कुंडलिनी ऊर्जा और चक्र नदी के जल प्रवाह और पनचक्की के टरबाइन की तरह हैं

क्या हठयोग को राजयोग पर्यंत ही करना चाहिए

मैं पिछली पोस्ट में हठयोग प्रदीपिका की एक भाषा टीका पुस्तक व अपने आध्यात्मिक अनुभव के बीच के लघु अंतर के बारे में बात कर रहा था। उसमें आता है कि हठयोग की साधना राजयोग की प्राप्ति-पर्यंत ही करें। यह भी लिखा है कि यदि सिद्धासन सिद्ध हो जाए तो अन्य आसनों पर समय बर्बाद करने से कोई लाभ नहीं। पुस्तक निर्माण के समय आध्यात्मिक संस्कृति का ही बोलबाला होता था। भौतिकता की तरफ लोगों की रुचि नहीं होती थी। जीवन क्षणभंगुर होता था। क्या पता कब महामारी फैल जाए या रोग लग जाए। युद्ध आदि होते रहते थे। इसलिए लोग जल्दी से जल्दी कुंडलिनी जागरण और मोक्ष प्राप्त करना चाहते थे। हालांकि खुद हठयोग प्रदीपिका में लिखा है कि विभिन्न आसनों से विभिन्न रोगों से सुरक्षा मिलती है। पर लोगों को स्वास्थ्य की चिंता कम, पर जागृति की चिंता ज्यादा हुआ करती थी। पर आज के वैज्ञानिक युग में जीवन अवधि लंबी हो गई है, और जीवनस्तर भी सुधर गया है, इसलिए लोग जागृतिके लिए लंबी प्रतीक्षा कर सकते हैं। क्योंकि आजकल जानलेवा बीमारियों का डर लगभग न के बराबर है, इसलिए लोगों में अपने शरीर को चुस्त-दुरुस्त और स्वस्थ रखने का उत्साह पहले से कहीं ज्यादा है। इसलिए मेरा विचार है कि यदि राजयोग की उपलब्धि भी हो जाए, तो भी हठयोग करते रहना चाहिए। एक मामले में योगी स्वात्माराम ठीक भी कह रहे हैं। यदि किसी के मन में पहले से ही कुंडलिनी बनी हो, तो हठयोग के अतिरिक्त या अनावश्यक प्रयास से उसे क्यों नुकसान पहुंचने दिया जाए। मेरे साथ भी तो ऐसा ही होता था। मेरे घर के आध्यात्मिक माहौल के कारण मेरे मन में हमेशा कुंडलिनी बनी रहती थी। मुझे लगता है कि यदि मैं उसे बढ़ाने के लिए बलपूर्वक प्रयास करता, तो शायद वह नाराज हो जाती। क्योंकि कुंडलिनी बहुत नाजुक, सूक्ष्म और शर्मीली होती है। कई प्रकार की कुंडलिनी हठयोग को पसंद भी नहीं करती, जैसे कि जीवित प्रेमी-प्रेमिका या मित्र के रूप से निर्मित कुंडलिनी। हठयोग के लिए सबसे ज्यादा खुश तो गुरु या देवता के रूप से निर्मित कुंडलिनी ही रहती है। कई बार आध्यात्मिक व कर्मठ सामाजिक जीवन से ही कुंडलिनी को सबसे ज्यादा बल मिलता है। कर्मयोग से भी बहुत बल मिलता है। ऐसे में यदि हठयोग किया, तो समय की बर्बादी ही होगी। स्वास्थ्य यदि हठयोग से दुरस्त रहता है, तो संतुलित रूप के मानसिक और शारीरिक काम से भी दुरस्त रहता है। हठयोग तो ज्यादातर अति भौतिक समाज या फिर वनों-आश्रमों के लिए ज्यादा उपयोगी है। संतुलन भी बना सकते हैं, हठयोग, राजयोग व कर्मयोग के बीच में। सब समय और परिस्थिति पर निर्भर करता है। ऐसा न हो कि कहीं मन में जमी कुंडलिनी को छोड़कर दूसरी ही कुंडलिनी को जगाने के चक्कर में पड़ जाओ, क्योंकि कुंडलिनी चित्र के क्षणिक जागरण से ज्यादा अहमियत कुंडलिनी चित्र के निरंतर मन में बने रहने की है। हो सकता है कि योगी स्वात्माराम का यह कथन प्रतिदिन के योग के लिए हो। जब प्रतिदिन की साधना के दौरान हठयोग से मन में कुंडलिनी का ध्यान अच्छी तरह से जम जाए, तब राजयोग वाली पद्धति से ध्यान करो। यह स्वाभाविक है कि दिनभर की काम की उलझन से आदमी का मन फिर से अस्थिर हो जाएगा। इससे वह अगले दिन सीधे ही राजयोग से नियंत्रित नहीं हो पाएगा। इसलिए अगले दिन उसे फिर से पहले हठयोग से वश में करना पड़ेगा। ऐसा क्रम प्रतिदिन चलेगा। ऐसा भी हो सकता है कि योगीराज ने यह उनके लिए लिखा हो, जिन्हें दुनियादारी की उलझनें न हों, और एकांत में रहते हुए योग के प्रति समर्पित हों। उनका मन जब लम्बे समय के हठयोग के अभ्यास से वश में हो जाए, तब वे उसे छोड़कर सिर्फ राजयोग करें। संसार की उलझनें न होने से उनका मन फिर से अस्थिर नहीं हो पाएगा। यदि थोड़ा बहुत अस्थिर होगा भी, तो भी राजयोग से वश में आ जाएगा।

हठयोग की शुरुआत प्राण ऊर्जा से और राजयोग की शुरुआत ध्यान चित्र से होती है

कुंडलिनी के बारे में भी विस्तार से नहीं बताया गया है। यही लिखा है कि फलाँ आसन को या फलाँ प्राणायाम को करने से कुंडलिनी जाग जाती है, या मूलाधार से ऊपर चढ़कर सहस्रार में पहुंच जाती है। इसी तरह व्याख्या में कहा गया है कि जब प्राण और अपान आपस में मणिपुर चक्र में टकराते हैं तो वहाँ एक ऊर्जा विस्फोट जैसा होता है, जिसकी ऊर्जा सुषुम्ना से चढ़ती हुई सीधी सहस्रार में जा पहुंचती है। इसका मतलब है कि प्राण ऊर्जा को ही वहाँ कुंडलिनी कहा गया है। क्योंकि यह ऊर्जा मूलाधार के कुंड में सोई हुई रहती है, इसलिए इसे कुंडलिनी कहते हैं। जब यह प्राण ऊर्जा या कुंडलिनी मस्तिष्क में जागेगी, तब इसके साथ मन का कोई चित्र भी जाग जाएगा। इसका मतलब है कि हठयोग में प्राण ऊर्जा को पहले जगाया जाता है, पर राजयोग में मन के चित्र को पहले जगाया जाता है। हठयोग में प्राण ऊर्जा के जागरण से मन का चित्र जागृत होता है, पर राजयोग में मन के चित्र के जागृत होने से प्राण ऊर्जा जागृत होती है। मतलब कि राजयोग में जागता हुआ मन का चित्र अपनी ऊर्जा की आवश्यकता को पूरा करने के लिए मूलाधार से प्राण ऊर्जा की नदी को पीठ से होकर ऊपर खींचता है। इसका मतलब है कि एकप्रकार से कुंडलिनी और प्राण ऊर्जा पर्यायवाची की तरह ही हैं। जिसे मैं कुंडलिनी कहता हूँ, वह हठयोग के प्राण और राजयोग के ध्यान-चित्र का मिश्रित रूप ही है। वास्तव में यही परिभाषा सबसे सटीक और व्यावहारिक है, क्योंकि हठयोग और राजयोग का मिश्रित रूप ही सबसे अधिक व्यावहारिक और फलदायक है। मुझे भी इसी मिश्रण से कुंडलिनी जागरण की अल्पकालिक अनुभूति मिली थी। यदि केवल राजयोग के ध्यान चित्र या मेडिटेशन ऑब्जेक्ट को लें, तब उसमें ऊर्जा की कमी रहने से वह क्रियाशील या जागृत नहीं हो पाएगा। इसी तरह, यदि केवल हठयोग की प्राण ऊर्जा को लिया जाए, तो उसमें चेतनता की कमी रह जाएगी। शायद इसीको मद्देनजर रखकर योगी स्वात्माराम ने कहा है कि राजयोग की उपलब्धि हो जाने पर हठयोग को छोड़ दो। उनका हठयोग को छोड़ने से अभिप्राय हठयोग को एकाँगी रूप में अलग से न कर के उसे राजयोग के साथ जोड़कर अभ्यास करने का रहा होगा। हठयोग के प्रारंभिक अभ्यास में तो मन के सर्वाधिक प्रभावी चित्र या ध्यान चित्र का ठीक ढंग से पता ही नहीं चलता। अभ्यास पूर्ण होने पर ही इसका पूरी तरह से पता चलता है। लगभग 2-3 महीनों में या अधिकतम 1 साल के अंदर यह हो जाता है। तब राजयोग शुरु हो जाता है। हालाँकि राजयोग के साथ जुड़ा रहकर हठयोग फिर भी चलता रहता है, पर इसमें राजयोग ज्यादा प्रभावी होने के कारण इसे राजयोग ही कहेंगे। मैं उस मानसिक चित्र और मूलाधार से ऊपर चढ़ने वाली ऊर्जा के मिश्रण को कुंडलिनी बता कर एक योग जिज्ञासु को शुरु में ही बता रहा हूँ कि बाद में ऐसा होगा, ताकि उसे साधना में कोई दिक्कत न आए। मानसिक चित्र तो पहले ही जागा हुआ अर्थात चेतन है। उस चित्र के सहयोग से जागती तो मूलाधार स्थित प्राण ऊर्जा ही है, जो आम अवस्था में सोई हुई या चेतनाहीन रहती है। इसलिए यह भी ठीक है कि उस ऊर्जा को कुंडलिनी कहा गया है। कुंडलिनी तो सिर्फ जागती है, पर ध्यान चित्र तो परम जागृत हो जाता है, क्योंकि वह आत्मा से एकाकार हो जाता है। मतलब ध्यान चित्र प्राण ऊर्जा से ज्यादा जागता है। इसलिए क्यों न उस ध्यान चित्र को ही कुंडलिनी कहा जाए। वैसे ध्यान चित्र और ऊर्जा का मिश्रण ही कुंडलिनी है, हालांकि उसमें ध्यान चित्र का महत्त्व ज्यादा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ध्यान चित्र राजयोग व हठयोग में समान रूप से अहमियत रखता है। ऊर्जा को अभिव्यक्ति ध्यान चित्र ही देता है। ऊर्जा को अनुभव ही नहीं किया जा सकता। ध्यान चित्र के रूप में ही तो ऊर्जा अनुभव होती है। अधिकांश लोग मानते हैं कि हठयोग केवल शारीरिक स्वास्थ्य से ही जुड़ा हुआ है, इसमें ध्यान का कोई स्थान नहीं है। मैं भी पहले कुछ-कुछ ऐसा ही समझता था। पर लोग वे 2-3 सूत्र नहीँ देखते, जिसमें इसे राजयोग के प्रारम्भिक सहयोगी के रूप में दिखाया गया है, और कहा गया है कि हठयोग की परिणति राजयोग में ही होती है। ध्यान योग का काम तो उसने राजयोग के पास ही रहने दिया है। वह दूसरे की नकल करके श्रेय क्यों लेता। इसका मतलब है कि उस समय भी कॉपीराइट प्रकार का सामाजिक बोध लोगों में था, आज से भी कहीं ज्यादा। तो क्यों न हम हठयोग प्रदीपिका को पतंजलि कृत राजयोग का प्रथम भाग मान लें। सच्चाई भी यही है।  योगी स्वात्माराम ऐसा ही जोर देकर करते अगर उन्हें पता होता कि आगे आने वाली पीढ़ी इस तरह से भ्रमित होगी।

ध्यान चित्र ही कुंडलिनी है

इसका प्रमाण मैं हठयोग की उस उक्ति से दूंगा, जिसके अनुसार कुंडलिनी सुषुम्ना नाड़ी में ऊपर की ओर बहती है। यदि आसनों व प्राणायामों के दौरान किसी चक्र पर ध्यान न किया जाए, तो मस्तिष्क में केवल एक थ्रिल या घरघराहट सी ही महसूस होगी, उसके साथ कोई मानसिक चित्र नहीं होगा। वह थ्रिल मस्तिष्क के दाएं, बाएं आदि किसी भी भाग में महसूस हो सकती है। पर जैसे ही उस थ्रिल के साथ आज्ञा चक्र, मूलाधार, स्वाधिष्ठान आदि चक्रों पर ध्यान लगाया जाता है, उसी समय सहस्रार चक्र में ध्यान किया जाने वाला मानसिक चित्र प्रकट हो जाता है। साथ में थ्रिल भी मस्तिष्क की लम्बवत केंद्रीय रेखा में आ जाती है। दरअसल आज्ञा आदि चक्रों पर ध्यान लगाने से कुंडलिनी ऊर्जा केन्द्रीभूत होकर सुषुम्ना में बहने लगती है, जिससे उसके साथ कुंडलिनी प्रकट हो जाती है। ऐसा दरअसल दाएं और बाएं मस्तिष्क के मिश्रित होने से उत्पन्न अद्वैत के सिद्धांत से होता है। थ्रिल के2रूप में मस्तिष्क को जाती ऊर्जा तो हर हाल में लाभदायक ही है, चाहे उसके साथ कुंडलिनी हो या न हो। उससे दिमाग तरोताजा हो जाता है। पर सम्पूर्ण लाभ तो कुंडलिनी के साथ ही मिलता है।

भगवान कृष्ण के द्वारा अर्जुन को अपने विश्वरूप का दर्शन कराना दरअसल कुंडलिनी जागरण ही था

इसे सम्भवतः श्री कृष्ण ने शक्तिपात से करवाया था। इसीलिए अर्जुन श्रीकृष्ण को कहता है कि उसे वे अनन्त रूप लग रहे हैं। इसका मतलब है कि उनका प्रियतम रूप अर्जुन की आत्मा से एकाकार हो गया था, अर्थात वे अखण्ड ऊर्जा(एनर्जी कँटीन्यूवम) से जुड़ गए थे। समाधि या कुंडलिनी जागरण ऐसा ही होता है। मैं तो एक मामुली सा इंसान हूँ। मुझे तो सिर्फ दस सेकंड की ही झलक मिली थी, इसीलिए ज्यादा नहीं बोलता, पर श्रीकृष्ण की शक्ति से वह पूर्ण समाधि का अनुभव अर्जुन में काफी देर तक बना रहा।

शरीर में नीचे जाते हुए चक्रों की आवृति घटती जाती है

चक्र पर चेतना शक्ति और प्राण शक्ति का मिलन होता है। नीचे वाले चक्र कम आवृति पर घूमते हैं। ऊपर की ओर जाते हुए, चक्रों की आवृति बढ़ती जाती है। आवृति का मतलब यहाँ आगे वाले चक्र से पीछे वाले चक्र तक और वहाँ से फिर आगे वाले चक्र तक कुंडलिनी ऊर्जा के पहुंचने की रप्तार है, अर्थात एक सेकंड में ऐसा कितनी बार होता है। विज्ञान में भी आवृति या फ्रेकवेंसी की यही परिभाषा है। यह तो मैं पिछली एक पोस्ट में बता भी रहा था कि यदि मस्तिष्क में चेतनामयी ऊर्जा की कमी है, तो अद्वैत का ध्यान करने पर कुंडलिनी चित्र नीचे के चक्रों पर बनता है, मतलब नीचे के कम ऊर्जा वाले चक्र क्रियाशील हो जाते हैं। साथ में बता रहा था कि अविकसित छोटे जीवों की कुंडलिनी नीचे के चक्रों में बसती है। इसका मतलब है कि उनके मस्तिष्क में चेतनामयी ऊर्जा की कमी होती है। जैसे-जैसे मस्तिष्क का विकास होता है, वैसे-वैसे कुंडलिनी ऊपर की ओर चढ़ती जाती है।

चक्र नाड़ी में बहने वाले प्राण से वैसे ही घूमते हैं, जैसे नदी में बहने वाले पानी से पनचक्की के चरखे घूमते हैं

सम्भवतः चक्र इसलिए कहा जाता है, क्योंकि जैसे पानी की छोटी नदी या नाली के बीचोंबीच आटा पीसने वाली पनचक्की की पानी से घूमने वाली चरखी घूमती है, उसी तरह सुषुम्ना नाड़ी के बीच में चक्र घूमते हैं। नाड़ी शब्द नदी से ही बना है। ये चक्र भी सुषुम्ना में ऊपर चढ़ रही ऊर्जा से टरबाइन की तरह पीछे से आगे की तरफ घूमते हैं। आज्ञा चक्र से नीचे जाने वाली नाड़ी के प्रवाह से वह फिर पीछे की तरफ घूमते हैं। पीछे से फिर आगे की ओर, आगे से फिर पीछे की ओर, इस तरह से यह चक्र चलता रहता है। आपको विशुद्धि चक्र का उदाहरण देकर समझाता हूँ। गर्दन के बीचोंबीच वह चक्ररूपी टरबाइन है। समझ लो कि इसमें नाड़ी के ऊर्जा प्रवाह को अपनी घूर्णन गति में बदलने के लिए प्रोपैलर जैसे ब्लेड लगे हैं। जब इस चक्र के साथ मूलाधार का ध्यान किया जाता है, तो गर्दन के पिछले भाग के बीच में कुंडलिनी चित्र बनता है। इसका मतलब है कि वहां प्रोपैलर ब्लेड पर दबाव पड़ता है। फिर जब उसके साथ आज्ञा चक्र का ध्यान किया जाता है, तो गर्दन के अगले भाग के बीचोंबीच एक सिकुड़न के साथ वह कुंडलिनी चित्र बनता है। मतलब कि पीछे से प्रोपैलर ब्लेड घूम कर आगे पहुंच गया, जिस पर आज्ञा चक्र से नीचे जा रहे ऊर्जा प्रवाह का अगला दबाव लगता है। फिर मूलाधार का ध्यान करने से वह फिर से गर्दन के पिछले वाले भाग में पहली स्थिति पर आ जाता है। आज्ञा चक्र के ध्यान से वह फिर आगे आ जाता है। इस तरह यह चक्र चलता रहता है। आप यह मान सकते हो कि उसमें एक ही प्रोपैलर ब्लेड लगा है, जो घूमते हुए आगे पीछे जाता रहता है। यह भी मान सकते हैं कि उस टरबाइन में बहुत सारे ब्लेड हैं, जैसे कि अक्सर होते हैं। यह कुछ-कुछ दार्शनिक जुगाली भी है। विशुद्धि चक्र, आज्ञा चक्र और मूलाधार चक्र का एकसाथ ध्यान करने से विशुद्धि चक्र तेजी से घूमने लगता है। हालांकि इसमें कुछ अभ्यास की आवश्यकता लगती है। आप समझ सकते हो कि नीचे से प्राण ऊर्जा उस चक्र को घुमाती है, और ऊपर से मनस ऊर्जा। चक्र पर दोनों प्रकार की ऊर्जाओं का अच्छा मिश्रण हो जाता है। चक्र पर जो सिकुड़न महसूस होती है, वह एकप्रकार से प्राण ऊर्जा से चक्र को लगने वाला धक्का है। चक्र पर जो कुंडलिनी चित्र महसूस होता है, वह चक्र पर मनस ऊर्जा से लगने वाला धक्का है। दरअसल आगे के चक्रों पर धक्का लगाने वाली शक्ति भी प्राण शक्ति ही है, मनस शक्ति नहीं। मनस शक्ति तो प्राण शक्ति के साथ तब मिश्रित होती है, जब वह मस्तिष्क से गुजर रही होती है। यह ऐसे ही होता है, जैसे किसी नदी के एक बगीचे के बीच से गुजरते समय उसके पानी में फूलों की सुगंध मिश्रित हो जाती है। अगले चक्रों में वह सुगन्धि या कुंडलिनी चित्र ज्यादा मजबूत होता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि आगे की नाड़ी में ऊर्जा नीचे जाते समय अपनी ज्यादातर खुशबू गवां देती है। मूलाधार से मुड़कर जब वह पीठ से ऊपर चढ़ती है, तब उसमें बहुत कम कुंडलिनी सुगन्धि बची होती है। मस्तिष्क में पहुंचते ही उसमें फिर से कुंडलिनी सुगंधि मिश्रित हो जाती है। वह फिर आगे से नीचे उतरते हुए चक्रों के माध्यम से चारों ओर कुंडलिनी सुगन्धि फैला देती है। इस तरह से यह चक्र चलता रहता है। सम्भवतः महामृत्युंजय मंत्र का “सुगंधिम पुष्टिम वर्धनम” इसी कुंडलिनी सुगंधि को इंगित करता है। एक पिछली पोस्ट में भी इसी तरह का अपना अनुभव साझा कर रहा था कि यदि सहस्रार को ऊपर वाले त्रिभुज का शिखर मान लिया जाए, आगे के और पीछे के चक्रों को जोड़ने वाली रेखा को त्रिभुज का आधार मान लिया जाए, उससे निचली उल्टी त्रिभुज का आधार जुड़ा हो, जिसका शिखर मूलाधार चक्र हो, तो बीच वाले चक्रों पर बड़ा अच्छा ध्यान लगता है। अब मैं अपने ही उस अनुभव को वैज्ञानिक रूप से समझ पा रहा हूँ कि ऐसा आखिर क्यों होता है। दरअसल ऊपर के त्रिभुज से मनस ऊर्जा ऊपर से नीचे आती है, और नीचे के त्रिभुज से प्राण ऊर्जा ऊपर जाती है। वे दोनों आधार रेखा पर स्थित चक्रों पर आपस में टकराकर एक ऊर्जा विस्फोट सा पैदा करती हैं, जिससे चक्र तेजी से घूमता है और कुंडलिनी जीवंत जैसी हो जाती है। पिरामिड आकृति में जो ऊर्जा का घनीभूत संग्रह होता है, वह इसी त्रिभुज सिद्धांत से होता है। जो यह कहा जाता है कि शरीर के चक्र शरीर के ऊर्जा केंद्र हैं, उसका मतलब यही है कि उन पर कुंडलिनी चित्र मजबूत होता है। वह कुंडलिनी चित्र आदमी के जीवन में बहुत काम आता है। उसी से कुंडलिनी रोमांस सम्भव होता है। उसी से अनासक्ति और अद्वैत की प्राप्ति होती है, जिसे प्राप्त करके आदमी काम करते हुए थकता ही नहीं। दरअसल आदमी के विकास के लिए सिर्फ शारीरिक और मानसिक शक्ति ही पर्याप्त नहीं होती। यदि ऐसा होता तो समृद्ध घर के रचे-पचे लोग ही दुनिया में तरक्की का परचम लहराया करते। पर हम देखते हैं कि अधिकांश मामलों में बुलंदियों को छूने वाले लोग गरीबी और समस्याओं से ऊपर उठे होते हैं। दरअसल सबसे ज़्यादा जरूरी आध्यात्मिक शक्ति होती है, जो कुंडलिनी से प्राप्त होती है। इससे आदमी अहंकार रूपी उस अंधेरे से बचा रहता है, जो काम करने से पैदा होता है, और तरक्की को रोकता है। एक बार मैं डॉक्टरों और हस्पतालों के चक्कर इसलिए लगाने लग गया था, क्योंकि मैं काम से थकता ही नहीं था। आम लोग तो इसलिए हॉस्पिटल जाते हैं क्योंकि वे काम से जल्दी थक जाते हैं। पर मेरे साथ उल्टा हो रहा था। कुंडलिनी मेरे ऊपर भूत बनकर सवार थी। कुंडलिनी शायद वह भूत है, जिसका वर्णन एक कहानी में आता है कि वह कभी खाली नहीं बैठता था, और पलक झपकते ही सब काम कर लेता था। जब उसे काम नहीं मिला तो वह आदमी को ही परेशान करने लगा। फिर किसी की सलाह से उसने उसे खम्बे को लगातार गाड़ते और उखाड़ते रहने का काम दिया। मतलब आदमी लगातार किसी न किसी काम में व्यस्त रहा। वैसे तो कुंडलिनी भली शक्ति है, कभी बुरा नहीं करती, होली घोस्ट की तरह। शायद होली घोस्ट नाम इसीसे पड़ा हो। फिर भी कुंडलिनी को हैंडल करना आना चाहिए। मुझे तो लगता है कि आजकल जो अंधी भौतिक तरक्की हो रही है, उसके लिए अनियंत्रित व मिसगाइडिड कुंडलिनी ही है।

अद्वैत का चिंतन कब करना चाहिए

किसी चक्र पर ध्यान देते हुए यदि अद्वैत की अवचेतन भावना भी की जाए, तो आनन्द व संकुचन के साथ कुंडलिनी उस चक्र पर प्रकट हो जाती है। यदि मस्तिष्क के विचारों या मस्तिष्क के प्रति ध्यान देते समय अद्वैत का ध्यान किया जाए, तो मस्तिष्क में दबाव व आनन्द के साथ कुंडलिनी प्रकट हो जाती है। इससे मस्तिष्क जल्दी ही थक जाता है।

योग में आसनों व प्राणायाम का क्रम

फिर कहते हैं कि पहले आसन करने चाहिए। उसके बाद प्राणायाम करना चाहिए। अंत में कुंडलिनी ध्यान करना चाहिए। प्राणायाम में भी सबसे पहले कपालभाति किया जाता है। मैं भी अपने अनुभव से बिल्कुल इसी क्रम में करता हूँ। आसनों से थोड़ा नाड़ियां खुल जाती हैं। इसलिए प्राणायाम से उनमें आसानी से कुंडलिनी ऊर्जा का प्रवाह प्रारम्भ हो जाता है। कपालभाति से भी नाड़ियों को खोलने के लिए भरपूर ताकत मिलती है, क्योंकि इसमें झटके से श्वास-प्रश्वास चलता है। लगभग 25-30 आसान हैं हठयोग प्रदीपिका में। कुछ मेरे द्वारा किए जाने वाले आसनों से मेल खाते हैं, कुछ नहीं। इससे फर्क नहीं पड़ता। ऐसे आसनों का मिश्रण होना चाहिए, जिससे लगभग पूरे शरीर का व्यायाम हो जाता हो। विशेष ध्यान पीठ और उसमें चलने वाली तीन मुख्य नाड़ियों पर होना चाहिए। मैं भी अपने हिसाब के 15-20 प्रकार के आसन कर ही लेता हूँ। मैं कुर्सी पर ही प्राणायाम करता हूँ। सिद्धासन आदि में ज्यादा देर बैठने से घुटने थक जाते हैं। कुर्सी में आर्म रेस्ट न हो तो अच्छा है, क्योंकि वे ढंग से नहीं बैठने देते। कुर्सी पर गद्दी भी रख सकते हैं। कुर्सी उचित ऊंचाई की होनी चाहिए।

नाड़ीशोधन प्राणायाम मूल प्राणायाम के बीच में खुद ही होता रहता है

प्राणायाम में कपालभाति के बाद कुछ देर बाएं नाक से सांस भरना और दाएं नाक से छोड़ना और फिर साँसों की घुटन दूर करने के लिए नाड़ी शोधन प्राणायाम करना मतलब हर सांस के साथ नथुने को बदलते रहना जैसे कि बाएं नाक से सांस लेना और दाएं से छोड़ना, फिर दाएं से लेना और बाएं से छोड़ना, और इसी तरह कुछ देर के लिए करना जब तक थकान दूर नहीँ हो जाती। फिर कुछ देर विपरीत क्रम में साँसे लेना, और विपरीत क्रम में नाड़ी शोधन प्राणायाम करना मतलब दाएं नथुने से शुरु करना। फिर दोनों नाकों से एकसाथ सांसें लेना और छोड़ना। फिर से साँसों की घुटन दूर करने के लिए कुछ देर एक तरफ से और कुछ देर दूसरी तरफ से नाड़ी शोधन प्राणायाम शुरु करना। इसी तरह, कुंडलिनी ध्यान करते समय जब साँसों को रोका जाता है, उससे साँस फूलने पर भी नाड़ी शोधन प्राणायाम करते रहना चाहिए। इस तरह से नाड़ी शोधन प्राणायाम खुद ही होता रहता है। अलग से उसके लिए समय देने की जरूरत नहीं।

जहाँ भी देखो वहीं दक्ष हैं

	जहाँ भी देखो वहीं दक्ष हैं।
        अहंकार से भरे हुए
	अपने-अपने पक्ष हैं।
	
        कोई याग-यज्ञ में डूबा
	कोई दुनिया का अजूबा।
	कोई बिजनेसमेन बना है
	हड़प के बैठा पूरा सूबा।
	एक नहीँ धंधे लक्ष हैं
	जहां भी देखो वहीँ दक्ष हैं।
	अहंकार से भरे हुए
	अपने-अपने पक्ष हैं।
	
	कर्म-मार्ग में रचे-पचे हैं
	राग-रागिनी खूब मचे हैं।
	नाम-निशान नहीं है सती का
	शिव भी उस बिन नहीं जचे हैं।
	अंधियारे से भरे कक्ष हैं
	जहां भी देखो वहीँ दक्ष हैं।
	अहंकार से भरे हुए
	अपने-अपने पक्ष हैं।
	
	ढोंग दिखावा अंतहीन है
	मन की निष्ठा अति महीन है।
	फल पीछे लट्टू हो रहते
	फलदाता को झूठा कहते।
	चमकाते बस नयन नक्श हैं
	जहां भी देखो वहीँ दक्ष हैं।
	अहंकार से भरे हुए
	अपने-अपने पक्ष हैं।
	
	प्रेम-घृणा का झूला झूले
	दर्शन वेद पुराण का भूले।
	बाहु-बली नहीं कोई भी
	नभ के पार जो उसको छू ले।
	शिवप्रकोप से न सरक्ष हैं
	जहाँ भी देखो वहीँ दक्ष हैं।
	अहंकार से भरे हुए
	अपने-अपने पक्ष हैं।
	~भीष्म🙏

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कुंडलिनी तंत्र की वैज्ञानिकता को भगवान शिव स्वयं स्वीकार करते हैं

दोस्तो, शिवपुराण में आता है कि पार्वती ने जब शिव के साथ दिव्य वनों, पर्वत श्रृंखलाओं में विहार करते हुए बहुत समय बिता दिया, तो वह पूरी तरह से तृप्त और संतुष्ट हो गई। उसने शिव को धन्यवाद दिया और कहा कि वह अब संसार के सुखों से पूरी तरह तृप्त हो गई है, और अब उनके असली स्वरूप को जानकर इस संसार से पार होना चाहती है। शिव ने पार्वती को शिव की भक्ति को सर्वोत्तम उपाय बताया। उन्होंने कहा कि शिव का भक्त कभी नष्ट नहीं होता। जो शिवभक्त का अहित करता है, वे उसे अवश्य दंड देते हैं। उन्होंने शिवभक्ति का स्वरूप भी बताया। पूजा,अर्चन, प्रणाम आदि भौतिक तरीके बताए। सख्य, दास्य, समर्पण आदि मानसिक तरीके बताए। फिर कहा कि जो शिव के प्रति पूरी तरह से समर्पित है, शिव के ही आश्रित है, और हर समय उनके ध्यान में मग्न है, वह उन्हें सर्वाधिक प्रिय है। वे ऐसे भक्त की सहायता करने के लिए विवश है, फिर चाहे वह पापी और कुत्सित आचारों व विचारों वाला ही क्यों न हो। शिवभक्ति को ही उन्होंने सबसे बड़ा ज्ञान बताया है।

पार्वती का शिव के साथ घूमना जीव का आत्मा की सहायता से रमण करना है

वास्तव में जीव चित्तरूप या मनरूप ही है। जीव यहां पार्वती है, और आत्मा शिव है। मन के विचार आत्मा की शक्ति से ही चमकते हैं, ऐसा शास्त्रों में लिखा है। इसको ढंग से समझा नहीं गया है। लोग सोचते हैं कि आत्मा की शक्ति तो अनन्त है, इसलिए अगर मन ने उसकी थोड़ी सी शक्ति ले ली तो क्या फर्क पड़ेगा। पर ऐसा नहीं है। आत्मा मन को अपना प्रकाश देकर खुद अंधेरा बन जाती है। यह वैसे ही होता है, जैसे माँ अपने गर्भ में पल रहे बच्चे को अपनी ताकत देकर खुद कमजोर हो जाती है। वास्तव में ऐसा होता नहीं, पर भ्रम से जीव को ऐसा ही प्रतीत होता है। इसी वजह से पार्वती का मन शिव के साथ भोग-विलास करते हुए भ्रम से भर गया। अपनी आत्मा के घने अंधकार को अनुभव करके उसे उस अंधकार से हमेशा के लिए पार जाने की इच्छा हुई। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जब तक आदमी समस्या को प्रचंड रूप में अनुभव न करे, तब तक वह उसे ढंग से हल करने का प्रयास नहीं करता। इसीलिए तजुर्बेदार लोग कहते हैं कि संसार सागर में डूबने के बाद ही उससे पार जाने की इच्छा पैदा होती है। इसलिए यह तंत्र सम्मत सिद्धांत एक वैज्ञानिक सत्य है कि निवृत्ति के लिए प्रवृत्ति बहुत जरूरी है। प्रवृत्ति के बिना निवृत्ति का रास्ता सरलता से नहीं मिलता। इसलिए नियम-मर्यादा की डोर में बंधे रहकर दुनिया में जमकर ऐश कर लेनी चाहिए, ताकि मन इससे ऊब कर इसके आगे जाने का रास्ता ढूंढे। नहीं तो मन इसी दुनिया में उलझा रह सकता है। कई तो इतने तेज दिमाग होते हैं कि दूसरों के एशोआराम के किस्से सुनकर खुद भी उनका पूरा मजा ले लेते हैं। कइयों को वे खुद अनुभव करने पड़ते हैं।

कुंडलिनी को शिव, और कुंडलिनी योग को शिवभक्ति माना गया है

कुंडलिनी से भी यही फायदे होते हैं, जो शिव ने अपने ध्यान से बताए हैं। शिवपुराण ने कुंडलिनी न कहकर शिव इसलिए कहा है, क्योंकि यह पुराण पूरी तरह से शिव के लिए ही समर्पित है। इसलिए स्वाभाविक है कि शिवपुराण रचयिता ऋषि यही चाहेगा कि सभी लोग भगवान शिव को ही अपनी कुंडलिनी बनाए। उपरोक्त शिव वचन के अनुसार कुंडलिनी तंत्र सबसे ज्यादा वैज्ञानिक, प्रभावशाली और प्रगतिशील है। बाहर से देखने पर पापी और कुत्सित आचार-विचार तो तंत्र में भी दिखते हैं, हालांकि साथ में शक्तिशाली कुंडलिनी भी होती है। वह चकाचौंध वाली कुंडलिनी उन्हें पवित्र कर देती है। तीव्र कुंडलिनी शक्ति से शिव कृपा तो मिलती ही है, साथ में भौतिक पंचमकारों आदि से भौतिक तरक्की भी मिलती है। इससे कई लाभ एकसाथ मिलने से आध्यात्मिक विकास तेजी से होता है। शिव खुद भी बाहर से कुत्सित आचार-विचार वाले लगते हैं। प्रजापति दक्ष ने यही लांछन लगाकर ही तो शिव का महान अपमान किया था। वास्तव में शिव एक शाश्वत व्यक्तित्व हैं। जो शिव के साथ हुआ, वह आज भी उनके जैसे लोगों के साथ हो रहा है, और हमेशा होता है। शाश्वत चरित्र के निर्माण के लिए ऋषियों की सूझबूझ को दाद देनी पड़ेगी। दूसरी ओर, साधारण कुंडलिनी योग से भौतिक शक्ति की कमी रह जाती है, जिससे आध्यात्मिक विकास बहुत धीमी गति से होता है। जहाँ शक्ति रहती है वहीं शिव भी रहता है। ये हमेशा साथ रहते हैं। इसीलिए शिवपुराण में आता है कि आम मान्यता के विपरीत शिव और पार्वती (शक्ति) का कभी वियोग नहीं होता। वे कभी आपस में ज्यादा निकट सम्बन्ध बना लेते हैं, और कभी एक-दूसरे को कथाएँ सुनाते हुए थोड़ी दूरी बना कर रहते हैं। उनके निकट सम्बन्ध का मतलब आदमी की कुंडलिनी जागरण या समाधि की अवस्था है, और थोड़ी दूरी का मतलब आदमी की आम सांसारिक अवस्था है। मैंने कुंडलिनी तंत्र के ये सभी लाभ खुद अनुभव किए हैं। एकबार मेरे कान में दर्द होता था। मैंने व्यर्थ में बहुत सी दवाइयां खाईं। उनका उल्टा असर हो रहा था। फिर मैंने अपने कान का सारा उत्तरदायित्व कुंडलिनी को सौंप दिया। मैं पूरी तरह कुंडलिनी के आगे समर्पित हो गया। अगले ही दिन होम्योपैथी डॉक्टर का खुद फोन आया और मुझे छोटा सा नुस्खा बताया, जिससे दर्द गायब। और भी उस दवा से बहुत फायदे हुए। एकबार किसी गलतफहमी से मेरे बहुत से दुश्मन बन गए थे। मैं पूरी तरह कुंडलिनी के आश्रित हो गया। कुंडलिनी की कृपा से मैं तरक्की करता गया, और वे देखते रह गए। अंततः उन्हें पछतावा हुआ। पछतावा पाप की सबसे बड़ी सजा है। मेरा बेटा जन्म के बाद से ही नाजुक सा और बीमार सा रहता था। भगवान शिव की प्रेरणा से मैंने उसके स्वास्थ्य के लिए कुंडलिनी की शरण ली। कुंडलिनी को प्रसन्न करने या यूं कह लो कि कुंडलिनी को अतिरिक्त रूप से चमकाने के लिए शिव की ही प्रेरणा से कुछ छोटा मानवतापूर्ण तांत्रिक टोटका भी किया। उसके बाद मुझे अपने व्यवसाय में भी सफलता मिलने लगी और मेरा बेटा भी पूर्णिमा के चाँद की तरह उत्तरोत्तर बढ़ने लगा। 

हिंदुओं के बीच में आध्यात्मिकता को लेकर कभी  विवाद नहीँ रहा

कुंडलिनी ध्यान ही कुंडलिनी भक्ति है। भक्ति से जो मन में निरंतर स्मरण बना रहता है, वही ध्यान से भी बना रहता है। अपने प्रभाव की कुंडलिनी को प्रसिद्ध करने के लिए तो विभिन्न सम्प्रदायों एवं धार्मिक मत-मतांतरों के बीच प्रारंभ से होड़ लगी रही है। शिवपुराण में भगवान शिव को भगवान विष्णु से श्रेष्ठ बताने के लिए कथा आती है कि एकबार भगवान शिव ने अपनी गौशाला में बड़ा सा सिंहासन रखवाया और उस पर भगवान विष्णु को बैठा दिया। उसके बाद भगवान शिव के परम धाम के अंदर वह गौशाला भगवान विष्णु का गौलोक बन गया। यह अपनी-2 श्रेष्ठता को सिद्ध करने वाले प्रेमपूर्ण व हास्यपूर्ण आख्यान होते थे, इनमें नफरत नहीं होती थी, मध्ययुग से चली आ रही कट्टर मानसिकता (जिहादी और अन्य बलपूर्वक धर्मपरिवर्तन कराने वाले धार्मिक समूहों की तरह) के ठीक उलट। 

सनातन धर्म की क्षीणता के लिए आंशिक आदर्शवाद भी जिम्मेदार है

आध्यात्मिक उपलब्धि के सच्चे अनुभव को जनता से साझा करने को अहंकार मान कर किनारे लगाया गया। जीवन की क्षणभंगुरता और मृत्यु के बखान से जीवन की आध्यात्मिक उपलब्धि  को ढका गया। दूसरी ओर, भौतिक तरक्की करने वाले लोग कुछ न छुपाते हुए अपनी उपलब्धि का प्रदर्शन करते रहे। लोग भी मजबूरन उनकी ही कीर्ति फैलाते रहे। इसको अहंकार नहीं माना गया। इस वजह से असली अध्यात्म सिकुड़ता गया। इस कमी का लाभ उठाने नकली आध्यात्मिक लोग आगे आए। उन्होंने अध्यात्म को भौतिकता का तड़का लगाकर पेश किया, जिसे लोगों ने स्वीकार कर लिया। वह भी लोगों को अहंकार नहीं लगा। इससे अध्यात्म और नीचे गिर  गया। ऐसे तो कोई भी अपने को आत्मज्ञानी या कुंडलिनी-जागृत बोल सकता है। यदि किसी को असल में आत्मज्ञान हुआ है, तो वह अपना स्पष्ट अनुभव हमेशा पूरी दुनिया के सामने रखे, ताकि उसका मिलान असली, शास्त्रीय, व सर्वमान्य अनुभव से किया जाए। ऐसा अनुभवकर्ता उम्रभर अपने उस अनुभव से संबंधित चर्चाएं, तर्क-वितर्क व उसकी सत्यता-सिद्धि करता रहे। साथ में, उसका आध्यात्मिक विकास भी उम्र भर होता रहे। वह उम्र भर जागृति के लिए समर्पित रहे। तभी माना जा सकता है कि ऐसे व्यक्ति का अनुभव असली अनुभव है। चार दिन टिकने वाले जागृति के अनुभव तो बहुत से लोगों को होते हैं।

कुंडलिनी चिंतन ~ गुप्त रहस्य जो अक्सर नजरअंदाज किए जाते हैं

इस पोस्ट में मुख्यतः शिवबिन्दु-ध्यान, स्नान-ध्यान, विपासना से कुंडलिनी बेहतर, कुंडलिनी जागरण की  गोपनीयता, सर्वोत्तम जागृति, मूलाधार में कुण्डलिनी निवास, प्राण-ऊर्जा संचरण का अनुभव, असली याद, हठयोग राजयोग के सहयोगी के रूप में, साँस रोकना, सुषुम्ना में ऊर्जा-संचरण, तांत्रिक शब्दों की गोपनीयता, व महामानव का वर्णन है।

दोस्तो, पिछले हफ्ते मुझे कुछ राईटर ब्लॉक महसूस हुआ। कुछ लिखने को मन नहीं किया। थोड़ा-बहुत लिख पाया, तो उसे पोस्ट के रूप में संकलित नहीं कर पाया। इस पोस्ट में वे मन में बिखरे अनुभवात्मक विचार इकट्ठे हुए। फिर सभी रहस्यात्मक विचारों के कीवर्ड्स को मिलाकर एक सबटाइटल बनाया।

जब मन में आई कुंडलिनी को शिवबिन्दु का रूप दिया जाता है तब पीठ से चढ़ती ऊर्जा के अनुभव के साथ आज्ञा चक्र पर खुद ही संकुचन बनता है। इससे मस्तिष्क में कुंडलिनी सीधी होकर सहस्रार से आज्ञा चक्र तक सीधी रेखा में फैल जाती है। हमारी इतनी छोटी औकात है कि हम शिव के बिंदु का ही चिंतन कर सकते हैं, अन्य कुछ नहीं। शिव तो बहुत दूर हैं। वो सबसे बड़े हैं। वो साक्षात पूर्ण ब्रह्म हैं। शिव बिंदु ही हमें शिव तक ले जाएगा।

बाहर से सभी शिव की नकल करना चाहते हैं पर अंदर से कोई नहीं करता। वे अंदर से कुंडलिनी के ध्यान में मग्न रहते हैं। इसलिए उनकी असली नकल तभी होगी जब किसी का ध्यान होता रहेगा, बेशक उन्हीके रूप की कुंडलिनी का। 

नहाते समय ऊर्जा की गश या थ्रिल बड़ी अच्छी अनुभव होती है। यह मस्तिष्क में बड़ी अच्छी महसूस होती है। इससे ताजगी और माइंडफुलनेस का एहसास होता है। इसीलिए रोज नहाने की सलाह दी जाती है, और नहाते समय मंत्रोच्चार के लिए बोला जाता है, ताकि मन में कुंडलिनी प्रभावी रहे, और ऊर्जा का लाभ कुंडलिनी को मिल सके। शायद यह थ्रिल तभी ज्यादा और अनुभव लायक होती है, अगर प्रतिदिन योग अभ्यास किया जाता रहे। योगाभ्यास के समय बेशक ऊर्जा की थरथराहट महसूस न होए, पर इससे ऊर्जा ढंग से एलाइन हो जाती है, जिससे दिन में कभी भी उपयुक्त माहौल मिलने पर एनर्जी सर्ज महसूस हो सकती है, जैसे कि नहाते समय। यही वजह है कि शौच और स्नान के बाद योग करना अधिक प्रभावशाली माना जाता है।

विपासना से मन के विचारों की शक्ति बनी रहती है। जिन विचारों के प्रति साक्षीभाव रखा जाता है, वे तो कुछ समय के लिए दब जाते हैं, पर साक्षीविचार का भाव हटते ही वही या दूसरे विचार दुगुनी शक्ति से कौंधते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमने विचारों को तो कुंद कर दिया होता है, पर विचारों की शक्ति कम होने की बजाय बढ़ती है। वह इसलिए क्योंकि विचारों की शक्ति खर्च होने पर रोक लगती है। साथ में एक विशेष चित्र भी मन में नहीं बनाया होता है, जो लगातार फालतू विचारों की शक्ति को सोखता रहे। इसके विपरीत, कुंडलिनी ध्यान में विचारों की शक्ति पर रोक नहीं लगती, पर उसे विचारों से हटा कर कुंडलिनी पर लगाया जाता है। इससे लंबे समय तक विचारों से छुटकारा मिलता है। यदि विचार आने भी लगे तो उनकी शक्ति कुंडलिनी को लगती है, और वे शांत हो जाते हैं, क्योंकि हमें वैसा करने की आदत होती है। कुंडलिनी के साथ विपासना से तो ऐसा ज्यादा होता है, क्योंकि दो प्रकार से एकसाथ साधना होती है। पर कुंडलिनी के बिना विपासना तो बहुत कमजोर और अस्थायी तरीका प्रतीत होता है। इसीलिए कुंडलिनी को अध्यात्म का मूलभूत आधार कहते हैं।

मैं बता रहा था कि वह जागृति सर्वोत्तम है जो कुंडलिनी से शुरु हो। इसकी एक और वजह है। इससे कुंडलनी योग पूरी तरह वैज्ञानिक बन जाता है, और अपने नियंत्रण में आ जाता है। आदमी को पता लग जाता है कि हम अपने प्रयासों से भी जागृति प्राप्त कर सकते हैं, केवल संयोग से ही नहीं। इससे आदमी औरों को भी यह तरीका सिखा सकता है, जिससे बड़े पैमाने पर जागृति संभव हो सकती है। दुर्लभता से होने वाले संयोग से तो सभी को जागृति नहीं मिल सकती न। संयोग से होने वाली जागृति तो बिना प्रयास के ही होती है ज्यादातर। अगर प्रयास हो भी तो वह सामान्य व हल्का प्रयास होता है, जैसे कि अद्वैत व अनासक्ति से भरा हुआ जीवन, व अन्य आध्यात्मिक क्रियाकलाप। वह प्रयास कुंडलनी योग जैसा वैज्ञानिक, मजबूत व समर्पित प्रयास  नहीं होता। जिसको संयोगवश जागरण मिला हो, वह खुद भी उसे अपने प्रयास से दुबारा प्राप्त करना नहीं जानता, औरों को क्या समझाएगा। बेशक जिसने कुंडलनी योग के प्रयास से खुद कुंडलिनी जागरण प्राप्त किया हो, वह उस प्रयास से उसे दुबारा प्राप्त करने के बारे में कई बार सोचेगा, क्योंकि इसमें सुनियोजित ढंग से बहुत मेहनत करनी पड़ती है। पर कम से कम उसे तरीके का तो पता है, जिससे वह औरों का खासकर होनहार, जिज्ञासु, और शक्तिपूर्ण प्रकार के सुयोग्य लोगों का मार्गदर्शन कर सकता है।

अद्वैत के साथ लौकिक कर्मों से मूलाधार क्रियाशील होता है। यह इसलिए होता है क्योंकि अद्वैत से मन में जो कुंडलिनी बनती है, उसके लिए मूलाधार से एनर्जी की सप्लाई शुरु हो जाती है, क्योंकि वह कुंडलिनी के लिए जरूरी होती है। कुंडलिनी के इलावा जो भी मस्तिष्क के काम हैं उनके लिए तो मस्तिष्क की अपनी ऊर्जा बहुत होती है, मूलाधार की अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसीलिए तो कहा जाता है कि कुंडलिनी मूलाधार चक्र में निवास करती है। द्वैतवादियों का मूलाधार इसीलिए सक्रिय नहीं होता, क्योंकि उनमें कुंडलिनी ही नहीं होती, अगर पिछले जन्म के प्रभाव से होती है तो बहुत कमजोर या नाममात्र की।

पीठ से मस्तिष्क को जाती हुई गश या थ्रिल हमेशा महसूस नहीं होती। जब मस्तिष्क को ऊर्जा की ज्यादा जरूरत हो, तभी महसूस होती है। मेरा आजकल रूपांतरण का दौर चल रहा है। इस दौर में मस्तिष्क में नए न्यूरोनल कनेक्शन बनते हैं और पुराने टूटते हैं। मतलब पिछ्ली यादें मिटती हैं, और नई बनती हैं। इसके लिए मस्तिष्क को बहुत ऊर्जा चाहिए होती है। जब मेरे अंदर पुराना जीवन हावी होने लगता है, तब यह थ्रिल बड़ी जोरदार व आनन्द वाली महसूस होती है। एक बच्चे की तरह एकदम ताजगी और नयापन सा महसूस होता है। पर आप योगा करते रहिए, क्योंकि बिना महसूस हुए भी योग से ऊर्जा ऊपर चढ़ती रहती है। आपके ऊपर भी जब कभी भावनाओं का दबाव ज्यादा होगा, तब यह थ्रिल महसूस होगा। रचनात्मक या नया काम होगा, तो भी एनर्जी थ्रिल बढ़ेगा। कुंडलनी साधना को शक्ति साधना के साथ जोड़कर करना चाहिए। तभी दोनों सहस्रार में एकसाथ जुड़ पाते हैं, अन्यथा शंका है।

योग करते हुए यदि कोई क्रिएटिव विचार आए तो उसे मन में ही रहने दो, उसे  नोट करने या एनालाइज करने न लगो, इससे कुंडलनी ऊर्जा की गति में बाधा पहुंच सकती है। पर यदि क्रिएटिव विचार बहुत जरूरी हो, और आप उसे बाद में भूल सकते हो, तो नोट कर भी सकते हो।

यह जो कुंडलिनी को छिपाने की प्रथा थी, वह मुझे असफल लोगों द्वारा अपनी शर्मिंदगी से बचने के लिए बढ़ाई गई लगती हैl हर किसी को अपना अहंकार प्यारा होता है। यदि कोई महान साधक या गुरु कुण्डलिनी जागरण न प्राप्त कर पाए, पर उसका एक निम्न और दुश्मन पड़ौसी कर दे, तो उसके लिए शर्म के कारण सच्चाई को बर्दाश्त करना मुश्किल तो होगा ही न। दूसरी वजह यह भी रही होगी कि कहीं तथाकथित निम्न बिरादरी के आदमी को सम्मान या श्रेय न देना पड़ जाए। क्योंकि यदि ऐसे तथाकथित नीच की कुंडलिनी जागृत हो जाए, तो सामाजिक दबाव के आगे झुकते हुए उसे अपेक्षित सम्मान व श्रेय देना पड़ेगा। इसलिए तथाकथित विद्वान वर्ग ने समाज में यह भ्रम फैला दिया होगा कि अपने कुंडलिनी जागरण को किसीके सामने प्रकट नहीं करना चाहिए, ताकि न बांस रहे और न ही बजे बाँसुरी।

जब साँस रोककर योगासन करते हैं तो शरीर की खुद ही ऊर्जा को घुमाने की इंस्टिंक्ट शुरु हो जाती है ताकि पूरे शरीर को ऑक्सीजन पर्याप्त मिल सके। हाँ, यह भी एक वजह है। दूसरी वजह मैंने पहले भी बताई थी कि साँस भरकर रोकने से ऊर्जा की गति की दिशा खुद ही ऊपर की तरफ रहती है।

जागरण और कुंडलिनी जागरण में कोई अंतर नहीं है। दोनों में पूर्ण आत्मा की अनुभूति होती है। कुंडलिनी जागरण में वह अनुभूति कुंडलिनी के माध्यम से कुंडलिनी से शुरु होती है। दूसरे किस्म का जागरण विपासना से, सदमे से आदि से हो सकता है। यह मुश्किल होता है। क्योंकि मन को शून्य करना पड़ता है। कुंडलिनी वाला जागरण आसान होता है, क्योंकि इसमें मन को शून्य करने की जरूरत नहीं होती। इसमें कुंडलिनी को ही इतना मजबूत बना दिया जाता है कि वह आत्मा के साथ जुड़कर उसे प्रकट कर देती है। वैसे भी दुनिया में रहकर कुंडलिनी वाला तरीका ही सर्वोत्तम है, क्योंकि दुनिया में आदमी का झुकाव प्रवृत्ति की तरफ ही तो होता है, निवृत्ति की तरफ नहीं।

संस्कृत पुराणों के हिंदी अनुवाद में निजी या अंतरंग ज्ञान छुपाया होता है। इसका मतलब है कि संस्कृत भाषा ज्यादा परिपक्व है। संस्कृत में स्पष्ट रूप से रेताः लिखा है शिवपुराण में, जिसे हिंदी अनुवाद में कामवासना लिखा गया है। वैसे इसका मतलब वीर्य होता है। रेताश्चतुर्बिंदु:, मतलब वीर्य की 4 बूंदें। आजकल हरेक किस्म का ज्ञान इंटरनेट पर उपलब्ध है। इसलिए कुण्डलिनी ज्ञान को भी गुप्त रखने की जरूरत नहीं है। यदि इसको गुप्त रखा गया, तो लोग इधर-उधर का भड़काऊ ज्ञान इकट्ठा करते हुए अपना नुकसान ही करेंगे।

लोग बोलते हैं कि पुरानी याद सताती है। दरअसल वह ऊपर-ऊपर की होती है। वह असली याद नहीं होती। यह बाहर-बाहर की व आसक्तिपूर्ण याद होती है। असली याद तो भावों की होती है। उसमें आसक्ति नहीं होती। यह गहन चिंतन के अभ्यास या ध्यान योग के अभ्यास से उत्पन्न होती है।

राजयोग के बिना हठयोग बहुत कम प्रभावी है। पहले मन में कुण्डलिनी राजयोग या साधारण ध्यान से परिपक्व हो जाए, तभी उसको अतिरिक्त बल देने के लिए हठयोग की जरूरत पड़ेगी। यदि पहले से कुण्डलिनी नहीं होगी, तो हठयोग से कुण्डलिनी केवल सतही रूप में ही अभिव्यक्त हो पाएगी, उसे अतिरिक्त बल नहीं मिल पाएगा। जागरण तो ध्यान चित्र का ही होता है। उच्चतम ध्यान को ही जागरण कहते हैं। इसे कुंडलिनी नाम इसको यौन ऊर्जा से जोड़ने से मिला है। यौन ऊर्जा मूलाधार चक्र में रहती है। यह ऊर्जा वहीँ उत्पन्न होकर वहीं पर नष्ट भी होती रहती है। इसीको नागिन के द्वारा अपनी पूंछ को मुंह में दबाना कहते हैं। मतलब कि नागिन की पूंछ से उत्पन्न ऊर्जा (वज्रशिखा पर उत्पन्न सूक्ष्म बिंदु-ऊर्जा) चलकर उसके मुंह में पहुंचती है, जिसको वह पूँछ के पास ही उगल भी देती है। यह वीर्य उत्सर्जन की तरह है। यह नागिन एक नाड़ी है जो अढ़ाई चक्कर पूरे करके कुंडली सी लगाई होती है। यह अढाई चक्कर का रहस्य जब पूरा और ढंग से समझ लूँगा, तब आपको बताऊंगा। वैसे जब आगे के और पीछे के स्वाधिष्ठान चक्रों को जोड़ने वाले घेरे का ध्यान साथ में किया जाता है, तो कुंडलिनी ऊर्जा सुषुम्ना में ज्यादा अच्छी तरह से चढ़ती है। यह अढ़ाई का फेर भी समझ ही लूंगा। इसीलिए इसमें बह रही ऊर्जा और ध्यान चित्र के मेल को ही कुंडलिनी कहते हैं। कुंडलिनी बनने से नागिन की कुण्डलिनी खुलकर वह ऊपर की ओर खड़ी होने लगती है। मतलब टॉप (मस्तिष्क) और बॉटम (मूलाधार) एक हो जाते हैं। इसका अर्थ है, प्राण ऊर्जा को मूलाधार से ऊपर सुषुम्ना के रास्ते से सहस्रार तक ले जाना। यह एक प्रकार से बिंदु संरक्षण ही है।

मानव मस्तिष्क के ऊपर चेतना विकास का भौतिक माध्यम कुछ नहीं है। फिर तो आत्मा ही है, अनंत चेतना का भंडार। ये जो फिल्मों, उपन्यासों या कॉमिक्स में महामानव दिखाए जाते हैं, ये दरअसल कुंडलिनीजागरण से युक्त व्यक्ति के ही भौतिक विकल्प हैं। क्योंकि कुंडलिनी शक्ति को भौतिक रूप में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता, इसलिए ऐसे महामानवों को कल्पित करना पड़ता है। ऐसा आज ही नहीं, पहले भी होता था। उदाहरण के लिए, हनुमान, नारद, भीम जैसे पौराणिक चरित्र कुंडलिनी-महामानव का भौतिक अभिव्यक्तिकरण ही तो है।

यह जो आता है कि प्राण ऊर्जा के सुषुम्ना में चलने के समय ही कुंडलिनी जागरण होता है, यह सही है। उसमें प्राण से बायाँ और दायाँ मस्तिष्क, दोनों बराबर सक्रिय हो जाते हैं। बाएँ मस्तिष्क से सांसारिक कर्म  होते हैं, और दाएं से शून्य पर नजर रहती है। दोनों के योग से शक्तिशाली अद्वैत पैदा होता है। उससे कुंडलिनी तेजी से अभिव्यक्त होती है। सुषुम्ना में तो बीच-बीच में प्राण चलता ही रहता है। उससे अद्वैत व कुण्डलिनी का आभास होता रहता है। जागरण तो तभी होता है जब इसे साथ में तांत्रिक यौनबल भी मिलता है। इसमें पूरा मस्तिष्क एकसमान कम्पायमान हो जाता है।

कई लोगों को कुंडलिनी ऊर्जा शरीर में इधर-उधर अटकी हुई महसूस होती है, जैसे कि कंधों में आदि में। इससे उन्हें बेचैनी महसूस होती है। दरअसल यह पीठ में इड़ा या पिंगला नाड़ी से ऊर्जा के चढ़ने से होता है। बाएँ भाग व बाएँ कंधे से इड़ा और दाएँ कंधे से पिंगला गुजरती है। ऊर्जा को नहीँ छेड़ना चाहिए। जहाँ जाती हो, वहाँ जाने दो। यह ऊर्जा की कमी से जूझ रहे भाग की ऊर्जा की जरूरत पूरी करके फिर से केंद्रीय नाड़ी में आकर घूमने लगती है। इसमें जल्दी लाने के लिए आज्ञा चक्र, तालु से जीभ के स्पर्श, स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार संकुचन का एकसाथ ध्यान करना चाहिए या इनमें से जितने बिंदुओं का हो सके, ध्यान करते रहना चाहिए। एक बिंदु से दूसरे बिंदु को भी ध्यान स्थानांतरित करते रह सकते हैं, सुविधा के अनुसार। दरअसल ये पॉइंटस कुंडलिनी के मार्ग के रूप में सीधी रेखा बनाने के लिए एक फुट रूलर का काम करते हैं। साथ में, कुंडलिनी ऊर्जा पर भी ध्यान बना रहना चाहिए। घूमती हुई कुंडलिनी ऊर्जा ही अच्छी होती है, एक जगह पर खड़ी नहीं।

यह जो योग से वजन घटता है, उसकी मुख्य वजह कुंडलिनी ध्यान ही है, न कि भौतिक व्यायाम। टाँगों आदि को मोड़कर रखने से तो बहुत कम ऊर्जा खर्च होती है। चक्र पर कुंडलिनी ध्यान से पैदा हुई मांसपेशियों की सिकुड़न से ही शरीर की अतिरिक्त जमा चर्बी घुलती है, जिससे वजन घटता है। अभ्यास हो जाने पर तो यह कुंडलिनी सिकुड़न दिनभर बनने लगती है।

गले मिलने से जो प्यार बढ़ता है, वह एकदूसरे के साथ अपनी-2 कुंडलिनी के साझा होने से ही बढ़ता है। सभीको अपनी कुण्डलिनी ही सबसे प्यारी होती है। जब कोई किसी के नजदीकी संपर्क में आता है, तो एक अधूरे यब-युम की तरह काल्पनिक पोज बन जाता है, जिसमें कुण्डलिनी एक शरीर से चढ़ती है, और दूसरे शरीर से उतरती है। इस तरह से दोनों शरीरों को कवर करते हुए एक कुण्डलिनी ऊर्जा लूप जैसा बन जाता है। ऐसा ही देवपूजा, सूर्यपूजा आदि के समय भी होता है।

कुन्डलिनी योग में दाढ़ी-मूँछ की भूमिका~ एक आध्यात्मिक हास्यात्मक व्यंग्य

Laughing Buddha

मैं एक पिछली पोस्ट में बता रहा था कि जब मेरी कुन्डलिनी शक्ति जागरण के लिए मूलाधार से ऊपर उठी, उस समय वहाँ महिलाओँ का समूह सामारोहिक नाच गाना कर रहा था। एक महीने से चले आ रहे तीव्र कुन्डलिनी योगाभ्यास से मेरी मध्यम आकार की दाढ़ी उग आई थी। काले बालों के झुंड में उगे कुछेक सफेद बाल दुनिया की भीड़ में साधु पुरुष जैसे भले जान पड़ते थे। इसलिए कई औरतें मुझे भोलेपन, प्यार व अचम्भे से निहार रही थीं। वहाँ पर बढ़ी हुई और मैचिंग दाढ़ी वाले कुछ दूसरे लोग भी थे, जो मुझे विशेष प्यार, आदर और अपनापन दे रहे थे। इससे जाहिर होता है कि दाढ़ी वाले लोग ही असली दाढ़ी की पहचान रखते हैं। हीरे को कौन पहचाने, जौहरी। इसमें हंसने वाली कोई बात नहीं, क्योंकि यह जोक नहीं सच्चाई है। वैसे भी औरतें बढ़ी हुई दाढ़ी से बड़ी प्रभावित और आकर्षित होती हैं। यदि उसके साथ कुन्डलिनी योगाभ्यास भी जुड़ा हो और वह भी तांत्रिक प्रकार का, तब तो कहने ही क्या। इससे भी मेरी सुषुप्त कुन्डलिनी शक्ति को जागने के लिए पर्याप्त बल मिला। असली दाढ़ी वही होती है जो साधना के प्रभाव से खुद उग आए, जिसे उगा के न करना पड़े, और जिसे फैशनेबल बनाने के लिए ज्यादा सौंदर्य प्रसाधन भी न लगाना पड़े। साधना के बल से आंखों में ऐसी चमक पैदा हो जाती है कि बाकि सभी सौंदर्य प्रसाधन उसके आगे फीके पड़ने लगते हैं। दिल में इतना नूर छा जाता है कि चेहरे के नूर पर ध्यान देने का मन ही नहीं करता। बार-बार चेहरे के नकली नूर की तरफ ध्यान न जाए, इसके लिए ही तो आदमी की दाढ़ी अपने आप बढ़ने लगती है। कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। कई लोग ज्यादा आकर्षक बनने के लिए और खासकर महिलाओं को आकर्षित करने के लिए जानबूझ कर दाढ़ी बढ़ाते हैं। साधना का तो वे नाम भी नहीं जानते। कुछ महिलाएं ऊपर ऊपर से तो उनसे आकर्षित होती हैं, पर दिल से उनसे प्रभावित नहीँ होती। पर जो महिला गहरी नजर और साधना का शौक रखती हो, वह तो उससे बेहतर क्लीन शेव आदमी को समझती है। क्योंकि क्लीनशेव पुरुष कम से कम धोखा तो नहीं कर रहा होता है, और बेचारा कम से कम नकली नूर से ही तो काम चला रहा होता है। ये जो कहते हैं न कि समथिंग इज बैटर दैन नथिंग। अब तो मेरी शेविंग किट डब्बे में पड़ी बोर हो रही होगी। पहले मैं नाई की दुकान जाया करता था हेयर ट्रिम करवाने। हफ्ते में एकबार। फेस पर कभी जीरो पर ज्यादातर नंबर एक की ट्रिम सेटिंग रखवाता था। मूछों पर ज्यादातर दो नम्बर की सेटिंग रखवाता था। अब तो मैंने अपना ट्रिमर ले लिया है। अपनी मर्जी से दाढ़ी और मूंछों की लंबाई रखता हूँ। एक दिन तो भाई गजब हो गया। हुआ यह कि दाढ़ी तो मैंने दो नम्बर की सेटिंग से बना ली थी। ट्रिमर के रेगुलेटर व्हील को तीन नंबर की तरफ घुमाने लगा ताकि मूंछें कुछ बड़ी रखता। पर यह क्या, व्हील उल्टा घूम गया। उस समय शाम गहरा जाने से वहाँ रौशनी भी कम थी और मैं भी कुछ ज्यादा ही जल्दी में था। अब इस पापी मन का पेट भरे तब न। वो भी दिन थे जब कई घंटों चल कर नाई की दुकान में पहुंचना पड़ता था। वहाँ भी रंगबिरंगे जंगलों को अपने मुंह पे सजाए लोगों की लंबी लाइन लगी होती थी। एक दाढ़ी के चक्कर में लगभग पूरा दिन बर्बाद हो जाता था। आजकल देवस्वरूप इस ट्रिमर ने घण्टों का काम मिनटों में समेट लिया है, फिर भी चाहिए इस मन को जल्दी। उस जमाने में एकदिन की पूरी कमाई मुंह पर उगे बगीचे की सफाई में लग जाती थी, पर आज यह कंजूस मन बाथरूम मिरर के ऊपर एक अच्छा सा बल्ब लगाने को राजी नहीँ। बगीचा इस आस से बोल रहा हूँ कि शायद कुंडलिनी फल इसीमें पकता हो, क्योंकि अधिकांश योगी बाबा दाढ़ी वाले ही नजर आते हैं मुझे। तीन की बजाय लैंथ सेटिंग एक हो गई थी। एक चौथाई मूँछ एक झटके में साफ हो गई। ट्रिमर कोई कैंची थोड़े ही है, जो संभलने का मौका दे। अधकटी मूँछ रखता तो लोग पता नहीं कौन सी मानसिक बीमारी समझ कर मुझे चिढ़ाते। इसलिए मजबूरी में पूरी मूँछ ही साफ करनी पड़ी और दाढ़ी भी। भला हो इस कोरोना फेसमास्क का जिसने अगली दिन मेरी सेहत को बचा लिया, वरना ताना दे देकर लोग जरूर गिरा देते। अब मार्केट में उपलब्ध स्टाईलिश ट्रिमर मशीनों के आगे रेजर ब्लेड वाला युग बीता हुआ युग लगता है। वैसे भी चिकित्सा विज्ञान के अनुसार क्लीनशेव मुंह ज्यादा गंदा होता है। जब सूक्ष्मदर्शी यंत्र से ऐसे मुंह का निरीक्षण किया गया तब कीटाणुओं की रंगबिरंगी कॉलोनियों के जंगल उसमें पाए गए। मुँह पर रेजर की खरोंच से शरीर के अन्दरूनी सेल्स कीटाणुओं की खुराक बनने के लिए इस तरह से बाहर निकलते रहते हैं, जैसे कि खेत में हल की खुदाई से मिट्टी में दबे कीड़े मकोड़े पक्षियों की खुराक बनने के लिए बाहर निकलते हैं। जब ट्रिमर से साफ किया गया मुँह देखा गया, तब बाहर से तो वह जंगल की तरह लग रहा था, पर अंदर से एकदम चकाचक। इसलिए हम आपको भी यही सलाह देते हैं कि एक अच्छा सा ट्रिमर रख लो और कुन्डलिनी योगी बन जाओ।

मेरे को देखकर बहुत से लोग जटाधारी बन गए। पर यह पता नहीं कि साथ में कुन्डलिनी योगी भी बने या फिर मुंहदिखाई भर के ही योगी बने। अगर योगी भी बनते तो मेरी सूरत के साथ सीरत का भी जायजा लेते। पर यह क्या, दूर-दूर और छिप-छिप के ही उन्होंने मेरी दाढ़ी का नुस्खा चुरा लिया, कुन्डलिनी योग गया तेल लेने। हाँ, तेल से याद आया। कइयों का आरोप है कि मूंछें बहुत तेल पीती हैं। इससे मुझे लगा कि यहाँ वस्तुस्थिति स्पष्ट कर देना जरूरी है, ताकि बेचारी बेकसूर मूंछें यूँ ही बदनाम न होती रहें। दरअसल वे अपनी मर्जी से या अपने ऐशो-आराम के लिए तेल नहीं पीतीं, बल्कि शनिदेव अपनी दिव्य अचिंत्य शक्ति से उनसे अपने लिए तेल पिलवाते हैं। इसलिए उन दाढ़ी-शरणागत लोगों से कुंडलिनी योगा हुआ हो या न हुआ हो, पर उनकी दाढ़ी में लगे तेल से शनिदेव जरूर प्रसन्न हुए होंगे। दोस्तो, आप तो जानते ही हो कि शनिदेव को काला रंग और सरसों का तेल बहोत प्रिय हैं। इसलिए यदि शनि का प्रकोप हो, तो इधर-उधर की जरा भी न सोचें। सरसों के तेल से सींच कर अपने सदाबहार झाड़ को जितना ज्यादा काला, घना और विकराल बनाएंगे, पूज्य शनिदेव उतने ही अधिक फूले नहीं समाएंगे। और आपको यह भी पता होगा कि नाराज शनिदेव जितने बुरे हैं, खुश होने पर उतने ही भले भी हैं। खैर मैं क्या कह रहा था कि अब चिकने चुपड़े लोगों की जगह जटाधारी लोगों का दिखना आम हो गया है। और तो और, नकल करने की होड़ ऐसी लगी कि छोटे बच्चे भी पापा के रेजर से मुँह खंरोचने लग गए, इस आस से कि शायद उनके भी बाल उग आएं। मैं बढ़ी दाढ़ी के फैशन को शुरु करने वाला ऐसा आइकन पीस बन गया कि जब कहीं मुँह की खारिश से परेशान होके मुंह के बाल छोटे करता, तो मिलने वाले लोग बोलते कि भाईसाहब आजकल आप कमजोर हो गए हैं। कमजोर नहीं, बहुत कमजोर। कसूर ट्रिमर का, और उलाहना सुने सेहत। बालों का भला सेहत से क्या रिश्ता। अब तो वे लोग ही जानें कि बालों से ऐसी कौनसी नाड़ी निकलती है, जो सीधी सेहत से जाकर जुड़ती है। और तो और, जो लोग मुझे क्लीनशेव आदमी के रूप में जानते थे, वे भी मेरी दाढ़ी को देखकर बोलते कि मियाँ आप कमजोर हो गए हैं। यह अब एक महान और रहस्यमयी खोजबीन का विषय है कि मुंह के बालों में बदलाव से सेहत कैसे गिर जाती है। सेहत भी सिर्फ उन्हीं लोगों की नजर में गिरती है, जिन्हें चेहरे में बदलाव नजर आता है। उसको खुद को और दूसरे लोगों को सेहत का गिरना जरा भी नजर नहीं आता। मूँछों की बात कोई नहीं करता। पता नहीं क्यों लोगों को मूँछों की बात करना दुखती रग को छूना लगता है। पर सच्चाई यह है कि जो जिंदगी में कभी न हँसा हो, वह भी मूँछों की बात से बतीसी चमकाते हुए हंसी का फव्वारा छोड़ दे। सीधे तौर पर हेयर ट्रिमर को कोई दोष न दे। सबको पता है कि अगर ट्रिमर या बालों को दोष दिया तो उससे लिंगभेद पैदा हो जाएगा। इससे जाहिर होता है कि आजकल के लोग कितने सयाने हो गए हैं, और साथ में लैंगिक समानता के प्रबल पक्षधर भी।

भाईसाहब हम करें भी तो आखिर क्या करें। दाढ़ी मुंडवाएँ तो डाढ़ी वाले लोगों की गैंग से बाहर, और अगर दाढ़ी बढ़ाएं, तो चिकने लोगों की गैंग से बाहर। आगे कुआँ, पीछे खाई। आप मानो न मानो, इस समस्या का हल इलेक्ट्रॉनिक ट्रिमर ही है। इसको लगाके आदमी इधर भी खप जाए और उधर भी। इसको दो नम्बर पर मुंह पर घुमा दो, तो दाढ़ी वाले भी खुश, और चिकने भी खुश। दो नम्बर पर ट्रिमर लगा डाला, तो लाइफ झिंगा-लाला। बौद्धों वाला मध्यमार्ग ही सबसे अच्छा है।  अगर ज्यादा ही असर चाहिए तो नकली दाढ़ी मूँछ रख लो, और चीनी में नमक की तरह हर जगह घुल-मिल जाओ। पर मुंह के बालों से तो व्यक्तित्व की पहचान जुड़ी होती है न। व्यक्तित्व की पहचान गई घास चरने। उसका जरा भी टेंशन नहीँ लेने का। अपुन तो बस मजे का बीन बजाना है। वैसे भी जजमेंटल बोले तो मीनमेख ढूंढते रहना आत्मा के लिए नुकसानदायक होता है। बस देखते रहिए, हंसी-मजाक में ही आप एक महान आध्यात्मिक गुरु बन जाएंगे। आपके तो दोनों हाथों में लड्डू आ जाएंगे।

कहते हैं कि बालों में आत्मा बसती है। आदमी को अपने मुंह के बाल सबसे ज्यादा अजीज होते हैं। मेरा डॉक्टर लोगों से दोस्ताना सम्बंध रहता है, क्योंकि वे बाल की खाल निकालने वाले होते हैं। भला उनसे अच्छा बालों को कौन समझ सकता है। वे बताते हैं कि वेंटिलेटर पर जिंदगी की साँसें गिन रहे लोग भी अपनी मूंछों को साफ नहीँ करवाते। वे अक्सर वेंटिलेटर के काम में भौतिक बाधा पहुंचाया करती हैं। माया मरे न मन मरे, मर-मर गए शरीर; आशा-तृष्णा न मिटे, कह गए दास कबीर। आदमी सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है, पर अपने मुँह के बालों की बेइज्जती कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता। तभी तो अजीज शख्स को नाक का बाल कहकर भी संबोधित किया जाता है। बेशक नाक का बाल है, पर है तो मूँछ का पड़ौसी ही। और वो पड़ौस ही क्या, जहाँ दिल न मिले। इसी तरह, जब चोर की दाढ़ी में तिनका, यह बोला जाता है, तो आदमी दाढ़ी पे हाथ घुमाए बिना रह ही नहीं पाता, बेशक उसे चोरी की सजा में फाँसी ही क्यों न हो जाए। आपको विश्वास न हो, तो आप प्रयोग करके देख लो। भला किस सच्चे दाढ़ीशुदा आदमी को अपनी प्रियतमा दाढ़ी पर एक अदना सा तिनका बर्दाश्त हो सकता है। बालों विशेषकर मूँछ के बालों के प्रति इस अथाह आकर्षण का ही परिणाम है कि एकबार वनविभाग का छापामार दल बाघ के दांतों और नाखूनों की छानबीन करने लोगों के घर पहुंचा, तो उसे उनकी जगह पर बाघ की मूँछ के बाल छिपाए हुए मिले। और तो और, सिक्ख धर्म में तो केश को धार्मिक महत्त्व का सर्वप्रमुख चिन्ह माना गया है। वहाँ तो केश रक्षा के लिए कटार का चलना भी जायज है। आपने महाभारत की कथा तो सुनी ही होगी न। उसमें पांडव, भगवान श्रीकृष्ण की सलाह पर अश्वत्थामा को मृत्युदंड न देकर उसका पूर्ण मुंडन करते हैं। साथ में माथे की मणि भी निकाल लेते हैं। भाईसाहब, वह मणि और कुछ नहीं, कुंडलिनी ही तो है, जो बालों के साथ खुद ही चलती बनी। वही माथे पर स्थित आज्ञाचक्र पर निवास करती है। अश्वत्थामा ने इसे अपनी मृत्यु से भी ज्यादा अपमानजनक समझा, और फिर देखा नहीं आपने कि कैसे उसने आगे चलकर बदले की कार्यवाही करते हुए ब्रह्मास्त्र चला दिया था, जिससे उत्तरा के गर्भ में झुलसते हुए परीक्षित को कैसे भगवान श्रीकृष्ण ने बाल-बाल बचा लिया था। इधर एक मशहूर नेत्री ने विदेशी मूल की महिला को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए अपने पूर्ण मुंडन की धमकी दे डाली, तो उधर एक विश्वविजेता खिलाड़ी ने अपनी कुलदेवी को प्रसन्न करने के लिए अपना पूर्ण मुंडन करा ही डाला। इसी तरह, तिरुपति बालाजी मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर को बाल चढ़ाए जाते हैं। मान्यता है कि भगवान वेंकटेश्वर इन बालों की कीमत से कुबेर का कर्ज उतारते हैं। कुबेर सृष्टि के सबसे धनवान देवता हैं। इसका मतलब है कि फिर कर्ज की रकम भी बहुत भारी भरकम रही होगी। तो क्या फिर भगवान वेंकटेश्वर भक्तों से सोना-चांदी नहीं माँग सकते, सिर्फ बाल ही क्यों मांगते हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि बाल सृष्टि की सबसे कीमती वस्तु है। वे जानते हैं कि बालों के अंदर आदमी का सारा बॉयोडाटा छिपा होता है। आप गूगल और फेसबुक जैसी कम्पनियों से पूछ कर देख सकते हैं कि डाटा की कीमत क्या होती है। थारे को जवाब मिल जावेगा। इतना इम्पोर्टेन्ट मैटर होने के बाद भी बालों की अचिंत्य शक्ति पर सही ढंग से वैज्ञानिक शोध हुए ही कहाँ हैं अभी तक। मुझे तो लगता है कि आज तक की सबसे कम समझी गई और सबसे जरूरी चीज बाल ही हैं। तो दोस्तो, बात यहीं पर जाकर अटकती है कि दाढ़ी-मूँछ के मामले में लापरवाही बरतना अच्छी बात नहीं है।

कुंडलिनी से भी तो आदमी का इसी तरह का गहरा लगाव होता है। हो न हो, पूरा का पूरा कुंडलिनी रहस्य बालों में ही छुपा हो। तभी तो केशों को पवित्र तीर्थस्थानों पर बहाने का रिवाज है। एक बार मैं दुश्मन इलाके में बैठे नाई से बाल साफ करवाने चला गया। समझ लो, यह मेरा एक रिसर्च प्रोजेक्ट था। मैं एक देसी वैज्ञानिक जो ठहरा। यह अलग बात है कि मेरी इन शुद्ध देसी खोजबीनों पर कोई ध्यान नहीं देता। फिर क्या था, उसके बाद वहां के लोग मेरे अजीज और मैं उनका अजीज। बालों की चमत्कारिक शक्ति को देखकर मैं दंग रह गया। बालों के रहस्यमयी टोटकों पर अभी ढंग से रिसर्च नहीं हुई है भाई साहब। मुझे तो पूर्ण विश्वास है कि बालों में ही सभी समस्याओं का हल मिल जाए। हमारे प्राचीन ऋषि मुनि बड़े पहुंचे हुए वैज्ञानिक हुआ करते थे। न हींग लगाते थे, न फिटकरी, और रिसर्च इतनी गहरी, जिसे छूने तक की हिम्मत आज की बड़ी-बड़ी प्रयोगशालाएं न कर सके है। तांत्रिक टोटकों को ही देख लो। कैसे पहुंचे हुए तांत्रिक, आदमी के सिर्फ एक बाल से पूरे आदमी को वश में कर लेते हैं। महिलाएं ऐसे केशतंत्र का ज्यादा शिकार बनती हैं, क्योंकि उन्हें ही अपने केश सबसे प्रिय होते हैं। बालों के इस छोटे से टोटके के आगे सारा आधुनिक विज्ञान फेल।। यह तो एक छोटा सा उदाहरण है। हमारे साथ बने रहिए, और देखते रहिए, आगे-आगे क्या होता है।

आदमी का त्वरित रूपांतरण जैसे कुंडलिनी जागरण से होता है, वैसे ही मूँछ काटने से भी होता है। इसीलिए पुराने जमाने में लोग अपने पापों से छुटकारा पाने के लिए अपनी मूँछ काट दिया करते थे। तभी से अपनी मूँछ बचाने की कहावतें बनीं। उदाहरण के लिए मूँछ ऊंची रखना, मूँछ न कटने देना, मूँछ का सवाल होना, मूँछ को शर्मिंदा न करना, मूँछ की लाज रखना, मूँछ की शर्म करना आदि बहुत सीं। सच भी है, सोने के जेवर की तरह अच्छी तरह से संभालकर रखी हुई मूँछ बुरे वक्त पे काम आती है। मुझे भी एकबार प्यार-संभाल कर रखी हुई मूंछों ने ही बचाया था। हुआ यह था कि मैं अपने बीते हुए जीवन से पूरी तरह उदास और निराश हो गया था। फिर किसी दैवकृपा से मिले एक गुरु सदृश तजुर्बेदार व्यक्ति ने मुझे मूँछ साफ करने की सलाह दी थी। वे खुद भी अपने नित नए नवेले चेहरे के शौकीन थे। दरअसल वे मेरे कॉलेज टाइम के रंगीन मिजाज के प्रोफेसर ही थे। कॉलेज की लड़कियां तो उनसे बड़ा लगाव रखती थीं। एकबार तो लगाव इस हद तक बढ़ गया था कि कुछेक छात्राओं को अपने साथ छेड़छाड़ की आशंका पैदा हो गई थी। भगवान जाने क्या-क्या मामले रहे होंगे। खैर, वे मूंछों की वजह से मेरे ऊपर ढाए गए सितम से अच्छी तरह वाकिफ थे। आपको तो पता ही है कि कॉलेज लाइफ में चिकने चेहरों की ही तूती बोलती है। मूंछों वालों को तो वहाँ पर बाबा बोला जाता है। बाबा भी अगर असली समझे, तब तो बात भी बने न। अब तो बाबा का मतलब भंगी, पगला, इश्क-विश्क में हारा हुआ और पता नहीं क्या-2। घिन्न आती है सोचकर भी। और तो और जितना भी आप अकल का घोड़ा दौड़ा सकते हो नकारात्मक लफ्जों के मैदान में, दौड़ा लो, सबका पर्यायवाची बाबा ही दिखेगा आपको। लापरवाह तो बाबा, भाँग पिए तो बाबा, शराब पिए तो बाबा, हड्ड चबाए तो बाबा, लुगाई संग घूमण लागे तो बाबा, मार-कुटाई करे तो बाबा। बस-2, समझदारों को इशारा ही काफी होता है। असली बाबा को बाबा कहोगे, तो चिमटा पड़ेगा। बाबा क्या दहेज में मिला शब्द है, जिस मर्जी के साथ मन किया, चिपका दिया। असली बाबाओं में एकता ही कहाँ, जो कोर्ट में पेटिशन दायर कर सके। कहते हैं न कि शेर अकेला चलता है, झुंड में तो भेड़-बकरियां चला करती हैं। इधर असली जाति-वर्ग को असली नाम से नहीं बुला सकते, और उधर जहाँ देखो, बाबा-बाबा-बाबा। तौबा के लिए, न बाबा न। बच्चियां नूं पुचकारण लई, ओ मेरा बाबा। इह तां माड़ा जिहा जचदा वी है, किवें कि बाबा ते बच्चे दोनों ही सौखे हुंदे हन। और अब तो नया ही ट्रेंड चल पड़ा है, माई क्यूटी बाबा। बाबा की मशहूरी का आलम यह कि एकबार मेरी पत्नी देवी ने मुझे प्यार से बाबा क्या कह दिया, मेरा छोटा सा बेटा हँसता ही जाए, हंसता ही जाए। मैंने पूछा मेरे बाबा इतना क्यों हँस रहे हो। तो वह मेरी तरफ अंगुली करके हँसते हुए बोला, बा-बा ब्लैक शीप। आजकल के बच्चे भी न कितने समझदार हो गए हैं। बाबा बरगा यूनिवरसल बोल नी देख्या अड़यो। कभी उस्ताद पहुंचे हुए हुनरमंद को कहते थे। आज भंगी ट्रक ड्राइवर को बोलते हैं। एक बार मैंने एक देसी इंजीनियर को तारीफ में उस्ताद क्या बोल दिया, उसने अगले ही दिन मुझे मानहानि का नोटिस भिजवा दिया। हाय राम, ये शब्द हैं के देसी तोप के गोले। गुरु शब्द बड़ा पवित्र अल्फाज़ माना जाता है। पर एक हिजड़े के निर्माण के दौरान भी इसका बहुत प्रयोग होता है। वहाँ पर कामदेव के शहर को उजाड़ने वाले एक्सपर्ट शख्स को भी गुरु बोला जाता है। कोई गलत काम करके आए, तो सबसे पहले इन्हीं शब्दों से स्वागत होता है, वाह गुरु। अब समय आ गया है कि हम पवित्र शब्दों की मर्यादा को बचाएं। अगर देशद्रोही की नापाक मूँछों को बचाने के लिए आधी रात में कोर्ट खुलवाए जा सकते हैं, तो इन शब्दों को बचाने के लिए क्यों नहीं। जबकि ये शब्द तो सबसे बड़े देशप्रेमी हैं, क्योंकि ये हमारी सनातन संस्कृति की रक्षा करते हैं। मैंने तो अपने समझदार मित्रों से साफ-2 शब्दों में कहलवा दिया है कि या तो वे मेरे आध्यात्मिक लेख न पढें, या फिर मुझे सपने में भी गुरु और बाबा न बोलें। एक चालू सा दोस्त मुझे बार-2 शरीफ कहकर चिढ़ाता था। मैंने उसे खरी-2 सुनाते हुए चेता दिया कि भले ही वह पाकिस्तान जाकर नवाज शरीफ को शरीफ बोल आए, पर मुझे कभी शरीफ न बोले। उसके बाद वो मुझे नेस बोले तो अंग्रेजी का अच्छा बोलने लगा। हाँ, तो मैं क्या मूल प्रवचन दे रहा था कि अब वे हरफनमौला महोदय अपने योग्य शिष्य को कैसे न पहचानते, सो उन बिन बुलाए गुरु ने पहली ही मुलाकात में मुझे प्रेम, गर्व, मुस्कान और गर्मजोशी के साथ सबसे प्रिय या सच्चा शिष्य कुछ ऐसा कहकर संबोधित कर दिया। वो मेरी मूंछों का काला झाड़ देखकर कुछ औंच जैसे भी गए थे, पर ये तो घुल-मिल कर उन्हें बाद में पता चला था कि मेरे दिल पर तो मूंछें थीं ही नहीं। बाद में कभी बता रहे थे कि तू डेंजरस हुआ करता था। मैंने भी स्पष्टीकरण दे दिया था कि वो मेरी मूंछें डेंजरस थीं, मैं नहीं। झाड़-साफ-दिमाग तो थे ही, इसलिए एकदम से समझ गए। फिर जाके ढंग से घुल-मिल पाए, नहीं तो मुच्छड़ों और मुच्छकटों की प्रॉपर हुकिंग कहाँ। कहाँ-2 की सुनाऊँ, इन वफादार मूछों ने कहाँ-2 नहीं बचाया है मुझे। अब तो लगता है कि कुत्ते उनके घने बालों के कारण ही वफादार होते हैं। एक-दो मुच्छकटे और 1-2 मुच्छड़ लोग भी उनके अगल-बगल में, उनसे कुछ इधर-उधर की हांकते कामकाजी चहलकदमी कर रहे थे। अपने प्रति उनके अंदर इतने सारे सुंदर और मजबूत भाव, वो भी एकसाथ देखकर तो मैं दंग ही रह गया। साथ में मैं अपने को खुशकिस्मत भी समझने लगा कि उन्होंने मुझे मुच्छड़ शिष्य नहीँ कहा। वो भाव-प्राकाट्य उन्होंने इतनी तेजी से किया कि जबतक उनके एकदम चिकने चेहरे से मेरी नजर हटती और मैं उनसे कुछ कह पाता, तब तक वे वहाँ से रुखसत भी कर गए थे। उस समय तो मुझे लगा था कि शायद जोक कर रहे होंगे, पर अब समझ आ रहा है कि वह जोक नहीं, उनका सच्चा मुच्छकटा आशीर्वाद था। वे खुद मुच्छड़ों और मुच्छकटों के अघोषित गठबंधन के सताए हुए लगते थे। बाद में तो मुझे उनसे यह गम्भीर शिकायत भी सुनने को मिली कि उन्हींके शिष्यगण उन्हें अपने चेहरे का बंजर मैदान दिखाकर चिढ़ाया करते थे। शायद इसी वजह से कई बार अपनी मुच्छों को टेबल पर सजा देते थे। हो सकता है कि वे कॉलेज टाइम की मेरी तांत्रिक गुरुभक्ति की निष्ठा को संयोगवश ताड़ गए हों। उनको भोले शंकर और कामदेव का एकसाथ आशीर्वाद प्राप्त लगता था। उस समय उनकी जिंदगी का चिकना और फैशनेबल चेहरा रखने का दौर चल रहा था। इसलिए मूँछ-छेदन संस्कार की दीक्षा उनसे लेना ही मैंने सबसे उचित समझा। उन गुरुदेव की सलाह पर मूँछ काटने से मेरा जबरदस्त रूपांतरण हुआ और उस नाजुक दौर में उन्होंने मुझे ऐसे संभाला जैसे एक कुंडलिनी गुरु अपने शिष्य को कुंडलिनी रूपांतरण के नाजुक दौर में संभालता है। मूँछ काट कर चिकना चेहरा बनने से मुझे ऐसा लगा जैसे कि मेरी जिंदगी का रिफ्रेश बटन दबा हो। जैसे कि मूँछों के साथ बीती जिंदगी भी उतर गई हो, और मैंने एक नया सा जनम ले लिया हो। मुंडन साईंस अब कुछ गले उतर रही है। कुंभ में भी नागा साधु बनने आए लोगों के सिर और चेहरे का पूर्ण मुंडन करके ही उनका माईंडवाश किया जाता है, ताकि वे पिछली जिंदगी में कभी वापिस लौट ही न सके। यज्ञोपवीत संस्कार के समय भी तो ऐसा ही पूर्ण मुंडन किया जाता है, बालों की एक लंबी शिखा को छोड़कर। उसके बाद भी आदमी का दूसरा जन्म माना जाता है, मतलब माइंड वाश हो जाता है उसका। बालों की शिखा उसे कुंडलिनी से और घर से जोड़कर रखती है, इसीलिए तो वह घर नहीं छोड़ता, बस कुंडलिनी साधना में लगा रहता है। इसी तरह, बौद्ध भिक्षु इनसे भी एक कदम आगे रहते हैं। वे हमेशा ही पूर्ण मुंडन करवाए रखते हैं, ताकि आम लोग उनके संपर्क में कभी आ ही न सके, और आकर उनकी साधना में विघ्न न डाल सके। अब केशप्रेमी लोग कहाँ जाने लगे मुंडक सभाओं में। कुछ किस्म के मुसलमान भाई तो काफिरों से अलग दिखने के लिए अलग ही नायाब नुस्खा अपनाते हैं। वे मूँछों को तो साफ कर देते हैं, पर दाढ़ी को बड़ा पालते-पोसते हैं। तो कुछेक बकरे के जैसी दाढ़ी रखते हैं। रब खैर करे। कहीँ पर लोग दाढ़ी पर चित्र-विचित्र डिसाईन और नक्शे आदि बनवाते हैं। भाई उनके नेचरल आर्ट को तो दाद देनी पड़ेगी। न रँग लगे, न कैनवास, बस एक बढ़िया सी कैंची चाहिए। कुछ लोग चार्ली चैपलिन की तरह नाक के ठीक नीचे, मधुमक्खी के जितनी मिनी मूँछ रखते हैं। इससे उन्हें नई ही उमंग का एहसास होता है। ऐसी मूँछ रखते हुए भी डर लगता है कि कहीं खुराफाती लोग मधुमक्खी को भगाने का झूठा बहाना बनाकर मुंह पर थप्पड़ ही न मारते रहे। कुछ लोग बहादुरी का प्रदर्शन करने के लिए दोनों तरफ को लम्बी, उठी हुईं और पैनी मूंछें रखते हैं, जैसे कि जाबांज फाइटर पायलट अभिनन्दन। सुनने में तो यह भी आया कि उनकी मूँछों के डर से ही पाकिस्तान को उन्हें चौबीस घंटे के अंदर रिहा करना पड़ा था। कुछ लोग अपने आप को विशिष्ट जताने के लिए दाढ़ी-मूँछ को मेहंदी या बनावटी रसायनों से लाल रँगाते हैं, तो कुछ उन्हें कज्जली काला कर देते हैं। बेचारे आम गरीब आदमी को ही मन मसोस कर झुंड की खाल के अंदर रहना पड़ता है, क्योंकि यदि वे विशेष बनने लगेंगे, तो खाएंगे क्या। लोगों के इस मिजाज से अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्राचीन काल में मूँछों का वास्तुशास्त्र जरूर रहा होगा। फिर हो सकता है कि वह मध्ययुग में जिहादियों द्वारा जला दिया गया हो। उसमें उन्हें अपनी अय्याशीपरस्त मूँछों की तौहीन नजर आई हो। भला एक अमनपसंद शख्स को अमन का बेइंतेहा पैग़ाम देने वाली पाक-साफ मूँछों की शान में गुस्ताखी कैसे बर्दाश्त हो सकती थी। तौबा-तौबा। प्रथमद्रष्टया तो यही लगता है कि इस तरह की विकृत मूँछ-विद्या से ही हिंदुओं के अनगिनत धार्मिक स्थल नेस्तनाबूद किए गए हैं, और असंख्य धार्मिक ग्रन्थ सुपुर्दे खाक किए गए हैं। तो भाइयो मैं अपनी मूँछमुंडन से जुड़ी आपबीती बता रहा था कि कैसे उससे डिप्रेस करने वाली वर्तमान की, कॉलेज की और बेरोजगारी की जिंदगी चली गई थी रिसाइकिल बिन में, और बचपन के साथ स्कूल टाइम की जिंदगी आ गई थी रिसाइकिल बिन के कचरे से निकल कर मेरे मस्तिष्क के डेस्कटॉप पर। ऐसा लगा जैसे मेरे दिमाग की वही पुरानी विंडो अपडेटिड वर्शन के साथ रीइंस्टॉल हो गई हो। वही पुराने जीवन के ख्याल, पर अनौखे और हुस्न से भरे अंदाज में। दोस्तो, बहुत तरक्की की मैंने उस दौर में। मेरी तरक्की का बाहरी माहौल तो पहले से ही बना हुआ होगा, बस भीतरी माहौल डगमगा रहा था, जिसे मेरे चिकने चेहरे ने संभाल लिया। जब मेरी हालत स्थिर हो गई, तब मैंने फिर से चेहरे पे फसल उगाना शुरु कर दिया। बर्फबारी के दिनों में तभी तो अनाज मिलेगा न जब पहले से फसल इकट्ठी कर रखी हो। मित्रो, मूंछों के सभी रहस्यों से पर्दा उठाने लगूँ तो एक पूरा मूँछ पुराण बन जाए। हाय, ये लेखन भी भला क्या अजीब बला है न। हाथ थक जाते हैं, पर मन नहीं थकता। और अगर तो मूँछ जैसा रोमांचक विषय हो, तब तो सवाल ही पैदा नहीं होता कि मन थक जाए। तजुर्बेदार बुजुर्ग लोग कहते हैं कि महिलाएं शादी से और पुरुष रण से वापिस नहीं लौटते। इसी तरह मूँछ जैसे दिलछेड़ विषय के लेखक की लेखनी कभी कागज से वापिस नहीं लौटती। इसलिए सब्र बनाकर पढ़ते रहना, ताकि लेख के अंत में आप भी अपने को मूँछ विशेषज्ञ बना हुआ पाओ। दरअसल मूंछों को हटाने से मेरी बरसों पुरानी दबी पड़ी कुंडलिनी ऐसे चमकने लगी थी, जैसे झाड़ को हटाकर उसके अंदर दबी पड़ी सोने की अंगूठी चमकती है। यह भी एक शोध का विषय है कि क्या मूँछों का अंधेरा चमकदार कुंडलिनी को ढक कर रखता है। मूंछें साफ करने का सबसे बड़ा फायदा मुझे यही हुआ कि मैं अपनी कुंडलिनी को अच्छी तरह से पहचान पाया था। फिर मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वो मुझे जहाँ लेके जाती रही, मैं वहाँ हो आता रहा, और वह हर प्रकार से मेरा भला ही करती रही। कुंडलिनी के आगे जैसे मैं बच्चे की तरह नँगा ही हो गया था। मूँछे उड़ाने और नंगे होने के बीच में कोई ज्यादा अंतर है भी नहीँ। मैंने उसके आगे अपने आप को समर्पित कर दिया था। कुंडलिनी के सहयोग से कड़ी मेहनत करके मैंने कामयाबी के बहुत से कीर्तिमान स्थापित किए दोस्तो। कुंडलिनी स्त्रीलिंग में थी, तभी तो कुंडलिनी को एक स्त्री की तरह संबोधित किया जाता है। ये जो प्यार-व्यार और शादी-ब्याह का खेल भौतिक जगत में चलता रहता है न, बिल्कुल ऐसा ही मन के सूक्ष्म जगत में भी चलता रहता है। फिर क्या था, उस स्त्रीलिंग कुंडलिनी को देखकर पुलिंग गुरु भी पहुंच गए मूँछ-मुस्कुराहट बिखेरते हुए गाजे-बाजे के साथ। दोनों ने शादी की, रोमांस किया, बच्चे पैदा किए और फिर दोनों बुड्ढे होकर एक-दूसरे के प्रति उदासीन जैसे भी हो गए। वो मेरे सूक्ष्म माँ-बाप मुझे छोड़कर जा रहे थे। मैं कुछ उदास रहने लग गया था। तभी मैंने कुंडलिनी योग का अभ्यास शुरु किया और उन मुच्छड़ गुरु (कुंडलिनी) की मूँछ खींचकर उन्हें फिर से जगा दिया बोले तो एकदम मस्त कुंडलिनी जागरण। तब जाकर मैंने कुछ राहत की साँस ली और घर की खेती को फिर से उगाना शुरु कर दिया। पर आज भी मैं बड़े झाड़ से डरता हूँ। पुराना सदमा जो गया नहीँ मेरे दिमाग से पूरी तरह। पता नहीं क्यों अंधेरा जैसा लगता है इसके नीचे। क्या सबको लगता होगा, या मेरेको ही। इसकी सफाई से क्या सबकी कुंडलिनी चमकती होगी, या सिर्फ मेरी ही चमकी थी। यह सब साझे शोध और अनुभव से ही पता चल सकता है। इसलिए मैं इनकी इस तरह से छंटाई करता रहता हूँ, ताकि इनकी जड़ तक हवा और रौशनी जाती रहे। पर मुझे लगता है कि यह मन का वहम भी है। कुंडलिनी जागरण के समय तो मेरे पूरे चेहरे पर झाड़ पसरा हुआ था, हालाँकि वह मध्यम आकार का था, पर था तो घना झाड़ ही। उस समय तो हर जगह प्रकाश ही प्रकाश था। इससे जाहिर होता है कि सबकुछ देश, काल और मानसिकता पर निर्भर करता है। इसलिए जैसा अच्छा लगे, वैसा करना चाहिए, पर कुंडलिनी के लिए प्रयास हमेशा करते रहना चाहिए। यदि घासफूस की तरह हल्की कुंडलिनी को यह मूँछों का झाड़ दबा कर रखता है, तो फनदार कोबरा नागिन की तरह फुफकारे मारने वाली शक्तिशाली कुंडलिनी को दुनिया की नजरों से बचाते हुए संभालकर भी यही रखता है। इसीलिए तो मैंने कहा न कि वक़्त की भाषा पढ़नी आनी चाहिए, और सर्वहितकारी मूँछों का हमेशा सम्मान करना चाहिए। वक्त के अनुसार आदमी खुद चलता नहीं, और दोष मढ़ता है मूँछों के सिर। सबसे ज्यादा दुरुपयोग आदमी ने मूँछों का खुद ही किया है। मूँछों की शक्ति से पता नहीँ कितने अनैतिक काम किए हैं उसने। मूँछों की अथाह शक्ति का अंदाजा इसीसे लगाया जा सकता है कि सिर्फ इनके ऊपर प्यार भरा हाथ फेरने से ही जोश कई गुना बढ़ जाता है। ए लो जी, इस क्रिया के लिए मूँछ-विशेषज्ञों द्वारा प्रदत्त नाम भी याद आ ही गया, मूँछ पर ताव देना। बड़ा गूढ़ नाम है यह। आप सोच भी नहीं सकते कि ताव का अर्थ यहाँ ताप या गर्मी है। जैसे मालिश की गर्मी से सरोबार पहलवान अंगड़ाई लेते हुए उठ खड़ा होता है, ऐसे ही मूंछें भी। उपरोक्त कुछ मुख्य वजहों से मूँछों की इज्जत आज इस कदर गिर गई है कि लड़की वाले सबसे पहले यही पूछते हैं कि कहीं लड़का मूँछों वाला तो नहीं है। कभी मूँछ वाले का समाज में विशिष्ट रुतबा हुआ करता था। आज तो आलम यह है कि मूँछों को यह लोरी-गीत सुनाकर शांत करना पड़ता है, मत रो——-~मेरी मूछ, चुप हो जा——नहीँ तेरी पूछ। जो कुकाल में होता है, बुरे हाल में होता है; ऐ यार मेरे साथ तेरे वही तो हुआ; मत रो—–~~~~—–। दोस्तो, यह ट्रेंड बदलना चाहिए, और हमें बेकसूर को बचाने के लिए मिलकर आगे आना चाहिए। और आगे की कहें, तो डाकुओं का भी मूँछों की बदनामी में भारी हाथ रहा है। हमारे समाज के लेखकों और कवियों ने भी मूँछों को डाकुओं के साथ बहुत जोड़ा है। यह कहीं पढ़ने में नहीं आता कि बड़ी-2 मूँछों वाला विद्वान। और तो और, देवियाँ भी पीछे नहीं रही हैं। उनका भी बच्चों को सुलाने के लिए बड़ी-2 आँखों के साथ, डरावनी मुद्रा में अक्सर यही डायलॉग होता है, बड़ी-2 मूँछों वाला-ला-ला-ला—–। अब इससे ज्यादा क्या कहूं, विलुप्ति की कगार पर खड़ी मूँछों को बचाने के लिए उनकी खोई इज्जत वापिस लौटाना जरूरी है कि नहीँ। यदि जरूरी है, तो मूँछ-संरक्षण के लिए भी कानून बनने चाहिए। आज की इस विकट परिस्थिति में मूँछ-आरक्षण के लिए कानून का बनाया जाना बहुत जरूरी हो गया है। मुच्छड़ों को अल्पसंख्यक वर्ग का दर्जा दे देना चाहिए। मूँछ संरक्षण के लिए कल्याणकारी योजनाएं चलाई जानी चाहिए। मूँछ-भत्ते का विशेष प्रावधान होना चाहिये। अपनी कहूँ, तो मेरे चेहरे पर घनी दाढ़ी आती ही नहीं। इससे इसकी जड़ों में हवा व रौशनी खुद ही लगातार पहुंचती रहती है। हो सकता है कि मेरी सदाबहार कुंडलिनी के पीछे इसी अधमुंडी किस्म की मूँछों का हाथ हो। इसको लेकर मेरी घरवाली बोलती रहती है कि आप दाढ़ी के साथ लड़की जैसे लगते हो। इसलिए कई बार मेरे मन में आता है कि क्यों न इस नपुंसकता की निशानी को जड़ से ही उखाड़ फेंकूँ। पर तभी यह भी सोचता हूँ कि अगर भरी बरसात के बीच खेत को बंजर रहने दिया, तो जालम गर्मी के दिनों में क्या खाएँगे। अगर सर्दियों में ही सारे कपड़े उतार दिए, तो गर्मियों में क्या उतारेंगे।

दोस्तो, मैंने यह भी महसूस किया कि खाली मूँछ की बजाय दाढ़ी-मूँछ का मिश्रण ज्यादा दार्शनिक होता है। कहते हैं न कि चेहरा मन का आइना होता है। आईने के अंदर सुंदर बनने से उसके सामने खड़ा आदमी खुद ही सुंदर बन जाता है। इसलिए चेहरे पर अद्वैत दर्शन बना कर रखने से मन में खुद ही अद्वैत छा जाता है। मुख्य भूभाग को बंजर रखना और पहाड़ी की तलहटी में बनी छोटी सी पथरीली क्यारी में झाड़ ऊगा कर रखना समझदारी का काम भी तो नहीं लगता। तो इस समस्या को देखते हुए मैंने पूरे भूभाग में बिजाई शुरु कर दी थी। पर फिर एक नई समस्या आन पड़ी थी। फसल के एकमुश्त कटान के बाद पूरा भूभाग बंजर और नँगा लगता था। कोई सीधा आसमान से जमीन पर आ गिरे और खजूर भी न मिले अटकने को, तो उसकी व्यथा-पीड़ा आप खुद भी समझ सकते हैं। साथ में, द्वैत या यूँ कह लो कि बदलाव के झटके ऐसे लगे, जैसे सर्द-गर्म के लगते हैं। और भाई ये मनहूस द्वैत तो मन का सबसे बड़ा रोग है न। तो दोस्तो, दोनों समस्याओं से बचने का एक ही मध्यमार्ग वाला तरीका बचा था। क्यारी की फसल को जमीन से न काटकर थोड़ा ऊपर-2 से काटा जाए। इससे क्या हुआ कि फसल कटान के बाद भी थोड़ी-बहुत हरियाली बची रही। उससे लोगों की आंखों का नूर भी बरबस बना रहा, और द्वैत या बदलाव पर भी काफी रोक लग गई। यहाँ एक दार्शनिक पेंच और है। दरअसल अद्वैत का निर्माण द्वैत से ही होता है। इसलिए जो सौ टके का दार्शनिक मिस्त्री है, उसके लिए तो द्वैत पैदा करने वाली विकराल मूंछें किसी सोने की ईंट उगलने वाली खदान से कम नहीं हैं। वह तो उनकी चिनाई करने से पहले उनके साथ मन के काम, क्रोध जैसे दोषों का मिक्चर सीमेंट-मोर्टार की तरह चिपकाता है, फिर उनसे अव्वल दर्जे के अद्वैत-महल तैयार कर लेता है। उसकी बसाई अद्वैत नगरी के आगे कुबेर की अलकापुरी क्या मायने रखती है। हो न हो, अलकापुरी इन्हीं मूँछ-महलों को कहा गया हो। वैसे भी कुबेर की मूंछें भी बड़ी सुंदर बताई जाती हैं। मैंने भी एकबार इसी तरह त्रिलोकलुभावन अद्वैत-नगरी का निर्माण किया था। उस समय मेरे पास बड़े-2 मिस्त्री ज्ञानप्राप्ति के लिए दूर-2 से घुटनों के बल आते थे।

इसी केशप्रेम की विचित्र मानसिकता के कारण ही आदमी अपने जैसे बालों वाले आदमी के साथ ही घुलना-मिलना पसंद करता है। इसी विकृत मानसिकता के परिणामस्वरूप ही तो तालिबानियों ने पूरे अफगानिस्तान में सभी को दाढ़ी रखने का फरमान जारी किया था। पर स्त्री उसे कम से कम बालों वाली चाहिए, खुद वह बेशक कितने ही लंबे बाल क्यों न रखता हो। पर स्त्री के मामले में उसका यौनस्वार्थ जो जुड़ा होता है। वह उसके केशस्वार्थ पर भारी पड़ जाता है। इसी तरह अपने बच्चे कैसे ही बालों वाले क्यों न हो, सभी अच्छे लगते हैं। इसमें भी अप्रत्यक्ष रूप से यौनस्वार्थ ही जुड़ा होता है। इससे साफ जाहिर होता है कि केशभाव और यौनभाव ये दोनों सबसे शक्तिशाली भाव हैं। तांत्रिक इन दोनों का महत्त्व अच्छी तरह से समझते हैं, इसलिए दोनों को संभाल कर रखते हैं। अब कुछ समझ में आ रहा है कि भगवान शिव के जैसे महान तांत्रिक जटाधारी और मस्तमौला क्यों होते हैं।

कई बार तो मुझे लगता है कि यदि कुन्डलिनी जागरण के समय मेरी दाढ़ी न बढ़ी होती, तो मुझे कुन्डलिनी जागरण ही न होता। क्लीनशेव होने से मैं अपना चिकना चुपड़ा मुंह लेकर उन गाने बजाने वाली औरतों के इर्दगिर्द इस प्रकार मंडराता ही रहता, जिस प्रकार एक बार नारद मुनि अपना बंदर का मुख लेकर पूरी स्वयंवर सभा में सबकी आंखों से आंखें मिलाते हुए मंडराते फिरे थे। उससे मुझे उस दोस्त से मिलने का मौका ही न मिलता जिससे मैं कुन्डलिनी की याद में खो गया था। साथ में अगर अपने जैसे नामर्द चिकनू को देखकर कोई औरत इशारे में भी दिल में चुभने वाला ताना कस देती, तब तो जागरण का प्रश्न ही पैदा न होता। ताने से तिलमिलाए नारद ने भी तो कपटी कहकर भगवान विष्णु की खटिया खड़ी नहीँ कर दी थी वैकुंठ में जाके, जागरण गया गेहूँ बीजणे जाँ बांदर भगाणे। हाँ, तो मैं क्या कह रहा था कि उस उलाहने से कुन्डलिनी में खोने की बजाय मेरा दिल उलाहने में खोने लगता। स्त्री की नाराजगी और स्त्री के उलाहने से भयानक चीज इस दुनिया में कुछ नहीँ है यारो। आदमी सब कुछ भूल सकता है, पर एक औरत का उलाहने से भरा नाराज चेहरा कभी नहीं भूल सकता। अगर औरत की नाराजगी से घायल दिल आदमी कुन्डलिनी जागरण क्या भगवान को भी पा ले, तो भी भगवान उसे उस नाराज औरत के चरणों में पड़कर माफी मांगने के लिए भेजते हैं, तभी अपने अनदेखे महल का अनदेखा मेन गेट उसके लिए खोलते हैं। वरना आदमी को उस अनदेखे महल को बाहर-बाहर से ही देख कर संतोष करना पड़ता है। इसकी कोई गारंटी नहीं कि औरत मान ही जाएगी। यह उस पर और आपके मन की पवित्रता पर निर्भर करता है। कई बार औरत माफी मांगने आए मर्द को कोई दूसरा ही उलाहना मार देती है। इससे वह कहीं का नहीं रहता, एक धोबी के कुत्ते की तरह, न घर का न घाट का। वह फिर से वापिस मुड़कर अनदेखे भगवान को दूर खड़े देख कर उसके पास पहुंच जाता है। भगवान उसे थोड़ा सा पुचकारते हैं, और फिर औरत के चिकने चेहरे को शांत करने के लिए वापिस रवाना कर देते हैं। कई बार तो बेचारा मर्द स्त्री और भगवान के बीच में गेंद ही बन कर रह जाता है। यह सिलसिला तब तक चलता है जब तक कोई अन्य दयालु और भाव से भरी स्त्री उस अभागे मर्द को थाम नहीं लेती। ये जो कहते हैं न कि लोहा ही लोहे को काटता है। दरअसल उस स्त्री को भगवान ही भेजता है अपनी दिव्य शक्ति से प्रेरित करके। इसलिए मेरी सलाह मानो, भगवान की कुछ मदद करने के लिए एक अच्छी औरत को भी ढूंढते रहा करो। स्त्री के मामले में डायरेक्ट एक्शन तो भगवान भी नहीं ले सकता। वह भी मामले का निपटारा एक स्त्री को भेजके ही कर सकता है। भगवान भी बेचारा सच्चा है। एक औरत के आगे उसकी भी नहीं चलती। अपनी पत्नी के डर से ही तो वह अपनी सभी मूर्तियों और चित्रों से मूंछें गायब कर देता है, नहीं तो उसके जैसा समदर्शी महानुभाव मुच्छड़ों के साथ क्यों पक्षपात करता। औरत के नाराज चिकने चेहरे की ज्वाला उसके अनछुए महल तक को छूने लगती है। वो करे भी तो क्या करे। यदि वह औरत के साथ सख्ती करे तो उसके बगल में बैठी उसकी पत्नीदेवी उलाहना मारते हुए, नाराज होकर चली जाए। वो भला अपने भक्त को चिकने चेहरे की ज्वाला से बचाने के लिए खुद क्यों उसका शिकार बने। मुझे तो चिकने लोगों पर यह सोचकर तरस आ रहा है कि कहीं वे स्त्री के कोप से बचने के लिए ही तो चिकने नहीं होते। औरत को उनका चिकना चेहरा देखकर उनपर तरस आ जाता होगा। चिकने चेहरे से औरत को बच्चे की याद जो आती है। वैसे भी औरतें बच्चों पर सबसे ज़्यादा मेहरबान होती हैं। पर ये चालाकी ज्यादा दिन नहीं चलती। गलती से अगर चेहरे पर दो बाल भी उग आए, तो वह पिछली सारी कसर सूद समेत निकालती है। इसलिए पुरजोर आवाज से कहता हूँ कि औरत के जैसा चिकना-चुपड़ा चेहरा बनाने से पहले औरत के द्वारा निभाई जाने योग्य जिम्मेदारियां भी समझ लेनी चाहिए। अगर ऐसा न किया गया तो बेचारे अमनपसंद दाढ़ीदार आदमी की आत्मा नाराज चिकने चेहरों के बीच ही भटकती रहेगी, और उसे मरने के बाद भी शांति नहीं मिलेगी। कांटे तो मुरझाए हुए ही अच्छे लगते हैं, पर फूल तो हमेशा खिले हुए ही अच्छे लगते हैं। खिला हुआ फूल चेहरे पे न सही, दिल पर ही सही। इसलिए कहता हूँ कि सिर्फ मुंह पर ही नहीं, दिल पर भी कुन्डलिनी रूपी दाढ़ी उगी होनी चाहिए। इससे जब औरत का प्यार, कामदेव के पुष्पबाण पर सवार होकर दिल तक पहुंचेगा तो वह सीधा कुन्डलिनी को लगेगा, जिससे कुन्डलिनी गलती से जागृत भी हो सकती है। नहीँ तो ऐसा होगा जैसा एकबार अंतरराष्ट्रीय मूँछ प्रतिस्पर्धा में हुआ था। उसमें विजेता घोषित किए गए दिग्गज मूँछ शिरोमणि या बेचारे मुच्छड़ महाशय कह लो, सहज उद्गार प्रकट करते हुए कहने लगे थे कि उन्हें विजेता घोषित होते हुए ऐसा मजा आ रहा था, जैसा एक गैंडे को बार-2 कीचड़ में लोटते हुए आता है। जो इस मूँछ स्तोत्र को श्रद्धापूर्वक पढ़ेगा, उसपर जीवनभर मूँछों की अपार कृपा बनी रहेगी, तथा इस जीवन के बाद उसे मूँछलोक की प्राप्ति होगी। अब कृपा करके इस दिव्य मूँछ संहिता को कहीँ कॉपी पेस्ट न करिएगा, नहीँ तो किन्हीं ताव-(प्र)चोदित मूँछों की गाज कहीँ व्यंग्यकार पर ही न गिर जाए।😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂~प्रेमयोगी {व्यंग्यकार~भीष्म}😄😥🙏

कुन्डलिनी ही मन के फालतू शोर को शांत करने के लिए सर्वोत्तम हथियार के रूप में

मन के बकवास विचारों की शांति के लिए कुन्डलिनी ध्यान एक सर्वोत्तम तरीका है

मित्रो, मन के बकवास विचारों को शांत करने के लिए अपने अपने नुस्खे बताते हैं लोग। मुझे तो कुंडलिनी ध्यान सबसे अच्छा तरीका लगता है। एकदम से मन का शोर शांत हो जाता है इससे। यह मैं पिछली कई पोस्टों में लगातार वर्णन करता आ रहा हूँ। इसे मैंने कुंडलिनी चक्रों पर प्राण और अपान की आपसी टक्कर का नाम दिया है। यह मानसिक विचारों और आधार चक्रों का एक साथ ध्यान करने जैसा है। पिछली पोस्ट में मैं बता रहा था कि साँस रोकने वाले प्राणायाम से स्ट्रोक और दिल के रोगों से बचाव हो सकता है। मेरा अनुमान सही निकला। मैं इस हफ्ते एक ऑनलाइन आध्यात्मिक बैठक में शामिल हुआ। उसमें यह रिसर्च दिखा रहे थे जिसके अनुसार श्वास व्यायाम से व साँस भरते समय पूरी छाती फैलाने से रक्तचाप कम हो जाता है। हालाँकि मुझे लगता है कि साँस रोकने से रक्तचाप ज्यादा नीचे गिरता है। जब मैं खाली श्वास व्यायाम करता था, तब मुझे इसका अहसास नहीं हुआ, पर जब प्राणायाम साँस रोककर करने लगा तो मेरा रक्तचाप 70-100 तक गिर गया। सामान्य स्तर 80-120 होता है। जब मैंने बैठक में विशेषज्ञ से पूछा कि क्या ऐसा हो सकता है, तो उन्होंने कहा कि इतना नीचे गिरना तो सामान्य है, पर बहुत ज्यादा नहीं गिरता। बड़ा कुछ बता रहे थे कि रक्तवाहिनी की दीवार में यह रसायन निकलता है, वह अभिक्रिया होती है आदि। मुझे वह ज्यादा समझ नहीं आया। मैं तो काम की बात पकड़ता हूँ। सबसे बड़ी प्रयोगशाला या प्रमाण तो अनुभव ही है। अध्यात्म के क्षेत्र में विज्ञान अनुभव तक ही ज्यादा सीमित रहे, तो ज्यादा अच्छा है। यदि वैज्ञानिक प्रयोग से प्रमाण मिल गया, तो लोग अपने अनुभव के प्रमाण का प्रयोग कम भी कर सकते हैं। मैं वैज्ञानिक प्रयोगों के खिलाफ नहीं हूं, पर यदि कोई किसी बात को सिद्ध करने के लिए अपने अनुभव का हवाला न देकर केवल वैज्ञानिक प्रयोग का हवाला दे, तो उसमें जीवंतता नहीं दिखाई देती। जिसको योग के महत्त्व का पता है, वह बिना वैज्ञानिक प्रयोग के व केवल औरों के अनुभव को प्रमाण मानकर खुद भी उसको अनुभव करने की कोशिश करेगा। फिर मैं बता रहा था कि बड़े पैमाने पर जागृति प्राप्त करने के लिए योगा से भरी हुई वैदिक जीवन परंपरा को अपनाना कितना जरूरी है। एक न एक दिन सभी को जागृत होना पड़ेगा। कब तक सच्चाई को नजरअंदाज करते रहेंगे। बिल्ली के पंजे में फंसा कबूतर अगर आंख बंद कर दे, तो बिल्ली भाग नहीं जाती।

मस्तिष्क के सभी भाव प्राण के रूप में कुन्डलिनी रूपी भगवान को अर्पित हो जाते हैं

जो गीता में भगवान यह कहते हैं कि अपने सभी क्लेश, विचार, सुख, दुख मुझे अर्पण कर। यह कुंडलिनी योग की तरफ इशारा है। भगवान इसमें कुंडलिनी है। प्राण अपान की टक्कर में जो मस्तिष्क का विचार-कचरा व ऊर्जा कुंडलिनी पर डाला जाता है, उससे कुंडलिनी चमकती है। यही वह अर्पण करना या हवन करना है। प्राण को अपान में हवन करने वाला गीता वाला श्लोक भी यही इशारा करता है। प्राण वाला मस्तिष्क-विचार निचले चक्रों पर स्थित अपान वाली कुंडलनी पर डाला जाता है। उससे कुंडलिनी आग भड़कती है। प्राण का प्राण में हवन भी वहीँ लिखा है। उसमें मन में सभी कुछ प्राण है। भगवान के रूप में कुन्डलिनी हृदय चक्र पर है। मन और हृदय दोनों ही स्थानों पर प्राण है। मैंने पिछली पोस्ट में कहा था कि चक्र के ऊपर कुंडलिनी का ज्योतिर्लिंग और शिवबिन्दु के साथ ध्यान करना चाहिए। शायद इसीलिए उन स्थानों का नाम चक्र पड़ा हो, क्योंकि जब पीठ वाले चक्र पर ज्योतिर्लिंग या शिवलिंग का ध्यान करते हैं, तो उसके काऊंटरपार्ट अगले चक्र पर शिवबिन्दु प्रकट हो जाता है। चक्र खोखले पहिए को भी कहते हैं। 

कुन्डलिनी से ही एक आदर्श जागृति शुरु होनी चाहिये, और कुन्डलिनी पर ही खत्म

मैं यह भी बता रहा था कि यदि ऊर्जा की नदी मूलाधार से मस्तिष्क में पहुंचती है, और उस समय मस्तिष्क में कुंडलिनी प्रभावी न हो, तो वहां के विचार या चित्र बड़ी स्पष्टता से कौंधते हैं, पर जागृत नहीं होते। पर यदि वहाँ ऊर्जा काफी अधिक और ज्यादा समय के लिए बनी रहे, तो जागृति भी हो जाती है। उसमें सभी चीजों के साथ अपना पूर्ण जुड़ाव महसूस होता है, जिसे पूर्ण अद्वैत कहते हैं। पर कोई विशेष चित्र पहचान में नहीं आता, जिससे पूर्ण जुड़ाव शुरु हुआ हो। वह इसलिए भी पहचान में नहीं आता क्योंकि आदमी ने कुंडलिनी के रूप में विशेष मानसिक चित्र साधना के लिए बनाया ही नहीं होता है। मतलब वह कुंडलनी साधना कर ही नहीं रहा होता है। बेशक आध्यात्मिकता को अभिव्यक्त करने के लिए बाद में मन में कुन्डलिनी मजबूत हो जाती है, पर वह कामचलाऊ व अस्थायी लगती है मुझे। स्थायी और असली कुन्डलिनी तो वही लगती है मुझे, जिससे मस्तिष्क में जागृति शुरु होती हुई, और जिसमें खत्म होती हुई दिखती है। उस कुन्डलिनी के स्मरण से वह शुरु होती है। फिर जागृति खत्म होते ही कुन्डलिनी मस्तिष्क से नीचे उतरकर आज्ञाचक्र पर आते दिखती है, और वहाँ से नीचे अनाहत चक्र पर। फिर उसे सभी चक्रों पर आसानी से घुमा सकते हैं। वैसे तो हर प्रकार की जागृति फायदेमंद है, पर मैं कुन्डलिनी से शुरु होने वाली जागृति को सर्वोत्तम कहूँगा।

कुन्डलिनी ऊर्जा का प्रवाह बारी-2 से शरीर के दाएं, बाएं और मध्य भाग में चलता रहता है, नथुनों से बहने वाले श्वास की तरह

योगासन इसलिए किए जाते हैं ताकि कहीं न कहीं कुंडलिनी एनर्जी पकड़ में आ जाए। यह ऊर्जा पूरे शरीर में है। पर यह कभी किसी चक्र पर तो कभी किसी दूसरे चक्र पर ज्यादा प्रभावी होती है। इसलिए पूरे शरीर के जोड़ों के बैंड या मोड़ आदि से यह कहीं न कहीं पकड़ में आ ही जाती है। मुझे इस हफ्ते नया प्रेक्टिकल अनुभव मिला है। ये जो बारी बारी से शरीर के बाएं और दाएं, दोनों किनारों का योगासन किया जाता है, वह बाईं और दाईं मुख्य नाड़ी से ऊर्जा को ऊपर चढ़ाने के लिए किया जाता है। इससे ऊर्जा संतुलित होकर खुद ही बीच वाली नाड़ी में आ जाती है। सीधे ही ऊर्जा को बीच वाली नाड़ी से चढ़ाना कठिन होता है। बाईं नाड़ी को इड़ा, दाईं को पिंगला और बीच वाली नाड़ी को सुषुम्ना कहते हैं। उदाहरण के लिए, जब मैं शलभासन को बाईं भुजा और दायाँ पैर उठाकर करता हूँ, उस समय कुन्डलिनी ऊर्जा इड़ा नाड़ी से ऊपर चढ़कर बाएँ मस्तिष्क को जाती है। वहां से उसे मैं आज्ञा चक्र की ओर तिरछा रीडायरेक्ट करता हूँ। इससे वह नीचे उतरकर और फिर मूलाधार से ऊपर चढ़कर सुषुम्ना में आने की कोशिश करती है। जब उसे दाईं भुजा और बायाँ पैर उठाकर करता हूँ, तब पिंगला से ऊपर चढ़ कर दाएँ मस्तिष्क को जाती है। उसे रीडायरेक्ट करने से लगभग वैसा ही होता है। एक हल्की सी अवेयरनेस आज्ञा चक्र पर भी रखता हूँ। उससे वह ऊर्जा केंद्रीय रेखा में आने की कोशिश करती है। आज्ञा चक्र नाम ही इसलिए पड़ा है क्योंकि यह कुंडलिनी शक्ति को सीधा बीच वाली नाड़ी में चलने की आज्ञा देता है। साथ में, मूलाधार संकुचन पर भी हल्की सी मानसिक नजर रखता हूँ। फिर ऊर्जा को जाने देता हूँ अपनी मर्जी से, वह जहाँ जाना चाहे। मैं देखता हूँ कि वह फिर बड़ी विवेक बुद्धि से खुद ही वहाँ जाती है, जहाँ ऊर्जा की कमी है। वह कमी पूरा होने पर उसके विपरीत भाग में चली जाती है, ताकि ऊर्जा संतुलन बना रहे। फिर बीच वाले चैनल में आ जाती है। वहाँ से वह शरीर के दोनों तरफ के हिस्सों को कवर करने लगती है। ये सभी पीठ व मस्तिष्क के हिस्से होते हैं। वह किसी पाईप में पानी की गश की आवाज की तरह चलती है। इसीलिए नाड़ी नाम भी नदी से ही बना है। शरीर के अगले भाग के हिस्से तब कवर होते हैं, यदि मैं हल्का सा ध्यान तालू को छूती हुई उलटी जीभ पर भी रखूं। तब वह आगे की नाड़ी से नीचे उतरकर नाड़ी लूप में घूमने लगती है।

साँस भरकर रोकने से कुन्डलिनी ऊर्जा पीठ में ऊपर चढ़ती है

योगासन इसीलिए बने हैं, ताकि उनसे नाड़ियों में बहती ऊर्जा का अनुभव होए, तथा उस बहती ऊर्जा से पूरा शरीर सिंचित होकर स्वस्थ रह सके। कर्मयोगी की ऊर्जा तो काम करते हुए खुद भी बहती रहती है, हालाँकि योगा द्वारा बहाव जितनी नहीं। इसकी सख्त जरूरत तो ध्यानयोगी को थी, क्योंकि उन्हें ध्यान लगाने के लिए ज्यादातर समय बैठे रहना पड़ता था। वैसे यह स्पष्ट है कि यदि भौतिक रूप से क्रियाशील रहने वाले लोग भी योगा करे, तो उन्हें भी बहुत लाभ होगा। मैंने इस हफ्ते नई बात नोट की। सांस भर कर रोकने से कुण्डलिनी ऊर्जा अच्छे से पीठ से ऊपर चढ़ रही थी, और वह मस्तिष्क में गशिंग पैदा कर रही थी। यही बात उपरोक्त बैठक में भी बता रहे थे कि साँस भरते हुए सेरेब्रोस्पाइनल फ्लुड रीढ़ की हड्डी में ऊपर चढ़ता है। कई वैज्ञानिक प्रकार के लोग बोलते हैं कि कुंडलनी ऊर्जा इसी के थ्रू जाती है। पर संशय होता है, क्योंकि कुंडलनी ऊर्जा तो एकदम से ऊपर चढ़ती है, पर सीएसएफ धीरे धीरे चलता है। हो सकता है कि जब वह मस्तिष्क में पहुंच जाता हो, तभी ऊर्जा के ऊपर चढ़ने का आभास होता हो। इसीलिए तो कुछ समय तक श्वास या अन्य योग अभ्यास करने के बाद ही ऊर्जा ऊपर चढ़ती महसूस होती है, एकदम से नहीं। इसीलिए  सांस रोककर योग करने को कहते हैं। हालांकि इसके लिए शायद पहले सांस लेते हुए योग करने का काफी लम्बा अभ्यास का अनुभव चाहिए होता है। सांस भरकर रोककर दरअसल  पिछले मणिपुर चक्र में गड्ढा बनने से ऊर्जा के प्रवाह की दिशा पीठ में ऊपर की ओर होती है। फिर थोड़े ध्यान से वह ऊर्जा गति पकड़ती है। सांस लेने व छोड़ते रहने से ऊर्जा अपनी दिशा लगातार बदलती रहती है, इससे ऊर्जा को पर्याप्त वेग नहीं मिल पाता। सांस भरने से वह ऊपर की ओर चढ़ती है, और सांस छोड़ते हुए नीचे की तरफ उतरती है।

बाइकिंग कुन्डलिनी योगा

मैं इस हफ्ते एक दिन साईकिल पर अपने काम गया। मैंने महसूस किया कि साईकिल की सीट का अगला नुकीला हिस्सा सिद्धासन में पैर कि एड़ी का काम करता है। जब मैं फिसल कर आगे को होता था, तब मेरी कुण्डलिनी ऊर्जा लूप में घूमने लगती थी। इसलिए मोटरसाइकिल पर भी सबसे आगे, फ्यूल टैंक से सट कर बैठने को कहा जाता है। यह मूलाधार पर तेज दबाव के कारण मोटरसाइकिल की सवारी को सुखद बनाता है। दरअसल प्राण तो इधर उधर के दृश्य मस्तिष्क में पड़ने से पहले ही सक्रिय था। मेरे सिर पर लगे हेलमेट ने उसे और ज्यादा सक्रिय कर दिया था। सीट के द्वारा मूलाधार पर दबाव पड़ने से अपान भी सक्रिय हो गया। मस्तिष्क या प्राण पर तो पहले से ही ध्यान था। मूलाधार पर संवेदना से अपान पर भी ध्यान चला गया। अपान पीठ से ऊपर चढ़ने लगा, तो प्राण आगे से नीचे उतरने लगा। कुण्डलिनी चक्र पूरा होकर प्राण और अपान का मिलन भी हुआ। इससे संगम हुआ और कुण्डलिनी लाभ मिला। बाइकिंग कुन्डलिनी योगा पर मैंने एक पहले भी पोस्ट लिखी है। बाइसाइकिल खासकर स्पोर्ट्स वाली और हल्की बाईसाईकिल से मूलाधार चक्र बहुत बढ़िया क्रियाशील होता है। बाइकिंग के बाद जो कई दिन तक आनन्द व हल्कापन सा छाया रहता है, वह इसी वजह से होता है। ध्यान रहे कि साइक्लिंग वाले दिन न ज्यादा, और न कम खाएं। योग के लिए भी ऐसा ही कहा जाता है। वास्तव में ज्यादा पेट भरने से साँसें भी ढंग से नहीं चलतीं, और कुन्डलिनी ऊर्जा भी ढंग से नहीं घूमती। कम खाने से कमजोरी आ सकती है। पेट पर बोझ महसूस नहीं होना चाहिए। मैंने तो यहाँ तक देखा है कि संतुलित मात्रा में खाने के बाद यदि आधा रोटी या दो चार चम्मच चावल भी ज्यादा खा लो, तो भी पेट पर बोझ आ जाता है। इसलिए एकबार भोजन से तृप्ति का एहसास होने पर उठ जाना चाहिए। बाइकिंग योगा जैसा लाभ हमेशा लिया जा सकता है, यदि आदमी को मूलाधार नियंत्रित करने में महारत हासिल हो जाए। यदि केवल मूलाधार को ही ऊपर की तरफ संकुचित करेंगे, तो थकान ज्यादा महसूस होती है। यदि आगे से पीछे तक के मूलाधार क्षेत्र को हल्का सा संकुचित करेंगे तो उसमें मूलाधार भी शामिल हो जाता है, स्वाधिष्ठान चक्र भी, और थकान भी कम महसूस होती है। प्रभाव भी ज्यादा पैदा होगा। निचले क्षेत्र के किसी भी भाग का संकुचन हो, तो भी काम कर जाता है। पर ध्यान रहे, कोई खास दिमागी काम करते हुए जैसे ड्राईविंग या मशीनरी ऑपरेट करते समय ध्यान मस्तिष्क पर ही रहना चाहिए। इससे ऐसा होगा कि मस्तिष्क की अतिरिक्त ऊर्जा नीचे चली जाएगी, जिससे फालतू विचारों से निजात मिलेगी और कार्यकुशलता में इजाफा होगा। यदि पूरा ध्यान नीचे जाने दिया, तो कार्यकुशलता में गिरावट आ सकती है। मैं देखता हूँ कि अविभाज्य प्राणों का विभाजन भी कितनी वैज्ञानिकता से किया गया है। यदि मस्तिष्क ज्यादा क्रियाशील हो तो प्राण व अपान के मिलान से प्राण के साथ कुंडलिनी अनाहत चक्र पर पहुंच जाती है। इसीलिए प्राणों का क्षेत्र ऊपर से नीचे अनाहत चक्र तक कहा गया है। यदि नीचे के, मूलाधार के आसपास के क्षेत्र ज्यादा क्रियाशील हों, और मस्तिष्क विचारशून्य सा हो, तो दोनों के मिलान से कुंडलनी नाभि चक्र पर स्वाधिष्ठान चक्र पर अभिव्यक्त होती है। इसीलिए कहा गया है कि अपान का क्षेत्र नीचे से ऊपर की ओर मणिपुर चक्र तक है। वैसे तो वहाँ समान प्राण का अधिकार बताया गया है, पर वह भी अपान का ही एक हिस्सा लगता है, या वहां अपान प्राण से ज्यादा ताकतवर लगता है। समान नाम ही इसलिए पड़ा है क्योंकि वहां प्राण और अपान का लगभग समान योगदान प्रतीत होता है।

मूलाधार पंप कुन्डलिनी योग का सर्वप्रमुख औजार है

मैंने यह भी नोट किया कि सिर्फ मूलाधार पंप से कुन्डलिनी को आगे के और पीछे के चक्रों पर आसानी से घुमा सकते हैं। पहले कुन्डलिनी मस्तिष्क से हृदय चक्र तक उतरती है। जरूरत के अनुसार चलाए गए मूलाधार पंप से काफी देर वहाँ स्थिर रहती है। फिर वहां से नीचे मणिपुर चक्र को उतरती है। वहाँ भी इसी तरह काफी देर स्थिर रहके वह स्वाधिष्ठान चक्र तक नीचे उतरती है। मैंने महसूस किया कि वह वह वहाँ से सीधे ही पीठ से ऊपर चढ़कर मस्तिष्क में गशिंग पैदा करती है। वैसे कहते हैं कि मूलाधार चक्र से कुन्डलिनी वापिस मुड़ती है। वैसे भी मूलाधार पंप से वह लगातार सक्रिय बना ही रहता है। आज्ञा चक्र पर हल्का ध्यान लगाने से वह गशिंग और भी ज्यादा हो जाती है, और केंद्रीय रेखा में भी आ जाती है। मुझे लगता है वह गशिंग रक्तवाहिनियों में दौड़ रहे रक्त की आवाज होती है। रक्त वाहिनियाँ भी नाड़ी या नदी की तरह होती हैं। वहाँ पर अन्य विचार भी होते हैं, हालाँकि मूलाधार पंप से उनकी ताकत पहले ही कुन्डलिनी को लग चुकी होती है। इसलिए वे कमजोर होते हैं। फिर जब फिर से मूलाधार पंप लगाया जाता है, तो वह कुन्डलिनी फिर मूलाधार चक्र तक पहुंच जाती है, और फिर पीठ से ऊपर चढ़ जाती है। काफी तरोताजा महसूस होता है। इस तरह यह क्रम काफी देर तक चलता है। अब और देखता हूँ कि और आगे क्या होता है। हाँ, फिर थोड़ी देर कुन्डलिनी मस्तिष्क में क्रियाशील रही, मतलब वह सहस्रार चक्र पर आ गई। जब सहस्रार चक्र थक गया तब वह आगे से आज्ञा चक्र को उतर गई। लगभग 5-10 मिनट तक कुन्डलिनी एक चक्र पर रही। जब चक्र लगातार सिकुड़न लगा कर थक जा रहा था, तब कुन्डलिनी अगले चक्र पर आ रही थी। मैं रिवोल्विंग और बैक पीछे को एक्सटेंड होने वाली चेयर पर आराम से अर्धसुषुप्त सी पोजिशन में लेटा था। जरूरत के हिसाब से हिल भी रहा था। जब मैं कोई अन्य काम कर रहा होता था, या उठकर चल रहा होता था, तब कुन्डलिनी एक ही चक्र पर ज्यादा देर ठहर रही थी। ऐसा इसलिए क्योंकि चक्र पर लगातार सिकुड़न न होने से वह चक्र थक नहीं रहा था। 5 मिनट बाद आज्ञा चक्र शिथिल हो गया, और कुन्डलिनी विशुद्धि चक्र को उतर गई। इस बार अगले चक्र के साथ पिछले चक्र भी एकसाथ क्रियाशील हो रहे थे, ऐसा लग रहा था कि एक लाइन से जुड़कर दोनों चक्र एक हो गए थे। चक्र पर कुन्डलिनी भी ज्यादा स्पष्ट लग रही थी। एक चक्र से दूसरे चक्र को कुन्डलिनी का गमन ज्यादा स्पष्ट अनुभव हो रहा था। शायद ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कुन्डलिनी के पहले राऊंड से सभी चक्र तरोताजा व अनवरुद्ध हो गए थे। इस बार उल्टी जीभ को तालु से टच करने से कुन्डलिनी विशुद्धि चक्र पर ज्यादा स्पष्ट थी। लगभग 5 मिनट बाद वह अनाहत चक्र को उतर गई। वहाँ वह मूलाधार पम्प के बिना भी बड़ी देर तक स्पष्ट चमक रही थी। चक्र ऐसे तो लगते नहीं मुझे जैसे कोई सीमांकित पहिया हो। मुझे तो सामान्य क्षेत्र के केंद्र का ही भान होता है। जैसे अनाहत चक्र, हृदय के क्षेत्र का लगभग केंद्र। हाँ, कई बार उस क्षेत्र की सिकुड़न से एक बिंदु जैसा जरूर प्रतीत होता है उस क्षेत्र के बिल्कुल केंद्र में, जहाँ सिकुड़न और ऐंठन सबसे ज्यादा और पिनपॉइंटिड सी प्रतीत होती है। शायद इसी बिंदु को चक्र कहते हैं। हालाँकि यह तेज और काफी देर के ध्यान से बनता है। इस पर कुन्डलिनी तेज चमकती है। आमतौर पर तो कुन्डलिनी ध्यान चक्र क्षेत्र में ही होता है, एगजेक्ट चक्र पर नहीं। जैसे रथ के एक हिस्से का पूरा भार उस हिस्से के पहिए पर रहता है, वैसे ही शरीर के एक पूरे चक्र क्षेत्र की ताकत उस क्षेत्र के चक्र में होती है। उसको तन्दरुस्त करके पूरा क्षेत्र तन्दरुस्त हो जाता है। लगभग 5 या 7 मिनट बाद अनाहत चक्र के थकने पर मेरा पेट अंदर को सिकुड़ता है और एक साँस की हल्की गैस्प सी निकलती है। इसके साथ ही कुन्डलिनी मणिपुर या नाभि चक्र पर पहुंच जाती है। वहाँ लगभग 10 मिनट रही। उसके थकने से कुन्डलिनी शक्ति नीचे कहीं उतरती है। उस को थोड़े ध्यान से ढूंढने पर वह स्वाधिष्ठान चक्र पर सैटल हो गई। फिर वह पीठ से सहस्रार को चढ़ने लगी व आगे से उतरकर वहीं पहुंचने लगी। मूलाधार पंप का रोल यहाँ ज्यादा अहम हो गया। गशिंग के साथ वह लगभग 5 मिनट तक सहस्रार व स्वाधिष्ठान चक्र के बीच झूलती रही। फिर वह मूलाधार चक्र पर टिक गई। फिर वह दुबारा सहस्रार में सेटल हो गई। मस्तिष्क में कुन्डलिनी के इलावा अन्य भी हल्के फुल्के विचार रहते हैं। पर कुन्डलिनी ही ज्यादा प्रभावी रहती है, और उनकी शक्ति भी कुन्डलिनी को मिलती रहती है। अन्य चक्रों पर तो केवल कुन्डलिनी ही रहती है। लगभग 5 मिनट सहस्रार में रहकर वह फिर नीचे उतरने लगी। वह इसी क्रम में पहले आज्ञा चक्र को, फिर विशुद्धि चक्र को उतरी। मुझे फिर किसी जरूरी काम से उठना पड़ा। लगभग डेढ़ घण्टे के करीब यह सिलसिला चलता रहा। मैंने यह भी देखा कि जब कुंडलिनी अपने दूसरे और तीसरे दौर में आधार चक्रों में थी, तब एक मामूली सी जननांग सनसनी पैदा हुई थी, जिसमें एक मामूली सा तरल पदार्थ निकलता महसूस हुआ। एकबार मैंने नोट किया कि मस्तिष्क की यादों की झोली से एक आसक्ति से युक्त आदमी का चित्र प्रकट हुआ। वह मूलाधार पंप से भी नीचे नहीं उतर रहा था। कई बार पंप लगाने पड़े। औसत से ज्यादा ऊर्जा खर्च करनी पड़ी। उसके नीचे उतरने से उसकी शक्ति कुन्डलिनी को लग गई और वह चमकने लगी। इसीलिये कहा जाता है कि कुन्डलिनी योग के अभ्यास से पहले काफी समय तक दैनिक जीवन में अनासक्ति व अद्वैत का अभ्यास होना चाहिए। इससे मन के दोष खुद ही खत्म हो जाते हैं। इससे योग करना भी काफी आसान और मनोरंजक हो जाता है। यही बात मैं पिछ्ली पोस्ट में कह रहा था कि सबसे पहले योग प्रशिक्षण लेने के इछुक को मैं शरीरविज्ञान दर्शन पुस्तक पढ़ने की और उसे कुछ सालों तक जीवन में ढालने की सलाह देता हूँ। उससे जब सच्चाई का पता चलता है, तो आदमी खुद ही अपने शौक से कुन्डलिनी योग सीखने लगता है। वह किसी बाध्यता या डर से ऐसा नहीं करता। इससे वह जल्दी और पूरा सीख जाता है। इसलिए कार्य की सफलता में सबसे बड़ा निर्णायक दृष्टिकोण होता है। 90% योग तो इस सकारात्मक दृष्टिकोण से हो जाता है। बाकि का 10% कुंडलिनी योग से पूरा होता है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ, तभी बता रहा हूँ। दरअसल मानवतावादी लाइफस्टाइल व दृष्टिकोण भी नहीं बदलना है। लाइफस्टाइल व दृष्टिकोण तो समसामयिक परिस्थितियों के अनुसार अपनाना ही पड़ता है। केवल यह करना है कि अपनी वर्तमान हालत पर अद्वैत दृष्टिकोण का अतिरिक्त चोला पहनाना है बस। बदलना कुछ नहीं है। आप जैसे हो, बहुत अच्छे हो।

कुन्डलिनी ही बारडो की भयानक अवस्था से बचाती है

आज भी पहले भी वर्णित किए गए एक मित्र द्वारा भेजा गया गीता का श्लोक मेरे दिल को छू गया। मैं उसे यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
प्रयाणकाले मनसाचलेनभक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥८- १०॥वह भक्ति युक्त पुरुष अन्तकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है॥10॥इसका अर्थ मुझे यही लगता है, जो मैंने ऊपर वर्णित किया है। मस्तिष्क के विचारों पर ध्यान के साथ भौंहों के बीचोंबीच स्थित आज्ञाचक पर भी ध्यान लगने दो। इससे प्राण केंद्रीय नाड़ी लूप में चलने लगता है, और मस्तिष्क में फालतू विचारों का स्थान कुन्डलिनी ले लेती है। प्राण के साथ कुंडलिनी भी होती है। केंद्रीय चैनल में, कुंडलिनी हमेशा प्राण के साथ रहती है। क्योंकि केंद्रीय चैनल अद्वैत चैनल है, और कुंडलिनी हमेशा अद्वैत के साथ होती है। कुंडलिनी ही तो परमात्मा तक ले जाती है। मुझे लगता है कि हर कोई परमात्मा तक पहुंच सकता है, पर ज्यादातर लोग मृत्यु के बाद के अंधेरे से घबराकर जल्दी ही नया शरीर धारण कर लेते हैं। हालाँकि अच्छा बुरा शरीर उन्हें अपने कर्मों के अनुसार मिलता है। शरीर के चुनाव में शायद उनकी मर्जी नहीं चलती। पर कुंडलिनी योगी को कुंडलिनी के प्रकाश से सहारा मिलता है। इसलिए वह लंबे समय तक परमात्मा में मिलने के लिए प्रतीक्षा कर सकता है। बुद्धिस्ट लोग भी लगभग ऐसा ही मानते हैं। वे मृत्यु के बाद की डरावनी अवस्था को बारडो कहते हैं।

कुन्डलिनी डीएनए को भी रूपांतरित कर देती है

मुझे लगता है कि कुंडलिनी आदमी का डीएनए भी रूपांतरित कर देती है। कुंडलिनी जागरण से ऐसा ज्यादा होता है। यदि मन के विचारों को नीचे उतारा जाए तो वे नीचे के सभी चक्रों पर कुंडलिनी में रूपांतरित हो जाते हैं। वैसे भी शरीर के हरेक सेल में दिमाग होता है। इन बातों की ओर वैज्ञानिक प्रयोग भी कुछ इशारा करते हैं।

कुंडलिनी इंजिन के ईंधन और ऊर्जा स्पार्क प्लग की चिंगारी की तरह है, जो जागृति-विस्फोट पैदा करते हैं

इन कुंडलिनी-विस्फोट घटकों के लिए ध्यान, शिवबिन्दु, मानवरूप देवमूर्ति, शिवलिंग, ज्योतिर्लिंग, साँस रोकने, मस्तिष्क दबाव, स्वयं शिक्षा, सकारात्मक सोच,अनवरत अभ्यास, निष्कामता, लगन, धैर्य, व व्यवस्थित दृष्टिकोण महत्त्वपूर्ण है।

मित्रो, पिछली पोस्ट में मैं कुंडलिनी जागरण और उसमें अनुभव होने वाले जुड़ाव के बारे में बात कर रहा था। वह जुड़ाव कुंडलिनी से शुरु होना चाहिये। इसका अर्थ है कि आदमी को सर्वप्रथम कुंडलिनी के साथ अपना पूर्ण जुड़ाव महसूस होना चाहिए, पूर्ण आनन्द व अद्वैत के साथ। उस पैदा हुए अद्वैत से तो फिर सभी चीजों के साथ अपना जुड़ाव महसूस होगा। हालाँकि यह जुड़ाव सेकंडरी होगा, प्राथमिक तो कुंडलिनी के साथ ही माना जाएगा। ऐसा होने से ही कुंडलिनी चित्र सर्वाधिक महत्वपूर्ण बन पाएगा, और स्थाई तौर पर क्रियाशील रहेगा। इसका मतलब आप यह समझो कि ऊर्जा साधना/चक्र साधना/नाड़ी साधना आप करते रहो, क्योंकि ये साधनाएं वक्त पड़ने पर कुंडलिनी के काम आएँगी। पर जगाने का प्रयास मानवरूप कुंडलिनी का ही करो। ऊर्जा को कुंडलिनी के पीछे चलना चाहिए, कुंडलिनी को ऊर्जा के पीछे नहीं। इस बारे में मैं अपना अनुभव बताता हूँ। मैं प्रतिदिन कुंडलिनी ध्यान के साथ ऊर्जा साधना करता था। एकदिन अच्छा अवसर मिलते ही मुझे एकदम से अचानक ही कुंडलिनी की बहुत तेज याद आई, और मैं उसमें खोने लगा। तभी मेरी ऊर्जा भी कुंडलिनी का साथ देने के लिए मूलाधार से पीठ से होकर ऊपर चढ़ी और मस्तिष्क में पहुंच गई। मुझे ऐसा लगा क्योंकि मेरा मूलाधार क्षेत्र पूरी तरह से शिथिल हो गया था, हालांकि वह ऊर्जा इतनी तेजी से ऊपर चढ़ी कि उसे महसूस करने का मौका ही नहीं मिला। इसलिए भी मैं ऊर्जा के पीठ से ऊपर चढ़ने का अंदाजा लगा रहा हूँ, क्योंकि मैं लगभग एक महीने से तांत्रिक विधि से कुंडलिनी को पीठ से ऊपर चढ़ाने का अच्छा अभ्यास कर रहा था। इसलिए भी क्योंकि उस समय वहाँ पर महिलाओं का नाच गाना हो रहा था। उससे भी मूलाधार की ऊर्जा उद्दीप्त हुई। यौन माध्यम से उद्दीप्त ऊर्जा पीठ से ही ऊपर चढ़ती है। वह ऊर्जा मस्तिष्क में पहुंच कर कुंडलिनी से जुड़ गई जिससे कुंडलिनी जागरण हो गया। बोलने का मतलब है कि कुंडलिनी तो खुद ही जागृत होने जा रही थी। उसे केवल ऊर्जा की अतिरिक्त आपूर्ति चाहिए थी। यह इसी तरह है जैसे कि गैस इंजन में पहुंच गई थी, बस उसे धमाका करने के लिए स्पार्क प्लग से एक चिंगारी की जरूरत थी। यदि चिंगारी न मिले तो इंजन में शक्ति का धमाका न होए। इसी तरह, यदि मैं ऊर्जा साधना न कर रहा होता तो कुंडलिनी को ऊर्जा न मिलती, और वह बिना जागृत हुए ही मस्तिष्क से नीचे लौट आती। ऐसा कुंडलिनी का ऊपर-नीचे आने-जाने का चक्र सबके अंदर चलता रहता है, बस ऊर्जा की चिंगारी नहीं दे पाते अधिकांश लोग। कइयों के साथ ऐसा होता है कि ऊर्जा की नदी तो मस्तिष्क में पहुंच जाती है, पर वहाँ कुंडलिनी नहीं होती। उससे मन में बहुत स्पष्टता के साथ चित्र कौंधते हैं, पर जागते नहीं। यह ऐसे ही है कि इंजन में गैस नहीं है, पर स्पार्क लगातार मिल रहे हैं। उससे चिंगारी की थोड़ी चमक तो पैदा होएगी, पर धमाके जितनी विशाल चमक नहीं। इसलिए मुख्य लक्ष्य कुंडलिनी को ही बनाओ, पर ऊर्जा साधना भी करते रहो। यह ऐसा है कि आपने कुंडलिनी की इतनी गहरी याद पैदा करनी है कि आप उसमें कुछ पलों के लिए खो जाओ। यही कुंडलिनी जागरण है। ऐसा समझो कि गुरु या देवता की याद इतनी गहरी पैदा करनी है, जितनी गहरी एक प्रणय प्रेम में डूबे हुए एक प्रेमी को अपनी प्रेमिका की खुद ही पैदा हो जाती है। पर गुरु या देवता की गहरी याद आपके अंदर खुद पैदा नहीं होगी, क्योंकि वहां पर यौन आकर्षण नहीं है। इसलिए आपको यौन आकर्षण जैसा मजबूत आकर्षण पैदा करने के लिए तांत्रिक तकनीकों का सहारा लेना पड़ेगा। इसके लिए उपरोक्त ऊर्जा साधनाएं आपके काम आएँगी। फिर आप कहेंगे कि फिर यौन प्रेमी को ही क्यों न कुंडलिनी बना लिया जाए। पर यह श्रेष्ठ तरीका नहीं है। पहली बात, यौन विकार के कारण यौन कुंडलिनी को जगाना असम्भव के समान है। दूसरी बात, कोई नहीं चाहेगा कि अगला जन्म स्त्री का मिले, क्योंकि स्त्री को पुरुष से ज्यादा कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। आदमी जैसा सोचता है, वह अगले जन्म में वैसा ही बन सकता है। यह अलग बात है कि आजकल के वैज्ञानिक युग में स्त्री व पुरुष समान हैं, बल्कि कई जगह तो स्त्री पुरुष से ज्यादा मजे में है। पर ऐसा युग हमेशा नहीं रहेगा। आज के जैसी वैज्ञानिक सुविधाओं का युग तो असीमित काल का मात्र एक नगण्य जैसा अंश प्रतीत होता है। ये सुविधाएं भी हर जगह उपलब्ध नहीं होतीं। ये दृश्य सत्य पर आधारित मेरे अपने अनुभवात्मक विचार हैं, इसमें लैंगिक भेदभाव वाली कोई बात नहीं है, और न होनी चाहिए। ये पर्सनल ब्लॉग है, ख्याति या पैसे के लिए नहीं। वैसे भी, दुनिया में नजर भी आता है और तंत्र सम्प्रदायों में भी यह मान्यता है कि स्त्री केवल पुरुष की सहायता ही कर सकती है कुन्डलिनी जागरण में, स्वयं जागृत नहीं हो सकती। यदि वह यह सहायता करती है, तो अगले जन्म में वह पुरुष बन कर जागृत हो जाती है। वैसे तो तन्त्र सम्प्रदायों में भी बहुत सी महान तांत्रिक महिलाएं हुई हैं, जिन्होनें अपने पुरुष साथी को भी जागृत किया है, और वे खुद भी जागृत हुई हैं। विशेष प्रयास करने वाले अपवाद के मामले तो हर जगह ही मिल जाते हैं। देवी माता का ध्यान तो बहुत से योगी करते ही आए हैं। योगी रामकृष्ण परमहंस माँ काली के उपासक थे। उन्हें ध्यान में काली माता स्पष्ट भौतिक रूप में दिखती थीं। वे उनसे खेलते, बातें करते। पर एक साधारण स्त्री और देवी स्त्री में फर्क है। शायद इसीलिए स्त्री को गुरु बनाए जाने के बारे में शास्त्रों में बहुत कम बताया गया है। वैसे परिवर्तन व विभिन्नता संसार का नियम है। आदमी को जैसे भी उपयुक्त लगे, वैसे ध्यान का अभ्यास करना चाहिए। साथ में कहा था कि संयोगवश या शक्तिपात आदि से जो बिना प्रयासों के जागृति प्राप्त होती है, वह अल्प व अस्थायी होती है। अल्प का मतलब कि उससे पूर्ण संतुष्टि नहीं मिलती। ऐसा मन करता है कि एकबार और जागृति मिल जाए। उससे बना कुण्डलिनी चित्र भी कुछ वर्षों के बाद मिटने लगता है। हालांकि ऐसी जागृति आदमी को पूर्ण जागृति को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है। इससे आदमी योग अभ्यास करने लगता है।

बिंदु शक्ति मूलाधार से सहस्रार की तरफ निर्देशित की जाती है

कुंडलिनी को बिंदु की शक्ति मूलाधार से स्वयं ही मिलती है। यदि किसी को बिंदु नाम से कुंडलिनी का अपमान लगे, तो शिवबिन्दु व ज्योतिर्लिंग या शिवलिंग नाम से ध्यान किया जा सकता है। इससे कुंडलिनी का अपमान भी नहीं होगा, और आदमी को शिव का स्वरूप भी मिलेगा। एकसाथ दो लाभ। एक और बढ़िया तरीका है कि अद्वैत के चिंतन को ही शिवबिंदु का नाम दे दो। इससे जैसे ही कुंडलिनी मन में आएगी, उसे एकदम से बिंदु की शक्ति मिल जाएगी। वैसे भी इस अद्वैतपूर्ण शरीर का मालिक शिव ही है। आदमी तो झूठमूठ का अहंकार करके इसका मालिक बन जाता है। इस तथ्य को शरीरविज्ञान दर्शन पुस्तक में वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया गया है। कुंडलिनी चक्रों पर शिवबिन्दु के ध्यान से सभी 12 चक्र शिव के बारह ज्योतिर्लिंग बन जाते हैं। ज्योतिर्लिंग शब्द में ज्योति का अर्थ कुंडलिनी की चमक से है। यही 12 ज्योतिर्लिंगों का आध्यात्मिक रहस्य है। इसीलिए मूलाधार को संकुचित करते रहने व वहाँ सिद्धासन में पैर की ऐड़ी का दबाव देने को कहते हैं। दरअसल बिंदु शक्ति को ले जाने वाली वज्र नाड़ी स्वाधिष्ठान चक्र व मूलाधार चक्र से होकर पीठ के बीचोंबीच ऊपर चढ़ती है। वह जननांग से शुरु होती है। इसका वर्णन मैंने एक पुरानी पोस्ट में किया है कि कैसे उस कुन्डलिनी नाड़ी को कुंडली लगाए नागिन की तरह दिखाया गया है, और कैसे वह कुन्डली खोलकर खड़ी हो जाती है। दरअसल कुन्डलिनी नागिन के आकार में नहीं है, जैसा कई लोग समझते हैं। यह कुन्डलिनी शक्ति को ले जाने वाली नाड़ी है। कुन्डलिनी नाम इसलिये पड़ा है, क्योंकि वह कुंडली लगाई हुई नागिन के जैसी नाड़ी में कैद रहती है। यह संस्कृत शब्द है। मूलाधार पर दबाव से वह नाड़ी क्रियाशील हो जाती है। इससे जाहिर है कि मूलाधार में जो शक्ति का निवास बताया गया है, वह बिंदु रूप में ही है। उसी बिंदु शक्ति को सहस्रार तक ले जाना होता है जागरण के लिए। वह धीरे धीरे करके रास्ते के सभी चक्रों को जागृत करते हुए भी वहाँ पहुंच सकती है, और सीधी भी। यह अभ्यास के प्रकार पर निर्भर करता है। साधारण अभ्यास से वह धीरे धीरे ऊपर पहुंचती है, पर तांत्रिक अभ्यास से एकदम सीधी सहस्रार में। उस बिंदु शक्ति को केवल आदमी ही ऊपर चढ़ा सकता है, अन्य जीव नहीं। क्योंकि केवल आदमी ही योगाभ्यास कर सकता है। साथ में, विशाल बिंदु शक्ति को झेलने लायक मस्तिष्क केवल आदमी के पास ही है, अन्य जीवों के पास नहीं।

साँस रोकने के बहुत से लाभ हैं

योगा वाली साँसों पर भी पिछली पोस्ट में व्यावहारिक चर्चा कर रहा था। दरअसल जो ड्रैगन को साँसों की आग उगलते हुए दिखाया गया है, वह कुंडलिनी की आग का ही प्रतीक है। उस साँस से जो कुंडलिनी नाड़ी लूप में घूमते हुए चमकती है, उसीको रहस्यात्मक आग के रूप में दर्शाया गया है। आदमी का वास्तविक आकार भी एक ड्रैगन के रूप जैसा ही है। यदि हम रीढ़ की हड्डी और मस्तिष्क को लें, तो एक नाग या ड्रैगन जैसा आकार बनता है। आदमी का असली रूप रीढ़ की हड्डी और मस्तिष्क में ही समाया हुआ है। बाहर के अन्य अंग तो मात्र बाहरी छिलकों की तरह है। इसका वर्णन मैंने एक पुरानी पोस्ट में किया था। यह मैंने कहीं पढ़ा नहीं और न ही इसका प्रमाण है मेरे पास, जो नीचे लिखा है। ऐसा लगता है कि साँस रोकने से रक्त वाहिनियों की दीवारों का लचीलापन बढ़ता है। क्योंकि उनकी मांसपेशियों को मजबूती मिलती है। खुद भी महसूस होता है, जब साँस रोकने से दिमाग की नसों में भारीपन व कड़ापन सा महसूस होता है। पर ऐसा सावधानी से करना चाहिए। बहुत ज्यादा या बहुत देर तक नहीँ। इसीलिए जिन आसनों में पेट अंदर को दबता है, उन्हें साँस बाहर निकालकर रोककर करने को कहते हैं। जैसे कि शीर्षासन, सर्वांगासन, हलासन, नौकासन आदि। जिनमें पेट बाहर को फूलता है, उनमें साँस अंदर भरकर रोकने को कहते हैं। जैसे कि शलभासन, मकरासन, भुजंगासन आदि। वैसे नियंत्रित अवस्था में तो किसी भी आसन में सांस को भरकर या बाहर निकालकर अपनी रुचि के अनुसार रोककर रख सकते हैं। शीर्षासन, सर्वांगासन व हलासन में विशेष ध्यान रखना पड़ता है, क्योंकि उनमें मस्तिष्क में बहुत दबाव पैदा होता है। अगर साँस रोकने से विशेषकर योग के दौरान खून की नसों का लचीलापन बढ़ता है, तो इससे जाहिर है कि इससे स्ट्रोक, व दिल के रोगों से कुछ राहत मिल सकती है। जब तक रिसर्च से प्रूव नहीं होता, तब तक ऐसा विश्वास करके श्वास रोककर योग करते रहने में कोई बुराई नहीं है। वैसे भी यह तो वैज्ञानिक प्रयोगों से स्पष्ट हो चुका है कि साँस रोकने से दिमाग में ऑक्सीजन का स्तर बदलता रहता है। इसका सीधा सा मतलब है कि खून की नसें सिकुड़ती और फैलती रहती हैं। जाहिर है कि उनके सिकुड़ने से ऑक्सीजन का स्तर घटेगा, और फैलने से बढ़ेगा। कुंडलिनी जागरण के समय मस्तिष्क में काफी दबाव महसूस होता है। उस दबाव को सहने के लिए भी इससे दिमाग की नसें तैयार रहती हैं।

सिर का दबाव ऐसा लगता है कि माथे के किनारों वाली दिमाग की नसें फूली हुई हैं। ऐसे आसन जिसमें सिर शरीर से नीचे हो, उनमें ऐसा ज्यादा लगता है। अभी हाल ही में मेरे एक रिश्तेदार लड़के की ब्रेन हेमरेज से मृत्यु हुई। वह सिर्फ 30 साल का था। अंतर्मुखी, लाडला, परिवार पर ज्यादा ही निर्भर और परिवार के इलावा दूसरों से कम घुलने-मिलने वाला था। कुछ दिनों से उसके सिर में हल्का सा दर्द रह रहा था, और खून की उल्टी के साथ बेहोशी से आधा घण्टे पहले वह सिर की नसों को छूकर बता रहा था कि उसे लग रहा था कि उसकी दिमाग की नसें फूल रही थीं। उसकी माँ को तो हाथ से छूने पर वैसा कुछ नहीं लगा। इसलिए उसे सोकर आराम करने को कहा। आईसीयू में डॉक्टरों ने उसके बचने के सिर्फ 5% चांस बताए। उसका मस्तिष्क बहते और जमे खून के दबाव से पत्थर की तरह सख्त हो गया था। वह सिर्फ डेढ़ दिन ही आईसीयू में जिंदा रह सका। उसे 5 दिन पहले कोरोना वैक्सीन, एस्ट्रोजेनिका आधारित कोविशील्ड भी लगा था। डॉक्टरों ने कहा कि उसे ज्यादा ही इम्मयूनिटी पैदा हो गई थी। इससे डरने की जरूरत नहीं। इससे डरकर वैक्सीन लगाना बन्द नहीं करना चाहिए, जब तक कोई बेहतर वैक्सीन नहीं आ जाती। इससे बहुत सी जानें बची हैं। इसकी तुलना में तो साईड इफेक्ट नगण्य ही हैं। हाँ, सावधान रहकर हर स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। अगर साइड इफेक्ट लगे, तो डॉक्टर से सम्पर्क में रहना चाहिए। ऐसे जीवनघातक दुष्प्रभाव की संभावना लाखों में केवल 1-2 को ही होती है। अब तो यह भी सामने आया है कि यदि गलती से इंजेक्शन माँस की बजाय खून की नस में लगे, तो भी खून में क्लॉट बन सकते हैं। मैं यह इसलिए बता रहा हूँ कि अगर योग, व्यायाम आदि से उसके दिमाग की नसों में ज्यादा फुलाव को झेलने की शक्ति होती, तो शायद रक्तस्राव न होता या कम रक्तस्राव होता, या एमरजेंसी ट्रीटमेंट से जान बच जाती।

बिंदु का अर्थ एक सुई की नोक जितना स्थान भी होता है

इसे अंग्रेजी में पॉइंट कहते हैं। यह पैन को एक स्थान पर रखकर उसकी स्याही का निशान लगाने से बनता है। पिछली पोस्ट में मैंने बताया था कि बिंदु का अर्थ बूँद होता है। पर इसका दूसरा अर्थ पॉइंट भी होता है। कुंडलिनी भी वास्तव में असीमित क्षेत्र के मन का एक सूक्ष्म स्थान होता है। यदि कागज के एक पृष्ठ या पूरी पुस्तक पर लिखे लेख को मन मान लिया जाए, तो कुंडलिनी सिर्फ एक पॉइंट जितने स्थान में आ जाएगी। एक पॉइंट से पूरे लेख के बारे में जानकारी मिल जाती है कि कौन सा पैन इस्तेमाल हुआ है, और कौन सी स्याही। यहाँ तक भी पता चल सकता है कि लेखक का हस्तलेख कैसा है। इसी तरह एक कुंडलिनी से पूरे मन के स्वभाव का अनुमान लग जाता है। जैसे एक बिंदु के पूर्ण ज्ञान से पूरा लेख नियंत्रित किया जा सकता है, इसी तरह एक कुंडलिनी के संपूर्ण ज्ञान से पूरा मन नियंत्रित हो जाता है। मैं यह उपमा दोनों के बीच में बाहरी सादृश्यता को देखकर दे रहा हूँ, भीतरी को नहीं।

योग सीखने की चीज नहीं, अभ्यास की चीज है

मुझे कई लोग बोलते हैं कि मुझे योग सिखा दो। जिसे 20 सालों को करते हुए मैं थोड़ा सा सीखा हूँ, उसे किसीको एकदम से कैसे सिखा सकता हूँ। योग वास्तव में कोई एक विशेष क्षेत्र की विद्या नहीं है, जिसे एकदम से सिखाया जा सके। यह एक विचारधारा है, एक जीवन दर्शन है, एक लाइफस्टाइल है। यह मन की एक अद्वैतमयी सोच है। इसे आप सकारात्मक सोच भी कह सकते हैं। उस सोच को बना कर रखने और बढ़ाने के लिए आप जो मर्जी तरीका चुन सकते हैं। बहुत से तरीकों का भी एकसाथ इस्तेमाल कर सकते हैं। इसलिए पहले सोच पैदा करना जरूरी है। जिसके अंदर सोच ही नहीं है, वह उसे बना के क्या रखेगा, और उसे बढ़ाएगा क्या। सोच तो आदमी के अपने वश में है। इसीलिए प्रकृति ने आदमी को फ्री विल उन्मुक्त चिंतन शक्ति दी है। योग कोई सोच जबरदस्ती नहीं पैदा कर सकता। योग का सहारा उस सोच को बढ़ाने के लिए लिया जा सकता है। जिसके अंदर यह सोच है, उसे कुछ सिखाने की जरूरत ही नहीं। सोच अपना रास्ता खुद ढूंढती है। उन्हें सोच बनाने के लिए मैं शरीरविज्ञान दर्शन पुस्तक पढ़ने को कहता हूँ। उसके बाद उनकी तरफ से कोई संदेश ही नहीं आता। यदि संदेश आता, तो मैं उन्हें कहता कि अब इस सोच को पक्का करने के लिए कुछ सालों तक इस सोच के साथ कर्मयोग के रास्ते पर चलो। सोच को आप कुंडलिनी भी मान सकते हो, क्योंकि दोनों ही मन के विचार हैं। फिर जब कुछ वर्षों के बाद उनका संदेश आता तो मैं उन्हें कुंडलिनी योग के बारे में बताता, व उसके बारे में व्यावहारिक पुस्तकें सुझाता, बेशक वे मेरी लिखी हुई ही हों। यही असली तरीका है योग सीखने का। मैं भी ऐसे ही सीखा हूँ। यदि कोई व्यायाम की तरह का शारीरिक योग ही सीखना चाहे, तो उसके लिए आज बहुत से साधन हर जगह उपलब्ध हैं, ऑनलाइन भी और ऑफलाइन भी। असली योग सीखने में समय लगता है, पूरी उम्र भी लग सकती है। 

आर्यसभ्यता की देवमूर्ति परम्परा से कुन्डलिनी साधना

आर्यन सभ्यता की रीति रिवाजों को देखकर उस समय की महान आध्यात्मिक वैज्ञानिकता वाली सोच का पता चलता है। शिव, गणेश आदि देवता बिल्कुल स्थाई व अजर अमर बना दिए गए थे। मूर्ति कला अपने चरम पर थी। इतनी जीवंत व आकर्षक मूर्तियां बनती थीं, जिनके आगे असली आदमी लज्जित हो जाते थे। असली आदमी, गुरु या प्रेमी से अधिक आसान तो देव मूर्तियों पर ध्यान लगाना होता था। उदाहरण के लिए यदि किसी के मन में शिव मूर्ति का रूप जागृत हो जाए, तो वह कभी नहीं भूल सकता था। वह इसलिए क्योंकि वह मूर्ति विशेष सहेज कर मन्दिर में हमेशा के लिए रखी जाती थी। वैसे भी देश के हरेक स्थान पर शिव मंदिर होने से शिव रूपी कुंडलिनी का कभी विस्मरण नहीं होता था। असली आदमी का तो सीमित जीवन होता है, पर ये देवमूर्तियाँ तो धर्म परंपरा से जुड़कर शाश्वत हो गई हैं। असली आदमी का तो वियोग भी हो सकता है। फिर ध्यान कैसे लगाए। देवमूर्तियां तो हर जगह और हर समय विद्यमान हैं। इसीलिए इनको बहुत सुंदर बनाया जाता था। स्वर्णमूर्ति सर्वश्रेष्ठ मानी जाती थी। क्योंकि वह सबसे आकर्षक, चमकदार और दीर्घजीवी होती थी। मैंने कई इतनी सुंदर मूर्तियां इतने जीवंत और सुंदर रूप में देखी हैं, कि आजतक मेरे मन में जीवंत हो जाती हैं। सोचो, जब एक बार देखने पर ही वे मन पर इतनी गहरी छाप छोड़ सकती हैं, तो बार बार उनका ध्यान करने से वे क्यों मन में जागृत नहीं होएंगी। यदि न भी जागृत होए, तो भी वे आदमी को अनासक्ति व अद्वैत के साथ जीना सिखाती हैं। वे हर हाल में फायदा ही करती हैं। वैसे  भी देव मूर्ति तभी अस्तित्व में आई जब किसीने सबसे पहले उसको मन में जागृत किया और उसे दुनिया के सामने रखा।

कुंडलिनी वाला भला केवल मानसिक कुन्डलिनी ही कर सकती है, कोई स्थूल भौतिक रूप नहीं

आदमी का भला करना तो कुंडलिनी का स्वभाव है, चाहे वह पत्थर के रूप वाली ही क्यों न हो। इसीलिए यह कहावत बनी है कि मानो तो पत्थर में भी भगवान मिल जाते हैं। पर इसका श्रेय कुंडलिनी को न दिया जाकर देवता को दिया जाने लगा। इससे लोगों के मन में देवताओं के प्रति विश्वास बढ़ता गया, जो आज तक है। हालांकि वैज्ञानिक तौर पर मानव भलाई के सारे काम कुंडलिनी कर रही थी। देवताओं को श्रेय दिया जाना उचित भी है, क्योंकि वे वैसे भी भौतिक रूप से भी लोगों का भला करते रहते हैं। जैसे सूर्यदेव रौशनी देते हैं, और जलदेव पानी। हालांकि कुंडलिनी वाला भला तो कुंडलिनी ही कर रही है, देवता नहीं। दोनों प्रकार की भलाई को अपने अपने असली रूप में देखना चाहिए, इकट्ठे जोड़कर नहीं, तभी कुंडलिनी के बारे में भ्रम दूर होगा। इसी तरह, एक आदमी का भला प्रेमी के रूप से बनी उसके मन की कुंडलिनी करती है, उसका प्रेमी नहीं। अगर प्रेमी ही भला कर रहा होता, तो शादी के बाद परस्पर आकर्षण खत्म या कम न होकर बढ़ता। पर होता उल्टा है। दरअसल शादी के बाद जब प्रेमी का भौतिक रूप हर वक्त उपलब्ध हो जाता है, तब मन में उसके रूप की बनी हुई कुंडलिनी मिटने लगती है। इससे कुंडलिनी वाले लाभ खत्म हो जाते हैं। पर आदमी दोष देता है प्रेमी को। प्रेमी तो जैसा पहले था, वैसा ही होता है। इसीलिए भगवान कृष्ण कहते हैं कि राधा उनकी सबसे प्रिय है। राधा से विवाह नहीं, सिर्फ उनका प्रेम ही होता है। बात स्पष्ट है कि कृष्ण के मन में राधा के रूप से बनी शाश्वत कुंडलिनी के कारण ही कृष्ण को राधा सबसे प्रिय है। यदि दोनों का विवाह हो जाता, तो शायद वैसा न होता। क्योंकि भौतिक रूप से तो उनकी पत्नी रुक्मिणी सबसे सुंदर हैं। दरअसल असली और सच्चा प्यार सिर्फ और सिर्फ कुंडलिनी से ही होता है, किसी भौतिक वस्तु से नहीं। “किसीकी याद के सहारे जीना” भी इसी कुंडलिनी के द्वारा किए जाने वाले भले का उदाहरण है। भला सुखी जीवन से बड़ा भला और क्या हो सकता है। शिव का दूसरा रूप पर्वत भी है, जो मैंने एक कविता पोस्ट में सिद्ध किया है। पर्वत आदमी का बहुत भला करते हैं। ये पानी, हवा, ठंडक, फल आदि देते हैं। इसलिए लोगों का देवताओं पर आसानी से ध्यान जम जाता है। इसीलिए ज्यादातर मामलों में देवताओं को ध्यान कुंडलिनी बनाया जाता था। इससे संसार में मानवता भी पनपी रहती थी। वैसे भी कुंडलिनी ही भगवान तक ले जाती है। भगवान तक पहुंचने के लिए सीधी उड़ान सेवा नहीं दिखाई देती। लगता यह अजीब है, पर यह सत्य है। यह मूर्ति विज्ञान है, जिसे जो नहीं समझेगा, वह तो दुष्प्रचार करेगा ही।

कुन्डलिनी या ध्यान-बिंदु के लिए विज्ञानवादी सोच, गहन अन्वेषण, अभ्यास, धैर्य, प्रेमपूर्ण संपर्कों, अध्ययन-चर्चाओं, और गुरु-देवताओं-महापुरुषों-अवतारों औरमन में बने उनके मानसिक चित्रों की आवश्यकता

दोस्तों, मैंने पिछली पोस्ट में कहा था कि साँसें कैसे लेनी चाहिए। इसीको थोड़ा और जारी रखते हैं। मुझे लगातार समर्पित योग करते हुए लगभग चार साल हो गए हैं। उससे पहले भी मैं लगभग 15 सालों से हल्का फुल्का योग प्रतिदिन करता आ रहा हूँ। अब जाकर मुझे लगता है कि मैं साँस लेना सीखा हूँ। वैसे अभी भी सीख ही रहा हूँ। सीखना कभी खत्म नहीं होता। कहना तो आसान है कि सांस लेने को ही योग कहते हैं। पर इसमें लम्बे अभ्यास की आवश्यकता होती है। अब समझा हूँ कि साँस भरने के बाद सांस को कुछ देर रोकने के लिए क्यों कहते हैं। पहले तो मैं इसे फिजूल का काम समझता था। दरअसल जब साँस भरने से प्राण और अपान का आपस में टकराव हो रहा होता है, तो उस टकराव को चरम तक पहुंचने के लिए थोड़ा सा वक़्त लगता है। उस समय साथ में टकराव का चिंतन भी होता रहे, तो और ज्यादा लाभ मिलता है। उससे कुंडलिनी ऊर्जा शक्तिशाली झटके के साथ ऊपर को चढ़कर आगे से नीचे उतरकर एनर्जी लूप में घूमने लगती है। वह एकदम से तरोताजा कर देती है। इसी तरह, साँस को धीरे-धीरे और लंबे समय तक अंदर भरें, ताकि प्राण और अपान अच्छे से आपस में मिल जाए। सांस को भी धीरे धीरे करके बाहर छोड़े, क्योंकि कुंडलिनी ऊर्जा को नीचे उतरते हुए समय लगता है। कुन्डलिनी भौतिक नाड़ियों में भौतिक द्रव्यों के साथ ही तो चलती है। इसलिए नाड़ियों के प्रवाह को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचने के लिए समय तो लगेगा ही। इसी तरह साँस पूरा छोड़ने के बाद जितनी देर सम्भव हो, उतनी देर सांस को रोककर रखें। इससे कुंडलिनी पूरा नीचे उतरकर स्वाधिष्ठान चक्र पर जमा हो जाती है, और जैसे ही मूलाधार को संकुचित करते हैं, वह मूलाधार को उतरकर पीठ से सहस्रार को चढ़ जाती है। वहाँ से वह साँस भरते समय प्राण के साथ लगभग हृदय चक्र तक नीचे उतरती है। वहां वह नीचे से आ रहे अपान से टकराकर तेज चमकने लगती है। फिर जब सांस छोड़ते समय छाती व पेट नीचे को उतरते हैं, तो वह भी नीचे उतरकर स्वाधिष्ठान चक्र पर पहुंच जाती है। फिर से वही पिछली प्रक्रिया रिपीट होती है। इस तरह से एक ऑटोमेटिक मशीन की तरह यह कुंडलिनी चक्र चलता रहता है, और आदमी आनन्द में मग्न रहता है। उलटी जीभ को नरम तालु से टच करके रखने से प्रवाह ज्यादा अच्छा हो जाता है। पेट व छाती को ऊपर नीचे जाते देखते हुए ध्यान करने में अतिरिक्त सहायता मिलती है। कई लोग तो कुन्डलिनी को नाभि और मूलाधार के बीच में ही घुमाते रहते हैं। कई बार ऐसी परिस्थितियां या शरीर के ऐसे पोस्चर होते हैं, जिसमें पेट से न चलकर साँस छाती से चलती है। उस समय साँस भरने पर छाती फूलती है, जो कुंडलिनी मिश्रित अपान को नीचे से ऊपर खींचती है। अंदर जाती हुई साँस के साथ कुंडलिनी मिश्रित प्राण ऊपर से नीचे छाती तक उतर जाता है। छाती में दोनों के टकराव से वहाँ कुंडलिनी ज्यादा स्पष्ट हो जाती है, और साथ में थकान से पैदा तनाव भी दूर हो जाता है। इसी तरह, कई बार अंदर जाती साँस से छाती और पेट दोनों एकसाथ आगे को फूलते हैं। इससे भी कुंडलिनी ऊर्जा पर अच्छा खिंचाव बनता है।

कुंडलिनी सुषुम्ना से ही ऊपर चढ़ती है, यद्यपि अन्य नाड़ियाँ भी इसमें सहयोग करती हैं

जब मेरी पीठ से कुंडलिनी ऊर्जा ऊपर चढ़ती है, तो मैं उसे रोकता नहीं, बेशक वह किसी भी नाड़ी पर या स्थान पर हो। दरअसल पीठ की केंद्रीय रेखा ही सुषुम्ना नाड़ी है। यह पीठ की अन्य दोनों मुख्य किनारे की रेखाओं या नाड़ियों से भी जुड़ी होती है। और भी कोई भी नाड़ी रेखा या बिंदु हो, सबसे जुड़ी होती है। वास्तव में सभी नाड़ियाँ आपस में नाड़ी जालों से जुड़ी होती हैं। तभी तो जब मुझे पीठ में कहीं भी कुंडलिनी ऊर्जा का आभास होता है, तो मैं उस अनुभव को रोकता नहीं हूँ। केवल इसके साथ अगले आज्ञा चक्र पर औऱ मूलाधार संकुचन पर तिरछी नजर बना कर रखता हूँ। ऐसा करने से धीरे से कुंडलिनी फिसलकर सुषुम्ना में आ जाती है, और ऊपर सहस्रार तक जाकर वहाँ से नीचे जाती है और फिर लूप में घूमने लग जाती है। बस ऐसा ध्यान बना रहना चाहिए। कई बार क्या होता है कि यदि कुंडलिनी ऊर्जा पीठ या सिर में बाईं तरफ हो, तो उपरोक्त ध्यान करने से वह पहले दाईं तरफ जाती है, फिर संतुलित होकर बीच वाली सुषुम्ना में फिट हो जाती है। हालांकि ऐसा थोड़े समय ही रहता है, क्योंकि ऊर्जा का वेग जल्दी से घटता रहता है। इसको कुण्डलिनी जागरण समझ कर भ्रमित नहीँ होना चाहिए। यह तो साधारण सी ऊर्जा की गति है, हालाँकि जागरण में भी ऐसा ही घटनाक्रम होता है, पर वह चरम पर होता है। ऐसी ऊर्जा की गति सभी में चली रहती है। पर सब इसे नहीं पहचानते, और न ही इस पर ध्यान देते हैं। इसी से तो आदमी जिंदा रहता है। सम्भवतः प्राणविद्या भी इसी प्राण के प्रवाह से मृत जीव को जिंदा कर सकती है। मैंने एक पुराने दोस्त से सुना था कि उसने इलाहाबाद के कुम्भ मेले में एक तन्त्रयोगी को एक मृत पक्षी को प्राणविद्या से जिंदा करते देखा था। इसके सच झूठ का तो पता नहीं पर हिंदु पुराणों में इससे संबंधित बहुत सी कथाएं हैं। संजीवनी विद्या भी शायद यही प्राण विद्या रही होगी, जिससे राक्षसगुरु शुक्राचार्य देवताओं से लड़े युद्ध में मरे राक्षसों को जिंदा किया करते थे। ऐसी रूपक कथाओं के आधार में कोई न कोई वैज्ञानिक तथ्य जरूर होता है। ये लोगों को योग की तरफ आकर्षित करने के लिए बनाई होती हैं। पर कई लोग इसका उल्टा मतलब लेकर विज्ञान और योग को नकारने लग जाते हैं। ऐसे ही जम्हाई लेना भी ऐसा ही ऊर्जा का प्रवाह है। तभी उससे थकान दूर होती है। आदमी कैसे हाथ ऊपर उठाकर, पीठ व गर्दन को सीधा करके, नाभि की सीध में गड्ढा बनाकर, मुँह खोलकर, आंखें भींचकर, आज्ञाचक को सिकोड़कर कुंडलिनी ऊर्जा को पीठ में ऊपर चढ़कर मस्तिष्क तक पहुंचने में मदद करता है। यही फर्क है कि योगी इसकी गहराई में जाता है कि यह क्या है, कैसे हुआ, क्यों हुआ और इससे कैसे अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। न्यूटन से पहले भी बहुत से लोगों ने पेड़ से सेब गिरते देखा था, पर उसकी गहराई में न्यूटन ही गया। आम आदमी इसे साधारण समझ कर छोड़ देता है। योगी भी एक वैज्ञानिक होता है, खासकर मनोवैज्ञानिक। जम्हाई तरोताजा करने वाला कुदरत का नायाब तोहफा है।

संगम के समय संगम के साथ संगम करने वाले दोनों घटकों पर ध्यान देने की आवश्यकता

पिछली पोस्ट में मैं संध्या आदि संगम कालों और स्थानों के बारे में बात कर रहा था। उन पर ऐसे ही ध्यान देना पड़ता है जैसे प्राण और अपान के टकराव पर, तभी लाभ मिलता है। ऐसे तो मुर्गा संध्या से पहले ही उठ जाता है, उसे संध्या का लाभ क्यों नहीं मिलता। क्योंकि उसकी संध्या में श्रद्धा नहीं है। आदमी यदि तकनीकी पहलू को न समझे, तो कम से कम श्रद्धा तो होनी ही चाहिए। दरअसल संध्या के मध्यम प्रकाश पर ध्यान की स्थिति में दिन की पूरी चमक और रात के पूरे अंधेरे पर भी ध्यान जाता रहना चाहिए, तभी संध्या में दिन और रात की आपस में टक्कर होगी, और आपस में मिश्रित होकर कुंडलिनी की चमक के साथ आंनद पैदा करेंगे। इसी तरह इलाहाबाद के संगम के पानी में बहुत से मेंढ़क और मछलियां रहती हैं, उनकी तो मुक्ति नहीं होती। वहाँ भी ऐसे ही होता है। यह हरेक संगम के बारे में तो है ही, साथ में हरेक धार्मिक रीत के बारे में भी है। इससे पता चलता है कि धर्म के वैज्ञानिक तकनीकी पहलू का ज्ञान कितना जरूरी है। यही ज्ञान ढूंढना इस वेबसाइट का काम है।

योग को खुद योग ही बेहतर सिखाता है

योग-आसनों के बारे में मुझे इस हफ्ते कुछ नए व्यावहारिक अनुभव मिले। मिले तो पहले भी थे, पर इतने स्पष्ट नहीं थे। पहले मैं जल्दी-जल्दी और उथले साँस लेता था। इस बार प्राणायाम की तरह गहरे और धीरे लिए। एकप्रकार से प्राणायाम भी आसनों के साथ होने लगा। एकसाथ दो लाभ। पहले मैं एक पोज़ में 20–30 बार छोटी, जल्दी और उथली साँसें लेता था। पर अब सिर्फ 2-3 बार ही ले पाया। इतना ज्यादा फर्क था। समय के साथ योग खुद अपने आप को सिखाता है। इसलिए जैसे ठीक लगे, वैसे करते रहना चाहिए। हालाँकि मैंने कहीं ब्लॉग में पढ़ा था कि योग गुरु अय्यंगर योग आसनों के साथ ही प्राणायाम भी सिखाते थे। अब पूरी सच्चाई का पता चला। फिर भी सावधान रहना पड़ता है। अपनी सुखपूर्वक सामर्थ्य को नहीं लांघना चाहिए। मेरा ज्यादातर समय योग अभ्यास में ही बीत जाता है। मेरे लिए यह जरूरी भी है। मैं इसके बिना स्वस्थ नहीं रह सकता। मुझे एनकाइलॉजिंग स्पॉन्डिलाइटिस, एक ऑटोइम्यून डिसीज है। इसमें आदमी हमेशा हरकत में रहना चाहिए। शरीर के जोड़ों खासकर छाती और पीठ के जोड़ों को जाम होने से बचाने के लिए व थकान पर काबू पाने के लिए नियमित व्यायाम होता रहना चाहिए। अवसाद, व अन्य मानसिक दोषों से बचाव के लिए कुंडलिनी ध्यान, प्राणायाम से लाभ मिलता है। यही इसका मुख्य उपचार है। इसीके बहाने मैं थोड़ा बहुत योग सीख पाया। मन को मनाने के लिए कोई बहाना अच्छा रहता है।

कुन्डलिनी, कर्मयोग और विज्ञान आपसी अंतरंग रिश्ते से जुड़े हैं

लोग अक्सर बोलते हैं कि अध्यात्म विज्ञान का विषय नहीं है। मैं कहता हूँ कि बिल्कुल है। कुंडलिनी जागरण तक तो बहुत ज्यादा है, पर उसके बाद भी काफी है। कुन्डलिनी जागरण के बाद व्यक्तिगत विज्ञान की जगह सार्वभौमिक या ब्रह्मांडीय विज्ञान ले लेता है। इससे उसे अनायास ही अनुकूल परिस्थितियां मिलने लगती हैं, और खुद ही उसका भला होने लगता है। ऐसा कुन्डलिनी की ईश्वरीय शक्ति के कारण होता है। हालाँकि इसकी भी अपनी सीमाएं और बाध्यताएं हैं।  इससे व्यक्तिगत विज्ञान का बोझ थोड़ा हल्का हो जाता है। कुन्डलिनी को प्राप्त करने के लिए और उसे क्रियाशील रखने के लिए कर्मयोग की जरूरत पड़ती है। कर्मयोग उतना ही अच्छा होगा, जितनी अधिक काम की गुणवत्ता व विशेषता होगी। विज्ञान ही कर्मों को गुणवत्ता, विशेषता व उच्चता प्रदान करता है। इसलिए अध्यात्म और विज्ञान साथ-साथ ठीक चलते हैं। मैं खुद विज्ञान का एक सनकी खिलाड़ी हुआ करता था। जहाँ कोई विज्ञान की कल्पना नहीं करता था, मैं वहाँ भी विज्ञान को फिट कर लेता था। मेरे अध्यापक मुझे मजाक में कहते कि दोस्त तू तो हर जगह विज्ञान लड़ा देता है। क्योंकि विज्ञान कुंडलिनी के लिए जरूरी है, इसीलिए विज्ञानपरक खासकर पाश्चात्य प्रकार वाली सभ्यता के लोग कुंडलिनी जिज्ञासु होते हैं। पर उनमें से अधिकांश लोग स्वास्थ्य संबंधी बाहरी योग के विज्ञान को ही समझते हैं। वे ध्यान के विज्ञान को कम समझते हैं। वे जितना दिमाग और एनर्जी बाहरी विज्ञान पर लगाते हैं, उसका थोड़ा भी हिस्सा अगर भीतरी विज्ञान पर लगाएं, तो सारे महान कुंडलिनी योगी बन जाएं। पर अब मनोविज्ञान के रूप में धीरे धीरे कुंडलिनी विज्ञान को समझ रहे हैं। इसीलिए तो ध्यान का कोई संतुष्टिजनक अनुवाद अंग्रेजी में नहीं मिलता। मेडिटेशन या कंसन्ट्रेशन शब्द से काम चलाना पड़ता है। दरअसल मेडिटेशन ध्यान को सुगम बनाने वाली पद्धति है, असली ध्यान नहीं। इसी तरह, कंसन्ट्रेशन का मतलब भौतिक वस्तुओं पर और थोड़े समय तक मन को केंद्रित करना है, एकमात्र मानसिक कुंडलिनी पर नहीँ, और बहुत लंबे समय या पूरे जीवन भर एक ही मानसिक चित्र पर नहीं। इसलिए ध्यान शब्द को अंग्रेजी के शब्दभंडार में शामिल किया जाना चाहिए। संस्कृत का केवल एक ध्यान शब्द ही सारे योग को समेटे हुए है। यह है, तो योग है। यदि यह नहीं है, तो योग नहीँ है। योग की बाकी चीजें तो केवल ध्यान की सहायक भर ही हैं। ध्यान और कुंडलिनी को पर्यायवाची शब्द मान सकते हैं। प्रथम विश्व योगदिवस के आसपास एक ब्लॉग में पढ़ रहा था जिसमें एक भौतिकवादी सज्जन बड़े गर्व से कह रहे थे कि आजकल के भौतिकवादी लोग, खासकर पाश्चात्य प्रकार वाली सभ्यता के लोग योग के बाहरी अंगों तक ही सीमित रहेंगे। वे ध्यान की गहराई तक नहीं जाएंगे। तो अब मैं सोचता हूँ कि फिर उनका कुंडलिनी जागरण कैसे होगा। ध्यान के बिना हो ही नहीँ सकता। बीच-2 में तो विरले लोगों को कुदरती संयोग से खुद भी ध्यान लग जाता है। पर बड़े पैमाने पर जागृति प्राप्त करने के लिए कृत्रिम रूप से ध्यान लगाना ही पड़ेगा। कुआं प्यासे के पास नहीँ जाता, प्यासे को कुएँ के पास जाना पड़ता है। यदि प्यासा आदमी कुएँ के पास न जाए, तो आदमी की जान को ही खतरा है, कुएँ को कुछ नहीं होगा। इसी तरह यदि लोग ध्यान को न अपनाए, तो लोगों का नुकसान है, ध्यान का नहीँ। इसलिए लाइफस्टाइल ही ध्यान वाला बनाना पड़ेगा। प्राचीन वैदिक परम्परा में ऐसा लाइफस्टाइल था। लगता तो ऐसा जीवन चरित्र अजीब है, पर सत्य भी यही है। सत्य को नकारा नहीँ जा सकता। 

कुन्डलिनी को बिंदु मानने से उसका ध्यान आसान हो जाता है

पिछली पोस्ट में मैंने बिंदु को कुंडलिनी रूप बताया था। कुंडलिनी का ध्यान बिंदु के रूप में इसलिए किया जाता है ताकि मूलाधार क्षेत्र में स्थित बिंदु की शक्ति कुंडलिनी को मिलती रहे। इससे महसूस होता है कि कुंडलिनी मूलाधार क्षेत्र पर स्थित मुख्य बिंदु स्थान से किसी नाड़ी के माध्यम से जुड़ गई है, बेशक कुंडलिनी कहीं पर भी क्यों न हो। ऐसा लगता है कि बिंदु ऊर्जा ऊपर चढ़ती हुई कुन्डलिनी को पुष्ट कर रही है। इसे ही आसुत यौन ऊर्जा भी कहते हैं। इससे यौनलिप्सा शांत हो जाती है, क्योंकि उसकी ऊर्जा को कुंडलिनी ने सोख लिया होता है। वैसे तो बिंदु की शक्ति पूरे मस्तिष्क को मिलती है, पर कुंडलिनी का ही ध्यान बिंदु के रूप में इसलिए किया जाता है, ताकि कुंडलिनी चित्र सबसे अधिक प्रभावी बना रहे, और दूसरे विचार इसके आगे दबे रहें। बिंदु एक द्रव पदार्थ है, इसलिए इसका प्रवाह अच्छा होता है। यह कुन्डलिनी के प्रवाह को भी बढ़ा देता है। साथ में मैं बता रहा था कि यदि कुंडलिनी का सही अर्थ समझ में आ गया, तो योग का आधे से अधिक सफर तय हो जाता है। जिस किसी बिरले खुशकिस्मत आदमी को अच्छे प्रेम संपर्क मिलते हैं, उसके मन में खुद ही कुंडलिनी चित्र बन जाता है। वह बेशक दुनियादारी में लाभ दिलाए और मन का चैन दे, पर उसे जगाना बहुत मुश्किल होता है। कई बार यौन प्रेमी के मजबूत चित्र के संयोग और वियोग से सीधा आत्मज्ञान भी मिल सकता है, बिना कुंडलिनी जागरण के। पर ऐसा बहुत ही विरले मामले में होता है। जगाने के लिए तो किसी पसंदीदा व काल्पनिक देवता, पुराने और ब्रह्मलीन गुरु आदि के मानसिक रूप के चित्र को कुंडलिनी बनाकर उसका नियमित ध्यान करना पड़ता है। यह आसान होता है, क्योंकि उनका प्रत्यक्ष भौतिक रूप विद्यमान नहीं होता, इसलिए वह ध्यान में बाधा नहीं पहुंचाता। कई वाममार्गी तांत्रिक अपने मन में इनके चित्र को मजबूत बनाने के लिए यौनसाथी का सहारा लेते हैं। कइयों को यह सहारा पिछले जन्मों के अच्छे कर्मों के कारण खुद ही मिल जाता है। दुनियादारी के प्रेम संपर्कों से आदमी को लोगों के चित्रों को मन में खुशी से रखने की आदत पड़ी होती है, जिससे उसे योग करते हुए कुंडलिनी ध्यान आसान लगता है। यह ऐसे ही होता है, जैसे यदि हम साँस रोककर अनाहत चक्र पर कुंडलिनी ध्यान कर रहे हों, तो हम मस्तिष्क के विचारों को नहीं रोकते, बल्कि उसके ध्यान के साथ मूलाधार चक्र का भी ध्यान करते हैं। इससे मस्तिष्क की शक्ति खुद ही नीचे उतरकर अनाहत चक्र पर कुण्डलिनी के रूप में चमकने लगती है। हृदय पर हाथ रखकर वहाँ कुंडलिनी का ध्यान आसान हो जाता है, और सिद्धासन में पैर की एड़ी से मूलाधार चक्र का। इसी तरह, हरेक चक्र पर ध्यान करते समय वहाँ हाथ या अंगुली लगाकर उसे आसान किया जा सकता है।

पतंजलि योगसूत्रों की सार्वभौमिक प्रामाणिकता

कुन्डलिनी खोजने के पीछे मेरा कोई स्वार्थ नहीं छिपा था। मुझे उसकी जरूरत भी नहीं लगती थी, क्योंकि मैं पहले से ही भरपूर आनन्द के साथ अद्वैत भाव वाला जागृत जीवन जी रहा था। हुआ यह कि संयोगवश मुझे कुछ अतिरिक्त समय मिल गया। मेहनती तो मैं था ही, हर समय कुछ न कुछ करता रहता था। उस अतिरिक्त समय में मैंने अध्यात्म के बारे में पढ़ना शुरु किया। पतंजलि योग मुझे समझ आ गया था, पर इश्क-विश्क के और प्राकृतिक रूप वाला। मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि बनावटी योगाभ्यास से किसीका मजबूत चित्र मन में कैसे बनाया जा सकता है। प्यार-मुहब्बत में तो वह खुद ही बन जाता है। इसलिए मैंने और भी योग की पुस्तकें पढ़ीं, ऑनलाइन योग मंचों पर चर्चाएं कीं, और साथ में योगाभ्यास भी करता रहा। एक बार तो मैं निराश होकर पतंजलि योगसूत्रों की प्रामाणिकता पर ही प्रश्नचिह्न लगाने लग गया था। फिर मंच पर एक अमेरिका में बसे भारतीय मूल के एक वृद्ध सज्जन ने मुझे थोड़े गुस्से में टोकते हुए बोला था, “आप ये कैसे कह सकते हैं? सैंकड़ों सालों से लोग उस पुस्तक से फायदा उठाते आए हैं। आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए”। मैंने झूठा स्पष्टीकरण देते हुए अपना बचाव किया था कि मैंने पतंजली के ऊपर संदेह नहीं किया था, पर मैं उनके बारे में कह रहा था, जो पतंजली योगसूत्रों की गलत व्याख्या करते थे। इससे वे संतुष्ट हो गए। शायद इस चर्चा ने भी मुझे इस पुस्तक की तह तक जाने में मदद की हो। तंत्र की पुस्तकें भी पढ़ीं, और उसका भी सहारा लिया। फिर भी मैं मस्त रहता था। कुन्डलिनी का पता चले तो भी ठीक, न पता चले तो भी ठीक। पर मेहनत रँग लाई, और उसका पता चल गया। बेशक मैं उसे ज्यादा देर नहीं झेल पाया। यदि झेल लेता तो शायद आप लोगों को कुछ बताने लायक  रहता ही नहीं। सब एक दिव्य योजना का हिस्सा है। फिर मुझे पता चला कि पतंजलि योगसूत्रों में बिल्कुल पूरा का पूरा सही लिखा है। यद्यपि उसे व्यावहारिक रूप से आम आदमी के लिए समझना मुश्किल है। इसलिए इसमें थोड़ी मदद कर देता हूँ। यह भी पता चला कि आम समाज में योग के बारे में किताबी ज्ञान ज्यादा फैलता है, योगाभ्यास नहीं। पर योग का अधिकांश हिस्सा व्यावहारिक योगाभ्यास ही है। 

कुंडलिनी जागरण मुख्य ध्येय होना चाहिए, ऊर्जा जागरण या सुषुम्ना जागरण नहीं

मुझे लगता है कि अधिकांश लोग जो कुन्डलिनी जागरण का दावा करते हैं, वह वास्तव में ऊर्जा जागरण या सुषुम्ना जागरण होता है। इसीलिए वे कुन्डलिनी का वर्णन कम, और ऊर्जा का वर्णन ज्यादा करते हैं। कुन्डलिनी जागरण तो बिना सुषुम्ना जागरण के भी हो सकता है। हालांकि ऊर्जा तो सुषुम्ना से होकर ही ऊपर चढ़ती है, पर वह बैकग्राउंड में रहती है, अनुभव में नहीं आती। एकदम से जो ऊर्जा की नदी उनकी पीठ से होकर मूलाधार से सहस्रार तक उनके अनुभव में आती है, वह सुषुम्ना जागरण ही है। जब इतनी ऊर्जा मस्तिष्क में एकसाथ आएगी, तो कोई न कोई चित्र तो वहाँ चमक से कौंधेगा ही। ऐसा ही चित्र एकबार मेरे मस्तिष्क में भी चमका था, जब मेरा क्षणिक सुषुम्ना जागरण हुआ था। इसका विस्तृत वर्णन मैंने एक पुरानी पोस्ट में किया है। वह चित्र एक स्थानीय मन्दिर का था। वह बहुत जीवन्त चित्र था, पर जागरण जैसा नहीं। फिर कुन्डलिनी चित्र भी चमका, पर वह भी जागरण जितना नहीँ था। जागरण के दौरान आदमी कुंडलिनी चित्र के साथ अपना पूर्ण जुड़ाव महसूस करता है, और साथ में महान आनंद व अद्वैत का अनुभव होता है। ज्यादातर लोग ऊर्जा साधना ज्यादा करते हैं, और कुन्डलिनी साधना कम। हालाँकि ये दोनों आपस में जुड़े हैं, पर मुख्य ध्येय तो कुन्डलिनी ही होना चाहिए। कुंडलिनी ही वह मानवीय चित्र है, जो एक सच्चे मित्र की तरह हमेशा साथ देता है। लोक में तो देता ही है, परलोक में भी देता है, क्योंकि यह सूक्ष्म है, जिसकी पहुंच हर जगह है। यही प्रेम और मानवता को बढ़ावा देता है। क्या आपने किसी प्रकाशमान ऊर्जा की नदी को, प्रकाश के चित्र-विचित्र डिसाईनों को किसी का मित्र बन कर सान्त्वना देते देखा है। मन की किसी मनुष्याकृति से पूर्ण जुड़ाव के बिना इस तरह के प्रकाश के अनुभव ऊर्जा जागरण या नाड़ी जागरण या सुषुम्ना जागरण के लक्षण हैं। मेरे को लगता है कि इन चीजों से पूर्ण जुड़ाव या पूर्ण समाधि बहुत कम अनुभव होता है, यदि हो भी जाए तो विशेष लाभ नहीं मिलता। हाँ, इतना जरूर है कि इससे कुंडलिनी साधना में बहुत मदद मिलती है, यदि कोई मदद लेना चाहें तो। मुझे लगता है कि इन चीजों के साथ प्रत्यक्ष और पूर्ण विलय या पूर्ण समाधि के अनुभव के दुर्लभ मामले हैं, और अपूर्ण विलय के साथ कोई तत्काल लाभ नहीं दिखता है। यद्यपि अद्वैतता के कारण प्रत्येक जागृति में अप्रत्यक्ष रूप से संबंधित वस्तुओं के साथ पूर्ण विलय होता है, लेकिन विलय की मुख्य और प्राथमिक वस्तु तो पसंदीदा मानव रूप ही होना चाहिये, इसमें से सबसे अच्छा ईश्वर रूप है, और दूसरे स्थान पर गुरु रूप है। कृत्रिम ध्यान प्रयासों के बिना अचानक ज्ञानोदय में, जागृति के समय मन में जो कुछ भी विचार या चित्र प्रवाहित होते हैं, उन संबंधित वस्तुओं के साथ आत्मा का प्राथमिक विलय होता है। यदि वह आत्मज्ञान किसी व्यक्ति की सहायता से हुआ है, वह प्रेम सम्बन्धी हो सकता है, तो वह मन में बाद में, कुंडलिनी ध्यान के सभी लाभ देते हुए कुंडलिनी के रूप में विकसित होता है। हालांकि, शक्तिपात आदि के द्वारा, स्वयं के प्रयासों के बिना इस प्रकार का अचानक जागरण कम शक्तिशाली और कम स्थिर प्रतीत होता है। वास्तव में, संबद्ध वस्तुएं या विचार मुख्य लक्ष्य नहीं हैं। ये मुख्य ध्येय नहीं हैं। मुख्य ध्येय तो मनुष्याकृति कुंडलिनी ही है। क्योंकि आदमी का सच्चा साथी आदमी ही होता है, इसलिए मानवरूप में देवता को ही ज्यादातर मामलों में कुंडलिनी बनाया जाता है। योग्य गुरु या महापुरुष या कृष्ण आदि अवतार भी कुंडलिनी बनाए जा सकते हैं। एक खास सम्प्रदाय का एक खास देवता इसलिए होता है, क्योंकि एक ही देवता के सामूहिक ध्यान करने से एक-दूसरे को ध्यान का बल मिलता है। जैसे कि शैव सम्प्रदाय, शाक्त सम्प्रदाय, गणपति के उपासक समाज समूह आदि। राज योग में कोई चक्र नहीं होते हैं, और ऊर्जा चैनल भी नहीं होते हैं। मन में केवल कुंडलिनी ध्यान किया जाता है। वहाँ भी कुण्डलिनी जागरण और कुण्डलिनी सक्रियता इसी प्रकार होती है।इसीलिए कुन्डलिनी का विशद वर्णन करना बहुत जरूरी हो गया था। इसी जरूरत को देखते हुए यह वेबसाइट संसारपटल पर आई।

कुंडलिनी एक सर्वोत्तम गुरु व बिंदु के रूप में है, जो सर्वलिंगमयी देह और कुम्भक प्राणायाम के साथ बहुत पुष्ट होती है

दोस्तों, मेरी पिछली पोस्ट के कथन के सही होने का एक ओर प्रमाण मिल गया। शिवपुराण के अगले ही अध्याय में है कि अग्नि में भस्म होने के बाद संध्या नामक नारी सूर्यमंडल में प्रविष्ट हो गई। उसके वहाँ दो टुकड़े हो गए। ऊपर वाले टुकड़े से सुबह का संध्याकाल बना, और नीचे वाले भाग से शाम का सांध्यकाल बना। फिर लिखा है कि रात और सूर्योदय के बीच का दिन का समय प्रातः संध्या का होता है, और सूर्यास्त व रात्रि के बीच का समय सांयकालीन संध्या का होता है। मैंने पिछली पोस्ट में यह भी लिखा था कि कुंडलिनी कामभाव से बचा कर रखती है। इस पोस्ट में मैं यह बताऊँगा कि कुंडलिनी ऐसा कैसे करती है। 

कुन्डलिनी सेक्सुअल एनर्जी को अपनी ओर आकर्षित करती है

कुन्डलिनी शरीर की एनर्जी को खींचती है। मैंने सेक्सुअल शब्द इसलिए जोड़ा क्योंकि यही एनर्जी शरीर में सर्वाधिक प्रभावशाली है। यह एक चुम्बक की तरह काम करती है। यदि आप किसी चक्र पर कुन्डलिनी का ध्यान करते हो, तो प्राण ऊर्जा खुद ही नाड़ी लूप में घूमने लग जाएगी, और कुन्डलिनी को मजबूत बनाएगी। कई लोग प्राण ऊर्जा को पहले घुमाते हैं, कई लोग कुन्डलिनी का ध्यान चक्र पर पहले करते हैं। दोनों का निष्कर्ष एक ही निकलता है।

वीर्य का तेज कुन्डलिनी को देने से कुन्डलिनी जीवंत हो जाती है

वीर्य का तेज मूलाधार चक्र में होता है। तेज का मतलब चमक व तीखापन होता है। यह बिल्कुल पारे की तरह होता है। तभी तो पारे का शिवलिंग बहुत शक्तिशाली होता है। एक पिछली पोस्ट में मैंने बताया था कि कैसे एक पारद शिवलिंग के पास ध्यान करने से मेरी कुन्डलिनी चमक गई थी।

बिंदु व बिंदु चक्र क्या है

बिंदु उसी वीर्य की बूंद को कहते हैं। बिंदु का शाब्दिक अर्थ भी बूंद ही होता है। बिंदु चक्र सहस्रार व आज्ञा चक्र के बीच में होता है, माथे के बीच से थोड़ा ऊपर पीछे तक। इसे बिंदु चक्र इसलिए कहते हैं क्योंकि यह सबसे अधिक वीर्य शक्ति प्राप्त करता है। ब्राह्मण लोग यहाँ चोटी बांधते हैं।

ज्योतिर्लिंग की ज्योति शिव के बिंदु से ही है

हिंदुओं में बारह ज्योतिर्लिंग प्रसिद्ध हैं। ये शरीर के बारह चक्रों को इंगित करते हैं। वास्तव में 12 चक्र होते हैं। आठवां बिंदु चक्र होता है। नवां, दसवां, ग्यारवां व बारवां चक्र थोड़ी-थोड़ी ऊंचाई के अंतराल पर सिर के ऊपर होते हैं। ये ज्योतिर्लिंग चक्रों की तरह देश के भिन्न-भिन्न स्थानों पर बने हैं। वास्तव में देश भी एक शरीर की तरह काम करता है। इसका पूरा विस्तार पुस्तक शरीरविज्ञान दर्शन में है। इन स्थानों पर जो ज्योति है, वह बिंदु के तेज का प्रतीक है। वह बिंदु शिव के लिंग से उत्पन्न होता है। तभी इनका नाम ज्योतिर्लिंग है। बिंदु ने शिवलिंग को शिवचक्रों के साथ जोड़ दिया है। एक प्रकार से कह सकते हैं कि लिंग सभी चक्रों पर स्थापित हो गया है। इसे ही सर्वलिंगमय देह कहते हैं। एक सर्वलिंग स्तोत्र भी है। इसमें देश में स्थित अनगिनत प्रसिद्ध शिवलिंग स्थानों के नाम हैं। यह पूरे शरीर में बिंदु के तेज के व्याप्त होने के बारे में संकेत देता है।

चक्र कुन्डलिनी पर बिंदु तेज का आरोपण सांस रोककर नहीं करना चाहिए

बिंदु तेज के ध्यान के समय साँसें बहुत तेजी से चलने लगती हैं। रक्तचाप भी बढ़ जाता है। उस समय सम्भवतः कोई तेज शारीरिक व मानसिक क्रियाकलाप हो रहा होता है। मानसिक क्रियाकलाप तो कुन्डलिनी की चमक के रूप में प्रत्यक्ष दिखता ही है। यह ऐसे ही है, जैसे बिंदुपात के समय होता है। दिल की धड़कन भी उस समय बढ़ जाती है। यह अभ्यास साँस रोककर नहीँ करना चाहिए। साँस रोकने से हृदय को क्षति पहुंच सकती है। यह ऐसे ही है जैसे कोई बिंदुपात के समय सांस रोकने का प्रयास करे। इससे दम घुटने का और भारी थकान का अनुभव होता है। इसलिए साँस रोककर किसी चक्र पर कुन्डलिनी ध्यान करने के बाद जब सांस सामान्य हो जाए, तभी रिलैक्स होकर चक्र कुन्डलिनी पर बिंदु तेज के आरोपण का ध्यान कर सकते हैं। दिल के रोगी, श्वास रोगी, उच्च रक्तचाप के रोगी भी इस अभ्यास को न करें। यदि करें, तो कम करें, सावधानी व सलाह से करें। कुन्डलिनी चिंतन का सबसे सरल और सुरक्षित तरीका अद्वैत का चिंतन ही है।

बिंदु कुन्डलिनी-रूप ही है

बिंदु और मन आपस में जुड़े होते हैं। दोनों का स्वभाव चमकदार और शक्तिरूप है। तभी तो जब बिंदु क्रियाशील होता है, तब मन में सुंदर और चमकदार विचार आते हैं। इसी बिंदु-क्रियाशीलता के लिए ही प्राणी प्रजनन की ओर आकर्षित होते हैं। कुन्डलिनी भी उसी मन का प्रमुख हिस्सा है। इसलिए वह भी बिंदु से शक्ति प्राप्त करती है। वास्तव में मन का सर्वोच्च शिखर कुंडलिनी जागरण ही है। इसीलिए संक्षेप में कहा जाता है कि जीव कुंडलिनी जागरण के लिए ही सभी क्रियाकलाप, मुख्य रूप से कामदेव संबंधी क्रियाकलाप करता है। कुंडलिनी एक मानसिक चित्र है, जो एकप्रकार से पूरे मन का प्रतिनिधि या सैम्पल पीस है। एक मानसिक चित्र का मतलब यह नहीं कि वह एक स्थिर चित्र ही है। यदि शिव के रूप का मानसिक चित्र है, तो वह पार्वती के साथ भी घूम सकता है, तांडव नृत्य भी कर सकता है, श्मशान में साधना भी कर सकता है, और अन्य जो कुछ भी। इसे प्रतिनिधि इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि इसको वश में करने से पूरा मन वश में हो जाता है, और इसको पूरी तरह हासिल करने से पूरा मन या यूँ कहो कि सबकुछ हासिल हो जाता है। मन में ही सबकुछ है। इसको पूरी तरह हासिल करने से सब कुछ हासिल हो जाता है। कुंडलिनी जागरण या इसे पूर्ण समाधि कह लो, यही कुंडलिनी या मन का पूरी तरह से हासिल होना है। इतनी सुंदर, व्यावहारिक, वैज्ञानिक और अनुभवात्मक परिभाषा आपको कुन्डलिनी की कहीं नहीं मिलेगी। चाहे आप किसी भी पुस्तक में या अन्य प्लेटफार्म पर ढूँढ लो। मुझे भी नहीं मिली थी। इसलिए मैं अंदाजा लगाकर ही कुन्डलिनी साधना करता रहा। जब कुन्डलिनी जागरण हुआ, तब पता चला। पतंजलि के ध्यान और समाधि के बारे में पता था, उसीको लेकर अभ्यास किया। पर कुन्डलिनी के बारे में कहीं नहीं मिला। इसको रहस्य बना कर रखा हुआ था, और इसके बारे में जितने मुंह, उतनी बातें। तब पता चला कि कुन्डलिनी जागरण और पूर्ण समाधि एक ही चीज है। पतंजलि ने जो किसी देवता या गुरु के चित्र या किसी भी प्रिय वस्तु के चित्र का मन में ध्यान करने को कहा है, वह कुंडलिनी ही है।  पुराने जमाने में तो इसे रहस्य बना कर रखने की प्रथा थी, ताकि इसका दुरुपयोग न हो। आज तो मुक्त समाज है। इसी से इस समर्पित कुन्डलिनी वैबसाइट को बनाने की प्रेरणा मिली। इससे जाहिर होता है कि किस हद तक भ्रम विद्यमान है, जैसा पहले मुझे भी था।

चक्रों पर लिंग की अनुभूति

यह अनुभूति तब होती है जब आदमी ने काफी व भारी परिश्रम किया हो, और उसने पेट से योग वाली साँसें काफी ली हों। केवल पेट से साँसें लेने से ही सबकुछ नहीं हो जाता। उसके साथ यह भी ध्यान करना पड़ता है कि साँस भरते समय अंदर जाती हवा के साथ प्राण नीचे जा रहा है, और पेट के आगे की तरफ फूलने से पिछले नाभि चक्र पर जो गड्ढा बनता है, वह अपान को नीचे से ऊपर खींच रहा है। इससे मणिपुर चक्र पर प्राण और अपान आपस में टकराते हैं, और सिकुड़न के साथ संवेदना पैदा करते हैं। प्राण-अपान की टक्कर के बारे में मैंने पिछली एक पोस्ट में बताया है। बाहर जाती हुई साँसों पर ध्यान नहीं देना चाहिए, क्योंकि इससे प्राण-अपान की टक्कर कमजोर पड़ती है। वह संवेदना और सिकुड़न फिर पीठ से मस्तिष्क तक चढ़ती हुई सभी चक्रों को तरोताजा करती है। वह फिर आगे से नीचे उतरकर आगे के चक्रों, विशेषकर नीचे वाले चक्रों को तरोताजा करती है। इससे ताजगी के अहसास के साथ एक गहरी साँस अंदर जाती है, और फिर साँसें शांत हो जाती हैं। खाली धौंकनी की तरह साँसें भरेंगे, तो इससे तो थकान ही बढ़ेगी। बेशक फायदा तो होगा, पर कम होगा। वैसे भी, परिस्थिति के अनुसार ही सांसें चलती हैं। आदमी गलती करके खुद भी अच्छा सीखता रहता है। कुछ न करने से अच्छा तो गलती करते रहो, पर गलती नुकसानदेह नहीं होनी चाहिये। पर कई बार जोर-जोर की साँसें बन्द ही न होने पर आदमी इमरजेंसी हॉस्पिटल सेक्शन में इस डर से चला जाता है कि कहीं उसके फेफड़े खराब होने से ऑक्सीजन का लेवल डाऊन तो नहीँ हो रहा। मेरे साथ भी एकबार ऐसे ही हुआ था। वास्तव में वह किसी तनाव से व धौंकनी की तरह साँस लेने से होता है। ऐसा लगता है कि साँसों से संतुष्टि ही नहीं हो रही। कहीं भी कुन्डलिनी प्रकट होने पर, यदि उसके ध्यान के साथ एनर्जी लूप का भी ध्यान करो, तो जैसे ही कुन्डलिनी, लूप में घूमने लगती है, वैसे ही लूप में एनर्जी का संचार बढ़ जाता है। एनर्जी कुन्डलिनी के साथ चलती है। वास्तव में, ज्यादातर मामलोँ में थकान के लिए ऑक्सीजन की कमी जिम्मेदार नहीं होती, बल्कि प्राण ऊर्जा का एक चक्र पर इकट्ठा होना होता है। इसे ही चक्र का ब्लॉक होना भी कहते हैं। उस प्राण ऊर्जा को लूप चैनल में चलाने के लिए एक अच्छी सी गहरी सांस भी काफी होती है। एक औऱ नई बात बताऊँ। हम अंगड़ाई प्राण ऊर्जा को रिलोकेट करने और उसे गति देने के लिए ही लेते हैं। इसीलिए अंगड़ाई लेने से थकान दूर होने का अहसास होता है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि हरेक तथ्य की गहराई में जाना चाहिए। ऊपर से ही आधी-अधूरी बात समझने से लाभ की बजाय हानि भी हो सकती है। यही इस कुन्डलिनी समर्पित वेबसाइट का मकसद है। चक्र-लिंग की अनुभूति के लिए एक शर्त यह भी है कि उसका प्रतिदिन का कुन्डलिनी योगाभ्यास अनवरत जारी रहना चाहिए। यह अनुभूति तब ज्यादा बढ़ जाती है, अगर इसके साथ आनन्दमयी रतिक्रीड़ा के साथ बिंदु संरक्षण भी हो। 4-5 दिनों के आराम के बाद ऐसा करने से इस सर्वलिंगमयी अनुभूति की संभावना ज्यादा होती है। यह चक्रों पर मुख्यतः नाभि चक्र, अनाहत चक्र व विशुद्धि चक्र पर तीखी व आनन्दमयी अनुभूति होती है। यह चक्र पर एक आनन्दमयी तेज सिकुड़न की तरह प्रतीत होता है। ऐसा लगता है कि जैसे चक्रों पर बिंदुपात हो रहा हो। वास्तव में चक्र कोई भौतिक संरचना नहीँ हैं। ये शरीर में वे स्थान हैं, जहां शक्ति घनीभूत हो जाती है, और एक आनन्दमयी संवेदना प्रकट करती है। आप चक्रों को शक्ति के जमावड़े अड्डे कह सकते हैं। वैसे भी, सारा खेल संवेदना का ही तो है। साधना से संवेदना को स्थानांतरित किया जा सकता है, और किसी भी चक्र पर संवेदना को पैदा किया जा सकता है।
प्राण और अपान आपस में जितनी तेजी व शक्ति से भिड़ेंगे, उनका मिश्रण उतना ही ज्यादा मजबूत होगा। जितना ज्यादा उनका परस्पर मिलन होगा, उतना ज्यादा कुंडलिनी लाभ प्राप्त होगा। प्राण सत्त्वगुण का और अपान तमोगुण का प्रतीक है। ये दोनों गुण भी इसी तरह मिश्रित होना चाहते हैं। कुछ साल पहले की बात है। मुझे कुछ वीआईपी लोगों के साथ 1-2 दिनों के लिए रहना पड़ा। मन से तो नहीँ चाहता था, क्योंकि वे ज्यादा ही खाने-पीने वाले थे। पर मजबूरी थी। हालांकि ऐसी चीजों के सीमित व नियंत्रित प्रयोग को मैं बुरा नहीं मानता। उनके खाने-पीने के दौरान मुझे उनके साथ बैठना पड़ा। वे तो अनलिमिटेड नॉनवेज खाकर और ड्रिंक करके नशे में धुत्त थे। उससे उस समय जैसे उनकी छुपी हुई तीसरी आंख खुल गई हो। वे मेरे मुंह के बारीक से बारीक भाव को भी आसानी से पढ़ रहे थे। मेरा बुझा हुआ सा मन उन्होंने पकड़ लिया। हल्की-फुल्की बातों को भी उन्होंने अपने खिलाफ समझ लिया। उस समय तो नशे में कुछ नहीं बोले, पर वे काफी समय तक मन में उसकी टीस रखते रहे। दरअसल नशे से और नॉनवेज से आदमी के अंदर बहुत ज्यादा तमोगुण छा जाता है। ऐसे में उसको बाहर से उतना ही ज्यादा सतोगुण देना पड़ता है। उससे जब तमोगुण और सतोगुण का मिलन होता है, तो वह बहुत ज्यादा आनन्द और आध्यात्मिक उन्नति अनुभव करता है, और सतोगुण प्रदान करने वाले का हमेशा के लिए मुरीद बन जाता है। यह लाभ सतोगुण वाले आदमी को भी मिलता है, क्योंकि उसे तमोगुणी से तमोगुण मिलता है। अर्थात दोनों प्रकार के लोगों से परस्पर एकदूसरे का हित स्वयं ही होता है। इसीलिए हिंदु समाज में वर्णव्यवस्था थी। वहाँ ब्राह्मण का गुण सतोगुण होता था, क्षत्रिय का रजोगुण, वैश्य का मिलाजुला और शूद्र का तमोगुण होता था। आज तो आदमी लगातार गुण बदलता रहता है। कभी सतोगुण, कभी रजोगुण और कभी तमोगुण आवश्यकतानुसार धारण कर लेता है। इसलिए हर किसी के वास्तविक गुण के बारे में संशय रहता है। इससे गुण मिलाप अच्छे से नहीं हो पाता, जिससे आध्यात्मिक उन्नति कम होती है। एक बात दिमाग में आई है। मुझे लगता है कि गुण मिलान जैसा कि हिंदू विवाह से पहले किया जाता है, यह वही बात है। यदि दोनों के गुण एक-दूसरे के साथ मिल जाते हैं, तो एक सुखद वैवाहिक जीवन का आगमन होता है, अन्यथा गुणों के टकराव के कारण वैवाहिक जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।  यह सतोगुण रोमांचित रह के, शालीनता दिखा के, और भी सारे दैवीय गुणों का प्रदर्शन करके प्रदान किया जा सकता है। साथ में उदारता और समर्पण का मानसिक भाव भी होना चाहिए। अहंकार व संकुचित भाव नहीं होना चाहिए। इससे तो वह उल्टा ज्यादा नाराज हो जाएगा। उसे लगेगा कि यह अपना सतोगुण अपने तक ही सीमित रखना चाहता है, मेरे तमोगुण से नहीं मिलाना चाहता। इसके विपरीत, यदि उसके सामने तमोगुण वाले भाव जैसे अवसाद, अरुचि, घृणा आदि दिखाए जाएं, तो उसका तमोगुण और ज्यादा बढ़ जाएगा। इससे वह खुद भी गंभीर अवसाद में जा सकता है। उनके साथ अन्य लोग जो खा-पी कर भी झूठमूठ में ही उनके सामने सतोगुण की एक्टिंग कर रहे थे और उन्हें बढ़िया से मक्खन लगा रहे थे, उनकी बल्ले-बल्ले। ऐसा मेरे साथ कॉलेज में भी कई बार होता था। इससे जाहिर होता है कि दुनिया प्यार से व मिलजुलकर ही अच्छी चलती है। हिन्दू पौराणिक समुद्रमंथन इसका अच्छा उदाहरण है।

मैं कभी पुरुष भाव और महिला भाव दोनों को मन में संतुलित रखता था। तब पुरुष जगत ने मुझे प्रताड़ित किया। अंत में मैंने स्त्री भाव मन से हटा दिया, और विरोधियों को करारा जवाब दिया। नतीजा, मेरा आधा चला गया था। अधूरापन। शादी के बाद मुझे मेरा वो खोया हुआ आधा मिल गया। मैं खुश हूं। चिंता मत करो। आप अकेले पूर्ण हो सकते हैं, या दूसरों की मदद ले सकते हैं। चुनना आपको है। एक ही बात है। हालांकि गुणवत्ता साझाकरण पहली नज़र में अधिक कुशल तरीका प्रतीत होता है।

कुन्डलिनी सर्वोत्तम गुरु है, जो योग में दिशानिर्देशन करती है

मुझे कुम्भक प्राणायाम का किताबी ज्ञान कभी समझ नहीं आया। मुझे तो यह भी ढंग से पता नहीँ था कि सांस रोकने को कुम्भक कहते हैं। कुन्डलिनी ने ही मुझे चक्रों पर सांस रोकने के लिए बाध्य किया, क्योंकि उससे वह बहुत तेजी से चमकती थी। आनन्द छा जाता था। मन हल्का और साफ हो जाता था। मैंने एक पिछली पोस्ट में इसका वर्णन किया है, जहां मैं इसे साँस रोककर प्राण और अपान की टक्कर का नाम दे रहा हूँ। हो सकता है कि उस टक्कर का भी कोई लिटेरल नाम हो। बोलने का मतलब है कि खुद अपने हिसाब से करना चाहिए। फिर जब मैंने कुम्भक नाम को गूगल पर सर्च किया तो पहले ही सर्च पेज पर किताबी ज्ञान तो बहुत मिला, पर किसीका अपना व्यावहारिक अनुभव नहीं था। उदाहरण के लिए वहां लिखा था कि साँसों को झटके से नहीं छोड़ना चाहिए। मैंने तो ऐसा कभी नहीं सोचा। हम क्या दौड़ लगाते हुए साँसों को झटके से नहीं छोड़ते। फेफड़े इतने नाजुक भी नहीं होते। किताबी ज्ञान में कई बातें होती हैं, जिनसे भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। यदि झटकों के डर से कोई कुम्भक ढंग से नहीं कर पाया, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इसी तरह, मैं ध्यान लगाते समय जरूरत के हिसाब से हिलता डुलता भी हूँ, ताकि बैठने में आसानी हो और कुंडलिनी पर अच्छे से ध्यान लग सके। किताबी ज्ञान में तो खम्भे की तरह बिल्कुल स्थिर रहने को कहा है। हो सकता है कि कोई स्थिर न रह पाने की वजह से ध्यान ही न लगा पाता हो, यह सोचकर कि स्थिरता के बिना ध्यान हो ही नहीं सकता। ऐसी कई बातें हैं, जिनसे भ्रम पैदा हो सकता है। इसलिए पूरा और स्पष्ट लिखना या कहना जरूरी है। योग के मामले में लचीलापन होना जरूरी है। फिर भी अध्ययन से लाभ तो मिलता ही है, चाहे वह किसी भी गुणवत्ता का हो। कुछ न होने से कुछ होना बेहतर है। आज मैंने इसी सतही ज्ञान को पढ़कर योग करते हुए साँस को धीमा व गहरा किया तो बहुत लाभ मिला, बेशक समय कुछ ज्यादा लगा। निष्कर्ष यह निकलता है कि कुन्डलिनी अपने हिसाब से खुद योग सिखाती रहती है। पढ़ने को भी वही प्रेरित करती है। इसलिए यदि कुन्डलिनी का सही मतलब पता चल जाए तो आधे से अधिक योग का सफर तय हो जाता है। यही इस वेबसाइट का मूल उद्देश्य है।

कुंडलिनी साधना के लिए सन्ध्या या संगम का महत्त्व

करोल पर्वत

रति दक्ष की पुत्री और ब्रह्मा की पौत्री है

मित्रों, पिछली पोस्ट कुछ छोटी थी, इस बार लॉन्गरीड आर्टिकल पढ़ने के लिए तैयार हो जाइए। पिछली पोस्ट में मैंने रति को ब्रह्मा की पुत्री कहा था। वास्तव में वह दक्ष की पुत्री है। बात एक ही है, क्योंकि दक्ष ब्रह्मा का मानस पुत्र है। दक्ष का मतलब होता है निपुण। जब आदमी अपने मन में दुनियादारी में निपुणता अर्थात कर्मयोग का संकल्प लेकर उसे अपनाता है, तो उसके मन में एक कुंडलिनी पैदा हो जाती है। यही दक्ष के पसीने से अर्थात कर्मयोग से रति अर्थात कुंडलिनी का जन्म है। यही मैंने पिछली पोस्ट में भी लिखा है कि कुंडलिनी को पहले कर्मयोग से पैदा करके विकसित करना पड़ता है, तब जाकर ही इसका समर्पित तंत्रयोग के साथ सफलतापूर्वक गठजोड़ बनाया जा सकता है।

धर्म विवेक बुद्धि का प्रतीक है

कथा के अनुसार धर्म ने ब्रह्मा को संध्या के प्रति  कामवासना से रोकना चाहा, पर वे नहीं रुके। तब धर्म ने शिव से ब्रह्मा को रोकने के लिए गुहार लगाई। धर्म या विवेक या बुद्धि भी ब्रह्मा का मानस पुत्र ही है। है तो यह भी विचार रूप ही, बेशक बुद्धि को मन से बड़ा कहा जाता हो। यह वास्तव में अच्छे और बुरे का ज्ञान है। पर कामवासनाओं से पीड़ित आदमी अक्सर इसकी बात नहीं सुनता। जब धर्म यह देखता है कि उससे बात नहीं बन रही, तब वह कुंडलिनी रूप शिव को याद करता है। वह उसी समय प्रकट होकर आदमी को गलत काम करने से रोकता है। तभी तो कहते हैं कि ईश्वर या कुंडलिनी बुद्धि से भी परे है। जहाँ बुद्धि या दिमाग भी हार जाता है, वहाँ कुंडलिनी को याद करके लाभ मिलता है। यदि प्रतिदिन के योगाभ्यास से हमेशा ही कुंडलिनी को याद रखा जाए, तब तो कहने ही क्या।

संध्या काल अद्वैत का प्रतीक है

संध्या स्त्री संध्या काल (डस्क और डान) का ही रूपक है, इसकी ओर इशारा वहीँ एक श्लोक से किया गया है, जिसमें लिखा गया है कि कामदेव रति के साथ ऐसे सुशोभित हो रहा था, जैसे संध्या काल में बादल के साथ चमकती बिजली। संध्या शब्द संस्कृत के संधि शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है, जोड़। संध्या में सभी विपरीत भाव जुड़े होते हैं। इस तरह से संध्या ईश्वर या अद्वैत के समतुल्य है। संध्या के समय दिन-रात के संतुलित होने से आदमी भी संतुलित हो जाता है। दरअसल संध्याकाल में दिन और रात के अंश बराबर होते हैं। संध्याकाल में आदमी का बायाँ व दायाँ मस्तिष्क समान चलने लगते हैं। उसके यिन और यांग बराबर हो जाते हैं। उसके दोनों नथुनों से बराबर साँस चलने लगती है। पिछली पोस्ट में जो मैंने प्राण और अपान को जोड़ने की योग तकनीक का वर्णन किया था, वह भी संध्या के तुल्य ही है। दरअसल जहाँ भी दो परस्पर विपरीत भाव आपस में जुड़ते हैं, वहाँ संध्या बन जाता है। उस शांत स्थिति में सभी काम विशेषकर आध्यात्मिक काम ज्यादा सफल होते हैं। संध्याकाल पूजापाठ से इतना ज्यादा जुड़ा है कि पूजा करने को संध्या करना ही कहा जाता है। इसी तरह ग्रहण काल भी एक संध्या काल है। उसमें किए काम कई गुना फल देते हैं। इसलिए कहते हैं कि ग्रहण काल में अच्छे व आध्यात्मिक काम ही करने चाहिए। पुराने समय में राजा लोग एकदम से राज्य छोड़कर तप के लिए वन चले जाया करते थे। वनवास का कुछ दिनों का शुरुआती समय भी उनके लिए महान संध्या काल की तरह होता था। उस समय वे कुंडलिनी साधना करके शीघ्रता से अपनी कुंडलिनी को जगा दिया करते थे। इसी तरह योगसाधना से बने प्रकाशमान चित्त में जो तांत्रिकों के द्वारा पंचमकारों से उत्पन्न अंधकार प्रविष्ट कराया जाता है, उससे भी उत्तम कोटि का बनावटी संध्या काल बनता है। उसमें वे बहुत सी सिद्धियां प्राप्त करते हैं, कुंडलिनी जागरण भी जिनमें एक है। इलाहाबाद के संगम में गंगा और यमुना नदियां मिलती हैं। ये दोनों नदियां परस्पर विपरीत गुणों वाली हैं। इससे बहुत अच्छा संध्या स्थान बनता है। इसिलए संगम को बहुत पवित्र माना जाता है। योगी लोग योग साधना के लिए गहन पहाड़ों व वनों में इसीलिए जाते हैं क्योंकि वहाँ उन्हें संगम का आभास होता है। कई धर्मों में कन्या को इसीलिए पूजा जाता है क्योंकि कन्या में स्त्री और पुरुष दोनों का संगम होता है।

सांयकालीन संध्या के समय भ्रमण से आनन्द तो मिलता है, पर कुंडलिनी विकास केवल योगी का ही होता है

आदमी के सौंदर्य में वृद्धि हो जाने के कारण वह संध्या काल में आसानी से काम का शिकार बन सकता है। इसकी मुख्य वजह यह है कि यौन प्रेमी के मन में अपने यौन साथी के रूप की कुंडलिनी बसी होती है। संध्या के समय वह प्रबल रूप में चमकने लगती है। उस समय यदि ऐसा व्यक्ति आचारहीन लोगों की संगति में हो, तो वह यौन कुंडलिनी से प्रेरित कामवासना के प्रभाव में आकर गलत कदम उठा सकता है। उससे उसके मन की कुंडलिनी को भी भारी क्षति पहुंच सकती है। परंतु यदि वह सदाचारी मित्रों व लोगों की संगति में हो, तो उनके प्रभाव में रहते हुए वह गलत कदम उठा ही नहीं पाता। वह कुंडलिनी को वश में कर लेता है, कुंडलिनी के वश में नहीं होता। इससे उसकी कुंडलिनी उत्तरोत्तर वृद्धि करती हुई उसे कुंडलिनी जागरण या सीधे ही आत्मज्ञान तक ले जाती है। इसीलिए संध्या के समय में आध्यात्मिक माहौल में रहने के लिए कहा जाता है। वैसे भी लोग संध्या के समय मॉल पर टहलने निकलते हैं। इधर-उधर के फालतू विचार उमड़ने से आनन्द तो मिलता है, पर उससे सांसारिक द्वैत रूप भ्रम में ही वृद्धि होती है। योगी लोग ऐसे समय में आसानी से पहचाने जा सकते हैं। उनके चेहरे पर कुंडलिनी के प्रभाव से विशेष चमक और शान्ति झलकती है। संध्या के समय मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों के बराबर व दक्षता से चलने से मानसिक शक्ति चरम पर होती है।

संध्या कालीन काम से यदि आम आदमी भ्रम में पड़ता है, तो तंत्रयोगी कुंडलिनी को मजबूत करता है

वास्तव में ब्रह्मा एक आम आदमी ही है। हरेक चीज की उत्पत्ति आदमी के मन में ही होती है। बाहर कुछ नहीं है। ये पर्वत,महासागर, चाँद, सितारे, सब मन की ही उपज हैं। इसी तरह संध्या का समय भी मन में ही बना। संध्या के समय कामभावना जागृत होने का मतलब है, संध्या के ऊपर आसक्त होना। संध्या ने बाद में लज्जा महसूस करते हुए तप करते हुए देहत्याग का विचार किया। इसका मतलब है कि वह अपने असली पवित्र काल के रूप को खोने जा रही थी। फिर ब्रह्मा, शिव आदि देवताओं ने उसकी शादी आध्यात्मिक ऋषि वसिष्ठ से करवा दी। मतलब कि संध्या काल फिर से आध्यात्मिक काम के लिए निर्धारित हो गया। तांत्रिक क्रियाएं इसमें अपवाद हैं। बेशक वे बाहर से भौतिक व सकाम लगें, पर अंदर से वे आध्यात्मिक ही होती हैं। इसीलिए तांत्रिक क्रियाएं भी ज्यादातर संध्या काल में ही की जाती हैं। कामदेव को ब्रह्मा ने भस्म होकर नष्ट हो जाने का श्राप दिया, क्योंकि उसने संध्या काल में ऋषियों और देवताओं को परेशान किया था। तो यह आम आदमी के लिए डर वाली बात है, क्योंकि वे काम के सहारे ही तो जीते हैं। वैसे भी, पूरे दिनभर के कामकाज से आदमी सन्ध्या के समय थका हुआ सा रहता है। इसी तरह सुबह उठकर नींद से पैदा हुई सुस्ती जैसी रहती है। यही संध्या को मिला शिव का वरदान है कि उसे काम परेशान नहीं करेगा। मतलब कि उस समय उनकी भौतिक कामनाएं व यौन कामनाएं नष्ट जैसी हो जाती हैं। एकप्रकार से काम थका हुआ सा होता है, पूरा नष्ट नहीं हुआ होता है। काम का पूर्ण नाश तो तंत्रयोगी ही कर पाते हैं। इसलिए तंत्रयोगियों के लिए यह काल वरदान है, क्योंकि वे अन्ततः काम को नष्ट करके ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। वे अपनी तन्त्र विद्या से पहले काम को पैदा करते हैं, फिर उससे मजबूत बनी कुंडलिनी से उसी काम को नष्ट कर देते हैं। वे काम की शक्ति अपनी कुंडलिनी को देते हैं। आम आदमी काम से उत्पन्न शक्ति को कुंडलिनी में रूपांतरित करने की तकनीक नहीं जानते, इसलिए वह शक्ति रंग-बिरंगे विचारों से भ्रम पैदा करती है। दूसरा अर्थ इससे यह निकलता है कि शिव वरदान के रूप में अपने आप को ही दे देते हैं। शिव मस्त मलंग और शून्य रूप हैं, उनके पास अपने सिवाय देने को है ही क्या। पर जब शिव मिल जाते हैं, तो सबकुछ खुद ही मिल जाता है। शिव कुंडलिनी रूप रति के रूप में हैं। इसलिए कुंडलिनी योग से काम खुद ही नष्ट हो जाता है।

कुंडलिनी काम से शक्ति लेकर अंत में काम को ही नष्ट कर देती है, फिर काम को पुनर्जीवित भी कर देती है

अब काम को ही देख लो। वह रति के प्रति इतना मोहित हो गया कि उसे अपने प्रति ब्रह्मा द्वारा दिए गए श्राप की सुध भी नहीं रही, और वह देवताओं के उकसावे में आकर रति से विवाह करने को राजी हो गया। यह उसके भस्म होने की शुरुआत थी, क्योंकि अंततः रति रूपी कुंडलिनी ने काम को नष्ट तो करना ही है। अब कुंडलिनी को ही शिव नाम दिया गया हो, तो आश्चर्य नहीं, क्योंकि शिव और शक्ति तत्त्वतः एक ही हैं। शिव ने काम को भस्म किया, मतलब कुंडलिनी ने काम को भस्म किया। अब यदि कोई कहे कि यह कैसे हो सकता है कि रति भी कुंडलिनी है और शिव भी कुंडलिनी है। तो इसका स्पष्टीकरण यह है कि रति दरअसल मन का भाव है, पर शिव वास्तविकता है। वैसे तो दोनों ही मन के भाव हो सकते हैं, पर मैं इन दोनों की आपसी सापेक्षता के हिसाब से बात कर रहा हूँ। मतलब कि सापेक्ष रूप से शिव रति की अपेक्षा ज्यादा वास्तविक है। इसी तरह रति शिव की अपेक्षा ज्यादा भावप्रधान है। यदि शिव मंदिर में रखी मूर्ति के रूप में हैं, तो रति मन में लग रहे उनके ध्यान के रूप में। रति मतलब लगाव। अब शिवपुराण में शिव से ही लगाव होगा, किसी अन्य देवता से नहीं। शिवपुराण में हर जगह शिव का ही ध्यान करने की सलाह दी गई है। इसी तरह  जब शिव-शक्ति का विवाह मतलब कुंडलिनी जागरण होता है, तब काम को पुनः जीवित हो जाने का वरदान मिला है। इसका मतलब है कि जागृति के बाद फिर से आदमी दुनिया में रम जाता है, हालाँकि ज्ञान व अनासक्ति के साथ। जागरण के बाद आदमी को कुछ पाने की चिंता तो होती नहीं, इसलिए वह खुलकर जीना शुरु करता है।

कामदेव के पुष्पबाण आदमी को प्यार-प्यार में ही घायल कर देते हैं

इस कथानक में यह वृत्तान्त रोचक है कि ब्रह्मदेव के मन से उत्पन्न कामदेव के पास पाँच फूलों के बाण या अस्त्र थे। ब्रह्मा या ब्रह्मदेव यहाँ सभी लोगों या जीवों के सामूहिक रूप का पर्याय है, और कामदेव सभी जीवों की सामूहिक कामवासनाओं का पर्याय है। तभी काम और ब्रह्मा के साथ देव शब्द लगा है। यदि एक आदमी की कामवासना की बात होती, तो सिर्फ काम ही कहते। इस तरह से तत्त्वतः तो काम और कामदेव एक ही हैं। कामदेव के ये पाँच बाण हैं, हर्षन मतलब खुश करना, रोचन मतलब पसंद करवाना, मोहन मतलब मोहित करवाना या एक के ही चक्कर में पागल बनवाना, शोषण मतलब शक्ति को सोखना, और मारण मतलब मरवाना। अब यह हैरानी की बात है कि अंतिम तीनों जानलेवा हथियार भी फूलों के ही हैं। तभी तो इन हथियारों से घायल आदमी प्यार-प्यार में ही बहुत कुछ गवां देता है, और उसे इसका आभास तक नहीँ होता।  इससे प्राचीन ऋषियों की व्यावहारिकता, दूरदर्शिता और सूक्ष्मदर्शिता का पता चलता है। इतने अच्छे रूपक बनाने वाले कोई वनवासी नहीँ हो सकते, जैसी कि आम भ्रांत धारणा है। वे दुनियादारी में सबसे ज्यादा कढ़े हुए और गढ़े हुए होते थे।

काम के साथ भावनाओं का अंबार भी चलता है, जिससे आदमी आनंदमयी मस्ती में डूबा रहता है

फिर लिखा है कि जैसे ही ब्रह्मा ने उत्तेजित होकर कामभाव से संध्या की तरफ देखा, वैसे ही उनके शरीर से उन्चास भाव पैदा हो गए। आम आदमी के साथ भी तो ऐसा ही होता है। कामोत्तेजित होने के बाद वह रंग-बिरंगे भाव दिखाने लगता है। वह यारों का यार, बापों का बाप, पुत्रों का पुत्र और पता नहीं क्या-क्या बनने लगता है। वह चारों ओर छा जाता है। ऐसे कौन से भाव हैं, जो उसके अंदर पैदा नहीं होते। मातृ भाव, भगिनी भाव, गुरु भाव, बुजुर्ग भाव, बाल भाव, नवयुवक भाव, पशु-पक्षी भाव, वृक्ष-लता भाव, पर्वत भाव आदि-आदि। ये भाव संध्या के समय ज्यादा उमड़ते हैं, क्योंकि उस समय मन में शांति छाई होती है। भावों में तो बुराई नहीं है, पर आसक्ति में बुराई है। जिस घर में संध्या योग होता है, वहाँ ये कामजनित भाव कुंडलिनी के साथ मिश्रित होकर आसक्ति और दुर्भावना को नष्ट कर देते हैं। केवल शुद्ध प्रेम बचा रहता है। कुंडलिनी और प्रेमभाव एकदूसरे को उत्तरोत्तर बढ़ाते रहते हैं। इसलिए प्रेम करने में बुराई नहीँ है, यदि उसे शुद्ध और आध्यात्मिक बनाया रखा जाए। बल्कि वह प्रेम तो सबसे बड़ा योग है। प्रेम में दीवाना होकर आदमी भावविभोर होकर आनन्दित हो जाता है। इसे आजकल हाईपर या हॉट या रंगीन होना कहते हैं। यही तो काम का आकर्षण है। इसको बहुत सुंदर शैली में व्यवहारिकता, आधुनिकता व वैज्ञानिकता के साथ समझाया गया है, पुस्तक शरीरविज्ञान दर्शन में। बहुत सुंदर रूपक कथाएँ हैं पुराणों में। मुझे लगता है कि कथा सुनाते समय मूल कथा के साथ उसमें दिए गए रूपक के रहस्य को भी डिकोड करके सुनाना चाहिए। इससे श्रोताओं को अधिक लाभ मिलेगा।

संध्या के द्वारा शिव से मांगे गए वरदान काम भाव से बचाव के लिए थे, शुद्ध प्रेमभाव से बचाव के लिए नहीं

ये मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कई लोग काम के डर से संध्या के समय आपस में बातें भी नहीँ करते। सन्ध्या के द्वारा लज्जित होकर तप करने का अर्थ है, लंबे समय तक आध्यात्मिक लोगों द्वारा संध्या के समय आध्यात्मिक साधनाएं करना। इसकी जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि उन लोगों ने काम को अपनाया था, शुद्ध प्रेम को नहीं। शुद्ध प्रेम तो अपने आप में तप ही है। संध्या के द्वारा तीन वरदान मांगे गए, जो शिव के द्वारा पूरे किए गए। पहले वरदान, पैदा होते ही किसी जीव में कामवासना पैदा न होने का अर्थ है कि जिस घर मे संध्या वंदन होता है, उस घर मे पैदा हुए बच्चों में उच्च कोटि के आध्यात्मिक संस्कार होते हैं। उनमें जन्म से ही अपने आप ही कुंडलिनी बनी होती है। वह कुंडलिनी उन्हें कामवासना से बचा कर रखती है। या यूँ कहो कि उनकी कुंडलिनी कामभाव को प्रेमभाव में रूपांतरित करती रहती है। दरअसल संध्या के पैदा होते ही कामदेव के प्रभाव से उसपर ब्रह्मा और उनके पुत्र आसक्त हो गए थे। संध्या का समय बहुत छोटा होता है। इसका अपना कोई अस्तित्व नहीं होता। यह दो प्रकार के विपरीत समयों के संयोग से बनता है। इसलिए इसके बड़े और जवान होने का प्रश्न ही नहीं होता, क्योंकि यह पैदा होते ही विलीन होने लगता है। दूसरा वरदान कि मेरे कुल में कोई भी कामासक्त न होए, इसका भी यही अर्थ है कि बेशक संध्या वंदन करने वाले लोगों के घरों के सदस्य किसी कारणवश कामभाव का प्रदर्शन करें, पर वे कामासक्त नहीँ होते, मतलब कामदेव के प्रभाव में आकर किसीके ऊपर लट्टू नहीँ हो जाते। तीसरा वरदान कि मेरे कुल की सभी स्त्रियां पतिव्रता होएं, इसका अर्थ है कि जो लोग संध्यावंदन करते हैं, उनकी कुंडलिनी बहुत विकसित और मजबूत होती है। इसी कुंडलिनी के कारण ही वे अपनी पत्नियों को पूर्ण संतुष्ट रख पाते हैं। यह तो वैज्ञानिक व तांत्रिक रूप से सत्य है कि यौन संतुष्टि और यौन क्रीड़ाओं पर पूरा नियंत्रण कुंडलिनी से ही प्राप्त होता है। एक वरदान शिव ने संध्या को यह भी दिया कि जो उसकी ओर काम भाव से देखेगा, वह नपुंसक हो जाएगा और उसकी शक्ति नष्ट हो जाएगी। इसका भी यही तात्पर्य है कि जो सन्ध्या के समय भोगों को आसक्ति से या उन्हें कुंडलिनी के बिना भोगेगा, वह मोहमाया के भ्रम में पड़कर अपनी आत्मा के अंधकार को बढ़ाएगा। कुंडलिनी के प्रति रति ही कामभाव या आसक्ति भाव को नियंत्रण में रखती है। सन्ध्या शब्द यहाँ ऐसे सभी समयों के लिए इंगित किया हुआ प्रतीत होता है, जिस समय आदमी सन्तुलित होता है, उसकी इड़ा और पिंगला नाड़ी बराबर चलती है, मन की कुंडलिनी मजबूत होती है, और मन में गहरी शांति छाई होती है। 

प्रेम और काम एकदूसरे को बढ़ाते रहते हैं

हर जगह प्रेम करते रहने से काम भाव में वृद्धि होती है। वह काम भाव जीवनसाथी के साथ मिलकर परिपक्व होकर प्रेम को और अधिक बढ़ाता है। तंत्रयोगी उस कामजनित प्रेम को कुंडलिनी प्रेम में रूपांतरित करते रहते हैं। तंत्रयोगी का केवल एक ही जीवनसाथी या यौनसाथी इसलिए होता है, ताकि कामजनित प्रेम उसकी कुंडलिनी को आसानी से हासिल होता रहे। अय्याश किस्म के आदमी का कामजनित प्रेम बहुत से यौनसाथियों में विभक्त हो जाता है, जिससे वह कुंडलिनी को नहीँ मिल पाता। इसीलिए कहते हैं कि एकपत्नीव्रत सबसे बड़ा व्रत है।इसके अलावा, यह यौन ऊर्जा है जिसकी कुंडलिनी के लिए जरूरत पड़ती है, न कि शारीरिक आकर्षण। बल्कि अतिरिक्त शारीरिक आकर्षण तो व्यक्ति को ऊर्जा के वास्तविक स्रोत से विचलित कर सकता है।

कुंडलिनी ही आदमी की असली सेवियर या रक्षक है

शिव के द्वारा संध्या के ऊपर कामासक्त ब्रह्मा को रोकने का अर्थ है कि आदमी को उस समय कुंडलिनी बचा लेती है। शिव यहाँ कुंडलिनी का प्रतीक है। वैसे भी कुंडलिनी आदमी को बुरे काम करने से रोकती ही है। यदि अनजाने या बहुत मजबूरी में कभी गलत काम हो भी जाए, तो कुंडलिनी उसका प्रायश्चित या पश्चाताप भी करवाती है। शिवपुराण में सभी के लिए शिव का ध्यान करना जरूरी बताया गया है। तो स्वाभाविक है कि ब्रह्मा भी शिव का ध्यान करते थे। इससे शिव उनकी कुंडलिनी बन गए, और कुंडलिनी रूप में वे ही ब्रह्मा को गलत काम से रोकने के लिए प्रकट हुए।

शिवपुराण एक तन्त्र पुराण ही है

शिवपुराण में सभी बातें और कथाएँ तन्त्र से सम्बंधित ही हैं। यह अलग बात है कि अधिकांश लोग उन्हें समझ नहीं पाते, क्योंकि वे रूपकों के रूप में हैं। ऐसा तन्त्र के दुरुपयोग को रोकने के लिए किया गया था। पुराण वेदों से निकलते हैं। इसका मतलब है कि तन्त्र का प्राचीनतम मूल स्रोत वेद ही हैं। यद्यपि प्रत्यक्ष नियमावली के साथ व्यावहारिक तन्त्र बौद्धों में ही दिखाई देता है। ऐसा नहीं है कि हिंदुओं में तन्त्र की व्यावहारिक प्रथा लुप्त हो गई हो। अभी भी हिन्दुओं में यह प्रचलित है, पर इसे बहुत गुप्त रखा जाता है, जिससे आम लोगों को इसका पता ही नहीं चलता। बौद्धों में भी इसे छिपा कर रखा जाता था। पर आज के इस मरते ग्रह को देखकर कोई पुनर्जीवन देने वाली विद्या छिपाना मानवता के साथ धोखा होगा, ये बात उन्होंने समझ ली है।

उपरोक्त काम व प्रेम से सम्बंधित सिद्धांतों का अनुभवात्मक साक्ष्य

दोस्तों, मैं बहुत से लोगों से गहरा प्रेम करता था। कई। पर अपना जीवन मैंने संयमपूर्वक ही जिया। अब अपनी बड़ाई में ज्यादा भी क्या कहना, पर यदि इससे किसी को लाभ मिलता हो तो इसमें बुरा भी कुछ नहीं है। जैसा भी मैंने इस पोस्ट में बताया है, वह सब मेरे साथ घटित हुआ। यह सब मेरा अपना अनुभवात्मक वर्णन है, कोई पढ़ा-पढ़ाया नहीं। इन्हीं अनुभवों के बीच में मेरा वह क्षणिक आत्मज्ञान व कुंडलिनी जागरण भी शामिल था, जिसका वर्णन होमपेज पर है। बेशक ये कुछ क्षणों के अनुभव थे, पर कुछ न होने से कुछ तो होना बेहतर है। और वैसे भी आत्म जागृति के अनुभव से ज्यादा महत्त्व तो आत्मजागृति से भरी जीवन दिनचर्या का है।