कुंडलिनी शक्ति से मूल प्रकृति में स्थित ध्यान चित्र जागृत होकर पुरुष बन जाता है

दोस्तों, यह बहुत छोटी पर बहुत सारगर्भित पोस्ट है। मूलाधार क्या मूल प्रकृति को ही कहा गया है। यह विचार मेरे मन में आया था। क्यों न इसका विश्लेषण कर लिया जाए। आदमी का आधार है व्यष्टि प्रकृति अर्थात जीवात्मा। यह सभी जीवों के लिए अलग-अलग है। आधार पर इमारत की गुणवत्ता, आकार, ऊंचाई आदि सभी निर्भर करते हैं। मतलब आधार में भावी इमारत की सारी सूचनाएं दर्ज रहती हैं। इसी तरह से आदमी की जीवात्मा में आदमी की सारी भावी सूचना दर्ज होती है, जैसे कि उसके जन्म, गुण, कर्म, फल आदि।

आधार तो हर एक जीव के लिए अलग और विशेष है, पर मूलाधार तो सबका एक ही है। आधार को प्रकृति का और मूल आधार को मूल प्रकृति का पर्यायवाची शब्द समझना चाहिए। कहते भी हैं कि अमुक आदमी की प्रकृति कैसी है। अर्थात स्वभाव कैसा है? मूलाधार से ही सभी आधार बनते हैं। आधार पहले मूलाधार में बदलना चाहिए। तभी कुंडलिनी योग की असली शुरुआत होगी। कर्म योग से आदमी की आत्मा में दबी हुई सूचनाएं अनासक्ति से उभर कर नष्ट हो जाएंगी। जब आत्मा का बक्सा लगभग खाली हो जाएगा तब वह मूलाधार बनेगा। मतलब उसमें सांसारिक सूचनाएं नहीं दबी होंगी। यह पुरुष की तरह ही होता है। सिर्फ यही अंतर है कि यह पुरुष के विपरीत अंधेरनुमा होगा। मतलब यह पुरुष की आभासी परछाई की तरह ही होगा। जब आदमी के अर्थात आदमी की जीवात्मा के मूल आधार अवस्था में स्थित होने पर गुरु आदि रूप के मानसिक चित्र का ध्यान किया जाता है, तब ध्यान आसानी से लगता है। यह इसलिए क्योंकि आत्मा में कोई दूसरा दबा हुआ कचरा होता ही नहीं जो ध्यान की शक्ति को सोखकर शक्तिशाली हो सके या अभिव्यक्त हो सके। जब तांत्रिक कुंडलिनी योग से उस ध्यान चित्र को कुंडलिनी शक्ति भी दी जाती है, तब तो है आग के शोले की तरह भड़कने लगता है। इससे वह जल्दी ही जागृत हो जाता है।

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demystifyingkundalini by Premyogi vajra- प्रेमयोगी वज्र-कृत कुण्डलिनी-रहस्योद्घाटन

I am as natural as air and water. I take in hand whatever is there to work hard and make a merry. I am fond of Yoga, Tantra, Music and Cinema. मैं हवा और पानी की तरह प्राकृतिक हूं। मैं कड़ी मेहनत करने और रंगरलियाँ मनाने के लिए जो कुछ भी काम देखता हूँ, उसे हाथ में ले लेता हूं। मुझे योग, तंत्र, संगीत और सिनेमा का शौक है।

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