क्या आत्मबोध की झलक ही सबसे ऊँचा अनुभव है?

क्या किसी जीवित प्राणी के लिए आत्मबोध की झलक (ग्लिम्प्स) ही सबसे उच्चतम अनुभव है? क्या इसे प्राप्त कर लेने का मतलब यह है कि उसने अपनी चरम सीमा पा ली? नहीं, क्योंकि झलक केवल शिखर का स्वाद देती है, लेकिन असली पूर्णता उस शिखर पर टिके रहने में है। जागृति के बाद व्यक्ति को अपने मौलिक स्वभाव में लौटना होता है, जो समाधि या मुक्ति की स्थिति है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि झलक का कोई मूल्य नहीं। यह एक दुर्लभ अनुभव है, जिसे कम से कम एक बार पाना ही जीवन को नई दिशा दे सकता है।

क्या मुक्ति में आत्मबोध की झलक से अधिक आनंद होता है?

जागृति की झलक में प्राण ऊर्जा एक तीव्र विस्फोट की तरह होती है, जिससे आनंद अत्यधिक और अकल्पनीय लगता है। यह प्रेम, भक्ति, रोमांस, सौंदर्य, दिव्यता—सभी को चरम पर पहुँचा देता है। लेकिन यह अनुभव अस्थायी होता है क्योंकि यह शरीर और मन की सीमाओं में बंधा होता है। दूसरी ओर, समाधि में यह ऊर्जा संतुलित रूप में स्थायी रहती है। वहाँ कोई संघर्ष नहीं, कोई गिरावट नहीं, केवल सहज पूर्णता होती है। यह संभव है कि समाधि का आनंद बाहरी रूप से जागृति से कम तीव्र लगे, लेकिन यह कभी समाप्त नहीं होता। जागृति का अनुभव बिजली की कौंध की तरह है, जबकि समाधि सूर्य के समान—शाश्वत और अडिग।

क्या बिना आत्मबोध की झलक के समाधि प्राप्त करने वाले को पछतावा रहेगा?

अगर कोई व्यक्ति सीधे समाधि में प्रवेश कर जाए और उसे आत्मबोध की तीव्र झलक न मिली हो, तो क्या उसे हमेशा यह पछतावा रहेगा कि उसने वह अनुभव नहीं किया? शायद हाँ। इसलिए संतों और शास्त्रों ने कहा है—मुक्ति से पहले प्रेम और पूर्ण समर्पण का चरम अनुभव करो। प्रेम, भक्ति और सौंदर्य की पराकाष्ठा आत्मबोध की झलक को जन्म देती है। यह क्षणिक हो सकती है, लेकिन इससे समाधि भी एक भावशून्य स्थिति नहीं, बल्कि आनंद और प्रेम से भरी पूर्णता बन जाती है।

जीवन में आत्मबोध की झलक क्यों आवश्यक है?

आत्मबोध की झलक केवल आध्यात्मिकता की बात नहीं है, यह जीवन की पूर्णता का अनुभव है। प्रेम और भक्ति का शुद्धतम रूप, गहरी करुणा, और अस्तित्व से असीम जुड़ाव—यह सब उसी झलक से संभव होता है। यह अनुभव हमें यह सिखाता है कि जीवन केवल मुक्त होने के लिए नहीं, बल्कि जीने के लिए भी है। केवल बंधन तोड़ने से मुक्ति नहीं मिलती, जब तक कि प्रेम, भक्ति और आनंद का पूर्ण विस्तार न हो जाए।

इसलिए, मेरा विश्वास है कि जीवन में कम से कम एक बार आत्मबोध की झलक पाना, चाहे वह क्षणभर के लिए ही क्यों न हो, सबसे मूल्यवान उपलब्धि हो सकती है। यह हमें न केवल सत्य की झलक देता है, बल्कि उसे जीने की प्रेरणा भी देता है।

पूर्णता का भ्रम

लंबे समय तक, मैं इस सूक्ष्म भ्रम में रहा कि ज्ञान की एक झलक पाने के बाद, मैंने सब कुछ पा लिया है। वह एक पल इतना पूर्ण, इतना अभिभूत करने वाला लगा कि मैंने इसे अंतिम गंतव्य समझ लिया। लेकिन जीवन, अपने परीक्षणों और सबक के साथ-विशेष रूप से शरीरविज्ञान दर्शन के लेंस के माध्यम से-एक गहरी सच्चाई को उजागर करता गया। वह झलक अंत नहीं थी, बल्कि केवल शुरुआत थी। यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है, और आगे का रास्ता जितना मैंने कभी सोचा था, उससे कहीं अधिक लंबा है।

Published by

Unknown's avatar

demystifyingkundalini by Premyogi vajra- प्रेमयोगी वज्र-कृत कुण्डलिनी-रहस्योद्घाटन

I am as natural as air and water. I take in hand whatever is there to work hard and make a merry. I am fond of Yoga, Tantra, Music and Cinema. मैं हवा और पानी की तरह प्राकृतिक हूं। मैं कड़ी मेहनत करने और रंगरलियाँ मनाने के लिए जो कुछ भी काम देखता हूँ, उसे हाथ में ले लेता हूं। मुझे योग, तंत्र, संगीत और सिनेमा का शौक है।

Leave a comment