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ओसीआर, ऑप्टिकल रिकोग्निशन सिस्टम, आधुनिक प्रकाशन के लिए एक वरदान

पाठक सोचते होंगे कि कुण्डलिनी-वैबसाईट में स्वयंप्रकाशन व वेबसाईट-निर्माण के विषय किस उद्देश्य से डाले गए हैं।  वास्तव में कुण्डलिनी-साधक को स्वयंप्रकाशन का व वेबसाईट-निर्माण का भी व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए।  ऐसा इसलिए है, क्योंकि कुण्डलिनी-क्रियाशीलता या कुण्डलिनी-जागरण के बाद दिमाग में मननशीलता की बाढ़ जैसी आ जाती है।  उस स्थिति में व्यक्ति एक उत्कृष्ट पुस्तक व वेबसाईट का निर्माण कर सकता है।  साथ में, इससे वह खालीपन की नकारात्मकता से भी बच सकता है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी ऐसा ही हुआ।

ओसीआर (ocr) तकनीक से मेरा सामना तब हुआ, जब मैं अपने पिता द्वारा लिखित लगभग सात साल पुरानी एक कागजी पुस्तक का ई-पुस्तक वाला रूप बनाने का प्रयत्न कर रहा था। पुस्तक का नाम था ‘सोलन की सर्वहित साधना’। सौभाग्य से उस पुस्तक की सॉफ्ट कोपी प्रकाशक के पास मिल गई। इससे मैं पुस्तक को स्कैन करने से बच गया। साथ में, संभवतः सॉफ्ट कोपी से बनाई गई ई-पुस्तक में कम अशुद्धियाँ होती हैं। वह पुस्तक पीडीएफ फोर्मेट में थी। पहले तो मैं ऑनलाईन पीडीएफ कन्वर्टर की सहायता लेने लगा। मैंने कई प्रकार के कन्वर्टर को ट्राय करके देखा, गूगल ड्राईवर के कन्वर्टर को भी। परन्तु सभी में जो वर्ड फाईल कन्वर्ट होकर आ रही थी, उसके अक्षर तो पूर्णतया दोषपूर्ण थे। वह हिंदी पुस्तक तो कोई चाइनीज पुस्तक लग रही थी। फिर पीडीएफ एलीमेंट का प्रयोग किया। उसमें मुफ्त के प्लान में कुछ ही पेज एक्सट्रेक्ट करने की छूट थी। पेज तो पीडीएफ फाईल से वर्ड फाईल को एक्सट्रेक्ट हो गए थे, पर उन पृष्ठों में पट्टियों, फूलों आदि से सजावट जस की तस बनी हुई थी। वे सजावट की चीजें मुझसे रिमूव नहीं हो रही थीं। कुछ हो भी रही थीं, पर सभी नहीं। अक्षरों की गुणवत्ता भी अधिक अच्छी नहीं थी। मैंने सोचा कि शायद खरीदे जाने वाले प्लान से कोई बात बन जाए। परन्तु जब उसकी कीमत देखी, तो मैं एकदम पीछे हट गया। क्योंकि उसकी न्यूनतम सालाना कीमत लगभग 3000-4000 रुपए की थी।

कई महीनों तक मेरी योजना ठन्डे बस्ते में पड़ी रही। फिर जब मुझे कुछ खाली समय प्राप्त हुआ, तब मैंने गूगल पर सर्च किया। ओसीआर तो मैंने पहले भी पढ़ रखा था, पर मुझे कभी भी पूरी तरह से समझ नहीं आया था। फिर मुझे एक वेबपोस्ट में पता चला कि उसके लिए पुस्तक को स्कैन करना पड़ता है, ताकि पुस्तक का प्रत्येक पृष्ठ एक अलग चित्र के रूप में आ जाए। जैसे ही मैं पुस्तक के स्कैन की तैयारी कर रहा था, वैसे ही मुझे पता चला कि यदि पुस्तक पीडीएफ फाईल के रूप में उपलब्ध हो, तो उसे सीधे ही चित्र-फाईल के रूप में कन्वर्ट किया जा सकता है। मैंने गूगल पर ‘पीडीएफ इमेज एक्सट्रेक्शन’ से सर्च करके बहुत से ऑनलाईन कन्वर्टर ट्राय किए। उनमें मुझे स्मालपीडीएफडॉटकोम पर उपलब्ध कन्वर्टर सर्वोत्तम लगा। मैंने उसमें एक ही बार में सारी बुक-फाईल अपलोड कर दी। कनवर्शन के बाद सारी बुक-फाईल डाऊनलोड कर दी। उससे कम्प्यूटर के डाऊनलोड फोल्डर में सारी बुक-फाईल क्रमवार चित्रों के रूप में आ गई। सभी चित्र एक जिपड (कंप्रेस्ड) फोल्डर में थे। उस फोल्डर को अन्जिप (विनजिप आदि सोफ्टवेयर से) करने से सभी चित्र एक साधारण फोल्डर में आ गए।

फिर मैं उन चित्रों को वर्ड डोक में कनवर्ट करने वाले सोफ्टवेयर (ओसीआर) को गूगल में खोजने लगा। बहुत से ओसीआर ऐसे थे, जो हिंदी भाषा की सुविधा नहीं देते थे। अंत में मुझे वैबसाईट http://www.i2ocr.com पर उपलब्ध ऑनलाईन ओसीआर सर्वोत्तम लगा। वह निःशुल्क था। मैं बुक-चित्रों वाला फोल्डर एकसाथ अपलोड करने की कोशिश कर रहा था, पर नहीं हुआ। फिर मैंने सभी चित्रों को सेलेक्ट करके, सभी को एकसाथ अपलोड करने का प्रयास किया। पर वह भी नहीं हुआ। फिर मुझे एक वेबपोस्ट में पता चला कि बैच एक्सट्रेक्शन वाले ओसीआर कमर्शियल होते हैं, व मुफ्त में उपलब्ध नहीं होते। अतः मुझे एक-२ करके चित्रों को कन्वर्ट करना पड़ा। चित्रों की तरह ही कन्वर्ट हुई डोक फाईलें भी क्रमवार रूप में डाऊनलोड फोल्डर में आ गईं।

फिर मैंने क्रम के अनुसार सभी डोक फाईलों को एक अकेली डोक फाईल में कोपी-पेस्ट कर दिया। पर डोक फाईल में अक्षरों की छोटी-बड़ी लाईनें थीं, जो जस्टिफाई एलाईनमेंट में भी ठीक नहीं हो रही थीं। फिर मैंने एक वैबपोस्ट में पढ़ा कि एमएस वर्ड के फाईन्ड-रिप्लेस के फाईन्ड सेक्शन में ^p (^ चिन्ह कीबोर्ड की शिफ्ट व 6 नंबर वाली की को एकसाथ दबाने से छपता है) को टाईप करें, व रिप्लेस में खाली सिंगल स्पेस डालें। ‘रिप्लेस आल’ की कमांड से सब ठीक हो जाता है। वैसा ही हुआ। इस तरह से वह ई-पुस्तक तैयार हुई।

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यदि बहुत सारी छोटी वर्ड फ़ाइलों को एक साथ जोड़ा जाना है, तो एमएस वर्ड के ‘इंसर्ट’ की मदद ली जानी चाहिए। ‘इंसर्ट’ बटन पर क्लिक करने पर बने ‘ऑब्जेक्ट’ बटन पर क्लिक करें, और इसके कोने पर बने त्रिकोण पर क्लिक करें। अब ड्रॉपडाउन मेनू पर ‘फ़ाइल फ्रॉम टेक्स्ट’ पर क्लिक करें। एक नया ब्राउज़-विंडो पॉप अप होगा। उस पर वर्ड फ़ाइलों का चयन करें, जिन्हें क्लब किया जाना है। ध्यान रखें कि चयन के क्रम में फ़ाइलों को क्लब किया जाएगा। इसका मतलब है, चयनित समूह में पहली फ़ाइल संयुक्त वर्ड फ़ाइल में पहले आएगी और इसी तरह। मैं एक बार में अधिकतम 10 फ़ाइलों को क्लब करने की सलाह देता हूं क्योंकि मुझे लगता है कि यदि बड़ी संख्या में फ़ाइलों को एक साथ चुना जाता है तो यह सिस्टम त्रुटि पैदा कर सकता है। पर वास्तव में कन्वर्ट होने के बाद कई फाईलें वर्ड फोर्मेट में डाऊनलोड नहीं हो रही थीं। मैं हिंदी भाषा की फाईल को ओसीआर कर रहा था। टेक्स्ट फोर्मेट में वे फाईलें डाऊनलोड हो रही थीं। हालांकि टेक्स्ट फोर्मेट वाली फाईल नोटपैड में ही खुल रही थीं, वर्डनोट में नहीं। टेक्स्ट फाईलों में डाऊनलोड करने का यह नुक्सान है कि उन्हें वर्ड फाईलों की तरह इन्सर्ट-ओब्जेक्ट आदि कमांड देकर एकसाथ क्लब नहीं किया जा सकता। सबको अलग-२ कोपी-पेस्ट करना पड़ता है।

उस पुस्तक में कई जगह दो अक्षर जुड़े हुए थे। जैसे कि मूल पुस्तक के ‘फल का’ शब्दों का ‘फलका’ बन गया था। थोड़ी सी मेनुअल करेक्शन से सब ठीक हो गया। कागजी पुस्तक को सामने रखकर उपयुक्त स्थानों पर पेजब्रेक, लाइनब्रेक, हैडिंग शेप आदि दिए गए, ताकि ई-पुस्तक पूर्णतः मूल पुस्तक की तरह लगती। कवर के व शुरू के कुछ चित्रात्मक पृष्ठों को सीधे ही ई-पुस्तक में इन्सर्ट किया गया। इन कवर फ़ोटो के संपादन के लिए मैंने ‘फोटोजेट’ के ऑनलाइन फोटो संपादक का उपयोग किया। हालाँकि, संपादित छवि डाउनलोड करने से पहले इस ऐप को फेस बुक पर साझा करना पड़ता है। Pixlr.com का ऑनलाइन संपादक भी अच्छा है। चित्रों को सीधे कोपी-पेस्ट करने की बजाय एमएस वर्ड की ‘इन्सर्ट-पिक्चर’ की सहायता ली गई, क्योंकि सीधे कोपी-पेस्ट करने से कई बार ई-बुक में चित्र दिखता ही नहीं।

पुस्तक को स्केन करने से पहले यह देख लें की पुस्तक कितनी पुरानी है। बहुत पुरानी पुस्तकों का ओसीआर नहीं हो पाता। पुस्तक की बाईंडिंग खोलकर प्रत्येक पेज को अलग से सकेन करना पडेगा। पुस्तक को फोल्ड करके स्केन करने से किनारे के अक्षर ढंग से स्कैन नहीं होते, जिससे वे ओसीआर नहीं हो पाते। बाद में आप पुस्तक की पुनः बाईन्डिंग करवा सकते हो। डबल पेज स्कैन करके भी ओसीआर नहीं हो पाता। पेज उसी हिसाब से स्कैनर पर रखना पड़ेगा, जैसा कि आमतौर पर सिंगल पेज रखा जाता है। पेज की लम्बाई स्कैनर की लम्बाई की दिशा में रखी जाती है। पेज सामान्य पुस्तक के पेज की तरह लिखा होना चाहिए, यानी अक्षरों की पंक्तियाँ पेज की चौड़ाई की दिशा में कवर करती हों। स्कैनर पर पेज जितना सीधा होगा, उतना ही अच्छा ओसीआर होगा। इसलिए पेज को स्कैनर-ग्लास की लम्बाई वाली बैक साईड प्लास्टिक बाउंडरी से सटा कर रखा जाना चाहिए। इससे पेज खुद ही सीधा आ जाता है। लैन्थवाईज तो पेज स्कैनर के बीच में आना चाहिए।

इससे आगे की तकनीक हाथ से लिखे लेख को ओसीआर करने की है। इसे ‘हैण्ड टैक्स्ट रिकोग्निशन’ कहते हैं। परन्तु यह पूरा विकसित नहीं हुआ है। इस पर खोज जारी है। हालांकि डब्बों वाले कागजी फोर्मेट में एक-२ डब्बे में एक-२ अक्षर को डालने से यह तकनीक काम कर जाती है। तभी तो सेवा-भरती या पंजीकरण आदि के अधिकाँश परिचय-फॉर्म भरने के लिए डब्बों वाले फोर्मेट का प्रयोग किया जाता है।

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OCR, Optical Recognition System, a boon to modern publishing

Readers will think that what is the purpose of self-publishing and website-creation in the Kundalini-website. In fact, Kundalini-seeker should also have practical experience of self-publishing and website building. This is because, after the Kundalini-activation or Kundalini-awakening, the mind becomes like a flood of thoughtfulness. In that case, the person can create an excellent book and an excellent website. Together, it can also avoid the negativity of the worklessness. The same happened with Premyogi vajra.

I encountered the OCR technique when I was trying to make an e-book form of a paper book written by my father about seven years ago.  The name of that book was ‘Solan ki sarvhit saadhna/सोलन की सर्वहित साधना’. Fortunately, the publisher found out the soft copy of that book. This saved me from scanning the book. Together, there is probably less inaccuracy in the e-book made with soft copies. That book was in PDF format. At first, I started taking the help of Online PDF Converter. I tried a variety of converters, as well as the Google Drive Converter. However, the word file that was coming after being converted by all of those was completely flawed. The book was looking like a Chinese book, not the original Hindi book. Then I used the PDF Element. There was facility for only few pages in free plan. The pages were extracted from the PDF file to the word file, but the pages were along with original decorations like straps, palettes, flowers etc. I was not able to remove those things of decoration. Some things were removable in word, but not all. It was also a labor intensive work. Even the quality of the letters was not better. I thought that may be something would be done with the plan of purchase. However, when I saw the value of it, I left it completely behind. Because its minimum annual price was about INR 3000-4000.

For several months, my plan was lying in cold storage. Then when I got some free time, I searched on Google. I had read about the OCR before, but I never fully understood it. Then I found out in a web post that the book has to be scanned for it so that every page of the book comes in the form of a separate picture. As soon as I was preparing for the scan of the book, I came to know that if the book is available as a PDF file, it could be converted directly into a picture file. I tried many online converters by searching on Google with keywords ‘PDF Image Extraction’. Among those converters, I found the best available converter on Smallpdf.com. Extractor on ilovepdf.com is also good. I uploaded whole of the book-file in one go. After conversion whole of the converted book-file was downloaded. In it, the entire book-file came in the download folder of the computer in the form of serial wise pictures (jpg images). All the pictures were in a zipped (compressed) folder. By making that folder unzipped (with WinZip etc. software), all images came in a simple folder.

Then I started finding online app on Google that could convert those pictures into the word doc (OCR app). There were many OCRs that did not offer Hindi language facility. Finally, I found the best online OCR for Hindi available on the website http://www.i2ocr.com. That was free. However, I was trying to upload the folder containing books, but it did not happen. Then I tried to upload all the pictures together by selecting all the pictures. However, even that did not happen. Then I found out in a web post that Batch Extraction OCRs are commercial, and are not available freely. Therefore, I had to convert pictures one by one. Like the book-pictures, the converted doc files also came folded serial wise in a folder.

Then I copied all the doc files into a single doc file in right sequence. However, the word-lines were unequal in length in the doc file, which were not being corrected even with the command of Justify alignment. Then I read in a web post that in the ‘Find’ section of ‘find-replace’ of MS Word, type the ^ p in the find section(^ symbol is printed by pressing the shift key and 6 number numeric key together), and insert a single blank space in the replace section. With the command of ‘Replace All’, all becomes all right. That is what happened. Thus, the e-book was prepared in this way.

It should be noted that if there are plenty of small word files to be clubbed together, then help of ‘insert’ of ms word should be taken. On clicking ‘insert’ button, search the ‘object’ button and click on triangle at corner of this. Now click ‘text from file’ on dropdown menu. A new browse-window will pop up. Select word files on it to be clubbed. Keep in mind that files will be clubbed in order of selection. It means, first file in selected group will come first in combined word file and so on. I advise to club only maximum of 10 files at a time for I feel it can produce error if very large number of files is selected together. In fact, many files were not being downloaded in word format after converting. I was doing OCR in Hindi language. Those files were being downloaded in the text format. However, the files with the text format were opening only in Notepad, not in wordnote. It is a loss to download text files that those cannot be clubbed together by giving commands like insert-object etc. as in word files. One has to copy-paste every file separately.

There were two words attached to each other without space in that book at many places. For example, the words ‘fruit is’ of the original book became ‘fruitis’. With a little manual correction, it was all right. Page break, line break, heading shape etc. were provided at the appropriate places by keeping the paper book in front, so that the e-book looks like a completely original book. Some pictorial pages of cover and initial part of book were inserted directly into the e-book. For editing these cover photos, I used online photo editor of ‘photojet’. However, one needs to share it on face book before downloading the edited image. Online editor of pixlr.com is also good. Instead of copying images directly, the help of ‘Insert- picture’ of MS Word was taken, because copying image directly to the word file does not cause that to appear in the e-book at all times.

Before scanning the book, see how much old the book is. OCR of old books is not available. Opening the book’s bindings is required so that each page is scanned separately. By scanning the bound book by folding it, the scans are not good for paper-margins, so they cannot get good OCR. Later on, you can re-bind the book. Scanning the double page does not even make the OCR. The page will have to be placed on the scanner accordingly, as usually a single page is placed. The length of the page is placed in the direction of the length of the scanner. The page should be written like a normal book page, that is, the lines of letters cover the width of the page. The more straightforward the page on the scanner, the better the OCR. Therefore, the page should be attached to the backside plastic boundary of scanner-glass length. The page itself comes directly straight with this. In lengthwise, page should come in the middle of the scanner.

Further technique is recognizing hand-written text by the OCR. This is called ‘hand text recognition’. However, it has not evolved completely. Search is on. However, this technique works by inserting letters one by one in predefined boxed compartments in the paper format. That is why the introduction-forms in recruitment etc. are hand-filled in the boxed format.

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देवपूजा में कुंडलिनी

सभी धार्मिक गतिविधियाँ कुण्डलिनी में वैसे ही समा जाती हैं, जैसे नदियाँ समुद्र में। जब हम किसी देवी-देवता की पूजा कर रहे होते हैं, तब हम अप्रत्यक्ष रूप से कुण्डलिनी की ही पूजा कर रहे होते हैं। शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार देवता की मूर्ति, चित्र आदि के रूप में स्थित मानव-देह में अद्वैतशाली देहपुरुष विद्यमान होते हैं। अतः देवता की पूजा से उनकी पूजा स्वतः ही हो जाती है। उससे पूजा करने वाले व्यक्ति के मन में अद्वैतभाव पुष्ट हो जाता है। शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार यह सिद्धांत है कि कुण्डलिनी व अद्वैत साथ-२ रहते हैं। अतः देवपूजन से कुण्डलिनी-पूजन स्वयं ही हो जाता है, जिससे कुण्डलिनी क्रियाशील होकर विकसित होती रहती है, और कभी भी अनुकूल परिस्थितियों को पाकर जागृत भी हो सकती है।

यदि हम देव-मूर्ति में देहपुरुषों की सत्ता को न भी मानें, तब भी कोई बात नहीं। क्योंकि प्रकृति की सभी चीजें जिन्हें हम जड़ कहते हैं, वे जड़ (निर्जीव) नहीं, अपितु अद्वैतभाव के साथ चेतन (सजीव) होती हैं। प्रकृति के सभी अणु-परमाणु या मूलकण मूर्ति में भी विद्यमान होते हैं। अतः देव-मूर्ति के पूजन से सम्पूर्ण अद्वैतमयी प्रकृति की पूजा स्वयं ही हो जाती है। देहपुरुष की सत्ता की वैज्ञानिक कल्पना तो सम्पूर्ण प्रकृति व मानवाकार मूर्ति के बीच में पूर्ण समानता को प्रदर्शित करने के लिए ही की गई है। इससे अद्वैतभाव की प्रचंडता भी बढ़ जाती है।

जैसे ही मूर्ति-पूजन के साथ कुण्डलिनी प्रकट हो जाती है, तथा पूजन व कुण्डलिनी के बीच के सम्बन्ध का तनिक विचार कर लिया जाता है, वैसे ही पूजन पर ध्यान देने से वह ध्यान कुण्डलिनी को स्वयं ही लगता रहता है। उससे कुण्डलिनी उत्तरोत्तर चमकती रहती है। उदाहरण के लिए, देव-मूर्ति के सामने घंटी बजाने से व घंटी की आवाज पर ध्यान लगाने से, व ऐसा समझने से कि वह आवाज देवमूर्ति में स्थित कुण्डलिनी की सेवा कर रही है, स्वयं ही बीच-२ में कुण्डलिनी पर ध्यान लगता रहता है। ऐसा ही तब भी होता है, जब पितरों का पूजन किया जा रहा होता है। क्योंकि पितरों की देह भी देवता या प्रकृति की तरह शुद्ध, निर्विकार व अद्वैतवान होती है।

इसका अर्थ है कि जिसे कुण्डलिनी का ज्ञान नहीं है, उसे पूजा का सम्पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। एक कुण्डलिनी-योगी ही उत्तम प्रकार का पुजारी सिद्ध हो सकता है।

यदि किसी के मन में कुण्डलिनी नहीं बनी हुई है, तो उसके द्वारा की गई पूजा उलटी भी पड़ सकती है। पूजा से उसके मन में चित्र-विचित्र प्रकार के विचार उठेंगे, क्योंकि पूजा से शान्ति व मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। इससे पूजा की शक्ति घटिया किस्म के विचारों को भी मिल सकती है, जो हानि पहुंचा सकते हैं। जो पूजा-शक्ति कुण्डलिनी-रूपी एकाकी व लाभदायक विचार को पुष्ट कर सकती है, वह विचारों के हानिकारक झमेले को भी पुष्ट कर सकती है। इसीलिए कहते हैं कि पुजारी या गुरु का योग्य होना बहुत जरूरी है।

मैं अपने दादा के साथ लोगों के घरों में वैदिक पूजा-पाठ कराने जाया करता था। उस पूजा से मेरी पहले से विद्यमान तांत्रिक कुण्डलिनी बहुत अधिक बलवान हो जाया करती थी। उससे मुझे बहुत अधिक आनंद के साथ भरपूर सकारात्मक शक्ति प्राप्त होती थी। वह शक्ति वैसी ही यजमान को भी प्राप्त हो जाया करती थी, क्योंकि वे मेरे दादा के साथ मेरे प्रति भी प्रेमभाव सहित आदर-बुद्धि व सेवाभाव रख रहे होते थे।

इसी तरह प्रत्येक कर्म भी बड़ी आसानी से पूजा बन सकता है, यदि शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार यह सत्य सिद्धांत समझा जाए कि प्रत्येक कर्म अद्वैतशाली देहपुरुष की प्रसन्नता के लिए ही किया जाता है।

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Kundalini in worship

All religious activities are endowed in Kundalini just like rivers in the sea. When we are worshiping some goddess or god, then we are indirectly worshiping the Kundalini. According to the physiology philosophy / shareervigyan darshan, the gods and goddesses are present in the form of non-dual dehpurush in the body of deities. Therefore, worship of the deity becomes their worship automatically. Advaita is strengthened in the mind of the person who worships him. According to the philosophy of physiology, it is the principle that Kundalini and Advaita/non-duality live together. Therefore, the Kundalini-Pooja / kundalini worship is done through Devapujan / god worship itself, due to which the Kundalini becomes progressively stronger, and can be awakened by observing favorable conditions.

Even if we do not accept the existence of Dehpurush inside God-idol, there is no problem even then. Because all the things of nature that we call as the nonliving are not lifeless actually, but are living with non-duality. All atoms and fundamental particles of nature also exist in the body of the idol. Therefore, the worship of the God-idol is equal to the worship of the non-dual nature itself. The scientific imagination of the existence of Dehpurush is done only to show complete equality between the entire nature and the human-form idol. This also increases the strength of non-duality.

As soon as the Kundalini becomes manifest with idol worship, and the relation between worship and Kundalini is taken into consideration, that soon by meditating on worship procedure, the Kundalini receives the meditation itself. Due to this, Kundalini keeps on shining. For example, by meditating on the sound of a bell in front of a God-idol and subtle or indirect thinking about it as serving the kundalini present in God-idol, sharper meditation goes on shifting to the Kundalini itself at intervals. This is the case even when the ancestors are being worshiped. Because the bodies of the ancestors are also pure, divine, and non-dual like the God or Nature.

It means that one, who does not have knowledge of Kundalini, he does not receive the full result of worship. A Kundalini-yogi can be a perfect type of priest. If the Kundalini is not built in anyone’s mind, then the worship made by him can also cause mental trouble. Puja will give power to ​​strange-looking thoughts in his mind, because worship gives peace and mental strength. In this way, power of worship can also be got by poor quality ideas, which can cause harm. The power, which can strengthen the lonely and beneficial thinking about the Kundalini that can also strengthen the harmful jumble of thoughts. That is why it is said that being an able and qualified priest or master is very important, not merely being.

I used to accompany my grandfather to Vedic pooja in the homes of people. From that worship, my already existing Tantric Kundalini would become very strong. From that, I got a lot of positive power with great pleasure. The hosts would have received that power as well, because they used to have love and respect for my grandfather along with me.

Similarly, every action can be made as worship very easily, if according to physiological philosophy, this true theory is understood that every action is done only for the appeasement of non-dual Dehpurusha of our own body.

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Interrelation between Kundalini and idol worship

One has to make cordial relations with Kundalini for a very long time to activate and awaken it. Most likely it is very hard in a single lifetime. It is therefore necessary that Kundalini be remembered by one since his birth. Even when a man is in the womb of the mother, then he must start getting subtle impression of kundalini meditation. Ishtadev (favored god) has been conceptualized to make it possible. Ishtdeva is always the same for all. From this, in the family that believes in that god, the habit of meditating on him continues to grow throughout the long series of generations. That is why it is easy for the people of Shaiva ​​Sampradaya (Shiva-creed) to meditate on the same form of Shiva. By the same meditation, Shiva, who settles in a Shaiva people’s heart, he can become their own Kundalini, which can eventually become alive as a Kundalini-awakening. If Shiva were not given a definite form by the visionary sages, then the meditation of Shiva would not progressively increase and would be interfered repeatedly.

Suppose, a man would have considered Shiva as longhaired, and his son would have considered Shiva as short haired, what would happen? In this way, the son did not receive the meditation earned by his father. He collects his own meditation from the beginning, making him a little profit. The benefit that he would get, it would be that in his life, in a small quantity, non-duality and non-attachment would arise. Then he would not get Kundalini awakening due to tremendous non-attachment and non-duality.

Dev Shankar is the most important among the deities. That is why he is called great Lord, being the Lord of Lords. He has been given a definite form. The necklace of the snake is there in his neck. He has lengthy hair on his head. The half moon is seated on his head. The Ganga River is coming out from his head-hair. There are three parallel lines marked with sandalwood and ash on his forehead, which is called Tilak. It is also called Tripund. The third eye is also seen open at many places in his mid eyebrow. He is covered with ash. He has a trident in one hand, and in one hand, he has a damaru (a special single handed drum). He rides a bull. He wears the tiger’s skin, and does not wear any other clothes. He is beautiful. His facial look and texture are balanced and free of error. His face is vibrant and attractive. His body is soft, muscular, strong and balanced. He has a facial complexion of medium white color. His movements are full of advaita (non-duality), non-attachment, and quietness.

Likewise, other deities and goddesses have also been given certain shapes and sizes. Along with these, they have also been given certain quotes and ethics. Ganesha has been described as a mouse rider, a laddoo (a type of sweet) lover, and having an elephant face. Similarly, nine different Goddesses have also been given different introduction.

According to this principle, making your ancestor or family elderly (grandfather etc.) as your master is more beneficial. Because a person is acquainted with him since his birth and is very cordial with him, so it is the easiest to put him in mind. Then the same mental idol (mental picture) made out of him becomes active and awakened by becoming a Kundalini with constant practice.

God-idol is associated with old friends, acquaintances and ancestors. When someone reconnects to those contemporary deities of those acquaintances, then the memories of those familiar beings are re-opened. The most effectively remembered being of them could emerge in the form of permanent remembrance (Kundalini) with the repeated practice. In science, it is called conditioned reflex. According to this, when two objects have sat together in the mind, then both objects are joined together. Whenever an object is remembered, then the other thing associated with it is remembered by itself. It is just like that biological phenomenon, when a cow starts letting down her milk on seeing her calf. In this way, god-statues work as social conditioners or social links. They play an important role in maintaining the memory of loved ones and acquaintances. This same principle applies in relation to all other prescribed religious laws. Although idols are main in it, because they are human, beautiful, easy to be accessible, unrivaled, and attractive.

If one does not notice direct benefit from idol worship, even then a good habit of meditation and deep feeling is formed with help of it. It helps in the overall growth of humanity. The same happened to Premyogi vajra, that is why he could get glimpse forms of Enlightenment and Kundalini awakening. Actually, deities were worshipped in their pure natural form in Vedic period. Later on, many of these deities were personified in human form with ongoing social reforms, Which is also based on scientific philosophy.

Natural things are non-dual and detached in their inherent internal form. That is why a blissful peace is felt at natural places. Actually, god idols are the miniaturized models of the vast nature for it is scriptural and also scientifically proved by “Shareervigyan darshan” that  everything external is situated inside the human body. These tiny models have been designed for the confined home environment.

Now it comes about religion-change. Based on the above facts, we should never sacrifice our religion. Because of the change of religion, the memories of the familiar ones that are associated with one’s home religion are lost, and so the good opportunities for Kundalini-growth are missed by hand. A saying in this regard also comes in the scriptures, “Shreyo Swadharmo Vigunopi, Paradharmo Bhayavaha”. That is, even though one’s own religion is of low quality, then too it provides welfare, but the religion of others is so frightening. It does not mean that one should be strictly religious or religious extremist, or should not accept other religions. Rather it means that while accepting all the human religions, one’s own religion should be made the main one. It should be kept in mind that this does not apply to yoga, because yoga is not a particular religion. Yoga is a spiritual psychology, which is an integral part of all the religions.

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कुण्डलिनी व मूर्तिपूजा के बीच में परस्पर सम्बन्ध

कुण्डलिनी को क्रियाशील व जागृत करने के लिए कुण्डलिनी के साथ बहुत लम्बे समय तक सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध बनाना पड़ता है। अधिकांशतः ऐसा एक ही जीवनकाल में संभव नहीं हो पाता। इसलिए आवश्यक है कि कुण्डलिनी के स्मरण वाला संस्कार एक आदमी को उसके जन्म से ही मिल जाए। यहाँ तक कि जब वह माता के गर्भ में हो, तभी से मिलना शुरू हो जाए। इसको संभव बनाने के लिए ही इष्टदेव को कल्पित किया गया है। वह कल्पित रूप सदा से सभी के लिए एक जैसा होता है। इससे उस इष्टदेव को मानने वाले परिवार में उस इष्टदेव के स्मरण से सम्बंधित संस्कार वंश परम्परा के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता रहता है। इसीलिए शैव सम्प्रदाय के लोगों के लिए शिव के रूप का ध्यान करना आसान हो जाता है। उसी ध्यान-शक्ति से एक शैव के मन में बसने वाला शिव उसकी कुण्डलिनी बन जाता है, जो अंततः कुण्डलिनी-जागरण के रूप में जीवंत भी हो सकता है। यदि दूरदर्शी ऋषियों के द्वारा शिव को निश्चित रूप न दिया गया होता, तो शिव का ध्यान उत्तरोत्तर न बढ़कर बार-२ टूटता रहता।

मान लो, किसी आदमी नि शिव को जटाधारी माना होता, और उसके पुत्र ने शिव को जटाहीन माना होता, तो क्या होता? वैसे में पिता के द्वारा अर्जित ध्यान पुत्र को प्राप्त न होता। वह अपना ध्यान स्वयं ही शुरू से इकट्ठा करता, जिससे उसे बहुत थोड़ा ही लाभ मिलता। उसे जो लाभ मिलता, वह यह होता कि उससे उसके जीवन में अल्प मात्रा में ही अद्वैत व अनासक्ति-भाव उत्पन्न होते। उससे प्रचंड अनासक्ति व अद्वैत के साथ कुण्डलिनी-जागरण न मिलता।

देवताओं में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देव शंकर हैं। इसीलिए उन्हें देवों के देव महादेव कहा जाता है। उन्हें एक निश्चित रूप प्रदान किया गया है। उनके गले में सर्प की माला है। उनके सिर पर लम्बी-२ जटाएं हैं। उनके मस्तक पर आधा चन्द्रमा विराजमान है। उनकी जटाओं से गंगा नदी निकल रही है। उनके माथे पर तीन समानांतर रेखाओं के रूप में तिलक है, जिसे त्रिपुंड कहा जाता है। कई जगह उनके भ्रूमध्य में खुला हुआ तीसरा नेत्र भी दिखाया जाता है। वे भस्म से लिपटे हुए हैं। उनके एक हाथ में त्रिशूल है, और एक हाथ में डमरू है। वे बैल की सवारी करते हैं। वे बाघ का चर्म ही ओढ़ते हैं, अन्य कोई वस्त्र नहीं पहनते हैं। वे सुन्दर हैं। उनके नयन-नक्श संतुलित व त्रुटिरहित हैं। उनका मुख कान्तिमान व आकर्षक है। उनका शरीर सुडोल व संतुलित है। वे मध्यम गोरे रंग के हैं। उनकी चाल-ढाल अद्वैत, अनासक्ति, व वैराग्य से भरी हुई है।

इसी तरह अन्य देवी-देवताओं को भी निश्चित रूप व आकार प्रदान किए गए हैं। साथ में, उन्हें निश्चित भाव-भंगिमाएं व आचार-विचार भी प्रदान किए गए हैं। गणेश को मूषक की सवारी करने वाला, लड्डू खाने वाला, व हाथी के जैसे मुख वाला बताया गया है। इसी तरह, नौ देवियों को भी भिन्न-२ परिचय दिए गए हैं।

इसी सिद्धांत के अनुसार अपने पूर्वज या पारिवारिक वृद्ध (पितामह आदि) को गुरु बनाना अधिक लाभप्रद है। क्योंकि एक व्यक्ति उनके साथ जन्म से लेकर परिचित व सौहार्दपूर्ण बना होता है, इसलिए उन्हें मन में बैठाना सर्वाधिक सरल होता है। वही मानसिक मूर्ति फिर लगातार के अभ्यास से कुण्डलिनी बन कर क्रियाशील व जागृत हो सकती है।

देव-मूर्ति पुराने मित्रों, परिचितों व पूर्वजों से भी जुड़ी होती है। जब कोई उन चिर परिचितों की समकालीन देव-मूर्ति से पुनः संपर्क साधता है, तब उन चिर-परिचितों की याद पुनः ताजा हो जाती है। उनमें से सर्वाधिक प्रभावशाली स्मरण बार-२ के अभ्यास से स्थायी स्मरण (कुण्डलिनी) के रूप में मन में उभर सकता है। विज्ञान की भाषा में इसे कंडीशंड रिफ्लेक्स (conditioned reflex) कहते हैं। इसके अनुसार जब दो वस्तुएं मन में एकसाथ बैठ गई हों, तो दोनों वस्तुएं आपस में जुड़ जाती हैं। जब कभी एक वस्तु का स्मरण किया जाता है, तो उससे जुड़ी हुई दूसरी वस्तु का स्मरण स्वयं ही हो जाता है। यह उस जैविक घटना की तरह है, जब एक गाय अपने बछड़े को देखकर अपना दूध छोड़ने लगती है। इस प्रकार से देव-मूर्तियाँ सामाजिक कंडिशनर (social conditioner) या सामाजिक संपर्कसूत्र (social link) का काम करती हैं। अपने प्रिय व परिचित जनों की याद बनाए रखने में ये अहम् भूमिका निभाती हैं। यही बात अन्य सभी निर्धारित किए गए धार्मिक विधि-विधानों के सम्बन्ध में भी लागू होती है। यद्यपि देव-मूर्तियाँ इनमें मुख्य हैं, क्योंकि वे मानवाकार, सुन्दर, सहज सुलभ, सर्वसुलभ, व आकर्षक होती हैं।

अगर किसी को मूर्ति पूजा से प्रत्यक्ष लाभ नहीं दिखता है, तो भी इसकी मदद से ध्यान और गहरी भावना की एक अच्छी आदत पड़ जाती है। यह मानवता के समग्र विकास में मदद करता है। यह सब प्रेमयोगी वज्र के साथ हुआ, तभी तो वह क्षणिक आत्मज्ञान व क्षणिक कुण्डलिनी जागरण को अनुभव कर पाया। दरअसल, वैदिक काल में देवताओं को उनके शुद्ध प्राकृतिक रूप में पूजा जाता था। बाद में, इनमें से कई देवताओं को मानव समाज में चल रहे सामाजिक सुधारों के साथ मानव रूप दिया गया, जो ज्ञान-विज्ञान सम्मत भी है।

प्राकृतिक चीजें अद्वैतशाली व अनासक्त होती हैं, तभी तो प्रकृति के बीच में आनंददायक शान्ति का अनुभव होता है। वास्तव में, देव-मूर्तियाँ घर के सीमित स्थान के लिए निर्मित किए गए, विराट प्रकृति के सूक्ष्म रूप ही हैं। शास्त्रों के वचनों से व वैज्ञानिक दर्शन “शरीरविज्ञान दर्शन” से भी यह प्रमाणित ही है कि जो कुछ भी इस बाह्य व विराट प्रकृति में है, वह सभी कुछ इस मानव शरीर के अन्दर भी वैसा ही है।

अब बात आती है, धर्म-परिवर्तन के बारे में। उपरोक्त तथ्यों के आधार पर तो अपने धर्म का त्याग कभी नहीं करना चाहिए। क्योंकि धर्म परिवर्तन करने से अपने कुलधर्म से जुड़ी हुई चिर-परिचित लोगों व वस्तुओं की यादें गायब हो जाती हैं, और कुण्डलिनी-विकास का अच्छा अवसर हाथ से छूट जाता है। शास्त्रों में भी आता है, श्रेयो स्वधर्मो विगुणोपि, परधर्मो भयावहः। अर्थात, अपना धर्म कम गुणों वाला होने पर भी कल्याणकारी है, दूसरों का धर्म तो भयावह है। इसका यह अर्थ नहीं है कि कट्टर धार्मिक होना चाहिए, या दूसरे धर्मों को नहीं मानना चाहिए। बल्कि इसका अर्थ है कि सभी मानवीय धर्मों को मानते हुए, अपने धर्म को ही मुख्य बना कर रखना चाहिए। यह ध्यान में रहना चाहिए कि यह बात योग पर लागू नहीं होती, क्योंकि योग कोई विशेष धर्म नहीं है। योग तो एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान है, जो सभी धर्मों का एक अभिन्न अंग है।

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Relation between Kundalini and meditation on Breath

The breath is very important in Kundalini-meditation. With the mind of the Kundalini, breathing starts improving, so the body’s metabolism improves. Similarly, by focusing mind on deep and regular breathing (with the body moving with it), the Kundalini appears on the chakras of the body (especially on the Anahata and Manipur chakras), and on the nose tip. Especially it is noticed on the nose tip, when the breath touching the nasal tip is minded. The same thing is written in the Gita (Hindu-scripture) too. There comes a topic called “meditation on nasikagra / nose tip or starting point of nose.” Many scholars consider it as a midpoint between the eyebrows, that is the Agya chakra. They call the starting part of the nose as this midpoint, because in their view the nose starts from there. Actually, the nose tip is nearest to the front lips, from which the nose starts. I can say it with evidence. When I go on a morning walk, and feel the touch at the sensitive part of the beginning of the nose with the cold breeze of the morning, then on my nose tip, on the peak of nose or slightly outside it, my kundalini appears. When I count one number with full breath (both inside and outside breath), likewise counting from one to five (most of the times foot-steps also aligned with the breath), and then breathing five times without count, and repeat such a sequence again and again for long, then the Kundalini becomes even more stable and clear.

Similarly, with the meditation of breath, you can also pronounce “So(silent a)ham” in mind. It also helps to get the godly power of “OM”. When pronouncing “so”, there is in breathing, and while pronouncing “ham”, there is out breathing. Sanskrit word “So / Sah” means “He (God)”. The Sanskrit word “ham / aham” means, I, That is, I am God / Brahma. In yoga, the importance of all types of breaths is there. If breath is shallow, then mind focusing on that at nasikagra / nose tip is easy. If there is deeper breath, then at the Vishuddha Chakra, at the Anahata Chakra with still deeper breath, with deeper than that, it is easy to meditate on those breaths at the Manipura Chakra and with the highest deepness level of breaths, it is easy to focus mind on those at Swadhishthan-Muladhar Chakra. By breathing with the stomach, meditation of breath at the navel chakra appears to be the easiest and most effective.

While bearing the Advaitabhaav / non-dual feel like Dehapurush, Kundalini is exposed up, and with this, breathing (along with metabolism) improves. Puffs become regular and deep. The air of the breath is felt appealing, and the feeling of satisfaction begins. Stress starts to end. The mechanisms of the body are relaxed. The working of the heart improves. The burden of the heart decreases. There is calm in the mind with joy.

Double way can also be adopted. In this, by holding the Advaita (mainly with the help of physiologic philosophy / shareervigyan darshan), the breaths are slightly deepened and regularized. Then paying attention to those breaths, more benefits are obtained. In addition to the non-dual feeling, the breath can be improved even by direct meditation of the Kundalini. Advaita and Kundalini-meditation, both of them can be run together. With the non duality, Kundalini becomes manifested anyway. Additional attention can be given to that exposed Kundalini. After concentrating on the breath for a long time, the Kundalini becomes like a stable and clear image in mind under meditation. The Kundalini then refreshes the whole body, relaxes it, and removes the disease.

While focusing on breath, moving parts of the body with breath itself attract the meditative attention. Almost all major body parts move with breath. In this way, the entire body gets entry into meditation. The whole body is full of Advaitic (non-dual) men. Therefore, the mind itself is filled with non-duality by indirect attention on those dehpurushas. According to “physiology philosophy,” these micro human beings exist in the form of body cells, and body biochemicals. These micro human beings behave just like living beings. Because a being having an Advaita feeling can only be a human being, not another creature. In other organisms, there is even lack of the bhaav / mental possession / feeling, so there is no question of type of feeling. Therefore, the form of a human being appears superimposed over those dehpurushas. Because a yogi has made a man (master or lover) as his own Kundalini, so the yogi is most habitual of that man’s form. From this, the form of that special man that is attributed to his Kundalini, that is superimposed over Deh-Purusha of that meditating yogi. With the practice of yogic pranayama, the breath becomes associated with the kundalini. From this also, the Kundalini manifests itself in the meditation of the breath. In this way, the Kundalini is constantly reinforced with various efforts, so that both of the mind and the body remain healthy. In this way, Kundalini can be awakened in the earliest times. In all these efforts, physiology-philosophy has a very important role to play.

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