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Kundalini Chitra develops Vigyanmaya Kosha

There are many descriptions in the scriptures that happiness is within, that is, it is in the soul, not outside. But I could not find any scientific explanation for this. Probably the form of the soul is like the existential void or the sky. In avidya or darkness there is one quality of the soul remaining, the void or the sky or the being. The quality of light disappears in it. That’s why the joy in it is greatly reduced, because all the qualities of the soul are related to each other more or less. In any form, the light that is experienced through the experience of the world, tries to fulfill the lack of light in the soul. What happens is that when that worldly light feeling is very fast, changing, i.e. dynamic or flamboyant or real like, then it cannot be mixed with the soul, because the soul is non undulating or changeless, like the nature of the sky, but on the contrary, the fast worldly feelings fluctuate quickly like waves of ups and downs means they are of the nature of change. One gets momentary happiness from them, as long as they remain, but as soon as they are removed, the darkness of the soul becomes more dense even from earlier. It is similar to how a person becomes blind for a while after coming out of bright light at night. When those worldly luminous experiences become dull due to non-attachment or Kundalini meditation etc., then they start matching with the empty soul. By this they give their light to the soul. Due to this, the lack of the soul is fulfilled and so bliss is felt, because according to the above scriptures, there is happiness in the soul itself, not outside. This is called satoguni avidya. Satogun is Prakash Pradhan. This is not only a matter of spiritual importance but also a matter of practical importance. Everyone likes a man who is calm and not the flamboyant one. The mental darkness of a person with a calm nature is also calm, while the mental darkness of a person with a fierce nature, ignorance of passion, is also fierce, deep and painful. This is the main difference between a gentleman and a scoundrel. The ignorance of a sage is due to being born of sattva guna, whereas that of a wicked person is due to being born of rajo guna and tamo guna.

When thoughts or mental images are changing rapidly due to passion, then their identity with the Pranamaya and Annamaya Kosha cannot be felt. Because later both are much more slow moving. Means it is difficult to consider them as one with the same combined body composition. Also the mental images related to common worldliness or livelihood are physical, because they are associated with the so-called material world, but the soul is immaterial, so they do not match. It is easy to associate mental images that are like static or slow and immaterial with this body group. In the Punjabi language and in the Sanskrit language, there is long path style or slowness, which increases the quality of goodness or sattvaguna. That’s why the use of these languages creates joy. The darkness of avidya that keeps on arising during worldliness through them, is the form of satoguni avidya. It is blissful. Similarly, keeping a beard like Sadhu Baba also makes a man’s behavior slow, contemplative, that is, satvik. This is why Baba remains intoxicated with bliss.

When a man attains a high position or object, the elders of the house keep him calm by preventing him from jumping too much. In our childhood, our mother used to bring us down from the sky to the ground immediately after some big achievement. In most of the cases, she did not let us fly in the sky of ego. She belonged to a family lineage of good and Vedic rites. If there is no contact of elders and sages in someone’s circle, then he flies far away with the achievements for a short time. Then, when the intoxication of flying breaks, he falls and starts drowning in the pit of depression, and the world starts considering him as crazy or mad, then he comes to his senses. But by then he would have lost a lot of joy and progress of the soul. That’s why it is not that this psychological principle of sattva guna avidya is applicable only in spirituality. This is equally applicable in worldly dealings too. Perhaps that’s why it comes in abundance in the scriptures that one has to suffer or do penance to attain knowledge. The scriptures believe that a person troubled by the sufferings of penance or lack of worldly goods will definitely find happiness in the soul.

When the gross body is also felt along with the thoughts, then the body gets their power and the burden of the brain is reduced. Means the force which was causing pressure in the brain gets transformed into the contraction of the muscles. Thoughts remain but fading with joy, they come to different chakras and dissolve. This happens because the chakras are not flooded with changing thoughts like the brain or mind. Infact chakra is not a dedicated organ for feelings like brain. Only one picture, mainly the Kundalini picture, remains on the chakras for a long time. This long stay of a sharp, quiet but unique mental image is a symbol of virtue. The avidya that arises from this is satoguni avidya. This is the bliss treasure. It is like a quiet and bright and non physical though unique candle flame mixed in the dark and quiet self more than other vibrant thoughts comparatively. Only the Kundalini picture that remains stable for a long time makes the best vigyanmaya kosha. It is a knowledge of immanent existence like the soul, but still a special knowledge. Meaning it is neither enlightenment or awakening, nor ordinary cosmic knowledge, but special knowledge or vigyan which is undoubtedly close to enlightenment.

कुण्डलिनी चित्र विज्ञानमय कोष को विकसित करता है

शास्त्रों में ऐसा बहुत वर्णन है कि आनंद भीतर है अर्थात आत्मा में है, बाहर नहीँ। पर इसका वैज्ञानिक स्पष्टीकरण मुझे कहीं नहीँ मिला। सम्भवतः आत्मा का स्वरूप सत्तामयी शून्य या आकाश की तरह है। अविद्या या अंधकार में आत्मा का एक गुण होता है, शून्य या आकाश या सत्ता वाला। प्रकाश का गुण इसमें गायब होता है। इसलिए उसमें आनंद काफी कम हो जाता है, क्योंकि आत्मा के सभी गुण एकदूसरे से जुड़े होते हैं। किसी भी रूप में जगत की अनुभूति से जो प्रकाश की अनुभूति होती है, वह आत्मा के प्रकाश की कमी को पूरा करने का प्रयास करती है। होता क्या है कि जब वह अनुभूति बहुत तेज, बदलती हुई अर्थात गतिशील जैसी या भड़कीली या वास्तविक जैसी हो, तब यह आत्मा से मिश्रित नहीँ हो पाती, क्योंकि आत्मा है तरंगरहित या परिवर्तनरहित आसमान के जैसे स्वभाव वाली पर इसके विपरीत तेज अनुभूतियाँ ताबड़तोड़ उतार-चढ़ाव की लहरों अर्थात परिवर्तन के स्वभाव वाली होती हैं। इनसे क्षणिक सुख तो मिलता है, जब तक ये रहती हैं, पर इनके हटते ही आत्मा का अंधेरा और भी ज्यादा घना होता हुआ महसूस होता है। यह ऐसे ही होता है, जैसे रात को तेज रौशनी से बाहर निकलते ही आदमी थोड़ी देर के लिए अंधा जैसा हो जाता है। जब अनासक्ति या कुण्डलिनी आदि से वे प्रकाशमय अनुभूतियाँ मंद या कम गतिशील जैसी हो जाती हैं, तब वे शून्य आत्मा से मेल खाने लगती हैं। इससे वे आत्मा को अपना प्रकाश प्रदान करती हैं। इससे आत्मा की कमी पूरी होने से आनंद प्रकट होता है, क्योंकि उपरोक्त शास्त्रानुसार आत्मा में ही आनंद है, बाहर नहीं। इसे ही सतोगुणी अविद्या कहा गया है। सतोगुण प्रकाशप्रधान होता है। यह कोई आध्यात्मिक महत्त्व ही नहीँ बल्कि व्यावहारिक महत्त्व का विषय भी है। हर कोई ऐसे आदमी को पसंद करता है, जो शांत स्वभाव का हो, न कि भड़कीले स्वभाव वाले को। शांत स्वभाव वाले का मानसिक अंधेरा भी शांत होता है, जबकि भड़कीले स्वभाव वाले की मानसिक अँधेरे के रूप में रजोगुणी अविद्या भी भड़कीली, गहरी और दुखदाई होती है। सज्जन और दुष्ट में यह मुख्य अंतर होता है। साधु की अविद्या सत्त्वगुण से उत्पन्न होने के कारण सत्त्वगुण सम्पन्न होती है, जबकि दुष्ट की रजोगुणतमोगुण से उत्पन्न होने के कारण वैसी ही होती है।

जब रजोगुण के कारण विचार या मानसिक चित्र जल्दी जल्दी बदल रहे हों, तब अपने प्राणमय और अन्नमय कोष के साथ उनके एकरूप होने की भावना नहीं की जा सकती। मतलब उन्हें अपने एक ही मिलेजुले शरीरसंघात के साथ एकरूप मानना कठिन होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि मन की तुलना में शरीरसंघात के अन्य सभी भाग बहुत धीमी गति वाले या स्थिर जैसे होते हैं। साथ में आम दुनियादारी या जीविका से संबंधित मानसिक चित्र भौतिक होते हैं, क्योंकि वे तथाकथित भौतिक दुनिया से जुड़े होते हैं, पर आत्मा अभौतिक है, इसलिए भी इनका मिलान नहीं होता। स्थिर या धीमे जैसे व अभौतिक समझे गए मानसिक चित्र को इस संघात के साथ मिलाना आसान होता है। पंजाबी भाषा में और संस्कृत भाषा में धीमापन या घुमाव होता है, जिससे सतोगुण बढ़ता है। इसीलिए इन भाषाओं के प्रयोग से आनंद पैदा होता है। इनके माध्यम से दुनियादारी के दौरान जो अविद्या का अंधकार पैदा होता रहता है, वह सतोगुणी अविद्या रूप होता है। वह आनंदरूप होता है। इसी तरह साधु बाबा की तरह दाढ़ी रखने से भी आदमी का वर्ताव धीमा, चिंतनशील अर्थात सात्विक हो जाता है। इसी वजह से बाबा आनंद के नशे में मस्त रहते हैं।

जब कोई आदमी उच्च पद या वस्तु प्राप्त करता है, तो उसे घर के बड़े-बूढ़े लोग ज्यादा उछलने से रोककर शांत बनाए रखते हैं। हमें बचपन में हमारी माताजी किसी बड़ी उपलब्धि के बाद एकदम से आसमान से जमीन पर उतार दिया करती थीं। ज्यादातर मामले में तो हमें अहंकार के आसमान में उड़ने ही नहीँ देती थीं। वे अच्छे व वैदिक संस्कारों वाले परिवार के वंश से संबंध रखती थीं। किसी के दायरे में अगर बुजुर्गों और साधुओं का सम्पर्क न हो, तो वह उपलब्धियों से थोड़े समय तो उड़ता ही है। फिर उड़ान का नशा टूटने पर जब गिरकर पाताल के गर्त में डूबने लगता है, और दुनिया उसे क्रेजी या पागल जैसा समझने लगती है, तब उसे होश आता है। पर तब तक वह काफी आनंद को और आत्मा की उन्नति को गवां भी चुका होता है। इसलिए ऐसा नहीँ कि यह सत्त्वगुणी अविद्या वाला मनोवैज्ञानिक सिद्धांत अध्यात्म में ही लागू होता है। यह दुनियावी व्यवहार में भी उतना ही लागू होता है। शायद इसीलिए शास्त्रों में यह बहुतायत में आता है कि ज्ञानप्राप्ति के लिए कष्ट उठाना पड़ता है, या तप करना पड़ता है। तप के कष्टों से परेशान आदमी जरूर आत्मा में आनंद ढूंढेगा, ऐसा शास्त्रों का विश्वास है।

जब विचारों के साथ स्थूल शरीर की भी भावना की जाती है तब उनकी शक्ति शरीर को मिलती है और मस्तिष्क का बोझ कम होता है। मतलब जो शक्ति मस्तिष्क में दबाव पैदा कर रही थी, वह मांसपेशियों की सिकुड़न के रूप में तब्दील हो जाती है। विचार रहते हैं पर आनंद के साथ हल्के पड़ते हुए विभिन्न चक्रोँ पर आकर विलीन हो जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि चक्रोँ पर बदलते विचारों की बाढ़ नहीँ उमड़ती जैसी मस्तिष्क या मन में उमड़ती है। क्योंकि चक्र विचारों के लिए समर्पित अंग नहीं हैं मस्तिष्क की तरह। चक्रोँ पर तो एक ही चित्र मुख्यतः कुण्डलिनी चित्र लम्बे समय तक बना रहता है। यह सतोगुण का प्रतीक है। इससे जो अविद्या पैदा होती है, वह सतोगुणी अविद्या है। यही आनंदमय कोष है। यह ऐसे है जैसे घुप्प और शांत अँधेरे में एक अभौतिक, शांत और हल्का, हालांकि अनौखा दिया जल रहा है। लम्बे समय तक स्थिर बना रहने वाला कुण्डलिनी चित्र ही सर्वोत्तम विज्ञानमय कोष बनाता है। वह आत्मा के जैसा स्थिर सत्ता का ज्ञान है, पर फिर भी विशेष ज्ञान है। मतलब न तो यह आत्मज्ञान है, और न साधारण लौकिक ज्ञान है, पर विशेष ज्ञान या विज्ञान है जो बेशक आत्मज्ञान के करीब है।

Kundalini Yoga guides the natural instinct to attain the Self

Many times a man gets so immersed in the mind-kite that he does not even realize that it is connected to his body. Neither the thread nor the one who pulls it is visible, only the kite is visible. Perhaps this is ignorance. In this it seems that the visions of the mind have their own separate existence, and we start fearing them by making them artificial ghosts. By the way, in Kundalini Yoga also the meditation picture is visible, but it is the same singled out, and it is seen in one’s own form and inside his body. Moreover, in most cases it does not have a physical existence or its physical existence is denied. For example, if a deity, an ancestor, a departed or completely separated lover is in the form of a meditation picture, then the intellect of physical reality towards it will not be there by itself. But if the Kundalini picture is in the form of a living lover, guru or other physical object, then one has to maintain non-attachment to its physical form, and treat it non-dual. By the way, such nature and behavior starts being formed by Kundalini Yoga itself. As I told in a previous post, how Kundalini Yoga realizes that Annamaya Kosha, Pranamaya Kosha, Manomaya Kosha, Vigyanmaya Kosha and Anandamaya Kosha are all interconnected. This maintains the belief that the Kundalini picture is within one’s own mind, a part of one’s own composite body, one’s own self, not an external separate physical object. This itself enhances one’s own nature of Non-attachment and nonduality. Because one cannot be attached to himself, nor can one feel duality in himself. No one realizes that he is not one man but a mixture of two men. That man alone has to bear the fruits of his actions, no one else comes. Even if someone keeps on making up in the mirror day and night, he or she does it out of love for someone else or God, not for himself. It is necessary to have two for love. There is no love alone. There is no theoretical difference between attachment and love, there is only a difference of level, behavior and attitude. According to this psychological principle, the soul gets purified itself by considering the Kundalini picture as one’s own self. Meaning that the Kundalini picture is adopted as a support to know your complete self. I think when kundalini meditation reaches a particular critical point, it gives power of existential self expression to soul so much that it is unable to be unexpressed beyond that resulting in to kundalini awakening. Probably, thoughts come in the mind only in the form of a natural effort to know the Self. But the way of understanding and adopting those thoughts is opposite to the correct one. Instead of considering them as our self, we start considering them as external, alien, gross and physical. Due to this, instead of soul getting strength from those thoughts, the confusions of the world keep increasing further and further. Meaning that instead of becoming pure, the soul becomes more and more impure. Perhaps this is the illusion. Kundaliniyoga tries to straighten this method. Due to this, the daily behavior of a man also starts getting transformed positively. The effect of non-attachment and Advaita starts increasing in his life. It is natural that the confusions of his mind start getting resolved. When the mind is healthy, the body also starts to be healthy. Individual health also improves social health. With social health, all the people of the society also feel their good health. In this way, the reform from society to person and from person to society spreads in the whole world like a chain reaction, which is also called era change.

कुण्डलिनीयोग आत्मरूप को पाने की कुदरती चेष्ठा के तरीके को सीधा करता है

कई बार आदमी मन-पतंग में इतना डूब जाता है कि उसे यह एहसास ही नहीं रहता कि वह उसके शरीर से जुड़ी है। न धागा दिखता है, न उसको खींचने वाला, सिर्फ पतंग दिखती है। सम्भवतः यही अज्ञान है। इसमें ऐसा लगता है कि मन के दृश्यों का अपना पृथक अस्तित्व है, और हम उन्हें बनावटी भूत बनाकर उनसे डरने लगते हैं। वैसे तो कुण्डलिनीयोग में भी ध्यानचित्र ही दिखता है, पर वह एक ही होता है, और उसे अपने रूप में और अपने शरीर के अंदर देखा जाता है। साथ में, ज्यादातर मामलों में उसका भौतिक अस्तित्व नहीं होता या उसके भौतिक अस्तित्व को नकार दिया जाता है। उदाहरण के लिए अगर कोई देवता, पूर्वज, दिवंगत या पूर्णतः बिछड़ा प्रेमी ध्यान चित्र के रूप में है, तब तो उसके प्रति भौतिक सत्यता की बुद्धि खुद ही नहीं होगी। पर अगर कुण्डलिनी चित्र किसी जीवित प्रेमी, गुरु या अन्य भौतिक वस्तु के रूप में है, तो उसके भौतिक रूप से अनासक्ति रखनी पड़ती है, और उसके साथ अद्वैतमय व्यवहार रखना पड़ता है। वैसे ऐसा स्वभाव व व्यवहार कुण्डलिनी योग से खुद ही बनने लगता है। जैसा कि मैंने एक पिछली पोस्ट में बताया था कि कुण्डलिनी योग से कैसे महसूस होता है कि अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष और आनंदमय कोष सब आपस में जुड़े हैं। इससे यह विश्वास पक्का बना रहता है कि कुण्डलिनी चित्र अपने मन के ही अंदर है, अपने ही देहसंघात का हिस्सा है, अपना ही स्वरूप है, कोई बाहरी पृथक भौतिक वस्तु नहीं। यह स्वयं आदमी की अनासक्ति और अद्वैत की प्रकृति को बढ़ाता है। क्योंकि अपने आप से किसी को आसक्ति नहीं हो सकती है, और न ही अपने आप में किसीको द्वैत महसूस हो सकता है। किसी को नहीँ लगता कि वह एक आदमी नहीं बल्कि दो आदमियों का मिश्रण है। अपने कर्म का फल उसी अकेले आदमी को भोगना पड़ता है, कोई दूसरा नहीं आता। अगर कोई दिनरात भी आईने में बनता-ठनता रहे तो भी वह किसी दूसरे के या ईश्वर के प्रेम में पड़कर करता है, अपने लिए नहीं। प्रेम के लिए दो का होना जरूरी है। अकेले में प्रेम नहीं होता। आसक्ति और प्रेम में सैद्धांतिक अंतर नहीं है केवल स्तर, व्यवहार व दृष्टिकोण का ही अंतर है। इसी मनोवैज्ञानिक सिद्धांत के अनुसार कुण्डलिनी चित्र के प्रति स्वयं ही हो रही आत्मभावना से आत्मा शुद्ध होती रहती है। मतलब कि कुण्डलिनी चित्र को अपने पूर्ण आत्मरूप को जानने के लिए सहारे के रूप में अपनाया जाता है। मुझे तो लगता है कि जब कुंडलिनी ध्यान एक विशेष महत्वपूर्ण या शीर्ष बिंदु तक पहुँचता है, तब यह आत्मा को अस्तित्वगत स्व-अभिव्यक्ति की इतनी अधिक शक्ति देता है कि वह उस बिंदु से परे अव्यक्त रहने में अस्मर्थ हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप कुंडलिनी जागरण होता है। सम्भवतः आत्मरूप को जानने की कुदरती चेष्ठा के रूप में ही मन में विचार आते हैं। पर उन विचारों को समझने का और अपनाने का तरीका उल्टा होता है। हम उन्हें अपना आत्मरूप न समझकर बाहरी,  पराया, स्थूल और भौतिक समझने लगते हैं। इससे उन विचारों से आत्मरूप को शक्ति मिलने की बजाय उनसे संसार की उलझनें और भी आगे से आगे बढ़ती रहती हैं। मतलब कि आत्मा शुद्ध होने की बजाय ज्यादा से ज्यादा अशुद्ध होता जाता है। सम्भवतः यही मोहमाया है। कुण्डलिनी योग इस तरीके को सीधा करने की कोशिश करता है। इससे आदमी का रोजाना का व्यवहार भी सकारात्मक रूप से रूपान्तरित होने लगता है। उसके जीवन में अनासक्ति और अद्वैत का प्रभाव बढ़ने लगता है। इससे स्वाभाविक है कि उसके मन की उलझनें सुलझने लगती हैं। मन स्वस्थ रहने से शरीर भी स्वस्थ रहने लगता है। व्यक्तिगत स्वास्थ्य से सामाजिक स्वास्थ्य में भी सुधार होता है। सामाजिक स्वास्थ्य से समाज के सभी लोग भी अपने अच्छे स्वास्थ्य को महसूस करते हैं। इस तरह समाज से व्यक्ति में और व्यक्ति से समाज में सुधार एक चेन रिएक्शन की तरह आगे से आगे बढ़ता हुआ पूरे विश्व में फैल जाता है, जिसे युग परिवर्तन भी कहते हैं।

Kundalini Yoga have Kapalbhati Pranayama as a main component

Inhale and exhale alternately through the left and right nostrils, so that the Kundalini energy continues to circulate in the Ida and Pingala nadis on both sides, and gradually rises up in the middle Sushumna nadi. Kites also fly like this. When the string is loosened, sometimes it spreads in the sky on the left side due to the slap of the flowing wind, and then when pulled, it climbs straight up. Sometimes due to wind blowing in the opposite direction, it spreads in the sky on the right side, and then when pulled, it rises straight up. By swinging both the sides, it remains straight above the man’s head even after reaching a great height. This straightness is equivalent to Sushumna Nadi. Even at the time of Kundalini Yoga, when there is a lack of prana in the left side of the body, and the body is left loose, the Kundalini starts flowing in the left side of the body i.e. Ida Nadi. Similarly, when there is a lack of prana in the right side of the body, the Kundalini is felt to flow in the right side i.e. Pingala Nadi. It seems as if there is a energizing movement that’s blissful, I do not feel the pulse like a thin wire with any current. It may be impractical book talk or realized in high level practice. I feel a lot of power just from its simple experience. Even in the sky, the wind blows towards that part, in which the pressure of the air decreases, that means the life force decreases, because air is the life force. It is natural from this that Kundalini or mind or kite moves in the same direction with the flow of prana or wind. Then when the wind or Prana increases there, it runs back a little in the opposite direction, along with which the kite or Kundalini also flows, and suppose it comes directly above the head or in Sushumna. Stopping there for a moment, the Vayu or Prana reaches the right sky or Pingala, along with which the kite or Kundalini is also there. From there the journey on the left side starts again. This kind of pendulum-like oscillation of the Kundalini-like mind or kite goes on, and it keeps rising up in the Sushumna or in the sky.

When the kite rises very high, then it is brought down by pulling on the string. Similarly, when the Kundalini rises high enough to cause pressure, fatigue, and headache in the brain, then the exhalation starts moving with jerks. This happens in Kapalbhati Pranayama, where the outgoing breath moves with jerks and pressure, but the incoming breath moves so quietly and slowly that it is not detected. Due to this, there is more awareness on the exhalation. Along with this, the muscles of the body also push down. Due to both these things, the Kundalini energy descends down the front channel, due to which the pressure in the brain decreases and the person gets refreshed and ready for mental work again. Kapalbhati produces miraculous effects. That’s why only this kind of breathing is done during work pressure and lack of time, it gives a lot of benefits. Let us tell one thing here that the mind-kite does not stay down permanently, it then rises up through the back channel. It keeps on rotating up and down. It is like if a kite is given a slight pull or tunka or jerk, it rises higher. Breaths are actually the strings of the mind, as it is often said that the string of breaths of so-and-so has been drawn long means someone survived, or the string of breaths broken means someone has died. In Shrimad Bhagwat Gita, when Arjuna says to Shri Krishna that Lord, it is very difficult to control the mind, even more difficult than controlling the wind, then Lord Krishna says that O Kaunteya, the mind is controlled by practice, Especially through the practice of Pranayama.

While taking a bath with cold water, the breath starts moving out rapidly and with jerks. Most of the time the mouth is also completely open, through which the breath comes out like a bellows. Due to this the pressure of the brain comes down, which prevents headache. Probably the risk of brain hemorrhage also decreases. This increases the ability to withstand cold water and it starts to feel pleasant. Similarly, almost the same thing happens with Vajrasana after eating food. With this, the power of the brain descends to the digestive organs, due to which digestion is cured. This style of breath is Kapalbhati only.

कुण्डलिनीयोग में कपालभाति प्राणायाम की अहम भूमिका है

बाएं और दाएं नथुने से बारीबारी साँस ली जाती है, और छोड़ी जाती है, ताकि इड़ा और पिंगला, दोनों साइड की नाड़ियों में कुण्डलिनी शक्ति झूलती रहे, और धीरे-धीरे बीच वाली सुषुम्ना नाड़ी में ऊपर चढ़ती रहे। पतंग भी इसी तरह उड़ती है। डोरी को ढील देने पर कभी वह बहती हवा के थपेड़े से दाईं तरफ के आकाश में फैल जाती है, और फिर खींच देने पर सीधी ऊपर चढ़ती है। कभी विपरीत दिशा में हवा बहने से वह बाईं तरफ के आकाश में पसर जाती है, और फिर खींच देने पर सीधी ऊपर उठती है। दोनों साइड को झूलने से वह बहुत ऊँचाई में पहुंच जाने पर भी आदमी के सिर के ऊपर सीधी बनी होती है। यह सीधाई ही सुषुम्ना नाड़ी के समकक्ष है। कुण्डलिनी योग के समय भी, जब शरीर के बाएं हिस्से में प्राण की कमी होती है, और शरीर को ढीला छोड़ा जाता है, तो कुण्डलिनी शरीर के बाएं हिस्से मतलब इड़ा नाड़ी में बहने लगती है। इसी तरह जब शरीर के दाएं भाग में प्राणों की कमी हो जाती है, तो कुण्डलिनी दाएं भाग अर्थात पिंगला नाड़ी में बहती महसूस होती है। ऐसा लगता है कि जैसे आनंदमयी जैसी हलचल हो रही है, कोई करेंट वाली पतली तार जैसी नाड़ी मुझे तो महसूस होती नहीं। हो सकता है कि यह अव्यवहारिक किताबी बातें हों या उच्च स्तर के अभ्यास में महसूस होती हो। मुझे तो साधारण अनुभव से ही काफ़ी शक्ति महसूस होती है। आकाश में भी उस हिस्से की तरफ हवा चलती है, जिस हिस्से में वायु का दबाव कम हो जाता है, मतलब प्राण कम हो जाता है, क्योंकि वायु ही प्राण है। इससे स्वाभाविक है कि प्राण या हवा के बहाव के साथ कुण्डलिनी या मन या पतंग उसी तरफ चली जाती है। फिर जब वहाँ हवा या प्राण ज्यादा बढ़ जाता है, तो वह थोड़ा उल्टी दिशा की तरफ वापिस भागता है, जिसके साथ पतंग या कुण्डलिनी भी उसके साथ बह जाती है, और मान लो सीधी सिर के ऊपर या सुषुम्ना में आ जाती है। क्षणभर वहाँ रुक के वायु या प्राण दाएं आसमान में या पिंगला में पहुंच जाता है, जिसके साथ पतंग या कुण्डलिनी भी होती है। वहाँ से फिर बाईं ओर का सफर शुरु होता है। कुण्डलिनीरूपी मन या पतंग का इस तरह का पेंडुलम के जैसा दोलन चलता रहता है, और वह सुषुम्ना में या आसमान में ऊपर उठती रहती है।

जब पतंग बहुत ऊपर उठ जाती है, तब डोर पर खींच लगाकर उसे नीचे उतारते हैं। इसी तरह जब कुण्डलिनी काफी ऊँचाई तक उठकर दिमाग़ में दबाव, थकान, और सिरदर्द पैदा करती है, तब निःश्वास झटके के साथ चलने लगते हैं। ऐसा कपालभाती प्राणायाम में होता है, जहाँ बाहर जाती सांस झटके और दबाव से चलती है, पर अंदर जाती साँस इतनी शांति से व धीरे चलती है कि उसका पता ही नहीँ चलता। इससे निःश्वास पर ज्यादा अवेयरनेस रहती है। साथ में, इसमें शरीर की मांसपेशियां भी नीचे की तरफ धक्का लगाती हैं। इन दोनों बातों से कुण्डलिनी शक्ति फ्रंट चैनल से नीचे उतरती है, जिससे मस्तिष्क का दबाव कम होने से आदमी पुनः तरोताज़ा होकर फिर से दिमागी काम के लिए तैयार हो जाता है। चमत्कारी प्रभाव पैदा करता है कपालभाती। इसलिए काम के दबाव व समय की कमी के दौरान केवल इसी तरह की साँस ली जाए, तो बहुत लाभ प्रदान करती है। यहाँ एक बात बता दें कि मन-पतंग स्थायी तौर पर नीचे नहीं रहती, यह फिर बैक चैनल से ऊपर चढ़ जाती है। यह लगातार उपरनीचे घूमती रहती है। यह ऐसे ही है जैसे पतंग को हल्की खींच या तुनका लगाया जाता है, तो वह और ऊपर उठती है। साँसें तो यथार्थ में ही मन की डोर हैं, जैसा अक्सर कहा भी जाता है कि फलां की सांसों की डोर लंबी खिंच गई मतलब कोई जिन्दा बचगया, या सांसों की डोर टूट गई मतलब कोई मर गया। श्रीमदभागवत गीता में जब अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं कि भगवन, मन को वश में करना तो बहुत कठिन है, वायु को वश में करने से भी कठिन है, तब भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे कौन्तेय, मन अभ्यास से वश में आ जाता है, विशेषकर प्राणायाम के अभ्यास से।

ठंडे पानी से नहाते समय साँस तेजी से और झटकों से बाहर की ओर चलने लगती है। अधिकांश समय मुंह भी पूरा खुला होता है, जिससे साँसें धौकनी की तरह बाहर निकलती हैं। इससे दिमाग़ का दबाव नीचे उतरता है जिससे सिरदर्द से बचाव होता है। सम्भवतः ब्रेन हीमोरेज का खतरा भी कम हो जाता है। इससे ठंडा पानी झेलने की क्षमता बढ़ती है और वह आनंद दायी लगने लगता है। इसी तरह खाना खाने के बाद वज्र-आसन से भी लगभग ऐसा ही होता है। इससे दिमाग़ की शक्ति पाचन अंगों तक उतरती है जिससे पाचन दुरस्त होता है। साँस का ये स्टाइल कपालभाती ही है।

कुण्डलिनीयोगानुसार शरीर कभी भी नहीँ मरता, कभी यह दिखता है, कभी नहीं दिखता, रहता हमेशा है, अनुभव के रूप में

सभी मित्रों को होली की शुभकामनाएं

मित्रों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे मन की गतिशीलता पतंग की उड़ान की तरह है। ऐसा लगता है कि प्राणायाम पतंग की डोरी को नियंत्रित गति देने की तरह है, जिससे पतंगरूपी मन अच्छे से और आत्मविकासरूपी आनंद पैदा करते हुए उड़ सके। मुझे तो यहाँ तक लगता है कि जो आनंद यौनक्रीड़ा के दौरान आता है, उसमें भी अनाच्छादित अर्थात नग्न शरीर के सम्पूर्ण उद्घाटन का काफी योगदान है। उसमें तो अन्नमय शरीर और प्राणमय शरीर दोनों एकसाथ उच्चतम अभिव्यक्ति के करीब होते हैं। कई लोग बोलते हैं कि असली प्यार मन से होता है, शरीर से नहीं। ये क्या बात हुई। सीधे कोई कैसे बाहरी तहखानों को लांघे बिना ही सबसे अंदरूनी तहखाने में पहुंच सकता है। जब लड़की के शरीर से हल्की यौन छेड़छाड़ होती है, बेशक अप्रत्यक्ष या मानसिक रूप में ही, तब लड़की का अन्नमय कोष सक्रिय हो जाता है। होली पर इसका अच्छा मौका मिलता है, उसे गवाएं नहीँ। हाहा। उसे पहली बार अपने शरीर की सबसे गहरी पहचान महसूस होती है। वह शरीर से ज्यादा ही सक्रिय व क्रियाशील होने लगती है। उसके मुख पर लाली और मुस्कान छा जाती है। इससे उसका प्राणमय कोष भी सक्रिय हो जाता है। प्राणों से उपलब्ध शक्ति को पाकर उसका मन रंगीनियों में बहुत दौड़ता है। वह हसीन सपने देखती है। सपनों में विभिन्न लोकों और परलोकों का भ्रमण करती है। इससे उसका मनोमय शरीर भी सक्रिय हो जाता है। क्योंकि यौन आकर्षण के कारण उसका ध्यान हर समय अपने शरीर और प्राणों पर भी बना रहता है, इसलिए उसका विज्ञानमय कोष भी खुद ही सक्रिय बना रहता है। उससे स्वाभाविक है, आनंदमय शरीर भी सक्रिय ही रहेगा। यह सब चेन रिएक्शन की तरह ही है। यही तो प्रेमानन्द है। यह आनंदमय कोष लम्बे समय तक सक्रिय बना रहता है। उसके पूरा खुल जाने के बाद तो आत्मा ही बचता है पाने को। वह भी विवाह के बाद तांत्रिक कुण्डलिनीयोग आधारित सम्भोगयोग से मिल ही जाता है। ऐसा नहीं कि यह स्त्री के साथ ही होता है। पुरुष के साथ भी ऐसा ही होता है। मुझे तो लगता है कि स्त्री की लावण्यमयी भावभंगिमा को देखकर जो पुरुष का तन और मन उससे देहसंबंध बनाने को उछालें मारने लगता है, वही उसके प्राणों का क्रियाशील होना है। यह अलग बात है कि कोई उस प्राणशक्ति का सदुपयोग करता है, तो कोई दुरुपयोग। कोई उसे आध्यात्मिक विकास में लगाता है, कोई भौतिक विकास में, और कोई संतुलित रुप से दोनों में।

थोड़ा मन की पतंग को उड़ने दें, एकदम न उतारें। हल्की सी तिरछी सी यह भावना रखें कि यह जुड़ी है। फिर थोड़ी देर बाद पतंग खुद आराम से लैंड करेगी। कोई झटका नहीँ लगेगा। मजा भी आएगा। लैंड होके उसे वापस भी जाने दें इच्छानुसार। खुद वापिस आएगी। अगर पतंग तूफानी जोर से ऊपर जा रही हो, और आप उसे जबरदस्ती नीचे खींचोगे, तो या तो पतंग फट सकती है, या धागा टूट सकता है। दोनों कमजोर तो पड़ेंगे ही, और उन पर दबाव भी बनेगा। ऐसा ही मन के साथ भी जबरदस्ती कर के होता है।

जिस समय दिमाग में थकान, दबाव या सिरदर्द जैसी हो रही हो, उस समय कपालभाति जैसी साँस खुद चलती है। उससे बाहर निकलती साँस पर ध्यान जाता है, जिससे कुण्डलिनी नीचे उतरती है। मतलब बाहर निकलती साँस धागे को नीचे खींचने मतलब खींच की तरह है, जिससे उड़ती हुई मनरूपी पतंग नीचे आती है, और दिमागी थकान रूपी तेज तूफ़ान से फटने से बचती है ।

विचारों के प्रकाश में ही नहीं, उनके अभाव के अंधकार में भी अनुभव शरीर से ही जुड़ा होता है, क्योंकि कुछ न कुछ मस्तिष्क की हलचल उसमें भी रहती ही है। यहाँ तक कि मृत्यु के बाद भी आत्मा का जो विशेष रूप में अनुभव होता है, वह भी शरीर से ही जुड़ा होता है, क्योंकि वह शरीर से ही निर्मित हुआ है। इसका मतलब है कि शरीर कभी भी नहीँ मरता। कभी यह दिखता है, कभी नहीं दिखता, रहता हमेशा है, अनुभव के रूप में।

Kundalini Yoga shows the body never dies, sometimes it is visible, sometimes not visible, however it exists always there in the form of experience

Happy Holi to all friends

Friends, in the previous post I was telling how the mobility of the mind is like the flight of a kite. Pranayama is like giving controlled motion to the string of a kite, so that the kite-like mind can fly smoothly and create bliss in the form of self-development. I even feel that the pleasure that comes during sexual play is largely contributed by the complete opening of the naked body. In that both the food body and the vital body are together close to the highest manifestation. Many people say that real love comes from the mind, not from the body. What is all of this about. How can one directly reach the innermost dungeon without crossing the outer ones? When a girl’s body is lightly touched sexually, of course indirectly or mentally, then the Annamaya Kosha of the girl gets activated. You get a good chance on Holi, don’t miss it. Haha. She feels for the first time the deepest identity of her body. She starts becoming more and more active bodily day by day. There is redness and a smile on her face. This activates her pranamaya kosha too. After getting the power available from Prana, her mind runs a lot in colors. She enjoys lucid dreams. In dreams she travels to different worlds and other worlds. With this her mental body also becomes active. Because due to sexual attraction, her attention remains on her body and soul all the time, therefore her vigyanmaya kosha itself also remains active. Naturally, with this the blissful body will also remain active. It’s all like a chain reaction. This is love. This blissful kosha remains active for a long time. After it is completely opened, only the soul remains to be attained. That too is found after marriage in Tantric Kundalini Yoga based Sambhogyoga. Not that this happens only with women. The same happens with men too. I think that seeing the graceful gesture of a woman, the body and mind of a man starts jumping to have a physical relationship with her, that is the activation of his soul or prana or kundalini. It is a different matter that someone makes good use of that life force, while someone misuses it. Some use it in spiritual development, some in physical development, and some in a balanced way in both.

Let the kite of the mind fly for a while, don’t take it off completely. Have a slight slant to the feeling that it is connected. Then after a while the kite itself will land comfortably. There will be no shock. There will be fun too. After landing, let it go back as per its wish. It will come back itself. If the kite is going up violently, and you pull it down forcefully, either the kite may tear, or the thread may break. Both will be weak, and there will be pressure on them. The same happens with the mind by forcing it.

Whenever there is a feeling of tiredness, pressure or headache in the mind, at that time Kapalbhati-like breathing takes place on its own. Meditation is done on the breath coming out of it, due to which the Kundalini descends. Means the exhaling breath is like pulling down the thread, due to which the kite flying in the form of mind comes down, and avoids being torn by the strong storm in the form of mental fatigue.

Not only in the light of thoughts, but also in the darkness of their absence, the experience is related to the body only, because some or the other activity of the brain remains in it as well. Even after death, the particular self form that the soul experiences is also attached to the body, because it is created by the body. It means that the body never dies. Sometimes it is visible, sometimes it is not visible, it is always there, in the form of experience.

कुण्डलिनी योग से मनोमय कोष रूपी पतंग प्राणमय कोष और अन्नमय कोष रूपी माँझे और चकरी से जुड़कर विज्ञानमय कोष रूपी उड़ान भरकर आनंदमय कोष रूपी मजा देती है

होता क्या है कि जब योग करते समय अन्नमय शरीर और प्राणमय शरीर के क्रियाशील होते ही मनोमय शरीर क्रियाशील होता रहता है, तब यह विश्वास पक्का होता रहता है कि मनोमय शरीर बेशक बाहरी और अनंत अंतरिक्ष में फैला महसूस होए, पर वह हमारे शरीर से जुड़ा हमारा ही स्वरूप है। हालांकि दुनियादारी के सभी कामों, खेलों, व व्यायामों के दौरान भी अन्नमय कोष, प्राणमय कोष और मनोमय कोष एकसाथ सक्रिय हो जाते है, पर वे इतनी तेजी से सक्रिय होते हैं कि उनकी आपस में एकत्व भावना करने का मौका ही नहीं मिलता। साथ में आदमी का ध्यान काम की पेचीदगी, उससे जुड़ी तकनीक, उससे जुड़े फल पर और अन्य लौकिक दुनियादारी पर भी रहता है, जिससे भी एकत्व की भावना की तरफ ध्यान नहीं जाता। वैसे भी एकत्व की भावना द्वैत से भरी दुनियादारी की विरोधी है। दो विरोधी चीजें साथ नहीं रह सकतीं। जल और अग्नि साथ नहीं रह सकते। मनोमय शरीर के प्रति इसी आत्मभावना से विज्ञानमय शरीर भी क्रियाशील हो जाता है। दुनियादारी का हर किस्म का ज्ञान साधारण ज्ञान की श्रेणी में आता है। किसी को डॉक्टरी का ज्ञान है, किसी को दर्जी का, किसी को नाई का, किसी को अध्यापन का, किसी को उपदेश देने का, किसी को यज्ञ या कर्मकांड करने या अन्य धार्मिक परम्परा निभाने का है। सब साधारण ज्ञान में आते हैं क्योंकि सभी रोजीरोटी के लिए और लौकिक व्यवहार के लिए हैं। विशेष ज्ञान या विज्ञान इन सबसे हटकर व अकेला है, जो न तो जीविकोपार्जन के लिए है, और न ही लौकिक व्यवहार की सिद्धि के लिए है, बल्कि केवल आत्मा की पूर्ण व प्रत्यक्ष अनुभूति के लिए है। विज्ञानमय शरीर का मतलब ही विशेष ज्ञान वाला शरीर है। इसमें स्थित होने पर साधक को ऐसा महसूस होता है कि वह स्थूल शरीर, प्राण, और मन का मिलाजुला रूप माने संघातमात्र है। जैसा मैंने पिछली पोस्ट में भी पतंग के उदाहरण से स्पष्ट किया था। अगर भटकते मन को अपना आत्मरूप न भी समझ सको तो यह तो समझ ही सकते हैं कि वह शरीर से साँस के माध्यम से ऐसे ही जुड़ा है जैसे एक पतंग मांझे के माध्यम से गट्टू या चकरी से जुड़ी होती है। पतंग उड़ाने का बहुत मजा आएगा। कभी बादलों के ऊपर, कभी दूर देश, कभी दूर ग्रह या तारे पर, कभी दूसरे ब्रह्माण्ड में, कभी परलोक में, तो कभी बिल्कुल पास में या चकरी में लिपटी हुई, कभी आँखों से ओझल होगी और सिर्फ चकरी और धागा ही नजर आएगा, फिर एकदम कहीं प्रकट हो जाएगी, कभी तूफ़ान में जैसी फँसी हुई बेढंगी उड़ेगी और बेढंगी दिखेगी, इस तरह अनंत आकाश में वह हर जगह उड़ेगी, पर हमेशा जुड़ी रहेगी शरीर के चक्रोँ के साथ। शायद चकरी से ही चक्र नाम पड़ा हो। हाहा। अब मनोवैज्ञानिक भी कह रहे हैं कि सूक्ष्मशरीर स्थूलशरीर के साथ एक चांदी के धागे से जुड़ा होता है। यह धागा नाभि से जुड़ा होता है। जैसे मांझा चकरी से बँधा होता है, वैसे ही योगा सांस नाभि से ही चलती है। सीधी सी बात है, अनुभव रूपी पतंग हमेशा अपने से अर्थात आत्मा से अर्थात अपने शरीर से जुड़ी हुई है। सम्भवतः इसीलिए नाभि चक्र को आदमी के शरीर का केंद्र बिंदु कहते हैं। नाभि पर एक अंदर की तरफ भिंचाव सा महसूस भी होता है, जब सूक्ष्म शरीर के साथ स्थूल शरीर का ध्यान भी किया जाता है। सम्भवतः नाभि चक्र से ही पतंग की चकरी का नाम पड़ा हो। उससे भौतिक दुनिया का प्रकाश आत्मा को मिलेगा ही, क्योंकि आत्मभावना जुड़ी है सबके साथ। फिर पूर्वोक्तानुसार आनंद भी पैदा होगा ही और कुण्डलिनी भी अभिव्यक्त होगी ही, क्योंकि कुण्डलिनी चित्र ही ऐसी भौतिक वस्तु है, जो ध्यान के माध्यम से आत्मा से सबसे ज्यादा जुड़ी होती है। मतलब कुण्डलिनी आत्मा से भौतिक दुनिया के जुड़ाव की प्रतिनिधि है। विशेष ज्ञान या विज्ञान के विपरीत साधारण ज्ञान दुनियादारी के मामले में होता है। ज्ञान जल्दी ही अज्ञान में परिवर्तित हो जाता है अगर उसे विज्ञान का साथ प्राप्त न हो। यह साइंस वाला विज्ञान नहीं है। प्राणमय शरीर का मतलब साँस पर ही ध्यान नहीं है, पर साँस से उत्पन्न शरीर की गति और शरीर के अन्य हिलने-डुलने पर ध्यान भी है। इस मामले में पैदल चलना एक सर्वोत्तम अध्यात्मवैज्ञानिक व्यायाम लगता है। इसमें पूरे शरीर पर, उसकी गति पर, उसकी संवेदनाओं पर और सांसों पर अच्छे से ध्यान जाता है। साथ में मन में भी सात्विकता के साथ विचारों की क्रियाशीलता भी काफी अच्छी होती है।

Kundalini Yoga helps the Manomaya Kosh in the form of kite connect with Pranamaya Kosh means string and Annamaya Kosh means chakra and fly in the form of Vigyanmaya Kosh and gives pleasure in the form of Anandamaya Kosh

What happens is that when while doing yoga, the mental body means manomaya kosh becomes active as soon as the food body means annamaya kosh and vital body means pranmaya kosh are active, then this belief is affirmed that the mental body may feel spread in the outer and infinite space, but it is connected to our body. It is our form. Although Annamaya Kosha, Pranamaya Kosha and Manomaya Kosha get activated together during all the worldly works, games and exercises, but they get activated so fast that they do not get a chance to feel unity among themselves. At the same time man’s attention remains on the intricacies of work, the technology associated with it, the fruits associated with it and other puzzling worldliness, due to which the feeling of oneness is not taken care of. Anyway, the feeling of oneness is against worldliness full of duality. Two opposite things cannot co-exist. Water and fire cannot live together. Due to this self-consciousness towards the mental body, the scientific body means vigyanmaya kosha also becomes functional. Every type of worldly knowledge comes under the category of ordinary knowledge. Some have knowledge of medicine, some of tailoring, some of barber, some of teaching, some of preaching, some of performing Yagya or rituals or following other religious traditions. All come in common sense means common knowledge or gyana because all are for livelihood and worldly behavior. Special knowledge or vigyan is different and unique from all these, which is neither for earning a living, nor for the accomplishment of worldly behavior, but only for the complete and direct realization of the soul. Vigyanmaya body means a body with special knowledge. On being situated in it, the seeker feels as if he is a combination of gross body, vital force and mind. As I explained in the previous post also with the example of kite. Even if you cannot feel the wandering mind as your self, then you can feel that it is connected to the body through the breath in the same way as a kite is connected to a gatu or chakri means rod roll or ringed role respectively through a manjha means string. Kite flying will be a lot of fun. Sometimes above the clouds, sometimes in a distant land, sometimes on a distant planet or star, sometimes in another universe, sometimes in the other world, sometimes very near or wrapped in the base wheel, sometimes it will disappear from the eyes and only the wheel and thread will be seen, Then suddenly it will appear somewhere, sometimes it will fly clumsily like caught in a storm and look clumsy, like this it will fly everywhere in the infinite sky, but will always be connected with the chakras of the body. Perhaps the name Chakra is derived from Chakri itself. Haha. Now psychologists are also saying that the subtle body is connected with the gross body by a silver cord. This thread is attached to the navel. Just as the string is tied to the wheel, similarly the yoga breath moves from the navel. It is a simple matter, the kite in the form of experience is always attached to the self, that is, to the soul, that is, to one’s own body. Probably that is why the navel chakra is called the center point of the human body. There is also a feeling of an inward stretch at the navel when meditation of the body is done along with the subtle body. Probably the name of the kite’s string-disc is derived from the navel chakra itself. The soul will definitely get the light of the physical world from it, because then self-feeling is connected with everything. Then, according to the aforesaid, happiness will also arise and Kundalini will also manifest itself, because Kundalini picture is such a physical thing, which is most connected to the soul through meditation. Means Kundalini is representative of the connection of the physical world with the soul. General knowledge, as opposed to specialized knowledge or vigyan, is a matter of worldliness. Knowledge quickly turns into ignorance if it is not supported by vigyan. This doesn’t mean science as it seems. Pranamaya sharira means not only meditation on the breath, but also meditation on the movement of the body produced by the breath and other activities. In this case, walking seems to be the best spiritual exercise. In this, attention is paid to the whole body, its movements, its sensations and the breath. Along with this, along with purity means sattvaguna in the mind, the activity of thoughts is also very good.