गृह {आत्मज्ञान व कुण्डलिनीजागरण का वास्तविक समय का जीवंत अनुभव}- आत्मज्ञान व कुंडलिनी जागरण कैसे काम करते हैं

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विश्व योग दिवस 2019 के लिए शुभकामनाएँ

kundalini demystified : कुंडलिनी रहस्योद्घाटित आतंरिक वैबपृष्ठ

सच्चे ज्ञानपिपासु को भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि उजागर हो गए हैं उस प्रेमयोगी वज्र  के शब्द, जो एक रहस्यमय व्यक्ति होने के साथ आत्मज्ञानी है, और जिसने अपनी कुंडलिनी को भी जागृत किया हुआ है

यह वेबसाइट / ब्लॉग ई-बुक के लिए लैंडिंग पेज के रूप में शुरू हुआ। फिर इसमें एक अद्भुत सार रूप में पुस्तक की विस्तृत जानकारी शामिल की गई। तदनंतर इसमें योग के छिपे रहस्य और बाद में एक योगी की सच्ची प्रेम कहानी को भी शामिल किया गया। आशा है कि भविष्य में इसमें लेखक के दिव्य, प्राणप्रिय व आत्मीय मित्र प्रेमयोगी वज्र के सभी रहस्यात्मक अनुभव शामिल कर दिए जाएंगे। यह पुस्तक शरीरविज्ञान को दार्शनिक शैली में प्रस्तुत करती है।कोरोना वायरस महामारी का दार्शनिक मनोविज्ञान समझने के लिए इस पुस्तक से बेहतर कोई पुस्तक प्रतीत नहीं हिती। पुस्तक प्रेमी इस लिंक पर क्लिक करके पुस्तक के बारे में अच्छी तरह से जान सकते हैं (आंतरिक वेबपेज), तथा साथ में इस पुस्तक के निःशुल्क संस्कृत-संस्करण को भी डाऊनलोड कर सकते हैं। इसके साथ, कुछ पुस्तकें (हिंदी, पंजाबी व अंग्रेजी, तीनों भाषाओं में) निःशुल्क डाऊनलोड के लिए भी उपलब्ध हैं।

प्रेमयोगी वज्र अपनी उस समाधि {कुण्डलिनीजागरण/KUNDALINI AWAKENING} का वर्णन अपने शब्दों में इस प्रकार करता है

मैं लगभग 18 सालों से अद्वैत {मुख्यतः अद्वैतपरक शविद अर्थात शरीर विज्ञान दर्शन से प्राप्त, कुछ सनातन धर्म की संगति से} का पूर्ण व्यावहारिकता व कर्मठता से युक्त सांसारिकता के साथ अभ्यास, लगभग 10-11 सालों से अनियमित व अपूर्ण {बिना केन्द्रित ध्यान/focused concentration के} योगाभ्यास {इन दोनों ही प्रयासों/अभ्यासों से मेरी कुण्डलिनी मेरे मस्तिष्क में आधार स्तर पर जीवित रहती थी- आतंरिक वेबपृष्ठ}; तथा  एक साल से, एक ऑनलाइन कुंडलिनी फोरम पर रहते हुए, अपने वास्तविक घर से बहुत दूर, शान्त व तनावमुक्त स्थान पर, महान मैदानों व गगनचुंबी पर्वत श्रृंखलाओं के जंक्शन के पास, ऋषिकेश / हरिद्वार की तरह केे प्राकृतिक शांतिदायक स्थान पर (बाह्य लिंक- क्वोरा) नियमित व समर्पित रुप से उपरोक्त अतिपरिचित वृद्धाध्यात्मिक पुरुष (गुरु) के मानसिक चित्र रूपी कुण्डलिनी का ध्यान करता हुआ, कुण्डलिनीयोग का अभ्यास(बाह्य वैबसाइट/क्वोरा) कर रहा था, जिससे मेरी कुण्डलिनी, और अधिक परिपक्व हो गई थी; तथा अन्त के एक महीने से तांत्रिक विधि/प्रत्यक्षयौनयोग- तांत्रिक आतंरिक वेबपृष्ठ {या वेबपेज “शॉप (लाइब्रेरी)” में पुस्तक “Love story of a Yogi- what Patanjali says”}  (लगभग प्रतिदिन/निरंतर) को भी उपरोक्त साधना के साथ जोड़कर, अपनी कुण्डलिनी को अत्यधिक परिपक्व व ऊर्ध्वगामी बना रहा था। मैं बहुत दिनों के बाद, बहुत लंबी यात्रा करके(बाह्य वैबसाइट/क्वोरा), अपने नए व व्यक्तिगत वाहन (अत्याधुनिक विशेषताओं सहित व एक मानवीय वाहन-निर्माता संगठन से खरीदा गया) से, अत्याधुनिक व सुविधासंपन्न सड़क मार्ग से सपरिवार घर आया हुआ था। तभी एक दिन मैं एक समारोह में एक कुर्सी पर बैठा था। साधना के शांतिदायक प्रभाव के कारण मेरी दाढ़ी कुछ बढ़ी हुई थी और उसके कुल बालों में से लगभग 30% बाल सफेद नजर आ रहे थे। उस समारोह में मेरा हृदय से स्वागत हुआ था। वहां पर मुझे अपने लिए चारों ओर विशेष प्रेम व सत्कार का अनुभव हो रहा था। समारोहीय लोगों के साथ जुड़ी हुई बचपन की मेरी यादें जैसे तरोताजा हो गयी थीं। मैं अपने को खुला हुआ, सुरक्षित, शांत, तनावरहित, मानसिकता से पूर्ण(mindful), अद्वैतशाली व मानसिक कुण्डलिनी-चित्र के साथ अनुभव कर रहा था। मेरी कुण्डलिनी से सम्बंधित लोग वहां पर उपस्थित थे व वातावरण-माहौल भी मेरी कुण्डलिनी से सम्बंधित था। खड़ी व छोटी पहाड़ी पर बना वह घर जैसे चिपका हुआ सा लगता था। चहल-पहल व रौनक वहां पर लगातार महसूस हो रही थी। समारोहीय संगीत(आधुनिक प्रकार का) भी मध्यम स्तर पर बज रहा था, जिसमें गायक के बोल(lyrics) स्पष्ट नहीं सुनाई दे रहे थे। उससे वह संगीत एक प्रकार का संगीतबद्ध शोर ही लग रहा था। बहुत अच्छा लग रहा था। चिर-परिचित लोगों के खुशनुमा चेहरे जैसे यहाँ-वहाँ उड़ रहे थे व सीढ़ियों पर ऊपर-नीचे आ-जा रहे थे। मैं बीच वाली मंजिल की बालकनी में था। एक कमरे में कुछ सुन्दर व तेजस्वी स्त्रियों का समूह नृत्य-गान में व्यस्त था। कभी एक-२ करके, कभी दो-२ के समूह में और बहुत विरले मामले में तीन-२ के समूह में वे महिलाएं बारी-२ से उठकर गाने वाली 20-25 महिलाओं के घेरे के बीच में आतीं और अपने नृत्य-कौशल का प्रदर्शन करतीं। मेरे सामने वाली, हरी-भरी व रौनक से युक्त एक लम्बी, एकसमान व मध्यम ऊँचाई की पहाड़ी  पर; लगभग सिधाई में, पर्वत-शिखर से लगभग एकसमान नीचाई  पर बनी व उस घर से लगभग 100 मीटर की हवाई दूरी पर बनी एक सड़क उस घर की उंचाई के स्तर पर थी और वहां से यातायात के साधनों का शोर भी मध्यम स्तर पर सुनाई दे रहा था। उस पहाड़ी पर स्थित सूर्य के मुंह की लाली पूरे दिन की थकान के कारण बढ़ती ही जा रही थी, जैसे कि वह अपने कर्तव्यवहन(duty) के पूरा होने का इंतजार बड़ी बेसब्री से कर रहा था। मेरा बहुत समय बाद मिल रहा, एक पुराना व कुछ समय पहले ही सेवानिवृत्त सैनिक, मेरे मानसिक कुण्डलिनी-चित्र के भौतिक रूप से सम्बंधित व उसके जैसे ही कर्मठता आदि गुणों से युक्त स्वभाव वाला, मित्र सहित ज्ञाति-भ्राता, हंसमुख व तेजस्वी मुद्रा में जैसे ही अपनेपन के साथ मेरा हालचाल पूछने लगा, वैसे ही मैं भी अपनी ओर से प्रसन्नता प्रदर्शित करता हुआ खड़ा हो गया उसकी प्रसन्नता से भरी आँखों से आँखें मिलाता हुआ, जिससे अचानक ही मैं कुण्डलिनी के विचार में गहरा खो गया और वह उद्दीप्त(stimulate) होकर अचानक ही मेरे पूरे मस्तिष्क में छा गई। मेरा सिर भारी हो गया व उसमें भारी दबाव महसूस होने लगा। मस्तिष्क में वह दबाव विशेष रूप का था, क्योंकि साधारण दबाव तो चेतना को भी दबा देता है, परन्तु वह दबाव तो चेतना(consciousness) को भड़का रहा था। ऐसा लग रहा था, जैसे कि मेरे मस्तिष्क के अन्दर चेतना की नदी(river of consciousness) भंवर के रूप में, पूरे वेग के साथ घूम रही हो और मेरे मस्तिष्क के कण-२ को कम्पित कर रही हो, जिसे सहन करने में मेरा मस्तिष्क अस्मर्थ हो रहा था। वह चेतना का प्रचंड भंवर मेरे मस्तिष्क में, बाहर की ओर एक विस्फोटक दबाव बनाता हुआ प्रतीत हो रहा था। उस चेतना-भंवर(consciousness whirl) को चलाने वाली, मुझे अपनी कुण्डलिनी प्रतीत हो रही थी, क्योंकि वह हर जगह अनुभव हो रही थी। उस तरह की हल्की सी, तूफानी सी, गंभीर व समान रूप की आवाज का अनुभव हो रहा था, जिस तरह की आवाज मधुमक्खियों के झुण्ड के एक साथ उड़ने से पैदा होती है। वास्तव में वह कोई आवाज भी नहीं थी, परन्तु उससे मिलता-जुलता, सन्नाटे से भरा हुआ, मस्तिष्क के एक विचित्र प्रकार के दबाव या कसाव से भरा हुआ, विशाल आत्मचेतना का अनुभव था। वैसा दबाव, जैसा कि शीर्षासन या सर्वांगासन करते हुए मस्तिष्क में अनुभव होता है; यद्यपि वह अनुभव उससे कहीं अधिक दबाव के साथ, उपर्युक्त सन्नाटे के साथ, चेतनापूर्ण, प्रकाशपूर्ण, कुण्डलिनीपूर्ण एवं आनंदमयी था। यदि अपने अन्दर चल रही, सन्नाटे व आवाज, एकसाथ दोनों से भरी हुई सरसराहट जैसी गुप्त हलचल(यद्यपि आवाज नहीं, पर आवाज की तरह) विद्युत्-ट्रांसफार्मर(electric ट्रांसफार्मर) को स्वयं को अनुभव होए, तो वह उसे कुण्डलिनीजागरण के जैसी स्थिति समझे। वह आत्मज्ञान भी नहीं था, अपितु उससे निम्नस्तर का अनुभव था।  वह ओम (बाह्य वेबसाईट- भारतकोष) के बीच के अक्षर, “ओ—————-” की एकसमान व लम्बी खिंची हुई आवाज की तरह की अनुभूति थी। संभव है कि ओम का रहस्य भी कुण्डलिनीजागरण में छुपा हुआ हो। दृष्यात्मक अनुभव भी जैसे झुण्ड की मधुमक्खियों की तरह ही, मस्तिष्क को फोड़ कर बाहर निकलने के लिए बेताब हो रहे थे। शक्तिशाली फरफराहट के साथ, जैसे वह अनुभव ऊपर की ओर उड़ने का प्रयास कर रहा था। अतीव आनंद की स्थिति थी। वह आनंद एकसाथ अनुभव किए जा सकने वाले सैंकड़ों यौनसंबंधों से भी बढ़ कर था। सीधा सा अर्थ है कि इन्द्रियां उतना आनंद उत्पन्न कर ही नहीं सकतीं। मेरी कुण्डलिनी पूरी तरह से प्रकाशित होती हुई, सूर्य का मुकाबला कर रही थी। वह प्रत्यक्ष के भौतिक पदार्थों से भी अधिक स्पष्ट, जीवंत व वास्तविक लग रही थी। मेरी आँखें खुली हुई थीं व गंभीरता से नज़ारे निहार रही थीं। जहाँ पर भी दृष्टि जा रही थी, वहीँ पर कुण्डलिनी दृष्टिगोचर हो रही थी। ऐसा लग रहा था, जैसे सभी कुछ कुण्डलिनी के रंग में रंगा हुआ हो। सभी अनुभव एकसमान, परिवर्तनरहित व पूर्ण जैसे लग रहे थे। मेरा अहंकार या व्यक्तित्व पूर्णतया नष्ट हो गया था। मैं अपने स्वास्थ्य के प्रति चिंतित हो रहा था। मुझे अपने व्यक्तित्व का कुछ भी भान नहीं रहा। मेरे साथ में कुर्सी पर बैठे २-३ लोग, आते-जाते कुछ लोग व वह ज्ञाति-भ्राता भी आश्चर्य, शंका व संभवतः तनिक चिंता से मेरी ओर देखने लगे; जिससे मुझे तनिक संकोच होने लगा। हड़बड़ाहट में मैं साथ ही बालकनी की ग्रिल से सटी अपनी कुर्सी पर बैठ गया, और मैंने थोड़ा सिर झुकाते हुए अपने माथे की ऊपरी सीमा को दाएं हाथ की अँगुलियों के अग्रभागों से मध्यम दबाव के साथ दबाते हुए बार-बार मला व आँखों को भींचते हुए अपने व्यक्तित्व में वापिस लौटने का प्रयत्न किया। कुछ प्रयत्न के बाद मेरी कुण्डलिनी मेरे मस्तिष्क से वापिस नीचे लौट आई। कुछ चंद क्षणों के बाद जैसे ही मुझे अपनी भूल का अहसास हुआ, उसी समय मैंने अपनी चमकती हुई कुण्डलिनी को वापिस ऊपर चढ़ाने का भरपूर प्रयास किया, परन्तु मैं सफल न हो सका, यद्यपि मैंने अपने आप को बहुत अधिक प्रसन्न, तरोताजा, तनावरहित, चिन्तारहित व अनासक्ति/द्वैताद्वैत  से संपन्न अनुभव किया। कुण्डलिनीजागरण के उस अनुभव के समय, मुझे अपने चेहरे पर गर्माहट व लाली महसूस हो रही थी। ऐसा अनुभव मुझे अप्रत्यक्षतंत्र/सांकेतिक तंत्रयोग/दक्षिणपंंथी तन्त्र के समय भी होता था, जब प्रथम देवीरानी का चित्र मेरे मस्तिष्क में स्पष्ट व प्रचंड हो जाया करता था, यद्यपि इस बार के जागरण की अपेक्षा मध्यम स्तर के साथ। इस बार देवीरानी का नहीं, अपितु उन पुराणपाठी तांत्रिक-वृद्धाध्यात्मिकपुरुष (वे एक कमरे में पुराणों का इक्के-दुक्के श्रोताओं के सम्मुख अर्थ सहित पाठ कर रहे होते थे और प्रेमयोगी वज्र साथ वाले कमरे में विज्ञान विषय का गहराई से अध्ययन कर रहा होता था- पढ़ें ईपुस्तक, कुण्डलिनी रहस्योद्घाटित- प्रेमयोगी वज्र क्या कहता है) का चित्र सर्वाधिक स्पष्ट व प्रचंड रूप से अनुभव हुआ, यद्यपि केवल १० सेकण्ड के लिए। प्रथम देवीरानी का चित्र तो मस्तिष्क में लगभग सदैव बना रहता था; कभी हल्के स्तर में, कभी मध्यम स्तर में और कभी प्रचंड स्तर में। यद्यपि इस बार कुण्डलिनी का चित्र सर्वोच्च स्तर पर अभिव्यक्त हुआ। वृद्धाध्यात्मिकपुरुष का मानसिक चित्र(कुण्डलिनी) भी लगभग सदैव(यद्यपि देवीरानी की अपेक्षा कुछ कम समय तक) बना रहता था, परन्तु वह अधिकांशतः हल्के स्तर पर ही अभिव्यक्त होता था; मध्यम या प्रचंड स्तर पर अपेक्षाकृत रूप से बहुत कम। ऐसा लगता है कि ऐसी भिन्नता के लिए, मेरा यौवन तथा भौतिक/कामप्रधान परिवेश जिम्मेदार था। यदि आध्यात्मिक परिवेश होता, तो सम्भवतः इसका उलटा होता, अर्थात वृद्धाध्यात्मिकपुरुष का मानसिक चित्र देवीरानी की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली बना करता। देवीरानी के चित्र ने कभी भी अपने भौतिकरूप के स्तर से अधिक अभिव्यक्ति नहीं दिखाई, परन्तु इस कुण्डलिनीजागरण में, वृद्धाध्यात्मिकपुरुष के चित्र ने तो अपने को, अपने भौतिकरूप के स्तर से भी अधिक अभिव्यक्त कर दिया। उस अनुभव से मेरे मन में स्त्रीमोह का फंदा काफी ढीला पड़ गया था, क्योंकि बिना कामोत्तेजना के ही सर्वाधिक स्पष्ट मानसिक चित्र बनना, किसी आश्चर्य से कम नहीं था। प्रथम देवीरानी के मानसिक चित्र(क्रियाशील कुण्डलिनी) के साथ मुझे कभी भी पूर्ण समाधि (जागृत कुण्डलिनी) की अनुभूति नहीं हुई {आतंरिक तांत्रिक वेबपृष्ठ या वेबपेज “शॉप (लाइब्रेरी)” में पुस्तक “Love story of a Yogi- what Patanjali says”}, अर्थात वह कुण्डलिनी क्रियाशील तो निरंतर बनी रही, परन्तु कभी जागृत नहीं हो सकी {प्रथम देवीरानी से आत्मज्ञान की कहानी देखें- आतंरिक तांत्रिक वेबपृष्ठ या वेबपेज “शॉप (लाइब्रेरी)” में पुस्तक “Love story of a Yogi- what Patanjali says”}। यद्यपि कालान्तर में द्वितीय देवीरानी ने प्रत्यक्ष/पूर्ण तंत्रयोग/ तथाकथित वामपंथी तंत्र (बाह्य वेबसाईट- isha.sadhguru.org) करवा कर, उन वृद्धाध्यात्मिक पुरुष के मानसिक चित्र की कुण्डलिनी को मेरे शरीर में बहुत ऊपर उठवाया व जागृत करवाया {वास्तविक समय की सम्बंधित कहानी इस आतंरिक वेबपेज या वेबपेज “शॉप (लाइब्रेरी)” में पुस्तक “Love story of a Yogi- what Patanjali says” पर देखें}। साथ में, यह इस तांत्रिक सिद्धांत को सिद्ध करता है कि तांत्रिक प्रेमिका / प्रेमी की संगति के साथ-२ आध्यात्मिक / तांत्रिक गुरु की संगति भी उपलब्ध होती रहनी चाहिए {आतंरिक तांत्रिक वेबपृष्ठ या वेबपेज “शॉप (लाइब्रेरी)” में पुस्तक “Love story of a Yogi- what Patanjali says”} संभवतः इसी कुण्डलिनीजागरण/समाधि को ही सहस्रार चक्र/मस्तिष्क में कुण्डलिनी का परब्रम्ह/आत्मा से जुड़ना/एकाकार होना कहा गया है। प्रेमयोगी वज्र की वास्तविक समय की सम्पूर्ण तांत्रिक प्रेमकथा इन वेबपृष्ठों पर पढ़ सकते हैं {आतंरिक तांत्रिक वेबपृष्ठ या वेबपेज “शॉप (लाइब्रेरी)” में पुस्तक “Love story of a Yogi- what Patanjali says” }

अतिरिक्त स्पष्टीकरण

प्रेमयोगी वज्र के अनुसार कुंडलिनी जागृति का अनुभव सामान्य, न्यूरोसाइंटिफिक रूप से व्याख्यात्मक और मूल रूप से मन-विज्ञान के अनुसार ही प्रतीत हुआ; कभी भी रहस्यमयी प्रतीत नहीं हुआ। कुण्डलिनी-जागरण के समय कुण्डलिनी का ध्यान अपने चरम पर होता है, अर्थात ध्याता(कुण्डलिनी का ध्यान करने वाला व्यक्ति), ध्येय(कुण्डलिनी) व ध्यान(ध्यान की प्रक्रिया), तीनों एक हो जाते हैं। इसे दूसरे शब्दों में ऐसे भी कह सकते है कि ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय एक हो जाते हैं। इसे पूर्ण समाधि की अवस्था भी कहते हैं। इसमें अन्धकारयुक्त आत्मा चमकती कुण्डलिनी के साथ एकाकार हो जाता है, अर्थात आत्मा प्रकाशपूर्ण हो जाता है। इससे साधक अनजाने में ही, स्वयं ही अपनी आत्मा को स्वच्छ करने के अभियान में लग जाता है। क्योंकि अद्वैतभाव से ही आत्मा स्वच्छ हो सकती है, अतः उसमें अद्वैतभाव स्वयं ही विकसित होने लगता है, जो उसकी जीवनशैली को भी सकारात्मक रूप से रूपांतरित कर देता है। प्रेमयोगी वज्र के कुण्डलिनी-जागरण को संभव बनाने वाली वास्तविक-समय(real time) की परिस्थितियों व तदनुसार किए गए प्रयासों को जानने के लिए Love story of a Yogi (आतंरिक तांत्रिक वेबपृष्ठ) या वेबपेज “शॉप (लाइब्रेरी) में पुस्तक “Love story of a Yogi- what Patanjali says” का व अधिक विस्तृत जानकारी के लिए उपरोक्त ई-पुस्तक का अवलोकन किया जा सकता है।

साथ में, उपरोक्त प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, दोनों प्रकार के यौनतंत्रों के अस्तित्व का यह अर्थ भी है कि विवाहित जीवन में एक महिला की आकर्षकता का महत्त्व कम ही होता है।

कुण्डलिनीजागरण के मूल / ओरिजिनल विवरण (ओनलाईन फोरम की चर्चा के अंतर्गत) यहाँ पढ़ें (आतंरिक लिंक)

प्रेमयोगी वज्र अपने आत्मजागरण/आत्मज्ञान(ENLIGHTENMENT) का वर्णन अपने शब्दों में इस प्रकार करता है

मैं मीठी निद्रा में एक स्वप्न देख रहा हूँ कि मैं अपने घर से लगभग २०० मीटर नीचे, घाटी की नदी के ऊपर बने हुए एक पुल पर खड़ा हूँ। तभी मैंने अचानक अपने को पूरा खुला हुआ अनुभव किया और मेरी अन्धकार से भरी आत्मा में अचानक प्रकाश छा गया। ऐसा लगा, जैसे कि मेरी आत्मा एक जकड़न से मुक्त हो गई। मन का प्रकाश जैसे आत्मा में फैल गया था। मैंने नदी में बहते जल को देखा। वह वैसे ही रूप-रंग का था, जैसा कि होता है, परन्तु वह मुझे अपनी आत्मा व पुल से अलग नहीं लग रहा था। पुल भी वैसा ही था, पर अनुभव-रूप में मेरी आत्मा व नदी-जल से अलग नहीं था। नदी से दूसरी ओर, सामने एक पहाड़ था, जिसका लगभग २० मीटर का मलबा, कई दिनों पहले, निरंतर हो रही भारी वर्षा के कारण गिरकर, नदी को संकरा किये हुए था। वह मलबा चमत्कारिक रूप से सीधे ही नीचे फिसला था, जिससे उसपर उपस्थित सभी पेड़-पौधे भी जीवित व सुरक्षित थे। उपरोक्त दिव्य, विचित्र व आत्मज्ञान से भरे स्वप्न में; मैंने उसकी ओर भी देखा, तो उस सब का अनुभव भी अलग नहीं था। फिर मैंने अपनी दृष्टि को ऊपर उठा कर, आसमान में चमकते हुए महान सूर्य को देखा। उसका अनुभव भी सभी के जैसा था और यहाँ तक कि चमक भी सभी के जैसी ही थी। इस सारे घटनाक्रम का अनुभव लगभग ५-१० सैकेंड में ही हो गया था। उस समय मैं परमानंद से ओत-प्रोत था। मुझे उस अनुभव में वह सभी कुछ मिल गया, जो कि मिलना संभव है। उन चंद क्षणों के लिए जैसे मैं संपूर्ण ब्रम्हांड/सृष्टि/अंतरिक्ष का राजा / परमदेवता-सदृश बन गया था। उस अनुभव में रात(अंधकार) और दिन(प्रकाश) जुड़े हुए थे। उस अनुभव में प्यार-घृणा, दोनों जुड़े हुए थे। इसका अर्थ है कि उस अनुभव में सभी कुछ विद्यमान था। वह एक पूर्ण अनुभव था। अपनी आत्मा के उस पूर्ण अनुभव-सागर में मुझे लग रहा था कि जैसे नदी, पुल, सूर्य, पहाड़ आदि के रूप में लहरें उठ रही थीं, जोकि उस एकमात्र अनुभव-सागर से अलग नहीं प्रतीत हो रही थीं। अगली सुबह जब मैं अपनी शय्या से ऊपर उठा; तो मैंने अपने को पूर्ण, पूर्णकाम, आप्तकाम, नवजात-बालक सदृश, तनाव-रहित, चिन्तारहित, भयरहित, शांत, आनंदमय व इच्छाहीन पाया, तथा अपने को अपने स्वाभाविक आत्मरूप में प्रतिष्ठित महसूस किया। ऐसा लगा, जैसे कि मैंने अपने-आप को अब वास्तविक रूप में पहचाना है और अज्ञात समय से चली आ रही जिंदगी की दौड़ को पूरा कर लिया है। मुझे ऐसा लगा कि जैसे कभी अपने घर से भटका हुआ, अब मैं अपने वास्तविक घर में पहुँच गया हूँ। उस अनुभव ने मेरे जीवन को एकदम से, पूर्णतया व सकारात्मक रूप से परिवर्तित कर दिया।

उपरोक्त को मूलस्रोत में देखें (आतंरिक वेबपृष्ठ)

स्पष्टीकरण

आम अवस्था में अपना आपा अर्थात आत्मा (बाह्य वेबसाईट- vedicaim.com) एक गहरे अंधेरे से भरे कमरे की तरह होता है, और सांसारिक/मानसिक दृश्य, उस अंधेरे कमरे के चलचित्रपट पर दौड़ रहे प्रकाशमान दृश्य की तरह होते हैं। उस आत्मज्ञान के समय वह आत्मा रूपी अँधेरा कमरा अचानक व एकदम से प्रकाशमान हो गया, जिससे कमरे/आत्मा व चलचित्र दृश्य/मन-संसार के बीच का अंतर समाप्त हो गया और वे सभी एक जैसे दिखने लगे।

वास्तव में हमारी अपनी अंधकारमयी आत्मा सभी बुराइयों के रूप में विद्यमान है। हमारी चमकदार चित्तवृत्तियाँ/संकल्प-विकल्प सभी अच्छाइयों के रूप में विद्यमान हैं। जब आत्मा व चित्तवृत्तियाँ एकसमान चेतना व प्रकाश से युक्त अनुभव होती हैं, तब उपरोक्त आत्मजागरण के अनुभव के अनुसार अपनी आत्मा में अच्छाइयां व बुराइयां एकसाथ ही चमत्कार रूप से अनुभव होती हैं।

किसी भी ज्ञान/वस्तु/कर्म/फल की अभिव्यक्ति का आधार चित्तवृत्तियाँ ही तो हैं। जिस समय आत्मा जागृत होती है, उस समय सभी चित्तवृत्तियाँ उससे अलग नहीं, अपितु उसी की विविध आकार-प्रकार की हलचलें जान पड़ती हैं, जैसे कि सागर में विविध प्रकार की तरंगें। इसी कारण से प्रेमयोगी वज्र को लगा कि उसने सभी कुछ पा लिया था, व सभी कुछ कर लिया था।

परमदेवता को ही सभी कुछ सदैव प्राप्त होता है, व सभी कुछ उसने सदैव किया हुआ होता है; तभी तो वह अपने बनाए हुए जगत में कोई स्वार्थबुद्धि नहीं रखता। क्योंकि प्रेमयोगी वज्र को 10 सेकंड की यह अनुभूति हुई कि उसने सभी कुछ प्राप्त कर लिया है, और सभी काम कर लिए हैैं; इसलिए उसे लगा कि वह उस 10 सेकंड के लिए परमदेवता बन गया था। फिर भी, उसे उन चंद क्षणों के लिए भी ईश्वर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि किसी के भी लिए भी ईश्वर बनना असंभव है, तभी तो उसने उन चंद क्षणों के लिए ईश्वर-सदृश / परमदेवता-सदृश ही बोला है, ईश्वर नहीं। यद्यपि उसे ईश्वर का पुत्र जरूर कहा जा सकता है। समस्त स्थूल सृष्टि ईश्वर के अन्दर, सागर में तरंगों की तरह ही विद्यमान है। किसी के मन में जो कुछ भी है, वह स्थूल सृष्टि का प्रतिबिम्ब ही है। इसलिए जीव के मन को सूक्ष्म सृष्टि भी कह सकते हैं। क्योंकि प्रेमयोगी वज्र ने अपने अन्दर (अपनी आत्मा के अन्दर) सूक्ष्म सृष्टि को, सागर में तरंगों की तरह अनुभव किया, स्थूल सृष्टि को नहीं, इसलिए वह ईश्वर का पुत्र या प्रतिबिम्ब ही कहलाया। इसीलिए वह शक्तियों के मामले में ईश्वर के सामने नगण्य ही था, और एक आम आदमी से बढ़कर कुछ भी नहीं था।

प्रेमयोगी वज्र ने आत्मज्ञानावस्था को द्वैत से भरे लोगों के लिए क्रोधपूर्ण पाया। ऐसा इसलिए है, क्योंकि क्षणिकात्मज्ञान की झलक के बाद, उन्होंने द्वैतवादी लोगों को अपने से भयभीत जैसा और अपने प्रति घृणायुक्त जैसा पाया, क्योंकि वे उनकी प्रबुद्ध आत्मस्थिति में अंधेरे जैसे का अनुभव करते थे। इसी प्रकार, उन्होंने प्रबुद्ध आत्मराज्य को वास्तविक अद्वैतवादी लोगों के लिए आशीर्वाद देने वाले के रूप में पाया। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उनकी क्षणिकात्मज्ञान की झलक के बाद, उन्होंने अद्वैतवादी लोगों को अपने से प्यार करने वाले के रूप में और अपने प्रति आकर्षित होने वाले के रूप में पाया। वे अपने अद्वैतमयी दृष्टिकोण के स्तर के अनुसार प्रबुद्ध आत्मज्ञानराज्य में थोड़े अंधेरे से लेकर शून्य अंधेरे तक का अनुभव करते थे।

प्रेमयोगी वज्र के इस क्षणिक आत्मजागरण को संभव बनाने वाली परिस्थितियों (विशेषतः यिन-यांग आकर्षण से उत्पन्न दृढ़ समाधि) व तदनुसार किए गए प्रयासों को जानने के लिए Love story of a Yogi का व अधिक विस्तृत जानकारी के लिए उपरोक्त ई-पुस्तक का अवलोकन किया जा सकता है।

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