दोस्तों, पूर्ण प्रकृति संपूर्ण जगत की छाया है। पूर्ण प्रकृति को मूल प्रकृति भी कहते हैं। यह समष्टि जगत की मूल प्रकृति है। व्यष्टि जगत की मूल प्रकृति को मूलाधार कहते हैं। पर मूलाधार तो शुद्ध छाया होती है। उसमें किसी विशेष भौतिक वस्तु की सूचना नहीं छिपी होती। मतलब यह शून्यमय छाया होती है। उधर हम मूल प्रकृति के अंदर संपूर्ण भौतिक जगत की सूचना को दर्ज होया हुआ मान रहे हैं। पर इसमें कोई विरोधाभास नहीं है। मूल प्रकृति में सभी विरोधी सूचनाएं एक दूसरे से रद्द होकर शून्य ही बन जाती हैं। पूरी सृष्टि संतुलित है, मतलब न्यूट्रल है। इसमें जितना पॉजिटिव है, उतना ही नेगेटिव है। इस तरह से मूल प्रकृति और मूलाधार दोनों एक ही है। मतलब आदमी मूलाधार के रूप में मूल प्रकृति को भी महसूस कर सकता है। क्योंकि मूल प्रकृति संपूर्ण सृष्टि का सूक्ष्म रूप है, इसका मतलब है कि आदमी अप्रत्यक्ष रूप में अर्थात मूलाधार के रूप में संपूर्ण सृष्टि को भी एक साथ अनुभव कर सकता है।
यहां एक पेच भी है। कोई कह सकता है कि जब मूल प्रकृति में सभी सूचनाएं खत्म हो गईं, तो उसमें अंधेरा कैसे रहा, क्योंकि अंधेरे का मतलब ही उसमें सूक्ष्म सूचनाओं की उपस्थिति है। दरअसल सूचनाएं खत्म नहीं हुईं, पर उनका कुल प्रभाव एकदूसरे से रद्द हो गया। सूचनाएं तो उसमें सारी रहीं। यह ऐसे ही है जैसे हलवे में चीनी और नीम डालने से होगा। रहेंगी तो ये दोनों चीजें, पर हलवा हमें न मीठा लगेगा, न कड़वा। आदमी के मूलाधार में पहुंचने पर भी ऐसा ही होता है। उसमें सभी सूचनाएं एकसमान होती हैं। इसलिए एकसमान सा, न चुभने वाला और आनंदमयी सा अंधेरा महसूस होता है उसमें। न किसी सूचना से राग, न किसी सूचना से द्वेष। यही अद्वैत है। इसीलिए अद्वैत और अनासक्त जीवन जीने की सलाह दी जाती है। इससे आदमी जल्दी मूलाधार में पहुंच जाता है। पर यह तभी होता है, जब अद्वैत के साथ भरपूर, विविध, और विरोधी दुनियादारी को भी जिया जाए। इससे आदमी सभी किस्म की विपरीत सूचनाएं इकट्ठा करेगा, जो एकदूसरे से रद्द होकर जल्दी ही मूलाधार में प्रवेश करा देती हैं। बिना विरोधी दुनियादारी के अद्वैत का आचरण एक दिखावा ही लगता है मुझे।
फिर कहते हैं कि मूलाधार तो विकास करते हुए कुंडली जागरण के माध्यम से पुरुष में विलीन हो सकता है। फिर मूल प्रकृति पुरुष में विलीन होकर खत्म क्यों नहीं हो जाती। शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि मूल प्रकृति का भौतिक अस्तित्व है, जिसे हम डार्क मैटर या डार्क एनर्जी कहते हैं। यह वैज्ञानिक सिद्धांत है कि भौतिक वस्तु कभी खत्म नहीं हो सकती। वह केवल रूप बदल सकती है, पर रहेगी वह हमेशा। इसे हम थ्योरी ऑफ कंजर्वेशन ऑफ मास एंड एनर्जी कहते हैं। एक वस्तु विभिन्न किस्म की वस्तुओं के रूप में या ऊर्जा के रूप में रह सकती है। यह सभी रूप आपस में बदलते रह सकते हैं। पर वह वस्तु कभी खत्म नहीं हो सकती। दूसरी तरफ मूलाधार का कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है। यह एक आत्मा का अनुभव है। वह अनुभव भी सच्चा नहीं पर भ्रमपूर्ण है। या ऐसा कह लो कि यह आत्मा पर भ्रम से बना हुआ मूल प्रकृति का आभासी चित्र मात्र है। असली या भौतिक उसमें कुछ भी नहीं है। जब आत्मा को ज्ञान होने पर भ्रम समाप्त हो जाता है, तो मूलाधार का अनुभव पुरुष के अनुभव के असली रूप में आ जाता है। यही सच्चा और असली अनुभव है। अगर मूल प्रकृति भी मात्र एक अनुभव होता और उसका कोई भौतिक अस्तित्व न होता, तब तो वह कब की खत्म हो जाती, और सृष्टि का अस्तित्व ही नहीं बचता। तब न हम होते, न आप और न ही यह रंगीन दुनिया। कई वेदांती लोग कहते हैं कि मूल प्रकृति का अस्तित्व नहीं है। वह भ्रम है, आदि-आदि। वे दरअसल मूलाधार की बात कर रहे हैं, जो मूल प्रकृति का आभासी मानसिक चित्र है। भौतिक रूप में तो सूक्ष्म मूल प्रकृति का अस्तित्व वैसा ही सत्य है, जैसा स्थूल भौतिक जगत का। बाईबल के Genesis 2:7 में मानवता को इसी तरह परिभाषित किया गया है। वहाँ हम पाते हैं कि परमेश्वर ने मानवता को परमेश्वर की छवि में बनाया है। परमेश्वर ने मानवता को एक ऐसे तरीके से बनाया है जो भौतिक दुनिया को बनाने के तरीके से बहुत अलग है।
कुंडलिनी योग से मूलाधार को ही पुरुष में विलीन किया जा सकता है, मूल प्रकृति को नहीं। पहले हर एक चक्र पर जमा संसारी कचरे को बाहर निकाला जाता है। फिर खाली हुए चक्र स्थानों पर कुंडलिनी चित्र को भरा जाता है। तभी यह हर समय ध्यान में रहते हुए उचित अवसर आने पर जाग जाता है। यह ऐसे ही है, जैसे एक माली बंजर भूमि पर फूल तभी उगा सकता है, जब उसके द्वारा पहले वहां के घास, फूस, झाड़, कंकड़ आदि को हटाकर उस जगह को साफ किया जाता है। अच्छी तरह से पाला और संभाला गया फूल का पौधा ऊपर उठता हुआ और बढ़ता हुआ कभी न कभी तो जागृति के फूल के रूप में खिलेगा ही।
भौतिक वस्तु न तो कभी पैदा हो सकती है, और न नष्ट हो सकती है, यह वैज्ञानिक सिद्धांत सांख्य दर्शन के सिद्धान्त को भी बयां करता है। इसके अनुसार प्रकृति भी रूप बदलती रहती है। यह कभी व्यक्त होती है, कभी अव्यक्त। पर रहती यह हमेशा है। मतलब यह अनादि, अनंत है। इसलिए यह सत्य नहीं कि प्रकृति या जगत की उत्पत्ति पुरुष अर्थात परमात्मा से हुई है। पुरुष की तरह प्रकृति का भी अपना स्वतंत्र अस्तित्व है। यह जो पुरुष से प्रकृति के उत्पन्न होने की बात की गई है, वह मन के अंदर बने प्रकृति के चित्र मतलब व्यष्टि प्रकृति के लिए कही गई है। आत्मा मतलब पुरुष खुद उस चित्र का रूप ले लेता है। मतलब उस प्रकृतिचित्र की उत्पत्ति पुरुष से हुई, प्रकृति की नहीं। आत्मा को जब अपने असली पुरुष रूप का ज्ञान हो जाता है, तो मानो वह प्रकृतिचित्र फिर से अपने असली पुरुष रूप में आ गया, मतलब प्रकृति पुरुष में विलीन हो गई।