कुंडलिनी योग के लिए बच्चों के द्वारा अंगूठा चूसना- एक अद्भुत आध्यात्मिक मनोविज्ञान

दोस्तों, जैसा कि मैंने पिछली पोस्टों में भी बताया कि मुख (ओरल केविटी) एक कुण्डलिनी स्विच की तरह काम करता है। जैसे ही ओरल केविटी की छत इसके फर्श के साथ सीधे संपर्क में आती है, वैसे ही वह स्विच ऑन हो जाता है। खाना खाते समय जब मुंह भोजन से भरा होता है, तब दोनों सतहों के बीच में संपर्क बन जाता है। इसी तरह, मुंह के पानी से भरे होने पर भी बहुत अच्छा संपर्क बनता है। तभी तो खाना खाने के बाद और पानी पीने के बाद बहुत रिलीफ मिलता है। यहाँ तक कि किसिंग से भी ऐसा ही होता है। उसमें भी मुंह की लार संपर्क बनाने का काम करती है। योगी लोगों ने इस सिद्धांत का पूरा फायदा उठाने के लिए जीभ को तालू से छुआने की तकनीक बनाई। साथ में, उस तकनीक के साथ उन्होंने कुण्डलिनी को भी जोड़ दिया।

बच्चे कुदरती तौर पर सबसे बड़े योगी होते हैं

मैंने ऐसा पहले भी लिखा था। बच्चों से ही योग की शुरुआत हुई। बच्चों से ही लोगों ने योग सीखा। बहुत से ऐसे योगियों के उदाहरण हैं, जो उम्र में बच्चे थे। शुकदेव, बाबा बालक नाथ ऐसे ही योगी-बच्चों के उदाहरण हैं, जिनकी योग-साधना का आजतक लोग लोहा मानते हैं। वास्तव में योग की नींव बच्चे में पेट के अन्दर ही पड़ जाती है।

बच्चों में कुण्डलिनी स्विच को ओन करने की प्रवृत्ति नैसर्गिक होती है

बच्चे माँ के पेट में ही अपना अंगूठा चूसने लग जाते हैं। जाहिर है कि पेट में उन्हें बहुत परेशानी होती है। छोटी सी जगह में कैद होकर वे अपने विचारों में बेबस होकर उलझे रहते हैं। इससे उन्हें क्रोध, भय, अवसाद आदि मानसिक विकारों का लगातार सामना करना पड़ता है। उसी से बचने के लिए वे अंगूठा चूसते हैं। अंगूठा मुंह की दोनों सतहों को आपस में जोड़ देता है। साथ में, लार भी यह काम करती है। यह प्रवृत्ति 4 साल की उम्र तक तो बच्चों में ठीक है, पर इसके बाद उससे मुंह की बनावट बिगड़ सकती है। तभी बहुत से लोग कहते हैं की बड़े बच्चों को डांटकर नहीं, बल्कि योग सिखा कर इस आदत को मिटाया जा सकता है।

एनेर्जी स्विच के ऑन होने से कुण्डलिनी लाभ कैसे मिलता है

मुंह के एनेर्जी स्विच के ऑन होने से दिमाग का बोझ नीचे उतर जाता है। तभी तो कहते हैं कि बोझ उतर गया, यह नहीं कहते कि बोझ चढ़ गया। इससे दिमाग के विचारों से आसक्ति हट जाती है। इससे मन में अद्वैत की शान्ति छा जाती है। शान्ति से मन में बनने वाली खाली जगह को भरने के लिए कुण्डलिनी खुद ही प्रकट हो जाती है। योगी कुण्डलिनी के व नाड़ी चैनलों के बलपूर्वक ध्यान से आम लोगों से अधिक कुण्डलिनी लाभ प्राप्त करते हैं।

गुस्से को कैसे घूँटा जा सकता है

आमतौर पर लोग कहते हैं कि मैं गुस्से को पी गया या उसने गुस्से को घूँट लिया। कई लोग गुस्से के समय कुछ घूंटने का प्रयास करते हैं। उससे दिमाग का बोझ लार के माध्यम से गले के नीचे उतर जाता है। वैसे भी गुस्से के समय लोग दांत भींचते हैं, ताकि वे गुस्से को काबु में करके अच्छी तरह से लड़ सकें। कई लोग लड़ाई से दूर हटने के लिए ऐसा करते हैं। ऐसा करने से मुंह की दोनों सतहें जीभ के माध्यम से टाईट होकर आपस में जुड़ जाती हैं।

मौन व्रत से कुण्डलिनी स्विच कैसे ऑन रहता है

मौन धर्म के पीछे भी यही कुण्डलिनी स्विच का सिद्धांत काम करता है। चुप रहने से दांत टाईट जुड़े होते हैं, और मुंह के अन्दर भी गैप नहीं रहता। बोलने से वह गैप बढ़ जाता है, और दिमाग का बोझ नीचे उतरकर दिमाग को नुकसान नहीं पहुंचा पाता है। मुझे खुद मौन रहने से अपना आत्मज्ञान व कुण्डलिनी जागरण पुनः याद आ जाता था। बिना अवेयरनेस के बोलने से मैं उन्हें भूल जाता था। जीभ खुद ही दांतों के पीछे तालू से टच रहती है।  

कोरोना लोकडाऊन के दौरान मजदूरों के पैदल पलायन के समय उनके साथ भटक रहे मासूम बालकों को देखकर निराशा होती है।

कुंडलिनी उच्च रक्तचाप के खिलाफ- तनाव को रोकने और उसे दूर करने के लिए एक रहस्यमय कुंजी; भोजन योग

शरीर में कुंडलिनी प्रवाह के लिए दो प्रमुख चैनल्स होते हैं। एक शरीर के आगे के भाग में है। दूसरा शरीर के पिछले भाग में है। दोनों शरीर के बीचोंबीच गुजरकर शरीर को दो बराबर व सिमेट्रिक जैसे भागों में बांटती हुई नजर आती हैं। एक हिस्सा बायां भाग (स्त्री या यिन) है, और दूसरा दायाँ(पुरुष या यांग) है। इसीसे अर्धनारीश्वर भगवान की अवधारणा हुई है। उस शिव भगवान का बायां भाग स्त्री रूप व दायाँ भाग पुरुष रूप दिखाया गया है। दोनों चैनल्स सभी चक्रों को बीचोंबीच काटते हैं। दोनों सभी चक्रों पर आपस में जुड़े हैं, जिससे बहुत से लूप बनते हैं। सबसे बड़ा लूप तब बनता है जब दोनों चैनल्स मूलाधार और मस्तिष्क चक्र पर आपस में जुड़े होते हैं। वह लूप सभी चक्रों को कवर करता है। कुण्डलिनी लूप पर भ्रमण करती है। और भी बहुत सी नाड़ियाँ इन दो मुख्य चैनल्स से निकलती हैं, जो पूरे शरीर में फैली हुई हैं। हठयोग व ताओवाद में इनका विस्तार से वर्णन है।

शरीर के आगे के भाग का चैनेल

मतिष्क प्यार का उत्पादक और दिल प्यार का एम्पलीफायर

प्यार मस्तिष्क में पैदा होता है। वह खाना खाते समय दिल तक उतर जाता है। तभी तो कहा जाता है कि साथ मिलकर खाने से प्यार बढ़ता है। यह भी कहा जाता है कि दिमाग का रास्ता पेट से होकर गुजरता है। जब स्कूल के दिनों में मेरे दोस्त मेरी काल्पनिक गर्लफ्रैंड का टिफिन दिखाकर मुझे मजाक में खाना खाने के लिए तैयार होने के लिए कहते थे, तब मुझे प्यार की बड़ी तेज व आनन्दमयी अनुभूति होती थी। आनंद तो दिल में ही पैदा होता है, दिमाग में तो बोझ महसूस होता है। कुंडलिनी जागरण व आत्मज्ञान भी तभी होता है जब दिल दिमाग से जुड़ता है। केवल दिमाग में कुंडलिनी जागरण नहीं बल्कि पागलपन ही पैदा हो सकता है। इसीलिए जीभ को तालु से छुआकर कुण्डलिनी को दिमाग से उतारकर दिल तक लाने के लिए कहा जाता है। बेशक उसे दिल से ही लूप बनाकर दिमाग तक ऊपर नीचे घुमाया जाता रहे। इससे दिल और दिमाग आपस में जुड़ जाते हैं। तभी तो कहते हैं कि उसके हुस्न का नशा मेरे दिलोदिमाग पर छा गया, मतलब कि बहुत मजा आया।  

कुंडलिनी भोजन के साथ मुंह से नीचे उतरती है

सीधा सा मतलब है कि टिफिन के खयाल से मेरे मुंह के रस के साथ मेरी कुंडलिनी मेरे दिल तक उतर जाती थी। वह रस या भोजन के कण एक कंडक्टर ज्वाइंट-ग्रीस की तरह दोनों जबड़ों को जोड़ देते थे। उससे होकर कुंडलिनी दिल तक उतरती थी और आनंद व प्यार पैदा करती थी। वहां से कुंडलिनी नाभि चक्र तक उतरती थी, जो वहां खाना पचाकर मुझे शक्ति का एहसास देती थी। तभी तो कहते कि नाभि में गट्स होता है। मैं तो पानी घूंट से मुंह को पूरा भरकर मस्तिष्क व शरीर के बीच बने सबसे मजबूत जोड़ को अनुभव करता हूँ, और वह पानी की घूंट मुझे अमृत के समान लगती है।

भरपेट खाना खाने के बाद यौनसंबंध या सैक्स बनाने की इच्छा

अक्सर देखा जाता है कि ज्यादा खाना खा लेने के बाद सैक्स के लिए मन करता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आगे वाले चैनेल से होती हुई कुंडलिनी नाभि चक्र से स्वाधिष्ठान चक्र तक उतर जाती है। कुंडलिनी वहीँ से पीछे मुड़कर ऊपर चढ़ जाती है। मूलाधार तो शरीर को बीचोंबीच विभाजित करने के लिए रखा गया है, ताकि कुंडलिनी चैनेल शरीर के बीचोंबीच सीधी रेखा में खुले। इसीलिए इसका ध्यान भी जरूरी है। हालांकि यह कुंडलिनी को पीछे से ऊपर मोड़ने का काम भी करता है। यह चक्र मलोत्सर्ग से भी जुड़ा है। तभी तो सेक्स के बाद हाजत की अनुभूति होती है और पेट साफ हो जाता है। वास्तव में कुंडलिनी स्वाधिष्ठान चक्र से नीचे उतरकर मूलाधार चक्र पर आ जाती है। दूसरे तरीके से, यदि मूलाधार पर वज्र शिखा का ध्यान किया जाए जो कि वास्तविकता है, तब दोनों सेक्सुअल चक्रों का ध्यान एक साथ हो जाता है और कुंडलिनी भी अच्छी तरह से पीछे मुड़ती है। कई लोग यह भी कहते हैं कि कुंडलिनी आज्ञा चक्र से ही पीछे मुड़कर नीचे उतर जाती है और सहस्रार तो मूलाधार की तरह सेंटरिंग व ध्यान करने के लिए ही है। पर मुझे तो कुंडलिनी को सहस्रार तक ले जाना अधिक आसान और कारगर लगता है। इसी तरह नाक के शिखर, आज्ञा चक्र और सिर पर बालों की चोटी रखने के स्थान से भी शरीर की सेंटरिंग होती है। इसी सेंटरिंग के लिए हिन्दुधर्म में सिर के पिछले भाग में दोनों तरफ के बीचोंबीच एक लंबे बालों की चोटी (शिखा) रखी जाती है।

विज्ञान फ्रंट चैनेल को ढंग से परिभाषित नहीं कर पाया है

मुझे लगता है कि फ्रंट चैनेल परस्पर स्पर्ष की संवेदना से बना है। यह स्पर्श की संवेदना सेल से सेल के कान्टेक्ट से आगे बढ़ती है। वैसे भी खाने का निवाला निगलते समय वह पहले गले के विशुद्धि चक्र में संवेदना पैदा करता है। फिर हृदय के अनाहत चक्र में और पेट में पहुंचने पर नाभि चक्र में संवेदना पैदा करता है। जब ज्यादा खाने से पेट नीचे लटक जाता है तब वह नीचे की ओर दबाव डालकर जननांग क्षेत्र को उत्तेजित करता है जिससे सैक्सुअल स्वाधिष्ठान चक्र क्रियाशील हो जाता है।

शरीर का मेरुदंड वाला चैनेल

सैक्स में सबसे ज्यादा आनंद होता है। जननांगों में सबसे तेज संवेदना पैदा होती है। यह भी सत्य है कि आनंद मस्तिष्क और दिल में एकसाथ तेज अनुभूति से पैदा होता है। इसका मतलब है कि जननांगों से संवेदना एकदम से मस्तिष्क व दिल तक जाती है। पहले वह सीधी मस्तिष्क तक जाती है। दिल तक तो उसे जीभ से उतारना पड़ता है। तांत्रिक संभोग के समय मुंह में भरपूर लार रस बनने से कुंडलिनी चालन/शक्ति चालन को अतिरिक्त सहायता प्राप्त होती है। इससे मस्तिष्क को भी कम थकान होती है। जननांगो से मस्तिष्क तक संवेदना को भेजने का रास्ता मेरुदंड ही है। विज्ञान से भी यह सिद्ध है कि मेरुदंड की नाड़ी जननांगों से सीधी मस्तिष्क तक जुड़ी होती है। विज्ञान के ही अनुसार , प्रत्येक चक्र भी मेरुदंड के माध्यम से ही मस्तिष्क से जुड़ा होता है।

संवेदना का बार-बार नाड़ी लूप में घूमना

जहाँ पहले से नाड़ी विद्यमान है, वहां पर संवेदना नाड़ी से चलती है। अन्य स्थानों पर सेल से सेल के कान्टेक्ट के थ्रू चलती है। मुझे तो लगता है मेरुदंड वाली संवेदना भी शुरु में स्पर्श के अनुभव से ही ऊपर चढ़ती है। इस तरह से नाड़ी लूप में कुण्डलिनी घूमने लगती है। यह नाड़ी लूप ताओवाद के माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट और कुण्डलिनी योग में एकसमान है।

यह नाड़ी लूप अनुभव के दायरे से विलुप्त हो गया, पर कुण्डलिनी अभ्यास से पुनः जागृत हो सकता है

आदमी केवल उन्हीं संवेदनाओं को अनुभव करने लगा , जिनकी उसे भौतिक रूप से सर्वाइव करने के लिए जरूरत थी। शरीर की अन्य संवेदनाओं को वह नजरअंदाज करने लगा। यह आध्यात्मिक नाड़ी लूप भी उन संवेदनाओं में शामिल था। इसलिए समय के साथ यह नाड़ी लूप अदृश्य हो गया। हालांकि अच्छी बात यह है कि लगातार के कुंडलिनी योग के अभ्यास से इस नाड़ी लूप को पुनः जागृत किया जा सकता है।

उलटी जीभ को पेलेट से छुआने पर काम आदि के बोझ से बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर एकदम से घट जाता है

यह मैंने पिछली पोस्ट में भी बताया था। मैं इस तकनीक की कारीगरी को कई बार आजमा चुका हूँ। अब इसका मैं उचित तरीका बताता हूँ। उलटी जीभ का तालु के साथ जितना पीछे हो सके, उतना पीछे फ्लैट और टाइट कांटेक्ट बनाएं। बेशक बहुत पीछे मोड़कर जीभ को परेशान न करें। बिल्कुल दांत के पीछे भी यदि जरा सी उल्टी जीभ लग जाए तो बहुत अच्छा कान्टेक्ट पॉइंट बनता है। इस उल्टे स्पर्श के कारण काउंटर करेंट सिस्टम चालू हो जाता है और कुंडलिनी नीचे उतर जाती है। यह काउंटर करेंट सिस्टम ऐसे ही है जैसे गर्म दूध के गिलास को ठंडे पानी में चारों ओर घुमाओ और ठंडे पानी को विपरीत दिशा में घुमाओ तो दूध एकदम से ठंडा हो जाता है। दूध की गर्मी पानी में एकदम चली जाती है। ऐसा लगता है कि मस्तिष्क पूरे शरीर में फ़ैल गया है। एकबार मुझे गुस्सा आ रहा था। उसी समय मैंने अपनी जीभ तालु से लगाई। मेरा मस्तिष्क शांत हो गया और उसकी एनर्जी हृदय चक्र तक उतर कर दोनों बाजुओं में फैल गई। मेरी बाजुएं लड़ाई के लिए तैयार हो गईं डिफेंसिव मोड में ही, क्योंकि मेरा मस्तिष्क शान्त था और लड़ाई शुरु नहीं करना चाहता था। इसीलिए सच्चे योगी व कुंफू विद्वान डिफेंसिव होते हैं, ऑफेंसिव नहीं। ऐसा उपरोक्त बाजू वाला ब्रांचिंग नाड़ी सिस्टम आगे वाले चैनेल से निकलकर पूरे शरीर में फैला है। ऐसी कल्पना करें कि दिमाग जीभ के माध्यम से गले से जुड़ गया है। वैसे भी गले में अकड़न सी पैदा होगी। मस्तिष्क के बोझ के नीचे उतरने से वह अकड़न विशुद्धि चक्र पर ज्यादा बढ़ जाएगी। थोड़ी देर बाद वह बोझ हृदय चक्र तक पहुंच जाएगा। थोड़ी अधिक देर बाद वह नाभि चक्र तक पहुंच जाता है। ऐसा साफ महसूस होता है कि कोई लहर जैसी दिमाग से नीचे उतरकर नाभि में विलीन हो गई। उसके साथ ही मन एकदम से खाली और हल्का हो जाता है। क्रोध आदि मन के विकार भी शांत हो जाते हैं, क्योंकि ये मन के बोझ से ही पैदा होते हैं। रक्तचाप भी एकदम से घटा हुआ महसूस होता है। कुंडलिनी भी आनंद के साथ नाभि चक्र पर चमकने लगती है। इसीलिए नाभि को सिंक या समुद्र भी कहते हैं, क्योंकि यह आदमी का सारा बोझ सोख लेती है।

जीभ के पिछले हिस्से पर टिप से शुरु होकर जीभ के बीचोंबीच जाती हुई गले के बीच में उतरकर आगे के सभी चक्रों को कवर करने वाली एक पतली नस जैसी महसूस होती है। उसके ऊपर कुंडलिनी चलती है। वह नस ही नरम तालु से टच होने पर कुंडलिनी या अन्य संवेदनाओं या बोझ को दिमाग से नीचे उतारती है। माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट में कुंडलिनी को नहीं अपितु सीधे एनर्जी या संवेदना या बोझ को नाड़ी चैनलों में घुमाया जाता है।

तालाबंदी लोकडाऊन का उल्लंघन करके पलायन कर रहे लोगों का कुंडलिनी से सम्बंध

भोजन के बिना आदमी कई दिनों तक जिंदा रह सकता है। वैसे भी एक बार में ही यदि बहुत सारा खाना खा लिया जाए, तो दो दिन तक दुबारा खाना खाने की जरूरत न पड़े। मेरे एक जाने-पहचाने शख्स थे जो अक्सर एक बार में ही 5 आदमियों का खाना खा लेते थे। विशेषकर वह ऐसा शादी आदि समारोहों में करते थे, जहाँ अच्छा और तला भुना खाना बनता था। फिर वे 5 दिन तक बिना कुछ खाए ही कमरे में सोए रहते थे, और बार-2 पानी पीते रहते थे। वे हंसते भी बहुत थे और पूरा खुलकर हँसते थे। साथ में वे पूरी तरह से मस्त रहते थे। इससे उन्हें खाना पचाने में मदद मिलती थी। इसी तरह, लोकडाऊन की वजह से काम न करने से तो तीन दिन तक एक भारी भोजन से गुजारा चल सकता है। पर भोजन से शरीर के लिए केवल पोषक तत्त्व ही नहीं मिलते, बल्कि मन के बोझ को कम करने वाला व आनन्द प्रदान करने वाला कुंडलिनी लाभ भी मिलता है। इसी कुंडलिनी लाभ के लिए लोग खासकर मजदूर नॉवेल कोरोना (कोविड-19) वायरस लोकडाऊन का उल्लंघन करके घर भाग रहे हैं, भूख से नहीं। वैसे भी अधिकांश मामलों में कैम्पों में मुफ्त का खाना मिल ही रहा है। यदि भोजन केवल शरीर बनाने के लिए चाहिए होता, तब तो मोटे आदमी कई-2 दिनों तक खाना न खाया करते।

कुंडलिनी दोनों दिशाओं में प्रवाहित हो सकती है

सीखने के समय ताओवाद में आगे के फ्रंट चैनल में कुंडलिनी को ऊपर की तरफ चलाया जाता है। मैंने भी एकबार तांत्रिक प्रक्रिया के दौरान फ्रंट चैनेल से ऊपर जाते हुए महसूस किया था। वह एक हेलीकॉप्टर की तरह बड़े सुंदर ढंग से और स्पष्ट रूप से ऊपर उठी थी। उसने सेक्सुअल चक्रों से मस्तिष्क तक पहुंचने में लगभग 5-10 सेकंड का समय लिया था। कुंडलिनी संवेदना एक तरंग की तरह ऊपर उठी। वह जिस क्षेत्र से गुजरी, उस क्षेत्र को प्रफुल्लित करते गई। निचले वाला क्षेत्र सिकुड़ता गया। मतलब कि जैसे ही वह जननांगों से ऊपर उठी, वे एकदम से सिकुड़ गए। पहले वे पूरी तरह से प्रसारित थे।

यद्यपि सबसे सुंदर अनुभूति तब होती है जब कुंडलिनी फ्रंट चैनल से नीचे उतरती है और मूलाधार से वापिस मुड़कर बैक चैनल से ऊपर चढ़ती है। जब एनर्जी मस्तिष्क में पहुंचती है, तब चेहरे की त्वचा पर ऊपर की तरफ खिंचाव लगता है और आंखें भिंच जाती हैं। कानों से ऊपर मस्तिष्क में घुसती हुई सरसराहट या गशिंग फ्लो के जैसी अनुभूति होती है। हो सकता है कि वह खिंचाव के दबाव में रक्त प्रवाह हो। फिर उस गशिंग से भरे दबाव को जीभ से नीचे उतारा जाता है। नीचे आते हुए वह गशिंग कुंडलिनी में बदल जाती हो। मूलाधार से वह फिर ऊपर मुड़ जाती है। रीढ़ की हड्डी का एक फन फैलाए शेषनाग के अनुभव से वह कुंडलिनी संवेदना मस्तिष्क तक पहुंच जाती है। नाग और जीभ का वैसे भी आपस में गहरा अंतरसंबंध है। फिर वही गशिंग और फिर वही प्रोसेस बार बार चलता रहता है।

कुंडलिनी के लिए यौनयोग के विकल्प के रूप में श्वास की विपरीतक्रम प्रवाह विधि (बैकवार्ड फ्लो मैथड या कुंडलिनी पंप); कोरोना काल में तो सही ढंग की व भरपूर साँसें ली ही जानी चाहिए, क्योंकि किसको पता कि कोरोना कब किसकी साँसें छीन ले 

योग में श्वास-प्रश्वास का सर्वाधिक महत्त्व है। सही ढंग से श्वास लेने पर ही योग का अधिकांश सफर तय हो जाता है। तभी तो कहते हैं कि साँस को जीतने से मन पर भी विजय मिल जाती है। सही तरीके की साँस के साथ-2 कुंडलिनी खुद ही चलती रहती है। इसलिए साँस को चक्रों पर घुमाने से कुंडलिनी स्वयं ही घूमने लगती है।

विपरीतक्रम श्वास विधि ही श्वासयोग का मुख्य भाग है

विपरीतक्रम श्वास विधि को सीखने के लिए सबसे पहले पेट से साँस लेना सीखा जाता है। इसे डायाफ्रेगमेटिक डीप ब्रीथिंग भी कहते हैं। इसमें साँस अंदर भरने पर पेट बाहर की तरफ फूलता है। सांस बाहर छोड़ने पर पेट अंदर की ओर सिकुड़ता है। यदि इससे विपरीत क्रम में पेट की गति हो, तो वह साँस छाती से मानी जाती है। छाती से ली गई साँस से मन चंचल रहता है, और शरीर को भरपूर ऑक्सीजन भी नहीं मिलती।

विपरीतक्रम श्वास विधि में साँस शरीर से बाहर नहीं छोड़ी जाती

भौतिक रूप से यह बात अजीब लग सकती है, क्योंकि साँस तो बाहर निकलेगी ही। परंतु आध्यात्मिक रूप से यह सत्य है। बाहर जाने वाली साँस की सूक्ष्म ध्यानमयी शक्ति को पेट से नीचे की ओर धकेला जाता है। उससे नाभि के नीचे व स्वाधिष्ठान चक्र के आसपास एक संवेदना जैसी पैदा होती है। वह संवेदना वीर्य-निर्माण की प्रक्रिया को उत्तेजित करती है।

अंदर भरी जाने वाली साँस वास्तव में रीढ़ की हड्डी में ऊपर की ओर चढ़ाई जाती है

बाहर जाने वाली साँस से स्वाधिष्ठान चक्र पर वीर्य-संवेदना का बिंदु बनता है। वह संवेदना बाहर छोड़ी गई साँस से पीठ वाले स्वाधिष्ठान चक्र से होती हुई रीढ़ की हड्डी में ऊपर की तरफ चढ़ती है। वह सभी चक्रों से होते हुए सहस्रार तक पहुंच जाती है। उस संवेदना के साथ वीर्य की सूक्ष्म  शक्ति व कुंडलिनी भी होती है। इस तरह से हम देख सकते हैं कि वास्तव में शरीर के अंदर नीचे की तरफ जाने वाली हवा ऊपर की तरफ जाती है, और ऊपर की तरफ जाने वाली हवा नीचे की तरफ जाती है। इसीलिए इसे विपरीतक्रम प्रवाह विधि (बैकवार्ड फ्लो मैथड) कहते हैं।

मूलाधार से लेकर सहस्रार चक्र तक फैले हुए शेषनाग के ध्यान से विपरीत-क्रम श्वास विधि आसान हो जाती है

शेषनाग वाली मेरी पिछली पोस्टों के अनुसार शेषनाग ने मूलाधार व स्वाधिष्ठान के ऊपर अपनी कुंडली लगाई हुई है। वह रीढ़ की हड्डी से होकर ऊपर उठा हुआ है, और मस्तिष्क में उसके एक हजार फन हैं। जब हम पेट से साँस भरते हैं, तो वह पीछे की ओर तन कर सीधा व कड़ा हो जाता है, तथा फन उठा लेता है। इसका अर्थ है कि उसके शरीर में साँस ऊपर की ओर चढ़ कर उसके फन तक पहुंची। इससे पूर्वोक्त संवेदना की शक्ति ऊपर की तरफ चली जाती है। जब हम साँस छोड़ते हैं, तब वह आगे की ओर ढीला हो जाता है, और अपना फन नीचे झुका लेता है। ऐसा लगता है कि उसने फुफकार के साथ साँस नीचे की तरफ छोड़ी। साथ में पेट भी अंदर की ओर सिकुड़ कर नीचे की ओर दबाव डालता है। इन सबसे पूर्वोक्त स्वाधिष्ठान बिंदु पर संवेदना बनती है।

विपरीतक्रम श्वास विधि यौनयोग का सर्वोत्तम विकल्प है

कई लोग विभिन्न शारीरिक और मानसिक बाधाओं के कारण यौनयोग नहीं कर पाते। उनके लिए यह विधि सर्वोत्तम है। संन्यासी योगी भी इसी विधि का प्रयोग करते थे। इससे वीर्य की शक्ति मस्तिष्क को आसानी से मिल जाती है।

कुंडलिनी के विकास के लिए बाँसुरी योग; बाँसुरी कोरोना काल के सबसे महत्वपूर्ण वाद्य यंत्र के तौर पर

दोस्तों, हर हफ्ते कोरोना वायरस अपनी तरफ ध्यान खींच लेता है। इसी के संबंध में लिखने का मन करता है। शायद इससे खुश होकर वह दुनिया के गुनाहों को माफ करके वापिस चला जाए। आशा ही जीवन है।

कोरोना काल में संगीत का महत्त्व

मैं लॉक डाऊन की वजह से घर में अपने को कैद जैसा महसूस कर रहा था। गाने भी बहुत सुन लिए थे। फिल्में भी बहुत देख ली थीं। भूतिया आत्मा जैसी फिल्मों का बोलबाला था। आजकल वे अच्छी लग रही थीं। एकदिन अपने परिवार के लोगों से उन कलाकारों के बारे में मेरी बात चल रही थी, जो लॉक डाऊन के समय अपनी कला विशेषकर संगीत कला को निखार रहे थे। कई लोगों ने तो खुद से ही संगीत सीखना भी शुरु कर दिया था। तभी मेरा ध्यान स्टोर रूम में रखी बाँसुरी की ओर गया जो कुछ सालों से वहाँ वैसे ही पड़ी थी। उस समय उससे बढ़िया गिफ्ट क्या हो सकती थी, क्योंकि उस समय लॉक डाऊन के कारण जरूरी चीजों के इलावा सभी वस्तुओं की आवाजाही पर रोक थी। मैं कॉलेज टाईम से लेकर कभी-कभार बाँसुरी बजा लिया करता था। 20 साल हो गए थे बाँसुरी से मित्रता किए हुए। किसी कला को यदि एकबार भी प्रयोग किया गया हो, तो वह समय के साथ खुद ही बढ़ती रहती है, बेशक फिर उसका प्रयोग बंद ही क्यों न किया जाए। इसीलिए पुराने समय में बचपन में ही सभी विद्याओं और कलाओं का एक्सपोजर दे दिया जाता था। बाँसुरी बजाने से मेरी धुँधली हो रही कुंडलिनी फिर से मजबूत होकर चमकने लगती थी।

बाँसुरी और कुंडलिनी का आपसी संबंध; बाँसुरी योग

बाँसुरी बजाने से प्राणायाम या ब्रीथिंग एक्सरसाइज हो जाती है। साँस भरते समय कुंडलिनी मेरुदंड से ऊपर चढ़ती है, और साँस छोड़ते समय आगे के चक्रों से नीचे उतरती है। इस तरह से कुंडलिनी पूरे शरीर का चक्कर लगाने लगती है। उससे सभी चक्र क्रियाशील हो जाते हैं। कुंडलिनी के ध्यान के साथ गहरी सांस भरी जाती है। फिर ध्यान के साथ धीरे-2 साँस छोड़ने से बाँसुरी की मधुर धुन भी बजती रहती है, और कुंडलिनी भी आगे के चक्रों से नीचे उतरती रहती है। साथ में, बाँसुरी की आवाज की शक्ति भी कुंडलिनी को लगती रहती है। इन सब से कुंडलिनी चमकने लग जाती है। उसके बाद आदमी को ऐसा लगता है जैसे कि उसने कुंडलिनी योग कर लिया हो। बाँसुरी योग भी अप्रतिम कुंडलिनी योग है। इससे तन और मन दोनों एकदम से स्वस्थ हो जाते हैं।

बाँसुरी एक सर्वोत्तम प्रकार का वाद्ययंत्र

बाँसुरी सबसे सस्ता और सर्वसुलभ वाद्ययंत्र है। इसको कहीं पर भी और कभी भी बाँस के पौधे से आसानी से बनाया जा सकता है। इसमें किसी विज्ञान या तकनीक की जरूरत नहीं होती। इसे बनाने में संसाधनों का भी बहुत कम प्रयोग होता है। इसमें सभी कुछ प्राकृतिक होता है, कुछ भी सिंथेटिक नहीं होता। इस वजह से बाँसुरी पर्यावरण मित्र होती है। आकार में छोटी होने से इसे कहीं पर भी आसानी से रखा जा सकता है। इन्हीं गुणों के कारण बाँसुरी सदाबहार व शाश्वत वाद्ययंत्र है। संभवतः इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण को बाँसुरी विशेष प्रिय थी। कई लोग घर में बाँसुरी बजाने से यह सोचकर परहेज करते हैं कि इसे खुले में बजाया जाना चाहिए। मैं भी यही सोचता था, पर 20 साल पहले ही मेरा यह भ्रम टूट गया था जब मैंने जंगली देहातों में रहने वाले लोगों को भी अपने कमरे के अंदर बाँसुरी बजाते हुए देखा।  चाहे कितना ही बड़ा लॉक डाऊन या आपातकाल क्यों न लागू हो जाए, बाँसुरी हमेशा मनोरंजन करती रहेगी, और आदमी को अध्यात्म के रास्ते पर ले जाती रहेगी। इसलिए प्रत्येक घर में कम से कम एक बाँस की बाँसुरी तो होनी ही चाहिए।

कुण्डलिनी ही सहस्रार चक्र से नीचे झरने वाले अमृत के रूप में कोरोना (कोविड-19) के खिलाफ काम कर सकती है

यह पोस्ट चिकित्सा विज्ञान का विकल्प नहीं है, अपितु उसकी अनुपूरक है। कृपया कोरोना से लड़ने के लिए डाक्टर की सलाह का पालन अवश्य करते रहें।

मस्तिष्क ही हमारे शरीर का बोस है। वह पूरे शरीर के सुचारु संचालन के लिए पूरे शरीर में सन्देश प्रसारित करता रहता है। कुछ सन्देश होरमोन के रूप में होते हैं, तो कुछ सन्देश नर्व सिग्नल के रूप में होते हैं।

हम उन संदेशों को महसूस नहीं कर सकते, इसलिए हम उन्हें मस्तिष्क में पैदा करके वहां से पूरे शरीर की तरफ बलपूर्वक नहीं धकेल सकते। जिस चीज को हम मस्तिष्क में महसूस कर सकते हैं, हम उसे ही शरीर की तरफ रवाना कर सकते हैं। हम विचारों को मस्तिष्क में महसूस कर सकते हैं। हम उन्हें शरीर के विभिन्न चक्रों तक ध्यान से उतार सकते हैं। इससे भी मस्तिष्क में संदेशवाहक रसायनों के निर्माण को बल मिलता है, जो पूरे शरीर में प्रसारित हो जाते हैं। परन्तु यह बल बहुत कम होता है, क्योंकि कभी-कभार उठने वाले व बदलते विचारों की चमक धुंधली होती है। साथ में, भिन्न-२ विचारों का सहारा लेने से आदमी का मन पैरानोइक या विचलित भी रह सकता है। इस समस्या का हल कुण्डलिनी में निहित है। कुण्डलिनी एकमात्र इष्ट की छवि है, जो रोज के अभ्यास से बहुत चमकीली बनी होती है। उसकी तीव्र चमक से मस्तिष्क में तेजी से रसायन बनते हैं। जब उस कुण्डलिनी को विभिन्न चक्रों तक उतारा जाता है, तब साथ में वे सभी रसायन भी वहां पहुँच जाते हैं, जो शरीर की बहुत मदद करते हैं। एकमात्र छवि का सहारा लेने से आदमी का मन भी विचलित नहीं होता। साथ में, कुण्डलिनी से आध्यात्मिक उन्नति भी प्राप्त होती है, जिससे मुक्ति मिलती है।

कुण्डलिनी ही सहस्रार से झरने वाला अमृत (एम्ब्रोसिया) है

योग शास्त्रों में लिखा है कि चन्द्रमा से पैदा हुए अमृत को सूर्य खाता है। सहस्रार ही वह चंद्रमा है। उसे बिंदु भी कहते हैं। विशुद्धि चक्र सूर्य है। कुण्डलिनी को ही अमृत कहा गया है, क्योंकि वही प्रकाश, आनंद व मुक्ति प्रदान करती है। साथ में, संभवतः कुण्डलिनी कोरोना जैसी प्राणघातक बीमारियों से भी हमारी रक्षा करती है, जैसा कि आगे बताया गया है।

योग साधना में भी यह सिखाया जाता है कि कुण्डलिनी को मूलाधार (शक्ति-उत्पादक चक्र) से उठाकर पीठ (महान नाग) के रास्ते से सहस्रार (नाग का फण) तक उठाना चाहिए। फिर उसे आगे के सभी चक्रों से होकर धीरे-२ नीचे उतारना चाहिए। इसका भी यही अर्थ है।

कुण्डलिनी को सहस्रार से नीचे उतारने के लिए विभिन्न रेखा-चित्रों का सहारा लिया जा सकता है

सिर-गर्दन की बाऊंडरी से बाहर निकलने वाली तिरछी-खड़ी रेखा गलती से बनी है

कुण्डलिनी को इन रेखा-चित्रों की रेखाओं पर घुमाया जाता है, जिससे वह उत्तरोत्तर चमकती जाती है।

कुण्डलिनी को नाग के माध्यम से भी नीचे उतारा जा सकता है

विशुद्धि चक्र से नीचे के चक्रों तक कुण्डलिनी को नाग की सहायता से भी पहुँचाया जा सकता है। विशुद्धि चक्र तक गर्दन सीधी रहती है, परन्तु उसके नीचे के चक्रों के लिए गर्दन को आगे को मोड़कर ठोड़ी को छाती से लगाया जाता है। इसे जालंधर बंध (चिन लौक) कहते हैं। इसके साथ कल्पना की जा सकती है कि नाग अपना फण नीचे करके अनाहत चक्र का चुम्बन कर रहा है। इससे सहस्रार व अनाहत चक्र कुण्डलिनी के पुल से आपस में जुड़ जाते हैं। इसी तरह, सहस्रार और मणिपुर चक्र; सहस्रार और स्वाधिष्ठान चक्र; और सहस्रार व मूलाधार चक्र भी आपस में जुड़ जाते हैं। इससे मस्तिष्क के सारे जैव-रसायन भी कुण्डलिनी के साथ सभी चक्रों पर पहुँच जाते हैं, जिससे शरीर और मन दोनों स्वस्थ रहते हैं।

कुण्डलिनी से कोरोना के खिलाफ लड़ने में मदद मिल सकती है

पुराने जमाने में एंटीबायोटिकस व वैक्सीन नहीं होती थीं। फिर भी लोग स्वस्थ रहते थे। उनके अच्छे स्वास्थ्य के लिए कुण्डलिनी काफी हद तक जिम्मेदार थी, जो उनके दैनिक जीवन में शामिल होती थी। योगी तो कभी बीमार होते ही नहीं थे।

पुराने जमाने में ही अधिकाँश जानें श्वास-रोगों से जाती थीं। कोरोना वायरस भी श्वास रोग पैदा करता है। श्वास रोग गले के रोगों से शुरू होते हैं। विशुद्धि चक्र गले में ही स्थित है। अमृत का झरना भी सहस्रार से विशुद्धि चक्र तक ही मुख्य रूप से दिखाया जाता है। सीधी सी बात है कि उससे गले के रोग ठीक होते थे, जिससे योगियों की जान बच जाती थी। तभी कुण्डलिनी को अमृत अर्थात जान बचाने वाला कहा गया है।

कुण्डलिनी ही देवी-देवताओं के रूप में रोगों से हमारी रक्षा करती है

पुराने जमाने में विशेष रोग से बचाव के लिए एक विशेष देवता का मंदिर होता था, जैसे कि बच्चों के छोटी माता रोग (small pox) से बचाव के लिए शीतला माता। उस देवी माता का मंदिर बहते पानी के पास, ठंडी जगह पर होता था। मतलब है कि रोग के बुखार को उस ठंडी जगह से ठंडक मिलती थी। आज भी ऐसे बहुत से मंदिर हाई। वास्तव में उन देवी-देवताओं की पूजा से कुण्डलिनी संपुष्ट होती है, जो हमारे इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है।    

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कुण्डलिनी से कोरोना से बचाव; कुण्डलिनी ही जीवन के लिए जोखिम भरी परिस्थितियों में सबसे अधिक साथ निभाती है, चाहे वह कोरोना वायरस हो या अन्य कोई भयंकर परिस्थिति

कुछ पहुंची हुई बातें हमें विश्वास करके माननी ही पड़ती हैं, क्योंकि उन्हें प्रत्यक्ष विज्ञान के द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता। इन्हीं में से एक बात है, परलोकगमन के समय कुण्डलिनी की सहायता प्राप्त होना। सभी धर्मों में यह बात बताई गई है कि एक इष्ट का ध्यान करते रहना चाहिए। वही इष्ट परलोक यात्रा को सुगम बनता है। यदि अंत समय में उस इष्ट का स्मरण हो जाए, तो मुक्ति निश्चित है। यदि मुक्ति न भी हो, तो इतना तो जरूर है कि वह जीवात्मा को धरती के बंधन से छुड़ाता है, जिससे परलोक यात्रा सुगम व शीघ्र हो जाती है। यह तो विज्ञान से भी सिद्ध है कि अंतरिक्ष यान को धरती के गुरुत्वाकर्षण से छूटने के लिए ही महान बल चाहिए होता है। उसके बाद वह स्वयं ही ऊपर जाता रहता है। वैसा ही बल इष्ट के स्मरण से मिलता है। उसी इष्ट को कुण्डलिनी कहते हैं।

राजा परीक्षित को इसी इष्ट-ध्यान से एक सप्ताह में मुक्ति मिल गई थी

राजा परीक्षित को पता चल गया था कि एक सप्ताह में उनकी मृत्यु होने वाली थी। इसलिए उन्होंने अपना पूरा ध्यान श्री कृष्ण में लगा दिया था। इससे उन्हें मुक्ति मिल गई। इसी तरह रजा खट्वांग को पता चल गया था कि उनकी मृत्यु 1 घंटे बाद होने वाली है। इसलिए उन्होंने अपना पूरा ध्यान अपने इष्ट में लगा दिया था। इससे उन्हें मुक्ति मिल गई।

इसीलिए मेरी नानी जी कहा करती थीं कि आजकल तो मुक्ति को प्राप्त करना बहुत आसान है। आजकल डाक्टर लोग पहले से बता देते हैं कि किस बीमार व्यक्ति के मरने की सम्भावना कब और कितनी है।

कुण्डलिनी ध्यान से कोरोना वायरस से निपटने में भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों प्रकार से मदद मिल सकती है

कोरोना वायरस से भी पता चल ही गया है कि आदमी की जिंदगी बहुत अस्थायी है। इससे शिक्षा लेते हुए लोगों को कुण्डलिनी साधना शुरू कर देनी चाहिए। पहले तो कुण्डलिनी आदमी को कोरोना से बचाने की पूरी कोशिश करेगी, जैसा कि पिछली एक और अन्य स्वास्थ्य संबंधी कुंडलिनी पोस्टों में बताया गया है। यदि आदमी फिर भी बच न पाया, तो यह उसे मुक्ति प्रदान करेगी या परलोक यात्रा को तो आसान बनाएगी ही।

कुण्डलिनी को तालु और गले पर विशेष रूप में केन्द्रित करें

वैसे तो कुण्डलिनी को प्रत्येक चक्र पर बारी-बारी से केन्द्रित करना चाहिए, फिर भी तालु चक्र, विशुद्धि चक्र और अनाहत चक्र पर विशेष ध्यान देना चाहिए। कोरोना वायरस का हमला इन्हीं क्षेत्रों पर होता है। कुण्डलिनी को इन क्षेत्रों में केन्द्रित करने से वहां पर सकारात्मक रक्त संचार बढ़ेगा। रक्त संचार के सकारात्मक होने का अर्थ है कि रक्त संचार के साथ कुण्डलिनी भी विद्यमान होगी। वही कुण्डलिनी अद्वैत शक्ति है। शरीर के सूक्ष्म सैनिक उसी अद्वैत शक्ति की सहायता से कीटाणुओं व विषाणुओं के साथ लड़ते हैं, तथा उनका संहार करते हैं। साधारण व्यायाम से रक्त संचार में तो वृद्धि होती है, पर उसमें वह दिव्य कुण्डलिनी शक्ति नहीं होती। तालु चक्र मुख के अन्दर बिलकुल पीछे होता है, जहां पर एक मांस की अंगुली जैसी संरचना नीचे लटकी होती है। वहां पर गला ख़राब होने पर खारिश जैसी भी होती है। विशुद्धि चक्र गर्दन के बिलकुल केंद्र में होता है, जहाँ पर थायरायड ग्रंथि भी होती है। अनाहत चक्र छाती में तथा दोनों स्तनों के बिलकुल बीचोंबीच होता है। विशुद्धि और अनाहत, दोनों ही चक्रों के आगे और पीछे के दो चक्र होते हैं, जो एक सीधी काल्पनिक रेखा से आपस में जुड़े होते हैं। दो-चार दिन के अभ्यास से इन चक्रों का खुद ही पता लगने लगता है। इन चक्रों पर कुण्डलिनी का ध्यान करने से उन पर संकुचन जैसा अनुभव होता है, और एक सरसराहट जैसी संवेदना भी अनुभव होती है। इसका अर्थ है कि वे चक्र क्रियाशील हो गए हैं।

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कुण्डलिनी ही तांत्रिक सैक्सुअल योग के माध्यम से इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना नाड़ियों; चक्रों, और अद्वैत को उत्पन्न करती है।

सभी मित्रों को शिवरात्रि पर्व की बहुत-2 बधाइयां । यह तांत्रिक पोस्ट तंत्र के आदिदेव भगवान शिव व तंत्र गुरु ओशो को समर्पित है।

प्रमाणित किया जाता है कि इस तांत्रिक वैब पोस्ट में किसी की भावना को ठेस पहुंचाने का प्रयास नहीं किया गया है। इसमें तांत्रिक वैबसाइट के अपने स्वतंत्र विचार जनहित में प्रस्तुत किए गए हैं। हम यौनिहिंसा की पुरजोर खिलाफत करते हैं।

कुण्डलिनी ही सबकुछ है। उसी का ध्यान जब शरीर के विशेष बिन्दुओं पर किया जाता है, तब वे बिंदु चक्र कहलाते हैं। उसी को गति देने से जब काल्पनिक मार्ग  बनते हैं, तब वे भी नाड़ियाँ कहलाते  हैं। उसी का ध्यान करने से अद्वैत स्वयं उत्पन्न होता है। इसी तरह अद्वैत का ध्यान करने से कुण्डलिनी स्वयं ही मन में प्रकट हो जाती है।

हमारी रीढ़ की हड्डी में दो आपस में गुंथे हुए सांप बहुत से धर्मों में दिखाए गए हैं। बीच में एक सीधी नाड़ी होती है।

आपस में गुंथे हुए दो नाग यब-युम आसन में जुड़े हुए दो तांत्रिक प्रेमी हैं

जैसा कि आप नीचे दिए गए चित्रों में देख पा रहे हैं। एक नाग पुरुष है, और दूसरा नाग स्त्री है। यह पहले भी हमने बताया है कि मनुष्य का समग्र रूप उसके तंत्रिका तंत्र में ही है, और वह फण उठाए हुए नाग की शक्ल से मिलता-जुलता है। हमारे तंत्रिका  तंत्र का मुख्य भाग मस्तिष्क समेत पीठ (मेरुदंड) में  होता है। इसीलिए हमारी पीठ फण उठाए नाग की तरह दिखती है। क्योंकि कुण्डलिनी (संवेदना) इसी नाग के शरीर (तंत्रिका तंत्र) पर चलती है, इसलिए जिस किसी और रास्ते से भी जब  कुण्डलिनी चलती है, तो अधिकांशतः उस रास्ते को भी नाग का रूप दिया जाता है। वास्तव में  एक नाग एक तांत्रिक प्रेमी की पीठ को रिप्रेसेन्ट करता है, और दूसरा नाग दूसरे तांत्रिक प्रेमी की पीठ को। पुरुष प्रेमी स्त्री के मूलाधार चक्र से कुण्डलिनी का ध्यान शुरू करता है।  फिर वह कुण्डलिनी को सीधा पीछे लाकर अपने मूलाधार पर स्थापित करता है। इस तरह से दोनों  प्रेमियों के मूलाधार आपस में जुड़ जाते हैं, और एक केन्द्रीय नाड़ी का शाक्तिशाली मूलाधार चक्र बनता है, जिसे चित्र में क्रोस के चिन्ह से मार्क किया गया है। वह केन्द्रीय नाड़ी बीच वाले सीधे दंड के रूप में  दिखाई  गई है, जिसे सुषुम्ना कहते हैं। पुरुष नाग को पिंगला, व स्त्री नाग को इड़ा कहा गया है। फिर पुरुष प्रेमी कुण्डलिनी को ऊपर चढ़ा कर  अपने स्वाधिष्ठान चक्र पर स्थापित करता है। वहां  से वह उसे सीधा आगे ले जाकर स्त्री के स्वाधिष्ठान पर स्थापित करता है। इस तरह से सुषुम्ना का स्वाधिष्ठान भी क्रियाशील  हो जाता है। फिर वह उसे स्त्री के स्वाधिष्ठान से ऊपर चढ़ा कर उसीके मणिपुर चक्र पर स्थापित करता है। उससे इड़ा का मणिपुर सक्रिय हो जाता है। वहां से उसे सीधा पीछे ले जाकर अपने मणिपुर चक्र पर स्थापित करता है। उससे पिंगला का मणिपुर भी सक्रिय हो जाता है। दोनों नाड़ियों के मणिपुर चक्रों के एकसाथ क्रियाशील होने से सुषुम्ना का मणिपुर चक्र स्वयं ही क्रियाशील हो जाता है। इस तरह से यह क्रिया ऐसी ही सहस्रार चक्र तक चलती है। स्त्री प्रेमी भी इसी तरह कुण्डलिनी को चलाती है। इस तरह से दो नाग आपस में गुंथे हुए और ऊपर की ओर जाते हुए प्रतीत होते हैं, तथा सुषुम्ना के माध्यम से सहस्रार तक पहुँच जाते हैं।

कैड्यूसियस का चिन्ह (symbol of caduceus) भी तांत्रिक यौनयोग को ही रेखांकित करता है

इस चिन्ह में दो सांप आपस में इसी तरह गुंथे हुए होते हैं। उनके बीच में एक सीधा स्तम्भ होता है, जिसके शीर्ष पर पंख लगे होते हैं। वास्तव में वे पंख कुण्डलिनी के सहस्रार की तरफ जाने का इशारा करते हैं। वैसे भी जागरण के समय कुण्डलिनी फरफराहट के साथ व ऊपर की ओर भारी दबाव के साथ उड़ती हुई महसूस होती है। वह स्तम्भ नीचे की तरफ टेपर करता है। इसका अर्थ है कि ऊपर चढ़ते हुए कुण्डलिनी  अधिक शक्तिशाली होती जाती है।

अपने ही शरीर में दो लिपटे हुए नाग अपने ही शरीर के तंत्रिका तंत्र के सिम्पैथेटिक व पैरासिम्पैथेटिक भागों की संतुलित हिस्सेदारी को भी इंगित करते हैं

इड़ा को पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम कह सकते हैं। वह ल्यूनर, शांत, पेसिव, व फैमिनाइन है। पिंगला नाड़ी को सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम कह सकते हैं। वह सोलर, भड़कीला, एक्टिव, व मैस्कुलाइन है। जब दोनों सिस्टम बराबर मात्रा में आपस में मिले हुए होते हैं, तब जीवन में संतुलन व अद्वैत छा जाता है। वैसी स्थिति में भी कुण्डलिनी विकसित होने लगती है, क्योंकि हमने पहले भी कहा है कि अद्वैत के साथ कुण्डलिनी हमेशा ही रहती है। 

(केवल प्रतीकात्मक चित्र)
(केवल प्रतीकात्मक चित्र)

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