Kundalini as the basis of beauty

What is beauty?

It is often said that beauty is not in any other, but inside the mind of the observer of the beauty. This thing becomes very clear with meditation yoga. The beautiful object is said to be beautiful because it has the power to settle in our hearts for a long time with joy. The same attractive and permanent image in the mind is also called Kundalini.

Spontaneous meditation of the beautiful object

Attention to the object sitting in the mind for a long time causes mind itself focused on it. Due to this, varied types of thoughts and colourful emotions continue to grow in the mind itself. Witnessing and non-attachment towards them remain present itself, because the above single thing sitting in the mind constantly keeps the attention of the person towards itself. Due to this, those emotional thoughts are impaired, resulting in a person increasingly moving toward emptiness. Eventually, the person achieves complete emptiness or enlightenment.

The most beautiful thing

In the temporal perspective, a virtuous woman is considered as one of the most beautiful for her worthy and her interesting person. This is because the picture of such a woman is most strongly settled in the mind of that man. The picture keeps getting stronger through everyday contact between the two. Ultimately, it becomes so much stronger and stable that it takes the form of a Yoga-Samadhi. If in the middle of a healthy attraction (true love), it is disrupted anyway, then mental image may also go weak. It mostly happens due to over interaction, physical relation between both etc. In cosmic behaviour, it is also noticed that after the marriage, mutual attraction decreases. If there are favourable conditions, then such a strong yin-yang attraction is enough for two years to reach level of Samadhi and enlightenment. In such a number of cases, seeing favourable conditions that are astonishing produces a strong faith in God and good deeds.

The availability of beauty is not dependent on worldly things, but dependent on good deeds and grace

Many people’s past actions are not good, and they do not even have God’s grace. Such a strong yin-yang attraction is not available to such people. Even if for many people it is available, but if they do not get favourable conditions, that attraction and subsequent mental image cannot stay stable for a long time. In such a situation, Samadhi cannot be achieved. Many people are doing very good things right now. They are virtuous. They keep elderly, old men and gurus happy, and obey their commands. They remain in front of them. They endure all the difficulties and abuses with pleasure. With this, the images of their gurus, old people and family members are settled in their minds. Any favourable image out of them becomes their Kundalini. Many times people who are too fortunate, they get indirectly strengthening their Kundalini through Yin-yang (sexual) attraction.

Kundalini-Yoga is a great relief for people without opportunities

It seems that Kundalini Yoga has been created mainly for the majority of the people who do not get the opportunity to meditate naturally. Many discouraged and pessimistic people also call it “extracting oil from the sand”. Although it is now the truth that there is also oil (petrol) in the sand. At the appropriate time, it becomes very easy, practical and effective by combining it with the sexual yoga of Tantra.

Artificial love

It is also a magical work done to meet the lack of daily love of a certain person through meditation. We can also call it as “synthesis of love”. Yoga is a factory that produces artificial love. This workmanship has influenced me from childhood. It does not have the possibility of collapse like a temporal love, because all the interaction with the object is in the mind only. Only the participation of external senses produces over indulgence.

Beautiful is relative and virtual

If the beauty was absolute, then a beautiful woman would appear equally beautiful to all kinds of people, and the violent animals would become lame in front of her. Similarly, if the beauty was dependent on the physical form, then the Kundalini of the form of aged gurus and black mother (externally ugly and horrific) enriched through yoga would not be considered the most beautiful by corresponding yogi, and that would not be bound most tightly in the mind of the yogi.

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सौंदर्य के आधार के रूप में कुंडलिनी

सुन्दरता क्या है

यह अक्सर कहा जाता है कि सुन्दरता किसी दूसरे में नहीं, अपितु अपने अन्दर होती है। ध्यान योग से यह बात बखूबी सिद्ध हो जाती है। सुन्दर वस्तु को इसलिए सुन्दर कहा जाता है क्योंकि वह हमारे मन में आनंद के साथ लम्बे समय तक दृढ़तापूर्वक बसने की सामर्थ्य रखती है। मन में वैसी आकर्षक व स्थायी छवि को ही कुण्डलिनी भी कहते हैं।

सुन्दर वस्तु के प्रति अनायास ध्यान

लम्बे समय तक मन में बैठी हुई वस्तु की तरफ ध्यान स्वयं ही लगा रहता है। इससे अनादिकाल से लेकर मन में दबे पड़े चित्र-विचित्र विचार व रंग-बिरंगी भावनाएं उमड़ती रहती हैं। उनके प्रति साक्षीभाव व अनासक्ति-भाव स्वयं ही विद्यमान रहता है, क्योंकि मन में बैठी हुई उपरोक्त वस्तु निरंतर अपनी ओर व्यक्ति का ध्यान खींचती रहती है। इससे वे भावनामय विचार क्षीण होते रहते हैं, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति उत्तरोत्तर शून्यता की ओर बढ़ता जाता है। अंततः व्यक्ति पूर्ण शून्यता या आत्मज्ञान को प्राप्त कर लेता है।

सबसे अधिक सुन्दर वस्तु

लौकिक परिपेक्ष्य में एक सर्वगुणसंपन्न स्त्री को एक उसके योग्य व उसके रुचिकर पुरुष के लिए सर्वाधिक सुन्दर माना जाता है। ऐसा इसीलिए है क्योंकि वैसी स्त्री का चित्र वैसे पुरुष के मन में सर्वाधिक मजबूती से बस जाता है। दोनों के बीच में प्रतिदिन के संपर्क से वह चित्र मजबूती प्राप्त करता रहता है। अंततः वह इतना अधिक माजबूत व स्थायी बन जाता है कि वह एक योग-समाधि का रूप ले लेता है। यदि बीच में स्वस्थ आकर्षण में (सच्चे प्यार में) खलल पड़े, तो मानसिक चित्र कमजोर भी पड़ सकता है। ऐसा जरूरत से ज्यादा इंटरेक्शन, शारीरिक सम्बन्ध आदि से हो सकता है। लौकिक व्यवहार में यह नजर भी आता है कि विवाह के बाद परस्पर आकर्षण कम हो जाता है। यदि अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती रहें, तो ऐसे यिन-यांग आकर्षण को समाधि व आत्मज्ञान के स्तर तक पहुँचाने के लिए २ साल काफी हैं। ऐसे ही बहुत सारे मामलों में हैरान कर देने वाली अनुकूल परिस्थितियों को देखकर ईश्वर पर व अच्छे कर्मों पर बरबस ही विश्वास हो जाता है।

सुन्दरता की प्राप्ति सांसारिक वस्तुओं पर नहीं, अपितु अच्छे कर्मों व ईश्वर-कृपा पर निर्भर

कई लोगों के पिछले कर्म अच्छे नहीं होते, और उन पर  ईश्वर की कृपा भी नहीं होती। ऐसे लोगों को ऐसा मजबूत यिन-यांग आकर्षण उपलब्ध ही नहीं होता। कई लोगों को यदि उपलब्ध हो भी जाता है, तो भी अनुकूल परिस्थितियाँ न मिलने के कारण वह लम्बे समय तक स्थिर नहीं रह पाता। ऐसे में समाधि नहीं लग पाती। बहुत से लोग वर्तमान में बहुत अच्छे कर्म कर रहे होते हैं। वे सदाचारी होते हैं। वे बड़ों-बूढ़ों को व गुरुओं को प्रसन्न रखते हैं, एवं उनकी आज्ञा का पालन करते हैं। वे उनके सामने नतमस्तक बने रहते हैं। वे सभी कठिनाईयों व दुर्व्यवहारों को प्रसन्नता के साथ सहते हैं। इससे उनके मन में अपने गुरुओं, वृद्धों व परिवारजनों की छवियाँ बस जाती हैं। उनमें से कोई अनुकूल छवि उनकी कुण्डलिनी बन जाती है। कई बार अप्रत्यक्ष रूप से कुण्डलिनी को पुष्ट करने वाला यिन-यांग आकर्षण भी कई किस्मत वालों को प्राप्त हो जाता है।

अवसरों से रहित लोगों के लिए कुण्डलिनी-योग एक बहुत बड़ी राहत

जिन अधिकाँश व बदकिस्मत लोगों को प्राकृतिक रूप से भरपूर ध्यान का अवसर नहीं मिलता, उन्हीं के लिए कुण्डलिनी योग बनाया गया है, मुख्य रूप से। कई हतोत्साहित व निराशावादी लोग इसे “रेत में से तेल निकालने” की संज्ञा भी देते हैं। यद्यपि यह अब सच्चाई है कि रेत में भी तेल (पैट्रोल) होता है। इसमें उपयुक्त समय पर तंत्र के प्रणय-योग के सम्मिलन से यह बहुत आसान, व्यावहारिक व कारगर बन जाता है।

बनावटी प्यार

किसी विशेष वस्तु से प्रतिदिन  के लौकिक प्यार की कमी को मेडीटेशन से पूरा करना भी एक जादुई कारीगरी ही है। इसे हम “प्रेम का कृत्रिम निर्माण (synthesis of love)” भी कह सकते हैं। योग एक ऐसी फैक्टरी है, जो प्रेम का कृत्रिम उत्पादन करती है। यह कारीगरी मुझे बचपन से लेकर प्रभावित करती आई है। इससे लौकिक प्यार की तरह पतन की भी सम्भावना नहीं होती, क्योंकि वस्तु से सारा इंटरेक्शन मन में ही तो होता है। अति तो इन्द्रियों से ही होती है हमेशा।

सुन्दरता सापेक्ष व आभासिक होती है

यदि सुन्दरता निरपेक्ष होती, तो एक सुन्दर स्त्री सभी प्रकार के लोगों को एकसमान सुन्दर लगा करती, और हिंसक जानवर भी उसके पीछे लट्टू हो जाया करते। इसी तरह, यदि सुन्दरता भौतिक रूप-आकार पर निर्भर होती, तब योग से प्रवृद्ध की गई वृद्ध गुरु व काली माता (बाहरी तौर पर कुरूप व डरावनी) के रूप की कुण्डलिनी सबसे अधिक सुन्दर न लगा करती, और वह योगी के मन में सबसे ज्यादा मजबूती से न बस जाया करती।

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द्वैत और अद्वैत दोनों एक-दूसरे के पूरक के रूप में

द्वैत क्या है?

दुनिया की विविधताओं को सत्य समझ लेना ही द्वैत है। दुनिया में विविधताएं तो हमेशा से हैं, और सदैव रहेंगी भी, परन्तु वे सत्य नहीं हैं। दुनिया में जीने के लिए विविधताओं का सहारा तो लेना ही पड़ता है। फिर भी उनके प्रति आसक्ति नहीं होनी चाहिए।

अद्वैत क्या है?

उपरोक्तानुसार, दुनिया की विविधताओं के प्रति असत्य बुद्धि या अनासक्ति को ही अद्वैत कहते हैं। वास्तव में द्वैताद्वैत को ही संक्षिप्त रूप में द्वैत कहते हैं। अद्वैत अकेला नहीं रह सकता। यह एक खंडन-भाव है। अर्थात यह द्वैत का खंडन करता है। यह खंडन “द्वैत” से पहले लगने वाले “अ” अक्षर से होता है। जब द्वैत ही नहीं रहेगा, तब उसका खंडन कैसे किया जा सकता है? इसलिए जाहिर है कि द्वैत व अद्वैत दोनों साथ-२ रहते हैं। इसीलिए अद्वैत का असली नाम द्वैताद्वैत है।

एक ही व्यक्ति के द्वारा द्वैत व अद्वैत का एकसाथ पालन

ऐसा किया जा सकता है। यद्यपि ऐसा जीवनयापन विरले लोग ही ढंग से कर पाते हैं, क्योंकि इसके लिए बहुत अधिक शारीरिक व मानसिक बल की आवश्यकता पड़ती है। इससे लौकिक कार्यों की गुणवत्ता भी दुष्प्रभावित हो सकती है, यदि सतर्कता के साथ उचित ध्यान न दिया जाए।

द्वैताद्वैत को बनाए रखने के लिए श्रमविभाजन

ऐसा विकसित सभ्यताओं में होता है, व बुद्धिमान लोगों के द्वारा किया जाता हहै। वैदिक सभ्यता भी इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें द्वैतमयी लौकिक कर्मों का  उत्तरदायित्व एक भिन्न श्रेणी के लोगों पर होता है, और अद्वैतमयी धार्मिक क्रियाकलापों  का उत्तरदायित्व एक भिन्न श्रेणी के लोगों पर। वैदिक संस्कृति की जाति-परम्परा  इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें ब्राम्हण श्रेणी के लोग पौरोहित्य (धार्मिक कार्य) का कार्य करते हैं, और अन्य शेष तीन श्रेणियां विभिन्न लौकिक कार्य करती हैं।

द्वैताद्वैत में श्रम-विभाजन के लाभ

इससे व्यक्ति पर कम बोझ पड़ता है। उसे केवल एक ही प्रकार का भाव बना कर रखना पड़ता है। इससे परस्पर विरोधी भावों के बीच में टकराव पैदा नहीं होता। इसलिए कार्य की गुणवत्ता भी बढ़ जाती है। वैसे भी दुनिया में देखने में आता है कि जितना अधिक द्वैत होता है, कार्य उतना ही अच्छा होता है। अद्वैतवादी के अद्वैतभाव का लाभ द्वैतवादी को मिलता रहता है, और द्वैतवादी के द्वैतभाव का लाभ अद्वैतवादी को मिलता रहता है।  यह ऐसे ही होता है, जैसे एक लंगड़ा और एक अंधा एक-दूसरे की सहायता करते हैं। यद्यपि इसमें पूरी सफलता के लिए दोनों प्रकार के वर्गों के बीच में घनिष्ठ व प्रेमपूर्ण सम्बन्ध बने रहने चाहिए।

गुरु-शिष्य का परस्पर सम्ब्बंध भी ऐसा ही द्वैताद्वैत-सम्बन्ध है

प्रेमयोगी वज्र को भी इसी श्रमविभाजन का लाभ मिला था। उसके गुरू (वही वृद्धाध्यात्मिक पुरुष) एक सच्चे ब्राम्हण-पुरोहित थे। प्रेमयोगी वज्र स्वयं  एक अति  भौतिकवादी व्यक्ति तथा। दोनों के बीच में लम्बे समय तक नजदीकी व प्रेमपूर्ण  सम्बन्ध बने रहे। इससे प्रेमयोगी वज्र का द्वैत उसके गुरु को प्राप्त हो गया, और गुरु  का अद्वैत उसको प्राप्त हो गया। इससे दोनों का द्वैताद्वैत अनायास ही  सिद्ध हो गया, और दोनों मुक्त हो गए। इसके फलस्वरूप प्रेमयोगी वज्र को क्षणिक आत्मज्ञान के साथ क्षणिक कुण्डलिनीजागरण की उपलब्धि भी अनायास ही हो गई। साथ में, उसकी कुण्डलिनी तो उसके पूरे जीवन भर क्रियाशील बनी रही।

यही द्वैताद्वैत समभाव ही सर्वधर्म समभाव है

कोई धर्म द्वैतप्रधान होता है, तो कोई धर्म अद्वैतप्रधान होता है। इसीलिए दोनों प्रकार के धर्मों के बीच में मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बने रहने चाहिए। इससे दोनों एक-दूसरे को शक्ति प्रदान करते रहते हैं। इससे वास्तविक द्वैताद्वैत भाव पुष्ट होता है। विरोधी भावों के बीच में परस्पर समन्वय ही वैदिक संस्कृति की सफलता के पीछे एक प्रमुख कारण था। शरीरविज्ञान दर्शन में इसका विस्तार के साथ वर्णन है।

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Duality and non-duality as complementary to each other

What is duality/dvaita?

Understanding the diversity of the world as true is duality. Diversity in the world is always there, and will remain forever, but this is not true. To live in the world, there is a need to resort to variations. Yet one should not have an attachment towards them.

What is non-duality/Advaita?

According to the aforementioned, detachment towards the diversity of the world is called Advaita. In this, diversity is welcome half heartedly, and is not considered as true. Indeed, Dvaitadvaita is called Dvaita in short form. Advaita cannot be living alone. This is a negation. That is, it denies duality. This rebuttal occurs from the letter “A” before “Dvaita.” When the duality is not there, then how can it be denied? Therefore, it is evident that both Dvaita and Advaita live together. That is why Dvaitadvaita is the real name of Advaita.

Dvaita and Advaita to be followed by the same person

This can be done. However, rare people are able to adopt this lifestyle, because it requires a lot of physical and mental strength. This can also affect the quality of the temporal work, especially if not given proper attention with caution.

Division of labour to Maintain Dvaitadvaita

It happens in developed civilizations, and is done by intelligent people. Vedic civilization is also a good example of it. In it, the liability of dualistic cosmic deeds is done to people of a different category, and responsibilities of subliminal religious activities are given to people of a different category. There is a good example in the form of the caste tradition of Vedic culture. In this, people of Brahmin class perform priesthood (religious work), and the other three categories perform various temporal works.

Benefits of division of labour in Dvaitadvaita

It produces a low burden on a person. He has to keep only one type of sentiment. This does not create conflicts between conflicting expressions or sentiments. Therefore, the quality of work also increases. Anyway, in the world it is seen that the more duality is, the better the work is. Advantages of the Dvaita of dualist are received by his accompanying non-dualist man, and the benefits of non-dualistic sentiment of priest are received by the dualist man accompanying him itself. It is like this, if a lame and a blind man help each other. Although there must be close and loving relationships between the two types of classes for full success with it.

The relationship between a disciple and his Guru is similar to Dvaitadvaita-relationship

Premyogi Vajra also got the benefit of this division of labour. His guru (the same old spiritual man) was a true Brahmin-priest. Premyogi Vajra himself was a very materialist. There was a close, loving, and Tantric relationship between the two for a long time. From this, Duality of Premyogi Vajra was got by his Guru, and he received the Advaita of his Guru. Due to this Dvaitadvaita was strengthened inside both of them unintended, and both became free. Because of this, the spontaneous achievement of transient KundaliniJagran by Premyogi vajra along with momentary enlightenment was there. This caused spiritual liberation of both of them itself. Together, Kundalini remained active throughout the life of Premyogi vajra.

This Dvaitadvaita coordination is the religious harmony

If one religion is dualistic, then another religion is non-dualistic. That is why there should be friendly relations between the two types of religions. This gives strength to each other. This proves the actual non-duality (dvaitadvait) of spirituality. The mutual co-ordination between opposing sentiments was the main reason behind the success of Vedic culture.

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प्राचीन मिस्र की आध्यात्मिक यौनता एवं भारतीय तंत्र के बीच में समानता

अन्खिंग क्या है और कैसे किया जाता है?

अन्खिंग में पूर्णता से थोड़ा कम (90%) सांस भर कर शक्ति को यौनचक्रों से पीठ वाले अनाहत चक्र (उनके अनुसार पांचवां चक्र) तक चढ़ाया जाता है, और वहां से 90 डिग्री के कोण पर पीछे की ओर खुले में मोड़ दिया जाता है। वह फिर स्वयं ही आँख के लूप से होते हुए सबसे ऊपर वाले आठवें चक्र (सिर से एक हाथ लम्बाई ऊपर) पर पहुँच जाती है। वह चक्र वर्टिकल बोडी लाइन से 90 डिग्री के कोण पर स्थित है। वहां से वह आँख-लूप के अगले भाग से नीचे उतर कर अनाहत चक्र (आगे का) पर पुनः स्थापित हो जाती है। फिर बाकि का बचा हुआ 10% सांस भी अन्दर भर लिया जाता है। धीरे-2 सांस छोड़ते हुए ध्यान किया जाता है कि वह शक्ति उस आँख-चेनल में घूम रही है। फिर गहरी साँसें लेते जाएं, जब तक कि पूरे शरीर में रिलैक्सेशन महसूस न हो जाए। फिर अपनी साँसें नार्मल कर लें। ध्यान करो कि यह शक्ति पूरे शरीर में रिसती हुई, उसकी सभी कोशिकाओं को पुष्ट करती हुई, उसके बाहर भी चारों ओर फैल रही है। फिर पूरी तरह से रिलैक्स हो जाओ, या सो जाओ।

अन्खिंग के रेखा-चित्र व लूप का मनोवैज्ञानिक रहस्य

अन्खिंग प्रक्रिया में शक्ति हृदय के ऊपर के शरीर के हिस्से को स्पर्श नहीं करती। वह चारों और बाहर-2 से ही लूप बना कर पुनः हृदय चक्र पर पहुँच जाती है। इसीलिए शक्ति-मार्ग को दर्शाने वाले रेखा-चित्र में रीढ़ की हड्डी को छूती हुई सीधी रेखा केवल यौनचक्र (मूलाधार) से हृदय चक्र तक ही दिखाई गई है, उसके ऊपर नहीं। उसके ऊपर उपरोक्त अन्खिंग-लूप जुड़ा है। हृदय चक्र पर एक सीधी रेखा आगे से पीछे जाते हुए एक क्रोस बनाती है। इस डिजाइन का यह मतलब है कि मूलाधार चक्र व नाभि चक्र के आगे वाले भाग से होते हुए कुण्डलिनी को ऊपर चढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि वे लचीले भाग में होते हैं, और योग-बंधों के कारण अन्दर की तरफ पिचक कर मेरुदंड वाले चक्र-भागों से जुड़कर एक हो जाते हैं। इससे आगे वाले चक्रों की शक्ति स्वयं ही पीछे वाले चक्रों को मिल जाती है। हृदय चक्र पर इसलिए आगे-पीछे गुजरने वाली रेखा है, क्योंकि आगे वाला चक्र पिचक कर पीछे वाले चक्र से नहीं जुड़ता है। देखा भी जाता है कि छाती का क्षेत्र विस्तृत है, और ज्यादा अन्दर-बाहर भी नहीं होता।

अन्खिंग का वैज्ञानिक स्पष्टीकरण

शक्ति मनोवैज्ञानिक दबाव से ही अनाहत चक्र से 90 डिग्री के कोण पर पीछे की ओर बाहर निकलती है। ऐसा सोचा जाता है, तभी ऐसा होता है। आठवें चक्र तक भी वह मनोवैज्ञानिक दबाव से ही आँख (अन्खिंग-लूप) से होते हुए ऊपर चढ़ती है। एक प्रकार से शक्ति बीच के चक्रों को बाईपास करते हुए, सीधे ही आठवें चक्र तक पहुँच जाती है। वहां से नीचे भी यह इसी तरह के दबाव के अभ्यास से आती है। इसमें शरीर की बनावट से मेल खाता हुआ रेखा-चित्र भी मानसिक चिंतन के दबाव की सहायता करता है।

अन्खिंग व सैक्सुअल कुण्डलिनीयोग के बीच में समानता

कुण्डलिनीयोग में शक्ति को कुण्डलिनी कहा जाता है। यह अधिकाँश मामलों में गुरु या देवता का मानसिक चित्र ही होता है। इस योग में यौनशक्ति से कुण्डलिनी को विभिन्न चक्रों पर पुष्ट किया जाता है, विशेषकर मस्तिष्क में। पुष्टता को प्राप्त कुण्डलिनी फिर लम्बे समय तक अनुभवदृष्टि में बनी रहकर तन-मन को शुद्ध करती रहती है। अन्खिंग में भी ऐसा ही होता है। यद्यपि उसमें शक्ति को हृदय क्षेत्र में ही केन्द्रित माना गया है। थोड़े समय के लिए आठवें चक्र पर भी रुकती है। बीच वाले रस्ते व लूप में तो केवल उसकी सूक्ष्म चाल ही होती है। वास्तव में हृदय में सबसे प्रिय वस्तु ही बसी होती है। यह वस्तु एक ही होती है। दो से तो प्रेम ही नहीं होता। हृदय ही प्रेम का स्थान है। इस तरह से, अन्खिंग की तथाकथित शक्ति स्वयं ही कुण्डलिनी-रूप सिद्ध हो गई। प्राचीन मिस्र की मान्यता के अनुसार, साधारण यौनसम्बन्ध के दौरान यौन-उन्माद/स्खलन की शक्ति या तो नीचे गिर कर भूमिगत हो जाती है, या मस्तिष्क के विभिन्न विचारों के रूप में प्रस्फुटित होती है। दोनों ही मामलों में यह नष्ट हो जाती है। परन्तु यदि मस्तिष्क का विचार एकमात्र कुण्डलिनी के रूप में हो, तब वह यौनशक्ति नष्ट नहीं होती। ऐसा इसलिए है, क्योंकि कुण्डलिनी का ध्यान प्रतिदिन किया जाता है, अन्य विचारों का नहीं। इसलिए यौनशक्ति से निर्मित, कुण्डलिनी की प्रचंडता लम्बे समय तक बनी रहती है। क्योंकि अन्य विचार कभी-कभार ही दोबारा पैदा होते हैं, इसलिए उनकी प्रचंडता तब तक गिर चुकी होती है। साथ में, यौनशक्ति सभी विचारों में बंट कर बहुत छोटी रह जाती है, जबकि वह कुण्डलिनीयोग से एक ही कुण्डलिनी को मिलती है, जिससे पूरी बनी रहती है। अतः सिद्ध होता है कि प्राचीन मिस्र की तथाकथित शक्ति कुण्डलिनी ही है, और अन्खिंग भी कुण्डलिनीयोग से भिन्न नहीं है। एक प्रकार से हम कुण्डलिनीयोग को अन्खिंग तकनीक का सरल व वैज्ञानिक रूपांतर भी कह सकते हैं।

प्राचीन तंत्र में यौनोन्माद (बिंदुपात) पूर्णतया वर्जित नहीं है, अपितु उस पर आत्मनियंत्रण न होना ही वर्जित है

प्रेमयोगी वज्र के अनुसार, यदि ओर्गैस्मिक शिखर/वीर्यपात के समय मूलबबंध व उड्डीयान बंध को मजबूती से व लम्बे समय तक बना कर रखा जाता है, तब पूरी यौनशक्ति मस्तिष्क-स्थित कुण्डलिनी को मिलती है। उससे ऐसा लगता है कि यौन-चक्र व मस्तिष्क-चक्र मिलकर एक हो गए हैं, और दोनों पर कुण्डलिनी एकसाथ चमक रही है। इससे वीर्य का क्षरण भी बहुत कम होता है, जबकि आनंद बहुत अधिक प्राप्त होता है। यदि केवल उड्डीयान बंध ही लगाया जाए, तो यह सकारात्मक प्रभाव बहुत कम हो जाता है।

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Sex, and specifically the orgasm, is more that just something that feels good and allows procreation. There are many other functions, such as the release of dysfunctional energy within the body, which can help to keep one from becoming diseased. There is the function that opens the higher chakras, and under the right conditions allows a person to begin the process of enlightenment. And further, if two people, lovers, practice sacred sex, the entire experience can lead them together into higher consciousness and into worlds beyond this plane——

Ancient Egyptian Sexual Ankhing 

The ancient egyptians believed that orgasm is more than just something that feels good and allows procreation…

This Ancient Egyptian Sex Technique May Be the Secret to Eternal Life

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Similarity between ancient Egyptian spiritual sexuality and Indian Tantra

What is Ankhing and how is it done?

In the Ankhing, by filling up a little less of full breath (90%) and holding it, the energy is lifted to the anahata chakra (fifth chakra according to it) of backbone, and from there it is turned backwards at an angle of 90 degrees in the open. it then goes up through the loop of ankh itself, reaching the eighth chakra (one hand length above head). That chakra is located at a 90-degree angle from the vertical bodyline. From there, energy gets down from the front part of the ankh-loop and re-establishes on the Anahata Chakra (front side). Then the rest of the remaining 10% of the breath is also filled in. leaving the breath slowly, it is meditated that the energy is revolving in that ankh channel. Then take deep breaths, until the relaxation is felt throughout the body. Then make your breath natural. Meditate in mind that this energy rises throughout the body, spreading all around, reinforcing all its cells, even spreading outside of it. Then completely relax, or sleep.

Psychological secrets of Ankhing’s line drawing and loop

The energy does not touch the body part above the heart in the ankhing process. It makes a loop all around the body, outside of it, and reaches the heart chakra again. That is why the line-drawing showing the path of energy in a straight line touching the spinal cord has been shown only from the sexual chakra (Muladhara) to the heart chakra, not above it. Above of it is the ankhing-loop connected. A straight line going back and forth on the heart chakra makes a cross. This design means that there is no need to lift the Kundalini going through the front component of the Mooladhar Chakra and the navel chakra, because they are in the flexible part, and due to the yoga locks/bandhas, they collapse inside and become one with the rear components of these chakras in the spinal cord. The energy of the chakras ahead of it gets itself behind the chakras. Therefore, there is a line going back and forth on the heart chakra, because the front chakra does not connect to the back chakra fully. It is also seen that the area of ​​chest is elaborate, less flexible and does not move too much in and out.

Scientific explanation of Ankhing

Energy comes out from the rear Anahata Chakra at the 90-degree angle due to the psychological pressure. Means, it is thought this way, and then only it happens. Even it climbs through the ankh (ankhing-loop) up to the eighth chakra due to same psychological pressure/will. In a way bypassing the in-between chakras, shakti/energy straightway reaches the eighth chakra. Even it comes downward with similar will-pressure. In this, the drawing of the ankhing corresponding to the texture of the body also helps in building up the pressure of mental contemplation.

Equality between the Ankhing and Sexual Kundalini yoga

In Kundalini Yoga, energy is called Kundalini. This is the mental picture of the master or God in most cases. In this yoga, the Kundalini is affirmed by sexual energy in various chakras, especially in the brain. The Kundalini, after attaining strength, continues to be experienced and so it purifies the mind and body for long period. The same happens in Ankhing. Although here energy is considered to be centered only in the heart area. For some time it also stays at the eighth chakra. In the in-between track and the loop, there is only a subtle movement of it. Actually, the most lovable thing is settled in the heart. This object is single and one. There is no love with two. The heart is the place of love. In this way, the so-called energy of Ankhing proved itself as a Kundalini. According to the belief in ancient Egypt, during sexual intercourse, the energy of sexual orgasm / ejaculation either falls down to underground, or is blurred in the form of various thoughts of the brain. In both cases, it is destroyed. However, if the brain is thinking about the sole kundalini, then sexual energy is not destroyed. That is because Kundalini’s meditation is done daily, not of other thoughts. Therefore, the sharpness of the Kundalini, which is made of sexual energy, persists for a long time. Because other thoughts are rarely born again, so their tremendous sharpness has almost collapsed. Together, sexual energy produces very small effect by dividing itself into all the thoughts, whereas in kundalini yoga, whole of the sexual energy is received by the sole Kundalini, which keeps it completely sharpened. Therefore, it is proved that the so-called energy of ancient Egypt is only the Kundalini, and Ankhing is not different from sexual Kundalini yoga. In a way, we can also call Kundalini Yoga as simple and scientific variation of the ankhing technique.

In ancient Tantra, reaching peak of orgasm is not entirely taboo, but it is forbidden not to have self control over it

As per Premyogi vajra, if the root lock and uddeyaan (flying) lock are kept firmly applied and for a long time at the time of the orgasm / ejaculation, then the entire sexual energy is attached to the brain-based kundalini. At that time, it seems that the sexual chakra and the brain-chakra have joined together, and the Kundalini is shining together on both. It also reduces the erosion of semen, while enjoyment is too much. If only flying lock is applied, then this positive effect is greatly reduced.

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Sex, and specifically the orgasm, is more that just something that feels good and allows procreation. There are many other functions, such as the release of dysfunctional energy within the body, which can help to keep one from becoming diseased. There is the function that opens the higher chakras, and under the right conditions allows a person to begin the process of enlightenment. And further, if two people, lovers, practice sacred sex, the entire experience can lead them together into higher consciousness and into worlds beyond this plane——

Ancient Egyptian Sexual Ankhing 

The ancient egyptians believed that orgasm is more than just something that feels good and allows procreation…

This Ancient Egyptian Sex Technique May Be the Secret to Eternal Life

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A basic revelation about Guru

Who is Guru?

Guru is a great personality, on whom one has faith, who is loved, and who seems to one to be much more important than himself. The Sanskrit word “guru” means very heavy or big.

Can a lover take the form of a Guru?

Largely, a lover can take the form of a Guru, although in most cases, he cannot become Guru completely. By the way, some exceptions are found everywhere. In most of the cases, respect for the lover is less and his importance is also less. Due to this, the picture of the lover does not sit well in his mind. It is necessary to have both respect and feeling of importance along with love for a Guru. That is why the guru is mostly close to old age. From this, they are knowledgeable, meditative, respected, and yogic. They are spiritual, ritualistic, and priests of deities. They are supposed to live a simple and satvik (pure) life. They are free, softly speaking, balanced, non-violent, and non-fanatic. All the virtues are inhabited in their mind-temple. They are devoid of the defects of the mind, are unattached and non-dual. Due to the above affection and importance for the Guru, his external form full of pastime (leela) settles in the heart of the disciple, and remains for a long time.

Divine qualities are essential in guru

It is so because kundalini itself is divine and tends to produce divine qualities. Therefore, divinity of Guru helps better in strengthening of the kundalini in one’s mind. In addition, divinity attracts God’s grace too. It is so because God also is full of divinity. God’s grace is also an important factor in kundalini growth.

Guru and romantic lover as complementary to each other

Coalition of guru and romantic-lover is an integral and fundamental part of tantra. According to tantra, relationship or connection between the guru and the lover / girlfriend should be maintained in any way. Many spiritual aspirants keep strong relationship (mental or physical or both) with lover and also with the Guru at the same time. This also causes union of images of lover and Guru both together in the mind of aspirants. From that, the respectful affection towards the Guru is transferred over the lover, and the love for the lover is transferred to Guru as pure love. It is like this, if a blind and a lame help each other. Usually, due to the old age of the Guru, love for him is not strong enough to attract them as much as that is there for a romantic loving partner. Similarly, there is not much respect for a sexually based lover, as opposed to an elderly Guru. The reason for this is that mostly this type of gender based lover is materialistic, low-aged, less experienced, less qualified, less yogic, having low-quality, having flaws of mind and dualistic.

The creation and development of two kundalinis together

With the constant contact of the Guru and lover, Kundalini (clear and permanent mental picture) made of pastime forms of both grow together. They both give strength to each other. In the physical atmosphere, the kundalini of lover, and in the spiritual atmosphere, the Kundalini of the Guru develops more. According to favourable conditions, any of the two Kundalinis can be awakened first. Most of the time, the Kundalini of the form of a Guru is awakened, the kundalini of lover becomes its assistant. This is because full mental union is possible only with the guru. Physical stimuli and excitement associated with romantic lover becomes obstacle in the way of his/her form being unified with her/his lover (Kundalini awakening). This is exactly what happened with Premyogi Vajra, who is the protagonist of this website.

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