कुण्डलिनी-ध्यान का मनोविज्ञान

मस्तिष्क में कुण्डलिनी का ध्यान

सीधे तौर पर हम मस्तिष्क में कुण्डलिनी के ऊपर ज्यादा देर तक गहरा ध्यान नहीं लगा सकते। ऐसा करने से मस्तिष्क में दबाव बढ़ जाता है, जिससे बेचैनी पैदा होती है, और चक्कर भी आ सकता है। मस्तिष्क के दबाव में होने से रोजमर्रा के काम-काज दुष्प्रभावित होने लगते हैं। याददाश्त घट सी जाती है। सांसारिक कार्यों में मन नहीं लगता। मन व शरीर में थकान जैसी रहती है। सिर घूमता हुआ जैसा महसूस होता है। अनभ्यस्त होने पर इससे मस्तिष्क को हानि पहुँचने का डर भी बना रहता है, जिससे अल्जाईमर जैसे मस्तिष्क के रोग भी पैदा हो सकते हैं।

निचले चक्रों पर कुण्डलिनी का ध्यान

उपरोक्त समस्या का हल चक्र-साधना से किया गया है। इसमें कुण्डलिनी का ध्यान शरीर के निचले चक्रों पर किया जाता है। चक्रों पर ध्यान की मात्रा ऊपर की तरफ बढ़ती रहती है। इसीलिए तो कुण्डलिनी-योगी मूलाधार से प्रारम्भ करते हैं, ताकि धीरे-२ अभ्यस्त हो सकें।

वैदिक संस्कृति में कुण्डलिनी का ध्यान प्रकृति के अन्दर किया जाता था

प्राचीन वैदिक युग में जन-जीवन बहुत अस्त-व्यस्त होता था। बहुत सी समस्याएँ होती थीं। उससे आदमी बहिर्मुखी व भौतिकवादी होता था। कोई मशीनें नहीं होती थीं। सभी काम हाथों से करने पड़ते थे। जंगली जानवरों का आतंक होता था। वैसी परिस्थिति में आम जन-मानस के लिए गहरा ध्यान करना संभव नहीं था। इसीलिए उन्होंने प्रकृति की पूजा करना प्रारम्भ किया, तथा कुण्डलिनी का ध्यान प्राकृतिक पदार्थों के भीतर किया। सूर्यदेव, वायुदेव, अग्निदेव आदि के रूप में इसके बहुत से उदाहरण हैं। उस प्रणाली में कुण्डलिनी मस्तिष्क से सर्वाधिक दूरी पर स्थित होती थी, जिससे उसका ध्यान बहुत सरल होता था। प्रकृति के बीच में पल-बढ़ रहे मनुष्य को उसका लाभ भी अनायास ही मिलता रहता था।

मूर्ति-परम्परा ने ध्यान को और अधिक बढ़ाने में मदद की

धीरे-२ मनुष्य विकसित होता गया, जिससे उसके लिए बहुत सा अतिरिक्त समय उपलब्ध हो गया। उससे मूर्तिवाद का जन्म हुआ। अब मनुष्य प्रकृति से दूर रहकर, एकांत में भी ध्यान लगा सकता था। मूर्ति-ध्यान के स्थान मंदिरों के रूप में उभर आए। देवमूर्ति के ऊपर ध्यान अधिक लगता था, क्योंकि वह मस्तिष्क के अधिक निकट होती थी, और उसकी बनावट मनुष्य की तरह होती थी।

कुण्डलिनीयोग की शुरुआत से ध्यान को पंख लग गए

कालान्तर में मनुष्य ने इतना अधिक विकास कर लिया था कि उसके द्वारा जुटाए गए अतिरिक्त अन्न से व अतिरिक्त संसाधनों से उसके भण्डार भर गए थे। इससे वह लम्बे समय तक गहन ध्यान-साधना कर सकता था। इसलिए कुण्डलिनी-योग की खोज हुई। उसमें शरीर के विभिन्न भागों/चक्रों पर कुण्डलिनी का ध्यान करना होता था। कुण्डलिनी की मस्तिष्क से दूरी बहुत अधिक घट गई थी, और कुण्डलिनी व्यक्ति के अपने ही शरीर में पहुँच गई थी। इससे ध्यान को असीमित ऊँचाई मिली, जो सहस्रार चक्र में अपने चरम पर पहुँच गई, कुण्डलिनी-जागरण के रूप में।

ध्यान सदैव मस्तिष्क में ही लगता है

चाहे कहीं भी कुण्डलिनी का ध्यान कर लो, वह होता तो मस्तिष्क में ही है, क्योंकि मस्तिष्क ही सभी अनुभवों का स्थान है। यह अलग बात है कि कुण्डलिनी मस्तिष्क/सहस्रार के जितनी नजदीक होती है, उस पर ध्यान उतना ही मजबूत लगता है।

आज के युग में हर प्रकार के व्यक्ति के लिए उपयुक्त साधना-पद्धति मौजूद है

आज विविधताओं वाला युग है। कई लोग बहुत व्यस्त हैं। उनके लिए वैदिक संस्कृति वाला कुण्डलिनी-ध्यान (कर्मयोग) उपलब्ध है। जिनके पास थोड़ा अतिरिक्त समय है, उनके लिए देव-मूर्तियों पर ध्यान लगाने के लिए बहुत से मंदिर मौजूद हैं। जिनके पास सर्वाधिक अतिरिक्त समय है, उनके लिए पूर्ण विकसित कुण्डलिनी योग भी उपलब्ध है।

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demystifyingkundalini by Premyogi vajra- प्रेमयोगी वज्र-कृत कुण्डलिनी-रहस्योद्घाटन

I am as natural as air and water. I take in hand whatever is there to work hard and make a merry. I am fond of Yoga, Tantra, Music and Cinema. मैं हवा और पानी की तरह प्राकृतिक हूं। मैं कड़ी मेहनत करने और रंगरलियाँ मनाने के लिए जो कुछ भी काम देखता हूँ, उसे हाथ में ले लेता हूं। मुझे योग, तंत्र, संगीत और सिनेमा का शौक है।

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