होली त्यौहार व तंत्र का आपस में रिश्ता- Tantra versus Holi festival

होली त्यौहार व तंत्र का आपस में रिश्ता (please browse down or click here to view this post in English)

होली है………। सभी मित्रों को होली की बहुत-२ शुभकामनाएँ। “होली” नाम ही तांत्रिक है। “ल” अक्षर को तंत्र में कामप्रधान माना गया है। मूलाधार का बीजाक्षर “लं” है, व उसी का बीजमंत्र “क्लीं” है। दोनों में ही “ल” अक्षर है। मूलाधार चक्र को भी कामप्रधान माना जाता है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी बीजाक्षर से सम्बंधित घटना हुई थी। वह जिस ऑनलाईन कुण्डलिनी-ग्रुप का सदस्य था, उसमें बहुत से लोगों के नाम “ल” अक्षर वाले थे। कई के नाम में तो दो “ल” भी थे। उदाहरण के लिए “ल्लो”, “लीं”, व “लि” आदि। उन “ल” अक्षर के नाम वाले लोगों के साथ ही उसका अधिकाँश वार्तालाप होता था। उससे उसका मूलाधार चक्र अनजाने में ही जागृत हो गया। उससे उसमें तांत्रिक योग की प्रवृत्ति जागृत हुई, जिससे शीघ्र ही उसकी कुण्डलिनी जागृत हो गई। साथ में, उनके चेहरे भी लाल रंग लिए हुए थे। लाल रंग भी कामोत्तेजक माना जाता है। उससे भी प्रेमयोगी वज्र को सहयोग मिला।

उस फोरम पर उसका नाम हृदयेश था। इसका अर्थ है, “हृदय का स्वामी”। एक परिपक्व व स्वस्थ हृदय ही मूलाधार को लम्बे समय तक क्रियाशील रख सकता है। बहुत मेहनती होने के कारण, उसका नाभि-चक्र भी क्रियाशील था। हृदय-चक्र व मूलाधार चक्र, दोनों को शक्ति की बहुत आवश्यकता होती है। नाभि चक्र दोनों के लिए शक्ति की आपूर्ति कर रहा था। इसलिए हम नाभि चक्र को अनाहत चक्र व मूलाधार चक्र को आपस में जोड़ने वाला पुल भी कह सकते हैं।

इसी तरह देवी भागवत पुराण में भी एक कथा आती है कि किसी जंगल में एक व्यक्ति के मुख से किसी भय के कारण अनायास ही बीजाक्षर वाले बोल निकले थे, क्योंकि वह मानसिक रूप से व वाणी से दिव्यांग भी था। उसी बीजाक्षर के बल से उसे देवी सिद्ध हो गई, और वह हर प्रकार से उन्नति करने लगा।

तंत्र के साथ होली के सम्बन्ध को उजागर करने वाला दूसरा कारक लाल रंग है। हम सभी जानते हैं कि होली का मुख्य रंग लाल रंग ही है। यह रंग होली वाला जोश भी पैदा करता है। आपको यह जानकार हैरानी होगी कि जो कुंकुम आम जनजीवन में सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है, वह हल्दी ही होता है। 95 भाग हल्दी-चूर्ण को 5 भाग चूने (पानी में घोलकर) के साथ मिलाकर जब छाया में सुखाया जाता है, तब वह सुर्ख लाल हो जाता है। चूने की मात्रा बहुत कम होने से इस तरह से निर्मित कुंकुम शरीर के लिए हानिकारक भी नहीं होता। परन्तु सिन्दूर बहुत भिन्न होता है। वह पारे व सीसे का यौगिक होता है, इसलिए स्वास्थ्य के लिए हानि भी पहुंचा सकता है, यदि ढंग से प्रयोग में न लाया जाए। उसका रंग संतरी होता है। हनुमान के ऊपर लगे हुए लाल रंग को आप सिन्दूर समझें। इसी तरह, गुलाल भी कई रंगों के होते हैं, व प्राकृतिक होते हैं। लाल गुलाब लाली वाले पौधों से, नीले रंग का गुलाल इंडिगो से आदि-२। होली के रंग खुद ही बनाने चाहिए। बाजार में तो अधिकाँश तौर पर सिंथैटिक रंग मिलते हैं, जो शरीर के लिए हानिकारक होते हैं। उपरोक्त कारणों से ही तंत्र के मूलाधार चक्र का रंग भी लाल ही होता है।

होलिका दहन भी तंत्र के अनुसार ही है। हम जानते हैं कि यज्ञादि अनुष्ठान अधिकाँश तौर पर तांत्रिक   होते हैं। यज्ञ में जल रही अग्नि के बीच में तांत्रिक अपनी कुण्डलिनी को अनुभव करता है। इससे उसकी  कुण्डलिनी बहुत पुष्ट हो जाती है, क्योंकि वह अग्नि के तेज से जगमगा जाती है।

होली के दिन एक दूसरे पर सीधे तौर पर व पिचकारी से रंग उड़ेलना भी तंत्र के अनुसार ही है। हम सभी जानते हैं कि सभी को अपने किए हुए  कर्मों का भोग करना ही पड़ता है। तांत्रिक योग से यह प्रक्रिया सरल हो जाती है। उससे फल देने वाले कर्म के संस्कार निरंतर के अभ्यास से इतने क्षीण हो जाते हैं कि या तो वे सीधे ही नष्ट हो जाते हैं, या मामूली सा फल देकर नष्ट हो जाते हैं। होली के रंगों से शरीर का विकृत होना एक प्रकार से पूर्व के किए हुए कुकर्मों से शरीर को दंड मिलना ही है। हो सकता है कि किसी के पिछले कर्मों के अनुसार उसके शरीर को गंभीर चोट लगनी हो। होली के रंग से जब उसका शरीर कुरूप हो जाता है, तो होनी उसे शरीर की क्षति समझ लेती है, जिससे उससे सम्बंधित कुकर्म क्षीण हो जाता है। तांत्रिक योगाभ्यास की अतिरिक्त सहायता से वह नष्ट ही हो जाता है। इसी तरह किसी को पानी में डुबो कर मार सकने वाला कुकर्म पानी की एक पिचकारी मात्र से शांत हो जाता है। होली के दिन चलने वाले हल्के-फुल्के मजाक व वाद-विवाद से भी इसी सिद्धांत के अनुसार ही पिछले कुकर्म शांत हो जाते है। अब ज़रा सोचें, बरसाने की लट्ठमार होली से तो पुराने कुकर्मों का भण्डार ही ढीला पड़ जाता होगा।

अब जो पुरानी कथा है कि होली के दिन प्रहलाद को मारने की मंशा रखने वाली उसकी बहन होलिका स्वयं ही दहन हो गई थी, उसमें वास्तव में हिरण्यकशिपु के कुकर्म को ही होलिका कहा गया है। कहा जाता है कि पिता के कुकर्म पुत्र को भोगने पड़ते हैं। वे कुकर्म (हिरण्यकशिपु की पुत्री व प्रहलाद की बहन के रूप में वर्णित) होली के तांत्रिक प्रभाव से नष्ट हो गए, अर्थात होलिका जल गई।

वास्तव में, होली के दिन चारों ओर कामदेव का तेज विद्यमान होता है, क्योंकि सभी लोग एकसाथ मिलकर काम को बढ़ा रहे होते हैं। उससे मूलाधार चक्र को बहुत बल मिलता है। यह तांत्रिक सिद्धांत है कि मूलाधार की क्रियाशीलता के समय किया गया कोई भी कार्य अनेक गुना फलदायी होता है। तभी तो होली का दिन तांत्रिक सिद्धि के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। अगर उस दिन तंत्रयोगी की कुण्डलिनी न भी जागृत हो पाए, तो भी कुण्डलिनी को बहुत अधिक बल मिलता है। वास्तव में, कुण्डलिनी की क्रियाशीलता को भी उतना ही अहम् माना जाता है, जितना की कुण्डलिनी-जागरण को।

कई लोग होली का प्रारम्भ कृष्ण-राधा के प्रेम से बताते हैं। इसमें तो होली की काम-प्रधानता स्वयं ही सिद्ध हो गई। तंत्र भी तो काम प्रधान ही है।

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Tantra versus Holi festival

Holi hai ………. Lots of good luck of Holi to all friends. The name “Holi” is tantric. The letter “L” is considered to be a romantic in Tantra. The seed-syllable of the root chakra is “Lm”, and the seed-mantra of it is “Kleem”. Both have the same letter “L”. Mulaladar chakra is also considered as pro-romantic. There was also an incident related to seed-syllable with Premyogi vajra. He was a member of the online Kundalini-group, in which many people had names containing the alphabet “L”. There were also two “L” in many names. For example, “Llo”, “Lee”, and “li” etc. He had most of his conversations with those people having names bearing “L” in any form. From this, his root chakra was awakened itself. From that, the tendency of tantric sexual activity was awakened in him, so that soon his kundalini awoke. Together, their faces were also red in color. Red color is also considered to be erotic. Premyogi vajra got support from that too.

His name was Hridayesh on that forum. It means “lord of the heart”. A mature and healthy heart can keep the mooladhara active for a long time. Due to being very diligent, his navel-chakra was also functional. Heart-chakra and Muladhadara chakra both require a lot of power. Navel Chakra was supplying power for both. Therefore, we can also call the Naval Chakra as a bridge connecting the Anahata Chakra and Muladhadra Chakra together.

In the same way, in the Goddess Bhagwat Puran, there is a story that in a forest, from the mouth of a person, due to fear, some seed syllables emanated itself, because he was also handicapped mentally and verbally as well. With the help of the same seed syllable, Goddess was pleased, due to which he started progressing in every way.

The second factor to highlight Holi’s relationship with tantra is red color. We all know that Holi’s main color is red color. This color also produces the passion of Holi. You must be surprised to know that the kunkum (sacred red color powder), which is most commonly used in the general life, that is turmeric only. Mix 95 part turmeric powder with five parts lime (dissolved in water) and when it is dried in the shade, then it becomes red. Since the amount of lime is very low, this form made in this way is not harmful to the body. However, vermilion is very different. It is a compound of mercury and lead, hence can also cause harm to the health, if not used in the manner. Its color is orange. Think of the red color shown on the Hanuman as vermilion. Similarly, gulals are also of many colors, and are natural. Red gulal from reddish plants, blue gulal from indigo etc. Holi colors should be made by themselves. In the market, there are mostly synthetic colors, which are harmful to the body. For the above reasons only the color of the root chakra of tantra is red.

Holika Dahan is also according to the tantra. We know that yajna rituals are mostly tantric. Tantric experiences his kundalini in the middle of the fire burning in Yajna. This makes his kundalini very strong, because that is shining with the shine of fire.

On the day of Holi, it is according to the tantra the ritual of coloring directly each other or with water mixed colors. We all know that everybody has to enjoy the deeds done by him. With Tantric Yoga, this process becomes simpler. The mental imprints of the actions that give phala become so weak with the practice of tantric yoga that either these are destroyed directly, or are destroyed by giving slightest phala or results. Being distorted from the colors of Holi, there is a way to get punishment for the body from the pre-existing misdeeds. It may be that according to past deeds someone has to bear serious injuries to his body. When the body becomes deformed with the color of Holi, then it is considered to be the loss of the body, due to which the karma associated with it becomes lose. With the additional help of Tantric Yoga, it is fully destroyed. Similarly, a karma that is able to drown someone through water immersion becomes calm with only one stream of colored water on Holi. According to the same principle, the past misdeeds become calm after the light joke and debate that runs on Holi. Now think, the Lath mar Holi (stick-fight) of Barsana can loosen even the storage of old misdeeds.

Now the old story is that on Holi, his sister Holika, who had the intention to kill her brother Prahlad, had become combusted herself. In reality, misdeeds of his father Hiranyakashipu have been called as Holika. It is said that the son has to suffer the misdeeds of his father. Those misdeeds (described as the daughter of Hiranyakashipu and sister of Prahlad) were destroyed with the tantric influence of Holi that means Holika was burnt.

In fact, the passion and shine of Kamdeva (god of romance) is present all around on the day of Holi, because all people are working together to grow romance. It gives a lot of force to the Mooladhar Chakra. It is the tantric theory that any work undertaken during the activation of the Muladhara is fruitful many folds. Only then is Holi’s day considered as the best for tantric accomplishment. Even if the Kundalini of Tantric Yogi cannot be awakened on that day, then too, Kundalini gets very much strength. In fact, the activity of Kundalini is also considered that much important, as much as its awakening.

Many people think the historical start of Holi with the love of Krishna-Radha. In this, Holi’s romantic nature is itself proved. Tantra is also romantic in nature.

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