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पुस्तक परिचय

यह ई-पुस्तक एक प्रकार की आध्यात्मिक-भौतिक प्रकार की मिश्रित कल्पना पर आधारित है। यह हमारे शरीर में प्रतिक्षण हो रहे भौतिक व आध्यात्मिक चमत्कारों पर आधारित है। यह दर्शन हमारे शरीर का वर्णन आध्यात्मिकता का पुट देते हुए, पूरी तरह से चिकित्सा विज्ञान के अनुसार करता है। इसी से यह आम जनधारणा के अनुसार नीरस चिकित्सा विज्ञान को भी बाल-सुलभ सरल व रुचिकर बना देता है। यह पाठकों की हर प्रकार की आध्यात्मिक व भौतिक जिज्ञासाओं को शांत करने में सक्षम है। यह सृष्टि में विद्यमान प्रत्येक स्तर की स्थूलता व सूक्ष्मता को एक करके दिखाता है, अर्थात यह द्वैताद्वैत/विशिष्टाद्वैत की ओर ले जाता है। यह दर्शन एक उपन्यास की तरह ही है, जिसमें भिन्न-२ अध्याय नहीं हैं। प्रेमयोगी वज्र ने इसे किसी पर आधारित करके नहीं, अपितु अपने ज्ञान, अनुभव व अपनी अंतरात्मा की प्रेरणा से रचा है; यद्यपि बाद में यह स्वयं ही उन मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित प्रतीत हुआ, जिन पर पहले की बनी हुई बहुत सी रचनाएं विद्यमान हैं। यह दर्शन कर्मयोग, तंत्र, अद्वैत, द्वैताद्वैत, ताओवाद(taoism) व अनासक्ति के आध्यात्मिक सिद्धांतों पर आधारित है। इस दर्शन में देशभक्ति व राष्ट्रीयता भी कूट-कूट कर भरी हुई है। यह दर्शन वास्तव में लगभग २० वर्षों के दौरान, एक-२ विचार व तर्क को इकट्ठा करके तैयार हुआ, जिनके साथ प्रेमयोगी वज्र का लंबा व व्यस्त जीवन-अनुभव भी जुड़ता गया। इसीसे यह दर्शन जीवंत व प्रेरणादायक प्रतीत होता है। प्रेमयोगी वज्र ने वैसे तो इसे अपने लाभ के लिए, अपने निजी दर्शन के रूप में निर्मित किया था, यद्यपि इसके अभूतपूर्व प्रभाव को देखते हुए, इसे सार्वजनिक करने का निर्णय बाद में लिया गया। प्रेमयोगी वज्र को इस दर्शन से सम्बंधित वस्तुओं को अपने यात्रा-थैले(COMMUTE BAG) में डालने की आदत पड़ गई थी, क्योंकि उससे उसे एक दिव्य, प्रगतिकारक व सुरक्षक शक्ति अपने चारों ओर अनुभव होती थी। इसका अर्थ है कि शविद(शरीर-विज्ञान-दर्शन) को ई-रीडिंग डीवाईसीस पर डाउनलोडिड-रूप(DOWNLOADED FORM) में सदैव साथ रखने से तांत्रिक लाभ की संभावना है। इस दर्शन से प्रेमयोगी वज्र का अध्यात्म व भौतिकता को आपस में जोड़ने का लम्बा स्वपन पूरा होता है। प्रेमयोगी वज्र को पूर्ण विश्वास है कि इस दर्शन की धारणा से मुक्ति प्रत्येक मानवीय स्थिति में पूर्णतया संभव है। ऐसा ही अनुभव प्रेमयोगी वज्र को भी तब हुआ था, जब शविद के पूरा हो जाने पर वह खुद ही कुण्डलिनीयोग के उच्च स्तर पर प्रतिष्ठित हो गया और कुछ अभ्यास के उपरान्त उसकी कुण्डलिनी उसके मस्तिष्क में अचानक से प्रविष्ट हो गई, जिससे उसे क्षणिक समाधि का अनुभव हुआ। अपने क्षणिकात्मज्ञान के बाद जब प्रेमयोगी वज्र की कुण्डलिनी इड़ा(भावनात्मक)नाड़ी में सत्तासीन हो गई थी, तब इसी दर्शन की सहायता से प्रेमयोगी ने उसका प्रवेश पिंगला नाड़ी(कर्मात्मक)में करवा कर उसे संतुलित किया। यह दर्शन सभी के लिए लाभदायक है; यद्यपि स्वास्थ्य व शरीर से सम्बंधित, सुरक्षा से सम्बंधित, कठिन परिश्रमी, उद्योगी, मायामोह में डूबे हुए, अनुशासनप्रिय, भौतिकवादी, वैज्ञानिक, समस्याओं से घिरे हुए लोगों के लिए तथा धर्म, मुक्ति, मानवता, विज्ञान व कैरियर के बारे में भ्रमित लोगों के लिए यह अत्यंत ही लाभदायक है। प्रेमयोगी वज्र को कुण्डलिनी के बारे में हर जगह भ्रम की सी स्थिति दिखी। यहाँ तक कि प्रेमयोगी वज्र स्वयं भी तब तक भ्रम की स्थिति में रहा, जब तक उसने कुण्डलिनी को साक्षात व स्पष्ट रूप में अनुभव नहीं कर लिया। अतःकुण्डलिनीजिज्ञासुओं के लिए तो यह पुस्तक किसी वरदान से कम नहीं है। मूलरूप में शविद संस्कृत भाषा में लिखा गया था, परन्तु आम पाठकों के द्वारा समझने में आ रही परेशानियों व ई-छपाई कंपनियों द्वारा वर्तमान में संस्कृत भाषा को सपोर्ट न किये जाने के कारण इसका हिंदी में अनुवाद करना पड़ा। यह अन्य मिथक साहित्यों से इसलिए भी भिन्न है, क्योंकि यह मिथक होने के साथ-२ सत्यता से भी भरा हुआ है, अर्थात एक साथ दो भावों से युक्त है, बहुत कुछ पौराणिक साहित्य से मिलता-जुलता। इसे पढ़कर पाठक शरीर-विज्ञान के अनुसार शरीर की अधिकाँश जानकारी प्राप्त कर लेता है; वह भी रुचिकर, प्रगतिशील व आध्यात्मिक ढंग से। इस पुस्तक में प्रेमयोगी वज्र ने अपने अद्वितीय आध्यात्मिक व तांत्रिक अनुभवों के साथ अपनी सम्बन्धित जीवनी पर भी थोड़ा प्रकाश डाला है। इसमें जिज्ञासु व प्रारम्भिक साधकों के लिए भी आधारभूत व साधारण कुण्डलिनीयोग-तकनीक का वर्णन किया गया है। आधारभूत यौनयोग पर भी सामाजिकता के साथ सूक्ष्म प्रकाश डाला गया है। प्रेमयोगी ने इसमें अपने क्षणिकात्मज्ञान(GLIMPSE ENLIGHTENMENT) व सम्बंधित परिस्थितियों का भी बखूबी वर्णन किया है। प्रेमयोगी ने विभिन्न धर्मों, वेदों, पुराणों, उपनिषदों, दर्शनों व अन्य धर्मशास्त्रों का भी अध्ययन किया है, मूल भाषा में; अतः अत्यावश्यकतानुसार ही शविद(शरीरविज्ञान दर्शन)से जुड़े हुए उनके कुछेक विचार-बिंदु भी इस पुस्तक में सम्मिलित किए गए हैं। पुस्तक के प्रारम्भ के आधे भाग में, शरीर में हो रही घटनाओं का सरल व दार्शनिक विधि से वर्णन किया गया है। प्रेमयोगी वज्र एक आध्यात्मिक रहस्यों से भरा हुआ व्यक्ति है। वह आत्मज्ञानी(ENLIGHTENED) है व उसकी कुण्डलिनी भी जागृत हो चुकी है। उसने प्राकृतिक रूप से भी योगसिद्धि प्राप्त की है व कृत्रिमविधि अर्थात कुण्डलिनीयोग के अभ्यास से भी। उसके आध्यात्मिक अनुभवों को उपलेखक ने पुस्तक में, उत्तम प्रकार से कलमबद्ध किया है। जो लोग योग के पीछे छुपे हुए मनोविज्ञान को समझना चाहते हैं, उनके लिए यह पुस्तक किसी वरदान से कम नहीं है। इस पुस्तक में स्त्री-पुरुष संबंधों का आधारभूत सैद्धांतिक रहस्य भी छुपा हुआ है। यदि कोई प्रेमामृत का पान करना चाहता है, तो इस पुस्तक से बढ़िया कोई भी उपाय प्रतीत नहीं होता। इस पुस्तक में सामाजिकता व अद्वैतवाद के पीछे छुपे हुए रहस्यों को भी उजागर किया गया है। वास्तव में यह पुस्तक सभी क्षेत्रों का स्पर्ष करती है। अगर कोई हिन्दुवाद को गहराई से समझना चाहे, तो इस ई-पुस्तक के समान कोई दूसरी पुस्तक प्रतीत नहीं होती। यदि दुर्भाग्यवश किसी का पारिवारिक या सामाजिक जीवन समस्याग्रस्त है, तो भी मार्गदर्शन हेतु इस पुस्तक का कोई मुकाबला नजर नहीं आता। यह पुस्तक साधारण लोगों(यहाँ तक कि तथाकथित उत्पथगामी व साधनाहीन भी)से लेकर उच्च कोटि के साधकों तक, सभी श्रेणी के लोगों के लिए उपयुक्त व लाभदायक है। उपन्यास के शौकीनों को भी यह ई-पुस्तक रोमांचित कर देती है। इस पुस्तक को बने बनाए क्रम में ही सम्पूर्ण रूप से पढ़ना चाहिए और बीच में कुछ भी छोड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि इसे उचित क्रम में ही श्रृंखलाबद्ध किया गया है। एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद पाठकगण तब तक पीछे मुड़कर नहीं देखते, जब तक कि इस पुस्तक को पूरा नहीं पढ़ लेते। इसको पढ़कर पाठक गण अवश्य ही अपने अन्दर एक सकारात्मक परिवर्तन महसूस करेंगे। ऐसा प्रतीत होता है कि इस ई-पुस्तक में मानव जीवन का सार व रहस्य छुपा हुआ है। आशा है कि प्रस्तुत ई-पुस्तक पाठकों की अपेक्षाओं पर बहुत खरा उतरेगी।

प्रेमयोगी वज्र अपनी उस समाधि(कुण्डलिनीजागरण/KUNDALINI AWAKENING) का वर्णन अपने शब्दों में इस प्रकार करता है

मैं लगभग18 सालों से अद्वैत(मुख्यतः शविद अर्थात शरीर विज्ञान दर्शन से प्राप्त, कुछ सनातन धर्म की संगति से) का पूर्ण व्यावहारिकता व कर्मठता से युक्त सांसारिकता के साथ अभ्यास, लगभग 10-11 सालों से अनियमित व अपूर्ण(बिना केन्द्रित ध्यान/focused concentration के) योगाभ्यास, तथा  एक साल से, घर से बहुत दूर, शान्त व तनावमुक्त स्थान पर नियमित व समर्पित रुप से कुण्डलिनीयोग का अभ्यास(बाह्य वैबसाइट/क्वोरा) कर रहा था, तथा अन्त के एक महीने से तांत्रिक विधि/प्रत्यक्षयौनयोग को उपरोक्त साधना के साथ जोड़कर, अपनी कुण्डलिनी को परिपक्व व ऊर्ध्वगामी बना रहा था। मैं बहुत दिनों के बाद, बहुत लंबी यात्रा करके(बाह्य वैबसाइट/क्वोरा), अपने नए व व्यक्तिगत वाहन से सपरिवार घर आया हुआ था। तभी एक दिन मैं एक समारोह में एक कुर्सी पर बैठा था। साधना के शांतिदायक प्रभाव के कारण मेरी दाढ़ी कुछ बढ़ी हुई थी और उसके कुल बालों में से लगभग 30% बाल सफेद नजर आ रहे थे। उस समारोह में मेरा ह्रदय से स्वागत हुआ था। वहां पर मुझे अपने लिए चारों ओर विशेष प्रेम व सत्कार का अनुभव हो रहा था। समारोहीय लोगों के साथ जुड़ी हुई बचपन की मेरी यादें जैसे तरोताजा हो गयी थीं। मैं अपने को खुला हुआ, सुरक्षित, शांत, तनावरहित, मानसिकता से पूर्ण(mindful) व मानसिक कुण्डलिनी-चित्र के साथ अनुभव कर रहा था। मेरी कुण्डलिनी से सम्बंधित लोग वहां उपस्थित थे व वातावरण-माहौल भी मेरी कुण्डलिनी से सम्बंधित था। खड़ी व छोटी पहाड़ी पर बना वह घर जैसे चिपका हुआ सा लगता था। चहल-पहल व रौनक वहां पर लगातार महसूस हो रही थी। समारोहीय संगीत(आधुनिक प्रकार का) भी मध्यम स्तर पर बज रहा था, जिसमें गायक के बोल(lyrics) स्पष्ट नहीं सुनाई दे रहे थे। उससे वह संगीत एक प्रकार का संगीतबद्ध शोर ही लग रहा था। बहुत अच्छा लग रहा था। चिर-परिचित लोगों के खुशनुमा चेहरे जैसे यहाँ-वहां उड़ रहे थे व सीढ़ियों पर ऊपर-नीचे आ-जा रहे थे। मैं बीच वाली मंजिल की बालकनी में था। एक कमरे में कुछ सुन्दर व तेजस्वी स्त्रियों का समूह नृत्य-गान में व्यस्त था। कभी एक-२ करके, कभी दो-२ के समूह में और बहुत विरले मामले में तीन-२ के समूह में वे महिलाएं बारी-२ से उठकर गाने वाली २०-२५ महिलाओं के घेरे के बीच में आतीं और अपने नृत्य-कौशल का प्रदर्शन करतीं। मेरे सामने वाली, हरी-भरी व रौनक से युक्त एक लम्बी, एकसमान व मध्यम ऊँचाई की पहाड़ी  पर; लगभग सिधाई में, पर्वत-शिखर से लगभग एकसमान नीचाई  पर बनी व उस घर से लगभग १०० मीटर की हवाई दूरी पर बनी एक सड़क उस घर की उंचाई के स्तर पर थी और वहां से यातायात के साधनों का शोर भी मध्यम स्तर पर सुनाई दे रहा था। उस पहाड़ी पर स्थित सूर्य के मुंह की लाली पूरे दिन की थकान के कारण बढ़ती ही जा रही थी, जैसे कि वह अपने कर्तव्यवहन(duty) के पूरा होने का इंतजार बड़ी बेसब्री से कर रहा था। मेरा बहुत समय बाद मिल रहा, एक पुराना व कुछ समय पहले ही सेवानिवृत सैनिक, मेरे मानसिक कुण्डलिनी-चित्र के भौतिक रूप से सम्बंधित व उसके जैसे ही स्वभाव वाला, मित्र व ज्ञाति-भ्राता, हंसमुख व तेजस्वी मुद्रा में जैसे ही अपनेपन के साथ मेरा हालचाल पूछने लगा, वैसे ही मैं कुण्डलिनी के विचार में गहरा खो गया और वह उद्दीप्त(stimulate) होकर अचानक ही मेरे पूरे मस्तिष्क में छा गई। मेरा सिर भारी हो गया व उसमें भारी दबाव महसूस होने लगा। मस्तिष्क में वह दबाव विशेष रूप का था, क्योंकि साधारण दबाव तो चेतना को भी दबा देता है, परन्तु वह दबाव तो चेतना(consciousness) को भड़का रहा था। ऐसा लग रहा था, जैसे कि मेरे मस्तिष्क के अन्दर चेतना की नदी(river of consciousness) भंवर के रूप में, पूरे वेग के साथ घूम रही हो और मेरे मस्तिष्क के कण-२ को कम्पित कर रही हो, जिसे सहन करने में मेरा मस्तिष्क अस्मर्थ हो रहा था। वह चेतना का प्रचंड भंवर मेरे मस्तिष्क में, बाहर की ओर एक विस्फोटक दबाव बनाता हुआ प्रतीत हो रहा था। उस चेतना-भंवर(consciousness whirl) को चलाने वाली, मुझे अपनी कुण्डलिनी प्रतीत हो रही थी, क्योंकि वह हर जगह अनुभव हो रही थी। उस तरह की हल्की सी, तूफानी सी, गंभीर व समान रूप की आवाज का अनुभव हो रहा था, जिस तरह की आवाज मधुमक्खियों के झुण्ड के एक साथ उड़ने से पैदा होती है। वास्तव में वह कोई आवाज भी नहीं थी, परन्तु उससे मिलता-जुलता, सन्नाटे से भरा हुआ, मस्तिष्क के एक विचित्र प्रकार के दबाव या कसाव से भरा हुआ, विशाल आत्मचेतना का अनुभव था। वैसा दबाव, जैसा कि शीर्षासन या सर्वांगासन करते हुए मस्तिष्क में अनुभव होता है; यद्यपि वह अनुभव उससे कहीं अधिक दबाव के साथ, उपर्युक्त सन्नाटे के साथ, चेतनापूर्ण, प्रकाशपूर्ण, कुण्डलिनीपूर्ण एवं आनंदमयी था। यदि अपने अन्दर चल रही, सन्नाटे व आवाज, एकसाथ दोनों से भरी हुई सरसराहट जैसी गुप्त हलचल(यद्यपि आवाज नहीं, पर आवाज की तरह) विद्युत्-ट्रांसफार्मर(electric ट्रांसफार्मर) को स्वयं को अनुभव होए, तो वह उसे कुण्डलिनीजागरण के जैसी स्थिति समझे। वह आत्मज्ञान भी नहीं था, अपितु उससे निम्नस्तर का अनुभव था।  वह ओम के बीच के अक्षर, “ओ—————-” की एकसमान व लम्बी खिंची हुई आवाज की तरह की अनुभूति थी। संभव है कि ओम का रहस्य भी कुण्डलिनीजागरण में छुपा हुआ हो। दृष्यात्मक अनुभव भी जैसे झुण्ड की मधुमक्खियों की तरह ही, मस्तिष्क को फोड़ कर बाहर निकलने के लिए बेताब हो रहे थे। शक्तिशाली फरफराहट के साथ, जैसे वह अनुभव ऊपर की ओर उड़ने का प्रयास कर रहा था। अतीव आनंद की स्थिति थी। वह आनंद एकसाथ अनुभव किए जा सकने वाले सैंकड़ों यौनसंबंधों से भी बढ़ कर था। सीधा सा अर्थ है कि इन्द्रियां उतना आनंद उत्पन्न कर ही नहीं सकतीं। मेरी कुण्डलिनी पूरी तरह से प्रकाशित होती हुई सूर्य का मुकाबला कर रही थी। वह प्रत्यक्ष के भौतिक पदार्थों से भी अधिक स्पष्ट, जीवंत व वास्तविक लग रही थी। मेरी आँखें खुली हुई थीं व गंभीरता से नज़ारे निहार रही थीं। जहाँ पर भी दृष्टि जा रही थी, वहीँ पर कुण्डलिनी दृष्टिगोचर हो रही थी। ऐसा लग रहा था, जैसे सभी कुछ कुण्डलिनी के रंग में रंगा हुआ हो। सभी अनुभव एकसमान, परिवर्तनरहित व पूर्ण जैसे लग रहे थे। मेरा अहंकार या व्यक्तित्व पूर्णतया नष्ट हो गया था। मैं अपने स्वास्थ्य के प्रति चिंतित हो रहा था। मुझे अपने व्यक्तित्व का कुछ भी भान नहीं रहा। मेरे साथ में कुर्सी पर बैठे २-३ लोग, आते-जाते कुछ लोग व वह ज्ञाति-भ्राता भी आश्चर्य, शंका व चिंता से मेरी ओर देखने लगे; जिससे मुझे तनिक संकोच होने लगा। हड़बड़ाहट में मैंने थोड़ा सिर झुकाते हुए अपने माथे की ऊपरी सीमा को दाएं हाथ की अँगुलियों के अग्रभागों से मध्यम दबाव के साथ दबाते हुए बार-बार मला व आँखों को भींचते हुए अपने व्यक्तित्व में वापिस लौटने का प्रयत्न किया। कुछ प्रयत्न के बाद मेरी कुण्डलिनी मेरे मस्तिष्क से वापिस नीचे लौट आई। कुछ चंद क्षणों के बाद जैसे ही मुझे अपनी भूल का अहसास हुआ, उसी समय मैंने अपनी चमकती हुई कुण्डलिनी को वापिस ऊपर चढ़ाने का भरपूर प्रयास किया, परन्तु मैं सफल न हो सका, यद्यपि मैंने अपने आप को बहुत अधिक प्रसन्न, तरोताजा, तनावरहित, चिन्तारहित व अनासक्ति/द्वैताद्वैत  से संपन्न अनुभव किया। कुण्डलिनीजागरण के उस अनुभव के समय, मुझे अपने चेहरे पर गर्माहट व लाली महसूस हो रही थी। ऐसा अनुभव मुझे अप्रत्यक्षतंत्र/सांकेतिक तंत्रयोग/दक्षिणपंंथी तन्त्र के समय भी होता था, जब प्रथम देवीरानी का चित्र मेरे मस्तिष्क में स्पष्ट व प्रचंड हो जाया करता था, यद्यपि इस बार के जागरण की अपेक्षा मध्यम स्तर के साथ। इस बार देवीरानी का नहीं, अपितु उन पुराणपाठी तांत्रिक-वृद्धाध्यात्मिकपुरुष (वे एक कमरे में पुराणों का इक्के-दुक्के श्रोताओं के सम्मुख अर्थ सहित पाठ कर रहे होते थे और प्रेमयोगी वज्र साथ वाले कमरे में विज्ञान विषय का गहराई से अध्ययन कर रहा होता था) का चित्र सर्वाधिक स्पष्ट व प्रचंड रूप से अनुभव हुआ, यद्यपि केवल १० सेकण्ड के लिए। प्रथम देवीरानी का चित्र तो मस्तिष्क में लगभग सदैव बना रहता था; कभी हल्के स्तर में, कभी मध्यम स्तर में और कभी प्रचंड स्तर में। यद्यपि इस बार कुण्डलिनी का चित्र सर्वोच्च स्तर पर अभिव्यक्त हुआ। वृद्धाध्यात्मिकपुरुष का मानसिक चित्र(कुण्डलिनी) भी लगभग सदैव(यद्यपि देवीरानी की अपेक्षा कुछ कम समय तक) बना रहता था, परन्तु वह अधिकांशतः हल्के स्तर पर ही अभिव्यक्त होता था; मध्यम या प्रचंड स्तर पर अपेक्षाकृत रूप से बहुत कम। ऐसा लगता है कि ऐसी भिन्नता के लिए, मेरा यौवन तथा भौतिक/कामप्रधान परिवेश जिम्मेदार था। यदि आध्यात्मिक परिवेश होता, तो सम्भवतः इसका उल्टा होता, अर्थात वृद्धाध्यात्मिकपुरुष का मानसिक चित्र देवीरानी की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली बना करता। देवीरानी के चित्र ने कभी भी अपने भौतिकरूप के स्तर से अधिक अभिव्यक्ति नहीं दिखाई, परन्तु इस कुण्डलिनीजागरण में, वृद्धाध्यात्मिकपुरुष के चित्र ने तो अपने को, अपने भौतिकरूप के स्तर से भी अधिक अभिव्यक्त कर दिया। उस अनुभव से मेरे मन में स्त्रीमोह का फंदा काफी ढीला पड़ गया था, क्योंकि बिना कामोत्तेजना के ही सर्वाधिक स्पष्ट मानसिक चित्र बनना, किसी आश्चर्य से कम नहीं था। प्रथम देवीरानी के मानसिक चित्र(क्रियाशील कुण्डलिनी) के साथ मुझे कभी भी पूर्ण समाधि(जागृत कुण्डलिनी) की अनुभूति नहीं हुई, अर्थात वह कुण्डलिनी क्रियाशील तो निरंतर बनी रही परन्तु कभी जागृत नहीं हो सकी। यद्यपि कालान्तर में द्वितीय देवीरानी ने प्रत्यक्ष/पूर्ण तंत्रयोग/ वामपंथी तंत्र से सहायता उपलब्ध करवा कर, उन वृद्धाध्यात्मिक पुरुष के मानसिक चित्र की कुण्डलिनी को मेरे शरीर में बहुत ऊपर उठवाया व जागृत करवाया। संभवतः इसी कुण्डलिनीजागरण/समाधि को ही सहस्रार चक्र/मस्तिष्क में कुण्डलिनी का परब्रम्ह/आत्मा से जुड़ना/एकाकार होना कहा गया है।

कुण्डलिनी-जागरण के समय कुण्डलिनी का ध्यान अपने चरम पर होता है, अर्थात ध्याता(कुण्डलिनी का ध्यान करने वाला व्यक्ति), ध्येय(कुण्डलिनी) व ध्यान(ध्यान की प्रक्रिया), तीनों एक हो जाते हैं। इसे दूसरे शब्दों में ऐसे भी कह सकते है कि ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय एक हो जाते हैं। इसे पूर्ण समाधि की अवस्था भी कहते हैं। 

प्रेमयोगी वज्र के इस कुण्डलिनी-जागरण को संभव बनाने वाली वास्तविक-समय(real time) की परिस्थितियों व तदनुसार किए गए प्रयासों को जानने के लिए Love story of a Yogi का व अधिक विस्तृत जानकारी के लिए उपरोक्त ई-पुस्तक का अवलोकन किया जा सकता है।

प्रेमयोगी वज्र अपने आत्मज्ञान(ENLIGHTENMENT) का वर्णन अपने शब्दों में इस प्रकार करता है

मैं मीठी निद्रा में एक स्वप्न देख रहा हूँ कि मैं अपने घर से लगभग २०० मीटर नीचे, घाटी की नदी के ऊपर बने हुए एक पुल पर खड़ा हूँ। तभी मैंने अचानक अपने को पूरा खुला हुआ अनुभव किया और मेरी अन्धकार से भरी आत्मा में अचानक प्रकाश छा गया। ऐसा लगा, जैसे कि मेरी आत्मा एक जकड़न से मुक्त हो गई। मन का प्रकाश जैसे आत्मा में फैल गया था। मैंने नदी में बहते जल को देखा। वह वैसे ही रूप-रंग का था, जैसा कि होता है, परन्तु वह मुझे अपनी आत्मा व पुल से अलग नहीं लग रहा था। पुल भी वैसा ही था, पर अनुभव-रूप में मेरी आत्मा व नदी-जल से अलग नहीं था। नदी से दूसरी ओर, सामने एक पहाड़ था, जिसका लगभग २० मीटर का मलबा, कई दिनों पहले, निरंतर हो रही भारी वर्षा के कारण गिरकर, नदी को संकरा किये हुए था। वह मलबा चमत्कारिक रूप से सीधे ही नीचे फिसला था, जिससे उसपर उपस्थित सभी पेड़-पौधे भी जीवित व सुरक्षित थे। उपरोक्त दिव्य, विचित्र व आत्मज्ञान से भरे स्वप्न में; मैंने उसकी ओर भी देखा, तो उस सब का अनुभव भी अलग नहीं था। फिर मैंने अपनी दृष्टि को ऊपर उठा कर, आसमान में चमकते हुए महान सूर्य को देखा। उसका अनुभव भी सभी के जैसा था और यहाँ तक कि चमक भी सभी के जैसी ही थी। इस सारे घटनाक्रम का अनुभव लगभग ५-१० सैकेंड में ही हो गया था। उस समय मैं परमानंद से ओत-प्रोत था। मुझे उस अनुभव में वह सभी कुछ मिल गया, जो कि मिलना संभव है। उन चंद क्षणों के लिए जैसे मैं संपूर्ण ब्रम्हांड/सृष्टि/अंतरिक्ष का राजा बन गया था। उस अनुभव में रात(अंधकार) और दिन(प्रकाश) जुड़े हुए थे। उस अनुभव में प्यार-घृणा, दोनों जुड़े हुए थे। इसका अर्थ है कि उस अनुभव में सभी कुछ विद्यमान था। वह एक पूर्ण अनुभव था। अपनी आत्मा के उस पूर्ण अनुभव-सागर में मुझे लग रहा था कि जैसे नदी, पुल, सूर्य, पहाड़ आदि के रूप में लहरें उठ रही थीं, जोकि उस एकमात्र अनुभव-सागर से अलग नहीं प्रतीत हो रही थीं। अगली सुबह जब मैं अपनी शय्या से ऊपर उठा; तो मैंने अपने को पूर्ण, पूर्णकाम, आप्तकाम, नवजात-बालक सदृश, तनाव-रहित, चिन्तारहित, भयरहित, शांत, आनंदमय व इच्छाहीन पाया, तथा अपने को अपने स्वाभाविक आत्मरूप में प्रतिष्ठित महसूस किया। ऐसा लगा, जैसे कि मैंने अपने-आप को अब वास्तविक रूप में पहचाना है और अज्ञात समय से चली आ रही जिंदगी की दौड़ को पूरा कर लिया है। मुझे ऐसा लगा कि जैसे कभी अपने घर से भटका हुआ, अब मैं अपने वास्तविक घर में पहुँच गया हूँ। उस अनुभव ने मेरे जीवन को एकदम से, पूर्णतया व सकारात्मक रूप से परिवर्तित कर दिया।

स्पष्टीकरण- आम अवस्था में अपना आपा अर्थात आत्मा एक गहरे अंधेरे से भरे कमरे की तरह होता है, और सांसारिक/मानसिक दृश्य, उस अंधेरे कमरे के चलचित्रपट पर दौड़ रहे प्रकाशमान दृश्य की तरह होते हैं। उस आत्मज्ञान के समय वह आत्मा रूपी अँधेरा कमरा अचानक व एकदम से प्रकाशमान हो गया, जिससे कमरे/आत्मा व चलचित्र दृश्य/मन-संसार के बीच का अंतर समाप्त हो गया और वे सभी एक जैसे दिखने लगे।

प्रेमयोगी वज्र के इस क्षणिक आत्मज्ञान को संभव बनाने वाली परिस्थितियों व तदनुसार किए गए प्रयासों को जानने के लिए Love story of a Yogi का व अधिक विस्तृत जानकारी के लिए उपरोक्त ई-पुस्तक का अवलोकन किया जा सकता है।

शरीरविज्ञानदार्शनिकों की विशेष पूजा

शरीरविज्ञान-दार्शनिक प्रतिक्षण ही अनंत उपचारों से, अनायास ही/अनजाने में ही/बिना किसी औपचारिकताओं के ही देहपुरुषों की पूजा करते रहते हैं; क्योंकि देहपुरुष कहीं दूर नहीं, अपितु सदैव उनके अपने शरीर में ही विद्यमान होते हैं। वे उन्हें नद, नदी, तालाब, चश्मे, झरने व समुद्र आदि अनेक जल-स्रोतों के जल से स्नान करवाते हैं; तथा उन्हें पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, अभिषेक व शुद्धोदक आदि के रूप में विभिन्न प्रकार का जल अर्पित करवाते रहते  हैं। विविध व सुगन्धित हवाओं के रूप में वे उन्हें नाना किस्म के धूप लगाते हैं। औषधियों से उनकी चिकित्सा करते हैं। अनेक प्रकार के वाहनों में बैठाकर, उन्हें एक प्रकार से रंग-बिरंगी पालकियों में घुमाते भी हैं। उनके द्वारा बोली गई शुभ वाणी से उनके उपदेश ग्रहण करते हैं। सुनाई देती हुईं, अनेक प्रकार की शुभ वाणियों को उनके प्रति अर्पित स्तोत्र, घंटानाद व शंखनाद समझकर, उनसे उनकी स्तुति करते हैं। अनेक प्रकार के व्यंजनों से उन्हें भोग लगाते हैं। नेत्ररुपी दीप-ज्योति से उनकी आरती उतरवाते हैं। अनेक प्रकार के मानवीय मनोरंजनों, संकल्प-कर्मरुपी व्यायामों से व योग-भोगादि अन्यानेक विधियों से उनका मनोरंजन करते हैं। इस प्रकार से शरीरविज्ञान दार्शनिकों के द्वारा किए गए सभी मानवीय काम व व्यवहार ईश्वरपूजारूप ही हैं। पुरुष की सारी अनुभूतियाँ, उसके अपने काम-काज को काबू में रखने वाली, उसकी अपनी चित्तवृत्तियाँ ही हैं, जिन्हें देहपुरुष ही अपने अन्दर पैदा करते हैं, देहदेश को नियंत्रित करने के लिए। ऐसा समझने वाला पुरुष देहपुरुषों को ही कर्ता-भोक्ता समझता है और कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है। वास्तव में हम अनादिकाल से ही पूजा व सेवा करते आ रहे हैं, इस देहमंडल की। परन्तु हमें इसका पर्याप्त लाभ नहीं मिलता, क्योंकि हमें इस बात का ज्ञान नहीं है, और यदि ज्ञान है तो दृढ़ता से विश्वास करते हुए, हम इस बात को मन में धारण नहीं करते। शविद के अध्ययन से यह विश्वास दृढ़ हो जाता है, जिससे उपरोक्त धारणा भी निरंतर पुष्ट होती रहती है। इससे हमें अनादिकाल से लेकर किए जाते हुए, अपने प्रयासों का फल एकदम से व इकट्ठा ही, कुण्डलिनीजागरण के रूप में मिल जाता है। इस तरह से हम देख सकते हैं कि शरीरविज्ञानदार्शनिक पूरी तरह से वैदिक-पौराणिक पुरुषों की तरह ही होते हैं। बाहर से वे कुछ अधिक व्यवहारवादी व तर्कवादी लग सकते हैं, परन्तु अन्दर से वे उनसे भी अधिक शांत, समरूप व मुक्त होते हैं। वे उस तूफान से भड़के हुए महासागर की तरह ही होते हैं, जो बाहर से उसी की तरह, तन-मन से भरपूर चंचल-चलायमान होते हैं, परन्तु अन्दर से उसी की तरह शांत व स्थिर भी होते हैं।

shivaedited

कागज-मुद्रित पुस्तक यहाँ पर उपलब्ध

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