कुंडलिनी सबसे बड़ी धर्मनिरपेक्ष वस्तु है

दोस्तों, बहुत से लोग कुंडलिनी को धर्म के नाम से, विशेषकर हिंदु धर्म से जोड़ते हैं। पहले मैं भी लगभग यही समझता था। इसका कारण है, कुंडलिनी k बारे में गहराई से समझ न होना। इसी कमी को पूरा करना इस ब्लॉग का उद्देश्य प्रतीत होता है। आज हम इस पोस्ट में कुंडलिनी की सर्वाधिक धर्मनिरपेक्षता को सिद्ध करने का प्रयास करेंगे।

प्रत्येक धर्म या सम्प्रदाय में अपने अलग-अलग आराध्य हैं

उदाहरण के लिए हिन्दू धर्म के विभिन्न संप्रदायों में अनेक प्रकार के देवी-देवता हैं। शैव संप्रदाय भगवान शिव की अराधना की संस्तुति करता है। वैष्णव सम्प्रदाय में भगवान विष्णु के अवतारों की पूजा करने को कहा गया है। शाक्त लोग देवी माता की अराधना करते हैं। ब्रह्मवादी हिन्दू निराकार ॐ की अराधना करते हैं। इसी तरह सिख धर्म में गुरुओं का ध्यान और उनकी बताई गई शिक्षा को अमल में लाना प्रमुख है। जैन मत में भगवान महावीर व उनके उपदेशों का वर्णन है। बुद्धिस्ट लोग भगवान बुद्ध को अपना सबसे बड़ा ईश्वर मानते हैं। इस्लाम में अल्लाह के प्रति समर्पित होने को कहा गया है। इसाई धर्म में भगवान यीशु की भक्ति पर जोर दिया गया है।

कुंडलिनी योग में कोई भी आराध्य नहीं है

इसका यह अर्थ नहीं है कि कुंडलिनी योगी किसी का भी ध्यान नहीं करते। इसका अर्थ है कि कुंडलिनी योग में अपना अराध्य अपनी मर्जी से चुनने की स्वतंत्रता है। वास्तव में ध्यान के आलंबन का ही नाम कुंडलिनी है, जैसा कि पतंजलि ने अपने योगसूत्रों में कहा है। “यथाभिमतध्यानात् वा” इस सूत्र में पतंजलि ने कहा है कि किसी भी मनचाही वस्तु के ध्यान से मन को स्थिर और योगयुक्त किया जा सकता है। यह अलग बात है कि तांत्रिक हठयोग की तकनीकों से इसके साथ संवेदनात्मक एनर्जी को मिश्रित करके, इसे और ज्यादा मजबूत किया जाता है। कुंडलिनी किसी भी वस्तु या भाव के रूप में हो सकती है। यह प्रेमिका के रूप में भी हो सकती है, प्रेमी के रूप में भी, और दुश्मन के रूप में भी। कृष्ण की कुंडलिनी देवी राधा के रूप में, और देवी राधा की कुंडलिनी अपने प्रेमी कृष्ण के रूप में थी। शिशुपाल कृष्ण को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानता था, इसलिए उसका ध्यान हमेशा कृष्ण में लगा रहता था। इस तरह से शिशुपाल की कुंडलिनी भी भगवान कृष्ण के रूप में थी। कुंडलिनी गुरु के रूप में भी हो सकती है, और शिष्य के रूप में भी। यह प्रकाश के रूप में भी हो सकती है, और अंधकार के रूप में भी। यह बड़े के रूप में भी हो सकती है, और छोटे के रूप में भी। यह तंत्र के रूप में भी हो सकती है, और मंत्र के रूप में भी। यह भगवान के रूप में भी हो सकती है, और भूत के रूप में भी। यह देवता के रूप में भी हो सकती है, और राक्षस के रूप में भी। यह निर्जीव पदार्थ के रूप में भी हो सकती है, और सजीव के रूप में भी। यह मनुष्य के रूप में भी हो सकती है, और पशु के रूप में भी। और तो और, यह ॐ, अल्लाह आदि निराकार रूप में भी हो सकती है। सीधा सा मतलब है कि एक आदमी का जिस वस्तु की तरफ सबसे ज्यादा झुकाव हो, वह उसी वस्तु को अपनी कुंडलिनी बना सकता है। फिर वह योग के माध्यम से उसका नियमित ध्यान करके उसको जगा भी सकता है। यह अलग बात है कि अधिकांश लोग अच्छे व सुंदर व्यक्तित्वों जैसे कि गुरु, देवता आदि का ही ध्यान करते हैं, क्योंकि एक आदमी जैसा ध्यान करता है, वह वैसा ही बन जाता है।

कुंडलिनी भौतिकतावादी विज्ञान से भी ज्यादा धर्मनिरपेक्ष है

विज्ञान भी व्यावहारिक प्रयोगों से सिद्ध किए गए सिद्धांतों को ही मानने की वकालत करता है। यह उनके इलावा अन्य किसी विषय को नहीं मानता। कुंडलिनी तो इन बाध्यताओं की सीमा से भी परे है। कुंडलिनी को किसी सत्य वस्तु या भाव का भी रूप दिया जा सकता है, और असत्य का भी। विज्ञान देवताओं को नहीं मानता, पर बहुत से ऋषियों ने उन्हें कुंडलिनी के रूप में जगाया है। ऐसा ही मैंने पिछली पोस्टों में भी बताया था कि करोल पहाड़ का आकार वास्तव में शिवलिंग जैसा नहीं था, परंतु मेरे निवास से वह विशाल शिवलिंग प्रतीत होता था। उसी आभासिक आकृति पर कई शिवभक्त लोग ध्यान लगा लेते थे। उपरोक्त तथ्यों से तो यही निष्कर्ष निकलता है कि कुंडलिनी सबसे अधिक संवेदनात्मक, सहानुभूतिप्रद, स्वतंत्रताप्रद, प्रेमप्रद, मानवतावादी, लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक, और धर्मनिरपेक्ष है; यहाँ तक कि भौतिकतावादी विज्ञान से भी ज्यादा। कुंडलिनी विज्ञान को यह भलीभांति ज्ञात है कि सभी की व्यक्तिगत रुचि का सम्मान करना चाहिए।

कुंडलिनी ही एक अधिकारी को सच्चा अधिकारी बनाती है

दोस्तों, अधिकारी मुझे बचपन से ही अच्छे लगते हैं। मुझे उनमें एक देवता का रूप नजर आता था। उनमें मुझे एक अपनेपन और सुरक्षा की भावना नजर आती थी। बदले में, अधिकारियों का भी मेरे प्रति एक विशेष प्रेम होता था। अधिकारी का जीवन जीते हुए अब मुझे यह समझ आ रहा है कि ऐसा क्यों होता था। 

अधिकारी देवता की तरह अद्वैतशील होते हैं

एक अधिकारी काम करते हुए भी कुछ काम नहीं करता। तभी तो कहा जाता है कि अधिकारी कुछ काम नहीं करते। वास्तव में एक अधिकारी सभी काम अद्वैत के साथ करता है।अद्वैत के साथ किया गया काम काम नहीं रह जाता। वही औरों से काम करवा सकता है, जो खुद न तो काम करता है, औऱ न ही निकम्मा रहता है। यह ऐसे ही है जैसे कि पानी की मझदार में न फंसा हुआ व्यक्ति ही पानी में फंसे हुए दूसरे व्यक्ति को पानी से बाहर निकाल सकता है। औरों से काम करवाना भी एक काम ही है। अद्वैत के साथ रहने से एक अधिकारी के काम न तो काम बने रहते हैं, और न ही निकम्मापन। एक प्रकार से उसके सारे काम काम की परिभाषा से बाहर हो जाते हैं। यदि अधिकारी खाली बैठा रहे, तो वह निकम्मा कहलाएगा। निकम्मापन भी काम के ही दायरे में आता है, क्योंकि काम और निकम्मापन दोनों एक-दूसरे के सापेक्ष हैं, और एक-दूसरे से शक्ति प्राप्त करते हैं। इसलिए काम के दायरे से बाहर होने के लिए यह जरूरी है कि वह अद्वैत के साथ लगातार काम करता रहे। क्योंकि अद्वैत और कुंडलिनी हमेशा साथ रहते हैं, इसलिए प्रत्यक्ष तौर पर भी कुंडलिनी का सहारा लिया जा सकता है। तभी वह अपने अधीनस्थ लोगों से उत्तम श्रेणी का भरपूर काम ले सकता है।

देवताओं के सर्वोच्च अधिकारी भगवान गणपति भी अद्वैत की साक्षात मूर्ति हैं

भगवान गणेश जी को गणनायक, गणपति, गणनाथ, विघ्नेश आदि नामों से भी जाना जाता है। ये सभी नाम नेतृत्व के हैं। इसीलिए वे सभी देवताओं से पहले पूजे जाते हैं। शास्त्रों ने उन्हें विशेष रूप दिया है। उनका मुँह वाला भाग एक हाथी का है, और बाकी शरीर एक मनुष्य का है। यह रूप अद्वैत का परिचायक है। यह सुंदरता और कुरूपता के बीच के अद्वैत को इंगित करता है। यह उस शक्तिशाली अद्वैत को दर्शाने का एक प्रयास है, जो जानवर और मनुष्य के सहयोग से पैदा होता है। हाथी स्वयं भी अद्वैत भाव का परिचायक होता है। उसमें एक अद्वैतशील संत के जैसी मस्ती और बेफिक्री होती है। हाथी कामभाव व उससे संबंधित मूलाधार चक्र का भी परिचायक है, जो एक नायक या नेता के जैसे सबसे महत्त्वपूर्ण और सर्वप्रथम स्थान पर आता है।

एक सच्चे अधिकारी और कुंडलिनी योगी के बीच समानता

दोनों ही प्रकार के लोग अद्वैतशील होते हैं। दोनों में ही अनासक्ति होती है। दोनों ही हर समय आनन्दित और हंसमुख रहते हैं। इससे यह भी सिद्ध होता है कि कुंडलिनी योग से अधिकारी में निपुणता की कमी पूरी हो सकती है। इसलिए एक अधिकारी को कुण्डलिनी योग जरूर करना चाहिए। प्रेम प्रसंग से भी कुंडलिनी/अद्वैत का विकास होता है। तभी आपने देखा होगा कि अधिकांश अधिकारी वर्ग के लोग इश्क-मोहब्बत के कुछ ज्यादा ही दीवाने होते हैं।

एक अधिकारी के लिए “शरीरविज्ञान दर्शन” जैसे अद्वैत दर्शन की अहमियत

हिन्दू शास्त्र और पुराण अद्वैत की भावना का विकास करते हैं। इसलिए एक अधिकारी को प्रतिदिन उन्हें पढ़ना चाहिए। इसी कड़ी में प्रेमयोगी वज्र ने “शरीरविज्ञान दर्शन” नामक पुस्तक की रचना की है। उसे लोग आधुनिक पुराण भी कहते हैं, क्योंकि वह पूरी तरह से वैज्ञानिक है। कम से कम उसे पढ़ने में तो संकोच नहीं होना चाहिए। 

अद्वैत से ही काम करने की प्रेरणा मिलती है

यह आमतौर पर देखा जाता है कि अद्वैतशील आदमी के काम के आनंद और मस्ती को देखकर बाकी लोग भी काम करने लग जाते हैं। यदि कभी काम के लिए बोलना भी पड़ जाए तो वह इतनी मित्रता व प्यार से होता है कि वह आदेश प्रतीत नहीं होता। एक प्रकार से वह बोलना भी न बोलने के बराबर ही हो जाता है। असली अधिकारी का गुण भी यही है कि उसके संपर्क में आते ही लोग खुद ही अच्छे ढंग से काम करने लग जाते हैं। लोगों में अपनी अलग ही विकास की सोच पैदा हो जाती है। लोग अपने काम से आनन्दित और हँसमुख होने लगते हैं। यदि काम करवाने के लिए अधिकारी को बोलना पड़े या आदेश देना पड़े, तो इसका मतलब है कि अधिकारी के अद्वैतशील व्यवहार में कमी है। वास्तव में अधिकारी बोलते हुए भी नहीं बोलते, और आदेश देते हुए भी आदेश नहीं देते। सच्चे अधिकारी गजब के कलाकार होते हैं।

कुंडलिनी के लिए शिवलिंग के रूप वाले गुम्बदाकार या शंक्वाकार पर्वत का महत्त्व: वर्ष 2020 की अंतिम ब्लॉग पोस्ट

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नया साल चमक और आशा से भरा हो ताकि अंधेरा और उदासी आप से दूर रहें। नववर्ष 2021 की शुभकामना!

दोस्तों, करोल पहाड़ हिमालय का एक बेहद आकर्षक पहाड़ है। यह शिवलिंग के जैसे आकार का है। मैदानी क्षेत्रों से ऊपर चढ़ते समय यह ऊंचे पहाड़ों के प्रवेशद्वार पर स्थित प्रतीत होता है। मेरी कुंडलिनी से जुड़े इसके योगदान पर वैज्ञानिक चर्चा हम आज इस पोस्ट में करेंगे।

करोल पहाड़ के साथ मेरा आजन्म रिश्ता

मैं इसी पहाड़ की नजर में पैदा हुआ, और इसीके सामने बड़ा हुआ। यह आसपास के क्षेत्र में सबसे ऊंचा पहाड़ एक साक्षी की तरह हर समय मेरे सामने खड़ा रहा। यह हमेशा मेरे कर्मों की गवाही देता रहा, और मुझे सन्मार्ग पर प्रेरित करता रहा। इसने मुझे कभी अहंकार नहीं करने दिया। जैसे ही मुझे कभी थोड़ा सा भी अहंकार होने लगता था, तो वह कहता था, “मैं तो सबसे बड़ा और ऊँचा हूँ, फिर भी मैं कभी अहंकार नहीं करता; फिर तू मेरे सामने कीड़े जितना छोटा होकर भी क्यों अहंकार कर रहा है”। उसके इस ताने से मेरा अहंकार समाप्त हो जाता था। उससे मेरे मन की कुंडलिनी चमकने लग जाती थी। इस पहाड़ पर मेरा आना-जाना लगा रहता था, क्योंकि मेरे ज्यादातर मित्र, रिश्तेदार व आजीविका के साधन इसी पहाड़ पर होते थे। प्रतिदिन सुबह जब मैं सूर्य को जल चढ़ा रहा होता था, तब वह इसी पहाड़ के पीछे से उग रहा होता था। इससे वह पूजा का जल उस पहाड़ को भी स्वयं ही लग जाता था। इससे अनजाने में ही वह पहाड़ मेरा इष्ट देवता और मित्र बन गया था।

समय के साथ करोल पहाड़ के साथ मेरी कुंडलिनी मजबूती से जुड़ती गई

सूर्य को जल देते समय मेरे मन में उमड़ने वाली कुण्डलिनी करोल पहाड़ के साथ स्वयं ही जुड़ती गई। सूर्य की तरफ तो सीधा देखा नहीं जा सकता, और न ही सूर्य देव दिनभर नजरों के सामने रहते हैं। परन्तु वह पहाड़ तो हमेशा नजरों के सामने रहता था। उसकी तरफ देर तक सीधी नजर से भी देखा जा सकता था। काम करते हुए जरा सा सिर ऊपर उठाता, तो वह पहाड़ अनायास ही दृष्टिपटल पर आ जाता था, और उसके साथ ही उससे जुड़ी हुई मेरी कुंडलिनी भी। इस तरह से मेरी कुण्डलिनी मेरे जीवनभर मेरे साथ लगातार बनी रही, और उत्तरोत्तर बढ़ती रही। परिणामस्वरूप, मुझे क्षणिक आत्मज्ञान भी उसी खूबसूरत पहाड़ के नजारे के साथ मिला, और कुंडलिनी जागरण भी उसीके चरणों की छत्रछाया में जाकर मिला।

करोल पहाड़ का शिवलिंग के जैसा आकार भी मेरी तांत्रिक कुंडलिनी के विकास में सहायक बना

शिवपुराण में शिवलिंग की आकृति का बहुत ज्यादा आध्यात्मिक महत्त्व बताया गया है। वहाँ शिवलिंग की पूजा को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। जरा सोचो कि जब छोटे से घरेलू आकार के शिवलिंग का इतना ज्यादा महत्त्व है, तब शिवलिंग के आकार वाले पहाड़ का महत्त्व क्योंकर नहीं होगा। इससे तो महत्त्व कई गुना बढ़ जाएगा, क्योंकि पहाड़ की विशालता, अचलता, अमरता, और अहंकारविहीनता के कारण उसके प्रति आदरबुद्धि वैसे भी ज्यादा होती है। तभी तो पहाड़ को देवता भी माना जाता है। इसी वजह से ही लोग साधना के लिए सुरम्य पहाड़ों की ओर जाते हैं। वैसे तो विभिन्न कोणों से देखने पर वह पहाड़ विभिन्न आकृतियों में दिखाई देता था, यद्यपि उसकी शिवलिंग के जैसी सुंदर आकृति तो मेरे घर व आसपास के क्षेत्र से ही ज्यादा दिखाई देती थी। इसका मतलब है कि वास्तविक आकृति का उतना महत्त्व नहीं है, जितना कि आकृति के भान होने का है। शिवलिंग के सूक्ष्म तांत्रिक महत्त्व के कारण ही मंदिर के शिखर कुछ शंक्वाकार या गुम्बदाकार लिए होते हैं। यह आकार वास्तव में मूलाधार से जुड़ा होता है, और उसी की शक्ति लिए होता है। कैलाश पर्वत का रूप भी ऐसा ही है, और संभवतः तंत्र के सर्वाधिक अनुरूप है। तभी तो यहाँ पर साक्षात शिव का निवास बताया गया है।

पहाड़ एक साधना में लीन मनुष्य की तरह होता है

इसी वजह से तो पहाड़ के रूप को भगवान शिव के रूप के साथ जोड़ा गया है। उसकी वनस्पति शिव की जटाएं हैं। उससे निकलते नदी-नाले व झरने शिव की जटा से निकलती गंगा नदी है। उस पर उगता चाँद शिव के मस्तक का खूबसूरत अर्धचंद्र है। उसके अंदर बसने वाले लोग व वन्य जीवजंतु शिव के ऊपर लिपटे नाग के रूप में हैं। उसका वनस्पतिविहीन व पथरीला भूभाग शिव के शरीर के नग्न भाग के रूप में है।

पहाड़ का अपना स्वरूप कुंडलिनी जागरण के दौरान की अवस्था है

यह अवस्था भाव, अभाव, व पूर्णभाव का मिश्रित रूप है। नशे आदि की अवस्था में भी भाव व अभाव दोनों एकसाथ होते हैं, परंतु उसमें पूर्णभाव नहीं होता। पर्वत की आत्मा में अभाव की अवस्था अद्वैत व जजमेंट से रहित चेतना के रूप में है, भाव की अवस्था अस्तित्व के आनंद के रूप में है, और पूर्णभाव की अवस्था पूर्ण अस्तित्व के परमानन्द के रूप में है। यह पूर्णभाव सर्वोच्च अनुभव के रूप में है। इसे भावाभावहीनता (न भाव, न अभाव) के रूप में भी जाना जा सकता है। पर्वत की ही तरह अन्य सभी निर्जीव पदार्थ भी जागती हुई कुण्डलिनी के रूप में पुर्नजीवन के रूप में हैं, निर्जीव नहीं। तभी तो कुंडलिनी जागरण के दौरान सभी कुछ अपने जैसा और एकसमान लगता है। भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत के इसी सर्वव्यापी रूप को समझा था, इसीलिए वे इंद्र देवता के कोप से बच पाए और व्रज के ग्रामीणों को भी बचा पाए। ग्रामीण तो गोवर्धन पर्वत को अपना स्थानीय देवता मानते थे, जो सीमित व अलग-थलग रूप वाला था। यह कथा मुझे एक रूपक की तरह भी लगती है। इंद्र विकास व संसाधनों के अहंकार से युक्त शहरवासियों व मैदानी भूभाग में रहने वाले लोगों का प्रतीक है। गोवर्धन पर्वत गांव की हरी-भरी वादियों का प्रतीक है। व्रजवासी एक अनपढ़, ग्रामीण, पहाड़ी, पिछड़े, अन्धविश्वासी व संकुचित सोच के अहंकारी आदमी का प्रतीक है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि अहंकार शहरवासी और ग्रामवासी, दोनों में है। यद्यपिशहरी में उच्चता व कृत्रिमता का अहंकार है, और ग्रामीण में निम्नता व प्रकृति का। ये दोनों प्रकार के अहंकार आपस में टकराते हैं। इन दोनों प्रकार के अहंकारों से रहित आदमी ज्ञानी कृष्ण की तरह है, जो इन दोनों प्रकार के लोगों के साथ मिश्रित होकर भी उनके दुष्प्रभावों से अछूता रहता है।

कुंडलिनी ही मन की वह ट्यूनिंग फ्रेकवेंसी है, जो मामूली सी लौकिक और पारलौकिक हलचल को भी आसानी से पकड़ लेती है

भगवान करे कि क्रिसमस के साथ कुंडलिनी बढ़े। सभी को क्रिसमस की शुभकामनाएं।

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दोस्तों, पिछली पोस्ट में मैंने बताया कि कैसे ग्रहों के साथ ट्यूनिंग बना लेने से उनके दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है। इस पोस्ट में हम इस बात पर चर्चा करेंगे कि वह ट्यूनिंग क्या है, और वह कैसे कुण्डलिनी सिद्धांत से जुड़ी हुई है।

कुंडलिनी ही मन की वह फ्रेक्वेंसी है, जिस पर हम ग्रहों के साथ ट्यून हो सकते हैं

हम रेडियो की ट्यूनिंग को नोट करके रखते हैं, और उसी फ्रेक्वेंसी पर हम रेडियो को चलाते हैं। दूसरी फ्रेक्वेंसी पर चलाने से रेडियो नहीं चलेगा। इसी तरह हमें अपनी कुंडलिनी का बखूबी पता होता है, और उसे हम कभी भूलते नहीं। वह मन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण चित्र होता है। उसको योगी लोग प्रतिदिन योगसाधना से भी याद करते रहते हैं। यदि किसी जन्मकुंडली-योग के कारण ग्रहों से आने वाला प्रकाश कम हो जाए, तो उसे संतुलित करने के लिए हमारे मन की कुंडलिनी की चमक बढ़ने लगती है। ऐसा महसूस होने पर हम कुंडलिनी योगसाधना को भी बढ़ा देते हैं। मन के दूसरे चित्रों की चमक बढ़ाने से हमें उतना लाभ नहीं मिलता, क्योंकि हमने उन्हें ग्रह पूजा आदि धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से ग्रहों के साथ व उनके प्रकाश के साथ नहीं जोड़ा होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो उनकी ट्यूनिंग ग्रहों के साथ नहीं की होती है। वास्तव में, धार्मिक अनुष्ठानों से केवल मन की कुंडलिनी ही ऊर्जावान बनती है। अन्य गतिविधियों से विचारों की बाढ़ में शक्ति बंट जाती है। इससे कोई एक विचार ट्यूनिंग फ्रेक्वेंसी की ऊर्जा प्राप्त नहीं कर पाता। ट्यूनिंग विचार की ऊर्जा जितनी अच्छी हो, उतनी अच्छी ट्यूनिंग होगी, क्योंकि अंदर-बाहर, यहाँ-वहाँ सभी कुछ ऊर्जा से भरपूर है। इसे हम ऑटो सर्च फंक्शन भी कह सकते हैं। ग्रहों के साथ पहले से ट्यून होई हुई कुंडलिनी खुद ही एक्टिवेट हो जाती है। ग्रहों के प्रकाश में किसी भी प्रकार के बदलाव के होने पर कुंडलिनी क्रियाशील हो जाती है। वह एक बफर का काम करते हुए उन बदलाओं के झटकों से सुरक्षा प्रदान करती है। 

ग्रहों के ऊपर कुण्डलिनी के ध्यान से वह ट्यूनिंग फ्रेक्वेंसी बन जाती है

ऐसा ग्रहों के पूजन से, सूर्य को अर्घ्य देने से, प्रतिदिन ध्यानपूर्वक पंचांग पढ़ने से और अन्य विविध धार्मिक अनुष्ठानों से होता है। तभी तो शास्त्रों में आता है कि प्रतिदिन ध्यानपूर्वक पंचांग को पढ़ने वाले पर कभी कोई विपत्ति नहीं आती। किसी आदमी के लिए ग्रहों के प्रकाशमान होने पर उसकी कुंडलिनी उस प्रकाश को ग्रहण करके चमकने लगती है। जब वे ग्रह उस आदमी के लिए अंधकारमय बनते हैं, तब वही कुंडलिनी उस आदमी को प्रकाश प्रदान करती रहती है। इस प्रकार से कुंडलिनी एक बैटरी या phosphorescent/ स्‍फुरदीप्‍त पदार्थ की तरह काम करती है, जो चार्ज और डिस्चार्ज होती रहती है, और अंधकार से बचाती है। प्रतिदिन के कुंडलिनी योग से भी उसे चार्ज किया जाता रहता है।

ग्रह-शांति के उपाय कुंडलिनी को रिचार्ज करते हैं

ग्रह-शांति के लिए नवग्रह पूजन, दान, जप-तप, व्रत, यज्ञ आदि धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। ये सभी उपाय मन को प्रकाशित करते हैं। सबसे अधिक प्रकाशित कुंडलिनी होती है, क्योंकि वही मन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण चित्र के रूप में होती है। उस कुंडलिनी से निकलने वाला प्रकाश ग्रहों के प्रकाश की कमी को पूरा कर देता है।

जीवन की प्रत्येक परिस्थिति ग्रहनिर्मित ही होती है

हरेक घटना सूर्य के प्रकाश में होती है। क्योंकि सभी आकाशीय पिंड एक-दूसरे से जुड़े हैं, इसलिए अन्य सभी ग्रहों का भी उनमें योगदान होता है। इसलिए यह स्वाभाविक है कि कुंडलिनी जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में हितकारक होती है। यदि किसी आदमी को उन्नत होने के लिए उन्न्त होने के लिए उपयुक्त घटनाओं का सहयोग मिल रहा हो, तो हम कह सकते हैं कि उसके ग्रह शुभ हैं। इसी तरह यदि किसी आदमी को उन्नत होने के लिए घटनाएँ न मिल रही हों या अनुपयुक्त घटनाएं मिल रही हों, तो कह सकते हैं कि उसके ग्रह अशुभ हैं।

इस पोस्ट की विश्लेषणात्मक विवेचना यही है कि जिस तरह एक रेडियो सेट से हमेशा अच्छा संगीत प्राप्त करने के लिए उसे हमेशा ट्यूनिंग फ्रेकवेंसी पर ऑन रखना जरूरी है, उसी तरह हमेशा आनंदमयी बने रहने के लिए मन में हमेशा कुण्डलिनी को बसा कर रखना जरूरी है। 

कुण्डलिनी की चमक को कम करने के लिए ही कुंडली-ग्रह किसी आदमी के लिए अपनी चमक कम करते हैं, जिससे पाप का अंधेरा हावी होकर अपना बुरा असर दिखाता है

दोस्तों, हाल ही में मुझे कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का सामना करना पड़ा। वैसी घटनाओं की रोकथाम के लिए मेरे परिचितों द्वारा मेरी जन्मपत्री कई प्रकार के ज्योतिषविदों से परीक्षित करवाई गई। कुछ ज्योतिषविदों की ऑनलाइन रॉय ली गई, तो कुछ की ऑफलाइन। सभी ने मेरी ग्रह-दशा को बहुत खराब बताया। एकदम से मेरा तुलादान करवाया गया। हनुमान चालीसा, दुर्गा रक्षा स्तोत्र, व गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र पढ़ने को कहा गया। महामृत्युंजय मन्त्र-जाप करने को कहा गया। मैं इन्हीं बातों से जुड़े हुए अपने कुण्डलिनी-अनुभव व इससे जुड़े मनोवैज्ञानिक सिद्धांत इस पोस्ट में साझा करूँगा।

बुरा समय आने पर कुण्डलिनी धीमी पड़ने लगती है

पूर्ववत नियमित योग करने पर भी मेरे मन की कुण्डलिनी धीमी पड़ती जा रही थी। मुझे उसका कारण समझ नहीं आ रहा था। हालांकि बहुत पहले भी मेरे साथ ऐसा होता था, पर उसकी वजह याद नहीं आ रही थी। उससे उस समय भी मैं इसी तरह से दुर्भाग्य के साए में आ जाता था।

धार्मिक कृत्यों से कुण्डलिनी चमकने लगती है, जो हर प्रकार से कल्याण करती है

वास्तव में सभी धार्मिक कृत्य कुण्डलिनी के माध्यम से ही लाभ पहुंचाते हैं। उनसे कुण्डलिनी एकदम से पुष्ट हो जाती है। वह कुंडलिनी फिर हर प्रकार से आदमी की भलाई में जुट जाती है। कुंडलिनी ही आदमी को विपदाओं से बचाती है। तुलादान कराते वक्त ही मुझे अहसास हुआ कि मेरे पाप या यूं कहो कि मन का बोझ मेरे कंधे से उतरकर दूसरे पलड़े पर रखे हुए अनाज के साथ नीचे उतर गया था। उससे मैं हल्का हो गया और मेरे अंदर जैसे काफी खाली जगह बन गई। उस खाली जगह को भरते हुए मेरी कुंडलिनी एकदम से कौंधने लग गई। उससे मैंने फीलगुड महसूस किया और उसके बाद मैं हर समय कुंडलिनी के आनंद में मस्त रहने लगा। कुण्डलिनी से जुड़े अन्य सारे आध्यात्मिक गुण भी पुनः मेरे अंदर प्रकट हो गए। उससे मेरा जीवन भी सुधर गया। व्रत-उपवास, जप-पाठ आदि धार्मिक कृत्यों से भी मुझे अपनी कुंडलिनी सुदृढ़ होती हुई महसूस हुई। विशेष ग्रह-दशा में विशेष धार्मिक कृत्य इसीलिए बताए जाते हैं, क्योंकि वे ही कुंडलिनी को सबसे ज्यादा उजागर करते हैं।

आकाशीय पिंड कुंडलिनी को प्रभावित करते हैं, क्योंकि दोनों ही चमकीले होते हैं

पाप मन के बोझ के रूप में प्रकट होते हैं। वे कुंडलिनी को दबाने की कोशिश करते हैं। इसी तरह, बुरी ग्रह दशा भी कुंडलिनी को दबा कर अपना प्रभाव दिखाती है। कुंडलिनी के दबने से पुराने पाप मन के बोझ के रूप में प्रकट हो जाते हैं। आदमी के लिए बुरी ग्रह दशा का मतलब यहाँ उसके लिए ग्रहों की चमक का कम होना है। उससे कुंडलिनी की चमक भी कम हो जाती है। जिन लोगों के मन में कुंडलिनी नहीं बनी होती है, उनकी सामान्य मानसिकता की चमक को प्रभावित करके ग्रह अपना असर दिखाते हैं।

ग्रह अपना असर कैसे दिखाते हैं

इसे हम एक साधारण से उदाहरण से समझ सकते हैं। सूर्य को सबसे बड़ा व चमकीला ग्रह माना जाता है, और उसका प्रभाव भी सबसे ज्यादा दिखाई देता है। जिस दिन चमकदार धूप हो, उस दिन मन आनंद व उमंग से भरपूर होता है। जिस दिन सूर्य की रौशनी बादलों से ढकी हो, उस दिन मन में अवसाद जैसा छाया रहता है। ऐसा ही प्रभाव अन्य ग्रह भी दिखाते हैं, जिसे ज्योतिष शास्त्र से समझा जाता है। जैसे रेडियो सिग्नल हर जगह हैं, पर वे उनसे प्रोपर ट्यूनिंग करने वालों को ही प्राप्त होते हैं; उसी प्रकार ग्रहों की चमक हर जगह है, पर वह समुचित जन्मकुंडली-योग वाले आदमी को ही प्राप्त होती है। यह ऐसे ही होता है, जैसे कई लोगों को सूर्य का प्रकाश भी आनंदित नहीं कर पाता। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उन्होंने सूर्य व उसके प्रकाश के साथ ट्यूनिंग नहीं की होती। शायद इसी ट्यूनिंग को बनाने के लिए ही सुबह के समय सूर्य को अर्घ्य देने की धार्मिक परम्परा है। इसी तरह नवग्रह पूजन से उन सभी ग्रहों के साथ ट्यूनिंग हो जाती है।

कोरोना काल में ज्योतिष शास्त्र अतिरिक्त सहायता प्रदान कर सकता है

जिन बीमारियों का इलाज है, उनके मामलों में तो कोई आध्यात्मिक मनोविज्ञान की बात ही नहीं करता। सफलता के लिए हर कोई आसान शॉर्टकट अपनाना चाहता है, बेशक वह टिकाऊ न हो।  पर कोरोना में तो यह विशेष लाभ पहुंचा सकता है, क्योंकि उसका इलाज ही नहीं। जब मन का बोझ कम होगा, तो स्वाभाविक है कि शरीर की इम्यूनिटी बढ़ेगी, जिससे कोरोना से लड़ने में मदद मिलेगी। यह तो वैज्ञानिक प्रयोगों से पहले से ही सिद्ध हो चुका है कि कुंडलिनी ध्यान से शरीर की इम्यूनिटी बढ़ती है।

ज्योतिष शास्त्र अपने आप में सम्पूर्ण विज्ञान है, जिसे गहन वैज्ञानिक अनुसंधान की आवश्यकता है

मैंने गूगल पर बहुत सर्च किया कि कहीं डीमिस्टीफाईंग ज्योतिष आदि के नाम से या अन्य कोई सरलीकृत वैबसाइट मिल जाए, पर कहीं नहीं मिली। ज्योतिष से संबंधित विद्वान पाठकों से अपेक्षा है कि वे इस क्षेत्र में पहल करें और ज्योतिष को पूर्ण सरलता से आम लोगों तक पहुंचाएं।

कुंडलिनी योगसाधना की सर्वश्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए ही शिवपुराण में शिव-केतकी की कथा के रूपक का वर्णन आता है

दोस्तों, आओ थोड़ा कुंडलिनी ध्यान कर लेते हैं। पिछली पोस्ट में मैंने जो शिव-केतकी की कथा कही थी, वह पुराणों में लिखित रूपकों का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। पुराण ऐसे रूपकों से भरे हुए हैं। रूपकों की सहायता से प्रस्तुत विषय अच्छी तरह से समझ में आ जाता है, और अच्छी तरह से याद रहता है। अधिकांश आध्यात्मिक ज्ञान मन की सीमा से बाहर होता है, और प्रत्यक्ष अनुभव की वस्तु है। इसलिए उसे रूपकों में ढालकर मन के दायरे में लाया जाता है। 

पूर्वोक्त प्रकाशमान स्तंभ के ओर-छोर की खोज करने के लिए ब्रह्मा ऊपर की ओर और भगवान विष्णु नीचे की ओर भागे थे

पूर्वोक्त कथा में हमने विष्णु को ऊपर की ओर तथा ब्रह्मा को नीचे की ओर जाते दिखाया था। पर वास्तविकता इसके विपरीत थी। वैसे इससे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। रूपकों को हम किसी भी तरफ को ढाल सकते हैं। सत्य का अनुभव तो वही रहता है। रूपक सत्य को नहीं बदल सकते। रूपकों का अपना कोई गणित नहीं होता। रूपक तो केवल सत्य को समझाने के लिए बनाए गए होते हैं। रूपक की इस विपरीत स्थिति में हम सत्य के अनुभव को निम्नलिखित तरीक़े से ढाल सकते हैं। ब्रह्मा प्रकार के लोग क्योंकि अंधाधुंध निर्माण कार्य करवाते हैं, इसलिए वे अपने सकाम कर्मों के फलस्वरूप विभिन्न उच्च लोकों को प्राप्त करते हैं। वे सहस्रार रूपी परम लोक को प्राप्त नहीं करते, क्योंकि वे जगत के प्रति आसक्त होते हैं। इसलिए वे कुंडलिनी योगसाधना नहीं कर पाते। यदि करते हैं, तो वह शीघ्र फलदायी नहीं होती। बाकि तो पूर्वोक्त रूपक में सब ठीक है। इसी तरह, विष्णु प्रकार के लोग नम्रता के, गहन अन्वेषण के, और ज्ञान चिंतन के प्रतीक होते हैं। वे नीचे के लोकों में रहने वाले दीन दुखी लोगों की सेवा में जुट जाते हैं। उनमें भी जगत के पालन और रक्षण का अहंकार आ जाता है। फिर भी वे अपनी झूठी शेखी नहीं बघारते, और न ही अपने प्रभाव का ज्यादा ढिंढोरा पीटते हैं। इसलिए उन्हें नीचे के लोकों या चक्रों में जाने वाला बताया गया है। इसी कारण से उनकी भी कुंडलिनी योग साधना आसानी से सफल नहीं होती। बाकि तो रूपक में सब ठीक ही है। असली तांत्रिक कुंडलिनी योगी तो भगवान शिव की तरह मस्तमौले होते हैं। उन्हें दुनियादारी का कोई फिक्र-फाका नहीं होता। वे अपनी कुंडलिनी के साथ मस्त और आनन्दमग्न होते हैं। वे तांत्रिक साधना से बढ़ाई गई अपनी एनर्जी को दुनियादारी में बर्बाद न करके उससे अपनी कुंडलिनी को जागृत करते हैं। वे ज्यादा पाने की चाहत में नहीं भागते। जो उन्हें मिल जाता है, उसी में संतुष्ट हो जाते हैं। भगवान शिव के पास भी एक बाघम्बर, एक मृगचर्म, एक त्रिशूल, एक सर्प, एक बैल और पार्वती माता के सिवाय कुछ नहीं होता। वे इन्हीं में खुश रहते हुए गहन व आनन्दमयी ध्यान साधना में डूबे रहते हैं।

केतकी का पुष्प ऐसे लोगों का प्रतीक है, जो भगवान के साथ रहकर भी उसे नहीं पहचानते

कथा में आता है कि केतकी का सफेद पुष्प भगवान शिव के मस्तक से नीचे गिरा था, पर वह भी उस ज्योति स्तंभ का आदि-अंत नहीं जानता था। केतकी की तरह साफ-सुथरी छवि वाले लोग भी उन पुजारियों की तरह हैं, जो लगातार मन्दिरों में रहकर भी भगवान को नहीं जानते। आम जनता उन पर विश्वास करती है, इसलिए ब्रह्मा प्रकार के लोग इस बात का नाजायज फायदा उठाते हैं। वे पैसे के दम पर उनसे अपना गुणगान करवाते हैं, और जतवाते हैं कि वे सबकुछ अर्थात भगवान को जानते हैं। बाकी तो रूपक में सब वैसा ही है।

कुंडलिनी ही हिंदू पुराणों की सर्वप्रमुख विषयवस्तु है: शिव व केतकी के फूल की कहानी

दोस्तों, पिछली पोस्ट में मैंने शिवपुराण की एक कथा के बारे में बताया था, जो कि तंत्रशास्त्र के रहस्य का आधारबिंदु है। उसे केतकी के फूल की कहानी कहते हैं। इस पोस्ट में मैं उस कहानी की गहराई से व्याख्या करूँगा।

क्या है केतकी के फूल की कहानी

शिवपुराण के अनुसार एक बार भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच में झगड़ा हो गया था। भगवान ब्रह्मा कहने लगे कि उन्होंने सारे संसार का निर्माण किया है, इसलिए वे ही सबसे बड़े हैं। दूसरी ओर, भगवान विष्णु कहने लगे कि वे ही सारे संसार का पालन और रक्षण करते हैं, इसलिए वे ही सबसे बड़े हैं। जब उनके झगड़े से चारों ओर उथल-पुथल मच गयी, तब उन दोनों के बीच में एक ज्योतिर्मय स्तंभ प्रकट हुआ। आकाशवाणी से आवाज हुई कि जो सबसे पहले इसके ओर-छोर का पता लगाएगा, वही सबसे बड़ा है। भगवान विष्णु ऊपर की तरफ चल पड़े, और भगवान ब्रह्मा नीचे की ओर। परंतु दोनों ही उसके छोर का पता नहीं लगा पाए और खाली हाथ वापिस लौट आए। विष्णु ने अपनी असफलता की सच्ची कहानी ब्रह्मा को बयान कर दी, परंतु ब्रह्मा भगवान विष्णु से झूठ बोलने लगे। ब्रह्मा ने कहा कि वे उसके छोर को छूकर वापिस आए थे। ब्रह्मा ने केतकी के सफेद फूल को साक्षी के रूप में प्रस्तुत किया। तभी इस झूठ से नाराज होकर भगवान शिव वहाँ प्रकट हो गए। उन्होंने कहा कि वे ही सबसे बड़े हैं तथा उनके सिवाय कोई दूसरा इसके आदि-अंत को नहीं जान सका है। केतकी के झूठ से नाराज होकर शिव ने उसको शाप दिया कि वह कभी उनकी पूजा में शामिल नहीं किया जाएगा। साथ में, ब्रह्मा को भी शाप दिया कि कहीं भी उनका मंदिर नहीं होगा, और न ही उनकी पूजा की जाएगी।

शिव-केतकी की कहानी का तांत्रिक रहस्य

ब्रह्मा और केतकी के फूल किसके प्रतीक हैं

वास्तव में उपरोक्त कथा मैटाफोरिक है, और कुंडलिनी योग की सर्वश्रेष्ठता की ओर इशारा कर रही है। ब्रह्मा उन लोगों का प्रतीक है, जो अंधाधुंध निर्माणकार्य से प्रकृति को नुकसान पहुंचा रहे हैं। अहंकार का सहारा लेने वाले बिजनेसमैन, नेता और नकली धर्मगुरु इसी प्रकार के लोग होते हैं। रजोगुणी यज्ञ आदि धार्मिक अनुष्ठान करवाने वाले लोग भी इनमें शामिल हैं। उनके अंदर अहंकार पैदा हो जाता है, और वे अपने आप को सबसे बड़ा समझने लगते हैं। उनके पास धन की कोई कमी नहीं होती, इसलिए वे समाज के प्रतिष्ठित व साफ-सुथरी छवि वाले लोगों को और पत्रकारों को खरीद लेते हैं। केतकी का सफेद फूल ऐसे ही लोगों का परिचायक है। वे ऐसे लोगों से अपना भरपूर गुणगान करवाते हैं, और असली भगवान को अनदेखा करके खुद भगवान बन बैठते हैं। इसीलिए ऐसी साफ सुथरी व सफेद छवि वाले कपटी लोग भगवान शिव को प्रसन्न नहीं कर पाते। उन्हें प्रसन्न करने के लिए तो बच्चे की तरह भोले बनना पड़ता है। तभी तो शिव को भोलेनाथ या भोले बाबा भी कहते हैं। तांत्रिक भी भोले ही होते हैं। ब्रह्मा जैसी छवि वाले उपरोक्त लोग भी लोगों से सच्चा सम्मान नहीं प्राप्त कर पाते। उनके प्रभाव के डर से ही लोग उन्हें झूठा सम्मान देते हैं। जैसे भगवान ब्रह्मा स्तंभ का निचला छोर ढूंढते हैं, वैसे ही उनकी तरह के लोगों का झुकाव भी नीचे अर्थात तमोगुण की तरफ ज्यादा होता है। तमोगुण मदिरा, माँस आदि के अनियंत्रित उपभोग के रूप में हो सकता है। वे ब्रह्मा की तरह ही रजोगुणी होते हैं। रजोगुण का झुकाव तमोगुण की तरफ ज्यादा होता है। वे बहुत नीचे के लोकों या चक्रों तक पहुंच जाते हैं, पर सबसे नीचे के लोक अर्थात मूलाधार चक्र तक नहीं पहुंच पाते। इसका सीधा सा अर्थ है कि वे मूलाधार चक्र पर कुंडलिनी को जगा नहीं पाते। यदि मूलाधार चक्र पर भी कुंडलिनी जागृत हो जाए, तो वह सभी चक्रों या लोकों को भेदते हुए सीधी सहस्रार में चली जाती है, और वहाँ भी जागृत हो जाती है। पर ऐसा तांत्रिक लोग ही कर सकते हैं, साधारण लोग नहीं।

भगवान नारायण सेवादारों व दानवीरों के प्रतीक हैं

समाज के कुछ लोग जनता की सेवा से सीधे जुड़े होते हैं। उनमें सेवादार और दानवीर मुख्य होते हैं। सात्विक धर्म-कर्म आदि करने वाले लोग भी इनमें शामिल हैं। अनेक प्रकार की मानसिक साधनाएं करने वाले लोग भी ऐसे ही होते हैं। हालाँकि वे भोले होते हैं, पर फिर भी वे ज्योतिर्मय स्तंभ का छोर नहीं ढूंढ पाते। वे स्तंभ पर ऊपर की ओर जाते हैं, क्योंकि वे सत्त्वगुणी होते हैं। उनके अंदर मन के दोष नहीं होते। अहंकार भी उनमें कम होता है। वे काफी ऊपर के लोकों या चक्रों तक चले जाते हैं, पर सर्वोच्च लोक या सहस्रार तक नहीं पहुंच पाते। इसका अर्थ है कि वे भी कुंडलिनी को जागृत नहीं कर पाते। फिर शिव ने कहा कि वे ही इसे जानते हैं। साथ में कहा कि इसलिए वे ही सबसे बड़े हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि शिवभक्त तांत्रिक ही अपनी कुंडलिनी को जागृत कर पाते हैं।

ज्योतिर्मय स्तंभ सुषुम्ना नाड़ी का और विभिन्न लोक विभिन्न चक्रों के प्रतीक हैं

वास्तव में सारा संसार हमारे अपने मनुष्य शरीर में बसा हुआ है, “यतपिण्डे तत्ब्रह्मांडे” के अनुसार। ऐसा ही “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” पुस्तक में भी वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया गया है। जो कथा में विभिन्न ऊपरी और निचले लोक कहे गए हैं, वे हमारे शरीर की रीढ़ की हड्डी में स्थित चक्र ही हैं। जो प्रकाशमय स्तम्भ है, वह सुषुम्ना नाड़ी है। वह भी चमकदार संवेदना के रूप में होती है। वह मूलाधार चक्र से अर्थात सबसे निचले लोक से सहस्रार चक्र अर्थात सबसे ऊपर के लोक तक गुजरती है। बीच में अनेक प्रकार के लोक अर्थात चक्र आते हैं। उसका लघु रूप लिंग या वज्र है। वही उस स्तंभ का सबसे प्रमुख भाग होता है, क्योंकि वहीँ से प्रकाशमय संवेदना स्तंभ उत्पन्न होता है।

कुंडलिनी जागरण के लिए भगवान शिव लिंग को मूर्ति से अधिक श्रेष्ठ मानते हैं

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इससे भगवान शिव की तथाकथित तन्त्रेश्वरता स्पष्ट जाती है। वे अपने लिंग को अपना निर्गुण रूप और अपनी मूर्ति को सगुण रूप मानते हैं। लिंग उस विराट स्तंभ का लघु रूप है, जो अधोलोकों को ऊर्ध्वलोकों से जोड़ता है। ब्रह्मा और विष्णु इसका आदि-अंत नहीं ढूंढ सके थे। इसी तरह लिंग भी मूलाधार को सहस्रार से जोड़ता है। यौनतंत्र का सारा रहस्य शिवपुराण के इसी कथानक में छिपा है। यदि शिव की मूर्ति पर या मस्तिष्क में बने शिव के चित्र पर सीधा ध्यान लगाया जाएगा, तो वह ज्यादा प्रभावी नहीं होगा। परंतु यदि वज्र पर शिव के चित्र का ध्यान किया जाएगा, तो वह वहाँ से सीधा मस्तिष्क या सहस्रार में पहुंचेगा, और तुलनात्मक रूप में वहाँ बहुत ज्यादा प्रभावी व स्थायी बना रहेगा। शिव का चित्र यहां कुंडलिनी का प्रतीक है। कुंडलिनी के रूप में अन्य कुछ भी चित्र या संवेदना हो सकती है। वैसे तो भगवान शिव ने अपने लिंग और मूर्ति, दोनों की एकसाथ आराधना करने को कहा है, परन्तु अधिक श्रेष्ठ लिंग को माना है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि विभिन्न सनातन धार्मिक परंपराओं से कुंडलिनी का विकास ही हो पाता है, परंतु उसके जागरण के लिए तंत्र का सहारा लेना ही पड़ता है। ऐसा इसीलिए है, क्योंकि यदि शिव के मानवीय रूप-आकार का पता ही नहीं होगा, तो लिंग पर भी उसका ध्यान कैसे हो पाएगा। शिव के मानवीय रूपाकार का पता तो उसकी मूर्ति से ही चलता है। इसीलिए अधिकांश मंदिरों में मूर्तियों के साथ शिवलिंग भी जरूर होता है। इसी तरह एक असली तांत्रिक सनातन धार्मिक परंपराओं का विरोधी नहीं, अपितु सहयोगी होता है।

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कुंडलिनी और मन्दिर का परस्पर सहयोगात्मक संबंध

दोस्तों, इसी हफ्ते मुझे एक नया कुंडलिनी अनुभव मिला। नया तो इसे नहीं भी कह सकते हैं, नए रूप में कह सकते हैं। कुंडलिनी तंत्र और सनातन धर्म के बीच में बहुत अधिक सहयोगात्मक रिश्ता है। इस पोस्ट में हम इसी पर चर्चा करेंगे। 

मंदिर में कुंडलिनी को ऊर्ध्वात्मक गति मिलती है

एक-दो दिन से मैं कुछ मन की बेचैनी और चंचलता महसूस कर रहा था। मेरे फ्रंट स्वाधिष्ठान चक्र पर एक दबाव जैसा बना हुआ था।ऐसा1लग रहा था कि कुंडलिनी वहां पर अटकी हुई थी। योग से थोड़ा रिलीफ मिल जाता था, फिर भी दबाव बना हुआ था। मैं एक बड़े समारोह के लिए एक बड़े मंदिर की बगल में स्थित दुकान पर फूलों के गुलदस्तों की बुकिंग कराने के लिए गया। जब वापिस आया तो अपनी बाइक वहीँ भूल आया। बाइक की याद मुझे मन्दिर के पास आई। मैं यह सोचकर मंदिर के अंदर प्रविष्ट हुआ कि भगवान का वही आदेश था। मंदिर के दरवाजों पर ताले लगे हुए थे। इसलिए मैं बाहर के लंबे-चौड़े संगमरमर से बने खुले आंगन में टहलने लगा। वहाँ पर मुझे मस्तिष्क में कुंडलिनी का स्मरण हो आया। उसी के साथ स्वाधिष्ठान का कुंडलिनी-दबाव भी ऊपर चढ़ते हुए महसूस हुआ। वहाँ पर कुछ लोग उरे-परे आ-जा रहे थे। मैं उनके रास्ते से हटकर एकांत में एक शीशे की दीवार के साथ बने संकरे प्लेटफार्म पर बैठ गया। मेरा शरीर खुद ही ऐसी पोजीशन बनाने की कोशिश कर रहा था, जिससे स्वाधिष्ठान चक्र की कुंडलिनी पर ऊपर की तरफ खिंचाव लगता। मैंने अपनी पीठ का फन फैलाए हुए नाग के रूप में ध्यान किया। मेरी कुंडलिनी वज्र से शुरु होकर रियर अनाहत चक्र तक एक संवेदनात्मक नस या चैनल के रूप में आ रही थी। बैकवार्ड फ्लो मैडिटेशन तकनीक भी इसमें मेरी मदद कर रही थी। मस्तिष्क के विचारों को मैं कुंडलिनी के रूप में आगे से होकर फ्रंट अनाहत चक्र तक पहुंचता हुआ महसूस कर रहा था। इससे अनाहत चक्र पर ऊपर का प्राण और नीचे का प्राण (अपान) आपस में टकरा कर चमकती कुंडलिनी को प्रकट कर रहे थे। तभी मेरी बाहर गई पत्नी का फोन भी आया, जो शायद अदृश्य टेलीपैथी से ही हुआ होगा। उससे मुझे और अधिक बल मिला। उससे फ्रंट स्वाधिष्ठान चक्र का दबाव समाप्त हो गया। मेरी साँसें तेज व गहरी चलने लगीं। वे साँसे मुझे बहुत सुकून दे रही थीं। कुंडलिनी से संबंधित सारी प्राण शक्ति मेरे अनाहत चक्र को मिली। उससे मेरा हृदय प्रफुल्लित हो गया, और मैं तरोताजा होकर बाइक पर वापिस घर लौट आया, और खुशी-खुशी अपने कामों में जुट गया। बड़े-बड़े मंदिरों को बनाने के पीछे एक नया कुंडलिनी-रहस्य उजागर हो गया था।

स्वाधिष्ठान चक्र पर दबाव बनने का मुख्य कारण सीमेन रिटेंशन होता है

ऐसा यौनसंबंध से परहेज करने से भी हो सकता है, पॉर्न देखने से भी हो सकता है, और अपूर्ण तांत्रिक यौनयोग से भी। इसलिए उचित योगसाधना से इस दबाव को ऊपर चढ़ाते रहना चाहिए। मस्तिष्क तक इसे पहुंचाने से यदि सिरदर्द या मस्तिष्क में दबाव लगे, तो पूर्वोक्त ढंग से अनाहत चक्र तक ही इसे चढ़ाना चाहिए।

कुंडलिनी को मानवता से जोड़ने वाला धर्म बन सकता था इस्लाम

दोस्तों, अभी हाल ही में फ्रांस के पेरिस और ऑस्ट्रिया के विएना में इस्लाम के नाम पर जो आतंकवादी घटनाएं हुईं, वे बहुत दुर्भाग्यपूर्ण हैं। और अभी एक घटना और आ गई कि पाकिस्तान में एक चौकीदार ने धर्म के नाम पर अपने बैंक मैनेजर की हत्या कर दी और वहाँ उसका इस काम के लिए गर्मजोशी से स्वागत किया गया। साथ में, करतारपुर में स्थित सिखों के प्रमुख गुरुद्वारे का प्रबंधन सिखों से वापिस लेकर आईएसआई को दे दिया है। दुनिया जानती है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई इस्लामिक आतंकवादियों के संगठनों को चलाती है।पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में अनगिनत मंदिर तोड़ दिए गए हैं, और प्राचीन नक्काशियां लुप्तप्राय कर दी गई हैं। वहाँ पर आए दिन अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होते ही रहते हैं। भारत ऐसी घटनाओं का सदियों से भुक्तभोगी रहा है। आज हम इस तथ्य की विवेचना करेंगे कि इस्लाम कैसे कुंडलिनी को मानवता के साथ जोड़ने वाला धर्म बन सकता था, पर अपनी एकमात्र गलती कट्टरता के कारण चूक गया।

मूर्ति-पूजा के खंडन का असली मकसद इंसान का इंसान के प्रति प्रेम बढ़ाना था

इस्लाम मानवता का धर्म हो सकता था। ऐसा इसलिए, क्योंकि इस्लाम में केवल अल्लाह का ध्यान करने को कहा गया है, किसी मूर्ति वगैरह का ध्यान नहीं। फिर भी मूर्ति पूजा औऱ अन्य हिन्दू परम्पराओं का अपना अलग वैज्ञानिक दर्शन है, जिसकी अवहेलना नहीं की जा सकती। इसी तरह अन्य धर्मों का भी है। अल्लाह के ध्यान से अद्वैत का ध्यान खुद ही हो जाता है। उससे मन में कुंडलिनी स्वयं ही बस जाती है। स्वाभाविक है कि कुंडलिनी के रूप में किसी मनुष्य का ही स्मरण होगा, किसी मूर्ति या जानवर का नहीं। प्रियतम मनुष्य की वही छवि फिर कुंडलिनी बन जाती है। उससे मानवतापूर्ण प्रेम बढ़ता है। परंतु कट्टरता के कारण इस मानवता पर पानी फिर जाता है। अब जिससे प्रेम होगा, यदि कट्टरता के कारण उसे मारा गया, तो कैसा प्रेम। इसलिए इसी संभावित हिंसा के भय से किसी मनुष्य से असली प्रेम हो ही नहीं पाता। असली इस्लाम तो तब आएगा, जब उसमें कट्टरता और हिंसा पर पूर्ण विराम लगेगा। ऐसा कुंडलिनी तंत्र में होता है। उसमें जीवित गुरु या देवता आदि से प्रेम किया जाता है। उन्हीं के रूप की कुंडलिनी मन में बस जाती है। 

बहुत से धर्म शांतिपूर्ण ढंग से हिन्दू सनातन परम्पराओं का विरोध करते हैं

भारत में भी ऐसे बहुत से धर्म हैं, जो हिंदुओं की बहुत सी सनातन परम्पराओं को नहीं मानते। यह उनका अपना दृष्टिकोण है और उसमें कोई आपत्ति भी नहीं है, क्योंकि वे ऐसी वामपंथी मान्यता किसी के ऊपर थोपते नहीं हैं। इस्लाम को भी अपनी निजी परम्परा पर चलने का पूरा अधिकार है, औरों की धार्मिक स्वतंत्रता का हनन किए बगैर। पर इस्लाम अपनी मान्यता मनवाने के लिए कट्टर और हिंसक बन जाता है। जो वन विविधतापूर्ण न हो, वह सूना-सूना सा लगता है।

इस्लाम में हिंसा को शामिल करना मध्य युग की मजबूरी थी

इस्लाम के निर्माण के समय उसमें हिंसा पर जोर दिया गया। ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि उस समय के लोग अनपढ़ और जंगली होते थे। उन्हें समझाना लगभग असंभव सा ही होता था। समझाने के लिए शिक्षा के साधन भी आज की तरह नहीं थे। इसलिए भय को बनाना जरूरी था, क्योंकि भय की लहर खुद ही बहुत दूर तक फैल जाती है, शिक्षा के कट्टरतापूर्ण साधन के रूप में। खासकर अरब देशों में तो ऐसा ही था। भारत जैसे सभ्य और अनुकूल परिवेश वाले देश में तो प्रारम्भ से ही शिक्षा और समझ का बोलबाला था। अरब से धार्मिक कट्टरता और हिंसा की प्रथा को मुस्लिम आक्रमणकारी भारत में लेकर आए। आज के आधुनिक संसार में भी वह सदियों पुरानी परंपरा वैसी ही बनी हुई है। उसको संशोधित करना जरूरी है। समाज सुधार की तरह समय के साथ धर्म सुधार भी होता रहना चाहिए। इस्लाम को छोड़कर सभी धर्मों में सुधार हुए हैं। मुसलमानों को मिलकर यह बात समझनी चाहिए, और दूसरे धार्मिक समुदायों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आधुनिकता के साथ आगे बढ़ते रहना चाहिए।