मन में लहर बनने को सतोगुण कहते हैं। लहर मिटने को तमोगुण कहते हैं। लहर बनने, मिटने के बीच के बदलाव की गतिशील अवस्था को रजोगुण कहते हैं। जब कोई विचार बनता है तो वह सतोगुण की लहर होती है और जब मिटता है तो तमोगुण का अंधेरा छा जाता है। होती वह भी लहर ही है पर अंधेरा होने से दिखती नहीं। जितनी लहर ऊपर को उठती है, नीचे भी उतनी ही डूबती है, मतलब पाताल या गर्त या अंधेरे की तरफ जाती है। वैसे देखा जाए तो शुरुआती आभासिक अस्तित्व सतोगुण का ही है। तमोगुण तो आत्मा पर उसकी आभासी छाप है जो अंधेरे के रूप में होती है। हैं तो दोनों गुण झूठे या आभासी ही, पर सबसे पहले निर्गुण आत्मा में सतोगुण की लहर पैदा हुई। फिर उससे तमोगुण बना, उससे फिर सतोगुण, उससे फिर तमोगुण, फिर सतोगुण और ऐसा यह सिलसिला अनादिकाल से चलता आ रहा है। निर्गुण आत्मा भी सतोगुण की तरह ही है, जैसे कि यह प्रकाशमान है, आनंद से भरी हुई है, और अस्तित्व से भरपूर है, पर उसमें आभासी लहरें नहीं हैं। शरीर के द्वारा उसमें आभासी लहरें बनने से वह सतोगुण से युक्त जीवात्मा बन गया। हालांकि मूल परमात्मा हमेशा वैसा ही निर्गुण बना रहता है। उसमें कोई फर्क नहीं पड़ता। फिर जब एक बार जीवात्मा में एक बार सतोगुण बन गया, तब तो उपरोक्तानुसार गुणों का सिलसिला चलना ही था। पेड़ से बीज और बीज से पेड़ बनता रहता है। यही जन्म मरण का खेल या रोग, जो कुछ भी कह लो है। यह मैं नहीं शास्त्र कह रहे हैं। आदमी या कोई भी जीव मरने से भी इसीलिए डरता है क्योंकि उसे अंदेशा होता है कि उसे फिर से कष्टों से भरे हुए नए जन्म की प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। यह अंदेशा उसे इसलिए होता है क्योंकि वह प्रतिदिन अपने जीवन में गुणों का चक्रवत परिवर्तन देखता रहता है। अंधेरे को अनुभव करने के बाद उसे प्रकाश को भी अनुभव करना पड़ता है। वह लगातार अंधेरे में नहीं रह सकता। क्योंकि दोनों एकदूसरे के सापेक्ष हैं। इसीलिए उसे मृत्यु रूपी अंधेरे से जन्म रूपी प्रकाश की तरफ़ जाने का अवचेतन मन में आभास होता है। अगर लगातार मृत्यु बनी रहती तब तो वह सभी कष्टों से रहित मुक्ति ही होती। तब तो उससे कोई न डरा करता।
अंधेरे में विचाररूपी प्रकाशमान लहर की सारी सूचना दर्ज होती है। जलरूप जीव की बीच वाली समान सतह आत्मा है। मैने जीव को जलरूप इसलिए कहा क्योंकि उसमें भी जल की तरह तरंगें उठती रहती हैं। शायद जल को इसीलिए देवता कहा जाता है। जब नीचे दबी हुई या नीचे डूबी हुई लहर खत्म होकर सतह के स्तर तक पहुंचती है, तब आत्मा को अपनी शांत अवस्था महसूस होने लगती है। वह पूरी तरह से महसूस होए, उससे पहले ही नई लहर फिर से ऊपर उठ जाती है, और वही प्रक्रिया दोहराई जाती है। यह सिलसिला लगातार चलता रहता है। इस तरह से आदमी आत्मा की शांति को प्राप्त नहीं कर पाता। हालांकि आत्मा सतोगुण की ऊंची लहर और तमोगुण की नीची लहर के बीच की शांत अवस्था है। पर ऐसा कहते हैं कि कुंडलिनी जागरण के रूप में उसका अनुभव सतोगुण के चरम पर होने पर ही होता है। यह सतोगुण का चरम कुंडलिनी योग की ध्यान साधना से ही प्राप्त होता है। मुझे लगता है कि बौद्ध लोग परिवर्तनशील आत्मा को इसी कारण से सत्य मानते हैं, क्योंकि गुणों के बदलने से परिवर्तनशील आत्मा को अपरिवर्तनशील आत्मा की अपेक्षा कुण्डलिनी जागरण के रूप में सतोगुण के शिखर को छूने का अधिक अवसर मिलता है। यह सतोगुण का चरम कुंडलिनी योग की ध्यान साधना से ही प्राप्त होता है। वैसे जिस बीच वाली अवस्था को हम आत्मा कह रहे हैं, वह शुद्ध आत्मा नहीं बल्कि जीवात्मा है जिसमें प्रकृति के तीनों गुण साम्यावस्था में हैं। जो कुंडलिनी जागरण से अनुभव होती है, वह शुद्ध आत्मा है, जो निर्गुण या गुणातीत है, मलिन जीवात्मा नहीं। इसलिए यहां कोई विरोधाभास नहीं है।
इस तरह से हम देख सकते हैं कि आत्मा प्रकृति के तीनों गुणों को अपने ऊपर आरोपित करके महसूस करती है। मतलब आत्मा प्रकृति का ही रूप धारण कर लेती है। मतलब कि आभासी प्रकृति के तीनों गुणों का रूप धारण कर लेती है। जब प्रकृति ही अस्तित्वहीन है तो उसके तीनों गुणों का अस्तित्व भी कैसे हो सकता है। इसी को भ्रमपूर्ण संसार कहते हैं। इसका मतलब सभी बदलाव झूठे हैं, पर बुद्धिस्ट लोग क्षणिकवाद मतलब परिवर्तनवाद को सत्य मानते हैं। शायद उन्होंने पुरुष और प्रकृति के संयोग को ही शुद्ध आत्मा समझा है। या कुछ और भी हो सकता है। इसी को शास्त्रों में ऐसा कहा है कि दुनिया प्रकृति और पुरुष के संयोग से बनी है। असल में प्रकृति का अस्तित्व ही नहीं है। कंप्यूटर गेम की तरह यह आभासी है पर आत्मा इस आभासी प्रकृति के रूप को धारण करके उसे अस्तित्व या सत्ता दे देता है। असली अस्तित्व तो सिर्फ आत्मा का ही है। तभी तो अद्वैत वेदांत में कहा है कि आत्मा ही सब कुछ है। इसके अलावा कुछ नहीं।
पर बेशक प्रकृति आभासी ही है पर व्यवहार में यह अपना असर तो छोड़ती ही है, जो आत्मा के ऊपर दृष्टिगोचर होता है। इसलिए सांख्य दर्शन के प्रकृतिपुरुषवाद रूपी द्विसत्तात्मक दर्शन को ज्यादा व्यावहारिक दर्शन कहते हैं। वैसे तो सभी दर्शनों में एक दूसरे की छाप दिखती है। पूर्व मीमांसा दर्शन के अपूर्ववाद को ही देख लो। यह दर्शन कहता है कि किसी भी कर्म से आत्मा में अपूर्व पैदा होता है। वह अपूर्व उस कर्म का फल मिलने पर ही नष्ट होता है। वह अपूर्व उस कर्म के द्वारा आत्मा पर पड़ने वाली अंधेरे की छाप ही है, जिसमें कर्म की सारी सूचना दबी होती है। जब यह छाप स्थूल रूप में किसी घटना के रूप में सामने आती है तो उसे ही हम उस कर्म का फल मिलना कहते हैं। क्योंकि बाहर निकलने से अपूर्व की ऊर्जा क्षीण या नष्ट हो गई। इसलिए आत्मा पर दर्ज अंधेरे की छाप भी मिट जाती है। शायद योग से इसी तरह कर्म क्षीण होते हैं। कुंडलिनी योग से कर्म संबंधी विचार मन में उमड़ते रहते हैं जिससे आत्मा पर उन से बनी अंधेरे की छांव मिटती रहती है। बेशक फल मिलने की अपेक्षा वह धीरे-धीरे मिटती है, पर मिटती तो है। इसीलिए कहते हैं कि योग से पाप नष्ट होते हैं। आत्मा पर आदमी की हरेक क्रियाशीलता दर्ज हो जाती है। चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक। चाहे उस क्रियाशीलता को कितनी ही चालाकी से या अनासक्ति से क्यों न अंजाम दिया गया हो। शायद इसीलिए कहते हैं कि परमात्मा से कोई बात नहीं छुपती। आत्मा पर दर्ज छाप को ही हम संस्कार या अवचेतन मन कहते हैं। हम जो कुछ भी सीखते हैं या पढ़ते हैं, वह सब कुछ तो हमें याद नहीं रहता। पर उससे हमें अपने अंदर एक रूपांतरण सा महसूस होता है। यह उनसे आत्मा पे पड़ी छाप से ही महसूस होता है। इसी से मुझे लगता है कि पुरानी यादें आत्मा में भंडारित रहती हैं। मस्तिष्क तो सिर्फ उन्हें तरंगों के स्थूल रूप में अभिव्यक्त करने का काम करता है। आत्मा को सूक्ष्म तरंग मान लो। पुरानी यादों को इसके ऊपर आरोपित ऑडियो विजुअल के सूक्ष्म सिग्नल मान लो। मस्तिष्क को डिकोडर और एंप्लीफायर मान लो, जो आत्मा पर मौजूद सूक्ष्म सिग्नल को पुनः ऑडियो विजुअल के स्थूल विचारों में रूपांतरित और प्रवर्धित कर देता है। इसका प्रमाण है, बहुत से लोगों को उनके पिछ्ले जन्मों की घटनाओं का सही रूप में याद रहना। पिछ्ले जन्म के उनके शरीर, मस्तिष्क, मन आदि सब कुछ जलकर खाक हो गए थे। फिर वे यादें अगल जन्म को कैसे गईं। वे आत्मा के ऊपर रहकर ही जा सकती हैं, अन्य तो कोई तरीका नहीं है।
दोस्तो, मुझे लगता है कि मैं पिछ्ले जन्म में संगीत से जुड़ा हुआ था। सपने में मैं स्पष्ट और मधुर और भावपूर्ण धुनों में गाने, अकेले या जुलूस की भीड़ में उत्साहपूर्वक, विशेषकर देवी माता के भक्तिपूर्ण भजनों को अक्सर गाता हूं। कई गानों को तो मैंने उसी समय नींद से जागकर रिकॉर्ड भी कर लिया है। मैं अपने एक परिचित को जानता हूं जो कंप्यूटर से ही पूरा गाना तैयार कर लेता है। संगीत वगैरह सबकुछ सॉफ्टवेयर से एड हो जाता है। अगर माता की कृपा रही तो संभव है कि जल्दी ही मेरे सपने के भजनों की एक एलबम ही आ जाए।