दोस्तों, अंधेरे में किसी का पूरा व्यक्तित्व कैसे दिख सकता है? मतलब पूरा जीवित व्यक्ति उसकी आत्मा के अंधेरे में कैसे महसूस हो सकता है। ऐसा तभी हो सकता है अगर उसके द्वारा उसके जीवन काल में कही गई व सोची गई सभी बातें, किए गए सभी व्यवहार व किए गए सभी काम उस अंधेरे में दर्ज हों। उस अंधेरे में सभी कुछ अलग अलग दर्ज होना चाहिए। अगर सब से एक ही अंधेरा कम या ज्यादा होता रहा, तब तो वह अंधेरा आम भौतिक अंधेरे जैसा होने से जड़ माना जाएगा। जैसे किस्म किस्म की वस्तुओं के रूप में किस्म किस्म का प्रकाश खत्म होकर रात के एक ही अंधेरे को बढ़ाता रहता है। अंधेरे को देखने से यह पता नहीं चलता कि इसमें कौन-कौन सी किस्म की वस्तुओं के रूप में कौन कौन से किस्म का प्रकाश समाया हुआ है। पर किसी आदमी की आत्मा के अंधेरे को महसूस करते हुए हमें उस आदमी के मन में विद्यमान किस्म किस्म की वस्तुओं के रूप में किस्म किस्म के प्रकाश समाए हुए लगते हैं। हालांकि फिर भी एक ही अविभाजित अंधेरा महसूस होता है। यह आश्चर्य ही है। शायद ब्लैकहोल में भी ऐसा ही होता हो। है तो उसमें एक ही अविभाजित अंधेरा, पर अगर कोई उसे योग आदि से गहराई से महसूस करे तो शायद उसमें उसके सभी निगले हुए पदार्थ महसूस होए, बेशक सूक्ष्मरूप में ही। विज्ञान भी कहता है कि सूचना कभी नष्ट नहीं होती। हो सकता है कि ब्लैकहोल में भी सभी पृथक पृथक पदार्थों की सूचना पृथक पृथक रूप में दर्ज या एनकोडिड हो। फिर जब उस ब्लैकहोल से नया ब्रह्मांड या तारा बनता हो तो वह सूचना फिर से पहले के जैसे स्थूल रूप में प्रकट हो जाती हो। हालांकि विज्ञान इसे नहीं मानता। इसलिए इसे एक विचारप्रयोग ही समझ लो। वैसे भी बहुत से क्षेत्र हैं, जो आधुनिक विज्ञान की समझ से परे है। अध्यात्म भी इनमें से एक है। इसीलिए कहते हैं कि आत्मा चेतन है। मतलब इसमें वह सबकुछ है जो जीवित प्राणी के मन में विविध प्रकार से है। बेशक मन में वह स्थूल रूप में होता है और आत्मा में सूक्ष्म रूप में। पर यह सिर्फ कहने की बात है और यह सापेक्ष है। आत्मा को महसूस करते हुए हमें स्थूल सूक्ष्म का जरा भी अंतर महसूस नहीं होता। हमें पूरा जीवित व्यक्ति उस अंधकारमय आत्मा के रूप में महसूस होता है। यहां तक कि स्वयं आत्मा को भी ऐसा लगता है कि वह तो पहले की तरह पूर्ण जीवित है। पता तो उसे होता है कि अब वह शरीर के बंधन से छूट गई है, पर उसे वह कोई अपने में बदलाव नहीं दिखता। मतलब वही पुराना व्यक्तित्व पर कुछ नए रूप में जैसे कि उसमें व्यापकता, अनश्वरता जैसे अतिरिक्त गुण आ जाते हैं, बेशक परमात्मा की तरह पूर्णतः नहीं पर सापेक्ष रूप में। मतलब शास्त्रों में जिसे सूक्ष्म शरीर कहा गया है उसके रूप में स्वयं आत्मा ही होती है।
शास्त्रों का सूक्ष्म शरीर आत्मा ही है। थोड़ा शब्दों को श्रृंगार देने के लिए ही सूक्ष्म शरीर का विस्तार से वर्णन है। सूक्ष्म शरीर आत्मा, बुद्धि, मन, अहंकार, पांच ज्ञानेंद्रियों, पांच कर्मेंद्रियों और पांच प्राणों से युक्त कहा गया है। इसका मतलब है कि आत्मा सोच सकती है, निर्णय ले सकती है, अपने अहम को महसूस कर सकती है, सुन सकती है, बोल सकती है, सूंघ सकती है, स्पर्श को महसूस कर सकती है, देख सकती है, हाथ से काम कर सकती है, पैर से चल सकती है, जीभ से चख सकती है, जननेंद्रिय और उपस्थेंद्रिय का कर्म कर सकती है। फिर आत्मा शरीर को क्यों धारण करती है। शायद इसीलिए ताकि उसे लहरें मिल सके। और इसलिए भी ताकि वह विकास कर के परमात्मा तक पहुंच सके। शास्त्रों में कहते हैं कि प्रेम की प्राप्ति के लिए ही आत्मा जन्म ग्रहण करती है। बात एक ही है। मन की लहरों से ही तो प्रेम बनता है। सीधे शब्दों में यही क्यों न कहें कि आत्मा कुंडलिनी योग के लिए ही शरीर ग्रहण करती है, क्योंकि कुंडलिनी योग से ही प्रेम बढ़ता है और इसी से आत्मा की मलिनता दूर होने से आत्मा का विकास भी होता है।
तो मैं वही कह रहा हूं कि आत्मा ने मेरे साथ बात की थी। अगर बात की तो उसने सोचा भी होगा। सोचा होगा तो निर्णय भी लिया होगा। अगर मेरे से बात की तो मुझे देखा भी होगा और मेरी बात भी सुनी होगी। अपने को या अपने अहंकार को तो वह महसूस करेगी ही, तभी बात कर पाएगी। मतलब उसमें सभी ज्ञानेंद्रियां थी। वाणी मतलब वाक एक कर्मेंद्रिय मानी जाती है। मतलब उसमें कर्मेंद्रिय भी थी। साथ में वह मुझे एक दूर जगह पर चल रही उस विशेष क्रियाशीलता के बारे में बता रही थी जिससे मैं प्रभावित हो सकता था। मतलब वह पैरों से चलकर वहां गई। उसके बारे में पता किया और मुझे उसकी सूचना दी। पैर भी एक कर्मेंद्रिय है। अपने शरीर वाली अवस्था के समय उस आत्मा को उस क्रियाशीलता के बारे में कुछ पता नहीं था। शरीर को इतने सारे काम करने के लिए प्राणों की और प्राणवायु की आवश्यकता होती है। बिना वायु के तो पत्ता भी नहीं हिलता। मतलब आत्मा बिना प्राणवायु ग्रहण किए या बिना सांस लिए ही प्राणों का काम भी कर रही थी। प्रकारांतर से या समझाने के लिए ऋषियों ने ऐसा लिखा है कि सूक्ष्म शरीर अर्थात जीवात्मा में पांच प्राण भी होते हैं, जो सूक्ष्मशरीर के विभिन्न काम करने में मदद करते हैं। आत्मा तो सूक्ष्म शरीर का आधार होने से उसमें सबसे प्रमुख तत्व है ही। बाकि शेष सारे तत्व तो आत्मा के ऊपर आधारित होने से आधेय ही हैं।