दोस्तो, पिछली पोस्ट में बात हो रही थी कि डार्क एनर्जी मुक्त होने के लिए बाहर भागती है, और डार्क मैटर बंधन में पड़ने के लिए अंदर को सिमटता है। इसलिए योग करना चाहिए ताकि डार्क एनर्जी का अंश मन में ज्यादा बना रहे, और आदमी की मुक्ति की संभावना ज्यादा बनी रहे, अंधेरे को पूरी तरह से तो खत्म नहीं किया जा सकता। साथ में कुल मिलाकर यह निष्कर्ष भी निकलता है कि ब्रह्मांड के अनगिनत ब्लैकहोल धरती के अनगिनत जीवों की तरह हैं। जैसे हरेक जीव के अंदर एक भरापूरा सूक्ष्म ब्रह्मांड है, उसी तरह हरेक ब्लैकहोल के अंदर एक भरापूरा स्थूल ब्रह्मांड है। इस तरह एक ही अनंत आकाश में अनगिनत ब्रह्मांड हैं। जैसे विभिन्न जीवों के मस्तिष्क के भीतर अलग अलग आकार व प्रकार के सूक्ष्म ब्रह्मांड हैं, इसी तरह अलग अलग ब्लैकहोलों के अंदर अलग अलग आकार व प्रकार के स्थूल अर्थात भौतिक ब्रह्मांड हैं।
ब्लैकहोल अपने अंधेरे से ऊब कर बाहर के चमकीले पिंडों को खाने लगता है, ताकि उसके अंदर की चमक बढ़ सके। पर क्षणिक चमक के बाद वह पिंड उसके अंधेरे में प्रविष्ट होकर उस अंधेरे को बढ़ाते ही हैं। कभी लंबे समय तक ब्लैकहोल को कुछ खाने को न मिले, तो वह सूक्ष्मरूप हॉकिंस रेडिएशनस को धीरे धीरे छोड़ते हुए मूल आकाश में विलीन होकर मुक्त भी हो जाता है।
जीव या आदमी भी तो इसी तरह का व्यवहार करता है। वह अपने मन के अंधेरे को कम करने के लिए विभिन्न इंद्रियों के माध्यम से बाहर की दुनिया को ग्रहण करता है। आंखों से दृष्य रूप में, कानों से श्रव्य रूप में, जीभ से स्वाद रूप में, व जननेन्द्रिय से संभोग रूप में दुनिया को ग्रहण करता है। थोड़ी देर तो उसे आनंद के साथ प्रकाश महसूस होता है, पर वह दुनिया भी उसके अंतर्मन के घनघोर अंधेरे में विलीन होकर उसे बढ़ाने का ही काम करती है। शास्त्रों में भी तो यही बारबार कहा गया है कि आदमी जितना भी प्रयास भौतिक सुख प्राप्त करने के लिए करता है, वह उतना ही दुखी होता जाता है। फिर कभी वह दुनियादारी की मोहमाया से बचकर योगाभ्यास करता है। इससे उसके मन का कचरा बाहर निकलता रहता है, जिससे वह कभी काफी साफ होकर मुक्त भी हो ही जाता है।
हो सकता है कि हमारा ब्रह्मांड किसी दूसरे बहुत बड़े ब्रह्मांड के अंदर बहुत बड़े ब्लैकहोल के अंदर बना हो। हमारे ब्रह्मांड में भी जितने ब्लैकहोल हैं, उनमें भी उनके अपने आकार और निगले गए पदार्थों के अनुरूप अलग अलग आकार प्रकार के ब्रह्मांड हैं ही। उनके अंदर भी जो ब्लैकहोल हैं, उनमें भी अलग ब्रह्मांड हैं। इस तरह यह परंपरा बहुत सूक्ष्म आकार के ब्लैकहोल और सूक्ष्म ब्रह्मांड तक जा सकती है, या हो सकता है कि यह परंपरा कहीं खत्म ही न होती हो। पर ब्लैकहोल बनने के लिए तारे का निश्चित द्रव्यमान होना चाहिए। हो सकता है कि दूसरे ब्रह्मांड में वह सीमा और हो या छोटी हो। हमारे ब्रह्मांड की सीमा ब्लैकहोल की बाउंड्री है, इसके बाहर हम नहीं देख सकते क्योंकि उसके बाहर से जो प्रकाश की किरण आती है वह फ्रीली नहीं आती बल्कि ब्लैकहोल की ग्रेविटी के आकर्षण से आती है, इसलिए वह ऐसी अदृश्य तरंग के रूप मे हो सकती है जिसे अभी तक देखा न गया हो। या वह तरंग के रूप में न होकर इंडिविजुअल व वर्चुअल फोटोन कणों के रूप में हो। सबसे बड़ी वजह तो दूरी की लगती है। ब्रह्मांड की सीमा बहुत दूर है। वहां से हम तक आतेआते प्रकाश किरण इतनी क्षीण हो जाती होगी कि पकड़ में ही न आए। इसके विपरीत, ऐसा लगता है कि हम न तो ब्लैकहोल से बाहर जा सकते हैं और न ही इसके बाहर से कुछ प्राप्त कर सकते हैं, क्योंकि यह पहले से ही अनंत आकाश है और अनंत का कभी अंत नहीं होता है। इससे ऐसा भी लगता है कि ब्रह्मांड में पदार्थों की मात्रा सीमित व निर्धारित है। वही बारंबार चक्रवत प्रकट व अप्रकट होती रहती है। ऐसा भी हो सकता है कि जब ब्लैकहोल में ब्रह्मांड बनने लग जाए, तब वह अपनी ग्रेविटी छोड़ देता हो या कम कर देता हो, क्योंकि तब उसमें बिगबैंग से ब्रह्मांड बाहर की तरफ़ फैल रहा होता है। ग्रेविटी वैसी ही रहे, तब भी उसका प्रभाव नहीं दिखेगा, क्योंकि बिगबैंग का धक्का भी बाहर की तरफ लग रहा होगा। यह शायद तब होगा जब ब्लैक होल का डार्क मैटर डार्क एनर्जी में रूपांतरित हो जाएगा। यही डार्क एनर्जी बिगबैंग के बाद सभी पदार्थों और पिंडों को एकदूसरे से दूर धकेलती रहती है, जिससे ब्रह्मांड गुब्बारे की तरफ फूलता रहता है। आदमी में भी तो ऐसा ही घटित होता है। जब वह दुनियादारी से थक जाता है, तो सारी दुनिया को अपने मन के अंधेरे में समेट लेता है। कुछ समय के लिए वैसा ही रहता है। फिर किसी कारणवश योग की तरफ मुड़ता है। योग से उसके मन का अंधेरा कम हो जाता है, या हल्का पड़ जाता है। उसे मन में खाली खाली सा महसूस होता है। उससे प्रेरित होकर वह फिर से अपने मन की दुनिया को बढ़ाने में लग जाता है। ब्लैकहोल से शायद हॉकिंस रेडिएशन बाहर निकलने से या अन्य किसी निकासी से उसका डार्क मैटर हल्का होकर डार्क एनर्जी में बदल जाता है। फिर उसके अंदर बिगबैंग और ब्रह्मांड का विस्तार शुरु हो जाता है।
आदमी ब्लैकहोल से बहुत ज्यादा समानता रखता है। जो आदमी जितनी ज्यादा सूचनाओं से भरा होता है, उससे उसके मरने के बाद उतना ही बड़ा ब्लैकहोल बनता है। उससे फिर वे सूचनाएं प्रकट हो जाती हैं उसके पुनर्जन्म के रूप में। मुझे लगता है कि मरने के बाद उसके पुराने जीवन को समेट कर रखने वाला डार्क मैटर कुछ समय वैसा ही रहता है। फिर समय की चाल से वह डार्क एनर्जी में तब्दील हो जाता है। वह उसकी मानसिक दुनिया को बढ़ाना चाहती है, पर उसके लिए पहले किसी जीव के शरीर में जन्म लेना जरूरी होता है। इसे नए सूक्ष्म ब्रह्मांड का निर्माण कह सकते हैं। आगे जाकर वह किसी अन्य मनुष्य जीवन का निर्माण भी करता है, किसीको रोजगार देकर, या किसीको शिक्षा देकर। कोई अपने पुत्र के रूप में नए मनुष्य का निमार्ण करता है। मतलब वह आगे भी ब्लैकहोल बनाता है, कोई आदमी कम संख्या में बनाता है, तो कोई ज्यादा। वह पुत्र ब्लैकहोल सूचना के मामले में उससे छोटा ही कहा जाएगा। एक प्रकार से एक सूक्ष्म ब्रह्मांड अपने अंदर के ब्लैकहोल से पुत्र या अन्य आश्रित के रूप में एक नया ब्लैकहोल पैदा करता है। वह भी फिर उस परंपरा को आगे बढ़ाता है। मन में जो सूचनाएं दबी पड़ी हैं, वही ब्लैकहोल है। मतलब अवचेतन मन ही ब्लैकहोल है। वह कभी नहीं रजता। वह ब्लैकहोल की तरह सभी सूचनाओं को खाता रहता है। उसमें आदमी के अनगिनत जन्मों से लेकर अनगिनत सूचनाएं दबी होती हैं। और कहें तो ब्लैकहोल भी बिल्कुल स्थिर नहीं हैं, बल्कि अन्य आकाशीय पिंडों की तरह अंतरिक्ष में चलायमान प्रतीत होते हैं। मतलब उनके चलने से उनके अंदर समाया अनंत अंतरिक्ष भी चलता रहता है। पर इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि जब जीव चलते हैं, उस समय भी तो उनके अंदर समाया हुआ अनंत अंतरिक्ष चल रहा होता है।