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Kundalini motivated Tantric Bhairav Nath to insult Mata Vaishno Devi

Friends, there is a legend at the origin of Vaishno Devi, the holy pilgrimage center for Hindus, that Tantric Bhairav Nath had run after the girl Vaishno.  He wanted to achieve his liberation through her (most probably through tantric sexual yoga).  He wanted to do this by awakening his Kundalini. Kanya (Maiden) Vaishno could not understand his good intentions and became Kali (black mother) in anger and started killing her. Then Bhairava came to know of her divinity and he apologized to her.  Vaishno also came to know about his good intentions.  She probably regrets that she inadvertently attempted to kill a supernatural tantric.  That is why she gave him the boon of liberation and also said that without the visit to temple of Bhairav, there will be no fruit of visit to my temple.  This theme also appears to be symbolic or metaphoric.  Mata Vaishno did not actually kill Bhairava.  To truly attain salvation one has to become void.  You have to lose everything.  Bhairav also had to become a zero for liberation.  This zero is also called asamprajnata samadhi, which leads to enlightenment.  This is said to be the death of Bhairava. Due to Bhairava’s attachment to the beautiful form of Vaishno mata in his mind, he developed spiritually and reached the highest level of his liberation, surpassing the level of asamprajnata samadhi and enlightenment. therefore it is said in the story that Vaishno beheaded Bhairava.

In other way, it may be that he had received tantric inspiration from the short company of the goddess mother.  With that he got the Kundalini awakening with the help of his real tantric consort (tantric girlfriend), which led to his radical transformation.  This is said to be he killed by goddess mother.

Thirdly, the killing of Bhairav Baba by Goddess Mother can also be a metaphor of this theory that using sexual tantra for material prosperity gives material progress but does not give liberation, that one has to die.

Nevertheless, despite good intentions, Baba Bhairav had acted against the rules of Tantra.  Tantra never allows an attacking attitude.  One has to behave like a decent and detached monk or a naive child.  Voluntarily made tantric companions have to be revered, and even worshiped, like a deity.  Both have to treat each other as equals.  Tantric guru’s mediation is also necessary.

The premarital affair appears to be a distorted form of the above story of Vaishno-Bhairava

We said distorted form because in most of the cases, the love affair between the boy and the girl is not for Kundalini awakening.  That is, that love affair is not of a tantric type.  In tantra, it is forbidden to have physical relations with one’s daughter or wife.  Therefore, in order to maintain a premarital or extramarital affair, it is necessary to avoid physical relations.  It also benefits a man by promoting deep tantric practice by him with his real tantric lover or spouse as he being fully satisfied with them. By the way, the main function of Tantric love is to create physical attraction, so that the immovable picture of the lover can remain as Kundalini in one’s mind continuously. This attraction can also arise from simply seeing each other joyfully, speech, working or behaving together in life, gestures, laughter, jokes and outings etc.  In fact, physical attraction arising from this go together is stronger and more durable than physical attraction arising out of direct physical relationship. Also, keeping physical relationship with more than one partner isn’t good for community health and community relationships. So as far as possible, it should be restricted to single partner only.

Vaishno Kanya was doing penance for her husband Parmeshwar (pati parmeshwar)or God

The combination of power of three goddesses viz. Saraswati, Lakshmi and Parvati resulted in the birth of Vaishno.  She wanted to have God as her husband.  In fact, all humans have come from God, and want to have the same.  Its metaphoric meaning is that a woman with a tantra is looking for a perfect husband (God-like).  If she cannot find such a husband, then she also makes her ordinary husband a god.

Premarital affair can also be life-threatening, while soulmate is the safest

This is probably what happened to famous Bollywood  film actor Sushant Singh Rajput recently.  Probably, he had become very attached and passionate about his love affair.  In such a situation, if the girlfriend does not give the right guidance, then it can prove fatal for the lover.  Soulmates (super fast friends) save from this situation.  Soulmate is a lover’s girlfriend or vice versa who has a lot of attraction towards him, though he never gets to meet her.  That means there is no attachment to that attraction.  A person sees his form or his reflection in his soulmate.  Soulmates take each other towards the Enlightenment.

कुंडलिनी के लिए ही तांत्रिक भैरव नाथ ने माता वैष्णो देवी का अपमान किया था

दोस्तों, हिंदुओं के पवित्र तीर्थस्थल वैष्णो देवी के मूल में एक कथा आती है कि तांत्रिक भैरव नाथ कन्या वैष्णो के पीछे भागा था। वह उसके माध्यम से अपनी मुक्ति प्राप्त करना चाहता था (सम्भवतः तांत्रिक यौन-योग के माध्यम से)। ऐसा वह अपनी कुंडलिनी को जागृत करके करना चाहता था। कन्या वैष्णो उसकी अच्छी मंशा को नहीं समझ सकी और क्रोध में आकर काली बन गई और उसका वध करने लगी। तब भैरव को उसकी दिव्यता का पता चला और वह उससे क्षमा मांगने लगा। वैष्णो को भी उसकी अच्छी मंशा का पता चल गया। सम्भवतः उसे पछतावा भी हुआ कि उसने अनजाने में एक महाज्ञानी तांत्रिक को मारने का प्रयास किया। इसीलिए तो उसने उसे मुक्ति का वर दिया और यह भी कहा कि भैरव के दर्शन के बिना मेरे दर्शन का कोई फल नहीं मिलेगा। यह प्रसंग सांकेतिक या मैटाफोरिक भी प्रतीत होता है। माता वैष्णो ने भैरव को असलियत में नहीं मारा था। वास्तव में मोक्ष प्राप्त करने के लिए शून्य बनना पड़ता है। अपना सब कुछ खोना पड़ता है। भैरव को भी मुक्ति के लिए ज़ीरो बनना पड़ा। इसी ज़ीरो को ही असम्प्रज्ञात समाधि भी कहते हैं, जिससे आत्मज्ञान होता है। इसी को भैरव का मरना कहा गया है। चूँकि भैरव के मन में वैष्णो के रूप की समाधि के लगने से ही वह आध्यात्मिक रूप से विकसित होकर असम्प्रज्ञात समाधि और आत्मज्ञान के स्तर को पार करता हुआ अपनी मुक्ति के उच्चतम स्तर तक पहुंचा, इसीलिए कथा-प्रसंग में कहा गया कि वैष्णो ने भैरव को मारा।

दूसरे प्रकार से ऐसा भी हो सकता है कि देवी माता की लघु संगति से उसे तांत्रिक प्रेरणा प्राप्त हुई हो। उससे उसने अपनी असली तांत्रिक प्रेमिका की सहायता से कुंडलिनी जागरण की प्राप्ति की हो, जिससे उसका अकस्मात रूपांतरण हो गया हो। इसीको उसका देवी माता के द्वारा मारा जाना कहा गया हो।

तीसरे प्रकार से देवी माता के द्वारा भैरव बाबा का मारा जाना इस सिद्धांत का मैटाफोर भी हो सकता है कि भौतिक समृद्धि के लिए यौन तंत्र का इस्तेमाल करने से भौतिक तरक्की तो प्राप्त होती है, पर मुक्ति नहीं मिलती, अर्थात मरना पड़ता है। 
फिर भी अच्छी मंशा के बावजूद भी बाबा भैरव ने तंत्र के नियमों के विरुद्ध तो काम किया ही था। तंत्र में कभी हमलावर रुख नहीं अपनाया जाता। एक नम्र व विरक्त साधु-संन्यासी या भोले-भाले बच्चे की तरह व्यवहार करना पड़ता है। स्वेच्छा से बने तांत्रिक साथी को देवी-देवता की तरह सम्मान देना पड़ता है, और यहाँ तक कि पूजना भी पड़ता है। दोनों को एक-दूसरे को बराबर मानना पड़ता है। तांत्रिक गुरु की मध्यस्थता भी जरूरी होती है।

विवाहपूर्व प्रेम संबंध वैष्णो-भैरव वाली उपरोक्त कथा का विकृत रूप प्रतीत होता है

विकृत रूप हमने इसलिए कहा क्योंकि अधिकांश मामलों में लड़के-लड़की के बीच का प्रेम संबंध कुंडलिनी जागरण के लिए नहीं होता। अर्थात वह प्रेमसंबंध तांत्रिक प्रकार का नहीं होता। वैसे तो तंत्र में किसी की बेटी या पत्नी से शारीरिक संबंध बनाना वर्जित है। इसलिए विवाहपूर्व या विवाहेतर प्रेमसंबंध को तांत्रिक बनाए रखने के लिए शारीरिक संबंध से परहेज रखना जरूरी है। इससे यह लाभ भी होता है कि आदमी को अपने असली तांत्रिक प्रेमी अथवा पति/पत्नी से ही पूरी तरह संतुष्ट होकर गहन तांत्रिक साधना करने की प्रेरणा मिलती है। वैसे तो तांत्रिक प्रेम का मुख्य कार्य शारीरिक आकर्षण को पैदा करना है, ताकि प्रेमी का अविचल चित्र निरंतर मन में कुंडलिनी के रूप में बना रह सके। यह आकर्षण साधारण बोलचाल, रहन-सहन, हाव-भाव, हँसी-मजाक व सैर-सपाटे आदि से भी पैदा हो सकता है। वास्तव में इनसे पैदा होने वाला शारीरिक आकर्षण प्रत्यक्ष शारीरिक संबंध से पैदा होने वाले शारीरिक आकर्षण से भी कहीं ज्यादा मजबूत और टिकाऊ होता है। साथ में, एक से अधिक साथी के साथ शारीरिक संबंध रखना सामुदायिक स्वास्थ्य व सामुदायिक संबंधों के लिए भी अच्छा नहीं है। इसलिए जहाँ तक संभव हो, इसे केवल एकल साथी तक ही सीमित रखा जाना चाहिए।

वैष्णो कन्या अपने पति परमेश्वर के लिए तपस्या कर रही थीं

वैष्णो में सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती, इन तीनों देवियों की शक्ति का सम्मिलन था। वह परमेश्वर को पति रूप में पाना चाहती थीं। वास्तव में सभी मनुष्य ईश्वर से आए हैं, और उसी को पाना चाहते हैं। इसका मैटाफोरिक अर्थ यह निकलता है कि तंत्रसम्पन्न स्त्री उत्तम पति (ईश्वर-सदृश) की तलाश में रहती है। यदि उसे ऐसा पति न मिल पाए तो वह अपने साधारण पति को भी ईश्वर बना देती है।

विवाहपूर्व प्रेमसंबंध जानलेवा भी हो सकता है, जबकि साऊलमेट सबसे सुरक्षित होता है

मशहूर सिने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के साथ सम्भवतः ऐसा ही हुआ। सम्भवतः वे अपने प्रेमसंबंध में बहुत आसक्त व परवश हो गए थे। ऐसी हालत में यदि प्रेमिका सही मार्गदर्शन न करे, तो यह प्रेमी के लिए घातक भी सिद्ध हो सकता है। साऊलमेट (आत्मीय मित्र) इस स्थिति से बचाते हैं। साऊलमेट एक ऐसा प्रेमी/प्रेमिका है, जिसके प्रति बहुत ज्यादा आकर्षण मौजूद होता है, यद्यपि उससे कभी भी मिलन नहीं हो पाता। इसका अर्थ है कि उस आकर्षण में अटैचमेंट नहीं होती। एक व्यक्ति को अपने साऊलमेट में अपना रूप या अपना प्रतिबिंब दिखता रहता है। साऊलमेटस एक दूसरे को एनलाईटनमेंट की तरफ ले जाते हैं।

Kundalini awakening with Panchamakaras or 5 Ms (wine, flesh, sex, fish and mudra)

The use of Panchamakars for Kundalini has been a controversial subject.  We neither recommend it, nor refute it.  We are only considering its spiritual psychological aspect. These are named 5 Ms because their name starts from Hindi letter “M” viz. Madira, Maans, Maithun, Matsya and Mudra.

Panchamakaras give the opportunity to develop the advaita bhava

By the way, with the Panchamakaras there is an increase in duality.  Take the wine.  This divides man into darkness and light.  In the same way, with flesh one gets divided into violence / anger and non-violence / peace.  With intercourse, one starts swinging between thrill and depression.  Mudra is called sitting for a long time with a special posture, sign etc.  This divides a man into a state of laziness or inefficiency and hard work.  It is an undisputed truth that advaita can flourish only in duality.  The tranquility of the ocean is dependent on its waves.  If the waves in the ocean did not hit the sky, then who would have said that today the sea is calm or tranquil.  Therefore, Advaita or non-duality is dependent on duality.  If the there will not be duality at base, then how will we be able to associate it with the letter “non” that negates it.  How can we deny what is not there?  If there was no duality, how could we deny it?  Therefore, two types of effects are produced by Panchamakaras.  A person who accepts the duality born to them and gets into it, forgets his Kundalini.  Those who initially accept the duality arising from the Panchamakaras and cleverly convert it into Advaita, they strengthen their Kundalini by becoming a Kundalini Yogi.  It is undisputed fact felt by everyone that Kundalini and Advaita live together always.  When one of the two things is increased, the other thing itself increases.

Actually, non-duality can only exist with duality, not alone. Therefore the real meaning of term “non-duality” is “nondual duality”.

Worship of Panchmakaras

Panchamakaras are duly worshiped before intake.  It is common in Buddhist tantra and Hindu leftist or vaammaargi spiritual system even today.  Kundalini is meditated inside Panchamakaras, and these are highly respected.  At the time of their consumption, as much as possible, meditation of Kundalini and Advaita is done.  As long as the influence of the Panchamakaras is on the body, one should try to keep the meditation of Kundalini and Advaita. What happens with this is that when the effects of those Panchamakaras are produced in daily life, or say that when one gets their results or fruits, then the Kundalini itself comes to the meditator in an enhanced form.  This is similar to the way that the interest increases when the money is deposited.

Panchamakaras can be used for maximum Kundalini benefits with minimum quantity

In common parlance, the Panchmakaras are the sin form.  Therefore, one definitely gets painful results out of these, because the fruits of karma are bound to be delivered.  To save the body and mind from that bad fruit, they can be consumed to a minimum.  Maximum spiritual benefit can be attained by associating them with maximum Kundalini or advaita bhava.  Those who already use Panchamakaras incorrectly can improve their method.  For those who want to start it, we advise them to do so only under the guidance of a qualified master.

A book that magically transforms the dualism generated from the Panchamakars into non dualism

That book is “Physiology Philosophy – A Modern Kundalini Tantra (A Yogi’s Love Story)” in Hindi.  This book has been rated 5 star, best, excellent and readable by everyone in a quality review of Amazon.  According to medical science, the entire universe is depicted in our own body.  By reading this, the whole dualism is transformed into non-duality, and one’s Kundalini becomes satisfied with pleasure. Of course,  Yoga provides additional benefits.  The panchmakri tantra is also called “everything” or “nothing” spiritual system.  If you get Kundalini awakening from this, then everything is got, if not found nothing is found and even hell may have to go.

कुण्डलिनी जागरण के लिए पंचमकारों (मदिरा, माँस, मैथुन, मत्स्य व मुद्रा) का प्रयोग

कुण्डलिनी के लिए पंचमकारों का प्रयोग एक विवादित विषय रहा है। हम न तो इसकी अनुशंसा करते हैं, और न ही इसका खंडन। हम केवल इसके आध्यात्मिक मनोवैज्ञानिक पहलू पर विचार कर रहे हैं।

पंचमकारों से अद्वैत भाव को विकसित करने का अवसर प्राप्त होता है

वैसे तो पंचमकारों से द्वैतभाव में ही वृद्धि होती है। मदिरा को ही लें। इससे आदमी अंधकार व प्रकाश में बंट जाता है। इसी तरह से, माँस से हिंसा/क्रोध व अहिंसा/शान्ति में विभक्त हो जाता है। मैथुन से वह रोमांच व अवसाद के बीच में झूलने लगता है। मुद्रा किसी विशेष आसन, चिन्ह आदि के साथ लम्बे समय तक बैठने को कहते हैं। इससे आदमी आलस या निकम्मेपन और मेहनत की स्थिति के बीच में बंट जाता है। यह निर्विवादित सत्य है कि द्वैत में ही अद्वैत पनप सकता है। समुद्र की गंभीरता उसकी लहरों के ही आश्रित है। यदि समुद्र में लहरें गगनचुंबी हिचकोले न मारा करतीं, तो कौन कहता कि आज समुद्र शांत या निश्चल है। इसलिए अद्वैत द्वैत के ही आश्रित है। यदि मूल भाव द्वैत ही नहीं होगा, तो उसको नकारने वाला “अ” अक्षर हम उसके साथ कैसे जोड़ पाएंगे। जो चीज है ही नहीं, उसे हम कैसे नकार सकते हैं। यदि द्वैत ही नहीं होता, तो हम उसे कैसे नकार पाते। इसलिए पंचमकारों से दो प्रकार के प्रभाव पैदा होते हैं। जो आदमी उनसे पैदा हुए द्वैत को पूर्णतः स्वीकार करके उसी में रम जाते हैं, वो अपनी कुण्डलिनी को भूल जाते हैं। जो लोग पंचमकारों से उत्पन्न द्वैत को शुरु में स्वीकार करके उसे चालाकी से अद्वैत में रूपांतरित करते रहते हैं, वे कुण्डलिनी योगी बन कर अपनी कुण्डलिनी को मजबूत करते हैं। यह निर्विवादित व सबके द्वारा अनुभूत तथ्य है कि कुण्डलिनी और अद्वैत सदैव साथ रहते हैं। दोनों में से एक चीज को बढ़ाने पर दूसरी चीज खुद ही बढ़ जाती है।

वास्तव में अद्वैत केवल द्वैत के साथ ही रह सकता है, अकेले में नहीं। इसलिए “अद्वैत” का असली अर्थ “द्वैताद्वैत” है।

पंचमकारों का पूजन

सेवन से पहले पंचमकारों का विधिवत पूजन किया जाता है। यह बुद्धिस्ट तंत्र और हिंदु वाममार्गी आध्यात्मिक प्रणाली में आज भी आम प्रचलित है। पंचमकारों में कुण्डलिनी का ध्यान किया जाता है, और उन्हें बहुत सम्मान दिया जाता है। उनके सेवन के समय भी जितना हो सके, कुण्डलिनी व अद्वैत का ध्यान किया जाता है। जब तक शरीर पर पंचमकारों का प्रभाव रहे, तब तक कोशिश करनी चाहिए कि कुंडलिनी व अद्वैत का ध्यान बना रहे। इससे क्या होता है कि जब दैनिक जीवन में उन पंचमकारों का प्रभाव पैदा होता है या यूँ कहें कि जब उनका फल मिलता है, तब कुण्डलिनी स्वयं ही विवर्धित रूप में ध्यानपटल पर आ जाती है। यह ऐसे ही होता है, जैसे कि पैसा जमा करने पर वह ब्याज जुड़ने से बढ़ता रहता है।

पंचमकारों का प्रयोग न्यूनतम मात्रा के साथ अधिकतम कुण्डलिनी लाभ के लिए किया जा सकता है

आम बोलचाल की भाषा में पंचमकार पाप रूप ही हैं। इसलिए इनसे दुखदायी फल भी अवश्य मिलता है, क्योंकि कर्म का फल तो मिल कर ही रहता है। उस बुरे फल से अपने शरीर व मन को बचाने के लिए इनका न्यूनतम सेवन किया जा सकता है। इनको अधिकतम कुण्डलिनी या अद्वैत भाव से जोड़कर अधिकतम आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। जो लोग पहले से ही पंचमकारों का प्रयोग गलत तरीके से करते हैं, वो अपना तरीका सुधार सकते हैं। जो लोग इसे शुरु करना चाहते हैं, हम उन्हें योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही ऐसा करने की सलाह देते हैं। 

एक पुस्तक जो पंचमकारों से उत्पन्न द्वैत भाव को जादुई तरीके से अद्वैतभाव में रूपांतरित कर देती है

वह पुस्तक है “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)”। इस पुस्तक को एमेजॉन की एक गुणवत्तापूर्ण समीक्षा में फाइव स्टार के साथ सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्कृष्ट व सबके द्वारा पढ़ा जाने योग्य आंकलित किया गया है। इसमें चिकित्सा विज्ञान के अनुसार हमारे अपने शरीर में संपूर्ण ब्रम्हांड को दर्शाया गया है। इसको पढ़ने से सारा द्वैतभाव अद्वैतभाव में रूपांतरित हो जाता है, और आनंद के साथ कुंडलिनी परिपुष्ट हो जाती है। योगसाधना से तो अतिरिक्त लाभ मिलता ही है। पंचमकारिक तंत्र को “सब कुछ” या “कुछ नहीं” साधना भी कहते हैं। इससे यदि कुंडलिनी जागरण मिल गया तो सब कुछ मिल गया, अगर नहीं मिला तो कुछ नहीं मिला और यहां तक कि नर्क भी जाना पड़ सकता है।

कुंडलिनी असफल प्रेम प्रसंग के विरुद्ध बेहतरीन सुरक्षाकवच है

दोस्तों, आजकल असफल प्रेम के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इसकी मुख्य वजह अविश्वास, भावनाओं की बेकद्री, रिश्तों में गलतफहमियां, स्वार्थ व धोखेबाजी आदि मानव स्वभाव की बुराइयां हैं। असफल प्रेम का सदमा आदमी के पूरे शरीर व मन को झकझोरने वाला होता है। इससे बचने के लिए कुंडलिनी योग एक सर्वोत्तम साधन है। इसलिए आजकल सभी को कुंडलिनी योग करना चाहिए, क्योंकि किसी न किसी रूप में सभी लोग प्रेम के सताए हुए हैं। 

प्रेमी का शरीर आदमी के चक्रों में बस जाता है

आदमी का अपने प्रेमी के साथ बहुत गहरा जुड़ाव पैदा हो जाता है। प्रेमी का आदमी के मन में लगातार स्मरण बना रहता है। भोजन करते समय स्मरण से प्रेमी का शरीर आदमी के आगे के तालु, विशुद्धि, अनाहत और मणिपुर चक्रों पर बस जाता है। भावनामय होने पर वह अनाहत चक्र पर मजबूत हो जाता है। यौन उत्तेजना होने पर वह मन से नीचे उतरकर स्वाधिष्ठान व मूलाधार चक्रों पर आ जाता है। वहाँ से वह मेरुदंड से ऊपर चढ़कर फिर से मस्तिष्क के सहस्रार चक्र में पहुंच जाता है। इससे आदमी के पीछे वाले चक्रों पर भी वह चित्र स्थापित हो जाता है। गहन चिंतन करते समय प्रेमी का चित्र आज्ञा चक्र में पहुंच जाता है। एक प्रकार से प्रेमी का चित्र कुंडलिनी बन जाता है, और कुंडलिनी योग अनजाने में ही चलता रहता है। यह प्रक्रिया बहुत धीमी और कुदरती होती है, इसलिए इसका आभास भी नहीं होता और प्रेमी का चित्र भी बहुत ज्यादा मजबूती से शरीर के सभी चक्रों पर जम जाता है।

कुंडलिनी योग से बनी हुई बनावटी कुंडलिनी प्रेमी के चित्र को रिप्लेस कर देती है

गुरु या देव रूप की कृत्रिम कुंडलिनी को प्रतिदिन के कुंडलिनी योग अभ्यास से चक्रों पर दृढ़ कर दिया जाता है। इससे प्रेमी के रूप वाली कुदरती कुंडलिनी चक्रों से हटने लगती है। इससे आदमी को असफल प्रेम के सदमे से राहत मिलती है। साथ में, कुंडलिनी योगी भविष्य के लिए भी असफल प्रेम के सदमे से सुरक्षित हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि उसके चक्रों पर बनावटी कुंडलिनी पहले से ही डेरा डाले हुए होती है। इससे वहाँ पर प्रेम की कुदरती कुंडलिनी अपना डेरा नहीं जमा पाती। 

यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि कृत्रिम कुंडलिनी योग करते समय प्रेमी की छवि का भी कुंडलिनी के रूप में ध्यान किया जा सकता है। हालांकि, कुंडलिनी के कमजोर होने और कई सामाजिक समस्याओं से बचने के लिए प्रेमी के संबंध में उचित शारीरिक संयम रखा जाना चाहिए। जब प्रेमी की छवि का मन में पूर्ण प्रदर्शन हो जाता है तब वह संतुष्ट हो जाता है, जिससे प्रेमी के लिए वासना या लालसा स्वयं ही घट जाती है। इसके बाद, कुंडलिनी भी कमजोर हो जाती है। यह प्रक्रिया उस कुंडलिनी के जागरण या अन्य कुंडलिनी, मुख्य रूप से गुरु या देवता के मानसिक रूप के त्वरित विकास व जागरण के लिए अहम भूमिका प्रदान करती है।

असफल प्रेम से उत्पन्न सदमे के इलाज के लिए और उससे बचाव के लिए हिंदी में लिखित पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” सर्वोत्तम प्रतीत होती है।

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Kundalini is the best protection against unsuccessful love affair

Friends, nowadays cases of unsuccessful love are increasing.  The main reason for this are evils of human nature, such as mistrust, disrespect of feelings, misunderstandings in relationships, selfishness and deception.  The shock of unsuccessful love is shaking the whole body and mind of man.  Kundalini yoga is the best means to avoid this.  That is why everyone should do Kundalini Yoga nowadays, because in some form or the other all people are persecuted by love.

Lover’s body settles in man’s chakras

The man has a very close association with his lover.  He has constant memory of his lover in his mind.  While eating, the lover’s image with remembrance settles on the palate chakra, front anahat and front Manipur Chakras of the man.  It becomes stronger on the Anahata Chakra when he is emotional.  On getting sexual stimulation, it comes down from the mind and settles on the swadhishthan and mooladhara chakras.  From there, it rises upward through the spinal cord and reaches the Sahasrara Chakra of the brain again.  This also establishes that picture or image on the back chakras of the man.  While thinking deeply, the picture of the lover reaches in the agya chakra.  In a way, the picture of a lover becomes Kundalini, and Kundalini Yoga continues inadvertently.  This process is very slow and natural, so there is no sense of it and the picture of lover is also very firmly fixed on all the chakras of the body.

Artificial Kundalini of yoga replaces the natural Kundalini made of lover’s image

Artificial Kundalini of Guru or Dev/god form is fixed on the chakras by daily Kundalini yoga practice.  This causes the natural Kundalini as a lover’s image to move away from the chakras.  This relieves the man from the shock of unsuccessful love.  Together, the Kundalini Yogi is also protected from the shock of unsuccessful love for the future.  This is because the artificial Kundalini is already camping on its chakras.  Due to this, the natural Kundalini of love cannot settle there.

It should be kept in mind that image of lover can also be made as kundalini while doing artificial kundalini yoga. Howeve, proper physical restraint is to be maintained with respect to lover to avoid weakening of kundalini and many social problems. When full exposure of lover’s image is experienced then the lust or craving for lover subsides itself. Thereafter, Kundalini also weakens. This process lays pavement to awakening of that kundalini or quick development and awakening of another kundalini mainly that of Guru or god.

The book “Physiology Philosophy – A Modern Kundalini Tantra (A Yogi’s Love Story)” or “Shareervigyan darshan- ek adhunik kundalini tantra (ek yogi ki premkatha)”, written in Hindi for treating and preventing shock resulting from unsuccessful love, seems to be the best.

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Kundalini being the male form gets a lot of strength from the sexual attraction of the female Kundalini

Friends, in the field of Kundalini, there is no greater science than Tantra at this time.  Tantra with me was proven to be natural and practical.  Although I knew nothing about Tantra.  Maybe it is the effect of my past life.  Today, in this short post, I will throw light on the importance of sexual yoga for quick awakening of Kundalini.

Sexual stimulation increases the clarity of the Kundalini, and it becomes vibrant

The lone Kundalini made of guru’s form can also be grown through yoga-meditation.  Although this method is slow, but it is safe.  There is more peace and sattvikta or purity in it.
In the second way, Kundalini of consort form is also meditated along with Kundalini of Guru form.  The main Kundalini is in the form of Guru. Kundalini made of consort offers Guru-kundalini sexual attraction.  Just as the physical bodies of man and woman continue to energize each other with the power of sex, in the same way, the subtle pictures or the kundalinis of man and woman made in the mind of the yogi.  Although this method is more powerful and intensely fruitful, but it is unsafe.  This method can cause disturbance, restlessness and weakness.  To avoid this, one may have to use Panchamakaras or 5 Ms.  These 5 Ms are as a form of sin for the common man.  Therefore, these also bring bad fruit in result.  That’s why this method is called the all or none method.  This either fulfils man’s all accomplishments, or he may have to suffer in the hell.

Sexuality is used in the leftist tantra of Buddhists

The Buddhist tantra consists of obscure statues or idols of two figures.  One of them is the male idol, and the other idol is feminine.  In the male idol, the Guru or the deity is meditated upon.  Similarly, in the female idol, the consort or goddess is meditated.

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कुंडलिनी यदि पुरुषरूप है तो उसे स्त्रीरूप कुंडलिनी के यौनाकर्षण से बहुत बल मिलता है

दोस्तों, कुंडलिनी के क्षेत्र में इस समय तंत्र से बड़ा कोई विज्ञान नहीं है। मेरे साथ तंत्र स्वयं ही स्वाभाविक व व्यवहारिक रूप से सिद्ध हो गया था। यद्यपि मैं तंत्र के बारे में कुछ नहीं जानता था। हो सकता है कि यह मेरे पूर्वजन्म का प्रभाव हो। आज इस छोटी सी पोस्ट में मैं कुंडलिनी के त्वरित जागरण के लिए यौनतंत्र के महत्त्व पर प्रकाश डालूँगा। 

यौनाकर्षण से कुंडलिनी की स्पष्टता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, और वह जीवंत हो जाती है

गुरु-रूप की अकेली कुंडलिनी को भी योग-ध्यान के माध्यम से बढ़ाया जा सकता है। यह तरीका यद्यपि धीमा होता है, परंतु सुरक्षित होता है। इसमें शान्ति और सात्विकता अधिक बनी रहती है। दूसरे तरीके में गुरु रूप की कुंडलिनी के साथ प्रेमिका रूप की कुंडलिनी का भी ध्यान किया जाता है। इसमें मुख्य कुंडलिनी गुरु रूप की होती है। प्रेमिका रूप की कुंडलिनी उसे यौनाकर्षण प्रदान करती है। जैसे पुरुष और स्त्री के भौतिक शरीर एक-दूसरे को यौनाकर्षण शक्ति से प्रफुल्लित करते रहते हैं, उसी तरह से योगी के मन में बने पुरुष और स्त्री के सूक्ष्म चित्र भी करते रहते हैं। यद्यपि यह तरीका अधिक शक्तिशाली और तीव्र फलदायी होता है, परंतु असुरक्षित होता है। इस तरीके से अशांति, बेचैनी और कमजोरी पैदा हो सकती है। इससे बचने के लिए पंचमकारों का प्रयोग करना पड़ सकता है। पंचमकार तो आम आदमी के लिए पाप स्वरूप ही हैं। इसलिए उनका फल भी भोगना पड़ता है। इसीलिए इस तरीके को सबकुछ या कुछ नहीं वाला तरीका कहते हैं। इससे या तो आदमी को सिद्धि मिलती है, या फिर उसका पतन होकर उसे नरक यातना भोगनी पड़ सकती है।

बुद्धिस्ट लोगों के वामपंथी तंत्र में यौनाकर्षण का सहारा लिया जाता है

बुद्धिस्ट तंत्र में दो डाईटी की अस्पष्ट सी मूर्तियां होती हैं। उनमें से एक मूर्ति को पुरुषरूप दिया जाता है, और दूसरी मूर्ति को स्त्रीरूप। पुरुष डाईटी में गुरु का या देवता का ध्यान किया जाता है। इसी तरह स्त्री डाईटी में प्रेमिका या देवी का ध्यान किया जाता है।

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Kundalini is the magician’s parrot in which his life resides

Friends, there is a saying in Russia that the magician lives in his parrot.  Even if this thing is not completely true, it has metaphorical significance.  Kundalini is the parrot, which gives strength to the magician.

Anything can be made Kundalini

The magician makes a parrot a Kundalini.  Parrot is colorful and beautiful, so easily becomes Dhyanalamban/meditation support or Dhyan-Kundalini.  A parrot can also be a mataphor.  Parrots can also mean something beautiful.  Like a lover, guru or any other beautiful thing.  One loves the beautiful thing easily and it settles in the mind.  The magician may also be a yogi’s mataphor.  Just as the powers of a yogi are due to his Kundalini, the powers of a magician are dependent on his parrot.

The magician / yogi spreads illusions only with the help of his parrot / kundalini

Just as a yogi acquires Advaita from his Kundalini, the magician obtains Advaita from his parrot.  When the magician spreads the illusion, then by the power of Advaita, he himself does not fall into the trap of that illusion.  The same yogi also does.  Common people are confused with the Yogi’s worldly pastimes, but he himself remains untouched by illusions.

The death of a parrot / kundalini makes the magician / yogi inactive

This makes emotional shock, as I have described in previous posts.  In fact, the entire life cycle of the magician / yogi is associated with the parrot / kundalini.  With the destruction of the parrot / kundalini, all the events, memories and attitudes attached to it are destroyed.  This makes him completely calm in the thick darkness.  This is called emotional shock.  This is also called asamprajnata samadhi of Patanjali.  Kundalini awakening can happen under this situation.  If it is held for a long time, enlightenment can also be attained.  On average, enlightenment can occur within about six months.  If you get the support of a qualified guru to handle this situation, you get emotional security.

God is the greatest magician, who keeps the magic of this world running with parrot / kundalini

In various religions, including Hindus, God is believed to be a magician or auspicious, who spreads his magic or enchantment in the open sky.  That makes this world.  He is fully nondual.  This proves itself that he also has his kundalini (parrot) with him because both live together.  The same parrot is called Mayashakti.

कुंडलिनी ही जादूगर का वह तोता है, जिसमें उसकी जान बसती है

दोस्तों, रशिया में एक कहावत है कि जादूगर की जान उसके तोते में बसती है। यह बात पूर्णतः सत्य न भी हो, तो भी इसका मैटाफोरक महत्त्व है। कुंडलिनी ही वह तोता है, जिससे जादूगर को शक्ति मिलती रहती है।

किसी भी चीज को कुंडलिनी बनाया जा सकता है

जादूगर एक तोते को कुंडलिनी बनाता है। तोता रंगीन व सुंदर होता है, इसलिए आसानी से ध्यानालम्बन या ध्यान-कुंडलिनी बन जाता है। तोता एक मैटाफोर भी हो सकता है। तोते का अर्थ कोई सुंदर रूप वाली चीज भी हो सकता है। जैसे कि प्रेमी, गुरु या कोई अन्य सुंदर चीज। सुंदर चीज से आसानी से प्यार हो जाता है और वह मन में बस जाती है। जादूगर योगी का मैटाफोर भी हो सकता है। जैसे योगी की शक्तियां उसकी कुंडलिनी के कारण होती हैं, वैसे ही जादूगर की शक्तियां उसके तोते के आश्रित होती हैं।

जादूगर/योगी अपने तोते/कुंडलिनी की सहायता से ही भ्रमजाल फैलाता है

जैसे योगी अपनी कुंडलिनी से अद्वैत को प्राप्त करता है, वैसे ही जादूगर अपने तोते से अद्वैत प्राप्त करता है। जादूगर जब भ्रम के जादू को फैलाता है, तब अद्वैत की शक्ति से ही वह भ्रम के जाल में नहीं फंसता। वैसा ही योगी भी करता है। आम लोग योगी की दुनियावी लीलाओं से भ्रमित होते रहते हैं, परंतु वह स्वयं भ्रम से अछूता रहता है।

तोते/कुंडलिनी के मरने से जादूगर/योगी निष्क्रिय सा हो जाता है

इसीसे भावनात्मक सदमा लगता है, जैसा कि मैंने पिछली पोस्टों में बयान किया है। वास्तव में, तोते/कुंडलिनी के साथ जादूगर/योगी का पूरा जीवनक्रम जुड़ा होता है। तोते/कुंडलिनी के नष्ट होने से उससे जुड़ी सारी घटनाएं, यादें व मनोवृत्तियां नष्ट सी हो जाती हैं। इससे वह घने अंधेरे में पूरी तरह से शांत सा हो जाता है। इसे भावनात्मक सदमा कहते हैं। इसे ही पतंजलि की असम्प्रज्ञात समाधि भी कहते हैं। इसी परिस्थिति में कुंडलिनी जागरण हो सकता है। यदि इसे कुछ लंबे समय तक धारण किया जाए, तो आत्मज्ञान भी प्राप्त हो सकता है। औसतन लगभग छः महीने के अंदर आत्मज्ञान हो सकता है। इस स्थिति को संभालने के लिए यदि योग्य गुरु का सहयोग मिले, तो भावनात्मक सुरक्षा मिलती है।

ईश्वर सबसे बड़ा जादूगर है, जो तोते/कुंडलिनी से इस दुनिया के जादू को चलाता रहता है

हिंदु समेत विभिन्न धर्मों में ईश्वर को एक जादूगर या ऐंद्रजालिक माना गया है, जो अपने जादू या इंद्रजाल को खुले आसमान में फैलाता है। उससे यह दुनिया बन जाती है। वह पूर्ण अद्वैतशील है। इससे स्वयं सिद्ध हो जाता है कि उसके साथ उसकी कुंडलिनी (तोता) भी रहती है। उसी तोते को मायाशक्ति कहा गया है।