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कुण्डलिनी योगी को देवराज इंद्र परेशान कर सकते हैं

मित्रो, मैंने पिछले हफ्ते की पोस्ट में बताया कि सभी प्रकार के योगों को एकसाथ अपनाने से ही योग में सफलता प्राप्त होती है। आज हम इस तथ्य की कुछ विस्तारपूर्वक अनुभवात्मक विवेचना करेंगे।

कर्मयोग सभी योगों की प्रारंभिक सीढ़ी के रूप में

ऐसा इसलिए है, क्योंकि कर्मयोग सबसे आसान है। इससे दुनिया में रमा हुआ आदमी भी ऐसे ही शांत व दुनिया से दूर बना रहता है, जैसे कमल का पत्ता पानी में डूबा रहकर भी पानी की पहुंच से दूर रहता है, और सूखा ही बना रहता है। कर्मयोग तो जिंदगी में हमेशा ही बना रहना चाहिए। परंतु यह किशोरों व युवाओं के लिए विशेष महत्त्व का है, क्योंकि इसी उम्र में कर्म तेजी से किए जाते हैं। कर्म की मात्रा जितनी ज्यादा हो, कर्मयोग भी उतना ही ज्यादा प्रभावशाली होता है। कर्मयोग को अद्वैत भाव या अनासक्ति भाव भी कहते हैं। मेरे घर पर शुरु से ही योग का प्रभुत्व होने से मुझे कर्मयोग के संस्कार विरासत में मिले। वैसा मेरा कर्मयोग तभी चरम पर पहुंचा, जब उसमें किसी अज्ञात ईश्वरीय प्रेरणा से तंत्र भी सम्मिलित हुआ। इसी से मुझे आत्मजागृति को दो बार अनुभव करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वास्तव में तंत्र से कर्म करने की शक्ति बढ़ जाती है, जिससे कर्मयोग भी बढ़ जाता है। फिर किसी दिव्य प्रेरणा से मैंने शरीरविज्ञान दर्शन की रचना की। यह एक व्यवहारिक दर्शन है, और दुनिया के झमेले में फंसे एक व्यक्ति के लिए रामबाण ओषधि है। इस दर्शन से मुझे बहुत बल मिला। इससे मुझे चहुँमुखी भौतिक तरक्की के साथ आध्यात्मिक तरक्की भी मिली। इसको बनाने के करीब 4-5 वर्ष पहले मुझे एक आत्मज्ञान की झलक भी मिली थी। उससे मैं विशेष हो गया था। मैं पूरी तरह से अद्वैत सागर में डूब गया था। दुनिया वालों को मैं मंगल ग्रह से आए आदमी की तरह लगने लगा, जिससे वे मुझे हीन सा समझने लगे और मुझे अलग-थलग सा रखने लगे। वे अपनी जगह पर सही भी थे। वे मुझे पारलौकिक आयाम में प्रविष्ट नहीं होने देना चाहते थे। हालांकि वह आयाम सर्वश्रेष्ठ होता है, पर उस आयाम में रहकर दुनियादारी के काम ढंग से नहीं हो पाते। देवता आदमी को उस आयाम में जाने से रोकते हैं, क्योंकि यदि सभी लोग उस आयाम में चले गए, तो उनकी रची हुई दुनिया कैसे चल पाएगी। तभी तो प्राचीन काल में देवताओं का राजा इंद्र योगियों की तपस्या भंग करने आ जाता था। इंद्र को डर होता था कि यदि कोई आदमी योगबल से अपनी ओर दुनिया के लोगों को आकर्षित करेगा, तो उसे कोई नहीं पूछेगा। इंद्र को एकप्रकार से अपने प्रभुत्व की राजगद्दी के खो जाने का डर सताता रहता था। इसी खतरे के मद्देनजर ही मैं योगसाधना को सावधानी से करता हूँ। जैसे ही मैं पारलौकिक आयाम में प्रविष्ट होने लगता हूं, और मुझे देवताओं से खतरे का आभास होने लगता है, मैं तुरंत कुछ तांत्रिक टोटका अपनाकर उस आयाम से बाहर निकल आता हूं। सूत्रों के अनुसार योगी श्री साधुगुरु भी ऐसा ही कहते हैं, और सम्भवतः करते भी हैं। वास्तव में, देवताओं से मधुर संबंध बना कर ही आदमी उनकी बनाई दुनिया से ऊपर उठ सकता है।

उपरोक्त आध्यात्मिक अलगाव के कारण मेरे लिए दुनिया के बीच खुलकर सम्मिलित होना मुश्किल हो गया था। इससे मुझे कर्महीनता और बोरियत सी सताने लगी। इसीको कुंडलिनी का विपरीत चैनल में चढ़ना कहते हैं। एक इड़ा चैनेल है, और एक पिंगला। एक भावनात्मक है, और एक कर्मात्मक। मैं भावनात्मक ज्यादा हो गया था। चित्र-विचित्र अनुभवों में और पुरानी यादों में डूबा रहता था। इससे कर्म करने की शक्ति का ह्रास होता था। इसी वजह से मुझे उस समय यौन साथी की बहुत जरूरत महसूस होती थी। यौनबल से कुण्डलिनी बीच वाले सुषुम्ना चैनल में चढ़कर सहस्रार तक पहुंच जाती है। इससे आदमी का जीवन संतुलित हो जाता है। यौन साथी का तो नहीं, पर शरीरविज्ञान दर्शन का साथ मुझे जरूर मिला। इससे उत्पन्न अद्वैत से मेरे फालतू के विचारों पर लगाम लग गई। इससे जो शक्ति की बचत हुई, उससे मेरी कुंडलिनी सुषुम्ना चैनल से होकर सहस्रार में प्रविष्ट हुई। फिर मेरी कुंडलिनी को यौनबल के बिना ही उछालें मारते देखकर संभावित यौन साथी भी मेरी ओर नजरें घुमाने लगे। जिस समय मुझे यौनबल की जरूरत थी, उस समय तो कहीं कोई नजर नहीं आया, पर जब मैंने अपना यौनबल खुद ही निर्मित कर लिया, तब वे  भी उसके प्रति उत्साहित होने लगे। वास्तव में जो कुछ हुआ, वह ठीक ही हुआ। अगर मुझे यौनबल समय से पहले मिल गया होता, तो मैं अपना स्वयं का दार्शनिक यौनबल पैदा करना न सीख पाता, और न ही मुझे आत्मजागृति की दूसरी झलक मिल पाती।

थोड़ी उम्र बढ़ने पर मेरा ज्यादा झुकाव ज्ञानयोग व हठयोग की तरफ हो गया

हालाँकि कर्मयोग भी चला हुआ था। एकबार तो आत्मज्ञान के एकदम बाद मेरा भक्तियोग भी काफी बढ़ गया था। दरअसल जब भौतिक साथियों से धोखा खाकर मैं पूरी तरह निरुत्साहित हो गया था, तभी मुझे आत्मज्ञान अर्थात ईश्वर दर्शन की झलक मिली थी। उससे मुझे संतुष्ट व सुखी रहने के लिए भरपूर सहारा मिला। मैं अपने को ईश्वर का विशेष कृपापात्र समझने लगा। मैं उसके प्रति बार बार आभार प्रकट करता था, और विभिन्न स्तुतियों से उसे धन्यवाद देता था। यही तो ईश्वर भक्ति है। इससे जाहिर होता है कि सभी प्रकार के योग एकसाथ चलते रहने चाहिए। समय के अनुसार उनके आपसी अनुपात में बदलाव करते रहना चाहिए। ऐसा करने पर आत्म जागृति की प्राप्ति को कोई नहीं रोक सकता।

Kundalini Yogi may be disturbed by Devraj Indra

Friends, I told in last week’s post that yoga is successful only by adopting all types of yoga together. Today we will have some detailed experiential discussion of this fact.

Karmayoga as the initial ladder of all yogas

This is because Karmayoga is the easiest. Due to this, the man who remains in the world remains calm and away from the world, just as the lotus leaf remains submerged in water, but it remains away from the reach of water, and remains dry. Karmayog should always remain in life. But it is of special importance for teenagers and young people, because at this age, deeds are done fast. The higher the amount of karma, the more effective the karma yoga is. Karmayoga is also called Advaita Bhava or Anasakti Bhava. My home inherited the rites of Karmayoga because of the dominance of yoga from the very beginning. My Karma Yoga in my life reached its peak only when Tantra was joined by some unknown divine inspiration. This gave me the privilege of experiencing self-awareness twice. In fact Tantra increases the power to do karma, which also increases karma yoga. Then with some divine inspiration, I created a philosophy of physiology or shareervigyan darshan in Hindi. It is a practical philosophy, and a panacea for a person trapped in the world. This philosophy gave me a lot of strength. This gave me all-round material advancement as well as spiritual progress. I had got a glimpse of enlightenment about 4-5 years before making it. I was made special by that. I was completely immersed in the Advaita Sagar. People of the over attached world started to look me like a man from Mars, due to which they started to think of me as inferior and kept me isolated. They were also right in their place. They did not want to allow me to enter the transcendental dimension. Although that dimension is the best, living in that dimension cannot allow the work of worldliness. The gods prevent man from going into that dimension, because if all people went into that dimension, how would their created world be able to run. That is why in ancient times the king of the gods Indra used to come to disturb the austerities of the yogis. Indra feared that if a man would attract the people of the world towards him with the power of yoga, no one would ask him. Indra was constantly afraid of losing the throne of his dominion. It is only in view of this danger that I do my yogasadhana carefully. As soon as I begin to enter into the parlokik dimension, and I feel the danger from the gods, I immediately come out of that dimension by adopting some tantric tactic. According to the sources, Yogi Sri Sadhguru also says the same, and probably does. In fact, man can rise above their created world only by having a good relationship with the gods.

Due to the above spiritual isolation, it was difficult for me to be openly involved among the world. This made me tortured by boredom and paranoia. This is called Kundalini climbing in the opposite channel. There is an Ida channel, and a Pingala. One is emotional, and one is karmic. I was too emotional. Used to be immersed in pictures of bizarre experiences and old memories. Due to this, the power to do karma was diminished. This is why I felt a great need for a sexual partner at that time. From the sexual force, Kundalini climbs into the Sushumna channel in the middle and reaches Sahasrara. This makes a man’s life balanced. Not with the sexual partner, but I definitely got support with the physiology philosophy. Advaita generated from this put a check on my useless thoughts. Due to the power saved by this, my Kundalini entered Sahasrara through Sushumna channel. Then, seeing my Kundalini bouncing without sexual power, potential sexual partners also started turning their eyes towards me. At the time when I was in need of sexual strength, there was no in the sight at that time, but when I made my sexual strength myself, then they also started getting excited about it. Whatever actually was correct to happen, that happened. If I had got sexual strength prematurely, I would not have learned to cultivate my own philosophical sexual force, nor would I have had a second glimpse of self-awareness.

थोड़ी उम्र बढ़ने पर मेरा ज्यादा झुकाव ज्ञानयोग व हठयोग की तरफ हो गया

हालाँकि कर्मयोग भी चला हुआ था। एकबार तो आत्मज्ञान के एकदम बाद मेरा भक्तियोग भी काफी बढ़ गया था। दरअसल जब भौतिक साथियों से धोखा खाकर मैं पूरी तरह निरुत्साहित हो गया था, तभी मुझे आत्मज्ञान अर्थात ईश्वर दर्शन की झलक मिली थी। उससे मुझे संतुष्ट व सुखी रहने के लिए भरपूर सहारा मिला। मैं अपने को ईश्वर का विशेष कृपापात्र समझने लगा। मैं उसके प्रति बार बार आभार प्रकट करता था, और विभिन्न स्तुतियों से उसे धन्यवाद देता था। यही तो ईश्वर भक्ति है। इससे जाहिर होता है कि सभी प्रकार के योग एकसाथ चलते रहने चाहिए। समय के अनुसार उनके आपसी अनुपात में बदलाव करते रहना चाहिए। ऐसा करने पर आत्म जागृति की प्राप्ति को कोई नहीं रोक सकता।

Kundalini resides in Sahasrara Chakra and Kundalini Shakti resides in Muladhara Chakra

Friends, confusion is often seen in the world about the difference between Kundalini and Kundalini Shakti. Many people consider Kundalini as Kundalini Shakti, and many others consider Kundalini Shakti as Kundalini. Today we will discuss this empirically.

Muladhara Chakra is the original abode of Kundalini Shakti, while the original abode of Kundalini is Sahasrara

Shakti is produced in the base chakra. She goes to Sahasrar and confirms Kundalini. From this it seems that Kundalini is being born in Muladhara. From Sahasrara the energy descends through the agya chakra, and spreads to all the chakras of the body. This gives the impression that Kundalini is rotating on all the chakras. Actually that energy is rotating. Shakti is also called Prana or Pranashakti. If there was a Kundalini on the chakras, it would be awake there too. But Kundalini awakens in Sahasrara only.

Brain is the place of experience in the body, no other place

If there is itching in the skin of any part of the body, it is felt in the brain. Although it seems to us that there is a sensation of itch in the itchy area. The same happens with Kundalini. Even if we meditate on the Kundalini on any chakra, it will be felt in the brain. But it seems that there is a Kundalini on the chakra. If the brain is made unconscious by medicine etc., there will be no sensation or meditation on the chakras of the body. Similarly, when the sushumna channel is experienced in the form of a bright streak in the back, then that feeling is also happening in the brain itself.

Descending from the brain through the front channel, Prana also brings down the virtual picture of Kundalini

This is proved by the fact that when the Kundalini is meditated in the brain, and when the prana is brought down from the brain by attaching the tongue to the palate, the Kundalini also descends with it and penetrates all the chakras and reaches the base chakra. As energy revolves, Kundalini’s picture is constantly being made in the brain, but its experience is on different chakras. Similarly, ascending from the back, the prana seems to be carrying the Kundalini back up. Although Kundalini is only in the brain. This means that when Prana drives Kundalini with him, then Kundalini also drives Pran with her, because the two are interlinked. In Tantric Hatha Yoga, Prana is made as a handle for Kundalini, while in Raja Yoga, Kundalini is made as the handle for Prana. Both methods are used in mixed yoga, so it is most effective.

When the various thoughts of the brain come down with prana, they become Kundalini

This happens because the yogi has a habit of contemplating Kundalini. Therefore Kundalini thought is most loved. That is why we say to the dear person that he is a piece of my heart. The mother refers to her womb for her son. When the prana is centered on a chakra, then there is very little prana left in the brain for thoughts. In such a low state of prana, Kundalini picture can only be made, because with the practice of daily yoga, the brain has a habit of making it easily and with less life energy. Similarly, at the time of yoga practice, when the mind is thoughtless, only the Kundalini is exposed to the energy that is offered to the Sahasrara from the base chakra. This is because Kundalini does not need to be thought carefully. She keeps herself on the meditation screen by daily practice. Similarly, during yoga practice, even when the breath is full of life, only the Kundalini is confirmed. This is because only the Kundalini picture can shine the fastest, taking the most of those breaths. It is only through daily Kundalini practice.

The place of cognition is the Sahasrara Chakra, that is why it is said that the soul resides in Sahasrara

I felt Kundalini awakening in my whole brain. It seemed that every particle of the brain was vibrating or awake. Although Kundalini was being felt in the upper most part of the brain. It is also called the crown Chakra. When the feeling of awakening ended, Kundalini was felt in the agya chakra. The awakening begins with Sahasrara because the prana shakti that rises above Muladhara directly enters Sahasrara and brightens the Kundalini there. It is possible that the experience is only in the Sahasrara Chakra, and the feeling in other brain centers has come from Sahasrara itself. Although my guess is against scientific experiments, in which many centers of cognition have been reported in the brain. By the way, medical science has not yet solved the puzzle of chakras and nadis. Similarly, just like the agya chakra and lower chakras, the sensations felt at all points of the brain and body are referenced. Sahasrara is the original place of sensations. Just after awakening in Sahasrara, Kundalini comes on the agya chakra. This shows that the lower chakra is of lower energy level than the chakra above it. This means that different levels of prana in Sahasrara are expressed as different chakras. The energy level is at the top most level during awakening. The sensation of awakening ceases as the energy level falls below a certain threshold. Even at that time, Kundalini would have been in Sahasrara itself, but she seems to be in the agya or ajna chakra. This happens because life force has descended from Sahasrar to the ajna chakra. If Kundalini had not walked with life force or prana, she would have felt on any chakra immediately after awakening. After that, as the prana goes down, Kundalini is also felt going down with it. It is like when a person has severe pain in a limb, he feels it in Sahasrara, and the man says that his head is being torn. This has also led to a saying that “there was so much pain that the peak (choti) stood”. Actually the hair braid is tied near Sahasrara. Minor pain is felt localized only in the local area of the affected limb. If the teeth are uprooted without numbness, there is a very severe pain in Sahasrara. The man says that there can be no greater pain or experience than that. Even after the experience of Kundalini awakening, a man says that there can be no greater experience than this. In fact, Kundalini Jagran is the greatest realization in the world. If there is any, it is enlightenment or God. In it there is full feeling of advaita and bliss. Advaita and joy are felt even after the tooth is uprooted, but not in full. It also shows that the place of cognition is Sahasrara itself. Many yogis have talked about the similarity between the feeling of awakening and the pain of tooth extraction. I too once felt the highest level of pain to remove such a tooth. The numbing medicine did not show its effect. It made me feel like my brain was bursting, because the whole prana of my body had entered Sahasrara in pursuit of pain. After that I remembered the enlightenment that had happened 3 years ago, because that stage was as spiritual as that. That stage seemed to be a state of Prana rising. In this, the whole prana is centered in Sahasrara. I have described this in an old post. Probably the destruction of sin through sorrow or pain is caused by this yoga feeling. This also confirms that yoga reduces the burden of sins. Now the experience of Kundalini cannot be produced like the experience of pain. If this were the case, the man would have felt the Kundalini carefully by guided hitting of his external organs. Although Kundalini also accompanies prana in brain but most of prana is consumed by pain as described below. Kundalini can only be meditated in the brain. It is difficult for the common man to do so. Therefore Prana is used as the handle of Kundalini. Prana is offered up to Sahasrara by Tantric Hatha Yoga. From there, Kundalini herself appears and keeps on strengthening. This shows that Hatha Yoga is more scientific, practical and easier than Raja Yoga. By the way, mixed use of both of them I found more effective.According to the above, when Prana reaches Sahasrara with pain, Kundalini also starts to be experienced with it. But much Kundalini benefit is not obtained, because most of the prana is eaten by the feeling of pain. However, in many places the sensation of touch is used for Kundalini. For example, the experience of mutual touch of the tongue and palate causes the Kundalini and Prana to descend from the brain, and move down the front channel.According to the above, just as the pictures made in Sahasrara seem to be made on the chakras, in the same way pictures of the sun, river, mountains etc. made in the outer world are also being made in Sahasrara, but their feeling is far outside. This trick is learned by the brain during gradual development. If everything felt inside, organism would not have run out, and would not have developed.The faster the feeling, the more it clings to the soul. It is also called samadhi. Such a sharp feeling occurs only in Sahasrara. That is why man never forgets sexual lover. In fact, the feeling along with prana  rising from the Muladhar Chakra is directly seated in Sahasrara and strengthens the feeling and accompanied image of the lover there. This is why many people becomes mad in love and renunciate like a sage.Due to this universality of Sahasrar Chakra, it has been given a form with thousand petals. This means that it is linked to every point of the body. Other chakras have two, three or four petals, meaning that they are connected to only a few chakras around. I have described this in an old post.According to Shiva Purana, Kundalini is Shiva, and Shiva is Kundalini. This is because it has been asked there to meditate on Shiva. Accordingly, Shiva resides in Sahasrar. Shakti keeps climbing above the Muladhar Chakra to meet him. When Shakti’s impulse rises above a certain threshold, her orgasmic union with Shiva reaches the peak level. This completes the union of Shiva and Shakti, which manifests as Kundalini awakening.

Mixed Yoga is the most effective, to confirm this statement I give an example of what happened to me. I was in a state of prana rising at that time. Was doing yoga practice every day. One day, because of my suddenly meeting old friend, I remembered Kundalini fastly. I got lost in it. Suddenly my prana also got up from the base and climbed through back to the brain to support that Kundalini. This awakened her. Its detailed description is on the homepage of this website. Prana was able to climb up because I was practicing tantric hatha yoga every day, and I had a habit of making climbing up of prana. If it was not a habit, Kundalini would have been remembered in the mind fast but she would not have awakened, because she would not have the prana energy of muladhar chakra. The real life force that cause awakening resides in the Muladhar Chakra. This also confirms the aforementioned statement that Prana pursues Kundalini, and where Kundalini goes, Prana goes there too. You can call the remembrance of Kundalini as Raja Yoga, and to uplift the prana from the base chakra is called Hatha Yoga. This proves that all types of yoga work together, and all are different parts of the single Mahayoga.

कुंडलिनी सहस्रार चक्र में और कुंडलिनी शक्ति मूलाधार चक्र में निवास करती है

मित्रो, कुंडलिनी और कुण्डलिनी शक्ति के बीच में अंतर को लेकर दुनिया में अक्सर भ्रम देखा जाता रहता है। कई लोग कुंडलिनी को कुंडलिनी शक्ति समझ लेते हैं, और दूसरे कई लोग कुण्डलिनी शक्ति को कुंडलिनी समझ लेते हैं। आज हम इस बारे में अनुभवात्मक चर्चा करेंगे।

कुण्डलिनी शक्ति का मूल निवासस्थान मूलाधार चक्र है, जबकि कुण्डलिनी का मूल निवासस्थान सहस्रार है

शक्ति मूलाधार में उत्पन्न होती रहती है। वह सहस्रार तक जाकर कुण्डलिनी को पुष्ट करती है। इससे ऐसा लगता है कि कुण्डलिनी मूलाधार में पैदा हो रही है। सहस्रार से शक्ति आज्ञाचक्र से होकर नीचे उतरती है, और शरीर के सभी चक्रों में फैल जाती है। इससे ऐसा आभास होता है कि सभी चक्रों पर कुंडलिनी घूम रही है। वास्तव में वह शक्ति घूम रही होती है। शक्ति को प्राण या प्राणशक्ति भी कहते हैं।यदि चक्रों पर ही कुण्डलिनी हुआ करती, तो वह वहाँ पर जागृत भी होती। पर कुंडलिनी तो सहस्रार में ही जागृत होती है।

शरीर में अनुभव का स्थान मस्तिष्क ही है, कोई अन्य स्थान नहीं

शरीर के किसी भी भाग की चमड़ी में यदि खुजली हो, तो उसकी अनुभूति मस्तिष्क में ही होती है। हालांकि हमें ऐसा लगता है कि खुजली वाले स्थान पर संवेदना की अनुभूति होती है।कुण्डलिनी के साथ भी वैसा ही होता है। चाहे हम किसी भी चक्र पर कुण्डलिनी का ध्यान करें, उसकी अनुभूति मस्तिष्क में ही होगी। परन्तु लगता ऐसा है कि चक्र पर कुण्डलिनी है। यदि मस्तिष्क को दवा आदि से बेहोश किया जाए, तो शरीर के चक्रों पर भी संवेदना या कुण्डलिनी की अनुभूति नहीं होगी। इसी तरह जब सुषुम्ना नाड़ी पीठ में एक चमकती हुई लकीर के रूप में अनुभव होती है, तो वह अनुभूति भी मस्तिष्क में ही हो रही होती है।

मस्तिष्क से फ्रंट चैनेल के रास्ते उतरता हुआ प्राण कुंडलिनी के आभासिक चित्र को भी अपने साथ नीचे ले आता है

यह इस बात से सिद्ध होता है कि जब मस्तिष्क में कुंडलिनी का ध्यान हो रहा होता है, उस समय यदि जीभ को तालु से लगा कर प्राण को मस्तिष्क से नीचे उतारा जाए, तो कुंडलिनी भी उसके साथ उतरकर सभी चक्रों को भेदते हुए मूलाधार तक पहुंच जाती है। कुंडलिनी का चित्र तो लगातार मस्तिष्क में ही बन रहा होता है, पर उसका आभासिक अनुभव विभिन्न चक्रों पर होता है। इसी तरह, पीठ से ऊपर चढ़ता हुआ प्राण कुंडलिनी को भी वापिस ऊपर ले जाता हुआ प्रतीत होता है। हालांकि कुण्डलिनी कुण्डलिनी मस्तिष्क में ही होती है। इसका मतलब है कि जब प्राण कुण्डलिनी को अपने साथ चलाता है, तो कुण्डलिनी भी प्राण को अपने साथ चलाती है, क्योंकि दोनों आपस में जुड़े होते हैं। तांत्रिक हठयोग में प्राण को कुंडलिनी का हैन्डल बनाया जाता है, जबकि राजयोग में कुंडलिनी को प्राण का हैंडल बनाया जाता है। मिश्रित योग में दोनों ही तरीकों का इस्तेमाल होता है, इसलिए यह सबसे ज्यादा प्रभावी है।

मस्तिष्क के विभिन्न विचार भी जब प्राण के साथ नीचे उतरते हैं, तो वे कुंडलिनी बन जाते हैं

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि योगी को कुण्डलिनी के चिंतन की आदत पड़ी होती है। इसलिए कुंडलिनी विचार सबसे प्रिय होता है। तभी तो प्रिय व्यक्ति के लिए कहते हैं कि वह तो मेरे दिल का टुकड़ा है। माँ बेटे के लिए अपनी कोख का हवाला देती है। जब प्राण किसी चक्र पर केंद्रित हो, तब मस्तिष्क में विचारों के लिए बहुत कम प्राण बचा होता है। उतने कम प्राण में तो कुण्डलिनी चित्र को ही बना के रखा जा सकता है, क्योंकि रोज के योगाभ्यास के बल से मस्तिष्क को उसको आसानी से और कम प्राण ऊर्जा से बनाने की आदत पड़ी होती है। इसी तरह, योगाभ्यास के समय जब मन विचारशून्य सा होता है, तो मूलाधार से सहस्रार को चढ़ने वाली शक्ति से कुंडलिनी ही उजागर होती है। यह इसलिए क्योंकि कुंडलिनी की लिए सोचकर ध्यान लगाने की जरूरत नहीं होती। वह रोज के अभ्यास से खुद ही ध्यानपटल पर बनी रहती है। इसी तरह, योगाभ्यास के दौरान जब साँसे प्राणों से भरपूर होती हैं, तब भी कुण्डलिनी ही पुष्ट होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कुण्डलिनी चित्र ही उन साँसों के प्राणों का सबसे अधिक फायदा उठाते हुए सबसे तेजी से चमक सकती हैं। ऐसा रोज के कुंडलिनी अभ्यास से ही होता है।

अनुभूति का स्थान सहस्रार चक्र ही है, इसीलिए कहा जाता है कि आत्मा सहस्रार में निवास करती है

मुझे तो कुण्डलिनी जागरण की अनुभूति पूरे मस्तिष्क में हुई। ऐसा लगा कि मस्तिष्क का हरेक कण कम्पायमान या जागृत हो रहा था। यद्यपि कुण्डलिनी मस्तिष्क के सबसे ऊपरी हिस्से में महसूस हो रही थी। उसे ही क्राऊन चक्र भी कहते हैं। जब जागरण की अनुभूति समाप्त हुई, तब कुण्डलिनी आज्ञा चक्र में महसूस हुई। सहस्रार से जागरण की शुरुआत इसलिए होती है क्योंकि मूलाधार से ऊपर चढ़ने वाली प्राणशक्ति सीधी सहस्रार में प्रविष्ट होकर वहाँ पर कुंडलिनी को चमकाती है। हो सकता है कि अनुभव केवल सहस्रार चक्र में ही होती हो, और अन्य मस्तिष्कीय केंद्रों में अनुभूति सहस्रार से ही रेफर्ड होकर आई हो। हालांकि मेरा यह अनुमान वैज्ञानिक प्रयोगों के विरुद्ध है, जिसमें मस्तिष्क में बहुत से अनुभूति के केंद्र बताए गए हैं। वैसे तो चिकित्सा विज्ञान अभी तक चक्रों और नाड़ियों की पहेली को नहीं सुलझा पाया है। इसी तरह, आज्ञा चक्र और उससे निचले चक्रों की तरह मस्तिष्क व शरीर के सभी बिंदुओं पर महसूस होने वाली संवेदनाएं रेफर्ड ही हैं। संवेदनाओं का मूल स्थान तो सहस्रार ही है। सहस्रार में जागरण के एकदम बाद कुंडलिनी आज्ञा चक्र पर आ जाती है। इससे जाहिर होता है कि निचला चक्र अपने ऊपर वाले चक्र से कम ऊर्जा स्तर का होता है। मतलब यह है कि सहस्रार की प्राणऊर्जा के विभिन्न स्तर विभिन्न चक्रों के रूप में अभिव्यक्त होते हैं। जागरण के समय ऊर्जा स्तर टॉप मोस्ट लेवल पर होता है। ऊर्जा स्तर के एक निश्चित सीमा के नीचे गिरने से जागरण की अनुभूति समाप्त हो जाती है। उस समय भी कुण्डलिनी रहती तो सहस्रार में ही है, पर वह आज्ञा चक्र में प्रतीत होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सहस्रार से प्राण आज्ञा चक्र तक उतर गया होता है। यदि कुण्डलिनी प्राण के साथ न चला करती, तो जागरण के एकदम बाद किसी भी चक्र पर महसूस हुआ करती। उसके बाद जैसे-जैसे प्राण नीचे उतरता है, कुण्डलिनी भी उसके साथ उतरती महसूस होती है। यह ऐसे ही होता है, जैसे जब किसी अंग में बहुत तेज दर्द होता है, तो वह सहस्रार में महसूस होता है, और आदमी कहता है कि उसका सिर फटा जा रहा है। इससे ऐसी कहावत भी बनी है कि”इतनी दर्द हुई कि चोटी खड़ी हो गई”। दरअसल बालों की चोटी सहस्रार के निकट बँधी होती है। छोटी मोटी दर्द तो प्रभावित अंग के स्थानीय क्षेत्र में ही लोकेलाइज्ड महसूस होती है। यदि बिना सुन्न किए दाँत उखाड़ा जाए, तो सहस्रार में बहुत तेज दर्द होता है। आदमी बोलता है कि उससे बड़ा दर्द कोई नहीं हो सकता। कुंडलिनी जागरण के अनुभव के बाद भी तो आदमी यही बोलता है कि इससे बड़ा अनुभव नहीं हो सकता। वास्तव में कुंडलिनी जागरण ही दुनिया की सबसे बड़ी अनुभूति है। अगर कोई है, तो वह आत्मज्ञान या ईश्वर ही है। उसमें अद्वैत और आनंद की अनुभूति पूर्ण रूप में होती है। अद्वैत और आनन्द तो दाँत उखाड़ने के बाद भी महसूस होता है, पर पूर्णरूप में नहीं। इससे भी जाहिर होता है कि अनुभूति का स्थान सहस्रार ही है। दाँत निकालने के दर्द की अनुभूति की जागरण की अनुभूति से समानता की बात बहुत से योगियों ने की है। मैंने भी ऐसा दाँत निकालने का उच्चतम स्तर का दर्द एकबार महसूस किया था। सुन्न करने वाली दवा अपना असर नहीं दिखा पाई थी। उससे मुझे अपना मस्तिष्क फटता हुआ सा इसलिए महसूस हुआ, क्योंकि मेरे शरीर का सारा प्राण दर्द का पीछा करते हुए सहस्रार में घुस गया था। उसके बाद मुझे 3 साल पहले हुए आत्मज्ञान का स्मरण हो आया, क्योंकि वह अवस्था उसीके जैसी आध्यात्मिक थी। वह प्राणोत्थान की अवस्था लग रही थी। इसमें पूरे शरीर का प्राण सहस्रार में केंद्रित होता है। इसका वर्णन मैंने एक पुरानी पोस्ट में किया है। सम्भवतः दुःख या दर्द से पाप का नष्ट होना इससे पैदा हुई इस योग भावना से ही होता है। इससे इस बात की भी पुष्टि हो जाती है कि योग से पाप क्षीण होते हैं। अब कुण्डलिनी के अनुभव को तो दर्द के अनुभव की तरह पैदा नहीं किया जा सकता है। अगर ऐसा होता तो आदमी सावधानी से अपने बाहरी अंगों में संवेदना पैदा करके कुण्डलिनी को महसूस किया करता। कुण्डलिनी का ध्यान तो मस्तिष्क में ही किया जा सकता है। ऐसा करना आम आदमी के लिए कठिन है। इसलिए प्राण को कुंडलिनी के हैंडल के रूप में प्रयोग में लाया जाता है। तांत्रिक हठयोग से प्राण को सहस्रार तक चढ़ाया जाता है। उससे वहां खुद ही कुण्डलिनी प्रकट होकर मजबूत होती रहती है। इससे जाहिर होता है कि हठयोग राजयोग की अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक, व्यावहारिक व आसान है। वैसे समयानुसार दोनों का मिश्रित प्रयोग मुझे ज्यादा कारगर लगा। उपरोक्तानुसार जब दर्द के साथ प्राण सहस्रार तक पहुंचता है, तो उससे कुण्डलिनी भी अनुभव होने लगती है। परंतु ज्यादा कुण्डलिनी लाभ नहीं मिलता, क्योंकि अधिकांश प्राण को दर्द की अनुभूति खा जाती है। हालांकि कई जगह स्पर्श की अनुभूति का कुण्डलिनी के लिए प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए, जीभ और तालु के आपसी स्पर्श के अनुभव से कुण्डलिनी और प्राण मस्तिष्क से वहां तक उतर जाते हैं, और फ्रंट चैनल से नीचे चले जाते हैं।उपरोक्तानुसार ही, जैसे सहस्रार में बनने वाले चित्र ही चक्रों पर बने हुए प्रतीत होते हैं, उसी तरह बाहरी दुनिया में बनने वाले सूर्य, नदी, पर्वत वगैरह के चित्र भी सहस्रार में ही बन रहे होते हैं, पर उनकी अनुभूति दूर बाहर होती है। यह ट्रिक मस्तिष्क ने क्रमिक जीवविकास के दौरान सीखी है। यदि सभी कुछ अंदर ही महसूस हुआ करता, तो बाहर की तरफ दौड़ न होती, और जीवविकास न होता।जितनी तेज अनुभूति होती है, वह उतनी ही ज्यादा आत्मा से चिपकती है। उसे ही समाधि भी कहते हैं। ऐसी तेज अनुभूति सहस्रार में ही होती है। तभी तो आदमी यौन प्रेमी को कभी भूल नहीं पाता। दरअसल मूलाधार से उठ रही अनुभूति सीधी सहस्रार में जा बैठती है और वहाँ प्रेमी के चित्र को मजबूत करती है। इसी वजह से कई लोग प्रेम में पागल होकर साधु बन जाते हैं।सहस्रार चक्र की इसी सार्वभौमिकता के कारण उसे एक हजार पंखुड़ियां दी गई हैं। इसका मतलब है कि यह शरीर के हरेक बिंदु से जुड़ा होता है। अन्य चक्रों में दो, तीन या चार पंखुड़ियां होती हैं, मतलब कि वे आसपास के कुछेक चक्रों से ही जुड़े होते हैं। इसका वर्णन मैंने एक पुरानी पोस्ट में किया है। शिवपुराण के अनुसार कुण्डलिनी ही शिव है, और शिव ही कुंडलिनी है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उसमें शिव ही का ध्यान लगाने को कहा गया है। उसीके अनुसार वह शिव सहस्रार में निवास करते हैं। शक्ति उनसे मिलने के लिए मूलाधार से ऊपर चढ़ती रहती है। जब शक्ति का आवेग एक निश्चित सीमा से ऊपर उठ जाता है, तब उसका शिव के साथ मिलन का कामोन्माद चरम पर पहुंच जाता है। उससे शिव-शक्ति का मिलन पूर्ण हो जाता है, जो कुण्डलिनी जागरण के रूप में प्रकट होता है।

मिश्रित योग सबसे अधिक कारगर होता है, इस उपरोक्त कथन की पुष्टि के लिए मैं अपने साथ घटित घटना का एक उदाहरण देता हूँ। मैं उस समय प्राणोत्थान की अवस्था में था। प्रतिदिन योगाभ्यास कर रहा था। एक दिन मेरे अचानक मिले पुराने मित्र के कारण मुझे कुण्डलिनी का तेज स्मरण हो आया। मैं उसमें खो गया। तभी अचानक मेरे प्राण भी उस कुंडलिनी का साथ देने के लिए मूलाधार से उठकर पीठ के रास्ते मस्तिष्क को चढ़ गए। इससे वह कुण्डलिनी जागृत हो गई। इसका विस्तृत विवरण इस वेबसाइट के होमपेज पर है। प्राण इसीलिए ऊपर चढ़ पाए, क्योंकि मैं प्रतिदिन तांत्रिक हठयोग का अभ्यास कर रहा था, और मुझे प्राण को ऊपर चढ़ाने की आदत बनी हुई थी। यदि वह आदत न होती, तो कुंडलिनी का स्मरण तो मस्तिष्क में तेजी से होता पर वह जागृत न होती, क्योंकि उसे मूलाधार की प्राणशक्ति न मिलती। जागरण कराने वाली असली प्राणशक्ति तो मूलाधार चक्र में ही रहती है। इससे पूर्वकथित इस बात की भी पुष्टि हो जाती है कि प्राण कुंडलिनी का पीछा करता है, और जहाँ कुंडलिनी जाती है, वहाँ प्राण भी चला जाता है। कुण्डलिनी के स्मरण को आप राजयोग कह सकते हैं, और मूलाधार से प्राण को ऊपर चढ़ाने को हठयोग कहते हैं। इससे सिद्ध होता है कि सभी प्रकार के योग मिलजुल कर काम करते हैं, और सभी एक ही महायोग के विभिन्न हिस्से हैं।

भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित कालजयी, भावपूर्ण व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ- भाग 4

स्वयं की तू तलाश कर

क्षणिक सुखों की चाह में           
भटक रहा इधर-उधर
कस्तूरी की खुशबू के लिए
हिरण की तरह बेख़बर
वज़ूद क्या तू कौन है?
इतनी-सी पहचान कर
हृदय में अपने झांक ले
स्वयं की तू पहचान कर।

राह में बिखरे हुए
कांटे भी चुन लें कभी
रोते हुए इन्सान का
दर्द भी सुन ले कभी
क्या तू मुंह दिखाएगा
जाएगा जब उसके घर
हृदय में अपने झांक ले
स्वयं की तू तलाश कर।

मर गया है कौन ये
पास जा के देख ले
ज़ुल्म क्या इस पर हुआ
चिन्तन में चिता सेंक लें
आवाज़ उठा अर्श तक
किसका तुझे इतना डर
हृदय में अपने झांक ले
स्वयं की तू तलाश कर।

बस्ती में ख़ुदग़र्जों की
निराश होना छोड़ दें
कर दे बुलन्द हस्ती को
हवाओं का रुख मोड़ दे
गुज़रेगा जिन राहों से
लोग झुकाएंगे सर
हृदय में अपने झांक ले
स्वयं की तू तलाश कर।

शान्ति-ध्वज को छोड़ दें
शमशीर उठा तन के चल
मसीहा बन कमज़ोर का
पड़ने दें माथे पे बल
आग़ाज़ कर जीवन का तू
अन्जाम की फ़िक्र न कर
हृदय में अपने झांक ले
स्वयं की तू तलाश कर।

सांसें मिली संसार में
मक़सद कोई ज़रूर है
शाख़ पर पत्ता भी वरना
हिलता नहीं हुज़ूर है
लगा दे यहाँ हाज़िरी
दिन-रात अपना कर्म कर
हृदय में अपने झांक ले
स्वयं की तू तलाश कर।

तरकश में अभी कई बाण पड़े हैं

हंसा कौन ये दूर गगन में
क्या सुन पाए तुम भी यारो
मौन व्याप्त है चहुं दिशा में
अब तो सम्भलो अहम के मारो

अति का बुरा सर्वत्र सुना था
आज घटित हुए देख लिया है
फिसला जब जीवन मुट्ठी से
फिर तुमने उसे याद किया है।

जीवनदायी धरा पर तुमको
जीना रास नहीं आया है
जीवन सम्भव नहीं जहां था
वो मंगल-चाँद तुम्हें भाया है

प्रकृति विरुद्ध जो काम किए हैं
उसका दण्ड तो पाना होगा
तुमने सोचा शाश्वत हैं हम
अब समय से पूर्व जाना होगा।

भूमि,नभ,जल,वायु,अग्नि
पंच तत्वों को भी न छोड़ा
विधि निर्मित जो नियम बने थे
उन नियमों का पालन तोड़ा

विज्ञान नहीं भगवान से ऊपर
इतना अगर तुम जाने होते
आज नहीं अपने कन्धो पर
मानवता की लाशें ढोते।

प्रमाद भरा है कैसा तुम में
दानवता तुमसे हारी है
भक्ष लिया हर जीव जगत का
अब सोचो किसकी बारी है

शर्मसार है जगत नियन्ता
महसूस हुई लाचारी है
सख्त़ फैसला अब वो लेगा
सृष्टि की ज़िम्मेदारी है।

अभी तो ये आरम्भ हुआ है
क्यों इतने बेचैन हो रहे
समय है ये कर्मों के फल का
वर्षौं से जिसका बीज बो रहे

किसके मद में उन्मत थे तुम
अब शीश झुकाए मौन खड़े हैं
एक ही तीर चलाया उसने
तरकश में अभी कई बाण पड़े हैं।

मानव जीवन के विरोधाभास पर छोटी सी गजल

जब से कसम ली उसने शराफ़त से जीने की
 पैमाईश लगे अब करने बुज़दिल भी सीने की।
 
हिक़ारत से देखते थे जो मयख़ानों की तरफ़
 आदत उन्हें अब हो गई हर रोज़ पीने की।
 
फ़ितरत में जिनकी डूबना बचाए उन्हें कौन
 समन्दर में ज़रूरत नहीं उनको सफ़ीने की।
 
नहीं वास्ता मेहनत से जिनका दूर तलक यार
 करते नहीं इज्ज़त वो किसी के पसीने की।
 
इकट्ठा किए रहे जो कौड़ियों को अपने पास
 कीमत क्या जाने नासमझ उजले नगीने की।
 
भरे हैं जो बारूद से हर वक़्त बेशुमार
 देते हैं नसीहत वो सभी को सकीने की।

भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित कालजयी, भावपूर्ण व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ- भाग 3

“भाव सुमन”, इस लघु पुस्तिका में हमारे दैनिक जीवन से जुड़े हुए भौतिक और आध्यात्मिक पहलुओं को सुन्दर, स्मरणीय, और कर्णप्रिय कविताओं के रूप में छुआ गया है। ये कवितायेँ बहुआयामी हैं। प्रत्येक कविता अनेक प्रकार के विषयों को एकसाथ छूती है। कविता हमारे अवचेतन मन तक आसानी से पहुँच बना लेती हैं। इसीलिए कहा जाता है कि “जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि”। बहुत सी पुस्तकों को पढ़ने से भी जो बात मन-स्वभाव में न बैठे, वह मात्र एक कविता के पठन-चिंतन से आसानी से बैठ सकती है। बहुत न लिखते हुए इसी आशा के साथ विराम लगाता हूँ कि प्रस्तुत कविता-संग्रह कविता-प्रेमी पाठकों की आकांक्षाओं पर खरा उतरेगा।

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कुंडलिनी स्विच

मित्रों, इस बार मैं योग की साधारण सी तकनीक का वर्णन करूंगा। यह है, जीभ की निचली सतह को नरम तालु से टच करने की। वैसे इसके बारे में मैंने पहले भी लिखा था। परंतु इस बार मैं तकनीक का व्यवहारिक रूप दिखाऊँगा। अभी भी मैंने कुंडलिनी को जीभ के माध्यम से फ्रंट चैनेल से उतारा। योग के निरन्तर अभ्यास से मेरी इस तकनीक में लगातार निखार आ रहा है। इसके बारे में मैं नित नई बातें सीख रहा हूँ। 

मस्तिष्क के विचारों और जीभ -तालु के स्पर्श का एकसाथ ध्यान करना चाहिए

ऐसा करने से विचारों की शक्ति खुद ही फ्रंट चैनेल से होते हुए नीचे उतर जाती है। 

जीभ तालु पर जितना पीछे कांटेक्ट में रहे, उतना ही अच्छा है

तालु का पीछे वाला भाग नरम, मखमली, नम व फिसलन से भरा होता है। वहाँ पर स्पर्श की संवेदना भी ज्यादा मजबूत व आनन्द से भरी होती है। कुंडलिनी जितने अधिक ऊपर वाले चक्रों में होती है, जीभ-तालु के आपसी स्पर्श की अनुभूति भी उतनी ही जल्दी और तेज होती है। स्पर्श की अनुभूति यदि पलभर के लिए भी हो जाए, तो भी कुंडलिनी नीचे उतर जाती है। यह ऐसे ही होता है, जैसे दो तारों के क्षणभर के संपर्क से ही करेंट प्रवाहित हो जाता है। कई बार यह अनुभूति जीभ को तालु पर रब करके भी पैदा की जाती है।

साँसें भी जीभ-तालु के आपसी स्पर्श को बनाने और मिटाने का काम करती हैं

इसीलिए जीभ-तालु के कांटेक्ट पॉइंट को कुंडलिनी स्विच भी बोलते हैं। साँस भरते समय यह कांटेक्ट पॉइंट कुछ लूस पड़ जाता है। वास्तव में यहाँ पर अवेयरनेस घट जाती है। इसका मतलब है कि कुंडलिनी स्विच ऑफ़ हो जाता है, और चैनेल का लूप सर्किट ब्रेक हो जाता है। इससे कुंडलिनी एनर्जी मस्तिष्क में जमा हो जाती है। पेट से साँसें भरने से ऐसा ज्यादा अच्छी तरह से होता है। इसी तरह, बैक चैनेल का फन उठाए नाग के रूप में ध्यान करने से भी कुण्डलिनी को बैक चैनेल में ऊपर चढ़ने में मदद मिलती है। मस्तिष्क में कुण्डलिनी एनर्जी के जमा होने से जीभ-तालु के स्पर्श को अनुभव करना भी आसान हो जाता है, जैसा ऊपर बताया गया है। फिर साँस छोड़ते हुए यह और आसान हो जाता है, क्योंकि उस समय पूरे फ्रंट चैनेल पर नीचे की तरफ दबाव पड़ता है। इस तरह से एक स्वचालित यंत्र के पुर्जों की तरह ये सभी तकनीकी बिंदु एक-दूसरे की मदद करते रहते हैं, और कुण्डलिनी चक्र लगातार चलने लगता है। इससे शरीर और मन दोनों रिफ्रेश हो जाते हैं। वैसे भी, कभी भी जीभ को तालु से स्पर्श कराने पर मस्तिष्क का अतिरिक्त बोझ नीचे उतर जाता है। मस्तिष्क के खाली हो जाने से उसमें एकदम से कुण्डलिनी स्वयं ही प्रकट हो जाती है। सिर्फ स्पर्श से कुछ नहीं होता, वहाँ पर अवेयरनेस भी पहुंचनी चाहिए। स्पर्श की संवेदना को गौर से अनुभव करने से वहाँ अवेयरनेस खुद ही पहुंच जाती है। उसके परिणामस्वरूप फ्रंट चैनेल में विशेषकर फ्रंट स्वाधिष्ठान चक्र में एक गहरी मांसपेशियों की सिकुड़न की अनुभूति होती है, और साथ में साँस की एक गहरी गैसप के साथ नियमित व गहरी सांसें चलने लगती हैं। यही कुण्डलिनी एनर्जी का चलना है। 

जीभ के पिछले हिस्से के केन्द्र से फ्रंट चैनल गुजरती है, जो सभी फ्रंट चक्रों को बेधते हुए मूलाधार तक जाती है। उससे कुंडलिनी एनर्जी के गुजरते समय पूरे फ्रंट चैनल एरिया में सनसनी के साथ ऐंठन महसूस होती है।

कई बार कुंडलिनी एनेर्जी पतली और केंद्रीय लाइन पर महसूस होती है, कभी बिना रेखा के ही

जरूरी नहीं कि हमेशा ही जीभ को तालु पर बहुत पीछे ले जाना पड़े। कई बार तालु के अगले भाग में ही अच्छी अनुभूति मिल जाती है। सामान्य पोजिशन में सीधी जीभ की तालु के साथ स्पर्श-संवेदना को भी अनुभव किया जा सकता है। जैसा ठीक लगे, वैसा करना चाहिए। कई बार कुण्डलिनी पतली रेखा में चलती महसूस होती है। ऐसा तब होता है, जब ध्यान तेज होता है, और मन शांत होता है। कई बार कुंडलिनी शक्ति केवल एक चक्र से दूसरे चक्र को स्थान बदलते दिखती है, चक्रों को जोड़ने वाली चैनल लाइन नहीं दिखाई देती।  अभ्यास के साथ खुद ही अनुभूतियाँ विकसित होती रहती हैं। इसलिए औरों की अनुभूतियों की नकल न करते हुए सही अभ्यास में लगे रहना चाहिए। इसी तरह, कई बार कुंडलिनी के चलने से संबंधित क्षेत्र की मांसपेशियों का संकुचन और ढीलापन ही महसूस होता है, बेशक कुंडलिनी का पता नहीं चलता। ऐसा सही तकनीक को लागू करने से होता है। यह कुण्डलिनी के प्रभाव को दिखाता है। कई बार ऐसा महसूस भी नहीं होता, खासकर जब मांसपेशियां थकी हों।

Kundalini switch

Friends, this time I will describe the simple technique of yoga. This is, to touch the lower surface of the tongue with the soft palate. Well I had written about it earlier also. But this time I will show the practical form of the technique. Just now I landed the Kundalini through the front channel through the tongue. With continuous practice of yoga, my technique is constantly improving. I am constantly learning new things about it.

The brain’s thoughts and tongue-palate touch should be meditated together

By doing this, the power of thoughts itself goes down through the front channel.

The more far inside the tongue is in contact with the palate, the better

The back part of the palate is soft, velvety, moist and slippery. There the sense of touch is also stronger and full of joy. The more the Kundalini is in the upper chakras, the faster and deeper the sensation of mutual touch of the tongue and palate. Even if the touch sensation remains for a moment, the Kundalini descends. This is similar to the way a current flows through the momentary contact of two wires. Many times this feeling is also produced by rubbing the tongue on the palate.

Breathing also works to make and erase the tongue and palate touch

That is why the contact point of the tongue-palate is also called Kundalini switch. This contact point becomes somewhat loose while breathing. Actually, awareness decreases here. This means that the Kundalini switches off, and the loop circuit of the channel breaks. This causes Kundalini energy to accumulate in the brain. This happens more thoroughly when the air is inhaled through stomach movement. Similarly, meditating on the back channel as a hood raising snake also helps Kundalini to climb up the back channel. The accumulation of Kundalini energy in the brain also makes it easier to experience the sensation of touch of the tongue and palate, as mentioned above. Also, it becomes easier while exhaling, because at that time there is downward pressure on the entire front channel. In this way, all these technical points help each other like the spares of an automatic device, and the Kundalini cycle starts running continuously. This refreshes both body and mind. Anyway, anytime the tongue touches the palate, the extra burden of the brain comes down. When the brain becomes empty, the Kundalini manifests itself in it. Nothing happens with just touch, awareness should also reach there. Deep feeling of touch sensation there causes reach of awareness there itself. As a result, there is a deep muscular sensation in the front channel, especially in the front swadhishthan chakra, and regular and deep breathing starts with a deep gasp of breath. This is the movement of Kundalini Energy.

The front channel passes through the center of the back of the tongue, intercepting all the front chakras uo to the Muladhar Chakra. This causes a sensation with cramp in the entire front channel area as Kundalini Energy passes through it.

At times, the Kundalini energy is felt on a thin and central line, sometimes without a line

One does not always have to move the tongue too far back on the palate. Many times a good feeling is found in the front bony part of the palate. In normal position of tongue, tactile sensation can also be experienced along the palate instead of inverted tongue. It should be done as it seems appropriate. At times, Kundalini feels moving in a thin line. This happens when meditation is deep, and the mind is calm. Many times the Kundalini Shakti is seen only changing place from one Chakra to another Chakra, the channel line connecting the Chakras is not visible. Feelings develop on their own with practice. Therefore, do not imitate the sensations of others, and one should be engaged in right practice. Similarly, sometimes the movement of the Kundalini causes the contraction and relaxation of the muscles of the area to be felt, of course, the Kundalini is not detected. This is done by applying the correct technique. It shows the influence of Kundalini. Sometimes it does not even feel, especially when the muscles are tired.

कुंडलिनी ही यमुना में पौराणिक कालियनाग को मारने वाले भगवान श्रीकृष्ण के रूप में अभिव्यक्त होती है

मित्रों, योग एक वैज्ञानिक विधि है। आम लोग इसे आसानी से नहीं समझ सकते। अभ्यास तो इसका तब करेंगे न, जब इसे समझेंगे। इसीलिए आम जनमानस की सुविधा के लिए पुराण रचे गए हैं। पुराणों में योग को विभिन्न मिथक घटनाओं और कथाओं के रूप में समझाया गया है। हालांकि मिथक रूप होने पर भी ये कथाएं सैद्धांतिक रूप से सत्य होती हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि ये मिथक शास्त्रीय होते हैं, विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए होते हैं, और गैर-शास्त्रीय या साधारण मिथकों के विपरीत होते हैं। कुछ तथाकथित आधुनिकतावादियों की सोच के विपरीत, ये अंधविश्वास की श्रेणी में नहीं आते। सामाजिक, व्यक्तिगत और व्यावहारिक मर्यादाओं के उल्लंघन से बचने के लिए कई बातें सीधे तौर पर नहीँ कही जा सकती हैं, इसलिए उन्हें वैज्ञानिक मिथक के रूप में कहना पड़ता है। योग को एकदम से समझना मुश्किल हो सकता है। लम्बे समय तक यौगिक या अद्वैतमयी जीवनशैली को अपना कर रखना पड़ता है। इसीलिए पुराणों में योग से संबंधित बातों को मनोरंजक मिथक कथाओं के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इससे ये कथाएं लंबे समय तक अपने प्रति आदमी की रुचि बना कर रखती हैं। इनसे आदमी अपनेआप ही अप्रत्यक्ष रूप से योगी बना रहता है, और अनुकूल परिस्थिति मिलने पर थोड़े से अतिरिक्त प्रयास से वह पूर्ण योगी भी बन सकता है। यदि सभी लोग एकसाथ पूर्णकालिक योगी बन गए, तब दुनियादारी के काम कैसे चलेंगे। इसीलिए योग को ऐसी वैज्ञानिक व सुहानी कथाओं के रूप में ढाला जाता है, जिन पर विश्वास बना रहे। इससे दुनियादारी के सारे दायित्वों को निभाते हुए भी आदमी हर समय यौगिक जीवनशैली में बंधा रहता है। ऐसी ही एक प्रसिद्ध कथा श्रीमद्भागवत महापुराण में आती है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण व कालियनाग के बीच हुए युद्ध का वर्णन है। उस कथा के अनुसार भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ के डर से रमणक द्वीप पर कालिय नाम का एक विशाल नाग रहता था, जिसके सैंकड़ों फन थे। उसे किसी संत ने श्राप दिया था कि कृष्ण भगवान उसको मारकर उसका उद्धार करेंगे। इसलिए वह वृन्दावन के समीप बह रही यमुना नदी में आ गया था। उसके जहर से यमुना का पानी जहरीला हो गया था, जिससे आसपास के लोगबाग और पशु-पक्षी मर रहे थे। कृष्ण भगवान अपने गोप मित्रों के साथ वहाँ गेंद खेल रहे थे। तभी उनकी गेंद यमुना के जल में चली गई। श्रीकृष्ण ने तुरंत यमुना में छलांग लगा दी। अगले ही पल वे कालियनाग से कुश्ती लड़ रहे थे। बहुत आपाधापी के बाद श्रीकृष्ण उसके बीच वाले और सबसे बड़े सिर पर चढ़ गए। वहाँ उन्होंने अपना वजन बढ़ा लिया और उसके फनों को मसल दिया। उन्होंने उसके सिर और पूँछ को एकसाथ पकड़कर उसे यहाँ-वहाँ पटका। अंत में उन्होंने कालियनाग को हार मानने पर मजबूर कर दिया। तभी कालियनाग की पत्नियां वहाँ आईं और भगवान कृष्ण से उसके प्राणों की भिक्षा माँगने लगीं। श्रीकृष्ण ने उसे इस शर्त पर छोड़ा कि वह सपरिवार यमुना को छोड़कर रमणक द्वीप पर वापिस चला जाएगा और दुबारा यमुना के अंदर कभी नहीं घुसेगा।

कालियनाग सुषुम्ना नाड़ी या मेरुदंड का प्रतीक है, और भगवान श्रीकृष्ण कुंडलिनी के प्रतीक हैँ

 वास्तव में आदमी की संरचना एक नाग से मिलती है। आदमी का सॉफ्टवेयर उसके केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र से बना होता है, जो आकृति में एक फन उठाए नाग की तरह दिखता है। उसमें मस्तिष्क और मेरुदंड आते हैं। आदमी का बाकी का शरीर तो इसी केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर बाहर-बाहर से मढ़ा गया है। इसी केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में सुषुम्ना नाड़ी प्रवाहित होती है। यहाँ यमुना नदी का पानी मेरुदंड के चारों ओर बहने वाले सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूड का प्रतीक है। रमणक द्वीप में निवास करना दुनियादारी के भोग-विलास में उलझने का प्रतीक है। रमणक शब्द को रमणीक या रमणीय शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है मनोरंजक। गरूड़ का भय साधु संतों के भय का प्रतीक है। रमणीक जगह पर साधु संत नहीं जाते। यह देखा जाता है कि साधु संत लोगों को दुनियादारी के फालतू झमेलों से दूर रखते हैं। साधु का श्राप किसी सज्जन द्वारा ईश्वर का सही रास्ता दिखाना है। कालियनाग का श्रीकृष्ण के द्वारा मारे जाने के बारे में कहना उसको आसक्ति के बंधन से मुक्ति प्रदान करने का प्रतीक है। श्रीकृष्ण के द्वारा उसे वापिस रमणक द्वीप भेजने का अर्थ है कि वह दुनिया के भोले-भाले लोगों से दूर एकांत में चला जाए और वहाँ पर आसक्ति का विष फैलाता रहे। कालियनाग की पत्नियां दस इन्द्रियों की प्रतीक हैं। इनमें 5 कर्मेन्द्रियां और 5 ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। ये इन्द्रियाँ कालियनाग की पत्नियां इसलिए कही गई हैं, क्योंकि ये दुनियादारी में आसक्त आदमी के सान्निध्य में बहुत शक्तिशाली होकर उससे एकाकार हो जाती हैं। कालियनाग का विष आसक्तिपूर्ण जीवनशैली का प्रतीक है। यह दुनिया का सबसे शक्तिशाली विष है। इससे आदमी जन्म-मरण के चक्कर में पड़कर बार-बार मरता ही रहता है। कालियनाग के सैंकड़ों फनों से निकल रहे विष का अर्थ है कि मस्तिष्क में पैदा हो रही सैंकड़ों इच्छाओं व चिंताओं से यह आसक्ति बढ़ती ही रहती है।  भगवान कृष्ण यहाँ कुंडलिनी के प्रतीक हैं। उनका कालियनाग के बीच वाले मस्तक पर चढ़ने का अर्थ है, कुंडलिनी का सहस्रार चक्र में ध्यान करना। श्रीकृष्ण के द्वारा गेंद खेलने का अभिप्राय कुण्डलिनी योगसाधना से है। गेंद यहाँ प्राणायाम की प्राणवायु की प्रतीक है। कृष्ण के सखा ग्वाल-बाल विभिन्न प्रकार के प्राणायामों व योगसाधना के प्रतीक हैं। जैसे गेंद आगे-पीछे जाती रहती है, वैसे ही साँसें भी। गेंद का नदी में घुसने का अर्थ है, प्राणवायु का चक्रों में प्रविष्ट होना। श्रीकृष्ण का नदी में छलांग लगाने का अर्थ है कि कुंडलिनी भी प्राणवायु के साथ चक्रों में प्रविष्ट हो गई। यमुना पवित्र नदी है, जिसमें श्रीकृष्ण छलांग लगाते हैं। इसका अर्थ है कि प्राणवायु से पवित्र हुए चक्रों में ही कुंडलिनी प्रविष्ट होती है। श्रीकृष्ण के द्वारा कालियनाग के फनों को मसले जाने का अर्थ है कि कुंडलिनी ने मस्तिष्क की फालतू इच्छाओं और चिंताओं पर रोक लगा दी है, तथा अवचेतन मन में दबे पड़े वैचारिक कचरे की सफाई कर दी है। श्रीकृष्ण के द्वारा कालियनाग के सिर और पूँछ को एकसाथ पकड़े जाने का अर्थ है कि कुंडलिनी मूलाधार चक्र से सहस्रार चक्र तक पूरी सुषुम्ना नाड़ी में फैल गई है। मूलाधार से शक्ति लेकर कुंडलिनी सहस्रार में चमक रही है। ऐसा तब होता है जब तालु-जिह्वा के जोड़ या सहस्रार और मूलाधार का ध्यान एकसाथ किया जाता है। ऐसा करने से कालियनाग के पटके जाने का अर्थ है कि उससे दिमाग का फालतू शोर खत्म हो रहा है, जिससे आदमी शाश्वत आनन्द की ओर बढ़ रहा है। कालियनाग को जान से मारने का प्रयास करने का अर्थ है कि शरीर के तंत्रिका तंत्र को नियंत्रित रूप में ही काम करने देना है। कालियनाग का दुबारा यमुना में न प्रविष्ट होने का अर्थ है कि कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी कभी आसक्तिपूर्ण व्यवहार नहीं करता।

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Kundalini is the manifestation of Lord Krishna who killed Mythological Kaliyanag in Yamuna river

Friends, yoga is a scientific method. Common people cannot understand it easily. They will practice it when they understand it. That is why the Puranas have been composed to facilitate the common public. Yoga has been explained in the Puranas as various mythic events and stories. Although being as mythological forms these stories are still theoretically true. This is so because these myths are classical and specially designed, as opposed to non classical or ordinary myths. Contrary to the thinking of some so-called modernists, they do not fall under the category of superstition. Many things cannot be said directly to avoid violations of social, personal and practical limitations, hence they have to be said as scientific myths. Yoga can be difficult to understand instantly. One has to adopt a Yogic or nondual lifestyle for a long time. That is why in Puranas, things related to yoga are presented as amusing mythology. This keeps these stories interesting for a man for a long time. With this, a man automatically becomes a yogi indirectly, and with a little extra effort, he can also become a perfect yogi if he gets a favorable situation. If everyone became a fulltime yogi together, then how would worldly work go. That is why yoga is molded as such scientific and pleasant stories, on which faith remains. Due to this, the man remains tied in the Yogic lifestyle at all times even while performing all the obligations of worldliness. One such famous story comes in the Shrimad Bhagwat Mahapuran, which describes the war between Lord Krishna and Kaliyanag. According to that legend, a huge snake named Kaliya who had hundreds of hoods lived on the island of Ramanak, with the fear of Garuda, the vehicle of Lord Vishnu. He was cursed by some saint that Lord Krishna will kill him and liberate him. Therefore, he came to the river Yamuna flowing near Vrindavan. The water of the Yamuna became poisonous due to its poison, killing the people, birds and animals around. Lord Krishna was playing ball with his grazer friends. Then his ball went into the water of Yamuna. Shri Krishna immediately leaped into the Yamuna. The next moment he was wrestling with Kaliynaag. After a lot of trouble, Shri Krishna climbed on the middle and biggest head of it. There he increased his weight and mashed his hoods. He grabbed his head and tail together and hit him here and there. In the end, he forced Kalyanag to give up. Then Kaliyanag’s wives came there and started asking Lord Krishna for his life. Srikrishna left him on the condition that he along with his family would leave the Yamuna and return to the island of Ramanak and would never enter the Yamuna again.

Kaliyanag is a symbol of the sushumna nadi or spinal cord, and Lord Shri Krishna is the symbol of Kundalini

In fact the structure of man resembles a serpent. The man’s software is made up of his central nervous system, which looks like a hood raising snake in shape. The brain and spinal cord come in it. The rest of the man’s body has been overlaid on this central nervous system. Sushumna channel runs in this central nervous system. Here the water of Yamuna river symbolizes the cerebrospinal fluid flowing around the spinal cord. Living in the island of Ramanak is a symbol of worldly indulgence. The word Ramanaka is derived from the Sanskrit word Ramanika or ramaneeya, meaning amusing. The fear of Garuda symbolizes the fear of saints. Saints do not go to the indulging places. It is seen that saints keep people away from unnecessary conflicts of worldliness. The curse of a monk means to show the right path to God by a gentleman. Saying about Kaliyanag being killed by Shri Krishna is a symbol of liberating him from the bondage of attachment. Shri Krishna sending him back to the island of Ramanak means that he should go in seclusion away from the innocent people of the world and spread poison of attachment there. Kaliyanag’s wives symbolize the ten senses. There are 5 work senses and 5 knowlege senses in them. These senses are said to be the wives of Kaliyanag because they become very powerful in the connection with the man attached to the world and become one with him. The poison of Kaliyanag signifies a attached lifestyle. It is the most powerful poison in the world. Due to this, man keeps dying in the cycle of birth and death again and again. The poison emanating from hundreds of hoods of Kaliyanag means that this attachment keeps on growing due to the hundreds of desires and worries that arise in the brain. Lord Krishna is the symbol of Kundalini here. His climb to the central hood of Kaliyanag means meditating Kundalini in the Sahasrara Chakra. Playing ball by Sri Krishna means Kundalini Yogasadhana. The ball is a symbol of pranayama here. Boy Krishna’s friend grazers symbolize various types of pranayamas and yogasanas. Breathing in and out denotes the ball going back and forth or up and down. The entry of the ball into the river means the entry of pranavayu into chakras. Sri Krishna’s leap into the river means that Kundalini also entered the chakras with pranavayu. Yamuna is the holy river in which Sri Krishna jumps. This means that the Kundalini enters only in the chakras consecrated by breathing. Mulling of the Kaliyanag by Sri Krishna means that Kundalini has curbed the mind’s unnecessary desires and concerns, and has cleaned up the ideological waste buried in the subconscious mind. The holding of Kaliyanag’s head and tail together by Sri Krishna means that the Kundalini has spread across the entire Sushumna channel from Muladhara Chakra to Sahasrara Chakra. Taking power from the Muladhar, Kundalini is shining in Sahasrara. This happens when the palate-tongue joint or Sahasrara and Muladhara are meditated together. By doing this, Kaliyanag’s banging means that the unnecessary noise of the brain is being eliminated, due to which man is moving towards eternal joy. To attempt to kill Kaliyanaag means to let the central nervous system of the body function in a controlled manner. Kaliyanag’s non-entry into the Yamuna again means that after Kundalini awakening, man never behaves indulgently.

Kundalini with Chakra balancing is the key to balanced life that leads to stress reduction itself

Friends, nowadays life has become very struggling and competitive. The intricacies of relationships have also increased a lot these days. It is natural for the burden to increase in the mind. Today we will discuss this and how to avoid it with the help of Kundalini.

Uncontrolled burden of mind is the root cause of most problems

The man’s uncontrolled burden of mind brings many behavioral changes in him. He becomes irritable and angry. This increases his stress. Increased stress reduces his ability to work, and he becomes a victim of various diseases. All these make his family, social and business life mess up. His breath also seems to stop, and also become irregular. This also causes a lack of oxygen in the body.

Chakra meditation helps reduce stress

Due to the non-utilization of all the chakras equally, the life force is not divided in equal quantity between all the chakras. Due to this the chakras which are excessively overpowered, they become adversely affected by the workload; And the chakras which get less life force than necessary also become adversely affected by not getting enough work. That is why it is said that yoga provides health benefits. In fact, with proper Kundalini yoga, all the chakras remain healthy and active. This makes life controlled and balanced. We have often seen that intellectuals working in the midst of nature have attractive personalities. Their lifestyle is balanced. This is the reason that their brain chakras are kept healthy by the work of the brain, and other chakras of the body by physical actions. If those people also do Kundalini Yoga, then they will also benefit, then how will urban people with lazy lifestyle not get.

Kundalini acts as a carrier of life force

Pranashakti is invisible. We cannot even experience it easily. Then how to rotate it on chakras. In fact, Kundalini acts as a handle for life force. Wherever Kundalini goes, Pranashakti goes there itself. That is why only the Kundalini is revolved on the chakras.

A practical recipe to reduce the unnecessary burden of mind

The tongue is held pressed lightly along the palate. Contact with the tongue and palate is taken into consideration. Let the movements of thoughts in the brain keep going, and also keep attention on them. Keep attention on the body’s front channel and back channel as well. If possible, keep awareness on all these together, otherwise shift the attention from one to another. By doing this, the Kundalini will suddenly appear in the brain, and other unnecessary thoughts will slow down. Kundalini will remain in the brain continuously with joy revolving on all the chakras too, and the unnecessary burden of the brain will also be reduced. One can imagine the back channel as a hood raising Sheshnag, on whose central line Kundalini runs. By taking long and deep breaths through the abdomen, Kundalini gets the additional power to walk in the channel. Even directly, Kundalini meditation can be focused on a particular chakra, and it can also be kept in mind that the life force will descend itself through the front channel from the brain to that chakra. With this, the brain power also reaches that chakra in a short time. With that, along with the spasm on the chakra and bliss the Kundalini begins to glow rapidly. The burden of the brain becomes lighter. It is as if the electric current reaches the target immediately in the form of electromagnetic waves, while the electrons take longer to reach.

Increasing appetite by drinking tea

It is often seen that drinking tea decreases appetite. This happens because tea makes the life force go to the brain. That is why after drinking tea, colorful thoughts start popping in the mind. This leads to loss of life force in the digestive system. Many times I brought down the increased life force of brain gained via tea through Kundalini Yoga, and set it especially on the navel chakra. It suddenly increased my appetite. Similarly Pranashakti can also be focused on other chakras. We can call it Tea Yoga. This proves that through Kundalini Yoga we can control many metabolic activities of our body.