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कुंडलिनी-ध्यानचित्र का वाममार्गी तांत्रिक यौनयोग में महत्त्व

मित्रो, मैं इस पोस्ट में शिवपुराण में वर्णित राक्षस अंधकासुर, दैत्यगुरु शुक्राचार्य, देवासुर संग्राम और शिव के द्वारा देवताओं की सहायता का रहस्योदघाटन करूंगा।

शिवपुराणोक्त अन्धकासुर कथा

एक बार भगवान शिव पार्वती के साथ काशी से निकलकर कैलाश पहुंचते हैं, और वहाँ भ्रमण करने लगते हैं। एकदिन शिव ध्यान में होते हैं कि तभी देवी पार्वती पीछे से आकर उनके मस्तक पर हाथ रखती हैं, जिससे शिव के माथे की गर्मी से उनकी अंगुली से एक पसीने की बूंद जमीन पर गिर जाती है। उससे एक बालक का जन्म होता है, जो बहुत कुरूप, रोने वाला और अंधा होता है। इसलिए उसका नाम अंधकासुर रखा जाता है। उधर राक्षस हिरण्याक्ष पुत्र न होने से बहुत दुखी रहता है। वह शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तप करता है, और उनसे पुत्र-प्राप्ति का वर मांगता है। शिव अंधक को उसे सौंप देते हैं। वह शिवपुत्र अंधक की प्राप्ति से अति प्रसन्न और उत्साहित होकर स्वर्ग पर चढ़ाई कर देता है, जिससे देवता स्वर्ग से भागकर धरती पर छिप कर रहने लगते हैं। वह धरती को समुद्र में डुबोकर पाताल लोक में छुपा देता है। फिर भगवान विष्णु देवताओं की सहायता करने के लिए वाराह के रूप में अवतार लेकर हिरण्याक्ष को मार देते हैं और धरती को अपने दाँतों पर रखकर पाताल से ऊपर उठाकर पूर्ववत यथास्थान रख देते हैं। उधर बालक अंधक जब अपने भाई प्रह्लाद आदि अन्य राक्षस बालकों के साथ खेल रहा होता है, तो वे उसे यह कह कर चिढ़ाते हैं कि वह अंधा और कुरूप है इसलिए वह अपने पिता हिरण्याक्ष की जगह राजगद्दी नहीं संभाल सकता। इससे अन्धक दुखी होकर भगवान शिव को खुश करने के लिए घोर तप करने लगता है। वह धुएं वाली अग्नि को पीता है, अपने मांस को काटकाट कर हवनकुण्ड में हवन करता है। इससे वह हड्डी का कंकाल मात्र बच जाता है। शिवजी उससे प्रसन्न होकर उसके मांगे वर के अनुसार उसे बिल्कुल स्वस्थ व आँखों वाला कर देते हैं, और कहते हैं कि वह केवल तभी मरेगा जब किसी महान योगी की पतिव्रता स्त्री को अपनी स्त्री बनाने का प्रयास करेगा। वर से खुश और दंभित होकर अन्धक उग्र भोगविलास में डूब जाता है, अनेकों कामिनियों के साथ विभिन्न रतिवर्धक स्थानों में रमण करता है, और अपनी आयु का दुरुपयोग करता है। वह साधुओं और देवताओं पर भी बहुत अत्याचार करता है। वे सब इकट्ठे होकर भगवान शिव के पास जाते हैं। शिव उनकी मदद करने के लिए कैलाश पर पार्वती के साथ विहार करने लगते हैं। एकदिन अन्धक के सेवक की नजर देवी पार्वती पर पड़ती है, और वह यह बात अन्धक को बताता है। अंधक पार्वती पर आसक्त होकर शिव को गंदा तपस्वी, जटाधारी आदि कह कर उनका अपमान करता है और कहता है कि उतनी सुंदर नारी उसी के योग्य है, न कि किसी तपस्वी के। फिर वह सेना के साथ शिव से युद्ध करने चला जाता है। उसे शिव का गण वीरक अकेले ही युद्ध में हरा कर भगा देता है, और उसे शिवगुफा के अंदर प्रविष्ट नहीं होने देता। फिर शिव पाशुपत मंत्र प्राप्त करने के लिए दूर तप करने चले जाते हैं। मौका देखकर अंधक फिर हमला करता है। पार्वती अकेली होती है गुफा में। उसे वीरक भी नहीं रोक पा रहा होता है। डर के मारे पार्वती सभी देवताओं को सहायता के लिए बुलाती है, जो फिर स्त्री रूप में अस्त्रशस्त्र लेकर पहुंच जाते हैं। स्त्री रूप इसलिए क्योंकि देवी के कक्ष में पुरुष रूप में जाना उन्हें अच्छा नहीं लगता। घोर युद्ध होता है। अंधक का सैनिक विघस सूर्य चन्द्रमा आदि देवताओं को निगल जाता है। चारों ओर अंधेरा छा जाता है। हालांकि वे किसी दिव्य मंत्र के जाप से उसके मुंह में घूँसे मारकर बाहर भी निकल आते हैं। तभी शिव भी वहाँ पहुँच जाते हैं। उससे उत्साहित गण राक्षसों को मारने लगते हैं। पर राक्षस गुरु शुक्राचार्य अपनी संजीवनी विद्या से सभी मृत राक्षसों को पुनर्जीवित कर देते हैं। शिव को यह बात शिवगण बता देते हैं कि शुक्राचार्य उनकी दी हुई विद्या का कैसे दुरूपयोग कर रहा है। इससे नाराज होकर शिव उसे पकड़ कर लाने के लिए नंदी बैल को भेजते हैं। नंदी राक्षसों को मारकर उसे पकड़कर ले आता है। शिव शुक्राचार्य को निगल जाते हैं। वह शिव के उदर में बाहर निकलने का छेद न पाकर चारों तरफ ऐसे घूमता है, जैसे वायु के वेग से घूम रहा हो। वह वहाँ से निकलने का वर्षों तक प्रयास करता है, पर निकल नहीं पाता। फिर शिव उसे शुक्र अर्थात वीर्य रूप में अपने लिंग से बाहर निकालते हैं। इसीलिए उनका नाम शुक्राचार्य पड़ा।

दरअसल संजीवनी विद्या उन्हें एक बहुत पुराने समय में शिव ने दी होती है। वह एक बहुत सुंदर स्थान पर शिव का लिंग स्थापित करते हैं। उस पर वे शिव की कठिन अराधना करते हैं। अग्निधूम को पीते हैं, और कठिन तप करते हैं। उससे शिव लिंग से प्रकट होकर उन्हें संजीवनी विद्या देते हैं, और वर देते हैं कि वे भविष्य में उनके उदर में प्रविष्ट होकर उनके वीर्य रूप में जन्म लेंगे। वे लिंग का नाम शुक्रेश और उनके द्वारा स्थापित कुएँ का नाम शुक्रकूप रख देते हैं। वे भक्तों द्वारा उस कूप में स्नान करने का अमित फल बताते हैं।

अंधकासुर कथा का कुंडलिनी-आधारित विश्लेषण

शुक्र मतलब ऊर्जा या तेज। शुक्र, ऊर्जा और तेज तीनों एकदूसरे के पर्याय हैं। शुक्राचार्य को निगल गए, मतलब योगी शिव ने खेचरी मुद्रा में जिह्वा तालु से लगाकर कुंडलिनी ऊर्जा को आगे के नाड़ी चैनल से नीचे उतारा, जिससे वीर्यशक्ति के रूपान्तरण से निर्मित कुंडलिनी ऊर्जा मूलाधार चक्र से पीठ की सुषुम्ना नाड़ी से होते हुए ऊपर चढ़ गई। वायु के वेग से वे इधरउधर भटकने लगे, मतलब साँसों की गति से कुंडलिनी ऊर्जा माइक्रोकोस्मिक औरबिट लूप में गोल-गोल घूमने लगी। शुक्राचार्य को बहुत समय तक घुमाने के बाद योगी शिव ने उन्हें वीर्य मार्ग से बाहर निकाल दिया, मतलब बहुत समय तक शक्ति को चक्रोँ में घुमाते हुए व उससे चक्रोँ पर इष्ट देव या गुरु आदि के रूप में कुंडलिनी चित्र का ध्यान करने के बाद जब वह शक्ति क्षीण होने लगी मतलब शुक्राचार्य शिथिल पड़ने लगे, तब उसे वीर्यरूप में बाहर निकाल दिया। उन्हें योगी शिव ने पुत्र रूप में स्वीकार किया, मतलब कि जिसे ओशो महाराज कहते हैं, ‘संभोग से समाधि’, वह तरीका अपनाया। इस यौनतंत्र में सहस्रार चक्र के समाधि चित्र को स्खलन-संवेदना के ऊपर आरोपित किया जाता है। इससे वही बात हुई जैसी एक पिछली पोस्ट में लिखी गई है कि गंगा नदी के किनारे पर उगी सरकंडे की घास पर शिववीर्य से बालक कार्तिकेय का जन्म हुआ, मतलब शुक्राचार्य ने कार्तिकेय के रूप में शिवपुत्रत्व प्राप्त किया। उपरोक्त कथा के ही अनुसार सबसे प्रसिद्ध, प्रिय व शक्तिशाली लिंग शुक्रलिंग ही माना जाएगा, क्योंकि यह पूरी तरह से असली है, अन्य तो प्रतीतात्मक ज्यादा हैं, जैसे कोई पाषाणलिंग होता है, कोई पारदलिंग, तो कोई हिमलिंग आदि। शुक्रकूप आसपास में एक ठंडे जल का कुआँ है, जो संभोगतंत्र में सहयोगी है, क्योंकि जैसा एक पिछली पोस्ट में दिखाया गया है कि कैसे ठंडे जल से स्नान यौनऊर्जा को गतिशील व कार्यशील बनाने का काम करता है।

शुक्राचार्य जो राक्षसों को जिन्दा कर रहे थे, उसका यही मतलब है कि वीर्यशक्ति बाह्यगामी होने के कारण संसारमार्गी मानसिक दोषों, आसक्तिपूर्ण भावनाओं और विचारों को बढ़ावा दे रही थी। शिव ने नंदी को शुक्राचार्य को पकड़ कर लाने को कहा, इसका मतलब है कि नंदी अद्वैत भाव का परिचायक है क्योंकि वह एक ऐसा शिवगण है जिसमें बैल के रूप में पशु और गण के रूप में मनुष्य एक साथ विद्यमान है। वह एक यिन-यांग मिश्रण है। अद्वैत से कुंडलिनी शक्ति को मूलाधार से ऊपर चढ़ने में मदद मिलती है।

देवी पार्वती ने महादेव शिव की आँखें बंद कीं, इससे वे अंधे जैसे हो गए। इसको यह समझाने के लिए कहा गया है कि कोई भावी योगी अज्ञान वाली अवस्था में था, न तो उसे लौकिक व्यवहार का ज्ञान था, और न ही आध्यात्मिक ज्ञान। फिर वह इश्कविश्क़ के चक्कर में पड़ गया। उससे उसकी शक्ति तो घूमने लगी, पर वह बिना कुंडलिनी चित्र के थी। कुंडलिनी चित्र माने ध्यान चित्र आध्यात्मिक ज्ञान की उच्चावस्था में बनता है। आध्यात्मिक ज्ञान लौकिक ज्ञान व अनुभव के उत्कर्ष से प्राप्त होता है। ऐसा होने में जीवन का लम्बा समय बीत जाता है। ज्ञानविज्ञानरहित प्यार-मोहब्बत से क्या होता है कि आदमी यौन शक्ति को ढंग से रूपान्तरित और निर्देशित नहीं कर सकता, जिससे उसका क्षरण या दुरुपयोग होता है। वही दुरुपयोग अंधक नाम वाला पुत्र है। इसका सीधा सा अर्थ है कि अमुक भावी योगी ने शक्ति को घुमाया तो जरूर। ऐसा उक्त कथानक की इस बात से सिद्ध होता है कि पार्वती ने दोनों नेत्रों को एकसाथ बंद किया, मतलब यिन-यांग संतुलित हो गए। पर परिपक्वता की कमी से इस संतुलन से किंचित चमक रहे कुंडलिनी चित्र को समझ नहीं पाया और उसे जानबूझकर व्यर्थ समझ कर त्याग दिया। चमक बुझने से स्वाभाविक है कि अंधेरा छा गया, जिसे आँखों को बंद करने के रूप में दिखाया गया है। क्योंकि शक्ति से मस्तिष्क में जो उच्च स्पष्टता के साथ छवि बनती है, उसे ही पुत्र कहा जाता है, जैसे कि इस ब्लॉग की एक पोस्ट में सिद्ध भी किया गया था। बिना किसी भौतिक सहवास के असली या भौतिक पुत्र तो पैदा हो ही नहीं सकता, वह भी मिट्टी-पत्थर से भरी जमीन के ऊपर या सरकंडों के ऊपर। क्योंकि इस पोस्ट के भावी योगी के मस्तिष्क में उस शक्ति से अंधेरा ही घनीभूत हुआ, इसलिए उसे पुत्र अंधक के रूप में दिखाया गया। चूंकि अँधेरे से भरा व्यक्ति किसी को प्रिय व कार्यक्षम नहीं लगता, इसलिए इसे ऐसा दिखाया गया है कि वह अंधकासुर सबको अप्रिय था और उसके बालमित्र उसे राजगद्दी के अयोग्य बताकर उसका मजाक उड़ाते थे। स्वाभाविक है कि भावी योगी दुनिया में सम्मान, सुखसमृद्धि और यहाँ तक कि जागृति के रूप में सम्पूर्णता को प्राप्त करने के लिए भरपूर प्रयास करता है, क्योंकि उसमें बहुत शक्ति होती है, केवल स्थिर ध्यानचित्र की ही कमी होती है। उसे दुनिया में ठोकरें खाने के बाद इस कमी का अप्रत्यक्ष अहसास हो ही जाता है, इसलिए वह कुंडलिनी ध्यानयोग के लिए एकांत में चला जाता है। इसे ही ऐसे दिखाया गया है कि अंधक फिर वन में जाकर शिव या ब्रह्मा का ध्यान करते हुए घोर तप करता है। अपने मांस को टुकड़ों में काटकाट कर वह उन्हें अग्नि में होम करता रहता है। साथ में अग्निधूम का पान करता है। इसका मतलब है कि भावी योगी कठिन हठयोग करता है, जिससे उसकी अतिरिक्त चर्बी तो घुलती ही है, साथ में मांसल शरीर भी योगाग्नि से जलकर दुबला हो जाता है। इस दहन से जो कार्बन डायक्साइड गैस निकलती है, उसे ही धुआँ कहा है। क्योंकि योग में अक्सर सांस को अंदर रोक कर रखा जाता है, इसलिए उसे ही धुएं को पीना कहा गया है। जब वह इतना कमजोर हो जाता है कि वह हड्डी का ढांचा जैसा दिखने लगता है, तब भगवान शिव उसे दर्शन दे देते हैं। इसका मतलब है कि जब हठयोगाभ्यास करते हुए काफी समय हो जाता है, जिससे योगी को अपने सहस्रार चक्र में बढ़ी हुई सात्विकता के कारण अपना शरीर अस्थिपंजर की तरह हल्का लगने लगता है, तब कुंडलिनी जागृत हो जाती है। मतलब अदृश्य या सुप्त कुंडलिनी शक्ति मानसिक शिवचित्र के रूप में जागृत हो जाती है। अब शिव अंधक को बिल्कुल स्वस्थ व सुंदर बना देते हैं। ठीक है, कुंडलिनी जागरण से ऐसा ही अकस्मात और सकारात्मक रूपान्तरण होता है। अब वह शिव से वर मांगता है कि वह कभी न मरे। शिव कहते हैं कि ऐसा सम्भव नहीं। विश्व की रक्षा के लिए भी यह जरूरी है। अमरता पाकर तो कोई भी अत्याचारी बनकर दुनिया को तबाह कर सकता है, क्योंकि उसे रोकने व डराने वाला कोई नहीं होगा। इसलिए ब्रह्मा उससे कोई न कोई मौत का कारण चुनने को कहते हैं, बेशक वह असम्भव सा ही क्यों न लगे। इस पर ब्रह्मा कहते हैं कि जब वह माँ के समान आदरणीय महिला को पत्नि बनाना चाहेगा, वह तब मरेगा। अब ये तंत्र की गूढ़ बातें हैं, जिनके यदि रहस्य से पर्दा उठाया जाए, तो आम जनमानस को अजीब लग सकता है। तिब्बतन यौनतंत्र में गुरु की यौनसाथी उनकी अनुमति से उनके शिष्यों को तांत्रिक यौनकला प्रयोगात्मक रूप में सिखाती है। गुरुपत्नि को माँ के समान माना गया है। मतलब कि तांत्रिक यौनयोग सीखने के बाद अंधक अंधी दुनियादारी से उपरत होकर अपनी आत्मा या अपने आप में शांत हो जाएगा, मतलब वह एक प्रकार से मर जाएगा। बाद में हुआ भी वैसा ही, मरने के बाद उसे शिव ने अपना गण बना लिया, मतलब वह मुक्त हो गया। आम मृत्यु के बाद तो कोई मुक्त नहीं होता। इसका एक मतलब यह भी है कि जब विवाह या सम्भोग के अयोग्य सम्मानित नारी से प्यार होता है, तब उसका रूप बारबार मन में आने लगता है, जिससे वह समाधि का रूप ले लेता है, जैसा कि प्रेमयोगी वज्र के साथ भी हुआ था। ब्रह्मा के वर को पाकर अन्धक राजा बन गया, और बहुत अय्याश हो गया। सुंदर व सुडोल शरीर तो उसे मिला ही था, इसलिए वह अनगिनत कामिनियों के साथ विभिन्न मनोहर स्थानों में रमण करते हुए अपना बहुमूल्य समय नष्ट करने लगा। इस यौन शक्ति के बल से वह बहुत पाप भी करने लगा। देवताओं को स्वर्ग से भगा कर वहाँ खुद राज करने लगा। जब कोई बुरे काम करेगा तो शरीर रूपी स्वर्ग में स्थित देवता दुखी होकर भागेंगे ही, क्योंकि देवताओं का मुख्य उद्देश्य है शरीर से अच्छे काम करवाना। अब मैं इससे जुड़ी हाल की घटना बताता हूँ और फिर पोस्ट को खत्म करता हूँ क्योंकि नहीं तो यह बहुत लंबी होकर पढ़ने में मुश्किल हो जाएगी। अगले हफ्ते तक शेष कथा के रहस्य को उजागर करने की कोशिश करूंगा, क्योंकि अभी मैं लगभग इतना ही समझ सका हूँ। हो सकता है कि आप मेरे से पहले उजागर कर दें, यदि ऐसा है तो कमेंट बॉक्स में जरूर लिखना।

आफताब-श्रद्धा से जुड़ा बहुचर्चित लवजिहाद काण्ड

आजकल बहुचर्चित आफताब पूनावाला से संबंधित मर्डर मिस्ट्री उपरोक्त अंधक कथा से बहुत मेल खा रही है। सूत्रों के अनुसार वह मुस्लिम युवक श्रद्धा नामक हिंदु लड़की के साथ लिव इन रिलेशनशिप में था। वह डेटिंग ऐप के माध्यम से अपना घरपरिवार छोड़कर उसके साथ लम्बे अरसे से रह रही थी। कई मकान मालिकों को तो वह उसे अपनी पत्नि तक बता कर साथ रखता था, क्योंकि यहाँ के परिवेश में लिव इन रिलेशनशिप को अच्छा नहीं समझा जाता। चोरी छुपे उसके 20 अन्य हिंदु लड़कियों के साथ भी प्रेमसंबंध थे। श्रद्धा को शायद यह बात पता चली होगी और वह उसे ऐसा करने से रोककर उससे शादी करना चाहती होगी। इसको लेकर झगड़े भी हुए और मारपीट भी। अंततः उसने उसका गला दबाकर हत्या कर दी और बिना अफ़सोस के उसके पेंतीस टुकड़े करके उन्हें फ्रिज में पैक कर दिया। धीरेधीरे करके वह उन्हें निकट के जंगल में फ़ेंकता रहा। छः महीने बाद श्रद्धा के पिता द्वारा लिखी शिकायत के बाद पुलिस उसे पकड़ सकी। यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि आज की तथाकथित आधुनिक महिलाओं को प्रसन्न करने के लिए कैसे आफताब की तरह शातिर, बेईमान, नशेड़ी, धूम्रपानी, मांसभक्षी, हिंसक और धोखेबाज बनना पड़ता है, हालाँकि ऐसे अतिवाद को कोई सभ्य व पढ़ालिखा समाज कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता, जिसमें मानवता का हनन होता हो। दूसरी ध्यान देने योग्य बात यह है कि बहुत से हिन्दुओं द्वारा शिवपुराण का कहीं गलत अर्थ तो नहीं निकला जा रहा, या बिना जानेबूझे कहीं वैसी विकृत सोच अवचेतन मन में तो नहीं बैठी हुई है। पुराण से प्राप्त आम धारणा के अनुसार महादेव शिव बिना कुलपरम्परा वाले एक भूतिया किस्म के आदमी थे, जिनको पति रूप में पाने के लिए पार्वती कई जन्मों तक घरपरिवार को छोड़कर भटकती रही। पति-पत्नि के परस्पर प्रेम को परवान चढ़ाने के लिए कुछ हद तक ऐसा पागलपन ठीक भी है, पर वह भी कुछ जरूरी शर्तों के साथ ही पूरा सफल होता है, और वैसे भी अति तो कहीं भी अच्छी नहीं है, ख़ासकर उस कौम के व्यक्ति के साथ तो बिल्कुल भी संबंध अच्छा नहीं है, जिनके तथाकथित लवजिहाद से जुड़े जालिमपने और जाहिलियत के उदाहरण आए दिन मिलते रहते हैं। सब पता होते हुए भी बारम्बार गलती करना तो ऐसा लगता है कि या तो परिवार में बच्चों को सही व संस्कारपूर्ण शिक्षा नहीं दी जा रही या ऐसी लड़कियों के ऊपर जादूटोना कर दिया गया है, या यह हिन्दुओं के पवित्र और ज्ञानविज्ञान से भरे शास्त्रों और पुराणों को बदनाम करने की एक सोचीसमझी और बहुत बड़ी साजिश चल रही है। कई लोग सख्त कानून की कमी को भी मुख्य वजह बता रहे हैं। कुछ लोग विकृत दूरदर्शन, ऑनलाइन व बॉलीवुड कल्चर को भी बड़ी वजह मानते हैं। कई लोग लिव इन रिलेशनशिप और डेटिंग एप्स को दोष दे रहे हैं। इससे हिंदु पुरुषों को भी शिक्षा लेनी चाहिए और महिलाओं की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश करनी चाहिए। जिसके अंदर ध्यान-कुंडलिनी चित्र नहीं है, यदि वह भी यौनतंत्र का अभ्यास करे, तो उसका हाल भी अंधक जैसा हो सकता है, जैसा आपने ऊपर पढ़ा, फिर यदि जिसको यौनतंत्र का कखग भी पता नहीं, यदि वह यौनसंबंधों के मामले में मनमर्जी करे, तो उसका उससे भी कितना बुरा हाल हो सकता है, यह उपरोक्त हाल की घटना से प्रत्यक्ष देखने को मिल रहा है।

प्रेमरोग से बचने का बेजोड़ उपाय

दोस्तों, इस समस्या का हल भी है। सौभाग्य से आज “शरीरविज्ञान दर्शन~एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र(एक योगी की प्रेमकथा)” नामक पुस्तक ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से उपलब्ध है। यह ईबुक के रूप में भी और प्रिंट पुस्तक के रूप में भी उपलब्ध है। इसमें ऐसा लगता है कि शिवपुराण का विवेचन आधुनिक शैली में किया गया है, जो हर किसी को समझ आ जाए, और उसके बारे में गलतफहमी दूर हो जाए। यह सत्य जीवनी और सत्य घटनाओं पर आधारित है। इसमें आधारभूत यौनयोग पर सामाजिकता के साथ प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक में स्त्री-पुरुष संबंधों का आधारभूत सिद्धांत भी छिपा हुआ है। यदि कोई प्रेमामृत का पान करना चाहता है, तो इस पुस्तक से बढ़िया कोई भी उपाय प्रतीत नहीं होता। इस पुस्तक में प्रेमयोगी वज्र ने अपने अद्वितीय आध्यात्मिक व तांत्रिक अनुभवों के साथ अपनी सम्बन्धित जीवनी पर भी थोड़ा प्रकाश डाला है। इस उपरोक्त “शरीरविज्ञान दर्शन” पुस्तक को एमाजोन डॉट इन पर एक गुणवत्तापूर्ण व निष्पक्षतापूर्ण समीक्षा में पांच सितारा, सर्वश्रेष्ठ, सबके द्वारा अवश्य पढ़ी जाने योग्य व अति उत्तम (एक्सेलेंट} पुस्तक के रूप में समीक्षित किया गया है। गूगल प्ले बुक की समीक्षा में भी इसे फाईव स्टार व शांतिदायक (कूल) आंका गया है। कुछ गुणग्राही पाठक तो यहाँ तक कहते हैं कि अगर इस पुस्तक को पढ़ लिया तो मानो जैसे सबकुछ पढ़ लिया। आशा है कि पुस्तक पाठकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरेगी।

Kundalini-Dhyanchitra’s importance in Left-way Tantric Sexual Yoga

Friends, in this post, I will demystify the story of helping gods by Lord Shiva to eliminate the demon Andhakasur, Daityaguru Shukracharya, and Devasur Sangram in Shivpuran.

Andhakasur story from Shiv Puran

Once Lord Shiva leaves Kashi with Parvati and reaches Kailash, and starts traveling there. One day Shiva was in meditation when Goddess Parvati came from behind and placed her hand on his forehead closing his both eyes, causing a drop of sweat from her finger to fall on the ground due to the heat of Shiva’s forehead. A child is born from that drop, who is very ugly, cries and is blind. That’s why he is named Andhakasura. On the other hand, the demon Hiranyaksha remains very sad for not having a son. He does severe penance to please Shiva, and asks him for the boon of having a son. Shiva hands over Andhak to him. Overwhelmed and excited by the attainment of Andhak, the son of Shiva, he ascends to heaven, due to which the deities run away from heaven and hide on earth. He hides the earth in the underworld by submerging it in the ocean. Then Lord Vishnu incarnates as Varaha to help the deities, kills Hiranyaksha and by keeping the earth on his teeth, lifts it up from the underworld and puts it back in place. On the other hand, when the boy Andhak is playing with his brother Prahlad etc. other demon children, they tease him by saying that he is blind and ugly, so he cannot handle the throne in place of his father Hiranyaksha. Saddened by this, Andhak starts doing great penance to please Lord Shiva. He drinks the smoky fire, cuts his flesh and offers it in the fire pit. From this he remains merely a skeleton. Shivji is pleased with him and makes him completely healthy and full of eyes according to his demand, and says that he will die only if he tries to make a great yogi’s wife his wife. Pleased and proud of the boon, Andhaka drowns in furious enjoyment, enjoys with many courtesans in various sex-enhancing places, and misuses his age. He also tortures a lot on sages and gods. They all gather together and go to Lord Shiva. To help them, Shiva begins to visit Kailash with Parvati. One day the eyes of Andhak’s servant fall on Goddess Parvati, and he tells this to Andhak. Being enamored of Parvati, Andhak insults Shiva by calling him dirty ascetic, jatadhari etc. and says that such a beautiful woman is worthy of him and not of any ascetic. Then he goes to fight with Shiva with the army. Shiva’s Gana Veerak single-handedly defeats him in the war and chases him away, and does not allow him to enter the Shivgufa. Then Shiva goes away to do penance to get Pashupat Mantra. Seeing the opportunity, Andhak attacks again. Parvati is alone in the cave. Even Veerak is not able to stop him. Out of fear, Parvati calls all the gods for help, who then arrive in female form with weapons. Female form because they do not like going to the room of the goddess in male form. There is a fierce battle. Vighas, the soldier of Andhak, swallows the deities like Sun, Moon etc. There is darkness all around. However, by chanting some divine mantra, they also come out by punching him in the mouth. Only then Shiva also reaches there. Enthused by him, the ganas start killing the demons. But demon guru Shukracharya revives all the dead demons with his Sanjivani Vidya. Shivgan tells this to Shiva that how Shukracharya is misusing the knowledge given by him. Enraged by this, Shiva sends Nandi the bull to capture him. Nandi kills the demons and captures him and brings him. Shiva swallows Shukracharya. Not finding an exit hole in Shiva’s abdomen, it moves around like it is moving with the speed of the wind. He tries for years to get out of there, but cannot get out. Then Shiva takes him out of his linga in the form of Shukra i.e. semen. That’s why he was named Shukracharya.

Actually Sanjivani Vidya was given to him by Shiva in a very old time. He installs Shiva’s linga at a very beautiful place. On that he worships Shiva hard. He drinks the smoke of fire, and do severe penance. Appearing from him, Shiva gives him Sanjivani Vidya, and gives him a boon that he will be born in his semen form by entering his abdomen in future. He names the linga as Shukresh and the well established by him as Shukrakoop. He tells the immense results of the devotees taking a bath in that well.

Kundalini-Based Analysis of the Andhakasur Story

Shukra means energy or speed. Venus or Shukra, semen, Energy and Tej all these are synonymous with each other. Shukracharya was swallowed, which means Yogi Shiva lowered the Kundalini energy down the front nadi channel by touching the tongue to the palate in Khechari Mudra, so that the Kundalini energy created from the transformation of semen energy ascended from the Mooladhara Chakra through the Sushumna nadi of the back. With the velocity of the wind, he started wandering here and there, which means, with the speed of breath, the Kundalini energy started moving round and round in the microcosmic orbit loop. After rotating Shukracharya for a long time, Yogi Shiva took him out through the seminal path, that is, after rotating the Shakti in the chakras for a long time and meditating on the Kundalini picture in the form of Ishta Dev or Guru etc. on the chakras, when he Shakti starts to weaken means Shukracharya is getting exhausted, then he was thrown out in the form of semen. He was accepted as a son by Yogi Shiva, which means he adopted what Osho Maharaj calls, ‘Samadhi from intercourse’. In this sexual tantra, the samadhi picture in the Sahasrar Chakra is superimposed on the ejaculation-sensation. This resulted in the same thing as written in a previous post that the child Kartikeya was born from Shivvirya on the reed grass growing on the banks of river Ganga, meaning Shukracharya attained the sonship of Shiva like Kartikeya. According to the above story, Shukralinga will be considered as the most famous, dear and powerful linga, because it is completely real, others are more apparent, like some ara stone linga, some pardalinga, some snow linga etc. Shukrakoop is a well of cold water nearby, which is helpful in the sexual tantra, because as shown in a previous post, how bathing with cold water works to make sexual energy dynamic and functional.

The fact that Shukracharya was reviving the demons means that the semen energy, being going external, was promoting worldly mental defects, attached feelings and thoughts. Shiva asked Nandi to catch Shukracharya, it means that Nandi is the personification of Advaita Bhava because he is such a Shivgana in which animal in the form of bull and man in the form of Gana exist together. It is a yin-yang mixture. Advaita helps Kundalini Shakti to rise up from Muladhara.

Goddess Parvati closed the eyes of Mahadev Shiva, due to which he became blind. This is said to explain that a prospective yogi was in a state of ignorance, having neither knowledge of worldly behavior, nor spiritual knowledge. Then he fell in love with Ishqvishq. Due to this his shakti started rotating, but she was without Kundalini picture. Kundalini picture means meditation picture is made in the higher state of spiritual knowledge. Spiritual knowledge is obtained from the culmination of worldly knowledge and experience. A long time of life passes in this happening. What happens with unscientific love is that man cannot transform and direct the sexual power in a positive manner that leads to its degradation or misuse. The same abuse has a son named Andhak. It simply means that such and such a future Yogi must have rotated the Shakti. This is proved by the above story that Parvati closed both the eyes together, which means Yin-Yang got balanced. But due to lack of maturity, he could not understand the constant translucent picture of any form associated with Kundalini shakti shining slightly from this balance and intentionally abandoned it considering it useless. The extinguishing of the brightness naturally resulted in darkness, which is shown as the closing of the eyes. Because the image that is formed in the brain with high clarity by shakti is called son, as was also proved in one of the posts of this blog. Without any physical intercourse, a real or physical son cannot be born, that too on the ground full of mud and stones or on the reeds. Because of that spiritual power or shakti only darkness got concentrated in the mind of the future yogi of this post, hence he was shown as the shiva-son Andhak. Since a person full of darkness is not liked and considered efficient by anyone, it is shown that he was unpleasant to everyone and his childhood friends used to make fun of him by calling him unworthy of the throne. It is natural that the future Yogi tries his best to achieve perfection in the world in the form of respect, happiness and even awakening, because he has a lot of energy, only he lacks a steady meditation picture. He gets an indirect feeling of this deficiency after stumbling in the world, so he goes into solitude for Kundalini meditation. This is shown in such a way that the blind then goes to the forest and meditates on Shiva or Brahma and does intense penance. Cutting his flesh into pieces, he goes on offering them to the fire. Along with this, he drinks the smoke of fire. This means that the future Yogi does hard Hatha Yoga, which not only dissolves his extra fat, but also makes the muscular body lean by burning with the fire of Yoga. The carbon dioxide gas that comes out from this combustion is called smoke. Because the breath is often held inside in yoga, that is why it is called drinking the smoke. When he becomes so weak that he looks like a bone frame, Lord Shiva appears to him. This means that after practicing Hatha Yoga for a long time, the Yogi feels his body as light as a skeleton due to the increased sattvikta or holiness in his Sahasrara Chakra, then the Kundalini is awakened. Means the invisible or dormant Kundalini Shakti awakens in the form of a mental image of Shiva. Now Shiva makes Andhak completely healthy and beautiful. Well, such a sudden and positive transformation happens with Kundalini awakening. Now he asks Shiva for a boon that he should never die. Shiva says that this is not possible. It is also necessary to protect the world. After attaining immortality, anyone can destroy the world by becoming a tyrant, because there will be no one to stop and scare him. That’s why Brahma asks him to choose one or the other cause of death, no matter how impossible it may seem. On this Brahma says that when he wants to marry a woman as respected as his mother, then he will die. Now these are the mysterious things of Tantra, if the secret of which is revealed, then the general public may find it strange. In Tibetan sex tantra, the master’s sexual partner teaches tantric sex arts to his disciples practically with his permission. Guru’s wife is treated like a mother in every religion and sect of the world. Means that after learning tantric sexual yoga, the blind will rise above blind worldliness and become calm in his soul or self, meaning he will die in a way. The same thing happened later, after his death Shiva made him his Gana, which means he became liberated. No one becomes liberated after a common death. It also means that when one falls in love with a respectable woman unfit for marriage or sexual intercourse, then her form starts coming to his mind again and again, due to which it takes the form of samadhi image, as happened with Premyogi Vajra. After getting Brahma’s boon, Andhak became the king, and became very debauched. He had already got a beautiful and shapely body, so he started wasting his valuable time enjoying in various beautiful places with countless courtesans. With the power of this sexual power, he also started committing many sins. After driving the deities out of heaven, he started ruling there himself. When someone does bad things, the deities in the body controlling bn body cells and other constituents will run away in sorrow, because the main purpose of the deities is to make the body do good things. Now I will tell the recent incident related to this and then finish the post because otherwise it will become very long and difficult to read. I’ll try to unravel the mystery of the rest of the story over the next week. It’s about all I’ve figured out so far. Maybe you can reveal it before me, if so then definitely write in the comment box.

Aftab-Shraddha’s famous love jihad case

Nowadays, the much called murder mystery related to the Aftab Poonawala and Shraddha is very similar to the above andhak demon story. According to sources, the Muslim youth was in a live-in relationship with a Hindu girl named Shraddha. She was living with him for a long time leaving her family helped by the online dating app. He used to keep her at different locations and houses mischievously telling her to be his wife as live in relationship is still considered bad here. He also secretly had love affairs with 20 other Hindu girls. Shraddha might have come to know about this and wanted to stop him from doing so and marry him. Quarrels beatings also took place regarding this. Eventually he strangled her to death and without remorse chopped her into thirty-five pieces and packed them in a refrigerator. Slowly he kept throwing them in the nearby forest. After six months, the police were able to catch him after a complaint was written by shraddha’s father. It is worth noting here that in order to please today’s so-called modern women, one has to become vicious, dishonest, drug addict, smoker, flesh eater, violent and deceitful like Aftab, although no civilized and educated society can ever tolerate such extremism, in which humanity is violated. The second thing to be noted is that probably Shivpuran is being misinterpreted by many Hindus, or is such a distorted thinking sitting in the subconscious mind without knowing it. According to the general belief obtained from the Puranas, Mahadev Shiva was a ghostly type of man without any family background, to get whom Parvati kept wandering leaving the family for many births in order to get him as her husband. Such insanity is okay to some extent to reach the pinnacle of mutual love of husband and wife, but it too has some important conditions attached to it for its full success, anyway excess of anything is never good, especially with the person of that community, whose so called relationship with love-jihad is associated with oppression and violence. Moreover, examples of this type of illiteracy keep coming every day. In spite of knowing everything, it seems that either the children are not being given proper education in the family or witchcraft has been done on such girls, or it is the conspiracy against the scriptures and Puranas of Hindus, which are sacred and full of knowledge. A well-planned and huge conspiracy is going on to defame these, it appears. Many people are also citing the lack of strict law as the main reason. Some people also consider distorted television, online, and Bollywood culture as a big reason. Many people are blaming live in relationships and dating apps. Hindu men should also take a lesson from this and try to live up to the expectations of women. The one who does not have shining Dhyana-Kundalini picture inside his mind, if he practices sexual tantra, then his condition can be like demon andhak, as you read above, then if the one who does not even know about sexual tantra, if he applies his free will in the matter of sex, then how much worse his condition can be than that, it is being seen directly from the above recent incident.

Unique way to avoid love disease

Friends, there is a solution to this problem too. Fortunately today the book “Sharir Vigyan Darshan ~ A Modern Kundalini Tantra (A Yogi’s Love Story)” is available both online and offline, ebook form as well as print form. A matching English form of this book is “Love story of aYogi ~what Patanjali says”. In this, it seems that Shivpuran has been explained in a modern style, which can be understood by everyone, and misunderstandings about it can be removed. It is based on true biography and true events. In this basic sex yoga has been highlighted along with sociality. The basic principle of man-woman relationship is also hidden in this book. If someone wants to drink Premamrit or love nectar, then there doesn’t seem to be any better solution than this book. In this book, Premyogi Vajra has thrown some light on his related biography along with his unique spiritual and tantric experiences. This above mentioned “Physiology Darshan” book have been rated five star, best, excellent and must read in a quality and unbiased review on amazon.in. It has also been rated five stars and cool in Google Play Books review. Some appreciative readers even say that If you read this book, it is as if you have read everything. It is hoped that the book will live up to the expectations of the readers.

Kundalini yoga philosophy in the animation movie Raya and the last dragon

Heartiest congratulations to all on the occasion of Prakash Parv of Sri Guru Nanak Dev

Friends, I was talking about the Kundalini effects of dragons in the previous posts. In the time being, I got a chance to watch the animation movie Raya and the Last Dragon. In this I saw a complete yoga philosophy. Now it is not clear whether Yogdarshan’s help was also taken in some form or the other while making this film or only I have seen it there. As far as I searched on Google, I came to know that inspiration has been taken from South East Asian (Thailand etc.) life and not from any yoga etc. Anyway, yoga has become quite popular in Thailand. It consists of a dragon shaped river and some human settlements in its course. There is a heart land called Kumandra Land in it. Everyone lives there together lovingly. Dragons dominate everywhere. The dragon saves everyone from the sinful demon named Drun, the tornado. Druns suck people’s souls and turn them into lifeless stones. The dragons are used up while fighting those monsters. Then after five hundred years they attack the human settlements again. Heartland contains a gemstone made up by dragons, which protects all from the drun. It can revive a man made to stone, but not a dragon made to stone. The different tribes get separated from the main tribe of Heartland and settle in different parts of the river to get that gem. The names of those tribes are Tail, Tailon, Spine and Fang. The Tailon Tribe has built their houses on the river to avoid Drun. Actually, there is no effect of dragons in the water, due to which the drun cannot reach there. The head of the Heart clan, Banz, wants all the tribes to come together and make a compromise and re-build Kumandra, in which all together are safe from druns. So he organizes a ceremony to which all the tribes are invited. There, a child of the Fang clan deceives Banz’s daughter Raya and leads the people of all the tribes to the gem. They all start fighting among themselves for the gem. This breaks the gem into five pieces. Each tribe gets a piece in hand. Drun attacks everyone as the gem breaks. Everyone runs here and there to save lives. Banz Standing on the bridge, giving the piece of gem to his daughter, pushes her into the river, advising her to make his land Kumandra again and himself turns into a stone by drun’s attack. six years later, Raya is going in a rook to find the bank of the river where the last dragon Sisu can be found somewhere. She suddenly finds her near the desert-like Tail clan. Sisu tells her that the gem was made and handed to her by her brothers and sisters, believing her. She finds that she can use her powers when she holds a piece. Each piece activates a different kind of power. She, with the help of Sisu, she finds another piece of gem in the temple there. This gives the Sisu dragon the power to appear as a man. Then they reach the Spine clan, escaping from the Fang clan. In this journey, Raya also finds five to six friends, some of whom are like a child, some like a monkey and some like a fool, although all are strong. Sisu does not want to fight with Namari, the princess of the powerful Fang clan, instead wants to convince her with a gift. When Sisu is showing her the pieces of the gem, Namari deceives her with arrow targeted to her. As soon as Raya starts attacking her out of fear, she shoots the same arrow that kills Sisu and she falls into the river. all the water dries up and Drun’s attacks escalate all of a sudden. All Raya’s friends and Namari also try to drive away Drun with their respective gem pieces, but for how long. Those pieces are disappearing in vapours. That’s when Raya remembers Sisu’s saying that faith is also necessary to join the pieces of a gem. So she gives Namari her piece of stone and she herself becomes a stone. Seeing Raya doing this, her friends also turn themselves into stones by handing over gem pieces to Namari. In the end, Namari also becomes a stone by adding her own piece to them. When the gem is fully formed again, there is light all around, and with that Raya’s father, Banj, and all the stone-turned people come alive. All stone turned dragons also come alive. Kumandra comes back and everyone starts living together again.

Kundalini Based Explanation of Raya and the Last Dragon

It is less of a Chinese dragon and more as a serpent of Kundalini tantra. This is the Sushumna Nadi. I was stating in a previous post that both are same, and represent Kundalini Shakti shaped like a serpent or the spine. It remains in water means it remains in the cerebrospinal fluid of the spinal cord. The flow of Kundalini energy in the spine keeps away evil thoughts in the form of druns or sins. Kumandra is that country or society, in which all types of feelings i.e. people live together. Different chakras are different tribal areas, and different mental feelings and thoughts on those chakras are different tribal people. Kumandra is actually a state of Kundalini yoga, in which the Kundalini Shakti ie dragon is rotated on all the chakras simultaneously. With the contribution of each chakra, a Kundalini picture, that is, a meditation picture, starts shining by this Kundalini Shakti. Sometimes it appears on some chakra and sometimes on another chakra. This is this gem which saves from the drun of duality. The man named Benz was holding that Kundalini picture only in his heart. Meaning the man was like an ordinary Raja Yogi, not a Tantric Kundalini Yogi. By this the people of Heartland means the cells of the heart were full of power, but other chakras were lacking in power. So the organs related to those chakras were suffering from lack of power. So it is natural that they were trying to steal the power source gem from the Heart clan. Once the head of the heartland means the soul has given all the people invitation on a feast means he tried meditating in an organized way on all the chakras with a sincere heart. But instead of joining together, they snatched and broke the gem, meaning that the man did not give Kundalini energy to all the chakras simultaneously by continuous practice of Tantric Kundalini Yoga for long, but he did meditation only once or did only simple i.e. less effective Kundalini Yoga. It is natural that the power was divided between the chakras, but the Kundalini picture disappeared, meaning it became situated on all the five main chakras in the form of formless shakti, that is, the gem broke into five pieces and one piece went to each tribe. People of all the chakras were alive with this power, but they were not safe from the drun of ignorance, because there was no complete or bright Kundalini picture in the form of a gem. Meditation saves from ignorance only in the form of a kundalini picture that’s the gem. Dhyana Chitra’s loss means that the soul named Banj got drowned in the darkness of ignorance due to the snatching of the gem, that means he died or turned to stone, but he gave the shakti with teaching to her daughter Raya meaning he gave the light of Kundalini Shakti that’s a piece of gem to the intellect, and advised her that she again make the non-dual world of body means Kumandra. Advaita means establishing harmony. Raya means intellect then jumps into water meaning cerebrospinal fluid of spinal cord means she practices meditation of sushumna channel in the spinal chord, where Kundalini Shakti means Sisu is noticed by her. In fact, meditation on the chakras is called meditation. To make it easier to meditate on the chakra, one can touch the chakra with the left hand, as the right hand touches the nose for pranayama. This itself turns the focus on the Kundalini picture. This is the specialty of hatha yoga. In Raja Yoga, the meditation-picture has to be focused by force and producing burden on the mind, which seems difficult. Just as by meditating on the chakra one starts meditating on the Dhyana Chitra itself, in the same way, by meditating on the serpent form Sushumna Nadi located in the spine, the Kundalini picture itself starts being meditated upon. There is great power in touch. Sushumna can be touched by massaging the back. There are many asanas, which make the feel of touch or pressure on the sushumna. The chair which gives full support to the whole back by touching it well, that looks blissful because the sushumna is active on it. What I was talking about in the previous post on the Ouroborus snake, how both man and woman, in cooperation with each other, activate the female half of their body in the form of chakras located in the path of front channel of their body, all that is through the amazing touch sensation mostly. Raya is saved from Drun by the influence of dragon or shakti. She senses the power of dragon in that river ie Sushumna Nadi, so she starts searching for her. Nadi also means river in Sanskrit. She is hiding in the Tail Island, which means that the shakti is in a sleep state in the Muladhara Chakra as often told. With the help of that dragon or Kundalini Shakti, she means intellect starts looking for the pieces of the gem, meaning the whole Kundalini picture, on the above islands, which means on the bases of the shakti, that is, on the chakras. A piece of gem by heart or mind or soul or Sahasrara has been given to her in the form of good inspiration. The soul resides in the heart or mind only. The second piece is found on the Mooladhara Chakra, the temple of Tail Island. Due to this the dragon can come in human form, which means that the Kundalini energy is spread throughout the Sushumana Nadi, which is in the shape of a snake with hood shaped like human. It means shakti is rising and trying to awaken by standing up. The people of Tailon Island live above water, meaning the body cells of the front swadhisthana chakra are located above the prostate filled with liquid semen. The swadhishthana chakra is surrounded by liquids in the form of seminal and urinary fluids flowing in the drains and micro rivers. The Front Swadhisthana Chakra is connected to the Rear Swadhishthana Chakra by a bridge-like Nadi connection. It is said that the people of Tailon Island lived in the middle of the river by building their houses on platforms etc. Due to the power of watery semen, this island-like chakra is not affected by ignorance or inefficiency in the form of attacks of druns. The bridge reminded of the Morbi bridge accident in Gujarat state. Recently, more than a hundred people died by drowning in the river due to the collapse of that swinging bridge connected to a famous hindu temple. Most of them were children. The youngest child is said to be two years old. TV journalists were showing the shoes of a small child who had drowned in the river. The shoes were brand new, and they had a picture of the Joker laughing. The child would have been jumping lost in joy over the bridge too happy with his new shoe, and then death must have caught him. Death comes unnoticed just like this. That is why it is said that death and God should always be remembered. It is a heart touching scene. Those who survive in such accidents are also mostly so called mentally handicapped. When I was in senior secondary school, a new teacher came to teach us English. He lived as calm, serious, quiet, detached, and non-dual. Some intelligent children found his method of teaching slow and backward in comparison to the previous teacher, but I liked it very much. Perhaps I was influenced by his so-called spiritual qualities. He used to watch with love, but did not laugh. Many times while thinking something, he used to say that one should never do bad to anyone, what is there in this life etc. Later it was heard that when he was carrying some cash to his previous school, some miscreants snatched the money from him and pushed him down the road bridge along with a scooter. There he lay unconscious when his wife looked for him and took him to the hospital. For a fearful and compelled man, all the paths of progress are closed, even his earlier progress starts getting destroyed. Of course, he must make spiritual progress on the strength of his past progress. But how long will the force of past progress last? Hindus were first scared by Islamic attackers, now Pakistan nurtured Islamic terrorism is intimidating. So called Khalistani terrorism is also one of them. The religion whose people and gurus had laid down their lives happily to protect Hinduism from the Mughal invaders, today a handful of those are supporting the so-called anti-Hindu Khalistan movement, on which most of the people remain silent due to fear etc., because many of those who spoke were silenced forcefully or put to death. If a little bit of everyone speaks freely in protest, then the terrorists will kill whom and whom. According to sources, Canada remains their main base. More recently, Hinduist political party Shiv Sena leader Sudhir Suri was shot dead while he was protesting peacefully against the dumping of deity idols in the garbage. According to sources, its wires are also being told attached to Pak-supported Khalistan. Be it Gagneja or Rabindra Gosain, the leader of the so-called Hindu ideological Rashtriya Swayamsevak Sangh, the list of victims of this international conspiracy is long. If you look deeply, it seems that Hindus are fighting with Hindus, the so called outsiders are the instigators and conspirators. Yes, now back to the original topic of the post. You must have also seen that no matter what it is, someone gets attracted towards sex on some pretext or the other mainly to save him from drun of ignorance. The third piece was found by him in the spine, that is, the spinal cord, in the form of a sensation arising in the Sushumna. The Kundalini Shakti located in the spine is got from the Kundalini picture on Chakras, as it is mentioned in the Shiva Purana that the seven sage wives (chakras) gave their semen effulgence to the Himalayas (the spine). Sisu tells that the pieces of the gem were given to her by her brothers and sisters, who lived on these different islands. The thing is this same. The Kundalini energy in the form of kundalini picture contemplated on each chakra gets collected, strengthened and recieved by the dragon Sisu ie. sushumna nadi, and then by one’s own brain, that is, by the mind of the man (because the mind of the serpent is the mind of the man) as a special energy and a new positive transformation from it. It is said in the above myth story that by getting a piece of every gem, Sisu acquires a special new power. Raya and Sisu escape from the Fang clan to the Spine clan, meaning awareness or intellect and kundalini energy does not rise up through the front chakras, rather, it rises up through the spinal cord passing through rear chakras. It is said because the fang means the sharp tooth of the mouth comes in the way of the front chakras. In this journey raya finds four or five helpful friends, that is, the five pranas and muscular strength that help to rotate the Kundalini Shakti. Near Fang Island, she enters the front Vishuddhi Chakra from rear. That is because there it is the most difficult to raise the Kundalini energy above the Vishuddhi chakra, so it slips forward. There princess Namari means sickness or weakness or worldliness kills sisu shakti, means she forces her to withdraw, and she falls into the river, means flowing back down in the fluid of the spinal cord. In Japanese, Namari means the same. Due to this, the tornadoes or druns become powerful again and start killing people, that is, by not giving emotions trapped in the chakras a chance to get out, while making them stone i.e. lifeless. Chakras are also circular like tornadoes. Sisu does not want to fight with Namari, meaning when the Kundalini Shakti starts climbing up by crossing the Vishuddhi Chakra, then the fighting-fighting thinking of the mind gets destroyed. The satoguna or lightful quality of the mind is increased. She wants to give a gift to Namari i.e. by feeding her some sweets etc. Anyway, when something happens to be in the mouth, the Kundalini circuit is completed, due to which the Kundalini starts rotating easily. But the opposite happened. Instead of helping Kundalini with it, a man’s intellect or raya started increasing the vices of worldliness like anger, fighting etc. with the help of worldly Namari. This will destroy the Kundalini Shakti. It has been shown that Sisu dies after being hit by an arrow and falls into the river, which means that the energy then goes back down the spine through the cerebrospinal fluid. This triggers Drun’s attacks again. Due to lack of power, they try to avoid the tornado with the Kundalini Chitra, which is broken into pieces, but without kundalini shakti, how long the Kundalini picture will save them. The Kundalini picture, that is, the meditation picture, gets its life and shine through kundalini energy. Due to this lake of energy, that meditation picture also starts getting blurred. From this Raya means intellect remembers that Sisu means Shakti had received that Kundalini gem only through mutual harmony and trust. That’s why she gives her gem piece to the worldly individual means Namari. All the organs and pranas follow the intellect, so all his friends mean pranas gave there energy to worldliness. The Kundalini chitra parts/luminescence that have been captured on different chakras, means different gem parts are handed over to worldly Namari. Namari also adds her piece to it leaving attachment to it, that means she also starts dealing in the world with non-attachment and non-duality using her full power. With this, those gem pieces get joined completely, that means the Kundalini picture starts shining with joy and peace. Due to this, the feelings buried in the chakras start reappearing again and merging in the bliss of the soul, which means that the people who were made stone and trapped by the whirlwinds or druns (chakras) come alive again and start rejoicing. With Sushumna flowing, awareness starts running in all the nadis of the body, meaning the rustle of the Shakti start running in them with feeling of joy. It is said as that then all dragons made of stone also become alive. Awakened dragons mean awakened nadis. Those dragons bring back happiness and prosperity to the whole of Kumandra. Because the body is also like a huge country, in which shakti travelling through nadis does everything. Through running of blissful energy in each nadi, the whole body itself becomes happy, strong and healthy. Earlier, pieces of gem were able to revive people made to stone, but not dragons made to stone. This means that through the blurred Kundalini picture, the feelings buried in the chakras begin to emerge, but the energy that moves rustling in nadis was not produced enough with it, as it requires as sharp and full kundalini image as possible. The Kundalini Shakti, which rustles in the form of a mighty serpent, follows the same mental Kundalini image. Further, Tantric sexual yoga strengthens this image and Shakti even more. Maharaj Osho also says the same thing. This means that the shakti chakras, especially the mooladhara chakra, remain in a sleeping state without proper and sustained meditation image. The proof of this is also that if you start chanting sleep-sleep in the mind, then the Kundalini image along with the Kundalini shakti will be felt on the Swadhisthana Chakra and the Muladhara Chakra along with inward constriction of naval chakra. Along with this, there is also a relaxed feeling, the pressure in the brain is felt to decrease suddenly, flood of irrevalent thoughts calm down, and headache is also relieved. This technique is very beneficial for those who have less sleep or who are under stress. I call meditation image as kundalini image because it awakens muladhara chakra and kundalini energy associated with it.

Nidra devi is the goddess of sleep. The mantra “Shri Nidra Hai” is designed by me. From Shree there is a non-dual experience of the philosophy of Physiology (sharir), due to which the Kundalini increases some pressure in the brain, from sleep word that Kundalini descends carrying excess pressure with it to the lower chakras, and with hai means exists, one returns to the normal state. If the pressure starts increasing in the brain while doing yoga, even then this remedy is very effective. Actually, sleep is also very important for yoga. Awakening is relative to sleep, so it can be achieved only through sleep. The one who always tries to stay awake by forcing himself to increase the quality of impractical goodness always in mind, at times I feel him like doing a pretense, and I doubt that spiritual awakening can be achieved with it. Similarly, while reading in the book etc, I used to think that Shambhavi Mudra is what a great and miraculous knowledge, because it used to be written that way. Writing is done so that the difficult thing can be made easy, not the opposite. Everything is simple if understood in a practical way. Keeping an eye on the nose or nose tip is a common and simple practice to centralize and rotate the Kundalini energy. By looking through both of the eyes at the same time, a subtle attention gets also fixed on the Agya Chakra, this is also a simple practice. Keeping the tongue as far back as possible on the palate is also a simple yoga tactic. By mixing these three techniques together, Shambhavi Mudra is formed, which brings the benefits of all three together and effectively. That is why life should be balanced so that equal contribution of the whole body chakras remains in it and the body remains fully functional. Yoga is balance. Similarly, the pieces of the gem were not able to provide permanent protection to the people from the drun. This is a method of Raja Yoga, in which the Kundalini picture is meditated only in the mind or heart, as opposed to complete yoga practice in the form of yogasanas and pranayama etc. of hatha yoga. Therefore, as long as the Kundalini picture is meditated in mind, it remains there, but as soon as that meditation image is removed from there, it fades away completely. This is the local remedy of the Banj clan to preserve the gem. This prevents drun or ignorance in the mind or heart, but it keeps on suppressing the feelings in the form of turning them in to stones on other chakras as there kundalini image isn’t meditated through full and dedicated kundalini yoga. Therefore the complete, everlasting and universal remedy is the proper worldliness with Hatha Yoga, not only the Raja Yoga. Rajayoga for many means just sitting idle and meditating. This is because in the hathayoga way of meditation the whole body and the outside world are equally and properly used in the meditation. However, initially it is the complete sattvik or light-full Raja Yoga that prepares and maintains the Kundalini picture in the mind. Rajayoga is preparatory and hathayoga is enhancer of yoga. It’s just like banj, the head of the heart clan had kept the gem in custody for the future. Many people see the asanas of hatha yoga and say that it is physical exercise, the real yoga is done through meditation in the mind. They mean to say that the bird of mind keeps on flying in empty space without any basis. But the truth is that the bird of the mind resides on the tree of the body. The healthier and more fruitful the tree is, the happier the bird will be.

कुंडलिनी योग दर्शन को दर्शाती कार्टून फ़िल्म राया एंड द लास्ट ड्रेगन

सभी को श्री गुरु नानकदेव के प्रकाश पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं

दोस्तों, मैं पिछली पोस्टों में ड्रेगन के कुंडलिनी प्रभावों के बारे में बात कर रहा था। इसी कड़ी में मुझे एनीमेशन मूवी राया एंड द लास्ट ड्रेगन देखने का मौका मिला। इसमें मुझे एक सम्पूर्ण योगदर्शन नजर आया। अब यह पता नहीं कि क्या इस फ़िल्म को बनाते समय योगदर्शन की भी किसी न किसी रूप में मदद ली गई या मुझे ही इसमें नजर आया है। जहाँ तक मैंने गूगल पर सर्च किया तो पता चला कि दक्षिण पूर्वी एशियाई (थाईलैंड आदि देश) जनजीवन से इसके लिए प्रेरणा ली गई है, किसी योग वगैरह से नहीं। थाईलैंड में वैसे भी योग काफी लोकप्रिय हो गया है। इसमें एक ड्रेगन शेप की नदी या दुनिया होती है। उसमें एक हर्ट नामक कुमान्द्रा लैंड होती है। वहाँ सब मिलजुल कर रहते हैं। हर जगह ड्रेगन्स का बोलबाला होता है। ड्रेगन सबको ड्रन अर्थात बवंडर नामक पापी राक्षस से बचाती है। ड्रन लोगों की आत्मा को चूसकर उन्हें निर्जीव पत्थर बना देते हैं। ड्रेगन उन ड्रन राक्षसों से लड़ते हुए नष्ट हो जाती हैं। फिर पांच सौ साल बाद वे ड्रन फिर से हमला कर देते हैं। हर्ट लैंड के पास ड्रेगन का बनाया हुआ रत्न होता है, जो ड्रन से बचाता है। वह पत्थर बने आदमी को तो जिन्दा कर सकता है, पर पत्थर बनी ड्रेगनस को नहीं। दूरपार के कबीले उस रत्न की प्राप्ति के लिए हर्ट लैंड के कबीले से अलग होकर नदी के विभिन्न भागों में बस जाते हैं। उन कबीलों के नाम होते हैं, टेल, टेलन, स्पाइन और फैंग। टेलन ट्राइब ने तो ड्रन से बचने के लिए अपने घर नदी पे बनाए होते हैं। दरअसल पानी में ड्रेगन का असर नहीं होता है, जिससे ड्रन वहाँ नहीं पहुंच पाता। हर्ट कबीले का मुखिया बैंज चाहता है कि सभी कबीले इकट्ठे होकर समझौता कर के फिर से कुमान्द्रा बना ले, जिसमें सभी मिलजुल कर ड्रन से सुरक्षित रहें। इसलिए वह समारोह का आयोजन करता है जिसमें वह सभी कबीलों को बुलाता है। वहाँ फैंग कबीले का एक बच्चा बैंज की बेटी राया को धोखा देकर सभी कबीलों के लोगों को रत्न तक पहुंचा देती है। वे सभी रत्न के लिए आपस में लड़ने लगते हैं। इससे रत्न पांच टुकड़ों में टूट जाता है। हरेक कबीले के हाथ एक-एक टुकड़ा लगता है। रत्न के टूटने से ड्रन सब पर हमला कर देता है। सब जान बचाने को इधर-उधर भागते हैं। बैंज भी पुल पर खड़े होकर रत्न का टुकड़ा अपनी बेटी को देकर यह कहते हुए उसे नदी में धक्का देता है कि वह कुमान्द्रा बना ले और वह खुद ड्रन के हमले से पत्थर बन जाता है। छः सालों बाद राया नदी का किनारा ढूंढने किश्ती में जा रही होती है ताकि अंतिम ड्रेगन सिसू कहीं मिल जाए। उसे वह रेगिस्तान जैसे टेल कबीले के नजदीक अचानक मिलती है। सिसू उसे बताती है कि वह रत्न उसके भाई बहिनों ने बनाकर उसे सौम्पा था, उसपर विश्वास करके। वह पाती है कि जब वह एक टुकड़ा रखती है तो वह अपनी शक्तियों का उपयोग कर सकती है। हरेक टुकड़ा उसकी अलग किस्म की शक्ति को क्रियाशील करता है। वह सिसू की मदद से वहाँ के मंदिर में रत्न का दूसरा टुकड़ा ढूंढ लेती है। इससे सिसू ड्रेगन को आदमी के रूप में आने की शक्ति मिल जाती है। फिर फैंग कबीले से बचते हुए वे स्पाइन कबीले में पहुंचते हैं। इस यात्रा में राया को पांच छः दोस्त भी मिल जाते हैं, जिनमें कोई तो बच्चे की तरह तो कोई बंदर की तरह और कोई मूर्ख जैसा होता है, हालांकि सभी ताकतवर होते हैं। शक्तिशाली फैंग कबीले की राजकुमारी नमारी से सिसू लड़ना नहीं चाहती, और उसे तोहफा देकर समझाना चाहती है। जब सिसू उसे रत्न के टुकड़े दिखा रही होती है, तब नमारी धोखे से उसपर तीरकमान साध लेती है। डर के मारे राया उसपर जैसे ही तलवार से हमला करने लगती है, वह वैसे ही तीर चला देती है, जिससे सिसू मरकर नदी में गिर जाती है। सारा पानी सूखने लगता है और ड्रन के हमले एकदम से बढ़ जाते हैं। राया के सभी दोस्त और नमारी भी अपने-अपने रत्न के टुकड़े से ड्रन को भगाने लगते हैं, पर कब तक। वे टुकड़े भाप में गायब हो रहे होते हैं। तभी राया को सिसू की बात याद आती है कि रत्न के टुकड़े जोड़ने के लिए विश्वास भी जरूरी है। इसलिए वह नमारी को रत्न का टुकड़ा थमाती है, और खुद पत्थर बन जाती है। राया को देखकर उसके दोस्त भी नमारी को टुकड़े सौम्प कर खुद पत्थर बन जाते हैं। अंत में नमारी भी अपना टुकड़ा उनमें जोड़कर खुद भी पत्थर बन जाती है। रत्न पूरा होने पर चारों ओर प्रकाश छा जाता है, राया के पिता बैंज समेत सभी पत्थर बने लोग जिन्दा हो जाते हैं। सभी पत्थर बनी ड्रेगन्स भी जिन्दा हो जाती हैं। कुमान्द्रा वापिस लौट आता है, और सभी लोग फिर से मिलजुल कर रहने लगते हैं।

राया एन्ड द लास्ट ड्रेगन का कुंडलिनी-आधारित स्पष्टीकरण

यह चाइनीस ड्रेगन कम और कुंडलिनी तंत्र वाला नाग ज्यादा है। यही सुषुम्ना नाड़ी है। मैं पिछली एक पोस्ट में बता रहा था कि दोनों एक ही हैं, और कुंडलिनी शक्ति को रूपांकित करते हैं। वह रीढ़ की हड्डी जैसे आकार का है, और पानी में मतलब स्पाइनल कॉर्ड के सेरेबरोस्पाइनल फ्लूड में रहता है। मेरुदण्ड में कुंडलिनी शक्ति के प्रवाह से ड्रन-रूपी या पापरूपी बुरे विचार दूर रहते हैं। कुमान्द्रा वह देह-देश है, जिसमें सभी किस्म के भाव अर्थात लोग मिलजुल कर रहते हैं। विभिन्न चक्र ही विभिन्न कबालई क्षेत्र हैं, और उन चक्रोँ पर स्थित विभिन्न मानसिक भाव व विचार ही विभिन्न कबालई लोग हैँ। कुमान्द्रा दरअसल कुंडलिनी योग की अवस्था है, जिसमें सभी चक्रोँ पर कुंडलिनी शक्ति अर्थात ड्रेगन को एकसाथ घुमाया जाता है। हरेक चक्र के योगदान से इस कुंडलिनी शक्ति से एक कुंडलिनी चित्र अर्थात ध्यान चित्र चमकने लगता है। यह कभी किसी चक्र पर तो कभी किसी दूसरे चक्र पर प्रकट होता रहता है। यही वह रत्न है जो द्वैत रूपी ड्रन से बचाता है। आदमी ने उस कुंडलिनी चित्र को केवल अपने हृदय में धारण किया हुआ था। मतलब आदमी साधारण राजयोगी की तरह था, तांत्रिक कुंडलिनी योगी की तरह नहीं। इससे हर्ट लैंड के लोग मतलब हृदय की कोशिकाएं तो शक्ति से भरी थीं, पर अन्य चक्रोँ से संबंधित अंग शक्ति की कमी से जूझ रहे थे। इसलिए स्वाभाविक है कि वे हर्ट कबीले से शक्तिस्रोत रत्न को चुराने का प्रयास कर रहे थे। एकबार हर्टलैंड के मुखिया बैंज मतलब जीवात्मा ने सभी लोगों को दावत पे बुलाया मतलब सभी चक्रोँ का सच्चे मन से ध्यान किया। पर उन्होंने मिलजुल कर रहने की अपेक्षा छीनाझपटी की और रत्न को तोड़ दिया, मतलब कि आदमी ने निरंतर के तांत्रिक कुंडलिनी योग के अभ्यास से सभी चक्रोँ को एकसाथ कुंडलिनी शक्ति नहीं दी, सिर्फ एकबार ध्यान किया या सिर्फ साधारण अर्थात अल्पप्रभावी कुंडलिनी योग किया। इससे स्वाभाविक है कि शक्ति तो चक्रोँ के बीच में बंट गई, पर कुंडलिनी चित्र गायब हो गया, मतलब वह निराकार शक्ति के रूप में सभी पांचोँ मुख्य चक्रोँ पर स्थित हो गया अर्थात रत्न पांच टुकड़ों में टूट गया और एक टुकड़ा हरेक कबीले के पास चला गया। इस शक्ति से सभी चक्रोँ के लोग जिन्दा तो रह सके थे, पर अज्ञान रूपी ड्रन से पूरी तरह से सुरक्षित नहीं थे, क्योंकि रत्न रूपी सम्पूर्ण कुंडलिनी चित्र नहीं था। अज्ञान से तो ध्यान-चित्र रूपी रत्न ही बचाता है। ध्यान-चित्र अर्थात रत्न के छिन जाने से बैंज नामक आत्मा तो अज्ञान के अँधेरे में डूब गई मतलब वह मर गया, पर उसने बेटी राया मतलब बुद्धि को बचीखुची कुंडलिनी शक्ति का प्रकाश मतलब रत्न का टुकड़ा देकर कहा कि वह शरीर-रूपी दुनिया में पुनः कुमान्द्रा मतलब अद्वैतवाद अर्थात मेलजोल स्थापित करे। राया मतलब बुद्धि फिर पानी मतलब सेरेबरोस्पाइनल फ्लूड या मेरुदण्ड के ध्यान में छलांग लगा देती है, जहाँ कुंडलिनी शक्ति मतलब सिसू ड्रेगन के प्रभाव से वह ड्रन से बच जाती है। दरअसल चक्रोँ के ध्यान को ही ध्यान कहते हैं। चक्र पर ध्यान को आसान बनाने के लिए बाएं हाथ से चक्र को स्पर्ष कर के रखा जा सकता है, क्योंकि दायां हाथ तो प्राणायाम के लिए नाक को स्पर्ष किए होता है। इससे खुद ही कुंडलिनी चित्र का ध्यान हो जाता है। यही हठयोग की विशिष्टता है। राजयोग में ध्यान-चित्र का ध्यान जबरदस्ती और मस्तिष्क पर बोझ डालकर करना पड़ता है, जो कठिन लगता है। जैसे चक्र का ध्यान करने से खुद ही ध्यानचित्र का ध्यान होने लगता है, उसी तरह मेरुदण्ड में स्थित नागरूपी सुषुम्ना नाड़ी का ध्यान करने से भी कुंडलिनी चित्र का ध्यान खुद ही होने लगता है। स्पर्ष में बड़ी शक्ति है। सुषुम्ना का स्पर्ष पीठ की मालिश करवाने से होता है। ऐसे बहुत से आसन हैं, जिनसे सुषुम्ना पर दबाव का स्पर्ष महसूस होता है। जो कुर्सी पूरी पीठ को अच्छे से स्पर्ष करके भरपूर सहारा देती है, वह इसीलिए आनंददायी लगती है, क्योंकि उस पर सुषुम्ना क्रियाशील रहती है। जो मैं ओरोबोरस सांप वाली पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे एकदूसरे के सहयोग से पुरुष और स्त्री दोनों ही अपने शरीर के आगे वाले चैनल में स्थित चक्रोँ के रूप में अपने शरीर के स्त्री रूप वाले आधे भाग को क्रियाशील करते हैं, वह सब स्पर्श का ही कमाल है। राया को उस नदी अर्थात सुषुम्ना नाड़ी में ड्रेगन रूपी शक्ति का आभास होता है, इसलिए वह उसकी खोज में लग जाती है। उसे वह टेल आईलैंड में छुपी हुई मतलब उसे शक्ति मूलाधार चक्र में निद्रावस्था में मिल जाती है। उस ड्रेगन रूपी कुंडलिनी शक्ति की मदद से वह रत्न के टुकड़ों को मतलब कुंडलिनी चित्र को उपरोक्त टापुओं पर मतलब शक्ति के अड्डों पर मतलब चक्रोँ पर ढूंढने लगती है। एक टुकड़ा तो उसके पास दिल या मन या आत्मा या सहस्रार रूपी बैंज का दिया हुआ है ही, सदप्रेरणा के रूप में। आत्मा दिल या मन में ही निवास करती है। दूसरा टुकड़ा उसे टेल आईलैंड के मंदिर मतलब मूलाधार चक्र पर मिल जाता है। इससे ड्रेगन मानव रूप में आ सकती है, मतलब वीर्यबल से कुंडलिनी शक्ति पूरी सुषुम्ना नाड़ी में फैल गई, जो एक फण उठाए नाग या मानव की आकृति की है। टेलन द्वीप के लोग पानी के ऊपर रहते हैं, मतलब फ्रंट स्वाधिष्ठान चक्र के बॉडी सेल्स तरल वीर्य से भरे प्रॉस्टेट के ऊपर स्थित होते हैं। फ्रंट स्वाधिष्ठान चक्र एक पुल जैसे नाड़ी कनेक्शन से रियर स्वाधिष्ठान चक्र से जुड़ा होता है। इसे ही टेलन द्वीप के लोगों का नदी के बीच में बने प्लेटफॉर्म आदि पर घर बना कर रहना बताया गया है। इसी नदी जल रूपी तरल वीर्य की शक्ति से इस द्वीप रूपी चक्र पर ड्रन रूपी अज्ञान या निकम्मेपन का प्रभाव नहीं पड़ता। पुल से गुजरात राज्य के मोरबी का पुल हादसा याद आ गया। हाल ही में एक लोकप्रिय हिंदु मंदिर से जुड़े उस झूलते पुल के टूटने से सौ से ज्यादा लोग नदी में डूब कर मर गए। उनमें ज्यादातर बच्चे थे। सबसे कम आयु का बच्चा दो साल का बताया जा रहा है। टीवी पत्रकार एक ऐसे छोटे बच्चे के जूते दिखा रहे थे, जो नदी में डूब गया था। जूते बिल्कुल नए थे, और उन पर हँसते हुए जोकर का चित्र था। बच्चा अपने नए जूते की खुशी में पुल पर आनंद में खोया हुआ कूद रहा होगा, और तभी उसे मौत ने अपने आगोश में ले लिया होगा। मौत इसी तरह दबे पाँव आती है। इसीलिए कहते हैं कि मौत को और ईश्वर को हमेशा याद रखना चाहिए। दिल को छूने वाला दृश्य है। जो ऐसे हादसों में बच जाते हैं, वे भी अधिकांशतः तथाकथित मानसिक रूप से अपंग से हो जाते हैं। मैं जब सीनियर सेकंडरी स्कूल में पढ़ता था, तब हमें अंग्रेजी विषय पढ़ाने एक नए अध्यापक आए। वे शांत, गंभीर, चुपचाप, आसक्ति-रहित, और अद्वैतशील जैसे रहते थे। कुछ इंटेलिजेंट बच्चों को तो उनके पढ़ाने का तरीका धीमा और पिछड़ा हुआ लगा पहले वाले अध्यापक की अपेक्षा, पर मुझे बहुत अच्छा लगा। सम्भवतः मैं उनके तथाकथित आध्यात्मिक गुणों से प्रभावित था। प्यार से देखते थे, पर हँसते नहीं थे। कई बार कुछ सोचते हुए कहा करते थे कि कभी किसी का बुरा नहीं करना चाहिए, इस जीवन में क्या रखा है आदि। बाद में सुनने में आया कि जब वे अपने पिछले स्कूल में स्कूल का कैश लेके जा रहे थे, तब कुछ बदमाशों ने उनसे पैसे छीनकर उन्हें स्कूटर समेत सड़क के पुल से नीचे धकेल दिया था। वहाँ वे बेहोश पड़े रहे जब उनकी पत्नि ने उन्हें ढूंढते हुए वहाँ से अस्पताल पहुंचाया। डरे हुए और मजबूर आदमी के तरक्की के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, यहाँ तक कि उसकी पहले की की हुई तरक्की भी नष्ट होने लगती है। बेशक वह पिछली तरक्की के बल पर आध्यात्मिक तरक्की जरूर कर ले। पर पिछली तरक्की का बल भी कब तक रहेगा। हिन्दुओं को पहले इस्लामिक हमलावरों ने डराया, अब पाकिस्तान पोषित इस्लामिक आतंकवाद डरा रहा है। तथाकथित ख़ालिस्तानी आतंकवाद भी इनमें एक है। जिस धर्म के लोगों और गुरुओं ने मुग़ल हमलावरों से हिंदु धर्म की रक्षा के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे, आज उन्हींके कुछ मुट्ठी भर लोग तथाकथित हिंदुविरोधी खालिस्तान आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं, बाकि अधिकांश लोग भय आदि के कारण चुप रहते हैं, क्योंकि बहुत से बोलने वालों को या तो जबरन चुप करवा दिया गया या मरवा दिया गया। अगर विरोध में थोड़ा-थोड़ा सब स्वतंत्र रूप से बोलें, तो आतंकवादी किस किस को मारेंगे। सूत्रों के अनुसार कनाडा उनका मुख्य अड्डा बना हुआ है। अभी हाल ही में हिन्दूवादी शिवसेना के नेता सुधीर सूरी की तब गोली मारकर हत्या कर दी गई, जब वे देव मूर्तियों को कूड़े में फ़ेंके जाने का विरोध करने के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। सूत्रों के अनुसार इसके तार भी पाक-समर्थित खालिस्तान से जुड़े बताए जा रहे हैं। तथाकथित हिंदु विचारधारा वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता गगनेजा हो या रवीन्द्र गोसाईं, इस अंतर्राष्ट्रीय साजिश के शिकार लोगों की सूचि लंबी है। गहराई से देखने पर तो यह लगता है कि हिंदु ही हिंदु से लड़ रहे हैं, उकसाने और साजिश रचने वाले तथाकथित बाहर वाले होते हैं। हाँ, अब पोस्ट के मूल विषय पर लौटते हैं। आपने भी देखा ही होगा कि कोई चाहे कैसा ही क्यों न हो, किसी न किसी बहाने सम्भोग की तरफ आकर्षित हो ही जाता है, ताकि अपनी ऊर्जा को बढ़ा सके, मतलब यहाँ निकम्मापन नहीं पनपता। तीसरा टुकड़ा उसे स्पाइन ट्राईब अर्थात मेरुदण्ड में मिला, सुषुम्ना में उठ रही संवेदना के रूप में। मेरुदण्ड स्थित कुंडलिनी शक्ति अर्थात सिसू ड्रेगन को कुंडलिनी चित्र चक्रोँ से मिला होता है, जैसा कि शिवपुराण में आता है कि ऋषिपत्नियों (चक्रोँ) ने अपने वीर्य तेज को हिमालय (मेरुदण्ड) को दिया। इसीको सिसू कहती है कि उसे रत्न के टुकड़े उसके भाई-बहिनों ने दिए, जो इन विभिन्न टापुओं पर रहते थे। हरेक चक्र से मिली कुंडलिनी चित्र रूपी चिंतन शक्ति से सिसू रूपी कुंडलिनी शक्ति मजबूती प्राप्त करती है, और अपने मस्तिष्क में अर्थात आदमी के मस्तिष्क में (क्योंकि फन उठाए नाग का मस्तिष्क ही आदमी का मस्तिष्क है) एक विशेष शक्ति और उससे एक नया सकारात्मक रूपांतरण महसूस करती है। इसको उपरोक्त मिथक कथा में ऐसे कहा है कि हरेक रत्न का टुकड़ा प्राप्त करने से वह एक विशेष नई शक्ति प्राप्त करती है। राया और सिसू फैंग कबीले से बचते हुए स्पाइन कबीले में पहुंचते हैं, मतलब अवेयरनेस या बुद्धि और कुंडलिनी शक्ति आगे के चक्रोँ से ऊपर नहीं चढ़ती, अपितु पीछे स्थित रीढ़ की हड्डी से ऊपर चढ़ती है। यह इसलिए कहा गया है क्योंकि फैंग मतलब मुंह का नुकीला दाँत आगे के चक्रोँ के रास्ते में ही आता है। इस यात्रा में उसे चार-पांच मददगार दोस्त मिल जाते हैं, मतलब पाँच प्राण और मांसपेशियों की ताकत जो कि कुंडलिनी शक्ति को घुमाने में मदद करते हैं। फैंग आईलैंड में वे पीछे से मतलब पीछे के विशुद्धि चक्र से प्रविष्ट होती हैं। वह इसलिए क्योंकि कुंडलिनी शक्ति को विशुद्धि चक्र से ऊपर चढ़ाना सबसे कठिन है, इसलिए वह आगे की तरफ फ़िसलती है। वहाँ राजकुमारी निमारी मतलब बीमारी मतलब कमजोरी या अंधभौतिकता उसे मार देती है, मतलब उसे वापिस हटने पर मजबूर करती है, और वह नदी में गिर जाती है, मतलब मेरुदण्ड के फ्लूड में बहती हुई वापिस नीचे चली जाती है। उससे बवंडर ताकतवर होकर लोगों को मारने लगते हैं, मतलब चक्रोँ में फँसी भावनाओं को बाहर निकलने का मौका न देकर वहीं उन्हें पत्थर अर्थात शून्य अर्थात बेजान बनाने लगते हैं। चक्र भी बवंडर की तरह गोलाकार होते हैं। सिसू नमारी से लड़ना नहीं चाहती मतलब जब कुंडलिनी शक्ति विशुद्धि चक्र को लांघ कर ऊपर चढ़ने लगती है, तब मन की लड़ाई-झगड़े वाली सोच नष्ट हो जाती है। मन का सतोगुण बढ़ा हुआ होता है। वह नमारी को तोहफा देना चाहती है मतलब उसे कुछ मिष्ठान्न आदि खिलाकर। वैसे भी मुंह में कुछ होने पर कुंडलिनी सर्कट कम्प्लीट हो जाता है, जिससे कुंडलिनी आसानी से घूमने लगती है। पर हुआ उल्टा। उस तोहफे से कुंडलिनी की मदद करने की बजाय वह दुनियादारी के दोषों जैसे गुस्से, लड़ाई व अति भौतिकता आदि को बढ़ाने लगी। इससे तो कुंडलिनी शक्ति नष्ट होगी ही। इसको ऐसे दिखाया गया है कि सिसू तीर लगने से मरकर नदी में गिर जाती है, मतलब शक्ति फिर सेरेबरोस्पाइनल द्रव से होती हुई मेरुदण्ड में वापिस नीचे चली जाती है। इससे फिर से ड्रन के हमले शुरु हो जाते हैं। इससे शक्ति की कमी से टुकड़ों में बंटे कुंडलिनीचित्र रूपी रत्न से वे बवंडर से बचने की कोशिश करते हैं, पर शक्ति के बिना कब तक कुंडलिनी चित्र बचा पाएगा। कुंडलिनी चित्र अर्थात ध्यान चित्र को शक्ति से ही जान और चमक मिलती है, और शक्ति को कुंडलिनी चित्र से। दोनों एकदूसरे के पूरक हैं। इससे वह मेडिटेशन चित्र भी धूमिल पड़ने लगता है। इससे राया मतलब बुद्धि को याद आता है कि आपसी सौहार्द और विश्वास से ही सीसू मतलब शक्ति ने वह कुंडलिनी रत्न प्राप्त किया था। इसलिए वह अपना रत्न भाग नमारी मतलब दुनियादारी या भौतिकता को दे देती है। सभी अंग और प्राण बुद्धि का ही अनुगमन करते हैं, इसलिए उसके सभी दोस्त मतलब प्राण भी जिन्होंने विभिन्न चक्रोँ से कुंडलिनी भागों को कैपचर किया है, वे भी अपनेअपने रत्नभाग नमारी को दे देते हैं। नमारी भी अपना टुकड़ा उसमें जोड़ देती है, मतलब वह भी पूरी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए दुनियादारी में अनासक्ति और अद्वैत के साथ व्यवहार करने लगती है। इससे वह रत्न पूरा जुड़ जाता है मतलब अद्वैत की शक्ति से कुंडलिनी चित्र आनंद और शांति के साथ पूरा चमकने लगता है। इससे चक्रोँ में दबी हुई भावनाएँ फिर से प्रकट होकर आत्मा के आनंद में विलीन होने लगती हैं, मतलब बवंडर द्वारा पत्थर बनाए लोग फिर से जिन्दा होकर आनंद मनाने लगते हैं। सुषुम्ना की शक्ति भी उस चित्र की मदद से जागने लगती है। सुषुम्ना नाड़ी के साथ ही शरीर की अन्य सभी नाड़ियों में भी अवेयरनेस दौड़ने लगती है, मतलब उनमें दौड़ती हुई शक्ति की सरसराहट आनंद के साथ महसूस होने लगती है। इसको ऐसे कहा गया है कि फिर पत्थर बनी सभी ड्रेगन भी जिन्दा हो जाती हैं। वे ड्रेगन पूरे कुमान्द्रा में खुशहाली और समृद्धि वापिस ले आती है। क्योंकि शरीर भी एक विशाल देश की तरह ही है, जिसमें शक्ति ही सबकुछ करती है। हरेक नाड़ी में आनंदमय शक्ति के दौड़ने से पूरा शरीर खुशहाल, हट्टाकट्टा और तंदुरस्त तो बनेगा ही। इससे पहले रत्न के टुकड़े पत्थर बने लोगों को तो जिन्दा कर पा रहे थे पर पत्थर बनी ड्रेगनों को नहीं। इसका मतलब है कि धुंधले कुंडलिनी चित्र से चक्रोँ में दबी भावनाएँ तो उभरने लगती हैं, पर उससे सरसराहट के साथ चलने वाली शक्ति महसूस नहीं होती। शक्तिशाली नाग के रूप में सरसराहट करने वाली कुण्डलिनी शक्ति मानसिक कुंडलिनी छवि का ही अनुसरण करती है। इसके और आगे, तांत्रिक यौन योग इस शक्ति को और ज्यादा मजबूती प्रदान करता है। महाराज ओशो भी यही कहते हैं। मतलब कि शक्ति चक्रोँ पर विशेषकर मूलाधार चक्र में सोई हुई अवस्था में रहती है। इसका प्रमाण यह भी है कि यदि आप मन में नींद-नींद का उच्चारण करने लगो, तो कुंडलिनी शक्ति के साथ कुंडलिनी चित्र स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र पर महसूस होने लगेगा, नाभि चक्र में भी अंदर की ओर सिकुड़न महसूस होगी। साथ में रिलेक्स फील भी होता है, असंयमित विचारों की बाढ़ शांत हो जाती है, मस्तिष्क में दबाव एकदम से कम होता हुआ महसूस होता है, और सिरदर्द से भी राहत मिलती है। यह तकनीक उनके लिए बहुत फायदेमंद है जिनको नींद कम आती हो या जो तनाव में रहते हैं।

निद्रा देवी ही नींद की अधिष्ठात्री है। “श्री निद्रा है” मंत्र मैंने डिज़ाइन किया है। श्री से शरीरविज्ञान दर्शन का अद्वैत अनुभव होता है, जिससे कुंडलिनी मस्तिष्क में कुछ दबाव बढ़ाती है, निद्रा से वह कुंडलिनी दबाव के साथ निचले चक्रोँ में उतर जाती है, है से आदमी सामान्य स्थिति में लौट आता है। अगर योग करते हुए मस्तिष्क में दबाव बढ़ने लगे, तब भी यह उपाय बहुत कारगर है। दरअसल योग के लिए नींद भी बहुत जरूरी है। जागृति नींद के सापेक्ष ही है, इसलिए नींद से ही मिल सकती है। जो जबरदस्ती ही हमेशा ही सतोगुण को बढ़ा के रखकर जागे रहने का प्रयास करता है, वह कई बार मुझे ढोंग लगता है, और उससे आध्यात्मिक जागृति प्राप्त होने में मुझे संदेह है। इसी तरह किताब में पढ़ते समय मुझे लगता था कि शाम्भवी मुद्रा पता नहीं कितनी बड़ी चमत्कारिक विद्या है, क्योंकि लिखा ही ऐसा होता था। लेखन इसलिए होता है ताकि कठिन चीज सरल बन सके, न कि उल्टा। सब कुछ सरल है यदि व्यावहारिक ढंग से समझा जाए। नाक पर या नासिकाग्र पर नजर रखना कुंडलिनी शक्ति को केंद्रीकृत कर के घुमाने के लिए एक आम व साधारण सी प्रेक्टिस है। एकसाथ दोनों आँखों से बराबर देखने से आज्ञा चक्र पर भी ध्यान चला जाता है, यह भी साधारण अभ्यास है। जीभ को तालू से ज्यादा से ज्यादा पीछे छुआ कर रखना भी एक साधारण योग टेक्टिक है। इन तीनों तकनीकों को एकसाथ मिलाने से शाम्भवी मुद्रा बन जाती है, जिससे तीनों के लाभ एकसाथ और प्रभावी रूप से मिलते हैं। इसीलिए जीवन संतुलित होना चाहिए ताकि उसमें पूरे शरीर का बराबर योगदान बना रहे, और शरीर कुमान्द्रा अर्थात संतुलित बना रहे। संतुलन ही योग है। इसी तरह रत्न के टुकड़े लोगों का ड्रन से स्थायी बचाव नहीं कर पा रहे थे। यह राजयोग वाला उपाय है, जिसमें केवल मन या दिल में कुंडलिनी चित्र का ध्यान किया जाता है, हठयोग के योगासन व प्राणायाम आदि के रूप में पूरी योगसाधना नहीं की जाती। इसलिए जबतक कुंडलिनी चित्र का ध्यान किया जाता है तब तक तो वह बना रहता है, पर जैसे ही ध्यान हटाया जाता है, वैसे ही वह एकदम से धूमिल पड़ जाता है। यही बैंज कबीले वाला स्थानीय उपाय है। इससे मन या हृदय में तो ड्रन से बचाव होता है, पर अन्य चक्रोँ पर लोगों के पत्थर बनने के रूप में भावनाएँ दबती रहती हैं। इसलिए सम्पूर्ण, सार्वकालिक व सार्वभौमिक उपाय हठयोग के साथ यथोचित दुनियादारी ही है, राजयोग मतलब खाली बैठकर केवल ध्यान लगाना नहीं। ऐसा इसलिए क्योंकि हठयोग में पूरे शरीर का और बाहरी संसार का यथोचित इस्तेमाल होता है। संसार में भी पूरे शरीर का इस्तेमाल होता है, केवल मन व दिल का ही नहीं। हालांकि प्रारम्भिक तौर पर पूर्ण सात्विक राजयोग ही कुंडलिनी चित्र को तैयार करता है, और उसे संभाल कर रखता है। यह ऐसे ही है, जैसे बैंज कबीले के मुखिया ने रत्न को संभाल कर रखा हुआ था। कई लोग हठयोग के आसनों को देखकर बोलते हैं कि यह तो शारीरिक व्यायाम है, असली योग तो मन में ध्यान से होता है। उनका कहने का मतलब है कि मन रूपी चिड़िया बिना किसी आधार के खाली अंतरिक्ष में उड़ती रहती है। पर सच्चाई यह है कि मन रूपी चिड़िया शरीर रूपी पेड़ पर निवास करती है। पेड़ जितना ज्यादा स्वस्थ और फलवान होगा, चिड़िया उतनी ही ज्यादा खुश रहेगी।

गांव शहर में भी बसता, तन से न सही मन से मानें

Featured image as Painting by Kritika

हम गाँवों के गबरू हैं तुम सा 
शहर में जीना क्या जानें।
है गांव शहर में भी बसता तन
से न सही मन से मानें।
बस सूखी रोटी खाई है तुम सा शहद
में पला नहीं।
हमने न झेली न टाली ऐसी भी
कोई बला नहीं।
हमने न पेड़ से खाया हो फल
ऐसा कोई फला नहीं।
तब तक सिर को दे मारा है जब
तलक पहाड़ भी टला नहीं।
सिर मत्थापच्ची करते जब तुम
थे भरते लंबी तानें।
हम गाँवों -----
दिल-जान से बात हमेशा की तुम
सी घुटन में जिया नहीं।
है प्यार बाँट कर पाया भी नफ़रत
का प्याला पिया नहीं।
इक काम जगत में नहीं कोई भी
हमने है जो किया नहीं।
है मजा नहीं ऐसा कोई भी
हमने हो जो लिया नहीं।
फिर अन्न-भरे खेतों में खड़ के
दाना-दाना क्यों छानें।
हम गाँवों के ----
है इज्जत की परवाह नहीं
बेइज्जत हो कर पले बढ़े।
अपनों की खातिर अपने सर
सबके तो ही इल्जाम मढ़े।
कागज की दुनिया में खोकर भी
वेद-पुराण बहुत ही पढ़े।
हैं असली जग में भी इतरा कर
खूब तपे और खूब कढ़े।
बस बीज को बोते जाना था कि
स्वर्ण कलश मिलते न गढ़े
इस सोच के ही बलबूते हम तो
हर पल निशदिन आगे बढ़े।
फिर छोटा मकसद ठुकरा कर हम
लक्ष्य बड़ा क्यों न ठानें।
हम गाँवों के -----
जो शहर न होते फिर अपनी हम
काबिलियत को न पाते।
रहते अगर न वहाँ तो क्या है
घुटन पता कैसे पाते।
न लोकतंत्र से जीते गर ये
नियम-व्यवस्था न ढाते।
फिर बेर फली तरु न भाते गर
भेल पकौड़े न खाते।
हम साइलेंट जोन में न बसते तो
घाट मुरलिया न गाते।
हम रिमझिम स्नान भी न करते गर
नगर में न तनते छाते।
है रात के बाद सुबह आती तम से ही
लौ दमखम पाती।
है सुखदुख का चरखा चलता वह
न देखे जाति-पाति।
फिर अहम को अपने छोड़ के हम यह
सत्य नियम क्यों न मानें।
हम गाँवों ----
है ढोल-गंवार यही कहते बस
तुलसी ताड़न-अधिकारी।
है अन्न उगाता जो निशदिन वो
कैसे है कम अधि-कारी।
जो दुनिया की खातिर जाता हो
खेतों पर ही बलिहारी।
वो कम कैसे सबसे बढ़कर वो
तो मस्ती में अविकारी।
फिर ऊंच-नीच ठुकरा क्यों न हम
इक ही अलख को पहचानें।
हम गाँवों ---

कुंडलिनी ही वह औरोबोरस सांप है जो अपने मुंह में अपनी पूँछ दबाकर यब-युम जैसा लूप बनाता है

श अक्षर दिल का अक्षर है~ श्री बीजमंत्र

दोस्तों, जैसा कि पिछली पोस्ट में विषय चल रहा था कि स या श अक्षर इसलिए भी कुंडलिनी प्रभाव को पैदा करता है, क्योंकि नाग की आवाज भी हिसिंग या स जैसी ही होती है। इसी तरह श्री में भी सर्प की सर सर चलने का शब्द भी समाहित है। श व स शब्द से ही श्री शब्द या श्रीं बीजमंत्र बना है, जो देवी का मुख्य बीज मंत्र है। इसमें शं, रं, और ह्रीं तीनों बीजमन्त्रों की सम्मिलित शक्ति होती है। सम्भवतः अंग्रेजी का शी शब्द इसी श्री से बना है। मुझे तो श अक्षर से शक्ति हृदय चक्र को उतरी हुई महसूस होती है। श से ही शंकर और शम्भु शब्द बने हैं। शं का अर्थ ही शांति होता है। पुरुष में भी श अक्षर मुख्य है। मुझे तो श अक्षर भावनाओं का और दिल का अक्षर लगता है। बीजमंत्र का ध्यान करते समय मन के विचारों को रोकना नहीं चाहिए, तभी उनकी शक्ति कुंडलिनी को लगती है। यदि विचारों को बलपूर्वक रोक दिया जाए, तब उनकी शक्ति खत्म हो जाएगी, फिर वो कुंडलिनी को कैसे लग पाएगी।

अंधेरा अल्प अवधि का होता है, जबकि प्रकाश चिर अवधि तक रहता है~ नॉनवेज और ड्रिंक

फिर मैं बता रहा था कि कैसे हिंसक जीव शिकार के समय खूंखार हो जाते हैं। शिकार को मारकर उसे भोजन के तौर पर खाते समय तो शेर आदमखोर भी हो जाता है, जैसा हम बड़े बुजुर्गों से सुना करते थे। दरअसल ननवेज में शक्ति तो होती है पर उसे पचाने के लिए भी बहुत शक्ति लगती है। यह ऐसे ही है जैसे गढ़े हुए पत्थर से बनी इमारत शक्तिशाली या मजबूत तो होती है, पर पत्थर गढ़ने के लिए भी ज्यादा शक्ति लगती है, साथ में गढ़े हुए बड़ेबड़े पत्थरों को इमारत तक ढोने और उन्हें सही जगह पर फिट करने में भी ज्यादा ऊर्जा खर्च होती है। ननवेज आदि का बेवजह उपयोग करने वाले का हाल उस कृपण सेठ की तरह होता है, जो अपना कीमती और दुर्लभ जीवन बेवजह धन सम्पत्ति इकट्ठा करने में बर्बाद कर देता है, पर वह कुछ भी उसके उपयोग में नहीं आती। या कह लो कि यह ऐसे ही है जैसे कोई सिरफिरा व्यक्ति अपना घर बन जाने के बाद भी सारी उमर पत्थर ही गढ़ता रहे। शिकारभोज के समय तेन्दुए की शक्ति पेट को चली जाती है, और मस्तिष्क में शक्ति की कमी से सोचने समझने की शक्ति नहीं रहती, जिससे वह अपने नजदीक हर किसी को उकसावा समझकर उस पर हमला बोल देता है, जवाबी हमले की परवाह किए बगैर। यह अलग बात है कि आदमी का व्यवहार उससे भी गिरा हुआ प्रतीत होता है क्योंकि उसने बिना उकसावे के ही चीते का इतना शिकार किया कि वे देश से विलुप्त ही हो गए, इसीलिए उन्हें पुनः बढ़ावा देने के लिए नामीबिया से आठ चीते विशेष विमान से यहाँ पहुंचा दिए गए हैं। सम्भवतः इसीलिए किसी भोजन करते हुए से मिलने या बात करने से मना किया जाता है। एकबार मैं बचपन में अपनी खाना खाती हुई मुख्याध्यापिका के कक्ष में प्रविष्ट होकर किसी काम के सिलसिले में बात करने लगा। मुझे वे उस समय एक शेरनी की तरह लगीं और मैं एकदम बाहर दौड़ आया। हमेशा के लिए अच्छी सीख भी मिल गई थी। मेरा एक दोस्त था। जिस दिन वह बाजार से ननवेज खाकर या ड्रिंक करके आता था, सीधा बिस्तर में जाकर सो जाता था, और किसीसे भी बात नहीं करता था, अगले दिन तक। सम्भवतः उसे एहसास था कि ऐसे समय में थोड़ी सी कहासुनी से बात बढ़ जाती, क्योंकि मस्तिष्क में शक्ति की कमी से अंधेरा होने से भले-बुरे का भान नहीं रहता। सम्भवतः इस वजह से भी यह धार्मिक मान्यता बनी हो कि ननवेज से मन में अंधेरा छाता है, और पाप लगता है।

रूपान्तरण ही जीव की नियति है जो उसे परम तक ले जाती है~ क्या योग ज़ेलेंस्की और पुतिन की मदद कर सकता है

रूपान्तरण धीरेधीरे होता है। इसे हम ऐसे समझ सकते हैं कि जब दो लोग बहुत वर्षों बाद मिलते हैं, तो आपसी दुश्मनी भूलकर दोस्त बन जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अलगाव के दिनों में उन्होंने बहुत कुछ नया सीख लिया होता है, जिससे पुरानी भावनाएं कमजोर पड़ जाती हैं। यह ऐसे ही है जैसे यदि लिखे हुए ब्लैकबोर्ड पर आप जितना ज्यादा नया लिखेंगे, पुराने लिखे शब्द उतने ही मिटते जाएंगे। रूपान्तरण की यह रप्तार योग से इसलिए बहुत तेज हो जाती है क्योंकि इससे मन का कचरा बहुत जल्दी साफ हो जाता है। योग को आप मन रूपी ब्लैकबोर्ड का डस्टर कह सकते हैं। जैसे डस्टर के प्रयोग से पुराना लेख ज्यादा मिटता है, और नया लेख ज्यादा स्पष्ट हो जाता है, उसी तरह योग के प्रभाव से पुरानी भावनाएँ ज्यादा मिटती हैं, और नई स्वस्थ भावनाएँ ज्यादा स्पष्ट हो जाती हैं। यदि जैलेंस्की और पुतिन अगले जन्म में मिले तो सम्भवतःआपस में दुश्मनी बिल्कुल न रखें, पर यदि एक-दो महीने भी ढंग से योगाभ्यास कर लें, तो सम्भवतः तुरंत ही दुश्मनी भूलकर लड़ना बंद कर दें।

सभी धार्मिक गतिविधियां योग धारणा को बढ़ावा देने के कारण योग की प्राथमिक सीढ़ी की तरह हैं~ जब ध्यान शुरू होता है

जितनी भी धार्मिक गतिविधियां हैं, वे इसी योग धारणा को बनाए रखने के लिए है, जो मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था। इससे स्पष्ट होता है कि सभी धर्म योग विज्ञान के अंतर्गत ही आते हैं। धारणा से ही ध्यान की शुरुआत होती है, और ध्यान से ही समाधि अर्थात कुंडलिनी जागरण की।

धमाके में चेतना का आनंद ढूंढती आधुनिक मानव संस्कृति~ महा विस्फोट (big bang) इतना आध्यात्मिक है

बम का धमाका भी कुंडलिनी जागरण का तुच्छ और पापपूर्ण और अमानवीय विकल्प लगता है मुझे। इसमें वैसी ही प्रकाश, गर्मी, चेतनता और आनंद की अनुभूति होती है, जैसी कुंडलिनी जागरण में, हालांकि उससे बहुत कम और क्षणिक रूप में। समारोह, त्यौहार आदि में चलाए जाने वाले पटाखे इसका अच्छा उदाहरण है। हालांकि यह मानवीय है अगर सीमा में रहे। सम्भवतः इसीलिए कई सिरफिरे चेतना की इसी क्षुद्र झलक की प्राप्ति के लिए युद्धाभ्यास के नाम पर धमाके करने लग जाते हैं। इससे जाहिर होता है कि योग से इस पर लगाम लग सकती है।

गंगास्नान से जो पाप धुलते हैं, वे योग से ही धुलते हैं~ सहस्रार के लिए एक अद्भुत मार्ग

गंगा में स्नान करने से पाप धुलते हैं, ऐसा कहा जाता है। दरअसल ऐसा कुंडलिनी शक्ति के मूलाधार से सहस्रार की तरफ चढ़ने से होता है। कहते हैं कि उन पापों को वहाँ आने वाले ऋषिमुनि ग्रहण कर लेते हैं। इसका मतलब है कि जब मस्तिष्क में शक्ति के पहुंचने से वह बहुत शक्तिशाली हो जाता है, तब उसमें किसी देवता या गुरु का जो चित्र कुंडलिनी चित्र अर्थात ध्यान चित्र के रूप में उभरता है, उसमें उन तपस्वी लोगों का बहुत ज्यादा योगदान होता है। वही कुंडलिनी चित्र पापों को जलाता है, सीधा गंगास्नान नहीं। मतलब कि पापों का नाश गंगास्नान से हो रहे योग से ही होता है। यदि ध्यान चित्र नहीं बनेगा, तब मस्तिष्क की बेकाबू शक्ति अमानवीय कामों या लड़ाईझगड़े की तरफ भी जा सकती है। पुतिन बर्फीले पानी में आराम से नहा लेते हैं, पर कुंडलिनी जागरण के लिए नहीं, लड़ने के लिए। इसलिए योग के साथ ध्यान भी जरूरी है। मैं यह भी बता रहा था कि यदि कमजोरी या ठंड महसूस होए तो ठंडे पानी से नहीं नहाना चाहिए। इसी तरह यदि समय की कमी हो तो भी ठंडे पानी से नहीं नहाना चाहिए। कम से कम आधा घंटा तो चाहिए ही शीतजल स्नान के लिए। नहाते समय बीचबीच में मांसपेशियों की सिकुड़न के साथ कुंडलिनी शक्ति को घुमाते रहना पड़ता है, ताकि उससे गर्मी पैदा होती रहे और ठंड का असर कम होए। स्नान के एकदम बाद योग व व्यायाम कर लेना चाहिए ताकि जल्दी से जल्दी शरीर को पर्याप्त गर्मी मिल सके। शाम के समय अतिरिक्त समय भी ज्यादा होता है, और दिनभर की क्रियाशीलता से गर्मी भी चढ़ी होती है, इसलिए शाम को नहाया जा सकता है।

दिल दा मामला है~ इसे बहुत ठंड से बचाएं

सबसे ज्यादा ठंड का प्रभाव दिल पर पड़ता है। इसलिए दिल पर विशेष रूप से कुंडलिनी चित्र का ध्यान करते रहो, ताकि पूरे शरीर की शक्ति वहाँ विशेष रूप से केंद्रित होती रहे। इससे हृदय क्षेत्र की मांसपेशियों में सिकुड़न होगी जिससे वहाँ गर्मी बढ़ेगी और रक्तसंचार बढ़ेगा। साथ में शक्ति को घुमाते भी रहें माइक्रोकोस्मिक औरबिट में। वैसे भी दिल शरीर के बीच में ही प्रतीत होता है, अगर सभी चक्रोँ को लेकर चलें तो। नाभि चक्र तो तब शरीर के केंद्र में महसूस होता है, जैसा कि कहा भी जाता है, यदि टांगों को भी चक्रोँ के साथ जोड़ा जाए। दिल से ही शक्ति को शक्ति मिलती है, और शक्ति ही दिल को भी शक्ति देती है। हिसाब बराबर। इसीलिए दिल केंद्र में है। जब शीर्ष चक्र को शक्ति चढ़ने से दिल कुछ थक सा जाता है, तब उस शक्ति का कुछ हिस्सा दिल की ओर वापिस मुड़कर उसे भी शक्ति देता है।इससे जुड़ा मैं दो तीन साल पुराना एक वाकया सुनाता हूँ। एकबार मैं किसी समारोह दावत आदि से घर आ रहा था। ठंड का मौसम था। दावतकक्ष में तो गर्मी के सारे इंतजाम थे, जिससे मेरी स्किन की रक्तवाहिनियाँ खुली हुई थीं। पर रात को एक जंगली घाटी से गुजरते हुए मोटरसाइकल पर मुझे बहुत ठंड लगी। ठंड का मौसम शुरु ही हुआ था इसलिए मैंने गर्म कपड़े भी नहीं पहने थे। चलती बाईक पर तो ठंडी हवा के थपेड़े ज्यादा ही लगते हैं। आसपास घर भी नहीं थे जहाँ रुक जाता। जानवरों से भरा हुआ रात का डरावना जंगल ही था चारों तरफ। तभी मुझे दिल में अजीब सी धड़कनेँ महसूस हुईं। ऐसा लगा जैसे मेरी छाती का दौड़ता हुआ घोड़ा कभी छलांगें लगा रहा है, और कभी रुक रहा है। कुदरती चेष्टा से मैंने बाइक रोकी और मैं घुटनों को बाजुओं से घेरकर बैठ गया ताकि हृदय को गर्मी और राहत मिल सके। फिर दिल सामान्य हो गया। जैसे ही मैं उठने लगा, वैसे ही मेरा दिल फिर वैसे ही नखरे करने लगा। मैं फिर से दिल को ढक कर बैठ गया। मैंने उसी हालत मैं जेब से फोन निकाला और एक दोस्त को कार लेकर आने को कहा। वो खुद ही मुझे सहारा देकर कार के अंदर ले गए। उन्होंने मेरी बाइक खुद ही सही जगह पर लगा दी क्योंकि मैं कुछ नहीं कर पा रहा था। जैसे ही मैं जरा सा भी अपने को खुला छोड़कर ठंडी हवा के सम्पर्क में आता था वैसे ही दिल वैसी ही हरकत शुरु कर देता था। मैंने अपने आपको ऐसे पैक किया हुआ था कि कम से कम हवा के सम्पर्क में आऊं। उन्होंने कार का हीटर चलाया जिससे मैं एकदम सामान्य हो गया। फिर वो कहने लगे कि डॉक्टर को दिखा लो, चेकअप करा लो आदि। मैंने कहा वह घटना बिमारी से नही, ठंड से थी, इसलिए अल्पकालिक थी, क्योंकि मैं फिर अपने को पहले से भी ज्यादा स्वस्थ महसूस कर रहा था। ठंड के मौसम में लेट नाइट दावतों से बचना चाहिए। उनमें ड्रिंक का प्रयोग तो बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। इससे चमड़ी की रक्तवाहिनियाँ और ज्यादा खुल जाती हैं। इससे दो नुकसान होते हैं। एक तो आदमी को बाहर की ठंड का अहसास ही नहीं होता, क्योंकि चमड़ी में झूठी गर्मी बनी रहती है। दूसरा, इससे शरीर की बहुत सारी गर्मी बाहर निकल जाती है। मेरे मामा के एक प्रोढ़ उम्र के चचेरे भाई को ड्रिंक करने की आदत थी। वे सर्दियों के मौसम में एक सुनसान जैसे रास्ते पर मृत मिले। दरअसल वे ड्रिंक करके देर रात की ठंड में अकेले रास्ते से गुजर रहे थे। वहाँ ठंड लगने से वे गिर पड़े होंगे। नशे की हालत में अपने को गर्मी देने के उनके सारे प्रयास विफल रहे होंगे। देर रात होने की वजह से उन्हें किसी की सहायता भी नहीं मिली होगी।

योग-साँसों से वीर्यशक्ति ऊपर चढ़ती है~ नासिकाग्र (nose tip) टिप ध्यान का आसान तरीका

गहरे और धीमे सांस योगविधि से पेट से लेने से और नाक से आतीजाती हवा पर ध्यान देने से जो योगलाभ मिलता है, वह दरअसल वीर्य शक्ति के मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्रोँ से ऊपर चढ़ने से ही मिलता है। इसमें सांसों का कोई प्रत्यक्ष योगदान नहीं लगता मुझे। कोई ऑक्सीजन वगैरह का रोल भी नहीं लगता ज्यादा। सम्भोगयोग के समय भी अधिकांशतः इन्हीं सांसों के बल पर ही वीर्यशक्ति के आधोगमन को रोकते हुए उसे ऊपर चढ़ाया जाता है। नाकों से आतीजाती सांसों पर ध्यान देने से नाक या नासिका शिखा पर खुद ही ध्यान चला जाता है, जो शरीर के ठीक बीचोंबीच है। इससे बीच वाली नाड़ी सुषुम्ना के क्रियाशील होने से वीर्यशक्ति के रूपान्तरण से बनने वाली प्राणशक्ति शरीर के बीचोंबीच चारों तरफ ज्यादा अच्छे से घूमने लगती है।

शक्ति को प्रेरित करने वाला चेतन आत्मा ही है और हम सभी औरोबोरस सांप जैसे हैं~ कुंडलिनी शक्ति मूलाधार में क्यों रहती है

योग का जो जलंधर बंध होता है, वह इसलिए लगाया जाता है ताकि मस्तिष्क तक चढ़ी हुई कुंडलिनी शक्ति आगे के चैनल से नीचे उतर सके और इस तरह एक बंद लूप में गोलगोल घूमती हुई सभी चक्रोँ को एकसाथ शक्ति देती रह सके। ठंडे पानी से नहाते समय सिर खुद ही आगे को नीचे झुक जाता है। इससे स्वाधिष्ठान चक्र का दबाव भी कम हो जाता है। यह ऐसे ही है जैसे एक विशालकाय और अनेक फनों वाला नाग अपनी दुखती पूँछ को मुंह से पकड़ने के लिए आगे को झुक जाता है और उसे अपने केंद्रीय फन से पकड़ने का प्रयास करता है।  मिस्र और यूनान का Ouroboros अर्थात औरोबोरस सांप भी इसीको दर्शाता है। लगता तो है कि पुराने समय में गंगास्नान करते हुए जब आध्यात्मिक लोगों को इन स्वयं होने वाली शरीरवैज्ञानिक प्रक्रियायों का बोध हुआ, तो उन्होंने इनके आधार पर कृत्रिम हठयोग का निर्माण कर दिया होगा। वैसे भी शक्ति को मूलाधार में स्थित बताया जाता है। उस शक्ति को दिमाग तक पहुंचाना होता है, क्योंकि मस्तिष्क ही पूरे शरीर और मन का मुखिया है। अगर मस्तिष्क में शक्ति है, तो पूरे तनमन में खुद ही शक्ति रहेगी। औरोबोरस की पूंछ उसके मुंह में होने का मतलब है कि योगी तांत्रिक कुंडलिनी योग से शक्ति को मुलाधार से मस्तिष्क तक पहुंचा रहा है। पर ऐसा भी नहीं है कि मूलाधार के इलावा कहीं शक्ति नहीं है। अगर ऐसा होता तो नपुंसक या बच्चे बिल्कुल शक्तिहीन होते। पर ऐसा नहीं है। सामान्य शक्ति तो उनमें भी होती है। इसका सीधा सा मतलब है कि मूलाधार में अतिरिक्त शक्ति होती है, जो मस्तिष्क को प्राप्त हो सकती है। वही अतिरिक्त शक्ति कुंडलिनी के लिए बहुत जरूरी होती है, क्योंकि सामान्य शक्ति से वह ढंग से क्रियाशील नहीं हो पाती, जागरण तो दूर की बात है। सम्भवतः कुंडलिनी शक्ति को ही मुलाधार में रहने वाली बताया गया है, सामान्य शक्ति को नहीं। हालांकि अपवाद तो हर जगह है। मूलाधार शक्ति के बिना भी कुंडलिनी जागृत हो सकती है, बेशक विरले मामलों में ही।

यब-युम जैसा यौनक्रीड़ामय आसन ही औरोबोरस सांप है~ सूक्ष्म ब्रह्मांडीय कक्षा (microcosmic orbit) का सबसे आसान तरीका

इसमें वैसे ज्यादा विस्तार से जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इस पैराग्राफ की हैडिंग से ही बात स्पष्ट है। फिर भी इससे जुड़ा वैज्ञानिक सिद्धांत तो डिस्कस कर ही सकते हैं। क्योंकि सांप की पूँछ पूरा झुकने पर भी काफी नीचे रह जाती है, जिससे वह उसे अपने मुंह में नहीं ले सकता, इसलिए वह सर्वोपयुक्त चीज को अपनी पूँछ से जोड़कर उसे इतना लम्बा करता है, ताकि वह उसके मुंह तक आसानी से पहुंच सके। इससे सांप का ऊर्जा चक्र पूर्ण हो जाता है, जिससे वह आनंद के साथ अतिरिक्त शक्ति प्राप्त करता है। उस रूपकात्मक नर सांप की पूँछ में जोड़ने के लिए सर्वोत्तम चीज क्या हो सकती है, यह सबको ही पता है। मादा सांप के जुड़ने से यिन-यांग भी आपस में जुड़ जाते हैं, इससे अद्वैत और कुंडलिनी अभिव्यक्त होने से और अतिरिक्त आनंद प्राप्त होता है, और आध्यात्मिक विकास भी होता है, जिसका चरम कुंडलिनी जागरण है। हैरतङ्गेज सृष्टि रचने वाले से बढ़कर बुद्धिमान भला कौन हो सकता है। इसका अनुभव के अतिरिक्त एक और प्रमाण है, कई जगह इस सांप को यिन-यांग के रूप में दिखाना। इसके लिए सांप का ऊपर वाला हिस्सा काले और नीचे वाला आधा हिस्सा सफेद रंग का दिखाया जाता है। इससे तो काफी स्पष्ट हो जाता है कि यब-युम को ही ओरोबोरस सांप के रूप में दिखाया गया है, क्योंकि इसी आसन में काला रंग मतलब यिन मतलब स्त्री भाग ऊपर होता है, और श्वेत रंग मतलब यांग मतलब पुरुष भाग निचली साइड होता है। कुछ सांप हकीकत में विरले मामले में अपनी पूँछ को खाते हैं, खासकर तब जब वे बाहरी वातावरण की बहुत ज्यादा गर्मी से और भूख से परेशान होते हैं। हो सकता है कि वे किसी कुशल तांत्रिक की तरह ही मूलाधार से ऊर्जा लेते हों, और उसे गोलगोल घुमाते हों, ताकि शरीर की ऊर्जा की कमी को पूरा कर के स्थिर हो सकें। पर दिमाग़ की कमी से वे मजबूरन पूँछ को निगल ही जाते हैं, और आगे बढ़ते हुए खुद को भी। सम्भवतः सर्प की यह ऊर्जा-ट्रिक भी विभिन्न धर्मों में उसका महत्त्व बनाने में जिम्मेदार हो।

अध्यात्मवैज्ञानिक खोजों और अविष्कारों का युग शुरु हो गया है~ यौन उपकरण ज्यादा बन रहे हैं

लगता है कि अति आदर्शवादी मध्ययुग और आधुनिक युग में उपरोक्त यब-युम जोड़े से यब भाग गायब सा हो गया, और युम ही बचा रहा। उसकी जगह पर साधारण कुंडलिनी योग का प्रचलन बढ़ा, जिसमें यब की कमी को कुंडलिनी को आगे के चक्रोँ से नीचे उतार कर किया गया। हालांकि यब के साथ भी कुंडलिनी ऐसे ही उतरती थी, यद्यपि यब से इस प्रक्रिया को बहुत बल मिलता था, और जीवंतता मिलती थी। आदर्शवादी योग में यम के अंदर ही यब को कल्पित कर दिया गया। एक ही व्यक्ति में यब को यम के साथ स्थायी तौर पर जोड़ दिया गया, असरदारी की कीमत पर। फिर यब-युम गठजोड़ का असर बढ़ाने वाले अन्य बहुत से कृत्रिम उपायों का सहारा लिया गया हो, जैसे कि दोनों हाथों को एकसाथ जोड़कर नमस्कार मुद्रा बनाना, ऊर्धव-त्रिपुण्ड लगाना, जनेऊ धारण करना आदि। हो सकता है कि वैज्ञानिक इस पोस्ट को पढ़कर इस कमी का फायदा उठाकर यब अर्थात यिन की कृत्रिम डम्मी बना कर बाजार में पेश कर दे। विज्ञान आज व्यवसाय से जुड़ा है, और पैसा कमाने का कोई भी तरीका नहीं छोड़ना चाहता। आज अधिकांश भौतिक खोजें हो चुकी हैं। अधिकांश वैज्ञानिकों के पास अतिरिक्त समय है। वे भौतिक खोजों से ऊब भी चुके हैं, विशेषकर इनके पर्यावरणीय दुष्प्रभावों से तंग आकर। इसीलिए आज अध्यात्मवैज्ञानिक खोजें बहुत हो रही हैं। कोई कुंडलिनी को घुमाने वाली मशीन बना रहा है, तो कोई मूलाधार की संवेदना बढ़ाने वाले विशेष और यौन प्रकार के यंत्र या औजार बना रहा है।

हरेक व्यक्ति के अंदर पुरुष और स्त्री दोनों भाग समाहित हैं~ चार बराबर हिस्सों से एक पूरा शरीर बनता है

दरअसल हम सब यब-युम जोड़े के रूप में ही हैं, पर उसे भूल चुके हैं। उसे याद दिलाने के लिए ही पुरुष और स्त्री की अलगअलग रचना हुई है। पुरुष स्त्री का आलिंगन करना चाहता है, अपने शरीर के यब हिस्से को जगाने के लिए। उसके शरीर का केवल युम हिस्सा ही क्रियाशील होता है। हमारे शरीर का पीठ वाला भाग युम है। वह युम या पुरुष भाग वज्र नाड़ी से शुरु होकर, सुषुम्ना के रूप में मेरुदण्ड से होता हुआ सहस्रार चक्र पर समाप्त होता है। यब या स्त्री भाग भी वज्र नाड़ी को घेरने वाली लिंग संरचना से शुरु होकर शरीर के आगे के चक्रोँ से ऊपर होता हुआ सहसरार चक्र पर खत्म होता है। पुरुष और स्त्री भाग वज्र शिखा पर, जिसे प्रकारान्तर से मूलाधार चक्र भी कह सकते हैं, और सहस्रार चक्र पर पूरी तरह से आपस में जुड़े होते हैं, यह मान के चल सकते हैं। बाकि चक्रोँ पर भी ये आपस में जुड़ने की कोशिश करते हैं। चित्रों में भी ऐसा ही दिखाया जाता है। वहाँ आगे और पीछे के चक्र आपस में एक रेखा से जुड़े दिखाए जाते हैं। चित्रों में तो शरीर के बाएं और दाएं भाग में इड़ा और पिंगला दिखाए जाते हैं। ये भी सही है। इड़ा यब है, और पिंगला युम है। सुषुम्ना मेरुदण्ड के बीच में है। पर सम्भोग योग से तो शक्ति सीधी ही सुषुम्ना से होते हुए सहस्रार में ली जाती है। मेरे को लगता है कि इड़ा और पिंगला वाले टोटके तो साधारण किस्म के योगों में होते हैं। तांत्रिक सम्भोग योग तो शोर्टेस्ट रूट है, क्योंकि इसमें इड़ा और पिंगला आती ही नहीं, शक्ति सीधी सहस्रार में पहुंच जाती है। कमजोरी की अवस्था में कई बार इड़ा और पिंगला की वजह से व्यवधान आ तो सकता है, पर वह हल्का होता है, और आसानी से काबू में आ जाता है। इसीलिए तो सम्भोग के प्रति दुनिया में सबसे ज्यादा आकर्षण दिखाई देता है। पर आम आदमी इसकी अध्यात्मवैज्ञानिकता को समझ नहीं पाता। वह इसीमें उलझा रहकर अपना जीवन समाप्त कर लेता है। पर योगी इससे योग-लाभ उठाकर अपने शरीर में ही यब-युम को पूरी तरह से अभिव्यक्त करके उभयलिंगी अर्थात अर्धनारीश्वर बन जाते हैं, और पृथक स्त्री अर्थात यब के आकर्षण के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। इसका यह मतलब नहीं कि वे फिर सम्भोग योग नहीं करते। वे करते हैं, पर उन्हें इसकी कम जरूरत पड़ती है। उससे वे अपने स्वसम्भोग योग अर्थात एकलिंगी सम्भोग योग को बल देते रहते हैं। कई तो इतने अभ्यस्त, कार्यकुशल और निपुण हो जाते हैं कि वे कभी भी मूलाधार स्थित वीर्यशक्ति को नहीं गिराते, और हमेशा उसे ऊपर चढ़ाकर अपने शरीर में आत्मसात कर लेते हैं। उपरोक्त चर्चा से यह बात तो स्पष्ट हो ही जाती है कि जैसे शरीर का बायां और दायां भाग यब और युम है, उसी तरह से शरीर का आगे और पीछे का भाग भी यब और युम ही है। मतलब कि पूरा शरीर चारों तरफ से दो विपरीत टुकड़ों को जोड़कर बना है। सम्भवतः त्रिआयामी स्वस्तिक चिह्न का यही मतलब हो। सम्भवतः शक्ति को स्त्री के रूप में इसीलिए दिखाया जाता है, क्योंकि शरीर का आगे का भाग जो स्त्रीरूप है, वही आकर्षक है, और उसीकी शक्ति इकट्ठी होकर और नीचे जाकर मूलाधार क्षेत्र में स्थित हो जाती है, जहाँ से वह पीठ से होते हुए ऊपर चढ़ने का प्रयास करती है।

शीतजल स्नान से यबयुम जनित कुंडलिनी लाभ कैसे मिलता है~ मांस शरीर तंत्रिका शरीर पर मढ़ा हुआ

जब पूरे शरीर पर ठंडा जल गिरता है, तो उसकी संवेदना नाड़ियों के द्वारा ग्रहण कर ली जाती है, क्योंकि पूरे शरीर में नाड़ियों का जाल है। इससे नरम बाहरी शरीर और सख्त आंतरिक शरीर आपस में जुड़ जाते हैं, मतलब यब और युम एक हो जाते हैं। इससे अद्वैत भाव और उससे कुंडलिनी शक्ति क्रियाशील हो जाती है, कुंडलिनी चित्र के साथ। प्रत्येक संवेदना समान प्रभाव डालती है, इसलिए किसी भी दर्द की अनुभूति के बाद अद्वैत के साथ आनंद की अनुभूति होती है।

प्रकृति स्त्री-रूप है और आत्मा पुरुष-रूप है~ दो महत्वपूर्ण कोष या शरीर

नाड़ी संरचना पुरुष है और उस पर मृदु व सुंदर पेशीय संरचना नारी है। बेसिक नर्वस स्ट्रक्चर सेंसिटिव लाइफ पाने के लिए सॉफ्ट बाहरी स्ट्रक्चर को आकर्षित करता है। अंत में, आत्मा ही पुरुष है क्योंकि यही तंत्रिका तंत्र की सभी संवेदनाओं का आनंद लेती है। सारा दृश्यमय जगत स्त्री या प्रकृति रूप है, क्योंकि यह पुरुष को संवेदना प्रदान करता है। सांख्य दर्शन में भी ऐसा ही कहा गया है। इसमें प्रकृति को भोग्या और पुरुष को भोक्ता कहा गया है। क्यों न इन दो मुख्य आवरणों को ही दो मुख्य कोष न मान लें, जटिल पांच कोशों के विपरीत।

हिंदू स्वस्तिक चिह्न का अध्यात्मवैज्ञानिक रहस्य~ स्वस्तिक का केंद्रीय बिंदु एक पूर्ण और संतुलित इंसान का प्रतिनिधित्व करता है

त्रिआयामी स्वस्तिक चिह्न में आगे की तरफ की छोटी डंडी यम है, और पीछे की तरफ की छोटी डंडी यब है। दोनों डंडियां सीधी खड़ी लम्बी डंडी से जुड़ी हैं, मतलब यब और युम एक होकर बढ़ी हुई जागृति का निर्माण कर रहे हैं। इसी तरह दो छोटी डांडियां शरीर के बाएं भाग के यब और शरीर के दाएं भाग के युम को दर्शाती हैं, क्योंकि वे दोनों इसी दिशा में थोड़ी लम्बी व तिरछी डंडी से आपस में जुड़ी हैं। यह भी बढ़ी हुई जागृति दिखाती है। फिर खड़ी और तिरछी दोनों लम्बी डंडीयां केंद्र में एक बिंदु पर आपस में जुड़ी हैं। इसको दोनों तरफ के यब-युम जोड़ों की बराबर शक्ति मिल रही है, इसलिए यह बिंदु सबसे शक्तिशाली है। इसका मतलब है कि अपने शरीर के अंदर के दाएं-बाएं भाग के यब-युम को संतुलित करने के साथ ही स्त्री-पुरुष जोड़े वाला अर्थात शरीर के आगे-पीछे के भागों वाला यब-युम भी संतुलित होना चाहिए। और दोनों किस्म के यब-युम जोड़े भी आपस में संतुलित होने चाहिए। यह अलग बात है कि क्या कोई अपने शरीर के अंदर ही स्त्री-पुरुष जोड़ा ढूंढ लेता है, तो कोई बाहर से किसी यौन साथी की सहायता लेता है।

पुरुष के लिए स्त्री स्त्री है और स्त्री के लिए पुरुष स्त्री है~ यौन भेदभाव भ्रमपूर्ण और सापेक्ष है, सत्य और निरपेक्ष नहीं है

दरअसल स्त्री का अस्तित्व ही नहीं है। हर जगह पुरुष ही पुरुष है। स्त्री हमें भ्रम से दिखाई देती है। यह मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि सम्भोग योग के समय स्त्री भी अपनी रज शक्ति को इसी तरह अपनी पीठ से ऊपर खींचती है जिस तरह पुरुष वीर्य शक्ति को अपनी पीठ से ऊपर खींचता है। मेरुदण्ड ही दरअसल पुरुष है, जो पुरुष और स्त्री में एकसमान है। इसी तरह आत्मा ही पुरुष है जो दोनों में एकसमान है। इसी तरह शरीर का अगला हिस्सा ही स्त्री है, और वह भी दोनों में एकसमान है। जो स्त्री सम्भोग योग के लिए पहल करती है, वह पुरुष की तरह लगती है। ऐसा इसलिए क्योंकि वह यौन योग से अपनी मूलाधारनिवासिनी शक्ति को ऊपर खींचना चाहती है। जो पुरुष सम्भोग योग से शर्माए, वह स्त्री की तरह प्रतीत होता है। वह इसलिए क्योंकि वह इसलिए सम्भोग योग से दूर भाग रहा है, क्योंकि वह शक्ति को ऊपर नहीं खींच पाएगा, और उसे नीचे की ओर गिरा देगा, शरीर के स्त्रीरूप अगले भाग की तरह। इसलिए स्त्री को स्त्रीरूप समझना मुझे ऐतिहासिक साजिश लगती है, जिसके अनुसार स्त्री अपनी शक्ति गिराती रहे, और पुरुष अपनी शक्ति उठाता रहे। पर तंत्र में ऐसा नहीं है। तंत्र में अपनी शक्ति उठाने का दोनों को समान अधिकार है। इसीलिए तंत्र में स्त्री पुरुष दोनों बराबर हैं। हालांकि यह अलग मामला है कि पुरुष को यौन शक्ति के संरक्षण की ज्यादा आवश्यकता है, क्योंकि तुलनात्मक रूप में उससे स्त्री साथी से कहीं ज्यादा शक्ति की बर्बादी होती है।

स्त्रीपुरुष का जोड़ा जितना बराबर उतना अच्छा, हालांकि बेमेल जोड़ यिन-यांग गठबंधन को बढ़ावा देते हैं

मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि एकसमान कद-काठी होने से पूरे शरीर में व्याप्त यिन और यांग आपस में ज्यादा अच्छे से घुलमिल जाते हैं, जिससे ज्यादा अच्छा अद्वैत भाव पैदा होता है। इससे ज्यादा कुंडलिनी लाभ मिलता है। वैसे तो पुरुष और स्त्री दोनों अपने एक ही शरीर में होते हैं, पर उसे पाने के लिए बाहर से मदद लेनी ही पड़ती है। देखा जाए तो यौन शक्ति के आध्यात्मिक रूपान्तरण के लिए दो-चार इंच का क्षेत्र ही काफी होता है, पर यिन-यांग के गठजोड़ के लिए तो भरापूरा और विपरीतता के साथ मिलताजुलता शरीर चाहिए होता है। इससे अतिरिक्त लाभ मिलता है। लगता है कि पुराने जमाने में इसपर ज्यादा गौर नहीं किया जाता था, इसीलिए विवाह से पहले शरीर मिलाने की बजाय नवग्रह-जन्मपत्री मिलाई जाती थी। पता नहीं इसमें क्या विज्ञान है कि प्रत्यक्ष को नजरन्दाज करके अनुमान पर भरोसा किया जाए। सम्भवतः यह नियम सामाजिक समरसता बनाए रखने के लिए भी था, ताकि सभी मर्द चंद खूबसूरत औरतों पर ही न टूट पड़ते, और कुरूप औरतें अविवाहित ही न रह जातीं या उन्हें निम्न दर्जे के मर्द से ही संतुष्ट न होना पड़ता। दरअसल व्यवहार में होता क्या है कि यदि यिन-यांग अच्छे से मैच हो जाए, तो कदकाठी मैच नहीं करते, और यदि कदकाठी अच्छे से मैच हो जाए, तो यिनयांग अच्छे से मैच नहीं होते। इसलिए समझौता करना पड़ता है। यदि दोनों गुण सर्वोत्तम रीति से मैच हो जाए, तो सर्वोत्तम जोड़ी मानी जाए। मेरे साथ भी ऐसा ही होता था। यिनयांग बहुत जबरदस्त ढंग से मैच होता था, पर कदकाठी जरा भी मैच नहीं होते थे। अंततः जन्मपत्री के ऊपर ही सभी कुछ छोड़ना पड़ा। इससे सब ठीक ही रहा। बोलने का मतलब है कि यदि प्रत्यक्ष से काम न बने, तभी पूरी तरह से अदृश्य के सहारे होना चाहिए। वैसे कुल मिलाकर यह निष्कर्ष भी निकलता है कि छोटी कद-काठी यिन है, और बड़ी कद-काठी यांग होता है। इसलिए लम्बू-छोटू जोड़ी बनना भी स्वाभाविक और योगानुसार ही है।

चाइनीज यिन सुस्त और यांग चुस्त है, जबकि तांत्रिक यिन चुस्त और यांग सुस्त है~ दो प्रकार के यौन तंत्र

इसका मतलब है कि चाइनीज सिस्टम में विषमवाही तंत्र को ज्यादा मान्यता है, जबकि भारतीय तंत्र में समवाही तंत्र को। विषमवाही तंत्र मतलब औरत को एक तांत्रिक मशीन समझा जाता है। उसकी इससे ज्यादा अपनी कोई अहमियत नहीं। इसलिए वह सुस्त और दबी हुई सी रहती है। उसकी सहायता से प्रकाश अर्थात कुंडलिनी को घुमाया जाता है। उस कुंडलिनी के रूप में कोई भी मानसिक चित्र हो सकता है, पर वह स्त्री नहीं। इसके विपरीत समवाही तंत्र में स्त्री को कुंडलिनी अर्थात देवी का रूप दिया जाता है। इससे वह अपनी मनमोहक छटाएं प्रदर्शित करती है। इससे स्त्री को भरपूर सम्मान मिलता है। उसे पुरुष के बराबर या उससे भी बढ़कर माना जाता है। आपने देखा होगा कि कैसे भगवान विष्णु देवी लक्ष्मी की, भगवान शिव देवी पार्वती की और भगवान ब्रह्मा देवी सरस्वती की सेवा में लगे रहते हैं। बाकि अपवाद तो हर सिस्टम में ही देखे जाते हैं।

क्या हम स्वाधिष्ठान चक्र के जागरण को बिमारी तो नहीं मान रहे? प्रोस्टेट संभोग शिश्न संभोग से बेहतर है

यहाँ पर बेनाइन प्रॉस्टेट हाइपरट्रॉफी मतलब बीएचपी या प्रॉस्टेट की जलन अर्थात इन्फलेमेशन का जिक्र हो रहा है। परमात्मा शिव ने पूर्वोक्त कार्तिकेय जन्म की कथा में कबूतर बने अग्निदेव को कहा था कि तेरी जलन ठंडे जल से स्नान करने वाली ऋषिपत्नियां हर लेंगी। उस जलन को ही विज्ञान की भाषा में प्रॉस्टेट इंफ्लेमेशन अर्थात प्रॉस्टेटाइटिस या बीएचपी नामक रोग कहते हैं। कहीं यही स्वाधिष्ठान चक्र का जागरण तो नहीं, जिसे शीतजल स्नान से व कुंडलिनी योग से ठीक किया जा सकता हो। वैसे स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी मान रहे हैं कि ज्यादातर प्रॉस्टेट प्रॉब्लम चिंता या अवसाद से होती है, जिसे दूर करने के लिए योग एक रामबाण उपाय है। बात कुल मिलाकर वही है। ठंडे जल के स्पर्ष से वह जलन दूसरे चक्रोँ पर चली जाती है, मतलब वे जागृत हो जाते हैं। इसमें सबसे ज्यादा सम्भावना मणिपुर चक्र के जागृत होने की होती है, क्योंकि चक्र क्रमवार ही जागृत होते हैं। पर ऐसा भी नहीं हमेशा। यह जलन सीधी विशुद्धि चक्र और अनाहत चक्र को भी जा सकती है। उक्त कथा के अनुसार महादेव एक हजार वर्षों तक देवी पार्वती के साथ एक गुफा में विहार करते रहे, और अंततः उनका मूलाधार चक्र और फिर स्वाधिष्ठान चक्र जागृत हो गया। जब स्वाधिष्ठान चक्र जागृत हुआ, तब वे गुफा से बाहर आए मतलब आध्यात्मिक कामक्रीड़ा से विरत हुए। मेरे बोलने का मतलब है कि स्वाधिष्ठान चक्र के जागरण के रूप में जो कुदरत का तोहफा मिलता है, लोग उसे दूर करने के लिए इलाज करवाने भागते हों या उससे परेशान होते हैं, जबकि उसकी ऊर्जा अन्य चक्रोँ को देकर कुंडलिनी लाभ भी मिलता हो, और वह शांत भी रहता हो। ये मैं इसलिए भी कह रहा हूँ क्योंकि आजकल प्रॉस्टेट की उत्तेजना या जलन से प्राप्त प्रॉस्टेट आर्गेस्म प्राप्त करने की होड़ सी लगी है। बहुत से यंत्र और तकनीकें विकसित हो रही हैं इसके लिए। अनुभवी लोग बताते हैं कि पेनाइल आर्गेस्म के विपरीत प्रॉस्टेट आर्गेस्म बहुत ज्यादा चिरस्थायी होता है, और आनंद भी ज़्यादा देता है। पेनाईल आर्गेस्म तो स्खलन के कुछ क्षणों तक ही मौजूद रहता है। इसमें वाकई अध्यात्मवैज्ञानिक शोध की जरूरत है।

यौन संयम क्यों न अपनाया जाए~ वामपंथी और दक्षिणपंथी जीवन शैली के बीच एक स्वस्थ संतुलन

जैसा कि शिवपुराण में रहस्यात्मक रूप में कहा गया है कि वीर्यपात-अवरोधी सम्भोग से प्रॉस्टेट में स्थायी जलन अर्थात इन्फलेमेशन हो सकती है, हालांकि उसे दूर करने का उपाय भी बताया गया है, तब क्यों न यह मान लिया जाए कि वैष्णवों का दक्षिणाचार ही अच्छा है। या कम से कम यह मान लो कि मध्यमार्ग अच्छा है, जिसमें पुरुष-स्त्री के बीच में असीम सात्विक प्रेम होता है, पर शारीरिक संबंध नहीं होता। इससे यब-युम लाभ मिलने से कुंडलिनी भी घूमेगी, और स्वास्थ्य समस्या भी पैदा नहीं होगी। मतलब हर तरफ लाभ ही लाभ। तो मेरा मानना है कि विवाह न होने तक ऐसा ही परहेज रखना चाहिए। इससे स्वस्थ सामाजिकता भी बनी रहेगी और कुंडलिनी भी बनी रहेगी। विवाह के बाद तो प्रेम के साथ ज्यादा संयम रखना मुश्किल हो जाता है। साथ में, मुझे यह भी लगता है कि कुंडलिनी जागरण को प्राप्त करने के लिए बहुत शक्ति की जरूरत होती है, इसलिए भगवान शिव की तरह अविरत सम्भोग योग जरूरी है। जब एक-दो महीने के भीतर जागरण हो जाए, तो स्वास्थ्य सुरक्षा को देखते हुए सम्भोग कम कर दे। यदि जागरण न होए, तो भी 1-2 महीने ही प्रयास करे, क्योंकि इसका मतलब है कि व्यक्ति जागरण के लिए परिपक्व नहीं है, और अतिरिक्त प्रयास अधिकांशतः विफल ही जाएगा, व स्वास्थ्य समस्याएं भी पैदा करेगा। फिर कुछ वर्षों तक साधारण तांत्रिक कुंडलिनी योग का अभ्यास करते हुए जागरण के लिए पात्र बनाने वाला लाइफस्टाइल अपनाए, और उचित समय और अवसर और एकांत मिलने पर जैसे कि शांति, तनाव व काम के बोझ में कमी महसूस होने पर और शक्ति का अहसास होने पर फिर 1-2 महीने के लिए अविरत व समर्पित सम्भोग योग करे। इस तरह करता रहे। या दूसरा तरीका यह अपनाए कि भगवान शिव की तरह सर्व-आनंदमयी सम्भोग योग में सालों तक अर्थात तब तक दिनरात इच्छानुसार लगा रहे, जब तक कि प्रॉस्टेट में जलन न होने लगे अर्थात जब तक स्वाधिष्ठान चक्र जागृत न हो जाए, और उससे खुद ही सम्भोग से मन न ऊबने लगे। उस अवस्था के बाद आदमी उभयलिंगी सा बनकर अपने साथ ही संभोग योग करने लगता है। कामकाज के बोझ से उसके आगे के स्वाधिष्ठान चक्र पर जलन के रूप में शक्ति इकठ्ठा होती रहती है, जिसे वह योग व शीतजल स्नान की सहायता से पीठ से ऊपर चढ़ाता रहता है। यह चक्र चलता रहता है। इससे वह अंततः धीरेधीरे क्रमवार चक्रोँ को जागृत करते हुए सहस्रार को जागृत करके पूर्ण जागृति प्राप्त कर लेता है, उपरोक्त प्रथम उपाय की तरह एक-दो महीने के ताबड़तोड़ सम्भोग योग से एकदम से जागृति प्राप्त नहीं करता। इस पर भी मनोवैज्ञानिक शोध की जरूरत है।

शक्ति का प्रवाह नाड़ियों के माध्यम से होता है, जिसे विज्ञान की भाषा में नर्व कहते हैं~ कैसे शिव तक पहुँचती है शक्ति

कोई भी काम शक्ति से ही होता है। यदि सड़क पर गाड़ी चल रही है तो कहेंगे कि इंजन शक्ति से गाड़ी चली। अगर टांगा चल रहा है तो कहेंगे कि यह अश्व शक्ति से या संक्षेप में शक्ति से चल रहा है। शक्ति का भी कोई प्रेरक जरूर होता है। इंजन शक्ति और अश्व शक्ति, दोनों का प्रेरक ईंधन या अग्नि है। हमारा शरीर भी नाड़ी शक्ति या सिर्फ शक्ति से चलता है। यदि नाड़ी शक्ति न हो, तो हट्टाकट्टा शरीर भी किसी काम का नहीं है। आपने देखा होगा कि पक्षाघात के बाद कैसे बाजू या टांग काम करना बंद कर देती है। वैज्ञानिक रूप से शक्ति या नाड़ी शक्ति नर्व फाइबर्स की क्रियात्मक उत्तेजना के रूप में ही होती है। शरीर की इसी नाड़ी शक्ति को ही संक्षेप में शक्ति कहते हैं। क्या आपने कभी सोचा कि इस शक्ति को प्रेरित करने वाली क्या चीज है? दार्शनिकों ने ऐसा सोचा भी और लिखा भी, जो धर्मशास्त्रों में पढ़ने को मिल जाता है। इंजन की गति रूपी नाड़ी शक्ति को भोजन रूपी ईंधन के सहयोग से प्रेरित करने वाला तत्त्व अग्नि-चिंगारी रूपी चेतन आत्मा ही है। मूलाधार में जो आनंदपूर्ण संवेदना महसूस होती है, वही इस शक्ति को प्रेरित करती है। अर्थात यह सबसे बड़ी मात्रा वाली शक्ति को प्रेरित करती है, जिसे हम कुंडलिनी शक्ति कहते हैं। जब इसे प्राण वायु का विशेष बल भी साथ में मिले, तब इसे ही प्राण शक्ति भी कहते हैं। वैसे तो हर प्रकार का चेतन अनुभव हमारी शक्ति को प्रेरित करता रहता है, जिससे हम जीवित बने रहते हैं, पर क्योंकि मूलाधार की अनुभूति सबसे अधिक आनंददायक और चेतना से भरी है, इसीलिए इसे ही शक्ति या कुंडलिनी शक्ति या प्राण शक्ति का स्रोत कहा जाता है। मुझे आज यह बात समझ में आई कि शास्त्रों में ऐसा क्यों कहा गया है कि परमात्मा अर्थात चेतना ही शक्ति का मूल स्रोत है। शास्त्रों में वैज्ञानिक रूप से ज्यादा विस्तार नहीं लगता मुझे तथ्यों का, सम्भवतः इसीलिए क्योंकि पुराने युग में तथ्य विश्वास के आधार पर समझे या माने जाते थे, वैज्ञानिक जाँचपड़ताल के आधार पर नहीं। चेतना के इसी शक्तिप्रेरक योगदान के कारण ही डोपामीन अर्थात रिवार्ड कैमिकल काम करता है। जो चढ़दी कला में होते हैं, उनके आगे सफलता के द्वार एक के बाद एक खुलते जाते हैं। पर कई बार ज्यादा ही चढ़दी कला से उच्च रक्तचाप और तनाव आदि से संबंधित समस्याएं भी पैदा हो जाती हैं। यह ऐसे ही होता है जैसे बिजली की जरूरत से ज्यादा वोल्टेज से बल्ब ही फ्यूज हो जाता है। मूलाधार की संवेदना पर पैदा हुई शक्ति तो चढ़ेगी ही चक्र तक, क्योंकि उसके साथ चक्र पर चेतन कुंडलिनी का ध्यान किया जा रहा होता है। जिस रास्ते से शक्ति गुजरती है, उसे नाड़ी या चैनल कहते हैं। चक्र पर वह शक्ति ज्यादा प्रभाव पैदा करती है, क्योंकि वहाँ जड़ जैसी संवेदना के साथ चेतन कुंडलिनी चित्र का भी ध्यान होता है। इसीलिए कहते हैं कि शक्ति शिव की ओर गमन करती है। कई लोग कुंडलिनी योग से तृप्त नहीं होते। इसकी मुख्य वजह है कि उनके मूलाधार पर शक्ति ही पैदा नहीं हुई होती है। मूलाधार को हम शक्ति उत्पादक यंत्र कह सकते हैं। वे चक्रोँ पर कुंडलिनी चित्र का ध्यान भी करते हैं, पर फिर भी प्यासे से बने रहते हैं। शक्ति की प्यास को तो मूलाधार ही बुझा सकता है। प्रजनन से सृष्टि के विस्तार के लिए ही मूलाधार को विशेष शक्ति दी गई है। होता तो सब नर्व फाइबर से ही। मतलब कि मूलाधार में यह उत्तम गुणवत्ता का है। यह तो मुर्गी और अंडे के जैसी कहानी है। पहले मूलाधार में नर्व फाइबर की उत्तेजना से शक्ति पैदा होती है, फिर वह शक्ति मेरुदण्ड से होकर मस्तिष्क तक जाती है, और उससे मस्तिष्क में आनंदमयी संवेदना महसूस होती है, फिर वह आनंदमयी संवेदना भी नर्व फाइबरस को उत्तेजित करती है, जिससे और शक्ति पैदा होती है। मस्तिष्क से वह शक्ति नाड़ीजालों के माध्यम से पूरे शरीर में और मूलाधार तक फैल जाती है। मतलब शक्ति एक बंद लूप जैसा बनाती है। शक्ति का लूप में घूमना ही माईक्रोकोस्मिक औरबिट के आधार में है। यही बंद लूप ही औरोबोरस सांप है। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इसे रिफ़लेक्स आर्क कहते हैं। यदि उस समय हम किसी विशेष चक्र पर कुंडलिनी चित्र का ध्यान करें, तो शरीर के अन्य हिस्सों की अपेक्षा शक्ति उसी चक्र पर ज्यादा पहुंचती है, जिससे वहाँ कुंडलिनी चित्र और अधिक चमकने लगता है। मतलब कि शक्ति मानसिक चित्र को ज्यादा से ज्यादा चमकाने की कोशिश करती है, ताकि वह जागृत होकर शिव बन सके। यही शक्ति का शिव की तरफ गमन है। कुंडलिनी चित्र का मतलब किसी के ऊपर प्रेम न्योछावर करना नहीं है, बल्कि उसकी मदद से शक्ति को काबू करना है। कहीं ज़ख्म वगैरह हो जाए तो वहाँ दर्द और लाली पैदा हो जाती है। दर्द वह चेतन संवेदना है जो लाल रंग की शक्ति को अपनी ओर खींचती है। फिर कहेंगे कि जिन अंगों की दर्द महसूस नहीं होती, वहाँ शक्ति कैसे पहुंचती है और उनकी हीलिंग कैसे होती है। इसमें चेतना द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से काम होता है। जब दर्द वाले हिस्से से नाड़ी ऊर्जा मस्तिष्क को पहुंचती है, तो मस्तिष्क के अनुभव न होने वाले हिस्से में संवेदना पैदा करती है। इससे वहाँ बहुत सी नाड़ी ऊर्जा और उससे जुड़े रसायनों की खपत हो जाती है। इससे मस्तिष्क के चेतन अनुभव पैदा करने वाले हिस्से में नाड़ी ऊर्जा की कमी हो जाती है। इससे आदमी आनंदहीन सा रहने लगता है। इसलिए चेतना के आनंद को पैदा करने के लिए यही रास्ता बचता है कि शरीर की गहराई में दबे ज़ख्म को जल्दी से जल्दी भरा जाए। इसके लिए नाड़ी ऊर्जा उस ज़ख्म पर केंद्रित होने लगती है। दरअसल रक्त प्रवाह के आधार में यही नाड़ी ऊर्जा होती है। रक्त प्रवाह अगर गाड़ी है, तो उसे नियंत्रित करने वाली नाड़ी ऊर्जा उसका चालक है। चेतन आत्मा को आप स्टेशन मास्टर कह सकते हैं। जब हम नाड़ी ऊर्जा को मूलाधार से मेरुदण्ड के रास्ते ऊपर चूसते हैं, तब रक्त प्रवाह भी खुद ही ऊपर चला जाता है। इससे ही मूलाधार के आसपास का दबाव घटा हुआ महसूस होता है। रक्त तो मेरुदण्ड से ऊपर नहीं चढ़ सकता, क्योंकि उसमें नर्व फाइबर की एक रस्सी है, कोई रक्त की नलिका नहीं है। इसलिए कुंडलिनी योग का साधारण सा सिद्धांत है कि गाड़ी चालक को नियंत्रित करो, गाड़ी खुद नियंत्रित हो जाएगी।

नाड़ियों का जाल ही शिव पर लिपटे सर्प हैं~ नागों से भरा मानव शरीर

भगवान शिव पर लिपटे सर्प आदि को देखकर पार्वती की मां मैना डर गई थीं। दरअसल शिव एक महा योगी थे। उनके शरीर की हरेक नाड़ी जागृत थी, केवल सुषुम्ना ही नहीं। इससे वे हरेक नाड़ी में सरसराहट के साथ कुंडलिनी को महसूस करते रहते थे हमेशा। स्वाभाविक है कि उन सरसराहटों को अनुभव करते हुए उनके अंगों का स्वभाव व उनकी चाल भी सर्प की तरह हो गई हो, जिसे मैना महसूस कर पा रही हो। शायद योगी गोपीकृष्ण के साथ भी ऐसा ही होता था। उन्हें अपने शरीर की हरेक नाड़ी की गति महसूस होती थी। इससे वे परेशान भी हो गए थे। फिर वे उसके अनुसार ढल भी गए थे। इसी पर आधारित सुंदर रचना है शिवपुराण में, त्रिपुरासुर वध की, जो मैं निचले पैराग्राफ में लिख रहा हूँ, संक्षेप में।

त्रिपुरासुर राक्षस प्रकृति के तीन गुण हैं, और कुंडलिनी जागरण ही उनको मारना है~ एक शिव पुराण कथा का रहस्योद्घाटन

एक राक्षस का पुर सोने का, एक का चांदी का और एक का लोहे का था। ये क्रमशः सत्त्व, रजस और तमो गुण के प्रतीक हैं। राक्षस मतलब इन गुणों के साथ उठने वाली आसक्तिपूर्ण भावनाएँ। इनको मारने के लिए शिव मतलब आत्मा ने शरीर रूपी रथ बनाया, मंन्द्राचल मतलब मेरुदण्ड को धनुष बनाया, और वासुकि नाग मतलब सुषुम्ना नाड़ी को बाण बनाया। राक्षसों से युद्ध किया मतलब मूलाधार से कुंडलिनी शक्ति को योगसाधना से सुषुम्ना के रास्ते ऊपर चढ़ाया और उसे सहस्रार में जागृत किया। उससे प्रकृति के तीनों गुणों के प्रति सारी आसक्ति खत्म हो गई मतलब त्रिपुरारि राक्षस मर गए। इससे शरीर में बसने वाले देवता खुश हो गए क्योंकि वे शरीर के बंधन से मुक्त हो गए। कभी समय लगा तो इस पर और प्रकाश डालूंगा, पर मूल चीज यही है।

उज्जैन का महाकाल ज्योतिर्लिङ्ग

उज्जैन में महाकाल मंदिर में यह त्रिपुरासुर वाली घटना घटी थी, ऐसा कहते हैं। इसीलिए अभी हाल ही में निर्मित भव्य महाकाल कोरिडोर में इसको दर्शाती मूर्तियां और कलाकृतियाँ प्रमुखता से सबसे मुख्य स्थान पर लगाई गई हैं। त्रिपुरासुरों को मारने के कारण ही महादेव शिव को त्रिपुरारि भी कहते हैं।

शक्ति का गमन बिना सीधी नाड़ी के भी होता है~ मन एक विद्युत चुम्बकीय तरंग के रूप में और कुंडलिनी छवि एक इलेक्ट्रॉन के रूप में तंत्रिका रूपी विद्युत तार में यात्रा करती है

वैसे शक्ति का गमन बिना सीधी नाड़ी के भी होता है, हालांकि लगता है कि पीठ की सुषुमना नाड़ी से ही सबसे ज्यादा शक्ति का गमन होता है, जिससे कुंडलिनी जागरण होता है। शरीर के आगे के भाग के चैनल में तो पीठ की तरह सीधी नाड़ी होती ही नहीं। वहाँ तो कुंडलिनी चित्र की मदद से ही स्टेप बाय स्टेप चक्रोँ से होते हुए गमन होता है। अगर आप फ्रंट आज्ञा चक्र पर कुंडलिनी चित्र का ध्यान करो तो आपका पेट अंदर की ओर सिकुड़ेगा, मतलब शक्ति फ्रंट आज्ञा चक्र से फ्रंट मणिपुर चक्र तक पहुंच गई। यह एकदम कैसे हुआ जबकि दोनों चक्रोँ को जोड़ने वाली कोई सीधी नाड़ी नहीं है। दरअसल योगाभ्यास में हम ऊपर से नीचे तक बारीबारी से सभी चक्रोँ पर कुंडलिनी चित्र का ध्यान करते हैं। जिस चक्र पर कुंडलिनी चित्र होता है, वहाँ शक्ति क्रियाशील हो जाती है, क्योंकि चेतन शिव शक्ति को नचाता है अर्थात उसे क्रियाशील करता है, और शक्ति फिर बदले में शिव को भी नचाती है मतलब उसे ज्यादा अभिव्यक्त करती है। इससे वहाँ सिकुड़न सी महसूस होती है, और कुंडलिनी चित्र भी ज्यादा चमकने लगता है। शक्ति तो पहले भी वहाँ होती है, पर वह सोई जैसी अवस्था में होती है। विज्ञान की भाषा में इसे ऐसे कह सकते हैं कि वहाँ नाड़ी चलाने वाले कैमिकल अर्थात न्यूरोट्रान्समिटर तो मौजूद हैं, पर क्रियाशील अवस्था में नहीं हैं। बिल्कुल विद्युत तरंग की तरह काम होता है। जैसे वास्तव में इलेक्ट्रोन तो बहुत धीमी गति से चलते हैं, एक घंटे में कुछ मीटर ही, पर उन इलेक्ट्रोनों को धक्का देने वाली विद्युतचुम्बकीय तरंग प्रकाश की गति से चलती है, इसलिए धरती के एक छोर पर स्विच ऑन करने पर धरती के दूसरे छोर पर उसी क्षण विद्युत करेंट पहुंच जाता है। उसी तरह नाड़ी चलाने वाले रसायन तो घूम फिर कर निचले चक्र पर पहुंचने में कुछ सेकंड लगा सकते हैं, क्योंकि सभी नर्व फाइबर्स आपस में कहीं न कहीं से जुड़े हैं, बेशक अगले चक्रोँ को कोई सीधी नाड़ी आपस में नहीं जोड़ती, पर मन से सोचा गया कुंडलिनी चित्र एक क्षण में ही निचले चक्र पर पहुंच जाता है। वह कुंडलिनी चित्र ही वहाँ की स्थानीय नाड़ियों को क्रियाशील करके वहाँ चमक के साथ संकुचन पैदा करता है। यह ऐसे ही है जैसे विद्युतचुंबकीय तरंग अपने दायरे में आने वाले इलेक्ट्रोनों को गति देते हुए एक क्षण में ही हजारों किलोमीटर लम्बी विद्युत तार में फैल जाती है। इसलिए हम मन की तुलना विद्युतचुम्बकीय तरंग से कर सकते हैं।

Kundalini is the Auroborus snake making a yab-yum like loop by pressing its tail in its mouth

The letter ‘sh’ is the letter of the heart~ shree beejmantra

Friends, as the topic was going on in the previous post that the letter S or SH also produces the Kundalini effect because the sound of the snake is also similar to hissing or S. Similarly, Shri also contains the word of the sar-sar sound of a snake moving. The word Shree or Shree Beejmantra is derived from the sound Sh or S, which is the main Beej Mantra of the Goddess. It contains the combined power of all the three Beej Mantras ~ Sham, Ram and Hrim. May be English word SHE is derived from same goddess. I feel the shakti descending to the heart chakra with the letter Sha. The words Shankar and Shambhu are derived from Sha itself. Sham means peace. The letter Sh is also important in the word Purusha that means Atma. I think the letter sound ‘sha’ is of feelings and heart. While meditating on the Beejmantra, the thoughts of the mind should not be stopped, only then their power is felt by the Kundalini. If thoughts are stopped by force, then their energy will be exhausted, then how will it be able to reach Kundalini.

Darkness is of short duration, while light lasts for a long time~ nonveg and drink

Then I was telling how violent creatures become dreadful while hunting. While killing the prey and eating it as food, the lion also becomes man-eater, as we used to hear from the elders. Actually, there is shakti in nonveg, but it also takes a lot of shakti to digest it. It is as if a building made of sculpted stone is powerful and strong, but it also takes more power to make a stone sculpted, in addition, more energy is spent in carrying the sculpted stones to the building and fitting them in the right place. The condition of the person who uses non-vegetarian etc. in excess is like that miserly Seth or rich man, who wastes his precious and rare life in amassing wealth unnecessarily, but nothing is of any use to him. Or say that it is as if a madman, even after having constructed his home, continues to forge his entire age in stones. At the time of hunting, a lot of shakti of the leopard goes to the stomach, therefore due to lack of shakti in the brain, there is no shakti to understand anything, due to which it attacks everyone nearby counting it as provocation, regardless of the counter attack. It is a different matter that now a days the man’s behaviour apears more downside than it because he hunted cheetah so much without provocation that it became extinct from the country, that is why eight cheetahs from Namibia have been brought here by special aircraft to promote them again. Perhaps that is why it is forbidden to meet or talk anyone while he’s having a meal. Once in my childhood, I entered the headmistress’s room while she was having her lunch and I started talking about some work. She looked like a lioness to me at that time and I immediately ran outside. Got a good lesson for ever. I had a friend. The day he used to come from the market after eating non-veg or having a drink, he used to go straight to his bed and fall asleep, and used not to talk to anyone until the next day. Perhaps he realized that at such a time, a little argument would have aggravated the matter, because due to lack of shakti in the brain, there is no sense of good and bad due to darkness prevailing in mind. Possibly because of this also this religious belief has been formed that there is a darkness in the mind from nonvez, and sin is incurred.

Transformation is the destiny of the living entity that carries it to the ultimate~ can yoga help zelensky and putin

The transformation happens slowly. We can understand this in such a way that when two people meet after many years, they forget mutual enmity and become friends. This is because during the days of separation they have learned a lot of new things, which weakens the old feelings. It is as if the more you write new words on the blackboard, the more old words will be erased. This rate of transformation is greatly accelerated by yoga because it clears the waste of the mind very quickly. You can call yoga the duster of the blackboard of the mind. Just as with the use of duster, the old article gets erased more, and the new article becomes more clear, similarly by the effect of yoga old feelings get erased more, and new healthy feelings become more clear. If Zelensky and Putin meet in the next life, they may not have enmity with each other at all, but if they practice yoga in a manner for a month or two, then perhaps immediately forget the enmity and stop fighting.

All religious activities are like the primary step of yoga because of promoting the concept or spirit or Dharna of yoga~ when the meditation begins

Whatever religious activities are there, it is to maintain this yoga concept or Dharna, which I was talking about in the previous post. It is clear from this that all religions come under the science of Yoga. It is from Dharana that meditation begins, and it is from meditation that Samadhi means awakening of Kundalini occurs.

Modern human culture finding consciousness joy in the explosion~ big bang is so spiritual

Bomb blast is also a cheap, inhumanely and sinful alternative to Kundalini awakening. In it there is a feeling of light, warmth, consciousness and bliss as in Kundalini awakening, although in a much lesser and momentary form. Crackers run in ceremonies, festivals etc. are a good example of this. Although it’s humanely if remains in limits. Probably that is why many madmen start banging in the name of maneuver, war etc. to get this small glimpse of consciousness. This shows that yoga can control this.

The sins that are washed away by bathing in the Ganges, they seem actually washed away by yoga~ a wonderful route to the sahasrar

Taking a bath in the Ganges washes away sins, it is said. In fact, this happens due to the rise of Kundalini Shakti from Muladhara towards Sahasrar. It is said that the sages who come there accept those sins. This means that when the shakti  reaches the brain, it becomes very strong, due to which the picture of any deity or guru that emerges in the form of Kundalini picture, that is, meditation picture, in that case those ascetic people contribute a lot. The same Kundalini picture burns the sins, not directly bathing in the Ganges. Meaning that the destruction of sins is done only by the yoga happening by bathing in the Ganges. If it does not make a meditation image, then the uncontrollable shakti of the mind can also go towards inhuman activities. Putin takes a relaxing bath in the icy waters, but not to awaken the Kundalini, but to fight. Therefore meditation is also necessary along with yoga. I was also telling that if one feel weakness or cold, then he should not take a bath with cold water. Similarly, even if there is a shortage of time, one should not take a bath with cold water. At least half an hour is needed for cold water bath. While bathing, the Kundalini energy has to be revolved with the contraction of muscles in between the bathing process, so that heat is generated from it and the effect of cold is reduced. Yoga and exercise should be done immediately after the bath so that the body can get enough heat as soon as possible. The standby time is also more in the evening, and the activity of the day also adds to the heat, so bathing can be done in the evening.

Heart chakra matters~ save it from too cold

The effect of cold is the most pronounced on the heart. Therefore, keep meditating Kundalini picture especially on the heart, so that the energy of the whole body is concentrated there exclusively. Due to this there will be contraction in the muscles of the heart region, due to which heat will increase there and blood circulation will increase. Simultaneously keep rotating the shakti in the microcosmic orbit. Anyway, the heart seems to be in the middle of the body, if all the chakras are considered. The navel chakra is only then felt in the center of the body, as the saying goes, if the legs are also associated with the chakras. Shakti gets strength from the heart, and shakti gives strength to the heart too. Both settle accounts. That’s why the heart is in the center. When the heart gets a bit tired due to the shakti climbing to the top chakra, then some part of that shakti turns back towards the heart and gives it strength too. Related to this, I narrate an incident two to three years old. Once I was coming home from some function, feast etc. It was cold weather. The banquet hall had all the heat arrangements, due to which the blood vessels of my skin were dilated enough. But I felt very cold on my bike while returning home passing through a wooded valley at night. The cold weather of the year had just started so I didn’t even wear warm clothes. On a moving bike, the cold air blows more. There were no houses around where to stay. There was a scary night forest full of animals all around. Then I felt a strange beating in my heart. It felt as if the horse running in my chest was sometimes leaping, and sometimes stopping. By natural effort I stopped the bike and I sat down with my arms around my knees so that the heart could get warmth and relief. Then the heart returned to normal. As soon as I started getting up, my heart started throwing tantrums again. I sat down again covering my heart. I took the phone out of my pocket in the same condition and asked a friend to bring the car. He himself supported me and took me inside the car. He himself put my bike in the right place because I was not able to do anything. As soon as I used to come in contact with the cold air, leaving myself open, the heart used to start doing the same thing. I had packed myself in such a way that I should come in contact with the least amount of air. He turned on the heater of the car, which made me completely normal. Then he started saying that show the doctor, get a checkup done etc. I said that the incident was not from illness, but from cold, so it was short-lived, because I was again feeling healthier than before. Late night feasts should be avoided in cold weather. Drinks should not be used in them at all. Due to this, the blood vessels of the skin open more. This has two disadvantages. One, a person does not feel the cold outside, because false heat remains in the skin. Second, it takes out a lot of body heat. An older cousin of my maternal uncle had a drinking habit. He was found dead on a deserted road during the winter season. Actually he was passing through the road alone in the cold of late night after having a drink. He must have fallen because of the cold there. All his attempts to warm himself while intoxicated must have failed. Because it was late at night, he would not have got any help.

Yoga-breathing raises up semen power~ easy way to nose tip meditation

The yogic benefits that are obtained by taking deep and slow breaths through the belly and by paying attention to the air coming-going im and out of the nose, are actually attained only by the semen shakti ascending from the Muladhara and Swadhishthana chakras. I don’t think there is any direct contribution of breath in this. The role of oxygen etc. does not seem to be much. Even at the time of sexual intercourse, it is mostly on the strength of these breaths that semen shakti is raised up, preventing its degradation down. By paying attention to the breath coming out of the nose, the attention itself goes to the nose or nasal tip, which is right in the central line of the body. Due to this the activation of the middle channel Sushumana occurs, by which the vital energy or prana formed by the transformation of semen energy starts moving around in the center of the body better.

It is the conscious soul that drives the shakti and we all just being the ouroborulos snake~ why kundalini shakti resides in Muladhara

The Jalandhara Bandha of Yoga is applied so that the Kundalini energy ascending to the brain can descend through the front channel and thus continue to deliver shakti to all the chakras in a closed loop. While taking a bath with cold water, the head itself tilts forward. This also reduces the pressure of the Swadhisthana Chakra. It is as if a giant and many hooded serpent bends forward to grab its sore tail by its mouth and tries to hold it by its central hood. Ouroboros of Egypt and Greece, ie Auroborus snake also shows this. It seems that in ancient times when spiritual people came to know about these physiological processes while bathing in the Ganges, they must have created artificial hatha yoga on the basis of them. Anyway, Shakti is said to be situated in Muladhara. That shakti has to be conveyed to the brain, because the brain is the boss of the whole body and mind. If there is shakti in the brain, then there will be shakti in the whole body itself. The tail of ouroborus in his mouth means that the yogi is transmitting the energy from the mooladhar to the brain through the tantric kundalini yoga. But it is not that there is no shakti anywhere other than the base chakra. If this were the case then the eunuch or the children would be absolutely powerless. But it is not so. They also have ordinary power. It simply means that there is additional shakti in the muladhara, which can be received by the brain. The same extra energy is very important for Kundalini, because it is not able to function properly with normal energy, leave aside awakening. Perhaps the Kundalini Shakti is said to reside in Muladhara, not the ordinary Shakti. However, exceptions are everywhere. Kundalini can be awakened even without Mooladhara Shakti, of course only in rare cases.

Auroborus snake is the sexual posture like yab-yum~ easiest way to microcosmic orbit

There is no need to go into much detail in this, as the point is clear from the heading of this paragraph. Nevertheless, the scientific theory related to it can only be discussed. Because the snake’s tail remains too low even when it bows fully, therefore it cannot take it in its mouth, so by attaching the most suitable thing to its tail, it lengthens it so that it can reach its mouth easily. This completes the energy circle of the snake, from which it gains additional shakti with bliss. Everyone knows what could be the best thing to add to the tail of that metaphorical male snake. The addition of a female snake also aligns yin and yang that leads to additional bliss from the manifestation of Advaita and Kundalini, and also leads to spiritual growth, the culmination of which is Kundalini awakening. Who can be more intelligent than the creator of this amazing world? Apart from experience, there is another proof of this, showing this snake as Yin-Yang in many places. For this, the upper half of the snake is shown black and the lower half is white. From this it becomes quite clear that Yab-Yum is depicted as the Oroborus snake, because in this asana the black color means yin means female part is up, and white color means yang means male part is lower side. Some snakes actually eat their tails in rare cases, especially when they are disturbed by the extreme heat of the external environment and by hunger. They may, like a skilled tantrik, take energy from the mooladhara and spin it round and round, so as to make up for the lack of energy in the body and become stable. But due to lack of brain, they are compelled to swallow the tail, and while moving forward, themselves too. Perhaps this energy-trick of the snake is also responsible for making it important in various religions.

The era of spiritual discoveries and inventions has begun~ sexual tools on rise

In the over idealistic Middle Ages and Modern Age the yab part seems to have disappeared from the above yab-yum pairings, and yum remained. In its place, the practice of simple Kundalini yoga grew, in which the deficiency of Yab or yin was made up by lowering the Kundalini from the front chakras. Although the Kundalini descended in the same way with Yab-yum pairing, but that process was given a lot of strength and vibrancy with yab. In idealistic yoga, Yab was conceived within Yum. Means in a single person, Yab was permanently combined with Yum, at the cost of effectiveness. Then many other artificial measures have been resorted to increase the effect of yab-yum alliance, such as making a salutation mudra by joining both the hands together, applying urdhavatripunda, wearing a thread, etc. Maybe after reading this post, the scientist can take advantage of this shortcoming and make an artificial dummy of yab and present it in the market. Science today is associated with business, and no one wants to give up any way to earn money. Today most of the physical discoveries have taken place. Most scientists have extra surplus time. They are also tired of physical discoveries, especially depressed with their environmental ill-effects. That is why many spiritual discoveries are happening today. Some are making machines to rotate the Kundalini, while some are making special and sexual types of instruments or tools to increase the sensation of Muladhara.

Every person contains both male and female parts~ four equal halves making one full piece of body

Actually, we are all in the form of a pair of yub-yum, but have forgotten that. Men and women have been created separately to remind it. The man wants to embrace the woman, to awaken the yab part of his body. Only the Yum part of his body is active. The back part of our body is Yum. That Yum or Purusha part starts from the Vajra Nadi, passes through the spinal cord in the form of Sushumana and ends at the Sahasrar Chakra. The Yab or the female part also starts from the outer linga structures encircling the Vajra Nadi and ends at the Sahasrar Chakra, moving upward through the front chakras of the body. The male and female parts are completely intertwined at the Vajra Shikha, which can also be called the Muladhara Chakra as being its power source, and the Sahasrara Chakra. On other chakras also they try to connect with each other by embracing each other as tightly as possible. The same is shown in the pictures too. There the front and back chakras are shown connected by a line. In the pictures, Ida and Pingala are shown on the left and right sides of the body. This is also correct. Ida is yab, and pingala is yum. Sushumna is in the middle of the spine. But through Sambhog Yoga, the shakti goes straight through Sushumna to Sahasrar. I feel that the tricks of ida and pingala are in simple types of yogas. Tantric sexual yoga is the shortest route, because Ida and Pingala do not come in it, but the shakti reaches directly into Sushumna and Sahasrar. In the state of weakness, sometimes there may be disturbances due to ida and pingala, but they are mild, and are easily controlled. That is why there is the greatest attraction in the world towards sex. But the common man does not understand its spirituality. He gets entangled in this and ends his life. But the yogi, taking advantage of this yoga, by fully expressing Yab-Yum in his own body, becomes unisexual i.e. Ardhanarishvara, and becomes free from the bondage of attraction to a separate woman, that is, Yab. This does not mean that they do not do sexual yoga again. They do, but they need it less. With this, they keep giving emphasis or power to their swasambhog yoga i.e. monogamous sexual yoga. Many become so accustomed, efficient and adept that they never drop the semen power at the base, and always carry it up and assimilate it into their bodies. From the above discussion it becomes clear that just as the left and right parts of the body are yab and yum, in the same way the front and back parts of the body are also yab and yum. Meaning that the whole body is made by joining two opposite pieces on all four sides. Perhaps this is the meaning of the three-dimensional Hindu swastika symbol. Possibly, Shakti is shown in the form of a woman and residing in the Muladhara, because the front part of the body which is feminine, its energy goes down and is collected in the Muladhara region, from where it again tries to climb up through the back.

How cold water bath produce yab-yum union and expression of kundalini there with~ flesh body overlaid over nerve body

When cold water falls on the whole body, its sensation is picked up by the nadis, because there is a network of nadis throughout the body. By this the soft outer body and the hard inner body are joined together, meaning the yab and yum become one. This activates the Advaita Bhava and the Kundalini Shakti from it, along with the Kundalini picture. Every sensation makes similar effect that is why there is a feeling of bliss with non-duality after any painfull incidence.

Nature is the female form and soul is the male form~ two important koshas or bodies

The nervous structure is Purusha and soft muscular beautiful structure overlaid on it is stri. We can call these as two koshas of body in simple form as opposed to already existing somewhat difficult to understand five koshas of body. Nervous structure attracts soft outer structure to get life of sensation. Ultimately, Atma is Purusha actually as it enjoys all sensation of nervous structure. All the visible nature is stri or prakriti as it provides sensation to Purusha. Sankhya thought of school says the same thing.

The Spiritual Mystery of the Hindu Swastika Symbol~ the central dot of swastika representing a complete and balanced human being

In the three dimensional Swastika symbol, the small stick on the front side is Yum, and the small stick on the back side is Yab. The two sticks are connected by a straight vertically long stick, meaning Yab and Yum are united to form an increased awakening. Similarly, other two front and back short sticks on left and right sides of body represent the yab of the left side of the body and the yum of the right side of the body respectively, as they are both connected left to right by a long transverse stick. It also shows increased wakefulness. Then the long sticks, both vertical or longitudinal and transverse, are joined together at a point in the centre. It is getting equal strength of the yab-yum joints on both sides, so this point is the most powerful. This means that along with balancing the yab-yum inside one’s own left-right body, the yab-yum of the male-female pair should also be balanced. And both types of yab-yum pairs should also be balanced among themselves. It is a different matter whether one finds a male-female pair in the form of back and front channel inside his own body, or takes the help of a sexual partner from outside.

Woman is woman for man and man is woman for woman~ sexual discrimination is illusionary and relative, not true and absolute

In fact, the woman does not exist. Everywhere men and men exist. The woman appears to us with illusions. I am saying this because during sexual yoga, the woman also pulls her Raja power up through her back in the same way as a man pulls the semen power through his back. The spine is actually the man, which is the same in man and woman. Similarly, the front part of the body is female, and that too is the same in both. The woman who takes the initiative for sex yoga looks like a man. This is because she wants to pull up her Mooladhara Nivasini Shakti through sexual yoga more. A man who is shy of sexual yoga, appears like a woman. That is because he is running away from sex yoga because he will not be able to pull the energy up, and will drop it down, like the front or female part of the body. That’s why considering a woman as a woman seems to me to be a historical conspiracy, according to which the woman keeps on dropping her shakti, and the man keeps on raising his shakti. But this is not the case in Tantra. Both have equal right to take their shakti in Tantra. That is why both men and women are equal in tantra. However it’s other matter that man needs to conserve Shakti more as he’s prone to lose it comparatively much more than the female partner.

Matching pair of male and female as good as possible, although mismatch promote yin-yang alliance

I am saying this because being of equal stature allows the yin and yang to mix better throughout the body, creating a better nondual feeling. This gives more Kundalini benefits. Although both man and woman are in the same body, but to get it one has to take help from outside. If seen, for the spiritual transformation of sexual power, only two-four inch area is enough, but for the yin-yang alliance, a full fledged and matching body is needed. This gives additional benefits. It seems that it was not given much attention in the olden days, that is why instead of matching the body before marriage, the planetary horoscope was matched. I do not know what is the science in this ignoring the direct and relying on the guesswork. Perhaps this rule was to maintain social harmony, so that all men would not break down lustfully on only a few beautiful women, and ugly women would not remain unmarried or would not have to be content with inferior men. What actually happens in practice is that if the yin-yang matches well, the stature doesn’t match, and if the stature matches well, the yinyang doesn’t match well. So compromise has to be made. If both the qualities match best, then the best pair is considered. Same used to happen with me. The yinyang match was very strong, but the stature was not a match at all. Ultimately, everything had to be left on the horoscope. Although all was well with this. To speak it means that if the direct does not work, then only one can fully go with the invisible. By the way, it can also be concluded that short height and slim body is yin, and big height and heavy body is yang. Therefore, it is natural to become a part of an odd looking pair.

Chinese yin is sluggish and yang fast, while Tantric yin is fast and yang sluggish~ two types of sexual tantra

This means that the asymmetric or vishamvahi tantra is more recognized in the Chinese system, whereas symmetric or samavahi tantra in the Indian system. Vishmavahi Tantra means a woman is considered a tantric machine. She has no more importance than that. That’s why she remains lethargic and suppressed. With her help, the light i.e. Kundalini is rotated. The form of that Kundalini can be any mental picture, but she is never as that meditative image. On the contrary, in Samvahi Tantra, the woman is given the form of Kundalini i.e. Goddess. With this, she displays her various adorable shades. This gives a lot of respect to the woman. She is considered equal to or even greater than a man. You must have seen how Lord Vishnu is engaged in the service of Goddess Lakshmi, Lord Shiva in the service of Goddess Parvati and Lord Brahma in the service of Goddess Saraswati. Moreover, exceptions are seen in every system.

Are we not treating the awakening of the Swadhisthana Chakra as a disease? Prostate orgasm is superior to penile orgasm

Here Benign Prostate Hypertrophy means BHP is being mentioned. Lord Shiva had told Agnidev, who became a pigeon in the aforesaid story of the Kartikeya birth, that his burning will be taken away by seven sage wives who bathe in cold water. That burning sensation or prostatitis is called BHP disease in the language of science. Is this the awakening of the Swadhisthana Chakra, which can be cured by taking cold water bath and kundalini yoga? By the way, health experts are also agreeing that most prostate problems are caused by anxiety or depression, to overcome which yoga is a panacea. Overall the matter is the same. With the touch of cold water, that burning sensation goes to the other chakras, meaning they are awakened. In this, the most likely possibility is that the Manipura Chakra is awakened, because the chakras are awakened sequentially. But not always so. This burning can go directly to the Vishuddhi chakra and also to the Anahata chakra. According to the above story, Mahadev lived in a cave with Goddess Parvati for a thousand years, and eventually his Muladhara Chakra and then the Swadhisthana Chakra were awakened. When the Swadhisthana Chakra was awakened, both of them came out of the cave that means abstaining from the spirituo-romantic work. I mean to say that it’s the gift of nature in the form of awakening of the Swadhisthana chakra, but people rush to get treatment to remove this burning sensation or are troubled by it, while giving its energy to other chakras one can also get Kundalini benefits, and it stays calm too. I am saying this also because nowadays there is a competition to get prostate orgasm obtained from stimulation or irritation of the prostate. Many tools and techniques are being developed for this. Experienced people say that unlike penile orgasms, prostate orgasms are much more lasting, and give more pleasure. Penile orgasm is present only for a few moments of ejaculation. It really needs spiritual psychological research.

Why not to adopt sexual abstinence~ a healthy balance between leftist and right wing lifestyle

As it is said in the Shiva Purana in a mystical form that sexual intercourse that prevents ejaculation can lead to permanent burning in the prostate, ie, its enlargement or inflammation, although a remedy has also been given there to remove it, then why not assume that Vaishnavas’s Dakshinachar or right hand path is good. Or at least assume that the middle way is good, in which there is infinite sattvik love between men and women, but there is no physical relationship. Due to this, the Kundalini will also rotate, and health problems will also not arise. Meaning there is profit on both sides. So I believe that such abstinence should be kept till the marriage does not take place. Due to this, healthy sociality will also be maintained and Kundalini will also be maintained. After marriage, it becomes difficult to have more restraint with love. At the same time, I also feel that to achieve Kundalini awakening, a lot of energy is required, therefore, like Lord Shiva, relentless Sambhog Yoga is necessary. When the awakening takes place within a month or two, then keeping in view the health safety, reduce the sexual intercourse. Even if there is no awakening, try it only for 1-2 months, because it means that the person is not ripe for awakening, and extra efforts will mostly fail, and will also cause health problems. Then adopt an awakening lifestyle by practicing simple tantric Kundalini yoga for a few years, and when given the appropriate time and opportunity and solitude, such as feeling calm, relieved of stress and workload, and feeling energy, then do continuous and dedicated sexual yoga for 1-2 months again. Keep doing it like this. Or adopt another way, like Lord Shiva, engage in all-blissful sexual yoga day and night for years as per wish, until the prostate does not start burning, that is, until the Swadhisthana Chakra is awakened, and one himself starts getting uncomfortable and bored from sex. After that stage the man becomes like a bisexual and starts doing sexual yoga with himself. Due to the burden of work, energy is accumulated in the form of irritation or burning sensation on the front Swadhishthana chakra, which he keeps on raising through the back with the help of yoga and cold water bath. This cycle goes on. With this, he eventually attains full awakening by awakening the Sahasrar Chakra in the last after gradually awakening all other chakras sequentially, unlike the above first method, where he gets awakened immediately after one or two months of relentless sexual yoga. There is also a need for psychological research on this.

Nerves transmit shakti~ how shakti reaches shiva

Any work is done by power or shakti. If the car is moving on the road, then it will be said that the car was driven by engine power. If the chariot is running then it will be said that it is running with horse power or in short power. There is definitely a motivator of power. Be the engine power or the horse power, fuel or fire is the motivator of both. Our body also runs on Nadi Shakti or just Shakti. If there is no nadi shakti, then even the healthy body is of no use. You must have seen how the arm or leg stops working after paralysis. Scientifically, shakti or nerve power is only in the form of functional stimulation of nerve fibers. This nadi shakti of the body is called Shakti in short. Have you ever wondered what drives this nadi shakti? Philosophers also wondered, thought and wrote such things, which are read in the scriptures. It is the conscious soul in the form of fire-spark that drives the nadi energy like engine movement with the help of fuel like food. The blissful sensation felt in Muladhara is what drives this energy. That is, it induces the greatest amount of energy, which we call Kundalini Shakti. When it also gets the special force of Prana Vayu along with it, then it is also called Prana Shakti. Although every kind of conscious experience continues to inspire our energy, due to which we remain alive, but because the experience of Muladhara sensation is the most pronounced, blissful and full of consciousness, it is therefore called the source of Shakti or Kundalini Shakti or life force. Today I understood why it is said in the scriptures that the Supreme Soul i.e. consciousness is the original source of shakti. I do not find much scientific detail in the scriptures, probably because in the old age facts were understood or accepted on the basis of belief and not on the basis of scientific inquiry. Probably it is because of this shakti-inducing contribution of consciousness that dopamine ie reward chemical works. The doors of success are opened one after the other in front of those who are in the ascendant move. But sometimes excessive climbing also causes problems related to high blood pressure and stress etc. It is as if the bulb gets fused due to the voltage exceeding the power requirement. The energy generated on the sensation of the Mooladhara will go up to the chakra, because with feeling it the conscious Kundalini is being meditated on the chakra. The path through which energy passes is called a nadi or channel. That shakti or simply energy creates a greater effect on the chakra, because there is also the meditation of the conscious Kundalini picture going on along with the feeling of the sensation of the root chakra. That is why it is said that Shakti moves towards Shiva. Many people are not satisfied with Kundalini Yoga. The main reason for this is that shakti generating sensation is not born on their base. We can call Muladhara as a power generating device. They even meditate on the Kundalini picture on the chakras, but still remain thirsty. Only Mooladhar can quench the thirst for shakti. Mooladhara has been given special sensation only for the expansion of the universe through reproduction. If sensation were all nerve fibers, then this means that nerve fibres are of excellent quality in the base. These can be researched how these produce so much powerful and pleasant sensation so as to artificially produce it elsewhere. This is a story like a chicken and an egg. First, energy is generated by the stimulation of nerve fibers in the muladhara, then that energy travels through the spinal cord to the brain, and from that a blissful sensation is felt in the brain, then that blissful sensation also stimulates other nerve fibers in brain because all nerve fibres in brain are interconnected, thereby creating more energy. From the brain, that energy spreads through the nerves to the whole body and up to the muladhara again. Means shakti forms a closed loop. The loop of shakti is as the basis of the microcosmic orbit. This closed loop is the Auroborus snake. In the language of medical science, it is called reflex arc. If at that time we meditate on the Kundalini picture on a particular chakra, then the energy reaches that chakra more than other parts of the body, due to which the Kundalini picture starts shining there more. Meaning that Shakti tries to brighten up the mental picture as much as possible, so that it can awaken and become Shiva. This is the movement of Shakti towards Shiva. The meaning of Kundalini picture is not to shower love on someone, but to control the shakti with its help. If there is a wound, etc., then pain and redness arise there. Pain is the conscious sensation that draws the red shakti towards itself. Then it will be said that the organs which do not feel pain, how does the energy reach there and how does their healing take place. It works indirectly through consciousness. When the nerve energy from the painful part reaches the brain, it creates sensation in the not feeling part of the brain. This consumes a lot of nadi energy and chemicals associated with it. This leads to a lack of nadi that’s nerve energy in the part of the brain that produces conscious experiences. Due to this man starts living unhappily and somewhat in darkness. Therefore, the only way left to create the bliss of consciousness is to heal the wounds buried deep in the body as quickly as possible. For this, the nadi energy starts focusing on that wound. Actually this is the nadi energy at the base of the blood flow. If blood flow is a vehicle, then the nadi energy that controls it is its driver. You can call the conscious soul the station master. When we suck the Nadi energy from the base of the spine up through the spine, then the blood flow itself also goes up. Due to this the pressure around the muladhara is felt to decrease. Blood cannot rise through the spine, because it is like a solid rope of nerve fibers, not as a hollow blood vessel. Therefore, the simple principle of Kundalini Yoga is that control the driver of the vehicle, the vehicle itself will be controlled.

Snakes wrapped around Shiva’s body are actually activated nerve channels~ serpentine human body

Parvati’s mother Maina was frightened after seeing the snakes wrapped around Lord Shiva. Actually Shiva was a great yogi. Every pulse or nadi in his body was awakened, not only Sushumana. With this, he used to feel the Kundalini with rustle in each pulse forever. It is natural that while experiencing those rustles, the nature of his limbs and his movements have also become like that of a snake, which Maina was able to feel. Perhaps the same thing happened with Yogi Gopikrishna. He could feel the movement of every pulse in his body. He was also troubled by this. Then he was molded accordingly. There is a beautiful composition based on this in the Shivpuran, about the slaughter of Tripurasura, which I am writing in the lower paragraph, in a nutshell.

Tripurasur demons are three gunas of nature and killing them is awakening the kundalini~ a Shiva purana story demystified

One demon’s residance building was that of gold, the second’s that of silver and the third’s that of iron. These are symbols of sattva, rajas and tamo qualities of nature respectively. Rakshasa means the attachment-full feelings that arise with these qualities. To kill them, Shiva means the soul made a chariot in the form of a human body, Mandrachal mountain means the spine was made as a bow, and Vasuki serpent means Sushumna was made as the arrow. Fighting with demons means raising Kundalini Shakti from Muladhara through Yogasadhana through Sushumana and awakening it in Sahasrar. By that all attachment to the three gunas of nature ended, meaning Tripurari demons died. This pleased the deities who resided in the body as they were freed from the bondage of the body. I’ll throw some more light on this if there’s time, but it’s the actual point in nutshell.

Mahakal Jyotirling of Ujjain

It is said that this Tripurasur incident took place in the Mahakal temple in Ujjain. That is why the sculptures and artifacts depicting it have been most prominently placed in the recently built grand Mahakal corridor. Due to killing of tripurasurs by Shiva, he’s also called as tripurari.

The movement of Shakti can occur even without a straight nerve~ mind as an electromagnetic wave and kundalini image as an electron travelling through the nerve as an electric wire

By the way, the movement of energy takes place without a straight nadi means nerve tract, although it seems that the most of the shakti flows through the back’s Sushumana Nadi, which leads to Kundalini awakening. In the channel of the front part of the body, there is no straight nadi like the back. There, with the help of the Kundalini picture, impulse moves step by step through the chakras. If you meditate on the Kundalini picture on the front Agya chakra, your belly will shrink inward, meaning the shakti has passed from the front Agya chakra to the front Manipura chakra. How this happened exactly when there is no straight Nadi connecting the two chakras. Actually in yoga practice we meditate on the Kundalini picture on all the chakras sequentially from top to bottom. May be also that makes a habit. However, the natural track seems the same. On the chakra on which the Kundalini picture is placed, there Shakti becomes active, because the conscious Shiva makes the Shakti dance, that is, makes it active, and Shakti then in turn makes Shiva dance more, meaning it expresses him more. Due to this, there is a feeling of contraction, and the Kundalini picture also starts shining more. The shakti is there earlier also, but it is in a state of sleep. In the language of science, it can be said that there are chemicals ie neurotransmitters already present that drive the nerve, but are not in an active state. It works just like an electric wave. Electrons are already in a wire but they need stimulus to express or flow. Similarly, electrons actually move very slowly, only a few meters in an hour, but the electromagnetic wave pushing those electrons ahead moves at the speed of light, so switching on at one end of the earth will result in the other end of the earth getting the electric current at the very same moment. In the same way, the chemicals that drive the nadi can take a few seconds to reach the lower chakra, because all the nerve fibers are interconnected somewhere, of course no direct nadi connects the next chakras, but thought of the mind reaches next chakras in an instant. Means the Kundalini picture thought reaches the lower chakra in an instant. It is the Kundalini picture that activates the local nadis and produces contractions there with brightness. It is as if an electromagnetic wave, accelerating the electrons coming in its path, spreads in an electric wire thousands of kilometers long in an instant. So we can liken the mind to an electromagnetic wave.

कुंडलिनी योग बनाम परमाणु विश्वयुद्ध

कुंडलिनी ऊर्जा ही नीलकंठ शिव महादेव के हलाहल विष को नष्ट करती है

दोस्तों, मैं हाल ही में एक स्थानीय मेले में गया। वहाँ मैं ड्रेगन ट्रेन को निहारने लगा। उसका खुले दांतों वाला मुंह दिखते ही मेरे अंदर ऊर्जा मुलाधार से ऊपर उठकर घूमने जैसी लग जाती थी। हालांकि यह हल्का आभास था, पर आनंद पैदा करने वाला था, लगभग वैसा ही जैसा शिवलिंगम के दर्शन से महसूस होता है। स्थानीय संस्कृति के अनुसार बाहरी अभिव्यक्ति के तरीके बदलते रहते हैं, पर मूल चीज एक ही रहती है। इसी के संबंध में मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे गुस्से आदि से कुंडलिनी शक्ति मस्तिष्क से नीचे उतरकर यौद्धा अंगों को चली जाती है। इससे मस्तिष्क में स्मरण शक्ति और भावनाएं क्षीण हो जाती हैं। भावनाएँ बहुत सारी ऊर्जा को खाती हैं। इसीलिए तो तीखी भावनाओं या भावनात्मक आघात के बाद आदमी अक्सर बीमार पड़ जाता है। आपने सुना होगा कि फलां आदमी अपने किसी प्रिय परिचित को खोने के बाद बीमार पड़ गया या चल बसा। गहरे तनाव के दौरान दिल का दौरा पड़ना तो आजकल आम ही हो गया है। शरीरविज्ञान दर्शन से अनियंत्रित भावनाओं पर लगाम लगती है। उपरोक्त मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि ड्रेगन के ध्यान से या उसको अपने शरीर पर आरोपित करने से कुंडलिनी शक्ति विभिन्न चक्रोँ पर उजागर होने लगती है। सम्भवतः बुद्धिस्टों के रैथफुल डाइटि भी इसी सिद्धांत से कुंडलिनी की मदद करते हैं। दरअसल विभिन्न धर्मशास्त्रों में जो आचार शिक्षा दी जाती है, उसके पीछे यही कुंडलिनी विज्ञान छुपा है। सत्य बोलो, चोरी न करो, क्रोध न करो, मीठा बोलो, हमेशा प्रसन्न व हँसमुख रहो, आसक्ति न करो आदि वचन हमें अवैज्ञानिक लगते हैं, पर इनके पीछे की वजह बहुमूल्य ऊर्जा को बचा कर उसे कुंडलिनी को उपलब्ध कराना ही है, ताकि वह जल्दी से जल्दी जागृत हो सके। कइयों को इसमें केवल स्वास्थ्य विज्ञान ही दिखता है, पर इसमें आध्यात्मिक विज्ञान भी छुपा होता है। ड्रेगन, शेर आदि हिंसक जीवों की ऊर्जा जब मस्तिष्क से नीचे उतरती है, तब सबसे पहले चेहरे, जबड़े और गर्दन पर आती है। इसीलिए तो क्रोध भरे मुख से गुर्राते हुए ये जबड़े और गर्दन की कलाबाजी पूर्ण गतियों से शिकार के ऊपर टूट पड़ते हैं। फिर कुछ अतिरिक्त ऊर्जा आगे की टांगों पर भी आ जाती है, जिससे ये शिकार को कस कर पकड़ लेते हैं। जब इन क्रियाओं से दिल थक जाता है, तब अतिरिक्त ऊर्जा दिल को भी मिलती है। उसके बाद ऊर्जा पेट को पहुंचती है, जिससे भूख बढ़ती है। इससे वह और हमलावर हो जाता है, क्योंकि वहाँ से ऊर्जा बैक चैनल से वापिस ऊपर लौटने लगती है, और टॉप पर पहुंचकर एकदम से जबड़े को उतर जाती है। जब इतनी मेहनत के बाद भी शिकार काबू में न आकर भागने लगता है, तो ऊर्जा टांगों में पहुंच कर शिकारी को उसके पीछे भगाने लगती है। थोड़ी देर बाद वह ऊर्जा मस्तिष्क को वापिस चली जाती है, और शिकारी पशु थक कर बैठ जाता है। फिर वह अपनी ऊर्जा को नीचे उतारने के लिए चेहरे को विकृत नहीं करता क्योंकि तब उसे पता लग जाता है कि इससे कोई फायदा नहीं होने वाला। वह इतना थक जाता है कि उसके पास ऊर्जा उतारने के लिए भी ऊर्जा नहीं बची होती। ऊर्जा उतारने के लिए भी ऊर्जा चाहिए होती है। इसीलिए उस समय वह गाय की तरह शांत, दयावान, अहिंसक और सदगुणों से भरा लगता है, उसकी स्मरणशक्ति और शुभ भावनाएँ लौट आती हैं, क्योंकि उस समय उसका मस्तिष्क ऊर्जा से भरा होता है। यह अलग बात है कि मस्तिष्क से नीचे उतरी हुई ऊर्जा उसे अंधकार के रूप में महसूस होती है, कुंडलिनी चित्र के रूप में नहीं, क्योंकि निम्न जीव होने से उसमें दिमाग़ भी कम है, और वह कुंडलिनी योगी भी नहीं है। दरअसल जो शिव ने विष ग्रहण करके उसे गले में फँसा कर रखा था, वह आदमी के मस्तिष्क की दुर्भावनाओं के रूप में अभिव्यक्त ऊर्जा ही है। विष का पान किया, मतलब आम दुनिया की बुरी बातें और बुरे दृश्य नकारात्मक ऊर्जा के रूप में कानों और आँखों आदि से अंदर प्रविष्ट हो गए। वह नकारात्मक ऊर्जा जब विशुद्धि चक्र पर पहुंचती है, तब वह कुंडलिनी ऊर्जा में रूपांतरित होकर वहाँ लम्बे समय तक फंसी रहती है। इसकी वजह है गर्दन की स्थिति और बनावट। गर्दन सिर और धड़ के जोड़ की तरह है, जो सबसे ज्यादा गतिशील है। जैसे पाईप आदि के बीच में स्थित लचीले और मुलायम जोड़ों पर पानी या उसमें मौजूद मिट्टी आदि जम कर फंस जाते हैं, उसी तरह गर्दन में ऊर्जा फंसी रह जाती है। इसीलिए तो भगवान शिव से वह विष न तो उगलते बना और न ही निगलते, वह गले में ही फंसा रह गया, इसीलिए शिव नीलकंठ कहलाते हैं। इसीलिए कहते हैं कि जिसने विशुद्धि चक्र को सिद्ध कर दिया, उसने बहुत कुछ सिद्ध कर लिया। दरअसल अगर कुंडलिनी शक्ति को गले से नीचे के किसी चक्र पर उतारा जाए, तो वह एकदम से घूम कर दुबारा मस्तिष्क में पहुंच जाती है, और वहाँ तनाव के दबाव को बढ़ाती है। हालांकि फिर ज्यादातर मामलों में वह सकारात्मक या अद्वैतात्मक कुंडलिनी ऊर्जा के रूप में महसूस होती है, नकारात्मक या द्वैतात्मक ऊर्जा के रूप में नहीं। हृदय चक्र पर भी काफी देर तक स्थिर रहती है, नाभि चक्र और उसके नीचे के चक्रोँ से तो पेट की सिकुड़न के साथ एकदम वापिस मुड़ने लगती है। यद्यपि फिर यह सकारात्मक कुंडलिनी ऊर्जा है, लेकिन मस्तिष्क में इसके वापस बुरे विचारों में परिवर्तित होने की संभावना तब भी बनी ही रहती है। वह ऊर्जा योद्धा अंगों से उठापटक भी करवा सकती है। इसीलिए उसे गले के विशुद्धि चक्र पर रोककर रखा जाता है। मतलब कि अगर भगवान शिव तनाव रूपी जहर को गले से नीचे उतारकर पी जाए, तो वे विनाशकारी तांडव नृत्य से दुनिया में तबाही भी मचा सकते हैं, या वह रूपांतरित जहर उनके पेट से चूस लिया जाएगा, और वह रक्त में मिलकर पुनः मस्तिष्क में पहुंच जाएगा। मस्तिष्क में  जहर पहुंचने का अर्थ है, अज्ञानरूपी या मनोदोष रूपी अंधकार के रूप में मृत्यु की सम्भावना। मनोदोषों से दुनिया में फिर से तबाही का खतरा पैदा हो जाएगा। सम्भवतः कुंडलिनी शक्ति भोजन के साथ पेट में पहुंचती है, और वहाँ से इसी तरह मस्तिष्क में पहुंच जाती है। हालांकि, तथाकथित विकृत ऊर्जा रूपी जहर पीने के बाद, मस्तिष्क में पुन: अवशोषण के साथ, थोड़े अतिरिक्त विचारशील प्रयास के साथ लंबे समय तक इसके कुंडलिनी ऊर्जा में रूपांतरित बने रहने की अधिकतम संभावना होती है। शिव जहर को उगल भी नहीं सकते, क्योंकि अगर वे उसे बाहर उगलते हैं तो भी उससे जीवों का विनाश हो सकता है। आदमी के मस्तिष्क की दुर्भावनाएं यदि बदजुबानी, गुस्से, बुरी नजर या मारपीट आदि के रूप में बाहर निकल जाएं, तो स्वाभाविक रूप से वे अन्य लोगों और जीवजंतुओं का अहित ही करेंगी। उससे समाज में आपसी वैमनस्य और हिंसा आदि दोष फैलेंगे। इसीलिए लोग कहते हैं कि फलां आदमी को गुस्सा तो बहुत आया पर वह उसे पी गया। दरअसल गुस्सा पीआ नहीं जाता, उसे गले में अटकाकर रखा जाता है, पीने से तो वह फिर से दिमाग़ में पहुंच जाएगा। इसीलिए कई लोगों को आपने परेशान होकर कहते हुए सुना होगा, मेरे तो गले तक आ गई। दरअसल कमजोर वर्ग के लोग ऐसा ज्यादा कहते हैं, क्योंकि न तो वे परेशानी को निगल सकते हैं, और न ही उगल सकते हैं, लोगों के द्वारा बदले में सताए जाने के डर से। दरअसल वे सबसे खुश होते हैं भोले शंकर की तरह, परेशानी को गले में फँसाए रखने के कारण। वे परेशान नहीं होते, परेशानी का उचित प्रबंधन करने के कारण। परेशान वे औरों को लगते हैं, क्योंकि उन्हें परेशानी को प्रबंधित करना नहीं आता। बहुत से लोगों को नीले गले वाले शिव बेचारे लग सकते हैं, पर बेचारे तो वे लोग खुद हैं, जो उन्हें समझ नहीं पाते। शिव किसीके डर की वजह से विष को गले में धारण नहीं करते, बल्कि अपने पुत्र समान सभी जीवों के प्रति दया के कारण ऐसा करते हैं। भगवान शिव सारी सृष्टि को बनाते और उसका पूरा कार्यभार सँभालते हैं। इसलिए स्वाभाविक है कि उनका दिमाग़ भी तनाव और अवसाद से भर जाता होगा। वह तनाव गुस्से के रूप में दुनिया के ऊपर न निकले, इसीलिए वे तनाव रूपी विष को अपने गले में धारण करके रखते हैं। क्योंकि रक्त का रंग भी लाल-नीला ही होता है, जो शक्ति का परिचायक है, इसीलिए उनका गला नीला पड़ जाता है। वे एक महान योगी की तरह व्यवहार करते हैं।

समुद्र मंथन या पृथ्वी-दोहन मानसिक दोषों के रूप में विष उत्पन्न करता है, जिसे शिव जैसे महापुरुषों द्वारा पचाया या नष्ट किया जाता है

कहते हैं कि वह हलाहल विष समुद्रमंथन के दौरान निकला था। उसमें और भी बहुत सी ऐश्वर्यमय चीजें निकली थीं। समुद्र का मतलब संसार अर्थात पृथ्वी है, मंथन का मतलब दोहन है, ऐश्वर्यशाली चीजें आप देख ही रहे हैं, जैसे कि मोटरगाड़ियां, कम्प्यूटर, हवाई जहाज, परमाणु रिएक्टर आदि अनगिनत मशीनें। आज भी ऐसा ही महान मंथन चल रहा है। अनगिनत नेता, राष्ट्रॉध्यक्ष, वैश्विक संस्थाएं, वैज्ञानिक और तकनीशियन समुद्रमंथन के देवताओं और राक्षसों की तरह है। इस आधुनिक समुद्रमंथन से पैदा क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार आदि मन के दोषों के रूप में पैदा होने वाले विष को पीने की हिम्मत किसी में नहीं है। दुनिया दो धड़ों में बंट गई है। एकतरफ तथाकथित राक्षस या तानाशाह लोग हैं, तो दूसरी तरफ तथाकथित देवता या लोकतान्त्रिक लोग हैं। इसीलिए पूरी दुनिया आज परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। सभी को इंतजार है कि किसी महापुरुष के रूप में शिव आएंगे और इस विष को पीकर दुनिया को नष्ट होने से बचाएंगे।

आज के समय में जिम व्यायाम के साथ योग बहुत जरूरी है

बहुत सी खबरें सुनने को मिल रही हैं कि फलां कलाकार या सेलिब्रिटी या कोई अन्य जिम व्यायाम करते हुए दिल के दौरे का शिकार होकर मर गया। मुझे लगता है कि वे पहले ही तनाव से भरे जीवन से गुजर रहे होते हैं। इससे उनके दिल पर पहले ही बहुत बोझ होता है। फिर बंद कमरे जैसे घुटन भरे स्थान पर भारी व्यायाम से वह बोझ और बढ़ जाता है, जिससे अचानक दिल का दौरा पड़ जाता है। पहले योग से तनाव को कम कर लेना चाहिए। उसके बाद ही भौतिक व्यायाम करना चाहिए, अगर जरूरत हो तो, और जितनी झेलने की क्षमता हो। योग से नाड़ियों में ऊर्जा घूमने लगती है। जीभ और तालु के आपसी स्पर्श के सहयोग से वह आसानी से मस्तिष्क से गले को या नीचे के अन्य चक्र को उतरती है, विशेषकर जब साथ में शरीरविज्ञान दर्शन की भी मन में भावना हो। शरीरविज्ञान दर्शन से मानसिक कुंडलिनी चित्र प्रकट होता है, और इसके साथ तालु-जीभ के परस्पर स्पर्ष के ध्यान से कुंडलिनी ऊर्जा अपने साथ ले जाता हुआ वह चित्र मस्तिष्क के दबाव को न बढ़ाता हुआ आगे के चैनल से होता हुआ किसी भी अनुकूल चक्र पर चमकने लगता है। इससे कुंडलिनी ऊर्जा व्यर्थ की बातचीत में बर्बाद न होकर विशुद्धि चक्र को भी पुष्ट करती है।

मस्तिष्क की ऊर्जा के सिंक या अवशोषक के रूप में विशुद्धि चक्र

ठंडे जल से नहाते समय जब नीचे से चढ़ती हुई ऊर्जा से मस्तिष्क का दबाव बढ़ जाता है या सिरदर्द जैसा होने लगता है, तब नीचे से आ रही ऊर्जा विशुद्धि चक्र पर कुंडलिनी प्रकाश और सिकुड़न के साथ घनीभूत होने लगती है। ऐसा लगता है कि नीचे का शरीर आटा चक्की का निचला पाट है, मस्तिष्क ऊपर वाला पाट है और विशुद्धि चक्र वह बीच वाला छोटा स्थान है, जिस पर दाना पिस रहा होता है। या ऊर्जा सीधी भी विशुद्धि चक्र को चढ़ सकती है, मस्तिष्क में अनुभव के बिना ही। जिसे ताउम्र प्रतिदिन गंगास्नान का अवसर प्राप्त होता था, उसे सबसे अधिक भाग्यवान, पुण्यवान और महान माना जाता था। “पंचस्नानी महाज्ञानी” कहावत भी शीतजल स्नान की महत्ता को दर्शाती है। गंगा के बर्फीले ठन्डे पानी में साल के सबसे ठंडे जनवरी (माघ) महीने के लगातार पांच पवित्र दिनों तक हरिद्वार के भिन्न-भिन्न पवित्र घाटों पर स्नान करना आसान नहीं है। आदमी में काफी योग शक्ति होनी चाहिए। पर यह जरूर है कि जिसने ये कर लिए, उसकी कुंडलिनी क्रियाशील होने की काफी सम्भावना है। इसीलिए कहते हैं कि ऐसे स्नान करने वाले को लोक और परलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं, मुक्ति भी नहीं। ठंडे पानी से नहाने वाले व ठंडे स्थानों में रहने वाले लोग इसके विशुद्धि चक्र प्रभाव की वजह से बहुत ओजस्वी और बातचीत में माहिर लगते हैं। यह ध्यान रहे कि ठंडे पानी का अभ्यास भी अन्य योगाभ्यासों की तरह धीरेधीरे ही बढ़ाना चाहिए, ताकि स्वास्थ्य को कोई हानि न पहुंचे। जिस दिन मन न करे, उस दिन नहीं नहाना चाहिए। अभ्यास और सहजता का नाम ही योग है। यकायक और जबरदस्ती योग नहीं है। अगर किसी दिन ज्यादा थकान हो तो न करने से अच्छा योगाभ्यास धीरे और आराम से करना चाहिए। इससे आदमी सहज़ योगी बनना सीखता है। किसी दिन कमजोरी लगे या मन न करे तो उस दिन अन्य धार्मिक गतिविधियों को छोड़ा भी जा सकता है, मूलभूत हठ योगाभ्यास को नहीं, क्योंकि योग सांसों या प्राणों से जुड़ा होने के कारण जीवन का मूल आधार ही है, जबकि अन्य गतिविधियां ऐड ऑन अर्थात अतिरिक्त हैं। होता क्या है कि बातचीत के समय मन में उमड़ रही भावनाएं और विचार विशुद्धि चक्र पर कैद जैसे हो जाते हैं, क्योंकि उस समय विशुद्धि चक्र क्रियाशील होता है। जब योग आदि से पुनः विशुद्धि चक्र को क्रियाशील किया जाता है, तब वे वहाँ दबे विचार व भावनाएँ बाहर निकल कर नष्ट हो जाती हैं, जिससे शांति महसूस होती है, और आदमी आगे की नई कार्यवाही के लिए तरोताज़ा हो जाता है। यह ऐसे ही है, जैसे खाली ऑडियो रिकॉर्डर में ऑडियो कैसेट को घुमाने से उस पर आवाज दर्ज हो जाती है। जब उस लोडिड कैसेट को पुनः उसी तरह घुमाया जाता है, तो वह दबी हुई आवाज गाने के रूप में बाहर आ जाती है, जिसे हम सब सुनते हैं। इसी तरह सभी चक्रोँ पर होता है। यह मुझे बहुत बड़ा चक्र रहस्य लगता है, जिसके बारे में एक पुरानी पोस्ट में भी बात कर रहा था।

श्री शब्द एक महामंत्र के रूप में (धारणा और ध्यान में अंतर)

जिंदगी की भागदौड़ में यदि शरीरविज्ञान दर्शन शब्द का मन में उच्चारण न कर सको, तो श्रीविज्ञान या शिवविज्ञान या शिव या शविद या केवल श्री का ही उच्चारण कर लो, कुंडलिनी आनंद और शांति के साथ क्रियाशील हो जाएगी। श्री शब्द में बहुत शक्ति है, इसी तरह श्री यंत्र में भी। सम्भवतः यह शक्ति शरीरविज्ञान दर्शन से ही आती है, क्योंकि श्री शब्द शरीर से निकला हुआ शब्द और उसका संक्षिप्त रूप लगता है। श्री शब्द सबसे बड़ा मंत्र लगता है मुझे, क्योंकि यह बोलने में सुगम है और एक ऐसा दबाव पैदा करता है, जिससे कुंडलिनी क्रियाशील होने लगती है। सम्भवतः इसीलिए किसी को नाम से सम्बोधित करने से पहले उसके साथ श्री लगाते हैं। इसी तरह धार्मिक अवसरों व क्रियाकलापों को श्री शब्द से शुरु किया जाता है। इसी तरह शिव भी शरीर से मिलता जुलता शब्द है, शव भी। इसीलिए शक्तिहीन शिव को शव भी कहते हैं। अति व्यस्तता या शक्तिहीनता की अवस्था में केवल “श” शब्द का स्मरण भी धारणा को बनाए रखने के लिए काफी है। मन की भावनात्मक अवस्था में इसके स्मरण से विशेष लाभ मिलता है। “श” व “स” अक्षर में बहुत शक्ति है। इसीलिए श अक्षर से शांति शब्द बना है। श अक्षर के स्मरण से भी शांति मिलती है और कुंडलिनी से भी। श अक्षर से कुंडलिनी मस्तिष्क के नीचे के चक्रोँ मुख्यतः हृदय चक्र पर क्रियाशील होने लगती है। इससे आनंद के साथ शांति भी मिलती है, और मस्तिष्क का बोझ हल्का हो जाने से काम, क्रोध आदि मन के जंगी दोष भी शांत हो जाते हैं। इसी तरह श अक्षर से ही शक्ति शब्द बना है, जो कुंडलिनी का पर्याय है। यह संस्कृत भाषा का विज्ञान है। आपने संस्कृत मंत्र स्वस्तिवाचन के बाद चारों ओर शांति का माहौल महसूस किया ही होगा। यह सामूहिक रूप में गाया जाता है, जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि की मंगलकामना की जाती है। ज्ञान होने पर भी उसका लाभ क्यों नहीं मिलता? क्योंकि हम ज्ञान की धारणा बना कर नहीं रखते। मैं ध्यान करने को नहीं बोल रहा। व्यस्त जीवन के दौरान ध्यान कर भी नहीं सकते। धारणा तो बना सकते हैं। धारणा और ध्यान में अंतर है। ध्यान का मतलब है उसको लगातार सोचना। इससे ऊर्जा का व्यय होता है। धारणा का मतलब है उस पर विश्वास या आस्था या उस तरफ सोच का झुकाव रखना। इसमें ऊर्जा व्यय नहीं होती। जब उपयुक्त समय कभी जिंदगी में प्राप्त होता है, तो धारणा एकदम से ध्यान में बदल जाती है और तनिक योगाभ्यास से समाधि तक ले जाती है। धारणा जितनी मजबूती से होगी और जितने लम्बे समय तक होगी, ध्यान उतना ही मजबूत और जल्दी लगेगा। पतंजलि ने भी अपने सूत्रों में धारणा से ध्यान स्तर का प्राप्त होना बताया है। मेरे साथ भी ठीक ऐसे ही हुआ। मैं शरीरविज्ञान दर्शन नामक अद्वैत दर्शन पर धारणा बना कर रखता था पर समय और ऊर्जा की कमी से ध्यान नहीं कर पाता था। इनकी उपलब्धता पर वह धारणा ध्यान में बदल गई और ====बाकि का सफर आपको पता ही है (कि क्या होता है )। अद्वैत की धारणा अप्रत्यक्ष रूप में कुंडलिनी की धारणा ही होती है, क्योंकि अद्वैत और कुंडलिनी साथसाथ रहने की कोशिश करते हैं। ध्यान प्रत्यक्ष रूप में, मतलब जानबूझकर कुंडलिनी का किया जाता है, जिसमे कुंडलिनी जागरण प्राप्त होता है।

रूपान्तरण से आदमी पुरानी चीजों को भूलता नहीं हैं, अपितु उन्हें सकारात्मकता के साथ अपनाता है

योग खुद कोई रूपान्तरण नहीं करता। यह अप्रत्यक्ष रूप से खुद होता है। योग से मन का कचरा बाहर निकलने से मन खाली और तरोताज़ा हो जाता है। इससे मन नई चीजों को ग्रहण करता है। नई चीजों में भी अच्छी चीजें और आदतें ही ग्रहण करता है, क्योंकि योग से सतोगुण बढ़ता है, जो अच्छी चीजों को ही आकर्षित करता है। कई लोगों को लगता होगा कि योग से रूपान्तरण के बाद आदमी इतना बदल जाता है कि उसके पुराने दोस्त व परिचित उससे बिछड़ जाते हैं, उसके मन में पुरानी यादें मिट जाती हैं, वह अकेला पड़ जाता है वगैरह वगैरह। पर दरअसल बिल्कुल ऐसा नहीं होता। रहता उसमें सबकुछ है, पर उसे उनके लिए वह क्रेविंग या छटपटाहाट महसूस नहीं होती, जो कि रूपान्तरण से पहले होती है। उनके लिए उसके मन में विकार नहीं होते, जैसे कि काम, क्रोध, लोभ, मोह और मत्सर। इसका मतलब है कि फिर पुराने दुश्मन भी उसे दोस्त लगने लगते हैं। अगर ऐसा रूपान्तरण सभी के साथ हो जाए, तो दुनिया से लड़ाई-झगड़े ही खत्म हो जाएं। अगर ऐसा ही रूपान्तरण सभी देशों या राष्ट्रध्यक्ष लोगों के साथ हो जाए, तो युद्ध वगैरह कथा-कहानियों तक ही सीमित रह जाएंगे।

Kundalini yoga versus nuclear world war

kundalini energy neutralizes the poison drunk by Neelkanth Shiva Mahadeva

Friends, I recently went to a local fair. There I began to look at the dragon train. As soon as I saw its open-toothed mouth, the energy inside me seemed like getting up from Muladhara and revolving around. Though it was mild, it was blissful, almost the same as one feels at the sight of the Shivalingam. The modes of outward expression keep on changing according to prevailing local culture, but the basic thing remains the same. About the same thing, I was telling in the previous post that how the Kundalini energy comes down from the brain and goes to the warrior organs due to anger etc. Due to this, the memory and emotions in the brain become impaired. Emotions consume a lot of energy. That’s why man often falls ill after strong feelings or emotional trauma. You must have heard that such a man fell ill or passed away after losing a dear acquaintance. Philosophy of physiology controls uncontrolled emotions. It should also come as no surprise from the above psychological analysis that by meditating on a dragon or by imposing it on one’s body, the Kundalini energy begins to manifest at various chakras. Perhaps the Wrathful deities of Buddhists also helps Kundalini by the same principle. In fact, this same Kundalini science is hidden behind the ethics that is taught in various religious scriptures. Speak the truth, don’t steal, don’t get angry, talk sweet, be happy and smiling, don’t get attached etc. words seem unscientific to us, but the reason behind them is to save precious energy and make it available to Kundalini, so that she can awaken as soon as possible. Some people saw these ethical words related to health science only, ignoring the spiritual science that’s along with it. When the energy of violent creatures like dragons, lions etc. comes down from the brain, then it first comes on the jaw and neck. That is why with the dreaded and roaring face along with the acrobatic movements of the jaw and neck, they fall on the prey. Then some of the extra energy also goes to the front legs, due to which they hold the prey tightly. When the heart gets tired from these activities, then the extra energy also gets down to the heart. After that the energy reaches the belly, which increases appetite. This makes these even more violent, because from there the energy starts coming back up through the back channel to top and again drops little down to the jaws. When, even after so much effort, the prey starts running away breaking the control, the energy reaches the legs and chases the hunter after it. After a while that energy goes back to the brain, so the hunter gets tired and sits down. Then it doesn’t distort its face to take its energy down because it realizes that it’s not going to be of any use. It gets so much tired that it doesn’t even have the energy to drop energy from brain down. Energy is also needed to drop energy down. That is why at that time it seems calm, compassionate, non-violent and full of virtues like a cow, its memory and good emotions return, because at that time its mind is full of energy. It is a different matter that the energy that has descended from the brain is felt by the animal in the form of darkness, not as a Kundalini picture, because being a lower living entity, it has less brain, and it is not a Kundalini yogi either. In fact, the poison that Shiva had consumed and trapped it in the throat was the energy expressed in the form of the evil spirits of the mind. These evils enter inside the body from bad scenes and words through eyes and ears. When that negative energy of brain reaches the Vishuddhi Chakra, it gets transformed in to positive kundalini energy that remains trapped there for a long time. This is because of the position and texture of the neck. The neck is like the joint of the head and the trunk, which is the most mobile. Just as water or soil present in water pipe gets stuck on the flexible and soft joints located at places in it, in the same way energy remains trapped in the neck. That’s why he neither spewed nor swallowed that transformed poison, it remained trapped in the throat, that is why Shiva is called Neelkanth means blue throated. That is why it is said that one who has perfected the Vishuddhi Chakra, he has perfected many things. In fact, if the Kundalini energy is dropped on any chakra below the neck, then it suddenly turns around again and reaches the brain, and increases the pressure of stress there. However Kundalini energy stays longer at heart chakra, but it tries to return back to brain immediately from naval chakra and chakras below through abdominal contraction. Although it’s than positive kundalini energy, but chances of its converting back to evil thoughts are still there in the brain. Also, the energy can go to warrior organs to make chaos in the society. Shiva can be forced to perform dreadful tandava dance with that energy reaching arms and legs if swallowed. That is why it is kept on the Vishuddhi chakra of the neck. Meaning that if Lord Shiva drinks the poison of stress down from the throat, then it will be sucked from his stomach, and it will reach the brain back after mixing with the blood. Poison or bad feelings reaching the brain means death in the form of darkness of ignorance or evils of mind. Presumably the Kundalini energy reaches the stomach with food, and from there it reaches the brain. Shiva cannot even spew the poison,  because if he spews it outside, it can destroy the living beings. If the maladies of man’s mind come out in the form of abuse, anger, and the evil eye, they will naturally do harm to other people and animals. Due to this, mutual enmity and violence etc. will spread in the society. That’s why people say that such a man got very angry but he drank it. Actually anger is not drunk, it is kept stuck in the throat, by drinking, it will reach the mind again. However, with drinking too with subsequent reabsorption to brain, there is maximum probability of its being transformed to kundalini energy for long time with little extra thoughtful effort. That is why you must have heard many people saying being upset, I have come till my throat or that my breath or life is entangled in my throat. In fact, the weaker section people say this more, because they can neither swallow nor spit out trouble, for fear of being persecuted in return by the people. In fact, one like them is happiest, like the innocent Shankar, because of keeping trouble stuck in his throat. They do not get upset actually, due to proper management of the problem. They are seen as upset by others, because they do not know how to manage the problem. To many people, blue-throated Shiva may seem poor, but those people are poor themselves as they do not understand him. Shiva does not wear poison around his neck out of fear, but out of compassion for all living beings like his own son. Lord Shiva creates the whole creation and takes care of its entire work. So it is natural that his mind would also be filled with stress and depression. That tension does not come out on the world in the form of anger, that is why he keeps the poison of stress around his neck. Because the color of blood is also red-blue, which is a sign of energy, that is why his throat turns blue. He behaves like a great yogi.

Samudra manthan or earth exploitation produce poison in the form of mental defects that is digested or destroyed by great men like Shiva

It is said that the Halahal poison came out during the churning of the ocean. There were many other wonderful things obtained through it. Samudra or ocean means world i.e. earth, churning or manthan means tapping or milking. You are already seeing the majestic things, such as automobiles, computers, airplanes, nuclear reactors etc., countless machines. The same great churning is going on even today. Countless leaders, heads of state, global organizations, scientists and technicians are like ocean churning gods and demons. The entire world is devided in to two parts, one part made of so called demons or dictators, and the second part made of so called gods or Democratic people. No one has the courage to drink the poison that arises in the form of defects of the mind like anger, jealousy, ego etc. That is why the whole world is standing on the verge of nuclear war today. Everyone is waiting that Shiva will come in the form of a great man and drink this poison and save the world from destruction.

Gym exercise is better alongwith yoga

In today’s timeMany news are being heard that such and such artist or celebrity died due to heart attack while doing gym exercise. I think they are already going through a stressful life. This puts a lot of burden on their heart already. Then heavy exercise in a stuffy place like a closed room increases that burden, which leads to a sudden heart attack. First of all, stress should be reduced by yoga. Only after that physical exercise should be done, if needed and whatever is tolerable. Through yoga, energy starts circulating in the nadis. With the help of mutual contact of tongue and palate, it easily descends from the brain to the throat or other lower chakra, especially when there is a feeling in the mind of the philosophy of physiology. Philosophy of physiology reveals the mental kundalini picture, and with it the kundalini energy is taken with it by the attention of the palate-tongue mutual touch, that picture does not increase the pressure of the brain and shines on any favorable chakra through the front channel. Due to this, the Kundalini energy is not wasted in unnecessary conversations instead it strengthens the Vishuddhi Chakra too.

Vishuddhi Chakra as a sink or absorber of brain energy

While bathing in cold water, when the pressure in the brain increases due to the rising energy from below or starts causing a headache, then the energy coming from below starts condensing on the Vishuddhi chakra with the light of kundalini and contraction there. It seems that the lower body is the lower plate of the flour mill, the brain is the upper plate and the Vishuddhi Chakra is the small space in the middle on which the grain is being milled. Or the energy can directly climb to vishuddhi chakra without being noticed in the brain. The one who got the opportunity of bathing in the Ganges every day, was considered the most fortunate, virtuous and great. The proverb “Panchasnani Mahagyani” meaning “five times bathers being the most knowledgeable” also shows the importance of cold water bath. It is not easy to bathe in the icy cold water of the Ganges for five consecutive auspicious days of coldest January month at different shores in holy Haridwar city. There should be a lot of yoga power in a man. But it is definite that the one who has done this, there is a lot of possibility of his Kundalini becoming active. That is why it is said that the one who takes such a bath has nothing rare in the world and the hereafter, not even liberation. Those who take bath with cold water and live in cold places, for the vishuddhi chakra potentiating reason, seem very energetic and expert in conversation. It should be kept in mind that the practice of cold water bath should also be increased gradually like other yoga practices, so that there is no harm to health. One should not take bath on a day when he does not feel like it. Yoga is the name of practice and ease. There is no sudden and forced manner yoga. If there is a lot of fatigue on some day, then better yoga should be practiced slowly and comfortably than not. By this man learns to become a Sahaja Yogi or auto yogi. If one day feels weakness or does not feel liking, then other religious activities can be abandoned on that day, not the basic hatha yoga practice, because yoga is the basic foundation of life being connected with breath or prana, whereas other activities are add on i.e. are extra. What happens is that the feelings and thoughts arising in the mind during the conversation get imprisoned on the Vishuddhi Chakra because at that time the Vishuddhi Chakra is active. When the Vishuddhi chakra is activated again by yoga etc., then those buried thoughts and feelings come out and get destroyed, due to which one feels peace, and the person is refreshed for further new action. It’s just like rotating an empty audio cassette in an audio recorder records sound on it. When that loaded cassette is rotated again in the same way, that muffled sound comes out in the form of a song that we all hear. The same happens on all the chakras. This seems to me to be the huge chakra mystery that appears psychologically resolved with this, which was also being talked about in an old post.

Shree word as a Mahamantra (difference between contemplation and assumption or dhyana versus dharna)

In the hustle and bustle of life, if you cannot pronounce the word sharirvigyan Darshan in your mind, then chant Shree Vigyan or Shiv Vigyan or shavid or only Shree, Kundalini will become active with joy and peace. There is a lot of power in the word Shree, similarly there is a Shree Yantra. Perhaps this power comes from the philosophy of Physiology, because the word Shri seems to be a word derived from the body or sharir in Sanskrit or it’s its abbreviated form. The word Shree seems to me to be the greatest mantra, because it is easy to utter and creates such a unique pressure on body systems, which activates the Kundalini. Probably that is why before addressing someone by name, one puts Shri with it. Also, in start of many holy occasions and activities, shree word is pronounced. Similarly, Shiva is also a word similar to shareer or body, corpse or shava too. That is why a powerless Shiva is also called a shava. In a state of preoccupation or powerlessness, even the mere remembrance of the word “sh” is sufficient to maintain the impression that’s Dharna. In a state of preoccupation or powerlessness, even the mere remembrance of the word “sh” is sufficient to maintain the impression. In the emotional state of mind, remembering it gives special benefit. There is a lot of power in the letter “S” mainly “sh” made of it. That is why the word Shanti meaning peace is formed from the letter Sh. The remembrance of the word ‘Sha’ gives peace and peace is also provided by Kundalini. With the word Sha, Kundalini starts working on the chakras below the brain, mainly the heart chakra. It also gives peace along with pleasure, and also by lightening the burden of the mind, by which the warlike vices of the mind like lust, anger, etc. also get pacified. Similarly, the word shakti is formed from the letter sh, which is synonymous with kundalini. This is the science of Sanskrit language. You must have felt an atmosphere of peace all around after the Sanskrit Mantra Swastivachan. It is sung in a collective form, in which the entire creation is wished well. Why not get the benefit of knowledge even after having it? Because we do not keep the concept (or Dharna in Sanskrit) of knowledge. I am not talking about meditating. Can’t even meditate during busy life. You can make assumptions. There is a difference between perception and attention. Meditation means thinking about it continuously. This consumes energy. Dharana means having faith or belief in it or inclination of thinking towards that. It does not consume energy. When the appropriate time is found sometime in life, the dharana immediately turns into meditation or dhyana and leads to samadhi with little yogic practice. The stronger the dharana and the longer it lasts, the stronger and quicker the meditation will be set. Patanjali has also told in his sutras to attain the level of meditation or dhyana through dharana. Exactly the same happened with me. I used to hold a belief on the Advaita philosophy called ‘Sharir Vigyan Darshan’ but could not meditate due to lack of time and energy. That perception on their availability turned into meditation and ==== you know the rest of the journey (what happens). The concept of Advaita is indirectly the concept of Kundalini, because Advaita and Kundalini try to live together. Meditation, in a direct form, means intentional meditation on Kundalini, in which Kundalini awakening is achieved.

Transformation does not make man forget the old things, but adopts them with a positive attitude

Yoga itself does not do any transformation. This happens indirectly. By taking out the waste of the mind through yoga, the mind becomes empty and refreshed. With this the mind accepts new things. Even in new things, he accepts only good things and habits, because through yoga the virtue of goodness increases, which attracts only good things. Many people would think that after transformation from yoga, a person changes so much that his old friends and acquaintances get separated from him, old memories are erased in his mind, he becomes lonely and so on. But actually that is not the case at all. He has everything in him, but he doesn’t feel the cravings or tingling for them that precedes the transformation. For them there are no vices in his mind, such as lust, anger, greed, attachment and jealousy. This means that even old enemies start seeming to him as friends. If such a transformation happens with everyone, then fights with the worldly beings will end. If this kind of transformation happens to all the countries or heads of state, then wars etc. will be limited to stories.

कुंडलिनी शक्ति ही ड्रेगन है

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में स्नान-योग अर्थात शीतजल स्नान और गंगास्नान से प्राप्त कुंडलिनी लाभ के बारे में बात कर रहा था। शीतजल स्नान अपने आप में एक संपूर्ण योग है। इसमें मूल बंध, जलंधर बंध और उड्डीयान बंध, योग के तीनों मुख्य बंध एकसाथ लगते हैं। हालांकि आजकल गंगा में प्रदूषण भी काफी बढ़ गया है, और लोगों में इतनी योगशक्ति भी नहीं रही कि वे ठंडे पानी को ज्यादा झेल सकें। मेरे एक अधेड़ उम्र के रिश्तेदार थे, जो परिवार के साथ गंगास्नान करने गए, और गंगा में अपने हरेक सगे संबंधी के नाम की एक-एक पवित्र डुबकी लम्बे समय तक लगाते रहे। घर वापिस आने पर उन्हें फेफड़ों का संक्रमण हो गया, जिससे उनकी जान ही चली गई। हो सकता है कि और भी वजहें रही हों। बिना वैज्ञानिक जाँच के तो पुख्ता तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता, पर इतना जरूर है कि जिस पानी में इतने सारे लोग एकसाथ नहा रहे हों, और जिसमें बिना जले या अधजले शव फ़ेंके जाते हों, साथ में मानव बस्तियों व उद्योगों का अपशिष्ट जल डाला जाता हो, उसमें संक्रमण फैलाने वाले कीटाणु मौजूद हो सकते हैं। पहले ऐसा नहीं था या कम होता था, और साथ में योगशक्ति आदि से लोगों की इम्युनिटी मजबूत होती थी।

मैं जागृति की जाँच के संबंध में भी बात कर रहा था। मैं इस पैराग्राफ में कुछ दार्शनिक गहराई में जा रहा हुँ। पाठकों को यह उबाऊ लग सकती है इसलिए वे चाहें तो आगे भी निकल सकते हैं। जागृति की जाँच से यह फायदा होगा कि जागृत व्यक्ति को यथासम्भव भरपूर सुखसुविधाओं का हकदार बनाया जा सकता है। जागृति के बाद भरपूर सुखसुविधाएं भी जब उसे मोहित नहीं कर पाएंगी, तभी तो वह जागृति की असली कीमत पहचानेगा न। दुनिया से संन्यास लेने से उसे जागृति के महत्त्व का कैसे पता चलेगा। उसके लिए तो महत्त्व उन्हीं दुनियावी सुखों का बना रहेगा, जिनका लालसा भरा चिंतन वह मन ही मन करता रहेगा। चीनी का महत्त्व आदमी तभी समझेगा न जब वह चीनी खाने के एकदम बाद मिष्ठान्न खाएगा और उसे उसमें मिठास नहीं लगेगी। अगर वह चीनी खाने के एकदम बाद मिष्ठान्न नहीं खाएगा, तब तो वह मिष्ठान्न का ही गुणगान गाता रहेगा, और चीनी को बेकार समझेगा। इसलिए मेरा मानना है कि जागृति के एकदम बाद आदमी के जीवन में दुनियावी सुखसुविधाओं की बाढ़ आ जानी चाहिए, ताकि वह इनकी निरर्थकता को दिल से महसूस कर सके और फिर प्रवचनादि से अन्य लोगों को भी महसूस करवा सके, केवल सुनीसुनाई बातों के सहारे न बैठा रहे। इसीलिए तो पुराने समय में राजा लोग वन में ज्ञानप्राप्ति के बाद अपने राज्य को लौट आया करते थे, और पूर्ववत सभी सुखसुविधाओं के साथ अपना आगामी जीवन सुखपूर्वक बिताते थे, वन में ही दुबके नहीं रहते थे। सम्भवतः इस सत्य को दिल से महसूस करके ही आदमी आत्मविकास के शिखर तक पहुंचता है, केवल सुनने भर से नहीं। सम्भवतः ओशो महाराज का क्रियादर्शन भी यही था। मैं भी उनकी तरह कई बार बनी-बनाई रूढ़िवादी धारणाओं से बिल्कुल उल्टा चलता हूँ, अब चाहे कोई मुझे क्रन्तिकारी कहे या सत्याग्रही। ज्यादा उपयुक्त शब्द ‘स्वतंत्र विचारक’ लगता है, क्योंकि स्वतंत्र विचार को किसी पर थोपा नहीं जाता और न ही उसके लिए भीड़ इकट्ठा की जाती है, अच्छा लगने पर लोग खुद उसे चुनते हैं। यह लोकतान्त्रिक और शान्तिपरक होता है, क्रांति के ठीक विपरीत। ओशो महाराज ने यह अंतर बहुत अच्छे से समझाया है, जिस पर उनकी एक पुस्तक भी है। बेशक जिसने पहले कभी मिष्ठान्न खाया हुआ हो, तो वह चीनी खाने के बाद मिष्ठान्न के स्वाद को याद कर के यह अंदाजा लगा सकता है कि चीनी की मिठास मिष्ठान्न से ज्यादा है, पर मिष्ठान्न की नीरसता का पूरा पता तो उसे चीनी खाने के बाद मिष्ठान्न खा कर ही चलेगा। इसी तरह जागृति के बाद आदमी यह अंदाजा लगा सकता है कि जागृति सभी भौतिक सुखों से बढ़कर है, पर भौतिक सुखों की नीरसता का प्रत्यक्ष अनुभव तो उसे जागृति के एकदम बाद सुखसुविधाओं में डूबने से होगा। जैसे अगर दुबारा चीनी का मिलना असम्भव हो, तो आदमी मिष्ठान्न खाकर चीनी की मिठास को पुनः याद कर सकता है, और कोई चारा नहीं, उसी तरह आदमी सुखसुविधाओं को भोगते हुए उनसे अपनी जागृति को पुनः याद करते हुए उससे लाभ उठा सकता है, और कोई चारा नहीं। तो ये आसमान में फूल की तरह संन्यास कहाँ से आ गया। मुझे लगता है कि संन्यास उसके लिए है, जो परवैराग्य में स्थित हो गया है, मतलब जागृति के बाद सारी सुखसुविधाओं को भरपूर भोग लेने के बाद उनकी नीरसता का प्रत्यक्ष अनुभव कर चुका है, और उनसे भी पूरी तरह विमुख हो गया है। उसको जागृति की तमन्ना भी नहीं रही है, क्योंकि सुख़सुविधाओं की तरह जागृति भी दुनियावी ही है, और दोनों एकदूसरे की याद दिलाते रहते हैं। पर यहाँ बहुत सावधानी की आवश्यकता है, क्योंकि जगत के प्रति जरा भी महत्त्वबुद्धि रहने से वह योगभ्रष्ट बन सकता है, मतलब  लौकिक और पारलौकिक दोनों लाभोँ से एकसाथ वँचित रह सकता है। इसलिए सबसे अच्छा व सुरक्षित तरीका गृहस्थ आश्रम का कर्मयोग ही है, जिसमें किसी भी हालत में खतरा नहीं है। जागृति के एकदम बाद के साधारण वैराग्य में संन्यास लेने से वह सुखभोगों की पुरानी यादों से काम चला सकता है, पर यह प्रत्यक्ष सुखभोगों की तरह कारगर नहीं हो पाता, और योगी की सुखभोगों के प्रति महत्त्वबुद्धि बनी रहती है।

सुखसुविधाएं तो दूर, कई लोग तो यहाँ तो कहते हैं कि आदमी को विशेषकर जागृत व्यक्ति को भोजन की जरूरत ही नहीं, उसके लिए तो हवापानी ही काफी है। ऐसा कैसे चलेगा। भौतिक सत्य को समझना पड़ेगा। दरअसल मोटापा अधिक भोजन से नहीं, अपितु असंतुलित भोजन से पनपता है। शरीर के मैटाबोलिज़्म को सुचारु रूप से चलाने के लिए सभी आवश्यक तत्त्व उचित मात्रा में चाहिए होते हैं। किसी की भी कमी से चयापचय गड़बड़ा जाता है, जिससे शरीर में भोजन ढंग से जल नहीं पाता, और इकट्ठा जमा होकर मोटापा पैदा करता है। शरीर ही चूल्हा है। यह जितना तेजी से जलेगा, जीवन उतना ही ज्यादा चमकेगा। बहुत से लोगों के लिए आज हिन्दू धर्म का मतलब कुछ बाहरी दिखावा ही रह गया है। उसे खान-पान के और रहन-सहन के विशेष और लगभग आभासिक जैसे अवैज्ञानिक (क्योंकि उसके पीछे का विज्ञान नहीं समझ रहे) तरीके तक सीमित समझ लिया गया है। कुछ लोगों के लिए मांस-मदिरा का प्रयोग न करने वाले हिन्दू हैं, तो कुछ के लिए संभोग से दूरी बना कर रखने वाले हिन्दू हैं। कुछ लोगों के लिए हिंदु धर्म पालयनवादी है। इसी तरह कई लोगों की यह धारणा है कि जो जितना ज्यादा अहिंसक है, गाय की तरह, वह उतना ही ज्यादा हिंदूवादी है। योग और जागृति गए तेल लेने। यहाँ तक कि अधिकांश लोग कुंडलिनी का अर्थ भी नहीं समझते। वे इसे ज्योतिष वाली कुंडली पत्री समझते हैं। हालांकि यह भी सत्य है कि पलायनवाद और शराफत से ही दुनिया बच सकती है, क्योंकि मानव की अति क्रियाशीलता के कारण यह धरती नष्ट होने की कगार पर है। इस तरह का बाहरी दिखावा हर धर्म में है, पर क्योंकि हिन्दू धर्म में यह जरूरत से ज्यादा उदारता व सहनशीलता से भरा है, इसलिए यह कमजोरी बन जाता है, जिससे दूसरे धर्मों को बेवजह हावी होने का मिलता है। अगर आप अपनी दुकान से गायब रहोगे, तो दूसरे लोग तो आएंगे ही उसमें बैठने। हालांकि यहाँ यह बात गौर करने लायक है कि मशहूर योगी गोपी कृष्ण ने अपनी किताब में लिखा है कि जागृति के बाद उन्हें इतनी ज्यादा ऊर्जा की जरूरत पड़ती थी कि कुछ मांसाहार के बिना उनका गुजारा ही नहीं चलता था। यह भी हो सकता है कि भिन्नभिन्न प्रकार के लोगों की भिन्नभिन्न प्रकार की जरूरतें हों। मैं फेसबुक पर एक मित्र की पोस्ट पढ़ रहा था, जो लिख रहा था कि अपने धर्म को दोष देने की, उसे बदनाम करने की और उसे छोटीछोटी बातों पर आसानी से छोड़ने की या धर्म बदलने की या धर्मनिरपेक्ष बनने की आदत हिन्दुओं की ही है, दूसरे धर्म के लोगों की नहीं। दूसरे धर्म के लोग किसी भी हालत में अपने धर्म को दोष नहीं देते, अपितु उसके प्रति गलत समझ और गलत व्यवस्था को दोष देते हैं। इसीलिए बहुत से लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि हिंदु धर्म को दूसरे धर्म के लोगों से ज्यादा अपने धर्म के लोगों से खतरा है। वैसे इस वैबसाईट का लक्ष्य धर्म की विवेचना करना नहीं है, यह तो प्रसंगवश बात चल पड़ी थी। यह तो मानना ही पड़ेगा का हिंदु धर्म की उदारता और सहनशीलता के महान गुण के कारण ही आज सबसे ज्यादा वैज्ञानिक शोध इसी धर्म पर हो रहे हैं। कई बार दिल की बात को बोलना-लिखना मुश्किल हो जाता है, जिससे गलतफहमियां पैदा हो सकती हैं। किसी के गुणों को उस पर स्थायी रूप से चिपकाने से भी गलतफहमी पैदा होती है। होता क्या है कि गुण बदलते रहते हैं। यह हो सकता है कि किसी में कोई विशेष गुण ज्यादा दिखता हो या और गुणों की अपेक्षा ज्यादा बार आता-जाता हो। ऐसा ही मैंने हिंदु धर्म के कुछ उपरोक्त गुणों के बारे में कहा है कि वे ज्यादा नजर आते हैँ कई बार, हमेशा नहीं। काल गणना भी जरूरी है, वस्तुस्थिति को स्पष्ट करने के लिए। ऐसा भी हो सकता है कि विशेष गुणों को धर्म के कुछ लोग ही अपनाएं, अन्य नहीं। इसलिए धर्म के साथ उसके घटक दलों पर नजर रखना भी जरूरी है। इसी तरह क्षेत्र विशेष पर भी निर्भर करता है। कहीं पर किसी धर्म के साथ कोई एक विशेष गुण ज्यादा प्रभावी हो सकता है, तो किसी अन्य जगह पर पर कोई अन्य विशेष गुण। सभी धर्मों में सभी गुण मौजूद हैं, कभी कोई ज्यादा दिखता है, तो कभी कोई दूसरा। पर जो गुण औसत से ज्यादा नजर दिखता है, वह उस धर्म के साथ स्थायी तौर पर चिपका दिया जाता है, और उस गुण के साथ उस धर्म की पहचान जोड़ दी जाती है, जिससे धार्मिक वैमनस्य पैदा होता है। इसीलिए कहते हैं कि बुराई से लड़ो, धर्म से नहीं; बुराई से लड़ो, बुरे से नहीं। कंडीशन्स लागू हो सकती हैं। अगर कोई मुझे मेरे अपने जायज हक के लिए तनिक गुस्से में देख ले, और मेरे प्रति स्थायी धारणा फैला दे कि मैं गुस्सैल किस्म का आदमी हूँ, तो मुझे तो बुरा लगेगा ही। आजकल के दौर में मुझे सभी धर्म असंतुलित नजर आते हैं, मतलब औसत रूप में। किसी धर्म में जरूरत से ज्यादा सतोगुण, तो किसी में रजोगुण, और किसी में तमोगुण है। कोई वामपंथियों की तरह उत्तर की तरफ जा रहा है, तो कोई दक्षिणपांथियों की तरह दक्षिण की तरफ, बीच में कोई नहीं। यह मैं औसत नजरिये को बता रहा हुँ, या जैसे विभिन्न धर्मगुरु दुनिया के सामने अपने धर्म को अभिव्यक्त करते हैं, असल में तो सभी धर्मों के अंदर बढ़चढ़ कर महान लोग हैं। अगर सभी धर्म मित्रतापूर्वक मिलजुल कर रहने लगें, तो यह औसत असंतुलन भी खत्म हो जाएगा, और पूरी दुनिया में पूर्ण संतुलन क़ायम हो जाएगा। संतुलन ही योग है।

उदाहरण के लिए चायना के ड्रेगन को ही लें। कहते हैँ कि ड्रेगन को मानने वाला चीनी होता है। पर हम सभी ड्रेगन को मानते हैं। यह किसी विशेष देश विशेष से नहीं जुड़ा है। ठंडे जल से स्नान के समय जब सिर को चढ़ी हुई कुंडलिनी आगे से नीचे उतारी जाती है, तो तेजी से गर्म साँसें चलती है, विशेष रूप से झटके के साथ बाहर की तरफ, जैसे कि ड्रेगन आग उगल रही हो। प्रेम प्रसंगों में भी ‘गर्म सांसें’ शब्द काफी मशहूर हैं।ड्रेगन या शेर की तरह मुंह चौड़ा खुल जाता है, सारे दाँत बाहर को दिखाई देते हैँ, नाक व कपोल ऊपर की तरह खिंचता है, जिससे आँखें थोड़ा भिंच सी जाती हैं, शरीर का आकार भी ड्रेगन की तरह हो जाता है, पेट अंदर को भिंचा हुआ, और सांसों से फैलती और सिकुड़ती छाती। शरीर का हिलना डुलना भी ड्रेगन की तरह लगता है। ड्रैगन को उड़ने वाला इसलिए दिखाया जाता है क्योंकि क्योंकि कुंडलिनी भी पलभर में ही ब्रह्माण्ड के किसी भी कोने में पहुंच जाती है। शरीर ब्रह्माण्ड तो ही है, मिनी ब्रह्माण्ड। ड्रेगन के द्वारा आदमी को मारने का मतलब है कुंडलिनी शक्ति द्वारा आदमी के अहंकार को नष्ट कर के उसे अपने नियंत्रण में लेना है। फिल्मों में, विशेषकर एनीमेशन फिल्मों में जो दिखाया जाता है कि आदमी ने कैसे ड्रेगन को जीतकर और उसको वश में करके उससे बहुत से काम लिए, उस पर बैठकर हवाई यात्राएं कीं, और अपने दुश्मनों से बदला लिया आदि, यह कुंडलिनी को वश में करने और उससे विभिन्न लौकिक सिद्धियों को हासिल करने को ही दर्शाता है। कहीं खूंखार जानवरों की शक्ति के पीछे कुंडलिनी शक्ति ही तो नहीं, यह मनोवैज्ञानिक शोध का विषय है। सम्भवतः गुस्से के समय जो चेहरा विकृत और डरावना हो जाता है, उसके पीछे भी यही वजह हो। दरअसल मांसपेशियों के संकुचन से उत्पन्न गर्मी ही गर्म सांसों के रूप में बाहर निकलती है। अब आप कहोगे कि मस्तिष्क से कुंडलिनी को नीचे कैसे उतारना है। इसमें कोई रॉकेट साईंस नहीं है। मस्तिष्क को बच्चे या गूंगे बहरे की तरह ढीला छोड़ दें, बस कुंडलिनी एक झटके वाली गहरी बाहर की ओर सांस और पेट की अंदर की ओर सिकुड़न के साथ नीचे आ जाएगी। हालांकि जल्दी ऊपर चढ़ जाती है फिर से। कुंडलिनी को लगातार नीचे रखने के लिए अभ्यास करना पड़ता है।

आदमी के चेहरे के आकलन से उसके व्यक्तित्व का आकलन हो जाता है

आदमी के चेहरे के आकलन से उसके व्यक्तित्व का आकलन हो जाता है। सीधी सी कॉमन सेंस की बात है। किसी का शारीरिक मुकाबला करने के लिए बाजुओं और टांगों को शक्ति की जरूरत होती है। शरीर की कुल शक्ति सीमित और निर्धारित है। उसे एकदम से नहीं बढ़ाया जा सकता। इसलिए यही तरीका बचता है कि शरीर के दूसरे भाग की शक्ति इन्हें दी जाए। आप किसी भी अंग की क्रियाशीलता को ज्यादा कम नहीं कर सकते, क्योंकि सभी अंग एकदूसरे से जुड़े हैं। शक्ति की नोटिसेबल या निर्णायक कमी आप मस्तिष्क में ही कर सकते हैं, क्योंकि इसमें फालतू विचारों और भावनाओं के रूप बहुत सी अतिरिक्त शक्ति जमा हुई रहती है। इसीलिए गुस्से और लड़ाई के समय चेहरे विकृत हो जाते हैं, क्योंकि उससे ऊर्जा नीचे उतर रही होती है। लड़ाई शुरु करने से पहले भी आदमी इसीलिए गालीगलौज या फालतू बहस करते हैं, ताकि उससे विचार और भावनाएं और दिमाग़ की सोचने की शक्ति बाधित हो जाए और चेहरा विकृत होने से वह शक्ति नीचे आकर बाजुओं आदि यौद्धा अंगों को मिले। तभी तो देखा जाता है कि हल्की सी मुस्कान भी गंभीर झगड़ों से चमत्कारिक रूप में बचा लेती है। मुस्कुराहट से शक्ति पुनः मस्तिष्क की तरफ लौटने लगती है, जिससे सोचने-विचारने की शक्ति बढ़ने से और यौद्धा अंगों को शक्ति की कमी होने से लड़ाई टल जाती है। इसीलिए मुस्कुराती और शांत शख्ससियत से हर कोई मित्रता करना चाहता है, चाहे कोई झूठमूठ में ही मुस्कुराता रहे, और जलेभुने व टेंस आदमी से हरकोई दूर भागता है।