दोस्तों, इस पोस्ट में हम थोड़ा गहरे दर्शन की तरफ जा रहे हैं। अगर कोई ज्यादा गहराई में ना जाना चाहे तो वे इस पोस्ट को स्किप भी कर सकते हैं। आओ, पहले हम आत्मा में लहर बनने की शुरुआत को समझते हैं। सबसे पहले आत्मा पूरी तरह शुद्ध था। वह परमात्मा जैसा ही था। फिर वह किसी शरीर के साथ जुड़ गया। मस्तिष्क ने उस आत्मा में एक आभासी हलचल या लहर पैदा की। वह जो लहर बनी उसने आत्मा के प्रकाश को ढक दिया। कितना ढका? उतना ही जितना एक लहर का प्रभाव था। फिर दूसरी लहर से आत्मा का अंधेरा और बढ़ गया। तीसरी से और, चौथी से और। यह सिलसिला चलता गया। यह ऐसे ही है जैसे पेड़ पर कम पत्ते से उसकी जमीन पर कम घनी छाया बनती है। जैसे-जैसे पत्तों की संख्या बढ़ती जाती है, वैसे वैसे ही छाया की सघनता भी बढ़ती जाती है। एक प्रकार से ज्यादा घने पत्तों की छाया में उससे कम घने पत्तों के हर एक स्तर की सूचना दर्ज है। ऐसा इसलिए क्योंकि किसी चीज की ज्यादा मात्रा के अंदर उस चीज की सभी कम मात्राएं खुद ही शामिल होती हैं। आत्मा के साथ वैसा ही होता है। उसकी ज्यादा लहरों से बनने वाले अंधकार के अंदर उसकी कम लहरों के हर एक स्तर से बनने वाले अंधकार खुद ही शामिल रहते हैं। या यूं कहो कि हर एक किस्म की लहर ने उसी विशेष किस्म का अंधकार आत्मा में पैदा किया। मतलब कि आज तक जितनी लहरें बनी, उतने ही और वैसे ही अंधकार आत्मा में बने। मतलब हर एक विचार रूपी लहर उसके जैसे विशेष अंधकार के रूप में आत्मा में दर्ज है। बेशक सतही तौर पर हमें आत्मा में वे अंधकार अलग-अलग महसूस न होएं। यह ऐसे ही है कि एक पेड़ के हर एक किस्म की मात्रा के पत्तों की सूचना उस पेड़ की छाया में उसके अपने समय में दर्ज हुई थी। पत्तों के नए स्तर की छाया बनने पर पत्तों के पुराने स्तर की छाया मिट जाती है। पर आत्मा में नई लहर से नए अंधकार के बनने पर पुरानी लहरों से बने पुराने सभी अंधकार दर्ज रहते हैं, वे मिटते नहीं है। इसीलिए पेड़ की छांव को देखने से केवल एक ही छांव महसूस होती है और पुरानी अन्य छांवों का अनुभव नहीं होता। पर आत्मा के अंधेरे को महसूस करने पर ऐसा महसूस होता है कि वह अंधेरा तो एक ही है, पर उसमें उसकी अनगिनत शरीरों वाली अनगिनत जीवित अवस्थाओं की विभिन्न व सभी सूचनाएं दर्ज हैं। हालांकि यह बहुत सूक्ष्म आभास होता है, और अभिन्न जैसा ही लगता है। ऐसा तभी हो सकता है, अगर हर एक सूचना अलग अंधेरे के रूप में मौजूद हो। अगर पेड़ की छांव की तरह ही आत्मा के बड़े अंधकार के अंदर उसके पुराने अन्य सभी छोटे अंधकार मिट जाया करते या दब जाया करते तो सभी आत्माएं एक जैसी हुआ करतीं। और फिर कर्म फल का सिद्धांत भी लागू ना होता। मतलब कि किसी भी कर्म की सूचना आत्मा में ना रहने से उसका फल भी ना मिला करता। पर ऐसा तो कुछ भी नहीं होता?
यहां यह बात गौर करने लायक है कि परमात्मा ने किसी को जबरदस्ती बंधन में नहीं डाला। जीवात्मा को तो उसने बस कुदरत दिखाई ही थी। अगर जीवात्मा चाहता तो उसे नकार भी सकता था। पर उसने अपने शाश्वत रूप को छोड़कर उसको चुना। इससे वह बंध गया। मतलब परमात्मा तो उसे कुदरत का अतिरिक्त आनंद देना चाहता था। पर जीवात्मा की आसक्ति से उलटा हो गया, मतलब जो अपना शाश्वत आनंद था, वह भी चला गया।
पेड़ की घनी छांव के बाद यदि कुछ पत्ते गिर जाएं, तो वह पुरानी घनी छांव खुद ही मिट जाती है। पर गहरी लहरों के बाद आत्मा में अगर हल्की लहर बने, तो पुरानी गहरी लहर से बना अंधेरा खुद से नहीं मिटता। बेशक नई और हल्की या अनासक्ति वाली विचार रूपी लहर से नया और हल्का अंधकार आत्मा में जुड़ जाए। पेड़ की छांव जमीन से नहीं चिपकी रहती, पर छांव बनाने वाले पत्तों के हटने के साथ ही एकदम से हट जाती है। पर आत्मा का अंधेरा आत्मा से चिपका रहता है। बेशक उस अंधेरे को बनाने वाली विचार लहर हट जाए, पर अंधेरा नहीं हटता। शायद वह उस विचार लहर के नियमित रूप से बारबार के स्मरण से धीरे धीरे हटता है। शायद कुंडलिनी योग से ऐसा ही होता है।