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Kundalini awakening requires six important factors to be fulfilled- spiritual awakening is possible for all!

Friends, I wrote in the previous post that Kundalini awakening cannot be attained by will. However, this may not the case. If determined and tried properly, it can also be attained by one’s own will. Kundalini awakening is a strange phenomenon. It is also the simplest, and also the most complex. It can be attained by one’s own will, and even not. It can be attained through our own efforts, and even not. According to the situation, it seems to involve different opposing sentiments.

Today we will tell what five things are required to gather for Kundalini awakening.

Importance of Kundalini meditation for Kundalini awakening

Kundalini meditation is the most important factor for Kundalini awakening. Kundalini image should be made with clarity, joy, and advaita/non-duality in mind. In fact, all human or spiritual qualities manifest themselves in a man through Kundalini. By assessing these qualities it can also be found out how strong Kundalini meditation is. It is not that Kundalini is meditated only through Yoga. In fact, Kundalini meditation arising out of Advaita Bhavna/non-dual attitude (Karmayoga) is more practical, stronger and more humane.

By doing Kundalini-meditation on different chakras, all the chakras also become stronger. Then when the Kundalini is lifted to the brain by passing through all the chakras through the tantric process, the energy of the chakras also reaches the brain itself. In this way, we can say that the power/energy of the chakras is also an sixth important factor for Kundalini awakening.

Importance of Prana for Kundalini awakening

Prana and shakti/energy (bodily and mental power) are synonyms. Just as no physical work is possible without energy, similarly Kundalini awakening is not possible without the strength of Prana. A weak, dull and sick man cannot have Kundalini awakening.

Kundalini and Prana live together. When the Kundalini is offered to the brain from the lower chakras of the body through yoga practice, then the Prana also goes up on its own. If there is a shortage of Prana in the body, even after reaching the brain, the Kundalini will remain weak, and will not be awakened.

Many believe that by sitting comfortably, and eating and drinking, the life force/Prana will be gathered in our body. However, it is not so. If that were the case, then all the elder billionaires would have attained the awakening of Kundalini. Prana actually accumulates with the functioning of the body and mind, sociality, non-duality and humanity. That is why in the olden times, the kings used to go to exile immediately after running the rule in the best method for many years. Then Prana being strengthened by their old activities used to awaken their Kundalini soon.

The same thing happened with Premyogi vajra. After the aforementioned kind of worldliness, he went into solitude to practice yoga. His accumulated vital energy/Prana was made available to his Kundalini, and she was awakened.

Importance of the introversion of the senses for Kundalini awakening

If the mouth of the senses is open outside, the accumulated life force/Prana will go out. With this, they will not be able to awaken Kundalini. Introversion does not mean becoming deaf and dumb. This means, getting least entangled in the outside world.

Even when Premyogi vajra started practicing yoga in seclusion while away from worldliness, he started to remain little extrovert for his maintenance, not more than necessary. Well-done Tantra also helped him a lot. His little Prana energy that was wasted in necessary worldliness that was fulfilled by his tantric way of life. With that tantra-augmented life force/Prana, he studied deep about Kundalini and Yoga, did yoga, did light trips, and did light work. Still, there was a lot of life force/Prana left in him, which was used to awaken his Kundalini.

Importance of semen power for Kundalini awakening

Semen power is the mainstay of the Tantra. Without semen power, Kundalini would not have the escape velocity required for awakening. Through tantric practice, semen energy is raised above the base chakras and passed to the brain. Prana with semen power also goes up. Much Pranas are destroyed with the destruction of semen power. Life force/Prana is saved by the rescue of semen power, which is provided to the Kundalini situated in the brain through the Tantra.

Importance of a trigger for Kundalini Awakening

If all the above favorable circumstances are present in the brain, but even if a mental shock / trigger is not found, then Kundalini awakening does not happen. Let me explain that trigger with an example. Suppose there are two Gurubhai (two people having same spiritual master), who are Kundalini Yogis, and both are meditating on the Kundalini of their Guru’s form at two different places. Then after years, they suddenly meet each other lovingly in a fair / ceremony etc., then that meeting will act as a trigger for both of them. With this, the attention of both of them will go to their Guru, so that the Kundalini of the form of the Guru already settled in their mind will be awakened.

Go to the following link to read the real-time experience of Kundalini-awakening resulting from the gathering of all the above six factors together.

Premyogi vajra describes his kundalini awakening experience in his own words as following

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कुण्डलिनी की प्राप्ति के लिए आवश्यक छह महत्त्वपूर्ण कारक- आध्यात्मिक जागरण सभी के लिए संभव है!

दोस्तों, मैंने पिछली पोस्ट में लिखा था कि कुण्डलिनी जागरण को अपनी इच्छा से प्राप्त नहीं किया जा सकता। परन्तु ऐसा भी नहीं है। यदि दृढ़ निश्चय से व सही ढंग से प्रयास किया जाए, तो उसे अपनी इच्छा से भी प्राप्त किया जा सकता है। कुण्डलिनी जागरण एक अजीबोगरीब घटना है। यह सबसे साधारण भी है, और साथ में सबसे जटिल भी। इसे अपनी इच्छा से भी प्राप्त किया जा सकता है, और नहीं भी। इसे अपने प्रयास से प्राप्त भी किया जा सकता है, और नहीं भी। परिस्थिति के अनुसार इसमें विभिन्न विरोधी भावों का समावेश प्रतीत होता है।

आज हम बताएंगे कि कुण्डलिनी जागरण के लिए किन पांच चीजों का एकसाथ इकट्ठा होना जरुरी है।

कुण्डलिनी जागरण के लिए कुण्डलिनी ध्यान का महत्त्व

कुण्डलिनी ध्यान कुण्डलिनी जागरण के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। कुण्डलिनी चित्र मन में स्पष्टता, आनंद, और अद्वैत के साथ बना होना चाहिए। वास्तव में कुण्डलिनी से आदमी में सभी मानवीय या आध्यात्मिक गुण स्वयं ही प्रकट हो जाते हैं। इन गुणों का आकलन करके भी यह पता लगाया जा सकता है कि कुण्डलिनी ध्यान कितना मजबूत है। ऐसा भी नहीं है कि योगसाधना से ही कुण्डलिनी का ध्यान होता हो। वास्तव में अद्वैत भावना (कर्मयोग) से पैदा होने वाला कुण्डलिनी ध्यान ज्यादा व्यावहारिक, ज्यादा मजबूत और ज्यादा मानवीय होता है।

अलग-२ चक्रों पर कुण्डलिनी-ध्यान करने से सभी चक्र भी मजबूत हो जाते हैं। फिर जब तांत्रिक प्रक्रिया से कुण्डलिनी को सभी चक्रों से गुजारते हुए मस्तिष्क तक उठाया जाता है, तब चक्रों की शक्ति भी स्वयं ही मस्तिष्क में पहुँच जाती है। इस तरह से हम कह सकते हैं कि चक्रों की शक्ति कुण्डलिनी जागरण के लिए छटा महत्त्वपूर्ण कारक है।

कुण्डलिनी जागरण के लिए प्राणों का महत्त्व

प्राण शक्ति (शारीरिक व मानसिक शक्ति) का ही पर्यायवाची रूप है। जैसे शक्ति के बिना कोई भौतिक कार्य संभव नहीं होता है, उसी तरह कुण्डलिनी जागरण भी प्राणों की मजबूती के बिना संभव नहीं है। कमजोर, सुस्त व बीमार आदमी को कुण्डलिनी जागरण की प्राप्ति नहीं हो सकती।

कुण्डलिनी और प्राण साथ-साथ रहते हैं। जब योग साधना से कुण्डलिनी को शरीर के निचले चक्रों से मस्तिष्क को चढ़ाया जाता है, तब उसके साथ प्राण भी अपने आप ऊपर चढ़ जाते हैं। यदि शरीर में प्राणों की कमी होगी, तो मस्तिष्क में पहुँच कर भी कुण्डलिनी कमजोर जैसी बनी रहेगी, और जागृत नहीं हो पाएगी।

कई लोग मानते हैं कि आराम से बैठकर, और खा-पी कर हमारे शरीर में प्राण शक्ति इकट्ठी हो जाएगी। परन्तु ऐसा नहीं है। यदि ऐसा होता, तो सभी बड़े-२ सेठ कब के कुण्डलिनी जागरण प्राप्त कर चुके होते। प्राण वास्तव में शरीर और मन की क्रियाशीलता, सामाजिकता, अद्वैत व मानवता से ही संचित होते हैं। इसीलिए तो पुराने समय में राजा लोग कई वर्षों तक सर्वोत्तम विधि से राज-काज चलाने के बाद एकदम से वनवास को चले जाया करते थे। उससे उनकी पुरानी क्रियाशीलता से मजबूत बने हुए प्राण उनकी कुण्डलिनी को शीघ्र ही जागृत कर दिया करते थे।

प्रेमयोगी वज्र के साथ भी ऐसा ही हुआ था। उपरोक्त प्रकार की भरपूर दुनियादारी के बाद वह योग साधना करने के लिए एकांत में चला गया। वहां उसकी संचित प्राण शक्ति उसकी कुण्डलिनी को लग गई, और वह जागृत हो गई।

कुण्डलिनी जागरण के लिए इन्द्रियों की अंतर्मुखता का महत्त्व

यदि इन्द्रियों का मुंह बाहर की ओर खुला रहेगा, तो संचित प्राण बाहर निकल जाएंगे। इससे वे कुण्डलिनी को जागृत नहीं कर पाएंगे। अंतर्मुखता का मतलब गूंगे-बहरे बनना नहीं है। इसका अर्थ तो बाहरी दुनिया में कम से कम उलझना है।

प्रेमयोगी वज्र भी जब दुनियादारी से दूर होकर एकांत में योग साधना करने लगा, तब वह अपने गुजारे लायक ही बहिर्मुखी रहने लगा, जरूरत से ज्यादा नहीं। वैसे तंत्र ने भी उसकी काफी सहायता की। उसकी जो शक्ति दुनियादारी में बर्बाद हो जाती थी, वह उसकी तांत्रिक जीवन पद्धति से पूरी हो जाती थी। अपनी उस तंत्र-संवर्धित प्राण शक्ति से वह कुण्डलिनी व योग के बारे में गहरा अध्ययन करता था, योग करता था, हलके-फुल्के भ्रमण करता था, और हलके-फुल्के काम करता था। फिर भी उसमें काफी प्राण शक्ति शेष बची रहती थी, जो उसकी कुण्डलिनी को जगाने में काम आई।

कुण्डलिनी जागरण के लिए वीर्य शक्ति का महत्त्व

वीर्य शक्ति तंत्र का प्रमुख आधार है। वीर्य शक्ति के बिना कुण्डलिनी को जागरण के लिए अपेक्षित मुक्तिगामी वेग (escape velocity) प्राप्त नहीं होता। तांत्रिक साधना के माध्यम से वीर्य शक्ति को आधार चक्रों से ऊपर उठाकर मस्तिष्क तक पहुँचाया जाता है। वीर्यशक्ति के साथ प्राण भी ऊपर चला जाता है। वीर्य शक्ति के नाश के साथ बहुत सा प्राण भी नष्ट हो जाता है। वीर्य शक्ति के बचाव से प्राण का बचाव हो जाता है, जो तंत्र के माध्यम से मस्तिष्क स्थित कुण्डलिनी को प्रदान कर दिया जाता है।

कुण्डलिनी जागरण के लिए एक ट्रिगर का महत्त्व

यदि उपरोक्त सभी अनुकूल परिस्थितियाँ मस्तिष्क में मौजूद हों, पर साथ में यदि एक मानसिक झटका/ट्रिगर न मिले, तो भी कुण्डलिनी जागरण नहीं होता। मैं उस ट्रिगर को एक उदाहरण से समझाता हूँ। मान लो कि दो गुरुभाई कुण्डलिनी योगी हों, और दोनों अलग-२ जगहों पर अपने गुरु के रूप की कुण्डलिनी का ध्यान कर रहे हों। फिर वे वर्षों बाद अचानक किसी मेले/समारोह आदि में आपस में प्यार से मिलें, तो वह मुलाक़ात उन दोनों के लिए एक ट्रिगर का काम करेगी। उससे उन दोनों का ध्यान अपने गुरु पर जाएगा, जिससे पहले से उनके मन में बसी हुई गुरु के रूप की कुण्डलिनी प्रचंड होकर एकदम से जागृत हो जाएगी।    

उपर चडकर हरेक चक्र क्रमवाईझ पांच से छे मास की अंतराल पे एक-एक चक्र का वेधन करते करते मस्तक मे एकठी हो जाएगी अब ये टाईम पे मस्तक मे कुल तीन प्रकार की एकरुप होती है. (1):- प्राण-अपान की उर्जा, (2):- दशेय ईन्द्रियाकी शक्ति की उर्जा, (3):- कुंडलीनी शक्ति की उर्जा .ये तीनो शक्तियां की उर्जा जब मस्तक मे एकरुप एकत्रित होकर बहती है तब मानव को गाढ ध्यान लग जाता है…….

कुण्डलिनी जागरण भाग-4

उपरोक्त सभी छह कारकों के एकसाथ इकट्ठा होने से उत्पन्न कुण्डलिनी-जागरण के वास्तविक समय के अनुभव को पढ़ने के लिए निम्नलिखित लिंक पर जाएं।

प्रेमयोगी वज्र अपनी उस समाधि(कुण्डलिनीजागरण/KUNDALINI AWAKENING) का वर्णन अपने शब्दों में इस प्रकार करता है

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ਕੁੰਡਲਨੀ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਲਈ ਛੇ ਜ਼ਰੂਰੀ ਕਾਰਕ- ਰੂਹਾਨੀ ਜਾਗਰਣ ਸਭ ਲਈ ਸੰਭਵ ਹੈ!

ਦੋਸਤੋ, ਮੈਂ ਪਿਛਲੀ ਪੋਸਟ ਵਿਚ ਲਿਖਿਆ ਸੀ ਕਿ ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗਰਣ ਇੱਛਾ ਨਾਲ ਪ੍ਰਾਪਤ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਦਾ। ਪਰ ਇਹ ਕੇਸ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਜੇ ਦ੍ਰਿੜਤਾ ਨਾਲ ਅਤੇ ਸਹੀ ਤਰੀਕੀਆਂ ਨਾਲ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਇਹ ਆਪਣੀ ਇੱਛਾ ਨਾਲ ਵੀ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤੀ ਜਾ ਸਕਦੀ ਹੈ। ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗਰਣ ਇਕ ਅਜੀਬ ਵਰਤਾਰਾ ਹੈ। ਇਹ ਸਭ ਤੋਂ ਸਰਲ ਵੀ ਹੈ ਅਤੇ ਸਭ ਤੋਂ ਜਟਿਲ ਵੀ। ਇਹ ਆਪਣੀ ਮਰਜ਼ੀ ਨਾਲ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ, ਜਾਂ ਨਹੀਂ ਵੀ। ਇਹ ਸਾਡੀ ਆਪਣੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਦੁਆਰਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ, ਜਾਂ ਨਹੀਂ ਵੀ। ਸਥਿਤੀ ਦੇ ਅਧਾਰ ਤੇ ਇਸ ਵਿਚ ਵੱਖਰੀਆਂ ਵਿਰੋਧੀ ਭਾਵਨਾਵਾਂ ਸ਼ਾਮਲ ਹੁੰਦੀਆਂ ਹਨ।

ਅੱਜ ਅਸੀਂ ਦੱਸਾਂਗੇ ਕਿ ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗਰਣ ਲਈ ਇਕੱਠੇ ਹੋਣ ਲਈ ਕਿਹੜੀਆਂ ਪੰਜ ਚੀਜ਼ਾਂ ਦੀ ਜਰੂਰਤ ਹੈ।

ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗਰੂਕਤਾ ਲਈ ਕੁੰਡਲਨੀ ਧਿਆਨ ਦਾ ਮਹੱਤਵ

ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗ੍ਰਿਤੀ ਲਈ ਕੁੰਡਲਨੀ ਸਿਮਰਨ ਸਭ ਤੋਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਣ ਕਾਰਕ ਹੈ। ਕੁੰਡਲਨੀ ਚਿੱਤਰਾਂ ਨੂੰ ਸਪੱਸ਼ਟਤਾ, ਅਨੰਦ ਅਤੇ ਮਨ ਵਿਚ ਅਡਵਾਈਟ ਦੇ ਨਾਲ ਬਣਾਇਆ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਦਰਅਸਲ, ਸਾਰੇ ਮਨੁੱਖੀ ਜਾਂ ਅਧਿਆਤਮਕ ਗੁਣ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਕੁੰਡਲਨੀ ਦੁਆਰਾ ਮਨੁੱਖ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਗਟ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਗੁਣਾਂ ਦਾ ਮੁਲਾਂਕਣ ਕਰਨ ਨਾਲ ਇਹ ਵੀ ਪਤਾ ਲਗਾਇਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ ਕਿ ਕੁੰਡਲਨੀ ਸਿਮਰਨ ਕਿੰਨਾ ਮਜ਼ਬੂਤ ​​ਹੈ। ਇਹ ਨਹੀਂ ਹੈ ਕਿ ਕੁੰਡਲਨੀ ਕੇਵਲ ਯੋਗਸਾਧਨ ਦੁਆਰਾ ਹੀ ਸਿਮਰਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਦਰਅਸਲ, ਅਦਵੈਤ ਭਾਵਨਾ (ਕਰਮਯੋਗਾ) ਤੋਂ ਪੈਦਾ ਹੋਇਆ ਕੁੰਡਲਨੀ ਧਿਆਨ ਵਧੇਰੇ ਵਿਹਾਰਕ, ਸ਼ਕਤੀਸ਼ਾਲੀ ਅਤੇ ਵਧੇਰੇ ਮਾਨਵਤਾ ਤੋਂ ਭਰਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ।

ਵੱਖ-ਵੱਖ ਚੱਕਰਾਂ ਵਿਚ ਕੁੰਡਲਨੀ-ਸਿਮਰਨ ਕਰਨ ਨਾਲ ਸਾਰੇ ਚੱਕਰ ਵੀ ਮਜ਼ਬੂਤ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਫਿਰ ਜਦੋਂ ਕੁੰਡਲਨੀ ਤਾਂਤਰਿਕ ਪ੍ਰਕਿਰਿਆ ਦੁਆਰਾ ਸਾਰੇ ਚਕਰਾਂ ਵਿਚੋਂ ਲੰਘਦੇ ਦਿਮਾਗ ਤਕ ਪਹੁੰਚ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਚੱਕਰ ਦੀ ਸ਼ਕਤੀ ਵੀ ਦਿਮਾਗ ਵਿਚ ਆਪਣੇ ਆਪ ਪਹੁੰਚ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਅਸੀਂ ਕਹਿ ਸਕਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗ੍ਰਿਤੀ ਲਈ ਚੱਕਰ ਦੀ ਸ਼ਕਤੀ ਇਕ ਹੋਰ ਮਹੱਤਵਪੂਰਣ ਕਾਰਕ ਹੈ.

ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗ੍ਰਿਤੀ ਲਈ ਜੀਵਨ ਸ਼ਕਤੀ/ਪ੍ਰਾਣ ਦਾ ਮਹੱਤਵ

ਪ੍ਰਾਣ ਸ਼ਕਤੀ (ਸਰੀਰਕ ਅਤੇ ਮਾਨਸਿਕ ਸ਼ਕਤੀ) ਦਾ ਸਮਾਨਾਰਥੀ ਹੈ। ਜਿਵੇਂ ਸ਼ਕਤੀ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਕੋਈ ਸਰੀਰਕ ਕਾਰਜ ਸੰਭਵ ਨਹੀਂ, ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗ੍ਰਿਤੀ ਜੀਵਨ ਸ਼ਕਤੀ./ਪ੍ਰਾਣ ਦੀ ਤਾਕਤ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਸੰਭਵ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਇੱਕ ਕਮਜ਼ੋਰ, ਸੁਸਤ ਅਤੇ ਬਿਮਾਰ ਆਦਮੀ ਨੂੰ ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗ੍ਰਿਤੀ ਨਹੀਂ ਮਿਲ ਸਕਦੀ।

ਕੁੰਡਲਨੀ ਅਤੇ ਪ੍ਰਾਣ ਇਕੱਠੇ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ। ਜਦੋਂ ਕੁੰਡਲਨੀ ਨੂੰ ਯੋਗਾ ਅਭਿਆਸ ਦੁਆਰਾ ਸਰੀਰ ਦੇ ਹੇਠਲੇ ਚੱਕਰ ਤੋਂ ਦਿਮਾਗ ਨੂੰ ਭੇਟ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਤਦ ਜੀਵਨ ਸ਼ਕਤੀ/ਪ੍ਰਾਣ ਵੀ ਆਪਣੇ ਆਪ ਚੜ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਜੇ ਸਰੀਰ ਵਿਚ ਜ਼ਿੰਦਗੀ-ਸ਼ਕਤੀ/ਪ੍ਰਾਣ ਦੀ ਘਾਟ ਹੈ, ਤਾਂ ਦਿਮਾਗ ਵਿਚ ਪਹੁੰਚਣ ਦੇ ਬਾਅਦ ਵੀ ਕੁੰਡਲਨੀ ਕਮਜ਼ੋਰ ਰਹੇਗੀ, ਅਤੇ ਜਾਗਦੀ ਨਹੀਂ ਹੋਵੇਗੀ।

ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਕਰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਆਰਾਮ ਨਾਲ ਬੈਠ ਕੇ, ਖਾਣ ਪੀਣ ਨਾਲ, ਜੀਵਨ ਸ਼ਕਤੀ/ਪ੍ਰਾਣ ਸਾਡੇ ਸਰੀਰ ਵਿੱਚ ਇਕੱਠੀ ਹੋ ਜਾਵੇਗੀ। ਪਰ ਅਜਿਹਾ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਜੇ ਅਜਿਹਾ ਹੁੰਦਾ, ਤਾਂ ਸਾਰੇ ਬਜ਼ੁਰਗ ਸੇਠਾਂ ਨੇ ਕੁੰਡਲਨੀ ਦੇ ਜਾਗਣ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਕਰ ਲਈ ਹੁੰਦੀ। ਪ੍ਰਾਣ ਅਸਲ ਵਿੱਚ ਤਨ ਅਤੇ ਮਨ ਤੋਂ ਸਮਾਜਿਕਤਾ, ਅਦ੍ਵਿਤ ਅਤੇ ਮਨੁੱਖਤਾ ਦੇ ਕਾਰਜਾਂ ਨਾਲ ਇਕੱਤਰ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਇਹੀ ਕਾਰਨ ਹੈ ਕਿ ਪੁਰਾਣੇ ਸਮੇਂ ਵਿੱਚ, ਰਾਜਾ ਲੋਕ ਕਈ ਸਾਲਾਂ ਤੋਂ ਸਭ ਤੋਂ ਵਧੀਆ ਤਰੀਕੀਆਂ ਨਾਲ ਰਾਜ-ਕਾਜ/ਰਾਜ-ਨਿਯਮ ਚਲਾਉਣ ਤੋਂ ਤੁਰੰਤ ਬਾਅਦ ਅਕੇਲੇਪਨ ਦੀ ਗ਼ੁਲਾਮੀ ਵਿੱਚ ਜਾਂਦੇ ਸਨ। ਪ੍ਰਾਣ ਜੇੜਾ ਉੰਨਾਂ ਦੀ ਪੁਰਾਣੀ ਸਰਗਰਮੀ ਨਾਲ ਮਜ਼ਬੂਤ ​​ਹੋਇਆ ਹੁੰਦਾ ਸੀ, ਉਹ ਤੋਂ ਕੁੰਡਲਨੀ-ਚਿਤਰ ਜਲਦੀ ਜਾਗਿਆ ਕਰਦਾ ਸੀ।

ਪ੍ਰੇਮਯੋਗੀ ਵਜਰਾ ਨਾਲ ਵੀ ਅਜਿਹਾ ਹੀ ਹੋਇਆ ਸੀ। ਉਪਰੋਕਤ ਕਿਸਮ ਦੀ ਸੰਸਾਰਿਕਤਾ ਤੋਂ ਬਾਅਦ, ਉਹ ਯੋਗਾ ਅਭਿਆਸ ਕਰਨ ਲਈ ਇਕਾਂਤ ਵਿਚ ਚਲਾ ਗਿਆ। ਉਸਦੀ ਇਕੱਠੀ ਹੋਈ ਮਹੱਤਵਪੂਰਣ ਪ੍ਰਾਣ ਸ਼ਕਤੀ ਉਸਦੀ ਕੁੰਡਲਨੀ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋ ਗਈ ਸੀ, ਅਤੇ ਉਹ ਜਾਗ ਗਈ।

ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗ੍ਰਿਤੀ ਲਈ ਇੰਦਰੀ-ਸ਼ਕਤੀ/ਪ੍ਰਾਣ ਦੇ ਅੰਤਰ-ਭੁਲੇਖੇ ਦੀ ਮਹੱਤਤਾ

ਜੇ ਇੰਦਰੀ-ਸ਼ਕਤੀ/ਪ੍ਰਾਣ ਦਾ ਮੂੰਹ ਬਾਹਰ ਖੁੱਲ੍ਹਾ ਹੈ, ਇਕੱਠੀ ਹੋਈ ਜਿੰਦਗੀ-ਸ਼ਕਤੀ/ਪ੍ਰਾਣ ਬਾਹਰ ਚਲੀ ਜਾਵੇਗੀ। ਇਸ ਨਾਲ ਉਹ ਕੁੰਡਲਨੀ ਨੂੰ ਜਗਾਉਣ ਦੇ ਯੋਗ ਨਹੀਂ ਹੋਵੇਗੀ। ਇਹ ਮਤ ਦਾ ਅਰਥ ਇਹ ਨਹੀਂ ਕਿ ਬੋਲ਼ੇ ਅਤੇ ਗੂੰਗੇ ਬਣੋ। ਇਸਦਾ ਅਰਥ ਹੈ ਘੱਟੋ ਘੱਟ ਬਾਹਰੀ ਸੰਸਾਰ ਵਿਚ ਉਲਝਣਾ।

ਇੱਥੋਂ ਤਕ ਕਿ ਜਦੋਂ ਪ੍ਰੇਮਯੋਗੀ ਵਜਰ ਦੁਨਿਆਵੀਤਾ ਤੋਂ ਦੂਰ, ਇਕਾਂਤ ਵਿਚ ਯੋਗਾ ਦਾ ਅਭਿਆਸ ਕਰਨਾ ਅਰੰਭ ਕਰ ਦਿੱਤਾ, ਤਦ ਉਹ ਘੱਟੋ ਘੱਟ  ਬਾਹਰ ਰਹਿਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤਾ, ਜ਼ਰੂਰੀ ਤੋਂ ਵੱਧ ਨਹੀਂ। ਖੈਰ ਤਂਤਰ ਨੇ ਵੀ ਉਸਦੀ ਬਹੁਤ ਮਦਦ ਕੀਤੀ। ਉਸਦੀ ਜਿਹੜੀ ਤਾਕਤ ਦੁਨਿਆਵੀਤਾ ਵਿਚ ਬਰਬਾਦ ਹੋਈ, ਉਹ ਉਸਦੇ ਤਾਂਤਰਿਕ ਜੀਵਨ ਤਰੀਕੇ ਨਾਲ ਪੂਰੀ ਹੋਈ। ਉਸ ਤੰਤਰ ਨਾਲ ਮਜਬੂਤ ਜੀਵਨ ਸ਼ਕਤੀ/ਪ੍ਰਾਣ ਨਾਲ ਉਸਨੇ ਕੁੰਡਲਨੀ ਅਤੇ ਯੋਗਾ ਬਾਰੇ ਡੂੰਘਾ ਅਧਿਐਨ ਕੀਤਾ, ਯੋਗਾ ਕੀਤਾ, ਘਟੋ ਘਟ ਯਾਤਰਾਵਾਂ ਕੀਤੀਆਂ, ਅਤੇ ਘਟੋ ਘਟ ਕਾਰਜ ਕੀਤੇ। ਫਿਰ ਵੀ, ਉਸ ਵਿੱਚ ਬਹੁਤ ਸਾਰੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਸ਼ਕਤੀ/ਪ੍ਰਾਣ ਬਚੀ ਸੀ, ਜੋ ਉਸਦੀ ਕੁੰਡਲਨੀ ਨੂੰ ਜਗਾਉਣ ਲਈ ਵਰਤੀ ਜਾਂਦੀ ਸੀ।

ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗ੍ਰਿਤੀ ਲਈ ਵੀਰਜ ਸ਼ਕਤੀ ਦੀ ਮਹੱਤਤਾ

ਵੀਰਜ ਸ਼ਕਤੀ ਤੰਤਰ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਦਾ ਮੁੱਖ ਅਧਾਰ ਹੈ। ਵੀਰਜ ਸ਼ਕਤੀ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗ੍ਰਿਤੀ ਲਈ ਜ਼ਰੂਰੀ ਭਾਗਣ ਦੀ ਗਤੀ (escape velocity) ਪ੍ਰਾਪਤ ਨਹੀਂ ਕਰਦੀ। ਤਾਂਤ੍ਰਿਕ ਅਭਿਆਸ ਦੁਆਰਾ ਵੀਰਜ ਸ਼ਕਤੀ ਅਧਾਰ ਚੱਕਰ ਤੋਂ ਉਪਰ ਉਠਾਈ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਦਿਮਾਗ ਨੂੰ ਭੇਜੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਵੀਰਜ ਸ਼ਕਤੀ ਵਾਲਾ ਪ੍ਰਾਣ ਵੀ ਉੱਪਰ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਵੀਰਜ ਸ਼ਕਤੀ ਦੇ ਵਿਨਾਸ਼ ਨਾਲ ਬਹੁਤ ਸਾਰੀਆਂ ਜਾਨਾਂ ਦੀ ਸ਼ਕਤੀਆਂ/ਪ੍ਰਾਣ-ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਨਸ਼ਟ ਹੋ ਜਾਂਦੀਆਂ ਹਨ। ਵੀਰਜ ਸ਼ਕਤੀ ਦੀ ਬਚਾਅ ਨਾਲ ਜ਼ਿੰਦਗੀ-ਸ਼ਕਤੀ/ਪ੍ਰਾਣ ਬਚਾਈ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਜੋ ਕਿ ਤੰਤਰ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਦੇ ਜ਼ਰੀਏ ਦਿਮਾਗ ਵਿਚ ਸਥਿਤ ਕੁੰਡਲਨੀ ਨੂੰ ਪ੍ਰਦਾਨ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ।

ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗਰਣ ਲਈ ਇੱਕ ਟਰਿੱਗਰ ਦੀ ਮਹੱਤਤਾ

ਜੇ ਉਪਰੋਕਤ ਸਾਰੇ ਅਨੁਕੂਲ ਹਾਲਾਤ ਦਿਮਾਗ ਵਿਚ ਮੌਜੂਦ ਹਨ, ਪਰ ਜੇ ਮਾਨਸਿਕ ਸਦਮਾ / ਟਰਿੱਗਰ ਨਹੀਂ ਮਿਲਿਆ, ਤਾਂ ਵੀ ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗਣਾ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ। ਮੈਂ ਉਸ ਟਰਿੱਗਰ ਨੂੰ ਇੱਕ ਉਦਾਹਰਣ ਦੇ ਨਾਲ ਸਮਝਾਉਂਦਾ ਹਾਂ। ਮੰਨ ਲਓ ਕਿ ਇੱਥੇ ਦੋ ਗੁਰੂਭਾਈ ਕੁੰਡਲਨੀ ਯੋਗੀਆਂ ਹਨ, ਅਤੇ ਦੋਵੇਂ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਥਾਵਾਂ ਤੇ ਆਪਣੇ ਗੁਰੂ ਦੇ ਸਰੂਪ ਦੀ ਕੁੰਡਲਨੀ ਦਾ ਸਿਮਰਨ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ। ਫਿਰ ਸਾਲਾਂ ਬਾਅਦ ਉਹ ਅਚਾਨਕ ਇੱਕ ਨਿਰਪੱਖ / ਸਮਾਰੋਹ ਆਦਿ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਦੂਜੇ ਨੂੰ ਵਧੇਰੇ ਪਿਆਰ ਨਾਲ ਮਿਲਦੇ ਹਨ, ਤਦ ਉਹ ਮੁਲਾਕਾਤ ਦੋਵਾਂ ਲਈ ਇੱਕ ਟਰਿੱਗਰ ਵਜੋਂ ਕੰਮ ਕਰੇਗੀ। ਇਸ ਨਾਲ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੋਵਾਂ ਦਾ ਧਿਆਨ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਗੁਰੂ ਵੱਲ ਜਾਵੇਗਾ, ਤਾਂ ਜੋ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਮਨ ਵਿਚ ਪਹਿਲਾਂ ਤੋਂ ਸਥਾਪਤ ਗੁਰੂ ਦੇ ਸਰੂਪ ਦੀ ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗ ਪਵੇ।    

ਉਪਰੋਕਤ ਸਾਰੇ ਛੇ ਕਾਰਕਾਂ ਦੇ ਇਕੱਠੇ ਹੋਣ ਦੇ ਨਤੀਜੇ ਵਜੋਂ ਕੁੰਡਾਲੀਨੀ-ਜਾਗਰਣ ਦੇ ਅਸਲ-ਸਮੇਂ ਦੇ ਤਜ਼ਰਬੇ ਨੂੰ ਪੜ੍ਹਨ ਲਈ ਹੇਠਾਂ ਦਿੱਤੇ ਲਿੰਕ ਤੇ ਜਾਓ।

Premyogi vajra describes his kundalini awakening experience in his own words as following

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ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗਰਣ – ਇਹ ਕਿਵੇਂ ਕੰਮ ਕਰਦਾ ਹੈ

ਦੋਸਤੋ, ਕੋਰਾ ਤੇ ਕੁੰਡਲਨੀ-ਜਾਗਰਣ ਬਾਰੇ ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਪ੍ਰਸ਼ਨ ਪੁੱਛੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਮੁੱਖ ਪ੍ਰਸ਼ਨ ਇਹ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗਰਣ ਕੀ ਹੈ? ਉਹੀ ਉੱਤਰ ਬਾਰ -2 ਦੁਹਰਾਉਣਾ ਤਰਕਸ਼ੀਲ ਨਹੀਂ ਲੱਗਦਾ। ਇਸ ਲਈ ਮੈਂ ਇਸ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਇਕ ਵੈਬਸਾਈਟ ਪੋਸਟ ਬਣਾਉਣ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਜੋ ਪਾਠਕਾਂ ਨੂੰ ਇਸ ਤੇ ਕੋਰਾ ਤੋਂ ਭੇਜਿਆ ਜਾ ਸਕੇ।

ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗਰਣਾ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਯਾਦ ਕਰਨਾ ਹੈ

ਇਹ ਅਸਲੀਯਤ ਹੈ। ਸਿਰਫ ਯਾਦ ਕਰਨ ਦਾ ਪੱਧਰ ਬਦਲਦਾ ਹੈ। ਕੁੰਡਲਨੀ ਨੂੰ ਇਸ ਤੋਂ ਵੱਧ ਡੂੰਘਾਈ ਨਾਲ ਯਾਦ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ। ਜਾਗਰਣ ਦੀ ਅਵਸਥਾ ਵਿਚ ਕੁੰਡਲਨੀ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦਿਲ ਦੀ ਗਹਿਰਾਈ ਵਿਚ ਚੜ੍ਹ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਕੁੰਡਲਨੀ ਨੂੰ ਜਗਾਉਣ ਦੇ ਸਮੇਂ, ਕੁੰਡਲਨੀ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਰੂਹ ਦੀ ਡੂੰਘਾਈ ਵਿੱਚ ਆ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਦਰਅਸਲ, ਕੁੰਡਲਨੀ ਆਤਮਾ ਨਾਲ ਜੁੜ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਉਹ ਆਤਮਾ ਨਾਲ ਅਭੇਦ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਉਸ ਸਮੇਂ, ਰੂਹ ਇਸਨੂੰ ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਵਸਤੂ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਨਹੀਂ ਦੇਖ ਸਕਦੀ। ਉਸ ਸਮੇਂ ਆਤਮਾ ਉਸਨੂੰ ਆਪਣੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਦੇਖਦੀ ਹੈ। ਰੂਹ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਕੁੰਡਲਨੀ-ਰੂਪ ਬਣ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਇੱਥੇ ਯਾਦ ਕੀਤਾ ਵਿਅਕਤੀ (ਗੁਰੂ, ਦੇਵਤਾ, ਪ੍ਰੇਮੀ ਆਦਿ ਜਾਂ ਸਿਧਾਂਤਕ ਤੌਰ ਤੋਂ ਕੁੱਝ ਵੀ) ਕੁੰਡਲਨੀ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਆਤਮਾ ਦਾ ਭਾਵ ਇਥੇ ਹੈ, ਆਮ ਆਦਮੀ ਦਾ ਆਪਣਾ ਨਿਰੰਕਾਰੀ

 ਅਤੇ ਹਨੇਰਾ ਰੂਪ ਹੈ। ਉਹ ਰੂਪ ਵਿਚਾਰਾਂ ਅਤੇ ਤਜ਼ਰਬਿਆਂ ਤੋਂ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਖਾਲੀ ਹੈ। ਇਹ ਇਕ ਹਨੇਰਾ ਰੱਦੀ ਵਾਂਗ ਹੈ। ਇਹ ਭਰਮ ਜਾਂ ਦੁਬਿਧਾ ਜਾਂ ਭਰਮ ਦੁਆਰਾ ਹਨੇਰੇ ਨਾਲ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ ਹੈ। ਦਰਅਸਲ, ਉਹ ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਿੰਨਾ ਚਮਕਦਾਰ ਹੈ। ਇਸਦਾ ਅਰਥ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਕੁੰਡਲਨੀ-ਜਾਗ੍ਰਿਤੀ ਦੇ ਸਮੇਂ, ਰੂਹ ਵੀ ਕੁੰਡਲਨੀ ਵਾਂਗ ਚਮਕਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੰਦੀ ਹੈ। ਇਹ ਹਰ ਚੀਜ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਖੁਦ ਦੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਮਹਿਸੂਸ ਕਰਾਉਂਦਾ ਹੈ। ਇਥੇ ਕੋਈ ਦਵੰਦਤਾ ਨਹੀਂ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ। ਅਦਵੈਤ-ਰੂਪ ਵਿਚ ਸਭ ਕੁਝ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਤ ਹੋਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਅਜਿਹਾ ਇਸ ਲਈ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਕਿਉਂਕਿ ਸਾਰੇ ਤਜ਼ਰਬੇ ਸਮੇਤ ਕੁੰਡਲਨੀ ਕੁਦਰਤੀ ਤੌਰ ਤੇ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਮਾਨ ਹੁੰਦੇ ਹਨ। ਉਸ ਸਮੇਂ, ਕੁੰਡਲਨੀ ਵਿਚ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋ ਕੇ ਰੂਹ ਵੀ ਰੋਸ਼ਨ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਵਿਸ਼ਾਲ ਅਗਨੀ ਆਪਣੇ ਤੋਂ ਵੱਖਰੀ ਲਾਟ ਕਿਵੇਂ ਲੱਭ ਸਕਦੀ ਹੈ? ਰੂਹ ਨੂੰ ਦੁਨੀਆ ਦੇ ਤਜ਼ੁਰਬੇ / ਪਦਾਰਥ ਤਦ ਵੱਖਰੇ ਮਹਿਸੂਸ ਹੋਏ ਜਦੋਂ ਇਹ ਕੁੰਡਲਨੀ ਨਾਲ ਜੁੜਿਆ ਨਹੀਂ ਸੀ। ਉਸ ਸਮੇਂ ਕੁੰਡਲਨੀ ਵੀ ਉਸ ਤੋਂ ਵੱਖਰੀ ਲੱਗ ਰਹੀ ਸੀ। ਬੇਸ਼ਕ ਇਸ ਗੱਲ ਦਾ ਕੋਈ ਫ਼ਰਕ ਨਹੀਂ ਪੈਂਦਾ ਕਿ ਕੁੰਡਲਨੀ ਵੱਲ ਕਿੰਨਾ ਧਿਆਨ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਸੀ, ਇਸ ਤੋਂ ਕੁਝ ਵੱਖ ਰਹਿੰਦਾ ਸੀ। ਹਨੇਰੇ ਕਮਰੇ ਨੂੰ ਅੱਗ ਦੀ ਛੋਟੀ ਲਾਟ ਆਪਣੇ ਵਰਗੀ ਕਿਵੇਂ ਦਿਖ ਸਕਦੀ ਹੈ? ਉਹ ਉਸ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਆਪ ਤੋਂ ਵੱਖਰੀ ਮਹਿਸੂਸ ਹੋਏਗੀ।

ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗਰਣ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਅਸਲ ਰੂਹ ਦੀ ਝਲਕ ਦਿਖਾਉਂਦੀ ਹੈ। ਇਸ ਦੁਆਰਾ, ਉਹ ਯੋਗਸਾਧਨਾ ਆਦਿ ਦੇ ਨਿਰੰਤਰ ਅਭਿਆਸ ਦੁਆਰਾ ਇਸ ਦੀ ਪੂਰੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਲਈ ਪ੍ਰੇਰਿਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।

ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗਰਣ ਬਹੁਤੀ ਦੇਰ ਨਹੀਂ ਚਲਦਾ

ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗਰਣ ਕੁਝ ਸਕਿੰਟਾਂ ਤੋਂ ਵੱਧ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਦੀ। ਉਸ ਸਮੇਂ ਦਿਮਾਗ ਵਿਚ ਇਕ ਵਿਸਫੋਟਕ ਦਬਾਅ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਬਹੁਤੇ ਮਾਮਲਿਆਂ ਵਿੱਚ, ਆਦਮੀ ਡਰ ਜਾਂ ਝਿਜਕ ਦੇ ਕਾਰਨ, ਕੁੰਡਲਨੀ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਆਪ ਥੱਲੇ ਲਿਆਉਂਦਾ ਹੈ। ਜੇ ਉਹ ਖੁਦ ਨਹੀਂ ਲਿਆਉਂਦਾ, ਥੋੜ੍ਹੇ ਸਮੇਂ ਵਿਚ ਦਿਮਾਗ ਬਹੁਤ ਥੱਕ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਜਗਾਉਣ ਦੇ ਤਜਰਬੇ ਨੂੰ ਰੋਕ ਦਿੰਦਾ ਹੈ। ਤਦ ਆਦਮੀ ਥਕਾਵਟ ਕਾਰਨ ਵੀ ਲੇਟ ਸਕਦਾ ਹੈ। ਉਹ ਨੀਂਦ ਨਹੀਂ ਮਹਿਸੂਸ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ, ਕਿਉਂਕਿ ਉਹ ਉਸ ਸਮੇਂ ਅਨੰਦੁ, ਅਦ੍ਵਿਤ, ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਤੇ ਆਰਾਮ ਵਿੱਚ ਡੂਬਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਉਸਦਾ ਮਨ ਇਕ ਸਿਫਰ ਵਰਗਾ ਬਣ ਸਕਦਾ ਹੈ, ਜਿਸ ਵਿਚ ਉਹ ਬਿਨਾਂ ਸੋਚੇ ਹੋਚ ਦੇ ਅਸਲ ਆਤਮਾ ਦਾ ਅਨੁਭਵ ਵੀ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ।

ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗਰਣ ਦੀ ਅਵਧੀ ਵਿਅਕਤੀ ਦੇ ਅਭਿਆਸ, ਮਨੋਬਲ, ਸਰੀਰਕ ਤਾਕਤ, ਉਮਰ, ਸਮਾਜਿਕ ਰੁਤਬੇ ਆਦਿ ‘ਤੇ ਵੀ ਨਿਰਭਰ ਕਰ ਸਕਦੀ ਹੈ। ਪਰ ਇਸ ਨੂੰ ਇਕ ਮਿੰਟ ਤੋਂ ਵੱਧ ਜਾਰੀ ਰੱਖਣਾ ਅਸੰਭਵ ਜਾਪਦਾ ਹੈ।

ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗਰਣ ਬਾਰੇ ਭੰਬਲਭੂਸਾ

ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਲੋਕ ਕੁੰਡਲਨੀ-ਧਿਆਨ ਅਤੇ ਪ੍ਰਣੋਥਨ/prana-rising (ਕੁੰਡਲਨੀ ਉਤ੍ਥਾਨ/ਰਾਈਜਿਨ੍ਗ) ਨੂੰ ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗਰਣ ਮੰਨਦੇ ਹਨ। ਇਹ ਉਲਝਣ ਕੁਦਰਤੀ ਹੈ, ਕਿਉਂਕਿ ਉਪਰੋਕਤ ਸਾਰੇ ਤਜੁਰਬੇ ਕੁਦਰਤ ਦੁਆਰਾ ਇਕੋ ਜਿਹੇ ਹਨ, ਅਤੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਸਾਰੀਆਂ ਸਥਿਤੀਆਂ ਵਿਚ ਕੁੰਡਲਨੀ ਦੀ ਯਾਦ ਜਾਂ ਚਿੰਤਨ ਮੌਜੂਦ ਹੈ। ਸਿਰਫ ਯਾਦ ਕਰਨ ਦਾ ਪੱਧਰ/level ਵੱਖਰਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਇਹ ਯਾਦ ਆਮ ਕੁੰਡਲਨੀ-ਸਿਮਰਨ ਵਿਚ ਸਭ ਤੋਂ ਘੱਟ ਹੈ। ਇਹ ਯਾਦ ਪ੍ਰਾਣ ਦੇ ਚਢ਼ਾਵ/prana-rising ਵਿਚ ਉਸ ਤੋਂ ਵਧ ਹੈ। ਇਹ ਕੁੰਡਲਨੀ-ਜਾਗਰਣ ਵਿੱਚ ਸਭ ਤੋਂ ਉੱਚਾ ਹੈ। ਸਧਾਰਣ ਕੁੰਡਲਨੀ ਅਭਿਆਸ ਅਤੇ ਪ੍ਰਾਣ-ਚਢ਼ਾਵ ਨਾਲ ਕੁੰਡਲਨੀ ਅਭਿਆਸ ਨਿਰੰਤਰ ਲੰਬੇ ਸਮੇਂ ਤਕ (ਘੰਟਿਆਂ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਦਿਨਾਂ ਤਕ) ਜਾਰੀ ਰੱਖੀ ਜਾ ਸਕਦੀ ਹੈ, ਪਰ ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗਰਣ ਇਕ ਮਿੰਟ ਤੋਂ ਵੱਧ ਨਹੀਂ ਜਾਰੀ ਰਖੀ ਜਾ ਸਕਦੀ। ਤੁਹਾਡੀ ਇੱਛਾ ਅਤੇ ਅਭਿਆਸ ਦੁਆਰਾ ਸਧਾਰਣ ਕੁੰਡਲਨੀ ਅਭਿਆਸ ਅਤੇ ਪ੍ਰਾਣ-ਚਢ਼ਾਵ ਨਾਲ ਕੁੰਡਲਨੀ ਧਿਆਨ ਕਿਸੇ ਵੀ ਸਮੇਂ ਪੈਦਾ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ, ਪਰ ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗਰਣ ਮਰਜ਼ੀ ਨਾਲ ਪੈਦਾ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ ਜਾ ਸਕਦੀ। ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗ੍ਰਿਤੀ ਆਪਣੇ ਆਪ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਅਤੇ ਬਿਨਾਂ ਦੱਸੇ। ਇਹ ਕੇਵਲ ਤਾਂ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਜਦੋਂ ਬਹੁਤ ਸਾਰੀਆਂ ਅਨੁਕੂਲ ਸ਼ਰਤਾਂ ਇਕੱਠੀਆਂ ਹੁੰਦੀਆਂ ਹਨ। ਇਸਦੇ ਇਲਾਵਾ, ਇਸ ਨੂੰ ਪੈਦਾ ਕਰਨ ਲਈ, ਇੱਕ ਮਾਨਸਿਕ ਸਦਮਾ/trigger ਜਾਂ ਉਤੇਜਕ ਵੀ ਮੌਜੂਦ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਦਰਅਸਲ ਆਦਮੀ ਦੁਆਰਾ ਆਪਣੀ ਜਾਗ੍ਰਿਤੀ ਦੇ ਹੋਂਦ ਬਾਰੇ ਕੋਈ ਭਵਿੱਖਬਾਣੀ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ ਜਾ ਸਕਦੀ ਹੈ। ਇਹ ਤਦੋਂ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਜਦੋਂ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਇਸ ਦੇ ਹੋਣ ਬਾਰੇ ਕੋਈ ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ। ਪਰ ਇਸ ਦੇ ਨਾਲ ਹੀ ਇਹ ਵੀ ਸੱਚ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗ੍ਰਿਤੀ ਸਿਰਫ ਧਿਆਨ ਅਤੇ ਪ੍ਰਾਣ ਦੇ ਚਢ਼ਾਵ ਦੀ ਸਥਿਤੀ ਵਿਚ ਹੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਅਤੇ ਇੰਨਾਂ ਨੂੰ ਲੰਬੇ ਸਮੇਂ ਤਕ (ਕਈ ਸਾਲਾਂ ਤੋਂ) ਜਾਰੀ ਰੱਖਿਆ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ।

ਪ੍ਰਣੋਥਨ/ਪ੍ਰਾਣ-ਚਢ਼ਾਵ ਬਾਰੇ ਵਿਸਥਾਰਪੂਰਵਕ ਜਾਣਕਾਰੀ ਹੇਠਾਂ ਦਿੱਤੀ ਪੋਸਟ ਤੇ ਪੜ੍ਹੀ ਜਾ ਸਕਦੀ ਹੈ।

There is no fundamental difference between Prana rising and Kundalini awakening. Only the different level of expression is the difference between the two. That is why many over ambitious people recognize their Prana rising as Kundalini awakening……

Prana rising as the start of Kundalini Awakening

ਹੇਠਾਂ ਦਿੱਤੇ ਵੈੱਬਪੇਜ ਨੂੰ ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗਰਣ ਦੇ ਅਸਲ ਸਮੇਂ ਦੇ ਤਜ਼ੁਰਬੇ ਨੂੰ ਜਾਣਨ ਲਈ ਪੜ੍ਹਿਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ।

All experiences were appearing as if equal, unchanging and complete. My personal ego was fully dead. I got suspicion of my health. I had no feeling of my own personality. I was as if in the form of a personality of Kundalini and non-duality only.

Premyogi vajra describes his kundalini awakening experience in his own words as following

ਅਗਲੀ ਪੋਸਟ ਵਿਚ, ਅਸੀਂ ਦੱਸਾਂਗੇ ਕਿ ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਗਰਣ ਲਈ ਮਨ ਵਿਚ ਕੀ 5 ਚੀਜ਼ਾਂ ਇਕੱਠੀਆਂ ਹੋਣੀਆਂ ਚਾਹੀਦੀਆਂ ਹਨ।

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Kundalini awakening- How it works

Friends, many questions are asked about Kundalini-Awakening on Quora. The main question is ‘what is Kundalini Awakening’? Repeating the same answer does not sound like anything rational. Therefore, I decided to create a website post related to it, so that readers can be redirected to it from Quora.

Kundalini awakening as to remember someone

This is essentially so. Only the level of recall varies. Kundalini cannot be remembered more deeply than this. In the state of awakening, Kundalini reaches into the full depths of the heart. At the time of awakening of the Kundalini, the Kundalini is completely descended into the depths of the soul. In fact, Kundalini gets connected to the soul. She merges with the soul. At that time, the soul cannot see it as another object. At that time, the soul sees her as his own form. The soul becomes completely Kundalini-form. The person (guru, deity, lover etc. or literally anything) remembered here is in the form of Kundalini. Soul means here that the common person has as his own absolute and dark form. That form is completely empty of thoughts and experiences. It is like a dark void. It is made dark by illusion. In fact, it is as bright as Kundalini.

This means that at the time of Kundalini-awakening, the soul also starts shining as Kundalini. This makes him feel everything as his own form. There is no duality. Everything seems to be bright in the non-dual form. This happens because all experiences including Kundalini are illuminated by nature. At that time, the joining of Kundalini also illuminates the soul. How can great fire find its flame different from itself? The soul felt different experiences / substances of the world as different from itself when it was not connected with Kundalini. At that time, Kundalini also looked different from itself. Of course, no matter how much attention/meditation was paid to Kundalini, there was some separation from it. How can a dark room feel a sparkle of fire inside it like itself? It will surely feel it different from itself.

Kundalini awakening shows the man a glimpse of his own real soul. By this, he is motivated to achieve it completely by constant practice of Yogasadhana, meditation etc.

Kundalini Awakening does not last long

Kundalini Awakening cannot be held for more than a few seconds. At that time, there is an explosive pressure in the brain. In most of the cases, the man brings down the Kundalini on his own, out of fear or hesitation. If he does not land her himself, the brain becomes very tired in a short time, and stops the experience of awakening itself. Then the man may relax down due to fatigue. He may not feel sleepy because at that time he is full of bliss, peace, advaita/non-duality, and relaxation. His mind can become like a void, in which he can also experience the real bright soul without thinking.

The duration of Kundalini awakening can also depend on the person’s practice, morale, mental strength, physical strength, age, social status etc. However, it seems impossible to continue it for more than a minute.

Confusion about Kundalini Awakening

Many people consider Kundalini-Dhyan/kundalini-meditation and Pranotthan/prana-rising (kundalini rising) as Kundalini Awakening. This confusion is natural, as the entire above are the same by nature and in all these situations Kundalini’s remembrance or contemplation exists. Only the level of remembrance varies. This remembrance is the lowest in ordinary Kundalini-meditation. This remembrance is more in the prana-rising. It is the highest in Kundalini-awakening. While simple Kundalini meditation and Kundalini meditation with prana-rising can be continued continuously for long time (from hours to days), Kundalini awakening experience cannot be continued for more than one minute. While simple Kundalini meditation and Kundalini meditation with prana-rising can be produced at any time by one’s desire and practice, Kundalini awakening cannot be born at will. Kundalini awakening happens on its own, and without being told. This happens only when many favorable conditions are gathered. In addition, to produce it, a mental shock/ stimulant/trigger must also be present. Actually, the man cannot make any predictions about its timing. This occurs when a man has no idea about its occurrence. But at the same time it is also true that Kundalini awakening occurs only in a state of kundalini meditation and prana-rising, and it should have been continued for a varying period of time (for months to years) according to various individual and environmental factors.

Detailed information about Pranotthan/prana-rising can be read on the following post.

There is no fundamental difference between Prana rising and Kundalini awakening. Only the different level of expression is the difference between the two. That is why many over ambitious people recognize their Prana rising as Kundalini awakening. Kundalini awakening is the complete and perfect Prana rising only, nothing new…..

Prana rising as the start of Kundalini Awakening

The following webpage can be read to know the real time experience of Kundalini awakening.

My head turned heavy with great tautness and pressure. That pressure was special because that was agitating and flaring up my consciousness unlike the normal and routine pressure that depress it. That was appearing as if a consciousness-river in the form of a whirl was swirling in my mind with full speed and shaking every particle of my brain, tolerating which my brain was becoming incapable.….

Premyogi vajra describes his kundalini awakening experience in his own words as following

In the next post, we will tell what 5 things must be gathered together in the mind/brain for Kundalini Awakening.   

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कुण्डलिनी जागरण- यह कैसे काम करता है

दोस्तो, क्वोरा पर कुण्डलिनी-जागरण के बारे में बहुत से प्रश्न पूछे जाते रहते हैं। मुख्य प्रश्न यही होता है कि कुण्डलिनी जागरण क्या होता है? बार-२ वही उत्तर दोहराना कुछ युक्तियुक्त सा नहीं लगता है। इसलिए मैंने निर्णय लिया कि इससे सम्बंधित एक वैबसाईट पोस्ट बनाई जाए, ताकि पाठकों को क्वोरा से इसकी ओर रिडायरेक्ट किया जा सके।

किसी को याद करना ही कुण्डलिनी जागरण है

तत्त्वतः तो ऐसा ही है। केवल याद करने के स्तर में ही भिन्नता होती है। कुण्डलिनी को इससे अधिक गहराई से याद नहीं किया जा सकता। जागरण की अवस्था में कुण्डलिनी दिल की गहराईयों में पूरी उतरी होती है। कुण्डलिनी जागरण के समय कुण्डलिनी आत्मा की गहराईयों में पूरी उतर चुकी होती है। वास्तव में कुण्डलिनी आत्मा से जुड़ जाती है। वह आत्मा से एकाकार हो जाती है। उस समय आत्मा उसे दूसरी वस्तु के रूप में नहीं देख पाता। उस समय आत्मा उसे अपने ही रूप में देखता है। आत्मा पूरी तरह से कुण्डलिनी-रूप बन जाता है। यहाँ याद किया गया व्यक्ति (गुर, देवता, प्रेमी आदि या सैद्धांतिक रूप से कुछ भी) ही कुण्डलिनी के रूप में होता है। आत्मा का अभिप्राय यहाँ आम आदमी का अपना निरपेक्ष व अंधकारमय स्वरूप है। वह रूप विचारों व अनुभवों से पूर्णतः रिक्त जैसा होता है। वह अंधकारमय शून्य जैसा होता है। वह माया या अज्ञान या भ्रम से ही अंधकारमय बना होता है। वास्तव में तो वह कुण्डलिनी की तरह ही प्रकाशमान होता है।

इसका मतलब है कि कुण्डलिनी-जागरण के समय आत्मा भी कुण्डलिनी के रूप में चमकने लगता है। इससे यह होता है की सभी कुछ अपने जैसा महसूस होने लगता है। कोई द्वैत नहीं रहता। सभी कुछ अद्वैत-रूप में प्रकाशित होने लगता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि कुण्डलिनी समेत सभी अनुभव स्वभाव से ही प्रकाशमान होते हैं। उस समय कुण्डलिनी के जुड़ने से आत्मा भी प्रकाशमान बन जाता है। विशाल अग्नि को अपनी एक लौ अपने से अलग कैसे लग सकती है? आत्मा को दुनिया के अनुभव / पदार्थ तब अपने से अलग लगते थे, जब वह कुण्डलिनी से नहीं जुड़ा था। उस समय उसे कुण्डलिनी भी अपने से अलग लगती थी। बेशक कुण्डलिनी का कितना ही ज्यादा ध्यान क्यों नहीं किया जाता था, कुछ न कुछ अलगाव तो उससे रहता ही था। एक अन्धकार से भरे कमरे को अपने अन्दर पैदा हुई एक आग की चिंगारी अपने जैसी कैसे लग सकती है? उसे तो वह अपने से अलग ही लगेगी न।

कुण्डलिनी जागरण आदमी को उसकी अपनी असली आत्मा की झलक दिखाता है। इससे वह योगसाधना आदि के निरंतर अभ्यास से उसे पूर्ण रूप से प्राप्त करने के लिए प्रेरित होता है।

कुण्डलिनी जागरण ज्यादा देर तक नहीं टिकता

कुण्डलिनी जागरण कुछ सेकंडों से ज्यादा समय तक नहीं झेला जा सकता। उस समय मस्तिष्क में विस्फोटक दबाव जैसा बना होता है। अधिकाँश मामलों में आदमी भय से या संकोच से कुण्डलिनी को स्वयं ही नीचे उतार देता है। यदि वह खुद न उतारे, तो कुछ देर में ही मस्तिष्क बहुत थक जाता है, और जागरण के अनुभव को खुद बंद कर देता है। फिर आदमी थकान के कारण आराम कर सकता है। संभवतः उसे नींद तो नहीं आती, क्योंकि वह उस समय आनंद, शान्ति, अद्वैत, और तनावहीनता से भरा होता है। उसका मस्तिष्क शून्य जैसा भी बन सकता है, जिसमें उसे विचार-शून्य असली आत्मा का अनुभव भी हो सकता है।

कुण्डलिनी जागरण की अवधि व्यक्ति के अभ्यास, मनोबल, शारीरिक बल, आयु, सामाजिक स्थिति आदि के ऊपर भी निर्भर कर सकती है। पर इसे एक मिनट से ज्यादा समय तक जारी रखना असंभव सा ही लगता है।

कुण्डलिनी जागरण के बारे में भ्रम

बहुत से लोग कुण्डलिनी-ध्यान को और प्राणोत्थान (कुण्डलिनी-उत्थान) को ही कुण्डलिनी जागरण समझ लेते हैं। यह भ्रम स्वाभाविक ही है, क्योंकि पूर्वोक्तानुसार सभी स्वभाव से समान ही हैं, और इन सभी स्थितियों में कुण्डलिनी का स्मरण या चिंतन विद्यमान होता है। केवल स्मरण के स्तर में ही अंतर होता है। साधारण कुण्डलिनी-ध्यान में यह स्मरण सबसे कम होता है। प्राणोत्थान में यह स्मरण और अधिक होता है। कुण्डलिनी-जागरण में यह सर्वोच्च होता है। जहां साधारण कुण्डलिनी ध्यान व प्राणोत्थान वाला कुण्डलिनी ध्यान लम्बे समय तक (घंटों से दिनों तक) लगातार जारी रखा जा सकता है, वहीँ कुण्डलिनी जागरण को एक मिनट से ज्यादा अवधि तक जारी नहीं रखा जा सकता। जहां साधारण कुण्डलिनी ध्यान और प्राणोत्थान वाले कुण्डलिनी ध्यान को अपनी इच्छा व अभ्यास से कभी भी पैदा किया जा सकता है, वहीँ कुण्डलिनी जागरण को इच्छानुसार पैदा नहीं किया जा सकता। कुण्डलिनी जागरण स्वयं होता है, और बिना बताए होता है। जब बहुत सी अनुकूल परिस्थितियाँ इकट्ठी होती हैं, तभी यह होता है। साथ में, इसको पैदा करने के लिए एक मानसिक झटका देने वाला उत्तेजक या उद्दीपक (ट्रिगर) भी होना चाहिए। वास्तव में आदमी इसके होने के बारे में कोई पूर्वानुमान नहीं लगा पता। यह तब होता है, जब आदमी को इसके होने के बारे में जरा भी अंदेशा नहीं होता। परन्तु साथ में यह भी सत्य है कि यह कुण्डलिनी ध्यान और प्राणोत्थान की अवस्था में ही होता है, और ये व्यक्तिगत व परिवेशीय परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न अरसे से (महीनों से लेकर वर्षों की अवधि तक) जारी रखे हुए होने चाहिए।

प्राणोत्थान के बारे में विस्तृत जानकारी निम्नलिखित पोस्ट पर पढ़ी जा सकती है।

प्राणोत्थान व कुण्डलिनी-जागरण के बीच में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है। दोनों के बीच में केवल अभिव्यक्ति के स्तर का ही अंतर है। इसीलिए कई अति महत्त्वाकांक्षी लोग प्राणोत्थान को ही कुण्डलिनी जागरण समझ लेते हैं। पूर्णता को प्राप्त प्राणोत्थान ही कुण्डलिनी जागरण कहलाता है …….

प्राणोत्थान- कुण्डलिनी जागरण की शुरुआत

कुंडली जागरण के वास्तविक समय के अनुभव को जानने के लिए निम्नलिखित वेबपेज पढ़ा जा सकता है।

शक्तिशाली फरफराहट के साथ, जैसे वह अनुभव ऊपर की ओर उड़ने का प्रयास कर रहा था। अतीव आनंद की स्थिति थी। वह आनंद एकसाथ अनुभव किए जा सकने वाले सैंकड़ों यौनसंबंधों से भी बढ़ कर था। सीधा सा अर्थ है कि इन्द्रियां उतना आनंद उत्पन्न कर ही नहीं सकतीं। मेरी कुण्डलिनी पूरी तरह से प्रकाशित होती हुई, सूर्य का मुकाबला कर रही थी …..

प्रेमयोगी वज्र अपनी उस समाधि(कुण्डलिनीजागरण/KUNDALINI AWAKENING) का वर्णन अपने शब्दों में इस प्रकार करता हैैं

अगली पोस्ट में हम यह बताएँगे कि कुण्डलिनी जागरण के लिए दिमाग में किन 5 चीजों का एकसाथ इकट्ठा होना जरूरी है।     

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Kundalini with proper sitting posture

Friends, I got a golden opportunity to visit Mata Vaishno Devi shrine a few days ago. I will tell you important things about it later on. But one thing that I found new was about sitting in a proper way. During that journey, my Kundalini was hitting the boom.

Keeping a straight back like a pole is not called a proper method of sitting

Earlier I used to understand that the back should be straight like a pole. It is not so actually. The normal bend in the back should remain at its full depth. The proper position of the back is like a snake, as I have described in detail in previous post. In this, a pit is formed on the back at lumbar region, in the direction of the navel. Then the back goes up outwardly. Finally, there is a bending of the head towards the inside. At level of the navel, the deeper the pit will be on the back, the more straight the back will be considered. This will create a stretch / spasm on a point on the lower back (on the hip), that is the Swadhisthana Chakra in the back, where the Kundalini will shine. In fact, the Kundalini will shine well on all the chakras of such back. By meditating on the back as a snake, this stretch manifests with Kundalini on each chakra. An upward stretch is also felt.

Learn to sit properly from the car’s driving seat

The driving seat (bucket seat) of most modern cars is like a tight body fit. It has to fit the body in minimum space. According to physiology, more the man keeps his back in its natural posture, the more the muscle tone (strength) of his body will increase. Together, healthy breath / abdominal breath will also improve. With this, he will be able to adjust his body, especially his longer legs, well and comfortably even in a small space.

My kundalini on driving seat

I had a medium sized car. The car was the best, but its driving seat seemed to me somewhat tight. With a natural and compensatory process / inspiration, I kept my back straight on that seat. I started placing a folded towel in the pit area of ​​the lumbar region of my back as said above. That towel used to support that pit, and I also experienced the pleasant touch of the pit. At that pit point, my Kundalini used to shine very much, which used to run on all the chakras from Sahasrara to Muladhar often. There was a lot of bliss, peace, and the real driving was the same. I used to feel like I fit in the cockpit of a fighter plane. Initially, I thought that why I had bought an expensive car with a tight seat, but later the reality was revealed. Perhaps influenced by the same seating, I was inspired to start practicing Kundalini Yoga.

Unique Kundalini Yoga with the help of a good chair-table

An appropriately-sized chair is very beneficial, in which the entire back can remain stable throughout the depth of its natural position. Lumbar support of proper bulge should be in proper place. It should have headrest in proper place. The headrest should be almost straight up the neck. A slight tilt can be given backwards. In fact, the back on the chair should be perfectly aligned with a snake raising its hood. Arms rest should be at the height where the elbow of the straight arm is located. They should be straight forward. The legs should climb towards the knees, so that the level of the knees is higher than the level of the hip. Many people say that it causes knee pain. To avoid this, the slopes of the legs can be reduced slightly, or the knees can be strengthened with exercises. The legs should not extend forward, as this worsens the natural shape of the back. The more the legs have shrunk towards the body, the more robust the natural back will be. The car’s thoughtfully made driving seat is similar to this. With this posture, man remains most alert and mindful. Kundalini is also strengthened by this posture. It also proves that with Kundalini, a man becomes alert, contemplative and developing.

Now let’s talk about the table. Good if there is an adjustable height table. The table should be at such a height so that the natural position of the back does not deteriorate, and there is no burden on the eyes while reading the book on it. This height is straight up to the level of the elbow. The chair is also better if it is adjustable / hydraulic.

A similar incident happened with Premyogi vajra. He made the above type of chair and table fit into a small room. It was light, inexpensive, improvised, old-fashioned and made of tin. Nevertheless, it developed a proper posture of his back. He would sit on it day and night and study continuously. From that, his study also reached to peak, and also his Kundalini.

Scientific basis for proper back seating

Possibly, sitting with a natural back makes the spine completely relaxed and efficient. All sensations travel up and down through the spine/spinal cord. Scientifically, Kundalini is the supreme sensation of the body.

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