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कब तक सत्य छिपाओगे~दशहरा विशेष कविता

कब तक सत्य छुपाओगे
कब तक प्रकाश दबाओगे।

खड़ा है रावण धर्म में
पड़ा है खंजर मर्म में।
पाप है अपने चरम में
मनुता डूबी शर्म में।
हिंसा का ढूंढोगे
कब तक बहाना।
जैसा करोगे
वैसा पाओगे।
कब तक सत्य छुपाओगे
कब तक प्रकाश दबाओगे।

पूजा पंडाल सज चुके
अपना धर्म भज चुके।
रावण धर्म के लोगों के
हिंसक कदम नहीँ रुके।
पुतले को जलाओगे
अपना मन बहलाओगे।
कब तक सत्य छुपाओगे
कब तक प्रकाश दबाओगे।

अगला वर्ष आएगा
यही बहारें लाएगा।
राज करेगा वीर बुजदिल
ये ही मंजर पाएगा।
मानवता को बुजदिली
कब तक तुम कह पाओगे।
कब तक सत्य छुपाओगे
कब तक प्रकाश दबाओगे।
साभार~भीष्म🙏@bhishmsharma95

कुंडलिनी शक्ति और शिव के मिलन से ही कार्तिकेय नामक ज्ञान पैदा हुआ, जिसने तारकासुर नामक अज्ञानान्धकार का संहार किया

सभी मित्रों को दशहरे की हार्दिक बधाई

मित्रो, शिव पुराण के अनुसार, भगवान शिव सती के विरह में व्याकुल होकर पर्वतराज हिमाचल (हिमालय का भाग) के उस शिखर पर तप करने बैठ गए, जहाँ गँगा नदी का अवतरण होता है। गंगा के कारण वह स्थान बहुत पवित्र होता है। वे अपने मन को सती से हटाकर योगसाधना से परमात्मा में लगाने लगे। जब पर्वतराज हिमाचल को अपने यहाँ उनके आने का पता चला तो वे अपने परिवार और गणों के साथ शिव से मिलने चले गए, और उनकी सेवा में उपस्थित हो गए। शिव ने उनसे कहा कि वे वहाँ एकांत में तपस्या करना चाहते हैं, इसलिए कोई उनसे मिलने न आए। पर्वतराज ने अपने राज्य में यह ऐलान कर दिया कि जो भी शिव से मिलने का प्रयास करेगा, उसे कठोर राजदण्ड दिया जाएगा। परंतु पार्वती उनकी सेवा करना चाहती थी, इसलिए वह अपने पिता हिमालय से शिव के पास जाने की जिद करने लगी। थकहार के हिमालय पार्वती को लेकर शिव के पास फिर पहुंच गए, और पार्वती की सेवा स्वीकार करने के लिए प्रार्थना करने लगे। शिव ने कहा कि वे ध्यान योग में रमे रहते हैं, वैसे में स्त्री का क्या काम। स्त्री तो स्वभाव से ही चंचल होती है, और बड़े से बड़े योगियों का ध्यान भंग कर देती हैं। फिर उन्होंने कहा कि वे हमेशा प्रकृति से परे अपने परमानन्द व शून्य स्वरूप में स्थित रहते हैं। इस पर पार्वती ने उनसे कहा कि वे प्रकृति से परे रह ही नहीं सकते। प्रकृति के बिना तो वे बोल भी नहीं सकते, फिर क्यों बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। अगर वे प्रकृति से परे हैं और उन्हें सबकुछ पहले से ही प्राप्त है, तब क्यों इस हिमालय शिखर पर तपस्या कर रहे हैं। जो प्रकृति से परे है, उसका प्रकृति कुछ नहीं बिगाड़ सकती, फिर क्यों उससे भयभीत हो रहे हैं। शिव को यह तर्क अच्छा लगा, और उन्होंने पार्वती को सखियों के साथ प्रतिदिन अपनी सेवा करने की अनुमति दे दी। शिव पार्वती के हावभाव से अनासक्त रहते थे। उनके मन में कभी कामभाव पैदा नहीं हुआ। हालाँकि उन्हें अपने ध्यान में पार्वती ही नजर आती थी। उन्हें लगने लगा कि उनकी पूर्व पत्नी सती ही पार्वती के रूप में उपस्थित हुई है। देवताओं व ऋषियों ने यह अच्छा अवसर जानकर कामदेव को शिव के मन में कामभाव पैदा करने के लिए भेजा। वे ऊर्ध्वरेता (ऐसा व्यक्ति जिसका वीर्य ऊपर की तरफ बहता हो) शंकर को च्युतरेता (ऐसा व्यक्ति जिसका वीर्य नीचे की ओर गिर कर बर्बाद हो जाता हो) बनाना चाहते थे। देवता व ऋषि दैत्य तारकासुर से परेशान थे। उसका वध शिव पार्वती के पुत्र के हाथों से होना था। इसीलिए वे शिव व पार्वती का विवाह कराना चाहते थे। शिव पहले तो पार्वती पर कामासक्त हो गए, और कामुकता के साथ उसके रूप-श्रृंगार का वर्णन करने लगे। फिर जैसे ही वे पार्वती के वस्त्रों के अंदर हाथ डालने लगे, और स्त्रीस्वभाव के कारण पार्वती शर्माती हुई दूर हटकर मुस्कुराने लगी, वैसे ही उन्हें अपनी ईश्वररूपता का विचार आया, और वे अपनी करनी पर पछताते हुए पीछे हट गए। फिर उनकी नजर पास में खड़े कामदेव पर गई। शिव की तीसरी आंख के क्रोधपूर्ण तेज से कामदेव खुद ही भस्म हो गया। शिव चाहते थे कि जब पार्वती का गर्व या अहंकार समाप्त हो जाएगा, वे तभी उसके साथ प्रेमसंबंध बनाएंगे। वैसा ही हुआ। जैसे ही पार्वती का अहंकार नष्ट हुआ, वैसे ही शिव ने उन्हें अपना लिया और उनके आपसी प्रेमसंबंध से कार्तिकेय का जन्म हुआ, जिसने बड़े होकर राक्षस तारकासुर का वध किया। तारकासुर ने देवताओं को बंधक बनाया हुआ था। वह देवताओं से अपनी मर्जी से काम करवाता था। दरअसल उसने ब्रह्मा से यह वरदान मांगा हुआ था कि वह शिव के पुत्र के सिवाय और किसी के हाथों से न मरे। उसे पता था कि शिव तो प्रकृति से परे साक्षात परमात्मा हैं, वे भला किसलिए विवाह करेंगे।

शिव-पार्वती विवाह की उपरोक्त रूपात्मक कहानी का रहस्योद्घाटन

ईश्वर भी जीव से मिलने के लिए बेताब रहता है। अकेले रहकर वह ऊब जैसा जाता है। यदि ऐसा न होता तो जीवविकास न होता। जीव से मिलने के लिए वह जीव के शरीर के सहस्रार में बैठकर तप करने लगता है। वह न कुछ खाता है, न कुछ पीता है। बस चुपचाप अपने स्वरूप में ध्यानमग्न रहता है। यही शिव का वहाँ तपस्या करना है। जीव का शरीर ही हिमालय पर्वत है, और जीव का मन अर्थात कुंडलिनी ही सती या पार्वती है। वे अपनी तपस्या व योगसाधना के प्रभाव से ही अपनी प्रेमिका सती के इतना नजदीक रहकर भी उसके लिए व्याकुल नहीं होते। सुषुम्ना यहाँ गंगा नदी है, जो सहस्रार को ऊर्जा की भारी मात्रा देकर उसे ऊर्जावान अर्थात पवित्र करती रहती है। जीवात्मा यहाँ पर्वतराज हिमालय या हिमाचल भी है। ऐसे तो जीवात्मा का मिलन परमात्मा से बीच-बीच में होता रहता है, पर पूरा मिलन नहीं होता। इसीको इस रूप में लिखा है कि शिव ने अपने वहाँ किसी के आकर मिलने को मना कर दिया। मिलने का अर्थ यहां पूर्ण मिलन ही है। दो के बीच पूर्ण मिलन तभी संभव हो सकता है, जब दोनों एक जैसे स्वभाव के हों। यदि शिव आम आदमी से पूर्णमिलन करेंगे, तो स्वाभाविक है कि उनकी तपस्या भंग हो जाएगी, क्योंकि आम आदमी तो तपस्या नहीं करते, और अनेकों दोषों से भरे होते हैं। इसीलिए जीवात्मा अपने मन और अपनी इन्द्रियों को बाहर ही बाहर दुनियादारी में ही उलझा कर रखता है, उसे शिव से मिलने सहस्रार की तरफ नहीं जाने देता। ये मन, इन्द्रियाँ और प्राण ही राजा हिमाचल के नगरनिवासी हैं। यदि ये कभी गलती से सहस्रार की तरफ चले भी जाएं, तो उन्हें अंधेरा ही हाथ लगता है। यह अंधेरा ही पर्वतराज हिमाचल द्वारा उन्हें दिया जाने वाला कठोर दंड है। पर मन में जो कुंडलिनी चित्र होता है, वह बारम्बार शिव से मिलने के लिए सहस्रार जाना चाहता है। यही पार्वती है। मन का सर्वाधिक शक्तिशाली चित्र कुंडलिनी चित्र ही होता है। वही सहस्रार तक आसानी से जाता रह सकता है। इसीको पार्वती की जिद और हिमालय के द्वारा उसको शिव के पास ले जाने के रूप में बताया गया है। इसीका यह मतलब भी निकलता है कि पार्वती शिव को कहती है कि यदि वह प्रकृति से परे है, तो वह सहस्रार में बैठ कर किसकी आस लगा कर तपस्या कर रहा है। मतलब कि प्रकृति ने ही शिव को इस शरीर के सहस्रार चक्र में बैठने के लिए मजबूर किया है, ताकि उसका मिलन पार्वती रूपी कुंडलिनी से हो सके। केवल कुंडलिनी चित्र को ही सहस्रार में भेजकर आनन्द आता है, अन्य चित्रों को भेजकर नहीं। इसको इस रूपात्मक कथा में यह कहकर बताया गया है कि शिव ने पार्वती के द्वारा की जाने वाले अपनी प्रतिदिन की सेवा को स्वीकार कर लिया। पार्वती प्रतिदिन सखियों के साथ शिव की सेवा करने उस पवित्र शिखर पर जाती और प्रतिदिन घर को लौट आती। इसका मतलब है कि प्रतिदिन के कुंडलिनी योगाभ्यास के दौरान कुंडलिनी थोड़ी देर के लिए ही सहस्रार में रुकती, शेष समय अन्य चक्रों पर रहती। मूलाधार चक्र ही कुंडलिनी शक्ति का अपना घर है। पीठ में ऊपर चढ़ने वाली मुख्य प्राण ऊर्जा और साँसों की गति जो हमेशा कुंडलिनी के साथ रहती हैं, वे पार्वती की सखियां कही गई हैं। हर क्रिया की बराबर की प्रतिक्रिया होती है। कुंडलिनी के सहस्रार में होने से अद्वैत का अनुभव हो रहा है, मतलब कुंडलिनी शिव का ध्यान कर रही है। उसके बदले में शिव भी कुंडलिनी का उतना ही ध्यान कर रहे हैं। शिव को पार्वती में अपनी अर्धांगिनी सती नजर आती है। दरअसल जीव या कुंडलिनी शिव से ही अलग हुई है। कभी वह शिव से एकरूप होकर रहती थी। ब्रह्मा आदि देवताओं के द्वारा कामदेव को शिव-पार्वती का मिलन कराने के लिए भेजने का अर्थ है, कुदरती तौर पर उच्च कोटि के योगसाधक का कामुकता या यौनतन्त्र की ओर आकर्षित होना। आप आए दिन देखते होंगे कि कैसे बड़े-बड़े आध्यात्मिक व्यक्तियों पर यौन शोषण के आरोप लगते रहते हैं। यहाँ तक विश्वामित्र जैसे प्रख्यात ब्रह्मऋषि भी इस यौनकामुकता से बच नहीं पाए थे, और भ्रष्ट हो गए थे। दरअसल यह कामुकता कुंडलिनी को इसी तरह से अंतिम मुक्तिगामी वेग (एस्केप विलोसिटी) को प्रदान करने के लिए पैदा होती है, जैसे एक अंतरिक्षयान को धरती के गुरुत्व बल से बाहर निकालने के लिए इसके रॉकेट इंजन से शक्ति पैदा होती है, ताकि वह भौतिकता से मुक्त होकर शिव से एकाकार हो सके। पर बहुत से योगी इस कामुकता को ढंग से संभाल नहीँ पाते, और लाभ की बजाय अपनी हानि कर बैठते हैं। उस यौनकामुकता का सहारा लेकर कुंडलिनी शिव के बहुत नजदीक तो चली गई, पर उनसे एकाकार नहीं हो सकी। इसका मतलब है कि कुंडलिनी जागरण नहीं हो सका। आज्ञा चक्र पर ध्यान से कुंडलिनी मानसपटल पर बनी रहती है, जिससे कामुकता वाला काम भी कामुकता से रहित और पवित्र हो जाता है। इसे ही शिव की तीसरी आंख से कामदेव का जल कर भस्म होना कहा गया है। तीसरी आंख आज्ञाचक्र पर ही स्थित होती है। मैं तो आज्ञा चक्र को ही तीसरी आंख मानता हूँ। तीसरी आँख या आज्ञा चक्र पर स्थित इसी कुंडलिनी शक्ति के प्रभाव से ही यौनयोग भौतिक कामुकता से अछूता रहता है, जबकि समान प्रकार की भौतिक गतिविधियों के बावजूद अश्लील पोर्न भड़काऊ कामुकता से भरा होता है। देवताओं की प्रार्थना पर शिव ने पार्वती से तभी विवाह किया जब पहले पार्वती ने अपना अहंकार नष्ट कर लिया। यह मैं पिछली पोस्ट में भी बता रहा था कि जब योगसाधना से उत्पन्न सत्त्वगुण पर भी अहंकार समाप्त हो जाता है, तभी कुंडलिनी जागरण की संभावना बनती है। कुंडलिनी मन या जीव का प्रतीक है। जीव का अहंकार खत्म हो गया, मतलब कुंडलिनी-रूपी पार्वती का अहंकार खत्म हो गया। जीव के शरीर में सभी देवता बसे हैं। जीवात्मा के रूप में वे भी शरीर में बंधे हुए हैं। उदाहरण के लिए ब्रह्मांड में उन्मुक्त विचरण करने वाले सूर्य देवता छोटी-2 दो आंखों में, सर्वव्यापी वायुदेव छोटी सी नाक में, अनन्त आकाश में फैला जल देवता सीमित रक्त आदि में। इसी तरह ऋषि भी जीव को ज्ञान का उपदेश करके बंधे हुए हैं। ये देवता और ऋषि भी तभी पूर्ण रूप से मुक्त माने जाएंगे, जब जीव मुक्त होगा, मतलब कुंडलिनी जागरण के रूप में शिव-पार्वती का विवाह होगा। जीवमुक्ति के लिए यही देवताओं व ऋषियों की प्रार्थना है, जिसे शिव अन्ततः स्वीकार कर लेते हैं। तारकासुर राक्षस यहाँ अज्ञान के लिए दिया गया नाम है। तारक का अर्थ आंख की पुतली होता है, जो अज्ञान की तरह ही अंधियारे रँग वाली होती है। यह जीव के मन सहित उसके पूरे शरीर को बंधन में डालता है। तारक का मतलब आंख या रौशनी या ज्ञान भी है। इसको नष्ट करने वाला राक्षस ही तारकासुर हुआ। अज्ञान रूपी तारकासुर आदमी को अंधा कर देता है। उपरोक्तानुसार जीव के बंधन में पड़ने से देवता और ऋषि खुद ही बंधन में पड़ जाते हैं। उसका संहार केवल कुंडलिनी जागरण से पैदा होने वाला ज्ञान ही कर पाता है, जिसे इस कथा में शिव-पार्वती के पुत्र कार्तिकेय के रूप में वर्णित किया गया है।

Kundalini Shakti and Shiva unite to give birth to the wisdom named Kartikeya, who destroyed the darkness of ignorance named Tarakasur

Happy Dussehra to all my friends

Friends, according to the Shiva Purana, Lord Shiva, distraught in the separation of Sati, sat down to meditate on the peak of the Himachal (part of Himalaya), where the Ganges river descends. Because of the Ganges, that place is very holy. He started diverting his mind from Sati and engaged himself in the practice of yoga. When Mountain king Himachal came to know about his arrival, he went to meet Shiva with his family and members, and attended his service. Shiva told him that he wanted to do penance there in solitude, so no one should come to meet him. Parvatraj announced in his kingdom that whoever tries to meet Shiva will be given a harsh scepter. But Parvati wanted to serve him, so she insisted on going to Shiva from her father Himalaya. The exhausted Himachal took Parvati back to Shiva, and prayed for Parvati to accept her service. Shiva said that he is engaged in meditation yoga, so what is the work of a woman. Women are fickle by nature, and disturb the attention of even the biggest yogis. Then he said that he is always situated beyond nature in his ecstasy and void form. On this Parvati told him that he could not live beyond nature. Without nature, he cannot even speak, then why is he talking big things. If he is beyond nature and he already is everything, then why is he doing penance on this Himalayan peak. Nature cannot harm the one who is beyond nature, then why is he afraid of it. Shiva liked this reasoning, and he allowed Parvati to do his daily service with her sakhis or she friends. Shiva used to remain unattached to Parvati’s gesture. There was never any desire in his mind. However, he only saw Parvati in his meditation. He felt that his ex-wife Sati had appeared in the form of Parvati. Knowing this good opportunity, the gods and sages sent Kamadeva to create lust in Shiva’s mind. They wanted to make Urdhvreta (a man with upward semen flow) Shankar a chyutreta (a man with downward semen flow to outside to be wasted). The gods and sages were troubled by the demon Tarakasura. He was to be killed at the hands of the son of Shiva- Parvati. That is why they wanted to get Shiva and Parvati married. Shiva first became enamored of Parvati, and began to describe her appearance with sensuality. Then as soon as he started putting his hands inside Parvati’s clothes, and because of her feminine nature, Parvati started smiling shyly running away, he got the idea of his God form, and he went back repenting of his actions. Then his eyes went to Cupid standing nearby. Kamadeva himself was consumed by the furious effulgence of Shiva’s third eye. Shiva wanted that only when Parvati’s pride or arrogance is over, he will have a love affair with her. That’s what happened. As soon as Parvati’s ego was destroyed, Shiva adopted her and from their mutual love, Kartikeya was born, who grew up and killed the demon Tarakasur. Tarakasur had taken the gods and rishis hostage. He used to get the gods to do things of his own free will. In fact, he had asked Brahma for a boon that he should not die at the hands of anyone except the son of Shiva. He knew that Shiva is the real God beyond nature, why would he marry.

Demystifying the the above metaphorical story of Shiva-Parvati marriage

God is also desperate to meet the soul. Being alone, he gets bored. If it were not so, there would be no evolution. In order to meet the soul, he starts doing penance while sitting in the sahasrar of the living being’s body. He neither eats nor drinks anything. He just remains silently meditating on his true natural form. This is what Shiva has to do penance there. The body of the living being is the Himalaya Mountain, and the mind of the living being, that is, Kundalini, is Sati or Parvati. Due to the effect of his penance and yoga, he does not get disturbed for her even after being so close to his beloved Sati. Sushumna is the river Ganges here, which keeps on energizing the Sahasrar by giving it a huge amount of energy carried up from muladhar. The soul of the living being here also is the mountain king Himalaya or Himachal. In this way, the meeting of the soul with God keeps happening in between, but there is no complete meeting. It is written in this form that Shiva refused to meet anyone there. Meeting here means complete meeting. Perfect union between two can be possible only when both are of similar nature. If Shiva will meet the common man completely, then it is natural that his penance will be disturbed, because the common man does not do penance, and is full of many faults. That is why the soul keeps its mind and its senses entangled in the outside world by itself, and does not allow these to go towards Sahasrar to meet Shiva. These mind, senses and pranas are the residents of King Himachal. Even if they ever go towards Sahasrar by mistake, they feel dark. This darkness is the harsh punishment given to them by Parvatraj Himachal. But the Kundalini picture in the mind wants to go to Sahasrar again and again to meet Shiva. This is Parvati. The most powerful picture of the mind is the Kundalini picture. It can easily go on till Sahasrar. This is described as the insistence of Parvati and the Himalaya taking her to Shiva. This also means that Parvati tells Shiva that if he is beyond nature, then sitting in Sahasrar, whom he is doing penance hoping for. Meaning that nature itself has forced Shiva to sit in the Sahasrar Chakra of this body, so that he can meet the Kundalini in the form of Parvati. Happiness comes only by sending the Kundalini picture to Sahasrara, not by sending other pictures. This is told in this metaphorical story by saying that Shiva accepted his daily service to be performed by Parvati. Parvati every day used to go to that holy peak to serve Shiva with her she friends and return home every day. This means that during the daily Kundalini yoga practice, the Kundalini would stay in the Sahasrara only for a short time, the rest of the time on the other chakras. The Muladhara Chakra is the Kundalini Shakti’s own home. The main prana energy rising through back and the movement of breath which always stays with the Kundalini are said to be the sakhis or she friends of Parvati. For every action there is an equal reaction. Due to Kundalini being in Sahasrara, one is experiencing Advaita, that means Kundalini is meditating on Shiva. In return, Shiva is also meditating on Kundalini equally. Shiva sees his consort Sati in Parvati. Actually Jiva or soul or living being or Kundalini or Sati is separated from Shiva once upon a time being infinite years ago. At that time, she used to live united with Shiva as both inseparable from each other. The sending of Kamadeva by Brahma and other deities to get Shiva-Parvati to meet means, naturally, an advanced yoga practitioner is attracted towards sexuality or sexual tantra. You must be seeing every day how big spiritual people are being accused of sexual abuse. Even eminent Brahmarishis like Vishwamitra could not escape this sexual eroticism, and became corrupt. In fact, this sexuality arises in order to impart the ultimate liberation velocity to the Kundalini just as escape velocity imparted to a space shuttle to escape earth’s gravitational pull, so that she can become free from materiality and become one with Shiva. But many yogis are not able to handle this sexuality properly, and instead of profit, it does their harm. Taking the help of that sexual sensuality, Kundalini went very close to Shiva, but could not unite with him. This means that Kundalini awakening could not take place. By meditating on the Agya chakra, the Kundalini remains on the psyche, due to which even the sexual act becomes devoid of sensuality and pure. It is said that Kamadeva was burnt to ashes from the third eye of Shiva. The third eye is located on the Agya chakra itself. I consider Ajna Chakra as the third eye. It is due to the influence of this Kundalini Shakti situated mainly at agya chakra or third eye that sexual yoga remains untouched by physical sexuality, whereas in spite of similar physical activities, pornography is full of inflammatory sexuality. On the request of the gods, Shiva married Parvati only when Parvati first destroyed her ego. I was also telling this in the previous post that when the ego on the Sattva guna produced by yoga practice is destroyed, only then there is the possibility of Kundalini awakening. Kundalini symbolizes the mind or the living being. The ego of the living being has ended, that is, the ego of Parvati in the form of Kundalini has ended. All the deities reside in the body of the living being. In the form of the soul, they are also bound in the body. For example, the sun god who roams freely in the universe is bound in two small eyes, the universal wind god is bound in the nose, the water god naturally roaming freely inside celestial bodies is bound in the limited blood etc. Similarly, the sages are also bound by preaching knowledge to the bound soul of living beings. These gods and sages will also be considered completely liberated only when the soul is liberated, which means the marriage of Shiva-Parvati will take place in the form of Kundalini awakening. This is the prayer of the gods and sages for salvation, which Shiva finally accepts. The demon Tarakasura is the name given here for ignorance of soul. Taraka literally means the pupil of the eye, which is dark in color like ignorance. It binds the whole body including the mind of the living entity. Taraka also means eye or light or knowledge. The demon who destroyed it was Tarakasur. Tarakasur or ignorance blinds a man. According to the above, the deities and the sages themselves fall into bondage due to the bondage of the soul. His destruction can only be accomplished by the wisdom born of Kundalini awakening, who is described in this story as Kartikeya, the son of Shiva-Parvati.

जय माता दुर्गे जय माता तारा हम पापी मानुष को तेरा सहारा~भक्तिगीत कविता

जय माता दुर्गे
जय माता तारा।
हम पापी मानुष को
तेरा सहारा।।
जय माँ भवानी
तेरा जयकारा।
भव-सा-गर का
तू ही किनारा।।
जय माता दुर्गे------
हिंगलाज नानी
जय हो जयकारा
तेरे लिए मेरा
जीवन पहारा।।
जय माता---
भटकूँ अवारा
बेघर बिचारा।
तेरे सिवा नहीं
अब कोई चारा।।
जय माता---
जग देख सारा
भटका मैं हारा।
भूलूँ कभी न
तेरा नजारा।।
जय माता---
हे अम्बे रानी
जय जय जयकारा
पागल सुत तेरा
नकली खटारा।।
जय माता----
तू ही जगमाता
तू ही विधाता।
तू जो नहीं हमें
कुछ भी न आता।।
हम थरमामीटर
तू उसमें पारा
तू क्षीरसागर
हम पानी खारा।।
जय माता---
किसमत का मारा
जग में नकारा
तू जो मिले जग
पाए करारा।।
हे माता---
जो है हमारा
सब है तुम्हारा।
दूँ क्या मैं तुझको
जो हो हमारा।।
जय माता दुर्गे
जय माता तारा।
हम पापी मानुष को
तेरा सहारा।।
साभार~भीष्म🙏@bhishmsharma95

कुंडलिनी के लिए किए गए प्रयास के प्रति भी अहंकार के नष्ट होने से ही कुंडलिनी जागरण होता है

मनरूपी आँख को ही तीसरी आँख कहते हैं

जब हमें नींद आ रही हो लेटे-लेटे और उस समय हम खड़े हो जाएं तो एकदम नींद भाग जाती है। दरअसल खड़े होने से व तनिक हिलने-डुलने से पीठ से ऊर्जा ऊपर चढ़ती है। मैं पिछ्ली पोस्ट में कुंडलिनी से पैदा हुई अति संवेदनशीलता के कारण अजीबोगरीब घटनाओं की संभावनाओं के बारे में बात कर रहा था।जब कुंडलिनी मस्तिष्क में क्रियाशील या जागृत होती है, तब मस्तिष्क की संवेदनशीलता बहुत बढ़ जाती है। इंद्रियों के सारे अनुभव तीव्र महसूस होते हैं। उदाहरण के लिए, खाने में स्वाद कई गुना बढ़ जाता है। सुगन्धि भी कई गुना मजबूत महसूस होती है। वास्तव में जिस प्राण ऊर्जा से इन्द्रियातीत कुंडलिनी उजागर हो सकती है, उससे अन्य इन्द्रियातीत अनुभव भी प्रकट हो सकते हैं, जैसे कि उड़ने का अनुभव, पानी पर चलने का अनुभव। इन्हें ही योगसिद्धियाँ कहते हैं। दरअसल ये अनुभव शरीर से नहीं, केवल मन से होते हैं। यह ऐसे ही होता है, जैसे कुंडलिनी के दर्शन आँखों से नहीं, बल्कि मन से होते हैं। इसी जागृत मन को ही तीसरी आँख का खुलना कहा गया है। क्योंकि मन से ही सारा संसार है, इसीलिए प्राचीन योग पुस्तकों में ऐसे मानसिक अनुभवों को शारीरिक अनुभवों की तरह लिखा गया है, ताकि आम आदमी को समझने में आसानी हो। पर अधिकांश लोग इन्हें शारीरिक या असल के भौतिक अनुभव समझने लगते हैं। समर्पित कुंडलिनी योगी अधिकांशतः कुंडलिनी से ही जीवन का महान आनन्द प्राप्त करता रहता है। वह जीवन के आनंद के लिए भौतिक वस्तुओं के अधीन नहीं रहता। इसलिए स्वाभाविक है कि यदि किन्हीं सांसारिक क्लेशों से उसकी कुंडलिनी क्षतिग्रस्त या कमजोर हो जाए, तो वह अवसाद रूपी अंधेरे से घिर जाएगा। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि उसे आनन्द प्राप्ति का दुनियादारी वाला तरीका एकदम से समझ नहीं आएगा, और न ही रास आएगा। इसीलिए कहते हैं कि मध्यमार्ग ही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है, क्योंकि इसमें अध्यात्म और दुनियादारी साथ-साथ चलते हैं, ताकि किसी की भी कमी से हानि न उठानी पड़े।

सीडेंटरी लाइफस्टाइल भौतिकता और आध्यात्मिकता दोनों का दुश्मन है

योग करते समय अद्वैत चिंतन ज्यादा सफल होता है, क्योंकि अद्वैत का  सदप्रभाव कुंडलिनी के माध्यम से ही प्राप्त होता है। योग करते समय सभी नाड़ियाँ मुख्यतः सुषुम्ना नाड़ी और चक्र खुले हुए रहते हैं। इससे अद्वैत से उजागर होती हुई कुंडलिनी आसानी से उपयुक्त चक्र पर काबिज हो जाती है। यदि मानसिक ऊर्जा का स्तर कम हो, तो कुंडलिनी नीचे के चक्रों पर काबिज होती है, और अगर मानसिक ऊर्जा अधिक हो, तो कुंडलिनी ऊपर के चक्रों की तरफ भागती है। इसी तरह अन्य किसी भी प्रकार की शारीरिक क्रियाशीलता के समय अद्वैत का ध्यान करने से भी इसी वजह से ज्यादा कुंडलिनी लाभ मिलता है। सुस्ती और शिथिलता के मौकों पर नाड़ियाँ और चक्र सोए जैसे रहते हैं, जिससे उनमें कुंडलिनी आसानी से संचरण नहीं कर सकती। इसी वजह से आदमी के बीमार पड़ने का डर भी बना रहता है। इसी वजह से सीडेंटरी लाइफस्टाइल वाले लोग न तो भौतिक रूप से और न ही आध्यात्मिक रूप से समृद्ध होते हैं।

सद्प्रयास कभी विफल नहीं होता

जितने भी विश्वप्रसिद्ध, कलाकार व समृद्ध व्यक्ति हैं, उनसे मुझे अपना गहरा रिश्ता महसूस होता है। वे मुझे अपने बचपन के दोस्तों व परिजनों के जैसे महसूस होते हैं। हो सकता है कि मैं पिछले जन्म में सम्भवतः उन्हीं की तरह भौतिक तरक्की के चरम तक पहुंच गया था। फिर मुझे कुंडलिनी जागरण की इच्छा महसूस हुई होगी और मैंने उसके लिए प्रयत्न भी किया होगा, पर मुझे सफलता न मिली होगी। उसीके प्रभाव से मुझे इस जन्म में पिछले जन्म के सम्पन्न, जगत्प्रसिद्ध व आध्यात्मिक व्यक्तित्वों के बीच में जन्म मिला होगा। क्षणिक कुंडलिनी जागरण की अनुभूति भी उसी के प्रभाव से मिली होगी। मेरे संपर्क के दायरे में आने वाले व्यक्ति भी पिछले जन्म के महान लोग रहे होंगे, और उन्हें कुंडलिनी का भी कुछ न कुछ साथ जरूर मिला होगा। उसी कुंडलिनी प्रभाव से वे मेरे संपर्क के दायरे में आए होंगे। इसका मतलब है कि सद्प्रयास कभी विफल नहीं जाता। वैसे भी स्वाभाविक रूप से कुंडलिनी जागरण की इच्छा भौतिकता का चरम छू लेने पर ही होती है। मनोवैज्ञानिक रूप से ऐसा भी हो सकता है कि कुंडलिनी जागरण की शक्ति से ही मुझे शक्तिशाली व्यक्तियों व वस्तुओं से अपनापन लगता हो, क्योंकि सभी शक्तियों का खजाना कुंडलिनी जागरण ही तो है।

प्रयास के बिना या अपने आप कुछ भी प्राप्त नहीं होता

रहस्यमय दृष्टिकोण ने मनुष्य को लापरवाह बना दिया है। इससे वह चमत्कार होने की प्रतीक्षा करता है। यह ब्लॉग इस रहस्यवाद को तोड़ रहा है। कुंडलिनी जागरण सहित सब कुछ वैज्ञानिक है और इसके लिए भी भौतिक चीजों की तरह लंबे समय तक एक निरंतर तार्किक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। इस ब्लॉग व वेबसाइट में किताबों सहित मेरी तथाकथित स्वतःस्फूर्त जागृति की घटना के बारे में पढ़ने के लिए सब कुछ है। मुख्य रूप से, किताब लव स्टोरी ऑफ ए योगी, फिर कुंडलिनी विज्ञान~ एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान, भाग १ और २। इसके अलावा, इस ब्लॉग का अनुसरण करने से हर हफ्ते ताज़ा सामग्री भी मिलेगी। मेरे बारे में कई लोग सोचते हैं कि मुझे अपनेआप या बिना किसी प्रयास के उच्च आध्यात्मिक अनुभव हुए। काफी हद तक बात भी सही है, क्योंकि मैंने इनके लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किए। मुझे अनुकूल परिस्थितियां मिलती गईं, और सब कुछ खुद से होता रहा। पर मेरे पूर्वजों की जो मेहनत इसमें छुपी हुई है, वह किसी को नहीं दिखाई देती। कम से कम मेरी तीन पीढ़ियों से मेरे परिवार में आध्यात्मिकता और उच्च कोटि के आदर्शवाद का बोलबाला था। इस वजह से समाज में दूर-दूर तक मेरे परिवार का नाम और मान-सम्मान होता था। मेरी दो पीढ़ियों से मेरा परिवार ब्राह्मण पुरोहिताई का काम करता आ रहा है। इस काम में वैदिक कर्मकांड किया जाता है। वैदिक कर्मकांड दरअसल कुंडलिनी योग का प्रथम अध्याय ही है, क्योंकि यह आदमी का कुंडलिनी से परिचय करवाता है, और उसे आसान व दुनियादारी वाले तरीक़े से मन में मजबूती प्रदान करता है। ऐसे आध्यात्मिक परिवार की संगति से ही मेरे मन में कुंडलिनी ने अनायास ही अपना पक्का डेरा जमाया। इसका मतलब है कि मेरे परिवार की सैकड़ों सालों की मेहनत का फल मेरे अंदर प्रकट हुआ। मुझे अपनेआप कुछ नहीं मिला। अपनेआप कुछ नहीं मिलता। यदि हम आध्यात्मिकता के रास्ते पर चलते रहेंगे, तो हमारे बच्चों, पौत्रों, प्रपौत्रों आदि को उसका फल मिलेगा। उन्हें अपनेआप कुछ नहीं मिलेगा। इसका मतलब है कि कुंडलिनी के लिए किया गया प्रयास कभी विफल नहीं होता। यदि प्रयास करने वाले को एकदम से फल मिलता न दिखे, तो समाज व दुनिया को अवश्य मिलता है। कालांतर में प्रयास करने वाले को भी फल मिल ही जाता है।

जागरण के लिए ध्यान या योग करने का अहंकार भी त्याग देना चाहिए

कुंडलिनी जागरण एक दुर्लभ घटना है। इसके लिए शायद ही कभी जोरदार प्रयास की आवश्यकता होती है। हां, जबरदस्त प्रयासों से मानसिक और शारीरिक रूप से इसके लिए तैयार हुआ जा सकता है। बलपूर्वक प्रयास मनुष्य में उपलब्ध प्राण ऊर्जा के स्तर पर होना चाहिए अन्यथा अत्यधिक बलपूर्वक प्रयास शरीर और मन को नुकसान पहुंचा सकता है। मैंने ऐसी ही संतुलित कोशिश की थी। मैं 15 वर्षों तक दुनिया के साथ बहता रहा, हालांकि मेरे अपने स्वयं के अनूठे दर्शन के माध्यम से मेरा हमेशा अद्वैतवादी रवैया बना रहता था। फिर मैंने प्राण शक्ति की अधिकता होने पर एक वर्ष तक बलपूर्वक हठयोग और फिर अगले एक मास तक तांत्रिक योग किया। फिर मैंने अपना यह अहंकार भी त्याग दिया, और मैं फिर से संसार के साथ बहने लगा। योग यथावत चलता रहा। योग आदि करने के इस अहंकार के त्यागने से ही मुझे अंततः कुण्डलिनी जागरण की सहजता से एक झलक मिली। फिर भी कोई बड़ा तीर नहीं चला लिया, क्योंकि जागृति से कहीं ज्यादा महत्त्व तो जागृत जीवनचर्या का ही है। संक्षेप में कहूँ तो केवल झलक इसलिए, क्योंकि मेरा उद्देश्य कोई ज्ञानप्राप्ति नहीं था, बल्कि मैं कुंडलिनी जागरण को वैज्ञानिक रूप में अनुभव करना चाहता था, और लोगों को बताकर उन्हें गुमराही से बचाना चाहता था। आखिर इच्छा पूरी हो ही जाती है। इसका मतलब है कि जागरण के लिए ध्यान या योग या अन्य पुण्य कर्म करने का अहंकार भी त्याग देना चाहिए। यह शास्त्रों में एक प्रसिद्ध उपदेशात्मक वाक्य द्वारा बताया गया है कि सतोगुण से आध्यात्मिकता बढ़ती है और उस सतोगुण के प्रति भी अहंकार को नष्ट करने से ही जागृति प्राप्त होती है। सतोगुण का मतलब है, योगसाधना के प्रभाव से मन व शरीर में प्रकाशमान दैवीय गुणों का प्रकट होना। इससे पहले मैं भी इस उपदेश के रहस्य को नहीं समझता था, परन्तु अब ही मुझे इसका मतलब स्पष्ट, व्यावहारिक व अनुभवात्मक रूप से समझ आया है। मुझे जागृति काल के दौरान न तो यह और न ही वह भावना या इमोशन, किसी विशेष रूप में अनुभव हुई। कोई विशेष संवेदना भी महसूस नहीं हुई, जैसे कि लोग अजीबोगरीब दावे करते रहते हैं। यह सब सिर्फ शक्ति का खेल ही तो है। जानबूझकर जागृति के लिए, लोग अक्सर अहंकार से भरे विभिन्न रास्ते अपनाते हैं, और इसी वजह से इसे कभी हासिल नहीं कर पाते हैं। कुछ अन्य लोग शांत रहते हैं, और सामान्य दुनियावी नदी के बीच बहते रहते हैं, हालांकि अपने अहंकार को मिटा कर रखते हैं। वे इसे विशेष व जानबूझकर किए जाने वाले प्रयास के बिना भी प्राप्त कर लेते हैं। कई दोनों के संतुलन वाला मध्यमार्ग अपनाते हैं, जिससे सबसे जल्दी सफलता मिलती है। मेरे साथ भी सम्भवतः यही मध्यमार्ग चरितार्थ हुआ लगता है।

Kundalini awakening occurs by the destruction of ego even to the effort made for the Kundalini

Mind-eye is called the third eye

When we lie down for getting sleepy, and then we stand up at that time, then sleep disappears suddenly. In fact, by standing and moving a little, the energy from the back rises. Yawning has the same effect. I was talking in the previous post about the possibility of strange happenings due to hypersensitivity born of Kundalini. When Kundalini is activated or awakened in the brain, the sensitivity of the brain increases greatly. All the experiences of the senses are felt intense. For example, the taste of food increases manifold. The fragrance also feels many times stronger. In fact, the prana energy from which the transcendental kundalini can be revealed can also reveal other transcendental experiences, such as the experience of flying, the experience of walking on water. These are called yogic siddhis. Actually these experiences are not from the body, but only from the mind. It is as if Kundalini is not seen with the eyes, but through the mind. This awakened mind is called the opening of the third eye. Because the whole world is from the mind, that is why in ancient yoga books such mental experiences have been written as physical experiences, so that it is easy for the common man to understand. But most people start to think of these as worldly or real physical experiences. A dedicated Kundalini yogi mostly derives the great joy of life from Kundalini. He is not subject to material things for the enjoyment of life. Therefore it is natural that if his Kundalini is damaged or weakened by any worldly troubles, he will be surrounded by darkness of depression. This will happen because he will not immediately understand, nor will he like the worldly way of attaining happiness. That is why it is said that the middle path is the best path, because spirituality and worldliness go hand in hand in this, so that there is no loss due to lack of anyone.

Sedentary lifestyle is the enemy of both materiality and spirituality

Advaita contemplation is more successful while doing yoga, because the good effect of Advaita is obtained only through Kundalini. While doing yoga, all the nadis, mainly the sushumna nadi and chakra, remain open. Due to this the Kundalini emerging from Advaita easily occupies the appropriate chakra. If the level of mental energy is low, the Kundalini occupies the lower chakras, and if the mental energy is high, the Kundalini rushes to the upper chakras. Similarly, meditation of Advaita at the time of any other type of physical activity also gives more Kundalini benefits due to this reason. In times of sluggishness, the nadis and chakras remain asleep, so that Kundalini cannot pass through them easily. For this reason, the fear of falling ill also remains. For this reason people with sedentary lifestyle are neither materially nor spiritually prosperous.

Positive effort never fails

I feel a deep connection with all the world famous artists and rich people. They make me feel like my childhood friends and family. I may have reached the peak of material progress in the previous life, possibly like them. Then I must have felt the desire for Kundalini awakening and I would have tried for that, but I would not have got success. Due to its influence, I must have been born in this birth in the midst of the rich, world famous and spiritual personalities of the previous life. The experience of momentary Kundalini awakening would also have been received by its influence. The people who come under my contact must also have been great people of previous lives, and they must have got some kind of Kundalini association as well. They must have come under my contact with the same Kundalini effect. This means that hard work never fails. Anyway, naturally, the desire for Kundalini awakening occurs only after touching the peak of materiality. Psychologically it may also happen that through the power of Kundalini awakening, I feel attached to powerful people and things, because Kundalini awakening is the treasure of all powers.

Nothing is achieved without effort or on its own

Mystical outlook has made man careless. This makes him wait for a miracle to happen. This blog is breaking this mysticism. Everything including Kundalini awakening is scientific and it also requires a sustained logical approach over a long period of time like material things. This blog and website has everything to read about my so-called spontaneous awakening phenomenon, including books. Mainly, the book Love Story of a Yogi, then Kundalini science~ A Spiritual Psychology, Parts 1 and 2. Apart from this, following this blog will also provide fresh content every week. Many people think of me as having had higher spiritual experiences on my own or without any effort. The point seems true to a large extent, because I did not make any special efforts for them. I kept getting favorable conditions, and everything happened by itself. But the hard work of my ancestors hidden in it is not visible to anyone. My family was dominated by spirituality and high idealism for at least three generations. Because of this, my family’s name and respect was far and wide in the society. For two generations, my family has been working as Brahmin priests. Vedic rituals are performed in this work. The Vedic ritual is actually the first chapter of Kundalini Yoga, because it introduces a person to Kundalini, and strengthens it in the mind in an easy and worldly way. It was in the company of such a spiritual family that the Kundalini unintentionally made its permanent place in my mind. It means that the fruits of my family’s hundreds of years of hard work have manifested in me. I didn’t get something on my own. You don’t get anything by yourself. If we keep on following the path of spirituality, then our children, grandsons, great grandsons etc. will get its fruits. They won’t get anything on their own. This means, efforts made for Kundalini never fail. If the person who makes efforts does not see the fruits immediately, then the society and the world definitely get it. Over a period of time, even the one who tries will get the result.

Even ego of doing meditation or yoga should also be shed away to get awakening

Kundalini awakening is a rare happening. It seldom requires forceful attempt. Yes, one can be ready for it mentally as well as physically with forceful efforts. Forceful efforts should be at the level of prana energy available in a man otherwise too much forceful effort may harm body and mind. I tried same. I drifted with world for 15 years though I had nondual attitude always through my self made unique philosophy. Then on availability of excess of prana energy, I did forceful hath yoga for one year and then tantric yoga for next one month. Then I shed my this ego too and I again started drifting with the world. Although Yoga was continued as it was. This shedding ego of even doing yoga etc. or letting go produced glimpse of Kundalini awakening in me just as effortlessly. Still, no one shot a big arrow, because more important than awakening is the awakened lifestyle. To sum up, just a glimpse, because my aim was not any enlightenment, but I wanted to experience Kundalini awakening in a scientific way, and to tell people to save them from misgivings. At last the wish is fulfilled. This means ego of doing meditation or yoga or other virtuous deeds should also be shed away to get awakening. This has been told in scriptures by a famous advising sentence that spirituality grow through satoguna and awakening occur through shedding away ego even to that satoguna too. Satoguna means the manifestation of luminous divine qualities in the mind and body under the influence of yoga practice. Earlier I also did not understand the secret of this saying, but now I have understood its meaning clearly, practically and experientially. During the time of my awakening, I felt no this or that emotion, no special sensation etc. as told by many people in strange ways. All things were quite smooth. It’s all an energy game only. For willful awakening, people most often adopt wrong paths full of egotism and so never attain it. Few others keep cool and drift amidst the common river, however abolishing the ego. They attain it without special willful effort. Many take the middle path of balancing both, which leads to quickest success. Probably the same middle path happened to me as well.

कुंडलिनी प्राण ऊर्जा का क्रीड़ा विलास ही है


दोस्तो, मैंने पिछले हफ्ते तीन फिल्में देखीं। उससे मेरा मस्तिष्क काफी क्रियाशील रहा। सम्भवतः इसीसे कई बार हल्का सा सिरदर्द भी रहा। हालाँकि मन में भरपूर शांति बनी रही, और भरपूर आनंद भी बना रहा। यह कुंडलिनी योग से बने हुए अद्वैत भाव से ही हुआ। फ़िर भी मैंने योग को कुछ कम किया, क्योंकि थोड़ी थकान व सुस्ती लग रही थी। इससे सिरदर्द भी थोड़ा कम हुआ और शरीर का कम्पन भी कम हुआ। वैसे ज्यादा अच्छा तब रहता है जब आसनों की संख्या कम न की जाए, पर उन पर लगने वाले समय को कम किया जाए। योग को काम की तरह नहीं लेना चाहिए। इसे थकान नहीं समझना चाहिए। इसे भरपूर आराम की तरह लेना चाहिए। शरीर व मन को ढीला छोड़ देना चाहिए। वास्तव में योग थकान को कम करता है, थकान को बढ़ाता नहीं। हरेक आसन एक विशेष प्रकार से प्राण ऊर्जा को ऊपर चढ़ाता है, और घुमाता है। वैसे भी कम नींद लेने से, रात को देर तक ज्यादा जागने से, खान-पान के समय में परिवर्तन से, पंखे या ऐसी की ज्यादा हवा लेने से तनाव व सिरदर्द पैदा हो जाता है। मेरे बाएं मस्तिष्क में क्रियाशीलता ज्यादा रही, जिसके लिए इड़ा नाड़ी से ऊर्जा ऊपर चढ़ रही थी। हालाँकि उसके साथ साथ आज्ञा चक्र और मूलाधार का ध्यान करने से ऊर्जा सुषुम्ना में स्थानांतरित हो जाती थी, जिससे दायाँ मस्तिष्क भी क्रियाशील हो जाता था, और सहस्रार में कुंडलिनी चित्र प्रकट हो जाता था। थोड़ी देर बाद वह ऊर्जा फिर से इड़ा नाड़ी में प्रविष्ट हो जाती थी। उसे फिर से इसी तरह सुषुम्ना में ले जाना पड़ता था। यह क्रम बार-2 चलता था। दरअसल दुनियादारी से बायाँ मस्तिष्क और अध्यात्म से दायाँ मस्तिष्क क्रियाशील होता है। दोनों मस्तिष्कों के संतुलन के लिए भौतिकता और आध्यात्मिकता का संतुलन जरूरी है। मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे देवलोक की स्त्रियां नंदा और अलकनन्दा का जल बारी-2 से पीकर रति क्रीड़ा की तरफ आकर्षित होती हैं और महान तृप्ति का अनुभव करती हैं। दरअसल वे दुनियादारी में डूबी हुई होती हैं। इसलिए उनमें ज्यादा एनेर्जी नहीं बची होती। वे सीधे तौर पर गंगा नदी तक नहीं पहुंच सकती हैं। इसलिए वे नन्दा और अलकनन्दा नदियों से ही काम चलाती हैं। मेरे साथ भी लगभग ऐसा ही हुआ। काम के ज्यादा बोझ के कारण मेरे अंदर इतनी एनेर्जी नहीं बची थी कि मैं कुंडलिनी को सीधे ही सहस्रार तक उठा पाता। ऐसा जबरदस्ती करने से मेरे सिर में हल्का दर्द हो रहा था। इसलिए मैंने कुंडलिनी ऊर्जा को उसकी अपनी मर्जी से पीठ से ऊपर चढ़ने दिया। फिर मैंने देखा कि वह इड़ा नाड़ी से होकर बाएँ मस्तिष्क को एक थ्रिल संवेदना के साथ जाने लगी, और लगातार जाती रही। मैं बस बीच में हल्का ध्यान फ्रंट आज्ञा चक्र और दांत के पीछे टिकाई हुई सीधी जीभ पर देता था। उनके साथ मूलाधार पर तो बहुत ही कम बार ध्यान दे पाता था, क्योंकि इससे ऊर्जा सीधे ही सहस्रार व सुषुम्ना में जाती है। उससे वह पिंगला या सुषुम्ना नाड़ी में जाने की कोशिश तो करती, पर जा नहीं पा रही थी। मतलब कि ऊर्जा की कमी थी। बड़ी देर बाद वह थोड़ी देर के लिए ही पिंगला और दाएँ मस्तिष्क में जाती थी, और फिर से इड़ा में आ जाती थी। कुंडलिनी ज्यादातर समय आज्ञा चक्र पर रहती, और उससे ऊपर न जाती। सुषुम्ना और सहस्रार में सिर्फ क्षण भर के लिए ठहरती थी। बात साफ है कि जितनी अपने अंदर ऊर्जा हो, उसीके हिसाब से कुंडलिनी को घुमाना चाहिए। जोर जबरदस्ती नहीँ करनी चाहिए।

ऊर्ध्वरेता पुरुष को ब्रह्मचारी माना जाए या तांत्रिक

मुझे इस सप्ताह शिवपुराण में एक नई जानकारी भी मिली। एक श्लोक में ऊर्ध्वरेता शब्द लिखा मिला। ऊर्ध्वरेता मनुष्य को महान ज्ञानी या आत्मज्ञानी या महान आध्यात्मिक साधक के समकक्ष रखा गया था। ऊर्ध्व का मतलब ‘ऊपर की ओर’ है, और रेता का मतलब ‘वीर्य’ है। इसलिए ऊर्ध्वरेता का मतलब हुआ कि वह व्यक्ति जो अपने वीर्य को ऊपर की ओर चढ़ाता है। यह तो वही सेक्सुअल सबलीमेशन है, जो तंत्रयोग की आधारभूत क्रिया है। तंत्र के नाम पर आजकल इसका ही बोलबाला है, हालाँकि यह वृहद परिपेक्ष्य वाले तंत्र का एक सर्वप्रमुख सहयोगी कारक ही है। अपने आप में यही सबकुछ नहीं है। इसका हिंदी में अनुवाद करते हुए इसे ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी लिखा गया है। जो ब्रह्मचारी है, वह ऊर्ध्वरेता कैसे बन पाएगा, क्योंकि ब्रह्मचारी में तो रेता का उत्पादन ही नहीं होता। रेता का उत्पादन तो सैक्सुअल स्टिमुलेशन से होता है, पर ब्रह्मचारी तो इससे सर्वथा दूर रहता है। यदि उसमें सामान्य शारीरिक क्रियाओं के तहत रेता का उत्पादन होता भी है, तो वह बहुत कम व अन-नोटिसड रहता है। जिस चीज को आदमी शरीर में नोटिस भी नहीं कर सकता, उसे वह ऊपर कैसे चढ़ाएगा। इससे एक और बात पता चलती है कि पुराणों में हर जगह तंत्र का उल्लेख है, और पौराणिक काल में तँत्रविज्ञान आम जनमानस में व्याप्त था। ब्रह्मचर्य भी तो एक तँत्रविज्ञान ही है। यदि ब्रह्मचारी योगसाधना की सहायता से वीर्य ऊर्जा को ऊपर न चढ़ाता रहे, तो वह उसे परेशान करेगी, और उसके मन व शरीर में विकार भी पैदा कर सकती है। यह अलग बात है कि वामपंथी तंत्र में इस ब्रह्मचर्य को अमर्यादित व प्रचण्ड रूप दिया जाता है। इससे हालाँकि आध्यात्मिक विकास बहुत तीव्रता से होता है, पर यदि यह सही ढंग से न किया जाए तो यह आध्यात्मिक पतन भी तीव्र गति से ही करता है। आजकल अधिकांशतः केवल इसी सैक्सुअल तंत्र को ही तंत्र माना जाता है।

महान लोगों के दोष भी आभूषणों की तरह शुभ होते हैं

इस दुनिया में कुछ भी सत्य नहीं है। सब कुछ एकदूसरे के सापेक्ष है। जो दोष आम लोगों में कुलक्षण कहे गए हैं, वही दोष भगवान शिव में सुलक्षण हैं। इसीलिए शिवपुराण में नारद मुनि पार्वती के माता-पिता को समझाते हुए कहते हैं कि ज्ञानियों और महान लोगों के दोष भी गुणों की तरह ही होते हैं। दरअसल नारद मुनि उन्हें बताते हैं कि उनकी पुत्री पार्वती का विवाह एक भूतिया, नंगे, जंगली और असामाजिक व्यक्ति से होगा। इससे वे चिंतित हो जाते हैं। फिर नारद उनकी चिंता को दूर करते हुए कहते हैं कि शिव भी ऐसे ही हैं, इसलिए पार्वती का विवाह शिव से करवाओ। पार्वती उनके मन की चंचलता को मिटा देगी। यह तंत्रयोग का ही तो वर्णन हो रहा है। फिर अधिकांश लोग कहते हैं कि तंत्र यहाँ से आया, वहाँ से आया; या तंत्र ऐसा है, तंत्र वैसा है। शिवपुराण एक पूर्ण समर्पित तंत्र-पुराण ही है। इसकी तंत्रविद्या आसानी से इसलिए पकड़ में नहीं आती, क्योंकि उसे उच्च कोटि की सामाजिकता व रूपकता के साथ लिखा गया है।

मान-अपमान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं

पिछले हफ्ते ही एक दुखद समाचार मिला कि अखाड़ा संघ के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी ने फंदे से झूलकर अपने प्राणों का अंत कर दिया। सूत्रों के अनुसार उन्होंने अपने आखिरी लिखित व वीडियो दस्तावेज में अपने इस काम के लिए अपने शिष्य आनन्द गिरि को जिम्मेदार ठहराया। आनन्द गिरि को उन्होंने बचपन से लेकर पालपोस कर बड़ा किया था, और उनका उसके प्रति विशेष लगाव होता था। सूत्रों के अनुसार वह उन्हें पहले भी समाज में अपमानित करवा चुका था, और अब भी झूठी विडियो वायरल करने जा रहा था, जिसमें उसके गुरु नरेंद्र गिरि किसी स्त्री के साथ आपत्तिजनक अवस्था में दिखाए जाते। इसी अपमान के डर से उन्होंने यह कदम उठाया। वैसे अभी भी इसकी जाँच चल रही है, और अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है। गीता में एक श्लोक आता है~जितात्मनः प्रशान्तस्यपरमात्मा समाहितः।शीतोष्णसुखदुःखेषुतथा मानापमानयोः॥६-७॥सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान में जिसने स्वयं को जीता हुआ है, ऐसा पुरुष परमात्मा में सम्यक् प्रकार से स्थित है॥7॥फिर अपमान से भयभीत होने को हम किस प्रकार का अध्यात्म कहेंगे। मैं यहाँ किसी का पक्ष नहीं ले रहा हूँ। मैं केवल घटना के एक पक्ष के बारे में वर्णन कर रहा हूँ, क्योंकि उसीसे सम्बंधित विचार मेरे मन में उठ रहे हैं। हरेक घटना के अनेक पक्ष होते हैं। पर हरेक पक्ष के बारे में विचार रखना एक अकेले आदमी के लिए संभव नहीं है। किसीका यह कहना कि इस घटना का केवल एक ही पक्ष क्यों लिया गया, बेमानी है। दूसरे पक्ष जानने के लिए दूसरे लोगों के विचार जानने चाहिए। एक जगह सभी कुछ नहीं मिल सकता। वैसे भी सम्पूर्ण जानकारी सभी पक्षों को जानकर ही मिलती है। लिटल नॉलेज इज ए डेंजरस थिंग। अगर दूसरे पक्ष की बात संक्षेप में कहूँ तो वह यही है कि गुरु, ज्ञानी और भक्त का कभी अपमान नहीं करना चाहिए। कुंडलिनी आदमी को बेहद संवेदनशील बना देती है। इसलिए कुंडलिनी योगी को परेशान नहीं करना चाहिए। उनसे प्रेम से ही बर्ताव करना चाहिए। सम्भवतः महिलाएं इसी कुंडलिनी सिद्धांत के कारण ज्यादा संवेदनशील होती हैं। मैं अगली पोस्ट में थोड़ा विस्तार से बताऊंगा कि ऐसा क्यों होता है। पहली बात, अपने प्रति सम्मान पर इतना लट्टू क्यों हुआ जाए कि उसके बाद अपमान झेल ही न सकें। अगर किसीके द्वारा लट्टू हुए बिना न रहा जाए, तो अपना सम्मान करवाया ही क्यों जाए। कुंडलिनी ही ऐसी परिस्थितियों में आदमी की सहायता व रक्षा करती है। कुंडलिनी के अतिरिक्त सृष्टि की हरेक वस्तु में स्वार्थ भरा है। कोई भी आदमी बिना स्वार्थ के मित्रता नहीं दिखाता। वृक्ष भी स्वार्थ के लिए ही फल देता है। गाय से दूध लेने के लिए उसे भी घास खिलाना पड़ता है। यहाँ तक कि नदी व पहाड़ आदि निर्जीव वस्तु से लाभ प्राप्त करने के बदले में उन्हें साफ-सुथरा रखना पड़ता है। पर कुंडलिनी तो बदले में किसी चीज की अपेक्षा नहीं रखती। वह बुरे समय में भी साथ देती है, और सांत्वना व सहानुभूति प्रदान करती है। कुंडलिनी अखण्ड ऊर्जा का एक बुलबुला है। उसका अखण्ड ऊर्जा से अलग अस्तित्व नहीं है। आसमान की तरह शून्य होने से उसे भला किस चीज की जरूरत हो सकती है। जो उसे जितना अधिक याद करता है, उसे उसका उतना ही ज्यादा साथ मिलता है। कुंडलिनी के अतिरिक्त हरेक वस्तु अस्थायी और अपवित्र है। कुंडलिनी के अतिरिक्त हरेक वस्तु भौतिक बाध्यताओं व सीमाओं से बंधी होती हैं। कुंडलिनी एक शुद्ध मानसिक चित्र है, शून्य ऊर्जा-आकाश का एक बुलबुला है। उसे भौतिक आयाम छू भी नहीं सकता। इसलिए अच्छी तरह से पालपोस कर रखी गई कुंडलिनी बुरे वक्त में बहुत काम आती है। जब भौतिक कार्यों व सम्बन्धों से तनाव बढ़ जाता है, तब पूरे शरीर की कार्यप्रणाली गड़बड़ा जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मस्तिष्क में ऊर्जा की कमी हो जाती है। उस समय अद्वैत की भावना करने से मन में कुंडलिनी प्रकट होने लगती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अद्वैत से शरीर थोड़ा रिलेक्स हो जाता है, जिससे ऊर्जा की खपत घट जाती है। अतिरिक्त ऊर्जा से मन में कुंडलिनी प्रकट होने लगती है। उस कुंडलिनी को बनाए रखने के लिए मूलाधार से ऊर्जा ऊपर चढ़ने लगती है। उससे एकदम से शारीरिक कार्यप्रणाली दुरस्त हो जाती है, और उससे मन के क्रोध आदि दोष मिट जाते हैं। दरअसल ऐसा मस्तिष्क में ऊर्जा की भरपूर उपलब्धता पैदा होने से ही होता है। मैंने पिछली पोस्ट में भी शिवपुराण का हवाला देकर लिखा था कि सहस्रार चक्र पूरे मस्तिष्क को ऊर्जा की आपूर्ति करता है। इसलिए जब मस्तिष्क में कुंडलिनी प्रकट हो जाए तो उसके साथ आज्ञा चक्र और मूलाधार चक्र का एकसाथ ध्यान करके उसे सेंट्रलाइज करने को कहा जाता है, ताकि वह सहस्रार में आ जाए। सहस्रार चक्र में इसीलिए एक हजार पंखुड़ियों को दर्शाया जाता है क्योंकि वह मस्तिष्क सहित पूरे शरीर में अनगिनत या हजारों स्थानों में ऊर्जा की आपूर्ति करता है। 

श्वास पर ध्यान से लाभ कुंडलिनी के माध्यम से ही मिलता है

एक दिन मैं थका हुआ महसूस कर रहा था। मैं सो भी नहीं पा रहा था, क्योंकि दिन में खाना खा लेने के बाद सोने से मुझे गैस्ट्रिक एसिड रिफलक्स होता है। पेट से मुंह को खटास जैसी आती है, जिससे दांत भी घिसते हैं। खाली बैठ कर साँसों पर ध्यान देने लगा, खासकर हँस शब्द के साथ। इससे थकान भी दूर हो गई और कुंडलिनी आनन्द भी प्रकट हो गया। साँस भरते समय साँस की आवाज पतले संगीत वाली थी, और बाहर जाती साँस की आवाज मोटे संगीत की थी। आप कह सकते हैं कि अंदर जाती साँस की आवाज की ट्रेबल या फ्रेकवेंसी ज्यादा थी, पर बाहर जाती साँस का ट्रेबल कम और बास ज्यादा था। म की आवाज ज्यादा ट्रेबल की और स की आवाज कम ट्रेबल की है। इसीलिए हँस के रूप में साँस पर ध्यान दिया जाता है। इसलिए हँ का ध्यान अंदर जाती साँस के साथ, व स का ध्यान बाहर जाती साँस के साथ किया जाता है। इससे बहुत लाभ मिलता है।

वैदिक दर्शन एक व्यावहारिक दर्शन है

व्यवहारिक दर्शन इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि यह शून्यवादी दर्शन नहीं है। वैदिक कर्मकांड इसका जीता जागता उदाहरण है। इसमें योग और ध्यान को दुनियादारी से प्राप्त किया जाता है, पलायनवाद से नहीं। मैं खुद इसी माहौल में पला-बढ़ा हूँ। यह अलग बात है कि जागरण रूपी अंतिम छलांग के लिए मैंने कुछ समय के लिए तंत्रयोग का सहारा भी लिया। पर यह भी सत्य है कि तंत्रयोग भी तभी सहायता करता है, यदि वैदिक कर्मकांड के प्रेमभरे माहौल में आदमी ने प्रारम्भिक आध्यात्मिक मुकाम हासिल कर लिया हो।

आध्यात्मिक रूप से हरेक पुरुष शिव और हरेक स्त्री पार्वती है

सती तपस्या करके शिव को प्राप्त करती है। अगले जन्म में जब वह पार्वती बनती है, तब भी तपस्या से ही शिव को प्रसन्न करके उन्हें प्राप्त करती है। मुझे तो यह तँत्रसम्मत गृहस्थ जीवन का रूपक ही लगता है। पार्वती की तपस्या यहाँ पर गृहस्थ जीवन की शुरुआत में एक पत्नी का, त्याग और समर्पण से भरपूर जीवन ही है। इसीलिए देखने में आता है कि गृहस्थी की शुरूआती खटपट के बाद ही असली गृहस्थ जीवन शुरु होता है। किसीकी गृहस्थी कुछ महीनों में ही पटरी पर आ जाती है, किसी को कुछ साल लग जाते हैं। कईयों के बीच तो तब असली ट्यूनिंग बनती है, जब उनके बच्चे भी बड़े हो जाते हैं। यह पति-पत्नी, दोनों की उचित भागीदारी पर निर्भर करता है कि कितना समय लगेगा। कई स्त्री पर आसक्त रहने वाले पति पत्नी से बिल्कुल भी तप नहीं करवाते और न ही खुद करते हैं। वे हालाँकि शुरु में ही फुल्ली ट्यूनड लगते हैं, पर यह दिखावा ज्यादा होता है। इस जल्दबाजी में वे एकदूसरे को ढंग से व गहराई से नहीं जान पाते। इससे कुछ न कुछ तांत्रिक कमी तो बाद तक रह ही जाती है। शादी से पहले तो चाहता ही है कि उसकी होने वाली पत्नी गुणों में देवी पार्वती से कम न हो, पर शादी के बाद भी पुरुष चाहता है कि उसकी पत्नी उसकी तन-मन-धन से सेवा करती रही, उससे भरपूर प्रेम करे और पूरी तरह उसके प्रति समर्पित रहे। मतलब कि पति चाहता है कि उसकी पत्नी उसके लिए पहले घोर तप करे, तभी वह अपने आपको उसके हवाले करेगा। भगवान शिव भी तो सती से या पार्वती से यही चाहते हैं। इसीलिए पार्वती निरन्तर शिव का स्मरण करते हुए घोर तप करती है। उसीके बाद शिव उसे स्वीकार करते हैं। थोड़ा तप तो शिव भी करते हैं। वे लगातार पार्वती की याद में इधर-उधर भटकते रहते हैं। यही उनका तप है। दरअसल यह मानव जीवन का मनोविज्ञान ही है, जिसे पुराणों में देवी-देवताओं की कथाओं द्वारा समझाया गया है।

युद्ध की देवी काली

युद्ध आदि के समय और अन्य विकट परिस्थितियों में भगवती माता या काली की पूजा करने का विधान है। दरअसल ऊर्जा का स्रोत स्त्री ही है। युद्ध आदि के समय बहुत अधिक प्राण ऊर्जा की आवश्यकता होती है, आम समय की अपेक्षा दुगुने से भी ज्यादा। शरीर को चलायमान रखने के लिए अलग से ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है, और मन को स्थिर रखने के लिए अलग से। अगर मुक्ति की आकांक्षा हो, तब तो और भी ज्यादा ऊर्जा चाहिए, क्योंकि उसके लिए साथ में नाड़ियों और अन्य चक्रों के साथ सहस्रार को भी जागृत रखना पड़ता है। काली को वीभत्स रूप इसलिए दिया गया है क्योंकि उससे प्राप्त ऊर्जा का इस्तेमाल युद्धादि में उपजे रक्तपात के लिए भी होता है। दूसरा मतलब यह भी है कि शक्ति खून की प्यासी भी हो सकती है।

Kundalini is the interplay of energies

Friends, I watched three movies last week. It kept my brain very active. Possibly due to this there was also a slight headache at times. However, there remained a lot of peace in the mind, and a lot of joy dominated. This happened due to the non-dual spirit created from Kundalini Yoga. Still, I reduced yoga a bit, because I was feeling a little tired and lethargic. Due to this the headache also reduced a little and the tremors of the body also decreased. By the way, it is better when the number of postures is not reduced, but the time spent on them is reduced. Yoga should not be taken as work. It should not be taken as fatigue. It should be taken as a rest. The body and mind should be let loose. In fact, yoga reduces fatigue, not increases it. Each asana in a particular way uplifts and rotates the prana energy. Anyway, due to less sleep, more waking up late in the night, due to change in food timings, excessive air intake from fans or a.c., stress and headache arise. There was more activity in my left brain, for which energy was rising from the Ida Nadi. However, by simultaneously meditating on the Ajna Chakra and Muladhara, the energy was transferred to the Sushumna, thereby activating the right brain, revealing the Kundalini picture in Sahasrara. After a while that energy would again enter the Ida Nadi. It had to be taken again to Sushumna in the same way. This sequence continued. In fact, the left brain is active from worldliness and the right brain is active from spirituality. A balance of materiality and spirituality is necessary for the balance of both the brains. I was telling in the previous post that how the women of Devlok or god abode get attracted towards Rati or lust sports by drinking the water of Nanda and Alaknanda alternately and feel great satisfaction. In fact, they are immersed in worldliness. So they don’t have much energy left. They cannot directly reach the river Ganges. That’s why they work only from the Nanda and Alaknanda rivers. Almost the same thing happened with me. Due to the heavy workload, I did not have enough energy to lift the Kundalini straight up to Sahasrar. Due to this force, my head was hurting a bit. So I let the Kundalini energy rise up in the back at her own free will. Then I noticed that it started going through the Ida nadi to the left brain with a thrilling sensation going. I just used to pay light attention in the intervening moments to the front agya chakra and the straight tongue resting behind the teeth. With this, I was rarely able to pay attention to Mooladhara, because from this the prana energy goes to Sahasrara and Sushumna straight. She would try to go to Pingala or Sushumna Nadi with him, but she was not able to go. Meaning there was a lack of energy. After a long time she used to go to Pingala and right brain for a while, and again to Ida. Kundalini stays on the Agya chakra most of the time, and does not go above it. She used to stay only for a moment in Sushumna and Sahasrara. The point is clear that the Kundalini should be rotated according to the amount of energy inside. It should not be forced.

The Urdhvareta Purush should be considered a Brahmachari or a Tantrik

I also got a new information this week in Shivpuran. In one verse the word ‘Urdhvreta’ was found written. The Urdhvareta man was equated with the great jnani or the enlightened one or the great spiritual seeker. Urdhva means ‘upwards’, and Reta means ‘semen’. Therefore, Urdhvareta means a person who pours his semen upwards. This is the same sexual sublimation, which is the basic action of Tantra Yoga. In the name of tantra, it dominates these days, although it is only a major contributory factor to tantra with a wider perspective. That is not all in itself. While translating it into Hindi, it has been written as Urdhvreta Brahmachari. One who is a celibate, how can he become an Urdhvreta, because there is no production of semen in a celibate. The production of semen is done through sexual stimulation, but the brahmacari stays away from it. Even if semen is produced in it under normal bodily functions, it remains very little and unnoticed. What can a man not even notice in the body, how can he uplift it? Another thing is known from this is that there is mention of tantra everywhere in the Puranas, and in the Puranic period, tantra science was prevalent among the common people. Brahmacharya is also a tantra science. If the brahmachari does not keep raising the semen energy with the help of yogasadhana, then it will disturb him, and may also cause disorder in his mind and body. It is a different matter that in the leftist system this celibacy is given a limitless and fierce form. Although this leads to rapid spiritual growth, but if it is not done properly, it also leads to a rapid spiritual decline. Nowadays, mostly only this sexual tantra is considered as tantra.

The faults of great people are also auspicious like ornaments

Nothing is true in this world. Everything is relative to each other. The defects which have been called Kulakshan in common people, the same defects are Sulakshana in Lord Shiva. That is why in Shiv Purana, Narada Muni, while explaining to Parvati’s parents, says that the faults of the wise and great people are also like the virtues. In fact Narad Muni tells them that their daughter Parvati will be married to a ghostly, naked, wild and anti-social person. This makes them worried. Then Narada removes their worries and says that Shiva is also like this, so get Parvati married to Shiva. Parvati will erase the restlessness of his mind. This is the description of Tantra Yoga itself. Then why most of the people say that tantra came from here or there; Or the tantra is like this, the tantra is like that. Shivpuran is a completely dedicated Tantra-Purana. Its tantric principles are not easily caught because it has a high degree of social, metaphoric and mystical styling of expression.

Humiliation and respect are two sides of the same coin

Last week got a sad news that Mahant Narendra Giri, president of Akhara Sangh, ended his life by hanging himself. According to sources, in his last written and video document, he attributed this work to his disciple Anand Giri. Anand Giri was brought up by him from childhood, and he had a special attachment to him. According to sources, he had made him humiliated in the society in the past, and was still going to make a false video viral, in which his mentor Narendra Giri was to be shown in an objectionable position with a woman. Fearing this humiliation, he took this step. However, it is still under investigation, and the final conclusion has not been revealed. There is a verse in the Gita ~Jitatmanah Prashantasya—॥6-7॥ meaning,One who has conquered himself in cold and heat, happiness and sorrow and honor and dishonor, such a person is rightly situated in the Supreme Soul.Then what kind of spirituality can we call being afraid of humiliation? I am not taking sides here. I am describing only one side of the event, because thoughts related to that are arising in my mind. There are many sides to every event. But it is not possible for a single man to think about each and every aspect. It is meaningless for anyone to say why only one side of the incident was taken. To know the other side, one must know the views of other people. Everything cannot be found at one place. Anyway, complete information is available only after knowing all the aspects. Little Knowledge is a Dangerous Thing. If I talk about the other side in a nutshell, then it is this that one should never insult the Guru, the Gnani and the devotee. Kundalini makes a man extremely sensitive. Therefore Kundalini Yogi should not be disturbed. They should be treated with love. Probably, the women are more sensitive due to this same Kundalini principle. In the next post I will elaborate a bit on why this happens. First of all, why should you be so proud of yourself that you can’t bear the humiliation after that? If you can’t live being taunted by someone, then why should you get yourself respected. Kundalini helps and protects man in such situations. Apart from Kundalini, there is selfishness in everything in the universe. No man shows friendship without selfishness. The tree also gives fruit for selfishness. To get milk from the cow, one has to feed grass. Even in exchange for getting benefits from non-living things like rivers and mountains, these have to be kept clean. But Kundalini does not expect anything in return. She supports even in bad times, and provides consolation and sympathy. Kundalini is a bubble of unbroken energy. It does not have a separate existence from the eternal energy. What can it need as it’s the conscious sky that’s empty. The more one remembers it, the more it gets along with him. Everything is temporary and impure except Kundalini. Everything except Kundalini is bound by material constraints and limitations. Kundalini is a pure mental picture, a bubble of zero energy-sky. It cannot even be touched by the physical dimension. That’s why a well-nourished Kundalini is very useful in bad times. When there is an increase in stress due to physical activities and relationships, then the functioning of the whole body gets disturbed. This happens because there is a lack of energy in the brain. At that time Kundalini starts manifesting in the mind due to feeling of Advaita in the discouraged man’s mind. This is because the body relaxes a bit with Advaita, which reduces energy consumption. With the excess energy, Kundalini starts appearing in the mind. To maintain that Kundalini, energy starts climbing up from the Muladhara. With this, the physical functioning gets corrected, and the anger etc. of the mind are erased by it. In fact, this happens only due to the creation of sufficient availability of energy in the brain. I had written in the previous post also by referring to Shiv Purana that Sahasrara Chakra supplies energy to the whole brain. Therefore, when the Kundalini appears in the brain, it is said to centralize it by meditating on the Agya chakra and the Muladhara chakra together with it, so that it enters the Sahasrara. The reason why a thousand petals are depicted in the Sahasrara Chakra is because it supplies energy to countless or thousands of places throughout the body, including the brain.

The benefits of meditation on breathing are obtained only through Kundalini

One day I was feeling tired. I could not even sleep, because I have gastric acid reflux on sleeping after a meal during the day. The mouth gets sour from the stomach, due to which the teeth also look wear out. Sitting empty-handed, began to pay attention to the breath, especially with the word HANS. Due to this fatigue also disappeared and Kundalini joy also appeared. While inhaling, the sound of the breath was of thin music, and the sound of the exhaled breath was of thick music. You could say that the inhalation sound had a higher treble or frequency, but the outgoing breath had less treble and more bass. M’s or HAN’s voice is high treble and S’s voice is low treble. That is why the attention is given to the breath in the form of HANS. Therefore the attention of HAN is done with the inhaling breath, and the attention of S is done with the outgoing breath. It gives a lot of benefits.

Vedic philosophy is a practical philosophy

I am saying practical philosophy because it is not a nihilistic philosophy. Vedic rituals are a living example of this. In this, yoga and meditation are achieved through worldliness, not escapism. I myself grew up in this environment. It is a different matter that for the last leap of awakening, I took the help of Tantra Yoga. But it is also true that Tantra Yoga only helps if one has attained the initial spiritual stage in the loving atmosphere of Vedic rituals and likewise.

Spiritually every man is Shiva and every woman is Parvati

Sati attains Shiva by doing penance. When she becomes Parvati in the next birth, she still pleases Shiva by doing penance and attains him. To me, it seems only a metaphor for Tantric household life. Parvati’s penance here is the life of a wife, full of sacrifice and dedication, at the beginning of the householder’s life. That is why it is seen that after the initial disturbance of the household, the real household life begins. Some households get back on track in a few months, some take a few years. For many, the real tuning is made when their children also grow up. It depends on the proper participation of both the husband and wife as to how much time it will take. Husbands who are attached to many women do not make their wife do penance at all, nor do they do it themselves. Although they seem fully tuned in the beginning, but it is more of a pretense. In this haste, they do not get to know each other deeply and thoroughly. Due to this, some tantric deficiency remains till later. Before marriage, one undoubtedly wants that his future wife should not be less than goddess Parvati in qualities, even after marriage, he wants his wife to serve him whole-heartedly, love him deeply and be completely devoted to him. Meaning that the husband wants his wife to do severe penance for him first, only then he will surrender himself to her. Lord Shiva also wants the same from Sati or Parvati. That is why Parvati does severe penance, constantly remembering Shiva. After that Shiva accepts her. Even Shiva does a little penance. He constantly wander here and there in remembrance of Parvati. This is his penance. Actually it is the psychology of human life, which is explained by the stories of gods and goddesses in the Puranas.

Goddess of War Kali

There is a ritual to worship Bhagwati Mata or goddess Kali in times of war etc. and in other dire circumstances. In fact, the source of energy is the woman. During war etc., a lot of vital energy is required, more than twice as much as during normal times. A separate energy supply is needed to keep the body moving, and a separate one to keep the mind stable. If there is a desire for liberation, then even more energy is needed, because for that, along with the nadis and other chakras, the Sahasrara has to be kept awake. Kali has been given a gruesome form because the energy derived from it is also used for bloodshed in war etc. Secondly it also means that Shakti can be thirsty for blood.

कुंडलिनी विभिन्न देवताओं, शिव ब्रह्मरूप अखंड ऊर्जा, सहस्रार चक्र वटवृक्ष और मस्तिष्क कैलाश पर्वत के रूप में दर्शाए गए हैं

दोस्तो, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि ‘चक्र’ नाम कैसे पड़ा है। दरअसल चक्र का शाब्दिक अर्थ भी पहिया ही होता है। उदाहरण के लिए रथचक्र, जलचक्र आदि। यह भी बताया कि चक्र को ऊर्जा का केंद्र क्यों कहा गया है। चक्र के बारे में ऐसा तो हर जगह लिखा होता है, पर यह साबित नहीं किया होता है कि ऐसा क्यों कहा गया है। इससे रहस्यात्मकता की बू आती है। मैंने इसे वैज्ञानिक व अनुभवात्मक रूप से सिद्ध किया कि ऐसा क्यों कहा जाता है। इसीलिए इस वेबसाइट का नाम “कुंडलिनी रहस्योद्घाटन” है। यह भी मनोवैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया कि प्राण ऊर्जा और मनस ऊर्जा के मिश्रण से कुंडलिनी कैसे बनती है। दरअसल प्राण ऊर्जा और मनस ऊर्जा के इसी मिश्रित रूप को ही कुंडलिनी कहते हैं। यह कुंडलिनी की सबसे छोटी परिभाषा है। इसे ही टाईम-स्पेस मिश्रण भी कहते हैं। प्राण ऊर्जा टाईम का प्रतिनिधित्व करती है, और मनस ऊर्जा स्पेस का प्रतिनिधित्व करती है। इस पोस्ट में मैं बताऊंगा कि सहस्रार चक्र को शिव के निवास स्थान या कैलाश के वटवृक्ष के रूप में कैसे निरूपित किया गया है।

दक्षयज्ञ से नाराज शिव को मनाने के लिए देवताओं द्वारा कैलाश गमन

भगवान विष्णु दक्ष से नाराज शिव को मनाने के लिए देवताओं सहित कैलाश पर्वत पर गए। वह कैलाश पर्वत मनुष्यों के इलावा किन्नरों, अप्सराओं और योगसिद्ध महात्माओं से सेवित था। वह बहुत ऊंचा था। वह चारों ओर से मणिमय शिखरों से सुशोभित था। वह अनेक प्रकार की धातुओं से विचित्र जान पड़ता था। वह अनेक प्रकार के वृक्षों व लताओं से भरा था। वह अनेक प्रकार के पशु-पक्षियों व झरनों से परिव्याप्त था। उसके शिखर पर सिद्धांगनाएँ अपने-अपने पतियों के साथ विहार करती थीं। वह अनेक प्रकार की कन्दराओं, शिखरों तथा अनेक प्रकार के वृक्षों की जातियों से सुशोभित था। उसकी कांति चांदी के समान श्वेतवर्ण की थी। वह पर्वत बड़े-बड़े व्याघ्र आदि जंतुओं से युक्त, भयानकता से रहित, सम्पूर्ण शोभा से सम्पन्न, दिव्य तथा अत्यधिक आश्चर्य उत्पन्न करने वाला था। वह पर्वत पवित्र गंगा नदी से घिरा हुआ और अत्यंत निर्मल था। उस कैलाश पर्वत के निकट शिव के मित्र कुबेर की अलका नाम की दिव्य नगरी थी। उसी पर्वत के पास ही सौगंधिक नामक दिव्य वन था, जो दिव्य वृक्षों से शोभित था, और जहाँ पक्षियों आदि की अद्भुत ध्वनि हो रही थी। उस पर्वत के बाहर से नन्दा और अलकनन्दा नामक दिव्य व पावन सरिताएं बह रही थीं, जो दर्शन मात्र से ही पापों का नाश करती हैं। देव स्त्रियां प्रतिदिन अपने लोक से आकर उन नदियों का जल पीतीं हैं, और स्नान करके रति से आकृष्ट होकर पुरुषों के साथ विहार करती हैं। फिर उस अलकापुरी और सौगंधिक वन को पीछे छोड़कर, आगे की ओर जाते हुए उन देवताओं ने समीप में ही शंकर जी के वट वृक्ष को देखा। वह वटवृक्ष उस पर्वत के चारों ओर छाया फैलाए हुए था। उसकी शाखाएं तीन ओर फैली हुई थीं। उसका घेरा सौ योजन ऊंचा था। वह घौंसलों से रहित और ताप से वर्जित था। उसका दर्शन केवल पुण्यात्माओं को ही होता है। वह अत्यंत रमणीय, परम पावन, शिवजी का योग स्थल, दिव्य, योगियों के द्वारा सेवन या निवास योग्य, तथा अति उत्तम था। महायोगमयी व मुमुक्षु लोगों को शरण देने वाले उस वटवृक्ष के नीचे बैठे शिवजी को देवताओं ने देखा। शिवभक्ति में लीन, शांत तन-मन वाले, व महासिद्ध जो ब्रह्मा के पुत्र सनक आदि हैं, वे प्रसन्नता के साथ उन शिव की उपासना कर रहे थे। उनके मित्र कुबेर, जो गुह्यकों व राक्षसों के पति हैं, वे अपने परिवार व सेवकों के साथ उनकी विशेष रूप से सेवा कर रहे थे। वे परमेश्वर शिव तपस्वियों के मनपसंद सत्यरूप को धारण किए हुए थे। वे वात्सल्य भाव से विश्वभर के मित्र लग रहे थे, और भस्म आदि से सुसज्जित थे। वे कुशासन पर बैठे हुए थे, और नारद आदि के पूछने पर सभी श्रोता सज्जनों को ज्ञान का उपदेश दे रहे थे। वे अपना बायाँ चरण अपनी दाईं जांघ पर, और बायाँ हाथ बाएँ घुटने पर रखी कलाई में रुद्राक्ष की माला डाले हुए सत्य-सुंदर तर्क मुद्रा में विराजमान थे।  वे सर्वोच्च ज्ञान की बात बताते हैं कि मोक्ष की प्राप्ति कर्म से नहीं, अपितु ज्ञान से होती है। इसलिए अद्वैत ज्ञान के साथ कर्म करना चाहिए, मतलब कि कर्मयोग करना चाहिए। जो लोग उनमें, ब्रह्मा और विष्णु में भेद करते हैं, वे नरक को जाते हैं। मतलब कि भगवान शिव भेददृष्टि को नकारते हैं।

कैलाश पर्वत व मस्तिष्क की परस्पर समकक्षता

कैलाश पर्वत मस्तिष्क है। वहाँ पर आम लोग-बाग, अप्सराएं और नाच-गाना करने वाले कलाकार तो भोगविलास करते ही हैं, ऋषि-मुनि भी वहीँ पर ध्यान का आनंद प्राप्त करते हैं। यह मानव शरीर में सबसे ऊंचाई पर स्थित है। मणिमय शिखरों का मतलब इसकी अखरोट के जैसी आकृति से बने अनेकों रिज या उभार हैं, जो मन के चमकीले विचारों व संकल्पों से चमकते रहते हैं। अनेक प्रकार की धातुओं का मतलब इसके किस्म-किस्म की संरचनाओं व रँगों वाले भाग हैं, जैसे कि खोपड़ी की हड्डी, उसके नीचे व्हाईट मैटर, उसके नीचे ग्रे मैटर, तरलता-पूर्ण नरम आंखें, कान, नाक, दांत आदि। मस्तिष्क का अंदरूनी भाग भी किस्म-किस्म के आकारों व रंगों में बंटा है, जैसे कि पॉन्स, हिप्पोकैम्पस, पिनियल ग्लैंड आदि। अनेक प्रकार के वृक्षों व लताओं का मतलब विभिन्न प्रकार के बाल हैं, जैसे कि सिर के बाल, दाढ़ी के बाल, मूँछ के बाल, कान के बाल, नाक के बाल आदि। यहाँ तक कि मस्तिष्क के अंदर भी रेशेदार माँस होता है, जिसे नर्व फाइबर कहते हैं। इससे लगता है कि प्राचीन ऋषि-मुनि मानव शरीर की एनाटोमी का भी अच्छा ज्ञान रखते थे। इसका विशद वर्णन आयुर्वेद में है। अनेक प्रकार के पशु-पक्षियों का मतलब बालों में पाए जाने वाले सूक्ष्म परजीवी ही हैं। अनेक प्रकार के झरनों का मतलब आँखों, कानों व मुंह आदि की ग्रन्थियों से निकलने वाला जैविक स्राव ही है। इसके शिखरों पर सिद्धांगनाओं के विहार करने का मतलब तंत्र योगिनियों के द्वारा तांत्रिक रोमांस करना ही है, जिससे वे महान आनन्द प्राप्त करती हैं। आनन्द का स्थान तो मस्तिष्क ही है। अनेक प्रकार की कन्दराएँ मस्तिष्क के आसपास अनेक प्रकार के छिद्र हैं, जैसे कि आँख, नाक, कान आदि। शिखरों व वृक्षों के बारे में तो ऊपर बता ही दिया है। उस पर्वत के चांदी की तरह होने का मतलब मस्तिष्क के चेतना से भरे चमकीले विचार ही हैं। व्याघ्र जैसे जंतुओं का मतलब जू, पिस्सू की तरह सूक्ष्म मांसाहारी परजीवी ही हैं, जो बालों की नमी में छिपे रह सकते हैं। ‘भयानकता से रहित’ मतलब उन जंतुओं से भय नहीँ लगता था। दिव्यता तो मस्तिष्क में है ही। सभी दिव्य भाव मस्तिष्क की क्रियाशीलता के साथ ही हैं। कुंडलिनी जागरण सबसे दिव्य है, इसीलिए उसमें मस्तिष्क की क्रियाशीलता चरम पर होती है। इसी तरह मस्तिष्क आश्चर्य का नमूना भी है। इसमें जीवन या चेतना की उत्पत्ति होती है। वैज्ञानिक आज तक इस पहेली को नहीं सुलझा सके हैं। गँगा नदी यहाँ सुषुम्ना नाड़ी का प्रतीक है। क्योंकि वह सहस्रार को सिंचित करती है, जिससे पूरा मस्तिष्क जुड़ा हुआ है, इसीलिए इसे पूरे पर्वत को घेरने वाली कहा है। यह पूरे मस्तिष्क को ऊर्जा से निर्मल कर देती है। शिव के मित्र कुबेर की नगरी अलकापुरी आज्ञा चक्र को कहा गया है। “अलका” शब्द संस्कृत के अलक्षित व हिंदी के अलख शब्दों से बना है। इस चक्र से अदृश्य कुंडलिनी के दर्शन होते हैं। इसीलिए इसे तीसरी आंख भी कहते हैं। दरअसल जब आज्ञाचक्र पर ध्यान लगाया जाता है, तो सहस्रार पर कुंडलिनी प्रकट हो जाती है। क्योंकि शिवपुराण में शिव ही कुंडलिनी के रूप में हैं, इसीलिए आज्ञाचक्र के अभिमानी देवता कुबेर को शिव का मित्र बताया गया है। अगर यहाँ अखण्ड ऊर्जा को ही शिव माना गया है, तब भी कुबेर शिव के मित्र सिद्ध होते हैं, क्योंकि कुंडलिनी से ही अखण्ड ऊर्जा प्राप्त होती है।आज्ञाचक्र बुद्धि का प्रतीक है। इसलिए स्वाभाविक है कि आज्ञाचक्र धनसंपदा से जुड़ा है, क्योंकि बुद्धि से ही संपदा अर्जित होती है। इसीलिए इसके देवता कुबेर सृष्टि में सबसे धनी हैं। उस पर्वत के पास ही सौगंधिक नामक वन है। क्योंकि इसका वर्णन अलकापुरी के एकदम बाद हो रहा है, इसका मतलब है कि वह वन उसके निकट ही है। वह तो नाक ही है। उसके अंदर ही सुगंधिका अनुभव होता है, इसलिए माना गया है कि सुगंधि की उत्पत्ति उसीमें हो रही है। क्योंकि सुगंधि वृक्षों और पुष्पों से ही उत्पन्न होती है, इसलिए नाक को वन का रूप दिया गया है। उस वन को दिव्य इसलिए कहा है, क्योंकि वह आकार में इतना छोटा होकर भी दुनिया भर की सभी दिव्य सुगंधियों को उपलब्ध कराता है। साधारण वन तो ऐसा नहीं कर सकता। उसमें स्थित रोमों को ही दिव्य वृक्ष माना जा सकता है। इन्हें दिव्य इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि आकार में इतना छोटा और कम संख्या में होने पर भी वे दुनिया भर की दिव्य सुगंधियों को उपलब्ध कराने में मदद करते हैं। वे गंध-ग्राही कोशिकाओं को सुरक्षा देते हैं। हो सकता है कि पौराणिक युग में नासिका-रोम को ही सुगन्धि के लिए एकमात्र जिम्मेदार माना जाता हो। उस वन में पक्षियों आदि की अद्भुत ध्वनि हो रही थी। वह ध्वनि दरअसल श्वास-प्रश्वास की धीमी आवाज ही है। इसे मीठी आवाज तो नहीं कही जा सकती। इसीलिए इसे अद्भुत कहा है। उस पर्वत के बाहर नन्दा और अलकनन्दा नामक दो नदियां इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ ही हैं। मस्तिष्क के साथ रीढ़ की हड्डी जुड़ी होती है। रीढ़ की हड्डी को यदि नीचे के पर्वत कहेंगे, तो मस्तिष्क शीर्ष के पर्वत शिखर से बना है। उसमें सुषुम्ना बहती है। उसे गंगा कहा गया है। इड़ा नाड़ी रीढ़ की हड्डी के बाहर बाईं ओर बहती है। इसके माध्यम से आदमी दुनियादारी का भौतिक, सीमित, तार्किक या लॉजिकल व जजमेंटल या नुक्ताचीनी वाला आनन्द लेता है। इसीलिए इसका नाम नन्दा है। दूसरी नाड़ी जो पिंगला है, वह मेरुदंड रूपी पर्वत के दाईं ओर बहती है। इसके माध्यम से आदमी आध्यात्मिक जैसा, शून्य या स्पेस या आकाश जैसा, अंधेरे जैसा, तर्कहीन या इलॉजिकल जैसा, असीमित जैसा, ननजजमेंटल जैसा आनन्द लेता है। इसका नाम अलकनन्दा है। जैसा ऊपर बताया, अलक शब्द अलख या अलक्षित का सूचक है। क्योंकि आकाश अनन्त होने से अलक्षित ही है, इसीलिए इसका नाम अलकनन्दा है, मतलब अलक्षित का आनन्द। दोनों नदियों के दर्शन से पाप नष्ट हो जाते हैं। अकेली नदी की बात नहीं हो रही, बल्कि दोनों नदियों की एकसाथ बात हो रही है। इसका मतलब है कि बाएं और दाएं मस्तिष्क के एकसाथ क्रियाशील होने से अद्वैत उत्पन्न होता है, जो निष्पापता रूप ही है। द्वैत ही सबसे बड़ा पाप है, और अद्वैत ही सबसे बड़ी निष्पापता। देव-स्त्रियों से मतलब यहाँ अच्छे व संस्कारवान घर की कुलीन स्त्रियां हैं। क्योंकि वे संपन्न होती हैं, इसलिए वे दुनियादारी के झमेले में ज्यादा नहीं फँसती। इससे वे अद्वैत के आनन्द में डूबी रहती हैं। इसी अद्वैत के आनन्द को उनके द्वारा दोनों नदियों के जल को पीने के रूप में दर्शाया गया है। वे सुंदर व सुडौल शरीर वाली होती हैं। नहाते समय कुंडलिनी ऊर्जा पीठ से ऊपर चढ़ती है, जैसा मैंने एक पिछली पोस्ट में बताया था। ऐसा ही उन देव स्त्रियों के साथ भी होता है। मूलाधार की ऊर्जा ऊपर चढ़ने से उनका मूलाधार ऊर्जाहीन सा हो जाता है। मूलाधार को ऊर्जा देने के लिए ही वे रति की ओर आकर्षित होती हैं, और पुरुषों के साथ विहार करती हैं। एक अन्य रूपक के अनुसार, देवस्त्रियाँ सुंदर व मानवीय विचारों की प्रतीक हैं। ऐसे विचार अद्वैत भाव के साथ होते हैं, मतलब इनके साथ इड़ा और पिंगला, दोनों नाड़ियाँ बहती हैं। जब ये दोनों नाड़ियाँ बहुत तेजी से बहती हैं, तभी दिव्य कामभाव जागृत होता है। ऐसा मूलाधार को ऊर्जा देने के लिए ही होता है, क्योंकि अद्वैत से मूलाधार की ऊर्जा ऊपर चढ़ती रहती है। अद्वैत भाव से मस्तिष्क में अभौतिक कुंडलिनी चित्र का विकास होने लगता है। उसके लिए बहुत ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि इंद्रियों की पहुंच से बाहर होने के कारण, आम मानसिक चित्रों की तरह इसको मजबूत करने के लिए शारीरिक इंद्रियों का सहयोग नहीं मिलता। इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए मूलाधार से ऊर्जा ऊपर चढ़ती है। उस स्थिति में की गई रति क्रीड़ा बहुत आनन्ददायक व आत्मा का विकास करने वाली होती है, मतलब कि इससे ऊर्जा सुषुम्ना में प्रविष्ट होकर सहस्रार में पहुंच जाती है। इस अतिरिक्त ऊर्जा से कुंडलिनी के साथ मस्तिष्क का भी अच्छा विकास होता है। इसीलिए कहते हैं कि मानव जाति के त्वरित विकास के लिए कुंडलिनी बहुत जरूरी है। उपरोक्त कुण्डलिनीपरक रतिक्रिया को तांत्रिक रतिक्रीड़ा भी कह सकते हैं। जब आदमी दुनियादारी से दूर हो, और ऊर्जा की कम खपत के कारण उसकी ऊर्जा की संचित मात्रा पर्याप्त हो, और वह पहले से ही सुषुम्ना में बह रही हो, वह तो साधु वाली स्थिति होती है। उसमें रतिक्रीड़ा के प्रति ज्यादा मन नहीं करता। देवलोक से वे स्त्रियां आती हैं, मतलब मस्तिष्क से वे मानवीय विचार बाहर आते हैं, और अद्वैत भाव के साथ दुनियादारी के काम निभाने लगते हैं। इसे ही देवस्त्रियों द्वारा नन्दा और अलकनन्दा नदियों में स्नान करना कहा गया है। देवता व देवियाँ वैसे भी अद्वैत भाव के प्रतीक होते हैं। साधारण लोगों में यह ऊर्जा का ऊर्ध्वगामी प्रभाव कम होता है। इसलिए उनकी कामुक भावना क्षणिक सुखदायी ही होती है, जिसे कामवासना कहते हैं। उनमें द्वैत भाव होने के कारण उनके मन में कुंडलिनी नहीं होती। इसलिए ऊर्जा की अतिरिक्त आवश्यकता न होने से मूलाधार की ऊर्जा ऊपर नहीँ चढ़ती। इसीलिए इसमें मूलाधार की ऊर्जा का रक्षण नहीं बल्कि क्षरण होता है। मस्तिष्क में ही दिव्यता होती है।  सौगंधिक वन और अलकापुरी को लाँघ कर आगे बढ़ने पर वे सभी देवता एक वटवृक्ष के पास पहुंचते हैं, जिसकी शाखाएं पूरे पर्वत पर फैल कर छाया पहुंचाए हुए थीं। दरअसल कुंडलिनी को ही उन सभी देवताओं के रूप में दर्शाया गया है। मन में पूरी सृष्टि बसी हुई है। इसका मतलब है कि मन में सभी देवता बसे हुए हैं, क्योंकि देवता ही सृष्टि को चलाते हैं, और पूरी सृष्टि के रूप में भी हैं। एकमात्र कुंडलिनी चित्र या ध्यान चित्र के अंदर पूरा मन ऐसे ही समाया हुआ होता है, जैसे एक चीनी के दाने में चीनी की पूरी बोरी या गन्ने का पूरा खेत समाया होता है। किसी को अगर चीनी के दर्शन कराने हो, तो हम पूरी बोरी चीनी न उठाकर एक दाना चीनी का ले जाते हैं। इससे काम काफी आसान हो जाता है। जितनी ऊर्जा से चीनी की बोरी को एक फुट ऊंचा उठाया जा सकता है, उतनी ही ऊर्जा से एक चीनी के दाने को हजारों फुट ऊंचा उठाया जा सकता है। जो काम चीनी की बोरी से होगा, वही काम चीनी के एक दाने से भी हो जाएगा। इसी तरह यदि शिव से मिलाने के लिए सहस्रार तक मन को ले जाना हो, तो हम मन की पूरी दुनिया को न ले जाकर केवल कुंडलिनी को ले जाते हैं। इससे शिव-मन या शिव-जीव के मिलाप का काम बेहद आसान हो जाता है। जितनी ऊर्जा से पूरे मन को मूलाधार से स्वाधिष्ठान चक्र तक भी ऊंचा नहीं उठाया जा सकता है, उतनी ही ऊर्जा से कुंडलिनी को सहस्रार तक ऊंचा उठाया जा सकता है। जो काम असंख्य चित्रों के ढेर को समेटे मन से होगा, वही काम उस ढेर में से छांटे गए एकमात्र कुंडलिनी चित्र से भी हो जाएगा। कुंडलिनी के स्थान पर बहुत सारे देवता इसलिए दिखाए गए हैं, ताकि इससे इस मनोवैज्ञानिक आख्यान को रोचकता व रहस्यात्मकता मिल सके। वटवृक्ष ही सहस्रार है, क्योंकि सहस्रार पूरे मस्तिष्क से नाड़ियों के माध्यम से जुड़ा है। उन नाड़ियों को सहस्रार चक्र रूपी वृक्ष की शाखाएं कह सकते हैं। उसकी शाखाएँ तीन ओर फैली हुई थीं, इसका मतलब है कि सहस्रार से बाएं मस्तिष्क, दाएँ मस्तिष्क और आगे व फिर नीचे फ्रंट चैनल, तीन दिशाओं में ऊर्जा प्रसारित होती है। पीछे व वहाँ के नीचे स्थित बैक चैनल से तो उसे ऊर्जा मिल रही है। यह चौथी दिशा में है, जिसे हम उस वृक्ष का तना या जड़ कह सकते हैं। ऊर्जा हमेशा जड़ से शाखाओं की तरफ ही बहती है। उसका ऊपरी विस्तार 100 योजन ऊँचा बताया गया है, जो लगभग एक हजार मील की दूरी है। यह बहुत ऊँचाई है, जो बाहरी अंतरिक्ष तक फैली है। दरअसल इसका मतलब है कि सहस्रार चक्र उस अखंड ऊर्जा से जुड़ा हुआ है, जो अनन्त आकाश में फैली हुई है। सहस्रार का शाब्दिक अर्थ भी एक हजार शाखाओं वाला है, सम्भवतः इसीलिए यह संख्या ली गई हो। वह घोंसलों से वर्जित है, मतलब वहाँ कोई सामान्य जीव नहीं पहुंच सकता। वह ताप से वर्जित है, मतलब अत्यंत शांत सहस्रार चक्र है। जिस द्वैत से ताप पैदा होता है, वह वहाँ था ही नहीं। वह अत्यंत रमणीय था। इसका मतलब है कि सभी स्थानों की रमणीयता सहस्रार के कारण ही होती है। रमणीय स्थानों पर ऊर्जा सहस्रार में घनीभूत हो जाती है, इसीलिए वे स्थान रमणीय लगते हैं। तभी तो आपने देखा होगा कि रमणीय स्थान पर घूमने के बाद शरीर में थकावट होने से कुछ समय काम करने को ज्यादा मन नहीं करता। यह इसलिए होता है क्योंकि शरीर की अधिकांश ऊर्जा सहस्रार को चली गई होती है। रमणीय स्थान पर घूमने के बाद आदमी तरोताजा व निर्मल सा हो जाता है। ऐसा लगता है कि पापों का पुराना बोझ हट गया है।इसीलिए दुनियादारी में पर्यटन का इतना ज्यादा क्रेज होता है। विभिन्न तीर्थ स्थल भी इसी रमणीयता के आध्यात्मिक गुण का फायदा उठाते हैं। ऐसा सब सहस्रार चक्र के कारण ही होता है। इसीलिए इसे परम पावन कहा है। उस वृक्ष का दर्शन केवल पुण्यात्माओं को ही होता है। इसमें कोई आश्चर्य वाली बात नहीं। अनुभव से भी यह साफ विदित होता है कि हिंसा आदि कर्मों से कुंडलिनी चेतना नीचे गिरती है, और मानवता रूपी पुण्य कर्मों से ऊपर चढ़ती है। वह दिव्य था। सारी दिव्यता सहस्रार चक्र में ही तो होती है। दिव्य शब्द दिवा या प्रकाश से बना है। प्रकाश का मूल सहस्रार और उससे जुड़ी अखंड ऊर्जा ही है। वह योगमयी था तथा योगियों व शिव का प्रिय निवास स्थान था। शिव भी तो योगी ही हैं। ब्रह्म या एनेर्जी कँटीन्यूवम से जुड़ाव या योग सहस्रार में ही सम्भव होता है। जाहिर है कि मोक्ष की इच्छा रखने वाले मुमुक्षु लोग वहीँ जाएंगे, क्योंकि सहस्रार में ही सीमित चेतना से छुटकारा सम्भव है। उस वृक्ष के मूल में शिव बैठे थे। ब्रह्म या अखंड ऊर्जा या एनर्जी कँटीन्यूवम को भी यहाँ शिव ही कहा है। वे तपस्वियों को प्रिय लगने वाले वेष में थे। मतलब कि वे अद्वैत रूप अखण्ड ऊर्जा के रूप में थे, जो तपस्वियों को अच्छी लगती है। द्वैत में डूबे साधारण लोग कहाँ उसे पसंद करने लगे। ब्रह्मा के पुत्र सनत्कुमार आदि ऋषि जो हमेशा ब्रह्मध्यान में लीन रहते हैं, उन्हें शिव की उपासना करते हुए इसलिए बताया गया है, क्योंकि शिव सृष्टि के सबसे बड़े तन्त्रयोगी भी हैं। आज्ञा चक्र व मूलाधार पर ध्यान केंद्रित करने से मस्तिष्क की ऊर्जा केन्द्रीभूत होकर सहस्रार में आ जाती है। इसे ही कुबेर द्वारा अपने गुह्यक सेवकों और परिवारजनों के साथ शिव की सेवा करना बताया गया है। गुह्यक यहाँ मूलाधार का प्रतीक हैं, क्योंकि मूलाधार और आज्ञाचक्र आपस में जुड़े होते हैं। गुह्यक भी मूलाधार की तरह ही डार्क तमोगुणी जैसे होते हैं। कुबेर के परिवारजन मस्तिष्क में चारों ओर बिखरी हुई मानसिक ऊर्जा के प्रतीक हैं। परिवारजन परिवार के मुखिया के ही वश में होते हैं। वात्सल्य भाव तो शिव में होगा ही। अनन्त चेतना के स्वामी शिव को हमारे जैसे सीमित चेतना वाले प्राणी बच्चे ही लगेंगे। वे भस्म लगाए हुए थे। भस्म वैराग्य, सार और निष्ठा का प्रतीक है। सारे विश्व का निचोड़ भस्म में निहित है। अखण्ड ऊर्जा में रमण करने वाले शिव को जगत नामक सीमित ऊर्जा कहाँ रास आएगी। अनेक लोग शिव से ही तंत्रयोग की प्रेरणा लेते हैं और कुंडलिनी जागरण प्राप्त करते हैं। इसे ही शिव के द्वारा ज्ञानोपदेश के रूप में दर्शाया गया है।

Kundalini as various gods, energy continuum as Shiva, Sahasrar Chakra as banyan tree and Brain is depicted as Mount Kailash

Friends, in the previous post, I was telling how the name ‘Chakra’ got its name. Actually Chakra literally means wheel itself. For example, chariot chakra, water chakra etc. I also explained why chakra is called the center of energy. This is written everywhere about the chakra, but it is not proved why it is said so. It smells of mystery. I proved it scientifically and empirically why it is called so. That is why the name of this website is “Demystifying Kundalini”. It was also proved psychologically that how Kundalini is formed by mixing Prana energy and Manas energy. Actually this mixed form of Prana energy and Manas energy is called Kundalini. This is the shortest definition of Kundalini. This is also called time-space mixing. Prana energy represents Time, and Manas energy represents Space. In this post I will explain how the Sahasrara Chakra is represented as the abode of Shiva.

The gods go to Kailash to persuade Shiva, who is angry with Dakshayagya

Lord Vishnu along with other gods went to Mount Kailash to persuade Shiva, who was angry with Daksha. Apart from humans, that mountain was serviced by eunuchs, apsaras or fairies and yogic sages. That was very high. That was adorned with pearls all around. That seemed strange with many types of metals. That was full of many types of trees and vines. It was surrounded by many types of animals, birds and springs. Siddanganas or wives of accomplished used to reside on its summit with their respective husbands. It was adorned with many types of cisterns, peaks and many types of tree species. Its radiance was as white as silver. That mountain was full of animals like big tigers etc., devoid of horror, full of splendor, divine and causing great wonder. The mountain was surrounded by the holy Ganges river and was extremely serene. Near that Kailash mountain was the divine city of Shiva’s friend Kuber named Alka. Near the same mountain there was a divine forest called Saugandhik, which was adorned with divine trees, and where the wonderful sound of birds etc. was being made. The divine and holy rivers named Nanda and Alaknanda were flowing from outside that mountain, which destroy sins by mere sight. God women come daily from their own world and drink the water of those rivers, and after taking a bath, being attracted by Rati or lust, they live with men. Then leaving behind that Alkapuri and Saugandhik forest, while going forward, those deities saw the banyan tree of Shankar ji nearby. That banyan tree was spreading shade around that mountain. Its branches were spread on three sides. Its circle was a hundred yojana high. It was devoid of nests and barred from heat. It is visible only to the pious souls. It was very delightful, His Holiness, Shiva’s place of yoga, divine, worthy of being consumed or inhabited by yogis, and very perfect. The deities saw Shiva sitting under that banyan tree, which gave shelter to Mahayogamayi and Mumukshu or liberation seeking people. Absorbed in the devotion of Shiva, having a calm body and mind, and being Mahasiddha, who are the sons of Brahma, Sanak etc., were worshiping that Shiva with pleasure. His friend Kubera, who is the leader of the guhyakas and demons, was doing special service to him along with his family and servants. He was wearing the true form of Lord Shiva, the favorite of the ascetics. He seemed to be friend from all over the world with affection, and was equipped with ashes etc. He was sitting on the carton of kusha, a holy grass, and on being asked by Narada etc., he was preaching knowledge to all the listeners gentlemen. He was seated in the truth-beautiful-logic posture with his left foot on his right thigh, and his left hand on his left knee, with a rosary of Rudraksha on his wrist. He tells the matter of supreme knowledge that salvation is not attained by action, but by knowledge. Therefore one should act with non-dual knowledge, which means one should do Karma Yoga. Those who distinguish between him, Brahma and Vishnu, go to hell. Meaning that Lord Shiva negates the discrimination.

Mutual equivalence of Mount Kailash and brain

Mount Kailash is the brain. There not only the common people, nymphs and dance-singing artists enjoy the pleasures, but sages and rishis also get the pleasure of meditation there. It is located at the highest point in the human body. Its manimaya Shikhars or pearly peaks means the many ridges or bulges made of its walnut-like shape, which keep shining with the bright thought-waves of the mind. Various types of metals mean its various structures and colored parts, such as skull bone, white matter beneath it, gray matter beneath it, fluid-soft eyes, ears, nose, teeth etc. The inner part of the brain is also divided into a variety of sizes and colors, such as the pons, hippocampus, pineal gland, etc. Various types of trees and vines mean different types of hair, such as hair of the head, hair of the beard, hair of the mustache, hair of the ear, hair of the nose, etc. You can also add nerve fibers in the list that have varying shapes and sizes. It appears as fibrous flesh on gross viewing. From this it seems that the ancient sages also had a good knowledge of the anatomy of the human body. Its detailed description is in Ayurveda. Many types of animals and birds mean microscopic parasites found entangled in the hair. The meaning of many types of springs is the biological secretion coming out of the glands of the eyes, ears and mouth etc. Visiting Siddhanganas or wives of accomplisheds on its summits means tantric romance by tantra yoginis, from which they derive great pleasure. The place of joy is the mind itself. There are many types of pores or cisterns around the brain, such as eyes, nose, ears etc. The peaks and trees have already been told above. That mountain being like silver means the bright thoughts of the mind full of consciousness. Carnivorois Animals like tiger mean lice, fleas etc. which can hide in the moisture of the hair. ‘Without horror’ means these minute creatures are not horrific. Divinity is in the mind. All divine expressions are accompanied by the functioning of the mind. Kundalini awakening is the most divine, that is why the activity of the brain is at its peak in it. Similarly, the brain is also a model of wonder. In this, there’s the physical expression of life or consciousness. Scientists have not been able to solve this puzzle till date. The river Ganga is the symbol of Sushumna Nadi here. Because she irrigates the Sahasrara, to which the whole brain is attached, that is why it is said to surround the entire mountain. It cleanses the whole brain with energy. The city of Shiva’s friend Kubera ie. Alkapuri has been called Agya Chakra. The word “Alka” is derived from Sanskrit’s Alakshit and Hindi’s Alakh words. It means invisible. The invisible Kundalini is visible from this chakra. That is why it is also called the third eye. In fact, when meditation is done on the Agya Chakra, the Kundalini appears on the Sahasrara. Because Shiva is in the form of Kundalini in the Shiva Purana, that is why Kuber, the arrogant deity of Ajnachakra, is said to be a friend of Shiva. If Shiva is depicted as energy continuum, even then kuber is proved as friend of Shiva for energy continuum is achievable only by means of Kundalini. The agya chakra is a symbol of intelligence. Therefore, it is natural that the wheel of agya chakra is associated with wealth, because wealth is earned only by intelligence. That is why its god Kuber is the richest in the universe. Near that mountain there is a forest called Saugandhik or nice smelling. Because it is being described immediately after Alkapuri, it means that the forest is near to it. That is the nose. Fragrance is experienced inside it, so it is believed that fragrance is being originated in it. Because the fragrance emanates from trees and flowers, the nose has been given the form of a forest. That forest is called divine because, despite being so small in size, it provides all the divine fragrances around the world. An ordinary forest cannot do this. The follicles or hair located in it can be considered as the divine tree. They are called divine because they are so small in size and few in number yet they help in providing divine fragrances around the world. They also provide protection to the odor-receptor cells. It may be that in the mythological era, the nose-hair was considered the only responsible for the aroma. There was a wonderful sound of birds etc. in that forest. That sound is actually the slow sound of breathing. It cannot be called sweet voice. That’s why it is called wonderful. Outside that mountain there are two rivers named Nanda and Alaknanda, ie. Ida and Pingala. The spinal cord is connected with the brain. If the spinal cord or vertebral column is called the mountains at the bottom, then the brain is made up of the mountain tops. Sushumna flows in it. She is called Ganga. Ida nadi flows outside the spinal cord to the left of it. Through this, man enjoys materialistic, limited, logical and judgmental or critical enjoyment of worldliness. That is why its name is Nanda or visibly enjoying. The second Nadi or channel, which is Pingala, flows on the right side of the mountain or vertebral column called Alaknanda. Through this man enjoys a status as spiritual, as void or space or sky, as darkness, as irrational or illogical, as unlimited, as nonjudgmental. Its name is Alaknanda or invisibly enjoying. As mentioned above, the word Alak is indicative of Alakh or Alakshit or non sensual. Because the sky is inexhaustible due to being infinite, that is why pingala’s name is Alaknanda, which means the bliss of Alakshit or invisible or undefined. Sins are destroyed by the sight of both the rivers. The river alone is not being talked about, but both the rivers are being talked about together. This means that by the simultaneous functioning of the left and the right brain, Advaita arises, which is the formlessness itself. Duality is the greatest sin, and non-duality is the greatest sinlessness. God women mean here noble women of a good and well-mannered household. Because they are affluent, they do not get caught up in the mess of worldliness. This keeps them immersed in the joy of Advaita or nonduality. The joy of this Advaita is depicted by the metaphoric writer in the form of drinking the water of both the rivers. They have a beautiful and graceful body. While bathing, Kundalini energy rises through their back, as I mentioned in a previous post. The same happens with those god-women as well. As the Mooladhara’s energy climbs up, their Mooladhara becomes powerless. It is only to give energy to Muladhara that they are attracted to Rati or pure lust, and lives with men. According to another metaphor, the god’s women are symbols of beautiful and human thoughts. Such thoughts are accompanied by Advaita bhava, that is, with them both the Ida and Pingala nadis flow. When both these nadis flow very fast, only then the divine sexual feeling is awakened. This is done only to give energy to Muladhara, because the energy of Muladhara keeps on climbing up through non-dualism. The non-material based Kundalini picture starts developing in the brain due to non-duality. Non material based means that kundalini image is fully mind based without any physical copy or counterpart outside. It requires a lot of energy, because being out of the reach of the senses, it does not get the support of the physical senses to strengthen itself like ordinary mental images. To fulfill this need, the energy rises up from the base chakra. Rati play done in that situation is very pleasurable and soul-developing, that means energy is flowing by means of it. Entering sushumna channel, this energy reaches Sahasrara.

Along with Kundalini, the brain also develops well from muladhar energy. That is why it is said that Kundalini is very important for the rapid development of mankind. The above Kundalini rituals can also be called tantric rituals. When a man is away from worldliness, has sufficient accumulated amount of energy in muladhar chakra due to low consumption, and his energy is already flowing in the sushumna, he is in a sadhu or sage state. He does not have much interest in Ratikrida or lustful play. Those women come from Devlok or god abode, meaning those human thoughts come out of the mind and start performing the work of worldliness with a non-dual spirit. This is said to be bathing in the Nanda and Alaknanda rivers by the goddesses. The gods and goddesses are themselves symbols of non-duality always. In ordinary people filled with duality, the upward effect of this energy is less marked. Therefore, their sensual feeling is only a momentary pleasure, which is called sex. Due to the duality in them, there is no Kundalini in their mind. Therefore, the energy of Muladhara does not climb up due to lack of need. That is why the energy of Muladhara is not conserved but gets destroyed. You can call Kundalini as the sexual-energy storing and delivering battery. Divinity resides in the mind itself. After crossing Saugandhik forest and Alkapuri, all the deities come to a banyan tree, whose branches spread over the entire mountain and cast shadow. Actually, Kundalini is depicted in the form of all those deities. The whole creation resides in the mind. It means that all the deities reside in the mind, because it is the deities who run the universe. Within a single Kundalini picture or meditation picture, the whole mind is absorbed in the same way as a sugar grain contains a whole sack of sugar or a whole sugarcane field. If someone wants to see sugar, then we do not pick up the whole sack of sugar but take one grain of sugar. This makes the job a lot easier. The amount of energy that can lift a sugar sack one foot high, the same amount of energy can lift a sugar grain thousands of feet high. Whatever work will be done with a sack of sugar, the same work will be done with a grain of sugar. Similarly, if the mind is to be taken up to Sahasrara to be united with Shiva, then we do not carry the whole world of the mind but carry only the Kundalini. This makes the task of reconciliation of Shiva-Mana or Shiva-Jiva very easy. The amount of energy with which the whole mind can be raised from the Muladhara to the Swadhisthana chakra or lower, the same amount of energy can elevate the Kundalini to the Sahasrara. What is the need of mind containing a heap of innumerable pictures, when the same thing will be done with a single Kundalini picture sorted out of that heap. Many deities have been shown in place of Kundalini, so that it can add interestingness and mystery to this psychological narrative. The banyan tree is sahasrara, because sahasrara is connected to the whole brain through nadis. Those nadis can be called branches of the tree of Sahasrara Chakra.  Its branches were spread on three sides, it means that from the Sahasrara to the left brain, right brain and then forward down to the front channel, energy is transmitted in three directions. It is getting energy from the back channel located in back and below direction. It is in the fourth direction, which we can call the trunk or root of that tree. Energy always flows from the root to the branches. Its upper extension is said to be 100 yojan high, which is a distance of around one thousand miles. It’s a big height reaching the outer space. Actually it means that the Sahasrara Chakra is associated with the energy continuum, which extends into the eternal sky. Probably, one thousand mark has been chosen as sahasrar itself literally means one thousand branches. It is barred from the nest, meaning no normal creature can reach there. It was barred from heat, which meant the very calm Sahasrara Chakra. The duality from which heat is created was not there at all. It was very delightful. This means that the beauty of all places is due to Sahasrara. At delightful places the energy gets condensed in the Sahasrar, that is why those places seem delightful. That’s why you must have seen that after roaming in a delightful place, the body does not feel like working for some time due to exhaustion. This happens because most of the body’s energy has gone to Sahasrara. After roaming in the delightful place, one becomes refreshed and serene. The old burden of sins seems to have been removed. That is why there is so much craze for tourism in the world. Pilgrimage also involves this very same principle. All this happens because of the Sahasrara Chakra. That is why it is called His Holiness. Only virtuous souls can see that tree. There is nothing surprising in this, it is clear from experience that the Kundalini consciousness falls down due to acts of violence etc., and rises up by virtue of humanity. It was divine. All divinity happens only in the Sahasrar Chakra. The word divine is derived from diva or light. The origin of light is the Sahasrara and the eternal energy associated with it. It was yogamayi or full of yoga and was the favorite abode of yogis and Shiva. Shiva is also a yogi. Connection or yoga with Brahman or energy continuum is possible only in Sahasrara. Obviously, Mumukshu people who desire salvation will go there, because it is possible to get rid of limited consciousness only in Sahasrara. Shiva was sitting at the root of that tree. Brahma or the unbroken energy or energy continuum is called Shiva here. He was in the guise of being dear to the ascetics. Meaning that he was in the form of non-dual form of unbroken energy, which is liked by the ascetics. Where did ordinary people immersed in duality start liking him? The sons of Brahma, Sanatkumar, etc., who are always absorbed in the meditation of Brahma, are said to be worshiping Shiva, because Shiva is also the greatest Tantrayogi of the universe. By concentrating on Ajna Chakra and Mooladhara, the prana energy gets channelized and centralized and comes to Sahasrara. It is said by Kubera to serve Shiva along with his guhyka or low level servants and family members. The Guhyak here symbolizes the Muladhara, as the Mooladhara and the Agya chakra are intertwined. Guhyaks are also dark tamoguni like Muladhara. The family members of Kubera are symbols of the prana or psychic energy scattered all around in the brain. The family members are under the control of the head of the family. Vatsalya or child-affection will be there in Shiva only. Lord Shiva, the lord of infinite consciousness, will think us as children with limited consciousness.. He was having bhasma or ash put on his body. Bhasma is a symbol of detachment, essence and loyalty. The essence of the whole world lies in the ashes. Why Shiva, who enjoys in the unbroken and unlimited energy, will like the limited energy called as world? Many people take inspiration from Shiva for Tantra Yoga and attain Kundalini awakening. This is depicted as preaching of divine knowledge of enlightenment by Shiva to his devotees.