कामयाब शिक्षा नीति यही है कि उसमें छात्र अपनी मनपसंद के कोई भी विषय चुन सके। विज्ञान का छात्र अध्यात्म, संगीत , योग आदि विषय रख सके और अध्यात्म आदि का छात्र विज्ञान का। इससे आदमी का संपूर्ण विकास होता है, और उसकी हॉबी भी पूरी होती है। हॉबी पूरी होने से वह मुख्य विषय भी अच्छे से पढ़ता है। आजकल ऐसी ही शिक्षा नीति का प्रचलन बढ़ रहा है। मेरा व्यवसाय विज्ञान से संबंधित है पर अध्यात्म का शौक लेखन से पूरा करता हूं।
किसी ने क्वोरा पर प्रश्न पूछा कि क्या आत्मा बिना शरीर के भी सोच सकती है और विकसित हो सकती है। मैंने कहा कि बिल्कुल ऐसा हो सकता है। जब मुझे अपने दिवंगत संबंधी की जीवात्मा का साक्षात्कार हुआ था, तो उसने कहा था कि उसे लग ही नहीं रहा था कि वह मर गया था। मुझे भी बिल्कुल नहीं लग रहा था कि वे व्यक्ति कुछ दिनों पहले मर गए थे, बल्कि ऐसा लग रहा था कि मेरे सामने पहले की तरह स्पष्ट जिंदा थे। यह अलग बात है कि जब मुझे किन्हीं पुरानी स्मृतियों से उनके मरने का अहसास हुआ तो वे उसी पल ओझल भी हो गए। साथ में उसने यह पूछा था कि क्या उसकी वही अवस्था ही मुक्ति की परमावस्था थी। पहली बात, अगर शरीररहित आत्मा में सोचने समझने की शक्ति न होती तो वह ऐसी बातें न करती और ऐसा न पूछती। साथ में संभावित संतुष्टिजनक उत्तर पाकर एकदम से गायब भी नहीं हुई होती। इसका मतलब है कि शरीररहित आत्मा में शारीरिक मन और इंद्रियों के सभी गुण होते हैं, और वे वैसे ही काम करते हैं, जैसे शरीर में। पर शरीर की तरह नहीं। मतलब अदृष्य आत्मा द्वारा ही इंद्रियों द्वारा किए जाने वाले सारे काम किए जाते हैं। आत्मा द्वारा आत्मा की ही मदद से सुना जाता है, देखा जाता है, सोचा जाता है आदि आदि। शायद आत्मा द्वारा दूसरी आत्मा से जुड़कर ही उसके अनुभव सीधे महसूस किए जाते हैं। वह आत्मा मेरी आत्मा से जुड़कर कुछ पूछ रही थी, पर शब्द बोलने वाला कोई नहीं दिख रहा था, न ही शब्द कहीं बाहर से आ रहे थे। शब्द महसूस हो रहे थे पर आत्मा की तरह गहरे और अदृष्य। उनकी अदृष्य आत्मा उनके अदृष्य शब्दों के साथ मुझे अपनी आत्मा से महसूस हो रही थी और मैं भी किन्हीं बाहरी स्थूल शब्दों से जवाब नहीं दे रहा था बल्कि मेरी आत्मा ही शब्द बनकर उनकी आत्मा को बता रही थी। इसका विस्तृत वर्णन मैंने एक पुरानी पोस्ट में किया है। मैं उस आत्मा से जुड़ाव महसूस कर रहा था, इसीसे वह मेरे द्वारा सोची हुई बात को महसूस कर रही थी। सोचना भी साधारण नहीं था बल्कि दिल-आत्मा की गहराई वाली सोच थी। शरीर तो आत्मा को इसलिए मिलता है ताकि वह भौतिक संसार को शरीर के माध्यम से सीधे ही महसूस कर सके, किसी अन्य आत्मा से जुड़ाव की अपेक्षा न रहे। हो सकता है कि आत्मा सीधे भी भौतिक पदार्थों से जुड़कर उन्हें महसूस करती हो, जैसे कि भूतिया महल आदि की घटनाओं से देखने को मिलता है। हालांकि यह जुड़ाव भौतिक शरीर के जुड़ाव से अलग और कमतर होता होगा, क्योंकि अगर एकजैसा जुड़ाव होता तो आत्मा कष्टों और बिमारियों से भरा शरीर धारण ही क्यों करती। जो आत्मा ने कहा कि वह तो मरी ही नहीं, यह सही है क्योंकि मरता कुछ भी नहीं है। अगर कोई कहे कि केवल शरीर मरता है, आत्मा नहीं, वह भी गलत है, क्योंकि शरीर भी नहीं मरता। दरअसल भौतिक शरीर का अस्तित्व भी मन में ही होता है, कहीं बाहर नहीं। शरीर के रूप आकार का जो चित्र मन में बसा होता है, वह कैसे नष्ट हो सकता है। हां, यह चित्र कभी स्थूल तो कभी सूक्ष्म बन सकता है, पर रहता हमेशा है। जैसे कमरे का बल्ब बुझने से थोड़ी देर के लिए गहरा अंधेरा महसूस होता, पर फिर कमरे में थोड़ा दिखने लगता है, ऐसा ही मरने के बाद होता है। पिछले अनगिनत जन्मों के हमारे जितने भी शरीर हुए हैं, उन सभी के चित्र हमारे अवचेतन मन में दर्ज हैं, मतलब अब तक हमारा कोई भी शरीर नहीं मरा है। इसीलिए मुझे उन परिचित व्यक्ति की आत्मा में उनका पिछला सारा बायोडाटा महसूस हुआ, मतलब उसका औसत रूप। उनका उस जन्म का शरीर तो उस सूक्ष्म डेटाबेस का एक छोटा सा अंश था। इसीलिए मैं उन्हें पूरा पहचान पा रहा था क्योंकि उस डेटाबेस की छाप वर्तमान के शरीर पर भी होती है। उनका वह आत्मरूप उनके उस जन्म के शरीर जैसा भी था और उससे भी कहीं ज्यादा। मतलब कि शरीर नष्ट होने से कोई मरता नहीं है पर अपने मूल सूक्ष्म रूप में आ जाता है जिसे अन्य स्थूल शरीर पकड़ नहीं सकते। सूक्ष्म शरीर अपने आप में पूर्ण शरीर है। स्थूल शरीर तो उसे स्थूलता प्रदान करने को मिलता है। जो स्थूल शरीर कर सकता है, वह सब सूक्ष्म शरीर भी कर सकता है। आकार व रफ्तार में अंतर हो सकता है। फिर बोलते हैं कि मनुष्य के मरने पर उसे किसी भी जीव के शरीर के रूप में जन्म मिल सकता है। यह भी सही नहीं लगता। जब कोई मरा ही नहीं है तो जन्म कैसे होगा। शरीर भी दरअसल मन में ही बसा होता है। साथ में, आदमी के इलावा अन्य जानवर अपने शरीर या चेहरे आदि को दर्पण में नहीं देखते रहते। मतलब उनको तो अपनी शक्ल सूरत का भान ही नहीं होता। वे अपने जैसे औरों को देखकर केवल अंदाजा ही लगा सकते हैं अपने बारे में, पर इतना उनमें दिमाग ही नहीं होता। उसके अंदर मन उसी आदमी का होता है जिसका उसके रूप में पुनर्जन्म हुआ। जब मन ही नहीं बदला तो कैसा पुनर्जन्म।
उन दिवंगत आत्मा ने मेरे साथ कई बार संपर्क बनाने की कोशिश की। कई बार उस दौरान मेरे पेट से पानी जैसा गले को आता था और दम घुटता सा लगता था। शायद ऐसा नाड़ी में कुंडलिनी शक्ति के ऊपर चढ़ने से होता था। फिर मैं उन्हें प्रेम और आदरपूर्वक बातें समझाता और दुबारा न आने को कहता। ऐसा लगता कि वह जीवात्मा सब सुनती और बात मानती। दरअसल अन्य आत्मा से जुड़ने के लिए सर्वोत्तम स्वास्थ्य और गहरा योगाभ्यास जरूरी है, जैसा आम जीवन में हमेशा करना संभव नहीं है। प्रारंभ में मैं तांत्रिक कुंडलिनी योगाभ्यास करता था, जिससे ही शायद वह शक्ति प्राप्त हुईं थी। गृहस्थ जीवन में तांत्रिक योगाभ्यास भी हमेशा नहीं किया जा सकता। हो सकता है कि हमारे शरीर से बहुत सी आत्माएं जुड़ी रहती हों और दुनिया की जानकारियां लेती रहती हों, पर हमें पता ही नहीं चलता। मुझे तो यह भी लगता है कि वे आत्मा मुझे जगाने के लिए आती थी ताकि मेरे महत्त्वपूर्ण अंगों में ऑक्सीजन का स्तर खतरनाक स्तर तक न गिर जाए। मुझे स्पॉन्डिलाइटिस इनफ्लेमेशन की वजह से कई बार गेस्ट्रिक रिफलक्स बढ़ जाता था। वे आत्मा परोपकारी थीं और मेरे प्रति तो बहुत हितैषी थीं, जीवन काल से लेकर ही।
शास्त्रों में भी सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व माना गया है। इसमें मन, बुद्धि, सभी प्राण और सभी इंद्रियां होती हैं। मतलब यह स्थूल शरीर की तरह सभी काम कर सकता है और सभी फल भोग सकता है, पर सूक्ष्म रूप में। इसका मतलब है कि स्थूल संसार से भी कहीं ज्यादा विस्तृत एक सूक्ष्म संसार है, जिसमें सभी कुछ स्थूल संसार की तरह घटित होता रहता है, पर सूक्ष्म रूप में। महान तंत्र योगियों को ही उसका आभास होता है।
Shiv 🌺🪔🔔🚩🔱🙏
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Om shiva om shiva om shiva om shiva om shiva 🙏🔱
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