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गुरु के बारे में एक आधारभूत रहस्योद्घाटन

गुरु क्या है

गुरु वह विलक्षण व्यक्तित्व है, जिस पर विश्वास है, जिससे प्रेम है, और जो अपने से कहीं अधिक महत्त्वशाली प्रतीत होते हैं। संस्कृत शब्द “गुरु” का अर्थ ही भारी या बड़ा है।

क्या एक प्रेमी गुरु का रूप ले सकता है

काफी हद तक एक प्रेमी गुरु का रूप ले सकता है, यद्यपि अधिकाँश मामलों में पूर्णरूप से गुरु नहीं बन सकता। वैसे कुछ अपवाद तो हर जगह ही देखने को मिल जाते हैं। अधिकांशतः प्रेमी के प्रति आदरभाव कम होता है, और उसके प्रति महत्त्वबुद्धि भी कम होती है। उससे प्रेमी का चित्र मन में अच्छी तरह से नहीं बैठता। गुरु के प्रति तो प्रेम के साथ आदरभाव व महत्त्वबुद्धि दोनों का होना आवश्यक है। इसीलिए गुरु अधिकांशतः आयु में वृद्धावस्था के करीब होते हैं। इससे वे ज्ञानी, ध्यानी, सम्मानित व योगसाधक होते हैं। वे आध्यात्मिक कर्मकांड करने वाले, व देवता के पुजारी होते हैं। वे साधारण व सात्विक जीवन जीने वाले होते हैं। वे सर्वप्रिय, मृदुभाषी, संतुलित, अहिंसक व कट्टरता से रहित होते हैं। उनके मन-मंदिर में सभी सद्गुणों का वास होता है। वे मन के दोषों से रहित, अनासक्त व अद्वैतशील होते हैं। गुरु के प्रति उपरोक्त आदरबुद्धि व महत्त्वबुद्धि के कारण उनका लीलामय रूप शिष्य के मन में पक्की तरह से बैठ जाता है, और लम्बे समय तक बना रहता है।

गुरु में दिव्य गुणों का होना आवश्यक है

ऐसा इसलिए है क्योंकि कुंडलिनी स्वयं दिव्य है और दिव्य गुणों का उत्पादन करती है। इसलिए, गुरु की दिव्यता एक व्यक्ति के दिमाग में कुंडलिनी को मजबूत करने में बेहतर रूप से मदद करती है। इसके अलावा, देवत्व भगवान के अनुग्रह को भी आकर्षित करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भगवान भी देवत्व से भरे हुए हैं। भगवान की कृपा भी कुंडलिनी वृद्धि में एक महत्वपूर्ण कारक है।

गुरु व प्रणय-प्रेमी एक दूसरे के पूरक के रूप में

गुरु व प्रणय-प्रेमी की जुगलबंदी तंत्र का एक अभिन्न व आधारभूत हिस्सा है। तंत्र के अनुसार, गुरु व प्रणय-प्रेमी/प्रेमिका के बीच में किसी भी प्रकार से सम्बन्ध या संपर्क बना रहना चाहिए। कई आध्यात्मिक आकांक्षी प्रेमी के साथ भी और गुरु के साथ भी एकसाथ मजबूत संबंध (मानसिक या शारीरिक या दोनों) बना कर रखते हैं। यह भी स्वयं ही प्रेमी और गुरु की मानसिक छवियों के परस्पर मिलन का कारण बनता है। उससे गुरु के प्रति बनी हुई आदरबुद्धि प्रणय-प्रेमी के ऊपर स्थानांतरित हो जाती है, और प्रणय-प्रेमी के प्रति किया गया प्रणय-प्रेम गुरु के ऊपर शुद्ध प्रेम के रूप में स्थानांतरित हो जाता है। यह ऐसे ही होता है, जैसे एक अँधा और एक लंगड़ा एक-दूसरे की सहायता करते हैं। आमतौर पर गुरु की वृद्धावस्था के कारण उनके प्रति उतना मजबूत व आकर्षण से भरा हुआ प्रेम पैदा नहीं होता, जितना कि एक यौनप्रेमी के प्रति होता है। इसी तरह, एक यौनप्रेमी के प्रति उतनी आदरबुद्धि नहीं होती, जितनी एक वृद्ध गुरु के प्रति होती है। इसका कारण यह है कि अधिकांशतः प्रणय-प्रेमी भौतिकवादी, कम आयु वाला, कम अनुभव वाला, कम योग्यता वाला, कम योगसाधना करने वाला, कम गुणों वाला, मन के दोषों से युक्त व द्वैतशील होता है।

दो कुण्डलिनियों का एकसाथ निर्माण, व विकास

गुरु व प्रेमी के निरंतर संपर्क से, दोनों के लीलामय रूपों की कुण्डलिनियां (स्पष्ट व स्थायी मानसिक चित्र) एकसाथ विकसित होती रहती हैं। वे दोनों एक-दूसरे को शक्ति देती रहती हैं। भौतिक माहौल में प्रेमी की व अध्यात्मिक माहौल में गुरु की कुण्डलिनी अधिक विकसित होती है। अनुकूल परिस्थितियों के अनुसार, दोनों में से कोई भी कुण्डलिनी पहले जागृत हो सकती है। अधिकाँशतः गुरु के रूप की कुण्डलिनी ही जागृत होती है, प्रणय-प्रेमी की कुण्डलिनी तो उसकी सहायक बन कर रह जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पूर्ण मानसिक मिलन तो गुरु के साथ ही संभव है। प्रणय-प्रेमी से सम्बंधित शारीरिक उत्तेजना उसके रूप की कुण्डलिनी से एकाकार होने (कुण्डलिनी जागरण) की राह में रोड़ा बन जाती है। यह सारा कुछ ठीक इसी तरह ही प्रेमयोगी वज्र के साथ भी हुआ, जो इस वेबसाईट का नायक है।

Please click on this link to view this post in English (A basic revelation about Guru)

भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित कालजयी, भावपूर्ण व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ-2

बताते हुए हर्ष हो रहा है कि “भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ-1” को पाठकों व कविता-प्रेमियों का अप्रत्याशित प्यार मिला। कुछ ही घंटों में उस पोस्ट को सैंकड़ों वियूस, लाईक्स व शेयर प्राप्त हो गए। उसीसे प्रोत्साहित होकर हमने कवि महोदय से इस कविता-श्रृंखला के दूसरे भाग की रचना का अनुरोध किया, जिसे कवि महोदय ने सहर्ष स्वीकार किया। उसी भाग को हम इस पोस्ट के माध्यम से अपने प्रिय पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।

परवाज़ रहता है क्यों इतना उत्सुक

 परवाज़                                                            
 रहता है क्यों इतना उत्सुक
 तारीख़ नई लिखने को हरदम।
                                
 एक नए रिश्ते की ख़ातिर
 अपना ही लहराए परचम।
 उसको ही सर्वस्व मानकर
 सबसे करे किनारा है।
 काट स्वयं जड़ों को अपनी
 ढूंढे नया सहारा है।
  
 याद नहीं बिल्कुल भी उसको
 बचपन में खेल जो खेले थे।
 एहसास नहीं ज़रा भी उसको
 माँ-बाप ने जो दु:ख झेले थे।
  
 मिलकर भाई-बहन कभी
 तितली के पीछे भागे थे
 नई सुबह के इन्तज़ार में
 रात-रात भर जागे थे।
  
 एक-दूसरे के दु:ख-सुख से
 जब एक साथ रो पड़ते थे।
 मिलते ही एक नई ख़ुशी
 तब फूल हंसी के झड़ते थे।
  
 छोटे-छोटे कदमों से हम
 धूल उड़ाया करते थे।
 गाँव की पगडण्डी से
 जब पढ़ने जाया करते थे।
  
 उस वक़्त हमें मालूम नहीं था
 वक़्त भी क्या दिखलाएगा।
 दोस्त-भाई गाँव छोड़कर
 शहरों का हो जाएगा।
  
 भाग रहा है धन के पीछे
 भूल के पिछली बातों को।
 आ जाती जब याद कभी तो
 तन्हा रोता रातों को।
  
 छोड़ केअपनी जन्मस्थली
 ढूंढे है प्यार परायों में।
 त्याग मुसाफिर घर को अपने
 ज्यों रात बिताए सरायों में।
  
 खेत पड़े हैं बंजर सारे
 माँ-बाप की आँखें सूखी हैं।
 ताक रही रस्ता बेटे का
 बस उसके दरस की भूखी हैं।
  
 आई घर की याद उसे
 बदला जब सारा परिवेश।
 इतिहास दोहराया ज़माने ने
 बच्चे भी उड़ गए परदेस।
  
 पंछी भी उड़कर रातों को
 आ जाते हैं नीढ़ में
 पर खोया रहा तू क्यों बरसों तक
 इन नगरों की भीड़ में?
  
 छोड़ जवानी शहरों में
 बूढ़ा लौटे गाँव को।
 वृक्ष नहीं जो बचे हुए हैं
 ढूंढे उनकी छाँव को।
  
 जैसा बोया वैसा काटा
 बचा नहीं अब कुछ भी शेष।
 झुकी कमर से लाठी टेके
 खोजे गत जीवन अवशेष।
  
 यन्त्र बना है मानव अब तो
 बलि चढ़ा जज़्बातों की।
 कभी नहीं करता तहलील
 उत्पन्न हुए हालातों की।
  
 कट के अपनी डोर से
 पतंग कोई उड़ न पाए।
 परवाज़ भरी थी जिस ज़मीन से
 उसी ज़मीन पे गिर जाए।  

ऐ ज़िन्दगी ! तू बेहद खूबसूरत है।

ऐ ज़िन्दगी ! तू बेहद खूबसूरत है।  
 तेरा हर नाज़ो नख़रा सह लेते हैं।
                                        
 रुलाए तू हंसाए तू,
 नश्तर चुभा,सहलाए तू।
  
 तेरी लौ की तपिश मेंपरवाने बन जल जाते हैं,
 कुर्बान हुए जाते हैं ।
 ऐ ज़िन्दगी!....
 मयस्सर हुई तू बहुत खुशनसीबी से 
 नहीं कोई ताल्लुक अमीरी-ग़रीबी से 
 तड़पाए तू,लहराए तू।
 सपने दिखा,तरसाए तू।
 तेरी रौ की कशिश में
 तिनके बन बह जाते हैं,भँवर में फंस जाते हैं।
 ऐ ज़िन्दगी!…..
  
 तमाशाई हैं सब अजब तेरी रियासत के
 नहीं कोई मालिक तेरी इस विरासत के
 ललचाए तू,भरमाए तू,
 दिल से लगा,ठुकराए तू।
 तेरी हवा की जुम्बिश से
 पत्ते बन उड़ जाते हैं,ख़ाक में मिल जाते हैं।
 ऐ ज़िन्दगी!….
  
   

फिर से तेरी रहमतों की बारिश का इंतज़ार मुझको

फिर से 
 तेरी रहमतों की बारिश का इंतज़ार मुझको      
 उम्मीद के ये बादल घिरने लगे हैं फिर से।
                                          
 जो ज़ख़्म अब से पहले नासूर बन गए थे
 रिस्ते हुए ज़ख़्म वो भरने लगे हैं फिर से।
 सफर में ज़िन्दगी के थी धूप चिलचिलाती
 झुलसे हुए पैरों से थी चाल डगमगाती।
 तपती हुई ज़मीं पर चलते हुए अचानक
 दरख़्तों की घनी छाया आने लगी है फिर से।
  
 ख़ौफ़ से भरा था इन्सानियत का मंज़र
 ख़ून से सना था हैवानियत का ख़ंज़र।
 फैली हुई थी हरसु दहशत की धुन्ध गहरी
 हिम्मत की हवा से वो छटने लगी है फिर से।
  
 अन्धेरों में भटकता था वो राह से अन्जाना  
 शम्मा को तड़पता है जैसे कोई परवाना।
 काली अन्धेरी रातें जो राह रोकती थी
 जुगनू के कारवां से रोशन हुई हैं फिर से।
  
 काली घटा ने घिर के ऐलान कर दिया है
 सागर का पानी उसने जी भर के पी लिया है।
 हर शाख़ पत्ते पत्ते पे लगी बौछारें गिरने
 कुदरत के ज़र्रे-ज़र्रे में छाया ख़ुमार फिर से। 

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काल का प्रहार
आकाश अश्रु रो रहा
सृष्टि के पाप धो रहा

धरा मिलनकी इच्छासे
पर्वत भी धैर्य खो रहा

चारों दिशा अवरुद्ध है
जल धाराएँ क्रुद्ध हैं

नर कंकाल बह रहे ——-

उपरोक्त “भाई विनोद शर्मा जी द्वारा रचित जगत्प्रसिद्ध, व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ-1” को पढ़ने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें

कवि महोदय का संक्षिप्त परिचय

कवि विनोद शर्मा एक हरफनमौला व्यक्ति हैं, और साथ में एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी भी हैं। ये हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला में अध्यापन के क्षेत्र से जुड़े हैं। सोलन पहाड़ों का प्रवेष-द्वार भी कहलाता है। यह हिमालयी उतुंग शिखरों को आधुनिक रूप से विकसित मैदानी भूभागों से जोड़ता है। विनोद भाई कला, संगीत व साहित्य के क्षेत्रों में बहुत रुचि रखते हैं। रंग-बिरंगी कविताएँ तो इनके दिल की आवाज की तरह हैं, जो बरबस ही इनके मुख से निस्सृत होती रहती हैं। ये सोलन जिला के एक छोटे से हिमशिखराँचलशायी गाँव से सम्बन्ध रखते हैं। इनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि ही अध्यापन के क्षेत्र से जुड़ी हुई है। इनकी कविताएँ वास्तविकता का परिचय करवाते हुए अनायास ही दिल को छूने वाली होती हैं। आशा है कि ये भविष्य में भी अपने देहजगत के अमृतकुंड से झरने वाले कवितामृत से अंधी भौतिकता के जहर से अल्पप्राण मरूभूमि को सिंचित करते रहेंगे। facebook

चित्रकार
हृदयेश गर्ग (कक्षा-3)

Prana rising as the start of Kundalini Awakening

What is Prana

Prana is called the vital power of the body. It is the life force or life power or vital force that keeps life moving. Oxygen (Prana-vayu) keeps the life force maintained. Food and water eaten by man also upkeep this power. Movement of body, work and yoga exercise also keep up this power. Cravings, anger, mental defects, and various diseases keep on reducing this power.

Up rise and downfall of Prana

In ordinary, balanced, and ideal human condition, Prana is equally spread throughout the body. His life force is equally distributed in the mind-brain and in the external senses. When a person starts falling down from the ideal human state, then his life force starts flowing more towards the external senses. In the same proportion, life force starts decreasing in his mind. In other words, we can say that his life force starts concentrating in the lower chakras of the body. When most of his life force is absorbed in the external senses, then he becomes like a demon or a beast. We can say that in this situation his life force has completely centered below the navel chakra. With this, man becomes dualistic, attached, and with the defects of mind. When a person becomes tired of the delusion of such a life or gets bored with it, then he goes out in solitude and peace. He becomes free of external senses. In such a situation, there is no more physical work for his prolific Prana there made out of his past living in over worldly life. That is why Prana climbs to the brain, and shows its effect there. This is called Prana rising. With this, varied old memories in his brain begin to flourish with pleasure. Due to this, these memories begin to get absorbed in the soul with peace. There is a lot of peace in the mind. The garbage of the mind starts to clear. In this way, the Prana of a great human being or god-type is more centered in the higher chakras.

Digestive system as a second brain

I want to clarify this above fact with an example. The meditation takes place in the mind-brain itself on a fasting day. The digestive system is also called the second brain, because it feeds a lot of Prana energy. Due to this system getting restive relief through the fast, the Prana energy of this system becomes available to the brain.

Scientists have also confirmed that the rapid development of the human brain during human evolution was accompanied by the discovery of fire. Most of the functions of the digestive system were done by the fire. This led to the availability of most of the Prana energy of the digestive system to the brain.

Nurturing the Kundalini with Prana rising (pranotthan)

If the Kundalini (a particular mental picture) is not reinforced by the over abundant Prana reaching the brain, then the Kundalini cannot be awakened. Rather, different types of mental images will continue to strengthen themselves, which will divide the life force between them. With no enough Prana, no mental picture will be able to awaken. Therefore, Kundalini-meditation is also necessary with Prana rising. If Kundalini-meditation is already continued, then it is even better.

Kundalini-meditation in every chakra along with the brain is helpful, because on all the chakras abundant of Prana is accumulated, which reinforces the Kundalini. In fact, the meditated Kundalini is strengthened in the brain only, whether it is meditated in brain or anywhere outside, because eventually the brain is the place of all experiences.

Best way of Prana rising

In fact there are many methods for Prana rising. Although the sexual yoga of tantra is the best and practical way for this. From this, even the person seriously trapped in the worldly confrontation instantly gets Prana rising. Man suddenly feels miraculously transformed himself. The best way to do sexual yoga is during the daytime in full consciousness and with full spirit/dedication. However, it should be done with full social and humanely responsibilities.

Symptoms of Prana rising

Kundalini’s meditation in mind continues to be persistent and in itself without willful meditative efforts. Feeling of peace, happiness, lightness, integrity, satisfaction etc. and many more divine qualities is there. Yoga practice seems full of charm and appealing. There are no cravings towards the world, although normal desires do not stop. There is no attachment to anything. Whether anything is done or not, it is fine.  Whether anything is achieved or not, it seems fine to him in both cases. Everything seems identical. It is Advaita/non-duality. Worries and stresses end. Hunger looks good. There is feel good health. Depression ends. The best mentality is around its peak. There is no enmity with anyone. The person becomes tolerant, cheerful, attractive, deer to all and friendly. Forgiveness is there. Defects of mind (arishadvarga) like lust, anger etc. disappear. There is no mind in heavy, unstable and fast-moving physical activity; because most of the body’s Prana energy flows towards the brain. However, whenever there is a need, man takes in hand such works too,  although with this his Prana-rising starts falling down from his brain.

Prana rising is very important for kundalini awakening

Kundalini awakening occurs when there are favorable conditions along with this state of Prana rising. There is no Kundalini awakening without Prana rising.

Kundalini awakening as the Prana rising reaching the peak point

There is no fundamental difference between Prana rising and Kundalini awakening. Only the different level of expression is the difference between the two. That is why many over ambitious people recognize their Prana rising as Kundalini awakening. Kundalini awakening is the complete and perfect Prana rising only, nothing new. Prana rising can remain for a long time. Even it can remain for many years, especially if the Kundalini is of a tantric type. Prana rising with the Kundalini only provides enlightenment. Kundalini awakening only makes it strong in additional form, nothing else. The study of books and other intense mind related activities also give rise to Prana rising, although it gets intensity, spirituality and stability for a long time only with Kundalini. Kundalini awakening is transient in nature in contrast to Prana rising. Its experience stays for no more than half a minute or a maximum of a minute. Most people drop it down in a few seconds only due to fear of strangeness, as had happened with the protagonist of this website, Premyogi Vajra.

कृपया इस पोस्ट को हिंदी में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें (प्राणोत्थान- कुण्डलिनी जागरण की शुरुआत)

प्राणोत्थान- कुण्डलिनी जागरण की शुरुआत

प्राण क्या है

प्राण शरीर की शक्ति को कहते हैं। यह जीवनी शक्ति है, जो जीवन को चलायमान रखती है। प्राणवायु शक्ति को बना कर रखती है। इसी तरह, खाया-पिया हुआ अन्न-जल भी इस शक्ति को बना कर रखता है। शरीर का हिलना-डुलना, काम-काज व योग-व्यायाम भी इस शक्ति को बना कर रखते हैं। काम, क्रोध आदि मानसिक विकार, एवं विभिन्न रोग इस शक्ति को घटाते रहते हैं।

प्राण का ऊर्ध्वगमन (ऊपर जाना) व अधोगमन (नीचे गिरना)

साधारण, संतुलित, व आदर्श मानवीय अवस्था में प्राण पूरे शरीर में समान रूप से व्याप्त रहता है। उसका प्राण मन-मस्तिष्क में व बाह्य इन्द्रियों में समान रूप से कार्य करता है। जब व्यक्ति आदर्श मानवीय अवस्था से नीचे गिरने लगता है, तब उसका प्राण बाह्य इन्द्रियों की तरफ ज्यादा प्रवाहित होने लगता है। उसी अनुपात में उसके मस्तिष्क में प्राण कम होने लगता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि उसका प्राण शरीर के निचले चक्रों में केन्द्रित होने लगता है। जब उसके प्राण का अधिकाँश भाग बाह्य इन्द्रियों में समाहित हो जाता है, तब वह दानव या पशु जैसा बन जाता है। इस स्थिति को हम कह सकते हैं कि उसका प्राण पूरी तरह से नाभिचक्र से नीचे केन्द्रित हो गया है। इससे आदमी द्वैतवादी, आसक्त, व मन के दोषों से युक्त हो जाता है। ऐसा व्यक्ति जब ऐसे जीवन की उलझनों से थक जाता है या उनसे ऊब जाता है, तब वह एकांत व शान्ति की खोज में निकल पड़ता है। वह बाह्य इन्द्रियों से उपरत हो जाता है। ऐसे में उसके दुनियादारी से प्रचंड बने हुए प्राण के पास ज्यादा शारीरिक काम नहीं रहता। इसलिए वह मस्तिष्क की तरफ चढ़ने लगता है, और वहां अपना असर दिखाता है। इसे ही प्राणोत्थान कहते हैं। इससे मस्तिष्क में चित्र-विचित्र व पुरानी यादें आनंद के साथ उमड़ने लगती हैं। इससे वे शान्ति के साथ आत्मा में लीन होने लगती हैं। मन में चारों ओर शान्ति छा जाती है। मन का कचरा साफ होने लगता है। इस तरह से महामानव या देवता का प्राण ऊपर वाले चक्रों में अधिक केन्द्रित होता है।

पाचन तंत्र एक दूसरे मस्तिष्क के रूप में

मैं इस उपरोक्त तथ्य को एक उदाहरण से स्पष्ट करना चाहता हूँ। व्रत-उपवास वाले दिन मन-मस्तिष्क में स्वयं ही ध्यान होता रहता है। पाचन प्रणाली को दूसरा मस्तिष्क भी कहते हैं, क्योंकि वह बहुत अधिक प्राण-ऊर्जा का भक्षण करती है। व्रत से इस प्रणाली को आराम मिलने के कारण वहां की प्राण-ऊर्जा मस्तिष्क को उपलब्ध हो जाती है।

वैज्ञानिक भी इस बात की पुष्टि कर चुके हैं कि मानव-मस्तिष्क के विकास में आग की खोज के साथ तेज गति आई। उसके पाचन तंत्र का अधिकाँश काम आग ने कर दिया। इससे पाचन तंत्र की अधिकाँश प्राण-शक्ति मस्तिष्क को उपलब्ध होने लगी।

प्राणोत्थान से कुण्डलिनी का पोषण

यदि मस्तिष्क में पहुंचे हुए प्राण से कुण्डलिनी (एक विशेष मानसिक चित्र) को पुष्ट न किया जाए, तो उससे कुण्डलिनी जागृत नहीं हो पाएगी। इसकी बजाय उससे विभिन्न प्रकार के मानसिक चित्र एकसाथ पुष्ट होते रहेंगे, जिससे प्राणशक्ति सब के बीच में बंट जाएगी। उससे पर्याप्त बल के अभाव  में कोई भी मानसिक चित्र जागृत नहीं हो पाएगा। अतः प्राणोत्थान के साथ कुण्डलिनी-ध्यान भी आवश्यक है। यदि पहले से ही कुण्डलिनी-ध्यान किया जा रहा है, तब तो और भी अच्छा है।

मस्तिष्क के साथ प्रत्येक चक्र पर कुण्डलिनी-ध्यान सहायक है, क्योंकि सभी चक्रों पर बहुत सी प्राण-शक्ति जमा होती है, जो कुण्डलिनी को पुष्ट करती है। वास्तव में कहीं पर भी ध्यान की गई कुण्डलिनी मस्तिष्क में ही पुष्ट होती है, क्योंकि अंततः मस्तिष्क ही सभी अनुभवों का स्थान है।

प्राणोत्थान का सबसे श्रेष्ठ तरीका

वास्तव में प्राणोत्थान की बहुत सी विधियां हैं। यद्यपि तंत्र का यौनयोग (सेक्सुअल योगा) इसके लिए सबसे श्रेष्ठ व व्यावहारिक तरीका है। इससे दुनियादारी के झमेले में फंसे हुए आदमी का भी एकदम से प्राणोत्थान हो जाता है। आदमी अचानक ही चमत्कारिक रूप से अपने आप को रूपांतरित सा महसूस करता है। यौनयोग दिन के समय पूर्ण चेतना की अवस्था में व पूर्ण निष्ठा-समर्पण से किया जाए, तो सर्वोत्तम है। हालांकि इसको पूर्ण सामाजिक व मानवीय उत्तरदायित्वों के साथ करना चाहिए।

प्राणोत्थान के लक्षण

मन में कुण्डलिनी का ध्यान निरंतर व स्वयं ही होता रहता है। शान्ति, आनंद, हल्केपन, सात्विकता, संतुष्टि आदि दिव्य गुणों का अनुभव होता है। योगसाधना करने में बहुत मन लगता है। संसार के प्रति लिप्सा (क्रेविंग) नहीं रहती, हालांकि सामान्य इच्छाएँ नहीं रुकतीं। किसी भी चीज में आसक्ति नहीं रहती है। हो जाए या मिल जाए, तो भी ठीक, और न होए या न मिले, तो भी ठीक। सभी कुछ एकसमान सा लगता है। यह अद्वैत है। चिंता व तनाव समाप्त हो जाते हैं। भूख अच्छी लगती है। अच्छा स्वास्थ्य महसूस होता है। भ्रमण के लिए मन करता है। अवसाद समाप्त हो जाता है। उत्तम मानसिकता अपने चरम के आसपास होती है। किसी से वैर-विरोध नहीं रहता। व्यक्ति सहनशील, हंसमुख, आकर्षक, सर्वप्रिय व मिलनसार बन जाता है। क्षमा भाव बना रहता है। काम, क्रोध अदि मन के विकार गायब हो जाते हैं। भारी, अस्त-व्यस्त व तेज-तर्रारी वाले शारीरिक कामों में मन नहीं लगता, क्योंकि शरीर की अधिकाँश प्राणशक्ति मस्तिष्क की ओर प्रवाहित होती रहती है। जरूरत पड़ने पर आदमी ऐसे काम कर भी लेता है, यद्यपि उससे उसका प्राणोत्थान नीचे गिरने लगता है।

कुण्डलिनी जागरण के लिए प्राणोत्थान बहुत जरूरी

इसी प्राणोत्थान की अवस्था में अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर कुण्डलिनी-जागरण होता है। प्राणोत्थान के बिना कुण्डलिनी-जागरण नहीं होता।

कुण्डलिनी-जागरण शिखर-बिंदु तक पहुंचे हुए प्राणोत्थान के रूप में

प्राणोत्थान व कुण्डलिनी-जागरण के बीच में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है। दोनों के बीच में केवल अभिव्यक्ति के स्तर का ही अंतर है। इसीलिए कई अति महत्त्वाकांक्षी लोग प्राणोत्थान को ही कुण्डलिनी जागरण समझ लेते हैं। पूर्णता को प्राप्त प्राणोत्थान ही कुण्डलिनी जागरण कहलाता है। प्राणोत्थान तो लम्बे समय तक भी रह सकता है। यहाँ तक कि यह कई सालों तक भी रहता है, विशेषतः यदि कुण्डलिनी तांत्रिक प्रकार की हो। कुण्डलिनी के साथ प्राणोत्थान ही आत्मज्ञान करवाता है। कुण्डलिनी जागरण तो केवल इसे अतिरिक्त रूप में पुष्ट ही करता है, अन्य कुछ नहीं। किताबों के अध्ययन व अन्य गहन दिमागी कार्यों से भी प्राणोत्थान होता है, यद्यपि इसे तीव्रता, आध्यात्मिकता व लम्बे समय तक स्थिरता कुण्डलिनी से ही मिलती है। प्राणोत्थान के विपरीत कुण्डलिनी जागरण क्षणिक होता है। इसका अनुभव आधा या एक मिनट से अधिक नहीं रहता। अधिकाँश लोग तो विलक्षणता के डर से इसे कुछ ही सेकंडों में नीचे उतार देते हैं, जैसा ही इस वेबसाईट के नायक प्रेमयोगी वज्र के साथ भी हुआ था।

Please click on this link to view this post in English (Prana rising as the start of Kundalini Awakening)

कुण्डलिनी चक्रों के त्रिभुज, वृत्त एवं पंखुड़ियाँ- एक छिपा हुआ राज उजागर

सहस्रार चक्र व स्वाधिष्ठान चक्र के सिवाय सभी चक्रों पर त्रिभुज हैं। कहीं पर वह सीधा ऊपर की ओर है, तो कहीं पर उल्टा नीचे की ओर है। कहीं पर एक-दूसरे को काटते हुए दो त्रिभुज हैं। इसी तरह किसी चक्र पर चार पंखुड़ियां हैं, तो किसी पर छह या सात आदि। सहस्रार में तो एक हजार पंखुड़ियां हैं। इनके पीछे आखिर क्या रहस्य छिपा हो सकता है? कुछ रहस्य दार्शनिक हैं, तो कुछ रहस्य अनुभवात्मक व मनोवैज्ञानिक हैं। योग करते हुए मुझे भी इसके पीछे छिपे हुए कुछ अनुभवात्मक रहस्य पता चले हैं, जिन्हें मैं इस पोस्ट के माध्यम से साझा कर रहा हूँ।

कुण्डलिनी के राजमार्ग और आपूर्ति-मार्ग

त्रिभुज की रेखाएं वास्तव में कुण्डलिनी-चित्र के राजमार्ग हैं, जिन पर दौड़ती हुई कुण्डलिनी का ध्यान किया जाता है। इसी तरह, त्रिभुज के बिंदु भी कुण्डलिनी के विश्राम स्थल हैं। चक्र के पीटल (पंखुड़ियां) उस चक्र से सम्बंधित क्षेत्र से सम्बंधित नाड़ी-पुंज हैं, जो चेतनामयी पोषक शक्ति या ध्यान शक्ति को चक्र व उस पर स्थित कुण्डलिनी तक पहुंचाती हैं। ये वृक्ष या फूल की पत्तियों की तरह ही हैं।

मूलाधार चक्र का उल्टा त्रिभुज नीचे की ओर

मूलाधार चक्र पर उल्टा त्रिभुज होता है। इसकी एक भुजा जननांग से शुरू होकर आगे के स्वाधिष्ठान चक्र (जननांग के मूल में) से होते हुए पीछे के (मेरुदंड के) स्वाधिष्ठान चक्र तक जाती है। इसकी दूसरी भुजा पीछे के स्वाधिष्ठान चक्र से लेकर मूलाधार चक्र (सबसे नीचे, जननांग व मलद्वार के मध्य में) तक है। इसकी तीसरी भुजा जननांग की शिखा से या आगे के स्वाधिष्ठान चक्र से लेकर मूलाधार तक है। मैंने देखा कि जननांग को छोड़कर, छोटा त्रिभुज बना कर भी अच्छा ध्यान होता है। जननांग से तो कुण्डलिनी को कई बार अतिरिक्त शक्ति मिल जाती है। उस छोटे त्रिभुज का एक बिंदु आगे का स्वाधिष्ठान चक्र है, दूसरा बिंदु पीछे का स्वाधिष्ठान चक्र है, व तीसरा बिंदु या त्रिभुज की शिखा मूलाधार है। 4 पीटल का अर्थ है कि एक पीटल जननांग तक है, एक आगे के स्वाधिष्ठान चक्र तक है, तीसरी पीछे के स्वाधिष्ठान चक्र तक है, और चौथी स्वयं मूलाधार चक्र की है (चक्र के संकुचन  से उपलब्ध)।

स्वाधिष्ठान चक्र पर कोई अलग से त्रिभुज नहीं है, क्योंकि वह मूलाधार के त्रिभुज में ही कवर हो जाता है। इसकी 6 पीटल निम्नलिखित क्षेत्रों से आती हैं। 4 मूलाधार से, एक जननांग से और छवीं पीटल इसकी अपनी है (संकुचन से उपलब्ध)।

त्रिभुज पिरामिड या शंकु को भी प्रदर्शित करता हुआ व उल्टा त्रिभुज पीछे की ओर को भी

मणिपुर चक्र में उल्टा त्रिभुज व 10 पीटल हैं। वास्तव में, उल्टे त्रिभुज का मतलब पीछे की ओर प्वाइंट करता हुआ त्रिभुज है। दो डाईमेंशन वाले कागज़ पर पीछे की ओर या अन्दर की ओर प्वाइंट करते हुए त्रिभुज को ही उल्टा या नीचे की तरफ प्वाइंट करता हुआ दर्शाया गया है। इसमें मुख्य ध्यान-पट्टिका नाभि क्षेत्र में, दाएं से लेकर बाएँ भाग तक फैली है। वैसे तो पट्टी को विस्तृत करते हुए पूरे उदर क्षेत्र को एक शंकु या पिरामिड (कुछ लोग त्रिभुज को पिरामिड ही मानते हैं) के आकार में भी दिखाया जा सकता है, जिसकी शिखा पीछे के (मेरुदंड वाले) मणिपुर चक्र पर है।नाभि क्षेत्र पिरामिड की तरह ही लगता है। पिरामिड की दो तिरछी भुजाएं सबसे निचली पसलियों से बनती हैं। पिरामिड की आधार भुजा पेल्विक कैविटी और एब्डोमिनल कैविटी को विभक्त करने वाली काल्पनिक रेखा से बनती है। यह पिरामिड अन्दर की तरफ जाता हुआ पिछले मणिपुर चक्र पर प्वाइंट करता है। इसीलिए कई लोग पूरे उदर क्षेत्र में कुण्डलिनी को चक्राकार भी घुमाते हैं। वास्तव में जब पेट ध्यान के साथ संकुचित किया जाता है, तो ऐसा लगता है कि पेट व रीढ़ की हड्डी आपस में जुड़ गए हैं, व दोनों आगे-पीछे के चक्र भी। इसकी 10 पीटल में से 6 पीटल स्वाधिष्ठान से आती हैं (ऊपर की ओर संकुचन से)। 7वीं पीटल उदर के दाएं भाग से, 8वीं बाएँ भाग से, 9वीं उसके अपने संकुचन से व 10वीं अनाहत चक्र से आती है (जालंधर बंध के सहयोग से)।

अनाहत चक्र पर सुन्दर षटकोण

अनाहत चक्र में एक-दूसरे को काटते हुए दो त्रिभुज हैं, जिससे एक सुन्दर षटकोण बनता है। क्योंकि यह चक्र सबसे प्रमुख है। मैंने स्वयं ध्यान के समय आगे से पीछे तक फैले हुए सुन्दर व आनंदमयी षटकोण को बनते हुए देखा है। एक त्रिभुज पीछे वाले अनाहत चक्र पर प्वाइंट करती है। उसकी आधार भुजा हृदय से लेकर छाती के दाएं क्षेत्र तक है। दूसरी त्रिभुज आगे वाले अनाहत चक्र पर प्वाइंट करती है, जिसकी आधार भुजा रीढ़ की हड्डी में पीछे वाले अनाहत चक्र के दोनों ओर फैली है। जब आदमी खड़े होकर सांस को भरते हुए व सिर को पीछे की ओर करते हुए छाती को बाहर की ओर फुलाता है, तब त्रिभुज की आधार भुजा आगे वाले क्षेत्र में, दोनों स्तनों के बीच में व त्रिभुज की चोटी पीछे वाले अनाहत बिंदु पर होती है। जब सांस को छोड़ते हुए, सिर को नीचे झुकाते हुए व कन्धों को आगे की ओर मोड़ते हुए छाती को अन्दर की ओर संकुचित किया जाता है; तब त्रिभुज की आधार भुजा कंधे की एक तरफ की उभार वाली हड्डी से लेकर दूसरी तरफ की उभार वाली हड्डी तक होती है, और आगे का अनाहत चक्र त्रिभुज की टिप के रूप में होता है।

इसके 12 पीटल में से 6 तो मणिपुर चक्र से आती हैं (ऊपर की ओर संकुचन के माध्यम से)। 2 आगे की आधार भुजा से, 2 पीछे की आधार भुजा से, तथा एक-2 पीटल दोनों चक्रों की अपनी है। वैसे मुझे एक अकेला, व छोटा त्रिभुज भी आसान लगा, जिसकी आधार भुजा हृदय से लेकर आगे वाले अनाहत चक्र तक ही है।

विशुद्धि चक्र पर भी उल्टा त्रिभुज

विशुद्धि चक्र पर उल्टा त्रिभुज है। जहां गले में संकुचन जैसा (आवाज वाले स्थान पर) होता है, वहां पर त्रिभुज की चोटी है। यह आगे वाला चक्र है। त्रिभुज की आधार भुजा गर्दन के मेरुदंड पर लम्बाई व चौड़ाई वाले भाग के लगभग बीचोंबीच है। इस भुजा के केंद्र में पीछे वाला चक्र है। दर्पण में देखने पर गले का वह क्षेत्र उल्टे त्रिभुज की तरह दिखता भी है, विशेषतः जब उड्डीयान बंध पूरा लगा हो। आगे वाले चक्र की ऊपर की ओर सिकुड़न से व उड्डीयान बंध से कुण्डलिनी पीछे वाले चक्र तक ऊपर चढ़ती रहती है। इसकी 16 पीटल में से 12 तो अनाहत चक्र से आती हैं, दो आज्ञा चक्र से, व अंतिम दो इस चक्र के अपने क्षेत्र से आती हैं।

आज्ञाचक्र के त्रिभुज की आधार भुजा दोनों आँखों के बीच में

आज्ञा चक्र पर उल्टी त्रिभुज है। इसका भी पूर्ववत यही अर्थ है कि इसकी आधार भुजा दाईं आँख से बाईं आँख के बीच में है, और यह पीछे के आज्ञा चक्र (सिर के पिछले भाग में, आगे के आज्ञा चक्र के ठीक अपोसिट बिंदु) पर प्वाइंट करती है। इसके दो पीटल में से एक दाईं आँख वाले क्षेत्र से, व एक बाईं आँख वाले क्षेत्र से आती हैं।

मस्तिष्क स्वयं नाड़ी-रेखाओं से भरा हुआ, इसलिए सहस्रार चक्र पर कोई त्रिभुज नहीं

सहस्रार चक्र पर कोई त्रिभुज नहीं है, क्योंकि इसमें ध्यान करने के लिए किसी विशेष रेखा-चित्र की आवश्यकता नहीं है। कहीं पर भी ध्यान किया जा सकता है, और सीधा चक्र-बिंदु पर भी। इसके हजारों पीटल का अर्थ है कि इसके पोषण के लिए लिए पूरे मस्तिष्क सहित पूरे शरीर की भावनामय ऊर्जा पहुंचती है। शरीर के किसी भी भाग पर या चक्र पर ध्यान कर लो, अंततः वह सहस्रार चक्र को ही पुष्ट करता है।

चक्रों के वृत्त कुण्डलिनी-किसान के गोल खेत की तरह

वैसे तो किसी भी चक्र पर षटकोण के रेखा चित्र पर कुण्डलिनी का ध्यान किया जा सकता है। कई चक्रों पर तो वृत्त (गोलाकार रेखाचित्र) भी बनाए गए हैं। इसका यह अर्थ है कि कुण्डलिनी का ध्यान गोलाकार क्षेत्र में भी किया जा सकता है, एक गोलाकार खेत को जोतते हुए किसान की तरह।

सम्भोगीय चक्रों का त्रिभुज बहुत प्रभावशाली

मैं यहाँ एक उदाहरण देकर स्पष्ट करना चाहता हूँ, की त्रिभुजाकार रेखाचित्र से ध्यान करना कितना आसान और प्रभावशाली हो जाता है। यहाँ मैं सबसे नीचे के सम्भोगीय चक्रों की बात करने जा रहा हूँ। अधिकांशतः इनका ध्यान इकट्ठे रूप में ही होता है, अलग-२ नहीं। जालंधर बंध से ऊपर का प्राण आगे के स्वाधिष्ठान चक्र पर आरोपित हो जाता है। मूलाधार के संकुचन से भी नीचे का प्राण वहां पहुँच जाता है। इससे कुण्डलिनी वहां पर दमकने लगती है। तभी वहां पर पीठ की तरफ को एक संकुचन सा अनुभव होता है। उससे जननांग शिखा से लेकर, कुण्डलिनी के साथ प्राण पीछे के स्वाधिष्ठान चक्र पर केन्द्रित हो जाता है। थोड़ी देर बाद वहां की मांसपेशी थक कर शिथिल हो जाती है, जिससे प्राण मूलाधार तक नीचे उतर जाता है। फिर मूलाधार संकुचित किया जाता है, जिससे प्राण फिर आगे वाले स्वाधिष्ठान चक्र तक ऊपर चढ़ जाता है। वही क्रम पुनः-२ दोहराया जाता है, और कुण्डलिनी उस त्रिभुज पर चक्राकार घूमती रहती है, हर बार अपनी चमक बढ़ाते हुए।

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The triangle, circle and petal of kundalini chakra- demystifying a hidden secret

There are triangles on all the chakras except Sahasrara and Swadhishthana. Somewhere it is upright, but reverse somewhere. There are two triangles transecting one another somewhere. Similarly, there are four petals on anyone chakra, but anyone has six or seven etc. There are thousand petals in Sahasrara. What can be the secret behind these? Some mysteries are philosophical, whereas some secrets are experiential and psychological. While doing yoga, I also find some experiential secrets hidden behind this, which I am sharing through this post.

Kundalini’s highways and supply routes

The lines of the triangle are in fact the highways of the Kundalini-picture, on which the running kundalini is meditated. Similarly, the points of the triangle are also the resting places of Kundalini. The petals of the chakra are psychic channels related to that chakra, which carries the conscious nutrient power or meditation power from widespread area of the body to the chakra and the Kundalini situated on it. These are just like the leaves of the tree or the flowers.

Inverted triangle of Muladhara Chakra as downward

The triangle is reversed on the muladhara chakra. One of its arms starts from the genitalia and goes through the front Swadhishthan chakra (in the root of genitalia) up to the back swadhishthan chakra in the spinal cord. Its second arm is there from the back of the Swadhishthan chakra to the Mooladhar chakra (mid point between the genital and the anal opening). Its third arm is from the tip of genitalia or from the front Swadhishthan chakra to the mooladhara. I saw that leaving the genitalia, creating a small triangle is also good for meditation there. From genitalia, Kundalini gets extra strength at many occasions. One point of that small triangle is the Swadhishthan chakra of the front channel, the second point is the Swadhishthan chakra at the rear, and the third point or the tip of the triangle is the mooladhara. 4 Petals mean that one petal is up to genitalia, second one  is up to front Swadhishthana chakra, the third is up to the rear Swadhishthan chakra, and the fourth is of the muladhara chakra of its own (available from the contraction of the chakra).

There is no separate triangle on Swadhishthan chakra, as it is covered in the triangle of the Mooladhara. Its 6 petals come from the following areas. 4 From the Mooladhara (root chakra), one from the genitalia and the sixth petal is of its own (available from its contraction).

Triangle also displaying pyramid or cone and reverse triangle also representing backward direction

In the Manipur Chakra, there is a downside triangle and 10 petals. In fact, the reverse triangle is a triangle pointing backwards. On the two dimensional paper, the forward and backward pointing triangles have been shown pointing upwards and downwards respectively. In this, the main meditative plaque stretches from right to the left in the navel area. Although expanding the strip, the entire abdominal area can also be shown in the shape of a cone or pyramid (someones say triangles as pyramids), whose crest is on the rear Manipur chakra (in the spinal cord). The navel area looks like a pyramid. The two sloping sides of the pyramid are made of the lowest ribs. The base arm of the pyramid is made from a hypothetical line dividing pelvic cavity and abdominal cavity. This pyramid points inside to the rear Manipur chakra. That is why many people rotate the Kundalini in the entire abdominal area. In fact, when the stomach is compressed with meditation, it seems that the stomach and spinal cord have been united together, and with this, both the back and front chakras united too. Six of its 10 petals come from Swadhishthan (from its upward contraction). 7th comes from the right part of the abdomen, 8th from the left side of the abdomen, 9th comes from its own contraction and 10th from Anahata chakra (in collaboration with Jalandhar bandh/lock).

Beautiful hexagon on Anahata Chakra

There are two triangles intersecting each other in Anahat Chakra, which creates a beautiful hexagon. Because this chakra is the most important. I myself saw the beautiful and blissful hexagon stretching from front to back in meditation. A triangle points back to the rear anahata chakra. Its base is from the heart to the right area of ​​the chest. The second triangle points to the front anahata chakra, whose base arm is spread on both sides of the rear anahata chakra in the spinal cord. When the man stands up and inflates out the chest while inhaling and moving the head backwards, the base arm of the triangle is in the front chakra area, between the two breast-nipples, and the top of the triangle is at the posterior anahat chakra point. . When leaving out the breath, the chest is narrowed inwards, while tilting the head down and turning the shoulders forward; The base arm of the triangle then extends from the bulging bone on one side of the back of shoulder to the corresponding bulging bone on opposite side at back, and the front anahata chakra forms the tip of the triangle.

6 of its 12 petals come from Manipur Chakra (through its upwardly contraction). 2 come from the base arm of front, 2 from base arm of the rear, and one petal of both chakras each. Well I found it easier to have a lonely, small triangle, whose base arm is from the heart to the front anahata chakra.

Inverted triangle on the vishuddhi chakra

There is inverted triangle on the vishuddhi chakra. Where there is contraction in the throat (at the voice point), there is the top of the triangle. The base arm of the triangle is around the middle of the length and breadth of the spinal cord on the neck. The rear chakra is at the centre of this base arm. When looking into the mirror, that area of ​​the throat looks like an inverted triangle, especially when the flying lock/uddeeyan lock is fully applied. Upward contractile force on voice point in throat along with flying lock propels kundalini upward up to its rear counterpart. 12 of its 16 petals come from the Anahata Chakra, two from the Agya chakra, and the last two come from its own areas.

The base arm of the triangle of the agya chakra between the two eyes

The triangle is reversed on the Agya chakra. It also means like afore said that its base arm extends from the left eye to the right eye, and it points to the rear Agya chakra (the point directly opposite to the front chakra, on the backside of skull). One of its two petals comes from the right eye area, and other from the left eye area.

The brain itself is filled with nerve pathways, so there is no triangle on the Sahasrara Chakra

There is no triangle on the Sahasrara chakra, because there is no special line drawing required to meditate in it. There can be meditated anywhere in it, and also directly on the chakra itself. Thousands of petals mean that for the sake of its nourishment, the whole body’s emotional energy, including the whole mind reaches there. Meditate on any part of the body or on any of the chakra, eventually it reinforces the Sahasrara Chakra.

Circles on chakras like the round field of a Kundalini-farmer

However, Kundalini can be meditated on lines of hexagon on any chakra as per ease. On many chakras, the circle (spherical drawing) is also there to represent something. It means that the Kundalini can also be meditated in the circular area, like a farmer ploughing a spherical farm field.

Triangle of sexual chakra is very impressive

I want to give an example here, to clarify, how easy and effective is it to meditate with a triangular drawing. Here I am going to talk about the sexual chakras at the bottom of our body. At Most of the time, these are meditated in the assembled form as a combined unit, not separately. Prana of upper body gets concentrated on the front swadhishthan chakra with help of Jalandhar bandh. The lower body life force/prana gets there from the contraction of the Mooladhar. This makes Kundalini glowing over there. Only then, there is an experience of its contraction towards the backside. From it, the Prana with the Kundalini gets focused on the rear Swadhishthan chakra, also collecting the prana from the genital tip. After a while, the muscles nearby swadhishthan chakra become tired, so Prana sinks down to the Mooladhar. Then the Mooladhar is constricted upward, so the prana then ascends to the front Swadhishthan Chakra. The same sequence is repeated again and again, and the Kundalini rotates on the triangle glistening more and more every time.

कृपया इस पोस्ट को हिंदी में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें (कुण्डलिनी चक्रों के त्रिभुज, वृत्त एवं पंखुड़ियाँ- एक छिपा हुआ राज उजागर)

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास; भाग-11

पोस्ट के जो केटेगरी व टैग होते हैं, वे गूगल सर्च में उपयोगी नहीं होते। वे तो केवल वर्डप्रेस डॉट कोम में ही पोस्ट को सर्च करवाते हैं। केटेगरी व टेग, दोनों मिलाकर पंद्रह से अधिक नहीं होने चाहिए। उनकी पंद्रह से अधिक संख्या वाली पोस्टों को वर्डप्रेस फ़िल्टर करके स्पाम में डाल देता है। केटेगरी में मुख्य कीवर्ड होता है, जबकि टेग में उस मुख्य कीवर्ड का सब कीवर्ड होता है। उदाहरण के लिए, कुण्डलिनी जागरण से सम्बंधित पोस्ट के लिए “कुण्डलिनी” कीवर्ड केटेगरी के लिए फिट है, जबकि “कुण्डलिनी जागरण” टेग के लिए।

ऐसा भी चल सकता है कि किसी पोस्ट के लिए केवल केटेगरी के ही कीवर्ड दिए गए हों, टेग के नहीं। वर्डप्रेस डॉट कोम दोनों को एकसमान समझता है। यहाँ तक कि यदि कोई भी केटेगरी या टेग न दिया गया हो, तब भी वह पोस्ट के मुख्य कंटेंट में से कीवर्ड को ढूंढ लेता है।

अब जो वेबसाईट के रीडर के अंतर्गत टेग बटन है, उसका अर्थ यह नहीं है कि उसमें लिखे जाने वाले कीवर्ड से केवल उसी कीवर्ड के टेग वाली पोस्टें ही ढूंढी जाए। वास्तव में उस बटन का नाम “टेग” के स्थान पर “कीवर्ड” ज्यादा उपयुक्त लगता है।

अब मुफ्त की व खरीदी गई वेबसाईट के बीच में अंतर के बारे में बात करते हैं। निःशुल्क वेबसाईट के डोमेन नेम में वेबसाईट के नाम के साथ वर्डप्रेस डॉट लगा होता है। पेमेंट वाली वेबसाईट में यह नहीं लगा होता। यही अंतर है, और कुछ नहीं। उदाहरण के लिए,  इस वेबसाईट के निःशुल्क वर्जन का डोमेन नेम यह होगा, demystifyingkundalini.wordpress.com; जबकि इसके सशुल्क वर्जन का डोमेन नेम यह है, demystifyingkundalini.com

दोनों में ही मेरी वैबसाईट का डोमेन नेम (demystifyingkundalini) सुरक्षित है, और इसे कोई दूसरा नहीं ले सकता। सशुल्क वर्जन में एक लाभ यह भी है कि उसमें कस्टमर केयर की ईमेल व चेट सुपोर्ट मिलती है। साथ में, निःशुल्क वेबसाईट के डाटा की सुरक्षा का जिम्मा कंपनी नहीं लेती। इसलिए नियमित रूप से उसे बेकअप करते रहना पड़ता है।

वेबसाईट विकास से सम्बंधित पोस्ट की इस सिरीज (नंबर 1 से लेकर 12 तक) में जो जानकारी मुझे कस्टमर केयर सुपोर्ट से मिली है, उनमें से भी कुछ ख़ास-२ डाली गई है। इसलिए यह निःशुल्क वेबसाईट को बनाने वाले के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

अब बात आती है बहुभाषी वेबसाईट की। पहला तरीका यह है कि एक ही वेबसाईट में दोनों भाषाओं के पेज व पोस्ट डालें। इसके लिए मीनू आईटम्स व विजेट्स के नाम हिंदी व अन्ग्रेजी, दोनों में रखने पड़ेंगे। एक भाषा से दूसरी भाषा में जाने के लिए पेजस व पोस्ट्स पर लिंक डालने होंगे। अब ऐसी वेबसाईट में दो प्रकार से ब्लॉग पोस्ट लिखी जा सकती है। पहले तरीके में, पहले मूल भाषा में लिखा जाता है, फिर उसके नीचे उसी पोस्ट में अनुवादित भाषा में लिखा जाता है। पोस्ट के टॉप पर एक पेजजंप लिंक दिया जाता है, ताकि उस पर क्लिक करने से अनुवादित भाषा में जाया जा सके।

दूसरे तरीके में, मूल हिंदी के लिए अलग से पोस्ट बनाई जाती है, और अंग्रेजी के लिए अलग से। दोनों पोस्टों में एक-दूसरे पर जाने के लिए लिंक डाला जाता है। यह तरीका सर्च इंजन रेंकिंग के लिए कुछ ज्यादा अच्छा प्रतीत होता है। मैं तो द्विभाषी वैबसाईट के लिए इसी तरीके को अपनाता हूँ। यद्यपि इसमें एक भाषा के फोलोवर दूसरी भाषा की पोस्ट भी प्राप्त करते रहते हैं। इससे बचने का तरीका यह है कि अनुवादित भाषा के लिए अलग से वेबसाईट बना लो। मुफ्त वाली वेबसाईट भी बना सकते हैं। एक वेबसाईट से दूसरी पर जाने के लिए जगह-२ पर लिंक डाले जाते हैं। संभवतः उसमें एक वेबसाईट मीनू से दूसरी वेबसाईट भी खुल जाती है, क्योंकि दूसरी वेबसाईट पहली वाली वेबसाईट की सेटिंग पर ही बनी होती है। उदाहरण के लिए, यदि मुख्य वेबसाईट demystifyingkundalini.com है, तो दूसरी वेबसाईट demystifyingkundalinieng.wordpress.com बना सकते हैं। डोमेन नाम में कुछ न कुछ परिवर्तन तो करना ही पड़ता है। साथ में, वह डोमेन नाम उपलब्ध भी होना चाहिए। फिर भी, खासकर भारतीय वातावरण में एक ही वैबसाईट में हिंदी व अंग्रेजी भाषाएँ एक दूसरे की सहयोगी हैं, इसलिए यह मिश्रित तरीका सर्वोत्तम है।

ट्रांसलेशन के मामले में गूगल कुछ सख्त है। अंगरेजी की गुणवत्ता से वह आसानी से संतुष्ट नहीं होता। इसलिए कहा जाता है कि मशीन-ट्रांसलेशन या गूगल-ट्रांसलेशन को वह स्वीकार नहीं करता। पर मेरा मानना है कि यदि गूगल से बेसिक ट्रांसलेशन कराने के बाद उसे हाथ से सुधारा जाए, तो वह ट्रांसलेशन स्वीकृत हो जाता है।

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