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कुंडलिनी योगसाधना से उत्पन्न शक्ति या उर्जा को स्तरोन्नत करती है

दोस्तों, मैं इस पोस्ट में कुंडलिनी से जुड़ा हुआ सबसे बड़ा रहस्य उजागर करने जा रहा हूँ। योग साधना से जिस चीज को बढ़ाया जाता है, उसको भिन्न-2 स्थानों पर भिन्न-2 नाम दिए गए हैं। कहीं इसे ऊर्जा, कहीं पर संवेदना, कहीं पर प्रकाश, और कहीं पर कुंडलिनी कहा जाता है। वास्तव में ये सभी नाम सही हैं। ये सभी नाम एक ही साधना का वर्णन ऐसे कर रहे हैं, जैसे बहुत से अंधे एक हाथी का वर्णन उसके एक-2 अंग से करते हैं।

संवेदना-ऊर्जा के ऊर्ध्वगमन का मेरा अपना अनुभव

मैंने पिछली पोस्ट में बताया था कि भावनात्मक सदमे से कैसे मेरी संवेदना-ऊर्जा मूलाधार से सहस्रार तक लगातार प्रवाहित हो रही थी। वह प्रकाशमान ऊर्जा एक पुल की तरह लग रही थी, जो इन दोनों चक्रों को आपस में जोड़ रही थी। इसका अर्थ है कि मेरी सुषुम्ना नाड़ी खुल गई थी। वास्तव में यह ऊर्जा एक खारिश की अनुभूति जैसी ही साधारण सेंसेशन थी, पर बहुत घनीभूत थी। मैं पहले ऐसे ऊर्जा चैनेल पर कम ही विश्वास करता था, पर इस अनुभव से मेरा विश्वास पक्का हो गया। यह ऊर्जा प्रवाह लगभग 10 सेकेंड तक बना रहा, जिसके दौरान मुझे एक अति प्रकाशमान मंदिर का साक्षात अनुभव हुआ। जैसे कि मैं उस मंदिर से जुड़कर एकाकार हो गया था। फिर मेरी कुंडलिनी मेरे उस अनुभव क्षेत्र में आई, और मैं उससे एकाकार हो गया। यद्यपि यह पूर्ण एकाकार नहीं था। अर्थात यह खंडित या अल्प कुंडलिनी जागरण था, पूर्ण नहीं। सम्भवतः ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मेरी सुषुम्ना पूरी तरह नहीं खुली थी, और ज्यादा समय तक खुली नहीं रही। 

कुंडलिनी से एकाकार होने के अतिरिक्त लाभ

जिस समय संवेदना ऊर्जा मूलाधार से सहस्रार तक सुषुम्ना नाड़ी से प्रवाहित हो रही हो, उस समय जो मानसिक चित्र बनता है, वह उतना तीव्र व स्पष्ट होता है कि आदमी उससे जुड़कर एकाकार हो जाता है। उससे आदमी को जीवन का वह सबसे बड़ा सुख मिलता है, जो कि सम्भव है। उससे आदमी संतुष्ट हो जाता है। उससे वह जीवन के प्रति अनासक्त होकर अद्वैतशील बन जाता है। उससे उसके मन में कुंडलिनी का बसेरा हो जाता है, क्योंकि अद्वैत के साथ कुंडलिनी सदैव रहती है। यदि आदमी पहले से ही कुंडलिनी साधना कर रहा हो, तब सुषुम्ना प्रवाह के दौरान अन्य चित्रों की बजाय कुंडलिनी का चित्र बनता है, और उससे आदमी एकाकार हो जाता है। इससे कुंडलिनी को अतिरिक्त शक्ति मिल जाती है। यदि प्रारंभ से ही संवेदना के साथ कुंडलिनी को जोड़ा जाता रहे, तब दोनों एक दूसरे को बढ़ाते रहते हैं। सुषुम्ना प्रवाह के दौरान जब कुंडलिनी मेरे मन में आई, तब मुझे उसके साथ मंदिर से अधिक जुड़ाव महसूस हुआ। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि रोज के कुंडलिनी ध्यान से मैं कुंडलिनी के साथ जीने का अभ्यस्त हो गया था। इन बातों से सिद्ध होता है कि सम्पूर्ण साधना कुंडलिनी योग ही है।

यदि चक्र अवरोधित न हों, तो सुषुम्ना के ऊर्जा प्रवाह के अनुभव के बिना ही कुंडलिनी जागरण होता है, और वह जागरण संपूर्ण होता है

उपरोक्त तथ्य को सिद्ध करने के लिए मैं अपना ही उदाहरण देता हूँ। अपने आत्मज्ञान के अनुभव के दौरान मैं सपने में दिख रहे दृश्य के साथ एकाकार हुआ था, किसी विशेष कुंडलिनी चित्र के साथ नहीं। परंतु उसके बाद मेरी वह महिला मित्र कुंडलिनी के रूप में मेरे मन में दृढ़ता से संलग्न हो गई थी, जिसकी सर्वाधिक सहायता से मैं उस आत्मज्ञान के अनुभव तक पहुंचा था।

उसके कई वर्षों बाद मैं कुंडलिनी साधना करने लगा। मैंने उन्हीं वृद्ध आध्यात्मिक पुरुष को अपनी कुंडलिनी बनाया हुआ था। उस दौरान जब मेरी सुषुम्ना खुली और उसमें ऊर्जा का प्रवाह हुआ (यद्यपि मुझे वह प्रवाह अनुभव नहीं हुआ, क्योंकि मेरे सभी चक्र अनब्लॉक थे, इसी वजह से वह जागरण संपूर्ण था, यद्यपि मैंने डर कर उसे एकदम नीचे उतार दिया), तब कुंडलिनी चित्र मेरे मन में प्रकट हुआ और मैं उससे पूरी तरह से एकाकार हो गया। हालांकि बैकग्राउंड के अन्य दृष्यों से भी मैं एकाकार ही था, पर मुख्य तो कुंडलिनी ही थी। इसी तरह, आत्मज्ञान के समय भी मुझे पीठ में एनर्जी फलो का भान नहीं हुआ, इसीलिए वह जागरण भी पूर्ण शक्तिशाली लग रहा था।

विशेष प्रकार का श्वास होने पर ही सुषुम्ना नाड़ी खुलती है

कहते हैं कि जब श्वास डायफ्रागमेटिक अर्थात एब्डोमिनल, गहरी, धीमी और बिना आवाज के चले; तभी सुषुम्ना के खुलने की ज्यादा संभावना होती है। मेरे भावनात्मक सदमे के दौरान मेरी सांसें बिल्कुल ऐसी ही हो गई थीं। इसीसे मेरी सुषुम्ना नाड़ी खुली। इससे यह जनप्रचलित बात सिद्ध हो जाती है कि सांसों के नियमन से ही योग होता है। 

सुषुम्ना के थ्रू एनर्जी राईज के लिए मूलाधार और सहस्रार चक्र के बीच में बहुत ज्यादा विभवांतर अर्थात पोटेंशियल डिफरेंस पैदा होना चाहिए

भावनात्मक सदमे से ये फायदा हुआ कि मेरा मस्तिष्क फुली डिस्चार्ज होकर नेगेटिव पोटेंशियल में आ गया था। मूलाधार तांत्रिक योगसाधना के कारण फुली पोसिटिव पोटेंशियल में था। इससे मूलाधार और सहस्रार के बीच में बहुत ज्यादा पोटेंशियल डिफरेंस पैदा हुआ। इससे मूलाधार और सहस्रार के बीच में सेंसेशनल इलेक्ट्रिक स्पार्क पैदा हुआ, जिसे हम एनर्जी राइज कह रहे हैं।

और हां, पूर्व पोस्ट में जिस मित्र से मुझे भावनात्मक सदमा मिला था, उससे प्यारा समझौता हो गया है। सप्रेम।

Kundalini enhances the power or energy generated by yoga meditation

Friends, I am going to reveal the biggest secret related to Kundalini in this post.  The thing which is enhanced by yoga practice, has been given different names at different places.  Sometimes it is called energy, sometimes sensation, sometimes light, and sometimes it is called Kundalini.  Actually all these names are correct.  All these names are describing one part of the single sadhana as many blinds describe an elephant with one part of it.

My own experience of uplifting sensation energy

I told in a previous post how my emotional energy was constantly flowing from Muladhara to Sahasrara due to emotional shock.  That luminous energy looked like a bridge, connecting these two chakras.  This means that my sushumna channel in spinal cord was opened.  In fact, this energy was just like an ordinary sensation of skin scratching, but very condensate.  I used to believe less on such energy channels earlier, but this experience confirmed my faith.  This energy flow lasted for about 10 seconds, during which I experienced a very bright temple.  As if I joined the temple and got united with it.  Then my Kundalini came into my field of experience, and I became one with it.  Although it was not a complete one.  That is, it was a fragmented or meager Kundalini awakening, not complete.  Probably this happened because my spinal cord was not fully opened, and it did not remain open for long.

Additional benefits of being united with Kundalini

The moment the sensory energy is flowing from Muladhara to Sahasrara through the sushumna channel, the mental picture that is formed at that time is so intense and clear that the person becomes united with it by fully joining it to the depth of soul.  It gives man that greatest happiness of life, which is possible.  That makes the man satisfied.  With this he becomes detached towards life and becomes nondual. This causes Kundalini to settle in his mind, because Kundalini is always accompanied by Advaita.  If a man is already doing Kundalini practice, then during the sushumna flow, instead of other images, the picture of Kundalini is awakened in his mind, and that makes the man unified with kundalini. This gives additional power to the Kundalini.  If the Kundalini is paired with yoga sensations from the beginning, then the sensation and kundalini, both continue to enhance each other.  When Kundalini came to my mind during the sushumna flow, I felt more connected to that than the temple.  This happened because with daily Kundalini meditation, I used to live with Kundalini. It is proved by these things that complete energy cultivation is possible only through Kundalini Yoga.

If chakras are not blocked, then full kundalini awakening can be there without the experience of energy flow through sushumna channel

I give my own example to prove above facts. During my enlightenment experience, I was united with the varied scene seen in the dream, not with any particular Kundalini picture. But after that, my female friend as Kundalini was firmly attached to my mind, with the greatest help of which I reached the experience of that enlightenment.

Many years after that, I started doing Kundalini cultivation. I made the same old spiritual man my Kundalini. During that time, when my spinal cord opened and energy flowed in it (though I did not feel that flow, because all my chakras were unblocked, that’s why that was full awakening although I dropped it down out of fear), then the Kundalini picture appeared in my mind and I became completely united with it. Although I was also united with other background scenes, but the main one was Kundalini. In the same way, at time of enlightenment, I didn’t experience energy flow in back that’s why that was appearing as full awakening.

Sushumna channel opens up only when there is special breathing

It is said that when the breath is diaphragmatic, that is, abdominal, deep, slow, and without sound;  Only then is the sushumna more likely to open.  During my emotional shock my breath became exactly like this.  This is why my spinal cord opened.  This proves the popular conception that yoga is done only by the regulation of breath.

For the energy rise through sushumna, there should be a lot of potential difference between the muladhar and the Sahasrara chakras

It was an emotional shock as detailed in previous post that caused my brain to become fully discharged and it produced negative potential in it. My Muladhar was fully energized and thus was in full positive potential due to regular Tantric Yogasadhana.  This led to a lot of potential difference between Muladhar and Sahasrara.  This created a sensational electric spark between Muladhar and Sahasrar, which we are calling as Energy rise.
And yes, the friend I met with an emotional shock in the previous post has a lovely compromise.  With love…

Kundalini awakening with emotional shock

Friends, it is believed that emotional shock also leads to Kundalini awakening.  If Kundalini yoga is already being done, then it becomes more effective.  Today I will tell my latest experience related to this.

Meet on WhatsApp after 27 years

After senior secondary school education, many classmates met for the first time on WhatsApp after 27 years.  That looked good. There was greenery emerging on old feelings.  It was during that class that my Kundalini developed the fastest.  Another name of Kundalini is also Love.  It is simple that I had a good loving relationship with all the members of the group.  I started the group, although most of the members’ entry was done by an experienced she member.  Some days the group did well.  To understand the psychology of Kundalini, I wanted to know in detail about an emotional she member.  I am already fond of writing and Kundalini research.  The member read my message and she gave promise to talk with me soon after the children who came for tuition etc. finish their studies, in a neutral way.  Although that study could not be finished till today.  I assume that she may have done well by ignoring for family or other psychological reasons.  Because faith is the identity of Kundalini.  But I got emotional shock from that. I had felt that type of emotional shock 2-3 times earlier too.  In fact, such deception happens when we start thinking of the world of mind as real.  But in reality there can be a lot of difference between the two.  Your greatest friend in the mind can be your biggest enemy in real life.  This clearly shows that love is the greatest friend, and love is also the biggest enemy.  A pet animal loves its master very much, and does not want to get away from him, but the same owner hands it over to the butcher.  That’s why it is said that love or faith is also sometimes blind.

External symptoms of trauma

I had become very sensitive and emotional with that trauma.  I was writing something continuously or say rambling in the group.  The small talk of other members was tickling me.  Because of this I removed two members from the group.  Angered with that, the main admin also left.  However, I rejoined her at the same time and asked her to re-enter the members who were removed.  Even though I was emotional, it also gave me a smell of partiality in getting out of group, which disturbed my mind. Then aforementioned Tution madam also left the group without citing any reason. One by one people started going out of the group. I began to feel their grief for being out of the group.  After giving the same reason, I too got away from the group after coming under emotional guilt.  Although this continues in social media, but there is talk of sensitivity related to Kundalini here.  I cried a lot that evening.  At night I had to put a handkerchief under my pillow. Actually, those tears were of joy that were coming on meeting friends after a long time. My whole body and mind got tired.  My digestive system went awry.

Kundalini Surge During Emotional Shock

On the same emotional trauma, my Energy was climbing from my back and coming down from the front of the body, in a closed loop again and again with a little attention on this.  Sometimes Kundalini was also associated with that energy.  Suddenly a lot of energy went up in my back in the night.  I had a dream along with that I am entering in through the door of a very big and beautiful temple.  That energy was absorbed into my brain.  The special thing was, that energy was not causing any pressure in my brain, as it often does.  Perhaps my brain was refreshed by getting enough sleep for several days.  The second reason was that the emotional shock left the mind empty.  Then Kundalini got connected with that energy in the brain.  It was an experience like Kundalini awakening, though it could not reach its level.

The description about Kundalini will be found only in this website

I studied everywhere.  Everywhere there is only a description of energy, nowhere is Kundalini.  Energy is considered as Kundalini in most places.  But there is a lot of difference between the two.  Energy without Kundalini is an Indian missile that does not have the national flag of India imprinted on it.  The special thing, which is a symbol of love, and the means to real development of humanity, is Kundalini.  Energy only serves to give brilliant life to Kundalini.  Apart from this website, if there is a description of Kundalini, then it is the classic book “Patanjali Yogasutra”.  In it, Kundalini is called Dhyanalamban (mental support for meditation).  Confusion remains in the mind of most people between the nature of Kundalini and Shakti (energy).

A book that saved me from emotional shock every time and helped me get out of it

That book is “Physiology Philosophy”, available on the “Shop (Library)” webpage of this website.  For detailed information visit this link.

The liqueur is the Somaras or Elixir of Life with the Advaita / non-dual attitude

With the help of above book, the wine also developed my kundalini or soul along with my transformation.  Empty wines harm Kundalini.  With the nondual feeling, even a small amount of alcohol used to have a great effect, and there was no addiction to alcohol.  This means that the Somaras or Elixir of Life mentioned in earlier times is a high quality wine drunk in right amount with nondual spirit, not any other magical fluid.  Gods also use it.

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कुंडलिनी जागरण के लिए भावनात्मक सदमे की आवश्यकता

दोस्तों, मान्यता है कि भावनात्मक सदमे से भी कुंडलिनी जागरण होता है। यदि पहले से ही कुंडलिनी योग किया जा रहा हो, तब तो वह ज्यादा प्रभावी हो जाता है। आज मैं इसी से संबंधित अपना ताजा अनुभव बताऊंगा।

27 साल बाद व्हाट्सएप पर मुलाकात

सीनियर सेकंडरी स्कूल एजुकेशन के बाद कई सहपाठियों से पहली बार मुलाकात 27 साल बाद व्हाट्सएप पर हुई। अच्छा लग रहा था। पुरानी भावनाओं पर हरियाली छा रही थी। उसी क्लास के दौरान मेरी कुंडलिनी सबसे तेजी से विकसित हुई थी। कुंडलिनी का दूसरा नाम प्रेम भी है। सीधी सी बात है कि ग्रुप के सभी सदस्यों के साथ मेरा अच्छा प्रेमपूर्ण संबंध था। ग्रुप मैंने शुरु किया था, हालांकि सदस्यों को जोड़ने का अधिकांश काम एक अनुभवी सदस्या ने किया था। कुछ दिन ग्रुप अच्छा चला। कुंडलिनी का मनोविज्ञान समझने के लिए मैं एक भावनात्मक सदस्या के बारे में विस्तार से जानना चाहता था। लेखन का औऱ कुंडलिनी रिसर्च का मुझे पहले से ही शौक है। सदस्या ने मेरा मेसेज पढ़ा और ट्यूशन आदि के लिए आए बच्चों की पढ़ाई खत्म होने के बाद बात करने का भरोसा उदासीन भाव के साथ दिया। यद्यपि वह पढ़ाई आज तक खत्म नहीं हो सकी। मैंने मान लिया कि पारिवारिक या अन्य मनोवैज्ञानिक कारणों से उसने ठीक ही किया होगा। क्योंकि विश्वास ही कुंडलिनी की पहचान है। पर मुझे उससे भावनात्मक सदमा लगा। वैसा भावनात्मक सदमा मुझे 2-3 बार पहले भी लग चुका था। वास्तव में ऐसा धोखा तब होता है, जब हम मन के संसार को असली मानने लगते हैं। पर वास्तव में दोनों में बहुत अंतर हो सकता है। मन में जो आपका सबसे बड़ा मित्र है, वह असल जीवन में आपका सबसे बड़ा शत्रु हो सकता है। इससे साफ जाहिर है कि प्रेम ही सबसे बड़ा मित्र है, और प्रेम ही सबसे बड़ा शत्रु भी है। एक पालतु पशु अपने मालिक से बहुत ज्यादा प्रेम करता है, और उससे दूर नहीं होना चाहता, पर वही मालिक उसे कसाई के हाथों सौंप देता है। तभी तो कहते हैं कि प्यार या विश्वास अंधा भी होता है। 

मानसिक आघात के बाहरी लक्षणों का पैदा होना

उस आघात से मैं बहुत सेंसिटिव व इमोशनल हो गया था। मैं ग्रुप में कुछ न कुछ लिखे जा रहा था। अन्य सदस्यों की छोटी-2 बातें मुझे चुभ रही थीं। इस वजह से मैंने दो सदस्यों को ग्रुप से निकाल दिया। उससे नाराज होकर एडमिन सदस्या भी निकल गई। हालाँकि मैंने उन्हें उसी समय दुबारा ग्रुप में शामिल कर दिया औऱ कहा कि वे चाहें तो निकाले गए सदस्यों को दुबारा दाखिल कर दें। मैं इमोशनल तो था ही , उससे मुझे उसके बाहर निकलने में भी पार्शियलिटी की बू आई, जिससे मेरा मन और डिस्टर्ब हो गया। उसके बाद उपरोक्त ट्यूशन मैडम जी भी बिना वजह बताए ग्रुप छोड़कर चली गईं। एक-एक करके लोग ग्रुप से बाहर जाने लगे। मैं ग्रुप से बाहर होने के उनके दुख को महसूस करने लगा। वही वजह बता कर मैंने भी भावनात्मक आवेश में आकर ग्रुप से किनारा कर लिया। हालांकि ऐसा चलता रहता है सोशल मीडिया में, पर यहाँ पर कुंडलिनी से जुड़ी संवेदनशीलता की बात हो रही है। उस शाम को मैं काफी रोया। रात को मुझे अपने सिरहाने के के नीचे रुमाल रखना पड़ा। दरअसल वो आँसू खुशी के थे, जो लंबे अरसे बाद दोस्तों से मिलकर आ रहे थे। मेरे पूरे शरीर और मन में थकान छा गई। मेरी पाचन प्रणाली गड़बड़ा गई। 

भावनात्मक सदमे के दौरान कुंडलिनी सर्ज

उसी भावनात्मक आघात वाली शाम को मेरी एनर्जी बार-2 मेरी पीठ से चढ़कर शरीर के आगे के भाग से नीचे उतर रही थी, एक बंद लूप में। कभी-कभी उस एनर्जी के साथ कुंडलिनी भी जुड़ जाती थी। रात को नींद में अचानक बहुत सारी एनर्जी मेरी पीठ में ऊपर चढ़ी। उसके साथ में ऐसा स्वप्न आया कि मैं बहुत बड़े औऱ सुंदर मंदिर के द्वार से अंदर प्रविष्ट हो रहा हूँ। वह एनर्जी मेरे मस्तिष्क में समा रही थी। विशेष बात यह थी कि उस एनर्जी से मेरे मस्तिष्क में बिल्कुल भी दबाव पैदा नहीं हो रहा था, जैसा अक्सर होता है। शायद कई दिनों तक भरपूर नींद लेने से मेरा मस्तिष्क तरोताजा हो गया था। दूसरी वजह यह थी कि भावनात्मक सदमे से दिमाग खाली सा हो गया था। फिर मस्तिष्क में उस एनर्जी के साथ कुंडलिनी जुड़ गई। वह कुंडलिनी जागरण जैसा अनुभव था, यद्यपि उसके स्तर तक नहीं पहुंच सका। 

कुंडलिनी के बारे में वर्णन केवल इसी वैबसाइट में मिलेगा

मैंने हर जगह अध्ययन किया। हर जगह केवल एनर्जी का ही वर्णन है, कुंडलिनी का कहीं नहीं। अधिकांश जगह एनर्जी को ही कुंडलिनी माना गया है। पर दोनों में बहुत अंतर है। बिना कुंडलिनी की एनर्जी तो वैसी भारतीय मिसाइल है, जिस पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज अंकित नहीं है। विशेष चीज, जो प्यार की निशानी है, और मानवता का असली विकास करने वाली है, वह कुंडलिनी ही है। एनर्जी तो केवल कुंडलिनी को जीवन्तता प्रदान करने का काम करती है। इस वेबसाइट के इलावा यदि कहीं कुंडलिनी का वर्णन है, तो वह “पतंजलि योगसूत्र” पुस्तक है। उसमें कुंडलिनी को ध्यानालम्बन कहा गया है। अधिकांश लोगों के मन में कुंडलिनी व शक्ति (एनर्जी) के स्वभाव के बीच में कन्फ्यूजन बना रहता है।

एक पुस्तक जिसने मुझे हर बार भावनात्मक सदमे से बचाया और उससे बाहर निकलने में मेरी मदद की

वह पुस्तक है, “शरीरविज्ञान दर्शन”, जो इस वेबसाइट के “शॉप (लाईब्रेरी)” वेबपेज पर उपलब्ध है। विस्तृत जानकारी के लिए इस लिंक पर जाएं।

अद्वैत भाव के साथ मदिरा ही सोमरस या एलिकसिर ऑफ़ लाइफ है

उपरोक्त पुस्तक के साथ मदिरा ने मेरे रूपांतरण के साथ मेरी कुंडलिनी या आत्मा का विकास भी किया। खाली मदिरा कुंडलिनी को हानि पहुंचाती है। इस भावना के साथ थोड़ी सी मदिरा का भी बहुत ज्यादा असर होता था, और मदिरा की लत भी नहीं लगती थी। इसका अर्थ है कि पुराने समय में जो सोमरस या एलिकसिर ऑफ़ लाइफ बताया गया है, वह अद्वैत भावना वाले विधिविधान के साथ व उचित मात्रा में सेवन की गई उच्च कोटि की मदिरा ही है, कोई अन्य जादुई द्रव नहीं। देवता भी इसका पान करते हैं। 

प्रेम या सम्मान, दोनों में से एक से संतुष्ट हो जाते।
अन्यथा अपनी भावनाओं के भंडार की राह को प्रकाशित कर देते, हम स्वयं ही अन्वेषण कर लेेते।।

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ਕੁੰਡਲਨੀ ਪ੍ਰੋਮੋਸ਼ਨ

ਦੋਸਤੋ, ਇਸ ਹਫਤੇ ਮੈਂ ਪਿਛਲੀ ਪੋਸਟ ਨੂੰ ਸੰਪਾਦਿਤ ਕਰਨ ਅਤੇ ਅਪਡੇਟ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਰੁੱਝਿਆ ਹੋਇਆ ਸੀ। ਪਿਛਲੀ ਪੋਸਟ ਦਾ ਵਿਸ਼ਾ ਮਹੱਤਵਪੂਰਣ ਸੀ। ਉਸ ਤੋਂ ਬਹੁਤ ਸਾਰੀਆਂ ਗਲਤਫਹਿਮੀਆਂ ਪੈਦਾ ਹੋ ਰਹੀਆਂ ਸਨ।  ਜੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਹਟਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਹੁੰਦਾ ਤਾਂ ਪੋਸਟ ਬਹੁਤ ਲੰਬੀ ਹੁੰਦੀ।  ਇਸ ਲਈ ਪੋਸਟ ਦੀ ਲੰਬਾਈ ਅਤੇ ਇਸਦੇ ਵਿਸ਼ੇ ਦੇ ਵਿਸਥਾਰ ਦੇ ਵਿਚਕਾਰ ਸੰਤੁਲਨ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਸੀ।  ਮੇਰੇ ਇਕ ਦੋਸਤ ਨੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਮੀਆਂ ਵੱਲ ਧਿਆਨ ਖਿੱਚਿਆ, ਇਸ ਲਈ ਮੈਂ ਉਸ ਦਾ ਨਾਮ ਸਹਿ-ਸੰਪਾਦਕ ਰੱਖਿਆ।  ਲੇਖਕ ਦੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਬਣਦੀ ਹੈ ਕਿ ਉਸ ਦੁਆਰਾ ਲਿਖੇ ਗਏ ਵਿਸ਼ੇ ਤੋਂ ਕੋਈ ਗਲਤਫਹਿਮੀ ਪੈਦਾ ਨਾ ਹੋਏ।

ਅੱਜ ਦੀ ਪੋਸਟ ਪ੍ਰਚਾਰਕ ਹੈ।  ਅੱਜ ਕੱਲ੍ਹ ਇਸ ਵੈਬਸਾਈਟ ਦੀ ਸਭ ਤੋਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਣ, ਆਧਾਰਭੂਤਬ ਇਕ ਵਿਸ਼ਾਲ ਕਿਤਾਬ ਛੂਟ ਦੀ ਪੇਸ਼ਕਸ਼ ਦੇ ਨਾਲ ਚੱਲ ਰਹੀ ਹੈ, ਜੋ 29 ਜੂਨ ਨੂੰ ਖਤਮ ਹੋ ਰਹੀ ਹੈ। ਵਿਸਥਾਰ ਜਾਣਕਾਰੀ ਲਈ ਹੇਠ ਦਿੱਤੇ ਪ੍ਰੋਮੋ ਚਿੱਤਰ ਤੇ ਕਲਿਕ ਕਰੋ।

ਜੇ ਤੁਸੀਂ ਪਿਛਲੇ ਹਫਤੇ ਦੀ ਪੋਸਟ ਦਾ ਅਪਡੇਟ ਕੀਤਾ ਸੰਸਕਰਣ ਪੜ੍ਹਨਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹੋ, ਹੇਠ ਦਿੱਤੇ ਲਿੰਕ ਤੇ ਕਲਿੱਕ ਕਰੋ।

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Kundalini promotion

Friends, this week I was busy editing and updating previous post. The subject of the previous post was important.  A lot of misunderstandings were brewing from that.  If those were removed already then the post would have been very long.  So there had to be a balance between the length of the post and the extension of its subject.  A friend of mine drew attention to those shortcomings, so I named him as co-editor.  It is the responsibility of the writer that no misunderstanding arise from the subject written by him.
Today’s post is promotional as well.  Nowadays the most important, basic and ambitious book of this website is going on with a huge discount offer, which expires on June 29.  Click the following promo image for detailed information.

If you want to read the updated version of last week’s post, then click on this link

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कुण्डलिनी प्रोमोशन

दोस्तों, इस हफ्ते मैं पिछ्ली पोस्ट को संपादित और अपडेट करने में व्यस्त रहा। पिछली पोस्ट का विषय महत्त्वपूर्ण था। उससे बहुत सी गलतफहमियां पैदा हो रही थीं। यदि उन्हें पहले ही दूर किया जाता तो पोस्ट बहुत बड़ी हो जाती। इसलिए पोस्ट की लंबाई और उसके विषय के विस्तार के बीच में संतुलन बनाना पड़ा। मेरे एक मित्र ने उन कमियों की ओर ध्यान दिलाया, इसलिए मैंने उनका नाम सह संपादक के तौर पर डाला है। लेखक की यह जिम्मेदारी बनती है कि उसके द्वारा लिखित विषय से कोई गलतफहमी पैदा न हो।साथ में आज की पोस्ट प्रोमोशनल है। आजकल इस वेबसाइट की सबसे महत्वपूर्ण, आधारभूत और महत्त्वाकांक्षी पुस्तक पर बड़ा भारी डिस्काउंट ऑफर चल रहा है, जो 29 जून को समाप्त हो रहा है। विस्तृत जानकारी के लिए निम्नलिखित प्रोमो चित्र को क्लिक करें।

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Kundalini can also lead to suicide?

Coauthored by dr. bhishm sharma, veterinary surgeon, H.P. state.

Coeditor : Master Vinod sharma {teacher, H.P. State}

Photo by Vanderlei Longo from Pexels

Just a few days ago, the case of suicide of famous Bollywood star Sushant Singh Rajput came to light. First, we wish his soul peace. He was on high. Elevations are achieved by Kundalini. So can Kundalini also cause suicide? In this post we will analyze it.

Depression is like an contagious disease, which can be overcome with the help of Kundalini Yoga: A Wonderful Spiritual Psychology

There came a videogame named Blue Whale, with which many children committed suicide while playing. Sushant had posted a painting of a man who had committed suicide on his social media wall for several days. In his film Chichhore, he kept explaining to his son throughout the film to avoid this disease. Similarly, according to a news, a Bihar state boy kept watching news of Sushant’s suicide alone till late in the night and he was also found hanging in the morning. This is all a game of the mind. The contemplation related to such suicide creates a bit of tension on the vishudhi chakra of throat. It feels like a choke, and there is a stuffy feeling on the throat. Kundalini yogis already have a habit of meditating on the this chakra. He repeatedly focuses Kundalini there. That gives life force to the throat, and kundalini also becomes strong. Gastritis may also have role in the throat suffocation. Stressful and unhealthy lifestyle leads to gastritis. Nowadays safe medicine exists for its treatment. Such medicines can harm people practicing yoga. Therefore, by eating half of their dose, their effect on themselves should be tested. Anti-depressant drugs can also increase depression for many people, because they significantly reduce a person’s memory and performance. Those medicines cause damage to the long-lived Kundalini, which can affect all the work related to it. If luck is good, and hard work is done, then it also gives an opportunity to create a new Kundalini-image and awaken it. However, it takes time to adjust to new kundalini. As per sources, Sushant was taking antidepressants as per doctor’s advice, although he was not taking those for sometime. One should stay as much silent as possible with tongue tightly adhered to palate to ease downward flow of kundalini or thoughts from brain. The one who suppresses the suicidal thoughts while he is in the midst of suicidal environment is a real yogi.

Sushant Singh Rajput many times got emotional in memory of his late mother

He loved his mother the most. It is a good thing and everyone should love family ancestors and elders. His last social media post also remembered his mother. We got to hear this from the media. Only the most beloved thing settles in the mind and becomes a Kundalini. This means that he had his mother’s image in his mind as Kundalini. This gave him continued successes.

By the way, pure Kundalini related to ancestors and family people or elders is always calm and full of welfare. But many times, with the support of the same Kundalini, the romantic love type Kundalini dominates the mind. She is very gaudy and can be dangerous at times. Sushant’s love and breakup from some of the star girls also came to be heard. A stable couple life is very important to give Kundalini positive and right direction. Although this continues to happen in the film world, but not everyone is the same, and it does not suit to everyone either. Suicides in love affair is related to this natural Kundalini. According to the doctor, he was suffering from Bipolar disease. This is another form of Kundalini-depression. This is characterized by a period of intense excitement followed by intense depression. If done properly, Kundalini yoga is the best treatment for bipolar disease.  The alleged artist had treated her for a few days, then left.

The sorrow of separation from someone is also a form of Kundalini depression.  In order to convert that sorrow into happiness, the mental picture of the separated person should be made as a Kundalini and start practicing Kundalini Yoga with it.

Kundalini brings out the disorders of the mind.  In fact, only disorders can cause depression, not the kundalini. One should be busy with work at all times to avoid Kundalini depression. The said artist had left work since many days and closed him inside room.

The spiritual progress of that film artist was also progressing rapidly with help of Kundalini

Eyewitnesses say that he was a spiritual person and very sensitive. His young body had an elderly mind. Such qualities arise from Kundalini only.

Kundalini can make a man carefree

Due to Kundalini, man is filled with advaita or non-duality. This means that night and day, life-death, friend-enemy, happiness and sorrow, all the opposite things start to look the same. This implies that man is not afraid of anything. When a man is not afraid of his death, then he will become careless about his life. That carelessness takes the form of suicide when it crosses the border.

In fact, alertness increases with Advaita, not carelessness.  But many people take Advaita incorrectly.

External support is required to handle the Kundalini

In the above situation man should get external support. People should continue to interact. Should spend a lot of time with family and friends. Must be involved in social functions and other social activities. This will show Kundalini Yogi the love for life in people’s minds. There will be fear of untowardness in the minds of people. This will inspire him to live life properly. Today’s Corona Lockdown has taken away this social support from many people.

Best support for Kundalini is a Guru

The Guru has already passed through the period of Kundalini. Therefore, he knows everything. Therefore, he alone can give power of the whole society to the new Kundalini Yogi.

Kundalini depression is the poison emanating from the spiritual ocean

The description of Samudramanthan or ocean churning is found in Hindu Puranas. Mandarachal mountain is Kundalini. Kundalini-Dhyan is Vasuki Nag. Good things emanating from that are good thoughts, which make a man a deity. The dirty things emanating from that are dirty thoughts, which demonize a man. The churn goes on with the hard work and cooperation of the gods and demons of the mind. The poison that comes out near the end is the depression born of Kundalini. The Shiva who drinks it is Guru. He keeps it suspended in throat. This means that he takes away the disciple’s depression, but is not affected by it himself. The nectar that emerges after that is the bliss that comes from Kundalini. The meaning of Lakshmi emanating from the churning of the ocean appears to be tantric. She leads to Lord Narayan.

My own experience related to Kundalini Yoga

What I wrote in this post is my own experience of kundalini related depression, and getting out of it. Luckily, I had the support of a neighbor, to whose house I could move freely without asking, and with whom I could spend as much time as I wanted. Most other people treated me like a creature from Mars. Good joke done.

Kundalini meditation is an extreme state of knowledge; depression is felt by other people

Kundalini depression is relative. The Kundalini Yogi himself feels the highest state of knowledge in kundalini meditation. Other experts of Kundalini also know this. Those people unaware of Kundalini feel that depression. That is why people keep criticizing Kundalini Yogi, and fill him with depression. People criticize him for his good so that he can learn to live without Kundalini, but he often does not understand this. His depression is caused by removing Kundalini by him from his mind, as he has become Kundalini addictive. There is no question of darkness of depression in front of Kundalini light. That is why either Kundalini should not be left away in any condition or there should be no attachment to Kundalini and the habit of living without it should also be maintained. Otherwise, depression is likely to arise, just as a drug addict feels it while leaving addiction suddenly. The more light one gets, the darker it will be when it is extinguished. That is why the emphasis is on adopting good association or company. It is good, if you cannot sow flowers in the way of others, then also you should not sow thorns. Flowers will grow by themselves. Mahatma Buddha has said the same.

Actually, Kundalini draws the power of body and mind. Weakness generated through it can be the cause of depression. Therefore, to avoid that weakness, there is a provision of consumption of Panchamakars or five Ms in Tantra.

It should be noted that Kundalini depression is higher with naturally occurring Kundalini. Although natural Kundalini results in development of spirituality very fast. Therefore, to avoid this danger of natural Kundalini, artificial Kundalini yoga should be done.

A book that helped me get out of Kundalini depression completely

The book is “Physiology Philosophy” or “shareervigyan darshan”. Full details are available at the following link.

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ਕੁੰਡਲਨੀ ਵੀ ਆਤਮ ਹੱਤਿਆ ਲਈ ਪ੍ਰੇਰਿਤ ਕਰ ਸਕਦੀ ਹੈ

ਸਹਲੇਖਕ: ਡਾ. ਭੀਸ਼ਮ ਸ਼ਰਮਾ, ਵੈਟਰਨਰੀ ਸਰਜਨ, ਐਚ.ਪੀ. ਰਾਜ

ਸਹ ਸੰਪਾਦਕ: ਮਾਸਟਰ ਵਿਨੋਦ ਸ਼ਰਮਾ {ਅਧਿਆਪਕ, ਐਚ. ਪੀ. ਰਾਜ}

Photo by Vanderlei Longo from Pexels

ਕੁਝ ਦਿਨ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਮਸ਼ਹੂਰ ਬਾਲੀਵੁੱਡ ਸਟਾਰ ਸੁਸ਼ਾਂਤ ਸਿੰਘ ਰਾਜਪੂਤ ਦੀ ਖੁਦਕੁਸ਼ੀ ਦਾ ਮਾਮਲਾ ਸਾਹਮਣੇ ਆਇਆ ਸੀ। ਪਹਿਲਾਂ, ਅਸੀਂ ਉਸਦੀ ਆਤਮਾ ਨੂੰ ਸ਼ਾਂਤੀ ਦੀ ਕਾਮਨਾ ਕਰਦੇ ਹਾਂ। ਉਹ ਕਾਰੋਬਾਰਾਂ ਵਿੱਚ ਉੱਚਾ ਸੀ। ਉੱਚਾਈ ਕੁੰਡਲਨੀ ਦੁਆਰਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਤਾਂ ਕੀ ਕੁੰਡਲਨੀ ਵੀ ਆਤਮ ਹੱਤਿਆ ਲਈ ਪ੍ਰੇਰਿਤ ਕਰ ਸਕਦੀ ਹੈ? ਇਸ ਪੋਸਟ ਵਿੱਚ ਅਸੀਂ ਇਸਦਾ ਵਿਸ਼ਲੇਸ਼ਣ ਕਰਾਂਗੇ।

ਉਦਾਸੀ ਇੱਕ ਫੈਲਣ ਵਾਲੀ ਬਿਮਾਰੀ ਵਾਂਗ ਹੈ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਕੁੰਡਲਨੀ ਯੋਗ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਨਾਲ ਦੂਰ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ: ਇੱਕ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਅਧਿਆਤਮਕ ਮਨੋਵਿਗਿਆਨ

ਬਲਿਯੂ ਵਹੇਲ ਨਾਮ ਦਾ ਇਕ ਵੀਡੀਓਗੇਮ ਆਇਆ ਸੀ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਖੇਡਦਿਆਂ ਕਈ ਬੱਚਿਆਂ ਨੇ ਆਤਮ ਹੱਤਿਆ ਕਰ ਲਈ ਸੀ।  ਸੁਸ਼ਾਂਤ ਨੇ ਕਈ ਦਿਨਾਂ ਤੋਂ ਆਪਣੀ ਸੋਸ਼ਲ ਮੀਡੀਆ ਦੀਵਾਰ ‘ਤੇ ਸਵੈ-ਵਿਨਾਸ਼ਕਾਰੀ ਆਦਮੀ ਦੀ ਪੇਂਟਿੰਗ ਪੇਂਟ ਕੀਤੀ ਸੀ। ਆਪਣੀ ਛਿਛੋਰੇ  ਫਿਲਮ ਵਿਚ, ਉਹ ਇਸ ਬਿਮਾਰੀ ਤੋਂ ਬਚਣ ਲਈ ਆਪਣੇ ਬੇਟੇ ਨੂੰ ਸਮਝਾਉਂਦਾ ਰਿਹਾ। ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਇਕ ਖ਼ਬਰ ਅਨੁਸਾਰ ਬਿਹਾਰ ਰਾਜ ਦਾ ਇਕ ਲੜਕਾ ਦੇਰ ਰਾਤ ਤੱਕ ਸੁਸ਼ਾਂਤ ਦੀ ਖ਼ੁਦਕੁਸ਼ੀ ਦੀ ਖ਼ਬਰ ਨਿੱਜੀ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਵੇਖਦਾ ਰਿਹਾ ਅਤੇ ਉਹ ਵੀ ਸਵੇਰੇ ਲਟਕਦਾ ਪਾਇਆ ਗਿਆ।  ਇਹ ਸਭ ਮਨ ਦੀ ਖੇਡ ਹੈ। ਅਜਿਹੀ ਖੁਦਕੁਸ਼ੀ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਚਿੰਤਨ ਗਲੇ ਦੇ ਸ਼ੂਧਤਾ ਚੱਕਰ ‘ਤੇ ਥੋੜਾ ਤਣਾਅ ਪੈਦਾ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਇਹ ਇਕ ਗਲਾ ਦੱਬਣ ਵਾਂਗ ਮਹਿਸੂਸ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਗਲੇ ‘ਤੇ ਇਕ ਘੁਟਣ ਮਹਿਸੂਸ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਕੁੰਡਲਨੀ ਯੋਗੀ ਦੀ ਸ਼ੁੱਧਤਾ ਚਕਰ ਉੱਤੇ ਮਨਨ ਕਰਨ ਦੀ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਆਦਤ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਉਹ ਉਥੇ ਕੁੰਡਲਨੀ ਦਾ ਧਿਆਨ ਬਰੋਬਰ ਕੇਂਦ੍ਰਤ ਕਰਦਾ ਹੈ।  ਇਹ ਗਲ਼ੇ ਨੂੰ ਜੀਵਨੀ ਸ਼ਕਤੀ ਦੀ ਤਾਕਤ ਦਿੰਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਕੁੰਡਲਨੀ ਵੀ ਮਜ਼ਬੂਤ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਗੈਸਟਰਾਈਟਸ ਦੀ ਵੀ ਗਲੇ ਦੇ ਦਮ ਘੁਟਣ ਵਿਚ ਭੂਮਿਕਾ ਹੋ ਸਕਦੀ ਹੈ। ਤਣਾਅਪੂਰਨ ਅਤੇ ਗੈਰ-ਸਿਹਤਮੰਦ ਜੀਵਨ ਸ਼ੈਲੀ ਗੈਸਟ੍ਰਾਈਟਿਸ ਦਾ ਕਾਰਨ ਬਣਦੀ ਹੈ। ਅੱਜ ਕੱਲ ਇਸ ਦੇ ਇਲਾਜ ਲਈ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਦਵਾਈ ਮੌਜੂਦ ਹੈ। ਅਜਿਹੀਆਂ ਦਵਾਈਆਂ ਯੋਗਾ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਨੁਕਸਾਨ ਪਹੁੰਚਾ ਸਕਦੀਆਂ ਹਨ। ਇਸ ਲਈ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਅੱਧੀ ਖੁਰਾਕ ਖਾਣ ਨਾਲ, ਸ਼ਰੀਰ ‘ਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਪ੍ਰਭਾਵ ਦੀ ਜਾਂਚ ਕੀਤੀ ਜਾਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ। ਐਂਟੀ-ਡਿਪਰੇਸੈਂਟ ਦਵਾਈਆਂ ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਲੋਕਾਂ ਲਈ ਉਦਾਸੀ ਨੂੰ ਵਧਾ ਸਕਦੀਆਂ ਹਨ, ਕਿਉਂਕਿ ਉਹ ਵਿਅਕਤੀ ਦੀ ਯਾਦਦਾਸ਼ਤ ਅਤੇ ਕਾਮ ਕਰਨ ਦੀ ਕਾਬਿਲੀਅਤ ਨੂੰ ਘਟਾਉਂਦੀਆਂ ਹਨ। ਉਹ ਦਵਾਈਆਂ ਲੰਬੇ ਸਮੇਂ ਲਈ ਰਹਿਣ ਵਾਲੀਆਂ ਕੁੰਡਲਨੀ ਨੂੰ ਨੁਕਸਾਨ ਪਹੁੰਚਾਉਂਦੀਆਂ ਹਨ, ਜੋ ਇਸ ਨਾਲ ਜੁੜੇ ਸਾਰੇ ਕੰਮਾਂ ਨੂੰ ਪ੍ਰਭਾਵਤ ਕਰ ਸਕਦੀਆਂ ਹਨ। ਜੇ ਕਿਸਮਤ ਚੰਗੀ ਹੈ, ਅਤੇ ਸਖਤ ਮਿਹਨਤ ਕੀਤੀ ਜਾਵੇ, ਤਾਂ ਇਹ ਇਕ ਨਵੀਂ ਕੁੰਡਲਨੀ-ਚਿਤਰ ਬਣਾਉਣ ਅਤੇ ਇਸ ਨੂੰ ਜਗਾਉਣ ਦਾ ਇਕ ਅਵਸਰ ਵੀ ਪ੍ਰਦਾਨ ਕਰਦੀਆਂ ਹਨ। ਹਾਲਾਂਕਿ ਨਵੀ ਕੁੰਡਲਨੀ ਨਾਲ ਅਭਿਅਸਟ ਹੋਣ ਲਈ ਸਮਯ ਲਗਦਾ ਹੈ। ਸੁਸ਼ਾਂਤ ਵੀ ਉਦਾਸੀ ਨਿਵਾਰਕ ਦਵਾ ਖਾ ਰਿਹਾ ਸੀ, ਹਾਲਾਂਕਿ ਕੁਝ ਵੇਲੇ ਤੋਂ ਨੀ ਖਾ ਰਿਗ ਸੀ। ਤੁਹਾਨੂੰ ਜਿੰਨਾ ਹੋ ਸਕੇ ਚੁੱਪ ਰਹਿਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਜੀਭ ਨੂੰ ਤਾਲੂ ਨਾਲ ਕੱਸ ਕੇ ਜੋੜਿਆ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਜੋ ਦਿਮਾਗ ਦੀ ਕੁੰਡਲਨੀ ਜਾਂ ਵਿਚਾਰ ਅਸਾਨੀ ਨਾਲ ਹੇਠਾਂ ਆ ਸਕਣ। ਜਿਹੜਾ ਵਿਅਕਤੀ ਆਪ ਨੂੰ ਖੁਦਕੁਸ਼ੀ ਦੀਆਂ ਭਾਵਨਾਵਾਂ ਦੇ ਵਿਚਕਾਰ ਹੋਣ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਵੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਦਬਾਉਂਦਾ ਹੈ ਉਹ ਅਸਲ ਯੋਗੀ ਹੈ।

ਸੁਸ਼ਾਂਤ ਸਿੰਘ ਰਾਜਪੂਤ ਆਪਣੀ ਸਵਰਗਵਾਸੀ ਮਾਂ ਦੀ ਯਾਦ ਵਿਚ ਕਈ ਵਾਰ ਭਾਵੁਕ ਹੁੰਦੇ ਸੀ

ਉਹ ਆਪਣੀ ਮਾਂ ਨੂੰ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਧ ਪਿਆਰ ਕਰਦਾ ਸੀ। ਇਹ ਵਧੀਆ ਗੱਲ ਹੈ,ਅਤੇ ਸਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਬਜ਼ੁਰਗਾਂ ਲਈ ਪਿਆਰ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਉਸ ਦੀ ਆਖ਼ਰੀ ਸੋਸ਼ਲ ਮੀਡੀਆ ਪੋਸਟ ਨੇ ਵੀ ਉਸ ਦੀ ਮਾਂ ਨੂੰ ਯਾਦ ਕੀਤਾ। ਸਾਨੂੰ ਇਹ ਗੱਲ ਮੀਡੀਆ ਤੋਂ ਸੁਣਨੀ ਮਿਲੀ। ਕੇਵਲ ਸਭ ਤੋਂ ਪਿਆਰੀ ਚੀਜ਼ ਮਨ ਵਿੱਚ ਸਮਾ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਇੱਕ ਕੁੰਡਲਨੀ ਬਣ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਇਸਦਾ ਅਰਥ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਉਸ ਦੇ ਮਨ ਵਿੱਚ ਕੁੰਡਲਨੀ ਵਜੋਂ ਉਸਦੀ ਮਾਂ ਦੀ ਤਸਵੀਰ ਸੀ। ਇਸ ਨਾਲ ਉਸ ਨੂੰ ਨਿਰੰਤਰ ਸਫਲਤਾਵਾਂ ਮਿਲੀਆਂ।ਤਰੀਕੇ ਨਾਲ, ਪੂਰਵਜਾਂ ਅਤੇ ਪਰਿਵਾਰਕ ਲੋਕਾਂ ਜਾਂ ਬਜ਼ੁਰਗਾਂ ਨਾਲ ਸੰਬੰਧਿਤ ਸ਼ੁੱਧ ਕੁੰਡਲਨੀ ਹਮੇਸ਼ਾਂ ਸ਼ਾਂਤ ਅਤੇ ਭਲਾਈ ਨਾਲ ਭਰਪੂਰ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ। ਪਰ ਕਈ ਵਾਰ ਉਸੇ ਕੁੰਡਲਨੀ ਦੇ ਸਮਰਥਨ ਨਾਲ, ਰੋਮਾਂਟਿਕ ਪ੍ਰੇਮ ਕਿਸਮ ਦੀ ਕੁੰਡਲਨੀ ਮਨ ਤੇ ਹਾਵੀ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਉਹ ਬਹੁਤ ਸੋਹਣੀ ਤੇ ਭੜਕਾਉਣ ਵਾਲੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਕਈ ਵਾਰ ਖ਼ਤਰਨਾਕ ਵੀ ਹੋ ਸਕਦੀ ਹੈ। ਸੁਸ਼ਾਂਤ ਦਾ ਕੁਝ ਸਟਾਰ ਕੁੜੀਆਂ ਦੇ ਨਾਲ ਪਿਆਰ ਅਤੇ ਬ੍ਰੇਕਅਪ ਵੀ ਸੁਣਨ ਨੂੰ ਮਿਲਿਆ। ਕੁੰਡਲਨੀ ਨੂੰ ਸਕਾਰਾਤਮਕ ਅਤੇ ਸਹੀ ਦਿਸ਼ਾ ਦੇਣ ਲਈ ਇੱਕ ਸਥਿਰ ਪਰਿਵਾਰਕ ਜੋੜਾ-ਜੀਵਨ ਬਹੁਤ ਮਹੱਤਵਪੂਰਣ ਹੈ। ਹਾਲਾਂਕਿ ਫਿਲਮੀ ਜਗਤ ਵਿਚ ਇਹ ਵਾਪਰਨਾ ਜਾਰੀ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ, ਪਰ ਹਰ ਕੋਈ ਇਕੋ ਜਿਹੇ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੇ, ਅਤੇ ਇਹ ਸਾਰਿਆਂ ਲਈ ਵੀ ਸੂਟ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ। ਪ੍ਰੇਮ ਸੰਬੰਧ ਵਿੱਚ ਖੁਦਕੁਸ਼ੀਆਂ ਇਸ ਕੁਦਰਤੀ ਕੁੰਡਲੀਨੀ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਹਨ। ਡਾਕਟਰ ਅਨੁਸਾਰ ਉਹ ਬਾਈਪੋਲਰ ਬਿਮਾਰੀ ਤੋਂ ਪੀੜਤ ਸੀ। ਇਹ ਕੁੰਡਲਨੀ-ਉਦਾਸੀ ਦਾ ਇਕ ਹੋਰ ਰੂਪ ਹੈ। ਇਸ ਵਿੱਚ ਤੀਬਰ ਉਤੇਜਨਾ ਦੇ ਬਾਅਦ ਤੀਬਰ ਉਦਾਸੀ ਦਾ ਦੌਰ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਜੇ ਸਹੀ ਢੰਗ ਨਾਲ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਕੁੰਡਲਨੀ ਯੋਗ ਬਾਈਪੋਲਰ ਬਿਮਾਰੀ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਵਧੀਆ ਇਲਾਜ ਹੈ।  ਕਥਿਤ ਕਲਾਕਾਰ ਨੇ ਉਸ ਨਾਲ ਕੁਝ ਦਿਨਾਂ ਲਈ ਸਲੂਕ ਕੀਤਾ, ਫਿਰ ਯੋਗ ਨੂੰ ਛੱਡ ਦਿੱਤਾ।

ਕੁੰਡਲਨੀ ਮਨ ਦੇ ਵਿਕਾਰ ਬਾਹਰ ਕੱਢਦੀ ਹੈ।  ਅਸਲ ਵਿਚ, ਸਿਰਫ ਵਿਕਾਰ ਉਦਾਸੀ ਦਾ ਕਾਰਨ ਹੋ ਸਕਦੇ ਹਨ, ਕੁੰਡਲਨੀ ਨਹੀਂ।ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਕੁੰਡਲਨੀ ਉਦਾਸੀ ਤੋਂ ਬਚਣ ਲਈ ਹਰ ਸਮੇਂ ਕੰਮ ਵਿਚ ਰੁੱਝਿਆ ਰਹਿਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ।

ਕਿਸੇ ਤੋਂ ਅਲੱਗ ਹੋਣ ਦਾ ਗਮ ਵੀ ਕੁੰਡਲਨੀ ਉਦਾਸੀ ਦਾ ਇਕ ਰੂਪ ਹੈ।  ਉਸ ਦੁੱਖ ਨੂੰ ਖੁਸ਼ਹਾਲੀ ਵਿੱਚ ਬਦਲਣ ਲਈ, ਵਿਛੜੇ ਵਿਅਕਤੀ ਦੀ ਮਾਨਸਿਕ ਤਸਵੀਰ ਦੀ ਕੁੰਡਲਨੀ ਬਣਾ ਕੇ ਕੁੰਡਲਨੀ ਯੋਗ ਅਭਿਆਸ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ।

ਉਸ ਫਿਲਮ ਦੇ ਕਲਾਕਾਰ ਦੀ ਅਧਿਆਤਮਕ ਤਰੱਕੀ ਵੀ ਕੁੰਡਲਨੀ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਨਾਲ ਤੇਜ਼ੀ ਨਾਲ ਅੱਗੇ ਵੱਧ ਰਹੀ ਸੀ

ਚਸ਼ਮਦੀਦਾਂ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਹੈ ਕਿ ਉਹ ਇੱਕ ਅਧਿਆਤਮਕ ਵਿਅਕਤੀ ਸੀ ਅਤੇ ਬਹੁਤ ਸੰਵੇਦਨਸ਼ੀਲ ਸੀ। ਉਸਦੇ ਜਵਾਨ ਸਰੀਰ ਦਾ ਬਜ਼ੁਰਗ ਦਿਮਾਗ ਸੀ। ਅਜਿਹੇ ਗੁਣ ਕੁੰਡਲਨੀ ਤੋਂ ਹੀ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦੇ ਹਨ।

ਕੁੰਡਲਨੀ ਆਦਮੀ ਨੂੰ ਬੇਫਿਕਰ ਬਣਾ ਸਕਦੀ ਹੈ

ਕੁੰਡਲਨੀ ਦੇ ਕਾਰਨ ਆਦਮੀ ਅਦਵਾਇਟ ਜਾਂ ਗੈਰ-ਦਵੈਤ ਨਾਲ ਭਰਪੂਰ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਇਸਦਾ ਅਰਥ ਹੈ ਕਿ ਰਾਤ ਅਤੇ ਦਿਨ, ਜੀਵਨ-ਮੌਤ, ਮਿੱਤਰ-ਦੁਸ਼ਮਣ, ਖੁਸ਼ੀ ਅਤੇ ਦੁੱਖ, ਸਾਰੀਆਂ ਵਿਪਰੀਤ ਚੀਜ਼ਾਂ ਇਕੋ ਜਿਹੀ ਦਿਖਣੀਆਂ ਸ਼ੁਰੂ ਹੁੰਦੀਆਂ ਹਨ। ਇਸ ਤੋਂ ਭਾਵ ਹੈ ਕਿ ਆਦਮੀ ਕਿਸੇ ਵੀ ਚੀਜ ਤੋਂ ਨਹੀਂ ਡਰਦਾ। ਜਦੋਂ ਮਨੁੱਖ ਆਪਣੀ ਮੌਤ ਤੋਂ ਨਹੀਂ ਡਰਦਾ, ਤਾਂ ਉਹ ਆਪਣੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਲਈ ਲਾਪਰਵਾਹੀ ਨਾਲ ਭਰ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਜਦੋਂ ਇਹ ਸਰਹੱਦ ਪਾਰ ਕਰਦੀ ਹੈ ਤਾਂ ਇਹ ਲਾਪਰਵਾਹੀ ਖੁਦਕੁਸ਼ੀ ਦਾ ਰੂਪ ਧਾਰ ਲੈਂਦੀ ਹੈ।

ਦਰਅਸਲ, ਅਡਵਾਈਤਾ ਲਾਪਰਵਾਹੀ ਨਹੀਂ, ਚੌਕਸਤਾ ਵਧਾਉਂਦੀ ਹੈ। ਪਰ ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਲੋਕ ਅਦਵੈਤ ਨੂੰ ਗਲਤ ਤਰੀਕੇ ਨਾਲ ਲੈਂਦੇ ਹਨ।

ਕੁੰਡਲਨੀ ਨੂੰ ਸੰਭਾਲਣ ਲਈ ਬਾਹਰੀ ਸਹਾਇਤਾ ਦੀ ਲੋੜ ਹੁੰਦੀ ਹੈ

ਉਪਰੋਕਤ ਸਥਿਤੀ ਵਿੱਚ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਬਾਹਰੀ ਸਹਾਇਤਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ। ਲੋਕਾਂ ਨਾਲ ਗੱਲਬਾਤ ਜਾਰੀ ਰੱਖਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ। ਪਰਿਵਾਰ ਅਤੇ ਦੋਸਤਾਂ ਦੇ ਨਾਲ ਬਹੁਤ ਸਾਰਾ ਸਮਾਂ ਬਿਤਾਉਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਸਮਾਜਿਕ ਕਾਰਜਾਂ ਅਤੇ ਹੋਰ ਸਮਾਜਿਕ ਗਤੀਵਿਧੀਆਂ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋਣਾ ਲਾਜ਼ਮੀ ਹੈ। ਇਹ ਕੁੰਡਲਨੀ ਯੋਗੀ ਨੂੰ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਮਨਾਂ ਵਿਚਲੇ ਜੀਵਨ ਲਈ ਪਿਆਰ ਦਰਸਾਏਗੀ। ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਮਨਾਂ ਵਿਚ ਅਣਸੁਖਾਵਾਂ ਹੋਣ ਦਾ ਡਰ ਰਹੇਗਾ। ਇਹ ਉਸਨੂੰ ਸਹੀ ਤਰੀਕਿਆਂ ਨਾਲ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਜੀਣ ਲਈ ਪ੍ਰੇਰਿਤ ਕਰੇਗਾ। ਅੱਜ ਦੇ ਕੋਰੋਨਾ ਲਾਕਡਾਉਨ ਨੇ ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਲੋਕਾਂ ਤੋਂ ਇਸ ਸਮਾਜਿਕ ਸਹਾਇਤਾ ਨੂੰ ਖੋਹ ਲਿਆ ਹੈ।

ਕੁੰਡਲਨੀ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਉੱਤਮ ਸਮਰਥਨ ਇਕ ਗੁਰੂ ਕਰਦਾ ਹੈ

ਗੁਰੂ ਜੀ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਕੁੰਡਲਨੀ ਦੇ ਦੌਰ ਵਿਚੋਂ ਲੰਘ ਚੁੱਕੇ ਹੁੰਦੇ ਹਨ। ਇਸ ਲਈ, ਉਹ ਸਭ ਕੁਝ ਜਾਣਦੇ ਹਨ। ਇਸ ਲਈ, ਉਹ ਇਕੱਲੇ ਹੀ ਸਾਰੇ ਸਮਾਜ ਦੀ ਸ਼ਕਤੀ ਨਵੇਂ ਕੁੰਡਲਨੀ ਯੋਗੀ ਨੂੰ ਦੇ ਸਕਦੇ ਹਨ।

ਕੁੰਡਲਨੀ ਉਦਾਸੀ ਰੂਹਾਨੀ ਸਮੁੰਦਰ ਵਿਚੋਂ ਨਿਕਲਦਾ ਜ਼ਹਿਰ ਹੈ


ਸਮੁੰਦਰਮਨਥਨ ਦਾ ਵਰਣਨ ਹਿੰਦੂ ਪੁਰਾਣਾਂ ਵਿਚ ਮਿਲਦਾ ਹੈ। ਮੰਦਰਚਲ ਪਹਾੜ ਕੁੰਡਲਨੀ ਹੈ। ਕੁੰਡਲਨੀ-ਧਿਆਨ ਵਾਸੂਕੀ ਨਾਗ ਹੈ। ਉਸ ਵਿਚੋਂ ਨਿਕਲਦੀਆਂ ਚੰਗੀਆਂ ਚੀਜ਼ਾਂ ਚੰਗੀਆਂ ਸੋਚਾਂ ਹੁੰਦੀਆਂ ਹਨ, ਜੋ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਇਕ ਦੇਵਤਾ ਬਣਾਉਂਦੀਆਂ ਹਨ। ਉਸ ਵਿੱਚੋਂ ਨਿਕਲਦੀਆਂ ਗੰਦੀਆਂ ਚੀਜ਼ਾਂ ਗੰਦੇ ਵਿਚਾਰ ਹਨ, ਜੋ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਭੂਤ ਕਰਦੀਆਂ ਹਨ। ਮਨ ਦੇ ਦੇਵਤਿਆਂ ਅਤੇ ਭੂਤਾਂ ਦੀ ਸਖਤ ਮਿਹਨਤ ਅਤੇ ਸਹਿਯੋਗ ਨਾਲ ਮੰਥਨ ਜਾਰੀ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ। ਅੰਤ ਦੇ ਨੇੜੇ ਜੋ ਜ਼ਹਿਰ ਬਾਹਰ ਆਉਂਦਾ ਹੈ ਉਹ ਹੈ ਕੁੰਡਲਨੀ ਦੀ ਪੈਦਾਇਸ਼ੀ ਉਦਾਸੀ। ਜਿਹੜਾ ਸ਼ਿਵ ਇਸ ਨੂੰ ਪੀਂਦਾ ਹੈ ਉਹ ਗੁਰੂ ਹੈ। ਉਹ ਇਸ ਨੂੰ ਗਲੇ ਵਿਚ ਮੁਅੱਤਲ ਰੱਖਦਾ ਹੈ। ਇਸਦਾ ਅਰਥ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਉਹ ਚੇਲੇ ਦੀ ਉਦਾਸੀ ਨੂੰ ਦੂਰ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਪਰ ਇਸ ਤੋਂ ਉਹ ਖੁਦ ਪ੍ਰਭਾਵਤ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ। ਉਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਜੋ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਉਭਰਦਾ ਹੈ ਉਹ ਅਨੰਦ ਹੈ ਜੋ ਕੁੰਡਲਨੀ ਤੋਂ ਆਉਂਦਾ ਹੈ। ਸਮੁੰਦਰ ਦੇ ਮੰਥਨ ਵਿਚੋਂ ਲਕਸ਼ਮੀ ਦੇ ਨਿਕਲਣ ਦਾ ਅਰਥ ਤਾਂਤਰਿਕ ਜਾਪਦਾ ਹੈ। ਉਹ ਭਗਵਾਨ ਨਾਰਾਇਣ ਵੱਲ ਲੇ ਜਾਂਦੀ ਹੈ।

ਮੇਰਾ ਕੁੰਡਲਨੀ ਯੋਗਾ ਨਾਲ ਜੁੜਿਆ ਆਪਣਾ ਅਨੁਭਵ

ਆਪਣਾ ਅਨੁਭਵ ਉਹੀ ਹੈ, ਜੋ ਮੈਂ ਇਸ ਪੋਸਟ ਵਿੱਚ ਲਿਖਿਆ ਹੈ। ਉਹ ਮੇਰਾ ਆਪਣਾ ਕੁੰਡਲਨੀ ਸਬੰਧਤ ਉਦਾਸੀ ਦਾ ਤਜਰਬਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਇਸ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਨਿਕਲਣ ਦਾ ਵੀ। ਖੁਸ਼ਕਿਸਮਤੀ ਨਾਲ, ਮੈਨੂੰ ਇਕ ਭਲੇਮਾਣਸ ਗੁਆਂਢੀ ਦਾ ਸਮਰਥਨ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋਇਆ, ਜਿਸ ਦੇ ਘਰ ਮੈਂ ਬਿਨਾਂ ਪੁੱਛੇ ਖੁੱਲ੍ਹ ਕੇ ਤੁਰ ਸਕਦਾ ਸੀ, ਅਤੇ ਜਿਸ ਨਾਲ ਮੈਂ ਜਿੰਨਾ ਮਰਜੀ ਸਮਾਂ ਬਿਤਾ ਸਕਦਾ ਸੀ। ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਹੋਰ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਮੰਗਲ ਦੇ ਜੀਵ ਦੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਵਿਵਹਾਰ ਕੀਤਾ। ਚੰਗਾ ਚੁਟਕਲਾ ਕੀਤਾ ਗਿਆ।

ਕੁੰਡਲਨੀ ਸਿਮਰਨ ਗਿਆਨ ਦੀ ਇੱਕ ਅਤਿਅੰਤ ਅਵਸਥਾ ਹੈ; ਦੂਜੇ ਲੋਕ ਉਦਾਸੀ ਮਹਿਸੂਸ ਕਰਦੇ ਹਨ

ਕੁੰਡਲਨੀ ਉਦਾਸੀ ਸਾਪੇਖ ਹੈ। ਕੁੰਡਲਨੀ ਯੋਗੀ ਖੁਦ ਕੁੰਡਲਨੀ ਸਮਾਧੀ ਵਿਚ ਗਿਆਨ ਦੀ ਉੱਚਤਮ ਅਵਸਥਾ ਨੂੰ ਮਹਿਸੂਸ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਕੁੰਡਲਨੀ ਦੇ ਹੋਰ ਮਾਹਰ ਵੀ ਇਸ ਨੂੰ ਜਾਣਦੇ ਹਨ। ਉਹ ਲੋਕ ਕੁੰਡਲਨੀ ਤੋਂ ਅਣਜਾਣ ਹਨ ਜੋ ਕੁੰਡਲਨੀ ਤੋਂ ਉਦਾਸੀ ਮਹਿਸੂਸ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਇਸੇ ਲਈ ਲੋਕ ਕੁੰਡਲਨੀ ਯੋਗੀ ਦੀ ਅਲੋਚਨਾ ਕਰਦੇ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ, ਅਤੇ ਉਸ ਨੂੰ ਉਦਾਸੀ ਨਾਲ ਭਰ ਦਿੰਦੇ ਹਨ। ਲੋਕ ਉਸਦੇ ਚੰਗੇ ਲਈ ਉਸਦੀ ਆਲੋਚਨਾ ਕਰਦੇ ਹਨ ਤਾਂ ਕਿ ਉਹ ਕੁੰਡਲਨੀ ਤੋਂ ਬਗੈਰ ਜੀਉਣਾ ਸਿੱਖ ਸਕੇ, ਪਰ ਉਹ ਅਕਸਰ ਇਸ ਗੱਲ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਸਮਝਦਾ। ਉਸਦੀ ਉਦਾਸੀ ਉਸ ਦੇ ਮਨ ਵਿਚੋਂ ਕੁੰਡਲਨੀ ਨੂੰ ਹਟਾਉਣ ਨਾਲ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਕਿਉਂਕਿ ਉਹ ਕੁੰਡਲਨੀ ਦਾ ਆਦੀ ਹੋ ਗਿਆ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਕੁੰਡਲਨੀ ਰੋਸ਼ਨੀ ਦੇ ਸਾਹਮਣੇ ਉਦਾਸੀ ਦੇ ਹਨੇਰੇ ਦਾ ਕੋਈ ਸਵਾਲ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ। ਇਸੇ ਲਈ ਜਾਂ ਤਾਂ ਕੁੰਡਲਨੀ ਨੂੰ ਕਿਸੇ ਵੀ ਸਥਿਤੀ ਵਿੱਚ ਨਹੀਂ ਛੱਡਿਆ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਜਾਂ ਕੁੰਡਲਨੀ ਨਾਲ ਕੋਈ ਲਗਾਵ ਨਹੀਂ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਅਤੇ ਇਸਦੇ ਬਿਨਾਂ ਜੀਣ ਦੀ ਆਦਤ ਵੀ ਬਣਾਈ ਰੱਖਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ। ਨਹੀਂ ਤਾਂ, ਉਦਾਸੀ ਪੈਦਾ ਹੋਣ ਦੀ ਸੰਭਾਵਨਾ ਹੈ, ਜਿਵੇਂ ਇਕ ਨਸ਼ੇੜੀ ਅਚਾਨਕ ਨਸ਼ਾ ਛੱਡਣ ਵੇਲੇ ਇਸ ਨੂੰ ਮਹਿਸੂਸ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਇਕ ਵਿਅਕਤੀ ਜਿੰਨਾ ਚਾਨਣ ਪਾਉਂਦਾ ਹੈ, ਹਨੇਰਾ ਵੀ ਉੱਨਾ ਹੀ ਗਹਿਰਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਜਦੋਂ ਇਹ ਬੁਝ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਇਸੇ ਲਈ ਚੰਗੀ ਸੰਗਤ ਅਪਣਾਉਣ ‘ਤੇ ਜ਼ੋਰ ਦਿੱਤਾ ਜਾਂਦਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਇਹ ਚੰਗਾ ਹੈ, ਜੇ ਤੁਸੀਂ ਦੂਜਿਆਂ ਦੇ ਰਾਹ ਤੇ ਫੁੱਲ ਨਹੀਂ ਬੀਜ ਸਕਦੇ, ਤਾਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਕੰਡੇ ਵੀ ਨਹੀਂ ਬੀਜਣੇ ਚਾਹੀਦੇ। ਫੁੱਲ ਆਪਣੇ ਆਪ ਵਧਣਗੇ। ਮਹਾਤਮਾ ਬੁੱਧ ਨੇ ਵੀ ਇਹੀ ਕਿਹਾ ਹੈ।

ਇਹ ਨੋਟ ਕੀਤਾ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਕਿ ਕੁੰਡਲਨੀ ਉਦਾਸੀ ਕੁਦਰਤੀ ਤੌਰ ਤੇ ਹੋਣ ਵਾਲੀ ਕੁੰਡਲਨੀ ਦੇ ਨਾਲ ਵਧੇਰੇ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਹਾਲਾਂਕਿ ਕੁਦਰਤੀ ਕੁੰਡਲਨੀ ਦੇ ਨਤੀਜੇ ਵਜੋਂ ਅਧਿਆਤਮਿਕਤਾ ਦਾ ਵਿਕਾਸ ਬਹੁਤ ਤੇਜ਼ੀ ਨਾਲ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ, ਕੁਦਰਤੀ ਕੁੰਡਲਨੀ ਦੇ ਇਸ ਖ਼ਤਰੇ ਤੋਂ ਬਚਣ ਲਈ, ਨਕਲੀ ਕੁੰਡਲੀਨੀ ਯੋਗ ਸਾਧਨਾ ਦਾ ਅਭਿਆਸ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ।

ਕੁੰਡਲਨੀ ਸਰੀਰ ਅਤੇ ਮਨ ਦੀ ਸ਼ਕਤੀ ਖਿੱਚਦੀ ਹੈ। ਉਹ ਕਮਜ਼ੋਰੀ ਉਦਾਸੀ ਦਾ ਕਾਰਨ ਹੋ ਸਕਦੀ ਹੈ।  ਇਸ ਲਈ, ਤੰਤਰ ਵਿੱਚ ਇਸ ਕਮਜ਼ੋਰੀ ਤੋਂ ਬਚਣ ਲਈ, ਪੰਚਮਕਾਰਾਂ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਦਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਹੈ।

ਇਕ ਕਿਤਾਬ ਜਿਸ ਨੇ ਮੈਨੂੰ ਕੁੰਡਲਨੀ ਉਦਾਸੀ ਤੋਂ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਬਾਹਰ ਕੱਰਣ ਲਈ ਸਹਾਇਤਾ ਕੀਤੀ

ਇਹ ਕਿਤਾਬ “ਸਰੀਰ ਵਿਗਿਆਨ ਦਰਸ਼ਨ” ਹੈ। ਪੂਰੇ ਵੇਰਵੇ ਹੇਠ ਦਿੱਤੇ ਲਿੰਕ ਤੇ ਉਪਲਬਧ ਹਨ।

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कुण्डलिनी भी आत्महत्या के लिए प्रेरित कर सकती है?

सहलेखक: डा० भीष्म शर्मा {पशु चिकित्सक, हि. प्र. राज्य}

सह संपादक: मास्टर विनोद शर्मा {अध्यापक, हि. प्र. राज्य}

Photo by Vanderlei Longo from Pexels

अभी कुछ दिन पहले बौलीवुड के मशहूर सितारे सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या का मामला सामने आया। सबसे पहले हम उनकी आत्मा की शान्ति की कामना करते हैं। वह बुलंदियों पर था। बुलंदियां कुण्डलिनी से हासिल होती हैं। तो क्या कुण्डलिनी भी आत्महत्या की वजह बन सकती है? इस पोस्ट में हम इसका विश्लेषण करेंगे।

अवसाद एक छुआछूत वाले रोग की तरह है, जिसे कुंडलिनी योग की सहायता से दूर भगाया जा सकता है: एक अदभुत आध्यात्मिक मनोविज्ञान

एक ब्लयू व्हेल नाम की वीडियोगेम आई थी, जिसे खेलते हुए बहुत से बच्चों ने आत्महत्या की थी। सुशान्त ने एक आत्महत्यारे की पेंटिंग अपनी सोशल मीडिया वाल पर कई दिनों से लगाई हुई थी। उनकी छिछोरे फिल्म में वह अपने बेटे को इस रोग से बचने के लिए पूरी फिल्म में समझाते रहे। इसी तरह, एक खबर के अनुसार एक बिहार राज्य का लड़का देर रात तक अकेले में सुशांत की खुदकुशी की खबरें देखता रहा औऱ सुबह को वह भी लटका हुआ मिला। यह सब मन का खेल है। ऐसे आत्महत्या से संबंधित चिंतन से विशुद्धि चक्र पर एक कसाव सा पैदा होता है। गला दबा हुआ सा लगता है, और गले पर एक घुटन सी महसूस होती है। कुंडलिनी योगी को तो विशुद्धि चक्र पर ध्यान करने की पहले से ही आदत होती है। वह बार-2 वहां कुंडलिनी को फोकस करता है। उससे गले को जीवनी शक्ति मिलती है, और कुंडलिनी भी मजबूत होती है। गले की घुटन में गेस्ट्राइटिस का भी रोल हो सकता है। तनावपूर्ण और अनहेल्थी जीवनशैली से गेस्ट्राइटिस होती है। आजकल इसके इलाज के लिए सुरक्षित दवाई मौजूद है। ऐसी दवाइयां योग अभ्यास करने वाले लोगों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसलिए इनका आधा डोज खाकर उनका अपने ऊपर असर परख लेना चाहिए। अवसाद-रोधी दवाएं तो बहुत से लोगों का अवसाद बढ़ा भी सकती हैं, क्योंकि उनसे आदमी की स्मरणशक्ति व कार्यक्षमता काफी घट जाती है। वे दवाईयां लम्बे समय से बनी हुई कुण्डलिनी को नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे उससे जुड़े सभी काम दुष्प्रभावित हो सकते हैं। अगर किस्मत अच्छी हो, और परिश्रम किया जाए, तो उससे नए कुण्डलिनी-चित्र के निर्माण का और उसे जागृत करने का सुअवसर भी प्राप्त होता है। नई कुंडलिनी से एडजस्ट होने में समय लगता है। सूत्रों के अनुसार, सुशांत भी लम्बे अरसे से अवसाद रोधी दवाएं खा रहे थे, हालांकि कुछ समय से उन्होंने उन्हें खाना छोड़ा हुआ था। जितना हो सके मौन रहना चाहिए औऱ जीभ को तालु के साथ टाईटली जोड़कर रखना चाहिए ताकि मस्तिष्क की कुंडलिनी या विचार आसानी से नीचे बह सके। जिसने आत्महत्या की भावनाओं के बीच में रहते हुए भी उसे दबा दिया, वह असली योगी है।

सुशांत सिंह राजपूत कई बार अपनी स्वर्गवासिनी माँ की याद में खोकर भावुक हो जाते थे

वह अपनी माँ से सर्वाधिक प्रेम करते थे। यह बहुत अच्छी बात है, और बड़ों-बुजुर्गों से प्यार होना ही चाहिए। उनकी आखिरी सोशल मीडिया पोस्ट भी अपनी माँ की याद की थी। ऐसा हमें मीडिया से सुनने को मिला। सर्वाधिक प्रिय वस्तु ही मन में निरंतर बस कर कुण्डलिनी बन जाती है। इसका अर्थ है कि उनके मन में अपनी माँ की छवि कुण्डलिनी के रूप में बसी हुई हो सकती है। इसीसे उन्हें निरंतर सफलताएं मिलती गईं। वैसे तो पूर्वजों व पारिवारिक लोगों या बुजुर्गों से संबंधित शुद्ध कुंडलिनी हमेशा शांत औऱ कल्याणकारी ही होती है। परंतु कई बार वैसी कुंडलिनी का सहारा लेकर इश्क-मोहब्बत वाली कुंडलिनी मन पर हावी हो जाती है। वह बहुत भड़कीली होती है औऱ कई बार खतरनाक हो सकती है। सुशांत का कुछ स्टार लड़कियों से प्यार और ब्रेकअप भी सुनने में आया। कुंडलिनी को सकारात्मक व सही दिशा देने के लिए एक स्थिर दाम्पत्य जीवन बहुत जरूरी होता है। हालांकि सिने जगत में ऐसा चलता रहता है, पर सभी एक जैसे नहीं होते, और ऐसा सभी को सूट भी नहीं करता। इश्क-मुहब्बत के चक्कर में हुई आत्महत्याएं इसी कुदरती कुण्डलिनी से सम्बंधित होती हैं। डॉक्टर के अनुसार वह बाईपोलर डिसीस से पीड़ित थे। यह कुण्डलिनी-अवसाद का ही एक दूसरा रूप है। इसमें तीव्र उत्तेजना के दौर के बाद तीव्र अवसाद का दौर आता है।अगर ढंग से किया जाए, तो कुंडलिनी योग ही बाइपोलर रोग का सबसे बढ़िया इलाज है। कथित कलाकार ने थोड़े दिनों के लिए उसे इलाज के लिए किया था, फिर छोड़ दिया था।अगर ढंग से किया जाए, तो कुंडलिनी योग ही बाइपोलर रोग का सबसे बढ़िया इलाज है। कथित कलाकार ने थोड़े दिनों के लिए उसे इलाज के लिए किया था, फिर छोड़ दिया था। कुंडलिनी मन के विकारों को बाहर निकाल रही होती है। वास्तव में विकार ही अवसाद पैदा कर सकते हैं, कुंडलिनी नहीं।कुंडलिनी अवसाद से बचने के लिए हर समय काम में व्यस्त रहना चाहिए। कथित कलाकार कई दिनों से कामधाम छोड़कर कमरे में बंद हो गए थे।

किसीसे बिछुड़ने का गम भी कुंडलिनी अवसाद का ही एक प्रकार है। उस गम को खुशी में बदलने के लिए बिछुड़े हुए व्यक्ति के मानसिक चित्र को कुंडलिनी बनाकर कुंडलिनी योग साधना शुरु कर देनी चाहिए।

कुण्डलिनी से उस सिने कलाकार की आध्यात्मिक प्रगति भी तीव्रता से हो रही थी

प्रत्यक्षदर्शी कहते हैं कि वे अध्यात्मिक रुझान वाले व बेहद संवेदनशील व्यक्ति थे। उनकी कम उम्र के शरीर में एक बुजुर्ग का दिमाग था। ऐसे गुण कुण्डलिनी से ही उत्पन्न होते हैं।

कुण्डलिनी आदमी को जीवन के प्रति लापरवाह बना सकती है

कुण्डलिनी के कारण आदमी अद्वैत से भर जाता है। इसका मतलब है कि उसे रात-दिन, जीवन-मृत्यु, दोस्त-दुश्मन, सुख-दुःख आदि सभी विपरीत चीजें एकसमान जैसी लगने लगती हैं। इससे यह अर्थ निकलता है कि आदमी को किसी चीज से डर नहीं लगता। जब कोई आदमी अपनी मौत से नहीं डरेगा, तब वह अपनी जिंदगी के प्रति लापरवाह हो जाएगा। वही लापरवाही जब सीमा पार कर जाती है, तब वह आत्महत्या का रूप ले लेती है। वास्तव में तो अद्वैत से सतर्कता बढ़ती है, लापरवाही नहीं। पर कई लोग अद्वैत को गलत तरीके से ग्रहण करते हैं।

कुण्डलिनी को संभालने के लिए बाहरी सहारे की आवश्यकता होती है

उपरोक्त स्थिति में आदमी को बाहरी सहारा मिलना चाहिए। लोगों से मेल-जोल जारी रहना चाहिए। परिवार व दोस्तों के साथ खूब समय बिताना चाहिए। घूमना-फिरना चाहिए। सामाजिक समारोहों व कार्यों में शामिल होते रहना चाहिए। इससे कुण्डलिनी योगी को लोगों के मन में जीवन के प्रति लगाव नजर आएगा। लोगों के मन में अनहोनी का डर नजर आएगा। इससे उसे सही ढंग से जीवन जीने की प्रेरणा मिलेगी। आजकल के कोरोना लौकडाऊन ने बहुत सारे लोगों से यह सामाजिक सहारा छीन लिया है।

गुरु कुण्डलिनी के लिए सर्वोत्तम सहारा है

गुरु कुण्डलिनी के दौर से पहले ही गुजर चुका होता है। इसलिए उसे सब कुछ पता होता है। इसलिए वह नए-२ कुण्डलिनी योगी को अकेला ही पूरे समाज की शक्ति दे सकता है।

कुण्डलिनी अवसाद ही समुद्रमंथन से निकला हुआ विष है

समुद्रमंथन का वर्णन हिन्दू पुराणों में मिलता है। मंदराचल पर्वत कुण्डलिनी है। कुण्डलिनी-ध्यान वासुकी नाग है। मन समुद्र है। उससे निकली हुई अच्छी चीजें अच्छे विचार हैं, जो आदमी को देवता बनाते हैं। उससे निकली हुई गन्दी चीजें गंदे विचार हैं, जो आदमी को राक्षस बनाते हैं। मन के देवताओं और राक्षसों के परिश्रम व सहयोग से मंथन चलता रहता है। अंत के करीब जो विष निकलता है, वह कुण्डलिनी से पैदा हुआ अवसाद है। उसे पीने वाले शिव गुरु हैं। वे उसे गले में धारण करते हैं। इसका मतलब है कि वे शिष्य का अवसाद हर लेते हैं, पर स्वयं उससे प्रभावित नहीं होते। उसके बाद जो अमृत निकलता है, वह कुण्डलिनी से मिलने वाला आनंद है। समुद्र मंथन से जो लक्ष्मी मिलती है, उसका अर्थ तांत्रिक प्रतीत होता है। वह भगवान् नारायण तक ले जाती है।

कुण्डलिनी योग से सम्बंधित मेरा अपना अनुभव

जो मैंने इस पोस्ट में लिखा, वह मेरा अपना ही कुण्डलिनी अवसाद का, और उससे बाहर निकलने का अनुभव है। खुशकिस्मती से मुझे एक पड़ौसी सज्जन का सहारा मिल गया था, जिनके घर मैं बिना पूछे और खुलकर आ-जा सकता था, तथा जिनके साथ जितना चाहे समय बिता सकता था। दूसरे अधिकाँश लोग तो मुझे मंगल ग्रह से आए हुए प्राणी की तरह ट्रीट करते थे। अच्छा जोक कर दिया।

कुण्डलिनी मेडिटेशन की अवस्था ज्ञान की चरम अवस्था होती है, अवसाद तो वह दूसरे लोगों को लगती है

कुण्डलिनी अवसाद सापेक्ष होता है। स्वयं कुण्डलिनी योगी को वह ज्ञान की शीर्ष अवस्था लगती है। कुण्डलिनी के अन्य जानकारों को भी यह ऐसी ही लगती है। कुण्डलिनी से अनजान लोगों को ही वह अवसाद लगती है। इसलिए वैसे लोग कुण्डलिनी योगी की आलोचना करते रहते हैं, और उसे अवसाद से भर देते हैं। लोग तो उसके भले के लिए उसकी आलोचना करते हैं ताकि वह कुंडलिनी के बिना जीना सीख सके, पर वह इस बात को अक्सर समझ नहीं पाता। अवसाद उसे कुंडलिनी को मन से हटाने से होता है, क्योंकि उसे कुंडलिनी के नशे की लत लग जाती है। कुंडलिनी प्रकाश के सामने तो अवसाद का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। इसीलिए या तो कुंडलिनी को किसी हालत में नहीं छोड़ना चाहिए या फिर कुंडलिनी से आसक्ति नहीं होनी चाहिए और उसके बिना जीने की आदत भी बनी रहनी चाहिए। नहीं तो वैसा ही अवसाद पैदा होने की संभावना है, जैसा नशेड़ी में एकदम से नशा छोड़कर पैदा होता है। जितनी ज्यादा रौशनी होगी, जब वह बुझेगी तब उतना ही ज्यादा अंधेरा भी होगा। कुंडलिनी शरीर औऱ मन की शक्ति को खींचती है। उससे पैदा हुई कमजोरी ही अवसाद की वजह बन सकती है। इसीलिए तंत्र में उस कमजोरी से बचने के लिए पंचमकारों के सेवन का प्रावधान है।इसीलिए अच्छी संगति को अपनाने पर जोर दिया गया है। अच्छा हो, यदि औरों के रास्ते में फूल न बो सको, तो कांटे भी नहीं बोने चाहिए। इससे फूल खुद उग आएँगे। महात्मा बुद्ध ने भी ऐसा ही कहा है।

यह ध्यान रखना चाहिए कि कुंडलिनी अवसाद प्राकृतिक तौर से उभरी कुंडलिनी से ज्यादा होता है। यद्यपि प्राकृतिक कुंडलिनी बहुत तेजी से आध्यात्मिक विकास करती है। इसलिए प्राकृतिक कुंडलिनी के इस खतरे से बचे रहने के लिए कृत्रिम कुंडलिनी योग करते रहना चाहिए।

एक पुस्तक जिससे मुझे कुण्डलिनी अवसाद से पूरी तरह से बाहर आने में मदद मिली

वह पुस्तक है “शरीरविज्ञान दर्शन”। उसका पूरा विवरण निम्नलिखित लिंक पर उपलब्ध है।

https://demystifyingkundalini.com/shop/

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