कुंडलिनी योग बनाम परमाणु विश्वयुद्ध

कुंडलिनी ऊर्जा ही नीलकंठ शिव महादेव के हलाहल विष को नष्ट करती है

दोस्तों, मैं हाल ही में एक स्थानीय मेले में गया। वहाँ मैं ड्रेगन ट्रेन को निहारने लगा। उसका खुले दांतों वाला मुंह दिखते ही मेरे अंदर ऊर्जा मुलाधार से ऊपर उठकर घूमने जैसी लग जाती थी। हालांकि यह हल्का आभास था, पर आनंद पैदा करने वाला था, लगभग वैसा ही जैसा शिवलिंगम के दर्शन से महसूस होता है। स्थानीय संस्कृति के अनुसार बाहरी अभिव्यक्ति के तरीके बदलते रहते हैं, पर मूल चीज एक ही रहती है। इसी के संबंध में मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे गुस्से आदि से कुंडलिनी शक्ति मस्तिष्क से नीचे उतरकर यौद्धा अंगों को चली जाती है। इससे मस्तिष्क में स्मरण शक्ति और भावनाएं क्षीण हो जाती हैं। भावनाएँ बहुत सारी ऊर्जा को खाती हैं। इसीलिए तो तीखी भावनाओं या भावनात्मक आघात के बाद आदमी अक्सर बीमार पड़ जाता है। आपने सुना होगा कि फलां आदमी अपने किसी प्रिय परिचित को खोने के बाद बीमार पड़ गया या चल बसा। गहरे तनाव के दौरान दिल का दौरा पड़ना तो आजकल आम ही हो गया है। शरीरविज्ञान दर्शन से अनियंत्रित भावनाओं पर लगाम लगती है। उपरोक्त मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि ड्रेगन के ध्यान से या उसको अपने शरीर पर आरोपित करने से कुंडलिनी शक्ति विभिन्न चक्रोँ पर उजागर होने लगती है। सम्भवतः बुद्धिस्टों के रैथफुल डाइटि भी इसी सिद्धांत से कुंडलिनी की मदद करते हैं। दरअसल विभिन्न धर्मशास्त्रों में जो आचार शिक्षा दी जाती है, उसके पीछे यही कुंडलिनी विज्ञान छुपा है। सत्य बोलो, चोरी न करो, क्रोध न करो, मीठा बोलो, हमेशा प्रसन्न व हँसमुख रहो, आसक्ति न करो आदि वचन हमें अवैज्ञानिक लगते हैं, पर इनके पीछे की वजह बहुमूल्य ऊर्जा को बचा कर उसे कुंडलिनी को उपलब्ध कराना ही है, ताकि वह जल्दी से जल्दी जागृत हो सके। कइयों को इसमें केवल स्वास्थ्य विज्ञान ही दिखता है, पर इसमें आध्यात्मिक विज्ञान भी छुपा होता है। ड्रेगन, शेर आदि हिंसक जीवों की ऊर्जा जब मस्तिष्क से नीचे उतरती है, तब सबसे पहले चेहरे, जबड़े और गर्दन पर आती है। इसीलिए तो क्रोध भरे मुख से गुर्राते हुए ये जबड़े और गर्दन की कलाबाजी पूर्ण गतियों से शिकार के ऊपर टूट पड़ते हैं। फिर कुछ अतिरिक्त ऊर्जा आगे की टांगों पर भी आ जाती है, जिससे ये शिकार को कस कर पकड़ लेते हैं। जब इन क्रियाओं से दिल थक जाता है, तब अतिरिक्त ऊर्जा दिल को भी मिलती है। उसके बाद ऊर्जा पेट को पहुंचती है, जिससे भूख बढ़ती है। इससे वह और हमलावर हो जाता है, क्योंकि वहाँ से ऊर्जा बैक चैनल से वापिस ऊपर लौटने लगती है, और टॉप पर पहुंचकर एकदम से जबड़े को उतर जाती है। जब इतनी मेहनत के बाद भी शिकार काबू में न आकर भागने लगता है, तो ऊर्जा टांगों में पहुंच कर शिकारी को उसके पीछे भगाने लगती है। थोड़ी देर बाद वह ऊर्जा मस्तिष्क को वापिस चली जाती है, और शिकारी पशु थक कर बैठ जाता है। फिर वह अपनी ऊर्जा को नीचे उतारने के लिए चेहरे को विकृत नहीं करता क्योंकि तब उसे पता लग जाता है कि इससे कोई फायदा नहीं होने वाला। वह इतना थक जाता है कि उसके पास ऊर्जा उतारने के लिए भी ऊर्जा नहीं बची होती। ऊर्जा उतारने के लिए भी ऊर्जा चाहिए होती है। इसीलिए उस समय वह गाय की तरह शांत, दयावान, अहिंसक और सदगुणों से भरा लगता है, उसकी स्मरणशक्ति और शुभ भावनाएँ लौट आती हैं, क्योंकि उस समय उसका मस्तिष्क ऊर्जा से भरा होता है। यह अलग बात है कि मस्तिष्क से नीचे उतरी हुई ऊर्जा उसे अंधकार के रूप में महसूस होती है, कुंडलिनी चित्र के रूप में नहीं, क्योंकि निम्न जीव होने से उसमें दिमाग़ भी कम है, और वह कुंडलिनी योगी भी नहीं है। दरअसल जो शिव ने विष ग्रहण करके उसे गले में फँसा कर रखा था, वह आदमी के मस्तिष्क की दुर्भावनाओं के रूप में अभिव्यक्त ऊर्जा ही है। विष का पान किया, मतलब आम दुनिया की बुरी बातें और बुरे दृश्य नकारात्मक ऊर्जा के रूप में कानों और आँखों आदि से अंदर प्रविष्ट हो गए। वह नकारात्मक ऊर्जा जब विशुद्धि चक्र पर पहुंचती है, तब वह कुंडलिनी ऊर्जा में रूपांतरित होकर वहाँ लम्बे समय तक फंसी रहती है। इसकी वजह है गर्दन की स्थिति और बनावट। गर्दन सिर और धड़ के जोड़ की तरह है, जो सबसे ज्यादा गतिशील है। जैसे पाईप आदि के बीच में स्थित लचीले और मुलायम जोड़ों पर पानी या उसमें मौजूद मिट्टी आदि जम कर फंस जाते हैं, उसी तरह गर्दन में ऊर्जा फंसी रह जाती है। इसीलिए तो भगवान शिव से वह विष न तो उगलते बना और न ही निगलते, वह गले में ही फंसा रह गया, इसीलिए शिव नीलकंठ कहलाते हैं। इसीलिए कहते हैं कि जिसने विशुद्धि चक्र को सिद्ध कर दिया, उसने बहुत कुछ सिद्ध कर लिया। दरअसल अगर कुंडलिनी शक्ति को गले से नीचे के किसी चक्र पर उतारा जाए, तो वह एकदम से घूम कर दुबारा मस्तिष्क में पहुंच जाती है, और वहाँ तनाव के दबाव को बढ़ाती है। हालांकि फिर ज्यादातर मामलों में वह सकारात्मक या अद्वैतात्मक कुंडलिनी ऊर्जा के रूप में महसूस होती है, नकारात्मक या द्वैतात्मक ऊर्जा के रूप में नहीं। हृदय चक्र पर भी काफी देर तक स्थिर रहती है, नाभि चक्र और उसके नीचे के चक्रोँ से तो पेट की सिकुड़न के साथ एकदम वापिस मुड़ने लगती है। यद्यपि फिर यह सकारात्मक कुंडलिनी ऊर्जा है, लेकिन मस्तिष्क में इसके वापस बुरे विचारों में परिवर्तित होने की संभावना तब भी बनी ही रहती है। वह ऊर्जा योद्धा अंगों से उठापटक भी करवा सकती है। इसीलिए उसे गले के विशुद्धि चक्र पर रोककर रखा जाता है। मतलब कि अगर भगवान शिव तनाव रूपी जहर को गले से नीचे उतारकर पी जाए, तो वे विनाशकारी तांडव नृत्य से दुनिया में तबाही भी मचा सकते हैं, या वह रूपांतरित जहर उनके पेट से चूस लिया जाएगा, और वह रक्त में मिलकर पुनः मस्तिष्क में पहुंच जाएगा। मस्तिष्क में  जहर पहुंचने का अर्थ है, अज्ञानरूपी या मनोदोष रूपी अंधकार के रूप में मृत्यु की सम्भावना। मनोदोषों से दुनिया में फिर से तबाही का खतरा पैदा हो जाएगा। सम्भवतः कुंडलिनी शक्ति भोजन के साथ पेट में पहुंचती है, और वहाँ से इसी तरह मस्तिष्क में पहुंच जाती है। हालांकि, तथाकथित विकृत ऊर्जा रूपी जहर पीने के बाद, मस्तिष्क में पुन: अवशोषण के साथ, थोड़े अतिरिक्त विचारशील प्रयास के साथ लंबे समय तक इसके कुंडलिनी ऊर्जा में रूपांतरित बने रहने की अधिकतम संभावना होती है। शिव जहर को उगल भी नहीं सकते, क्योंकि अगर वे उसे बाहर उगलते हैं तो भी उससे जीवों का विनाश हो सकता है। आदमी के मस्तिष्क की दुर्भावनाएं यदि बदजुबानी, गुस्से, बुरी नजर या मारपीट आदि के रूप में बाहर निकल जाएं, तो स्वाभाविक रूप से वे अन्य लोगों और जीवजंतुओं का अहित ही करेंगी। उससे समाज में आपसी वैमनस्य और हिंसा आदि दोष फैलेंगे। इसीलिए लोग कहते हैं कि फलां आदमी को गुस्सा तो बहुत आया पर वह उसे पी गया। दरअसल गुस्सा पीआ नहीं जाता, उसे गले में अटकाकर रखा जाता है, पीने से तो वह फिर से दिमाग़ में पहुंच जाएगा। इसीलिए कई लोगों को आपने परेशान होकर कहते हुए सुना होगा, मेरे तो गले तक आ गई। दरअसल कमजोर वर्ग के लोग ऐसा ज्यादा कहते हैं, क्योंकि न तो वे परेशानी को निगल सकते हैं, और न ही उगल सकते हैं, लोगों के द्वारा बदले में सताए जाने के डर से। दरअसल वे सबसे खुश होते हैं भोले शंकर की तरह, परेशानी को गले में फँसाए रखने के कारण। वे परेशान नहीं होते, परेशानी का उचित प्रबंधन करने के कारण। परेशान वे औरों को लगते हैं, क्योंकि उन्हें परेशानी को प्रबंधित करना नहीं आता। बहुत से लोगों को नीले गले वाले शिव बेचारे लग सकते हैं, पर बेचारे तो वे लोग खुद हैं, जो उन्हें समझ नहीं पाते। शिव किसीके डर की वजह से विष को गले में धारण नहीं करते, बल्कि अपने पुत्र समान सभी जीवों के प्रति दया के कारण ऐसा करते हैं। भगवान शिव सारी सृष्टि को बनाते और उसका पूरा कार्यभार सँभालते हैं। इसलिए स्वाभाविक है कि उनका दिमाग़ भी तनाव और अवसाद से भर जाता होगा। वह तनाव गुस्से के रूप में दुनिया के ऊपर न निकले, इसीलिए वे तनाव रूपी विष को अपने गले में धारण करके रखते हैं। क्योंकि रक्त का रंग भी लाल-नीला ही होता है, जो शक्ति का परिचायक है, इसीलिए उनका गला नीला पड़ जाता है। वे एक महान योगी की तरह व्यवहार करते हैं।

समुद्र मंथन या पृथ्वी-दोहन मानसिक दोषों के रूप में विष उत्पन्न करता है, जिसे शिव जैसे महापुरुषों द्वारा पचाया या नष्ट किया जाता है

कहते हैं कि वह हलाहल विष समुद्रमंथन के दौरान निकला था। उसमें और भी बहुत सी ऐश्वर्यमय चीजें निकली थीं। समुद्र का मतलब संसार अर्थात पृथ्वी है, मंथन का मतलब दोहन है, ऐश्वर्यशाली चीजें आप देख ही रहे हैं, जैसे कि मोटरगाड़ियां, कम्प्यूटर, हवाई जहाज, परमाणु रिएक्टर आदि अनगिनत मशीनें। आज भी ऐसा ही महान मंथन चल रहा है। अनगिनत नेता, राष्ट्रॉध्यक्ष, वैश्विक संस्थाएं, वैज्ञानिक और तकनीशियन समुद्रमंथन के देवताओं और राक्षसों की तरह है। इस आधुनिक समुद्रमंथन से पैदा क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार आदि मन के दोषों के रूप में पैदा होने वाले विष को पीने की हिम्मत किसी में नहीं है। दुनिया दो धड़ों में बंट गई है। एकतरफ तथाकथित राक्षस या तानाशाह लोग हैं, तो दूसरी तरफ तथाकथित देवता या लोकतान्त्रिक लोग हैं। इसीलिए पूरी दुनिया आज परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। सभी को इंतजार है कि किसी महापुरुष के रूप में शिव आएंगे और इस विष को पीकर दुनिया को नष्ट होने से बचाएंगे।

आज के समय में जिम व्यायाम के साथ योग बहुत जरूरी है

बहुत सी खबरें सुनने को मिल रही हैं कि फलां कलाकार या सेलिब्रिटी या कोई अन्य जिम व्यायाम करते हुए दिल के दौरे का शिकार होकर मर गया। मुझे लगता है कि वे पहले ही तनाव से भरे जीवन से गुजर रहे होते हैं। इससे उनके दिल पर पहले ही बहुत बोझ होता है। फिर बंद कमरे जैसे घुटन भरे स्थान पर भारी व्यायाम से वह बोझ और बढ़ जाता है, जिससे अचानक दिल का दौरा पड़ जाता है। पहले योग से तनाव को कम कर लेना चाहिए। उसके बाद ही भौतिक व्यायाम करना चाहिए, अगर जरूरत हो तो, और जितनी झेलने की क्षमता हो। योग से नाड़ियों में ऊर्जा घूमने लगती है। जीभ और तालु के आपसी स्पर्श के सहयोग से वह आसानी से मस्तिष्क से गले को या नीचे के अन्य चक्र को उतरती है, विशेषकर जब साथ में शरीरविज्ञान दर्शन की भी मन में भावना हो। शरीरविज्ञान दर्शन से मानसिक कुंडलिनी चित्र प्रकट होता है, और इसके साथ तालु-जीभ के परस्पर स्पर्ष के ध्यान से कुंडलिनी ऊर्जा अपने साथ ले जाता हुआ वह चित्र मस्तिष्क के दबाव को न बढ़ाता हुआ आगे के चैनल से होता हुआ किसी भी अनुकूल चक्र पर चमकने लगता है। इससे कुंडलिनी ऊर्जा व्यर्थ की बातचीत में बर्बाद न होकर विशुद्धि चक्र को भी पुष्ट करती है।

मस्तिष्क की ऊर्जा के सिंक या अवशोषक के रूप में विशुद्धि चक्र

ठंडे जल से नहाते समय जब नीचे से चढ़ती हुई ऊर्जा से मस्तिष्क का दबाव बढ़ जाता है या सिरदर्द जैसा होने लगता है, तब नीचे से आ रही ऊर्जा विशुद्धि चक्र पर कुंडलिनी प्रकाश और सिकुड़न के साथ घनीभूत होने लगती है। ऐसा लगता है कि नीचे का शरीर आटा चक्की का निचला पाट है, मस्तिष्क ऊपर वाला पाट है और विशुद्धि चक्र वह बीच वाला छोटा स्थान है, जिस पर दाना पिस रहा होता है। या ऊर्जा सीधी भी विशुद्धि चक्र को चढ़ सकती है, मस्तिष्क में अनुभव के बिना ही। जिसे ताउम्र प्रतिदिन गंगास्नान का अवसर प्राप्त होता था, उसे सबसे अधिक भाग्यवान, पुण्यवान और महान माना जाता था। “पंचस्नानी महाज्ञानी” कहावत भी शीतजल स्नान की महत्ता को दर्शाती है। गंगा के बर्फीले ठन्डे पानी में साल के सबसे ठंडे जनवरी (माघ) महीने के लगातार पांच पवित्र दिनों तक हरिद्वार के भिन्न-भिन्न पवित्र घाटों पर स्नान करना आसान नहीं है। आदमी में काफी योग शक्ति होनी चाहिए। पर यह जरूर है कि जिसने ये कर लिए, उसकी कुंडलिनी क्रियाशील होने की काफी सम्भावना है। इसीलिए कहते हैं कि ऐसे स्नान करने वाले को लोक और परलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं, मुक्ति भी नहीं। ठंडे पानी से नहाने वाले व ठंडे स्थानों में रहने वाले लोग इसके विशुद्धि चक्र प्रभाव की वजह से बहुत ओजस्वी और बातचीत में माहिर लगते हैं। यह ध्यान रहे कि ठंडे पानी का अभ्यास भी अन्य योगाभ्यासों की तरह धीरेधीरे ही बढ़ाना चाहिए, ताकि स्वास्थ्य को कोई हानि न पहुंचे। जिस दिन मन न करे, उस दिन नहीं नहाना चाहिए। अभ्यास और सहजता का नाम ही योग है। यकायक और जबरदस्ती योग नहीं है। अगर किसी दिन ज्यादा थकान हो तो न करने से अच्छा योगाभ्यास धीरे और आराम से करना चाहिए। इससे आदमी सहज़ योगी बनना सीखता है। किसी दिन कमजोरी लगे या मन न करे तो उस दिन अन्य धार्मिक गतिविधियों को छोड़ा भी जा सकता है, मूलभूत हठ योगाभ्यास को नहीं, क्योंकि योग सांसों या प्राणों से जुड़ा होने के कारण जीवन का मूल आधार ही है, जबकि अन्य गतिविधियां ऐड ऑन अर्थात अतिरिक्त हैं। होता क्या है कि बातचीत के समय मन में उमड़ रही भावनाएं और विचार विशुद्धि चक्र पर कैद जैसे हो जाते हैं, क्योंकि उस समय विशुद्धि चक्र क्रियाशील होता है। जब योग आदि से पुनः विशुद्धि चक्र को क्रियाशील किया जाता है, तब वे वहाँ दबे विचार व भावनाएँ बाहर निकल कर नष्ट हो जाती हैं, जिससे शांति महसूस होती है, और आदमी आगे की नई कार्यवाही के लिए तरोताज़ा हो जाता है। यह ऐसे ही है, जैसे खाली ऑडियो रिकॉर्डर में ऑडियो कैसेट को घुमाने से उस पर आवाज दर्ज हो जाती है। जब उस लोडिड कैसेट को पुनः उसी तरह घुमाया जाता है, तो वह दबी हुई आवाज गाने के रूप में बाहर आ जाती है, जिसे हम सब सुनते हैं। इसी तरह सभी चक्रोँ पर होता है। यह मुझे बहुत बड़ा चक्र रहस्य लगता है, जिसके बारे में एक पुरानी पोस्ट में भी बात कर रहा था।

श्री शब्द एक महामंत्र के रूप में (धारणा और ध्यान में अंतर)

जिंदगी की भागदौड़ में यदि शरीरविज्ञान दर्शन शब्द का मन में उच्चारण न कर सको, तो श्रीविज्ञान या शिवविज्ञान या शिव या शविद या केवल श्री का ही उच्चारण कर लो, कुंडलिनी आनंद और शांति के साथ क्रियाशील हो जाएगी। श्री शब्द में बहुत शक्ति है, इसी तरह श्री यंत्र में भी। सम्भवतः यह शक्ति शरीरविज्ञान दर्शन से ही आती है, क्योंकि श्री शब्द शरीर से निकला हुआ शब्द और उसका संक्षिप्त रूप लगता है। श्री शब्द सबसे बड़ा मंत्र लगता है मुझे, क्योंकि यह बोलने में सुगम है और एक ऐसा दबाव पैदा करता है, जिससे कुंडलिनी क्रियाशील होने लगती है। सम्भवतः इसीलिए किसी को नाम से सम्बोधित करने से पहले उसके साथ श्री लगाते हैं। इसी तरह धार्मिक अवसरों व क्रियाकलापों को श्री शब्द से शुरु किया जाता है। इसी तरह शिव भी शरीर से मिलता जुलता शब्द है, शव भी। इसीलिए शक्तिहीन शिव को शव भी कहते हैं। अति व्यस्तता या शक्तिहीनता की अवस्था में केवल “श” शब्द का स्मरण भी धारणा को बनाए रखने के लिए काफी है। मन की भावनात्मक अवस्था में इसके स्मरण से विशेष लाभ मिलता है। “श” व “स” अक्षर में बहुत शक्ति है। इसीलिए श अक्षर से शांति शब्द बना है। श अक्षर के स्मरण से भी शांति मिलती है और कुंडलिनी से भी। श अक्षर से कुंडलिनी मस्तिष्क के नीचे के चक्रोँ मुख्यतः हृदय चक्र पर क्रियाशील होने लगती है। इससे आनंद के साथ शांति भी मिलती है, और मस्तिष्क का बोझ हल्का हो जाने से काम, क्रोध आदि मन के जंगी दोष भी शांत हो जाते हैं। इसी तरह श अक्षर से ही शक्ति शब्द बना है, जो कुंडलिनी का पर्याय है। यह संस्कृत भाषा का विज्ञान है। आपने संस्कृत मंत्र स्वस्तिवाचन के बाद चारों ओर शांति का माहौल महसूस किया ही होगा। यह सामूहिक रूप में गाया जाता है, जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि की मंगलकामना की जाती है। ज्ञान होने पर भी उसका लाभ क्यों नहीं मिलता? क्योंकि हम ज्ञान की धारणा बना कर नहीं रखते। मैं ध्यान करने को नहीं बोल रहा। व्यस्त जीवन के दौरान ध्यान कर भी नहीं सकते। धारणा तो बना सकते हैं। धारणा और ध्यान में अंतर है। ध्यान का मतलब है उसको लगातार सोचना। इससे ऊर्जा का व्यय होता है। धारणा का मतलब है उस पर विश्वास या आस्था या उस तरफ सोच का झुकाव रखना। इसमें ऊर्जा व्यय नहीं होती। जब उपयुक्त समय कभी जिंदगी में प्राप्त होता है, तो धारणा एकदम से ध्यान में बदल जाती है और तनिक योगाभ्यास से समाधि तक ले जाती है। धारणा जितनी मजबूती से होगी और जितने लम्बे समय तक होगी, ध्यान उतना ही मजबूत और जल्दी लगेगा। पतंजलि ने भी अपने सूत्रों में धारणा से ध्यान स्तर का प्राप्त होना बताया है। मेरे साथ भी ठीक ऐसे ही हुआ। मैं शरीरविज्ञान दर्शन नामक अद्वैत दर्शन पर धारणा बना कर रखता था पर समय और ऊर्जा की कमी से ध्यान नहीं कर पाता था। इनकी उपलब्धता पर वह धारणा ध्यान में बदल गई और ====बाकि का सफर आपको पता ही है (कि क्या होता है )। अद्वैत की धारणा अप्रत्यक्ष रूप में कुंडलिनी की धारणा ही होती है, क्योंकि अद्वैत और कुंडलिनी साथसाथ रहने की कोशिश करते हैं। ध्यान प्रत्यक्ष रूप में, मतलब जानबूझकर कुंडलिनी का किया जाता है, जिसमे कुंडलिनी जागरण प्राप्त होता है।

रूपान्तरण से आदमी पुरानी चीजों को भूलता नहीं हैं, अपितु उन्हें सकारात्मकता के साथ अपनाता है

योग खुद कोई रूपान्तरण नहीं करता। यह अप्रत्यक्ष रूप से खुद होता है। योग से मन का कचरा बाहर निकलने से मन खाली और तरोताज़ा हो जाता है। इससे मन नई चीजों को ग्रहण करता है। नई चीजों में भी अच्छी चीजें और आदतें ही ग्रहण करता है, क्योंकि योग से सतोगुण बढ़ता है, जो अच्छी चीजों को ही आकर्षित करता है। कई लोगों को लगता होगा कि योग से रूपान्तरण के बाद आदमी इतना बदल जाता है कि उसके पुराने दोस्त व परिचित उससे बिछड़ जाते हैं, उसके मन में पुरानी यादें मिट जाती हैं, वह अकेला पड़ जाता है वगैरह वगैरह। पर दरअसल बिल्कुल ऐसा नहीं होता। रहता उसमें सबकुछ है, पर उसे उनके लिए वह क्रेविंग या छटपटाहाट महसूस नहीं होती, जो कि रूपान्तरण से पहले होती है। उनके लिए उसके मन में विकार नहीं होते, जैसे कि काम, क्रोध, लोभ, मोह और मत्सर। इसका मतलब है कि फिर पुराने दुश्मन भी उसे दोस्त लगने लगते हैं। अगर ऐसा रूपान्तरण सभी के साथ हो जाए, तो दुनिया से लड़ाई-झगड़े ही खत्म हो जाएं। अगर ऐसा ही रूपान्तरण सभी देशों या राष्ट्रध्यक्ष लोगों के साथ हो जाए, तो युद्ध वगैरह कथा-कहानियों तक ही सीमित रह जाएंगे।

Kundalini yoga versus nuclear world war

kundalini energy neutralizes the poison drunk by Neelkanth Shiva Mahadeva

Friends, I recently went to a local fair. There I began to look at the dragon train. As soon as I saw its open-toothed mouth, the energy inside me seemed like getting up from Muladhara and revolving around. Though it was mild, it was blissful, almost the same as one feels at the sight of the Shivalingam. The modes of outward expression keep on changing according to prevailing local culture, but the basic thing remains the same. About the same thing, I was telling in the previous post that how the Kundalini energy comes down from the brain and goes to the warrior organs due to anger etc. Due to this, the memory and emotions in the brain become impaired. Emotions consume a lot of energy. That’s why man often falls ill after strong feelings or emotional trauma. You must have heard that such a man fell ill or passed away after losing a dear acquaintance. Philosophy of physiology controls uncontrolled emotions. It should also come as no surprise from the above psychological analysis that by meditating on a dragon or by imposing it on one’s body, the Kundalini energy begins to manifest at various chakras. Perhaps the Wrathful deities of Buddhists also helps Kundalini by the same principle. In fact, this same Kundalini science is hidden behind the ethics that is taught in various religious scriptures. Speak the truth, don’t steal, don’t get angry, talk sweet, be happy and smiling, don’t get attached etc. words seem unscientific to us, but the reason behind them is to save precious energy and make it available to Kundalini, so that she can awaken as soon as possible. Some people saw these ethical words related to health science only, ignoring the spiritual science that’s along with it. When the energy of violent creatures like dragons, lions etc. comes down from the brain, then it first comes on the jaw and neck. That is why with the dreaded and roaring face along with the acrobatic movements of the jaw and neck, they fall on the prey. Then some of the extra energy also goes to the front legs, due to which they hold the prey tightly. When the heart gets tired from these activities, then the extra energy also gets down to the heart. After that the energy reaches the belly, which increases appetite. This makes these even more violent, because from there the energy starts coming back up through the back channel to top and again drops little down to the jaws. When, even after so much effort, the prey starts running away breaking the control, the energy reaches the legs and chases the hunter after it. After a while that energy goes back to the brain, so the hunter gets tired and sits down. Then it doesn’t distort its face to take its energy down because it realizes that it’s not going to be of any use. It gets so much tired that it doesn’t even have the energy to drop energy from brain down. Energy is also needed to drop energy down. That is why at that time it seems calm, compassionate, non-violent and full of virtues like a cow, its memory and good emotions return, because at that time its mind is full of energy. It is a different matter that the energy that has descended from the brain is felt by the animal in the form of darkness, not as a Kundalini picture, because being a lower living entity, it has less brain, and it is not a Kundalini yogi either. In fact, the poison that Shiva had consumed and trapped it in the throat was the energy expressed in the form of the evil spirits of the mind. These evils enter inside the body from bad scenes and words through eyes and ears. When that negative energy of brain reaches the Vishuddhi Chakra, it gets transformed in to positive kundalini energy that remains trapped there for a long time. This is because of the position and texture of the neck. The neck is like the joint of the head and the trunk, which is the most mobile. Just as water or soil present in water pipe gets stuck on the flexible and soft joints located at places in it, in the same way energy remains trapped in the neck. That’s why he neither spewed nor swallowed that transformed poison, it remained trapped in the throat, that is why Shiva is called Neelkanth means blue throated. That is why it is said that one who has perfected the Vishuddhi Chakra, he has perfected many things. In fact, if the Kundalini energy is dropped on any chakra below the neck, then it suddenly turns around again and reaches the brain, and increases the pressure of stress there. However Kundalini energy stays longer at heart chakra, but it tries to return back to brain immediately from naval chakra and chakras below through abdominal contraction. Although it’s than positive kundalini energy, but chances of its converting back to evil thoughts are still there in the brain. Also, the energy can go to warrior organs to make chaos in the society. Shiva can be forced to perform dreadful tandava dance with that energy reaching arms and legs if swallowed. That is why it is kept on the Vishuddhi chakra of the neck. Meaning that if Lord Shiva drinks the poison of stress down from the throat, then it will be sucked from his stomach, and it will reach the brain back after mixing with the blood. Poison or bad feelings reaching the brain means death in the form of darkness of ignorance or evils of mind. Presumably the Kundalini energy reaches the stomach with food, and from there it reaches the brain. Shiva cannot even spew the poison,  because if he spews it outside, it can destroy the living beings. If the maladies of man’s mind come out in the form of abuse, anger, and the evil eye, they will naturally do harm to other people and animals. Due to this, mutual enmity and violence etc. will spread in the society. That’s why people say that such a man got very angry but he drank it. Actually anger is not drunk, it is kept stuck in the throat, by drinking, it will reach the mind again. However, with drinking too with subsequent reabsorption to brain, there is maximum probability of its being transformed to kundalini energy for long time with little extra thoughtful effort. That is why you must have heard many people saying being upset, I have come till my throat or that my breath or life is entangled in my throat. In fact, the weaker section people say this more, because they can neither swallow nor spit out trouble, for fear of being persecuted in return by the people. In fact, one like them is happiest, like the innocent Shankar, because of keeping trouble stuck in his throat. They do not get upset actually, due to proper management of the problem. They are seen as upset by others, because they do not know how to manage the problem. To many people, blue-throated Shiva may seem poor, but those people are poor themselves as they do not understand him. Shiva does not wear poison around his neck out of fear, but out of compassion for all living beings like his own son. Lord Shiva creates the whole creation and takes care of its entire work. So it is natural that his mind would also be filled with stress and depression. That tension does not come out on the world in the form of anger, that is why he keeps the poison of stress around his neck. Because the color of blood is also red-blue, which is a sign of energy, that is why his throat turns blue. He behaves like a great yogi.

Samudra manthan or earth exploitation produce poison in the form of mental defects that is digested or destroyed by great men like Shiva

It is said that the Halahal poison came out during the churning of the ocean. There were many other wonderful things obtained through it. Samudra or ocean means world i.e. earth, churning or manthan means tapping or milking. You are already seeing the majestic things, such as automobiles, computers, airplanes, nuclear reactors etc., countless machines. The same great churning is going on even today. Countless leaders, heads of state, global organizations, scientists and technicians are like ocean churning gods and demons. The entire world is devided in to two parts, one part made of so called demons or dictators, and the second part made of so called gods or Democratic people. No one has the courage to drink the poison that arises in the form of defects of the mind like anger, jealousy, ego etc. That is why the whole world is standing on the verge of nuclear war today. Everyone is waiting that Shiva will come in the form of a great man and drink this poison and save the world from destruction.

Gym exercise is better alongwith yoga

In today’s timeMany news are being heard that such and such artist or celebrity died due to heart attack while doing gym exercise. I think they are already going through a stressful life. This puts a lot of burden on their heart already. Then heavy exercise in a stuffy place like a closed room increases that burden, which leads to a sudden heart attack. First of all, stress should be reduced by yoga. Only after that physical exercise should be done, if needed and whatever is tolerable. Through yoga, energy starts circulating in the nadis. With the help of mutual contact of tongue and palate, it easily descends from the brain to the throat or other lower chakra, especially when there is a feeling in the mind of the philosophy of physiology. Philosophy of physiology reveals the mental kundalini picture, and with it the kundalini energy is taken with it by the attention of the palate-tongue mutual touch, that picture does not increase the pressure of the brain and shines on any favorable chakra through the front channel. Due to this, the Kundalini energy is not wasted in unnecessary conversations instead it strengthens the Vishuddhi Chakra too.

Vishuddhi Chakra as a sink or absorber of brain energy

While bathing in cold water, when the pressure in the brain increases due to the rising energy from below or starts causing a headache, then the energy coming from below starts condensing on the Vishuddhi chakra with the light of kundalini and contraction there. It seems that the lower body is the lower plate of the flour mill, the brain is the upper plate and the Vishuddhi Chakra is the small space in the middle on which the grain is being milled. Or the energy can directly climb to vishuddhi chakra without being noticed in the brain. The one who got the opportunity of bathing in the Ganges every day, was considered the most fortunate, virtuous and great. The proverb “Panchasnani Mahagyani” meaning “five times bathers being the most knowledgeable” also shows the importance of cold water bath. It is not easy to bathe in the icy cold water of the Ganges for five consecutive auspicious days of coldest January month at different shores in holy Haridwar city. There should be a lot of yoga power in a man. But it is definite that the one who has done this, there is a lot of possibility of his Kundalini becoming active. That is why it is said that the one who takes such a bath has nothing rare in the world and the hereafter, not even liberation. Those who take bath with cold water and live in cold places, for the vishuddhi chakra potentiating reason, seem very energetic and expert in conversation. It should be kept in mind that the practice of cold water bath should also be increased gradually like other yoga practices, so that there is no harm to health. One should not take bath on a day when he does not feel like it. Yoga is the name of practice and ease. There is no sudden and forced manner yoga. If there is a lot of fatigue on some day, then better yoga should be practiced slowly and comfortably than not. By this man learns to become a Sahaja Yogi or auto yogi. If one day feels weakness or does not feel liking, then other religious activities can be abandoned on that day, not the basic hatha yoga practice, because yoga is the basic foundation of life being connected with breath or prana, whereas other activities are add on i.e. are extra. What happens is that the feelings and thoughts arising in the mind during the conversation get imprisoned on the Vishuddhi Chakra because at that time the Vishuddhi Chakra is active. When the Vishuddhi chakra is activated again by yoga etc., then those buried thoughts and feelings come out and get destroyed, due to which one feels peace, and the person is refreshed for further new action. It’s just like rotating an empty audio cassette in an audio recorder records sound on it. When that loaded cassette is rotated again in the same way, that muffled sound comes out in the form of a song that we all hear. The same happens on all the chakras. This seems to me to be the huge chakra mystery that appears psychologically resolved with this, which was also being talked about in an old post.

Shree word as a Mahamantra (difference between contemplation and assumption or dhyana versus dharna)

In the hustle and bustle of life, if you cannot pronounce the word sharirvigyan Darshan in your mind, then chant Shree Vigyan or Shiv Vigyan or shavid or only Shree, Kundalini will become active with joy and peace. There is a lot of power in the word Shree, similarly there is a Shree Yantra. Perhaps this power comes from the philosophy of Physiology, because the word Shri seems to be a word derived from the body or sharir in Sanskrit or it’s its abbreviated form. The word Shree seems to me to be the greatest mantra, because it is easy to utter and creates such a unique pressure on body systems, which activates the Kundalini. Probably that is why before addressing someone by name, one puts Shri with it. Also, in start of many holy occasions and activities, shree word is pronounced. Similarly, Shiva is also a word similar to shareer or body, corpse or shava too. That is why a powerless Shiva is also called a shava. In a state of preoccupation or powerlessness, even the mere remembrance of the word “sh” is sufficient to maintain the impression that’s Dharna. In a state of preoccupation or powerlessness, even the mere remembrance of the word “sh” is sufficient to maintain the impression. In the emotional state of mind, remembering it gives special benefit. There is a lot of power in the letter “S” mainly “sh” made of it. That is why the word Shanti meaning peace is formed from the letter Sh. The remembrance of the word ‘Sha’ gives peace and peace is also provided by Kundalini. With the word Sha, Kundalini starts working on the chakras below the brain, mainly the heart chakra. It also gives peace along with pleasure, and also by lightening the burden of the mind, by which the warlike vices of the mind like lust, anger, etc. also get pacified. Similarly, the word shakti is formed from the letter sh, which is synonymous with kundalini. This is the science of Sanskrit language. You must have felt an atmosphere of peace all around after the Sanskrit Mantra Swastivachan. It is sung in a collective form, in which the entire creation is wished well. Why not get the benefit of knowledge even after having it? Because we do not keep the concept (or Dharna in Sanskrit) of knowledge. I am not talking about meditating. Can’t even meditate during busy life. You can make assumptions. There is a difference between perception and attention. Meditation means thinking about it continuously. This consumes energy. Dharana means having faith or belief in it or inclination of thinking towards that. It does not consume energy. When the appropriate time is found sometime in life, the dharana immediately turns into meditation or dhyana and leads to samadhi with little yogic practice. The stronger the dharana and the longer it lasts, the stronger and quicker the meditation will be set. Patanjali has also told in his sutras to attain the level of meditation or dhyana through dharana. Exactly the same happened with me. I used to hold a belief on the Advaita philosophy called ‘Sharir Vigyan Darshan’ but could not meditate due to lack of time and energy. That perception on their availability turned into meditation and ==== you know the rest of the journey (what happens). The concept of Advaita is indirectly the concept of Kundalini, because Advaita and Kundalini try to live together. Meditation, in a direct form, means intentional meditation on Kundalini, in which Kundalini awakening is achieved.

Transformation does not make man forget the old things, but adopts them with a positive attitude

Yoga itself does not do any transformation. This happens indirectly. By taking out the waste of the mind through yoga, the mind becomes empty and refreshed. With this the mind accepts new things. Even in new things, he accepts only good things and habits, because through yoga the virtue of goodness increases, which attracts only good things. Many people would think that after transformation from yoga, a person changes so much that his old friends and acquaintances get separated from him, old memories are erased in his mind, he becomes lonely and so on. But actually that is not the case at all. He has everything in him, but he doesn’t feel the cravings or tingling for them that precedes the transformation. For them there are no vices in his mind, such as lust, anger, greed, attachment and jealousy. This means that even old enemies start seeming to him as friends. If such a transformation happens with everyone, then fights with the worldly beings will end. If this kind of transformation happens to all the countries or heads of state, then wars etc. will be limited to stories.

कुंडलिनी शक्ति ही ड्रेगन है

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में स्नान-योग अर्थात शीतजल स्नान और गंगास्नान से प्राप्त कुंडलिनी लाभ के बारे में बात कर रहा था। शीतजल स्नान अपने आप में एक संपूर्ण योग है। इसमें मूल बंध, जलंधर बंध और उड्डीयान बंध, योग के तीनों मुख्य बंध एकसाथ लगते हैं। हालांकि आजकल गंगा में प्रदूषण भी काफी बढ़ गया है, और लोगों में इतनी योगशक्ति भी नहीं रही कि वे ठंडे पानी को ज्यादा झेल सकें। मेरे एक अधेड़ उम्र के रिश्तेदार थे, जो परिवार के साथ गंगास्नान करने गए, और गंगा में अपने हरेक सगे संबंधी के नाम की एक-एक पवित्र डुबकी लम्बे समय तक लगाते रहे। घर वापिस आने पर उन्हें फेफड़ों का संक्रमण हो गया, जिससे उनकी जान ही चली गई। हो सकता है कि और भी वजहें रही हों। बिना वैज्ञानिक जाँच के तो पुख्ता तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता, पर इतना जरूर है कि जिस पानी में इतने सारे लोग एकसाथ नहा रहे हों, और जिसमें बिना जले या अधजले शव फ़ेंके जाते हों, साथ में मानव बस्तियों व उद्योगों का अपशिष्ट जल डाला जाता हो, उसमें संक्रमण फैलाने वाले कीटाणु मौजूद हो सकते हैं। पहले ऐसा नहीं था या कम होता था, और साथ में योगशक्ति आदि से लोगों की इम्युनिटी मजबूत होती थी।

मैं जागृति की जाँच के संबंध में भी बात कर रहा था। मैं इस पैराग्राफ में कुछ दार्शनिक गहराई में जा रहा हुँ। पाठकों को यह उबाऊ लग सकती है इसलिए वे चाहें तो आगे भी निकल सकते हैं। जागृति की जाँच से यह फायदा होगा कि जागृत व्यक्ति को यथासम्भव भरपूर सुखसुविधाओं का हकदार बनाया जा सकता है। जागृति के बाद भरपूर सुखसुविधाएं भी जब उसे मोहित नहीं कर पाएंगी, तभी तो वह जागृति की असली कीमत पहचानेगा न। दुनिया से संन्यास लेने से उसे जागृति के महत्त्व का कैसे पता चलेगा। उसके लिए तो महत्त्व उन्हीं दुनियावी सुखों का बना रहेगा, जिनका लालसा भरा चिंतन वह मन ही मन करता रहेगा। चीनी का महत्त्व आदमी तभी समझेगा न जब वह चीनी खाने के एकदम बाद मिष्ठान्न खाएगा और उसे उसमें मिठास नहीं लगेगी। अगर वह चीनी खाने के एकदम बाद मिष्ठान्न नहीं खाएगा, तब तो वह मिष्ठान्न का ही गुणगान गाता रहेगा, और चीनी को बेकार समझेगा। इसलिए मेरा मानना है कि जागृति के एकदम बाद आदमी के जीवन में दुनियावी सुखसुविधाओं की बाढ़ आ जानी चाहिए, ताकि वह इनकी निरर्थकता को दिल से महसूस कर सके और फिर प्रवचनादि से अन्य लोगों को भी महसूस करवा सके, केवल सुनीसुनाई बातों के सहारे न बैठा रहे। इसीलिए तो पुराने समय में राजा लोग वन में ज्ञानप्राप्ति के बाद अपने राज्य को लौट आया करते थे, और पूर्ववत सभी सुखसुविधाओं के साथ अपना आगामी जीवन सुखपूर्वक बिताते थे, वन में ही दुबके नहीं रहते थे। सम्भवतः इस सत्य को दिल से महसूस करके ही आदमी आत्मविकास के शिखर तक पहुंचता है, केवल सुनने भर से नहीं। सम्भवतः ओशो महाराज का क्रियादर्शन भी यही था। मैं भी उनकी तरह कई बार बनी-बनाई रूढ़िवादी धारणाओं से बिल्कुल उल्टा चलता हूँ, अब चाहे कोई मुझे क्रन्तिकारी कहे या सत्याग्रही। ज्यादा उपयुक्त शब्द ‘स्वतंत्र विचारक’ लगता है, क्योंकि स्वतंत्र विचार को किसी पर थोपा नहीं जाता और न ही उसके लिए भीड़ इकट्ठा की जाती है, अच्छा लगने पर लोग खुद उसे चुनते हैं। यह लोकतान्त्रिक और शान्तिपरक होता है, क्रांति के ठीक विपरीत। ओशो महाराज ने यह अंतर बहुत अच्छे से समझाया है, जिस पर उनकी एक पुस्तक भी है। बेशक जिसने पहले कभी मिष्ठान्न खाया हुआ हो, तो वह चीनी खाने के बाद मिष्ठान्न के स्वाद को याद कर के यह अंदाजा लगा सकता है कि चीनी की मिठास मिष्ठान्न से ज्यादा है, पर मिष्ठान्न की नीरसता का पूरा पता तो उसे चीनी खाने के बाद मिष्ठान्न खा कर ही चलेगा। इसी तरह जागृति के बाद आदमी यह अंदाजा लगा सकता है कि जागृति सभी भौतिक सुखों से बढ़कर है, पर भौतिक सुखों की नीरसता का प्रत्यक्ष अनुभव तो उसे जागृति के एकदम बाद सुखसुविधाओं में डूबने से होगा। जैसे अगर दुबारा चीनी का मिलना असम्भव हो, तो आदमी मिष्ठान्न खाकर चीनी की मिठास को पुनः याद कर सकता है, और कोई चारा नहीं, उसी तरह आदमी सुखसुविधाओं को भोगते हुए उनसे अपनी जागृति को पुनः याद करते हुए उससे लाभ उठा सकता है, और कोई चारा नहीं। तो ये आसमान में फूल की तरह संन्यास कहाँ से आ गया। मुझे लगता है कि संन्यास उसके लिए है, जो परवैराग्य में स्थित हो गया है, मतलब जागृति के बाद सारी सुखसुविधाओं को भरपूर भोग लेने के बाद उनकी नीरसता का प्रत्यक्ष अनुभव कर चुका है, और उनसे भी पूरी तरह विमुख हो गया है। उसको जागृति की तमन्ना भी नहीं रही है, क्योंकि सुख़सुविधाओं की तरह जागृति भी दुनियावी ही है, और दोनों एकदूसरे की याद दिलाते रहते हैं। पर यहाँ बहुत सावधानी की आवश्यकता है, क्योंकि जगत के प्रति जरा भी महत्त्वबुद्धि रहने से वह योगभ्रष्ट बन सकता है, मतलब  लौकिक और पारलौकिक दोनों लाभोँ से एकसाथ वँचित रह सकता है। इसलिए सबसे अच्छा व सुरक्षित तरीका गृहस्थ आश्रम का कर्मयोग ही है, जिसमें किसी भी हालत में खतरा नहीं है। जागृति के एकदम बाद के साधारण वैराग्य में संन्यास लेने से वह सुखभोगों की पुरानी यादों से काम चला सकता है, पर यह प्रत्यक्ष सुखभोगों की तरह कारगर नहीं हो पाता, और योगी की सुखभोगों के प्रति महत्त्वबुद्धि बनी रहती है।

सुखसुविधाएं तो दूर, कई लोग तो यहाँ तो कहते हैं कि आदमी को विशेषकर जागृत व्यक्ति को भोजन की जरूरत ही नहीं, उसके लिए तो हवापानी ही काफी है। ऐसा कैसे चलेगा। भौतिक सत्य को समझना पड़ेगा। दरअसल मोटापा अधिक भोजन से नहीं, अपितु असंतुलित भोजन से पनपता है। शरीर के मैटाबोलिज़्म को सुचारु रूप से चलाने के लिए सभी आवश्यक तत्त्व उचित मात्रा में चाहिए होते हैं। किसी की भी कमी से चयापचय गड़बड़ा जाता है, जिससे शरीर में भोजन ढंग से जल नहीं पाता, और इकट्ठा जमा होकर मोटापा पैदा करता है। शरीर ही चूल्हा है। यह जितना तेजी से जलेगा, जीवन उतना ही ज्यादा चमकेगा। बहुत से लोगों के लिए आज हिन्दू धर्म का मतलब कुछ बाहरी दिखावा ही रह गया है। उसे खान-पान के और रहन-सहन के विशेष और लगभग आभासिक जैसे अवैज्ञानिक (क्योंकि उसके पीछे का विज्ञान नहीं समझ रहे) तरीके तक सीमित समझ लिया गया है। कुछ लोगों के लिए मांस-मदिरा का प्रयोग न करने वाले हिन्दू हैं, तो कुछ के लिए संभोग से दूरी बना कर रखने वाले हिन्दू हैं। कुछ लोगों के लिए हिंदु धर्म पालयनवादी है। इसी तरह कई लोगों की यह धारणा है कि जो जितना ज्यादा अहिंसक है, गाय की तरह, वह उतना ही ज्यादा हिंदूवादी है। योग और जागृति गए तेल लेने। यहाँ तक कि अधिकांश लोग कुंडलिनी का अर्थ भी नहीं समझते। वे इसे ज्योतिष वाली कुंडली पत्री समझते हैं। हालांकि यह भी सत्य है कि पलायनवाद और शराफत से ही दुनिया बच सकती है, क्योंकि मानव की अति क्रियाशीलता के कारण यह धरती नष्ट होने की कगार पर है। इस तरह का बाहरी दिखावा हर धर्म में है, पर क्योंकि हिन्दू धर्म में यह जरूरत से ज्यादा उदारता व सहनशीलता से भरा है, इसलिए यह कमजोरी बन जाता है, जिससे दूसरे धर्मों को बेवजह हावी होने का मिलता है। अगर आप अपनी दुकान से गायब रहोगे, तो दूसरे लोग तो आएंगे ही उसमें बैठने। हालांकि यहाँ यह बात गौर करने लायक है कि मशहूर योगी गोपी कृष्ण ने अपनी किताब में लिखा है कि जागृति के बाद उन्हें इतनी ज्यादा ऊर्जा की जरूरत पड़ती थी कि कुछ मांसाहार के बिना उनका गुजारा ही नहीं चलता था। यह भी हो सकता है कि भिन्नभिन्न प्रकार के लोगों की भिन्नभिन्न प्रकार की जरूरतें हों। मैं फेसबुक पर एक मित्र की पोस्ट पढ़ रहा था, जो लिख रहा था कि अपने धर्म को दोष देने की, उसे बदनाम करने की और उसे छोटीछोटी बातों पर आसानी से छोड़ने की या धर्म बदलने की या धर्मनिरपेक्ष बनने की आदत हिन्दुओं की ही है, दूसरे धर्म के लोगों की नहीं। दूसरे धर्म के लोग किसी भी हालत में अपने धर्म को दोष नहीं देते, अपितु उसके प्रति गलत समझ और गलत व्यवस्था को दोष देते हैं। इसीलिए बहुत से लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि हिंदु धर्म को दूसरे धर्म के लोगों से ज्यादा अपने धर्म के लोगों से खतरा है। वैसे इस वैबसाईट का लक्ष्य धर्म की विवेचना करना नहीं है, यह तो प्रसंगवश बात चल पड़ी थी। यह तो मानना ही पड़ेगा का हिंदु धर्म की उदारता और सहनशीलता के महान गुण के कारण ही आज सबसे ज्यादा वैज्ञानिक शोध इसी धर्म पर हो रहे हैं। कई बार दिल की बात को बोलना-लिखना मुश्किल हो जाता है, जिससे गलतफहमियां पैदा हो सकती हैं। किसी के गुणों को उस पर स्थायी रूप से चिपकाने से भी गलतफहमी पैदा होती है। होता क्या है कि गुण बदलते रहते हैं। यह हो सकता है कि किसी में कोई विशेष गुण ज्यादा दिखता हो या और गुणों की अपेक्षा ज्यादा बार आता-जाता हो। ऐसा ही मैंने हिंदु धर्म के कुछ उपरोक्त गुणों के बारे में कहा है कि वे ज्यादा नजर आते हैँ कई बार, हमेशा नहीं। काल गणना भी जरूरी है, वस्तुस्थिति को स्पष्ट करने के लिए। ऐसा भी हो सकता है कि विशेष गुणों को धर्म के कुछ लोग ही अपनाएं, अन्य नहीं। इसलिए धर्म के साथ उसके घटक दलों पर नजर रखना भी जरूरी है। इसी तरह क्षेत्र विशेष पर भी निर्भर करता है। कहीं पर किसी धर्म के साथ कोई एक विशेष गुण ज्यादा प्रभावी हो सकता है, तो किसी अन्य जगह पर पर कोई अन्य विशेष गुण। सभी धर्मों में सभी गुण मौजूद हैं, कभी कोई ज्यादा दिखता है, तो कभी कोई दूसरा। पर जो गुण औसत से ज्यादा नजर दिखता है, वह उस धर्म के साथ स्थायी तौर पर चिपका दिया जाता है, और उस गुण के साथ उस धर्म की पहचान जोड़ दी जाती है, जिससे धार्मिक वैमनस्य पैदा होता है। इसीलिए कहते हैं कि बुराई से लड़ो, धर्म से नहीं; बुराई से लड़ो, बुरे से नहीं। कंडीशन्स लागू हो सकती हैं। अगर कोई मुझे मेरे अपने जायज हक के लिए तनिक गुस्से में देख ले, और मेरे प्रति स्थायी धारणा फैला दे कि मैं गुस्सैल किस्म का आदमी हूँ, तो मुझे तो बुरा लगेगा ही। आजकल के दौर में मुझे सभी धर्म असंतुलित नजर आते हैं, मतलब औसत रूप में। किसी धर्म में जरूरत से ज्यादा सतोगुण, तो किसी में रजोगुण, और किसी में तमोगुण है। कोई वामपंथियों की तरह उत्तर की तरफ जा रहा है, तो कोई दक्षिणपांथियों की तरह दक्षिण की तरफ, बीच में कोई नहीं। यह मैं औसत नजरिये को बता रहा हुँ, या जैसे विभिन्न धर्मगुरु दुनिया के सामने अपने धर्म को अभिव्यक्त करते हैं, असल में तो सभी धर्मों के अंदर बढ़चढ़ कर महान लोग हैं। अगर सभी धर्म मित्रतापूर्वक मिलजुल कर रहने लगें, तो यह औसत असंतुलन भी खत्म हो जाएगा, और पूरी दुनिया में पूर्ण संतुलन क़ायम हो जाएगा। संतुलन ही योग है।

उदाहरण के लिए चायना के ड्रेगन को ही लें। कहते हैँ कि ड्रेगन को मानने वाला चीनी होता है। पर हम सभी ड्रेगन को मानते हैं। यह किसी विशेष देश विशेष से नहीं जुड़ा है। ठंडे जल से स्नान के समय जब सिर को चढ़ी हुई कुंडलिनी आगे से नीचे उतारी जाती है, तो तेजी से गर्म साँसें चलती है, विशेष रूप से झटके के साथ बाहर की तरफ, जैसे कि ड्रेगन आग उगल रही हो। प्रेम प्रसंगों में भी ‘गर्म सांसें’ शब्द काफी मशहूर हैं।ड्रेगन या शेर की तरह मुंह चौड़ा खुल जाता है, सारे दाँत बाहर को दिखाई देते हैँ, नाक व कपोल ऊपर की तरह खिंचता है, जिससे आँखें थोड़ा भिंच सी जाती हैं, शरीर का आकार भी ड्रेगन की तरह हो जाता है, पेट अंदर को भिंचा हुआ, और सांसों से फैलती और सिकुड़ती छाती। शरीर का हिलना डुलना भी ड्रेगन की तरह लगता है। ड्रैगन को उड़ने वाला इसलिए दिखाया जाता है क्योंकि क्योंकि कुंडलिनी भी पलभर में ही ब्रह्माण्ड के किसी भी कोने में पहुंच जाती है। शरीर ब्रह्माण्ड तो ही है, मिनी ब्रह्माण्ड। ड्रेगन के द्वारा आदमी को मारने का मतलब है कुंडलिनी शक्ति द्वारा आदमी के अहंकार को नष्ट कर के उसे अपने नियंत्रण में लेना है। फिल्मों में, विशेषकर एनीमेशन फिल्मों में जो दिखाया जाता है कि आदमी ने कैसे ड्रेगन को जीतकर और उसको वश में करके उससे बहुत से काम लिए, उस पर बैठकर हवाई यात्राएं कीं, और अपने दुश्मनों से बदला लिया आदि, यह कुंडलिनी को वश में करने और उससे विभिन्न लौकिक सिद्धियों को हासिल करने को ही दर्शाता है। कहीं खूंखार जानवरों की शक्ति के पीछे कुंडलिनी शक्ति ही तो नहीं, यह मनोवैज्ञानिक शोध का विषय है। सम्भवतः गुस्से के समय जो चेहरा विकृत और डरावना हो जाता है, उसके पीछे भी यही वजह हो। दरअसल मांसपेशियों के संकुचन से उत्पन्न गर्मी ही गर्म सांसों के रूप में बाहर निकलती है। अब आप कहोगे कि मस्तिष्क से कुंडलिनी को नीचे कैसे उतारना है। इसमें कोई रॉकेट साईंस नहीं है। मस्तिष्क को बच्चे या गूंगे बहरे की तरह ढीला छोड़ दें, बस कुंडलिनी एक झटके वाली गहरी बाहर की ओर सांस और पेट की अंदर की ओर सिकुड़न के साथ नीचे आ जाएगी। हालांकि जल्दी ऊपर चढ़ जाती है फिर से। कुंडलिनी को लगातार नीचे रखने के लिए अभ्यास करना पड़ता है।

आदमी के चेहरे के आकलन से उसके व्यक्तित्व का आकलन हो जाता है

आदमी के चेहरे के आकलन से उसके व्यक्तित्व का आकलन हो जाता है। सीधी सी कॉमन सेंस की बात है। किसी का शारीरिक मुकाबला करने के लिए बाजुओं और टांगों को शक्ति की जरूरत होती है। शरीर की कुल शक्ति सीमित और निर्धारित है। उसे एकदम से नहीं बढ़ाया जा सकता। इसलिए यही तरीका बचता है कि शरीर के दूसरे भाग की शक्ति इन्हें दी जाए। आप किसी भी अंग की क्रियाशीलता को ज्यादा कम नहीं कर सकते, क्योंकि सभी अंग एकदूसरे से जुड़े हैं। शक्ति की नोटिसेबल या निर्णायक कमी आप मस्तिष्क में ही कर सकते हैं, क्योंकि इसमें फालतू विचारों और भावनाओं के रूप बहुत सी अतिरिक्त शक्ति जमा हुई रहती है। इसीलिए गुस्से और लड़ाई के समय चेहरे विकृत हो जाते हैं, क्योंकि उससे ऊर्जा नीचे उतर रही होती है। लड़ाई शुरु करने से पहले भी आदमी इसीलिए गालीगलौज या फालतू बहस करते हैं, ताकि उससे विचार और भावनाएं और दिमाग़ की सोचने की शक्ति बाधित हो जाए और चेहरा विकृत होने से वह शक्ति नीचे आकर बाजुओं आदि यौद्धा अंगों को मिले। तभी तो देखा जाता है कि हल्की सी मुस्कान भी गंभीर झगड़ों से चमत्कारिक रूप में बचा लेती है। मुस्कुराहट से शक्ति पुनः मस्तिष्क की तरफ लौटने लगती है, जिससे सोचने-विचारने की शक्ति बढ़ने से और यौद्धा अंगों को शक्ति की कमी होने से लड़ाई टल जाती है। इसीलिए मुस्कुराती और शांत शख्ससियत से हर कोई मित्रता करना चाहता है, चाहे कोई झूठमूठ में ही मुस्कुराता रहे, और जलेभुने व टेंस आदमी से हरकोई दूर भागता है।

kundalini shakti is dragon

Friends, in the previous post I was talking about bathing yoga means the Kundalini benefits of cold water bath and Ganga bath. Cold water bath is a complete yoga in itself. In this, Moola Bandha, Jalandhara Bandha and Uddiyana Bandha, the three main bandhas of yoga, are engaged together. However, nowadays the pollution in the Ganges has also increased a lot, and people did not have enough yogic power to withstand the cold water much. I had a middle-aged relative who went with his family to take a bath in the Ganges, and took a long holy dip in the Ganges with the names of each of his relatives. On his return home, he developed a lung infection, which cost him his life. There may have been other reasons too. Nothing can be said for sure without scientific investigation, but it is necessary to say that the water in which so many people are bathing together, and in which unburned or half-burnt dead bodies are thrown, along with the waste water of human settlements and industries, if ingested, it may contain germs that cause infection. Earlier it was not like this or it used to be less, and along with yoga power etc., the immunity of the people was strengthened.

I was also talking about the test of awakening. I’m going to go into some philosophical depth in this paragraph. If readers find it boring they can go ahead if they want. The test of awakening will have the advantage that the awakened person can be made entitled to as many amenities as possible. After awakening, even when the rich facilities will not be able to fascinate him, then only he will recognize the real value of awakening. How will he come to know the importance of awakening by retiring from the world? For him, the importance of those worldly pleasures will remain, whose longing and contemplation he will keep in his mind. A man will understand the importance of sugar only if he eats sweets immediately after eating sugar and he will not feel sweetness in it. If he does not eat sweets immediately after eating sugar, then he will continue to sing praises of sweets, and will consider sugar to be useless. That’s why I believe that immediately after awakening, there should be a flood of worldly comforts in the life of a man, so that he can feel their futility from the heart and then can make other people feel through discourses etc. That is why in the old times, the kings used to return to their kingdom after attaining enlightenment in the forest, and used to spend their future life happily with all the amenities as before, they did not stay hidden in the forest. Perhaps by realizing this truth from the heart, man reaches the pinnacle of self-development, not just by listening. Probably this was also the philosophy of Osho Maharaj. I too, like him, at times run completely contrary to the orthodox beliefs made up, now whether someone calls me a revolutionary or a Satyagrahi. The more appropriate term seems to be ‘free thinker’, because free thought is not imposed on anyone nor is crowd gathered for it, people choose themselves when they like it. It is democratic and peaceful, just the opposite of revolution. Osho Maharaj has explained this difference very well, on which he also has a book. Of course, one who has ever eaten confectionery before, then after eating sugar, by remembering the taste of confectionery, he can guess that the sweetness of sugar is more than confectionery, but the full knowledge of the dullness of confectionery will be known by eating it after eating sugar. Similarly, after awakening, a person can imagine that awakening is greater than all material pleasures, but the direct experience of the dullness of material pleasures will be by drowning himself in the comforts immediately after awakening. Just as if there it is impossible to get sugar again, then a person can eat sweets and remember sugar’s sweetness, and there is no other option, similarly a man can take help of worldly enjoyments to remember his awakening, and there is no other option. So where did this sannyas come from like a flower in the sky? I think sannyas is for one who has become settled in paravairagya means super detachment, that is, after awakening, having enjoyed all the comforts to the fullest, has experienced their dullness, and has become completely detached from them. He has not even the desire for awakening remaining, because like the comforts, awakening is also worldly, and both keep reminding each other. But a lot of caution is needed here, because having even a little sense of importance towards the world can make him a spiritually corrupt person, meaning he can simultaneously be deprived of both worldly and transcendental benefits. Therefore, the best and safest method is Karma Yoga of the householder’s ashram, in which there is no danger in any condition. By taking sannyas in simple dispassion immediately after awakening, he can operate from the old memories of pleasures, but it does not work like direct pleasures, and the yogi’s intellect for pleasures remains.

Far from the comforts, it is said here by many that the man, especially the awakened person, does not need food, only thin air is enough for him. How will this go? The physical truth has to be understood. Actually obesity is not caused by overeating, but by unbalanced diet. All the essential elements are needed in proper quantity for the proper functioning of the body’s metabolism. Due to any deficiency, the metabolism gets disturbed, due to which the food in the body is not able to burn properly, and accumulates and produces obesity. The body is the hearth. The faster it burns, the brighter the life. For many people, Hinduism today means some outward show. It has been understood to be limited to a special and almost virtually unscientific (because the science behind it is not understood) way of eating and living. For some people only those are Hindus who do not use meat and liquor, while for some only those are Hindus who keep distance from sexual intercourse. For some, Hinduism relates to escapism. Similarly, many people have a belief that the more a man non-violent, like a cow, the more Hindutva he has. Yoga and awakening are unnoticed as if going away to take oil. Even most people do not understand the meaning of Kundalini. They consider it as the Kundali means horoscope letter of astrology. Although it is also true that only escapism and decency can save the world, because due to the hyperactivity of humans, this earth is on the verge of destruction. This kind of outward show is in every religion, but because in Hinduism it is over generous and tolerant, so it becomes a weakness, giving other religions unnecessary dominance. If you remain missing from your shop, others will come and sit in it. However, it is worth noting here that the famous yogi Gopi Krishna has written in his book that after awakening, he needed so much energy that he could not survive without some non-vegetarian food. It may also be that different types of people have different types of needs. I was reading a friend’s post on Facebook, who was writing that the habit of blaming one’s own religion, defaming it and leaving it easily or being converted or becoming secular on petty things is the habit of Hindus only and not people of other religions. People of other religions do not blame their own religion at any cost but blame its misunderstanding and mismanagement. That is why many people even say that Hinduism is more threatened by the people of their own religion than the people of other religions. By the way, the goal of this website is not to discuss religion, it was a matter of incident. It has to be accepted that due to the great virtue of the generosity and tolerance of Hinduism, today most scientific research is being done on this religion. Sometimes it becomes difficult to speak or write Dil Ki Baat, which can lead to misunderstandings. Sticking one’s qualities to it permanently also creates misunderstandings. What happens is that the properties keep changing. It may be that a particular quality is more visible in someone or it comes and goes more often than other qualities. The same I have said about some of the above mentioned qualities of Hinduism that they are more visible sometimes, not always. Time calculation is also necessary, to clarify the situation. It may also happen that certain qualities are adopted by only some people of religion and not by others. Therefore, along with religion, it is also necessary to keep an eye on its constituents. Somewhere one particular quality may be more dominant with a religion, while another particular quality in another place. All the virtues are present in all religions, sometimes some are more visible, sometimes others. But the quality which is more visible than the average, is permanently attached to that religion, and with that quality the identity of that religion is attached, which creates religious animosity. That is why it is said that fight evil, not religion; Fight evil, not evil doer. The conditions may apply. If someone looks at me when I’m little bit angry for my jenuine rights, and spreads a permanent impression about me that I am an angry person, then I will feel bad. In today’s world, all religions seem to me to be unbalanced, that is, in an average way. Some religions have more Satoguna, some have Rajoguna, and some have Tamoguna. Some are going north like leftist, some going south like right wing activist, none in the middle. I am telling this from the average point of view, or as different religious leaders express their religion to the world, in fact there are great people in all religions. If all the religions start living together friendly, then this average imbalance will also end, and perfect balance will be established in the whole world. Yoga is balance.

Take for example the dragons of China. It is said that the believer of dragons is a Chinese. But we all adore dragons. It is not associated with any particular country. While bathing in cold water, when the head-mounted kundalini is lowered from the front, there is a rapid warm breath, especially with a jolt outward, as if a dragon is spewing fire. Warm breathing is a common term in love affairs. Mouth opens wide like a dragon or lion, all teeth are visible on the outside, nose and cheeks are pulled upwards, causing eyes to become slightly clenched, body shape also becomes like dragon’s, stomach inwardly Constricted, and the chest expanding and contracting with breath. The movement of the body also feels like a dragon. The dragon is shown to be flying because the Kundalini also reaches any corner of the universe in a moment. The body is the universe itself, the mini-universe. To kill man by dragon means to destroy man’s ego by Kundalini Shakti and take it under its control. What is shown in films, especially in animation films, is how man conquered and tamed dragons, took many tasks from it, sat on it, traveled by air, and took revenge on his enemies, etc., it only shows to achieve various worldly accomplishments with kundalini. Whether there is Kundalini Shakti behind the power of the dreaded animals, it is a matter of psychological research. Perhaps this is the psychological reason behind the face which becomes distorted and scary during anger. Actually the heat generated by the contraction of muscles comes out in the form of hot breath. Now you will say how to bring down the Kundalini from the brain. There is no rocket science in this. Let the brain loose like a child or a dumb deaf, just the Kundalini will come down with a jerky deep out breath and an inward contraction of the abdomen. Although quickly climbs up again. It takes practice to keep the Kundalini down continuously.

The assessment of a man’s face determines his personality

The assessment of a man’s face determines his personality. It’s just a matter of common sense. Arms and legs need strength to compete physically. The total power of the body is limited and determined. It cannot be increased immediately. That’s why the only way left is to give them the power of another part of the body. You cannot reduce the activity of any part too much, because all the organs are connected to each other. You can make a noticeable or decisive lack of power in the brain itself, because it has accumulated a lot of excess energy in the form of extravagant thoughts and feelings. That’s why faces get distorted during anger and fighting, because energy is coming down from it. Even before starting a fight, men do abusive or frivolous debate, so that thoughts and feelings and the thinking power of the mind are obstructed and due to the distorted face, that power comes down to the arms etc. That is why it is seen that even the slightest smile saves miraculously from serious quarrels. Due to this, the power starts returning to the brain, due to which the power of thinking increases and the battle is averted due to lack of power to the warrior organs. That’s why everyone wants to be friends with a smiling and calm person, even if someone smiles in a lie, and everyone runs away from the jealous and tense person.

काम तो है आ~राम को, योगा के विश्राम को

चूल्हा कैसे जलेगा
जीवन कैसे चलेगा।
आज का दिन तो चल पड़ा पर
कल कैसे दिन ढलेगा।
चूल्हा कैसे जलेगा।

बचपन बीता खेलकूद में
सोया भरी जवानी में।
सोचा उमर कटेगी यूँ ही
अपनी ही मनमानी में।
नहीं विचारा पल भर को भी
वक़्त भी ऐसे छलेगा।
चूल्हा कैसे ----

सोचा था कुछ काम करेंगे
खून पसीना एक करेंगे।
पढ़ लिख न पाए तो भी तो
भूखे थोड़ा ही मरेंगे।
सोचा नहीं हमारे हक से
पेट मशीन का पलेगा।
चूल्हा कैसे ----

नायाबी न थमी है, पर
काम की फिर भी कमी है।
काम वहाँ पर नहीं है मिलता
जहाँ गृहस्थी जमी है।
गृहसुख त्याग के इस मानुष का
पैसा कैसे फलेगा।
चूल्हा कैसे-----

काश कि ऐसा दिन होता सब
को पैसा मुमकिन होता।
उसके ऊपर वो पाता जो
जितना भी दाना बोता।
झगड़े मिटते इससे क्यों नर
इक-दूजे संग खलेगा।
चूल्हा कैसे ----

काम तो है आ~राम को
योगा के विश्राम को।~2
इसके पीछे उमर कट गई
आखिर कब ये फलेगा।
चूल्हा कैसे ---

कुंडलिनी योग में सहायक शीतजल स्नान~कुंडलिनी जागरण के स्वघोषित दावे की पुष्टि के लिए जाँच में अहम

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कि कैसे सम्भोग योग पूरी तरह से शिवपुराण में उल्लिखित कार्तिकेय जन्म की प्रसिद्ध कथा पर आधारित है। कबूतर बने अग्निदेव ने कैसे शिवतेज को सप्तऋषि-पत्नियों के रूप में निरूपित चक्रोँ को देकर अपनी जलन को कम किया। वे ऋषिपत्नियां कड़ाके की ठंड के महीने में सुबह के ब्रह्म मुहूर्त में ठंडे पानी से नहाती थीं। दरअसल वे ठंड से काम्पती हुई ऋषिपत्नियां अग्निदेव के पास तपिश लेने गईं। अग्नि की चिंगारी के साथ शिवतेज उनके अंदर प्रविष्ट हो गया। होता क्या है कि ठंडे पानी से नहाते समय चक्रोँ की मांसपेशियों में ठंड से सिकुड़न पैदा हो जाती है जिससे पेट में ऊपर की तरफ खिंचाव लगता है। इससे स्वाधिष्ठान चक्र के निकट यौनाँग पर स्थित वीर्यतेज ऊपर की तरफ चढ़कर सभी सातों चक्रोँ में फैल जाता है। इससे प्रॉस्टेट का दबाव भी कम हो जाता है, या यूँ भी कह सकते हैं कि ऊर्जा की कमी से पेशाब को रोक कर रखने वाली मांसपेशियां ढीली पड़ जाती हैं, इसीलिए ठंडे पानी से नहाते समय बारबार और खुलकर पेशाब आता है। डर के समय भी लगभग यही प्रक्रिया होती है, इसीसे यह कहावत बनी है कि वह इतना डर गया कि उसकी पेंट गीली हो गई। दरअसल डर से मस्तिष्क में अंधेरा या शून्य सा छा जाता है, जो ऊर्जा को नीचे से ऊपर की ओर चूसता है। उस तेज की शक्ति से चक्रोँ पर मांसपेशियों की सिकुड़न और ज्यादा बढ़ने से उन पर गर्मी पैदा हो जाती है। यही ऋषिपत्नियों के द्वारा आग की तपिश लेना और उसके माध्यम से शिवतेज को प्राप्त करना है। इससे चक्रोँ पर रक्तसंचार बढ़ जाता है, जिससे वहाँ कुंडलिनी चित्र चमकने लगता है, क्योंकि जहाँ पर रक्त या वीर्य या प्राण है, वहीं पर कुंडलिनी है। दरअसल रक्त की अपेक्षा वीर्य तेज कुंडलिनी को बहुत अधिक शक्ति देता है। इसीलिए कहते हैं कि रक्त की हजारों बूंदों से वीर्य की एक बूंद बनती है। चक्र की सिकुड़न के साथ यदि स्वाधिष्ठान व मूलाधार चक्र की वीर्य जलन का ध्यान न किया जाए, तो उस चक्र पर कुंडलिनी चित्र नहीं बनता, सिर्फ सिकुड़न ही रहती है। इसीलिए कहते हैं कि कुंडलिनी मूलाधार में निवास करती है। इसी कुंडलिनी चित्र को ऋषिपत्नियों का गर्भस्थित बालक कहा गया है, क्योंकि जैसे वीर्य से गर्भ बनता है, उसी तरह कुंडलिनी चित्र भी बनता है। इसीलिए भगवान शिव देवी पार्वती द्वारा शापित कबूतर बने अग्निदेव को आश्वासन देते हुए कहते हैं कि वह उनके वीर्य तेज को सप्तऋषि पत्नियों को दे, जिससे उसकी जलन शांत हो जाएगी। आश्चर्य होता है शिवपुराण की इस नायाब और वैज्ञानिक तरीके से कही गई कथा पर। जैसे सम्भोग योग से वीर्यतेज ऊपर चढ़ता है, वैसे ही ठंडे जल से स्नान से भी। इसीलिए सम्भोग योग और शीतजल स्नान दोनों क्रियाओं को एक जैसा दिखाया गया है। यानी सामाजिक रूप से शर्मनाक कारणों से ठंडे पानी के स्नान के रूप में यौन योग से ओतप्रोत कहानी को अच्छी तरह से बताया गया है। यह एक अच्छा विकल्प है। यह एक बुद्धिमान युक्ति है। हो सकता है कि जो भगवान शिव को बर्फीली पर्वत चोटियों में निवास करते हुए दिखाया गया हो और शिवलिंगम को लगातार बूँदबूँद गिर रहे पानी से नहाया जाता हो, और बरसात के मौसम के वर्तमान के जुलाई-अगस्त अर्थात श्रावण के महीने को भी इसी कारण से शिव-विशिष्ट महीना माना गया हो। स्वर्ग से नीचे गिरती हुई गंगा नदी शिव को स्नान कराते हुए ही धरा के ऊपर प्रविष्ट होती है। मैं यहाँ कुछ दार्शनिक जुगाली भी करना चाहूंगा। सम्भोग का प्राथमिक उद्देश्य कुंडलिनी जागरण लगता है, संतानोत्पत्ति तो द्वितीयक या सहचर उद्देश्य है सम्भवतः। संतान इस इनाम के तौर पर है कि फलां आदमी ने कुंडलिनी जागरण प्राप्त करके अपना जीवन सफल कर लिया है, अब वह अपने जैसी संतान को पैदा करके उसका जीवन सफल करने में भी मदद करे। इसका प्रमाण है, गृहस्थ आश्रम से पहले ब्रह्मचर्य आश्रम का होना। इसमें आदमी द्विज मतलब जागृत बन जाता था। ब्रह्मचर्य का मतलब ही वीर्य शक्ति को बर्बाद न करके ऊपर चढ़ाना है। यह अलग बात है कि यदि इस आश्रम अवस्था में कोई कमजोर आदमी कुंडलिनी जागरण को प्राप्त न कर पाए, तो गृहस्थ आश्रम में भी कुछ वर्षों तक सम्भोग योग की मदद ले सकता है। यह ऐसे ही है जैसे कोई कमजोर बच्चा अगली कक्षा में जाने के बाद भी पिछली कक्षा की कमी को पूरा करने के लिए अतिरिक्त समर्पित कोचिंग या प्रशिक्षण लेता है। इसे सुपर ब्रह्मचर्य या आपातकालीन ब्रह्मचर्य या एकस्ट्राआर्डिनरी ब्रह्मचर्य कह सकते हैं। जब से संतानोत्पत्ति सम्भोग का प्राथमिक उद्देश्य बना, तब से ही लोग कुंडलिनी जागरण को भी भूलने लगे और विश्व की जनसंख्या भी बेतरतीब बढ़ने लगी। मैं फेसबुक में पढ़ रहा था कि फलां आदमी ने तीस हजार लोगों को उनके पिछले जन्मों की याद दिला दी, और फलां आदमी ने दस हजार लोगों को। क्या किसी ने किसी को कुंडलिनी जागरण भी करवाया, इसकी कोई चर्चा नहीं। मुख्य काम पीछे, गौण काम आगे। इधर ये वर्तमान जीवन ही भुलाए नहीं भूलता, और उधर कुछ लोग गत जन्मों के जीवनों को भी याद कराने में लगे हैं। अजीब और हास्यास्पद विडंबना लगती है यह। मुझे तो यह भी लगता है कि आगे वाले चैनल को अर्धनारीश्वर के बाएं अर्थात स्त्री भाग और मेरुदण्ड वाले चैनल को दाएं अर्थात पुरुष भाग के रूप में दिखाया गया है। यब-युम आसन भी तो ऐसा ही होता है। सम्भवतः यब-युम आसन के प्रति लज्जा संकोच के कारण ही ऐसा दिखाया गया हो। वैसे भी फोटो वगैरह टू डिमेंशनल बैकग्राउंड पर थ्री डिमेंशनल यब-युम को दिखा भी नहीं सकते। पर मूर्ति में तो दिखा सकते थे। इसलिए लज्जा संकोच ही मुख्य वजह लगती है। ये दोनों चैनल जुड़कर एक होने की कोशिश करते हैं। इससे मूलाधार की शक्तिशाली कुंडलिनी ऊर्जा एक तरंग के रूप में ऊपर चढ़ती हुई और सभी चक्रोँ को भेदती हुई सहस्रार में प्रविष्ट हो जाती है, और मुड़कर वापिस नीचे नहीं आती, क्योंकि आगे वाला कुंडलिनी चैनल पीछे वाले चैनल में मर्ज हो जाता है। मतलब दोनों चैनलों के जुड़ने से सुषुम्ना नाम का एक केंद्रीय चैनल खुल जाता है। सम्भवतः रीढ़ की हड्डी से थोड़ा आगे स्थित बायाँ अर्थात इड़ा चैनल है, और रीढ़ की हड्डी के थोड़ा पीछे मतलब पीठ की चमड़ी को छूता हुआ चैनल दायां अर्थात पिंगला है। रीढ़ की हड्डी के केंद्र में स्थित स्पाइनल कॉर्ड सुषुम्ना चैनल है। सम्भवतः यही यिन-यांग अर्थात स्त्री-पुरुष आकर्षण का मूलभूत वैज्ञानिक सिद्धांत है। वैसे बहूक्त बायाँ और दायां चैनल भी यथावत अस्तित्व में है। मैं तो बाएं चैनल को मेरुदण्ड के आगे खिसकाकर और दाएं चैनल को मेरुदण्ड के पीछे को खिसकाकर उन्हें अतिरिक्त आयाम प्रदान कर रहा हूँ।

सबको पता है कि जैसे ही चक्र सिकुड़न के माध्यम से गर्मी प्राप्त करते हैं, वैसे ही उनको वीर्यतेज भी प्राप्त हो जाता है। ऋषिपत्नियों ने वह तेज हिमालय को मतलब रीढ़ की हड्डी को दिया। ज़ब शरीर पर ठंडा पानी गिरता है तो योग-श्वासों के साथ उड्डीयान बंध खुद ही लगता है। इसमें पेट अंदर और ऊपर की तरफ भिंचता है। इससे चक्रोँ की जलन मेरुदण्ड को चली जाती है। मेरुदण्ड उस तेज को गंगा नदी मतलब सुशुम्ना नाड़ी को दे देता है। सुषुम्ना उसे किनारों पर उगे सरकंडों मतलब सहस्रार चक्र को देती है, जहाँ कार्तिकेय का जन्म मतलब कुंडलिनी जागरण या कुंडलिनी क्रियाशीलन होता है। यदि सुषुम्ना नाड़ी पूरी खुल जाए तो कुंडलिनी जागरण अन्यथा कुंडलिनी क्रियाशीलन होता है। मतलब कुंडलिनी चित्र मस्तिष्क में सजीव या वास्तविक भौतिक चित्र के जैसा बन जाता है। यही ठंडे पानी से स्नान का महत्त्व है, जिसका वर्णन हर धर्म में है। ईसाई धर्म के बैपटिस्म में भी सम्भवतः ठंडे पानी से सम्भव इसी शारीरिक क्रिया से मस्तिष्क में कुंडलिनी चित्र जीवंत हो जाता है, जिसे इनीशिएशन कहते हैं, जिससे आदमी आध्यात्मिक मुक्ति के पथ पर आरूढ़ हो जाता है। इसीलिए बैपटिस्म चमत्कारी असर दिखाता है अक्सर। गंगा नदी में स्नान के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ इसीलिए लगी रहती है। गंगा नदी का पानी बर्फीला ठंडा होता है जिसमें नहाने से कुंडलिनी शक्ति आनंद पैदा करते हुए दौड़ती है। हिन्दुओं में एक ऋषि पंचमी का व्रत होता है, जिसमें महिला को ठंडे पानी के झरने या तलाब में लगातार लम्बे समय तक नहाना पड़ता है, और पवित्र दाँतुन भी करते रहना पड़ता है। सम्भवतः दाँतुन करने से मस्तिष्क की अतिरिक्त ऊर्जा आगे के चैनल से नीचे उतरती रहती है, जिससे कुंडलिनी को घूमने में आसानी होती है, जिससे ठंड भी नहीं लगती। दरअसल मांसपेशियों की सिकुड़न और नाड़ी का चालन शरीर में गर्मी पैदा करके ठंड से बचाने की शरीर की कुदरती चेष्ठा है, कुंडलिनी लाभ तो सहलाभ अर्थात सेकण्डरी है। तिब्बती बुद्धिस्ट बर्फ की शिलाओं को अपने ऊपर रख कर पिघलाते हैं। इस मुकाबले में जो जितनी ज्यादा शिलाएं पिघलाता है, वह उतना ही बड़ा योगी माना जाता है। सबसे ज्यादा बर्फ की शिलाएं पिघलाने वाला विजयी घोषित किया जाता है। यह ध्यान शक्ति को मापने का अच्छा तरीका है। चक्रोँ पर कुंडलिनी ध्यान से वहाँ पर मांसपेशी की सिकुड़न से गर्मी पैदा होती है, जो बर्फ को पिघलाती है। मैं पिछली पोस्ट में सोच रहा था कि काश किसी के कुंडलिनी जागरण के स्वघोषित दावे को जाँचने का तरीका होता। चाह के कुछ न कुछ मिल ही जाता है। बर्फ की शिलाओं को शरीर पर पिघलाने वाला वही यह तरीका है। यह साधारण, अप्रत्यक्ष, कारगर और व्यावहारिक तरीका है। इसमें खून का सैंपल लेकर उसमें संभावित कुंडलिनी मार्कर को खोजने की जरूरत नहीं है। बेशक कुंडलिनी जागरण का इससे प्रत्यक्ष तौर पर पता न चलता हो, पर कुंडलिनी ध्यान की शक्ति को मापकर अप्रत्यक्ष तौर पर तो पता चल ही जाता है, क्योंकि कुंडलिनी जागरण से कुंडलिनी ध्यान शक्ति में एकदम से इजाफा होता है। यह अलग बात है कि कुंडलिनी योग के लम्बे ध्यान से कुंडलिनी ध्यान शक्ति में बिना जागरण के ही इजाफा हो जाता है। मुख्य चीज यही कुंडलिनी ध्यान शक्ति है, कुंडलिनी जागरण नहीं, ऐसा लगता है मुझे। हालांकि कुंडलिनी जागरण का अपना अलग ही शैक्षणिक और आधिकारिक महत्त्व है। इस जाँच तकनीक से कुंडलिनी जागरण का अंदाजा ही लगाया जा सकता है, उसकी पुष्टि नहीं की जा सकती। इस तकनीक में एक कमी और लगती है। यदि किसी योगी में पर्याप्त कुंडलिनी ध्यान शक्ति है, पर वह कमजोर है, तो सम्भवतः वह ज्यादा देर तक चक्रोँ की सिकुड़न नहीं बनाए रख पाएगा, ऊर्जा की कमी से। यह मेरा अपना अनुमान है, हो सकता है कि ऐसा न हो। पर आम लोगों को बिना अभ्यास के ऐसा नहीं करना चाहिए। ठंड भी लग सकती है। पहाड़ों की तरह ठंडे स्थानों में रहने वाले लोग कुंडलिनी शक्ति के कारण ही ज्यादा चुस्त होते हैं, ऐसा लगता है।

नई चीज को पुरानी चीज से जोड़ने से उसके प्रति लोगों की सकारात्मक सोच कुप्रभावित हो सकती है

मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि जहाँ तक मुझे लगता है, ओशो महाराज ने सम्भोग योग से संबंधित अपने दर्शन को पुरानी मान्यताओं से ज्यादा नहीं जोड़ा। इससे उनकी दार्शनिक चतुराई और निपुणता भी झलकती है। होता क्या है कि हर कोई पुरानी चीज से उबा हुआ जैसा होता है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है। आप एकबार स्टेच्यु ऑफ़ यूनिटी घूम आओ, तो दुबारा वहाँ जाने से अच्छा किसी नई जगह को जाना लगता है। इसी तरह, लोगों का अक्सर पुरानी चीजों के प्रति लगाव नई और आधुनिक चीजों से कम होता है। हालांकि कुछ लोगों के साथ उल्टा भी होता है। वे बनी बनाई पुरानी मान्यताओं पर ज्यादा विश्वास करते हैं। उन्हें उनके रहस्योद्घाटन से विशेष लाभ मिल सकता है। कईयों का किसी विशेष धर्म या जीवनपद्धति से पहले ही विशेष पूर्वाग्रह या दुराग्रह बना होता है। अगर वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार खोजी गई तकनीक या दर्शन के लिए बारबार पुरानी या किसी विशेष पद्धति का हवाला दिया जाता रहेगा, तो उसकी नवीनता और रोचकता क्षीण होने लगेगी। इसलिए लगता है कि यह अच्छा रहेगा यदि ऐसा हवाला कम से कम और केवल संदर्भ मात्र के लिए दिया जाए। इससे नवीनता का लाभ भी मिलेगा, और नई पद्धति की प्रामाणिकता पर भी संदेह नहीं होगा। हाँ, पुरानी पद्धतियों का वैज्ञानिक व अनुभव आधारित रहस्योद्घाटन निःसंकोचतापूर्वक किया जा सकता है। सम्भवतः इसीलिए महान चाइनीज दार्शनिक कन्फुसियस कहते थे कि नई परम्पराएं पुरानी परम्पराओं से जुड़ी होनी चाहिए।

Kundalini Yoga helped with Cold water bath~important in the investigation to confirm the self-declared claim of Kundalini awakening

Friends, I was telling in the previous post that how Sambhog Yoga is completely based on the famous story of Kartikeya birth mentioned in Shivpuran. How Agnidev, who became a pigeon, eased his burning by giving Shivatej to the chakras represented as the wives of the Saptarishis. Those sage wives used to take a bath with cold water in the early morning or Brahma Muhurta during the cold winter months. In fact, those sage wives, shivering with cold, went to Agnidev to take heat. With the spark of fire, Shivtej entered them. What happens is that while taking a bath with cold water, the muscles of the chakras get contracted due to cold, due to which there is an upward stretch in the abdomen. Due to this, the semen effulgence located on the genitals near the Swadhisthana chakra rises upwards and spreads in all the seven chakras. This also reduces the pressure of the prostate, or it can also be said that due to lack of energy, the muscles that hold urine become loose, hence frequent and open urination is common while taking a bath with cold water. Almost the same process happens in times of fear, which has led to the saying that he was so scared that his paint got wet. In fact, fear creates a dark or void in the brain, which sucks the seminal energy from the bottom up. Due to the power of that kundalini energy, the muscles on the chakras contract further more and heat is generated on them. This is to take the heat of fire by the wives of the sages and through its sparklings to attain Shivtej. This increases the circulation of blood on the chakras, due to which the Kundalini picture starts shining there, because where there is blood or semen or prana, there is Kundalini. Actually, semen gives a lot more power to Kundalini than blood. That is why it is said that thousands of drops of blood make one drop of semen. With the contraction of the chakra, if the burning of semen at Swadhisthana and Mooladhara chakra is not meditated along with, then the picture of Kundalini is not formed on that chakra, only the contraction remains. That is why it is said that Kundalini resides in Muladhara. This Kundalini picture has been called the child in the womb of sage wives, because just as a womb is formed from semen, in the same way, Kundalini picture is also formed from this same. That is why Lord Shiva assures Agnidev turned pigeon, who became cursed by Goddess Parvati, that he should give his semen effulgence to the wives of the Saptarishis, which will pacify his burning sensation. I’m still surprised with this unique and scientifically told story of Shiv Puran. Just as the semen rises up by sexual yoga, so also by bathing in cold water. That is why both the actions are shown almost same in this story. Means due to socially shameful reason, sexual story has been well told in the form of cold water bath. It’s a good alternative. It’s an intelligent tactic. May be Lord Shiva has been shown residing in snowy mountain peaks and shivlingam continuously bathed with overhead dribbling water, and rainy season present month of July-August called as Shravan month is Shiva specific month due to this same reason. The river Ganges, falling down from heaven, enters the earth only after bathing Shiva. I would also like to do some philosophical rumination here. The primary objective of sexual intercourse seems to be Kundalini awakening, the birth of a child is probably a secondary or companion purpose. The child is as a reward that such a person has made his life successful by attaining Kundalini awakening, now he should also help another wandering soul to succeed in his life by producing children like him. The proof of this is the existence of Brahmacharya Ashram before the Grihastha Ashram. In this the man used to become dvija meaning awakened. The meaning of Brahmacharya is to raise the semen power without wasting it. It is a different matter that if a weak person is not able to achieve Kundalini awakening in this ashram stage, then in the next stage of householder or grihasth ashram he can also take the help of Sambhog Yoga for a few years in this household ashram. It is as if a weak child even after moving to the next class takes additional vigorous coaching or training to make up for the gap in the previous class. It can be called super celibacy or emergency celibacy or extraordinary celibacy. Ever since procreation became the primary objective of sex, people started forgetting Kundalini awakening and the world population also started increasing randomly. I was reading on Facebook that such a man reminded thirty thousand people of their past lives, and such a man reminded ten thousand people. There is no discussion of whether anyone got Kundalini awakening helped by anyone. Main work behind, minor work ahead. Here even this present life is not forgotten, and on the other hand some people are also engaged in remembering the lives of past births. Weird and ridiculous the matter appearing. I also feel that the channel in front is shown as the left side of Ardhanarishvara i.e. female part and the channel exact behind spinal cord is shown as the right i.e. male part. The same goes for the yab-yum posture. Probably because of shyness towards the yab-yum posture, it has been shown like this as it is. Anyway, photos etc. cannot even show three dimensional yub-yum on a two dimensional background. But it could be shown in an idol. That’s why shyness seems to be the main reason. These two channels try to unite by joining. This allows the powerful Kundalini energy of Muladhara to rise up in the form of a wave and enter the Sahasrara, penetrating all the chakras, and not turning back down, as the Kundalini channel in front merges with the channel behind. Meaning the joining of both the channels opens up a central channel named Sushumna. Probably a little ahead of the spinal cord is the left ie Ida channel, and a little behind the spinal cord, the channel touching the back skin is the right ie Pingala. The spinal cord is the central or sushumna channel located in the center of the vertebral column. Perhaps this is the basic scientific principle of yin-yang i.e. male-female attraction. By the way, left and right channels also exist in the same way as usually shown. I am giving them extra dimension by moving the left channel in front of the spine and moving the right channel behind the spine.

Everyone knows that as soon as the chakras receive heat through contraction, they also get semen effulgence. The sage wives gave that radiance to the Himalayas, meaning the backbone. When cold water falls on the body, uddiyana bandha along with yoga breathing is felt by itself. In this, the stomach squeezes inwards and upwards. Due to this the burning or kundalini effulgence of the chakras goes to the spine. The spine gives that effulgence to the river Ganges which means Sushumna Nadi. Sushumna gives it to the reeds growing on the sides, meaning Sahasrar Chakra, where Kartikeya’s birth means Kundalini awakening or Kundalini activation occurs. If the Sushumna nadi is fully opened then Kundalini awakening otherwise Kundalini activation takes place. Meaning the Kundalini picture becomes like a living or real physical picture in the brain. This is the importance of bathing in cold water, which is described in every religion. In the Baptism of Christianity, possibly even with cold water, this physical action of bathing, which is called initiation, brings alive the Kundalini picture in the brain, which sets a man on the path of spiritual liberation. That’s why baptism often shows miraculous effects. That’s why the crowd of devotees keeps on taking a bath in the Ganges river. The water of the Ganges river is icy cold, by bathing in which the Kundalini Shakti runs brightly, creating bliss. There is a fast of Rishi Panchami among Hindus, in which a lady has to bathe continuously for a long time in a spring or pond of cold water, and also have to keep doing holy teeth brushing and cleaning with chewed wooden stick. Possibly due to the toothing, the extra energy of the brain keeps coming down from the front channel, which makes it easier for the Kundalini to move around, which also does not let feel cold. Actually, contraction of muscles and conduction of nadi is the natural effort of the body to protect it from cold by generating heat in the body, Kundalini benefit is Sahalabha i.e. associated benefit. Tibetan Buddhists melt ice cubes by placing them on top of them. The more rocks one melts in this match, the bigger he is considered to be a yogi. The one who melts the most ice cubes is declared the winner. This is a good way to measure meditation power. The contraction of the muscles of the chakras due to kundalini meditation there produces heat, which melts the ice. I was thinking in the previous post that I wish there was a way to check one’s self-proclaimed claim of Kundalini awakening. If you want, you get something or the other. This is the way to melt the ice cubes on the body. It is simple, indirect, effective and practical method. There is no need to take a blood sample to find a possible Kundalini marker in it. Of course, Kundalini awakening is not known directly from this, but by measuring the power of Kundalini meditation, it is known indirectly, because Kundalini awakening increases the power of Kundalini meditation. It is a different matter that due to prolonged practice of Kundalini Yoga, Kundalini meditation power increases without awakening. The main thing is this Kundalini meditation power, not Kundalini awakening, it seems to me. However, Kundalini awakening has its own educational and authoritarian significance. With this test technique, Kundalini awakening can only be estimated, it cannot be confirmed. There seems to be one more drawback to this technique. If a yogi has sufficient Kundalini meditation power, but is weak, he may not be able to maintain the contraction of the chakras for long, due to lack of energy. This is my own guess, it may not be so. But common people should not do this without practice. It can be causing cold too. People living in cold places like mountains are more agile due to Kundalini Shakti, it seems.

By associating new things with old things, people’s positive thinking towards it can be adversely affected

I was mentioning in the previous post that as far as I am aware, Osho Maharaj did not link his philosophy related to Sambhog Yoga much to the old beliefs. This also reflects his philosophical cleverness and dexterity. What happens is that everyone is tired of the old stuff. This is a psychological fact. Once you visit the Statue of Unity, it is better to go to a new place than to go there again. Similarly, people often have less attachment to old things than to new and modern things. However, with some people the opposite happens. They believe more in the old beliefs made up. They may get special benefit from their revelation. Many have a special prejudice towards a particular religion or way of life. If the old or a particular lifestyle related method is repeatedly cited for the technology or philosophy discovered according to the present circumstances, then its novelty and interestingness will start to diminish. So it seems that it would be good if such reference is given at least and for reference only. This will also give the benefit of innovation, and the authenticity of the new method will not be doubted. Yes, scientific and experience based revelation of old methods can be done without hesitation. Perhaps that is why the great Chinese philosopher Confucius used to say that new traditions should be linked to old traditions.

Kundalini tantra based sexual Yoga and Osho~a truth half understood

Friends, in the previous post, I was highlighting the philosophical works of Osho Maharaj to honor him. He used to give meaningful detail to his works with his philosophical skill. Meaningful meaning that the confusions of the mind were removed from them. On the contrary, unnecessary expansion is also done by many people in many places, due to which the confusion of the mind increases instead of decreasing. Similarly, meaningful expansions keep many secrets hidden within themselves, so that they may not be easily accessible to the unqualified person, but the capable person can understand them well. The most effective articles are long articles. Google also understands this, that is why it gives more attention to big articles. Rare knowledge is hidden in large articles just like gold in an elaborate mine filled with clay. The style of the Puranas is also of similar meaningful expansionism. In the midst of elaborate tales, a variety of mysteries are uncovered, which keep the eye of knowledge open. Most of the people, especially those who are in a hurry, are deprived of the divine wisdom hidden within the great writings. Some of my recent articles were very long, even one containing about eight thousand words. With so many words, many small booklets begin to be made. Writing those articles gave me the greatest satisfaction, because in them there was a glimpse of such excellent knowledge and revelations, which I do not see anywhere. I also got many new insights from them. Although I feel that perhaps only few readers have been able to read it completely, due to paucity of time. By the way, the mentality of the writer is caught well only after reading the entire article. I am more of a book writer, less a blog writer. That’s why all my blog posts seem to be intertwined. I will fill the gap of the previous blog post in the next post. In this way, the series of posts are also compiled in the form of a book. This is a good way to write a book, because in today’s busy age, no man can write a book in one sitting. Also, these posts are written very carefully, after repeated inspections, with full details and as per the grammar, so that the readers do not need to comment. That is why there are no comments in my blog, only readers are there. If there are comments, those are of praise only. Hha lol 😄. The book also does not have a comment section. Those large blog posts were probably well received in book form, which was reflected in the increase in book download reports. The complete mentality of an author is known by reading all his works. Because some have something special, some have something. If there is a deficiency in one of the works, then the author makes up for it in his other work. Reading incomplete works can lead to misunderstandings about the author. Little Knowledge is a Dangerous Thing. There is no doubt that one can become a great human by reading all the works of Osho. Osho’s creations are many, my creations are very few in comparison to his. Even if someone reads all my works, he becomes eligible for reward, just imagine the benefits from reading all the works of Osho. Although it is a different matter that I do not stand anywhere in front of a great avatar man like Osho. Let me give an example of how it is sometimes difficult to understand even great people. When I was a teenager, mainly at college times, I used to listen to Osho’s Sambhog Yoga or sex to superconsciousness talks from different types of people, as if they were trying to cover up their evils with great joy and enthusiasm. There was also some funny tone to narrate them. Although they used to treat it as pure sex, there was no trace of yoga in it. That’s why I used to doubt the teachings imparted by Osho. Because at that time I was a bachelor, and was unfamiliar with the experience of sex. Yes, some mysterious truth was definitely reflected in them. The reason for this was, around that time, I attained momentary self-awakening from pure love yoga, of course only during the dream period. But it was strong enough to completely transform me in a jiffy and push me almost completely on the spiritual path. One of the reasons for this must have been that due to the condition of my childhood, my mind was fresh and sensitive at that time, so there was a lot of receptivity for transformation. My pure mental love-yoga was of course not formed out of sex, but the mentality and longing for sex was at its base, as it often happens in the case of every male-female love. The special thing in this was that probably the subtle mentality and longing of sex was equal and overwhelming on both sides, meaning it was not like one-sided love, I feel so. Though everything was by the invisible attraction of the mind, there was nothing in the physical form, there was no mutual speech, there was no personal interaction, everything was confined to a group of people or students. It is a different matter that there used to be love-filled and ignorant or childish-like initiatives from the feminine side, to create a relationship of pure friendship or love. I felt like I had got a PhD in the field of love by the special grace of the Mother Goddess, because mainly it appeared the same love, from which the lotus of my sahasrar had almost blossomed in the end, because this is the biggest goal of the creation. There were many other favorable reasons too responsible for this, but they were able to bring color only by permeating love, not directly, it seems to me. Because I had attained samadhi not by physical sex, but by like mental or subtle or unexpressed sex, so I also felt my invisible connection with Osho, of course only on a subtle philosophical level. Although I had never read his teachings properly. Maybe that’s why I used to deny samadhi from physical sex, of course from outside, although I also felt such a possibility in my mind. Whenever I heard about Osho’s and leftist tantric sex yoga or any romantic anecdote, I would get lost in blissful samadhi, Kundalini would shine brightly in my heart and sahasrar, my hair would blossom and my body felt like a trembling. Feeling like heaviness in the head even. This was probably due to the rise of the sexual energy built up on my muladhara. My back would become straight, my face would become flushed, my breath would be fast and I would feel kundalini like dancing-singing and laughing in front of me like a beautiful and trance picture of a psychic lover, which many times the image of that old spiritual man used to subdue. The mental picture would become alive. It is a different matter that after many years the experience of complete samadhi or the glimpse of Kundalini awakening came to me from the meditation of mental picture of the same old man through kundalini yoga practice assisted with sexual yoga and not from the mental picture of the beloved. I used to try to stop the talk of Sambhog Yoga, or walk away from them, so that my fellow students or people did not understand my condition otherwise. Everyone would have been surprised by it and possibly thought of me as if like being impotent. For a long time even in married life, I could not understand the secret of Sambhog-samadhi, although naturally I was going towards it because in nature everyone moves towards perfection, but did not know that this is Samadhi, and the sex Gets it quickest. Meaning that as a blind man was able to touch the elephant, but he did not know that it was an elephant. Once I read an article in the newspaper about Osho’s Sambhog-samadhi, I was incensed. It was like a talk about the grinning cat scratching the pole. Being proud of my pure love, I began to refute that article in front of an old man like a father. He said the lone  words in a fit of anger, he is right. At that time nothing was understood by me, but now it seems that he was not even able to refute the statement of a great personality like Osho, and could not even understand it. Along with this, due to fear of public shame, he was not able to speak anything on it. Well, time passed, and my experience expanded. It is after many years. As if by some divine power, I heated up by physical , spiritual and astral flames, had a chance to rest for about 2-3 years at a calm place like the shade of a banyan tree growing near a lake. Earning strength from that positive relaxation, I started reading articles and books on the Internet related to Tantra. Having lived with the philosophy of physiology for about 10-15 years, my inclination towards tantra was already formed. Meaning that the gunpowder was ready, it just needed a spark. Along with, I also Started joining few online discussion forums related to Kundalini. I already had scientific and investigative nature. Hence there was a desire to find Kundalini with the help of sexual tantra, which was fulfilled to some extent. Then I almost completely understood the above universal epic word of Osho. Who can understand a Yug Purush completely, that’s why I am adding almost word together. It is a different matter that Sambhog Yoga is not a discovery of modern or medieval age. It is also mentioned wonderfully in Shiv Purana. There it is written in a mystical manner, such as taking up the Shiva Tej by Agnidev as a pigeon, receiving that effulgence by seven sage wives, giving it to the Himalaya by the sage wives, pouring it into the Ganges by the Himalaya, Birth of baby Kartikeya with it on the reeds growing on the banks of the Ganges etc. This narrative has also been disclosed in detail in a post on this blog. From this it becomes clear that the timeless and spaceless Lord Shiva is the originator of sexual yoga, not any earthly human being. As far as my limited eye can see, I do not think that dear Osho Maharaj has attributed it to Lord Shiva by referring to this above said story in his description of sexual Yoga. If anyone knows about this then please let me know so that my knowledge can also increase. Perhaps for this reason he was also surrounded by unnecessary ruckus or controversy. What happens is that when the credit of one’s statement is given to someone else, to a guru or to a higher authority or to a deity or to God or even to a pen name, then one does not create unnecessary arrogance from it, and secondly it does not create unnecessary controversy due to misunderstanding by the people. That’s why Om is put at the beginning of every mantra, which means that this statement is of God, not mine. I have also been saying from the beginning that my statements about this is not my own. I am only saying what Lord Shiva and Osho Maharaj or ages old tantric kundalini yogis have already said. However, it is a different matter that as per sources Nupur Sharma had also said the same thing, which was written in the Quran, and which is often discussed in Muslim communities, and she had also cited this fact. Still, many Muslim organizations and Islamic countries rallied against that poor lonely woman, to the point where the jihadis even killed some Hindu people. This proves that even this social engineering technique rarely works in the case of fanatics. I also feel that this was a false excuse to implicate Nupur Sharma, just as some news and arrests like this have also come to the fore, because she does not even give a chance to point fingers at herself. The excuse was such that a lion was drinking water upstream in the river. A lamb was also drinking water on its lower side. The lion said to the lamb that you are making my water refuse, I will eat you. So the lamb said that sir, you are higher than me, my refuse water is not coming to you, but I am drinking your refuse water. So the lion said that then your mother must have made my water refuse, and saying so, ate the lamb. Nupur Sharma was an intense and stunning BJP spokesperson. She presented the answer to every debate bound political or religious question cleverly, eloquently, powerfully, deeply and with evidence. The shades of Saraswati, Lakshmi and Kali goddesses together were seen inside her at times. She used to show the Islamic scholars the stars in the day who made unrestrained and absurd arguments in the TV debates. If you play a bean band in front of a buffalo, she will not offer a garland. Doing someone, dying some other one. The time has come to eradicate the disease of religious intolerance from the entire world. Until it’s done humanely and lawfully, till then such provocative rhetoric should be avoided. When you know that opening the lid of the bottle will bring out the genie, then why open it. In fact, there are other clever people who instigate gullible and loose tongue people. We do not take anyone’s pros and cons, neither admire nor criticize anyone, tell the truth as the truth and the lie as the lie, contrary to the bigotry. Let’s go back to Kundalini again little more, the main subject brother. The discovery of Kundalini by me or any else doesn’t matter much. It is not Einstein’s discovery of relativity, that once discovered, there is no need to search for it by others. Every man will have to search for Kundalini himself, and live according to it, the search by others will not bring much benefit. Searching by others can certainly help one guess about what it looks like, and where and how to find it.

Osho Maharaj was a strong opponent of fanatical religiosity

I also admire Osho Maharaj a lot because he was a strong opponent of religious fanaticism. He believed that it did not allow free spiritual thinking to flourish. Due to this the lotus of knowledge of man does not develop properly. He also spoke openly against Jihad. He said that supreme being does not need any soldier to protect the religion. He himself is fully capable. He also used to call hardcore religious originators as if like mental patients. More recently this week, jihadis beheaded a tailor named Kanhaiya lal brutally in ISIS or Talibani style in Udaipur, Rajasthan because he had posted a Facebook post in support of Nupur Sharma. This incident is reminiscent of the Charlie Hebdo jihadist incident in France. It’s highly condemnable.

कुंडलिनी तंत्र आधारित संभोग योग और ओशो~एक सच जो अधूरा समझा गया

मित्रो, मैं पिछली पोस्ट में ओशो महाराज के सम्मान में उनकी दार्शनिक रचनाओं पर प्रकाश डाल रहा था। वे अपनी दार्शनिक कौशलता से अपनी रचनाओं को सार्थक विस्तार देते थे। सार्थक मतलब उनसे मन की उलझनेँ दूर होती थीं। इसके विपरीत, कई लोगों द्वारा कई जगह निरर्थक विस्तार भी किया जाता है, जिससे मन की उलझनेँ सुलझने की बजाय बढ़ती हैं। इसी तरह सार्थक विस्तार कई रहस्यों को अपने अंदर छुपा कर रखते हैं, ताकि वे अयोग्य व्यक्ति को आसानी से उपलब्ध न हो सकें, पर योग्य व्यक्ति उन्हें अच्छी तरह समझ सकें। पुराणों की शैली भी इसी तरह की सार्थक विस्तारवाद की होती है। विस्तृत कथाओं के बीच में किस्मकिस्म के रहस्य उजागर किए गए होते हैं, जो ज्ञानचक्षु को खोलते रहते हैं। सबसे ज्यादा कारगर लेख बड़े लेख ही होते हैं। बड़े लेखों में दुर्लभ ज्ञान इसी तरह छिपा होता है, जैसे मिट्टी से भरी विस्तृत खदान में सोना। गूगल भी इस बात को समझता है, इसीलिए बड़े लेखों को ज्यादा तवज्जो देता है। अधिकांश लोग विशेषतः जो जल्दबाजी से भरे होते हैं, वे बड़े लेखों के अंदर छिपे हुए दिव्य ज्ञान से वँचित रह जाते हैं। मेरे हाल ही के पिछले कुछ लेख बहुत बड़े-बड़े थे, यहाँ तक कि एक तो आठ हजार के करीब शब्दों से भरा लेख था। इतने शब्दों से बहुत सी लघु पुस्तिकाएँ बनना शुरु हो जाती हैं। उन लेखों को लिखकर मुझे सबसे ज्यादा संतुष्टि मिली, क्योंकि उनमें वैसे उत्कृष्ट ज्ञान की और रहस्योद्घाटनों की झलक दिखी मुझे, जो बहुत कम दिखाई देती है। उनसे मुझे कई नई अंतःदृष्टियां भी मिलीं। हालांकि मुझे लगता है कि सम्भवतः उसे कम ही पाठक पूरा पढ़ पाए होंगे, समय की कमी के कारण। वैसे लेखक की मानसिकता पूरा लेख पढ़कर ही अच्छे से पकड़ में आती है। मैं एक पुस्तक लेखक ज्यादा हुँ, ब्लॉग लेखक कम। इसीलिए मेरी सभी ब्लॉग पोस्टें आपस में जुड़ी हुई सी लगती हैं। पिछली ब्लॉग पोस्ट की कमी अगली पोस्ट में पूरी कर लेता हुँ। इस तरह श्रृंखला में बंधी पोस्टें पुस्तक के रूप में भी संकलित की जाती रहती हैं। यह पुस्तक लिखने का अच्छा तरीका है, क्योंकि आज के व्यस्त युग में कोई आदमी एक बैठक में तो पुस्तक नहीं लिख सकता। साथ में, इन पोस्टों को बहुत सोचसमझ कर, बारबार निरिक्षण करने के बाद, पूर्ण विस्तार के साथ, और व्याकरण के अनुसार शुद्ध रूप में लिखा जाता है, ताकि पाठकों को कमेंट करने की जरूरत ही न पड़े। इसीलिए तो मेरे ब्लॉग में कमेंट होते ही नहीं, केवल पाठक ही होते हैं। अगर कमेंट होते हैं, तो तारीफ के ही होते हैं। हहा😄। पुस्तक में भी कमेंट सेक्शन नहीं होता। पुस्तक रूप में सम्भवतः वे बड़ी ब्लॉग पोस्टें काफी पसंद की गईं, जिसका पता बुक डाउनलोड रिपोर्ट में इजाफे से चला। किसी लेखक की सम्पूर्ण मानसिकता का पूरा पता उसकी सभी रचनाओं को पढ़कर चलता है। क्योंकि किसी में कुछ विशेष होता है, तो किसी में कुछ। अगर किसी एक रचना में कमी रह गई हो, तो लेखक उसे अपनी दूसरी रचना में पूरी कर देता है। अधूरी रचनाएं पढ़ने से रचनाकार के प्रति गलतफहमी पैदा हो सकती है। लिटल नॉलेज इज ए डेंजरस थिंग। इसमें कोई संदेह नहीं कि ओशो की सभी रचनाएं पढ़कर कोई भी व्यक्ति महामानव बन सकता है। ओशो की रचनाएं बहुत ज्यादा हैं, मेरी रचनाएं तो उनके मुकाबले बहुत कम हैं। मेरी सभी रचनाएं भी अगर कोई पढ़ ले, तो भी वह इनाम का पात्र बन जाए, ओशो की सभी रचनाएं पढ़ना तो दूर की बात है। हालांकि यह अलग बात है कि ओशो जैसे महान अवतारी पुरुष के आगे मैं कहीं भी नहीं ठहरता। महान लोगों को समझना भी कई बार कैसे कठिन हो जाता है, इसका मैं एक उदाहरण देता हुँ। मैं जब किशोरावस्था में था तो कई अय्याश किस्म के लोगों से, मुख्यतः कॉलेज टाइम में इस तरह से ओशो के सम्भोग-योग को सुना करता था, जैसे कि वे बड़ी ख़ुशी और उत्साह से अपनी बुराइयों को ढकने की कोशिश कर रहे हों। कुछ-कुछ मज़ाकिया लहजा भी होता था उनका सुनाने का। हालांकि वे लोग उसे शुद्ध सम्भोग मानकर चलते थे, योग का तो उसमें नामोनिशान नहीं दिखता था। इसलिए मुझे ओशो द्वारा प्रदत्त शिक्षा पर संदेह होता था। क्योंकि उस समय मैं कुंवारा था, और सम्भोग के अनुभव से अपरिचित था। हाँ, कुछ रहस्यमयी सच्चाई उसमें जरूर झलकती थी मुझे। इसकी वजह थी, उस समय के आसपास मुझे शुद्ध प्रेमयोग से क्षणिक आत्म जागृति का प्राप्त होना, बेशक स्वप्नकाल में ही सही। पर वह इतनी मज़बूत थी जिसने मुझे एक झटके में पूरी तरह से रूपातंरित करके आध्यात्मिक पथ पर लगभग पूरी तरह से धकेल दिया था। इसकी एक वजह यह भी रही होगी कि बाल्यकाल जैसी अवस्था के कारण मेरा मस्तिष्क तरोताज़ा व संवेदनशील था उस समय, इसलिए बहुत रिसप्टेव था रूपातंरण के लिए। मेरा शुद्ध मानसिक प्रेमयोग बेशक सम्भोग से नहीं बना था, पर सम्भोग की मानसिकता और लालसा उसके आधार में जरूर थी, जैसी कि पुरुष-स्त्री के हरेक प्रेम के संबंध में अक्सर होता ही है। इसमें विशेष बात यह थी कि सम्भवतः सम्भोग की सूक्ष्म मानसिकता और लालसा दोनों पक्षो में बराबर और बढ़चढ़ कर थी, मतलब वह एकतरफा प्यार की तरह नहीं था, ऐसा लगता है मुझे। हालांकि सबकुछ मन के अदृश्य आकर्षण से ही था, स्थूल रूप में कुछ भी नहीं था, कोई बोलचाल नहीं थी, कोई व्यक्तिगत मेलमिलाप नहीं था, सबकुछ लोगों या छात्रों के समूह तक ही सीमित था। यह अलग बात है कि स्त्रीपक्ष से ही प्रेम से भरी और नादानी या बचपने जैसे से भरी हुई पहलें हुआ करती थीं, शुद्ध मित्रता या प्रेम का संबंध बनाने के लिए। देवीमाता की विशेष कृपा से मुझे तो जैसे प्रेम के क्षेत्र में पीएचडी ही मिल गई थी, ऐसा लगता था मुझे, क्योंकि मुख्यतः वह वही प्रेम लगता था मुझे, जिससे मेरे सहस्रार का कमल खिल जैसा उठा था अंत में, क्योंकि यही सृष्टि की सबसे बड़ी उपलब्धि है। इसके लिए और भी बहुत सी अनुकूल वजहें रही थीं, पर वे प्रेम को परवान चढ़ाकर ही रंग ला सकी थीं, सीधे तौर पर नहीं, ऐसा लगता है मुझे। क्योंकि शरीरीक सम्भोग से न सही पर मानसिक या सूक्ष्म या अव्यक्त सम्भोग जैसे सुख से मुझे वह समाधि मिली थी, इसलिए मुझे ओशो से अपना अदृश्य संबंध भी महसूस होता था, बेशक दार्शनिक स्तर का ही सही। हालांकि मैंने उनकी शिक्षाओं को कभी ढंग से पढ़ा नहीं था। सम्भवतः मैं इसीलिए स्थूल सम्भोग से समाधि को नकारता था, बेशक बाहरबाहर से ही सही, क्योंकि अपने मन में ऐसी सम्भावना मुझे लगती भी थी। जब भी ओशो के व वामपंथी तांत्रिकों के अनुसार सम्भोग योग आदि के बारे में या कोई भी रोमांटिक किस्सा सुनता, तो मैं आनंद से भरी हुई समाधि में खोने लगता, कुंडलिनी मेरे सहस्रार में जोरों से चमकने लगती, मेरा रोमरोम खिल उठता और मेरे शरीर में कंपन जैसा होने लगता व सिर में भारीपन जैसा आ जाता। सम्भवतः मेरे मुलाधार पर बनी यौन ऊर्जा के ऊपर चढ़ने से ऐसा होता था। मेरी पीठ सीधी हो जाती, मेरे मुख पर लाली आ जाती, सांस तेज जैसी चलने लगती और मानसिक प्रेमिका का मनमोहक व समाधि चित्र जैसे जीवंत सा होकर मेरे सामने हँसता हुआ नाचने-गाने सा लगता, जिसे वश में करने के लिए कई बार उन वृद्ध आध्यात्मिक पुरुष का मानसिक चित्र भी जीवंत हो जाता। यह अलग बात है कि अनेक वर्षों के बाद पूर्ण समाधि या कुंडलिनी जागरण की झलक वाला अनुभव मुझे उन्ही पुरुष के मानसिक चित्र के यौनयोग सहायित कुण्डलिनीयोग के माध्यम से ध्यान से मिला, प्रेमिका के मानसिक चित्र से नहीं। साथ वाले छात्र या लोग उसे अन्यथा न समझे, इसके लिए मैं सम्भोग योग की वार्ता को बंद करवाने की कोशिश करता, या वे मुझे असहज जानकर खुद ही बंद कर देते, या मैं उनसे दूर हो जाने की कोशिश करता। सब उससे कुछ हैरान जैसे होते और सम्भवतः मुझे नपुंसक जैसा समझते। वैवाहिक जीवन में भी लम्बे समय तक मैं सम्भोग-समाधि का रहस्य समझ नहीं पाया, हालांकि स्वाभाविक रूप से मैं उसकी तरफ जा रहा था क्योंकि कुदरतन हर कोई पूर्णता की तरफ बढ़ता है, पर यह पता नहीं था कि यही समाधि है, और यह सम्भोग से सबसे शीघ्रता से मिलती है। मतलब कि जैसे एक अंधा आदमी हाथी को छू तो पा रहा था, पर उसे यह पता नहीं था कि वह हाथी था। एकबार मैंने अख़बार में ओशो के सम्भोग-समाधि से संबंधित एक लेख को पढ़ा, तो मैं झुंझला गया। खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे वाली बात हुई। मैं अपने शुद्ध प्रेमयोग पर गर्वित जैसा होते हुए एक पिता समान वृद्ध व्यक्ति के सामने उस लेख का खंडन करने लगा। उन्होंने बड़े गुस्से में भड़कते हुए एक ही बात कही, वह ठीक कहता है। उस समय तो कुछ समझ नहीं आया पर अब लगता है कि वे ओशो जैसे महान व्यक्तित्व के कथन का खंडन भी नहीं कर पा रहे थे, और उसे समझ भी नहीं पा रहे थे। साथ में लोकलाज के डर से उसपर कुछ बोल भी नहीं पा रहे। खैर, समय बीतता गया, और मेरे अनुभव का दायरा बढ़ता गया। बहुत वर्षों के बाद की बात है। मानो किसी दैवीय शक्ति से आधिभोतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक, तीनों तापों से तपे हुए मुझ राहगीर को एक सरोवर के निकट उपजे वटवृक्ष की छाया तले जैसे स्थान पर लगभग 2-3 वर्ष विश्राम का मौका मिला। उस सकारात्मक  विश्राम से शक्ति अर्जित करके मैं इंटरनेट पर तंत्र से संबंधित लेख और पुस्तकें पढ़ने लगा। लगभग 10-15 वर्षों से शरीरविज्ञान दर्शन के साथ जीवनयापन करने से तंत्र की तरफ मेरा झुकाव पहले से ही बना हुआ था। मतलब कि बारूद तैयार था, उसे सिर्फ चिंगारी की जरूरत थी। साथ में, बहुत से कुंडलिनी संबंधी ऑनलाइन वार्ता मंचों में भी शामिल होने लगा। वैज्ञानिक व खोजी स्वभाव तो मेरा पहले से था ही। इसलिए यौनतंत्र की सहायता से कुंडलिनी को खोजने की इच्छा हुई, जो कुछ हद तक सफल भी हो गई। तब मैं ओशो के उपरोक्त वैश्विक महावक्य को लगभग  पूरी तरह समझ पाया। एक युगपुरुष को पूरी तरह तो कौन समझ सकता है, इसीलिए साथ में लगभग शब्द जोड़ रहा हुँ। यह अलग बात है कि सम्भोग योग कोई आधुनिक या मध्य युग की खोज नहीं है। शिवपुराण में भी इसका बेहतरीन उल्लेख मिलता है। वहाँ इसे रहस्यात्मक तरीके से लिखा गया है, जैसे अग्निदेव का कबूतर बनकर शिवतेज को धारण करना, उस तेज को सात ऋषिपत्नियों के द्वारा ग्रहण करना, ऋषिपत्नियों के द्वारा उसे हिमालय को देना, हिमालय के द्वारा उसे गंगा में उड़ेलना, गंगा के किनारे पर उगे सरकंडों पर उससे बालक कार्तिकेय का जन्म होना आदि। इस आख्यान को इसी ब्लॉग की एक पोस्ट में विस्तार से रहस्योद्घाटित भी किया गया है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि देशकालातीत भगवान शिव ही संभोग योग के जनक हैं, कोई पार्थिव व्यक्ति नहीं। जहाँ तक मेरे सीमित ज्ञानचक्षु देख पा रहे हैं, मुझे नहीं लगता कि प्रिय ओशो महाराज ने संभोग योग के वर्णन के दौरान भगवान शिव की इस कथा का हवाला देते हुए इसका श्रेय उन्हें दिया हो। अगर इसकी जानकारी किसी को हो तो कृपया मुझे बताए ताकि मेरे ज्ञान में भी वृद्धि हो सके। सम्भवतः इसी वजह से वे कुछ व्यर्थ के विवादों से भी घिरे रहे। होता क्या है कि जब अपने कथन का श्रेय किसी अन्य को, गुरु को या उच्चाधिकारी को या देवता को या ईश्वर को, या यहाँ तक कि काल्पनिक नाम को दिया जाता है, तो एक तो उससे अनावश्यक अहंकार पैदा नहीं होता, और दूसरा लोगों की गलतफहमी से अनावश्यक बवाल या विवाद भी पैदा नहीं होता। इसीलिए हरेक मंत्र के शुरु में ॐ लगाया जाता है, जिसका मतलब है कि यह कथन ईश्वर का है, मेरा नहीं। मैं भी शुरु से कहता आया हूँ कि इस बारे में मेरा कथन अपना नहीं है। मैं तो वही कह रहा हूँ जो पहले से ही भगवान शिव और ओशो महाराज या युगों पुरातन तांत्रिक कुंडलिनी योगियों ने कहा हुआ है। यह अलग बात है कि सूत्रों के अनुसार नूपुर शर्मा ने भी वही कहा था, जो कुरान में लिखा था, और उसने इस बात का हवाला भी दिया था। फिर भी उस बेचारी अकेली महिला के खिलाफ बहुत से मुस्लिम संगठन और इस्लामिक देश लामबंद हो गए, यहाँ तक कि उस बात पर जेहादियों ने कुछ हिन्दू लोगों का कत्ल तक कर दिया। इससे सिद्ध हो जाता है कि धर्माँधों के मामले में यह सोशल इंजिनीयरिंग तकनीक भी कम ही काम करती है। मुझे तो यह भी लगता है, और जैसी कुछ खबरें और गिरप्तारियां भी सुनने में आईं हैं कि यह नूपुर शर्मा को फँसाने का एक झूठा बहाना था, क्योंकि वह अपने ऊपर अंगुली उठाने का मौका ही नहीं देती थी। यह बहाना ऐसा था कि एक शेर नदी में ऊपर की तरफ पानी पी रहा था। उसकी निचली तरफ एक मेमना भी पानी पी रहा था। शेर ने मेमने से कहा कि तू मेरा पानी जूठा कर रहा है, मैं तुझे खा जाऊंगा। तो मेमने ने कहा कि महाराज, आप तो मेरे से ऊंचाई पर हैं, मेरा जूठा पानी तो आपतक आ ही नहीं रहा, बल्कि मैं आपका जूठा पानी पी रहा हुँ। तो शेर ने कहा कि फिर जरूर तेरे मांबाप ने मेरा पानी जूठा किया होगा, और ऐसा कहकर वह उसको खा गया। प्रखर और तेजस्वी भाजपा प्रवक्ता थी नूपुर शर्मा। हर राजनीतिक या धार्मिक प्रश्न का जवाब बड़ी चतुराई से, तहजीब से, दबदबे से, गहराई से और साक्ष्य के साथ प्रस्तुत करती थी। सरस्वती, लक्ष्मी और काली की एकसाथ छटाएं दिखती थीं कई बार उनके अंदर। दूरदर्शन की चर्चाओं में अनर्गल और बेतुके तर्क-वितर्क करने वाले इस्लामिक विद्वानों को छठी का दूध याद दिलाती थी वह। भैंस के आगे बीन बजाओगे तो वह माला तो नहीं पहनाएगी न। करे कोई, मरे कोई। अब समय आ गया है कि धार्मिक असहिष्णुता का रोग जड़ से खत्म कर दिया जाए। जब तक मानवतापूर्ण और क़ानूनबद्ध तरीके से ऐसा न कर लिया जाए, तब तक ऐसी उद्वेगकारी बयानबाजी से बचना चाहिए। जब पता है कि बोतल का ढक्कन खोलने से जिन्न बाहर निकलेगा, तो उसे खोलना ही क्यों। दरअसल भोलेभाले और बड़बोले लोगों को भड़काने वाले दूसरे ही शातिर लोग होते हैं। हम किसी का पक्ष-विपक्ष नहीं लेते, न किसी की प्रशंसा करते, न किसी की बेइज्जती, सच को सच और झूठ को झूठ बोलते हैं, धर्माँधों के बिलकुल उलट। चलो भाई, फिर से थोड़ा सा मुख्य विषय कुंडलिनी की तरफ और चलते हैं। मेरे द्वारा या किसी अन्य के द्वारा कुंडलिनी की खोज कोई विशेष बात नहीं है। कुंडलिनी की खोज कोई आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत की खोज नहीं है, कि जिसे एकबार खोज लिया, तो दूसरों को दुबारा खोजने की जरूरत नहीं है। कुंडलिनी की खोज हरेक आदमी को खुद करनी पड़ेगी, और उसके अनुसार जीवनयापन करना पड़ेगा, औरों की खोज से विशेष लाभ नहीं मिलने वाला। दूसरों की खोज से यह अंदाजा जरूर लग सकता है कि वह देखने में कैसी है, और उसे कहाँ और कैसे खोजा जा सकता है।

ओशो महाराज कट्टर धार्मिकता के प्रखर विरोधी थे

ओशो महाराज को मैं इसलिए भी बहुत मानता हूँ, क्योंकि वे धार्मिक कट्टरता के प्रखर विरोधी थे। वे मानते थे कि यह उन्मुक्त आध्यात्मिक चिंतन को नहीं पनपने देती। इससे आदमी के ज्ञान का कमल ढंग से विकसित नहीं हो पाता। वे जेहाद के खिलाफ भी खुलकर अपनी बात रखते थे। उनका कहना था कि परम तत्त्व को धर्म की सुरक्षा के लिए किसी सिपाही की जरूरत नहीं है। वे खुद पूर्ण सक्षम हैं। वे कट्टर धार्मिक अधिष्ठाताओं को मानसिक रोगी जैसा कहते थे। अभी हाल ही में इसी हफ्ते जिहादियों ने राजस्थान के उदयपुर में कन्हैया लाल नाम के एक दर्जी का इसलिए आईएसआई और तालिबानी स्टाइल में बेरहमी से गला रेत कर कत्ल कर दिया क्योंकि उसने नूपुर शर्मा के समर्थन में एक फेसबुक पोस्ट डाली थी। यह घटना फ्रांस में घटित चार्ली हैब्दो जेहादी कांड की याद दिलाती है। यह बेहद निंदनीय है।

Kundalini marker or sign inside body that can physically and scientifically prove Kundalini awakening can lead to real spiritual social era

Friends, in last week’s post I was talking about how Janeu thread balances nadis and strengthens a man’s Kundalini. The man’s attention keeps on shifting to his left side with janeu thread in between various works, and sometimes he even tries to straighten it. Due to this, his attention keeps going towards Kundalini itself, because Janeu is a symbol of Kundalini and Brahma. At the time of defecation, it is hung on the right ear because the effect of Ida Nadi is more at that time. Its coming on the right side of the body gives strength to the left side of the brain i.e. Pingala Nadi. The act of defecation is also often said to be feminine, and Ida Nadi is also feminine. To balance this, one has to activate the male dominated Pingala Nadi, which is in the left side of the brain. This work is accomplished by hanging the thread on the right ear. During defecation, the left hand is also used more in cleanliness, due to which the Ida Nadi located in the right brain gets strength. By the way, the right parts of the body are more active, such as the right hand, the right leg are stronger. These are controlled by the pingala-dominated left side of the brain. This Pingala dominant left part of the brain is usually stronger than its Ida dominant right side. By moving the thread towards the left side of the body, it indirectly strengthens the right side of the brain. Simply understand it as it was told in the previous post that at the time of defecation or urination, the source of Kundalini energy, Muladhara remains active. Its energy can reach Kundalini only if Ida and Pingala Nadi are flowing equally. For this, the force of the left side of the body is pulled through the thread and passed to the right ear and finally to the right brain. This strengthens the normally relaxed right brain. Due to this, both the parts of the brain are balanced, the spiritual non-duality remains. Anyway, as above, being a symbol of Kundalini or Brahm, Janeu constantly keeps remembrance of Kundalini. If for some reason one forgets to keep the thread on the ear at the time of defecation, then the thumb of the left hand has been asked to touch the right ear, that is, it has been asked to hold the right ear once. This gives strength to the left body and the right brain as well, because the Ida Nadi of the left body enters the right brain. Anyway, the right ear is close to the right brain. This gives power to the right brain from two sides, making it equal to the left brain. This is a wonderful practical  spiritual psychology. A professor at my university considered me to be a well-balanced person in his eyes, even as he once said so during an examination. Perhaps they sensed the effect of the first momentary awakening within me, that is, a dream state momentary awakening. Maybe my Janeu also has a big hand in my balanced personality. By the way, after completing my studies, once I had stopped wearing it for some time considering it to be a hindrance in the work, but now I understand that it was not meant to obstruct the work, but It was meant to balance the psychic channels. If someone keeps it long and keeps it tightly bound inside the trousers, then it benefits even if it does not move towards the left side arm, because being hung on the left shoulder, it itself is inclined to the left side.

Kundalini awakening benefits indirectly, not directly 

I do not see any direct benefit from Prakriti-Purusha Vivek in the form of Kundalini awakening mentioned in the previous post. It gives only this indirect benefit that by the experience of a pure Purush who is complete and free from nature, attachment to the world as a mixture of Prakriti-Purusha gets destroyed in the same way as a lamp fades in front of the sun. Just as sugar-mixed tea does not taste sweet for some time after consuming pure sugar, similarly, after the experience of a pure purusha, for a few years, interest in the mixed world disappears. Due to this the behavior of man improves, and he starts moving step by step towards liberation from nature. Salvation comes to him only after living a long life by such a free way of life, not at once. Then why wait for Kundalini awakening, why not live life directly like free people. Veda-Purana or Sharir Vigyan Darshan Book is of great help in leading a free life. If a man wants to increase the scope of his luxuries, he can deny such free behavior even after awakening of Kundalini, because man has always got free will, not compulsion. It is as if he can get the sweetness of tea even after eating sugar by dissolving more sugar in the tea. By doing this, he too will not get any benefit like a common man who has no awareness. If a wise man wishes, even in the midst of luxuries, by maintaining disinterest in his mind or by creating artificial interest, he can get the spiritual benefit that comes without awakening the Kundalini. It is as if one can stay away from harmful sugar through exercising well or by adding artificial sweetener.

One should look kundalini light not its generator inside others

As in the previous post, people look at the diet and lifestyle of Tantriks, not their Kundalini. Due to this they insult him in misunderstanding, and suffer. Prajapati Daksha had also insulted Lord Shiva by falling into this misunderstanding. In a post in the same blog, I revealed the story of Daksha’s humiliation of Shiva and consequently Shiva’s Ganas destroying  Daksha Yagya. Many people may feel that this website is Hindu favoring. But actually it is not so. This website is Kundalini favoring. This website picks up any context in which Kundalini appears, no matter what religion or culture it belongs to. Now because most of the Kundalini-related issues are in Hindu religion, that’s why this website may seem to be colored with Hinduism.

Kundalini yogi is also formed by the maturity of agility yogi

This week I got another insight. One day a man was troubling me. There was a heated debate. He was showing his arguing power. Was trying to influence and manipulate me excessively. It was natural that his behavior and my behavior in response to it was to create attachment and duality. However, by remembering the philosophy of physiology, I was preventing attachment and duality from growing. It was a lunch time. My lunch time was moving ahead than expected, due to which I was also feeling hungry. Then he left, giving me a chance to have lunch. In the evening, I was meditating alternately with the chakras of my body moving downwards while doing Kundalini Yoga as in everyday yoga practice. When I reached the Manipur chakra and started meditating on Kundalini there, then incidents related to the man who argued during the day started popping up in my psyche. Because the Manipura chakra, located in the navel, is related to hunger and food, the events related to that man were imprisoned or rather associated with it, because I was hungry while arguing with him. Because it is the principle that by the clear emergence of the old event in the mind in a pure mental form, the seed of that event is destroyed, and the mind is cleared, so after that I felt the lightness of the mind. Atonement and repentance are therefore said to be the greatest punishment for any sin, because from these the incidents of old sin emerge in a pure mental form, from which the seed of those bad deeds is destroyed. When there will be no trace of karma, how can one get the fruits of it? When the seed of the tree is burnt to ashes, how will the tree grow from it, and how will it bear fruit. Similarly, every action is bound by some or the other chakra. At the time of that action, the chakra whose quality is more effective in a person, that karma gets tied the most in that chakra. Although the qualities of all the chakras are always present in a person, but the quality of a particular chakra is most effective at a time. Anahata Chakra is more effective in the emotional state. The Swadhisthana Chakra is more effective in sexual arousal or romance. Mooladhara is more effective in stupidity, Vishuddhi during sweet speech, Ajna Chakra in intellectual state and Sahasrara Chakra is more effective in the state of knowledge or non duality. That is why while doing yoga, kundalini meditation is done on all the chakras in turn so that the samskaras of various types of attachment-ful karma that are tied in them can be eradicated. Most of my life to date has been spent with romance and sexual excitement, I feel, so most of my karma is tied to the Swadhisthana Chakra. This is probably why I get the most relief from Kundalini meditation on the Swadhisthana Chakra. It is because of attachment that the chakras get blocked, because the Kundalini energy keeps accumulating on them, and is not able to revolve properly. That’s why you must have seen that people who are agile, they are like all-rounders. They are all-rounders because they do not stick to any subject for a long time, due to which they do not develop attachment towards any subject. They are constantly changing subjects, so they seem fickle. Although fickleness is considered an obstacle in the path of spirituality, but in tantra, I find the quality of playfulness helpful. It seems that there must have been so much hatred towards Tantra in the general public that all the subjects related to it were considered disgusting and anti-spiritual. Due to the non-attachment arising out of this restlessness, the restless person feels energetic only because of the revolution of the Kundalini energy. Being a female nature, playfulness also seems to me to be a part of the Panchamkars of Tantra. Transientism of Buddhist philosophy is also a symbol of fickleness. Meaning that everything is destroyed in a moment, so don’t mind anyone. The point is also true and scientific, because after every moment everything changes, of course, it may not seem so from a physical point of view. That’s why it seems foolish to cling to something. But logical people will ask that then why do Buddhists stick to the same Kundalini with the power of meditation for a lifetime. So the answer is that they cling to Kundalini only to get rid of their clinging to everything other than Kundalini. All the glue is spent on sticking the Kundalini, there is no more left to stick the rest of the world. On attaining the state of perfection, even the clinging to the Kundalini disappears by itself. That’s why I consider even playfulness to be yoga, non-attachment yoga. Chanchalata yoga also leads to Kundalini yoga. When a man ever reaches such a state that he cannot continue with Chanchalata Yoga, then he himself leans towards Kundalini Yoga. He is enamored of non-attachment, which he gets from Kundalini yoga instead of fickle yoga. When there is a temper of non-dual emotion like philosophy of physiology with restlessness, then that playfulness becomes yoga. It should not be a surprise if I say that I have been upgraded from a fickle yogi to a Kundalini yogi. Chanchalta Yoga can also be called a synonym of Karma Yoga because there is no special difference between the two. Sometimes a Kundalini yogi has to be demoted and become a fickle yogi again. Even an awakened person gets demotion, of course, only for show or to run the complicated business of the world. In ancient India, the awakened people were mostly made sannyasins. Perhaps this was done so that not everyone would get free social security by pretending to be awake. Afraid of giving up all the worldly pleasures in sannyas, a potential swindler would think a hundred times before making a false claim of his awakening. Therefore I consider such social protections to be incomplete. What is the use of such protections in which a man cannot freely enjoy pleasures, even sexual pleasures. I consider Osho Maharaj’s perfect sannyasa to be the best, in which he used to enjoy all the happiness above all, that too while being a sannyasin. Heard that he used to have a bunch of great cars for his own pleasure. Although I find majority of his style of discourse less scientific or practical and more philosophical. He used to take even the smallest things to the point of excessive depth and boredom. For a while it looked like seductive or hypnotising. I myself have been inspired by one of his books towards a higher spiritual goal. The name of that book was, Tantra, A Supreme Understanding. However, after reading it, it seemed that it took a long time to understand a small matter and read a very detailed or decorative article. In fact, such is his style. His works are so extensive and detailed that finding something of one’s own use among them is as difficult as finding a needle in a pile of straw. This is my limited opinion. It might be wrong. Who has so much time in today’s busy age? Still, the vitality, practicality and meaningfulness that is in his expansion is not visible in other expansions. I’ll shed a little more light on this in the next post. Only science can provide such a perfect sannyas to all the awakened people. There must be a sign or marker in the body or mind proving the awakening, which can be caught by science. Then such a marker will be the pointer to the title of Jagrut Purush and the best facilities associated with it, just as today a person who has passed the doctoral examination is given. Then all the people will be inspired to attain awakening which will lead to the rise of a truly spiritual society.

The pressure of Kundalini Shakti in the Muladhara created by Tantra Yoga in the plains is reduced by its climbing up towards Sahasrar in the mountains

The energy of the Panchamakaras, by which a person reaches close to Kundalini awakening, can also be a hindrance in real event of Kundalini awakening, except for Tantric Kundalini sex. In fact, Kundalini awakening comes only from the peak state of Sattvaguna. Only Kundalini sex increases the Sattva guna, all other 5 Ms increase the Rajoguna and Tamoguna. Kundalini resides in Sahasrar only through the mode of goodness, and it is there that awakening takes place, not at other chakras. Actually, due to Satoguna, the body of a person remains like sluggish or loose and tired. However, there is a feeling of great vigor and intensity in the mind and body. But it is more than just a show. Even after putting a little workload on the mind and body, there is a feeling of vibration in the body. Bliss remains because Kundalini activity continues in Sahasrara. If the burden is increased forcibly by taking shelter of Tamagun or Rajoguna, the Kundalini descends from the Sahasrara, thereby reducing the divinity of man. Then again for a few days dedicated tantric yoga practice has to be done to make Kundalini functional again in Sahasrara. If simple yoga is practiced, it can take many days or months. With the balanced use of gunas, Kundalini moves evenly throughout the body, but in Sahasrar, it needs an abundance of Satoguna to make it functional there. Understand that due to the balance of the three gunas, a person is able to float in the river, and at the moments of the abundance of satoguna, he keeps on taking a dip in the water. One will be able to take a dip only when he is swimming. The energy saved by the calm satoguna is used to maintain the Kundalini in Sahasrar. To save energy, people find a secluded abode for spiritual practice. So much physical labor has to be done in the village, countryside or mountains that there is no energy left to raise the semen power. That is why there is less dominance of tantric sex. However, a mix of mountain and plain is best for the tantra. By getting the natural power of the mountain, a refreshed person is able to practice tantric yoga well in the plains. Later that plain area practice is more likely to result in Kundalini awakening in the mountain itself, because the various beautiful natural scenery there acts as a spark or trigger for Kundalini awakening. The pressure of Kundalini Shakti in the organs related to Muladhar and swadhishthan chakras created by Tantra Yoga in the plains is reduced by its climbing up towards Sahasrar in the mountains. This happens because the high-rise ranges of mountains pull the Kundalini upwards. Kundalini energy continues to rise above the mooladhara due to the low gravity in the mountains, while in the plains due to the high force of gravity, it tries to keep falling in the pit of the mooladhara. Moreover, kundalini shakti resides subtly in that blood that flows downwards. Probably Jagadguru Adi Shankaracharya included them prominently in the Char Dham Yatra due to this divine quality of the mountains. For this reason the mountains are full of tourists. Rich people build one house in the mountain and one house in the plains. Perhaps that is why India is called the Kundalini nation because it has a good and favorable ratio of plains and mountains. Because of this energy absorbing nature of sex, those who follow a simple diet, start considering it as disgusting. For this reason the development of tantra was more in favorable physical environment like Punjab state. Similarly, in big cities, there is comfort, but there is no peace. This wastes energy. Hence small, well-planned and quiet convenient cities, situated at beautiful locations having favorable environment, preferably near large water bodies are best for tantra yoga. Rajogun and Tamoguna do not let slow the functioning of the body, so that energy is spent on it, and falls short to maintain the Kundalini in Sahasrara. Of course, the Kundalini shines abundantly on the other chakras too, but there is no awakening there. Perhaps it is a different matter that a skilled tantrik can maintain Sattvagun even with all the Panchamkaras. When the Kundalini is active in Sahasrara, there is an inclination towards things of the good quality itself, and aversion to things of the Rajoguna or Tama guna. It is a different matter that the availability of sufficient energy along with the balanced state of the three gunas plays an important role in the functioning of Kundalini in all the chakras including Sahasrara, while awakening is there only with the abundance of satoguna.