दोस्तों मैंने एआई से सजीव प्राणी की एक वाक्य की परिभाषा मांगी तो उसने बताया कि जीवित प्राणी वह होता है जो प्रजनन, विकास, चयापचय, पर्यावरण के प्रति अनुकूलन, उत्तेजनाओं का जवाब और होमियोस्टैसिस को बनाए रखने में सक्षम होता है, जबकि निर्जीव इनमें से किसी भी क्रिया को करने में सक्षम नहीं होते हैं। इस पोस्ट में हम कुंडलिनी योग के माध्यम से यह सिद्ध करेंगे कि ये सभी क्रियाएं निर्जीव में भी होती हैं।
निर्जीव में प्रजनन
अगर निर्जीव में प्रजनन ना होता तो सृष्टि का विकास कैसे होता। फिर तो हमें आकाश भी ग्रह तारों से भरा हुआ ना दिखाई देता। प्रजनन से ही वस्तुओं या जीवो की संख्या में वृद्धि होती है। क्योंकि सृष्टि में अनगिनत निर्जीव वस्तुएं हैं, इसलिए निर्जीव में प्रजनन भी जरूर होता है। वह प्रजनन मूल आकाश अर्थात मूल प्रकृति से होता है। शास्त्रों में भी कहा गया है कि मूल प्रकृति से ही सृष्टि का जन्म होता है। उस मूल आकाश से मूल कणों का जन्म होता है। मूल आकाश को मां समझ लो और मूल कणों को बच्चे। फिर तो वह मूल कण आपसी क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं से बढ़ते ही रहते हैं और पूरी सृष्टि के रूप में फैल जाते हैं। दरअसल यह सारी सृष्टि कुछ सौ या हजार मूल कणों से ही बनी होगी। उनकी परस्पर अलग-अलग प्रतिक्रियाओं से अलग-अलग पदार्थ बनते हैं, जिनसे पूरी सृष्टि भर जाती है।
निर्जीवों में चयापचय
एआई की परिभाषा के अनुसार चयापाचय जीवित प्राणियों में होने वाली रासायनिक प्रतिक्रियाओं का समूह है जो ऊर्जा उत्पादन, वृद्धि, विकास और मरम्मत के लिए आवश्यक है। तथाकथित निर्जीव सूर्य में नाभिकीय प्रतिक्रिया से ऊर्जा का उत्पादन होता है। उससे मूल कणों में निरंतर वृद्धि और विकास होता रहता है। इससे सूर्य में सृष्टि निर्माण करने वाले सभी तत्वों का निर्माण पर्याप्त मात्रा में हो जाता है।
निर्जीव में पर्यावरण के प्रति अनुकूलन
किक मारने से केवल कुत्ता ही नहीं भागता बल्कि एक गेंद भी भागती है। आकाशगंगाऐं परिवार की तरह समूह में रहती हैं ताकि नए तारों का निर्माण अच्छे से हो सके। जैसे सजीव घुटन भरी घनी आबादी से भागकर शांति की तरफ जाना चाहते हैं, वैसे ही हवा, पानी जैसी सभी निर्जीव चीजें भी उच्च दबाव से निम्न दबाव वाले क्षेत्र की ओर भागती हैं। मतलब कि निर्जीव पदार्थ भी अपनी बेहतरी के लिए अपने को अनुकूलित कर लेते हैं।
निर्जीव द्वारा उत्तेजनाओं का जवाब
एक धातु का टुकड़ा गर्म होने पर फैलता है। मतलब वह फैल कर अपनी गर्मी को बाहर निकालने की कोशिश करता है या वहां से भागने की कोशिश करता है। वही धातु का टुकड़ा ठंड बढ़ने पर सिकुड़ जाता है। मतलब वह वहीं पर दुबक कर अपनी गर्मी को बचाने की कोशिश करता है। विस्फोट, विद्युत चालन तथा रासायनिक प्रतिक्रियाओं के रूप में अनगिनत उदाहरण हैं, जिनमें निर्जीव सचिवों से भी ज्यादा मात्रा में और ज्यादा तेजी से उत्तेजनाओं का जवाब देते हैं।
निर्जीव द्वारा होमियोस्टैसिस को बनाए रखना
होमियोस्टेसिस का मतलब होता है, जीवन के लिए जरूरी परिस्थितियों को एकसमान बनाए रखना। जैसे कि एक स्वस्थ शरीर का एक निश्चित और एकसमान तापमान होता है, जिसमें शरीर सबसे अधिक कार्यक्षम होता है। इसी तरह इसे अगर निर्जीवों में लें, तो जब तापमान बहुत अधिक बढ़ जाता है, तो बादल घिरने लगते हैं, और वर्षा हो जाती है। इससे वातावरण का तापमान फिर से सामान्य हो जाता है। ग्रीन हाउस गैसें धरती पर एक समान व स्थिर तापमान बनाए रखने में मदद करती हैं। गुरुत्वाकर्षण बल आकाशगंगाओं को स्थिर संरचना बनाए रखने में मदद करता है, जिससे सृष्टि का समुचित विकास सुनिश्चित होता है। ब्रह्मांड के विस्तार बल और गुरुत्वाकर्षण बल का परस्पर संतुलन ब्रह्मांड को जीवित बनाए रखता है।
इस तरह के लीक से हटे हुए या आउट ऑफ बॉक्स थिंकिंग से उपजे तथ्यों से स्पष्ट है कि निर्जीव और सजीव के बीच में मूलतः कोई अंतर नहीं है। इनको विभाजित करने वाली रेखा असली नहीं बल्कि काल्पनिक है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि निर्जीवों में भी सजीवों की तरह ही अपने स्तर की बेसिक कॉग्निशन होती है। जब किसी आदमी की कुंडलिनी योग से समाधि लगती है, तो उसे उस वस्तु की बेसिक कॉग्निशन का अनुभव हो जाता है। वह एक आदिम अनुभूति होती है, और पूर्ण आत्मज्ञान की परम अनुभूति के बहुत नजदीक होती है। इसीलिए कहते हैं कि परमात्मा तक समाधि से ही पहुंचा जा सकता है।