कुंडलिनी आधारित हठयोग की सफाई तकनीकें असल की सफाई नहीं करतीं

दोस्तों हठयोग में बहुत सी तकनीकें आती हैं। शंख प्रक्षालन में इतना पानी पिया जाता है कि पेट की पूरी सफाई हो जाए। वमन में पिए हुए पानी को पेट से वापस खींच कर मुंह से बाहर निकाला जाता है। जल नेति में एक नथुने से पानी पीकर दूसरे नथुने से निकाला जाता है। सभी में पानी हल्का गुनगुना गर्म और हल्का नमकीन होना चाहिए। आम भाषा में इन क्रियाओं को सफाई क्रियाएं कहा जाता है, पर वास्तव में ऐसा है नहीं। सफाई तो गंदी वस्तु की की जाती है। हमारा शरीर गंदा थोड़े ही है। श्लेष्मा को बाहर निकालने को सफाई कहा जाता है, पर स्वस्थ व्यक्ति में स्वस्थ श्लेष्मा बनता है, जिसके शरीर के लिए बहुत से लाभ होते हैं। उसके बाहर निकलने को शरीर की सफाई नहीं कहना चाहिए। ऐसा कहने से इन योगिक क्रियाओं को करने का मन ही नहीं करता। ऐसा लगता है कि हम पहले गंदे थे और अब साफ हो रहे हैं। मुझे लगता है कि इनको बाहर निकालने से जो ध्यान लाभ मिलता प्रतीत होता है, वह उसके बाहर निकलने से नहीं, पर उसके अभाव में विविध अंगों के साथ वातावरणीय पदार्थों के स्पर्श से मिलता है। यह एक प्रकार का एक्यूप्रेशर जैसा प्रभाव होता है। जब अमाशय और आंतों की अंदरूनी सतह श्लेष्मा मतलब म्यूकस के बाहर निकलने से नंगी हो जाती है, तब उस पर जल और भोजन आदि का स्पर्श एक्यूप्रेशर का काम करता है। इससे इनकी सतह से नाड़ी संवेदना मस्तिष्क तक पहुंचकर उसे सक्रिय कर देती है। इसी तरह नाक के अंदर से म्यूकस के बाहर निकलने से उसकी अंदरूनी नंगी सतह पर वायु का स्पर्श एक्यूप्रेशर पैदा करता है। ऐसे एक्यू बिंदुओं या मर्म स्थानों (एक्यू बिंदुओं का संस्कृत नाम) का वर्णन शरीर की बाहरी सतह पर तो है, पर अंदरूनी सतह पर कहीं नहीं है। मुझे लगता है कि इस पर भी खोज की जरूरत है। प्राकृतिक तौर पर भी उल्टी होने के बाद या दस्त लगने के बाद या जुकाम होने के बाद भी इसी तरह की ताजगी और कुंडलिनी समाधि का सा अनुभव होता है। संभवतः इन्हीं की नकल करके ही ये स्वस्थ व बनावटी सफाई तकनीकें बनाई गई हैं। सफाई भी शायद इन्हें इसीलिए कहा गया है क्योंकि बिमारी के समय ऐसी शारीरिक प्रतिक्रियाएं सफाई ही करती हैं।  क्योंकि इन क्रियाओं से मन की समाधि मतलब मन की सफाई महसूस होती है, शायद इसी को शरीर की समझ लिया होगा, क्योंकि मन और शरीर आपस में जुड़े होते हैं। क्योंकि शायद इस तरह के रोग मन को समाधि लाभ देने के लिए पैदा होते हैं, इसीलिए कहा जाता होगा कि इन क्रियाओं से शरीर के रोग नहीं होते। इसलिए स्वस्थ शरीर में इनका नाम मनशुद्धि क्रियाएं होना चाहिए।

इसी तरह नाड़ी पर भी सुव्यवस्थित शोध की जरूरत है। अगर नाड़ियों का रूप केवलमात्र तथाकथित अभौतिक और सूक्ष्म होता, तो वैद्य लोग हाथ की कलाई को पकड़कर नाड़ी परीक्षण ना किया करते। नाड़ी या नरव को हम बेशक सीधे अनुभव नहीं कर सकते पर उसके भौतिक और अनुभवात्मक प्रभाव को तो अनुभव कर ही सकते हैं। मांसपेशी पर उसका प्रभाव कंपन, सिकुड़न आदि के रूप में होता है, तो मस्तिष्क में विचारों के रूप में। और तो और, जिन शारीरिक क्रियाओं को हम नाड़ी मतलब स्नायु के बिना और केवल हार्मोन या एंजाइम के प्रभाव से होता हुआ मानते हैं, वे भी अप्रत्यक्ष रूप से नाड़ी या नर्व के ही प्रभाव से होती हैं। हार्मोन या एंजाइम पैदा करने वाले सेल्स नर्व की शक्ति से ही नींबू की तरह निचोड़े जाते हैं, जिससे उनके अंदर से हार्मोन बाहर निकलते हैं। मेरुदंड में मूलाधार से मस्तिष्क तक जो सुषुम्ना नाड़ी के रूप में विद्युत रेखा महसूस होती है, वह स्पाइनल कॉर्ड की अति क्रियाशीलता से उसी का स्पंदन महसूस होता है, जो रेखा के रूप में होता है, मुझे ऐसा लगता है। मेरुदंड में वह रेखा रूप स्पंदन पैदा करती है, तो मस्तिष्क में वह अति स्पष्ट, जीवंत व स्थिर मानसिक चित्र के रूप में अभिव्यक्त होती है, जिसे समाधि कहते हैं। इन बातों से ऐसा लगता है कि नरव या स्नायु के अनुभवात्मक व भौतिक प्रभाव को ही नाड़ी कहते हैं। नर्व फाइबर मतलब स्नायु तंतु भौतिक शरीर की एक भौतिक संरचना है, जो शरीर में संदेशों के प्रसार में मदद करता है। अगर नाड़ी संचरण को बिल्कुल ही अभौतिक या चमत्कारी जैसा माना जाए, तो इसका यह नुकसान होगा कि आदमी अपने शरीर के स्वस्थ रखरखाव के प्रति उदासीन हो जाएगा। वह सोचेगा कि नाड़ी तो केवल विशेष साधना से ही क्रियाशील होगी। वैसे होता यह है कि स्वस्थ शरीर होने पर ही साधना को मन करता है, और वह सफल भी स्वस्थ शरीर से ही होती है।

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demystifyingkundalini by Premyogi vajra- प्रेमयोगी वज्र-कृत कुण्डलिनी-रहस्योद्घाटन

I am as natural as air and water. I take in hand whatever is there to work hard and make a merry. I am fond of Yoga, Tantra, Music and Cinema. मैं हवा और पानी की तरह प्राकृतिक हूं। मैं कड़ी मेहनत करने और रंगरलियाँ मनाने के लिए जो कुछ भी काम देखता हूँ, उसे हाथ में ले लेता हूं। मुझे योग, तंत्र, संगीत और सिनेमा का शौक है।

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