दोस्तो, शिवपुराण में अंधक नामक एक दैत्य की कथा आती है। कहते हैं कि उस देवशत्रु दैत्य ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया था। वह समुद्र में गर्त का आश्रय लेकर रहता था। वह अत्यंत पराक्रमशाली दैत्य उस गर्त से निकलकर प्रजाओं को पीड़ित करने के पश्चात पुनः उसी गड्ढे में प्रवेश कर जाता था। तब दुखी होकर सभी देवताओं ने बारंबार शिव की प्रार्थना करते हुए उनसे अपना सारा दुख निवेदन किया। इस पर शिव ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा कि वे उसे मारेंगे और उनसे कहा कि वे अपनी सेना के साथ वहां जाएं, वे खुद भी गणों के साथ वहां आ रहे हैं। तब उस गर्त से देवताओं और ऋषियों से द्वेष करने वाले उस भयंकर अंधक के निकल जाने पर देवता लोग उस गर्त में प्रवेष कर गए। तब देवताओं और दैत्यों ने परस्पर अत्यंत भयानक युद्ध किया। शिवजी की कृपा से देवता उस युद्ध में प्रबल हो गए। देवताओं से पीड़ित होकर वह ज्यों ही उस गड्ढे में प्रवेष करने लगा, उसी समय परमात्मा शिव ने उसे त्रिशूल में पिरो दिया। तब त्रिशूल में स्थित हुआ वह शिवजी का ध्यान करके प्रार्थना करने लगा,”हे देव, अंत समय में आपका दर्शन करके प्राणी आपके ही सदृश हो जाता है”। शिवजी ने खुश होकर उससे वर मांगने को कहा। तब सात्त्विक भाव को प्राप्त हुए उस दैत्य ने शिवजी को प्रणाम करके व उनकी स्तुति करके अपने लिए उनकी भक्ति मांगी और उनसे वहीं निवास करने की प्रार्थना की। इस पर शंकर ने दैत्य को उसी गड्ढे में फेंक दिया और लोकहित की कामना से वहीं लिंगरूप धारण कर स्थित हो गए।
उपरोक्त पौराणिक कथा का आध्यात्मिक-मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
मुझे लगता है कि अवचेतन मन को ही अंधक राक्षस कहा गया है। यही आदमी को नियंत्रित करता है। अनजाने में जो आदमी से व्यवहार होता है, वह इसी के वश में आकर होता है। इसीलिए तो आदमी शराब आदि के नशे में मन में गहरी दबी हुई बातों, भावनाओं और शारीरिक क्रियाओं को प्रकट करता है। उस समय वर्तमान का चेतन मन निष्क्रिय सा रहता है, जिससे अवचेतन मन को शरीर को नियंत्रित करने का ज्यादा मौका मिलता है। समुद्र का गड्ढा मूलाधार चक्र है। समुद्र में भी जल होता है, और चक्रों में भी शक्तिरूपी जल होता है। समुद्र भी भूमि पर सबसे ज्यादा निचाई पर स्थित होता है, और मूलाधार चक्र भी शरीर में सबसे ज्यादा निचाई पर स्थित माना जाता है। चक्र के बीच में खाली घेरा ही वह गड्ढा है। जैसे मूलाधार चक्र शरीर का सबसे सुदूर और निष्क्रिय सा भाग है, उसी तरह अवचेतन मन भी संपूर्ण मन का सबसे सुदूर और निष्क्रिय सा हिस्सा है। जैसे समुद्र के गड्ढे की गहराई में प्रकाश न पहुंचने से वहां अंधेरा होता है, इसी तरह अवचेतन मन में भी अंधेरा होता है। इसलिए मूलाधार और अवचेतन मन, दोनों को एक स्थान पर साथ रहते दिखाया जाता है। अंधक मतलब अंधा या अंधेरा करने वाला। जब आदमी अवचेतन मन के प्रभाव में होता है, तो वह भी आदमी को अंधा सा या अंधेरानुमा बना देता है। जैसे नींद आदि के रूप में कुछ देर अवचेतन मन में रहने के बाद आदमी जागकर चुस्ती के साथ क्रियाशील हो जाता है, उसी तरह मूलाधार में अवचेतन मन के रूप में सोई हुई शक्ति जागकर और ऊपर उठकर पूरे शरीर और मन को स्वस्थ और क्रियाशील कर देती है। पुरानी इच्छाएं और आदतें अवचेतन मन में सूक्ष्म वासनाओं के रूप में दबी हुई होती हैं। ये आदमी के व्यवहार को निर्धारित करती हैं। आदमी की मानसिक शक्ति कमजोर पड़ने पर ये वासनाएं जागकर उसके मन में काम, क्रोध आदि छः दोष पैदा कर सकती हैं, जिससे वह कई बार बुरे कर्म कर बैठता है, जो उसे पतन या विनाश की ओर ले जाता है। वासनाओं से बुरे काम और बुरे काम से पुनः वासना का निर्माण होने से ये दोनों चक्रवत एकदूसरे को बढ़ाते रहते हैं। अच्छा काम भी बुरा ही माना जाएगा यदि उसके साथ आसक्ति जुड़ जाए, क्योंकि यही आसक्ति वासना के बनने में मदद करती है। हां बुरे काम की तुलना में इससे यह फायदा होगा कि अच्छे काम का फल भी अच्छा ही मिलेगा। हालांकि अच्छे फल को आसक्ति के साथ भोगने से उससे भी वासना बनकर अवचेतन मन में दर्ज हो जाएगी, जो आदमी से फिर अच्छा काम करवाएगी। जैसे मर्जी कर्म और फल हों, आसक्ति का साथ मिलने पर बंधन तो डालेंगे ही। अच्छे काम और फल को सोने की जंजीर समझ लो, और बुरे कर्मफल को लोहे की जंजीर। दोनों आदमी को जन्ममरण के चक्कर में जकड़ेंगी ही। उसके बाद आदमी को चेतना या होश आने पर थोड़ी देर के लिए जागी हुई वह वासना फिर से उसके अवचेतन मन रूपी गड्ढे में चली जाती है। ऐसा बारंबार होता रहता है। अंधक मतलब अवचेतन मन और उससे उत्पन्न विभिन्न दोष मतलब उसकी सेना के विभिन्न राक्षस। जैसे ही काम, क्रोध आदि दोष आदमी पर हावी होने लगता है, वैसे ही उसके द्वारा शरीरविज्ञान दर्शन आदि अद्वैत साहित्यों या देवपूजा आदि अद्वैतवर्धक कर्मों की सहायता से उत्पन्न अद्वैतमय देवताओं के ध्यान से शिवरूपी ध्यानचित्र नीचे के चक्रों पर उजागर होने लगता है। योग से भी ऐसा ही होता है। योग से जब शरीर की प्राण शक्ति घूमते हुए मूलाधार पर पहुंचती है, तो इसे ही देवताओं का वहां पहुंचना कह सकते हैं, क्योंकि देवता शरीर के अंगों और उनको चलाने वाली शक्ति के साथ जुड़े होते हैं। देवताओं की सेना आध्यात्मिक कृत्यों को कहा गया होगा और शिव की सेना मतलब गणसेना तांत्रिक कृत्यों को कहा गया होगा। दोनों एकदूसरे के पूरक हैं। शक्ति के साथ शिवरूपी ध्यान चित्र का आभिव्यक्त होना स्वाभाविक ही है। वहां राक्षसों के साथ युद्ध का मतलब है, वहां दबे स्थूल या इसी जन्म के विचारों का प्रकट होना और उससे उनका कमजोर होना या नष्ट होना। अवचेतन मन में तो अनगिनत जन्मों के विचार दबे होते हैं। इसलिए उसे हराना इतना आसान नहीं है। मस्तिष्क में शक्ति पहुंचने से वह स्थूल विचारों और क्रियाओं के रूप में प्रकट होता रहता है, और उससे सर्वाधिक दूर मूलाधार में शक्ति पहुंचने से वह अपने अंधकारमय मूलरूप में छिपता रहता है। मतलब आदमी पूरी तरह उसके नियंत्रण में होता है, बेशक उसे लगे कि वह सबकुछ अपनी मर्जी से कर रहा है। जैसे ही वह शक्ति के साथ मूलाधार में पहुंचता है, वह बैक चैनलस से ऊपर जाती हुई शक्ति के साथ फिर ऊपर चढ़ जाता है। मतलब जैसे ही वह नीचे जाते हुए मूलाधार चक्र पर पहुंचता है, वैसे ही वह इड़ा, पिंगला, और सुषुम्ना नाड़ियों से ऊपर उठने लगता है। यही शिव के द्वारा अंधक को त्रिशूल पर लटकाना है। उन नाड़ियों से मास्तिष्क में पहुंचकर वह शिवध्यान की संगति से पवित्र हो जाता है। वहां से फिर वह फ्रंट चैनल से नीचे गिरकर पुनः मूलाधार चक्र में पहुंच जाता है। यह चक्र चलता रहता है। क्योंकि मूलाधार चक्र उस अंधक को त्रिशूल पर उठाकर लगातार पवित्र करता रहता है, इसलिए यही अंधकेश्वर लिंग लगता है। वह शिवलिंग मतलब शिव का लिंग इसलिए है क्योंकि वह शिवरूप ध्यानचित्र के साथ जुड़ा होता है। क्योंकि ध्यानचित्र एक पार्श्व संगीत की तरह जीवनरूपी शोरभरे संगीत के झटकों से आदमी को बचाता है, इसीलिए कथा में कहा गया है कि शिव ने देवताओं और लोगों की अंधक से रक्षा की। मतलब योग अगर पुरानी दबी वासनाओं को बाहर निकालकर उन्हें साफ करता रहता है, तो उसमें प्रयोग किया गया ध्यानचित्र योगी को उनके वशीभूत होने से बचाता रहता है। तभी तो वे वासनाएं साफ होती हैं, नहीं तो उनके वशीभूत होने से फिर नई वासनाएं बन जाएंगी। मतलब साफ है कि ध्यानचित्र के बिना योग अधूरा है और यहां तक कि नुकसानदायक भी हो सकता है। मतलब योग सैशन के अंत में एक ध्यान सैशन भी होना चाहिए। बहुत समय लगता है वासनाओं की सफाई में। इसलिए योग जीवनभर निरंतर और प्रतिदिन नियमित रूप से चलता रहना चाहिए। वैसे यह ध्यान देने वाली बात है कि आम दुनियावी कामों से भी शक्ति घूमती रहती है। जब आदमी शारीरिक काम करता है, तो रक्तसंचार से, पहले तो शरीर और मन को काफी आनंदमय ताजगी और स्फूर्ति मिलती है। फिर थक जाने पर जब आदमी आराम करता है तब रक्त को घुमाने वाली शरीर की क्रियाशीलता नहीं रहती, जिससे भागता हुआ रक्त अपने भारीपन की वजह से मूलाधार चक्र पर जमा हो जाता है, और साथ में शक्ति भी। उससे फिर से आदमी अवचेतन मन के अंधेरे की गिरफ्त में आ जाता है। उससे ऊबकर वह फिर सांसारिक क्रियाशीलता को अपनाकर उस मूलाधार पर जमा हुई शक्ति को घुमाने की कोशिश करता है। इससे पूरे शरीर और मास्तिष्क में शक्ति पहुंचने से वह फिर से आनंदित हो जाता है। मतलब अंधक गड्ढे से बाहर आकर शरीररूपी विश्व को नियंत्रित करने लगता है। क्योंकि आदमी से काम वही होते हैं, जो उसके अवचेतन मन में दबे होते हैं। वैसे बड़ों, गुरुओं और ज्ञानियों की संगति से वह उसके प्रभाव में आकर बुरे काम करने से बचता भी है। पर कब तक। जब तक उसका समूल नाश नहीं किया गया, तब तक पूरी सुरक्षा नहीं।
दुनियावी कामों से अगर पुराने जमे विचार शिथिल होते रहते हैं, तो नए विचार अवचेतन मन पर जमते भी रहते हैं। मतलब आगे दौड़, पीछे चौड़। इसीलिए कामों को कर्मयोग के रूप में करने को कहा जाता है। इसमें कर्ता, कर्म, और फल में आसक्ति नहीं रखी जाती। अनासक्ति की वजह से वे अवचेतन मन पर गहरे नहीं जमते बल्कि ऊपर ही रहकर जल्दी ही बाहर निकलकर नष्ट भी होते रहते हैं। इससे कुल मिलाकर विचारों का नष्ट होना विचारों के जन्म से ज्यादा होता है, जिससे अवचेतन मन रूपी अंधक धीरे धीरे शुद्ध होता रहता है।
दूसरी बात, योग के समय प्रकट होने वाले दबे विचारों को हम खुलकर प्रकट होने देते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि वे हमारे से ऊटपटांग काम या व्यवहार नहीं करवा सकते, क्योंकि हम उस समय काम तो कर ही नहीं रहे होते हैं बल्कि एकांत में योग कर रहे होते हैं। इससे वह बार बार प्रकट होकर नष्ट होते रहते हैं। उन्हें गीले बारूद का मिसफायर होना कह सकते हैं। दूसरी ओर, काम के समय हम बुरे विचारों को खुलकर प्रकट नहीं होने देते, क्योंकि वे हमें दिग्भ्रमित करके हमसे बुरे कर्म और बुरे व्यवहार करवा सकते हैं।
तीसरी बात, योग के समय ध्यानचित्र ज्यादा प्रभावी होता है। वह ऊटपटांग किस्म के दबे विचारों के प्राकट्य के बुरे प्रभाव को कम करते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि ज्यादा ध्यान ध्यानचित्र पर रहता है, जिससे जाग रही बुरी मानसिक वृत्तियों की तरफ कम ध्यान जाता है। वैसे तो कर्मयोग के समय भी ध्यानचित्र प्रभावी रहता है, पर उतना नहीं, जितना योग के समय। हालांकि मेरे कर्मयोग के दौरान तो ध्यानचित्र साधारण योग से भी ज्यादा प्रभावी रहता था, फिर भी तंत्रयोग के ध्यानचित्र से तो थोड़ा कम ही प्रभावी होता था। थोड़ा ही फर्क था। बेशक जागृति योग्य बल तंत्रयोग से ही मिला। कर्मयोग में भी बहुत शक्ति होती है। ध्यानचित्र के इसी अध्यात्मवैज्ञानिक लाभ को देखते हुए उसे शिवपुराण रचयिता ने शिव का रूप दिया है। वह योग की सहायता से अंधक को बार बार त्रिशूल पर उठाता रहता है और उसे पवित्र करके पुनः गड्ढे में फेंकता रहता है। मतलब बैक चैनल की नाड़ियों के माध्यम से शक्ति और शिवचित्र के साथ अवचेतन मन ऊपर उठता रहता है, अपनी एनर्जी रिलीज करके पवित्र होता रहता है, और फ्रंट चैनल से होकर नीचे गिरता रहता है। फिर पुनः पीछे से ऊपर उठता है। यह चक्र चलता रहता है।
चौथी बात, दुनियावी कामों से शक्ति को इतना ज्यादा और जल्दी जल्दी नहीं घुमा सकते, जितना कि योग से। दिनभर योग करते रहने से शक्ति को सैंकड़ों बार घुमाया जा सकता है, जबकि काम करते हुए तो शक्ति ज्यादा से ज्यादा 4 5 बार ही घूम सकती है। सुबह के ब्रेकफास्ट के बाद के काम से शक्ति एकबार घूमती है। फिर लंच के समय आराम होता है। आराम के बाद के काम से शक्ति फिर एकबार घूमती है। लगभग 1 2 बार तो सभी शक्ति को घुमा लेते हैं। कई लोग शाम के समय आराम के साथ चायपानी कर लेते हैं। उसके बाद के काम से शक्ति तीसरी बार घूमती है। बहुत तेज लोग जल्दी सोकर उठने से लेकर ब्रेकफास्ट तक के काम से भी शक्ति को चौथी बार घुमा लेते हैं। अति क्रियाशील लोग तो शाम के पूजा के आराम और खाना खाने के बाद से लेकर सोने तक शक्ति को पांचवी बार भी घुमा लेते हैं। मतलब शक्ति को घूमने के लिए काम के साथ आराम भी जरूरी होता है।
ये सब बारूद का खेल है। अवचेतन मन में जमा विचारों के बारूद को इस तरह जलाना है कि धमाका भी न होए और वह जलता भी रहे। इसके लिए उस पर अनासक्ति रूपी हल्के जल का छिड़काव किया जा सकता है। यही योग का ध्येय है। कुदरती चेष्ठा भी हल्के दर्जे का योग ही है, जिसमें आदमी को उसके अवचेतन मन में दबे कर्मविचारों के जैसे फल मिलते रहते हैं। इससे वे कर्मविचार याद आ जाते हैं, मतलब वे दबी हुई ऊर्जा के रूप में थे, जो बाहर निकलकर आत्मा में विलीन हो जाती है। ऊर्जा न पैदा होती है और न ही नष्ट होती है। वह आत्मा से प्रकट होती रहती है और उसी में विलीन होती रहती है। इस जन्म के दबे विचार तो याद आ जाते हैं, पर पिछले जन्म के विचार बिना याद आए ही विलीन होते रहते हैं। हालांकि उसका अहसास जरूर होता है। इसीलिए तो किसी अच्छे या बुरे फल मिलने के बाद आदमी अपने में हल्कापन और आनंद सा पैदा होता हुआ महसूस करता है। क्योंकि आदमी बुरे फल से घबराकर उसे अन्यथा व नकारात्मक रूप में लेता है, इसलिए उसमें आनंद होने से भी वह उसे महसूस नहीं कर पाता। अगर आदमी अनासक्ति व अद्वैत भाव को अपना कर रखे, तो आनंद ही है, चाहे फल अच्छा हो या बुरा हो। इसी कुदरती योग को तेज गति देने के लिए ही कुंडलिनी योग बना है।