कुंडलिनी तंत्र को उजागर करती लोकप्रिय फिल्म बाहुबली

दोस्तो, मैं एक पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कुंडलिनी-पुरुष को अभिव्यक्त करने के लिए ही महामानव को कल्पित किया जाता है। हनुमानजी ने भी एकबार पुराने जमाने के रॉकेट मैन की तरह ही वीरता से भरा कलाकौशल दिखाया था। लंका में जब उनकी पूँछ में लपेटे गए तेल से चुपड़े कपड़े में आग लगाई जाती है, तो वे रॉकेट मैन की तरह उड़ने लगते हैं, और पूरी लंका को आग लगाकर भस्म कर देते हैं। जो यथार्थ आजके महामानव से जुड़ा है, वही पुराने समय के महामानव के साथ भी जुड़ा है। अंतर यही है कि पुराने जमाने के ऋषि जानबूझकर कुंडलिनी-पुरुष को भौतिक अभिव्यक्ति देते थे, पर आजकल के बुद्धिजीवियों से अनजाने में ही आंतरिक प्रेरणा से ऐसा हो रहा है। मैंने अपने कुंडलिनी जागरण के आसपास बड़े और अत्याधुनिक पर्दे पर बाहुबली फ़िल्म सपरिवार देखी थी। हो सकता है कि उसका भी मेरी जागृति में हाथ हो। उस तमिल मूल की हिन्दी में अनुवादित फिल्म में बाहुबली नामक काल्पनिक महामानव का ही बोलबाला था। बाहुबली का शाब्दिक अर्थ है, ‘ऐसा व्यक्ति जिसकी भुजाओं में बहुत बल हो’। वह अपने कन्धे पर सैकड़ों किलो वजन के पत्थर के शिवलिंग को लेके चलता, अकेले ही शत्रुओं की पूरी सेना को पलभर में ही परास्त करता, और नौका को दिव्य विमान की तरह उड़ाकर उस पर अपनी प्रेमिका राजकुमारी से रोमांस करता। उस फिल्म में भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों काल नजर आते थे। विचित्र सी भव्यता थी उसमें, जिसे बहुत पुरानी भी कह सकते हैं, और बहुत नई भी। उसमें एनिमेशन तकनीक, वास्तविक दृश्य और जीवंत अभिनय, तीनों का मिश्रण लाजवाब था। गीत-संगीत भी आत्मा की गहराई को छूता हुआ नजर आता था। एक रोमांटिक गाने की शुरुआत तब होती है जब बाहुबली पानी में खड़ा होकर अपनी दोनों बाजुओं का पुल बनाकर उसके ऊपर से देवसेना को गुजार कर एक बड़ी सी सुंदर किश्ती में बैठाता है। इस दृश्य में कुंडलिनी तंत्र का यह पहला उपदेश छिपा है कि तंत्र में पुरुष और स्त्री बराबर का स्थान रखते हैं, और स्त्री को देवी और गुरु के रूप में पूजनीय भी माना जाता है। बाहुबली और देवसेना का रोमांस एक उड़ती हुई नौका पर दिखाया गया है। दरअसल वह पालों वाली नौका थी जो पानी पर तैर रही थी। सुंदर तटीय पहाड़ियों के बीच से गुजरती हुई वह नौका गहरे समुद्र में पहुंच जाती है। इसका मतलब है कि दोनों का विवाहोपरांत रोमांस हल्के-फुल्के पर्यटन से शुरु होकर दुनियादारी की गहरी जिम्मेदारियों के बीच में पहुंच जाता है। वहाँ बड़े-2 तूफानों से उनकी नौका डगमगाने लगती है। इसका मतलब है कि सांसारिक उलझनों और समस्याओं से उनके प्यार का आधार उनका मनुष्य जीवन संकटग्रस्त होने लगता है। फिर देवसेना आकर्षक मुस्कान के साथ बाहुबली को कुछ गूढ़ इशारा करते हुए अपने हाथ से गुलाबी रंग छोड़ती है, जो पूरे पानी को गुलाबी कर देता है। इसमें गहरा अर्थ छिपा है। मैंने शिव-पार्वती की प्रेम-लीलाओं से सम्बंधित पिछली पोस्ट में भी बताया था कि जब तक आदमी संसारसागर में बुरी तरह से नहीं फंस जाता, तब तक वह उससे बाहर निकलने का प्रयास नहीं करता। गुलाबी रंग वास्तव में स्त्री-प्रेम का प्रतीक है। वह पानी में फैलता है, मतलब संसार से होकर ही स्त्री-प्रेम उसके पात्र तक पहुंच सकता है, संसार से भागकर नहीं। समुद्र और उसका जल यहाँ संसार का प्रतीक है। दूसरा तँत्रसम्मत अर्थ इससे यह निकलता है कि स्त्री ही तंत्र का प्रारंभ करने वाली तँत्रगुरु होती है। उससे प्रेरित बाहुबली भी जोश के साथ अपने हृदय व हाथों से नीला रंग छोड़ता है, जो चारों ओर फैल जाता है। नीला रंग पुरुष-प्रेम का प्रतीक है। ये दोनों रँग आपस में मिल जाते हैं। इसका मतलब कि दोनों का प्रेम (कुंडलिनी) एकदूसरे से और चारों ओर हर चीज से घुल मिल जाता है।  फिर उससे उमंग से भरा बाहुबली उस नौका के स्टीयरिंग को घुमाता हुआ फ्लाईंग गियर लगाता है, जिससे उसके पाल पंख बन जाते हैं, और नौका बादलों के बीच उड़ने लगती है। फ्लाईंग गियर का मतलब यहाँ तांत्रिक योग, और उससे कुंडलिनी का हृदय चक्र से ऊपर उठकर आज्ञा चक्र की तरफ जाना है। उस पर गाने-बजाने वाली और सेवा-शुश्रुषा करने वाली लोगों की पूरी महफिल भी साथ होती है। इसका मतलब है कि कुंडलिनी से आकर्षित होकर सभी लोग कुंडलिनी योगी के सहयोगी बन जाते हैं। इसका यह मतलब भी है कि सभी प्राण कुंडलिनी के साथ होते हैं। ये सभी सुविधाएं प्राणों की प्रतीक भी हैं। बादलों को घोड़ों के आकार में दौड़ते हुए व हिनहिनाते हुए दिखाया गया है। ये दरअसल इन्द्रियाँ हैं, जो तांत्रिक कुंडलिनी शक्ति से अपनी क्रियाशीलता के चरम पर होती हैं। सारस जैसे सफेद पंछियों के झुंड उड़ते व चहकते दिखाए जाते हैं। ये भी उमंग से भरे हुए मन के प्रतीक हैं। मन या जीवात्मा को पंछी की संज्ञा भी दी जाती है। वैसे भी शास्त्रों में इंद्रियों को घोड़ों के रूप में दर्शाया गया है। आसमान को तलाब की तरह दिखा कर उसमें उगे कमल पुष्पों के झुंड दिखाए गए हैं। साथ में चन्द्रमा भी एक सुंदर जमीनी वस्तु की तरह दिखता है, जिस पर भी फूल उगने लगते हैं। बादल उनकी नौका पर स्तंभों, सीढ़ियों आदि से सुंदर आकृतियों में लिपटने लगते हैं। इसका मतलब है कि कुंडलिनी या मन के सहस्रार चक्र में प्रविष्ट होने के बाद सभी जमीनी वस्तुएं औऱ जमीनी भाव दिव्य लगने लगते हैं। जमीन और आसमान एक हो जाते हैं। मूलाधार और सहस्रार एक हो जाते हैं। बादल भी इसका प्रतीक है, क्योंकि उसमें जमीन (पानी) और आसमान (हवा) दोनों के अंश होते हैं। इसीलिए बादल मनभावन लगते हैं। मन अद्वैत भाव से भर जाता है। सबकुछ एक जैसा और आनन्द से भरा हुआ लगता है।  यह तांत्रिक कुंडलिनी रोमांच ही है, जिसे इस तरह आसमानी बगीचे में उड़ती नौका के रूप में दिखाया गया है। नहीं तो मन के कुंडलिनी आनन्द को कोई कैसे दिखाए। बाहुबली और देवसेना साधारण रोमांस को कुंडलिनी रोमांस में बदल देते हैं, जिससे उनकी कुंडलिनी सहस्रार चक्र में पहुंच जाती है। इसे ही बादलों की ऊंचाई में उड़ना दिखाया गया है। पेड़ के इर्दगिर्द सिमटा रोमांस क्या रोमांस होता है? फिल्म निर्माता की दार्शनिक कल्पना शक्ति को दाद देनी पड़ेगी। इन उपरोक्त दृष्यों वाले मात्र एक गाने में ही पूरा तंत्र दर्शन सिमटा हुआ प्रतीत होता है। सम्भव है कि मेरे अवचेतन मन पर बाहुबली फिल्म की छाप पड़ी हो, और अनजाने में ही कुंडलिनी योग की तरफ मेरा आकर्षण बढ़ा हो। और ये तो अधिकांश विद्वान मानते ही हैं कि महामानव और कुछ नहीं, कुंडलिनी-मानव ही है। वैसे मैं यहाँ फ़िल्म की समीक्षा नहीं कर रहा हूँ, प्रकरणवश लिख रहा हूँ।