कुंडलिनी के लिए ही तांत्रिक भैरव नाथ ने माता वैष्णो देवी का अपमान किया था

दोस्तों, हिंदुओं के पवित्र तीर्थस्थल वैष्णो देवी के मूल में एक कथा आती है कि तांत्रिक भैरव नाथ कन्या वैष्णो के पीछे भागा था। वह उसके माध्यम से अपनी मुक्ति प्राप्त करना चाहता था (सम्भवतः तांत्रिक यौन-योग के माध्यम से)। ऐसा वह अपनी कुंडलिनी को जागृत करके करना चाहता था। कन्या वैष्णो उसकी अच्छी मंशा को नहीं समझ सकी और क्रोध में आकर काली बन गई और उसका वध करने लगी। तब भैरव को उसकी दिव्यता का पता चला और वह उससे क्षमा मांगने लगा। वैष्णो को भी उसकी अच्छी मंशा का पता चल गया। सम्भवतः उसे पछतावा भी हुआ कि उसने अनजाने में एक महाज्ञानी तांत्रिक को मारने का प्रयास किया। इसीलिए तो उसने उसे मुक्ति का वर दिया और यह भी कहा कि भैरव के दर्शन के बिना मेरे दर्शन का कोई फल नहीं मिलेगा। यह प्रसंग सांकेतिक या मैटाफोरिक भी प्रतीत होता है। माता वैष्णो ने भैरव को असलियत में नहीं मारा था। वास्तव में मोक्ष प्राप्त करने के लिए शून्य बनना पड़ता है। अपना सब कुछ खोना पड़ता है। भैरव को भी मुक्ति के लिए ज़ीरो बनना पड़ा। इसी ज़ीरो को ही असम्प्रज्ञात समाधि भी कहते हैं, जिससे आत्मज्ञान होता है। इसी को भैरव का मरना कहा गया है। चूँकि भैरव के मन में वैष्णो के रूप की समाधि के लगने से ही वह आध्यात्मिक रूप से विकसित होकर असम्प्रज्ञात समाधि और आत्मज्ञान के स्तर को पार करता हुआ अपनी मुक्ति के उच्चतम स्तर तक पहुंचा, इसीलिए कथा-प्रसंग में कहा गया कि वैष्णो ने भैरव को मारा।

दूसरे प्रकार से ऐसा भी हो सकता है कि देवी माता की लघु संगति से उसे तांत्रिक प्रेरणा प्राप्त हुई हो। उससे उसने अपनी असली तांत्रिक प्रेमिका की सहायता से कुंडलिनी जागरण की प्राप्ति की हो, जिससे उसका अकस्मात रूपांतरण हो गया हो। इसीको उसका देवी माता के द्वारा मारा जाना कहा गया हो।

तीसरे प्रकार से देवी माता के द्वारा भैरव बाबा का मारा जाना इस सिद्धांत का मैटाफोर भी हो सकता है कि भौतिक समृद्धि के लिए यौन तंत्र का इस्तेमाल करने से भौतिक तरक्की तो प्राप्त होती है, पर मुक्ति नहीं मिलती, अर्थात मरना पड़ता है। 
फिर भी अच्छी मंशा के बावजूद भी बाबा भैरव ने तंत्र के नियमों के विरुद्ध तो काम किया ही था। तंत्र में कभी हमलावर रुख नहीं अपनाया जाता। एक नम्र व विरक्त साधु-संन्यासी या भोले-भाले बच्चे की तरह व्यवहार करना पड़ता है। स्वेच्छा से बने तांत्रिक साथी को देवी-देवता की तरह सम्मान देना पड़ता है, और यहाँ तक कि पूजना भी पड़ता है। दोनों को एक-दूसरे को बराबर मानना पड़ता है। तांत्रिक गुरु की मध्यस्थता भी जरूरी होती है।

विवाहपूर्व प्रेम संबंध वैष्णो-भैरव वाली उपरोक्त कथा का विकृत रूप प्रतीत होता है

विकृत रूप हमने इसलिए कहा क्योंकि अधिकांश मामलों में लड़के-लड़की के बीच का प्रेम संबंध कुंडलिनी जागरण के लिए नहीं होता। अर्थात वह प्रेमसंबंध तांत्रिक प्रकार का नहीं होता। वैसे तो तंत्र में किसी की बेटी या पत्नी से शारीरिक संबंध बनाना वर्जित है। इसलिए विवाहपूर्व या विवाहेतर प्रेमसंबंध को तांत्रिक बनाए रखने के लिए शारीरिक संबंध से परहेज रखना जरूरी है। इससे यह लाभ भी होता है कि आदमी को अपने असली तांत्रिक प्रेमी अथवा पति/पत्नी से ही पूरी तरह संतुष्ट होकर गहन तांत्रिक साधना करने की प्रेरणा मिलती है। वैसे तो तांत्रिक प्रेम का मुख्य कार्य शारीरिक आकर्षण को पैदा करना है, ताकि प्रेमी का अविचल चित्र निरंतर मन में कुंडलिनी के रूप में बना रह सके। यह आकर्षण साधारण बोलचाल, रहन-सहन, हाव-भाव, हँसी-मजाक व सैर-सपाटे आदि से भी पैदा हो सकता है। वास्तव में इनसे पैदा होने वाला शारीरिक आकर्षण प्रत्यक्ष शारीरिक संबंध से पैदा होने वाले शारीरिक आकर्षण से भी कहीं ज्यादा मजबूत और टिकाऊ होता है। साथ में, एक से अधिक साथी के साथ शारीरिक संबंध रखना सामुदायिक स्वास्थ्य व सामुदायिक संबंधों के लिए भी अच्छा नहीं है। इसलिए जहाँ तक संभव हो, इसे केवल एकल साथी तक ही सीमित रखा जाना चाहिए।

वैष्णो कन्या अपने पति परमेश्वर के लिए तपस्या कर रही थीं

वैष्णो में सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती, इन तीनों देवियों की शक्ति का सम्मिलन था। वह परमेश्वर को पति रूप में पाना चाहती थीं। वास्तव में सभी मनुष्य ईश्वर से आए हैं, और उसी को पाना चाहते हैं। इसका मैटाफोरिक अर्थ यह निकलता है कि तंत्रसम्पन्न स्त्री उत्तम पति (ईश्वर-सदृश) की तलाश में रहती है। यदि उसे ऐसा पति न मिल पाए तो वह अपने साधारण पति को भी ईश्वर बना देती है।

विवाहपूर्व प्रेमसंबंध जानलेवा भी हो सकता है, जबकि साऊलमेट सबसे सुरक्षित होता है

मशहूर सिने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के साथ सम्भवतः ऐसा ही हुआ। सम्भवतः वे अपने प्रेमसंबंध में बहुत आसक्त व परवश हो गए थे। ऐसी हालत में यदि प्रेमिका सही मार्गदर्शन न करे, तो यह प्रेमी के लिए घातक भी सिद्ध हो सकता है। साऊलमेट (आत्मीय मित्र) इस स्थिति से बचाते हैं। साऊलमेट एक ऐसा प्रेमी/प्रेमिका है, जिसके प्रति बहुत ज्यादा आकर्षण मौजूद होता है, यद्यपि उससे कभी भी मिलन नहीं हो पाता। इसका अर्थ है कि उस आकर्षण में अटैचमेंट नहीं होती। एक व्यक्ति को अपने साऊलमेट में अपना रूप या अपना प्रतिबिंब दिखता रहता है। साऊलमेटस एक दूसरे को एनलाईटनमेंट की तरफ ले जाते हैं।

कुण्डलिनी जागरण के लिए पंचमकारों (मदिरा, माँस, मैथुन, मत्स्य व मुद्रा) का प्रयोग

कुण्डलिनी के लिए पंचमकारों का प्रयोग एक विवादित विषय रहा है। हम न तो इसकी अनुशंसा करते हैं, और न ही इसका खंडन। हम केवल इसके आध्यात्मिक मनोवैज्ञानिक पहलू पर विचार कर रहे हैं।

पंचमकारों से अद्वैत भाव को विकसित करने का अवसर प्राप्त होता है

वैसे तो पंचमकारों से द्वैतभाव में ही वृद्धि होती है। मदिरा को ही लें। इससे आदमी अंधकार व प्रकाश में बंट जाता है। इसी तरह से, माँस से हिंसा/क्रोध व अहिंसा/शान्ति में विभक्त हो जाता है। मैथुन से वह रोमांच व अवसाद के बीच में झूलने लगता है। मुद्रा किसी विशेष आसन, चिन्ह आदि के साथ लम्बे समय तक बैठने को कहते हैं। इससे आदमी आलस या निकम्मेपन और मेहनत की स्थिति के बीच में बंट जाता है। यह निर्विवादित सत्य है कि द्वैत में ही अद्वैत पनप सकता है। समुद्र की गंभीरता उसकी लहरों के ही आश्रित है। यदि समुद्र में लहरें गगनचुंबी हिचकोले न मारा करतीं, तो कौन कहता कि आज समुद्र शांत या निश्चल है। इसलिए अद्वैत द्वैत के ही आश्रित है। यदि मूल भाव द्वैत ही नहीं होगा, तो उसको नकारने वाला “अ” अक्षर हम उसके साथ कैसे जोड़ पाएंगे। जो चीज है ही नहीं, उसे हम कैसे नकार सकते हैं। यदि द्वैत ही नहीं होता, तो हम उसे कैसे नकार पाते। इसलिए पंचमकारों से दो प्रकार के प्रभाव पैदा होते हैं। जो आदमी उनसे पैदा हुए द्वैत को पूर्णतः स्वीकार करके उसी में रम जाते हैं, वो अपनी कुण्डलिनी को भूल जाते हैं। जो लोग पंचमकारों से उत्पन्न द्वैत को शुरु में स्वीकार करके उसे चालाकी से अद्वैत में रूपांतरित करते रहते हैं, वे कुण्डलिनी योगी बन कर अपनी कुण्डलिनी को मजबूत करते हैं। यह निर्विवादित व सबके द्वारा अनुभूत तथ्य है कि कुण्डलिनी और अद्वैत सदैव साथ रहते हैं। दोनों में से एक चीज को बढ़ाने पर दूसरी चीज खुद ही बढ़ जाती है।

वास्तव में अद्वैत केवल द्वैत के साथ ही रह सकता है, अकेले में नहीं। इसलिए “अद्वैत” का असली अर्थ “द्वैताद्वैत” है।

पंचमकारों का पूजन

सेवन से पहले पंचमकारों का विधिवत पूजन किया जाता है। यह बुद्धिस्ट तंत्र और हिंदु वाममार्गी आध्यात्मिक प्रणाली में आज भी आम प्रचलित है। पंचमकारों में कुण्डलिनी का ध्यान किया जाता है, और उन्हें बहुत सम्मान दिया जाता है। उनके सेवन के समय भी जितना हो सके, कुण्डलिनी व अद्वैत का ध्यान किया जाता है। जब तक शरीर पर पंचमकारों का प्रभाव रहे, तब तक कोशिश करनी चाहिए कि कुंडलिनी व अद्वैत का ध्यान बना रहे। इससे क्या होता है कि जब दैनिक जीवन में उन पंचमकारों का प्रभाव पैदा होता है या यूँ कहें कि जब उनका फल मिलता है, तब कुण्डलिनी स्वयं ही विवर्धित रूप में ध्यानपटल पर आ जाती है। यह ऐसे ही होता है, जैसे कि पैसा जमा करने पर वह ब्याज जुड़ने से बढ़ता रहता है।

पंचमकारों का प्रयोग न्यूनतम मात्रा के साथ अधिकतम कुण्डलिनी लाभ के लिए किया जा सकता है

आम बोलचाल की भाषा में पंचमकार पाप रूप ही हैं। इसलिए इनसे दुखदायी फल भी अवश्य मिलता है, क्योंकि कर्म का फल तो मिल कर ही रहता है। उस बुरे फल से अपने शरीर व मन को बचाने के लिए इनका न्यूनतम सेवन किया जा सकता है। इनको अधिकतम कुण्डलिनी या अद्वैत भाव से जोड़कर अधिकतम आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। जो लोग पहले से ही पंचमकारों का प्रयोग गलत तरीके से करते हैं, वो अपना तरीका सुधार सकते हैं। जो लोग इसे शुरु करना चाहते हैं, हम उन्हें योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही ऐसा करने की सलाह देते हैं। 

एक पुस्तक जो पंचमकारों से उत्पन्न द्वैत भाव को जादुई तरीके से अद्वैतभाव में रूपांतरित कर देती है

वह पुस्तक है “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)”। इस पुस्तक को एमेजॉन की एक गुणवत्तापूर्ण समीक्षा में फाइव स्टार के साथ सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्कृष्ट व सबके द्वारा पढ़ा जाने योग्य आंकलित किया गया है। इसमें चिकित्सा विज्ञान के अनुसार हमारे अपने शरीर में संपूर्ण ब्रम्हांड को दर्शाया गया है। इसको पढ़ने से सारा द्वैतभाव अद्वैतभाव में रूपांतरित हो जाता है, और आनंद के साथ कुंडलिनी परिपुष्ट हो जाती है। योगसाधना से तो अतिरिक्त लाभ मिलता ही है। पंचमकारिक तंत्र को “सब कुछ” या “कुछ नहीं” साधना भी कहते हैं। इससे यदि कुंडलिनी जागरण मिल गया तो सब कुछ मिल गया, अगर नहीं मिला तो कुछ नहीं मिला और यहां तक कि नर्क भी जाना पड़ सकता है।

कुंडलिनी असफल प्रेम प्रसंग के विरुद्ध बेहतरीन सुरक्षाकवच है

दोस्तों, आजकल असफल प्रेम के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इसकी मुख्य वजह अविश्वास, भावनाओं की बेकद्री, रिश्तों में गलतफहमियां, स्वार्थ व धोखेबाजी आदि मानव स्वभाव की बुराइयां हैं। असफल प्रेम का सदमा आदमी के पूरे शरीर व मन को झकझोरने वाला होता है। इससे बचने के लिए कुंडलिनी योग एक सर्वोत्तम साधन है। इसलिए आजकल सभी को कुंडलिनी योग करना चाहिए, क्योंकि किसी न किसी रूप में सभी लोग प्रेम के सताए हुए हैं। 

प्रेमी का शरीर आदमी के चक्रों में बस जाता है

आदमी का अपने प्रेमी के साथ बहुत गहरा जुड़ाव पैदा हो जाता है। प्रेमी का आदमी के मन में लगातार स्मरण बना रहता है। भोजन करते समय स्मरण से प्रेमी का शरीर आदमी के आगे के तालु, विशुद्धि, अनाहत और मणिपुर चक्रों पर बस जाता है। भावनामय होने पर वह अनाहत चक्र पर मजबूत हो जाता है। यौन उत्तेजना होने पर वह मन से नीचे उतरकर स्वाधिष्ठान व मूलाधार चक्रों पर आ जाता है। वहाँ से वह मेरुदंड से ऊपर चढ़कर फिर से मस्तिष्क के सहस्रार चक्र में पहुंच जाता है। इससे आदमी के पीछे वाले चक्रों पर भी वह चित्र स्थापित हो जाता है। गहन चिंतन करते समय प्रेमी का चित्र आज्ञा चक्र में पहुंच जाता है। एक प्रकार से प्रेमी का चित्र कुंडलिनी बन जाता है, और कुंडलिनी योग अनजाने में ही चलता रहता है। यह प्रक्रिया बहुत धीमी और कुदरती होती है, इसलिए इसका आभास भी नहीं होता और प्रेमी का चित्र भी बहुत ज्यादा मजबूती से शरीर के सभी चक्रों पर जम जाता है।

कुंडलिनी योग से बनी हुई बनावटी कुंडलिनी प्रेमी के चित्र को रिप्लेस कर देती है

गुरु या देव रूप की कृत्रिम कुंडलिनी को प्रतिदिन के कुंडलिनी योग अभ्यास से चक्रों पर दृढ़ कर दिया जाता है। इससे प्रेमी के रूप वाली कुदरती कुंडलिनी चक्रों से हटने लगती है। इससे आदमी को असफल प्रेम के सदमे से राहत मिलती है। साथ में, कुंडलिनी योगी भविष्य के लिए भी असफल प्रेम के सदमे से सुरक्षित हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि उसके चक्रों पर बनावटी कुंडलिनी पहले से ही डेरा डाले हुए होती है। इससे वहाँ पर प्रेम की कुदरती कुंडलिनी अपना डेरा नहीं जमा पाती। 

यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि कृत्रिम कुंडलिनी योग करते समय प्रेमी की छवि का भी कुंडलिनी के रूप में ध्यान किया जा सकता है। हालांकि, कुंडलिनी के कमजोर होने और कई सामाजिक समस्याओं से बचने के लिए प्रेमी के संबंध में उचित शारीरिक संयम रखा जाना चाहिए। जब प्रेमी की छवि का मन में पूर्ण प्रदर्शन हो जाता है तब वह संतुष्ट हो जाता है, जिससे प्रेमी के लिए वासना या लालसा स्वयं ही घट जाती है। इसके बाद, कुंडलिनी भी कमजोर हो जाती है। यह प्रक्रिया उस कुंडलिनी के जागरण या अन्य कुंडलिनी, मुख्य रूप से गुरु या देवता के मानसिक रूप के त्वरित विकास व जागरण के लिए अहम भूमिका प्रदान करती है।

असफल प्रेम से उत्पन्न सदमे के इलाज के लिए और उससे बचाव के लिए हिंदी में लिखित पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” सर्वोत्तम प्रतीत होती है।

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कुंडलिनी यदि पुरुषरूप है तो उसे स्त्रीरूप कुंडलिनी के यौनाकर्षण से बहुत बल मिलता है

दोस्तों, कुंडलिनी के क्षेत्र में इस समय तंत्र से बड़ा कोई विज्ञान नहीं है। मेरे साथ तंत्र स्वयं ही स्वाभाविक व व्यवहारिक रूप से सिद्ध हो गया था। यद्यपि मैं तंत्र के बारे में कुछ नहीं जानता था। हो सकता है कि यह मेरे पूर्वजन्म का प्रभाव हो। आज इस छोटी सी पोस्ट में मैं कुंडलिनी के त्वरित जागरण के लिए यौनतंत्र के महत्त्व पर प्रकाश डालूँगा। 

यौनाकर्षण से कुंडलिनी की स्पष्टता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, और वह जीवंत हो जाती है

गुरु-रूप की अकेली कुंडलिनी को भी योग-ध्यान के माध्यम से बढ़ाया जा सकता है। यह तरीका यद्यपि धीमा होता है, परंतु सुरक्षित होता है। इसमें शान्ति और सात्विकता अधिक बनी रहती है। दूसरे तरीके में गुरु रूप की कुंडलिनी के साथ प्रेमिका रूप की कुंडलिनी का भी ध्यान किया जाता है। इसमें मुख्य कुंडलिनी गुरु रूप की होती है। प्रेमिका रूप की कुंडलिनी उसे यौनाकर्षण प्रदान करती है। जैसे पुरुष और स्त्री के भौतिक शरीर एक-दूसरे को यौनाकर्षण शक्ति से प्रफुल्लित करते रहते हैं, उसी तरह से योगी के मन में बने पुरुष और स्त्री के सूक्ष्म चित्र भी करते रहते हैं। यद्यपि यह तरीका अधिक शक्तिशाली और तीव्र फलदायी होता है, परंतु असुरक्षित होता है। इस तरीके से अशांति, बेचैनी और कमजोरी पैदा हो सकती है। इससे बचने के लिए पंचमकारों का प्रयोग करना पड़ सकता है। पंचमकार तो आम आदमी के लिए पाप स्वरूप ही हैं। इसलिए उनका फल भी भोगना पड़ता है। इसीलिए इस तरीके को सबकुछ या कुछ नहीं वाला तरीका कहते हैं। इससे या तो आदमी को सिद्धि मिलती है, या फिर उसका पतन होकर उसे नरक यातना भोगनी पड़ सकती है।

बुद्धिस्ट लोगों के वामपंथी तंत्र में यौनाकर्षण का सहारा लिया जाता है

बुद्धिस्ट तंत्र में दो डाईटी की अस्पष्ट सी मूर्तियां होती हैं। उनमें से एक मूर्ति को पुरुषरूप दिया जाता है, और दूसरी मूर्ति को स्त्रीरूप। पुरुष डाईटी में गुरु का या देवता का ध्यान किया जाता है। इसी तरह स्त्री डाईटी में प्रेमिका या देवी का ध्यान किया जाता है।

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कुंडलिनी ही जादूगर का वह तोता है, जिसमें उसकी जान बसती है

दोस्तों, रशिया में एक कहावत है कि जादूगर की जान उसके तोते में बसती है। यह बात पूर्णतः सत्य न भी हो, तो भी इसका मैटाफोरक महत्त्व है। कुंडलिनी ही वह तोता है, जिससे जादूगर को शक्ति मिलती रहती है।

किसी भी चीज को कुंडलिनी बनाया जा सकता है

जादूगर एक तोते को कुंडलिनी बनाता है। तोता रंगीन व सुंदर होता है, इसलिए आसानी से ध्यानालम्बन या ध्यान-कुंडलिनी बन जाता है। तोता एक मैटाफोर भी हो सकता है। तोते का अर्थ कोई सुंदर रूप वाली चीज भी हो सकता है। जैसे कि प्रेमी, गुरु या कोई अन्य सुंदर चीज। सुंदर चीज से आसानी से प्यार हो जाता है और वह मन में बस जाती है। जादूगर योगी का मैटाफोर भी हो सकता है। जैसे योगी की शक्तियां उसकी कुंडलिनी के कारण होती हैं, वैसे ही जादूगर की शक्तियां उसके तोते के आश्रित होती हैं।


जादूगर/योगी अपने तोते/कुंडलिनी की सहायता से ही भ्रमजाल फैलाता है


जैसे योगी अपनी कुंडलिनी से अद्वैत को प्राप्त करता है, वैसे ही जादूगर अपने तोते से अद्वैत प्राप्त करता है। जादूगर जब भ्रम के जादू को फैलाता है, तब अद्वैत की शक्ति से ही वह भ्रम के जाल में नहीं फंसता। वैसा ही योगी भी करता है। आम लोग योगी की दुनियावी लीलाओं से भ्रमित होते रहते हैं, परंतु वह स्वयं भ्रम से अछूता रहता है।


तोते/कुंडलिनी के मरने से जादूगर/योगी निष्क्रिय सा हो जाता है


इसीसे भावनात्मक सदमा लगता है, जैसा कि मैंने पिछली पोस्टों में बयान किया है। वास्तव में, तोते/कुंडलिनी के साथ जादूगर/योगी का पूरा जीवनक्रम जुड़ा होता है। तोते/कुंडलिनी के नष्ट होने से उससे जुड़ी सारी घटनाएं, यादें व मनोवृत्तियां नष्ट सी हो जाती हैं। इससे वह घने अंधेरे में पूरी तरह से शांत सा हो जाता है। इसे भावनात्मक सदमा कहते हैं। इसे ही पतंजलि की असम्प्रज्ञात समाधि भी कहते हैं। इसी परिस्थिति में कुंडलिनी जागरण हो सकता है। यदि इसे कुछ लंबे समय तक धारण किया जाए, तो आत्मज्ञान भी प्राप्त हो सकता है। औसतन लगभग छः महीने के अंदर आत्मज्ञान हो सकता है। इस स्थिति को संभालने के लिए यदि योग्य गुरु का सहयोग मिले, तो भावनात्मक सुरक्षा मिलती है।

ईश्वर सबसे बड़ा जादूगर है, जो तोते/कुंडलिनी से इस दुनिया के जादू को चलाता रहता है

हिंदु समेत विभिन्न धर्मों में ईश्वर को एक जादूगर या ऐंद्रजालिक माना गया है, जो अपने जादू या इंद्रजाल को खुले आसमान में फैलाता है। उससे यह दुनिया बन जाती है। वह पूर्ण अद्वैतशील है। इससे स्वयं सिद्ध हो जाता है कि उसके साथ उसकी कुंडलिनी (तोता) भी रहती है। उसी तोते को मायाशक्ति कहा गया है।

कुंडलिनी योगसाधना से उत्पन्न शक्ति या उर्जा को स्तरोन्नत करती है

दोस्तों, मैं इस पोस्ट में कुंडलिनी से जुड़ा हुआ सबसे बड़ा रहस्य उजागर करने जा रहा हूँ। योग साधना से जिस चीज को बढ़ाया जाता है, उसको भिन्न-2 स्थानों पर भिन्न-2 नाम दिए गए हैं। कहीं इसे ऊर्जा, कहीं पर संवेदना, कहीं पर प्रकाश, और कहीं पर कुंडलिनी कहा जाता है। वास्तव में ये सभी नाम सही हैं। ये सभी नाम एक ही साधना का वर्णन ऐसे कर रहे हैं, जैसे बहुत से अंधे एक हाथी का वर्णन उसके एक-2 अंग से करते हैं।

संवेदना-ऊर्जा के ऊर्ध्वगमन का मेरा अपना अनुभव

मैंने पिछली पोस्ट में बताया था कि भावनात्मक सदमे से कैसे मेरी संवेदना-ऊर्जा मूलाधार से सहस्रार तक लगातार प्रवाहित हो रही थी। वह प्रकाशमान ऊर्जा एक पुल की तरह लग रही थी, जो इन दोनों चक्रों को आपस में जोड़ रही थी। इसका अर्थ है कि मेरी सुषुम्ना नाड़ी खुल गई थी। वास्तव में यह ऊर्जा एक खारिश की अनुभूति जैसी ही साधारण सेंसेशन थी, पर बहुत घनीभूत थी। मैं पहले ऐसे ऊर्जा चैनेल पर कम ही विश्वास करता था, पर इस अनुभव से मेरा विश्वास पक्का हो गया। यह ऊर्जा प्रवाह लगभग 10 सेकेंड तक बना रहा, जिसके दौरान मुझे एक अति प्रकाशमान मंदिर का साक्षात अनुभव हुआ। जैसे कि मैं उस मंदिर से जुड़कर एकाकार हो गया था। फिर मेरी कुंडलिनी मेरे उस अनुभव क्षेत्र में आई, और मैं उससे एकाकार हो गया। यद्यपि यह पूर्ण एकाकार नहीं था। अर्थात यह खंडित या अल्प कुंडलिनी जागरण था, पूर्ण नहीं। सम्भवतः ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मेरी सुषुम्ना पूरी तरह नहीं खुली थी, और ज्यादा समय तक खुली नहीं रही। 

कुंडलिनी से एकाकार होने के अतिरिक्त लाभ

जिस समय संवेदना ऊर्जा मूलाधार से सहस्रार तक सुषुम्ना नाड़ी से प्रवाहित हो रही हो, उस समय जो मानसिक चित्र बनता है, वह उतना तीव्र व स्पष्ट होता है कि आदमी उससे जुड़कर एकाकार हो जाता है। उससे आदमी को जीवन का वह सबसे बड़ा सुख मिलता है, जो कि सम्भव है। उससे आदमी संतुष्ट हो जाता है। उससे वह जीवन के प्रति अनासक्त होकर अद्वैतशील बन जाता है। उससे उसके मन में कुंडलिनी का बसेरा हो जाता है, क्योंकि अद्वैत के साथ कुंडलिनी सदैव रहती है। यदि आदमी पहले से ही कुंडलिनी साधना कर रहा हो, तब सुषुम्ना प्रवाह के दौरान अन्य चित्रों की बजाय कुंडलिनी का चित्र बनता है, और उससे आदमी एकाकार हो जाता है। इससे कुंडलिनी को अतिरिक्त शक्ति मिल जाती है। यदि प्रारंभ से ही संवेदना के साथ कुंडलिनी को जोड़ा जाता रहे, तब दोनों एक दूसरे को बढ़ाते रहते हैं। सुषुम्ना प्रवाह के दौरान जब कुंडलिनी मेरे मन में आई, तब मुझे उसके साथ मंदिर से अधिक जुड़ाव महसूस हुआ। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि रोज के कुंडलिनी ध्यान से मैं कुंडलिनी के साथ जीने का अभ्यस्त हो गया था। इन बातों से सिद्ध होता है कि सम्पूर्ण साधना कुंडलिनी योग ही है।

यदि चक्र अवरोधित न हों, तो सुषुम्ना के ऊर्जा प्रवाह के अनुभव के बिना ही कुंडलिनी जागरण होता है, और वह जागरण संपूर्ण होता है

उपरोक्त तथ्य को सिद्ध करने के लिए मैं अपना ही उदाहरण देता हूँ। अपने आत्मज्ञान के अनुभव के दौरान मैं सपने में दिख रहे दृश्य के साथ एकाकार हुआ था, किसी विशेष कुंडलिनी चित्र के साथ नहीं। परंतु उसके बाद मेरी वह महिला मित्र कुंडलिनी के रूप में मेरे मन में दृढ़ता से संलग्न हो गई थी, जिसकी सर्वाधिक सहायता से मैं उस आत्मज्ञान के अनुभव तक पहुंचा था।

उसके कई वर्षों बाद मैं कुंडलिनी साधना करने लगा। मैंने उन्हीं वृद्ध आध्यात्मिक पुरुष को अपनी कुंडलिनी बनाया हुआ था। उस दौरान जब मेरी सुषुम्ना खुली और उसमें ऊर्जा का प्रवाह हुआ (यद्यपि मुझे वह प्रवाह अनुभव नहीं हुआ, क्योंकि मेरे सभी चक्र अनब्लॉक थे, इसी वजह से वह जागरण संपूर्ण था, यद्यपि मैंने डर कर उसे एकदम नीचे उतार दिया), तब कुंडलिनी चित्र मेरे मन में प्रकट हुआ और मैं उससे पूरी तरह से एकाकार हो गया। हालांकि बैकग्राउंड के अन्य दृष्यों से भी मैं एकाकार ही था, पर मुख्य तो कुंडलिनी ही थी। इसी तरह, आत्मज्ञान के समय भी मुझे पीठ में एनर्जी फलो का भान नहीं हुआ, इसीलिए वह जागरण भी पूर्ण शक्तिशाली लग रहा था।

विशेष प्रकार का श्वास होने पर ही सुषुम्ना नाड़ी खुलती है

कहते हैं कि जब श्वास डायफ्रागमेटिक अर्थात एब्डोमिनल, गहरी, धीमी और बिना आवाज के चले; तभी सुषुम्ना के खुलने की ज्यादा संभावना होती है। मेरे भावनात्मक सदमे के दौरान मेरी सांसें बिल्कुल ऐसी ही हो गई थीं। इसीसे मेरी सुषुम्ना नाड़ी खुली। इससे यह जनप्रचलित बात सिद्ध हो जाती है कि सांसों के नियमन से ही योग होता है। 

सुषुम्ना के थ्रू एनर्जी राईज के लिए मूलाधार और सहस्रार चक्र के बीच में बहुत ज्यादा विभवांतर अर्थात पोटेंशियल डिफरेंस पैदा होना चाहिए

भावनात्मक सदमे से ये फायदा हुआ कि मेरा मस्तिष्क फुली डिस्चार्ज होकर नेगेटिव पोटेंशियल में आ गया था। मूलाधार तांत्रिक योगसाधना के कारण फुली पोसिटिव पोटेंशियल में था। इससे मूलाधार और सहस्रार के बीच में बहुत ज्यादा पोटेंशियल डिफरेंस पैदा हुआ। इससे मूलाधार और सहस्रार के बीच में सेंसेशनल इलेक्ट्रिक स्पार्क पैदा हुआ, जिसे हम एनर्जी राइज कह रहे हैं।

और हां, पूर्व पोस्ट में जिस मित्र से मुझे भावनात्मक सदमा मिला था, उससे प्यारा समझौता हो गया है। सप्रेम।

कुंडलिनी जागरण के लिए भावनात्मक सदमे की आवश्यकता

दोस्तों, मान्यता है कि भावनात्मक सदमे से भी कुंडलिनी जागरण होता है। यदि पहले से ही कुंडलिनी योग किया जा रहा हो, तब तो वह ज्यादा प्रभावी हो जाता है। आज मैं इसी से संबंधित अपना ताजा अनुभव बताऊंगा।

27 साल बाद व्हाट्सएप पर मुलाकात

सीनियर सेकंडरी स्कूल एजुकेशन के बाद कई सहपाठियों से पहली बार मुलाकात 27 साल बाद व्हाट्सएप पर हुई। अच्छा लग रहा था। पुरानी भावनाओं पर हरियाली छा रही थी। उसी क्लास के दौरान मेरी कुंडलिनी सबसे तेजी से विकसित हुई थी। कुंडलिनी का दूसरा नाम प्रेम भी है। सीधी सी बात है कि ग्रुप के सभी सदस्यों के साथ मेरा अच्छा प्रेमपूर्ण संबंध था। ग्रुप मैंने शुरु किया था, हालांकि सदस्यों को जोड़ने का अधिकांश काम एक अनुभवी सदस्या ने किया था। कुछ दिन ग्रुप अच्छा चला। कुंडलिनी का मनोविज्ञान समझने के लिए मैं एक भावनात्मक सदस्या के बारे में विस्तार से जानना चाहता था। लेखन का औऱ कुंडलिनी रिसर्च का मुझे पहले से ही शौक है। सदस्या ने मेरा मेसेज पढ़ा और ट्यूशन आदि के लिए आए बच्चों की पढ़ाई खत्म होने के बाद बात करने का भरोसा उदासीन भाव के साथ दिया। यद्यपि वह पढ़ाई आज तक खत्म नहीं हो सकी। मैंने मान लिया कि पारिवारिक या अन्य मनोवैज्ञानिक कारणों से उसने ठीक ही किया होगा। क्योंकि विश्वास ही कुंडलिनी की पहचान है। पर मुझे उससे भावनात्मक सदमा लगा। वैसा भावनात्मक सदमा मुझे 2-3 बार पहले भी लग चुका था। वास्तव में ऐसा धोखा तब होता है, जब हम मन के संसार को असली मानने लगते हैं। पर वास्तव में दोनों में बहुत अंतर हो सकता है। मन में जो आपका सबसे बड़ा मित्र है, वह असल जीवन में आपका सबसे बड़ा शत्रु हो सकता है। इससे साफ जाहिर है कि प्रेम ही सबसे बड़ा मित्र है, और प्रेम ही सबसे बड़ा शत्रु भी है। एक पालतु पशु अपने मालिक से बहुत ज्यादा प्रेम करता है, और उससे दूर नहीं होना चाहता, पर वही मालिक उसे कसाई के हाथों सौंप देता है। तभी तो कहते हैं कि प्यार या विश्वास अंधा भी होता है। 

मानसिक आघात के बाहरी लक्षणों का पैदा होना

उस आघात से मैं बहुत सेंसिटिव व इमोशनल हो गया था। मैं ग्रुप में कुछ न कुछ लिखे जा रहा था। अन्य सदस्यों की छोटी-2 बातें मुझे चुभ रही थीं। इस वजह से मैंने दो सदस्यों को ग्रुप से निकाल दिया। उससे नाराज होकर एडमिन सदस्या भी निकल गई। हालाँकि मैंने उन्हें उसी समय दुबारा ग्रुप में शामिल कर दिया औऱ कहा कि वे चाहें तो निकाले गए सदस्यों को दुबारा दाखिल कर दें। मैं इमोशनल तो था ही , उससे मुझे उसके बाहर निकलने में भी पार्शियलिटी की बू आई, जिससे मेरा मन और डिस्टर्ब हो गया। उसके बाद उपरोक्त ट्यूशन मैडम जी भी बिना वजह बताए ग्रुप छोड़कर चली गईं। एक-एक करके लोग ग्रुप से बाहर जाने लगे। मैं ग्रुप से बाहर होने के उनके दुख को महसूस करने लगा। वही वजह बता कर मैंने भी भावनात्मक आवेश में आकर ग्रुप से किनारा कर लिया। हालांकि ऐसा चलता रहता है सोशल मीडिया में, पर यहाँ पर कुंडलिनी से जुड़ी संवेदनशीलता की बात हो रही है। उस शाम को मैं काफी रोया। रात को मुझे अपने सिरहाने के के नीचे रुमाल रखना पड़ा। दरअसल वो आँसू खुशी के थे, जो लंबे अरसे बाद दोस्तों से मिलकर आ रहे थे। मेरे पूरे शरीर और मन में थकान छा गई। मेरी पाचन प्रणाली गड़बड़ा गई। 

भावनात्मक सदमे के दौरान कुंडलिनी सर्ज

उसी भावनात्मक आघात वाली शाम को मेरी एनर्जी बार-2 मेरी पीठ से चढ़कर शरीर के आगे के भाग से नीचे उतर रही थी, एक बंद लूप में। कभी-कभी उस एनर्जी के साथ कुंडलिनी भी जुड़ जाती थी। रात को नींद में अचानक बहुत सारी एनर्जी मेरी पीठ में ऊपर चढ़ी। उसके साथ में ऐसा स्वप्न आया कि मैं बहुत बड़े औऱ सुंदर मंदिर के द्वार से अंदर प्रविष्ट हो रहा हूँ। वह एनर्जी मेरे मस्तिष्क में समा रही थी। विशेष बात यह थी कि उस एनर्जी से मेरे मस्तिष्क में बिल्कुल भी दबाव पैदा नहीं हो रहा था, जैसा अक्सर होता है। शायद कई दिनों तक भरपूर नींद लेने से मेरा मस्तिष्क तरोताजा हो गया था। दूसरी वजह यह थी कि भावनात्मक सदमे से दिमाग खाली सा हो गया था। फिर मस्तिष्क में उस एनर्जी के साथ कुंडलिनी जुड़ गई। वह कुंडलिनी जागरण जैसा अनुभव था, यद्यपि उसके स्तर तक नहीं पहुंच सका। 

कुंडलिनी के बारे में वर्णन केवल इसी वैबसाइट में मिलेगा

मैंने हर जगह अध्ययन किया। हर जगह केवल एनर्जी का ही वर्णन है, कुंडलिनी का कहीं नहीं। अधिकांश जगह एनर्जी को ही कुंडलिनी माना गया है। पर दोनों में बहुत अंतर है। बिना कुंडलिनी की एनर्जी तो वैसी भारतीय मिसाइल है, जिस पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज अंकित नहीं है। विशेष चीज, जो प्यार की निशानी है, और मानवता का असली विकास करने वाली है, वह कुंडलिनी ही है। एनर्जी तो केवल कुंडलिनी को जीवन्तता प्रदान करने का काम करती है। इस वेबसाइट के इलावा यदि कहीं कुंडलिनी का वर्णन है, तो वह “पतंजलि योगसूत्र” पुस्तक है। उसमें कुंडलिनी को ध्यानालम्बन कहा गया है। अधिकांश लोगों के मन में कुंडलिनी व शक्ति (एनर्जी) के स्वभाव के बीच में कन्फ्यूजन बना रहता है।

एक पुस्तक जिसने मुझे हर बार भावनात्मक सदमे से बचाया और उससे बाहर निकलने में मेरी मदद की

वह पुस्तक है, “शरीरविज्ञान दर्शन”, जो इस वेबसाइट के “शॉप (लाईब्रेरी)” वेबपेज पर उपलब्ध है। विस्तृत जानकारी के लिए इस लिंक पर जाएं।

अद्वैत भाव के साथ मदिरा ही सोमरस या एलिकसिर ऑफ़ लाइफ है

उपरोक्त पुस्तक के साथ मदिरा ने मेरे रूपांतरण के साथ मेरी कुंडलिनी या आत्मा का विकास भी किया। खाली मदिरा कुंडलिनी को हानि पहुंचाती है। इस भावना के साथ थोड़ी सी मदिरा का भी बहुत ज्यादा असर होता था, और मदिरा की लत भी नहीं लगती थी। इसका अर्थ है कि पुराने समय में जो सोमरस या एलिकसिर ऑफ़ लाइफ बताया गया है, वह अद्वैत भावना वाले विधिविधान के साथ व उचित मात्रा में सेवन की गई उच्च कोटि की मदिरा ही है, कोई अन्य जादुई द्रव नहीं। देवता भी इसका पान करते हैं। 

प्रेम या सम्मान, दोनों में से एक से संतुष्ट हो जाते।
अन्यथा अपनी भावनाओं के भंडार की राह को प्रकाशित कर देते, हम स्वयं ही अन्वेषण कर लेेते।।

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कुण्डलिनी प्रोमोशन

दोस्तों, इस हफ्ते मैं पिछ्ली पोस्ट को संपादित और अपडेट करने में व्यस्त रहा। पिछली पोस्ट का विषय महत्त्वपूर्ण था। उससे बहुत सी गलतफहमियां पैदा हो रही थीं। यदि उन्हें पहले ही दूर किया जाता तो पोस्ट बहुत बड़ी हो जाती। इसलिए पोस्ट की लंबाई और उसके विषय के विस्तार के बीच में संतुलन बनाना पड़ा। मेरे एक मित्र ने उन कमियों की ओर ध्यान दिलाया, इसलिए मैंने उनका नाम सह संपादक के तौर पर डाला है। लेखक की यह जिम्मेदारी बनती है कि उसके द्वारा लिखित विषय से कोई गलतफहमी पैदा न हो।साथ में आज की पोस्ट प्रोमोशनल है। आजकल इस वेबसाइट की सबसे महत्वपूर्ण, आधारभूत और महत्त्वाकांक्षी पुस्तक पर बड़ा भारी डिस्काउंट ऑफर चल रहा है, जो 29 जून को समाप्त हो रहा है। विस्तृत जानकारी के लिए निम्नलिखित प्रोमो चित्र को क्लिक करें।

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कुण्डलिनी भी आत्महत्या के लिए प्रेरित कर सकती है?

सहलेखक: डा० भीष्म शर्मा {पशु चिकित्सक, हि. प्र. राज्य}

सह संपादक: मास्टर विनोद शर्मा {अध्यापक, हि. प्र. राज्य}

Photo by Vanderlei Longo from Pexels

अभी कुछ दिन पहले बौलीवुड के मशहूर सितारे सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या का मामला सामने आया। सबसे पहले हम उनकी आत्मा की शान्ति की कामना करते हैं। वह बुलंदियों पर था। बुलंदियां कुण्डलिनी से हासिल होती हैं। तो क्या कुण्डलिनी भी आत्महत्या की वजह बन सकती है? इस पोस्ट में हम इसका विश्लेषण करेंगे।

अवसाद एक छुआछूत वाले रोग की तरह है, जिसे कुंडलिनी योग की सहायता से दूर भगाया जा सकता है: एक अदभुत आध्यात्मिक मनोविज्ञान

एक ब्लयू व्हेल नाम की वीडियोगेम आई थी, जिसे खेलते हुए बहुत से बच्चों ने आत्महत्या की थी। सुशान्त ने एक आत्महत्यारे की पेंटिंग अपनी सोशल मीडिया वाल पर कई दिनों से लगाई हुई थी। उनकी छिछोरे फिल्म में वह अपने बेटे को इस रोग से बचने के लिए पूरी फिल्म में समझाते रहे। इसी तरह, एक खबर के अनुसार एक बिहार राज्य का लड़का देर रात तक अकेले में सुशांत की खुदकुशी की खबरें देखता रहा औऱ सुबह को वह भी लटका हुआ मिला। यह सब मन का खेल है। ऐसे आत्महत्या से संबंधित चिंतन से विशुद्धि चक्र पर एक कसाव सा पैदा होता है। गला दबा हुआ सा लगता है, और गले पर एक घुटन सी महसूस होती है। कुंडलिनी योगी को तो विशुद्धि चक्र पर ध्यान करने की पहले से ही आदत होती है। वह बार-2 वहां कुंडलिनी को फोकस करता है। उससे गले को जीवनी शक्ति मिलती है, और कुंडलिनी भी मजबूत होती है। गले की घुटन में गेस्ट्राइटिस का भी रोल हो सकता है। तनावपूर्ण और अनहेल्थी जीवनशैली से गेस्ट्राइटिस होती है। आजकल इसके इलाज के लिए सुरक्षित दवाई मौजूद है। ऐसी दवाइयां योग अभ्यास करने वाले लोगों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसलिए इनका आधा डोज खाकर उनका अपने ऊपर असर परख लेना चाहिए। अवसाद-रोधी दवाएं तो बहुत से लोगों का अवसाद बढ़ा भी सकती हैं, क्योंकि उनसे आदमी की स्मरणशक्ति व कार्यक्षमता काफी घट जाती है। वे दवाईयां लम्बे समय से बनी हुई कुण्डलिनी को नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे उससे जुड़े सभी काम दुष्प्रभावित हो सकते हैं। अगर किस्मत अच्छी हो, और परिश्रम किया जाए, तो उससे नए कुण्डलिनी-चित्र के निर्माण का और उसे जागृत करने का सुअवसर भी प्राप्त होता है। नई कुंडलिनी से एडजस्ट होने में समय लगता है। सूत्रों के अनुसार, सुशांत भी लम्बे अरसे से अवसाद रोधी दवाएं खा रहे थे, हालांकि कुछ समय से उन्होंने उन्हें खाना छोड़ा हुआ था। जितना हो सके मौन रहना चाहिए औऱ जीभ को तालु के साथ टाईटली जोड़कर रखना चाहिए ताकि मस्तिष्क की कुंडलिनी या विचार आसानी से नीचे बह सके। जिसने आत्महत्या की भावनाओं के बीच में रहते हुए भी उसे दबा दिया, वह असली योगी है।

सुशांत सिंह राजपूत कई बार अपनी स्वर्गवासिनी माँ की याद में खोकर भावुक हो जाते थे

वह अपनी माँ से सर्वाधिक प्रेम करते थे। यह बहुत अच्छी बात है, और बड़ों-बुजुर्गों से प्यार होना ही चाहिए। उनकी आखिरी सोशल मीडिया पोस्ट भी अपनी माँ की याद की थी। ऐसा हमें मीडिया से सुनने को मिला। सर्वाधिक प्रिय वस्तु ही मन में निरंतर बस कर कुण्डलिनी बन जाती है। इसका अर्थ है कि उनके मन में अपनी माँ की छवि कुण्डलिनी के रूप में बसी हुई हो सकती है। इसीसे उन्हें निरंतर सफलताएं मिलती गईं। वैसे तो पूर्वजों व पारिवारिक लोगों या बुजुर्गों से संबंधित शुद्ध कुंडलिनी हमेशा शांत औऱ कल्याणकारी ही होती है। परंतु कई बार वैसी कुंडलिनी का सहारा लेकर इश्क-मोहब्बत वाली कुंडलिनी मन पर हावी हो जाती है। वह बहुत भड़कीली होती है औऱ कई बार खतरनाक हो सकती है। सुशांत का कुछ स्टार लड़कियों से प्यार और ब्रेकअप भी सुनने में आया। कुंडलिनी को सकारात्मक व सही दिशा देने के लिए एक स्थिर दाम्पत्य जीवन बहुत जरूरी होता है। हालांकि सिने जगत में ऐसा चलता रहता है, पर सभी एक जैसे नहीं होते, और ऐसा सभी को सूट भी नहीं करता। इश्क-मुहब्बत के चक्कर में हुई आत्महत्याएं इसी कुदरती कुण्डलिनी से सम्बंधित होती हैं। डॉक्टर के अनुसार वह बाईपोलर डिसीस से पीड़ित थे। यह कुण्डलिनी-अवसाद का ही एक दूसरा रूप है। इसमें तीव्र उत्तेजना के दौर के बाद तीव्र अवसाद का दौर आता है।अगर ढंग से किया जाए, तो कुंडलिनी योग ही बाइपोलर रोग का सबसे बढ़िया इलाज है। कथित कलाकार ने थोड़े दिनों के लिए उसे इलाज के लिए किया था, फिर छोड़ दिया था।अगर ढंग से किया जाए, तो कुंडलिनी योग ही बाइपोलर रोग का सबसे बढ़िया इलाज है। कथित कलाकार ने थोड़े दिनों के लिए उसे इलाज के लिए किया था, फिर छोड़ दिया था। कुंडलिनी मन के विकारों को बाहर निकाल रही होती है। वास्तव में विकार ही अवसाद पैदा कर सकते हैं, कुंडलिनी नहीं।कुंडलिनी अवसाद से बचने के लिए हर समय काम में व्यस्त रहना चाहिए। कथित कलाकार कई दिनों से कामधाम छोड़कर कमरे में बंद हो गए थे।

किसीसे बिछुड़ने का गम भी कुंडलिनी अवसाद का ही एक प्रकार है। उस गम को खुशी में बदलने के लिए बिछुड़े हुए व्यक्ति के मानसिक चित्र को कुंडलिनी बनाकर कुंडलिनी योग साधना शुरु कर देनी चाहिए।

कुण्डलिनी से उस सिने कलाकार की आध्यात्मिक प्रगति भी तीव्रता से हो रही थी

प्रत्यक्षदर्शी कहते हैं कि वे अध्यात्मिक रुझान वाले व बेहद संवेदनशील व्यक्ति थे। उनकी कम उम्र के शरीर में एक बुजुर्ग का दिमाग था। ऐसे गुण कुण्डलिनी से ही उत्पन्न होते हैं।

कुण्डलिनी आदमी को जीवन के प्रति लापरवाह बना सकती है

कुण्डलिनी के कारण आदमी अद्वैत से भर जाता है। इसका मतलब है कि उसे रात-दिन, जीवन-मृत्यु, दोस्त-दुश्मन, सुख-दुःख आदि सभी विपरीत चीजें एकसमान जैसी लगने लगती हैं। इससे यह अर्थ निकलता है कि आदमी को किसी चीज से डर नहीं लगता। जब कोई आदमी अपनी मौत से नहीं डरेगा, तब वह अपनी जिंदगी के प्रति लापरवाह हो जाएगा। वही लापरवाही जब सीमा पार कर जाती है, तब वह आत्महत्या का रूप ले लेती है। वास्तव में तो अद्वैत से सतर्कता बढ़ती है, लापरवाही नहीं। पर कई लोग अद्वैत को गलत तरीके से ग्रहण करते हैं।

कुण्डलिनी को संभालने के लिए बाहरी सहारे की आवश्यकता होती है

उपरोक्त स्थिति में आदमी को बाहरी सहारा मिलना चाहिए। लोगों से मेल-जोल जारी रहना चाहिए। परिवार व दोस्तों के साथ खूब समय बिताना चाहिए। घूमना-फिरना चाहिए। सामाजिक समारोहों व कार्यों में शामिल होते रहना चाहिए। इससे कुण्डलिनी योगी को लोगों के मन में जीवन के प्रति लगाव नजर आएगा। लोगों के मन में अनहोनी का डर नजर आएगा। इससे उसे सही ढंग से जीवन जीने की प्रेरणा मिलेगी। आजकल के कोरोना लौकडाऊन ने बहुत सारे लोगों से यह सामाजिक सहारा छीन लिया है।

गुरु कुण्डलिनी के लिए सर्वोत्तम सहारा है

गुरु कुण्डलिनी के दौर से पहले ही गुजर चुका होता है। इसलिए उसे सब कुछ पता होता है। इसलिए वह नए-२ कुण्डलिनी योगी को अकेला ही पूरे समाज की शक्ति दे सकता है।

कुण्डलिनी अवसाद ही समुद्रमंथन से निकला हुआ विष है

समुद्रमंथन का वर्णन हिन्दू पुराणों में मिलता है। मंदराचल पर्वत कुण्डलिनी है। कुण्डलिनी-ध्यान वासुकी नाग है। मन समुद्र है। उससे निकली हुई अच्छी चीजें अच्छे विचार हैं, जो आदमी को देवता बनाते हैं। उससे निकली हुई गन्दी चीजें गंदे विचार हैं, जो आदमी को राक्षस बनाते हैं। मन के देवताओं और राक्षसों के परिश्रम व सहयोग से मंथन चलता रहता है। अंत के करीब जो विष निकलता है, वह कुण्डलिनी से पैदा हुआ अवसाद है। उसे पीने वाले शिव गुरु हैं। वे उसे गले में धारण करते हैं। इसका मतलब है कि वे शिष्य का अवसाद हर लेते हैं, पर स्वयं उससे प्रभावित नहीं होते। उसके बाद जो अमृत निकलता है, वह कुण्डलिनी से मिलने वाला आनंद है। समुद्र मंथन से जो लक्ष्मी मिलती है, उसका अर्थ तांत्रिक प्रतीत होता है। वह भगवान् नारायण तक ले जाती है।

कुण्डलिनी योग से सम्बंधित मेरा अपना अनुभव

जो मैंने इस पोस्ट में लिखा, वह मेरा अपना ही कुण्डलिनी अवसाद का, और उससे बाहर निकलने का अनुभव है। खुशकिस्मती से मुझे एक पड़ौसी सज्जन का सहारा मिल गया था, जिनके घर मैं बिना पूछे और खुलकर आ-जा सकता था, तथा जिनके साथ जितना चाहे समय बिता सकता था। दूसरे अधिकाँश लोग तो मुझे मंगल ग्रह से आए हुए प्राणी की तरह ट्रीट करते थे। अच्छा जोक कर दिया।

कुण्डलिनी मेडिटेशन की अवस्था ज्ञान की चरम अवस्था होती है, अवसाद तो वह दूसरे लोगों को लगती है

कुण्डलिनी अवसाद सापेक्ष होता है। स्वयं कुण्डलिनी योगी को वह ज्ञान की शीर्ष अवस्था लगती है। कुण्डलिनी के अन्य जानकारों को भी यह ऐसी ही लगती है। कुण्डलिनी से अनजान लोगों को ही वह अवसाद लगती है। इसलिए वैसे लोग कुण्डलिनी योगी की आलोचना करते रहते हैं, और उसे अवसाद से भर देते हैं। लोग तो उसके भले के लिए उसकी आलोचना करते हैं ताकि वह कुंडलिनी के बिना जीना सीख सके, पर वह इस बात को अक्सर समझ नहीं पाता। अवसाद उसे कुंडलिनी को मन से हटाने से होता है, क्योंकि उसे कुंडलिनी के नशे की लत लग जाती है। कुंडलिनी प्रकाश के सामने तो अवसाद का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। इसीलिए या तो कुंडलिनी को किसी हालत में नहीं छोड़ना चाहिए या फिर कुंडलिनी से आसक्ति नहीं होनी चाहिए और उसके बिना जीने की आदत भी बनी रहनी चाहिए। नहीं तो वैसा ही अवसाद पैदा होने की संभावना है, जैसा नशेड़ी में एकदम से नशा छोड़कर पैदा होता है। जितनी ज्यादा रौशनी होगी, जब वह बुझेगी तब उतना ही ज्यादा अंधेरा भी होगा। कुंडलिनी शरीर औऱ मन की शक्ति को खींचती है। उससे पैदा हुई कमजोरी ही अवसाद की वजह बन सकती है। इसीलिए तंत्र में उस कमजोरी से बचने के लिए पंचमकारों के सेवन का प्रावधान है।इसीलिए अच्छी संगति को अपनाने पर जोर दिया गया है। अच्छा हो, यदि औरों के रास्ते में फूल न बो सको, तो कांटे भी नहीं बोने चाहिए। इससे फूल खुद उग आएँगे। महात्मा बुद्ध ने भी ऐसा ही कहा है।

यह ध्यान रखना चाहिए कि कुंडलिनी अवसाद प्राकृतिक तौर से उभरी कुंडलिनी से ज्यादा होता है। यद्यपि प्राकृतिक कुंडलिनी बहुत तेजी से आध्यात्मिक विकास करती है। इसलिए प्राकृतिक कुंडलिनी के इस खतरे से बचे रहने के लिए कृत्रिम कुंडलिनी योग करते रहना चाहिए।

एक पुस्तक जिससे मुझे कुण्डलिनी अवसाद से पूरी तरह से बाहर आने में मदद मिली

वह पुस्तक है “शरीरविज्ञान दर्शन”। उसका पूरा विवरण निम्नलिखित लिंक पर उपलब्ध है।

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कुण्डलिनी सर्ज (लहर) के लिए बाई-साईकलिंग (बाईकिंग) योग

भीष्म एवं हृदयेश

लोग सोचते हैं कि रोजाना की व्यस्त जीवनशैली से कुण्डलिनी साधना में बाधा पहुँचती है। पर ऐसा नहीं होता। व्यस्त काम-काज से कुण्डलिनी बहुत तेजी से ऊपर चढ़ती है। योग से रोजाना के कामकाज को करने की शक्ति भी मिलती है। कामकाज और योग, दोनों एक दूसरे के पूरक व सहयोगी हैं। 3 दिन की साईकलिंग से मेरी कुण्डलिनी मूलाधार से मस्तिष्क तक पहुँच गई। भारी गर्मी के बीच, एकदम से इतना ज्यादा बाईसाईकल मैं इसलिए चला सका, क्योंकि मेरा मन और शरीर रोजाना के कुण्डलिनी योगाभ्यास से फिट व तंदरुस्त थे।

मेरा बाई-साईकलिंग योग का अनुभव

इस हफ्ते आंशिक कोरोना-लौकडाऊन की वजह से मैंने साईकल पर ही अपने दफ्तर को आना-जाना शुरू किया। एक दिन का कुल 20 किलोमीटर का सफर हो जाता था। पहले दिन मैंने नोटिस किया कि मेरे मूलाधार पर बड़ी तेज व दबाव से भरी हुई संवेदना थी। वह संवेदना वैसी ही थी, जैसी सीमेन रिटेंशन से महसूस होती है। ऐसा लगता था जैसे कि मेरे मूलाधार चक्र पर किसी ने आगे से नुकीले चमड़े के जूते से गहरी किक मार दी हो, और उसके बाद मीठा व गहरा दर्द हो रहा हो। उससे मैं दिन के समय कुछ हल्का सा बेचैन रहने लगा। योग करते समय वह संवेदना फिर बढ़ जाती थी। मैं उस संवेदना को बार-२ पीठ से ऊपर चढ़ाने की कोशिश करता था। प्राणायाम के साथ पीठ के शेषनाग का चिंतन करने से वह संवेदना कुछ ऊपर जाती हुई लगती थी। इस प्राणायाम का वर्णन मैंने “बैकवार्ड फ्लो” व ‘शेषनाग’ वाली पुरानी पोस्ट में किया है। जब वह दर्द जैसी संवेदना ऊपर चढ़ती थी, तब पीठ में जगह-२ ऐंठन जैसी मीठी दर्द महसूस होती थी। उसी पर ही कुन्डलिनि चित्र भी प्रकट हो जाता था। दो दिन तक ऐसे ही चलता रहा। तीसरे दिन वह संवेदना मेरे पिछले अनाहत चक्र पर आ गई। ऐसा लगने लगा कि जैसे किसी ने चमड़े के पैने जूते से मेरे पिछले अनाहत चक्र पर गहरी किक मारी है, जिसके बाद उस पर मीठी व गहरी दर्द पैदा हो रही है। उससे मूलाधार का दबाव और वहां की संवेदना गायब हो गई। मणिपुर चक्र को संवेदना ने बायपास किया। इसका मतलब था कि मणिपुर चक्र ब्लोक नहीं था। जो चक्र ब्लॉक होता है, उसी पर वह मीठा दर्द महसूस होता है। एक दिन के बाद वह संवेदना गर्दन से होकर ऊपर चढ़ने लगी। फिर वह मीठी दर्द व अकड़न गर्दन के पिछले भाग के केंद्र (विशुद्धि चक्र) में महसूस होने लगी। उसी दिन मेरे मूलाधार को बाहर से किसी वजह से और संवेदना मिली। संवेदना आसानी से ऊपर चढ़ गई, क्योंकि मूलाधार पिछले फ्लो से अनब्लौक हो गया था। वह गर्दन की संवेदना से मिल गई और उसे मजबूत बना दिया। अनाहत चक्र की संवेदना गायब हो गई। अगले दिन, गर्दन से वह संवेदना मस्तिष्क में पहुँचने लगी, जिससे सिर हल्का परन्तु एनर्जी सर्ज के समय भारी लगने लगा। मैं दिन के समय कुर्सी पर बैठा था, और मुझे नींद की 4-5 मिनट की झपकी आ गई। जब मैं ऊपर उठा तो एनर्जी सर्ज पूरे वेग से पूरे मस्तिष्क में छा रही थी। दिमाग भारी व दबावयुक्त था। ऐसा लग रहा था कि उसमें मधुमक्खी के झुण्ड उड़ रहे हैं। यद्यपि आनंद भी आ रहा था। उससे कामकाज में दखलंदाजी न हो, इसके लिए मैंने उलटी जीभ को तालु से छुआ दिया। उससे एकदम से वह संवेदना की सर्ज आगे से नीचे उतर कर मेरे अगले अनाहत चक्र पर आ गई। उससे मेरा दिमाग एकदम से शांत हो गया, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। हृदय में कुण्डलिनी मजबूती से प्रकट हो गई, और वह आनंद से प्रफुल्लित हो गया। मस्तिष्क में केवल एनर्जी थी, कुण्डलिनी तो दिल में ही प्रकट हुई। इससे सिद्ध हुआ कि प्रेम दिल में ही बसता है। यह कोई आश्चर्य वाली चमत्कारिक घटना नहीं है, अपितु शरीर की सामान्य सी शरीरविज्ञान से जुडी हुई घटना है। इस प्रकार का कुण्डलिनी प्रवाह योगी के जीवन में इसी तरह से जीवनभर चलता रहता है। कुण्डलिनी जागरण तभी होता है, जब उसके लिए बहुत सी अनुकूल परिस्थितियाँ हों, और चक्र ब्लॉक न हों। जिस समय एनर्जी सर्ज मेरे दिमाग में छा रही थी, यदि उस समय मुझे किसी भी कारण से कुण्डलिनी की गहरी याद आ गई होती, तो पुनः कुण्डलिनी जागरण के लिए यह एक अनुकूल परिस्थिति होती। वास्तव में, मस्तिष्क में वह प्राणों का सर्ज था, क्योंकि उसमें कुण्डलिनी नहीं थी। विपरीत रूप से, कुण्डलिनी से भी प्राणों का सर्ज पैदा हो सकता है। वैसे में कुण्डलिनी की गहरी याद दिमाग में खुद ही प्राणों का सर्ज पैदा करती है। उसके साथ कुण्डलिनी खुद ही जुडी होती है, क्योंकि कुण्डलिनी ने ही तो वह प्राणों का सर्ज (महान लहर/जमघट) पैदा किया हुआ होता है। वैसी स्थिति में कुण्डलिनी जागरण हो जाता है। ऐसा ही कुण्डलिनी जागरण मुझे लगभग 3 साल पहले हुआ था, जिसका वर्णन मैंने इस वैबसाईट के होमपेज पर किया है।

बाईकिंग या साईकलिंग योग डायाफ्रागमैटिक साँसों को उत्तेजित करता है

मुझे लगता है कि साईकल चलाते समय पेट से गहरे सांस लेने से मेरा मूलाधार चक्र ज्यादा ही उत्तेजित हो गया था। स्पोर्ट्स बाईक में पीठ का पोस्चर अपनी प्राकृतिक अवस्था में होता है, और उसकी पतली सीट के दबाव से मूलाधार चक्र भी उत्तेजित होता रहता है। साथ में, पीठ में सांस लेते व छोड़ते हुए शेषनाग के चिंतन से मेरे मूलाधार को और अधिक शक्ति मिली। उससे मूलाधार में वीर्य शक्ति संचित होने लगी। उससे बैकवार्ड फ्लो भी चालू हो गया, जिससे मूलाधार में संचित एनर्जी पीठ में ऊपर चढ़ने लगी। मूलाधार की संवेदना वैसी ही थी, जैसी यौन-ऊर्जा के रक्षण से पैदा होती है। साथ में, वह संवेदना यौनसंबंध के लिए भी प्रेरित कर रही थी। शायद यही वजह है कि कामकाज में एक्टिव लोग सेक्सुअल रूप से भी एक्टिव होते हैं। मैं मुंह और जीभ को कस कर बंद रखता था, और जीभ की अधिकाँश सतह को तालु से कसकर चिपका कर रखता था। मैं उसका चिंतन एक पिलर के टॉप की स्लैब से करता था जिससे मस्तिष्क फ्रंट पिलर या एनर्जी चैनल से जुड़ा होता था। उससे साईकलिंग के समय उमड़ने वाले दिमाग के फालतू विचार नीचे उतरकर शरीर को एनर्जी देते रहते थे। उससे मन भी शांत रहता था, और थकावट भी नहीं होती थी।

अगले दिन मेरी कुण्डलिनी एनर्जी मणिपुर चक्र तक लौट आई थी

अगले दिन मेरी गहरी व मीठी दर्द पीछे के मणिपुर चक्र पर आ गई। संभवतः वह आगे के अनाहत चक्र से आगे के मणिपुर चक्र तक नीचे उतरी थी। आगे से वह पीछे के मणिपुर चक्र तक आ गई थी। वास्तव में इसी मीठी दर्द को एनर्जी कहते हैं। यही नाड़ी लूप में घूमती है। जब इस दर्द के साथ सबसे मजबूत व पसंदीदा मानसिक चित्र मिश्रित हो जाता है, तब वही एनेर्जी कुण्डलिनी कहलाती है। मुझे ऐसा भी लगा कि पीछे के चक्रों पर खाली एनेर्जी ज्यादा प्रभावी रहती है, जबकि आगे के चक्रों पर कुण्डलिनी ज्यादा प्रभावी रहती है। पीठ में जगह-२ बनने वाले मोड़ या बैंड उस एनेर्जी का निर्माण करते हैं, जिसके साथ कुण्डलिनी चित्र मिश्रित किया जाता रहता है।

कुण्डलिनी जागरण आध्यात्मिक प्रगति के लिए अत्यावश्यक नहीं है

कुण्डलिनी जागरण का योगदान यही है कि यह साधक के मन में कुण्डलिनी योगसाधना के प्रति अटूट विशवास पैदा करता है। उससे साधक प्रतिदिन के तौर पर हमेशा ही कुण्डलिनी योगसाधना करता रहता है। इस प्रकार से, यदि कोई व्यक्ति हमेशा ही सही तरीके से कुण्डलिनी योगसाधना करता रहे, तो एक प्रकार से उसकी कुण्डलिनी जागृत ही मानी जाएगी। हालांकि सही तरीके से कुण्डलिनी योगसाधना सीखने के लिए उसे योग्य गुरु की जरूरत पड़ेगी। एक प्रकार से, यह वैबसाईट भी एक गुरु (ई-गुरु) का ही काम कर रही है।    

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