दोस्तो, सृष्टि के रहस्य को सिर्फ सांख्य दर्शन ने ही सबसे अच्छी तरह से समझाया है। प्रकृतिपुरुष युग्म के बारे में शायद शास्त्रों का यह मतलब है कि अगर शुरु में प्रकृति ने भी सृष्टि बनाई तो भी प्रकृतिपुरुष युग्म ने ही बनाई, क्योंकि पुरुष से मिलन की संभावना से प्रेरित होकर ही प्रकृति ने सृष्टि बनाई। जो पुराने समय में समय की कमी के कारण बुद्ध ने जिज्ञासु शिष्य को नहीं समझाया था कि जीवनमरण रूपी रोग की शुरुआत कहां से हुई उसे सांख्य दर्शन से समझा जा सकता है। आदमी हमेशा से भी इस बंधन रोग से ग्रस्त है और नहीं भी है। जब पहला अनुभवात्मक मस्तिष्क बना तभी बंधन की शुरुआत हुई। मतलब तभी जीवात्मा अस्तित्व में आई। पर जिस प्रकृति के ऊपर पुरुष से प्रकाशमय रेखाचित्र बना, वह प्रकृति तो अनादि है। इसका मतलब है कि जीवात्मा अनादिकाल से प्रकृति के रूप में थी।
मतलब जीवात्मा अनादिकाल से बंधन में था पर ऐसा भी नहीं है, क्योंकि प्रकृति छाया की तरह है जिसका अस्तित्व ही नहीं है। जो चीज अनादि है उसका अंत हो ही नहीं सकता। शास्त्रों में कई जगह लिखी यह बात मुझे समझ नहीं आती जिसमें कहा गया है कि बंधन अनादि है, पर उसका अंत हो सकता है। ऐसा होना असंभव है। अंत उसीका हो सकता है जिसकी कभी शुरुआत हुई हो। शायद वे ठीक कह रहे हैं पर हम गलत समझते हैं। ऐसा कहने का उनका एक प्रयोजन बंधन से डराना और उसे कमजोर न समझने की भूल न करना है। दूसरा प्रयोजन यह बताना है कि पुरुष कभी बंधन में नहीं पड़ सकता। अगर ऐसा होता तो लोग बंधन को मिटाने के लिए ज्यादा प्रयास न करते क्योंकि उन्हें फिर बंधन में पड़ने का डर बना रहता। शायद उनका बंधन अनादि कहने का तात्पर्य यह है कि प्रकृति अनादि है, यह नहीं कि जीवात्मा अनादि है। शायद उनका कहने का यह मतलब है कि यह बंधन परंपरा अनादि है और एक आदमी के मुक्त होने से खत्म नहीं हो जाती। साथ में परमात्मा इतना निर्दयी नहीं हो सकता कि उसने सभी जीवों को अनादिकाल से बंधन में जकड़ कर रखा हो। अंतिम प्रयोजन यह लगता है कि लोग गूढ़ दर्शन के झमेले से बचकर सिर्फ साधना पर ध्यान दे। वैसे कई जगह शास्त्रों में ऐसा भी कहा गया है कि फलां आदमी एक ही मनुष्य जन्म में मुक्त हो गया या हो जाता है, फलां को दस जन्म लेने पड़े, फलां को सौ आदि। इस्का यह मतलब हुआ कि बंधन की कभी शुरुआत हुई और वह अनादि नहीं है।
दरअसल प्रकृति का अस्तित्व है भी और नहीं भी। इसीलिए इसे शास्त्रों में अनिर्वचनीय कहा है। पेड़ की छाया भी अनिर्वचनीय ही होती है। वह होती है इसीलिए दिखती है, पर असल में होती भी नहीं।मतलब जीव या आदमी का बंधन अनादि भी है और अनादि नहीं भी है। सैद्धांतिक रूप से तो यह अनादि है पर अनुभवात्मक रूप से इसकी शुरुआत हुई थी। जब जीवात्मा बन ही गया तब इसका विलय पुरुष में ही संभव है, नहीं तो वह अस्तित्वहीन होकर भी सुख-दुख अनुभव करता हुआ भटकता ही रहेगा। यह आश्चर्य ही है कि जीवात्मा का अस्तित्व न होते हुए भी वह कैसे बन जाता है? यह प्रकृतिपुरुष का ही खेल है। जीवात्मा एक भ्रममात्र ही है। मतलब जीवात्मा की उत्पत्ति नहीं होती बल्कि भ्रम की उत्पत्ति होती है। भ्रम खत्म तो बंधन खत्म।
प्रकृति भूमि है तो पुरुष पेड़ है। जब पेड़ का बीज जमीन पर गिरता है तो वह बढ़ने लगता है और बढ़ते बढ़ते पेड़ ही बन जाता है। जैसे जैसे पेड़ बढ़ता है वैसे वैसे भूमि दिखनी कम होती रहती है, और पेड़ दिखना बढ़ता रहता है। अंत में पेड़ इतना फैल जाता है कि उसके पत्तों के झुरमुटों के शिखर से भूमि बिल्कुल नहीं दिखती। ऐसा लगता है कि भूमि और बीज दोनों वृक्ष बन गए हैं। पर दरअसल बीज ही वृक्ष बना होता है। भूमि तो पहले के जैसी ही होती है। एक बीज के पेड़ बनने से भूमि नष्ट नहीं हो जाती, पर दूसरे बीजों को भी पेड़ बनाने के लिए वैसी ही बनी रहती है। इसी तरह प्रकृति भी है जो न होते हुए भी आभासी भूमि की तरह है।
भूमि सबसे नीचे थी। वह आकाश की ऊंचाइयों को छूना चाहती थी। आकाश न सही, पेड़ की ऊंचाई तक ही सही। पर सीधे तौर पर वह ऐसा नहीं कर सकती थी। इसलिए उसने पेड़ की मदद ली। पेड़ के बीज को उसने बढ़ाया और फैलाया और उसे ऊंचा उठा दिया। भूमि बेशक खुद ऊंची नहीं उठ सकी पर उसे पेड़ों को ऊंचा उठाने का श्रेय मिला, जो उसे तसल्ली देने के लिए काफी था। इसी तरह पुरुष की छाया मतलब प्रकृति भी पुरुष जैसा महान बनना चाहती थी। वह सीधे तौर पर ऐसा नहीं कर सकती थी क्योंकि पेड़ की छाया कभी पेड़ नहीं बन सकती और न पेड़ से मिल ही सकती है। इसलिए उसने पुरुष के बीज की मदद ली। उसने पुरुषबीज मतलब जीवात्मा को बढ़ाना शुरु किया और उसे कुंडलिनी जागरण करा के पुरुष जितना ऊंचा उठा दिया। प्रकृति बेशक खुद पुरुष नहीं बन सकी, पर उसे जीवात्माओं को ऊंचा उठाने का श्रेय मिला, जो उसे तसल्ली देने के लिए काफी था। मां भी लगभग ऐसी ही होती है, इसीलिए प्रकृति और धरती को मां भी कहा गया है।