जीवन जी पाते थे।

इतिहास गवाह है कि जब से भारत की वैदिक संस्कृति का अन्य संस्कृतियों के द्वारा अतिक्रमण हुआ है, तभी से यौन-हिंसा के मामले बढ़े हैं, और वीभत्स हुए हैं। इसलिए यौन-हिंसा से बचने के लिए कुण्डलिनी योग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

तांत्रिक यौन-शिक्षा को सर्वसुलभ करवाने वाली निम्नलिखित पुस्तकें अनुमोदित की जाती हैं

1) शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)

2) कुण्डलिनी रहस्योद्घाटित- प्रेमयोगी वज्र क्या कहता है

3) कुण्डलिनी विज्ञान- एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान     

Please click on this link to view this post in English (Kundalini for prevention of sexual violence)

ਇਸ ਪੋਸਟ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬੀ ਵਿਚ ਪੜ੍ਹਨ ਲਈ ਇੱਥੇ ਕਲਿੱਕ ਕਰੋ (ਕੁੰਡਲਨੀ ਤੋਂ ਜਿਨਸੀ ਹਿੰਸਾ ਦੀ ਰੋਕਥਾਮ)