वह जो मेरी गुरु बनी
परिचय
हिमालय की शांत पहाड़ियों में बसे अपने घर में, धूप से गरम हुई खिड़की के पास, 52 वर्ष के ईशान शर्मा एक कप चाय और पुराने लकड़ी के पुस्तक-स्टैंड के साथ बैठे थे। उनके सामने एक ऐसी कहानी खुली पड़ी थी जो सिर्फ लिखी नहीं गई थी, बल्कि जी गई थी। बाहर की हवा ऐसे सरसराती थी जैसे कोई पन्ने पलट रहा हो, और उसी मौन में उन्होंने फिर से शुरुआत की—उन शब्दों को दोबारा छूते हुए जो कभी उनके भीतर से ऐसे बहे थे जैसे प्राचीन पत्थर से फूटता हुआ झरना।
कुछ पुस्तकें सिखाने के लिए होती हैं, कुछ प्रभावित करने के लिए, लेकिन यह पुस्तक वैसी नहीं है। यह न सिखाने आई है, न चकित करने। वह जो मेरी गुरु बनी पूर्णता की कथा नहीं है, बल्कि उस गहरी अपूर्णता की कहानी है जो प्रेम से रूपांतरित हो गई। यह उस साधक की कथा है जो साधना की खोज में नहीं था, उस मनुष्य की जो साधारण जीवन में ठोकर खाकर दिव्य से टकरा गया। यह यात्रा टूटे दिल, भ्रम और ऐसे प्रेम से शुरू होती है जिसे केवल रोमांटिक कह देना बहुत छोटा कर देना होगा।
हिमालय की शांत छाया में जन्मा ईशान एक सामान्य जीवन जीता रहा—कभी शिक्षक, कभी पशु चिकित्सक, पति, पुत्र और मित्र के रूप में। लेकिन इन सब भूमिकाओं के परदे के पीछे कुछ बहुत पुराना जाग रहा था—एक अनकहा बुलावा, एक शाश्वत स्पंदन, जिसे वह न समझ सकता था, न अनदेखा कर सकता था। और तभी वह आई। केवल एक स्त्री के रूप में नहीं, बल्कि एक दर्पण के रूप में, जिसने उसकी दृष्टि बाहर से भीतर मोड़ दी। मायरा। जिसने उसे बल से नहीं, बल्कि केवल अपने होने से ही तोड़ दिया। जिसकी अनुपस्थिति ने भीतर की उपस्थिति को जगा दिया।
इन पन्नों में पाठक को ज्ञान तक पहुँचने का कोई सीधा रास्ता नहीं मिलेगा, क्योंकि आत्मा कभी सीधी रेखा में नहीं चलती। यहाँ विज्ञान और पुराणों के बीच घूमते रास्ते हैं, स्कूल के दोस्तों की हँसी है, प्रेमियों के बीच का मौन है, चंद्रमा की झलकें हैं और भूले हुए जन्मों की गूँज है। और इन सबके बीच एक ऐसा मनुष्य है जो गुरु की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की तरह लिखता है जिसे प्रेम ने जगाया—जो आज भी भूलता है, ठोकर खाता है, उठता है और फिर याद करता है।
हर अध्याय एक स्मृति भी है और एक ध्यान भी। ईशान के अनुभवों की मिट्टी में जड़ा हुआ, रहस्यमय बोध के जल से सींचा हुआ और आंतरिक खोज के चंद्रप्रकाश में पनपा हुआ। ये शिक्षाएँ उसकी नहीं हैं; वे जीवन के हृदय से पंखुड़ियों की तरह स्वयं खुलती गईं। उसने तो बस उन्हें इन पन्नों पर उतार दिया, जैसे तब उतारा जाता है जब घाव ही ज्ञान की कोख बन जाए।
यह पुस्तक कोई निर्देश नहीं है, यह एक स्मरण है। कोई उपदेश नहीं, बल्कि भीतर से आती हुई एक हल्की-सी प्रतिध्वनि। एक गीत, एक प्रार्थना, एक सेतु—उन सभी के लिए जिन्होंने कभी आकाश की ओर देखकर फुसफुसाया हो, “क्या इससे भी कुछ अधिक है?”
हाँ, है।
और वह ऊपर नहीं, बाहर नहीं, बल्कि भीतर से शुरू होता है।
वह जो मेरी गुरु बनी में आपका स्वागत है। आशा है कि आप इसमें उत्तर नहीं, बल्कि स्वयं को पाएँगे।