कुंडलिनी जागरण के लिए ही सृष्टिरचना होती है; हिंदु पुराणों में शिशु विकास को ही ब्रह्माण्ड विकास के रूप में दिखाया गया है

मित्रो, पुराणों में सृष्टि रचना विशेष ढंग से बताई गई है। कहीं आकाश के जल में अंडे का फूटना, कहीं पर आधाररहित जलराशि में कमल का प्रकट होना और उस पर एक देवता का अकस्मात प्रकट होना आदि। कहीं आता है कि सीधे ही प्रकृति से महत्तत्व, उससे अहंकार, उससे तन्मात्रा, उससे इंद्रियां और उससे सारी स्थूल सृष्टि पैदा हुई। जब मैं छोटा था, तब अपने दादाजी (जो एक प्रसिद्ध हिंदू पुरोहित और एक घरेलू पुराण वक्ता थे) से पूछा करता था कि अचानक खुले आसमान में बिना आधारभूत संरचना के ये सारी चीजें कैसे प्रकट हो गईं। वे परंपरावादी और रहस्यवादी दार्शनिक के अंदाज में कहते थे, “ऐसे ही होता है। हो गया तो हो गया।” वे ज्यादा बारीकी में नहीं जाते थे। पर अब कुंडलिनी योग की मदद से मैं इस शास्त्रीय उक्ति को ही सभी रहस्यों का मूल समझ रहा हूँ, “यत्पिण्डे तत्ब्रम्हांडे”। इसका मतलब है कि जो कुछ इस शरीर में है, वही सब कुछ ब्रम्हांड में भी है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। इस उक्ति को पुस्तक”शरीरविज्ञान दर्शन” में वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया गया है। इसलिए प्राचीन दूरदर्शी ऋषियों ने शरीर का वर्णन करके ब्रम्हांड को समझाया है। वे गजब के शरीर वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक थे। दरअसल, एक आदमी कभी भी अपने मन या मस्तिष्क के अलावा कुछ नहीं जान सकता है, क्योंकि वह जो कुछ भी वर्णन करता है, वह उसके मस्तिष्क के अंदर है, बाहर नहीं।

सृष्टि रचना पुराणों में शरीर रचना से समझाई गई है

 कई जगह आता है कि शेषशायी विष्णु की नाभि से कमल पैदा हुआ जिस पर ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। उसी के मन ने सृष्टि को रचा। माँ को आप विष्णु मान सकते हो। उसका शरीर एक शेषनाग की तरह ही केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के रूप में है, जो मेरुदंड में स्थित है। वह नाग हमेशा ही सेरेब्रोस्पाइनल फ्लुइड रूपक समुद्र में डूबा रहता है। उस नाग में जो कुंडलिनी या माँ के मन की संवेदनाएं चलती हैं, वे ही भगवान विष्णु का स्वरूप है, क्योंकि शक्ति और शक्तिमान भगवान में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं। गर्भावस्था के दौरान जो नाभि क्षेत्र में माँ का पेट बाहर को उभरा होता है, वही भगवान विष्णु की नाभि से कमल का प्रकट होना है। विकसित गर्भाशय को भी माँ के शरीर की नसें-नाड़ियाँ माँ के नाभि क्षेत्र के आसपास से ही प्रविष्ट होती हैं। खिले हुए कमल की पंखुड़ियों की तरह ही गर्भाशय में प्लेसेंटोमस और कोटीलीडनस उन नसों के रूप में स्थित कमल की डंडी से जुड़े होते हैं। वे संरचनाएं फिर इसी तरह शिशु की नाभि से कमल की डंडी जैसी नेवल कोर्ड से जुड़ी होती हैं। ये संरचनाएं शिशु को पोषण उपलब्ध कराती हैं। यह शिशु ही ब्रह्मा है, जो उस खिले कमल पर विकसित होता है। शिशु का साम्यगुण रूप ही वह मूल प्रकृति है, जिसमें गुणों का क्षोभ नहीं है। पहले मैं समझा करता था कि साम्यावस्था का मतलब है कि सभी गुण (प्रकृति का आधारभूत घटक) एक-दूसरे के बराबर हैं। आज भी बहुत से लोग ऐसा समझते हैं। पर ऐसा नहीं है।अगर ऐसा होता तो मूल रूप में सभी जीव एक जैसे होते, पर वे प्रलय या मृत्यु के बाद भी अपनी अलग पहचान बना कर रखते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आत्मा के प्रकाश को ढकने वाले तमोगुण की मात्रा सबमें अलग होती है। इससे अन्य गुणों की मात्रा भी खुद ही अलग होती है। यदि तमोगुण ज्यादा है, तो उसी अनुपात में सतोगुण कम हो जाता है, क्योंकि ये एक-दूसरे के विरोधी हैं। दरअसल उसमें सभी गुण साम्यावस्था में अर्थात समान अवस्था में होते हैं। सभी गुणों का समान अवस्था में होने का या उनमें क्षोभ या लहरों के न होने का मतलब है कि सत्त्वगुण (प्रकाश व ज्ञान का प्रतीक) भी घटने-बढ़ने के बजाय एकसमान रहता है, रजोगुण (गति, बदलाव व ऊर्जा का प्रतीक) भी एकसमान रहता है, और तमोगुण (अंधकार व अज्ञान का प्रतीक) भी। इससे वह किसी विशेष गुण की तरफ लालायित नहीं होता। इसीलिए शिशु सबकुछ अनुभव करते हुए भी उदासीन सा रहता है। वह निर्गुण नहीं होता। क्योंकि गुणों में क्षोभ तभी पैदा हो सकता है, यदि गुण पहले से विद्यमान हों। निर्गुण या गुणातीत तो केवल भगवान ही होता है। इसलिए उसमें कभी गुण-क्षोभ सम्भव नहीं हो सकता है। इसीलिए ईश्वर हमेशा ही परिवर्तनरहित हैं। ईश्वर निर्गुण इसीलिए होता है, क्योंकि उसमें आत्म-अज्ञान से उत्पन्न तमोगुण नहीं होता। सभी गुण तमोगुण के आश्रित होते हैं। इसी वजह से तो पंचमकारी या वामपंथी तांत्रिक दुनियादारी और अध्यात्म दोनों में अव्वल लगते हैं। फिर शिशु के थोड़ा बड़ा होने पर चित्त या मस्तिष्क में वृत्तियों या संवेदनाओं के बढ़ने से गुणों में, विशेषकर सतोगुण में क्षोभ पैदा होता है, और वह प्रकाश की ओर आकर्षित होने लगता है। इससे सतोगुण रूप महत्तत्व अर्थात बुद्धि उत्पन्न होती है। उसे लगने लगता है कि उसकी सत्ता के लिए उसका रोना और दूध पीना कितना जरूरी है। उससे शिशु को अपने विशेष और सबसे अलग होने का अहसास होता है, जिसे अहंकार कहते हैं। इसप्रकार अहंकार की उत्पत्ति हो जाती है। उससे तन्मात्राओं की उत्पत्ति होती है। तन्मात्रा पंचमहाभूतों का सूक्ष्म रूप या अनुभव मात्र होती हैं, जिन्हें हम मस्तिष्क में अनुभव करते हैं। जैसे पृथ्वी की तन्मात्रा गंध, जल की रस, वायु की स्पर्श, अग्नि की रूप और आकाश की शब्द होती है। वह दूध के रस के स्वाद को पहचानने लगता है, खिलौने की गंध को पहचानता है, अपने किए मूत्र की गर्मी को स्पर्ष करता है, सुंदर-असुंदर रूप में अंतर समझने लगता है, घुंघरू या खिलौने की आवाज की ओर आकर्षित होता है। फिर शिशु बाहर की तरफ नजर दौड़ाता है कि ये अनुभूतियाँ कहाँ से आईं। उससे इन्द्रियों की उत्पत्ति होती है, क्योंकि वह चक्षु, कान, त्वचा, जीभ, नाक आदि इन्द्रियों की सहायता से ही बाहर को महसूस करता है। इसीके साथ मन रूप इन्द्रिय भी विकसित होती है, क्योंकि वह इसी से ऐसा सब सोचता है। इन्द्रियों से उपरोक्त पंचमहाभूतों की उत्पत्ति होती है, क्योंकि वह इन्द्रियों से ही उनको खोजता है और उन्हें अनुभव करता है। उसे पता चलता है कि दूध, खिलौना, घुंघरू आदि भौतिक पदार्थ भी दुनिया में हैं, जिन्हें वह इन्द्रियों से महसूस करता है। फिर आगे-2 जैसा-2 बच्चा सीखता रहता है, वैसी-2 सृष्टिरचना की उत्पत्ति आगे बढ़ती रहती है। इस तरह से एक आदमी के अंदर ही पूरी सृष्टि का विस्तार हो जाता है। 

कुण्डलिनी जागरण ही सृष्टि विकास की सीमा है

सृष्टि रचना का विस्तार आदमी कुंडलिनी जागरण के लिए ही करता है। यह तथ्य इस बात से सिद्ध होता है कि कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी सृष्टि विस्तार से उपरत सा हो जाता है। उसका झुकाव प्रवृत्ति (दुनियादारी) से हटकर निवृत्ति (रिटायरमेंट) की तरफ बढ़ने लगता है। उसकी प्रवृत्ति भी निवृत्ति ही बन जाती है, क्योंकि फिर उसमें आसक्ति से उत्पन्न क्रेविंग या छटपटाहट नहीँ रहती। पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि यह स्थिति मन की होती है, बाहर से वह पूरी तरह से दुनियादारी के कामों में उलझा हो सकता है। कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी को लगता है कि उसने पाने योग्य सब कुछ पा लिया है, और करने योग्य सबकुछ कर लिया है। 

शिव पुराण के अनुसार सृष्टि रचना शिव के वीर्य से हुई

शिवपुराण में आता है कि प्रकृति रूपी योनि में शिव के वीर्यस्थापन से एक अंडे की उत्पत्ति हुई। वह अंडा 1000 सालों तक जल में पड़ा रहा। फिर वह बीच में से फटा। उसका ऊपर का भाग सृष्टि का कपोल बना। उससे ऊपर के श्रेष्ठ लोक बने। नीचे वाले भाग से निम्न लोक बने। 
दरअसल शिव यहाँ पिता है, और प्रकृति या पार्वती माता है। दोनों के वीर्य और रज के मिलन से गर्भाशय में अंडा बना। वह गर्भाशय के पोषक जल में लंबे समय तक पड़ा रहा और विकसित होता रहा। फिर वह फटा, अर्थात मनुष्याकृति में उससे अंगों का विभाजन होने लगा। उसमें ऊपर वाला भाग सिर या कपोल की तरह स्पष्ट नजर आया। उसमें सहस्रार चक्र, आज्ञा चक्र और विशुद्धि चक्र के रूप में ऊपर वाले लोक बने। नीचे के भाग में अन्य चक्रों के रूप में नीचे वाले लोक बने।

कुण्डलिनी ही माता पार्वती है, जीवात्मा ही भगवान शिव है, और कुण्डलिनी जागरण ही शिवविवाह है

दोस्तो, पिछली पोस्ट में इस सर्वविदित सिद्धांत की पुष्टि की गई थी कि दरअसल कुंडलिनी विकास को ही जीवविकास की संज्ञा दी गई है। कुंडलिनी मूलाधार में जन्म लेती है, विभिन्न स्थानों पर बढ़ती है, और अंत में सहस्रार में जागृत हो जाती है। इसे ही शिवविवाह कहते हैं। जैसे उच्च कोटि के गृह में विवाह के बाद प्रेमी युगल विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करता है, वैसे ही आत्मा-कुंडलिनी का जोड़ा सहस्रार में विवाहित होकर विभिन्न चक्रों पर भ्रमण करता रहता है। इसे ही शास्त्रों में ऋषियों का विभिन्न लोकों में भ्रमण बताया गया है। दरअसल वे लोक विभिन्न चक्रों के रूप में ही हैं। आज हम इस पर चर्चा करेंगे।

कुंडलिनी ही पार्वती है

अहंकार ही राजा दक्ष है। उसकी बेटी सती ही कुंडलिनी है। अहंकार से ही आदमी दुनियादारी में कामयाब होता है। उसी से एक स्थिर चित्र का निर्माण होता है, जो कुंडलिनी है। अहंकार रूपी दक्ष नहीं चाहता कि उसकी पुत्री कुंडलिनी भूतिया शिव के पीछे भागकर उसकी दुनियादारी को नुकसान पहुंचाए। अंत में वह हार जाता है और सती शिव को प्राप्त करने के लिए कुंडलिनी योग रूपी तप करती है। वह उसकी इच्छा के विरुद्ध जाकर शिव से विवाह कर लेती है मतलब कुंडलिनी जाग जाती है। अहंकार काफी कम हो जाता है पर मरता नहीं। वह कुंडलिनी को शिव से दूर करके अपने झमेले में फंसा लेता है। जब कुंडलिनी को यह भान होता है तब तक उसकी उमर पूरी हो चुकी होती है। गुस्से में शिव के द्वारा दक्ष का सिर काटकर बकरे का सिर लगाने का अर्थ है कि अहंकार शरीर के साथ भी नहीं मरता, अपितु कुछ क्षीण जरूर हो जाता है। अगले जन्म में कुंडलिनी रूपी सती पार्वती के रूप में पर्वत राज के घर पैदा होती है। वह शिव की प्राप्ति के लिए फिर तप करती है। कुंडलिनी अपना अभियान अगले जन्म में फिर से शुरु कर देती है। मैटाफोरिक कथा में इसका मतलब है कि उस कुंडलिनी को धारण करने वाला योगी अपने अगले जन्म में अपने अंतिम लक्ष्य की पूर्ति के लिए हिमालय में योगसाधना करने चला जाता है। वहाँ इंद्र अपनी गद्दी खो जाने के डर से कामदेव को शिव की तपस्या भंग करने के लिए भेजता है। शिव उसे अपनी दृष्टि से जला देते हैं। यहाँ शिव, योगी की सुप्त अंतरात्मा हैं। कामदेव दुनिया की रंगरलियों का रूपक है। यदि योगी की कुंडलिनी उसकी आत्मा से मिलन को उत्सुक हो, तो दुनिया की रंगरलियां आत्मा का अहित नहीँ कर सकतीं, बल्कि खुद ही क्षीण हो जाती हैं। पार्वती के माता-पिता प्रारंभ में पार्वती को शिव से विवाह से रोकते हैं। दरअसल मन-बुद्धि ही पार्वती के माता पिता के प्रतीक हैं। कुंडलिनी की उत्पत्ति उन्हीं से होती है। वे कुंडलिनी से दुनियादारी की उपलब्धियों की ही अपेक्षा रखते हैं, उसे ईश्वर की प्राप्ति के लिए तप आदि प्रयास नहीं करने देना चाहते। शिव भी पार्वती को हतोत्साहित करने के लिए उसे घटिया भेष में मिलकर शिव की बुराइयां सुनाते हैं। दरअसल वह अज्ञान से ढकी प्रारंभिक योगी की आत्मा ही है जो भगवान के बारे में भ्रम पैदा करती रहती है। पर पार्वती तप में लगी रहती है। अंत में शिव प्रसन्न होकर उससे विवाह कर लेते हैं, मतलब कुंडलिनी जागरण हो जाता है। फिर पार्वती कैलाश को चली जाती है, मतलब कुंडलिनी सहस्रार में बस जाती है। उसके कार्तिकेय बेटा पैदा होता है। वह दिव्य सेना का अधिपति है। उसके बेटा गणेश भी जन्म लेता है, जो समस्याओं से बचाता है, और विघ्नों को हरता है। वास्तव में ये सभी काम जागृत कुंडलिनी के ही हैं। दिव्य सेना यहाँ शरीर की इन्द्रियों की प्रतीक है। शिवपुराण की मिथक कथा में शिव को भूत की तरह दिखाया गया है, जिसके प्रति पार्वती आकर्षित होती है। उसके माँ बाप उसे रोकते हैं। दरअसल अज्ञान से ढकी आत्मा ही शिव है, जो बाहर से अंधेरे भूत की तरह लगती है। पर असल में अंदर से वह प्रकाशरूप ही होती है। अहंकार और बुद्धि ही पार्वती रूपी कुण्डलिनी के माँ-बाप हैं। ये उसे शिव की ओर जाने से रोकते हैं।कालिदास के कुमारसम्भव के अनुसार पार्वती शिव को गुफा के वीराने से गृहस्थ जीवन की मुख्य धारा में लाना चाहती है। कुण्डलिनी भी इसी तरह से अज्ञाननिद्रा में डूबी आत्मा को जगाना चाहती है। साथ में लिखा है कि कामदेव के भस्म होने से सृष्टि व्यवस्था थम सी गई थी। फिर पार्वती ने शिव से विवाह किया और उनसे कामदेव को पुनर्जीवित करवाया। फिर सृष्टि की प्रक्रिया पुनः प्रारंभ हो गई। जब तक तीव्र कुंडलिनी योगसाधना चली होती है, तब तक योगी दुनियादारी से दूरी सी बना कर रखता है। कुण्डलिनी जागरण के बाद उसका मन पुनः दुनिया में रम जाने का करता है, यद्यपि ज्ञान के साथ। इसे ही कामदेव का पुनर्जन्म कहा गया है।देवीभागवत पुराण के अनुसार, पर्वत राज हिमालय और उसकी पत्नी मैना भगवती आदि पराशक्ति को प्रसन्न करती है। वही पार्वती के रूप में उनकी बेटी बन जाती है। वास्तव में अज्ञान से ढकी आत्मा ही पर्वत राज हिमालय है, और बुद्धि मैना है। जब दोनों अच्छे सांसारिक कर्मों से व मानवता से शक्ति को प्रसन्न करते हैं तो वह कुंडलिनी के रूप में उनके शरीर में स्थायी रूप से बस जाती है। 
पार्वती अपने लास्य नृत्य से शिव को शांत करती हैं, जब वे विनाशकारी तांडव नृत्य करते हैं। असल में अज्ञान से भरी हुई जीवात्मा अशांत व भटकी हुई होती है। वह बहुत से गलत काम करती है। कुंडलिनी ही उसे प्रकाश प्रदान करके सन्मार्ग दिखाती है।
शाक्त के अनुसार, शिव पार्वती के घर पर निवास करते हैं। यहाँ पार्वती को मुख्य और शिव को गौण माना गया है। उनके आपसी विवाद से शिव नाराज होकर घर छोड़कर जाने लगते हैं। तब पार्वती दशमहाविद्याओं को उतपन्न करके उनसे शिव के भागने का हरेक द्वार बंद करवाती है, और शिव को जाने से रोकती है। दरअसल सहस्रार के सिवाय विभिन्न चक्र विशेषकर मूलाधार कुंडलिनी का घर है। वहाँ उसका प्रभुत्व रहता है। वहाँ जीवात्मा ज्यादा सहज नहीं रहता। किसी कारणवश कुंडलिनी के शिथिल पड़ने से वह वहाँ से भागने लगता है। फिर कुण्डलिनी पंचमकारों और उनसे उत्पन्न पाँच वीभत्स भावों का आश्रय लेती है। इससे वह बहुत मजबूत होकर जीवात्मा को जाने से रोकती है। क्योंकि जहाँ कुंडलिनी है, वहाँ जीवात्मा है। उसके भागने के लिए कहे गए विभिन्न मार्ग कुंडलिनी चक्र ही हैं। कई स्थानों पर कुंडलिनी चक्रों की संख्या दस भी बताई गई है।एक मिथक के अनुसार, पार्वती नहा रही होती है। उसने अपने बेटे गणेश को दरवाजे पर पहरेदार के बतौर रखा होता है। गणेश शिव को भी अंदर नहीँ जाने देते। शिव नाराज होकर उसका सिर धड़ से अलग कर देते हैं। इससे पार्वती शिव से बहुत नाराज होती है। फिर उसे प्रसन्न करने के लिए शिव गणेश को हाथी का सिर लगाते हैं। दरअसल, कुंडलिनी चाहती है कि शरीर में उसका सबसे अधिक प्रभुत्व रहे। गणेश इन्द्रियों का नायक है। वह दुनिया की फालतू चीजों को कुंडलिनी का प्रभुत्व नष्ट करने से रोकता है। वह बाहर से आए भगवानों को भी ऐसा करने से रोकता है। इससे बाहरी धार्मिक संगठन नाराज होकर उसे सजा देते हैं। पर उन्हें कुण्डलिनी की शक्ति के आगे झुककर उसे छोड़ना पड़ता है। यद्यपि वह दुनिया के द्वारा की गई उपेक्षा से काफी क्षीण हो जाता है। शाक्त पंथ में यह भी आता है कि शक्ति के बिना शिव एक शव है। यह सत्य ही है क्योंकि कुंडलिनी के संयोग के बिना जीवात्मा अचेतन और अंधकार से भरा हुआ होता है। जब सहस्रार में उसका कुंडलिनी से विवाह होता है, तभी वह शिव बनता है। उपरोक्त सभी तथ्यों से जाहिर है कि कुंडलिनी योग ही शिव व पार्वती से जुड़ी मिथक कथाओं के मूल में है।

कुण्डलिनी ही जैव विकास का मुख्य उद्देश्य है

मित्रो, मैंने पिछ्ली एक पोस्ट में बताया था कि मैंने अपने मन की चेतना के स्तर के अनुसार कुंडलिनी को विभिन्न चक्रों पर अनुभव किया। ज्यादा चेतना होने पर कुंडलिनी ऊपर के चक्रों पर आई, तथा कम चेतना होने पर नीचे के चक्रों पर आई। वास्तव में चेतना का स्तर शुद्ध मन से मापा जाता है, बाह्य इंद्रियों से संयुक्त मन से नहीं। बाह्य इन्द्रियों के सहयोग से तो सभी लोग और बहुत से अन्य जीव चेतना से भरे होते हैं। मरने के बाद तो बाह्य इन्द्रियाँ रहती नहीं हैं। उस समय तो शुद्ध मन की सूक्ष्म चेतना ही काम आती है। आँखों से कुछ देखते समय मन में चेतना की बाढ़ सी महसूस होती है। वह चेतना आँखों के बल से पैदा होती है, मन के अपने बल से नहीँ। इसी तरह अन्य बाह्य इंद्रियों के मामले में भी समझना चाहिये। जैसे-जैसे मन की काबलियत भीतर से भीतर जाते हुए सूक्ष्मता में चेतना प्रकट करने की बढ़ती है, वैसे-वैसे ही वह मुक्ति के अधिक योग्य बनता जाता है। कुण्डलिनी उसकी इसी योग्यता को बढ़ाती है। कुंडलिनी ध्यान के समय आँखें बंद होने के साथ लगभग सभी बाह्य इंद्रियों के दरवाजे बंद होते हैं। फिर भी योग ध्यान की शक्ति से मन में प्रज्वलित हो रही कुंडलिनी में इतनी चेतना आ जाती है, जितनी बाह्य इन्द्रियों के सहयोग से भी नहीं आती। वर्षों के ऐसे लगातार अभ्यास से बिना कुण्डलिनी के शांत, विचाररहित मन में भी इतनी ही चेतना आ जाती है। इसे ही आत्मज्ञान कहते हैं। दरअसल मन भी बाह्य इन्द्रियों का एक सूक्ष्म रूप ही है।  विचाररहित मन को ही अक्सर आत्मा कहा जाता है। 

वास्तव में विकसित हो रहे जीवों के रूप में कुंडलिनी ही विकसित हो रही होती है। दरअसल कुंडलिनी मन का ही द्योतक है। कुंडलिनी ही सबसे उच्च स्तर का मानसिक विचार है। इसलिए हम कुंडलिनी की चेतना के स्तर से मन की चेतना का स्तर नाप सकते हैं।

कुंडलिनी के काम करने के लिए उसी न्यूरोनल ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो मस्तिष्क या दिमाग के काम करने के लिए आवश्यक होती है। उस न्यूरोनल ऊर्जा को प्राण ऊर्जा या प्राणशक्ति द्वारा उत्तेजित किया जाता है, जो पूरे शरीर की सामान्यीकृत ऊर्जा है। तो दोनों एक ही ईंधन से प्रेरित होते हैं इसीलिए दोनों आपस में जुड़े हुए हैं। लेकिन सृजन का मुख्य उद्देश्य जीव को अंतिम स्थिति प्रदान करना है। यह कुंडलिनी द्वारा किया जाता है। इसका अर्थ है कि कुंडलिनी विकास ही सृजन का प्राथमिक लक्ष्य है, मस्तिष्क का विकास नहीं। मस्तिष्क का विकास अनिच्छा से खुद ही होता है। यह सह-प्रभाव के रूप में है, यद्यपि यह कुप्रभाव भी बन सकता है, यदि इसे गलत दिशा में लगाया जाए। कई पुरानी सभ्यताओं ने इस तथ्य को अच्छी तरह से समझा और कुंडलिनी पर मुख्य ध्यान रखा। तभी तो उस समय विभिन्न आध्यात्मिक पद्धतियों का बोलबाला था। आज, कुंडलिनी-घटनाऐं दिन-प्रतिदिन बढ़ रही हैं, क्योंकि आज के युग का मस्तिष्क विकास भी अप्रत्यक्ष रूप से कुंडलिनी विकास का कारण बन रहा है। इसलिए, कुंडलिनी विकास और मस्तिष्क या विश्व विकास को एक साथ करना ही सबसे अच्छा तरीका है, ताकि कम से कम समय में कुंडलिनी जागरण हो सके। इसके लिए कर्मयोग भी एक अच्छा तरीका है।

कुंडलिनी चेतना के विकास का पैमाना है। कुण्डलिनी के सुषुप्त होने का अर्थ है कि मन सोया हुआ है। सोया इसलिए कहते हैं क्योंकि मन की चेतना कभी खत्म नहीं होती, केवल अप्रकट हो जाती है अर्थात सो जाती है। उस समय चेतन मन के स्थान पर अंधेरा ही होता है। आत्मज्ञान के बाद कुंडलिनी लगातार मन में उच्च चेतना के साथ छाई रहती है, जिसे हम समाधि कहते हैं। इसे कुंडलिनी के पूर्ण जागरण की सबसे क़रीबी अवस्था कह सकते हैं। इन दोनोँ विपरीत छोरों के बीच में अधिकांश जीव होते हैं। उनकी कुंडलिनी की चेतना का बल्ब कभी जलता रहता है, कभी धीमा पड़ जाता है, तो कभी बुझ जाता है।

कुण्डलिनी विकास के रूप में जीव विकास

योग के बारे में सुनने में आता है कि कुण्डलिनी (नाड़ी-ऊर्जा) ही विभिन्न जीवों के रूप में ऊपर चढ़ती रहती है। सबसे निम्न जीवों में व पेड़-पौधों में यह मूलाधार में सुषुप्त रहती है। इसे कुंडलिनी शक्ति या प्राण शक्ति भी कहते हैं। वास्तव में, उनमें भी यह शरीर को बनाए रखने के लिए जीव द्वारा अनुभव किए बिना ही पृष्ठभूमि में हमेशा काम करती रहती है। यह ऐसे ही है, जैसे एक आदमी जब सोया होता है, तब उसकी चेतना लुप्त होती है, पर वह शरीर को जीवित रखने वाले सभी काम तब भी कर रही होती है। यह पूरे शरीर में वितरित रहती है, लेकिन इसे मूलाधार चक्र में निवसित कहा जाता है, क्योंकि यह इसके विकास और पोषण का मुख्य स्थान है। यह ऐसा ही है, जैसे कि एक आदमी दुनिया में हर जगह भटक सकता है, लेकिन वह अपने विकास, पोषण और आराम(नींद) को मुख्य रूप से अपने घर पर ही प्राप्त करता है। साथ में, कुण्डलिनी मूलाधार चक्र से ही अपनी लम्बी यात्रा शुरु करती है। अचेतन मन और मूलाधार चक्र, दोनों को समान कहा जाता है, और दोनों को सबसे बुरी भावनाओं से जोड़ा जाता है। आगे जो कहा गया है कि कुंडलिनी की शुरुआत मूलाधार चक्र से ही होती है, इसका अर्थ है कि प्रकाश की ओर यात्रा अंधेरे से ही शुरू होती है। उससे थोड़े विकसित जीवों में यह मूलाधार में अत्यल्प जागृत अवस्था में आ जाती है। इन्हें उभयलिंगी या हेर्मैप्रोडिटिक कहा जा सकता है। सम्भवतः इसी स्तर पर पूर्ण आत्मा सहस्रार से गिरकर मूलाधार के गड्ढे में फंस कर सो गई थी। इसीलिए तो उस जीव का यिन या स्त्री और यांग या पुरुष रूप में विभाजन हुआ, ताकि एक-दूसरे के प्रति आकर्षण से आत्मा मूलाधार से ऊपर चढ़ते हुए पुनः सहस्रार में प्रविष्ट हो सके। मूलाधार के वर्चस्व वाले सबसे निम्न जीवों के पास अपशिष्ट शरीर उत्पादों के उन्मूलन के अलावा बाहरी ऊर्जावान कार्य करने के लिए कुछ भी नहीं है। यह गुदा द्वार के पास स्थित मूलाधार चक्र का कार्य है। इसलिए उनकी कुंडलिनी ऊर्जा को मूलाधार चक्र में केंद्रित कहा जाता है। उससे विकसित जीवों में यह स्वाधिष्ठान चक्र तक ऊपर चढ़ जाती है।  यहां जीव का यौन विभाजन होता है और वह यौन आकर्षण के साथ यौन इच्छा महसूस करने लगता है। तभी तो देखा जाता है कि निम्न जीवों में प्रजनन की गति बहुत तेज होती है। उसमें उनकी अधिकांश ऊर्जा का व्यय हो जाता है। यह कुंडलिनी या जीव विकास के लिए अद्भुत बल प्रदान करता है। यह बल आज के विकसित मानव में भी लगातार काम कर रहा है। मध्यम विकसित जीवों में यह नाभि चक्र में आ जाती है। तभी तो अधिकांश निम्न जीव रात-दिन खाने में ही लगे रहते हैं। उच्च कोटि के प्राणी में जैसे सम्भवतः गाय में व प्रेममयी मनुष्य में यह हृदय चक्र में आ जाती है। संभवतः तभी तो गाय वात्सल्य स्नेह से भरी हुई होती है। गाय में पाचन का अधिकांश काम सूक्ष्म जीव करते हैं, इसलिए ऊर्जा की काफी बचत हो जाती है। बबून, गोरिल्ला आदि जैसे प्राइमेट्स में, कुंडलिनी ऊर्जा आगे उनकी भुजाओं या फ़ॉर्लिम्ब्स तक चली जाती है, इसीलिए वे अधिकतम रूप से अपने फ़ॉर्लिम्ब फ़ंक्शन का उपयोग करते हैं। इसी तरह, कोयल जैसे सुंदर गायन करने वाले पक्षी में, गले के चक्र में कुंडलिनी ऊर्जा को केंद्रित कहा जा सकता है। डॉल्फिन जैसे विश्लेषणात्मक कौशल वाले बुद्धिमान जानवरों में, इसे आज्ञा चक्र तक आने वाला कहा जा सकता है। यह मानव में ही सहस्रार चक्र तक आ सकती है, वह भी उचित मस्तिष्क-अभ्यास के साथ, क्योंकि केवल वही इसे जागृत कर सकता है, और जागरण का स्थान भी केवल सहस्रार ही है। सबसे उच्च कोटि के मनुष्य में यह सहस्रार में पूर्ण रूप से जाग जाती है।

कुंडलिनी के सात चक्र सात लोकों क़े रूप में हैं

शास्त्रों में ऊपर के सात लोकों का वर्णन आता है। ये सात लोक सात चक्रों के रूप में हैं। सबसे निम्न लोक मूलाधार चक्र है, क्योंकि उस स्तर के जीवों में सबसे कम चेतना होती है। उसके ऊपर के लोकों या चक्रों में जाते हुए चेतना का स्तर बढ़ता रहता है। सहस्रार में यह स्तर सर्वाधिक होता है। कुंडलिनी जागरण अर्थात शिव और शिवा के मिलन के समय चेतना का स्तर पूर्ण हो जाता है, जिससे उसे शिवलोक या ब्रह्मलोक कहते हैं। वैसे तो मूलाधार के नीचे भी पाताल के सात लोक बताए गए हैं। उनमें भी चेतना क्रमशः नीचे की ओर गिरती रहती है। इन लोकों में अधिकांशतः राक्षसों का का निवास बताया गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इनकी चेतना का स्तर इतना अधिक गिर गया होता है कि ये देवताओं, साधुओं व उच्च चेतना वाले अन्य जीवों से द्रोह करते रहते हैं। धरती को मूलाधार चक्र के समकक्ष माना गया है। ऊपर के आसमान के लोक उच्च लोक हैं, जबकि धरती के नीचे पाताल लोक हैं।

आदमी का सीधा खड़ा होना और पीठ में गड्ढा बनना भी जैव विकास श्रृंखला की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है

मैंने एक पुरानी पोस्ट में बताया था कि कैसे अपनी नई कार में बैठकर मुझे उसे चलाते हुए लगातार अपनी पीठ सीधी और नेचरल पोस्चर में रखनी पड़ती थी, क्योंकि उसका लेगस्पेस हल्का सा कम लग रहा था। उससे मेरी कुंडलिनी को जागृत करने वाली और पीठ में ऊपर चढ़ने वाली शक्ति मिली। लोग कह सकते हैं कि अगली दोनों टांगों का हाथ की तरह प्रयोग करने के लिए ही आदमी सीधा खड़ा हुआ। पर ऐसा तो गोरिल्ला आदि प्राइमेट भी करते हैं। आदिमानव भी ऐसा करते थे। उनकी पीठ तो बिल्कुल सीधी नहीं होती, और न ही हाथों का प्रयोग करने के लिए जरूरी लगती है। फिर विकसित आदमी की ही पीठ क्यों सीधी हुई। ऐसा दरअसल कुण्डलिनी को मूलाधार से मस्तिष्क तक आसानी से व निपुणता से चढ़ाने के लिए हुआ। कुंडलिनी आकाश की तरह सूक्ष्म होती है। इसका स्वभाव ऊपर की तरफ उठना होता है। तभी तो कुंडलिनी जागरण के समय लगता है कि कुंडलिनी ऊपर की तरफ तेजी व शक्ति से उड़ रही है। फिर कह सकते हैं कि फिर नाभि की सीध में पीठ में गड्ढा क्यों बना। वास्तव में वह रोलर कोस्टर के गड्ढे की तरह काम करता है। वह प्रश्वास की शक्ति से कुंडलिनी एनर्जी को मूलाधार से चूसकर अपने अंदर जमा करता रहता है। फिर काम करते हुए या योग करते हुए आदमी जब आगे की तरफ झुकता है, वह वेग को पकड़कर तेजी से दिमाग की तरफ ऊपर भाग जाती है। गर्दन के केंद्र पर जो विशुद्धि चक्र है, वहाँ भी एक ऐसा ही छोटा सा गड्ढा बनता है। वह भी इसी तरह निःश्वास की शक्ति से अनाहत चक्र पर इकट्ठी हुई कुंडलिनी एनर्जी को मूमेंटम प्रदान करके उसे ऊपर धकेलता है। इसी तरह, स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र पर यौन ऊर्जा भंडारित होती है, जिसे ही योग के दौरान पीठ में ऊपर चढ़ाया जाता है।

काम भाव का जीवविकास में सबसे ज्यादा योगदान है

उभयलिंगी जीव में यिन और यांग एक ही शरीर में इकट्ठे होते थे। इसका मतलब है कि वे पूर्ण आत्मा ही थे। क्योंकि उनमें विकास के लिए अपनी अलग इच्छा नहीँ थी, इसलिए उनका विकास अन्य कुदरती व जड़ वस्तुओं जैसे पहाड़, मिट्टी, आकाशीय पिंडों की तरह होता था। उस विकास की गति कुदरती और धीमी थी। फिर लिंग के विभाजन के साथ यिन-यांग का भी विभाजन हो गया। पुरुष वर्ग में यांग और स्त्री वर्ग में यिन की बहुलता हो गई। इस विभाजन से जीव को अपने अंदर अपूर्णता का अहसास हुआ। सम्भवतः इसी स्तर पर जीवात्मा की उत्पत्ति हुई। वह यिन और यांग को इकठ्ठा करके पूर्ण होने का प्रयास करने लगा। इससे काम भाव की उत्पत्ति हुई। इससे जीवों के पुरुष वर्ग और स्त्री वर्ग के बीच में परस्पर तीव्र आकर्षण पैदा हुआ। इसी काम भाव का जीवविकास में सबसे ज्यादा योगदान है, क्योंकि इससे सबसे अधिक अद्वैतभाव पैदा होता है, जिससे कुण्डलिनी का विकास सबसे मजबूती और तेजी से होता है। यह हमने पिछली बहुत सी पोस्टों में अनुभवात्मक रूप से सिद्ध किया है कि अद्वैत, कुंडलिनी और आनंद साथ साथ रहते हैं। इसने विकास को कृत्रिमता और तेज गति प्रदान की। आज भी यह तांत्रिक कुण्डलिनी योग के रूप में मनुष्य को मुक्ति रूपी पूर्णता की प्राप्ति के लिए विकास श्रृंखला की अंतिम छलाँग लगाने में मदद कर रहा है। यह मूलाधार चक्र पर स्थित यिन (शक्ति) को सहस्रार में स्थित यांग (शिव) के साथ जोड़ता है। भारतीय दर्शन में यिन को प्रकृति और यांग को पुरुष कहा जाता है। यिन-यांग के मिलन से अद्वैत भाव पैदा होता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से कुण्डलिनी को विकसित करता है। ऐसा नहीं है कि यिन-यांग का आकर्षण केवल स्त्री-पुरुष का ही आकर्षण होता है। यह किन्हीं भी विपरीत भावों के बीच में हो सकता है। मूलाधार अंधेरे, निम्नता, अज्ञान, घृणा आदि सभी निम्न भावों का प्रतीक है। इनके विपरीत सहस्रार प्रकाश, उच्चता, ज्ञान, प्रेम आदि सभी उच्च भावों का प्रतीक है। इसीलिए इन दोनों पर एकसाथ कुन्डलिनी ध्यान से तीव्र अद्वैतभाव पैदा होता है, जिससे सहस्रार में कुंडलिनी चमकने लगती है। यौन आकर्षण का मुख्य कार्य यही है कि इससे मूलाधार और सहस्रार चक्र तरोताजा और बलवान हो जाते हैं।

कुंडलिनी के लिए ही विभिन्न देवता विभिन्न व्यक्तित्वों के सांचों के रूप में हैं


मित्रो, मुझे कभी कोई देवता अधिक पसंद आता है, कभी कोई। बहुत पहले मुझे देवी माता रानी सर्वाधिक पसंद थी। अब मुझे भगवान शिव सबसे अच्छे लगते हैं। एक बार मैं जब मुंबई घूमने गया था, तब मुझे भगवान गणेश सबसे अच्छे लगे थे। देवताओं से हमेशा ही मेरी कुंडलिनी उजागर हो जाती थी। बात स्पष्ट है कि जो देवता कुंडलिनी को सबसे ज्यादा उजागर करता है, वही देवता सबसे अच्छा लगता है। इसका मतलब है कि असली आनन्द तो कुंडलिनी में ही है। देवता तो कुंडलिनी को उजागर करने में मददगार होते हैं। 

एक विशेष देवता का स्वरूप एक विशेष व्यक्तित्व के स्वरूप का साँचा होता है

वास्तव में विभिन्न देवताओं का अस्तित्व विभिन्न व्यक्तित्वों के बोधक के रूप में है। भगवान शिव एक तांत्रिक, मस्त, अकिंचन, भोले, निस्पृह, प्रकृति-प्रेमी, शीघ्र नाराज व प्रसन्न होने वाले, अनासक्त व उच्च कोटि के आत्मगौरव के अहसास वाले व्यक्तित्व के बोधक हैं। यदि किसी को ऐसा व्यक्तित्व व ऐसे व्यक्तित्व वाला कोई आदमी पसंद है, तो उसे शिव आराधना से लाभ मिल सकता है। शिव का ध्यान करते रहने से ऐसे व्यक्तित्व वाले व्यक्ति की छवि उसके मन मन्दिर में प्रकट होती रहती है, और फिर धीरे-धीरे कुंडलिनी का रूप ले लेती है। जीवन में कोई किसी के साथ भौतिक रूप से तो लगातार नहीं बना रह सकता। परन्तु मानसिक रूप में जरूर हमेशा बना रह सकता है। किसी प्रेमी व्यक्ति के मानसिक चित्र को लगातार बनाए रखने के लिए ही उसके जैसे देवता को चुना जाता है। देवता को मूर्ति, चित्र, प्रतिमा आदि के रूप में पूजा जाता है। इससे प्रेमी का मानसिक चित्र मजबूत होता रहता है। कई बार उल्टा भी घटित होता है। जिस व्यक्तित्व के देवता की अराधना की जाती है, उस व्यक्तित्व वाले आदमी से प्यार होने लगता है। इससे फिर कुंडलिनी का विकास होता है। पुराने युग में योगी किसी प्रेमी व्यक्ति के बिना ही खाली देवता की मूर्ति को भी कुंडलिनी बना लेते थे। परंतु आजकल यह असंभव सा ही लगता है। क्योंकि आजकल का समाज देवप्रधान या मूर्तिप्रधान न होकर व्यक्तिप्रधान है। इसी तरह किसी को भगवान गणेश का व्यक्तित्व रुचिकर लग सकता है, तो किसी को मां काली का। पसंद अपनी-अपनी। सभी की रुचि के अनुसार देवता विद्यमान हैं। जहाँ तक मेरे अपने अनुभव की बात है, तो मेरी कुंडलिनी के रूप में शिव जैसा व्यक्तित्व था। किसी दिव्य घटनाक्रम से एकबार मेरा झुकाव एकदम से भगवान शिव के प्रति बन गया था। मैं पूरी तरह हर तरफ से हारकर अपने आप को उनके प्रति समर्पित महसूस कर रहा था। इससे मुझे विविध अनुकूल परिस्थितियों के साथ अनजाने में ही तंत्रयोग की प्रेरणा मिली, जिससे मेरी कुंडलिनी जल्दी से जागृत हो गई।

देवता भावरूप में हमेशा विद्यमान रहते हैं

उदाहरण के लिए यदि किसी देश-काल में पैदा हुए विशेष तांत्रिक या कहो भैरवनाथ को तन्त्र का देवता माना जाता, तो आजकल के अधिकांश लोगों की उन पर श्रद्धा न होती। ऐसा इसलिए होता, क्योंकि भैरवनाथ एक असली मनुष्य थे, जो बहुत पुराने समय में पैदा हुए थे, और आज नहीं हैं। उनके समय की जीवन-परिस्थितियां आज की जीवन-परिस्थितियों से सर्वथा भिन्न थीं। इस प्रकार लोगों के मन में उमड़ रहा तांत्रिक भाव बाबा भैरव की तरह ही नष्टप्राय हो जाता। परंतु इसके विपरीत भगवान शिव शाश्वत हैं। वे आज भी वैसे ही हैं, जैसे हजारों वर्ष पहले थे। वे आगे भी हमेशा वैसे ही रहेंगे। वास्तव में वे कोई नाशवान व्यक्ति नहीं, अपितु व्यक्तित्व या भाव के रूप में हैं। उनके व्यक्तित्व को ओढ़ने वाले अनगिनत लोग हो चुके हैं। इसलिए उन पर हमेशा विश्वास और इंटरस्ट बना रहता है। उससे तंत्र पर भी विश्वास बना रहता है, और उसके प्रति रुचि भी। 

देवता हमेशा ही कुंडलिनी को शक्ति देते हैं

यदि कोई देवता रुचिकर हो या न हो, वह हमेशा ही कुंडलिनी लाभ देता है। देवता वास्तव में सजीव (यांग/शिव/पुरुष) और निर्जीव (यिन/शक्ति/प्रकृति) के मिश्रण की तरह है। सजीव का गुण उसमें मनुष्य की तरह ही सभी क्रियाकलाप करने के रूप में है। निर्जीव का गुण उनमें निर्जीव वस्तुओं जैसे कि हवा, पानी, आग, सूर्य आदि के रूप में होना है। देवता में सजीव व निर्जीव का मिश्रण तभी संभव हो सकता है, यदि देवता अद्वैतमयी और अनासक्त हों। अद्वैत व अनासक्ति से देवता के सभी क्रियाकलाप उसके मन में शांत हो जाते हैं। हालांकि देवता द्वारा बाहर-बाहर से वे होते रहते हैं। यदि देवता पूरी तरह से सजीव होता, तो एक जीवित मनुष्य की तरह प्रत्यक्ष होता, और दुनिया के बंधन में डूबा रहता। यदि देवता पूरी तरह निर्जीव होता, तो मृतप्राय होता, जो सृष्टि को क़भी भी न चला पाता। और तो और, उसकी पूजा से लाभ की बजाय हानि होती। देवता के इसी अद्वैत रूप के कारण ही उसकी पूजा करने से आदमी के मन में अद्वैत छा जाता है, जिससे कुंडलिनी उजागर हो जाती है। इसीलिए ही वेद-शास्त्रों में लिखा गया है कि देवता की अराधना से दुनिया के सुख-साधनों के साथ मुक्ति की भी प्राप्ति होती है।

कुंडलिनी के लिए ही भगवान शिव काशी में पार्वती के साथ विहार करने के लिए सभी जिम्मेदारियों से मुक्त बने रहते हैं

सभी मित्रों को पावन शिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं

मित्रो, मैंने पिछली पोस्टों में बताया था कि भगवान शिव मस्त-मलंग तांत्रिक की तरह रहते हैं। उनके पास कुछ अति जरूरी चीजों के सिवाय कुछ अतिरिक्त नहीं रहता। उनमें से माता पार्वती भी एक हैं, जिनके साथ वे काशी में स्वच्छन्द रूप से विचरण करते रहते हैं। 

तंत्रसिद्धि के लिए दुनियादारी के झंझटों से दूर रहना जरूरी है

शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव ने दुनियादारी के झमेले से दूर रहने के लिए भगवान विष्णु की उत्पत्ति की। उन्होंने उन्हें दुनिया के पालन और रक्षण की जिम्मेदारियां सौंपी। स्वयं वे पार्वती के साथ सुखपूर्वक योगसाधना करने के लिए काशी में विहार करने लगे। कहते हैं कि वे आज भी वहाँ विचरण करते रहते हैं।

प्रेमयोगी वज्र का एकांत-विहार का अपना निजी अनुभव

प्रेमयोगी वज्र भी भगवान शिव की तरह दुनियादारी के झमेले में फंसा हुआ था। उसने लगभग 20 वर्षों तक कठिन परिश्रम किया, और विकास के अनेक कारनामे स्थापित किए। हालाँकि उसका रुझान तांत्रिक जीवन की तरफ भी रहता था। इससे वह अद्वैत भाव में स्थित रह पाता था। उससे वह थकान महसूस करने लगता था। ऐसा इसलिए होता था क्योंकि अद्वैत भाव या कुण्डलिनी को बनाए रखने के लिए भी कुछ अतिरिक्त शक्ति खर्च होती रहती है। शक्ति के बिना कुछ भी संभव नहीं, भगवान भी नहीं। तभी तो शक्ति को शिव का अभिन्न हिस्सा समझा जाता है। हालांकि कभी-कभार के तांत्रिक खान-पान व रहन-सहन से उस शक्ति की आपूर्ति आसानी से हो जाती थी। आग उसे भी जलाती है, जो उसके बारे में जानता है; और उसे भी उतना ही जलाती है, जो उसके बारे में नहीं जानता। इसी तरह दुनियादारी के झंझट सभी के अंदर2अज्ञान का अंधेरा पैदा कर देते हैं। यह अलग बात है कि अद्वैतयुक्त ज्ञानी में वह अंधेरा कम घना होता है। यह ऐसे ही है जैसे आग के बारे में जानने वाला आदमी उससे बचने का प्रयास करता है, जिससे वह कम जलन प्राप्त करता है। उसी दौरान किसी अचिंत्य परिस्थिति के कारण उसका शिव के प्रति प्रेम जागा था। फिर वैसी ही दिव्य परिस्थितियों के कारण उसे घर से अति दूर सपरिवार एकांत से भरे  स्थान में रहने का अवसर मिला। उससे वह पुराना जीवन लगभग भूल सा गया। एक प्रकार से भगवान शिव ने उसे अपनी तरह दुनियादारी के झंझटों से मुक्त कर दिया। यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि जो दुनिया में उलझा हो, उसे ही त्याग का फल मिलता है। जो पहले से ही सोया हुआ हो, उसे सो कर कोई लाभ नहीं मिलता। तभी तो शिवपुराण में लिखा है कि दुनियादारी के झंझटों को संभालने के लिए शिव ने विष्णु को नियुक्त किया और स्वयं संसार को त्याग कर काशी चले गए। एक अधिकारी अपने मातहत को उन्हीं जिम्मेदारियों को सौंप सकता है, जिनके बारे में वह खुद बखूबी जानता हो और जिन्हें निभाने का उसे लंबा अनुभव हो। यदि भगवान शिव ने दुनिया को लम्बे समय तक न चलाया होता, तो वे विष्णु को अपनी जगह पर कैसे प्रतिनियुक्त कर पाते। जो दुनिया को पुरजोर तरीक़ेसे नहीं स्वीकारते, उन्हें दुनिया के त्याग का फल भी नहीं मिलता। इसलिए जब तक दुनिया में रहो, पूरी तरह डूब के रहो, पर होश संभाल कर रखो। आज विज्ञान भी इस बात को स्वीकारता है कि जब मन की चेतनायुक्त क्रियाशीलता एकदम से 50 प्रतिशत से ज्यादा गिर जाए, तब आत्मजागृति की संभावना काफी बढ़ जाती है। इसीलिए पुराने समय में राजा लोग एकदम से राज्य का त्याग करके तप के लिए वनवास को चले जाया करते थे। चार आश्रम भी इसीलिए बने थे। गृहस्थ आश्रम के झमेले को निभा कर आदमी एकांत में स्थित वानप्रस्थ आश्रम जाया करते थे, जहाँ उन्हें बहुत शान्ति मिलती थी। उस एकांत में प्रेमयोगी वज्र शिव की तरह ही पूर्ण तंत्रमयी जीवन बिताते हुए अपने तांत्रिक साथी के साथ मनोरम व धार्मिक स्थानों पर विहार करने लगा। उससे उसकी कुण्डलिनी क्रियाशील हो गई, और दो वर्षों के अंदर ही जागृत हो गई।

शिव के के द्वारा भाँग का सेवन 

भगवान शिव के बेफिक्री, मस्ती, आनन्दपूर्णता, अद्वैत व भोलेपन आदि गुणों को ही उनके द्वारा भाँग का नशा किए जाने के रूप में दिखाया गया है। लोग इन्हीं गुणों की प्राप्ति के लिए ही नशा करते हैं। पर ज्यादातर लोग सफल नहीं हो पाते, क्योंकि ये गुण आत्मा के आश्रित हैं, नशे के नहीं। यदि तांत्रिक विधि से व गुरु की देखरेख में हल्का नशा किया जाए, तो वह इन गुणों की झलक दिखाकर इनकी स्थायी प्राप्ति के लिए प्रेरित कर सकता है। इन गुणों की वास्तविक व स्थायी प्राप्ति तो आत्मबल से ही सम्भव है।

भगवान शिव के ऊपर दुग्ध व भाँग मिश्रित जल चढ़ाने के पीछे छिपा आध्यात्मिक मनोवैज्ञानिक रहस्य

मैं आज सुबह सपरिवार एक शिवमंदिर घूम कर आया। पैदल ही 4 किलोमीटर का सफर तय किया। मौसम बड़ा सुहाना था। चारों ओर प्रकृति की छटा बिखरी हुई थी। आम के पीले पुष्प गुच्छों पर भौंरे गुंजायमान हो रहे थे। लोगबाग मंदिर आ-जा रहे थे। रास्ते में कुछ पिल्ले हमारे साथ-साथ चलने लगे, फिर कुछ सूंघ कर रुक गए और इधर-उधर देखने लगे। कुछ पुराने और बड़े पेडों पर लताएँ ऐसे घनीभूत होकर लिपटी हुई थीं, जैसे कि कोई प्रियतमा अपने प्रेमी से या माता अपने शिशु से अपना लगाव दिखा रही हो। एक सूखा पेड़ आधा नीचे झुका हुआ था, और एक जिंदगी से थक कर झुके एक बूढ़े इंसान की तरह लग रहा था। वास्तव में अधिकांश समय हम देखकर भी कुछ नहीं देखते। उस रास्ते से मैं कई बार गुजरा हूँ, पर ये चीजें मुझे पहली बार नजर आईं। इसलिए आँखों के साथ दिमाग और मन भी खुले रखने चाहिए। मंदिर से आते हुए रास्ते से कुछ भाँग के पत्ते भी तोड़कर साथ ले आया। घर में उनको करीब 20 मिनट तक शिव के मंत्र के जाप के साथ बारीक पीस। फिर उसे थोड़े पानी, उतने ही दूध और कुछ शहद के साथ मिश्रित किया। उस घोल को मैं लगभ 25 मिनट तक शिव मन्त्र के जाप के साथ फैंटता रह। फिर उस घोल को छान कर साफ किया। उस से थोड़ा सा घोल लेकर मैं पास के दूसरे मंदिर सपत्नीक चला गया। वहां उसे लोटे के जल मैं मिश्रित कर दिया और उससे शिवलिंग का अभिषेक करने लगा। लगभग 15 मिनट तक मैं थोड़ा-थोड़ा करके उस जल को शिवलिंग के ऊपर गिराता रहा। उस जल का रंग कुछ दूधिया और हरा था। एक अन्य दंपत्ति भी नजदीक ही बैठे थे, और शिव की पूजा के साथ शिव की आरती गा रहे थे। जैसे ही शिवलिंग पर मेरा जल गिरता था, मेरी कुण्डलिनी शक्ति प्राप्त करके वहाँ चमकने लगती थी। मन भी कुछ रोमांटिक मूड में जैसा आ गया था। वास्तव में वह जल भगवान शिव का यौन द्रव्य बन गया था। दूध से उसका रंग सफेद हो गया था, और भाँग से उसमें यौनता का नशा चढ़ गया था। एक बार पारद शिवलिंग के दर्शन के समय भी मुझे वैसी ही अनुभूति हुई थी। जब मैंने गूगल पर सर्च किया तो पता चला कि तरल पारे को एक विशेष प्राचीन हर्बल तकनीक से ठोस बनाया जाता है। वह एक प्रकार से भगवान शिव की ठोस बन गया यौन द्रव्य ही है। इससे अवचेतन में यह संदेश भी जाता है कि भटकते हुए तरल मन को ठोस बना कर शांत करना चाहिए। मैं घर वापिस आया और भगवान शिव के नाम से उस द्रव्य का आधा गिलास पी गया।

कुंडलिनी ध्यान चौबीसों घंटे करने के तीन तरीके

मित्रो, मैंने पिछली पोस्टों में बताया था कि जीभ को तालु से छुआ कर कुंडलिनी को आगे के चैनल से नीचे उतारते हैं। मैंने यह भी कहा था कि किसी भी संवेदना के अनुभव का एकमात्र स्थान सहस्रार ही है, कोई अन्य चक्र नहीं। कुंडलिनी चित्र हमेशा सहस्रार में ही बन रहा होता है। अन्य चक्रों में वह तभी प्रतीत होता है, जब उसका ऊर्जा स्तर एक न्यूनतम सीमा से नीचे गिरता है। ऊर्जा का स्तर जितना नीचे गिरता है, वह उतना ही ज्यादा निचले चक्र में जाता है। मैंने हाल ही में इससे संबंधित एक नया अनुभव प्राप्त किया, जिसे मैं उन्हीं निम्नलिखित सिद्धांतों की पुष्टि के लिए प्रयोग में लाऊँगा।

आध्यात्मिक आयाम को प्राप्त कराने वाली दो मुख्य यौगिक विधियां हैं

पहली विधि दार्शनिक है, और दूसरी विधि प्रयोगात्मक या तांत्रिक है। पहली विधि में किसी पसंदीदा अद्वैत दर्शन को अपनी वर्तमान स्थिति पर आरोपित किया जाता है। दूसरी विधि में जीभ को तालु से छुआ कर रखा जाता है।

आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कराने वाली दार्शनिक या राजयोग गत विधि

मैं एक दिन बहुत से जटिल कार्यों में व्यस्त था। उन कार्यों से लगातार द्वैत पैदा हो रहा था। द्वैत के साथ मानसिक परेशानी आ रही थी। उससे स्वाभाविक था कि शारीरिक परेशानी भी पैदा हो रही थी। मैं उस द्वैत को अद्वैत में रूपांतरित करने के लिए दार्शनिक विधि का सहारा लेने लगा। मैं स्वनिर्मित “शरीरविज्ञान दर्शन” नामक पुस्तक को अपनी उस समय की वर्तमान व मनोदोलन से भरी अवस्था पर आरोपित करने लगा। मैं अपनी अवस्था को बिल्कुल नहीं बदल रहा था। मतलब कि जैसी अवस्था बन रही थी, उसे वैसा ही रहने दे रहा था। अवस्था को बदलने से देवता नाराज होते हैं, और वे कामकाज में विघ्न डालते हैं। वे चाहते हैं कि आदमी हर प्रकार की अवस्था का अनुभव करे। यह अलग बात है कि असली योगी उन सभी अवस्थाओं को अनासक्ति से अनुभव करे। देवता इससे और ज्यादा खुश हो जाते हैं, क्योंकि वे खुद भी अनासक्त होते। वे हर अवस्था का अनासक्ति से सामना करते हैं, उनसे भागते नहीं हैं। अवस्थाओं से पलायन करने को अपना और अपनी बनाई सृष्टि का अपमान समझते हैं, क्योंकि सभी अवस्थाएं इस विभिन्नताओं से भरी सृष्टि के हक में ही होती हैं। इसीलिए मैं अवचेतन मन से ही यह मान रहा था कि मेरा अद्वैत दर्शन मेरी सभी अवस्थाओं से जुड़कर उनको अद्वैतशील बना रहा है। मैं सीधे तौर पर इसका चिंतन नहीँ कर रहा था, क्योंकि उससे मेरी अवस्थाएं दुष्प्रभावित हो सकती थीं। उससे क्या होता था कि मेरे अज्ञातस्थान वाले चिन्तन में कुंडलिनी प्रकट हो जाती थी, और मेरे किसी चक्र पर स्थित हो जाया करती थी। जितना कम मानसिक ऊर्जा स्तर मेरी अवस्था का होता, मेरी कुंडलिनी उतना ज्यादा निचले चक्र पर चली जाती थी। मन के कुछ ऊर्जावान रहने पर वह हृदय चक्र पर आ जाती थी। ऊर्जा स्तर के काफ़ी ज्यादा गिरने पर वह नाभि चक्र पर आ जाती थी। उससे भी कम ऊर्जा होने पर वह स्वाधिस्ठानचक्र पर भी स्थित हो जाती थी।

आत्म-जागरूकता पैदा करने वाली तांत्रिक विधि

फिर से मस्तिष्क की थकान होने पर मैंने अपनी उलटी जीभ को नरम तालु से छुआया। मुझे वहाँ नमकीन सा स्वाद लगा और तीव्र संवेदना की अनुभूति हुई। इसके साथ ही मस्तिष्क की ऊर्जा जीभ के पिछले हिस्से की केंद्रीय रेखा से सभी चक्रों को भेदते हुए नीचे उतर गई और नाभि चक्र पर स्थित हो गई। उसके साथ कुण्डलिनी भी थी। मस्तिष्क में केवल विचारों का कंफ्यूसिंग पुलिंदा था। वह नीचे उतरते हुए कुण्डलिनी बन गया। उससे मस्तिष्क की थकान एकदम से कम हो गई। अद्वैत व आनन्द के साथ शांति का उदय हुआ। विचार व कर्म अनासक्ति के साथ होने लगे। 

राजयोग व तंत्र के नियमों के मिश्रण वाली तीसरी यौगिक विधि

कुछ देर बाद मेरे मस्तिष्क में फिर से द्वैत से युक्त दबाव बनने लगा था। उसे कम करने के लिए मैंने उपरोक्त दोनों विधियों का प्रयोग किया। पहले मैंने जीभ को तालु से लगातार छुआ कर रखा। उसके साथ ही शरीरविज्ञान पुस्तक से अपने मन में कुंडलिनी को पैदा करने का प्रयास किया। पर वह मस्तिष्क में ढंग से प्रकट हो पाती, उससे पहले ही फ्रंट चैनेल से नीचे आ गई। उसके जीभ को क्रॉस करते समय जीभ में स्वाद से भरी हुई तेज संवेदना पैदा होती थी। इससे कुंडलिनी लूप भी पूरा हो गया था। इससे वह नाभि चक्र से भी नीचे उतरकर स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र से होते हुए मूलाधार को संकुचित करने से पीठ के बैक चैनेल से ऊपर चढ़ जाती थी और आगे से फिर नीचे उतर जाती थी। इससे कुंडलिनी चक्र की तरह लूप में घूमने लगी। यह विधि मुझे सर्वाधिक शक्तिशाली लगीं। हालांकि समय के अनुसार किसी भी विधि को अपने लाभ के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है।

कुण्डलिनी योगी को देवराज इंद्र परेशान कर सकते हैं

मित्रो, मैंने पिछले हफ्ते की पोस्ट में बताया कि सभी प्रकार के योगों को एकसाथ अपनाने से ही योग में सफलता प्राप्त होती है। आज हम इस तथ्य की कुछ विस्तारपूर्वक अनुभवात्मक विवेचना करेंगे।

कर्मयोग सभी योगों की प्रारंभिक सीढ़ी के रूप में

ऐसा इसलिए है, क्योंकि कर्मयोग सबसे आसान है। इससे दुनिया में रमा हुआ आदमी भी ऐसे ही शांत व दुनिया से दूर बना रहता है, जैसे कमल का पत्ता पानी में डूबा रहकर भी पानी की पहुंच से दूर रहता है, और सूखा ही बना रहता है। कर्मयोग तो जिंदगी में हमेशा ही बना रहना चाहिए। परंतु यह किशोरों व युवाओं के लिए विशेष महत्त्व का है, क्योंकि इसी उम्र में कर्म तेजी से किए जाते हैं। कर्म की मात्रा जितनी ज्यादा हो, कर्मयोग भी उतना ही ज्यादा प्रभावशाली होता है। कर्मयोग को अद्वैत भाव या अनासक्ति भाव भी कहते हैं। मेरे घर पर शुरु से ही योग का प्रभुत्व होने से मुझे कर्मयोग के संस्कार विरासत में मिले। वैसा मेरा कर्मयोग तभी चरम पर पहुंचा, जब उसमें किसी अज्ञात ईश्वरीय प्रेरणा से तंत्र भी सम्मिलित हुआ। इसी से मुझे आत्मजागृति को दो बार अनुभव करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वास्तव में तंत्र से कर्म करने की शक्ति बढ़ जाती है, जिससे कर्मयोग भी बढ़ जाता है। फिर किसी दिव्य प्रेरणा से मैंने शरीरविज्ञान दर्शन की रचना की। यह एक व्यवहारिक दर्शन है, और दुनिया के झमेले में फंसे एक व्यक्ति के लिए रामबाण ओषधि है। इस दर्शन से मुझे बहुत बल मिला। इससे मुझे चहुँमुखी भौतिक तरक्की के साथ आध्यात्मिक तरक्की भी मिली। इसको बनाने के करीब 4-5 वर्ष पहले मुझे एक आत्मज्ञान की झलक भी मिली थी। उससे मैं विशेष हो गया था। मैं पूरी तरह से अद्वैत सागर में डूब गया था। दुनिया वालों को मैं मंगल ग्रह से आए आदमी की तरह लगने लगा, जिससे वे मुझे हीन सा समझने लगे और मुझे अलग-थलग सा रखने लगे। वे अपनी जगह पर सही भी थे। वे मुझे पारलौकिक आयाम में प्रविष्ट नहीं होने देना चाहते थे। हालांकि वह आयाम सर्वश्रेष्ठ होता है, पर उस आयाम में रहकर दुनियादारी के काम ढंग से नहीं हो पाते। देवता आदमी को उस आयाम में जाने से रोकते हैं, क्योंकि यदि सभी लोग उस आयाम में चले गए, तो उनकी रची हुई दुनिया कैसे चल पाएगी। तभी तो प्राचीन काल में देवताओं का राजा इंद्र योगियों की तपस्या भंग करने आ जाता था। इंद्र को डर होता था कि यदि कोई आदमी योगबल से अपनी ओर दुनिया के लोगों को आकर्षित करेगा, तो उसे कोई नहीं पूछेगा। इंद्र को एकप्रकार से अपने प्रभुत्व की राजगद्दी के खो जाने का डर सताता रहता था। इसी खतरे के मद्देनजर ही मैं योगसाधना को सावधानी से करता हूँ। जैसे ही मैं पारलौकिक आयाम में प्रविष्ट होने लगता हूं, और मुझे देवताओं से खतरे का आभास होने लगता है, मैं तुरंत कुछ तांत्रिक टोटका अपनाकर उस आयाम से बाहर निकल आता हूं। सूत्रों के अनुसार योगी श्री साधुगुरु भी ऐसा ही कहते हैं, और सम्भवतः करते भी हैं। वास्तव में, देवताओं से मधुर संबंध बना कर ही आदमी उनकी बनाई दुनिया से ऊपर उठ सकता है।

उपरोक्त आध्यात्मिक अलगाव के कारण मेरे लिए दुनिया के बीच खुलकर सम्मिलित होना मुश्किल हो गया था। इससे मुझे कर्महीनता और बोरियत सी सताने लगी। इसीको कुंडलिनी का विपरीत चैनल में चढ़ना कहते हैं। एक इड़ा चैनेल है, और एक पिंगला। एक भावनात्मक है, और एक कर्मात्मक। मैं भावनात्मक ज्यादा हो गया था। चित्र-विचित्र अनुभवों में और पुरानी यादों में डूबा रहता था। इससे कर्म करने की शक्ति का ह्रास होता था। इसी वजह से मुझे उस समय यौन साथी की बहुत जरूरत महसूस होती थी। यौनबल से कुण्डलिनी बीच वाले सुषुम्ना चैनल में चढ़कर सहस्रार तक पहुंच जाती है। इससे आदमी का जीवन संतुलित हो जाता है। यौन साथी का तो नहीं, पर शरीरविज्ञान दर्शन का साथ मुझे जरूर मिला। इससे उत्पन्न अद्वैत से मेरे फालतू के विचारों पर लगाम लग गई। इससे जो शक्ति की बचत हुई, उससे मेरी कुंडलिनी सुषुम्ना चैनल से होकर सहस्रार में प्रविष्ट हुई। फिर मेरी कुंडलिनी को यौनबल के बिना ही उछालें मारते देखकर संभावित यौन साथी भी मेरी ओर नजरें घुमाने लगे। जिस समय मुझे यौनबल की जरूरत थी, उस समय तो कहीं कोई नजर नहीं आया, पर जब मैंने अपना यौनबल खुद ही निर्मित कर लिया, तब वे  भी उसके प्रति उत्साहित होने लगे। वास्तव में जो कुछ हुआ, वह ठीक ही हुआ। अगर मुझे यौनबल समय से पहले मिल गया होता, तो मैं अपना स्वयं का दार्शनिक यौनबल पैदा करना न सीख पाता, और न ही मुझे आत्मजागृति की दूसरी झलक मिल पाती।

थोड़ी उम्र बढ़ने पर मेरा ज्यादा झुकाव ज्ञानयोग व हठयोग की तरफ हो गया

हालाँकि कर्मयोग भी चला हुआ था। एकबार तो आत्मज्ञान के एकदम बाद मेरा भक्तियोग भी काफी बढ़ गया था। दरअसल जब भौतिक साथियों से धोखा खाकर मैं पूरी तरह निरुत्साहित हो गया था, तभी मुझे आत्मज्ञान अर्थात ईश्वर दर्शन की झलक मिली थी। उससे मुझे संतुष्ट व सुखी रहने के लिए भरपूर सहारा मिला। मैं अपने को ईश्वर का विशेष कृपापात्र समझने लगा। मैं उसके प्रति बार बार आभार प्रकट करता था, और विभिन्न स्तुतियों से उसे धन्यवाद देता था। यही तो ईश्वर भक्ति है। इससे जाहिर होता है कि सभी प्रकार के योग एकसाथ चलते रहने चाहिए। समय के अनुसार उनके आपसी अनुपात में बदलाव करते रहना चाहिए। ऐसा करने पर आत्म जागृति की प्राप्ति को कोई नहीं रोक सकता।

कुंडलिनी सहस्रार चक्र में जबकि कुंडलिनी शक्ति मूलाधार चक्र में निवास करती है

मित्रो, कुंडलिनी और कुण्डलिनी शक्ति के बीच में अंतर को लेकर दुनिया में अक्सर भ्रम देखा जाता रहता है। कई लोग कुंडलिनी को कुंडलिनी शक्ति समझ लेते हैं, और दूसरे कई लोग कुण्डलिनी शक्ति को कुंडलिनी समझ लेते हैं। आज हम इस बारे में अनुभवात्मक चर्चा करेंगे।

कुण्डलिनी शक्ति का मूल निवासस्थान मूलाधार चक्र है, जबकि कुण्डलिनी का मूल निवासस्थान सहस्रार है

शक्ति मूलाधार में उत्पन्न होती रहती है। वह सहस्रार तक जाकर कुण्डलिनी को पुष्ट करती है। इससे ऐसा लगता है कि कुण्डलिनी मूलाधार में पैदा हो रही है। सहस्रार से शक्ति आज्ञाचक्र से होकर नीचे उतरती है, और शरीर के सभी चक्रों में फैल जाती है। इससे ऐसा आभास होता है कि सभी चक्रों पर कुंडलिनी घूम रही है। वास्तव में वह शक्ति घूम रही होती है। शक्ति को प्राण या प्राणशक्ति भी कहते हैं।यदि चक्रों पर ही कुण्डलिनी हुआ करती, तो वह वहाँ पर जागृत भी होती। पर कुंडलिनी तो सहस्रार में ही जागृत होती है।

शरीर में अनुभव का स्थान मस्तिष्क ही है, कोई अन्य स्थान नहीं

शरीर के किसी भी भाग की चमड़ी में यदि खुजली हो, तो उसकी अनुभूति मस्तिष्क में ही होती है। हालांकि हमें ऐसा लगता है कि खुजली वाले स्थान पर संवेदना की अनुभूति होती है।कुण्डलिनी के साथ भी वैसा ही होता है। चाहे हम किसी भी चक्र पर कुण्डलिनी का ध्यान करें, उसकी अनुभूति मस्तिष्क में ही होगी। परन्तु लगता ऐसा है कि चक्र पर कुण्डलिनी है। यदि मस्तिष्क को दवा आदि से बेहोश किया जाए, तो शरीर के चक्रों पर भी संवेदना या कुण्डलिनी की अनुभूति नहीं होगी। इसी तरह जब सुषुम्ना नाड़ी पीठ में एक चमकती हुई लकीर के रूप में अनुभव होती है, तो वह अनुभूति भी मस्तिष्क में ही हो रही होती है।

मस्तिष्क से फ्रंट चैनेल के रास्ते उतरता हुआ प्राण कुंडलिनी के आभासिक चित्र को भी अपने साथ नीचे ले आता है

यह इस बात से सिद्ध होता है कि जब मस्तिष्क में कुंडलिनी का ध्यान हो रहा होता है, उस समय यदि जीभ को तालु से लगा कर प्राण को मस्तिष्क से नीचे उतारा जाए, तो कुंडलिनी भी उसके साथ उतरकर सभी चक्रों को भेदते हुए मूलाधार तक पहुंच जाती है। कुंडलिनी का चित्र तो लगातार मस्तिष्क में ही बन रहा होता है, पर उसका आभासिक अनुभव विभिन्न चक्रों पर होता है। इसी तरह, पीठ से ऊपर चढ़ता हुआ प्राण कुंडलिनी को भी वापिस ऊपर ले जाता हुआ प्रतीत होता है। हालांकि कुण्डलिनी कुण्डलिनी मस्तिष्क में ही होती है। इसका मतलब है कि जब प्राण कुण्डलिनी को अपने साथ चलाता है, तो कुण्डलिनी भी प्राण को अपने साथ चलाती है, क्योंकि दोनों आपस में जुड़े होते हैं। तांत्रिक हठयोग में प्राण को कुंडलिनी का हैन्डल बनाया जाता है, जबकि राजयोग में कुंडलिनी को प्राण का हैंडल बनाया जाता है। मिश्रित योग में दोनों ही तरीकों का इस्तेमाल होता है, इसलिए यह सबसे ज्यादा प्रभावी है।

मस्तिष्क के विभिन्न विचार भी जब प्राण के साथ नीचे उतरते हैं, तो वे कुंडलिनी बन जाते हैं

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि योगी को कुण्डलिनी के चिंतन की आदत पड़ी होती है। इसलिए कुंडलिनी विचार सबसे प्रिय होता है। तभी तो प्रिय व्यक्ति के लिए कहते हैं कि वह तो मेरे दिल का टुकड़ा है। माँ बेटे के लिए अपनी कोख का हवाला देती है। जब प्राण किसी चक्र पर केंद्रित हो, तब मस्तिष्क में विचारों के लिए बहुत कम प्राण बचा होता है। उतने कम प्राण में तो कुण्डलिनी चित्र को ही बना के रखा जा सकता है, क्योंकि रोज के योगाभ्यास के बल से मस्तिष्क को उसको आसानी से और कम प्राण ऊर्जा से बनाने की आदत पड़ी होती है। इसी तरह, योगाभ्यास के समय जब मन विचारशून्य सा होता है, तो मूलाधार से सहस्रार को चढ़ने वाली शक्ति से कुंडलिनी ही उजागर होती है। यह इसलिए क्योंकि कुंडलिनी की लिए सोचकर ध्यान लगाने की जरूरत नहीं होती। वह रोज के अभ्यास से खुद ही ध्यानपटल पर बनी रहती है। इसी तरह, योगाभ्यास के दौरान जब साँसे प्राणों से भरपूर होती हैं, तब भी कुण्डलिनी ही पुष्ट होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कुण्डलिनी चित्र ही उन साँसों के प्राणों का सबसे अधिक फायदा उठाते हुए सबसे तेजी से चमक सकती हैं। ऐसा रोज के कुंडलिनी अभ्यास से ही होता है।

अनुभूति का स्थान सहस्रार चक्र ही है, इसीलिए कहा जाता है कि आत्मा सहस्रार में निवास करती है

मुझे तो कुण्डलिनी जागरण की अनुभूति पूरे मस्तिष्क में हुई। ऐसा लगा कि मस्तिष्क का हरेक कण कम्पायमान या जागृत हो रहा था। यद्यपि कुण्डलिनी मस्तिष्क के सबसे ऊपरी हिस्से में महसूस हो रही थी। उसे ही क्राऊन चक्र भी कहते हैं। जब जागरण की अनुभूति समाप्त हुई, तब कुण्डलिनी आज्ञा चक्र में महसूस हुई। सहस्रार से जागरण की शुरुआत इसलिए होती है क्योंकि मूलाधार से ऊपर चढ़ने वाली प्राणशक्ति सीधी सहस्रार में प्रविष्ट होकर वहाँ पर कुंडलिनी को चमकाती है। हो सकता है कि अनुभव केवल सहस्रार चक्र में ही होती हो, और अन्य मस्तिष्कीय केंद्रों में अनुभूति सहस्रार से ही रेफर्ड होकर आई हो। हालांकि मेरा यह अनुमान वैज्ञानिक प्रयोगों के विरुद्ध है, जिसमें मस्तिष्क में बहुत से अनुभूति के केंद्र बताए गए हैं। वैसे तो चिकित्सा विज्ञान अभी तक चक्रों और नाड़ियों की पहेली को नहीं सुलझा पाया है। इसी तरह, आज्ञा चक्र और उससे निचले चक्रों की तरह मस्तिष्क व शरीर के सभी बिंदुओं पर महसूस होने वाली संवेदनाएं रेफर्ड ही हैं। संवेदनाओं का मूल स्थान तो सहस्रार ही है। सहस्रार में जागरण के एकदम बाद कुंडलिनी आज्ञा चक्र पर आ जाती है। इससे जाहिर होता है कि निचला चक्र अपने ऊपर वाले चक्र से कम ऊर्जा स्तर का होता है। मतलब यह है कि सहस्रार की प्राणऊर्जा के विभिन्न स्तर विभिन्न चक्रों के रूप में अभिव्यक्त होते हैं। जागरण के समय ऊर्जा स्तर टॉप मोस्ट लेवल पर होता है। ऊर्जा स्तर के एक निश्चित सीमा के नीचे गिरने से जागरण की अनुभूति समाप्त हो जाती है। उस समय भी कुण्डलिनी रहती तो सहस्रार में ही है, पर वह आज्ञा चक्र में प्रतीत होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सहस्रार से प्राण आज्ञा चक्र तक उतर गया होता है। यदि कुण्डलिनी प्राण के साथ न चला करती, तो जागरण के एकदम बाद किसी भी चक्र पर महसूस हुआ करती। उसके बाद जैसे-जैसे प्राण नीचे उतरता है, कुण्डलिनी भी उसके साथ उतरती महसूस होती है। यह ऐसे ही होता है, जैसे जब किसी अंग में बहुत तेज दर्द होता है, तो वह सहस्रार में महसूस होता है, और आदमी कहता है कि उसका सिर फटा जा रहा है। इससे ऐसी कहावत भी बनी है कि”इतनी दर्द हुई कि चोटी खड़ी हो गई”। दरअसल बालों की चोटी सहस्रार के निकट बँधी होती है। छोटी मोटी दर्द तो प्रभावित अंग के स्थानीय क्षेत्र में ही लोकेलाइज्ड महसूस होती है। यदि बिना सुन्न किए दाँत उखाड़ा जाए, तो सहस्रार में बहुत तेज दर्द होता है। आदमी बोलता है कि उससे बड़ा दर्द कोई नहीं हो सकता। कुंडलिनी जागरण के अनुभव के बाद भी तो आदमी यही बोलता है कि इससे बड़ा अनुभव नहीं हो सकता। वास्तव में कुंडलिनी जागरण ही दुनिया की सबसे बड़ी अनुभूति है। अगर कोई है, तो वह आत्मज्ञान या ईश्वर ही है। उसमें अद्वैत और आनंद की अनुभूति पूर्ण रूप में होती है। अद्वैत और आनन्द तो दाँत उखाड़ने के बाद भी महसूस होता है, पर पूर्णरूप में नहीं। इससे भी जाहिर होता है कि अनुभूति का स्थान सहस्रार ही है। दाँत निकालने के दर्द की अनुभूति की जागरण की अनुभूति से समानता की बात बहुत से योगियों ने की है। मैंने भी ऐसा दाँत निकालने का उच्चतम स्तर का दर्द एकबार महसूस किया था। सुन्न करने वाली दवा अपना असर नहीं दिखा पाई थी। उससे मुझे अपना मस्तिष्क फटता हुआ सा इसलिए महसूस हुआ, क्योंकि मेरे शरीर का सारा प्राण दर्द का पीछा करते हुए सहस्रार में घुस गया था। उसके बाद मुझे 3 साल पहले हुए आत्मज्ञान का स्मरण हो आया, क्योंकि वह अवस्था उसीके जैसी आध्यात्मिक थी। वह प्राणोत्थान की अवस्था लग रही थी। इसमें पूरे शरीर का प्राण सहस्रार में केंद्रित होता है। इसका वर्णन मैंने एक पुरानी पोस्ट में किया है। सम्भवतः दुःख या दर्द से पाप का नष्ट होना इससे पैदा हुई इस योग भावना से ही होता है। इससे इस बात की भी पुष्टि हो जाती है कि योग से पाप क्षीण होते हैं। अब कुण्डलिनी के अनुभव को तो दर्द के अनुभव की तरह पैदा नहीं किया जा सकता है। अगर ऐसा होता तो आदमी सावधानी से अपने बाहरी अंगों में संवेदना पैदा करके कुण्डलिनी को महसूस किया करता। कुण्डलिनी का ध्यान तो मस्तिष्क में ही किया जा सकता है। ऐसा करना आम आदमी के लिए कठिन है। इसलिए प्राण को कुंडलिनी के हैंडल के रूप में प्रयोग में लाया जाता है। तांत्रिक हठयोग से प्राण को सहस्रार तक चढ़ाया जाता है। उससे वहां खुद ही कुण्डलिनी प्रकट होकर मजबूत होती रहती है। इससे जाहिर होता है कि हठयोग राजयोग की अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक, व्यावहारिक व आसान है। वैसे समयानुसार दोनों का मिश्रित प्रयोग मुझे ज्यादा कारगर लगा। उपरोक्तानुसार जब दर्द के साथ प्राण सहस्रार तक पहुंचता है, तो उससे कुण्डलिनी भी अनुभव होने लगती है। परंतु ज्यादा कुण्डलिनी लाभ नहीं मिलता, क्योंकि अधिकांश प्राण को दर्द की अनुभूति खा जाती है। हालांकि कई जगह स्पर्श की अनुभूति का कुण्डलिनी के लिए प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए, जीभ और तालु के आपसी स्पर्श के अनुभव से कुण्डलिनी और प्राण मस्तिष्क से वहां तक उतर जाते हैं, और फ्रंट चैनल से नीचे चले जाते हैं।उपरोक्तानुसार ही, जैसे सहस्रार में बनने वाले चित्र ही चक्रों पर बने हुए प्रतीत होते हैं, उसी तरह बाहरी दुनिया में बनने वाले सूर्य, नदी, पर्वत वगैरह के चित्र भी सहस्रार में ही बन रहे होते हैं, पर उनकी अनुभूति दूर बाहर होती है। यह ट्रिक मस्तिष्क ने क्रमिक जीवविकास के दौरान सीखी है। यदि सभी कुछ अंदर ही महसूस हुआ करता, तो बाहर की तरफ दौड़ न होती, और जीवविकास न होता।जितनी तेज अनुभूति होती है, वह उतनी ही ज्यादा आत्मा से चिपकती है। उसे ही समाधि भी कहते हैं। ऐसी तेज अनुभूति सहस्रार में ही होती है। तभी तो आदमी यौन प्रेमी को कभी भूल नहीं पाता। दरअसल मूलाधार से उठ रही अनुभूति सीधी सहस्रार में जा बैठती है और वहाँ प्रेमी के चित्र को मजबूत करती है। इसी वजह से कई लोग प्रेम में पागल होकर साधु बन जाते हैं।सहस्रार चक्र की इसी सार्वभौमिकता के कारण उसे एक हजार पंखुड़ियां दी गई हैं। इसका मतलब है कि यह शरीर के हरेक बिंदु से जुड़ा होता है। अन्य चक्रों में दो, तीन या चार पंखुड़ियां होती हैं, मतलब कि वे आसपास के कुछेक चक्रों से ही जुड़े होते हैं। इसका वर्णन मैंने एक पुरानी पोस्ट में किया है। शिवपुराण के अनुसार कुण्डलिनी ही शिव है, और शिव ही कुंडलिनी है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उसमें शिव ही का ध्यान लगाने को कहा गया है। उसीके अनुसार वह शिव सहस्रार में निवास करते हैं। शक्ति उनसे मिलने के लिए मूलाधार से ऊपर चढ़ती रहती है। जब शक्ति का आवेग एक निश्चित सीमा से ऊपर उठ जाता है, तब उसका शिव के साथ मिलन का कामोन्माद चरम पर पहुंच जाता है। उससे शिव-शक्ति का मिलन पूर्ण हो जाता है, जो कुण्डलिनी जागरण के रूप में प्रकट होता है।

मिश्रित योग सबसे अधिक कारगर होता है, इस उपरोक्त कथन की पुष्टि के लिए मैं अपने साथ घटित घटना का एक उदाहरण देता हूँ। मैं उस समय प्राणोत्थान की अवस्था में था। प्रतिदिन योगाभ्यास कर रहा था। एक दिन मेरे अचानक मिले पुराने मित्र के कारण मुझे कुण्डलिनी का तेज स्मरण हो आया। मैं उसमें खो गया। तभी अचानक मेरे प्राण भी उस कुंडलिनी का साथ देने के लिए मूलाधार से उठकर पीठ के रास्ते मस्तिष्क को चढ़ गए। इससे वह कुण्डलिनी जागृत हो गई। इसका विस्तृत विवरण इस वेबसाइट के होमपेज पर है। प्राण इसीलिए ऊपर चढ़ पाए, क्योंकि मैं प्रतिदिन तांत्रिक हठयोग का अभ्यास कर रहा था, और मुझे प्राण को ऊपर चढ़ाने की आदत बनी हुई थी। यदि वह आदत न होती, तो कुंडलिनी का स्मरण तो मस्तिष्क में तेजी से होता पर वह जागृत न होती, क्योंकि उसे मूलाधार की प्राणशक्ति न मिलती। जागरण कराने वाली असली प्राणशक्ति तो मूलाधार चक्र में ही रहती है। इससे पूर्वकथित इस बात की भी पुष्टि हो जाती है कि प्राण कुंडलिनी का पीछा करता है, और जहाँ कुंडलिनी जाती है, वहाँ प्राण भी चला जाता है। कुण्डलिनी के स्मरण को आप राजयोग कह सकते हैं, और मूलाधार से प्राण को ऊपर चढ़ाने को हठयोग कहते हैं। इससे सिद्ध होता है कि सभी प्रकार के योग मिलजुल कर काम करते हैं, और सभी एक ही महायोग के विभिन्न हिस्से हैं।

कुंडलिनी स्विच

मित्रों, इस बार मैं योग की साधारण सी तकनीक का वर्णन करूंगा। यह है, जीभ की निचली सतह को नरम तालु से टच करने की। वैसे इसके बारे में मैंने पहले भी लिखा था। परंतु इस बार मैं तकनीक का व्यवहारिक रूप दिखाऊँगा। अभी भी मैंने कुंडलिनी को जीभ के माध्यम से फ्रंट चैनेल से उतारा। योग के निरन्तर अभ्यास से मेरी इस तकनीक में लगातार निखार आ रहा है। इसके बारे में मैं नित नई बातें सीख रहा हूँ। 

मस्तिष्क के विचारों और जीभ -तालु के स्पर्श का एकसाथ ध्यान करना चाहिए

ऐसा करने से विचारों की शक्ति खुद ही फ्रंट चैनेल से होते हुए नीचे उतर जाती है। 

जीभ तालु पर जितना पीछे कांटेक्ट में रहे, उतना ही अच्छा है

तालु का पीछे वाला भाग नरम, मखमली, नम व फिसलन से भरा होता है। वहाँ पर स्पर्श की संवेदना भी ज्यादा मजबूत व आनन्द से भरी होती है। कुंडलिनी जितने अधिक ऊपर वाले चक्रों में होती है, जीभ-तालु के आपसी स्पर्श की अनुभूति भी उतनी ही जल्दी और तेज होती है। स्पर्श की अनुभूति यदि पलभर के लिए भी हो जाए, तो भी कुंडलिनी नीचे उतर जाती है। यह ऐसे ही होता है, जैसे दो तारों के क्षणभर के संपर्क से ही करेंट प्रवाहित हो जाता है। कई बार यह अनुभूति जीभ को तालु पर रब करके भी पैदा की जाती है।

साँसें भी जीभ-तालु के आपसी स्पर्श को बनाने और मिटाने का काम करती हैं

इसीलिए जीभ-तालु के कांटेक्ट पॉइंट को कुंडलिनी स्विच भी बोलते हैं। साँस भरते समय यह कांटेक्ट पॉइंट कुछ लूस पड़ जाता है। वास्तव में यहाँ पर अवेयरनेस घट जाती है। इसका मतलब है कि कुंडलिनी स्विच ऑफ़ हो जाता है, और चैनेल का लूप सर्किट ब्रेक हो जाता है। इससे कुंडलिनी एनर्जी मस्तिष्क में जमा हो जाती है। पेट से साँसें भरने से ऐसा ज्यादा अच्छी तरह से होता है। इसी तरह, बैक चैनेल का फन उठाए नाग के रूप में ध्यान करने से भी कुण्डलिनी को बैक चैनेल में ऊपर चढ़ने में मदद मिलती है। मस्तिष्क में कुण्डलिनी एनर्जी के जमा होने से जीभ-तालु के स्पर्श को अनुभव करना भी आसान हो जाता है, जैसा ऊपर बताया गया है। फिर साँस छोड़ते हुए यह और आसान हो जाता है, क्योंकि उस समय पूरे फ्रंट चैनेल पर नीचे की तरफ दबाव पड़ता है। इस तरह से एक स्वचालित यंत्र के पुर्जों की तरह ये सभी तकनीकी बिंदु एक-दूसरे की मदद करते रहते हैं, और कुण्डलिनी चक्र लगातार चलने लगता है। इससे शरीर और मन दोनों रिफ्रेश हो जाते हैं। वैसे भी, कभी भी जीभ को तालु से स्पर्श कराने पर मस्तिष्क का अतिरिक्त बोझ नीचे उतर जाता है। मस्तिष्क के खाली हो जाने से उसमें एकदम से कुण्डलिनी स्वयं ही प्रकट हो जाती है। सिर्फ स्पर्श से कुछ नहीं होता, वहाँ पर अवेयरनेस भी पहुंचनी चाहिए। स्पर्श की संवेदना को गौर से अनुभव करने से वहाँ अवेयरनेस खुद ही पहुंच जाती है। उसके परिणामस्वरूप फ्रंट चैनेल में विशेषकर फ्रंट स्वाधिष्ठान चक्र में एक गहरी मांसपेशियों की सिकुड़न की अनुभूति होती है, और साथ में साँस की एक गहरी गैसप के साथ नियमित व गहरी सांसें चलने लगती हैं। यही कुण्डलिनी एनर्जी का चलना है। 

जीभ के पिछले हिस्से के केन्द्र से फ्रंट चैनल गुजरती है, जो सभी फ्रंट चक्रों को बेधते हुए मूलाधार तक जाती है। उससे कुंडलिनी एनर्जी के गुजरते समय पूरे फ्रंट चैनल एरिया में सनसनी के साथ ऐंठन महसूस होती है।

कई बार कुंडलिनी एनेर्जी पतली और केंद्रीय लाइन पर महसूस होती है, कभी बिना रेखा के ही

जरूरी नहीं कि हमेशा ही जीभ को तालु पर बहुत पीछे ले जाना पड़े। कई बार तालु के अगले भाग में ही अच्छी अनुभूति मिल जाती है। सामान्य पोजिशन में सीधी जीभ की तालु के साथ स्पर्श-संवेदना को भी अनुभव किया जा सकता है। जैसा ठीक लगे, वैसा करना चाहिए। कई बार कुण्डलिनी पतली रेखा में चलती महसूस होती है। ऐसा तब होता है, जब ध्यान तेज होता है, और मन शांत होता है। कई बार कुंडलिनी शक्ति केवल एक चक्र से दूसरे चक्र को स्थान बदलते दिखती है, चक्रों को जोड़ने वाली चैनल लाइन नहीं दिखाई देती।  अभ्यास के साथ खुद ही अनुभूतियाँ विकसित होती रहती हैं। इसलिए औरों की अनुभूतियों की नकल न करते हुए सही अभ्यास में लगे रहना चाहिए। इसी तरह, कई बार कुंडलिनी के चलने से संबंधित क्षेत्र की मांसपेशियों का संकुचन और ढीलापन ही महसूस होता है, बेशक कुंडलिनी का पता नहीं चलता। ऐसा सही तकनीक को लागू करने से होता है। यह कुण्डलिनी के प्रभाव को दिखाता है। कई बार ऐसा महसूस भी नहीं होता, खासकर जब मांसपेशियां थकी हों।

कुंडलिनी ही यमुना में पौराणिक कालियनाग को मारने वाले भगवान श्रीकृष्ण के रूप में अभिव्यक्त होती है

मित्रों, योग एक वैज्ञानिक विधि है। आम लोग इसे आसानी से नहीं समझ सकते। अभ्यास तो इसका तब करेंगे न, जब इसे समझेंगे। इसीलिए आम जनमानस की सुविधा के लिए पुराण रचे गए हैं। पुराणों में योग को विभिन्न मिथक घटनाओं और कथाओं के रूप में समझाया गया है। हालांकि मिथक रूप होने पर भी ये कथाएं सैद्धांतिक रूप से सत्य होती हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि ये मिथक शास्त्रीय होते हैं, विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए होते हैं, और गैर-शास्त्रीय या साधारण मिथकों के विपरीत होते हैं। कुछ तथाकथित आधुनिकतावादियों की सोच के विपरीत, ये अंधविश्वास की श्रेणी में नहीं आते। सामाजिक, व्यक्तिगत और व्यावहारिक मर्यादाओं के उल्लंघन से बचने के लिए कई बातें सीधे तौर पर नहीँ कही जा सकती हैं, इसलिए उन्हें वैज्ञानिक मिथक के रूप में कहना पड़ता है। योग को एकदम से समझना मुश्किल हो सकता है। लम्बे समय तक यौगिक या अद्वैतमयी जीवनशैली को अपना कर रखना पड़ता है। इसीलिए पुराणों में योग से संबंधित बातों को मनोरंजक मिथक कथाओं के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इससे ये कथाएं लंबे समय तक अपने प्रति आदमी की रुचि बना कर रखती हैं। इनसे आदमी अपनेआप ही अप्रत्यक्ष रूप से योगी बना रहता है, और अनुकूल परिस्थिति मिलने पर थोड़े से अतिरिक्त प्रयास से वह पूर्ण योगी भी बन सकता है। यदि सभी लोग एकसाथ पूर्णकालिक योगी बन गए, तब दुनियादारी के काम कैसे चलेंगे। इसीलिए योग को ऐसी वैज्ञानिक व सुहानी कथाओं के रूप में ढाला जाता है, जिन पर विश्वास बना रहे। इससे दुनियादारी के सारे दायित्वों को निभाते हुए भी आदमी हर समय यौगिक जीवनशैली में बंधा रहता है। ऐसी ही एक प्रसिद्ध कथा श्रीमद्भागवत महापुराण में आती है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण व कालियनाग के बीच हुए युद्ध का वर्णन है। उस कथा के अनुसार भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ के डर से रमणक द्वीप पर कालिय नाम का एक विशाल नाग रहता था, जिसके सैंकड़ों फन थे। उसे किसी संत ने श्राप दिया था कि कृष्ण भगवान उसको मारकर उसका उद्धार करेंगे। इसलिए वह वृन्दावन के समीप बह रही यमुना नदी में आ गया था। उसके जहर से यमुना का पानी जहरीला हो गया था, जिससे आसपास के लोगबाग और पशु-पक्षी मर रहे थे। कृष्ण भगवान अपने गोप मित्रों के साथ वहाँ गेंद खेल रहे थे। तभी उनकी गेंद यमुना के जल में चली गई। श्रीकृष्ण ने तुरंत यमुना में छलांग लगा दी। अगले ही पल वे कालियनाग से कुश्ती लड़ रहे थे। बहुत आपाधापी के बाद श्रीकृष्ण उसके बीच वाले और सबसे बड़े सिर पर चढ़ गए। वहाँ उन्होंने अपना वजन बढ़ा लिया और उसके फनों को मसल दिया। उन्होंने उसके सिर और पूँछ को एकसाथ पकड़कर उसे यहाँ-वहाँ पटका। अंत में उन्होंने कालियनाग को हार मानने पर मजबूर कर दिया। तभी कालियनाग की पत्नियां वहाँ आईं और भगवान कृष्ण से उसके प्राणों की भिक्षा माँगने लगीं। श्रीकृष्ण ने उसे इस शर्त पर छोड़ा कि वह सपरिवार यमुना को छोड़कर रमणक द्वीप पर वापिस चला जाएगा और दुबारा यमुना के अंदर कभी नहीं घुसेगा।

कालियनाग सुषुम्ना नाड़ी या मेरुदंड का प्रतीक है, और भगवान श्रीकृष्ण कुंडलिनी के प्रतीक हैँ

 वास्तव में आदमी की संरचना एक नाग से मिलती है। आदमी का सॉफ्टवेयर उसके केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र से बना होता है, जो आकृति में एक फन उठाए नाग की तरह दिखता है। उसमें मस्तिष्क और मेरुदंड आते हैं। आदमी का बाकी का शरीर तो इसी केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर बाहर-बाहर से मढ़ा गया है। इसी केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में सुषुम्ना नाड़ी प्रवाहित होती है। यहाँ यमुना नदी का पानी मेरुदंड के चारों ओर बहने वाले सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूड का प्रतीक है। रमणक द्वीप में निवास करना दुनियादारी के भोग-विलास में उलझने का प्रतीक है। रमणक शब्द को रमणीक या रमणीय शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है मनोरंजक। गरूड़ का भय साधु संतों के भय का प्रतीक है। रमणीक जगह पर साधु संत नहीं जाते। यह देखा जाता है कि साधु संत लोगों को दुनियादारी के फालतू झमेलों से दूर रखते हैं। साधु का श्राप किसी सज्जन द्वारा ईश्वर का सही रास्ता दिखाना है। कालियनाग का श्रीकृष्ण के द्वारा मारे जाने के बारे में कहना उसको आसक्ति के बंधन से मुक्ति प्रदान करने का प्रतीक है। श्रीकृष्ण के द्वारा उसे वापिस रमणक द्वीप भेजने का अर्थ है कि वह दुनिया के भोले-भाले लोगों से दूर एकांत में चला जाए और वहाँ पर आसक्ति का विष फैलाता रहे। कालियनाग की पत्नियां दस इन्द्रियों की प्रतीक हैं। इनमें 5 कर्मेन्द्रियां और 5 ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। ये इन्द्रियाँ कालियनाग की पत्नियां इसलिए कही गई हैं, क्योंकि ये दुनियादारी में आसक्त आदमी के सान्निध्य में बहुत शक्तिशाली होकर उससे एकाकार हो जाती हैं। कालियनाग का विष आसक्तिपूर्ण जीवनशैली का प्रतीक है। यह दुनिया का सबसे शक्तिशाली विष है। इससे आदमी जन्म-मरण के चक्कर में पड़कर बार-बार मरता ही रहता है। कालियनाग के सैंकड़ों फनों से निकल रहे विष का अर्थ है कि मस्तिष्क में पैदा हो रही सैंकड़ों इच्छाओं व चिंताओं से यह आसक्ति बढ़ती ही रहती है।  भगवान कृष्ण यहाँ कुंडलिनी के प्रतीक हैं। उनका कालियनाग के बीच वाले मस्तक पर चढ़ने का अर्थ है, कुंडलिनी का सहस्रार चक्र में ध्यान करना। श्रीकृष्ण के द्वारा गेंद खेलने का अभिप्राय कुण्डलिनी योगसाधना से है। गेंद यहाँ प्राणायाम की प्राणवायु की प्रतीक है। कृष्ण के सखा ग्वाल-बाल विभिन्न प्रकार के प्राणायामों व योगसाधना के प्रतीक हैं। जैसे गेंद आगे-पीछे जाती रहती है, वैसे ही साँसें भी। गेंद का नदी में घुसने का अर्थ है, प्राणवायु का चक्रों में प्रविष्ट होना। श्रीकृष्ण का नदी में छलांग लगाने का अर्थ है कि कुंडलिनी भी प्राणवायु के साथ चक्रों में प्रविष्ट हो गई। यमुना पवित्र नदी है, जिसमें श्रीकृष्ण छलांग लगाते हैं। इसका अर्थ है कि प्राणवायु से पवित्र हुए चक्रों में ही कुंडलिनी प्रविष्ट होती है। श्रीकृष्ण के द्वारा कालियनाग के फनों को मसले जाने का अर्थ है कि कुंडलिनी ने मस्तिष्क की फालतू इच्छाओं और चिंताओं पर रोक लगा दी है, तथा अवचेतन मन में दबे पड़े वैचारिक कचरे की सफाई कर दी है। श्रीकृष्ण के द्वारा कालियनाग के सिर और पूँछ को एकसाथ पकड़े जाने का अर्थ है कि कुंडलिनी मूलाधार चक्र से सहस्रार चक्र तक पूरी सुषुम्ना नाड़ी में फैल गई है। मूलाधार से शक्ति लेकर कुंडलिनी सहस्रार में चमक रही है। ऐसा तब होता है जब तालु-जिह्वा के जोड़ या सहस्रार और मूलाधार का ध्यान एकसाथ किया जाता है। ऐसा करने से कालियनाग के पटके जाने का अर्थ है कि उससे दिमाग का फालतू शोर खत्म हो रहा है, जिससे आदमी शाश्वत आनन्द की ओर बढ़ रहा है। कालियनाग को जान से मारने का प्रयास करने का अर्थ है कि शरीर के तंत्रिका तंत्र को नियंत्रित रूप में ही काम करने देना है। कालियनाग का दुबारा यमुना में न प्रविष्ट होने का अर्थ है कि कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी कभी आसक्तिपूर्ण व्यवहार नहीं करता।

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