My post

कुंडलिनी विज्ञान ही अधिकांश धार्मिक मान्यताओं की रीढ़ है


इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी-मार्ग

मित्रो, कुंडलिनी विज्ञान सभी धर्मों की रीढ़ है। सभी धार्मिक मान्यताएं इस पर आधारित है। आज मैं हिन्दू धर्म की कुछ परंपरागत मान्यताओं का उदाहरण देकर इस सिद्धान्त को स्पष्ट करूंगा। साथ में, कुंडलिनी योग के कुछ व्यावहारिक बिंदुओं पर भी प्रकाश डालने की कोशिश करूंगा। हालांकि ये मान्यताएं तुच्छ लगती हैं, पर ये कुंडलिनी योग का बहुत बड़ा व व्यावहारिक संदेश देती हैं।

दोनों पैरों की ठोकर से कुंडलिनी को केंद्रीकृत करना

इस मान्यता के अनुसार यदि किसी आदमी के पैर की ऐड़ी को पीछे से किसी अन्य आदमी के पैर से ठोकर लग जाए तो दूसरे पैर को भी उसी तरह ठोकर मारनी पड़ती है। उससे दोनों लोगों का शुभ होता है। दरअसल एक तरफ के पैर की ठोकर से कुंडलिनी शरीर के उस तरफ अधिक क्रियाशील हो जाती है, क्योंकि कुंडलिनी संवेदना का पीछा करती है। जब शरीर के दूसरी तरफ के पैर में भी वैसी ही संवेदना पैदा होती है, तब कुंडलिनी दूसरी तरफ जाने लगती है। इससे वह शरीर के केंद्र अर्थात सुषुम्ना नाड़ी में आ जाती है। इससे आदमी संतुलित हो जाता है, जिससे उसका हर प्रकार से शुभ होता है। दूसरे आदमी को भी इस प्रभाव का लाभ मिलता है, क्योंकि जैसा कर्म, वैसा फल। मैंने यह खुद होते देखा है।

एक या ऑड छींक अशुभ, पर दो या ईवन छींकें शुभ मानी जाती हैं

इसके पीछे भी यही कुंडलिनी सिद्धांत काम करता है। एक छींक की संवेदना से दिमाग का एक ही तरफ का हिस्सा क्रियाशील होता है। कल्पना करो कि बायाँ हिस्सा क्रियाशील हुआ। इसका मतलब है कि उस समय आदमी की सोच सीमित, लीनियर या लॉजिकल थी। क्योंकि दिमाग के दोनों हिस्से आपस में लगातार कंम्यूनिकेट करते रहते हैं, इसलिए यह पक्का है कि वह दाएँ हिस्से को सतर्क कर देगा। जब दूसरी छींक आती है, तो उससे दिमाग का दायाँ हिस्सा क्रियाशील हो जाता है। उससे आदमी की सोच असीमित या इलॉजिकल हो जाती है। इससे कुंडलिनी या अवेयरनेस दिमाग के दोनों हिस्सों में घूमकर दिमाग के बीच में केंद्रित हो जाती है। इसी केंद्रीय रेखा पर सहस्रार और आज्ञा चक्र विद्यमान हैं। इससे पूर्णता, संतुलन और आनन्द का अनुभव होता है। 

मस्तिष्क में अंदरूनी विवाह ही अर्धनारीश्वर का रूप या शिवविवाह है

मस्तिष्क का दायाँ और बायाँ भाग बारी-2 से काम करते रहते हैं। ऐसा उनके बीच के स्थाई संपर्क मार्ग से होता है। इस न्यूरोनल या नाड़ी मार्ग को कॉर्प्स कॉलोसम कहते हैं। जिनमें किसी रोग आदि के कारण नहीं होता, वे लगातार मस्तिष्क के एक ही हिस्से से बड़ी देर तक काम करते रहते हैं। उनमें आपसी तालमेल न होने के कारण वे अपने काम ढंग से नहीं कर पाते। सामान्य व्यक्ति में कुछ देर तक बायाँ मस्तिष्क काम करता है। वह तर्कपूर्ण, सीमित, व व्यावहारिक दायरे में रहकर कुशलता से रोजमर्रा के काम करवाता है। थोड़ी देर में ही वह विचारों की चकाचौंध से थक जाता है। फिर शरीर दाएँ मस्तिष्क के नियंत्रण में आ जाता है। उसकी कार्यशैली आकाश की तरह असीमित, तर्कहीन, व खोजी स्वभाव की होती है। क्योंकि इसमें आदमी को सीमित दायरे में बांधने वाले विचारों की चकाचौंध नहीं होती, इसलिए यह अंधकार लिए होता है। इसमें रहकर जैसे ही आदमी की विचारों की पुरानी थकान खत्म होती है, वैसे ही यह हिस्सा बन्द हो जाता है, और बायाँ हिस्सा फिर से चालू हो जाता है। यह सिलसिला लगातार चलता रहता है। कार्य के आधिपत्य को आपस में परिवर्तित करने का समय अंतराल आदमी की सतर्कता और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के अनुसार बदलता रह सकता है। अब बात आती है, मस्तिष्क के दोनों हिस्सों को एकसाथ समान रूप से क्रियाशील करने की। यही कुंडलिनी का केंद्रीय रेखा या सुषुम्ना में आना है। इससे कुंडलिनी शक्ति मतलब प्राण शक्ति दोनों हिस्सों में बराबर बंट जाती है, और पूरे मस्तिष्क को क्रियाशील कर देती है। ऐसा ही कुंडलिनी जागरण के समय भी महसूस होता है, जब किसी विशेष क्षेत्र की बजाय पूरा मस्तिष्क समान रूप में चेतन, क्रियाशील और कम्पायमान हो जाता है। इसे हम अर्धनारीश्वर का आंतरिक मिलन या शिवविवाह भी कह सकते हैं। यह भी कह सकते हैं, शरीर के बाएँ भाग का विवाह दाएँ भाग से हो गया है। हिंदु धर्म में अर्धनारीश्वर नामक शिव के बाएं भाग को स्त्री और आधे दाएँ भाग को पुरुष के रूप में दिखाया गया है। कुंडलिनी चित्र बाएँ मस्तिष्क में रहने का ज्यादा प्रयास करता है, इसीलिए कुंडलिनी को स्त्री रूप दिया गया है। आप खुद देखिए, हर किसी के मन में चकाचौंध से भरे विचारों के पूल के अंदर हमेशा डूबे रहने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। इस प्रवृत्ति को दाएँ मस्तिष्क के खाली आकाश में जागरूकता को स्थानांतरित करने के नियमित अभ्यास के माध्यम से दूर किया जाना ही लक्ष्य है। कुंडलिनी योग के माध्यम से इसे केंद्र में लाने की कोशिश की जाती है। कुंडलिनी के केन्द्रीभूत होने से ही एक आदमी पूर्ण मानव बनता है। इससे उसमें तार्किक व्यावहारिकता भी रहती है, और साथ में अतार्किक भावप्रधानता व खोजीपना भी। इसका अर्थ है कि वहाँ अद्वैत उत्पन्न हो जाता है, क्योंकि अद्वैत के बिना दो विरोधी गुणों का साथ रहना सम्भव ही नहीं है। इसी तरह, सीधे तौर पर शरीरविज्ञान दर्शन या पुराणों से अद्वैत भाव बना कर रखने से मन में कुंडलिनी की स्पष्टता बढ़ जाती है। मन में दो विरोधी गुणों को एकसाथ बना कर रखने के लिए या कुंडलिनी योग से कुंडलिनी को बना कर रखने के लिए बहुत अधिक प्राण ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसीलिए मैंने पिछ्ली पोस्ट में योग के लिए संतुलित आहार व संतुलित जीवन पर बहुत जोर दिया है। शुरु-2 में मैं कुंडलिनी योग करते समय मस्तिष्क में सहस्रार चक्र व आज्ञा चक्र के स्तर पर कुंडलिनी को सिर में चारों ओर ऐसे घुमाता था, जैसे एक किसान गोलाकार खेत में हल चला रहा हो। उससे मेरा पूरा मस्तिष्क क्रियाशील हो जाता था, और आनन्द के साथ कुंडलिनी केन्द्रीभूत हो जाती थी। मैंने यह भी देखा कि एक नाक से जल खींचकर दूसरे नाक से निकालने पर भी कुंडलिनी को केन्द्रीभूत होने में मदद मिलती है। इसे जलनेती कहते हैं। इसके लिए जल गुनगुना गर्म और हल्का नमकीन होना चाहिए, नहीं तो सादा और ठंडा जल नाक की म्यूकस झिल्ली में बहुत चुभता है। 

इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियाँ ही कुंडलिनी जागरण के लिए मूलभूत नाड़ियाँ हैं

कुंडलिनी योग के अभ्यास के दौरान पीठ में तीन नाड़ियों की अनुभूति होती है। नाड़ियाँ वास्तव में सूक्ष्म संवेदना मार्ग हैं, जो केवल अनुभव ही की जा सकती हैं। भौतिक रूप में तो मुझे ये शरीर में नजर आती नहीं। हो सकता है कि ये भौतिक रूप में भी हों। यह एक रिसर्च का विषय है। एक नाड़ी पीठ के बाएं हिस्से से होकर ऊपर चढ़ती है, और बाएँ मस्तिष्क से होते हुए आज्ञा चक्र पर समाप्त हो जाती है। दूसरी नाड़ी भी इसी तरह पीठ के व मस्तिष्क के दाएँ हिस्से से गुजरते हुए आज्ञा चक्र पर ही पूर्ण हो जाती है। एक इसमें इड़ा और दूसरी पिंगला नाड़ी है। इन दोनों के बिल्कुल बीच में और ठीक रीढ़ की हड्डी के बीच में से तीसरी नाड़ी पीठ व मस्तिष्क के बीचोंबीच होती हुई सहस्रार तक जाती है। यह सुषुम्ना नाड़ी है। सामान्य आरेखों के विपरीत, मुझे इड़ा और पिंगला पीठ में अधिक किनारों पर मिलती हैं। यह एक कम अभ्यास का प्रभाव हो सकता है। दरअसल, योग में दार्शनिक सिद्धांतों से ज्यादा भावना या अनुभव मायने रखता है। कुंडलिनी जागरण इसी नाड़ी से चढ़ती हुई कुंडलिनी से होता है। यदि कुंडलिनी इड़ा या पिंगला नाड़ी से होकर भी ऊपर चढ़ रही हो, तब भी उसे रोकना नहीं चाहिए, क्योंकि कुंडलिनी हर हालत में फायदेमंद ही होती है। उसे जबरदस्ती सुषुम्ना में धकेलने का भी प्रयास करना चाहिए, क्योंकि कुंडलिनी जबरदस्ती को ज्यादा पसंद नहीं करती। कुंडलिनी अपने प्रति समर्पण से खुश होती है। जब वह इड़ा या पिंगला से चढ़ रही हो, तब उसके ध्यान के साथ मूलाधार या स्वाधिष्ठान चक्र व आज्ञा चक्र का भी एकसाथ ध्यान करना चाहिए। इससे वह एकदम सुषुम्ना में आ जाती है, या थोड़ी देर के लिए पीठ के दूसरे किनारे की नाड़ी में चढ़ने के बाद सुषुम्ना में चढ़ने लगती है। इससे कुंडलिनी सहस्रार में प्रकाशित होने लगती है। इसके साथ, शरीर व मन के संतुलन के साथ आनन्द की प्राप्ति भी होती है। कुंडलिनी को सहस्रार से नीचे आज्ञा चक्र को नहीं उतारा जाता, इसीलिए सुषुम्ना नाड़ी का अंत सहस्रार चक्र में चित्रित किया जाता है। वास्तव में कुंडलिनी को सहस्रार में रखना व उधर जागृत करना ही कुंडलिनी योग का सर्वप्रमुख ध्येय है। इसीसे सभी आध्यात्मिक गुण प्रकट होते हैं। सहस्रार चक्र पिंड को ब्रह्मांड से जोड़ता है। यह सबसे अधिक आध्यात्मिक चक्र है, जो एक तरफ आत्मा से जुड़ा होता है, और दूसरी तरफ परमात्मा से। सहस्रार में कुंडलिनी के दबाव को झेलने की बहुत क्षमता होती है। ऐसा लगता है कि कुंडलिनी से सहस्रार की खारिश मिट रही है, और मजा आ रहा है। फिर भी यदि वहां असहनीय दबाव लगे, तो कुंडलिनी को आज्ञा चक्र तक व आगे की नाड़ी से शरीर में नीचे उतार सकते हैं। हालांकि, यह इडा या पिंगला के माध्यम से नीचे लाने की तुलना में अधिक कठिन और गड़बड़ वाला दिखाई देता है। हालाँकि उल्टी जीभ को नरम तालु से छुआ कर रखने से इसमें मदद मिलती है। इसीलिए इड़ा और पिंगला का अंत आज्ञा चक्र में चित्रित किया गया है, पर सुषुम्ना नाड़ी का अंत सहस्रार चक्र में दिखाया गया है। यदि आप मूलाधार और आज्ञा चक्र पर एकसाथ ध्यान लगाओ, तो कुंडलिनी का संचार इड़ा नाड़ी से होता है। यदि आप स्वाधिष्ठान चक्र और आज्ञा चक्र का एकसाथ ध्यान करो, तो कुंडलिनी का संचरण पिंगला नाड़ी से होता है। चित्र में भी ऐसा ही दिखाया गया है। इसका अर्थ है कि आज्ञा चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र, तीनों का एकसाथ ध्यान करने से कुंडलिनी का संचरण सुषुम्ना नाड़ी से ही होगा या वह सीधी ही सहस्रार तक पहुंच जाएगी। ऐसा चित्र में दिखाया भी गया है। आप देख सकते हैं कि सुषुम्ना नाड़ी की भागीदारी के बिना ही कुंडलिनी सहस्रार चक्र तक पहुंच गई है। इड़ा और पिंगला से कुंडलिनी एकसाथ आज्ञा चक्र तक आई। वहाँ से वह बाएँ और दाएँ मस्तिष्क से ऊपर चढ़ कर सहस्रार पर इकट्ठी हो जाती है। ऐसा महसूस भी होता है। दोनों तरफ के मस्तिष्क में दबाव से भरी मोटी लहर ऊपर जाती और सहस्रार में जुड़ती महसूस होती है। तभी चित्र में इन दोनों लघु नाड़ियों को मोटी पट्टी के रूप में दिखाया गया है। जब कुंडलिनी को आगे की नाड़ी से नीचे उतारना होता है, तब इन्हीं पट्टीनुमा नाड़ियों से इसे सहस्रार से आज्ञा चक्र तक उतारा जाता है, और वहाँ से नीचे। आपने भी देखा होगा, जब आदमी मानसिक रूप से थका होता है, तो वह अपने माथे को मलता है, और अपनी आँखों को भींचता है। इससे उसे माथे के दोनों किनारों से गशिंग या उफनते हुए द्रव की पट्टी महसूस होती है। उससे वह मानसिक रूप से पुनः तरोताजा हो जाता है। ये इन्हीं नाड़ियों की क्रियाशीलता से अनुभव होता है। आप इसे अभी भी करके अनुभव कर सकते हो। वास्तविक व त्वरित दैनिक अभ्यास के दौरान कोई नाड़ी महसूस नहीं होती। केवल ये चार चक्र महसूस होते हैं, और कुंडलिनी सहस्रार चक्र में महसूस होती है। इड़ा नाड़ी अर्धनारीश्वर देव के स्त्री भाग का प्रतिनिधित्व करती है। पिंगला नाड़ी उनके आधे और पुरुष भाग का प्रतिनिधित्व करती है। सुषुम्ना नाड़ी दोनों भागों के मिलन या विवाह का द्योतक है। मूलाधार से मस्तिष्क तक सबसे ज्यादा ऊर्जा का वहन सुषुम्ना नाड़ी करती है। तभी तो तांत्रिक योग के समय सहस्रार का ध्यान करने से मूलाधार एकदम से संकुचित और शिथिल हो जाता है। दैनिक लोकव्यवहार में आपने भी महसूस किया होगा कि जब मस्तिष्क किसी और ही काम में व्यस्त हो जाता है, तो कामोत्तेजना एकदम से शांत हो जाती है। बेशक वह ऊर्जा सुषुम्ना से गुजरते हुए नहीं दिखती, पर सहस्रार तक उसके गुजरने का रास्ता सुषुम्ना से होकर ही है। सुषुम्ना से ऊर्जा का प्रवाह तो यौगिक साँसों के विशेष और लम्बे अभ्यास से अनुभव होता है। वह भी केवल कुछ क्षणों तक ही अनुभव होता है, जैसा आसमानी बिजली गिरने का अनुभव क्षणिक होता है। पर इसको अनुभव करने की आवश्यकता भी नहीं। महत्त्वपूर्ण तो कुंडलिनी जागरण है, जो इसके अनुभव के बिना ही होता है। यदि आप सीधे ही फल तक पहुंच पा रहे हो, तो पेड़ को देखने की क्या जरूरत है। सम्भवतः इसी से यह कहावत बनी हो, “आम खाओ, पेड़ गिनने से क्या लाभ”। इड़ा और पिंगला से भी ऊर्जा आज्ञा चक्र तक ऊपर चढ़ती है, पर सुषुम्ना जितनी नहीं।

Kundalini science is the backbone of most of the religious beliefs

Travel paths of Ida, Pingala and Sushumna

Friends, Kundalini science is the backbone of all religions. All religious beliefs are based on it. I will explain this principle by giving some examples of some of the traditional beliefs of Hindu religion along with some practical know-how of Kundalini yoga. Although these beliefs look pity, but these convey a great practical message of Kundalini yoga.

Centralizing the Kundalini with the toe touching the heel

According to this belief, if a heel of a man’s foot is hit by another man’s foot from behind, then other heel is also to be kicked in the same way. It makes both people auspicious. In fact, with the hit on the foot of one side of body, the Kundalini becomes more active on that side of the body as the Kundalini pursues sensation. When the same sensation arises in the foot on the other side of the body, then the Kundalini starts going to the other side. This brings her to the center of the body, i.e. the spinal cord. This makes a man balanced, which makes him auspicious in every way. The other man also gets the benefit of this effect, because what’s karma, that’s the fruit. I have seen this happen myself.

One or odd sneeze is inauspicious, but two or even sneezes are considered auspicious

The same Kundalini principle works behind this as well. The sensation of a sneeze activates only one side of the brain. Imagine that the left side becomes active. This means that at that time the thinking of man was limited, linear or logical. Because the two parts of the brain constantly communicate among themselves, it is sure that it will alert the right side. When the second sneeze occurs, the right part of the brain becomes active with it. This makes a man’s thinking unlimited or logical. This causes the Kundalini or Awareness to revolve in both parts of the brain and become centered in the middle of the brain. On this central line, Sahasrara and the Ajna chakras are situated. This leads to fullness, balance and joy.

The inner marriage of the brain with itself is the form of Ardhanarishvara god or Shiva Vivah

The right and left parts of the brain keep on working turn by turn. This happens through the permanent contact route between them. This neuronal pathway is called the corpus callosum. In which people it’s not there due to any disease etc., these continue to work continuously as separate units for a long time. These people are unable to do their work properly due to lack of mutual coordination between both halves of their brain. In normal person, left brain works for some time. It performs everyday tasks efficiently by staying within a rational, limited, and practical scope. But man gets tired of the glare of its thoughts in a short time. Then the body comes under the control of the right brain. Its work style is unlimited, irrational or illogical, emotional, compassionate and investigative in nature like an open sky. Because there is no dazzle of thoughts that bind man in a limited range, so it is having darkness. By staying in it, as soon as the old fatigue of a man’s thought processes is over, this part stops, and the left part starts again. This cycle goes on continuously. The time interval of job transfer may vary according to activity level of a man and his spiritual interest. Now the point is, to make both parts of the brain work together equally. This is the arrival of the Kundalini in the central line or sushumna. With this, the Kundalini Shakti means the vital force is divided equally in both the parts, and makes the whole brain functional. The same is also felt during Kundalini awakening, when instead of a particular area, the whole brain becomes conscious, active and vibrating equally. We can also call this as the internal union of Ardhanarishvara or Shiv Vivaha. It can also be said that the left part of the body is married to the right part. In Hinduism, the left part of Shiva named Ardhanarishvara is shown as female goddess and the half right side as male god. Kundalini picture tries to be in the left brain, that’s why Kundalini has been given a feminine form. You see, everyone has natural instinct to be always submerged inside the pool of glistening thoughts. This instinct is to be overcome through regular practice of shifting awareness to empty sky of right brain. An attempt is made to bring it to the center through Kundalini yoga. A person becomes a complete human being only by the centralization of Kundalini. By this, there is logical practicality in him, as well as irrational emotionality and discovery mind too along with . This means that advaita or non duality is born there, because without advaita it is not possible to coexist with two opposing qualities. In the same way, by directly maintaining the advaita bhava from physiology philosophy or sharirvigyan darshan or Puranas, the clarity of Kundalini is increased in the mind. To keep the two opposing qualities together in the mind or to keep the Kundalini through Kundalini Yoga requires a lot of vital energy. That is why I have laid a lot of emphasis on balanced diet and balanced life for yoga in the last post. In beginning, while doing Kundalini yoga, I used to rotate the Kundalini around the head at the level of the sahasrar chakra and ajna chakra in the brain, as if a farmer is running a plow in a circular field. With this, my whole brain would become active, and Kundalini would be centered with bliss. I also noticed that drawing water from one nose and removing it from the other nose also helps the Kundalini to centralize. This is called Jal Neti. For this, the water should be lukewarm, and mildly salty, otherwise plain and cold water irritates the mucous membrane of the nose.

Ida, Pingala and Sushumna nadis are the only three nadis necessary for Kundalini awakening

During the practice of Kundalini Yoga, there are three sensation paths in the back. The nadis are actually subtle sensory pathways, which can only be experienced. In physical form, I do not see these in my body. They may also be in physical form. This is a research topic. A sensation ascends through the left side of the back, and ends at the command ajna chakra after passing through the left brain. The second sensational path likewise passes through the right part of back and the brain, which is also completed on the ajna chakra. One is Ida and the other is Pingala Nadi. In the middle of these two and right in the middle of the spinal cord, the third channel passes to the Sahasrara, which is in the middle of the back and brain. This is the sushumna channel. Unlike the usual diagrams, I find Ida and pingala more lateral that’s towards the margins of back. May be it a short practice effect. Actually, feeling matters more than the theoretical principles in Yoga. Kundalini awakening is done by the Kundalini climbing through this channel. Even if Kundalini is climbing up through Ida or Pingala channel, it should not be interfered, because Kundalini is beneficial in every situation. She should also not be forced to travel through the sushumna channel, because Kundalini does not like force much. Kundalini is happy with surrender. When she is climbing through Ida or Pingala, along with her meditation, Mooladhara or swadhishthan chakra and ajna Chakra should also be meditated together. With this, she comes into the sushumna channel, or after climbing in the channel of the opposite side in the back for a while, she starts climbing in the spinal cord or sushumna channel. This causes Kundalini to be expressed in Sahasrar. Along with this, there is also the attainment of bliss with the balance of body and mind. Kundalini is not taken down from the Sahasrara to the Ajna Chakra, hence the end of the Sushumna Nadi is depicted in the Sahasrara Chakra. In fact, keeping Kundalini in Sahasrar and awakening it there is the primary goal of Kundalini Yoga. All spiritual qualities are manifested by this. The Sahasrara Chakra connects the body to the universe. It is the most spiritual chakra, which is connected to the soul on one side, and the divine or God on the other side. Sahasrara has great ability to withstand the pressure of the Kundalini. It seems that Sahasrara’s itching is being erased by the Kundalini, and one is having joy of this. However, if there is unbearable pressure, then the Kundalini can be brought down to ajna chakra and to the lower body through the front channel. However, it appears more difficult and messy as compared to bringing down through Ida or pingala. However, it is helped by keeping the inverted tongue touched with the soft palate.That is why the end of Ida and Pingala is depicted in the ajna chakra, but the end of sushumna channel is depicted in Sahasrara chakra. If you concentrate together on the Muladhar and the ajna chakra, then the Kundalini runs through the Ida channel. If you meditate together on the Swadhisthana Chakra and the ajna Chakra, then the Kundalini is transmitted through the Pingala Nadi. This means that meditating ajna chakra, swadhishthan chakra and Muladhar Chakra, all three together would make Kundalini run through the Sushumna channel up to sahasrar or it will reach the sahasrar chakra directly. This is also shown in the picture. You can see that Kundalini has reached the Sahasrara Chakra without the participation of the Sushumna Nadi. Passing through Ida and Pingala, Kundalini join together at the ajna chakra. From there, she climbs up through the left and right brain and gathers at Sahasrara. It also feels like this. A thick wave filled with pressure in the brain on both sides goes up and feels connected in Sahasrara. That’s why both of these short channels are shown in the picture as thick bands. When the Kundalini is to be lowered down from sahasrar chakra through the front channel, it is through these same band shape short channels that it is lowered from Sahasrara to the ajna Chakra, and down from there. You must have noticed, when a man is mentally exhausted, he rubs his forehead, and also constricts his eyes and forehead. This gives him a feeling of passing of some gushing fluid through both sides of the forehead. That makes him mentally rejuvenated. It is experienced by the functioning of these channels. You can experience it by doing this just now. In real and casual practice, none of these channels are experienced only these four chakras together with Kundalini at sahasrar chakra is experienced. The Ida Nadi represents the female part of Ardhanarishvara Dev that’s half man half woman god. The Pingala channel represents right half of his body that’s the male god part. The sushumna nadi signifies the union or marriage of the two parts. Sushumna channel carries the most of the energy from the Muladhar Chakra to the brain. That is why, by meditating on Sahasrara during Tantric Yoga, the Muladhar Chakra becomes fully shrunk and loose. In daily folklore, anyone too must have realized that when the brain gets busy with some other work, the sexual arousal becomes completely calm. Of course, that energy is not seen passing through the spinal cord, but the path of its passage to Sahasrara is through the spinal cord or sushumna only. The flow of energy through the spinal cord is experienced through special and long practice of yoga breathings. That too is experienced only for a few moments, as the experience of falling lightning is momentary. But there is no need to experience it. Important is the Kundalini awakening, which happens without its experience. If you are able to reach the fruit directly, then what is the need to see the tree. Probably it may be the source of origination of this Hindi saying, ” Eat the mangoes, don’t count the trees”. Energy also ascends through the Ida and Pingala channels  that terminate in ajna chakra, but not as much as through the Sushumna channel.

कुंडलिनी एक पक्षी की तरह है जो खाली और खुले आसमान में उड़ना पसंद करता है

मित्रो, योग या अध्यात्म को उड़ान के साथ संबद्ध करके दिखाया गया है। आध्यात्मिक शास्त्रों में विमानों का वर्णन अनेक स्थानों पर आता है। कई जगहों पर योगियों को आसमान में उड़ते हुए दिखाया गया है। आत्मा को पंछी की उपमा दी गई है। आज हम इस पर वैज्ञानिक चर्चा करेंगे।
आत्मा और आकाश में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है
दोनों ही त्रिआयामी हैं। दोनों ही सर्वव्यापी हैं। आत्मजागृति के दिव्य अनुभव के दौरान आदमी अपने को प्रकाशमयी आनंदमयी, सर्वव्यापक, व चेतनापूर्ण आकाश के रूप में अनुभव करता है। इसी तरह, मृतात्मा से साक्षात्कार के समय भी आदमी अपने को आकाश की तरह अनुभव करता है। हालाँकि उसमें प्रकाश, चेतना व आनन्द के गुण बहुत कम होते हैं। इसलिए वह रूप चमकते काजल की तरह प्रतीत होता है। फिर भी वह रूप सर्वव्यापक होता है।

 आदमी का मन हमेशा से ही आसमान में उड़ने को ललचाता रहा है

इसका कारण यही है कि आत्मा आकाश जैसे रूप वाली होती है। हर कोई अपने जैसे गुण स्वभाव वाले से मैत्री करना चाहता है। इसीलिए हरेक आदमी आकाश में भ्रमण करना चाहता है। यही कारण है कि वायुयान में बैठकर आनन्द मिलता है। जब मैं विमान में बैठा था, तो मेरे मन में आनंद के साथ कुंडलिनी क्रियाशील हो गई थी। इसी तरह, मैं एकदिन परिवार के साथ पतंग का मजा लेने एक खाली मैदान में चला गया। बच्चे ऊंचे आसमान में पतंग उड़ा रहे थे, और मैं जमीन पर दरी बिछा कर उस पर लेट गया, ताकि बिना गर्दन मोड़े पतंग को लगातार देख पाता। मैं लगभग डेढ़ घंटे तक पतंग को बिना थके देखता रहा। उस दौरान मेरे मन में आनन्द से भरे शांत विचारों के साथ कुंडलिनी क्रियाशील बनी रही। कई बार तो ऐसा लगा कि मैं खुद ही पतंग पर बैठ कर ऊंचे आसमान में उड़े जा रहा हूँ। कई दिन तक वह आनन्द मेरे मन में बना रहा, और साथ में उमंग भी छाई रही। काम-काज में भी अच्छा मन लगा रहा। इसी तरह, पहाड़ों में भी कुंडलिनी आनंद बढ़ जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पहाड़ भी आकाश की तरह थ्री डायमेंशनल हैं, हालाँकि उससे थोड़ा कम हैं। पहाड़ों में भी आदमी हर प्रकार से गति कर सकता है। वह आगे-पीछे भी जा सकता है, और ऊपर नीचे भी चढ़ सकता है।

आत्मारूपी आकाश के उपलब्ध होते ही कुंडलिनी पक्षी उसमें उड़ान भरने लग जाता है

शरीरविज्ञान दर्शन या अन्य अद्वैतशास्त्र से जब मन में आकाश जैसी शून्यता छाने लगती है, तब कुंडलिनी उसमें एक उड़ते हुए पक्षी की तरह अनुभव होने लगती है। साथ में आकाश में उड़ने के जैसा आनन्द तो होता ही है। उस समय आत्मा तो बैकग्राउंड के अंधकारमयी व शून्य आकाश की तरह होती है, केवल कुंडलिनी ही प्रकाशरूप पक्षी की तरह अभिव्यक्त होती है। इसलिए शास्त्रों में कुंडलिनी को आत्मा या पक्षी के रूप में माना गया है। कुंडलिनी आत्मा का संपीडित या लघु रूप है। जैसे साँप कुंडलिनी मार कर छोटा हो जाता है, उसी तरह आत्मा भी। इसीलिए इसे कुंडलिनी कहते हैं। जब कुंडलिनी आत्मा से जुड़कर सर्वव्यापक हो जाती है, तब उसे ही सांप का कुंडलिनी खोलकर अपने असली और विस्तृत रूप में आना कहते हैं। इसी तरह, आकाश से संबंध होने पर भी मन में आकाश जैसी अद्वैतमयी शून्यता खुद ही छाने लगती है। उससे भी वही कुंडलिनी प्रभाव पैदा होता है, जिससे मन उसी तरह आनन्द से भर जाता है। इसीलिए उपरोक्तानुसार, शास्त्रों में योगियों को आसमान में उड़ते हुए दिखाया गया है, तथा विमानों का बहुतायत में वर्णन किया गया है। 

कुंडलिनी ही भ्रमित आत्मा का दीपक है

अद्वैत के ध्यान से मन आकाश की तरह शून्य व निश्चल तो बन जाता है, पर उसका आंनद व प्रकाश गायब हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आनन्द व प्रकाश मन के विचारों के साथ होते है। ये विचारों के साथ ही गायब हो जाते हैं। इन्हीं की भरपाई करने के लिए ही एकाकी चित्र रूपी कुंडलिनी मन में क्रियाशील हो जाती है। यह दीपक की तरह काम करती है, और विचारशून्य मन या आत्मा को आनंदपूर्ण प्रकाश से भर देती है। लम्बे समय के कुंडलिनी योग अभ्यास से एक समय ऐसा भी आता है जब आत्मा का अपना खुद का नैसर्गिक प्रकाश पैदा हो जाता है। फिर तो वहाँ कुंडलिनी दीपक की रौशनी भी फीकी पड़ जाती है। पर ऐसा साधना के सबसे ऊंचे व अंतिम स्तर पर ही होता है। इसे ही असम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं।

कुंडलिनी ही आत्मा की भौतिक प्रतिनिधि है

आत्मा तो आकाश की तरह शून्य होती ही, पर उसके विपरीत चेतनापूर्ण होती है, पर दुनियादारी में रहने से उस पर माया या भ्रम का दुष्प्रभाव पड़ता है। इससे उसका चेतन प्रकाश गायब हो जाता है। जब आदमी अद्वैत भावना से आत्मा में लौटने का प्रयास करता है, तो वहाँ कुंडलिनी प्रकट हो जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अद्वैत से उत्पन्न निर्विचार अवस्था से मस्तिष्क में न्यूरोनल एनर्जी इकट्ठी हो जाती है, जो आमतौर के विचारों को बनाती है। उस न्यूरोनल एनर्जी को बाहर निकलने का आसान रास्ता कुंडलिनी के रूप में ही नजर आता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उसके लिए मस्तिष्क को निश्चय नहीं करना पड़ता है कि कुंडलिनी चित्र कैसा है, क्या इसके बारे में विचार करना चाहिए, इसको विचारने के क्या परिणाम होंगे आदि। इसकी वजह है, कुंडलिनी चित्र से लम्बे समय से संबंध बना होना। यह संबंध प्रेम आदि के रूप में प्राकृतिक भी हो सकता है, और योग आदि के रूप में बनावटी भी। वही कुंडलिनी चित्र आत्मा को उसके प्रकाश, चेतना आदि के स्वाभाविक गुण प्रदान करता है। उस समय यिन के रूप में आत्मा होती है, और यांग के रूप में कुंडलिनी। हालांकि ऐसा हमें सांसारिक भ्रम के कारण लगता है। असल में तो यिन के रूप में कुंडलिनी और यांग के रूप में आत्मा होती है। इन दोनों का जुड़ाव ही शिवविवाह है। जब यह पूरा हो जाता है, तो यही कुंडलिनी जागरण या आत्मसाक्षात्कार कहलाता है। उस समय कुंडलिनी की चेतना पूरे आत्म-आकाश में छा जाती है, और दोनों पूरी तरह एक-दूसरे में घुले-मिले प्रतीत होते हैं। कुंडलिनी को आत्मा का भौतिक प्रतिनिधि इसीलिए कहा जा रहा है, क्योंकि वह बेशक एक सीमित व एकाकी चित्र के रूप में है, और भौतिक बाध्यताओं से बंधी है, पर उसमें आत्मा के सभी चेतनामयी गुण विद्यमान हैं। वही आत्मा को उसके अपने असली चेतनामयी गुणों की याद दिलाती है। पर ऐसा अभ्यास से होता है। इसीलिए कुंडलिनी को योग, प्रेम आदि से हमेशा बना कर रखा जाता है।

Kundalini is like a bird that likes to fly in the empty and open sky

Friends, yoga or spirituality has been shown to be associated with flying. The description of planes appears in many places in the spiritual scriptures. Yogis have been shown flying in the sky at many places. The soul has been given the metaphorical form of bird. Today we will discuss it scientifically.

There is basically no difference between the soul and the sky

Both are three-dimensional. Both are ubiquitous. During the divine experience of self-awareness, man experiences himself as a glaring, blissful, all-pervasive, and conscious sky. Similarly, at the time of encounter of the departed soul, the man feels himself like the sky. However, it has very few qualities of light, consciousness and bliss. Therefore, that form appears like a glowing mascara. Yet that form is ubiquitous.

Man’s mind has always been tempted to fly in the sky

The reason for this is that the soul is sky-like. Everyone wants to befriend someone like him. That is why every man wants to travel in the sky. This is the reason why you get pleasure sitting in an airplane. When I was sitting in the plane, Kundalini became active with pleasure in my mind. Likewise, I went to an empty field to enjoy kite with my family one day. Children were flying kites in the high sky, and I lay on the ground facing sky over a mat, so that I could see the kite continuously without turning my neck. I kept watching the kite without getting tired for about an hour and a half. During that time Kundalini remained active, with quiet thoughts and old memories slowly creeping with bliss in my mind. Many times I felt like sitting on that kite myself and flying in the high sky. For many days, that bliss remained in my mind, and along with it, the zeal also dominated. There was a good mood in work as well. Similarly, Kundalini bliss increases in the mountains as well. This is because the mountains are also three dimensional like the sky, although slightly less than that. Even in the mountains, man can move in every way. He can also move back and forth, and can also climb up and down.

Kundalini bird starts flying in the sky as it becomes available

When with sharirvigyan darshan or other nondual philosophies, the emptiness of the sky begins to settle in the mind, then Kundalini starts to appear like a flying bird in it. Together, there is bliss as like flying in the sky. At that time the soul is like the dark and void sky of the background, and only the Kundalini expresses like a glistening bird in the sunny sky or as a piece of light. Hence the soul that has been considered as a bird in the scriptures, that’s actually Kundalini. Kundalini is the compressed or short form of the soul. As the snake becomes smaller by coiling into a tight spiral, so too the soul. That is why it is called Kundalini that literally means coiled into spiral. When the Kundalini joins the soul fully and becomes universal, then it is called the opening of the coil of the snake and coming to its real and detailed form. In the same way, when one becomes connected to the sky, the nondual emptiness like the sky starts filling the mind. That also creates the same Kundalini effect, which fills the mind with bliss in the same way. That is why, as mentioned above, in the scriptures, yogis are shown flying in the sky, and planes are described in abundance.

Kundalini is the lamp of the deluded soul

The mind becomes void and calm like the sky due to the meditation of non duality, but its bliss and light disappears. This happens because joy and light are with the thoughts of the mind. They disappear with thoughts. To compensate for these, the Kundalini in the form of a lonely picture becomes active in the mind. It acts like a lamp, and fills the thoughtless mind or soul with joyful light. Through the long-term Kundalini yoga practice, there comes a time when the soul produces its own natural light. Then the light of the Kundalini lamp also fades there. But this happens only at the highest and last level of spiritual practice. This is called asamprajnata samadhi.

Kundalini is the physical representative of the soul

The soul is zero like the sky but full of consciousness as opposed to it, although by being in worldliness, it has to bear its ill effects of illusion. This causes its conscious light to disappear. When man tries to return to his primitive soul with advaita spirit, then Kundalini appears there. This is because the neuronal energy in the brain is gathered from the thoughtless state generated by Advaita, which usually produces thoughts. The easy way to get that neuronal energy out is through Kundalini thought or picture. This happens because for that the brain does not have to decide what the Kundalini picture is like, should it be thought about, what will be the consequences of thinking it, etc. This is because of the long association with the Kundalini picture. This relationship can be as natural as love etc., and also artificial in the form of yoga etc. The same Kundalini picture tries to give the soul the natural qualities of its light, consciousness, etc. At that time the soul is in the form of Yin, and Kundalini as Yang. However this seems to us due to worldly illusion. In fact, it’s just opposite, there is Kundalini in the form of Yin and the soul in the form of Yang. The union of these two is Shivvihiva or Shiva marriage. When it is completed, it is called Kundalini awakening or Self Realization. At that time, the consciousness of Kundalini envelops the whole self-sky, and the two seem to be completely mingled with each other. Kundalini is said to be the physical representative of the soul, because it is undoubtedly a limited and solitary image in the limited brain, and is bound by physical constraints, but it has all the conscious qualities of the soul. The same reminds the soul of its true real qualities. But it happens through practice. That is why Kundalini is always remembered through yoga, love, etc.

कुंडलिनी के लिए वामपंथी तंत्र के यौगिक पंचमकारों की संभावित अहमियत, जिनसे प्रकृति के तीनों गुण संतुलित रहते हैं

मित्रो, पिछले हफ्ते हमने पंचमकार और उनसे उत्पन्न तमोगुण के बारे में बताया था। पंचमकारों का वर्णन हमने पुरानी पोस्टों में भी किया है। दरअसल पंचमकार वामपंथी तांत्रिक के प्रमुख हथियार हैं, कुंडलिनी का शिकार करने के लिए। ये पांच चीजें हैं, जिनके नाम अक्षर म से शुरु होते हैं। ये हैं, मैथुन, माँस, मद्य, मत्स्य एवं मुद्रा। पांचवा पंचमकार, मुद्रा वास्तव में कुंडलिनी योग ही है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि पंचमकार को लेकर इन भौतिक चीजों या भावनाओं के सांसारिक रूपों के साथ भ्रमित नहीं होना चाहिए। ये केवल तभी पंचमकार बनती हैं, जब ये पूरी तरह से एक योग्य गुरु के मार्गदर्शन में आध्यात्मिक भावना व साधना के साथ होती हैं, और अधिकतम आध्यात्मिक लाभ के लिए न्यूनतम राशि में उपयोग की जाती हैं। ऐसा नहीं करने पर, पंचमकार हानिकारक भी हो सकते हैं। पंचमकार शुरू में द्वंद्व या द्वैत पैदा करते हैं। फिर इसे विभिन्न ध्यान तकनीकों और वेदों-पुराणों या शरीरविज्ञान दर्शन जैसे अद्वैतमयी दर्शन-सिद्धांतों के साथ अद्वैत में परिवर्तित किया जा सकता है। दरअसल, अद्वैत का अपना अलग अस्तित्व नहीं है। यह केवल द्वैत का निषेध है। यह द्वैत है, जिसका अपना अस्तित्व है। इसलिए, हम सांसारिक भागीदारी के माध्यम से केवल द्वैत को ही पैदा कर सकते हैं। हम अद्वैत का उत्पादन सीधे नहीं कर सकते हैं, लेकिन केवल द्वैत के निषेध के माध्यम से ही कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, द्वैत सबसे पहले प्राप्त होने वाली आधार वस्तु है। यदि हमारे पास द्वैत नहीं है, तो हम नकारात्मक शब्द ‘अ’ को उस पर कैसे लागू करेंगे। अद्वैत के संबंध में व्यापक गलतफहमी दिखाई देती है। हम द्वैत की पूर्ण उपेक्षा करते हुए अद्वैतमयी नहीं बने रह सकते हैं। ये दोनों भावनाएँ साथ-साथ चलती हैं। हम इस पोस्ट में किसी चीज या जीवन के किसी  विशेष तौर-तरीके की वकालत नहीं कर रहे हैं। हम केवल वैज्ञानिक सत्य को पाठकों के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं।

दुनिया की नजरों में पंचमकारों को पापपूर्ण माना जाता है

इसका एक कारण यही है, जो पिछली पोस्ट में बताया था। ये तमोगुण पैदा करते हैं। दूसरा कारण यह है कि इसमें हिंसा कर्म छुपा होता है। कर्म का फल तो मिलता ही है। पर वह कर्म के हिसाब से ही मिलता है, मनमर्जी से नहीँ। शास्त्रीय मिथक कथाओं के अनुसार अधिकांश लोग समझ लेते हैं कि उससे मृत्युदंड मिल जाएगा अथवा भयानक नरकों में घोर यातनाएं झेलनी पड़ेंगी, क्योंकि सभी पाप या हिंसाएं बराबर हैं। पर ऐसा नहीं होता। ये सिर्फ आध्यात्मिक उक्ति ही है, भौतिक या व्यावहारिक नहीं। छुटपुट पापकर्म के छुटपुट फल मिलते रहते हैं, जो आम प्रगतिशील या मेहनतकश जनजीवन में वैसे भी देखे जाते हैं, जैसे बीमार होना, पैर फिसलना, मोच आना, हादसे की संभावना बढ़ जाना आदि। पर ज्यादातर मामलों में बचाव हो जाता है। पंचमकारों से मिली शक्ति से आदमी दुनियादारी के कामों में ज्यादा निमग्न रहने लगता है। इससे स्वाभाविक रूप से जो छुटपुट बीमारियाँ, शारीरिक कष्ट व मानसिक कष्ट पैदा होते हैं, वे ही उनके पाप के फल के रूप में होते हैं। उनसे पंचमकारों का पाप नष्ट होता रहता है, और दुनिया के काम धंधे भी तरक्की करते रहते हैं। इसलिए ऊर्जा का अधिक से अधिक सदुपयोग इस तरह से करना चाहिए कि उसके लिए कम से कम पाप करना पड़े। यही कर्म प्रबंधन है। यही योग है।

आजकल पंचमकारों के बिना कुंडलिनी योग करना मुश्किल प्रतीत होता है

मैं एक ब्लॉग में एक युवक के योग अनुभव के बारे में पढ़ रहा था। वह उसके लिए शुद्ध शाकाहारी बन गया था। एक बार संभवतः वह ऐमजॉन के जंगल में अपने किसी जाने पहचाने व्यक्ति के पास रहने लगता है। वहाँ वह मछली से परहेज करके चावल की ढेरी में एक गड्ढा सा बनाकर उसमें डालने के लिए दाल की मांग करता है। उसके परिचित की हंसी रुकने का नाम ही नहीं लेती। इससे शर्मिंदा होकर वह नॉनवेज योगी बन जाता है। इसका मतलब है कि जैसा देश, वैसा भेष। संतुलित आहार लेना योगी के लिए बहुत जरूरी है, क्योंकि योग के लिए ऊर्जा की सख्त जरूरत होती है। योग का दूसरा नाम संतुलन या संतुलित जीवन भी है। इससे जीवन में संतुलित आहार की अहमियत का पता चलता है। हम भोजन के संतुलन को केवल पोषक तत्त्वों के संतुलन तक ही सीमित समझते हैं। पर वास्तव में यह संतुलन भोजन की प्रकृति के गुणों तक भी एक्सटेंड होना चाहिए। एक आदमी को शाकाहार से सभी जरूरी पोषक तत्त्व मिल सकते हैं, पर उसे प्रकृति का तमोगुण मांसाहार से ही मिलेगा। कोई चाहे तो स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाए बिना सीमित मदिरा का प्रयोग भी आवश्यक तमोगुण की प्राप्ति के लिए कर सकता है। यह सभी को मालूम है और जैसा कि इस ब्लॉग की पिछली पोस्टों में सिद्ध किया गया है कि जीवन के संतुलन के लिए मन के अंदर प्रकृति के तीनों गुण संतुलन में होने चाहिए। ये गुण एक दूसरे के पूरक तभी बनते हैं, जब संतुलन में होते हैं, अन्यथा ये एक दूसरे के अवरोधक बन जाते हैं। ये सभी जानते हैं कि आहार से ही मन बनता है। एक प्रसिद्ध लोकोक्ति भी है कि “जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन”। इससे आहार में प्रकृति के तीनों गुणों के संतुलित मात्रा में होने की अहमियत का पता चलता है। तभी कहते हैं कि बिन खाए भजन न हो गोपाला। आयुर्वेद के वात, पित्त और कफ भी प्रकृति के क्रमशः सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण हैं। इनके संतुलन से स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है। पतंजलि ने यम और नियम में जो अहिंसा शब्द डाला है, उसका मतलब है कि बिना उच्च प्रयोजन के हिंसा न हो। यदि शरीर को पुष्ट व नीरोग रखने के लिए हल्की-फुल्की हिंसा के रूप में हल्का-फुल्का हेल्दी नॉनवेज जैसे कि मछली, अंडा न लिया जाए तो यह भी शरीर के प्रति हिंसा होगी। उससे भी योग का यम और नियम कहाँ सिद्ध हो पाएगा। मानव शरीर के प्रति हिंसा तो सबसे बड़ी हिंसा होती है। पतंजलि बहुत लम्बी सोच रखते थे, इसलिए शाकाहार-मांसाहार के झमेले में पड़ने की बजाय उन्होंने अहिंसा शब्द जोड़ दिया। समझने वालों के लिए यह बहुत है। अब यदि विज्ञान के हिसाब से शरीर की जरूरत को आंका जाए तो एक आदमी को हफ्ते में केवल दो ही दिन और एक दिन में करीब 70-100 ग्राम मांस की जरूरत होती है। इससे ज्यादा हानिकारक हो सकता है। इससे कम से शरीर को हानि पहुंच सकती है। मैंने बहुत से योगी लोग देखे हैं, जिन्हें 15 दिन बाद, कइयों को 1 महीने बाद, तो कइयों को 3 महीने बाद जरूरत महसूस होती है। कईयों को तो छः महीने के अंतराल पर नानवेज की जरूरत महसूस होती है। अब बताइए कि इससे पोषक तत्त्वों की क्या कमी पूरी होगी। इससे जाहिर है कि उससे आदमी के मन के तमोगुण की कमी पूरी होती है। इससे, अपने अंधकार प्रकार के आंतरिक स्वभाव से उसे भरपूर व ताजगी प्रदान करने वाली नींद भी आती है, जिससे उसके शरीर व मन की अच्छी मुरम्मत हो जाती है, और उससे वह स्वस्थ हो जाता है। शरीर अपनी जरूरत खुद बताता है। इसकी जरूरत होने पर योग में ध्यान कम लगने लगता है, चुस्ती कम हो जाती है, भूख घट जाती है, पाचन प्रणाली गड़बड़ाने लगती है, शरीर में कम्पन पैदा होने लगते हैं। व्यवहार में गुस्सा व चिड़चिड़ापन आ जाता है, अद्वैतभाव बना कर रखना मुश्किल हो जाता है, मन द्वैत के भंवर के अंदर भटकने लगता है, अवसाद जैसा हो जाता है, शरीर रोगी होने लगता है, डर सा लगने लगता है, सेक्स के प्रति रुचि नहीं रहती आदि बहुत से लक्षण पैदा हो जाते हैं। मन में सही तरीके से अद्वैत भाव बनाए रखने के लिए प्रकृति के तीनों गुणों का संतुलन बहुत जरूरी है। फिर यह सबको पता है कि जहां अद्वैत है, वहाँ कुंडलिनी भी है। वास्तव में आहार की कमी से शरीर और मन के हरेक हिस्से में कुछ न कुछ दुष्प्रभाव जरूर पैदा होता है। बहुत से लोग इन्हें नजरन्दाज करते हैं और बहुत से लोगों को इसका आभास ही नहीँ होता। नॉनवेज की खुराक पूरी होने से ये सभी खराब लक्षण एकदम से गायब हो जाते हैं। वैसे भी मछ्ली को सर्वश्रेष्ठ आमिष आहार माना गया है, क्योंकि इसमें बहुत से स्वास्थ्यवर्धक गुण हैं, और इसके कोई दुष्प्रभाव भी नहीँ हैं। तभी तो इसे पंचमकारों में विशेष रूप से शामिल किया गया है। इसके सेवन से पापकर्म भी बहुत कम होता है। वैज्ञानिक शोध से भी यह बात सामने आई है कि मछली को दर्द नहीं होता। यह उन्हें जालिम कुदरत से बचने के लिए कुदरत का ही दिया तोहफा है। वैसे तो सभी चीजों व भावों में प्रकृति के तीनों गुण विद्यमान होते हैं, पर किसी विशेष चीज में कोई विशेष गुण ज्यादा बलवान होता है। पंचमकारों को ही लें, तो मैथुन व मत्स्य में रजोगुण, मांस व मदिरा में तमोगुण, और मुद्रा में सतोगुण की अधिकता होती है। आजकल के प्रदूषण और अति भौतिकता के युग में शरीर की ऊर्जा की मांग बहुत ज़्यादा बढ़ गई है। ऐसे में सम्भवतः यौगिक पंचमकार ही मानव जाति का सही दिशानिर्देशन कर सकते हैं।

Kundalini may require the Yogic Panchamakaras of leftist Tantra to balance the three gunas of nature

Friends, last week we talked about the Panchamakaras and the tamoguna that originated from them. We have also described the Panchamakaras in old posts. It appears that it’s necessary to read previous post to understand this post fully. Actually, the Panchamakars are the main weapon of the leftist tantric to hunt for Kundalini. These are the five things whose names start with the letter M. These are sex (maithun in Sanskrit or Hindi), meat (maans), alcohol (Madira), fish (matsya) and mudra (typical sustained body posture). Fifth panchmakara, Mudra is actually Kundalini yoga. It’s important to note that Panchmakaras should never be confused with worldly forms of these material things or sentiments. These only become panchmakaras when these are fully accompanied with spiritual sentiment and practices in the guidance of a qualified Guru and are utilized in minimum amount for the maximum spiritual benefits. Not doing so, panchmakaras may turn harmful too. Panchmakaras initially produce duality. Then it can be converted to non duality with various meditation techniques and nondual philosophies like Vedas-puranas or sharirvigyan darshan. Actually, non duality has not its separate existence. It’s only the negation of duality. it’s the duality that has it’s own existence. Therefore, we can only produce duality directly through worldly indulgence. We can’t produce non duality directly but only through negation of duality. In other words, duality is the base thing to be attained first. To what we would apply the negation word ‘non’, if there is no duality. There appears wide spread misunderstanding regarding non duality. We can’t remain nondual while fully ignoring the duality. Both sentiments run together side by side. This post is not advocating any particular thing or method or lifestyle. We are only presenting the scientific truth to the readers.

Panchamakars are considered sinful in the eyes of the world

One of the reasons, which was mentioned in the previous post is that they produce tamoguna. The second reason is that in it violence karma is involved. You get the fruits of karma. But one only gets it according to karma, not according to his choice or thinking. According to classical mythology, most people understand that it will lead to death penalty or will have to face severe torture in terrible hells, because all types of sins or violence are equal. But this does not happen. This is only a spiritual expression, not a physical or practical one. Minor fruits of minor sins continue to be seen, which are ordinarily seen in the common progressive public in any way, such as getting sick, slipping foot, sprains, increase in the chance of an accident, etc. But in most cases, rescue takes place. The power from the Panchamakars makes the man more engrossed in worldly pursuits. Naturally the minor illnesses, physical pains and mental pains that arise from this are as the result of their sins. With them, the sin of the Panchamakaras is destroyed, and the business of the world also continues to progress. Therefore, the maximum use of energy should be done in such a way that one has to commit least sins for it. This is karma management. This is the Yoga.

Nowadays it seems difficult to do Kundalini yoga without Panchamakaras

I was reading about the yoga experience of a young man in a blog. He had become a pure vegetarian for yoga. Once he lives in the wilderness of Amazon as guest to someone he knows. There, he avoids the fish and asks for pulses to be put into a pit made by him in the rice pile in his plate. The laughter of his acquaintance does not take the name of stopping. Embarrassed by this, he becomes a non-veg yogi. It means habits and habitats are according to the country. Eating a balanced diet is very important for a yogi, because yoga requires a lot of energy. Yoga is the second name of balance or balanced life. It highlights the importance of balanced diet in one’s life. We consider the balance of food to be limited only to the balance of nutrients. But in fact, this balance should be extended even to the gunas of the nature or prakriti. A person can get all the necessary nutrients from vegetarianism, but he will get the Tamogun of nature only from the non-vegetarian. One can also use limited alcohol without any harm to health, to obtain the necessary tamoguna. It is known to all and as it has been proved in the previous posts of this blog that for the balance of life, the three gunas of nature should be in balance inside the mind. These gunas complement each other only when in equilibrium, otherwise they may become inhibitors of each other. All of us know that mind is formed by diet. There is also a famous saying that “What is grain, that is the brain”. This shows the importance of having all the three gunas of nature in a balanced amount in the diet. It is said that no worship without eating. Vata, Pitta and Kapha of Ayurveda are also Satoguna, Rajoguna and Tamoguna respectively of nature. Health remains good by balancing them. The word non-violence that Patanjali has inserted in Yama and Niyam of ashtanga yoga means that there should be no violence without a higher purpose. If non-veg such as fish, egg is not taken in the form of mild violence or sin to keep the body strong and healthy, then it will also be violence towards the body. From that, how will the yama and niyam of yoga be applied in Yoga. Violence against the human body is the greatest violence. Patanjali used to think very long, so instead of getting into the mess of vegetarian or non-vegetarian, he added the word non-violence. This is enough for those who understand. Now if according to science, the need of the body is judged, then a man only needs 70-100 grams of meat as doze of one day for two days in a week. It can be harmful for the body if this need isn’t fulfilled or even over fulfilled. Over fulfilling also produce unnecessary tamoguna or darkness. I have seen many yogis, who feel the need after 15 days, many after 1 month, and some after 3 months. Many feel the need for non veg at an interval of six months. Now tell what will be the deficiency of nutrients fulfilled by it. From this, it is clear that the deficiency of tamoguna of man’s mind is fulfilled by it. It also gives him full and refreshing sleep due to its inherent quality of darkness, which makes a good repair of his body and mind, and that makes him healthy. The body states its own need. When it is needed, meditation starts to decrease in yoga, agility is reduced, appetite decreases, digestive system starts messing up, tremors start to occur in the body. In behavior, anger and irritability comes, it becomes difficult to maintain non duality, the mind starts to wander inside the vortex of duality, it becomes like depression, the body starts getting sick, one starts to feel like fear, disinterest in sex. To maintain the advaita sentiment in the right way in the mind, the balance of the three gunas of nature is very important. Further added, where there is non duality, there is kundalini. Like these, many symptoms occur if body requirements remain unfulfilled. In fact, due to lack of diet, some side effects are produced in every part of the body and mind. Many people ignore them and many people are not aware of these. All these bad symptoms disappear immediately after the nutritional supplements are completed. Anyway, fish is considered the best diet, because it has many healthy properties, and also has no side effects. That is why it has been specially included in the Panchamakaras. Papakarma or sin is also very less due to its consumption. Scientific research has also revealed that the fish does not feel pain. It appears as a gift given to it by the nature to escape from the torture of the very same nature. Although all the three gunas of nature are present in all things and expressions, but in a particular thing, a particular guna is more powerful. Take Panchamakars, then there is excess of Rajoguna in sex and fish, Tamogun in meat and liquor, and Satoguna in Mudra or static gesture. In today’s era of pollution and hyper-physicality, the demand for energy of the body has increased a lot. In such a situation, perhaps only the leftist Yogic panchamakaras can guide mankind correctly.

कुंडलिनी ही शिव को भीतर से सत्त्वगुणी बनाती है, बेशक वे बाहर से तमोगुणी प्रतीत होते हों


दोस्तो, भगवान शिव के बारे में सुना जाता है कि वे तमोगुणी हैं। तमोगुण मतलब अंधेरे वाला गुण। शिव भूतों के साथ श्मशान में रमण करते हैं। अपने ऊपर उन्होंने चिता की भस्म को मला होता है। साथ में यह भी कहा जाता है कि भगवान शिव परम सतोगुण स्वरूप हैं। सतोगुण मतलब प्रकाश वाला गुण। इस तरह दोनों विरोधी गुण शिव के अंदर दिखाए जाते हैं। फिर इसको जस्टिफाई करने के लिए कहा जाता है कि शिव बाहर से तमोगुणी हैं, पर भीतर से सतोगुणी हैं। आज हम इसे तांत्रिक कुंडलिनी योग के माध्यम से स्पष्ट करेंगे।

कुंडलिनी ही शिव के सत्त्वगुण का मूल स्रोत है

दरअसल शिव तन्त्र के अधिष्ठाता देव हैं। उन्हें हम सृष्टि के पहले तांत्रिक भी कह सकते हैं। यदि हम तांत्रिक योगी के आचरण का बारीकी से अध्ययन करें, तो शिव के संबंध में उठ रही शंका भी निर्मूल हो जाएगी। वामपंथी तांत्रिक को ही आमतौर पर असली तांत्रिक माना जाता है। वे पाँच मकारों का सेवन भी करते हैं। बेशक शिव पंचमकारी नहीँ हैं, पर तमोगुण तो उनके साथ वैसे ही रहता है, जैसे पंचमकारी तांत्रिक के साथ। दुनिया के आम आदमी के अंदर इनके सेवन से तमोगुण उत्पन्न होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे इससे उत्पन्न ऊर्जा को संभाल नहीं पाते और उसके आवेश में गलत काम कर बैठते हैं। वे गलत काम तमोगुण को और अधिक बढ़ा देते हैं। पंचमकार खुद भी गुणों में तेज हलचल पैदा करते हैं, जिससे स्वाभाविक तौर पर तमोगुण भी उत्पन्न हो जाता है, आम दुनिया के अधिकांश लोग जिसके प्रभाव में आकर निम्न हरकत कर बैठते हैं। परन्तु एक तंत्रयोगी गुणों की हलचल को अपने कुंडलिनी योग की बदौलत हासिल अद्वैत भाव से शांत कर देते हैं। इससे उन्हें बहुत अधिक कुंडलिनी लाभ मिलता है, क्योंकि अद्वैत के साथ कुंडलिनी अक्सर रहती ही है। इससे कुंडलिनी तेजी से चमकने लगती है। तमोगुण से दबी हुई प्राण शक्ति और नाड़ी शक्ति जब कुंडलिनी को लगती है, तो वह जीवंत होने लगती है। यह वैसे ही होता है जैसे अंधेरे में दीपक या चिंगारी अच्छे से चमकते हैं। तभी तो भगवान शिव की तरह श्मशान में किया गया कुंडलिनी योगाभ्यास शीघ्रता से फलीभूत होता है। वैसे भी देखने में आता है कि तमोगुण की अधिकता में मस्तिष्क में विचारों की हलचल रुक सी जाती है। ऐसा किसी भय से, उदासी से, हादसे के नजदीक गुजरने से, तनाव से, अवसाद से, नशे से, तमोगुणी आमिषादि भोजन से, काम आदि से मन व शरीर की थकान से, आदि अनेक कारणों से हो सकता है। ऐसे समय में मस्तिष्क में न्यूरोनल एनर्जी का संग्रहण हो रहा होता है। इसमें जो बीच-बीच में इक्का-दुक्का विचार उठते हैं, वे बहुत शक्तिशाली और चमकीले होते हैं, क्योंकि उन्हें घनीभूत न्यूरोनल एनर्जी मिल रही होती है। योगी लोग इन्हीं विचारों को कुंडलिनी विचार में तब्दील करते रहते हैं। इससे सारी न्यूरोनल एनर्जी कुंडलिनी को मिलती रहती है। बुरे समय में भगवान या कुंडलिनी को याद करने से उत्पन्न महान लाभ के पीछे यही सिद्धांत काम करता है। इस तमोगुण के दौर के बाद सतोगुण व रजोगुण का दौर आता है। यह विचारों के प्रकाश से भरा होता है। दरअसल संग्रहीत न्यूरोनल एनर्जी बाहर निकल रही होती है। इसमें चमकीले विचारों की बाढ़ सी आती है। आम आदमी तो इनमें न्यूरोनल एनर्जी को बर्बाद कर देता है, पर योगी उन विचारों को कुंडलिनी मेँ तब्दील करके सारी एनर्जी कुंडलिनी को दे रहा होता है। योगी ऐसा करने के लिए अक्सर किसी अद्वैत शास्त्र की मदद लेता है। अद्वैत शास्त्रों में देवता संबंधी दार्शनिक पुस्तकें होती हैं, जैसे कि पुराण, स्तोत्र आदि। शरीरविज्ञान दर्शन भी एक उत्तम कोटि का आधुनिक अद्वैत शास्त्र है। वह अद्वैतशास्त्र को अपनी वर्तमान गुणों से भरपूर अवस्था के ऊपर पिरोता रहता है। वह इस सच्चाई को समझता रहता है कि उसके जैसी सभी अवस्थाएँ हर जगह व हर किसी में विद्यमान हैं। इससे शान्ति और आनन्द के साथ कुंडलिनी चमकने लगती है। वह कुंडलिनी, योग के माध्यम से सभी चक्रों पर भ्रमण करते हुए सभी को स्वस्थ और मजबूत करती है। पूरा तन और मन आनन्द व प्रकाश से भर जाता है। इस प्रकार जिन चीजों से आम आदमी के भीतर तमोगुण उत्पन्न होता है, उनसे तन्त्रयोगी के भीतर सतोगुण उत्पन्न हो जाता है। सम्भवतः यही वजह है कि दुनिया वालों को भगवान शिव बाहर से तमोगुणी दिखते हैं, पर असल में वे भीतर से सतोगुणी होते हैं। इससे यिन और यांग का मिलन भी हो जाता है, जिससे ज्ञान पैदा होता है। यिन तमोगुण है, और यांग सतोगुण।

Kundalini makes Lord Shiva Sattvaguni or light form in his mind, whereas he appears to be Tamoguni or dark form when viewed from outside

Friends, Lord Shiva is heard with saying that he is Tamoguni. Tamoguna means dark qualities. Shiva wanders with the ghosts in the crematorium. On top of his body, he massages the ash of cremation ground. It is also said that Lord Shiva is the ultimate Satoguna form. Satoguna means light qualities. In this way both opposing qualities are shown inside Shiva. Then it is said to justify that Shiva is Tamoguni from outside, but Satoguni from inside. Today we will clarify this through Tantric Kundalini Yoga.

Kundalini is the main source of Sattva component of Shiva

In fact, Shiva is the first Lord of Tantra. We can also call him the first Tantric of creation. If we study the conduct of the tantric yogi carefully, then the doubts arising in relation to Shiva will also disappear. Left Tantric are generally considered to be the real Tantric. They also consume five makaras or 5 Ms. Surely, Shiva is not a Panchmakarik, but Tamoguna stays with him just like with the Panchamakarik tantrik. Tamoguna arises through consumption of these panchamakaras inside the common men of the world. This is because they are unable to handle the energy generated by these and do wrong work in their charge. Those wrongdoings add more to Tamogun. The Panchamakaras themselves create a sharp movements or waves in gunas, which also naturally creates tamoguna in most of the people of the common world, under whose influence, they may take wrong step. But a Tantrayogi calms the stir of gunas with the advaita bhava or nondual sentiment achieved through his Kundalini Yoga. A yogi often seeks the help of an Advaita Shastra to do this. The Advaita scriptures contain philosophical books about the deity, such as Puranas, Stotras, etc. Physiology philosophy or sharirvigyan darshan in Hindi is also an excellent class modern Advaita literature. Yogi keeps advaita scripture overlaid on a state of his present gunas. He keeps on understanding the truth that all his conditions exist everywhere and in everything. This makes the Kundalini shine with peace and joy. This gives him a lot of Kundalini benefit, because Kundalini is living often with Advaita. This causes the Kundalini to shine faster. When Kundalini gets the life force and neuronal power suppressed by tamoguna, she starts to come alive. This occur just like candle or spark shining brilliantly in the dark. That’s why Kundalini yoga is quickly fruiting if practised in cremation ground as by Lord Shiva. Anyway, it is seen that in the plethora of Tamoguna conditions, the movement of thoughts is stopped in the brain. This may be due to any fear, sadness, passing near the accident, stress, depression, intoxication, tamoguni non veg food, work fatigue of mind and body etc. At such times, neuronal energy is being stored in the brain. In this, the thoughts which arise in between, they are very powerful and bright, because they are receiving condensed neuronal energy. Yogis keep converting these thoughts into single Kundalini thought. This keeps all the neuronal energy going to the Kundalini. The same principle works behind the great benefits generated by remembering God or Kundalini in bad times. After this Tamogun phase, thete comes Satogun and Rajoguna phase. It is filled with the light of thoughts. Actually stored neuronal energy is exiting. It is flooded with bright ideas. The common man wastes neuronal energy in them, but the yogi converts those thoughts into Kundalini and gives all the energy to the Kundalini. She travels on all the chakras through Kundalini yoga, and makes each of these healthy and strong. The whole body and mind is filled with joy and light. In this way, the things by which the tamoguna is produced within the common man, they produce the satoguna within the tantrayogi. Due to this very reason, the people of the world see lord Shiva as Tamoguni from outside, but basically he is Satoguni from inside. This also leads to the union of yin and yang, which leads to enlightenment. Yin is tamogun, and yang is satogun.

Kundalini awakening as the peak point reached, then the order of the universe’s development stops, and after some period of stability, the process of holocaust or Pralaya starts

Friends, I wrote in the previous post that Srishti or creation development is only for Kundalini development, and with Kundalini awakening, Srishti development completes and thereafter stops. Today we will discuss what happens after that. Actually, the event of holocaust also happens inside our body, not outside.

Description of Holocaust or Pralaya in Hindu Puranas

According to the Hindu Puranas, there are catastrophes when four eras have passed. The first era is Satyuga, the second era is Dwapara, the third is Treta, and the last age is Kali Yuga. There is a gradual decline of human beings in these ages. Satyuga has been described as the best and Kali Yuga as the worst. The order in which the creation of the world happens, in the same order, the holocaust also takes place. The five elements dissolve in the sense organs. The senses merge into the Tanmātras or subtle experiences. Panchatnamatras merge in ego. The ego merges in mahattattva or intellect. In the end, the mahattattva merges into nature. At the end of the disaster, nature also merge into God.

The four ages are in the form of the four stages of human life and the four ashramas

The childhood of man can be called the Satyuga. In this man would be free from all mental and physical disorders. He is as true as the deity. Then comes adolescence. It can be named Dwapara. In this, some disorder starts in the mind. The third stage is maturity age, in which a man becomes greatly depressed by the mess of worldliness. The last stage is that of old age. It is like Kali Yuga, in which darkness prevails due to distortion of mind and body. Similarly, the four ashrams or residencies of human life are also in the form of four yugas. Brahmacharya ashram can be called Satyuga, householder’s residency is Dwaparyuga, Vanaprastha is Tretayuga and Sannyasam Ashram is Kaliyuga. In fact the states are being matched from outside by looking at the Holocaust. In any state of body, a man can be at any higher level of mind.

Human death is depicted as a holocaust

As we clarified in the previous post that man can never know the world outside his mind. His world is limited to his mind. This means that then worldly creation and holocaust are also in the mind. This mental world is described in the Puranas. We fall into deception and understand it in the physical world outside. After Kundalini awakening or mental maturity, man’s attachment is not in the outside world. He lives with advaita bhava or non duality and detachment. We can call this the stability of the universe after its complete development. Then in the last days of his life, the process of holocaust starts in him. Due to weakness, he leaves the work of worldliness and keeps busy with the maintenance of his body. In a way we can say that the Panchamahabhutas or five elements merge into the senses. Then over time his senses also start to diminish. Due to weakness, his focus shifts from the senses to the inner mind. He cannot drink water with his hand. Others feed him with water in his mouth. He feels the juices of waters. Nearby attendants feed him food by putting food in his mouth. He feels the taste and smell of food. Families bathe him with their hands. He feels the touch of water. Others show him various pictures etc. He realizes their beauty. Others tell him Katha Kirtan or godly stories. He rejoices to feel their sweet and knowledge-filled voice. In a way, the senses merge into the Panchathanmatras or five subtle inner experiences. Even with the growing weakness, the man also has difficulty in experiencing the Panchatnamatras. Then his beloved brothers call him by name. This causes the flow of a little energy inside him, and he starts to enjoy himself. We can say that the Panchatnamatras merged in ego. With the further increase of weakness, the ego’s sense in him also starts to wane. He does not achieve agility even when called by name. With his intellect, he starts analyzing about his condition inside, it’s cause, it’s remedy and future outcome. In a way, the ego merges into the mahattattva or intelligence. After that, there is no energy to think even in the intellect. Man becomes like a lifeless. In that state he either goes into a coma or dies. We shall call this as mahattattva merging into nature. As mentioned in the previous post, at that stage all the gunas fall into equilibrium. Neither do they increase, nor decrease. They remain the same. In fact, it is the thoughtful brain that provides waves to increase and decrease the gunas of nature. It is a simple matter that when the brain itself is dead, then what will give the shock of thoughts to the gunas. Ignorant people go as far as nature. These types of people keep coming back and forth as birth and death again and again. The Enlightened one may goe one step further. They leave nature and merge into Purusha or God. All the gunas of nature cease there, and man becomes a form of light. There is no rebirth from there. This can be called as extreme holocaust or atyantik Pralaya.

कुंडलिनी जागरण ही सृष्टि विकास का चरम बिंदु है, फिर ब्रह्मांड के विकास का क्रम बंद हो जाता है, और स्थिरता की कुछ अवधि के बाद, प्रलय की प्रक्रिया शुरू हो जाती है

दोस्तों, मैंने पिछली पोस्ट में लिखा था कि सृष्टि का विकास केवल कुंडलिनी विकास के लिए है, और कुंडलिनी जागरण के साथ, सृष्टि का विकास पूरा हो जाता है, और उसके बाद रुक जाता है। आज हम चर्चा करेंगे कि उसके बाद क्या होता है। दरअसल, प्रलय की घटना हमारे शरीर के अंदर ही होती है, बाहर नहीं।

हिंदू पुराणों में प्रलय का वर्णन

हिंदू पुराणों के अनुसार, चार युग बीत जाने पर प्रलय होता है। पहला युग है सतयुग, दूसरा युग है द्वापर, तीसरा है त्रेता और अंतिम युग है कलियुग। इन युगों में मानव का क्रमिक पतन हो रहा है। सतयुग को सर्वश्रेष्ठ और कलियुग को सबसे बुरा बताया गया है। जिस क्रम से संसार का निर्माण होता है, उसी क्रम में प्रलय भी होता है। पंचतत्व इंद्रिय अंगों में विलीन हो जाते हैं। इंद्रियाँ तन्मात्राओं या सूक्ष्म अनुभवों में विलीन हो जाती हैं। पंचतन्मात्राएँ अहंकार में विलीन हो जाती हैं। अहंकार महात्त्व या बुद्धि में विलीन हो जाता है। अंत में, महातत्व प्रकृति में विलीन हो जाता है। आपदा के अंत में, प्रकृति भी भगवान में विलीन हो जाती है।

चार युग मानव जीवन के चार चरणों और चार आश्रमों के रूप में हैं

मनुष्य के बचपन को सतयुग कहा जा सकता है। इसमें मनुष्य सभी मानसिक और शारीरिक विकारों से मुक्त होता है। वह देवता के समान सत्यस्वरूप होता है। फिर किशोरावस्था आती है। इसे द्वापर नाम दिया जा सकता है। इसमें मन में कुछ विकार उत्पन्न होने लगता है। तीसरा चरण परिपक्वता आयु है, जिसमें एक व्यक्ति दुनियादारी की उलझनों से बहुत उदास हो जाता है। अंतिम चरण बुढ़ापे का है। यह कलियुग की तरह है, जिसमें मन और शरीर की विकृति के कारण अंधकार व्याप्त होता है। इसी प्रकार मानव जीवन के चार आश्रम या निवास भी चार युगों के रूप में हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम को सतयुग कहा जा सकता है, गृहस्थ का निवास द्वापरयुग है, वानप्रस्थ त्रेतायुग है और संन्यास आश्रम कलियुग है। वास्तव में होलोकॉस्ट या प्रलय को देखकर इन अवस्थाओं का बाहर से मिलान किया जा रहा है। वैसे तो शरीर की किसी भी अवस्था में, कोई भी व्यक्ति मन के किसी भी उच्च स्तर पर हो सकता है।

मानव मृत्यु को ही प्रलय के रूप में दर्शाया गया है

जैसा कि हमने पिछली पोस्ट में स्पष्ट किया था कि मनुष्य अपने मन के बाहर की दुनिया को कभी नहीं जान सकता। उसकी दुनिया उसके दिमाग तक सीमित है। इसका मतलब यह है कि तब सांसारिक निर्माण और प्रलय भी मन में हैं। इस मानसिक संसार का वर्णन पुराणों में मिलता है। हम धोखे में पड़ जाते हैं और इसे भौतिक दुनिया में व बाहर समझ लेते हैं। कुंडलिनी जागरण या मानसिक परिपक्वता के बाद मनुष्य का लगाव बाहरी दुनिया में नहीं होता है। वह अद्वैत भाव और वैराग्य के साथ रहता है। हम इसे ब्रह्मांड के पूर्ण विकास के बाद इसका स्थायित्व कह सकते हैं। फिर उसके जीवन के अंतिम दिनों में, प्रलय की प्रक्रिया शुरू होती है। कमजोरी के कारण, वह दुनियादारी का काम छोड़ देता है और अपने शरीर के रखरखाव में व्यस्त रहता है। एक तरह से हम कह सकते हैं कि पंचमहाभूत या पाँच तत्व इंद्रियों में विलीन हो जाते हैं। फिर समय के साथ उसकी इंद्रियाँ भी कमजोर होने लगती हैं। कमजोरी के कारण उसका ध्यान इंद्रियों से आंतरिक मन की ओर जाता है। वह अपने हाथ से पानी नहीं पी सकता। दूसरे उसे मुँह में पानी भरकर पिलाते हैं। वह पानी के रस को महसूस करता है। आसपास के परिचारक उसके मुंह में खाना डालकर उसे खाना खिलाते हैं। वह भोजन का स्वाद और गंध महसूस करता है। परिजन उसे अपने हाथों से नहलाते हैं। उसे पानी का स्पर्श महसूस होता है। अन्य लोग उसे विभिन्न चित्र आदि दिखाते हैं। दूसरे उसे कथा कीर्तन या ईश्वरीय कहानियाँ सुनाते हैं। वह उनकी मीठी और ज्ञान से भरी आवाज़ को महसूस करके आनन्दित होता है। एक तरह से, इंद्रियाँ पंचतन्मात्राओं या पाँच सूक्ष्म आंतरिक अनुभवों में विलीन हो जाती हैं। यहां तक कि बढ़ती कमजोरी के साथ, आदमी को पंचतन्मात्राओं का अनुभव करने में भी कठिनाई होती है। तब उसके प्यारे भाई उसे नाम से बुलाते हैं। इससे उसके अंदर थोड़ी ऊर्जा का प्रवाह होता है, और वह खुद का आनंद लेने लगता है। हम कह सकते हैं कि पंचतन्मात्राएँ अहंकार में विलीन हो गईं। कमजोरी के और बढ़ने के साथ ही उसके अंदर अहंकार का भाव भी कम होने लगता है। नाम से पुकारे जाने पर भी वह फुर्ती हासिल नहीं करता। अपनी बुद्धि के साथ, वह अंदर ही अंदर अपनी स्थिति के बारे में विश्लेषण करना शुरू कर देता है, क्या इसका कारण है, क्या उपाय और क्या भविष्य का परिणाम है। एक तरह से अहंकार महत्तत्त्व या बुद्धि में विलीन हो जाता है। उसके बाद बुद्धि में भी सोचने की ऊर्जा नहीं रहती है। मनुष्य निर्जीव की तरह हो जाता है। उस अवस्था में वह या तो कोमा में चला जाता है या मर जाता है। हम इसे महत्तत्त्व के प्रकृति में विलय के रूप में कहेंगे। जैसा कि पिछली पोस्ट में बताया गया है, उस स्तर पर सभी गुण संतुलन में आते हैं। न वे बढ़ते हैं, न घटते हैं। वे वही रहते हैं। वास्तव में, यह विचारशील मस्तिष्क है जो प्रकृति के गुणों को बढ़ाने और घटाने के लिए लहरें प्रदान करता है। यह एक साधारण बात है कि जब मस्तिष्क ही मृत हो गया है, तो गुणों को विचारों का झटका कौन देगा। अज्ञानी लोग मूल प्रकृति  जितना ही दूर जा पाते हैं। इस प्रकार के लोग बार-बार जन्म और मृत्यु के रूप में आगे-पीछे आते रहते हैं। शास्त्रों के अनुसार प्रबुद्ध एक कदम आगे बढ़ सकता है। उसके मामले में प्रकृति पुरुष में विलीन हो जाती है। पुरुष पूर्ण और प्रकाशस्वरूप है। उसमें गुण नहीं होते। वह निर्गुण है। वहाँ से पुनर्जन्म नहीं होता।